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पूरी गीता, हिन्दी सत्संग में — श्लोक संस्कृत में गाए हुए, फिर उन पर सरल बातचीत। हर सत्संग लगभग एक घंटे का।
अध्याय १ · अर्जुन का विषाद
- १ गीता सार - अध्याय 1 गीता 1.1–1.19
- २ गीता सार - अध्याय 1 गीता 1.20–1.30
- ३ गीता सार - अध्याय 1 गीता 1.31–1.47
अध्याय २ · सांख्ययोग
- ४ गीता सार - अध्याय 2 गीता 2.1–2.10
- ५ गीता सार - अध्याय 2 गीता 2.11–2.25
- ६ गीता सार - अध्याय 2 गीता 2.26–2.38
- ७ गीता सार - अध्याय 2 गीता 2.39–2.53
- ८ गुस्सा कहाँ से आता है गीता 2.54–2.63
- ९ शांति के बिना सुख कहाँ गीता 2.64–2.72
अध्याय ३ · कर्मयोग
- १० काम छोड़ दूँ या करता रहूँ? गीता 3.1–3.16
- ११ बड़े जो करते हैं, सब वही करते हैं गीता 3.17–3.29
- १२ मन मेरी बात क्यों नहीं मानता गीता 3.30–3.43
अध्याय ४ · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
- १३ भगवान बार-बार क्यों आते हैं गीता 4.1–4.15
- १४ हर काम पूजा कैसे बने गीता 4.16–4.32
- १५ संदेह को कैसे काटें गीता 4.33–4.42
अध्याय ५ · कर्मसंन्यास योग
अध्याय ६ · आत्मसंयम योग
- १८ मन को दोस्त कैसे बनाएँ गीता 6.1–6.15
- १९ न ज़्यादा, न कम गीता 6.16–6.32
- २० साधना अधूरी रह गई तो? गीता 6.33–6.47
अध्याय ७ · ज्ञानविज्ञान योग
अध्याय ८ · अक्षरब्रह्म योग
अध्याय ९ · राजविद्या राजगुह्य योग
- २५ सब कुछ उसी में, फिर भी वह अलग गीता 9.1–9.12
- २६ मैं ही यज्ञ, मैं ही औषधि गीता 9.13–9.25
- २७ भगवान क्या माँगते हैं गीता 9.26–9.34
अध्याय १० · विभूति योग
- २८ भगवान खुद समझ का दीया जलाते हैं गीता 10.1–10.11
- २९ मैं आपको कहाँ देखूँ? गीता 10.12–10.25
- ३० जहाँ सुंदरता, वहाँ भगवान गीता 10.26–10.42
अध्याय ११ · विश्वरूप दर्शन योग
- ३१ मुझे अपना असली रूप दिखाओ गीता 11.1–11.14
- ३२ जब भगवान का रूप डरा दे गीता 11.15–11.31
- ३३ मैं काल हूँ, तुम निमित्त हो गीता 11.32–11.44
- ३४ फिर से वही प्यारा रूप गीता 11.45–11.55
अध्याय १२ · भक्तियोग
अध्याय १३ · क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग
- ३७ ज्ञान असल में कैसा दिखता है गीता 13.0–13.11
- ३८ हर जगह हाथ-पैर वाला गीता 13.12–13.23
- ३९ सबमें एक ही भगवान गीता 13.24–13.34