मोह नष्ट हुआ
गीता 18.67–18.78 · 77 मिनट
"मैं वही करूँगा", और जहाँ कृष्ण वहाँ विजय
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥ ६७ ॥
य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥ ६८ ॥
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥ ६९ ॥
क्या कभी ऐसा होता है कि किसी लम्बी उलझन के बाद, बरसों के डर और सवालों के बाद, आदमी सचमुच कह सके कि अब मन साफ़ है? कि अब मुझे पता है मैं कौन हूँ, और मुझे क्या करना है? यही आज का सवाल है: मोह नष्ट हुआ, यह कहने का दिन कैसा होता है? और जो आदमी कुरुक्षेत्र में धनुष छोड़कर बैठ गया था, वह आख़िर में क्या कहकर उठता है: "मैं वही करूँगा"?
जय श्री कृष्ण।
आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का तिरपनवाँ और आख़िरी सत्संग है। यह वाक्य कहते हुए मेरा मन थोड़ा भारी भी है और भरा हुआ भी। पहले सत्संग में मैंने आपसे कहा था कि यह यात्रा पैदल तीर्थ जैसी होगी, बीच में थकान भी आएगी, पर जो पहुँचता है वह फिर पहले जैसा नहीं रहता। आज हम उस तीर्थ के आख़िरी घाट पर खड़े हैं। अठारहवें अध्याय के सड़सठवें श्लोक से अठहत्तरवें श्लोक तक, यानी गीता के आख़िरी बारह श्लोक। और इनमें श्रीकृष्ण का उपदेश पूरा होता है, अर्जुन अपना आख़िरी उत्तर देते हैं, और फिर वही आवाज़ लौट आती है जिससे यह सब शुरू हुआ था: सञ्जय की आवाज़, हस्तिनापुर के महल में, अन्धे राजा धृतराष्ट्र के सामने।
पहले जल्दी से याद कर लें कि पिछली बार हम कहाँ रुके थे। पिछले सत्संग में, चौवनवें से छियासठवें श्लोक तक, श्रीकृष्ण ने वह रास्ता दिखाया था जो शान्त और प्रसन्न मन से परा भक्ति तक पहुँचता है। फिर वह भरोसा दिया था, "मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि", मुझमें चित्त लगाओ, मेरी कृपा से तुम सब कठिनाइयाँ पार कर जाओगे। फिर कहा, ईश्वर सब प्राणियों के हृदय में रहते हैं, उन्हीं की शरण में जाओ। फिर एक बहुत अनोखी बात आई। श्रीकृष्ण ने कहा, "विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु", इस पर पूरी तरह विचार करो, फिर जैसा चाहो वैसा करो। यानी भगवान ने अर्जुन को आदेश नहीं दिया, आज़ादी दी। और फिर, मानो प्रेम रुका न हो, एक बार और बोले: "प्रियोऽसि मे", तुम मुझे प्रिय हो, इसलिए सबसे गुप्त बात फिर सुनो। "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।" सब धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आओ, मैं तुम्हें सब पापों से छुड़ा दूँगा, शोक मत करो।
वहाँ, उस "मा शुचः" पर, उपदेश का सार पूरा हो गया। मधुसूदन सरस्वती आज के पहले श्लोक पर टीका शुरू करते ही दो शब्द लिखते हैं: "समाप्तः शास्त्रार्थः", शास्त्र का अर्थ पूरा हुआ। तो अब श्रीकृष्ण क्या कह रहे हैं? अब वे यह बता रहे हैं कि जो बात अभी कही गई, उसका आगे क्या हो। किसे सुनाई जाए, किसे नहीं, और जो सुनाए, पढ़े या सुने, उसे क्या मिलता है। मधुसूदन इसे "संप्रदाय की विधि" कहते हैं, यानी परम्परा आगे कैसे चले। सोचिए, जैसे कोई पिता बहुत क़ीमती चीज़ बेटे के हाथ में रखकर कहे, "इसे सँभालना, और किसे देना है, यह भी सुन लो।"
सड़सठवाँ श्लोक। "इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन। न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति।" यह उपदेश तुम्हें कभी तपरहित को नहीं कहना चाहिए, न भक्तिरहित को, न उसको जो सुनना ही नहीं चाहता, और न उसको जो मुझमें दोष देखता है।
पहली बार सुनने पर यह श्लोक थोड़ा कड़ा लग सकता है। जैसे गीता किसी बन्द कमरे की चीज़ हो, जिस पर ताला लगा हो। पर हमारी टीका यहाँ एक बहुत साफ़ बात कहती है: इस उपदेश को गोपनीयता के कारण नहीं, बल्कि इसलिए सँभालकर रखा गया है कि यह केवल तैयार आदमी के काम आता है। जो निन्दा करने के लिए ही सुन रहा है, उसे दिया जाए तो व्यर्थ जाता है, और हानि भी कर सकता है।
अब चारों "न" को एक-एक करके देखिए, क्योंकि आचार्य इन्हें बहुत ध्यान से खोलते हैं। पहला, "नातपस्काय", तपरहित को नहीं, यानी जिसके जीवन में तप नहीं। श्रीधर स्वामी तप का अर्थ करते हैं अपने धर्म का पालन, और मधुसूदन कहते हैं, जिसकी इन्द्रियाँ ज़रा भी संयम में नहीं। नीलकण्ठ इसे और सरल कर देते हैं: जो कोई प्रयत्न ही नहीं करता। दूसरा, "नाभक्ताय", भक्तिरहित को नहीं, यानी जिसके मन में न गुरु के लिए आदर है, न भगवान के लिए। तीसरा, "न चाशुश्रूषवे", जो सुनना नहीं चाहता उसे भी नहीं। श्रीधर इसका अर्थ सेवा से भी जोड़ते हैं, जो पास बैठकर सेवा नहीं करता। और ज्ञानेश्वर महाराज यहाँ एक बड़ी प्यारी उपमा देते हैं: मोती कितना भी अच्छा हो, अगर उसमें छेद न हो तो धागा उसमें कैसे जाएगा? जिसमें सुनने की चाह ही नहीं, उसमें गीता का धागा नहीं पिरोया जाता।
और चौथा, सबसे भारी: "न च मां योऽभ्यसूयति", जो मुझमें दोष देखता है। शंकराचार्य और मधुसूदन दोनों इसका अर्थ एक ही तरह करते हैं: जो श्रीकृष्ण को साधारण मनुष्य मानकर सोचे कि यह आदमी तो अपनी ही बड़ाई कर रहा है, और उनके ईश्वर होने को सह न सके। रामानुज एक बारीकी देखते हैं जो संस्कृत व्याकरण से आती है। पहले तीन लोगों के लिए श्लोक एक तरह की बनावट रखता है, और इस चौथे के लिए बनावट बदल देता है। वे कहते हैं, यह इसलिए कि ऐसे आदमी से तो सबसे ज़्यादा दूर रहना है। और मधुसूदन एक बात और कहते हैं जो मुझे बहुत सच्ची लगती है। श्लोक में चार अलग-अलग "न" इसलिए हैं कि इनमें से एक भी कमी हो, तो भी आदमी इस बात को लेने लायक नहीं रहता। बहुत बड़ा तपस्वी हो, बहुत बुद्धिमान हो, पर अगर दोष ढूँढने के लिए ही बैठा है, तो गीता उसके भीतर नहीं उतरेगी।
अब इसे अपने घर की भाषा में सुनिए। आपने कभी किसी को कोई बहुत प्यारी बात सुनाई हो, कोई दिल की बात, और सामने वाला बीच में ही हँसी उड़ा दे, या फ़ोन देखने लगे? उस दिन आपको समझ आता है कि हर बात हर समय हर किसी से नहीं कही जाती। यह कंजूसी नहीं, यह बात का आदर है। बीज भी उसी मिट्टी में डाला जाता है जो उसे थाम सके। ज्ञानेश्वर यही कहते हैं: समुद्र गहरा है, यह कौन नहीं मानता, पर उस पर बरसी वर्षा व्यर्थ ही जाती है। वही पानी प्यासे खेत में गिरे, तो अन्न उगता है।
अब अड़सठवाँ श्लोक, और यहाँ से फल की बात शुरू होती है। "य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति। भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः।" जो मुझमें परम भक्ति करके यह परम गुप्त उपदेश मेरे भक्तों में कहेगा, वह निःसन्देह मुझे ही प्राप्त होगा।
ध्यान दीजिए, पिछले श्लोक में चार कमियाँ गिनाई गईं, और इस श्लोक में बस एक गुण बचा है: "मद्भक्तेष्वभिधास्यति", जो मेरे भक्तों में कहेगा। शंकराचार्य और मधुसूदन दोनों इस पर रुकते हैं। वे कहते हैं, भक्ति का नाम यहाँ दोबारा लिया गया है, तो इसका अर्थ यह है कि केवल भक्ति से भी आदमी इस शास्त्र को पाने का अधिकारी हो जाता है। यानी बहुत पढ़ा-लिखा न हो, बहुत बड़ा तपस्वी न हो, पर भगवान से प्रेम हो, तो दरवाज़ा उसके लिए खुला है। मुझे यह बात आज के सत्संग में बहुत भरोसे वाली लगती है, क्योंकि हम में से ज़्यादातर लोग न बड़े विद्वान हैं, न बड़े तपस्वी। हमारे पास बस थोड़ा-सा प्रेम है।
और कैसे कहे, यह भी श्लोक बताता है: "भक्तिं मयि परां कृत्वा", मुझमें परम भक्ति करके। शंकराचार्य इसका बहुत सुंदर अर्थ करते हैं। वे कहते हैं, सुनाने वाला यह सोचकर सुनाए कि मैं परम गुरु भगवान की सेवा कर रहा हूँ। यानी सुनाना कोई बड़ाई का काम नहीं, सेवा है। जो गीता सुनाते हुए यह सोचे कि लोग मुझे बड़ा मानेंगे, वह गीता नहीं, अपने को सुना रहा है।
पर यहाँ नीलकण्ठ एक बहुत उदार बात कहते हैं, जो मुझे पढ़कर अच्छा लगा। वे कहते हैं, अगर कोई आदमी भक्ति के बिना, केवल मान और पूजा पाने के लिए भी यह बात भक्तों को सुनाता है, तो भी उस पुण्य से धीरे-धीरे उसके भीतर भक्ति जाग जाती है, और वह भी आख़िर में वहीं पहुँचता है। और वे अपनी बात के लिए अजामिल की कथा याद दिलाते हैं, जिसने अपने बेटे को "नारायण" कहकर पुकारा था, और भगवान ने उतने से ही उसे सद्गति दे दी। नीलकण्ठ का तर्क सीधा है: जब बेटे के नाम में छिपा भगवान का नाम भी काम आ गया, तो जो अपनी वाणी से इतना बड़ा रहस्य कह रहा है, उसका क्या कहना। गीता का स्वभाव ही ऐसा है। आग को अनजाने में भी छू लो, तो वह जलाती ही है। यह उपमा भी नीलकण्ठ की ही है, अगले श्लोक पर।
और अब उनहत्तरवाँ श्लोक, जो प्रेम की भाषा में है। "न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः। भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि।" मनुष्यों में उससे बढ़कर मेरा प्रिय काम करने वाला कोई नहीं है, और पृथ्वी पर उससे बढ़कर मेरा प्रिय दूसरा कोई होगा भी नहीं।
श्रीधर स्वामी और मधुसूदन इसे तीनों कालों में फैला देते हैं: न पहले कोई था, न अभी है, न आगे होगा। और अभी-अभी, पैंसठवें श्लोक में, श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था, "प्रियोऽसि मे", तुम मुझे प्रिय हो। अब वही "प्रिय" शब्द वे उस आदमी के लिए कह रहे हैं जो यह बात आगे दूसरों तक ले जाए। मानो कह रहे हों, अर्जुन, तुम मुझे प्रिय हो, और जो तुम्हारी तरह किसी दूसरे के अँधेरे में यह दीपक रख दे, वह भी मुझे उतना ही प्रिय है।
और ज्ञानेश्वर महाराज इस श्लोक को एक बगीचे का रूप दे देते हैं। वे कहते हैं, जब भक्तों की सभा में कोई गीता के श्लोकों को प्रेम से बरसाता है, तो ऐसा लगता है जैसे वसन्त किसी बगीचे में आ गया हो: पत्तों पर रोमांच, फूलों की आँखों में ख़ुशबू के आँसू, और कोयल की कूक में भरा हुआ गला। और वे कहते हैं, ऐसे आदमी को भगवान अपने कलेजे में रखते हैं।
अब एक बात जो मैं ईमानदारी से कहना चाहता हूँ। इन श्लोकों को सुनकर कोई सोच सकता है कि तो फिर गीता सुनाने वाले को बहुत बड़ा मान लिया जाए। नहीं। श्लोक सुनाने वाले की बड़ाई नहीं कर रहा, उस काम की बड़ाई कर रहा है। और उस काम की शर्त है: "मद्भक्तेष्वभिधास्यति", भक्तों में कहना, और "भक्तिं मयि परां कृत्वा", भक्ति से। जो माँ रात को अपने बच्चे को गीता का एक श्लोक सुनाकर सुलाती है, जो दादाजी पोते को अर्थ समझाते हैं, जो दोस्त किसी टूटे हुए दोस्त को फ़ोन पर बस इतना कह देता है कि "शोक मत कर, उसने कहा है वह छुड़ा देगा", ये सब इसी श्लोक के लोग हैं।
पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने सुनाने वाले की बात कह दी। अब वे उसकी बात करेंगे जो बस पढ़ता है, और उसकी, जो केवल सुनता है। और मुझे लगता है कि वह बात आज सीधे आपके लिए है, जो इतने दिनों से यह यात्रा सुन रहे हैं। आइए, अगले तीन श्लोक सुनते हैं।
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः ।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥ ७० ॥
श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः ।
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥ ७१ ॥
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा ।
कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय ॥ ७२ ॥
सत्तरवाँ श्लोक। "अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः। ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः।" और जो हम दोनों के इस धर्ममय संवाद को पढ़ेगा, उसके द्वारा मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा, ऐसा मेरा मत है।
"संवादमावयोः", हम दोनों का संवाद। श्रीकृष्ण यह नहीं कहते कि "मेरा उपदेश"। वे कहते हैं "हम दोनों की बातचीत"। अर्जुन के सवाल, अर्जुन के आँसू, अर्जुन का डर, यह सब भी इस गीता का हिस्सा है। और यही बात हमें भी छूती है। गीता में केवल भगवान के उत्तर नहीं हैं, उसमें हमारे सवाल भी हैं। जो आदमी पहले अध्याय में अपने मन का डर पढ़ता है, वह भी गीता पढ़ रहा है।
और "ज्ञानयज्ञ" शब्द हमारे लिए नया नहीं है। हमारी टीका याद दिलाती है कि यह वही ज्ञानयज्ञ है जिसकी प्रशंसा चौथे अध्याय में हुई थी: "श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप", चीज़ों से किए जाने वाले यज्ञ से ज्ञान का यज्ञ श्रेष्ठ है। और टीका कहती है, इन वचनों का ध्यान से किया गया साधारण पाठ भी पूजा माना गया है। यानी जो आदमी सुबह चाय से पहले गीता का एक अध्याय, या एक श्लोक, ध्यान से पढ़ लेता है, उसने उस दिन यज्ञ कर लिया। न आग जली, न घी डाला गया, न कोई पुरोहित आया। पर भगवान कहते हैं, "मैं पूजित हुआ"।
अब यहाँ श्रीधर स्वामी एक प्रश्न उठाते हैं जो शायद आपके मन में भी हो। अगर कोई आदमी संस्कृत नहीं जानता, अर्थ नहीं समझता, बस पाठ करता जाता है, तो? और उनका उत्तर बहुत प्यारा है। वे कहते हैं, ऐसा आदमी अर्थ न समझे, फिर भी जब वह पाठ करता है, तो भगवान को लगता है कि यह मुझे ही पुकार रहा है। जैसे दुनिया में कोई किसी का नाम यूँ ही ले ले, तो वह आदमी यह सोचकर पास आ जाता है कि मुझे बुलाया गया। वैसे ही भगवान उसके पास आ जाते हैं। मधुसूदन भी यही बात दोहराते हैं, और फिर जोड़ते हैं कि जो अर्थ समझकर, मन शुद्ध करते हुए पढ़े, उसका तो कहना ही क्या।
और ज्ञानेश्वर महाराज इस पर एक ऐसी पंक्ति कहते हैं जो मुझे इस पूरी यात्रा में सबसे ज़्यादा याद रहेगी। वे कहते हैं, गीता के पाठ करने वाले को भी वही फल मिलता है जो अर्थ जानने वाले को, क्योंकि गीता माँ है, और माँ यह भेद नहीं करती कि कौन-सा बच्चा समझदार है और कौन-सा अभी गोद का है। गीता माउली। माँ गीता। गोद के बच्चे को भी वही दूध मिलता है।
अब इकहत्तरवाँ श्लोक। "श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः। सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्।" जो मनुष्य श्रद्धावान् और दोषदृष्टि से रहित होकर इसे केवल सुनता भी है, वह भी पापों से मुक्त होकर पुण्य करने वालों के शुभ लोकों को प्राप्त होता है।
देखिए, सीढ़ी कैसे नीचे उतरती आई है। पहले उसकी बात हुई जो भक्तों को यह बात सुनाए। फिर उसकी, जो इसे पढ़े। और अब उसकी, जो केवल सुने। "शृणुयादपि", सुने भी। उस छोटे-से "अपि" पर शंकराचार्य, मधुसूदन और नीलकण्ठ, तीनों रुकते हैं। वे कहते हैं, जब केवल सुनने वाले को इतना मिलता है, तो जो सुनकर अर्थ भी समझे, उसकी बात ही क्या।
और श्रीधर स्वामी इस श्लोक की दो शर्तों का एक बहुत ज़मीनी अर्थ करते हैं। वे एक दृश्य बनाते हैं: कोई आदमी ज़ोर-ज़ोर से गीता का पाठ कर रहा है, और पास से कोई दूसरा सुन रहा है। अब सुनने वाला दो तरह का हो सकता है। एक, जो श्रद्धा से सुनता है। और दूसरा, जो मन में कहता है, "यह इतने ज़ोर से क्यों पढ़ रहा है? और ग़लत-सलत भी पढ़ रहा है।" श्रीधर कहते हैं, "श्रद्धावाननसूयश्च" में दोषदृष्टि न करने की शर्त इसी दूसरे आदमी को अलग करने के लिए है। सुनने का फल उसे मिलता है जो सुनते समय उच्चारण की ग़लतियाँ नहीं गिनता, आवाज़ की कमियाँ नहीं गिनता, बस सुनता है।
और नीलकण्ठ यहाँ भागवत की एक पंक्ति याद करते हैं, जिसका भाव है कि वासुदेव की कथा तीन लोगों को पवित्र करती है: कहने वाले को, पूछने वाले को, और सुनने वाले को, जैसे उनके चरणों का जल। ज्ञानेश्वर इसे और आगे ले जाते हैं। वे कहते हैं, जैसे जंगल में आग घुसते ही जंगल के जानवर दिशाएँ छोड़कर भाग जाते हैं, या सूरज उगते ही आकाश का अँधेरा खो जाता है, वैसे ही जब गीता कान के महाद्वार पर गूँजती है, तो पाप भाग जाते हैं।
और अब मैं आपसे एक बात कहना चाहता हूँ, जो इसी श्लोक के लिए रखी थी। इन तिरपन सत्संगों में आप सुनते रहे हैं। किसी ने हर दिन शाम को सुना होगा, किसी ने गाड़ी चलाते हुए, किसी ने रसोई में काम करते हुए, किसी ने अस्पताल के गलियारे में बैठकर, किसी ने रात को नींद न आने पर। कुछ लोग बीच में छूट गए होंगे और फिर लौट आए होंगे। और हो सकता है कि बहुत-सी बातें आपको याद भी न हों। कोई आचार्य का नाम, कोई महाभारत की कथा, कोई श्लोक का शब्द। पर यह श्लोक आपके लिए है। "श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः।" भगवान ने यह नहीं कहा कि जो सब याद रखे। उन्होंने कहा, जो श्रद्धा से सुने। आपने सुना। इतने दिनों तक, धीरज से, श्रद्धा से। उसके लिए मैं आपको मन से धन्यवाद देता हूँ। और सच कहूँ, यह धन्यवाद मुझसे बड़ा है। जो आवाज़ आप सुन रहे हैं, वह तो बस एक सारथी की तरह है। रथ तो गीता का है, और आप उसमें इतने दिन बैठे रहे।
अब महाभारत की एक बात, जो गीता के ठीक बाद आती है, और जो इसी श्लोक के भाव को एक दूसरी आवाज़ में कहती है। भीष्म पर्व का बयालीसवाँ अध्याय गीता का अठारहवाँ अध्याय है। और तैंतालीसवाँ अध्याय, यानी गीता पूरी होते ही जो अध्याय शुरू होता है, उसके पहले पाँच श्लोक गीता की प्रशंसा के हैं। ये श्लोक वैशम्पायन के मुख से आते हैं, यानी उस कथावाचक के, जो पूरा महाभारत राजा जनमेजय को सुना रहे हैं।
पहला श्लोक है: "गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रसंग्रहैः।" गीता को अच्छी तरह पढ़ना और समझना चाहिए, दूसरे शास्त्रों के संग्रहों से क्या लाभ? क्योंकि यह स्वयं पद्मनाभ भगवान के मुखकमल से निकली है। फिर कहा, गीता में सब शास्त्र हैं, जैसे हरि में सब देवता, और गंगा में सब तीर्थ। फिर एक बहुत प्यारी पंक्ति: गीता, गंगा, गायत्री और गोविन्द, "ग" से शुरू होने वाले ये चारों जिसके हृदय में बसे रहें, उसका फिर जन्म नहीं होता।
और फिर चौथे और पाँचवें श्लोक में एक हिसाब है, जो मुझे बहुत रोचक लगता है। वहाँ लिखा है कि केशव ने छह सौ बीस श्लोक कहे, अर्जुन ने सत्तावन, सञ्जय ने सड़सठ, और धृतराष्ट्र ने, एक। यह पुराना हिसाब है, और आज की प्रचलित प्रति, जिसमें सात सौ श्लोक हैं, उससे यह पूरा मेल नहीं खाता। पुराने पाठों की अपनी गिनती होती है, और हम उस बहस में नहीं जाएँगे। पर एक बात दोनों में एक-सी है: धृतराष्ट्र ने पूरी गीता में केवल एक श्लोक कहा। वही पहला श्लोक। "धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः। मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय।" पूरी गीता में अन्धे राजा का बस एक सवाल है, और बाकी सब उत्तर है।
और पाँचवाँ श्लोक कहता है, गीता पूरे महाभारत का अमृत है; कृष्ण ने उसे मथकर उसका सार निकाला और अर्जुन के मुख में डाल दिया। अर्जुन के मुख में। जैसे माँ बच्चे के मुँह में कौर रखती है।
और अब, इससे पहले कि हम अगले श्लोक में उतरें, एक छोटी-सी बात आपसे कहना चाहता हूँ। हम पूरी गीता के सबसे नाज़ुक मोड़ पर खड़े हैं। अगले श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन से एक सवाल पूछेंगे, और उसके बाद अर्जुन पूरी गीता में आख़िरी बार बोलेंगे। फिर सञ्जय अपनी बात कहेंगे, और वह एक श्लोक आएगा जिसे पूरी गीता का निचोड़ कहा जाता है। आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। जो आदमी इतनी दूर चलकर आख़िरी घाट से पहले लौट जाए, उसने तीर्थ का पानी देखा, पर उसमें डुबकी नहीं लगाई। तो अगर आप यह सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की यह यात्रा आपके पास बनी रहे, और जब मन करे आप किसी भी पड़ाव पर लौट सकें। और आज का यह आख़िरी सत्संग आख़िर तक सुनिए, क्योंकि आज का सबसे सुंदर उत्तर अभी आना बाकी है।
बहत्तरवाँ श्लोक। "कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा। कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय।" हे पार्थ, क्या तुमने यह एकाग्र चित्त से सुना? हे धनञ्जय, क्या तुम्हारा अज्ञान से उत्पन्न मोह नष्ट हो गया?
सोचिए। सात सौ श्लोकों के बाद, विश्वरूप दिखाने के बाद, सब कुछ कह देने के बाद, भगवान एक शिक्षक की तरह पूछते हैं: "समझ आया?" हमारी टीका कहती है, एक अच्छे गुरु की तरह श्रीकृष्ण जाँचते हैं कि उपदेश ने अपना काम किया या नहीं, और न किया हो तो फिर से समझाने को तैयार हैं। शंकराचार्य यही बात और साफ़ कहते हैं: पूछने वाले का भाव यह है कि अगर बात नहीं पहुँची, तो मैं किसी दूसरे उपाय से फिर समझाऊँगा। और वे कहते हैं, यहाँ आचार्य का धर्म दिखाया गया है, कि दूसरा प्रयत्न करके भी शिष्य को कृतार्थ करना चाहिए।
नीलकण्ठ एक और बात कहते हैं। श्रीकृष्ण तो सबके भीतर बैठे हैं, सब जानते हैं, उन्हें पूछने की ज़रूरत नहीं। फिर भी पूछते हैं, संसार को सिखाने के लिए। और नीलकण्ठ उनके मन का भाव ऐसे बताते हैं: अगर इसे नहीं समझ आया, तो जैसे पुराने समय में एक गुरु अपने शिष्य निदाघ के पास बार-बार लौटकर उसे समझाते रहे, वैसे ही मैं इसे सौ बार भी समझाऊँगा। सौ बार। हमारे जीवन में ऐसा कोई कम ही होता है जो सौ बार समझाने को तैयार हो।
और अब इस श्लोक का सबसे गहरा शब्द: "प्रनष्टस्ते", तुम्हारा पूरी तरह नष्ट हुआ। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, इसमें "प्र" इसलिए लगा है कि मोह ऐसा मिटा हो कि फिर लौटकर न उठ सके। और रामानुज इस श्लोक में एक बात जोड़ते हैं जो हमें सीधे पीछे ले जाती है। वे कहते हैं, श्रीकृष्ण यह पूछ रहे हैं कि क्या वह अज्ञान मिट गया, जिससे मूढ़ होकर तुमने कहा था, "मैं नहीं लड़ूँगा"।
आपको याद होगा, चौथे सत्संग में हमने यह शब्द सुना था। दूसरे अध्याय का नौवाँ श्लोक: "न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह।" "मैं नहीं लड़ूँगा", गोविन्द से यह कहकर अर्जुन चुप हो गए। वहाँ अर्जुन की चुप्पी थी। आज भगवान का सवाल है। और बीच में पूरी गीता।
पर अभी एक बात बाकी है। सवाल पूछ लिया गया है। अब अर्जुन का उत्तर आएगा, गीता में उनके आख़िरी शब्द। और उस एक श्लोक में पहले अध्याय का एक-एक घाव भरता हुआ दिखेगा। आइए, सुनते हैं।
अर्जुन उवाच
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ॥ ७३ ॥
सञ्जय उवाच
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः ।
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥ ७४ ॥
"नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत। स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव।" हे अच्युत, आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और मुझे स्मृति प्राप्त हो गई। मैं सन्देहरहित होकर स्थित हूँ। मैं आपके वचन का पालन करूँगा।
हमारी टीका कहती है: ये गीता में अर्जुन के अन्तिम वचन हैं। बस एक श्लोक। इतने बड़े प्रश्नों के बाद, इतने आँसुओं के बाद, इतने तर्कों के बाद, अर्जुन का उत्तर एक श्लोक का है, और उसमें कोई तर्क नहीं है। जैसे बहुत लम्बी बीमारी के बाद कोई सुबह उठकर बस इतना कहे, "आज ठीक लग रहा है।" उसे लम्बा भाषण नहीं देना पड़ता।
और अब इस श्लोक को मैं आपके साथ धीरे-धीरे, शब्द-शब्द खोलना चाहता हूँ, क्योंकि इसका हर शब्द पहले अध्याय के किसी न किसी घाव पर रखा हुआ मरहम है। आइए, पहले अध्याय की ओर लौटकर देखें कि अर्जुन कहाँ से चले थे।
पहला शब्द: "अच्युत"। अर्जुन श्रीकृष्ण को इस श्लोक में "अच्युत" कहकर पुकारते हैं। अच्युत, यानी जो कभी अपनी जगह से गिरता नहीं, डिगता नहीं। और अब यह सुनिए। गीता में अर्जुन ने पहली बार श्रीकृष्ण से कुछ कहा था, पहले अध्याय के इक्कीसवें श्लोक में, तो किस नाम से पुकारा था? "सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत।" हे अच्युत, मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिए। पहली पुकार भी "अच्युत", और आख़िरी पुकार भी "अच्युत"। बीच में अर्जुन डिगे, गिरे, बैठ गए, रोए। पर जिसे वे पुकार रहे थे, वह पूरे समय अपनी जगह पर था। यह मेल पाठ में है, और इसका अर्थ मैं अपनी ओर से कह रहा हूँ: हम डिगते हैं, वह नहीं डिगता। इसीलिए लौटने की जगह बनी रहती है।
दूसरा: "नष्टो मोहः", मोह नष्ट हुआ। आपको याद होगा, तीसरे सत्संग में हमने पहले अध्याय का आख़िरी श्लोक सुना था: "विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः", शोक से व्याकुल मन वाले अर्जुन बाणसहित धनुष छोड़कर रथ के पिछले भाग में बैठ गए। और महाभारत के आदि पर्व में धृतराष्ट्र जब अपनी हार के कारण गिनाते हैं, तो उसी क्षण के लिए कहते हैं कि अर्जुन "मोह से घिरकर" रथ में बैठ गए थे। वही मोह आज नष्ट हुआ।
पर यहाँ एक बात पर ध्यान दीजिए, जो मुझे बहुत सच्ची लगती है। ग्यारहवें अध्याय के पहले ही श्लोक में अर्जुन एक बार पहले भी कह चुके थे: "मोहोऽयं विगतो मम", मेरा यह मोह चला गया। फिर भी उसके बाद सवाल बचे रहे। विश्वरूप देखकर वे डरे, फिर साकार और निराकार का प्रश्न आया, फिर संन्यास और त्याग का। यानी मोह एक बार में नहीं जाता। परत-दर-परत जाता है। आज अर्जुन ने "नष्टो मोहः" के साथ दो शब्द और जोड़े हैं, "गतसन्देहः" और "करिष्ये", जो ग्यारहवें अध्याय में नहीं थे। यह मेरी अपनी पढ़त है, पर मुझे लगता है कि जिस दिन मोह सचमुच जाता है, उस दिन वह सिर्फ़ समझ में नहीं, काम में भी दिखता है।
और नीलकण्ठ ठीक यही बात बहुत सुंदर ढंग से कहते हैं। वे कहते हैं, अर्जुन का मोह दो तरह का था। एक, जो आत्मा नहीं है उसे आत्मा मान लेना, यानी शरीर को ही आदमी मान लेना। और दूसरा, अपने धर्म को, अपने कर्तव्य को, अधर्म मान लेना। "गतसन्देहः" कहकर अर्जुन बताते हैं कि पहला मोह गया। और "करिष्ये वचनं तव" कहकर बताते हैं कि दूसरा भी गया।
तीसरा: "स्मृतिर्लब्धा", स्मृति मिल गई। कौन-सी स्मृति? क्या अर्जुन कुछ भूल गए थे? तिलक महाराज इसका बहुत सीधा उत्तर देते हैं। वे कहते हैं, देखिए कि अर्जुन को किस बात की विस्मृति हुई थी। दूसरे अध्याय के सातवें श्लोक में अर्जुन ने ख़ुद कहा था, "पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः", धर्म के विषय में मेरा चित्त मोहित है, मैं आपसे पूछता हूँ। तिलक कहते हैं, उसी भूले हुए कर्तव्य की स्मृति आज लौटी है। शंकराचार्य, श्रीधर और नीलकण्ठ इसे और गहरे ले जाते हैं: यह अपने असली स्वरूप की याद है। श्रीधर के शब्दों का भाव है, "यह मैं हूँ", ऐसा अपने आप को पहचान लेना। हमारी टीका दोनों को साथ रखती है: स्मृति अपने सच्चे स्वरूप और अपने कर्तव्य की याद है, जो दोनों पहले अध्याय के विषाद में खो गए थे।
यह शब्द मुझे बहुत भरोसा देता है। अर्जुन यह नहीं कहते कि "मुझे नया ज्ञान मिला"। वे कहते हैं, "मुझे याद आ गया"। यानी जो खोया था वह कहीं बाहर से नहीं आया, वह भीतर ही था, बस ढक गया था। जैसे कोई माँ, जिसका बच्चा बहुत दिन बीमार रहा हो, और वह डर और थकान में भूल गई हो कि वह कितनी मज़बूत है। फिर एक दिन कोई अपना आकर उसका हाथ पकड़ता है, और उसे याद आ जाता है। गीता हमें कुछ ऐसा नहीं देती जो हम नहीं हैं। वह हमें वह याद दिलाती है जो हम हैं।
चौथा: "त्वत्प्रसादान्मयाच्युत", आपकी कृपा से मैंने पाया, हे अच्युत। अर्जुन यह नहीं कहते कि मैंने बहुत ध्यान से सुना इसलिए समझ गया। वे कहते हैं, आपकी कृपा से। पिछले सत्संग में श्रीकृष्ण ने कहा था, "मत्प्रसादात्तरिष्यसि", मेरी कृपा से पार हो जाओगे। आज अर्जुन उसी शब्द में उत्तर देते हैं: "त्वत्प्रसादान्मयाच्युत"। भगवान ने कहा "मेरी कृपा से", शिष्य ने कहा "आपकी कृपा से"। वादा और उसका पूरा होना, दोनों एक ही शब्द में।
पाँचवाँ: "स्थितोऽस्मि", मैं खड़ा हूँ, स्थिर हूँ। अब यह सुनिए, क्योंकि मेरे लिए यह इस श्लोक का सबसे भीगा हुआ शब्द है। दूसरे सत्संग में, पहले अध्याय के तीसवें श्लोक में, अर्जुन ने कहा था: "गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते। न च शक्नोम्यवस्थातुं", गाण्डीव हाथ से फिसल रहा है, त्वचा जल रही है, "मैं खड़ा नहीं रह पा रहा।" और आज वही आदमी कहता है, "स्थितोऽस्मि", मैं खड़ा हूँ। श्रीधर स्वामी इस शब्द का अर्थ करते हैं: युद्ध के लिए उपस्थित हूँ। मधुसूदन कहते हैं: आपकी आज्ञा में स्थित हूँ। जो पैर काँप रहे थे, वे अब टिके हैं। और वे किसी ज़मीन पर नहीं, एक वचन पर टिके हैं।
और छठा, आख़िरी: "करिष्ये वचनं तव", मैं आपका वचन पूरा करूँगा। दूसरे अध्याय में अर्जुन ने कहा था, "न योत्स्य इति", मैं नहीं लड़ूँगा। आज कहते हैं, "करिष्ये", मैं करूँगा। पूरी गीता "न" से "हाँ" तक की यात्रा है। तिलक साफ़ कहते हैं कि गीता का उपदेश अर्जुन को युद्ध में लगाने के लिए हुआ, और जगह-जगह कहा गया, "इसलिए तू युद्ध कर", इसलिए यहाँ "आपकी आज्ञा के अनुसार करूँगा" का अर्थ यही है कि "मैं युद्ध करता हूँ"। रामानुज भी कहते हैं: अभी, इसी समय, युद्ध आदि जो कर्तव्य आपने बताया, वह करूँगा।
और पिछली बार श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आज़ादी दी थी, "यथेच्छसि तथा कुरु", जैसा चाहो वैसा करो। अर्जुन ने उस आज़ादी का क्या किया? उन्होंने उसे भगवान के चरणों में रख दिया: "करिष्ये वचनं तव"। यही आज के शीर्षक का दूसरा हिस्सा है: "मैं वही करूँगा।" यह किसी डरे हुए आदमी का "जी हुज़ूर" नहीं है। यह उस आदमी का निर्णय है जिसे पूरी छूट दी गई, जिसने सब सोच लिया, और फिर अपने मन से कहा, "आप जो कहें, वही"।
और मधुसूदन सरस्वती इसमें एक शब्द जोड़ते हैं जो मुझे बहुत गहरा लगता है। वे "करिष्ये" का अर्थ करते हैं: "यावज्जीवं", जब तक जीवित हूँ, आपकी आज्ञा का पालन करूँगा। और यहाँ मुझे ईमानदारी से कहना होगा कि महाभारत अर्जुन को आगे भी पूरा मनुष्य ही दिखाता है। तेईसवें सत्संग में आपने सुना था कि युद्ध के नौवें दिन, भीष्म के सामने अर्जुन नरमी से लड़ रहे थे, और श्रीकृष्ण रथ से कूदकर हाथ में चाबुक लिए भीष्म की ओर दौड़ पड़े थे। और ग्यारहवें सत्संग में सुना था कि युद्ध के बाद अर्जुन ने ख़ुद श्रीकृष्ण से कहा, "जो आपने पहले मित्रता से कहा था, वह सब मुझ विचलित मन वाले से छूट गया।" तो क्या "नष्टो मोहः" झूठ था? नहीं। मुझे लगता है कि इससे यह पता चलता है कि "करिष्ये" एक दिन का वचन नहीं, जीवन भर का अभ्यास है। स्मृति मिलती है, फिर धुँधली होती है, फिर लौटानी पड़ती है। इसीलिए, जैसा हम अगले श्लोकों में सुनेंगे, सञ्जय कहते हैं कि वे इस संवाद को "बार-बार याद करते हैं"।
और ज्ञानेश्वर महाराज इस श्लोक पर अर्जुन के उत्तर को एक उपमा में रखते हैं। अर्जुन कहते हैं, प्रभु, आप पूछ रहे हैं कि मोह है या नहीं? यह तो ऐसा है जैसे सूरज आँख के पास आकर पूछे कि तुम्हारे भीतर अँधेरा बचा है क्या? और ज्ञानेश्वर लिखते हैं कि अर्जुन की यह बात सुनकर भगवान ख़ुशी से नाच उठे, मानो कह रहे हों, मेरे पूरे संसार का फल आज मुझे मिल गया। जैसे कोई पिता बेटे के पहले क़दम पर नाच उठता है।
और अब चौहत्तरवाँ श्लोक, और यहाँ आवाज़ बदल जाती है। "इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः। संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्।" इस प्रकार मैंने वासुदेव और महात्मा पार्थ का यह अद्भुत और रोमांचकारी संवाद सुना।
हमारी टीका कहती है: पहले अध्याय का ढाँचा लौट आता है। सञ्जय। आपको याद रहे, यह सब सञ्जय हस्तिनापुर में धृतराष्ट्र को सुना रहे थे, युद्ध के दसवें दिन, जब भीष्म बाणों की शय्या पर गिर चुके थे। पहले सत्संग में आपने सुना था कि सञ्जय दौड़ते हुए लौटे और बोले, "महाराज, मैं सञ्जय हूँ, आपको प्रणाम, भीष्म मारे गए।" और तब धृतराष्ट्र ने कहा, "सब शुरू से बताओ।" अब वह "शुरू से" पूरा हुआ। सञ्जय कहते हैं, "इत्यहं वासुदेवस्य", इस प्रकार मैंने वासुदेव और महात्मा पार्थ का यह संवाद सुना।
और देखिए सञ्जय अर्जुन को क्या कहते हैं: "महात्मनः", महात्मा। जो आदमी पहले अध्याय के अन्त में शोक से बैठ गया था, उसे सञ्जय आज "महात्मा" कहते हैं। रामानुज यहाँ रिश्ता भी याद दिलाते हैं: वासुदेव, यानी वसुदेव के पुत्र, और पार्थ, यानी उनकी बुआ के पुत्र, जिन्होंने उनके दोनों चरणों का सहारा लिया है। बीसवें सत्संग में हमने यह रिश्ता महाभारत से देखा था, कि कुन्ती श्रीकृष्ण की बुआ थीं।
और "रोमहर्षणम्", रोंगटे खड़े कर देने वाला, और अद्भुत। मधुसूदन इन दो शब्दों को अलग करते हैं: "अद्भुत" मन पर असर है, विस्मय; और "रोमहर्षण" शरीर पर असर है, रोमांच। यानी यह संवाद मन और शरीर दोनों को छू गया। और ज्ञानेश्वर कहते हैं कि यह कहते-कहते सञ्जय अपने आप को ही भूल गए, आँखों से आनन्द बहने लगा, गला भर आया, और कुछ देर बाद उन्हें फिर अपने शरीर की याद आई।
पर ज्ञानेश्वर उसी जगह एक पंक्ति और लिखते हैं, जो इस पूरी कथा का सबसे उदास सच है। वे कहते हैं, सञ्जय इतने आनन्द में बोले, पर धृतराष्ट्र नहीं पिघले, जैसे चाँदनी में छुआ हुआ पत्थर। और महाभारत भी यही दिखाता है। गीता पूरी होने के बाद, भीष्म पर्व के चौवालीसवें अध्याय में, धृतराष्ट्र के मुँह से जो पहले शब्द निकलते हैं, वे सुनिए। वे पूछते हैं, जब मेरी और दूसरों की सेनाएँ व्यूह में सज गईं, तब पहले किसने प्रहार किया? मूल शब्द हैं, "मामकेष्वितरेषु च", मेरे लोगों में और दूसरों में। मेरे लोग। पहले श्लोक में भी यही था, "मामकाः पाण्डवाश्चैव"। सात सौ श्लोक सुन लिए, और पहला शब्द फिर वही, "मेरे"।
पर अभी एक बात बाकी है। क्या धृतराष्ट्र की कहानी यहीं, इसी पत्थर पर रुक जाती है? और सञ्जय, जिन्होंने यह सब देखा, उन्हें यह दृष्टि मिली कैसे, और फिर उसका क्या हुआ? महाभारत इसका उत्तर बहुत आगे जाकर देता है। आइए, अगले दो श्लोक सुनते हैं।
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम् ।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् ॥ ७५ ॥
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् ।
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ॥ ७६ ॥
पचहत्तरवाँ श्लोक। "व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम्। योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्।" व्यासजी की कृपा से मैंने यह परम गुप्त योग साक्षात् योगेश्वर श्रीकृष्ण से, स्वयं कहते हुए, सुना है।
"व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम्", व्यास की कृपा से मैंने यह परम गुप्त बात सुनी। हमारी टीका याद दिलाती है कि व्यासजी ने सञ्जय को दिव्य दृष्टि दी थी, जिससे वे दूर रहकर पूरा युद्ध देख-सुन सकें। और यह कथा हमने पहले सत्संग में सुनी थी, तो बस इतना याद कर लें। युद्ध से पहले व्यास धृतराष्ट्र के पास आए और बोले, "पुत्र, अगर तुम यह युद्ध देखना चाहो, तो मैं तुम्हें आँखें देता हूँ।" और धृतराष्ट्र ने कहा, "मैं अपने कुटुम्बियों का वध देखना नहीं चाहता, बस सुनना चाहता हूँ।" तब व्यास ने वह दृष्टि सञ्जय को दे दी। श्रीधर, मधुसूदन और नीलकण्ठ, तीनों एक छोटी-सी बात जोड़ते हैं: व्यास ने केवल दिव्य आँख नहीं, दिव्य कान भी दिए थे। तभी तो सञ्जय रथ पर कही गई बात सुन सके, शब्द-शब्द।
और उसी अध्याय में एक पंक्ति है जिस पर मैं आज रुकना चाहता हूँ। व्यास ने धृतराष्ट्र से कहा, मैं इन सब कौरवों और पाण्डवों की कीर्ति फैलाऊँगा, और फिर दो शब्द: "मा शुचः", शोक मत करो। "मा शुचः।" पिछले सत्संग में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से गीता का सबसे बड़ा वचन इन्हीं दो शब्दों पर पूरा किया था: "मोक्षयिष्यामि मा शुचः"। युद्ध के पहले, व्यास ने अन्धे पिता से कहा "शोक मत करो", और युद्ध के बीच, श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा "शोक मत करो"। यह मेल मेरी अपनी पढ़त है, पर मुझे लगता है कि महाभारत में शोक मिटाने वाले दो ही बड़े स्वर हैं, और दोनों एक ही बात कहते हैं।
एक और मेल देखिए। ग्यारहवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था, "दिव्यं ददामि ते चक्षुः", मैं तुम्हें दिव्य नेत्र देता हूँ। और व्यास ने सञ्जय को दिव्य दृष्टि दी। रथ पर एक को आँख मिली, महल में दूसरे को। भगवान ने अर्जुन को देखने की आँख दी, और गुरु ने सञ्जय को। और दोनों ने वही देखा।
अब "साक्षात्कथयतः स्वयम्", स्वयं कहते हुए, साक्षात्। मधुसूदन सरस्वती इस पर एक बहुत मानवीय बात कहते हैं। वे कहते हैं, सञ्जय यहाँ अपने भाग्य पर ख़ुश हो रहे हैं: मैंने परम्परा से, किसी से सुनकर नहीं सुना, सीधे भगवान के मुँह से सुना। और नीलकण्ठ इसे और ऊँचा ले जाते हैं। वे कहते हैं, जैसे सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्मा ने भगवान से सीधे ज्ञान सुना था, वैसे ही आज सञ्जय ने अर्जुन से कहते हुए भगवान को सीधे सुना। उस कृपा में सञ्जय ब्रह्मा के बराबर हो गए।
अब हम अपनी ओर देखें। हमने तो परम्परा से ही सुना है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा, सञ्जय ने धृतराष्ट्र से, फिर व्यास ने यह सब महाभारत में बाँधा, उनके शिष्य वैशम्पायन ने राजा जनमेजय को सुनाया, और फिर हज़ारों बरसों तक आचार्यों ने, माँओं ने, दादियों ने, किसी ने किसी को सुनाया, तब यह हम तक पहुँचा। तो क्या हम घाटे में रहे? नहीं। अभी इकहत्तरवें श्लोक में भगवान ने ख़ुद कहा कि जो श्रद्धा से सुने, वह भी पार हो जाता है। सञ्जय को सीधे सुनने का सौभाग्य मिला। हमें श्रद्धा से सुनने का। और भगवान ने दोनों के लिए दरवाज़ा खोल रखा है।
और एक शब्द और: सञ्जय पूरी गीता को एक नाम देते हैं, "योगं योगेश्वरात्", योगेश्वर से सुना योग। तिलक महाराज इस पर बहुत ज़ोर देते हैं। वे कहते हैं, देखिए, श्रीकृष्ण, अर्जुन और सञ्जय, तीनों इसे "योग" कहते हैं, और उनकी समझ में यह योग कर्मयोग है, यानी संसार में रहकर, आसक्ति छोड़कर अपना कर्तव्य करना। शंकराचार्य इसे थोड़ा अलग ढंग से कहते हैं: यह ग्रन्थ योग के लिए है, इसलिए यह ग्रन्थ भी योग कहलाता है। हर आचार्य ने गीता में अपनी साधना का रास्ता देखा है, और गीता इतनी बड़ी है कि सबके रास्ते उसमें समा जाते हैं।
अब छिहत्तरवाँ श्लोक। "राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्। केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः।" हे राजन्, केशव और अर्जुन के इस अद्भुत और पवित्र संवाद को बार-बार याद करके मैं बार-बार हर्षित होता हूँ।
"संस्मृत्य संस्मृत्य", याद कर-करके। मधुसूदन और नीलकण्ठ कहते हैं, यह दोहराना उत्तेजना का है, जैसे बहुत भरे मन से कोई बात दो बार निकल जाए। और "मुहुर्मुहुः", बार-बार। शंकराचार्य कहते हैं, हर क्षण। और "पुण्यं", पवित्र। शंकराचार्य और मधुसूदन दोनों कहते हैं कि यह संवाद ऐसा है कि सुनने भर से पाप हर लेता है।
अभी अर्जुन ने कहा था, "स्मृतिर्लब्धा", मुझे स्मृति मिल गई। और अब सञ्जय कहते हैं, "संस्मृत्य संस्मृत्य", मैं बार-बार याद करता हूँ। यह मेल पाठ में है, और मुझे यह गीता का बहुत सुंदर संकेत लगता है। गीता से मिली स्मृति को बार-बार याद करके ही बचाया जाता है। अर्जुन भूल गए थे, यह हमने अभी सुना। सञ्जय नहीं भूले, क्योंकि वे याद करते रहे।
और अब एक बात जो इस श्लोक को और भी गहरा कर देती है। तेईसवें सत्संग में आपने सौप्तिक पर्व का वह दृश्य सुना था, जब युद्ध के आख़िर में दुर्योधन ने प्राण छोड़े, और सञ्जय ने धृतराष्ट्र से कहा था कि आपके पुत्र के स्वर्ग जाने पर ऋषि की दी हुई मेरी वह दिव्य दृष्टि आज नष्ट हो गई। मूल में शब्द है "प्रनष्टं"। वही शब्द, "प्रनष्टस्ते", जो श्रीकृष्ण ने बहत्तरवें श्लोक में मोह के लिए कहा था। दृष्टि चली गई। पर देखिए, जो चीज़ नहीं गई, वह स्मृति है। व्यास की दी हुई आँख युद्ध के साथ चली गई, पर सञ्जय ने जो सुना और याद किया, वह उनके पास रहा। कृपा का दिया हुआ साधन कभी-कभी चला जाता है। गुरु बिछुड़ जाते हैं, अच्छे दिन बीत जाते हैं, वह सत्संग ख़त्म हो जाता है। पर जो सुना, अगर उसे बार-बार याद किया, तो वह नहीं जाता।
और अब धृतराष्ट्र, जिन्हें हमने पत्थर की तरह छोड़ा था। महाभारत उनकी कहानी को वहीं नहीं छोड़ता। इकतीसवें सत्संग में आपने आश्रमवासिक पर्व का वह दृश्य सुना था, जब युद्ध के बरसों बाद, वन के आश्रम में, व्यास ने गंगा में उतरकर मरे हुए वीरों को बुलाया, और धृतराष्ट्र को दिव्य दृष्टि दी। और वहाँ पाठ उस दृश्य के लिए वही दो शब्द कहता है जो आज सञ्जय ने गीता के लिए कहे: अद्भुत, और रोमहर्षण। और कहता है कि धृतराष्ट्र "उस मुनि की कृपा से" प्रसन्न हुए। जो आँखें युद्ध से पहले ठुकरा दी थीं, वही कृपा बरसों बाद फिर आई, और इस बार ठुकराई नहीं गई।
और उसके ठीक बाद, आश्रमवासिक पर्व का सैंतीसवाँ अध्याय दो पंक्तियों में धृतराष्ट्र के बारे में एक बात कहता है जो हमने अब तक नहीं सुनी। राजा ने ऋषि की कृपा से अपने पुत्रों को फिर देखा, और उस नरश्रेष्ठ राजा ने राजधर्म, ब्रह्म का उपनिषद, और "बुद्धिनिश्चयमेव च", बुद्धि का दृढ़ निश्चय भी पाया। बुद्धि का निश्चय। जिस आदमी ने गीता का केवल एक श्लोक कहा था, और जो सात सौ श्लोक सुनकर भी "मेरे लोग" ही बोला था, उसे बरसों बाद आख़िर निश्चय मिला। बहुत देर से मिला। पर मिला। छठे अध्याय की वह बात याद आती है: "न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति", भलाई की ओर उठा कोई क़दम व्यर्थ नहीं जाता। धृतराष्ट्र ने गीता सुनी थी। वह सुनना बरसों बीज की तरह पड़ा रहा।
और अब सञ्जय की आख़िरी झलक। यह आश्रमवासिक पर्व में है, और इसे नारद युधिष्ठिर को सुनाते हैं। धृतराष्ट्र, गान्धारी और कुन्ती गंगाद्वार के पास वन में कठोर तप कर रहे थे, और सञ्जय उनके साथ थे। पाठ एक पंक्ति कहता है जो मुझे बहुत छूती है: समतल और ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर सञ्जय राजा के मार्गदर्शक थे, और कुन्ती गान्धारी की आँख थीं। सोचिए। जिसने युद्ध के दिनों में अन्धे राजा को दिव्य दृष्टि से सब दिखाया, वह आख़िरी दिनों में भी उनकी आँख बना रहा, अब पैरों के लिए।
अठारहवें सत्संग में हमने वह दावाग्नि सुनी थी, जब वन में आग फैली और राजा ने सञ्जय से कहा कि तुम जाओ। आज उसका वह हिस्सा देखिए जो तब छूट गया था। सञ्जय घबराकर बोले, "महाराज, मुझे कोई उपाय नहीं दिखता, आप ही बताइए अब क्या करें।" और राजा को दोबारा कहना पड़ा, "जाओ, देर मत करो।" यह दृश्य कठिन है, और मैं इसे किसी को रास्ता दिखाने के लिए नहीं, केवल सञ्जय को देखने के लिए कह रहा हूँ। क्योंकि अब सञ्जय जो करते हैं, वह सुनिए। उन्होंने राजा की प्रदक्षिणा की, और कहा, "युङ्क्ष्वात्मानमिति प्रभो", प्रभु, अपने आप को योग में लगाइए। राजा ने उसकी बात मानी, और सञ्जय आग से बच निकलकर बाद में हिमालय की ओर चले गए।
जिस आदमी ने "योगं योगेश्वरात्" सुनाया था, उसकी आख़िरी सेवा भी यही थी: अन्धे राजा से कहना, "योग में लगिए"। और इस बार राजा ने बात मानी। अर्जुन ने पहली ही सुबह कहा था, "करिष्ये वचनं तव"। धृतराष्ट्र को वह मानने में पूरा जीवन लगा। पर कहने वाला आख़िर तक साथ रहा।
पर अभी एक बात बाकी है। सञ्जय ने संवाद को याद किया। पर एक चीज़ और है जिसे वे बार-बार याद करते हैं, एक रूप। और फिर वह एक श्लोक, जिसमें सञ्जय अन्धे राजा के पहले सवाल का उत्तर देते हैं। आइए, गीता के आख़िरी दो श्लोक सुनते हैं।
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः ।
विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः ॥ ७७ ॥
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥ ७८ ॥
सतहत्तरवाँ श्लोक। "तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः। विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः।" और हरि के उस अत्यन्त अद्भुत रूप को बार-बार याद करके, हे राजन्, मुझे महान् विस्मय होता है और मैं बार-बार हर्षित होता हूँ।
हमारी टीका कहती है: यह रूप ग्यारहवें अध्याय में दिखाया गया विश्वरूप है। इकतीसवें से चौंतीसवें सत्संग तक हम उसी रूप के सामने बैठे थे: हज़ार सूर्यों जैसा तेज, अनगिनत मुख, और फिर वह क्षण जब अर्जुन काँप उठे थे। और देखिए, वही रूप अर्जुन के लिए डर बन गया था, और सञ्जय के लिए वह विस्मय और हर्ष है। शायद इसलिए कि अर्जुन उस रूप के भीतर अपने ही लोगों को जाते देख रहे थे, और सञ्जय उसे अब पीछे मुड़कर याद कर रहे हैं, जब पूरी बात समझ में आ चुकी है। डर का दृश्य भी, समझ आ जाने के बाद, विस्मय बन जाता है।
और नीलकण्ठ यहाँ एक बात कहते हैं जो पूरे ढाँचे को जोड़ देती है। वे कहते हैं, उस विश्वरूप में सञ्जय ने वह भी देख लिया था जो अभी होना था, भीष्म आदि का नाश, जैसे हथेली पर रखा आँवला। अब सोचिए। सञ्जय यह सब युद्ध के दसवें दिन सुना रहे हैं, जब भीष्म गिर चुके हैं। यानी जो उन्होंने पहले दिन की सुबह विश्वरूप में देखा था, वह अब सच हो चुका है। और फिर भी वे कहते हैं, "हृष्यामि", मैं हर्षित होता हूँ। मधुसूदन कहते हैं, वह रूप अर्जुन को ध्यान के लिए दिखाया गया था। जिसने भगवान के उस रूप को देख लिया जिसमें सब कुछ समाया है, उसके लिए किसी का गिरना भी उस रूप से बाहर नहीं रहता।
और ज्ञानेश्वर महाराज इस श्लोक के बाद एक दृश्य बनाते हैं, जो उनकी अपनी कल्पना है, पर बहुत सच्ची है। सञ्जय आनन्द में डूबे बोल रहे हैं, और धृतराष्ट्र बीच में टोकते हैं: सञ्जय, व्यास ने तुम्हें यहाँ किस काम के लिए बिठाया है, और तुम बेमौक़े ये क्या बातें कर रहे हो? सीधे बताओ, आख़िर जीत किसकी होगी? हमारी सेना तो उनसे दुगुनी है। और तब सञ्जय वह आख़िरी श्लोक कहते हैं।
अठहत्तरवाँ श्लोक। गीता का आख़िरी श्लोक। "यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम।" जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धारी पार्थ हैं, वहीं लक्ष्मी, विजय, ऐश्वर्य और अचल नीति है, ऐसा मेरा मत है।
हमारी टीका इस श्लोक के बारे में वह बात कहती है जिसके लिए मैंने आपको पहले सत्संग से तैयार किया था: सञ्जय धृतराष्ट्र के पहले श्लोक वाले प्रश्न का उत्तर देते हैं, कि उनके पुत्रों और पाण्डवों ने क्या किया। "किमकुर्वत सञ्जय", उन्होंने क्या किया, सञ्जय? और सात सौ श्लोकों के बाद सञ्जय कहते हैं: महाराज, बात यह नहीं कि किसने क्या किया। बात यह है कि श्रीकृष्ण किस ओर हैं। पहला श्लोक डर था। आख़िरी श्लोक उत्तर है।
अब शब्दों को देखिए। "योगेश्वरः कृष्णो"। शंकराचार्य कहते हैं, सब योगों के ईश्वर, क्योंकि हर योग का बीज उन्हीं से निकलता है। और "पार्थो धनुर्धरः"। शंकराचार्य इसका अर्थ करते हैं, गाण्डीव धनुष वाले। गाण्डीव। वही धनुष जो पहले अध्याय में अर्जुन के हाथ से फिसल रहा था, और जिसे पहले अध्याय के अन्त में उन्होंने नीचे रख दिया था। आज सञ्जय उन्हें "धनुर्धर" कहते हैं, धनुष थामने वाले। और महाभारत का अगला अध्याय सञ्जय की यही बात सच करता है। तीसरे सत्संग में आपने सुना था कि गीता पूरी होते ही अर्जुन ने फिर गाण्डीव उठा लिया था, और भीष्म पर्व के तैंतालीसवें अध्याय का पाठ कहता है कि धनञ्जय को बाण और गाण्डीव धारण किए देखकर महारथियों ने फिर बड़ी गर्जना की। "करिष्ये वचनं तव" केवल शब्द नहीं थे। धनुष हाथ में लौट आया था।
फिर चार चीज़ें: "तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम"। श्री, यानी लक्ष्मी, शोभा। विजय, यानी जीत। भूति, श्रीधर स्वामी कहते हैं, आगे से आगे बढ़ती समृद्धि। और ध्रुवा नीति, अचल नीति। शंकराचार्य कहते हैं, ऐसी नीति जो कभी चूकती नहीं। और आख़िर में दो शब्द, "मतिर्मम", ऐसा मेरा मत है। सञ्जय यह किसी से सुनी बात की तरह नहीं कहते। यह उनका अपना निश्चय है, सब कुछ देख-सुन लेने के बाद।
और यह बात इस कथा में पहली बार नहीं कही गई। पहले सत्संग में आपने सुना था कि गीता से कुछ ही पहले, जब युधिष्ठिर भीष्म का व्यूह देखकर घबरा गए थे, तब अर्जुन ने ही उन्हें समझाया था, "यतः कृष्णस्ततो जयः", जहाँ कृष्ण हैं, वहाँ विजय है। चौथे सत्संग में सुना कि गीता के ठीक बाद द्रोण ने युधिष्ठिर को आशीर्वाद देते हुए यही कहा: "यतो धर्मस्ततः कृष्णो यतः कृष्णस्ततो जयः"। और युद्ध से पहले व्यास ने धृतराष्ट्र से कहा था, "यतो धर्मस्ततो जयः"। व्यास, अर्जुन, सञ्जय, द्रोण। चार अलग आवाज़ें, एक बात। पर देखिए, अर्जुन ने यह बात गीता से पहले कही थी, दूसरों को समझाने के लिए, और फिर ख़ुद टूट गए थे। अब सञ्जय यह बात गीता के बाद कहते हैं, और इस बार अर्जुन उसके भीतर खड़े हैं, धनुष हाथ में लेकर।
पर इस श्लोक में एक छिपी हुई पुकार भी है, जिसे आचार्यों ने सुना है। श्रीधर स्वामी कहते हैं, सञ्जय का भाव यह है: महाराज, अपने पुत्रों के राज्य की आशा छोड़ दीजिए, और अभी भी, पुत्रों के साथ, श्रीकृष्ण की शरण लेकर, पाण्डवों को प्रसन्न करके, अपने पुत्रों के प्राण बचा लीजिए। मधुसूदन और नीलकण्ठ भी यही कहते हैं: पाण्डवों से सन्धि कीजिए। मधुसूदन याद दिलाते हैं कि उस पक्ष में नर और नारायण साथ हैं। यानी गीता का आख़िरी श्लोक केवल भविष्यवाणी नहीं है, यह एक अन्धे पिता से की गई आख़िरी विनती भी है: "अभी भी समय है।" धृतराष्ट्र ने वह विनती नहीं सुनी। गीता के बाद युधिष्ठिर बड़ों का आशीर्वाद लेकर लौटे, फिर से कवच पहने गए, और भीष्म पर्व के चौवालीसवें अध्याय से युद्ध शुरू हो गया।
और अब यह श्लोक हमारे लिए। "जहाँ कृष्ण, और जहाँ पार्थ।" ध्यान दीजिए, केवल कृष्ण नहीं कहा, केवल पार्थ भी नहीं। दोनों। भगवान की कृपा, और हमारे हाथ का धनुष। जो कहे कि सब भगवान करेंगे, मैं हाथ पर हाथ रखकर बैठूँ, वह पहले अध्याय का अर्जुन है। जो कहे कि सब मैं ही करूँगा, उसे भगवान की ज़रूरत नहीं, वह दुर्योधन की गिनती है। गीता का आदमी वह है जो रथ में धनुष लेकर खड़ा है, और लगाम श्रीकृष्ण के हाथ में है।
ज्ञानेश्वर महाराज इस श्लोक के बारे में एक हिसाब देते हैं जो मुझे बहुत प्यारा लगता है। वे कहते हैं, शब्द-ब्रह्म अनन्त है; वह सवा लाख श्लोकों का महाभारत बना; महाभारत का सब कुछ सात सौ श्लोकों की गीता में आया; और उन सात सौ का निचोड़ यह आख़िरी श्लोक है, व्यास के शिष्य सञ्जय का पूरा उद्गार। और वे गीता को सप्तशती भी कहते हैं, सात सौ मन्त्रों वाली भगवती, जिसने मोह रूपी महिषासुर को मारा। मोह नष्ट हुआ, यह गीता की देवी की विजय है।
और अब, आज का दिन केवल अठारहवें अध्याय का अन्त नहीं है। आज पूरी गीता का अन्त है। बीसवें सत्संग में मैंने कहा था कि पुराने आचार्य अठारह अध्यायों को छह-छह के तीन हिस्सों में देखते हैं। मधुसूदन सरस्वती अपनी टीका एक श्लोक से पूरी करते हैं, जिसमें वे उस भगवान को प्रणाम करते हैं जिसने आदि, मध्य और अन्त के तीन षट्कों में यह तीन काण्डों वाला शास्त्र रचा। तो एक नज़र पीछे। पहले छह अध्याय: एक डरा हुआ पिता, एक टूटा हुआ योद्धा, और फिर अमर आत्मा, कर्म का अधिकार पर फल नहीं, और मन को अपना मित्र बनाना। बीच के छह अध्याय: मोतियों में पिरोया धागा, पत्र-पुष्प का प्रेम, "मेरा भक्त नष्ट नहीं होता", वह विश्वरूप, और वह भक्त जो भगवान को प्रिय है। और आख़िरी छह अध्याय: शरीर रूपी खेत और उसे जानने वाला, तीन गुण और उनके पार, उलटा पीपल, दैवी गुण, श्रद्धा, और अन्त में, सब छोड़कर एक शरण। डर से शरण तक। "मामकाः" से "मामेकं शरणं व्रज" तक।
और जिस मधुसूदन सरस्वती ने पूरी गीता को अद्वैत के गहरे तर्कों से समझाया, वे अपनी टीका के अन्त में एक भक्त की तरह लिखते हैं: जिनके हाथ में बाँसुरी है, जो नए बादल जैसे साँवले हैं, जिनका मुख पूर्ण चन्द्रमा-सा है, उन कृष्ण से बढ़कर कोई तत्त्व मैं नहीं जानता। "कृष्णात्परं किमपि तत्त्वमहं न जाने।" इतने तर्कों के बाद, बस एक मुस्कुराता हुआ चेहरा।
परम्परा से मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को गीता जयन्ती मानी जाती है, यानी वह दिन जब कुरुक्षेत्र में यह गीता कही गई। इस बार वह आज से चार दिन बाद, बीस दिसम्बर को है। अगर मन करे, तो उस दिन गीता का कोई एक अध्याय, या बस यह आख़िरी श्लोक, घर में सबके साथ बैठकर पढ़िए। भगवान ने अभी कहा था, जो इसे पढ़ता है, उससे मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होता हूँ।
तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।
पहली बात। मोह एक दिन में नहीं जाता, पर जाता है। अर्जुन ने ग्यारहवें अध्याय में भी कहा था कि मोह चला गया, और फिर भी सवाल बचे। आख़िर में उन्होंने कहा, "नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा"। और फिर भी आगे भूले। इसलिए सञ्जय की तरह कीजिए: "संस्मृत्य संस्मृत्य", बार-बार याद कीजिए। आपके भीतर जो खोया लगता है, वह खोया नहीं, बस ढका है। गीता उसे याद दिलाती है।
दूसरी बात। आज़ादी का सबसे सुंदर उपयोग। श्रीकृष्ण ने कहा, "जैसा चाहो वैसा करो"। और अर्जुन ने कहा, "करिष्ये वचनं तव"। अपने जीवन का वह "मैं नहीं लड़ूँगा" पहचानिए, वह काम जिससे आप डर के कारण पीछे हटे बैठे हैं, और उसे धीरे से "करिष्ये" में बदलिए। जो पैर काँप रहे थे, वे वचन पर टिककर कहते हैं, "स्थितोऽस्मि"।
तीसरी बात। जहाँ कृष्ण और पार्थ साथ हैं, वहीं विजय है। कृपा और प्रयत्न, दोनों। और किसी के लिए भी देर नहीं होती। धृतराष्ट्र ने सात सौ श्लोक सुनकर भी "मेरे" कहा, और फिर भी बरसों बाद, ऋषि की कृपा से, उन्हें बुद्धि का निश्चय मिला। अगर उनके लिए रास्ता खुला रहा, तो आपके लिए भी खुला है।
आम तौर पर मैं हर सत्संग के आख़िर में अगले श्लोक की ओर इशारा करता था। आज कोई अगला श्लोक नहीं है। पर अगर कभी यह यात्रा फिर से करने का मन हो, तो पहला श्लोक वहीं रखा है, जहाँ हमने उसे छोड़ा था: "धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे"। और इस बार, शायद, वह डर की तरह नहीं, एक पुराने दोस्त की आवाज़ की तरह सुनाई दे।
आज आपसे आख़िरी सवाल पूछकर जाऊँगा। इन तिरपन सत्संगों में कौन-सा एक श्लोक, या कौन-सी एक बात, आपके साथ घर गई? और आपकी ज़िंदगी में वह कौन-सा "मैं नहीं करूँगा" है जिसे आप "करिष्ये", मैं करूँगा, में बदलना चाहते हैं? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।
गीता का पहला सवाल एक डरे हुए पिता ने पूछा था: उन्होंने क्या किया? और उसका आख़िरी उत्तर यह है: जहाँ कृष्ण हैं, वहाँ सब है।
जय श्री कृष्ण।
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥ ७८ ॥
तीन बातें
- मोह एक दिन में नहीं जाता, पर जाता है। अर्जुन ने ग्यारहवें अध्याय में भी कहा था कि मोह चला गया, और फिर भी सवाल बचे। आख़िर में उन्होंने कहा, "नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा"। और फिर भी आगे भूले। इसलिए सञ्जय की तरह कीजिए: "संस्मृत्य संस्मृत्य", बार-बार याद कीजिए। आपके भीतर जो खोया लगता है, वह खोया नहीं, बस ढका है। गीता उसे याद दिलाती है।
- आज़ादी का सबसे सुंदर उपयोग। श्रीकृष्ण ने कहा, "जैसा चाहो वैसा करो"। और अर्जुन ने कहा, "करिष्ये वचनं तव"। अपने जीवन का वह "मैं नहीं लड़ूँगा" पहचानिए, वह काम जिससे आप डर के कारण पीछे हटे बैठे हैं, और उसे धीरे से "करिष्ये" में बदलिए। जो पैर काँप रहे थे, वे वचन पर टिककर कहते हैं, "स्थितोऽस्मि"।
- जहाँ कृष्ण और पार्थ साथ हैं, वहीं विजय है। कृपा और प्रयत्न, दोनों। और किसी के लिए भी देर नहीं होती। धृतराष्ट्र ने सात सौ श्लोक सुनकर भी "मेरे" कहा, और फिर भी बरसों बाद, ऋषि की कृपा से, उन्हें बुद्धि का निश्चय मिला। अगर उनके लिए रास्ता खुला रहा, तो आपके लिए भी खुला है।