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सत्संग ५२

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सब छोड़कर मेरी शरण आओ

गीता 18.54–18.66 · 76 मिनट

अंतिम भरोसा: शरणागति

ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति । समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥ ५४ ॥
गीता 18.54 — अर्थ पढ़ें ›
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः । ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥ ५५ ॥
गीता 18.55 — अर्थ पढ़ें ›
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः । मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥ ५६ ॥
गीता 18.56 — अर्थ पढ़ें ›

क्या आपके मन पर कोई ऐसा बोझ है जो उतरता ही नहीं? कोई पुरानी ग़लती, जिसकी याद रात को अचानक आ जाती है। कोई ज़िम्मेदारी, जिसे आप बरसों से अकेले ढो रहे हैं। या बस यह थकान, कि जितना हो सकता था सब कर लिया, पूजा भी, व्रत भी, दौड़-धूप भी, और फिर भी मन हल्का नहीं हुआ। आज का सवाल यही है: जब अपनी कोशिशें चुक जाएँ, तब आख़िरी भरोसा किस पर रखें? और भगवान जब कहते हैं, "सब छोड़कर मेरी शरण आओ", तो उसका सच्चा अर्थ क्या है?

जय श्री कृष्ण।

आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का बावनवाँ सत्संग है, और आज हम गीता के उस शिखर पर पहुँच रहे हैं जिसकी ओर यह पूरी यात्रा चल रही थी। आज के तेरह श्लोकों के आख़िर में वह श्लोक आएगा जिसे बहुत-से आचार्य पूरी गीता का सबसे गुप्त वचन कहते हैं, उपदेश का अन्तिम शब्द। उसके बारे में आचार्यों ने जितना लिखा है, उतना शायद गीता के किसी और श्लोक पर नहीं लिखा। आज मैं उन सबकी बात आपके सामने एक साथ रखूँगा, बिना किसी का पक्ष लिए। पर उससे पहले हमें धीरे-धीरे उन सीढ़ियों पर चढ़ना है, जिन पर चढ़कर श्रीकृष्ण वहाँ पहुँचते हैं।

आपको याद रहे, यह सब हमें सञ्जय सुना रहे हैं। हस्तिनापुर के महल में, अन्धे राजा धृतराष्ट्र के सामने, उस दिन जब भीष्म बाणों की शय्या पर गिर चुके हैं। महाभारत के भीष्म पर्व का बयालीसवाँ अध्याय ही गीता का अठारहवाँ अध्याय है, "मोक्षसंन्यासयोग"। और यह अध्याय पूरे उपदेश को समेट रहा है।

पहले जल्दी से याद कर लें कि पिछली बार हम कहाँ रुके थे। पिछले सत्संग में, इकतालीसवें से तिरपनवें श्लोक तक, श्रीकृष्ण ने अपने काम को ही पूजा बना देने की बात कही थी। "स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः", अपने-अपने कर्म में लगा हुआ मनुष्य सिद्धि पाता है। फिर वह बड़ी बात, कि जिस परमेश्वर से सब प्राणी निकले हैं और जिससे यह सारा जगत् भरा है, "स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य", उसकी पूजा अपने ही कर्म से करके मनुष्य सिद्धि पाता है। फिर वह भरोसा कि अपना धर्म कमी वाला हो तब भी दूसरे के अच्छी तरह किए धर्म से श्रेष्ठ है, और वह सच्चा-सा चित्र, कि हर काम में कोई न कोई दोष होता ही है, "धूमेनाग्निरिवावृताः", जैसे आग धुएँ से ढकी रहती है।

और फिर, पिछले सत्संग के आख़िरी श्लोकों में, श्रीकृष्ण ने एक सीढ़ी दिखाई थी। शुद्ध बुद्धि, धैर्य से अपने को साधना, एकान्त, थोड़ा भोजन, वाणी, शरीर और मन पर संयम, ध्यान और वैराग्य। और अन्त में, अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रह को छोड़कर, ममता से रहित और शान्त होकर, मनुष्य "ब्रह्मभूयाय कल्पते", ब्रह्म बनने के योग्य हो जाता है। आज का पहला श्लोक ठीक वहीं से शुरू होता है, जहाँ वह सीढ़ी ख़त्म हुई थी।

"ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।" जो ब्रह्मभूत हो गया, जिसका मन प्रसन्न है, वह न शोक करता है, न इच्छा करता है। "समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्।" सब प्राणियों में समभाव वाला होकर वह मेरी परा भक्ति पाता है।

शब्दों को एक-एक करके देखें। "ब्रह्मभूतः", यानी जो ब्रह्म में टिक गया। श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती इसे खोलते हैं: "मैं ब्रह्म हूँ", यह निश्चय जिसके भीतर डगमगाता नहीं। "प्रसन्नात्मा", जिसका मन साफ़ पानी जैसा हो गया, शम-दम के अभ्यास से। और फिर दो छोटी बातें, जिन पर हमारी पूरी ज़िंदगी टिकी रहती है। "न शोचति", वह जो चला गया उसका शोक नहीं करता। "न काङ्क्षति", और जो अभी मिला नहीं उसकी लालसा नहीं करता। श्रीधर स्वामी ठीक यही अर्थ देते हैं: खोए हुए का शोक नहीं, न पाए हुए की चाह नहीं।

ज़रा अपने मन को देखिए। हमारा आधा समय पीछे देखने में जाता है, जो हाथ से निकल गया। और आधा आगे देखने में, जो अभी हाथ में आया नहीं। बीच में जो क्षण है, वर्तमान, वह इन दोनों के बीच पिस जाता है। यह श्लोक कहता है, जो सचमुच भीतर टिक गया, उसके लिए यह चक्की रुक जाती है।

फिर "समः सर्वेषु भूतेषु", सब प्राणियों में सम। शंकराचार्य और मधुसूदन दोनों इसे छठे अध्याय की उस बात से जोड़ते हैं: दूसरों का सुख-दुःख वह अपने जैसा देखता है। अपनी उँगली कटे तो जितना दर्द होता है, दूसरे की कटे तो उतनी ही करुणा उठती है।

और अब इस श्लोक का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा। "मद्भक्तिं लभते पराम्।" वह मेरी परा भक्ति पाता है। सोचिए, हम आम तौर पर क्या मानते हैं? कि भक्ति पहली सीढ़ी है, भोले लोगों के लिए, और ज्ञान ऊपर की सीढ़ी, समझदार लोगों के लिए। पर श्रीकृष्ण यहाँ उलटा कह रहे हैं। जो ब्रह्मभूत हो गया, जो सबसे ऊपर पहुँच गया, उसे वहाँ जाकर परा भक्ति मिलती है। यानी शिखर पर पहुँचकर भी भक्ति ख़त्म नहीं होती। वहीं से उसका सबसे ऊँचा रूप शुरू होता है।

इस परा भक्ति का अर्थ क्या है, इस पर आचार्य अलग-अलग राह से चलते हैं, और हमारी टीका दोनों राहें ईमानदारी से रखती है। कुछ लोग इसे ज्ञान की ही पकी हुई अवस्था मानते हैं; कुछ भगवान की प्रेम भरी सेवा, जिसे स्थिर मन अब खुलकर कर पाता है। शंकराचार्य पहली राह पर हैं। वे सातवें अध्याय की ओर इशारा करते हैं, जहाँ श्रीकृष्ण ने चार तरह के भक्त गिनाए थे: दुःखी, जिज्ञासु, कुछ चाहने वाला, और ज्ञानी। शंकर कहते हैं, यह परा भक्ति उसी चौथे की भक्ति है, ज्ञानी की, जिसका लक्षण ज्ञान ही है। और रामानुजाचार्य दूसरी राह पर हैं। वे कहते हैं, ऐसे आदमी को भगवान के सिवा सारी दुनिया तिनके जैसी लगती है, और उसे उस कमलनयन प्रभु के प्रति एक ऐसा प्रेम मिलता है, जो अपने आप में सबसे प्रिय अनुभव है। एक के लिए यह ज्ञान की पूर्णता है, दूसरे के लिए प्रेम की। और दोनों मानते हैं कि यही शिखर है।

अब पचपनवाँ श्लोक। "भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।" उस भक्ति से वह मुझे तत्त्व से जानता है, कि मैं जितना हूँ और जो हूँ। "ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्।" फिर मुझे तत्त्व से जानकर वह तत्काल मुझमें प्रवेश करता है।

"यावान्यश्चास्मि", इस एक जुड़े हुए शब्द में दो सवाल छिपे हैं, और आचार्यों ने इन पर बड़ी सुन्दर बातें कही हैं। एक, मैं कितना हूँ। दूसरा, मैं कौन हूँ। रामानुज कहते हैं: स्वरूप से और स्वभाव से मैं कौन हूँ, और गुणों से और विभूतियों से मैं कितना हूँ। श्रीधर स्वामी कहते हैं: "कितना", यानी सब जगह व्याप्त; और "कौन", यानी सत्, चित् और आनन्द से भरा हुआ। यानी भगवान को जानने के दो पहलू हैं। एक उनकी विशालता, जो हमने दसवें और ग्यारहवें अध्याय में देखी, विभूतियाँ और विश्वरूप। और दूसरा उनका भीतरी स्वरूप, जो आँख से नहीं, अनुभव से जाना जाता है।

और ध्यान दीजिए, यह जानना "भक्त्या" है, भक्ति से। यह बात हमारे रोज़ के जीवन से भी समझ आती है। किसी आदमी के बारे में आप किताबें पढ़कर बहुत कुछ जान सकते हैं, उसका नाम, उसका काम, उसकी उपलब्धियाँ। पर उसे सच में कौन जानता है? जो उससे प्रेम करता है। माँ अपने बच्चे की आवाज़ भीड़ में पहचान लेती है, उसके चेहरे से उसकी भूख जान लेती है। वह जानना पढ़ाई से नहीं आया, प्रेम से आया। श्रीकृष्ण कह रहे हैं, मुझे भी ऐसे ही जाना जाता है।

और फिर "विशते", प्रवेश करता है। इस शब्द पर भी दो राहें हैं, और हमारी टीका दोनों रखती है: कुछ लोग "प्रवेश" का अर्थ भगवान से एक हो जाना मानते हैं; कुछ उनके निकट सदा के लिए रहना। मधुसूदन सरस्वती "तदनन्तरम्" शब्द पर रुकते हैं। वे कहते हैं, ज्ञान होते ही अज्ञान मिट जाता है, जैसे दीपक जलते ही अँधेरा। पर शरीर तब तक चलता है जब तक पिछले कर्मों का भोग बाकी है, और उसके छूटने के बाद ही वह पूरी तरह उस परम में मिलता है। श्रीधर स्वामी इसे और कोमल कहते हैं: जब जानना भी शान्त हो जाता है, तब वह परमानन्द ही हो जाता है।

और एक बात, जो मुझे यहाँ बहुत प्यारी लगती है। चौंतीसवें सत्संग में आपने सुना था, विश्वरूप के बाद, जब श्रीकृष्ण फिर अपने कोमल रूप में आए, तो उन्होंने कहा था: "भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन", अनन्य भक्ति से ही मैं इस प्रकार जाना जा सकता हूँ, देखा जा सकता हूँ, और "प्रवेष्टुं च परन्तप", प्रवेश भी किया जा सकता हूँ। वहाँ यह एक वादा था। आज, सात अध्याय बाद, वही बात पूरी होकर सामने आ रही है: "भक्त्या मामभिजानाति", और "विशते तदनन्तरम्"। जो वादा ग्यारहवें अध्याय में किया था, अठारहवें में उसकी पूरी राह दिखा दी।

अब छप्पनवाँ श्लोक, और यहाँ एक मोड़ आता है जो हम जैसे लोगों के लिए बहुत बड़ा है। "सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः।" सब कर्म सदा करता हुआ भी, जो मेरा आश्रय लेता है, "मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्", वह मेरी कृपा से शाश्वत, अविनाशी पद पाता है।

अब सोचिए, अभी-अभी जो सीढ़ी दिखाई गई, उसमें क्या-क्या था? एकान्त में रहना, थोड़ा खाना, सब विषय छोड़ देना, सदा ध्यान में रहना। यह सुनकर हममें से बहुतों के मन में एक उदासी उठी होगी। मेरे पास तो एकान्त है ही नहीं। सुबह बच्चों का टिफ़िन, फिर दफ़्तर की बस, शाम को बूढ़े माता-पिता की दवा, रात को हिसाब। मैं कहाँ से ध्यान में बैठूँ? क्या वह शिखर केवल उन्हीं के लिए है जो सब छोड़कर जंगल चले गए?

और श्रीकृष्ण, जैसे हमारे मन की यह उदासी पढ़कर, तुरन्त कहते हैं: नहीं। "सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो", सब कर्म करता हुआ भी, और सदा करता हुआ भी। हमारी टीका इसे बहुत साफ़ कहती है: उनचासवें से पचपनवें श्लोक तक संन्यासी का मार्ग बताने के बाद, श्रीकृष्ण कर्म करते रहने वाले की बात करते हैं, और कहते हैं कि वह भी शरण और कृपा से वहीं पहुँचता है।

मधुसूदन सरस्वती इस पर एक बहुत व्यावहारिक बात कहते हैं, जो सीधे अर्जुन से जुड़ी है। अर्जुन क्षत्रिय हैं; उनके लिए संन्यास का रास्ता नहीं है। तो क्या उनका मोक्ष रुक गया? मधुसूदन कहते हैं: जो संन्यास ले सकता है वह ले, जो नहीं ले सकता वह कर्म करता रहे; पर दोनों का छुटकारा एक ही चीज़ से होता है, भगवान की एकमात्र शरण से, और उनकी कृपा से। और श्रीधर स्वामी "मद्व्यपाश्रयः" को एक छोटे वाक्य में खोलते हैं: जिसका सहारा मैं हूँ, स्वर्ग जैसा कोई फल नहीं।

"मद्व्यपाश्रयः" शब्द को अपने जीवन में ऐसे देखिए। एक नर्स रात की ड्यूटी पर है, वार्ड में बीस मरीज़ हैं। उसके पास बैठकर माला फेरने का समय नहीं। पर अगर हर मरीज़ की पट्टी बदलते हुए उसके मन में यह भाव है कि यह मैं उसी के लिए कर रही हूँ जो इस मरीज़ के भीतर भी बैठा है, और नतीजा उसी पर छोड़ती हूँ, तो वह भी "मद्व्यपाश्रयः" है। काम वही, हाथ वही, बस टेक बदल गई। पहले टेक अपने पर थी, अब उस पर।

और अब इस श्लोक का वह शब्द, जिस पर मैं आपका ध्यान ख़ास तौर पर दिलाना चाहता हूँ: "मत्प्रसादादवाप्नोति"। मेरी कृपा से पाता है। सीढ़ी अपनी मेहनत से चढ़ी जाती है, यह सच है। पर शिखर पर जो पद मिलता है, वह कमाया हुआ वेतन नहीं, दिया हुआ प्रसाद है। आज के इन तेरह श्लोकों में "प्रसाद" शब्द तीन बार आएगा। यह पहली बार है। इसे याद रखिए, क्योंकि आज की पूरी बात इसी एक शब्द के चारों ओर घूमने वाली है।

तो इन तीन श्लोकों का सार यह है: जो भीतर टिक जाता है, वह न बीते का शोक करता है, न आने वाले की लालसा, और उसे वहाँ पहुँचकर सबसे ऊँची भक्ति मिलती है। उस भक्ति से वह भगवान को जैसे वे हैं वैसे जानता है, और उनमें प्रवेश करता है। और जिसके पास एकान्त नहीं, जो रोज़ के कामों में घिरा है, उसके लिए भी वही द्वार खुला है, शरण और कृपा से। रास्ते दो हैं, पर मंज़िल एक।

पर अभी एक बात बाकी है। अब तक श्रीकृष्ण "वह" कहकर बात कर रहे थे: वह ब्रह्मभूत, वह भक्त, वह कर्म करने वाला। अब अगले श्लोक में वे सीधे अर्जुन की आँखों में देखकर "तुम" कहने वाले हैं। और उसके ठीक बाद एक ऐसी कड़ी चेतावनी देंगे, जो सुनने में चुभती है, पर भीतर से प्रेम की है। आइए, अगले दो श्लोक सुनते हैं।

चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः । बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ॥ ५७ ॥
गीता 18.57 — अर्थ पढ़ें ›
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि । अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि ॥ ५८ ॥
गीता 18.58 — अर्थ पढ़ें ›

सत्तावनवाँ श्लोक। "चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः।" सब कर्मों को मन से मुझमें अर्पण करके, मेरे परायण होकर, "बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव", बुद्धियोग का सहारा लेकर, निरन्तर मुझमें चित्त वाले हो जाओ।

पहला शब्द सुनिए: "चेतसा", मन से। श्रीकृष्ण यह नहीं कह रहे कि कर्म छोड़ दो। वे कह रहे हैं, कर्म मन से मुझे सौंप दो। हाथ काम करते रहें, पर काम का मालिक बदल जाए। शंकराचार्य और मधुसूदन दोनों यहाँ नौवें अध्याय का वह श्लोक याद दिलाते हैं, जो सत्ताईसवें सत्संग में आपने सुना था: "यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्", जो करते हो, जो खाते हो, जो हवन करते हो, जो देते हो, सब मुझे अर्पण करो। और रामानुज तीसरे अध्याय की ओर ले जाते हैं: "मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा", सब कर्म मुझमें रखकर, और फिर, "युध्यस्व विगतज्वरः", बिना सन्ताप के लड़ो। यानी जो बात अर्जुन को तीसरे अध्याय में कही गई थी, वही अठारहवें में फिर लौट रही है। अच्छा शिक्षक ज़रूरी बात एक बार कहकर नहीं छोड़ता।

फिर "बुद्धियोग"। हमारी टीका इसे सीधे दूसरे अध्याय से जोड़ती है: बुद्धियोग वह समबुद्धि है जो दूसरे अध्याय में बताई गई, फल की चिन्ता के बिना कर्म करना। सातवें सत्संग में आपने वह श्लोक सुना था, "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन"। वही समता यहाँ "बुद्धियोग" कहलाती है। मधुसूदन इसमें एक गहरी बात जोड़ते हैं: यही बुद्धियोग वह चीज़ है, जो बाँधने वाले कर्म को भी छुड़ाने वाला बना देती है। कर्म वही है, पर देखने की आँख बदलने से उसका असर उलट जाता है।

और आख़िरी शब्द, "मच्चित्तः सततं भव", सदा मुझमें मन वाले रहो। श्रीधर स्वामी कहते हैं, काम करते समय भी, चौथे अध्याय की उस भावना से, "ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ", कि अर्पण भी वही, आहुति भी वही, आग भी वही। रसोई में खड़ी माँ के हाथ आटा गूँध रहे हैं, पर मन में धीरे-धीरे कोई नाम चल रहा है। दुकानदार तराज़ू तौल रहा है, पर भीतर कहीं यह याद बनी है कि सामने खड़ा ग्राहक भी उसी का है। यह "मच्चित्तः" है। काम से भागना नहीं, काम के बीच में याद को जगाए रखना।

और अब अट्ठावनवाँ श्लोक, जिसमें एक वादा और एक चेतावनी साथ-साथ हैं। "मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।" मुझमें चित्त लगाकर तुम मेरी कृपा से सब कठिनाइयों को पार कर जाओगे। "अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि।" पर यदि अहंकार के कारण मेरी बात नहीं सुनोगे, तो नष्ट हो जाओगे।

"दुर्ग" शब्द सुनिए। दुर्ग यानी किला, ऐसी जगह जहाँ से निकलना कठिन हो। नीलकण्ठ कहते हैं, ये तीनों तरह के संकट हैं: अपने शरीर-मन से उठने वाले, दूसरे प्राणियों से आने वाले, और भाग्य या प्रकृति से आने वाले। मधुसूदन इन्हें भीतर के किले कहते हैं, काम और क्रोध। और मधुसूदन एक शब्द जोड़ते हैं जो मुझे इस श्लोक की कुंजी लगता है। वे कहते हैं, "मत्प्रसादात्तरिष्यसि" का अर्थ है कि तुम पार करोगे अपनी ख़ुद की भाग-दौड़ के बिना, बिना थकाने वाली मेहनत के। यह आज का दूसरा "प्रसाद" है। पहली बार कृपा से पद मिला था; अब कृपा से रास्ते के किले पार होंगे।

और फिर वह कड़ा वाक्य। "अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि", पर यदि अहंकार के कारण नहीं सुनोगे। कौन-सा अहंकार? शंकराचार्य और मधुसूदन दोनों एक ही बात कहते हैं: "मैं पण्डित हूँ", यह अहंकार। रामानुज इसे और साफ़ करते हैं: "क्या करना है और क्या नहीं करना है, यह सब मैं ही जानता हूँ", यह भाव। और "विनङ्क्ष्यसि" का अर्थ श्रीधर स्वामी बताते हैं: तुम अपने जीवन के असली लक्ष्य से गिर जाओगे। यह कोई शाप नहीं है, यह एक सच्ची चेतावनी है, जैसे पिता बच्चे को कहे कि आग को हाथ मत लगाना, जल जाओगे।

और अब, इससे पहले कि मैं आपको महाभारत का एक दृश्य सुनाऊँ जो इस श्लोक को आँखों के सामने खड़ा कर देता है, एक छोटी-सी बात कहना चाहता हूँ। हम आज गीता के सबसे बड़े भरोसे की ओर बढ़ रहे हैं, पर वह भरोसा आख़िर में आता है, और उससे पहले के ये श्लोक उसकी नींव हैं। आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। जो आदमी "सब धर्मों को छोड़ दो" इतना सुनकर उठ जाए, और न जाने कि उससे पहले श्रीकृष्ण ने क्या-क्या कहा, वह इस वचन का ठीक उलटा अर्थ लेकर चला जाएगा। तो अगर आप यह सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की यह यात्रा बीच में न छूटे। और आज का यह सत्संग आख़िर तक सुनिए, क्योंकि आज का सबसे बड़ा भरोसा अभी आना बाकी है।

अब वह दृश्य। यह गीता के बाद का है, द्रोण पर्व में, और इसे भी सञ्जय ही धृतराष्ट्र को सुनाते हैं, उस दिन जब द्रोणाचार्य भी गिर चुके थे। पिता के छल से मारे जाने की ख़बर सुनकर अश्वत्थामा क्रोध से जल उठा। उसने दुर्योधन से कहा कि मेरे पास एक ऐसा अस्त्र है जिसे न अर्जुन जानता है, न कृष्ण, न भीम, न युधिष्ठिर: नारायणास्त्र।

और उसने उसकी कथा बताई। उसके पिता द्रोण ने एक बार भगवान नारायण को विधिपूर्वक प्रणाम करके भेंट अर्पित की थी, और वर में यह परम अस्त्र माँगा था। देते समय भगवान ने एक चेतावनी दी थी: यह अस्त्र शत्रु को मारे बिना लौटता नहीं, इसे जीता नहीं जा सकता, और यह न मारे जाने योग्य को भी मार सकता है। और फिर उन्होंने बताया था कि इसे शान्त करने के उपाय केवल ये हैं: रथ से उतर जाना, शस्त्र रख देना, विनती करना, और शरण में जाना। इसे याद रखिए। शरण में जाना।

फिर अश्वत्थामा ने आचमन किया और वह अस्त्र छोड़ा। सञ्जय कहते हैं, आकाश में हज़ारों जलती नोकों वाले बाण प्रकट हुए, जैसे आग उगलते साँप, फिर लोहे के गोले, उस्तरे जैसी धार वाले चक्र। और पाण्डवों के वीर उससे जितना लड़ते थे, वह अस्त्र उतना ही बढ़ता जाता था। पाण्डवों की सेना ऐसे जलने लगी जैसे सर्दी के अन्त में सूखी घास।

युधिष्ठिर टूट गए। उन्होंने कहा, धृष्टद्युम्न, भाग जाओ; सात्यकि, तुम भी जाओ; अब युद्ध नहीं करना है, मैं अपने भाइयों के साथ अग्नि में प्रवेश कर लूँगा। और ठीक उस क्षण श्रीकृष्ण ने अपनी भुजाओं से सेना को रोका और कहा: "जल्दी शस्त्र रख दो और सवारियों से नीचे उतर आओ। इस अस्त्र का यही उपाय है। जितना तुम इससे लड़ोगे, यह उतना ही बलवान होगा। जो उतरकर, शस्त्र रखकर, हाथ जोड़कर झुक जाएँगे, उन्हें यह नहीं मारेगा। पर जो मन से भी इससे लड़ेगा, उसे यह पाताल में भी जाकर मारेगा।"

सबने शस्त्र रखने का मन बना लिया। पर एक आदमी अड़ गया। भीम। भीम ने कहा, "कोई शस्त्र मत रखना। मैं अपने बाणों से इस अस्त्र को रोकूँगा, अपनी सोने से मढ़ी गदा से इसे नष्ट करूँगा। पराक्रम में मेरे जैसा यहाँ कोई नहीं, जैसे सूर्य जैसी कोई दूसरी ज्योति नहीं। देखो मेरी ये भुजाएँ, जो हिमालय को भी गिरा सकती हैं।" और उन्होंने अर्जुन से भी कहा कि गाण्डीव मत रखना। अर्जुन ने बड़ा शान्त उत्तर दिया: "भीम, नारायणास्त्र के सामने, गायों और ब्राह्मणों के सामने गाण्डीव रख देना, यही मेरा उत्तम व्रत है।"

भीम अकेले रथ दौड़ाकर अश्वत्थामा पर टूट पड़े। और अब जो हुआ, उसे ध्यान से सुनिए। बाकी सब उतर गए, शस्त्र रख दिए, और अस्त्र का सारा ज़ोर अकेले भीम के सिर पर आ गिरा। वह आग भीम को, उनके रथ, घोड़ों और सारथि समेत निगल गई। भीम दिखने बन्द हो गए, जैसे आग में रखी आग। तब श्रीकृष्ण और अर्जुन रथ से कूदे, उस तेज के भीतर घुसे, और भीम को बल से खींचने लगे। और भीम खींचे जाते हुए भी गरज रहे थे। श्रीकृष्ण ने कहा, "कुन्तीपुत्र, यह क्या? रोकने पर भी तुम युद्ध से नहीं लौटते? अगर ये लड़कर जीते जा सकते, तो हम भी लड़ते। तुम्हारे सब साथी उतर चुके हैं, तुम भी उतर जाओ।" और उन्होंने भीम को, जो साँप की तरह फुफकार रहे थे, रथ से नीचे उतार दिया और उनसे शस्त्र रखवा दिए। उसी क्षण वह नारायणास्त्र शान्त हो गया। दिशाएँ साफ़ हो गईं, ठण्डी हवा चलने लगी, और भीम ऐसे चमके जैसे रात के अन्त में उगा सूरज।

और एक छोटी-सी बात, जो पाठ में है और मुझे बहुत प्यारी लगती है। जिस श्लोक में भीम को खींचा जाता है, उसमें सञ्जय श्रीकृष्ण और अर्जुन को "नर और नारायण" कहते हैं। नारायण के नाम वाला अस्त्र, और उससे बचाने वाले भी नर और नारायण।

अब इस कथा को इस श्लोक के साथ रखकर देखिए। "मत्प्रसादात्तरिष्यसि", और "अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि"। भीम बुरे आदमी नहीं थे; वे पाण्डवों में सबसे बलवान थे, सबसे वफ़ादार। उनका अहंकार भी अपने बल का अहंकार था, अपनों को बचाने के लिए। पर कुछ आग ऐसी होती है जो लड़ने से बढ़ती है। मुझे लगता है हमारी चिन्ता, हमारा अपराध-बोध, किसी पुराने दुःख की याद, ये सब ऐसी ही आग हैं। हम जितना इनसे लड़ते हैं, "मैं इसे सोचूँगा ही नहीं", "मैं इसे दबा दूँगा", ये उतनी ही बढ़ती हैं। और कभी-कभी उपाय लड़ना नहीं, उतरना होता है। रथ से उतर जाना, हाथ जोड़ लेना, कह देना: "मुझसे नहीं होता, अब आप सँभालिए।"

और जो अपनी ज़िद में अकेला रह जाए, उसे भी भगवान छोड़ते नहीं। वे ख़ुद आग में घुसकर उसे खींच लाते हैं। "विनङ्क्ष्यसि" चेतावनी है, पर श्रीकृष्ण चेतावनी देकर अलग नहीं खड़े हो जाते।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने कहा, "अहंकार के कारण नहीं सुनोगे तो"। किस बात को नहीं सुनोगे? अगले श्लोक में वे अर्जुन को उनका अपना एक वाक्य लौटाने वाले हैं, ठीक उन्हीं शब्दों में, जो अर्जुन ने सोलह अध्याय पहले कहे थे, और जिन्हें कहकर वे चुप हो गए थे। आइए, अगले दो श्लोक सुनते हैं।

यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे । मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥ ५९ ॥
गीता 18.59 — अर्थ पढ़ें ›
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा । कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥ ६० ॥
गीता 18.60 — अर्थ पढ़ें ›

उनसठवाँ श्लोक। "यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे।" अहंकार का सहारा लेकर तुम जो यह सोचते हो कि "मैं नहीं लड़ूँगा", "मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति", तुम्हारा यह निश्चय झूठा है; तुम्हारी प्रकृति तुम्हें युद्ध में लगा देगी।

तीन शब्द सुनिए: "न योत्स्य इति"। चौथे सत्संग में, दूसरे अध्याय के नौवें श्लोक में, आपने यही शब्द सुने थे। सञ्जय ने धृतराष्ट्र से कहा था: "न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह", "मैं नहीं लड़ूँगा", गोविन्द से यह कहकर अर्जुन चुप हो गए। वहाँ से यह सारा उपदेश शुरू हुआ था। सत्रह अध्याय, सैकड़ों श्लोक, आत्मा, कर्म, ध्यान, भक्ति, विश्वरूप। और अब, उपदेश के लगभग आख़िर में, श्रीकृष्ण अर्जुन का वही वाक्य, अक्षरशः वही, उठाकर उनके सामने रख देते हैं। जैसे कोई वैद्य महीनों के इलाज के बाद मरीज़ की पहली पर्ची निकालकर दिखाए: देखो, तुम यह लेकर आए थे।

और श्रीकृष्ण उस वाक्य को एक नाम देते हैं: "यदहङ्कारमाश्रित्य", जो अहंकार का सहारा लेकर। हमारी टीका यहाँ बहुत साफ़ बात कहती है: अर्जुन का युद्ध से इनकार यहाँ अपने असली रूप में दिखाया गया है; वह सच्चा संन्यास नहीं, बल्कि अहंकार का निर्णय है, जो उनके अपने योद्धा-स्वभाव के विरुद्ध है।

पर यह अहंकार कैसा था? अर्जुन तो घमण्ड से नहीं, करुणा से रुके थे। अपने दादा, अपने गुरु, अपने भाइयों को देखकर। तो इसे अहंकार क्यों कहा? मधुसूदन सरस्वती इसका बहुत बारीक उत्तर देते हैं। वे कहते हैं, यहाँ अहंकार का रूप यह है: "मैं धर्मात्मा हूँ, मैं यह क्रूर काम नहीं करूँगा।" यानी अहंकार कभी-कभी धर्म के कपड़े पहनकर आता है। "मैं इतना अच्छा हूँ कि यह नहीं करूँगा", यह वाक्य सुनने में विनम्र लगता है, पर इसके केन्द्र में भी "मैं" ही बैठा है। रामानुज इसे दूसरे ढंग से कहते हैं: अपने हित-अहित के फ़ैसले में अपने को पूरी तरह स्वतन्त्र मान लेना, भगवान की आज्ञा को अनसुना करके।

और श्रीधर स्वामी एक ऐसा प्रश्न उठाते हैं, जो अर्जुन के मन में सचमुच उठ सकता था। पिछले श्लोक में श्रीकृष्ण ने कहा था, "नष्ट हो जाओगे"। अर्जुन कह सकते थे: "ठीक है, मैं नष्ट हो जाऊँ, पर अपने बन्धुओं से नहीं लड़ूँगा।" श्रीधर कहते हैं, इसी का उत्तर यह श्लोक है: तुम्हारा यह निश्चय झूठा है, क्योंकि तुम उतने स्वतन्त्र हो ही नहीं जितना मान रहे हो।

अब साठवाँ श्लोक। "स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा।" हे कौन्तेय, अपने स्वभाव से उपजे अपने कर्म से बँधे हुए तुम, "कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्", जो काम मोह के कारण करना नहीं चाहते, वह विवश होकर भी करोगे।

"स्वभावजेन", स्वभाव से जन्मा। पिछले सत्संग में आपने सुना था कि क्षत्रिय के स्वभाव से कौन-से कर्म जन्मते हैं: शौर्य, तेज, धैर्य, कुशलता, युद्ध से न भागना। शंकराचार्य और रामानुज दोनों यही कहते हैं: वही शौर्य तुम्हें बाँधे हुए है। रामानुज एक छोटी-सी बात जोड़ते हैं जो अर्जुन को बहुत अच्छी तरह पहचानती है: तुम शत्रुओं का अपमान सह नहीं पाओगे, और वही न सह पाना तुम्हें खुद युद्ध में खींच लाएगा।

और संत ज्ञानेश्वर यहाँ कई चित्र देते हैं, जो इस श्लोक को एकदम आँखों के सामने ला देते हैं। वे कहते हैं, पूरब की ओर बहते पानी में कोई पश्चिम की ओर तैरना चाहे, तो उसका ज़िद करना ही बचता है, पानी तो अपनी ओर ही ले जाएगा। फिर कहते हैं, किसी के हाथ-पैर बाँधकर उसे रथ में डाल दो। वह ख़ुद एक कदम नहीं चलता, फिर भी दूर-दूर तक पहुँच जाता है। तुम भी कहते रहो कि "मैं कुछ नहीं करूँगा", पर रथ तो चल रहा है।

और फिर ज्ञानेश्वर अर्जुन के अपने जीवन से एक उदाहरण देते हैं। वे कहते हैं: विराट के राजकुमार उत्तर जब भाग रहे थे, तब तुम क्यों लड़ने निकल पड़े थे? छठे सत्संग में आपने वह दृश्य सुना था, आज उसका केवल एक कोना देखिए। अज्ञातवास का आख़िरी साल था, अर्जुन बृहन्नला के वेश में, नाच-गाना सिखाने वाले बनकर रह रहे थे, और जब उत्तर भागे, तो वही अर्जुन अपनी लम्बी चोटी लहराते हुए उनके पीछे दौड़ पड़े। वेश बदल गया था, नाम बदल गया था, पर स्वभाव नहीं बदला था। ज्ञानेश्वर कहते हैं, वह स्वभाव इस बार भी तुम्हें लड़ाएगा।

नीलकण्ठ यहाँ तीसरे अध्याय का एक श्लोक याद दिलाते हैं: "प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति", सब प्राणी अपनी प्रकृति के पीछे चलते हैं, हठ क्या करेगा? और उसी अध्याय में श्रीकृष्ण ने कहा था, "कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः", प्रकृति के गुण सबसे विवश करके कर्म कराते हैं। "यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्" उसी बात की गूँज है।

अब यहाँ एक ग़लतफ़हमी से बचना है। कोई यह न समझे कि श्रीकृष्ण कह रहे हैं, "तुम्हारे हाथ में कुछ नहीं, सब पहले से तय है, जो होना है होगा।" नहीं। इन दो श्लोकों को उनसे ठीक पहले वाले श्लोक के साथ पढ़िए। सत्तावनवें में उन्होंने कहा था, कर्म मन से मुझे सौंप दो। यानी चुनाव यह नहीं है कि युद्ध करोगे या नहीं; स्वभाव तो तुमसे युद्ध करवा ही लेगा। चुनाव यह है कि वह युद्ध कैसे करोगे। या तो विवश होकर, मन में इनकार लिए, भीतर से टूटे हुए, "अवश" होकर। या मुझे अर्पण करके, बिना सन्ताप के, "मत्परः" होकर। काम एक ही है। पर एक में आदमी घसीटा जाता है, दूसरे में वह चलता है।

अपने जीवन में यह कितनी बार होता है। एक डॉक्टर है, और किसी रात उसके हाथ में एक मरीज़ नहीं बच पाता। वह घर आकर कहती है, "बस, अब मैं ऑपरेशन नहीं करूँगी, यह मुझसे नहीं होगा।" उसका दुःख सच्चा है। पर अगली रात अस्पताल से फ़ोन आता है, एक बच्चा गम्भीर हालत में लाया गया है, और उसके पैर अपने आप जूते पहनने लगते हैं। उसका स्वभाव, उसकी बरसों की सीख, उसका बचाने वाला मन, उसे उठा देता है। अब सवाल यह है कि वह उस बच्चे के पास कैसे जाएगी। डर और अपराध-बोध का बोझ लेकर, या यह मानकर कि मैं अपना काम पूरा करूँगी और नतीजा उसके हाथ में रहेगा जो सबको जीवन देता है?

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने कहा, तुम्हारी प्रकृति तुम्हें चलाएगी। तो फिर प्रकृति को कौन चलाता है? यह रथ, जिसमें हम सब बँधे बैठे हैं, इसकी लगाम किसके हाथ में है? अगले श्लोक में वे यह परदा उठाते हैं, और फिर अर्जुन से साफ़ शब्दों में कहते हैं: उन्हीं की शरण में जाओ। आइए, अगले दो श्लोक सुनते हैं।

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥ ६१ ॥
गीता 18.61 — अर्थ पढ़ें ›
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत । तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥ ६२ ॥
गीता 18.62 — अर्थ पढ़ें ›

इकसठवाँ श्लोक। "ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।" हे अर्जुन, ईश्वर सब प्राणियों के हृदय में रहते हैं, "भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया", और अपनी माया से सब प्राणियों को, मानो यन्त्र पर चढ़े हों, घुमाते रहते हैं।

इस श्लोक में एक सम्बोधन छिपा है, अर्जुन, और शंकराचार्य उस पर रुकते हैं। अर्जुन नाम का अर्थ है उजला, श्वेत, शुद्ध। शंकर ऋग्वेद की एक पंक्ति याद दिलाते हैं, "अहश्च कृष्णमहरर्जुनं च", एक दिन काला है और एक दिन उजला। मधुसूदन सरस्वती इसका भाव खोलते हैं: हे शुद्ध मन वाले अर्जुन, तुम ऐसे ईश्वर को जानने के योग्य हो। सोचिए, रथ पर दो बैठे हैं, एक का नाम है साँवला, कृष्ण, और दूसरे का उजला, अर्जुन। और साँवला उजले से कह रहा है, जो तुम्हारे हृदय में बैठा है, उसे पहचानो।

फिर "यन्त्रारूढानि", यन्त्र पर चढ़े हुए। हमारी टीका कहती है, यह चित्र घूमते चक्र पर बैठी आकृतियों या कठपुतलियों का है: वे चलती हैं, पर चलाने की शक्ति उनकी नहीं। शंकराचार्य कहते हैं, जैसे लकड़ी के बने पुतले किसी यन्त्र पर चढ़ाए हों। श्रीधर स्वामी कहते हैं, जैसे सूत्रधार लकड़ी के यन्त्र पर चढ़ी बनावटी आकृतियों को घुमाता है। और श्रीधर एक दूसरा अर्थ भी देते हैं: यन्त्र यानी शरीर, और उन पर चढ़े हैं वे जीव जो शरीर को ही "मैं" मान बैठे हैं।

संत ज्ञानेश्वर इस चित्र को एक पूरा नाटक बना देते हैं। वे कहते हैं, ईश्वर अपनी माया का परदा लगाकर अकेले भीतर बैठा डोरी खींचता है, और बाहर चौरासी लाख योनियों के छाया-चित्र नाचते हैं। तैंतालीसवें सत्संग में आपने सुना था, "सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो", मैं सबके हृदय में बैठा हूँ। यह श्लोक उसी बात को और आगे ले जाता है: केवल बैठा नहीं है, चला भी रहा है।

और अब मुझे महाभारत की एक स्त्री याद आती है, जिसने यही चित्र बहुत पहले, बहुत दुःख में, अपने मुँह से कहा था। द्रौपदी। पैंतीसवें सत्संग में आपने वह प्रसंग सुना था: वनवास में, अपने पति को दुःख में देखकर, द्रौपदी ने युधिष्ठिर से कहा था कि धर्म से लक्ष्मी नहीं मिलती, और आप जैसा धर्मात्मा सब कुछ कैसे हार गया? और युधिष्ठिर ने उत्तर दिया था कि वे धर्म का व्यापार नहीं करते। आज उसी बातचीत का वह हिस्सा, जो हमने तब नहीं सुना था।

द्रौपदी ने कहा था, लोग एक पुरानी बात कहते हैं, कि संसार ईश्वर के वश में है, अपने वश में नहीं। जैसे कोई कुशल आदमी ध्यान लगाकर लकड़ी की गुड़िया का एक-एक अंग हिलाता है, वैसे ही ये प्राणी चलाए जाते हैं। डोरी से बँधे पक्षी की तरह यह असहाय प्राणी ले जाया जाता है। धागे में पिरोई मणि की तरह, नाक की रस्सी से बँधे बैल की तरह, वह विधाता की आज्ञा के पीछे चलता है। किनारे से गिरकर धारा के बीच पड़े पेड़ की तरह वह कभी अपने वश में नहीं रहता। जैसे घास की नोकें तेज़ हवा के वश में झुक जाती हैं, वैसे ही सब प्राणी विधाता के वश में हैं।

चित्र वही है, जो आज श्रीकृष्ण दे रहे हैं। पर सुनिए द्रौपदी उस चित्र से कहाँ पहुँचती हैं। वे कहती हैं: भगवान प्राणियों से वैसे खेलता है जैसे बच्चा खिलौनों से। वह उनके साथ माता-पिता जैसा व्यवहार नहीं करता। और सज्जनों को दुःख में और दुष्टों को सुख में देखकर मैं उस विधाता की निन्दा करती हूँ।

द्रौपदी को कोई दोष नहीं दे सकता। जिस स्त्री को भरी सभा में घसीटा गया हो, जिसके पति जंगल में भटक रहे हों, उसके मुँह से यह शिकायत निकलना बिलकुल मनुष्य जैसा है। पर अब देखिए, एक ही चित्र से दो रास्ते निकलते हैं। द्रौपदी ने कहा: सब उसके हाथ में है, इसलिए वह दोषी है। श्रीकृष्ण कहते हैं: सब उसके हाथ में है, इसलिए उसी की शरण में जाओ। कठपुतली के सामने भी दो रास्ते हैं। वह डोरियों से लड़ती रहे, या उस हाथ की ओर मुँह कर ले जो डोरियाँ थामे है।

और यही बासठवाँ श्लोक है। "तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।" हे भारत, सब प्रकार से उन्हीं की शरण में जाओ। "तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।" उनकी कृपा से तुम परम शान्ति और शाश्वत धाम पाओगे।

"सर्वभावेन", सब प्रकार से। मधुसूदन सरस्वती इसे तीन शब्दों में खोलते हैं: मन से, वाणी से, कर्म से। यानी केवल मुँह से "शरण" कह देना नहीं, और केवल मन में मान लेना भी नहीं। श्रीधर स्वामी इसका कारण भी बताते हैं: जब सब जीव ईश्वर के ही अधीन हैं, तो अहंकार छोड़कर उन्हीं की शरण लो। और संत ज्ञानेश्वर एक चित्र देते हैं: वाणी, चित्त और शरीर सब उन्हें देकर ऐसे शरण में जाओ, जैसे गंगा समुद्र में जाती है। गंगा समुद्र में जाकर खोती नहीं, वह समुद्र हो जाती है।

और अब रामानुजाचार्य की एक पंक्ति, जो मुझे इस श्लोक की सबसे सुन्दर व्याख्या लगती है। वे कहते हैं, "तमेव", उन्हीं की, यानी उन ईश्वर की जो सबके शासक हैं, और जो अपने शरणागतों के प्रेम के कारण इस समय तुम्हारे सारथि बनकर बैठे हैं, और तुमसे कह रहे हैं, "ऐसे करो"। सोचिए। श्रीकृष्ण कह रहे हैं, "उनकी शरण में जाओ", "वह", जैसे कोई और हो। पर रामानुज कहते हैं, जिसकी ओर इशारा है, वह तो लगाम थामे सामने बैठा है। जो हृदय में बैठा डोरियाँ खींचता है, वही आज रथ में बैठा घोड़ों की रास खींच रहा है।

और "तत्प्रसादात्परां शान्तिं"। आपने ध्यान दिया, आज का तीसरा "प्रसाद"। छप्पनवें श्लोक में कृपा से पद मिला, अट्ठावनवें में कृपा से किले पार हुए, और अब कृपा से परम शान्ति। रामानुज इस शान्ति का अर्थ बताते हैं: सब कर्म-बन्धनों का शान्त हो जाना। शंकराचार्य शाश्वत स्थान को विष्णु का परम पद कहते हैं।

एक छोटा-सा चित्र मन में रखिए। गाँव के मेले में बच्चा झूले पर बैठा है, वह लकड़ी का घोड़ा जो गोल-गोल घूमता है। वह घोड़े को नहीं चला रहा, घोड़ा उसे नहीं चला रहा, झूला किसी और के हाथ से घूम रहा है। अब एक बच्चा है जो हर चक्कर पर डरकर रोता है। और एक दूसरा बच्चा है जो हर चक्कर पर नीचे खड़े अपने पिता की ओर हाथ हिलाता है। झूला दोनों के लिए एक ही है, चक्कर भी उतने ही। फ़र्क़ बस इतना है कि दूसरे बच्चे को पता है कि नीचे कौन खड़ा है। यही शरण है।

पर अभी एक बात बाकी है। इतना कहकर श्रीकृष्ण रुकते हैं, और एक ऐसी बात कहते हैं जो किसी गुरु के मुँह से सुनना बड़ा अनोखा लगता है: "मैंने सब कह दिया। अब तुम सोचो, और जैसा चाहो, वैसा करो।" आइए, अगले दो श्लोक सुनते हैं।

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया । विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥ ६३ ॥
गीता 18.63 — अर्थ पढ़ें ›
सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः । इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥ ६४ ॥
गीता 18.64 — अर्थ पढ़ें ›

तिरसठवाँ श्लोक। "इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया।" इस प्रकार मैंने तुम्हें गुप्त से भी अधिक गुप्त ज्ञान कहा। "विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु।" इस पर पूरी तरह विचार करके, जैसा चाहो वैसा करो।

इस श्लोक को सुनकर मुझे हर बार अचरज होता है। जिसने अभी-अभी कहा था कि ईश्वर सबके हृदय में बैठा डोरियाँ खींचता है, वही अब कहता है: "यथेच्छसि तथा कुरु", जैसा तुम चाहो। हमारी टीका इसे बहुत सुन्दर ढंग से कहती है: श्रीकृष्ण अर्जुन पर उपदेश थोपते नहीं। पूरा उपदेश देकर वे चुनाव अर्जुन पर छोड़ते हैं, ध्यान से विचार करने के बाद। भगवान आदेश दे सकते थे। उन्होंने समझाया, और फिर हाथ खोल दिए।

और यह कोई नई बात नहीं। आपको याद होगा, पहले सत्संगों में सुना था, द्वारका में जब दुर्योधन और अर्जुन दोनों सहायता माँगने आए, तब भी श्रीकृष्ण ने चुनाव अर्जुन पर छोड़ा था: एक ओर पूरी नारायणी सेना, दूसरी ओर मैं अकेला, बिना शस्त्र के। अर्जुन ने उन्हें चुना था। जो भगवान युद्ध से पहले चुनने देते हैं, वही उपदेश के बाद भी चुनने देते हैं।

पर "विमृश्यैतदशेषेण" को अनदेखा मत कीजिए। इसमें दो बातें जुड़ी हुई हैं: विचार करके, और पूरा, बिना कुछ छोड़े विचार करके। मधुसूदन सरस्वती साफ़ कहते हैं: इसका अर्थ यह नहीं कि बिना सोचे, मन में जो आए वही करो। पूरे गीता-शास्त्र को एक साथ, एक अर्थ में बाँधकर समझो, फिर अपनी योग्यता के अनुसार चलो। बिना कुछ छोड़े। आज की शुरुआत में मैंने आपसे कहा था कि आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। श्रीकृष्ण ख़ुद यही कह रहे हैं। गीता से कोई एक श्लोक उठाकर अपनी पसन्द की बात साबित कर लेना आसान है। पर उपदेश देने वाले की शर्त है: पूरा, शेष के बिना।

रामानुज कहते हैं, यहाँ "जैसा चाहो" का अर्थ है: कर्मयोग, ज्ञानयोग या भक्तियोग, जो तुम्हारी योग्यता के अनुकूल हो, उसे अपना लो। और श्रीधर स्वामी एक भरोसा देते हैं: इस पर ठीक से विचार करोगे, तो तुम्हारा मोह अपने आप चला जाएगा। यानी यह स्वतन्त्रता अकेला छोड़ देने वाली स्वतन्त्रता नहीं है। यह उस पिता की स्वतन्त्रता है, जो बेटे को सब समझाकर कहता है, "अब तुम बड़े हो गए, फ़ैसला तुम्हारा है", और मन ही मन जानता है कि बेटा ठीक ही चुनेगा।

और अब चौंसठवाँ श्लोक, जिसमें कुछ बहुत अनोखा होता है। "सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः।" सबसे अधिक गुप्त मेरा परम वचन फिर सुनो। "इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्।" तुम मेरे अत्यन्त प्रिय हो, इसलिए मैं तुम्हारे हित की बात कहूँगा।

अभी-अभी श्रीकृष्ण ने कहा था, "जैसा चाहो, वैसा करो।" और अगले ही श्लोक में वे रुक नहीं पाते। अर्जुन ने कुछ पूछा नहीं, फिर भी वे कहते हैं, "एक बात और सुनो।" मधुसूदन सरस्वती इस पर एक शब्द लिखते हैं: "अपृष्टोऽपि", बिना पूछे भी। कोई माँ बच्चे को घर से विदा करते हुए सब समझा दे, दरवाज़े तक छोड़ दे, और फिर दरवाज़े पर खड़ी होकर पुकारे, "सुनो, एक बात और।" यह वही पुकार है।

और क्यों? श्रीधर स्वामी और मधुसूदन दोनों कहते हैं: गीता इतनी गहरी है कि उसे पूरा का पूरा मन में उतारना कठिन है, इसलिए करुणा से भगवान ख़ुद उसका सार निकालकर दे रहे हैं। और शंकराचार्य इसका कारण एक वाक्य में कहते हैं, जो मुझे इस श्लोक का सबसे कोमल भाष्य लगता है: न डर से कहूँगा, न किसी लाभ के लिए, बल्कि इसलिए कि तुम मुझे प्रिय हो।

अब शब्दों की एक सीढ़ी देखिए। नौवें अध्याय की शुरुआत में श्रीकृष्ण ने कहा था, "इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे", यह अत्यन्त गुप्त ज्ञान मैं तुम्हें कहूँगा। अभी तिरसठवें में कहा, "गुह्याद्गुह्यतरं", गुप्त से भी अधिक गुप्त। और अब, "सर्वगुह्यतमं", सब गुप्तों में सबसे गुप्त। मधुसूदन यह सीढ़ी खोलते हैं: कर्मयोग गुप्त है, उसका फल ज्ञान उससे अधिक गुप्त, और अब जो आने वाला है, वह इन दोनों से ऊपर।

संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर एक चित्र देते हैं: कछुई अपने बच्चों को केवल अपनी दृष्टि से पालती है, ऐसा वे कहते हैं; अर्जुन का भाग्य भी ऐसा है, कि जो बात सुनाने की नहीं, वह उसे मिल रही है।

और "इष्टोऽसि मे दृढमिति", तुम मुझे दृढ़ता से प्रिय हो, यह भाव श्रीकृष्ण अर्जुन के लिए गीता से बरसों पहले, वनवास के दिनों में भी कह चुके थे। तेरहवें सत्संग में हमने उसकी एक झलक सुनी थी, कि तुम नर हो और मैं नारायण। उसी वचन की एक पंक्ति तब रह गई थी: जो तुमसे द्वेष करता है, वह मुझसे द्वेष करता है, और जो तुम्हारे साथ है, वह मेरे साथ है। और उसी के बीच वह वाक्य, जिसमें दो नाम एक हो जाते हैं: "ममैव त्वं तवैवाहं", तुम मेरे ही हो, और मैं तुम्हारा ही। यही प्रेम आज इस रथ पर बोल रहा है।

पर अभी एक बात बाकी है। इतनी तैयारी, तीन सीढ़ियाँ, और "तुम मेरे प्रिय हो" का भरोसा। अब वह "परम वचन" आता है, दो श्लोकों में, जिन्हें विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं कि इनके बाद सिखाने को इससे अधिक कुछ नहीं बचता। आइए, उन्हें सुनते हैं।

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥ ६५ ॥
गीता 18.65 — अर्थ पढ़ें ›
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ ६६ ॥
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पैंसठवाँ श्लोक। "मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।" मुझमें मन लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो, मुझे नमस्कार करो। "मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे।" तुम मुझे ही प्राप्त होगे। यह मैं तुमसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ, क्योंकि तुम मेरे प्रिय हो।

ये शब्द आपने पहले सुने हैं। सत्ताईसवें सत्संग में, नौवें अध्याय के आख़िरी श्लोक में, लगभग यही चार बातें थीं: "मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु"। हमारी टीका यही कहती है: ये लगभग वही शब्द हैं जो वहाँ हैं; यहाँ वे एक प्रतिज्ञा के साथ आते हैं। और एक बात मुझे यहाँ बहुत छूती है। नौवें अध्याय में ही श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था, "कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति", हे कौन्तेय, तुम प्रतिज्ञा करके कह दो कि मेरा भक्त नष्ट नहीं होता। वहाँ प्रतिज्ञा अर्जुन से करवाई थी। आज, "सत्यं ते प्रतिजाने", भगवान ख़ुद प्रतिज्ञा कर रहे हैं।

चार सीढ़ियाँ हैं, और मधुसूदन सरस्वती उन्हें बड़े प्यार से खोलते हैं। "मन्मना भव", मुझमें मन लगाओ। पर वे पूछते हैं, मन तो कंस और शिशुपाल का भी श्रीकृष्ण में लगा रहता था, द्वेष से। इसलिए अगला शब्द, "मद्भक्तो", प्रेम से लगाओ। फिर "मद्याजी", मेरी पूजा करो। और अगर पूजा की सामग्री न हो? तो, मधुसूदन कहते हैं, "मां नमस्कुरु", शरीर, वाणी और मन से बस झुक जाओ। नीलकण्ठ इसमें एक और भरोसा जोड़ते हैं: वेद ख़ुद कहते हैं कि नमस्कार भी यज्ञ है। जिसके पास कुछ भी न हो, उसके पास भी झुकना तो है। भगवान ने सीढ़ी का आख़िरी डण्डा इतना नीचे रखा है कि कोई भी उस पर पैर रख सके।

और रामानुज "सत्यं ते प्रतिजाने" पर कहते हैं: यह केवल मीठी बात नहीं, सच्ची प्रतिज्ञा है। क्योंकि जिसका मुझमें बहुत प्रेम है, उसमें मेरा भी बहुत प्रेम होता है, और मैं उसका बिछड़ना सह नहीं पाता, इसलिए उसे अपने पास ले आता हूँ। मधुसूदन एक छोटी-सी बात कहते हैं: जो प्रिय है, उससे छल नहीं किया जाता।

और अब वह श्लोक। "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।" सब धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आओ। "अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।" मैं तुम्हें सब पापों से छुड़ा दूँगा। शोक मत करो।

हमारी टीका कहती है, यह उपदेश का अन्तिम और सबसे गुप्त वचन है। और इस पर आचार्य जितनी अलग-अलग राहों से चले हैं, उतना शायद किसी और श्लोक पर नहीं। मैं आपके सामने उनकी बातें एक-एक करके रखता हूँ। किसी को ग़लत नहीं कहूँगा। आप सुनिए, और जो आपके मन को छुए, उसे रख लीजिए।

शंकराचार्य कहते हैं: यहाँ "धर्म" में अधर्म भी गिना गया है, क्योंकि बात कर्म से पूरी तरह ऊपर उठने की है। सब कर्म छोड़कर यह जान लो कि मैं ही वह एक हूँ, सबका आत्मा, सब प्राणियों में स्थित, जन्म-मृत्यु से परे, और मुझसे अलग कुछ नहीं। और "मैं छुड़ा दूँगा" का अर्थ है, मैं तुम्हारे भीतर अपना ही स्वरूप प्रकट कर दूँगा। शंकर यहाँ दसवें अध्याय का दीपक याद दिलाते हैं, "नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता", भीतर बैठकर ज्ञान के दीपक से अँधेरा मिटाता हूँ।

रामानुजाचार्य इस श्लोक के दो अर्थ देते हैं, और दोनों बहुत कोमल हैं। पहला अर्थ: कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग, ये सब धर्म करते रहो, प्रेम से, अपनी योग्यता के अनुसार; पर उनके फल, उनका कर्तापन और उनका सहारा छोड़ दो, और केवल मुझे करने वाला, पूजने योग्य, पाने योग्य और उपाय मानो। रामानुज कहते हैं, धर्मों का शास्त्र के अनुसार त्याग यही है, जो इस अध्याय की शुरुआत में ही समझाया गया था। और दूसरा अर्थ, जो सीधे दुःखी मन से बात करता है। रामानुज कहते हैं, अर्जुन को शोक हो रहा था कि भक्ति शुरू करने के रास्ते में अनगिनत पुराने पाप खड़े हैं, और उन्हें धोने के लिए जितने प्रायश्चित, व्रत और यज्ञ बताए गए हैं, वे इतने हैं कि एक छोटे-से जीवन में पूरे हो ही नहीं सकते। तो श्रीकृष्ण कहते हैं: वे सब छोड़ दो, मुझ परम करुणामय की शरण में आ जाओ, जो शरण में आने वाले की कोई जाँच-पड़ताल नहीं करता; जो रुकावटें हैं, उनसे मैं छुड़ा दूँगा। बलदेव विद्याभूषण भी यही दूसरा अर्थ लेते हैं।

श्रीधर स्वामी बहुत छोटा, बहुत सीधा कहते हैं: "मेरी भक्ति से ही सब हो जाएगा", इस दृढ़ विश्वास से, नियमों की चिन्ता छोड़कर, केवल मेरी शरण में रहो; और यह शोक मत करो कि कोई कर्म छूटने से पाप लगेगा, क्योंकि मैं छुड़ा दूँगा।

मधुसूदन सरस्वती कहते हैं: वर्ण के धर्म हों, आश्रम के धर्म हों, सबके साधारण धर्म हों, वे रहें या न रहें, उन्हें अपना सहारा मत मानो। सहारा केवल मुझे मानो, जो सब धर्मों का स्वामी और फल देने वाला है। और मधुसूदन ज़ोर देकर कहते हैं: यहाँ कर्म छोड़ने का आदेश नहीं है। अर्जुन क्षत्रिय हैं, उन्हें संन्यास का आदेश हो ही नहीं सकता। आदेश केवल इतना है कि भगवान की एकमात्र शरण, ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी, सबके लिए एक जैसी। और वे लिखते हैं, सब शास्त्रों का परम रहस्य ईश्वर की शरण ही है, इसलिए भगवान ने शास्त्र को यहीं पूरा किया।

मध्वाचार्य बहुत छोटा उत्तर देते हैं: धर्म छोड़ने का अर्थ है फल छोड़ना। वरना युद्ध करने का आदेश क्यों दिया जाता? और अभिनवगुप्त इसे सीधे अर्जुन के उस क्षण से जोड़ते हैं: युद्ध में जो बन्धुओं का वध होगा, उसका "मैं करने वाला हूँ", यह भाव छोड़ दो, और "गुरु को मारना मेरे लिए अधर्म होगा", यह चिन्ता भी; सबके करने वाले, स्वतन्त्र मुझ एक की शरण लो; और "मा शुचः" का अर्थ है, क्या करूँ, क्या न करूँ, इस उलझन में मत पड़ो।

तिलक महाराज कहते हैं: यहाँ "धर्म" का अर्थ वे अनेक मार्ग हैं जो शास्त्रों में भगवान तक पहुँचने के लिए बताए गए, अहिंसा, सत्य, माता-पिता की सेवा, गुरु-सेवा, यज्ञ, दान, संन्यास। उन सबकी उलझन में मत पड़ो, केवल मुझे भजो। और तिलक कहते हैं, इसका सार यह है कि दृढ़ भक्ति के साथ अपने धर्म के कर्म करते जाओ, डरो मत। यही कर्मयोग है, और यही सारी गीता का निचोड़।

और संत ज्ञानेश्वर? वे पहले कहते हैं, जैसे रस्सी हाथ में लेते ही साँप का आकार छूट जाता है, जैसे जागते ही सपने का घर छूट जाता है, वैसे ही धर्म-अधर्म का सारा झमेला अज्ञान से उपजा है, उसे छोड़ दो। जैसे नमक पानी में पड़कर पानी हो जाता है, वैसे मेरी शरण में आओ। और फिर ज्ञानेश्वर वह लिखते हैं जो किसी टीका में नहीं, एक भक्त की आँखों में ही दिख सकता है। वे कहते हैं, यह कहकर साँवले श्रीकृष्ण ने कंगन वाली अपनी दाहिनी भुजा फैलाई और अपने शरणागत भक्तराज को गले लगा लिया। हृदय से हृदय मिल गया। जैसे एक दीपक से दूसरा दीपक जलाया जाता है, वैसे ही, द्वैत तोड़े बिना, उन्होंने अर्जुन को अपने जैसा बना लिया। जो बात शब्दों में नहीं आ सकती थी, वह उन्होंने गले लगाकर दे दी।

ये सब राहें अलग हैं। एक कहता है, ज्ञान से सब कर्म छूटते हैं; दूसरा कहता है, कर्म करते हुए उनका सहारा छूटता है; तीसरा कहता है, अपने पुण्य और पाप का हिसाब छूटता है। पर हमारी टीका एक बात बहुत साफ़ कहती है, और यह मैं आपसे ज़ोर देकर कहना चाहता हूँ: इनमें से कोई भी इसे कर्तव्य की लापरवाही की छूट नहीं मानता। "सब धर्म छोड़ दो" का अर्थ यह नहीं कि माता-पिता की सेवा छोड़ दो, सच बोलना छोड़ दो, अपना काम छोड़ दो। जिसने यह वचन सबसे पहले सुना, वह अर्जुन, इसे सुनकर धनुष उठाकर अपना कर्तव्य करने गया।

और अब इस श्लोक का आख़िरी शब्द सुनिए: "मा शुचः"। शोक मत करो। याद कीजिए, पहले अध्याय का अन्त। अर्जुन धनुष-बाण छोड़कर रथ के पीछे बैठ गए थे, "शोकसंविग्नमानसः", शोक से व्याकुल मन वाले। और दूसरे अध्याय में जहाँ से श्रीकृष्ण का असली उपदेश शुरू होता है, वहाँ पहला वाक्य था, "अशोच्यानन्वशोचस्त्वं", तुम उनके लिए शोक कर रहे हो जो शोक के योग्य नहीं। उपदेश शोक से शुरू हुआ था, और आज शोक पर ही पूरा हो रहा है: "मा शुचः"।

और "सर्वपापेभ्यो" भी अर्जुन के अपने शब्दों का उत्तर है। हमारी टीका यही कहती है: यह पहले अध्याय के अर्जुन के शोक का भी उत्तर है, जहाँ उन्हें युद्ध के पाप का डर था। उन्होंने कहा था, "पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः", इन्हें मारकर हमें पाप ही लगेगा। आज श्रीकृष्ण कहते हैं, उस पाप का बोझ मैं ले लेता हूँ। और दूसरे अध्याय में अर्जुन ने कहा था, "शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्", मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में आया हूँ, मुझे सिखाइए। वहाँ अर्जुन ने शरण माँगी थी। आज, सोलह अध्याय बाद, भगवान ने कहा: "मामेकं शरणं व्रज"। माँगी हुई शरण आज दी जा रही है।

और यहाँ मुझे फिर वह नारायणास्त्र याद आता है। आपको याद होगा, भगवान नारायण ने उसे शान्त करने के जो उपाय बताए थे, उनमें आख़िरी था, "गमनं शरणस्य", शरण में जाना। मुझे लगता है, वह कथा इस श्लोक की एक छोटी-सी तस्वीर है। जिस आग से लड़ने वाला जलता था, वही आग झुकने वाले के सामने ठण्डी हवा बन गई। और जो अड़ गया, उसे भी नर और नारायण ने ख़ुद जाकर बाहर खींचा।

विश्वनाथ चक्रवर्ती, वायु पुराण के एक श्लोक के सहारे, शरण के छह अंग बताते हैं, और उन्हें सुनकर शरण कोई धुँधली बात नहीं रहती। जो भगवान को प्रिय हो, वह करने का संकल्प; जो उन्हें अप्रिय हो, उसे छोड़ना; यह भरोसा कि वे रक्षा करेंगे ही; उन्हीं को अपना रक्षक चुन लेना; अपने को पूरा उन्हें सौंप देना; और अपनी दीनता केवल उन्हीं के सामने रखना, और कहीं नहीं। और फिर विश्वनाथ श्रीकृष्ण के मुँह से एक बहुत प्यारी बात कहलवाते हैं: "तुम यह भी शोक मत करना कि मैंने अपने प्रभु पर इतना बड़ा बोझ डाल दिया। शरणागत से प्रेम करने वाले मुझको उसमें ज़रा भी थकान नहीं।" और वे नौवें अध्याय का वह वचन याद दिलाते हैं, "योगक्षेमं वहाम्यहम्", उनका योगक्षेम मैं ख़ुद ढोता हूँ।

और एक बात। यह "मा शुचः" उस कमरे में भी गूँज रहा है जहाँ सञ्जय इसे सुना रहे हैं। सामने बैठे धृतराष्ट्र अभी-अभी भीष्म के गिरने की ख़बर सुनकर शोक में डूबे हैं। मुझे लगता है, सञ्जय अनजाने में ही अपने राजा तक भी यह वचन पहुँचा रहे हैं।

इस श्रृंखला में हमने भरोसे के कई श्लोक सुने हैं। आत्मा न जन्मती है न मरती है। जब-जब धर्म की हानि होगी, मैं आऊँगा। भलाई करने वाला कभी दुर्गति को नहीं जाता। अनन्य भाव से भजने वालों का योगक्षेम मैं ढोता हूँ। मेरा भक्त नष्ट नहीं होता। मैं उनका संसार-सागर से उद्धार करता हूँ। आज वे सब भरोसे एक वाक्य में आकर मिल गए: "मा शुचः"।

और अगले सत्संग में, जो इस श्रृंखला का आख़िरी है, श्रीकृष्ण बताएँगे कि यह गीता किसे सुनानी चाहिए और किसे नहीं, इसे सुनाने और सुनने का फल क्या है, और फिर अर्जुन का उत्तर आएगा, जिसकी शुरुआत है, "नष्टो मोहः"। उसी उत्तर में एक शब्द और है, "त्वत्प्रसादान्मयाच्युत", आपकी कृपा से। आज हमने तीन बार "प्रसाद" सुना; चौथी बार उसे अर्जुन कहेंगे।

तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली बात। शरण घर छोड़ने का नाम नहीं, टेक बदलने का नाम है। "सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः", सब कर्म करते हुए भी जो उन पर टिका है, वह कृपा से वहीं पहुँचता है। अपना काम पूरे मन से कीजिए, और उसका बोझ अपने कन्धे से उतारकर उनके कन्धे पर रख दीजिए।

दूसरी बात। कुछ आग लड़ने से बढ़ती है। चिन्ता, अपराध-बोध, किसी पुराने दुःख की याद, इनसे ज़िद करके लड़ेंगे तो ये भीम पर गिरे अस्त्र की तरह और भड़केंगी। कभी-कभी उपाय रथ से उतर जाना है, हाथ जोड़ लेना है, और कह देना है, "अब आप सँभालिए।"

तीसरी बात। जिसने सब करके देख लिया और फिर भी मन भारी है, उसके लिए यह श्लोक है। अपने पुण्यों का हिसाब और अपने पापों की गिनती, दोनों उनके चरणों में रख दीजिए। "अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।" यह वचन भगवान ने अपने प्रिय से प्रतिज्ञा करके कहा है, और प्रिय से छल नहीं किया जाता।

आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आपके मन का वह कौन-सा बोझ है, जिसे आज आप उनके कन्धे पर रखना चाहेंगे? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।

सत्रह अध्यायों तक श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया। और आख़िर में, ज्ञानेश्वर कहते हैं, उन्होंने बस गले लगा लिया। वह आलिंगन आज आपके लिए भी है।

जय श्री कृष्ण।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ ६६ ॥
गीता 18.66 — अर्थ पढ़ें ›

तीन बातें

  1. शरण घर छोड़ने का नाम नहीं, टेक बदलने का नाम है। "सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः", सब कर्म करते हुए भी जो उन पर टिका है, वह कृपा से वहीं पहुँचता है। अपना काम पूरे मन से कीजिए, और उसका बोझ अपने कन्धे से उतारकर उनके कन्धे पर रख दीजिए।
  2. कुछ आग लड़ने से बढ़ती है। चिन्ता, अपराध-बोध, किसी पुराने दुःख की याद, इनसे ज़िद करके लड़ेंगे तो ये भीम पर गिरे अस्त्र की तरह और भड़केंगी। कभी-कभी उपाय रथ से उतर जाना है, हाथ जोड़ लेना है, और कह देना है, "अब आप सँभालिए।"
  3. जिसने सब करके देख लिया और फिर भी मन भारी है, उसके लिए यह श्लोक है। अपने पुण्यों का हिसाब और अपने पापों की गिनती, दोनों उनके चरणों में रख दीजिए। "अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।" यह वचन भगवान ने अपने प्रिय से प्रतिज्ञा करके कहा है, और प्रिय से छल नहीं किया जाता।