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अध्याय १८ · मोक्षसंन्यासयोग

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अर्जुन बोले

18.1 संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् । त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥ १ ॥

हे महाबाहो, हे हृषीकेश, हे केशिनिषूदन! मैं संन्यास का तत्त्व और त्याग का तत्त्व, दोनों को अलग-अलग जानना चाहता हूँ।

O mighty-armed one, O Hṛṣīkeśa, O slayer of Keśin, I wish to know the truth about renunciation, and about relinquishment, each separately.

श्रीभगवान् बोले

18.2 काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः । सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥ २ ॥

ज्ञानी लोग कामना से किए जाने वाले कर्मों के त्याग को संन्यास जानते हैं। विचारशील लोग सब कर्मों के फल के त्याग को त्याग कहते हैं।

The wise know renunciation as giving up actions done from desire. The discerning call relinquishment the giving up of the fruit of all actions.

18.3 त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः । यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥ ३ ॥

कुछ विचारक कहते हैं कि कर्म को दोष की तरह छोड़ देना चाहिए। दूसरे कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप रूपी कर्म नहीं छोड़ने चाहिए।

Some thinkers say that action should be given up as a fault. Others say that acts of sacrifice, charity and austerity should not be given up.

18.4 निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम । त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः ॥ ४ ॥

हे भरतश्रेष्ठ, त्याग के विषय में मेरा निश्चय सुनो। क्योंकि हे पुरुषसिंह, त्याग तीन प्रकार का कहा गया है।

O best of the Bharatas, hear from me the final word on relinquishment. For relinquishment, O tiger among men, is declared to be of three kinds.

18.5 यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् । यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥ ५ ॥

यज्ञ, दान और तप रूपी कर्म छोड़ने योग्य नहीं हैं। वे अवश्य करने चाहिए। यज्ञ, दान और तप बुद्धिमानों को भी पवित्र करते हैं।

Acts of sacrifice, charity and austerity are not to be given up. They must surely be done. Sacrifice, charity and austerity purify even the wise.

18.6 एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च । कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥ ६ ॥

परन्तु ये कर्म भी आसक्ति और फल को छोड़कर करने चाहिए। हे पार्थ, यह मेरा निश्चित और उत्तम मत है।

But even these actions should be done giving up attachment and the fruits. This, O son of Pṛthā, is my settled and highest view.

18.7 नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते । मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ॥ ७ ॥

परन्तु अपने नियत कर्तव्य-कर्म का त्याग उचित नहीं है। मोह के कारण उसका त्याग तामस त्याग कहा गया है।

But giving up an action that is one's duty is not proper. Abandoning it out of delusion is called tāmasa relinquishment.

18.8 दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् । स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥ ८ ॥

जो कर्म को दुःखरूप समझकर, शरीर के कष्ट के डर से छोड़ देता है, वह राजस त्याग करता है। उसे त्याग का फल बिल्कुल नहीं मिलता।

One who gives up an action only because it is painful, from fear of bodily trouble, makes a rājasa relinquishment. He does not gain the fruit of relinquishment at all.

18.9 कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन । सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥ ९ ॥

हे अर्जुन, जब नियत कर्म केवल इसलिए किया जाता है कि उसे करना ही है, और आसक्ति तथा फल भी छोड़ दिए जाते हैं, तो वह त्याग सात्त्विक माना गया है।

O Arjuna, when a prescribed action is done only because it must be done, giving up attachment and also the fruit, that relinquishment is held to be sāttvika.

18.10 न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते । त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥ १० ॥

सत्त्वगुण से भरा, बुद्धिमान्, जिसके संशय कट गए हैं, ऐसा त्यागी अप्रिय कर्म से द्वेष नहीं करता और प्रिय कर्म में आसक्त नहीं होता।

The man of relinquishment, filled with sattva, wise, with his doubts cut away, does not hate unpleasant work and does not cling to pleasant work.

18.11 न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः । यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥ ११ ॥

क्योंकि देहधारी मनुष्य कर्मों को पूरी तरह नहीं छोड़ सकता। परन्तु जो कर्मफल का त्याग करता है, वही त्यागी कहलाता है।

For one who has a body cannot give up action completely. But one who gives up the fruit of action is called a man of relinquishment.

18.12 अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् । भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ॥ १२ ॥

कर्म का फल तीन प्रकार का होता है: अनिष्ट, इष्ट और मिश्रित। यह मरने के बाद उन्हें मिलता है जिन्होंने त्याग नहीं किया, पर संन्यासियों को कभी नहीं मिलता।

The fruit of action is of three kinds: unwanted, wanted and mixed. It comes after death to those who have not relinquished, but never to those who have renounced.

18.13 पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे । साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥ १३ ॥

हे महाबाहो, सब कर्मों की सिद्धि के ये पाँच कारण, जो सिद्धान्त रूप सांख्य में कहे गए हैं, मुझसे जानो।

O mighty-armed one, learn from me these five causes for the accomplishment of all actions, stated in the Sāṅkhya that settles the matter.

18.14 अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् । विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥ १४ ॥

वे हैं: अधिष्ठान, कर्ता, अनेक प्रकार के करण, विविध अलग-अलग चेष्टाएँ, और पाँचवाँ दैव।

They are the seat, the doer, the instruments of many sorts, the various distinct efforts, and the unseen power as the fifth.

18.15 शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः । न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥ १५ ॥

मनुष्य शरीर, वाणी और मन से जो भी कर्म आरम्भ करता है, चाहे वह न्याययुक्त हो या उसके विपरीत, उसके ये पाँच कारण हैं।

Whatever action a person begins with body, speech or mind, right or its opposite, these five are its causes.

18.16 तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः । पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥ १६ ॥

ऐसा होने पर भी जो बुद्धि शुद्ध न होने के कारण केवल शुद्ध आत्मा को कर्ता देखता है, वह दुर्बुद्धि ठीक नहीं देखता।

This being so, one who, because his understanding is untrained, sees the pure Self alone as the doer, that man of poor understanding does not see.

18.17 यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते । हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥ १७ ॥

जिसमें "मैं करता हूँ" का भाव नहीं है, जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती, वह इन लोगों को मारकर भी न मारता है, न बँधता है।

One who has no feeling of "I am doing", whose understanding is not stained, even if he kills these people, does not kill and is not bound.

18.18 ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना । करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः ॥ १८ ॥

ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता, ये तीन कर्म की प्रेरणा हैं। करण, कर्म और कर्ता, ये तीन कर्म का आधार हैं।

Knowledge, the known and the knower are the threefold impulse to action. The instrument, the act and the doer are the threefold basis of action.

18.19 ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः । प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥ १९ ॥

गुणों की गणना वाले शास्त्र में ज्ञान, कर्म और कर्ता, गुणों के भेद से तीन-तीन प्रकार के कहे गए हैं। उन्हें भी ठीक-ठीक सुनो।

In the teaching on the guṇas, knowledge, action and the doer are described as of three kinds by the difference of the guṇas. Hear them also properly.

18.20 सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते । अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥ २० ॥

जिस ज्ञान से मनुष्य सब प्राणियों में एक अविनाशी भाव को, विभक्तों में अविभक्त रूप से देखता है, उस ज्ञान को सात्त्विक जानो।

Know that knowledge to be sāttvika by which one sees one unchanging reality in all beings, undivided in the divided.

18.21 पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् । वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ॥ २१ ॥

परन्तु जो ज्ञान सब प्राणियों में भिन्न-भिन्न प्रकार के अनेक भावों को अलग-अलग जानता है, उस ज्ञान को राजस जानो।

But the knowledge that sees in all beings many realities of different kinds, each separate, know that to be rājasa.

18.22 यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् । अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥

परन्तु जो ज्ञान एक ही कार्य में मानो वही सब कुछ हो, ऐसे आसक्त रहता है, जो युक्तिहीन है, तत्त्व से रहित है और तुच्छ है, वह तामस कहा गया है।

But the knowledge that clings to a single thing as if it were the whole, without reason, not grasping the truth, and narrow, is called tāmasa.

18.23 नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम् । अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ॥ २३ ॥

जो कर्म नियत है, आसक्ति से रहित है, राग-द्वेष के बिना किया गया है, और फल न चाहने वाले द्वारा किया गया है, वह सात्त्विक कहा जाता है।

Action that is prescribed, free of attachment, done without liking or dislike, by one who does not seek the fruit, is called sāttvika.

18.24 यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः । क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥ २४ ॥

परन्तु जो कर्म कामना चाहने वाले द्वारा, या अहंकार के साथ, और बहुत परिश्रम से किया जाता है, वह राजस कहा गया है।

But action done by one who seeks his desires, or with ego, and with great strain, is called rājasa.

18.25 अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम् । मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥ २५ ॥

जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और अपनी सामर्थ्य का विचार किए बिना मोह से आरम्भ किया जाता है, वह तामस कहा जाता है।

Action begun out of delusion, without considering the consequence, the loss, the harm and one's own capacity, is called tāmasa.

18.26 मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः । सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥ २६ ॥

जो कर्ता आसक्ति से मुक्त है, "मैं" नहीं कहता, धैर्य और उत्साह से युक्त है, और सिद्धि-असिद्धि में विकाररहित रहता है, वह सात्त्विक कहा जाता है।

The doer who is free of attachment, not given to talk of "I", with steadiness and zeal, unchanged in success and failure, is called sāttvika.

18.27 रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः । हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥ २७ ॥

जो कर्ता रागी है, कर्मफल चाहता है, लोभी है, हिंसा के स्वभाव वाला है, अशुद्ध है, और हर्ष-शोक से युक्त है, वह राजस कहा गया है।

The doer who is full of passion, eager for the fruit of action, greedy, harmful by nature, impure, and carried by joy and grief, is called rājasa.

18.28 अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः । विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥ २८ ॥

जो कर्ता असंयमी, असभ्य, घमण्डी, धूर्त, दूसरों की जीविका बिगाड़ने वाला, आलसी, विषादी और काम टालने वाला है, वह तामस कहा जाता है।

The doer who is undisciplined, coarse, stubborn, deceitful, spiteful, lazy, despondent and procrastinating is called tāmasa.

18.29 बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु । प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय ॥ २९ ॥

हे धनञ्जय, अब गुणों के अनुसार बुद्धि और धृति का तीन प्रकार का भेद सुनो, जो पूरी तरह और अलग-अलग कहा जा रहा है।

O Dhanañjaya, hear now the threefold division of the intellect and of steadiness by the guṇas, told fully and one by one.

18.30 प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये । बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३० ॥

हे पार्थ, जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्ति को, कर्तव्य और अकर्तव्य को, भय और अभय को, और बन्धन तथा मोक्ष को जानती है, वह सात्त्विकी है।

O son of Pṛthā, the intellect that knows the path of action and the path of withdrawal, what should and should not be done, what is to be feared and what is not, bondage and freedom, is sāttvika.

18.31 यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च । अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥ ३१ ॥

हे पार्थ, जिस बुद्धि से मनुष्य धर्म और अधर्म को, कर्तव्य और अकर्तव्य को ठीक से नहीं जानता, वह राजसी है।

O son of Pṛthā, the intellect by which one understands dharma and adharma, and what should and should not be done, wrongly, is rājasa.

18.32 अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता । सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥ ३२ ॥

हे पार्थ, जो बुद्धि तम से ढकी हुई अधर्म को धर्म मानती है और सब बातों को उलटा देखती है, वह तामसी है।

O son of Pṛthā, the intellect which, covered by darkness, takes adharma to be dharma and sees all things the wrong way round, is tāmasa.

18.33 धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः । योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३३ ॥

हे पार्थ, जिस अटल धृति से मनुष्य योग के द्वारा मन, प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को धारण करता है, वह सात्त्विकी है।

O son of Pṛthā, the unwavering steadiness by which, through yoga, one holds the workings of mind, breath and senses in check, is sāttvika.

18.34 यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन । प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ॥ ३४ ॥

परन्तु हे अर्जुन, जिस धृति से फल चाहने वाला मनुष्य अत्यन्त आसक्ति से धर्म, काम और अर्थ को धारण करता है, हे पार्थ, वह राजसी है।

But the steadiness by which one holds on to dharma, pleasure and wealth, O Arjuna, with strong attachment and wanting the fruit, is rājasa, O son of Pṛthā.

18.35 यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च । न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥ ३५ ॥

हे पार्थ, जिस धृति से दुर्बुद्धि मनुष्य निद्रा, भय, शोक, विषाद और मद को नहीं छोड़ता, वह तामसी है।

O son of Pṛthā, the steadiness by which a dull-minded man does not let go of sleep, fear, grief, dejection and arrogance is tāmasa.

18.36 सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ । अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ॥ ३६ ॥

हे भरतश्रेष्ठ, अब मुझसे तीन प्रकार का सुख सुनो: वह, जिसमें मनुष्य अभ्यास से रमता है और जिसमें दुःख का अन्त पाता है,

And now hear from me, O bull among the Bharatas, the three kinds of happiness. There is a happiness in which one comes to delight through practice, and in which one reaches the end of sorrow.

18.37 यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् । तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥ ३७ ॥

जो आरम्भ में विष जैसा और परिणाम में अमृत के समान है, और अपनी बुद्धि की प्रसन्नता से उत्पन्न होता है, वह सुख सात्त्विक कहा गया है।

That which is like poison at first and like nectar in the end, born of the clearness of one's own mind, is called sāttvika happiness.

18.38 विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् । परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥ ३८ ॥

जो सुख विषयों और इन्द्रियों के संयोग से होता है, आरम्भ में अमृत के समान और परिणाम में विष जैसा, वह राजस माना गया है।

The happiness that comes from the meeting of the senses with their objects, like nectar at first and like poison in the end, is held to be rājasa.

18.39 यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः । निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ ३९ ॥

जो सुख आरम्भ में और परिणाम में भी अपने को मोहित करता है, और निद्रा, आलस्य तथा प्रमाद से उत्पन्न होता है, वह तामस कहा गया है।

The happiness that deludes the self both at first and in its outcome, arising from sleep, sloth and heedlessness, is called tāmasa.

18.40 न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः । सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ॥ ४० ॥

पृथ्वी पर, या फिर स्वर्ग में देवताओं में भी, ऐसी कोई वस्तु नहीं जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीनों गुणों से मुक्त हो।

There is no being on earth, or again in heaven among the gods, that is free from these three guṇas born of nature.

18.41 ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप । कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥ ४१ ॥

हे परन्तप, ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों के कर्म उनके स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसार बाँटे गए हैं।

O scorcher of foes, the duties of brāhmaṇas, kṣatriyas, vaiśyas and śūdras are divided according to the guṇas arising from their own nature.

18.42 शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च । ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥ ४२ ॥

शम, दम, तप, शौच, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकता, ये ब्राह्मण के स्वभाव से उत्पन्न कर्म हैं।

Calm, self-restraint, austerity, purity, forbearance, straightforwardness, knowledge, realized wisdom and faith are the work of a brāhmaṇa, born of his nature.

18.43 शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् । दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥ ४३ ॥

शूरवीरता, तेज, धैर्य, दक्षता, युद्ध में न भागना, दान और स्वामिभाव, ये क्षत्रिय के स्वभाव से उत्पन्न कर्म हैं।

Valour, vigour, steadiness, skill, not fleeing in battle, generosity and leadership are the work of a kṣatriya, born of his nature.

18.44 कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् । परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥ ४४ ॥

खेती, गोपालन और व्यापार वैश्य के स्वभाव से उत्पन्न कर्म हैं। सेवा रूप कर्म भी शूद्र के स्वभाव से उत्पन्न कर्म है।

Farming, cattle-keeping and trade are the work of a vaiśya, born of his nature. Work of the nature of service is likewise the work of a śūdra, born of his nature.

18.45 स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः । स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ॥ ४५ ॥

अपने-अपने कर्म में लगा हुआ मनुष्य सिद्धि पाता है। अपने कर्म में लगा हुआ मनुष्य किस प्रकार सिद्धि पाता है, वह सुनो।

A person devoted to his own work attains perfection. Hear how one devoted to his own work finds perfection.

18.46 यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् । स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥ ४६ ॥

जिससे सब प्राणियों की उत्पत्ति होती है और जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, उस परमेश्वर की अपने कर्म से पूजा करके मनुष्य सिद्धि पाता है।

By worshipping, with his own work, Him from whom all beings come forth and by whom all this is pervaded, a man finds perfection.

18.47 श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् । स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥ ४७ ॥

अपना धर्म, कमी वाला हो तब भी, दूसरे के अच्छी तरह किए गए धर्म से श्रेष्ठ है। स्वभाव से नियत कर्म करते हुए मनुष्य पाप नहीं पाता।

One's own duty, even imperfect, is better than another's duty well done. Doing the work fixed by one's own nature, one incurs no sin.

18.48 सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् । सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥ ४८ ॥

हे कौन्तेय, स्वाभाविक कर्म को, दोषयुक्त होने पर भी, नहीं छोड़ना चाहिए। क्योंकि सब कर्म किसी न किसी दोष से वैसे ही ढके हुए हैं जैसे धुएँ से अग्नि।

O son of Kuntī, one should not give up the work one is born to, even with its faults. For all undertakings are covered by some fault, as fire is by smoke.

18.49 असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः । नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥ ४९ ॥

जिसकी बुद्धि सब जगह आसक्तिरहित है, जिसने अपने को जीत लिया है और जो कामनारहित है, वह संन्यास से परम नैष्कर्म्य-सिद्धि पाता है।

One whose mind is unattached everywhere, who is self-mastered and free of longing, attains through renunciation the supreme perfection of actionlessness.

18.50 सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे । समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ॥ ५० ॥

हे कौन्तेय, सिद्धि को प्राप्त हुआ मनुष्य किस प्रकार ब्रह्म को पाता है, जो ज्ञान की परम निष्ठा है, वह मुझसे संक्षेप में जानो।

O son of Kuntī, learn from me briefly how one who has attained perfection reaches Brahman, which is the highest culmination of knowledge.

18.51 बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च । शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥ ५१ ॥

विशुद्ध बुद्धि से युक्त होकर, धृति से अपने को वश में करके, शब्द आदि विषयों को छोड़कर, और राग-द्वेष को दूर करके,

A person endowed with an intellect made pure controls himself by steadiness, gives up sound and the other sense objects, and casts off liking and dislike.

18.52 विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः । ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥ ५२ ॥

एकान्त में रहने वाला, थोड़ा खाने वाला, वाणी, शरीर और मन को वश में रखने वाला, सदा ध्यानयोग में लगा हुआ, वैराग्य का आश्रय लिया हुआ,

He lives in solitude, eats lightly, restrains speech, body and mind, is always given to the yoga of meditation, and takes refuge in dispassion.

18.53 अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् । विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ५३ ॥

अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रह को छोड़कर, ममतारहित और शान्त होकर, वह ब्रह्मभाव के योग्य होता है।

Letting go of ego, force, pride, desire, anger and possessions, free of "mine" and at peace, he becomes fit to become Brahman.

18.54 ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति । समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥ ५४ ॥

ब्रह्मभूत और प्रसन्नचित्त होकर वह न शोक करता है, न इच्छा करता है। सब प्राणियों में समभाव वाला होकर वह मेरी परा भक्ति पाता है।

Having become Brahman, serene, he neither grieves nor desires. Equal to all beings, he gains supreme devotion to Me.

18.55 भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः । ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥ ५५ ॥

भक्ति से वह मुझे तत्त्व से जानता है कि मैं जितना हूँ और जो हूँ। तब मुझे तत्त्व से जानकर वह तत्काल मुझमें प्रवेश करता है।

By devotion he knows Me in truth, how great I am and who I am. Then, having known Me in truth, he enters into Me at once.

18.56 सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः । मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥ ५६ ॥

सब कर्म सदा करता हुआ भी, मेरे आश्रित रहने वाला मनुष्य मेरी कृपा से शाश्वत अविनाशी पद पाता है।

Even while always doing all actions, one who takes refuge in Me reaches, by My grace, the eternal, imperishable state.

18.57 चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः । बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ॥ ५७ ॥

सब कर्मों को मन से मुझमें अर्पण करके, मेरे परायण होकर, बुद्धियोग का आश्रय लेकर, निरन्तर मुझमें चित्त वाले हो जाओ।

Giving over all actions to Me in your mind, holding Me as the highest, relying on the yoga of understanding, always keep your mind on Me.

18.58 मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि । अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि ॥ ५८ ॥

मुझमें चित्त लगाकर तुम मेरी कृपा से सब कठिनाइयों को पार कर जाओगे। परन्तु यदि अहंकार के कारण मेरी बात नहीं सुनोगे, तो नष्ट हो जाओगे।

With your mind on Me, you will cross all difficulties by My grace. But if out of ego you will not listen, you will perish.

18.59 यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे । मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥ ५९ ॥

यदि अहंकार का आश्रय लेकर तुम सोचते हो "मैं नहीं लड़ूँगा", तो तुम्हारा यह निश्चय मिथ्या है। तुम्हारी प्रकृति तुम्हें युद्ध में लगा देगी।

If, relying on ego, you think "I will not fight", this resolve of yours is vain. Your nature will compel you.

18.60 स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा । कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥ ६० ॥

हे कौन्तेय, अपने स्वभाव से उत्पन्न कर्म से बँधे हुए तुम, जो मोह के कारण नहीं करना चाहते, वह विवश होकर भी करोगे।

O son of Kuntī, bound by your own work born of your nature, what out of delusion you do not wish to do, you will do even helplessly.

18.61 ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥ ६१ ॥

हे अर्जुन, ईश्वर सब प्राणियों के हृदय में रहते हैं, और अपनी माया से सब प्राणियों को, मानो यन्त्र पर चढ़े हों, घुमाते रहते हैं।

O Arjuna, the Lord dwells in the heart of all beings, making all beings turn by His māyā, as if mounted on a machine.

18.62 तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत । तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥ ६२ ॥

हे भारत, सब प्रकार से उन्हीं की शरण में जाओ। उनकी कृपा से तुम परम शान्ति और शाश्वत धाम प्राप्त करोगे।

Go to Him alone for refuge with all your being, O Bhārata. By His grace you will attain supreme peace and the eternal abode.

18.63 इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया । विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥ ६३ ॥

इस प्रकार मैंने तुम्हें गुप्त से भी अधिक गुप्त ज्ञान कहा। इस पर पूरी तरह विचार करके, जैसा चाहो वैसा करो।

Thus I have told you knowledge more secret than the secret. Reflect on it fully, and then do as you wish.

18.64 सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः । इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥ ६४ ॥

सबसे अधिक गुप्त मेरा परम वचन फिर सुनो। तुम मेरे अत्यन्त प्रिय हो, इसलिए मैं तुम्हारे हित की बात कहूँगा।

Hear once more My supreme word, the most secret of all. You are very dear to Me, so I will speak for your good.

18.65 मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥ ६५ ॥

मुझमें मन लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो, मुझे नमस्कार करो। तुम मुझे ही प्राप्त होगे। यह मैं तुमसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ, क्योंकि तुम मेरे प्रिय हो।

Fix your mind on Me, be devoted to Me, worship Me, bow to Me. You will come to Me alone. I truly promise you this, for you are dear to Me.

18.66 सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ ६६ ॥

सब धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आओ। मैं तुम्हें सब पापों से छुड़ा दूँगा। शोक मत करो।

Giving up all dharmas, come to Me alone for refuge. I will set you free from all sins. Do not grieve.

18.67 इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन । न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥ ६७ ॥

यह उपदेश तुम्हें कभी तपरहित को नहीं कहना चाहिए, न भक्तिरहित को, न सुनना न चाहने वाले को, और न उसको जो मुझमें दोष देखता है।

You should never speak this to one without austerity, nor to one without devotion, nor to one who does not wish to hear, nor to one who finds fault with Me.

18.68 य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति । भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥ ६८ ॥

जो मुझमें परम भक्ति करके यह परम गुप्त उपदेश मेरे भक्तों में कहेगा, वह निःसन्देह मुझे ही प्राप्त होगा।

One who, showing supreme devotion to Me, teaches this supreme secret among My devotees, will come to Me alone, without doubt.

18.69 न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः । भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥ ६९ ॥

मनुष्यों में उससे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करने वाला कोई नहीं है, और पृथ्वी पर उससे बढ़कर मेरा प्रिय दूसरा कोई होगा भी नहीं।

Among men there is no one who does what is dearer to Me than he does, and there will be no one on earth dearer to Me than he.

18.70 अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः । ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥ ७० ॥

और जो हम दोनों के इस धर्ममय संवाद को पढ़ेगा, उसके द्वारा मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा, ऐसा मेरा मत है।

Anyone who studies this holy talk of ours honours Me with an offering of knowledge. That is how I see it.

18.71 श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः । सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥ ७१ ॥

जो मनुष्य श्रद्धावान् और दोषदृष्टि से रहित होकर इसे केवल सुनता भी है, वह भी पापों से मुक्त होकर पुण्य करने वालों के शुभ लोकों को प्राप्त होता है।

A person who, full of faith and free of fault-finding, only hears it, he too is freed and reaches the happy worlds of those who do good deeds.

18.72 कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा । कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय ॥ ७२ ॥

हे पार्थ, क्या तुमने यह एकाग्र चित्त से सुना? हे धनञ्जय, क्या तुम्हारा अज्ञान से उत्पन्न मोह नष्ट हो गया?

O son of Pṛthā, have you heard this with a focused mind? O Dhanañjaya, has your delusion born of ignorance been destroyed?

अर्जुन बोले

18.73 नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत । स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ॥ ७३ ॥

हे अच्युत, आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और मुझे स्मृति प्राप्त हो गई। मैं सन्देहरहित होकर स्थित हूँ। मैं आपके वचन का पालन करूँगा।

O Acyuta, by your grace my delusion is destroyed and I have regained my memory. I stand firm, my doubts gone. I will do as you say.

सञ्जय बोले

18.74 इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः । संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥ ७४ ॥

इस प्रकार मैंने वासुदेव और महात्मा पार्थ का यह अद्भुत और रोमांचकारी संवाद सुना।

Thus I heard this wondrous dialogue between Vāsudeva and the great-souled son of Pṛthā, which makes the hair stand on end.

18.75 व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम् । योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् ॥ ७५ ॥

व्यासजी की कृपा से मैंने यह परम गुप्त योग साक्षात् योगेश्वर श्रीकृष्ण से, स्वयं कहते हुए, सुना है।

By the grace of Vyāsa I have heard this supreme and secret yoga directly from Kṛṣṇa, the Lord of yoga, as He Himself was telling it.

18.76 राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् । केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ॥ ७६ ॥

हे राजन्, केशव और अर्जुन के इस अद्भुत और पवित्र संवाद को बार-बार याद करके मैं बार-बार हर्षित होता हूँ।

O king, as I remember again and again this wondrous and holy dialogue between Keśava and Arjuna, I rejoice again and again.

18.77 तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः । विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः ॥ ७७ ॥

और हरि के उस अत्यन्त अद्भुत रूप को बार-बार याद करके, हे राजन्, मुझे महान् विस्मय होता है और मैं बार-बार हर्षित होता हूँ।

And as I remember again and again that most wondrous form of Hari, O king, my wonder is great, and I rejoice again and again.

18.78 यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥ ७८ ॥

जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धारी पार्थ हैं, वहीं लक्ष्मी, विजय, ऐश्वर्य और अचल नीति है, ऐसा मेरा मत है।

Where Kṛṣṇa, the Lord of yoga, is, and where the son of Pṛthā, the archer, is, there are fortune, victory, well-being and firm, sound policy. This is my conviction.