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सत्संग ५१

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अपना काम ही पूजा

गीता 18.41–18.53 · 75 मिनट

मेरा काम छोटा है? हर काम में कुछ दोष

ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप । कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥ ४१ ॥
गीता 18.41 — अर्थ पढ़ें ›
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च । ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥ ४२ ॥
गीता 18.42 — अर्थ पढ़ें ›
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् । दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥ ४३ ॥
गीता 18.43 — अर्थ पढ़ें ›

क्या आपको कभी लगा है कि आपका काम छोटा है? कि कोई मन्दिर में बैठकर पूजा करता है, कोई बड़ी कुर्सी पर बैठकर फ़ैसले करता है, और आप बस रोज़ वही रसोई, वही दुकान, वही दफ़्तर की फ़ाइलें, वही खेत सँभालते हैं? और ऊपर से यह भी लगता है कि मेरे काम में तो कितनी कमियाँ हैं, कितनी गड़बड़ है, कितना समझौता करना पड़ता है। आज का सत्संग इसी मन के लिए है। आज श्रीकृष्ण एक ऐसी बात कहने वाले हैं जिसे सुनकर आपका रोज़ का काम आपको कभी छोटा नहीं लगेगा।

जय श्री कृष्ण।

आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का इक्यावनवाँ सत्संग है। हम गीता के अठारहवें और अन्तिम अध्याय के बीच में हैं, जो महाभारत के भीष्म पर्व का बयालीसवाँ अध्याय है, "मोक्षसंन्यासयोग"। और हर बार की तरह याद रखिए कि यह सब हमें सञ्जय सुना रहे हैं, हस्तिनापुर के महल में, अन्धे राजा धृतराष्ट्र को, उस दिन जब युद्ध के दस दिन बीत चुके हैं और भीष्म बाणों की शय्या पर गिर चुके हैं।

पहले याद कर लें कि पिछली बार हम कहाँ रुके थे। पिछले सत्संग में श्रीकृष्ण ने बुद्धि, धृति और सुख, तीनों को तीन-तीन गुणों में बाँटकर दिखाया था। सात्त्विक बुद्धि वह जो जानती है कि कब आगे बढ़ना है और कब रुकना है, क्या करना है और क्या नहीं। सात्त्विक धृति वह अटल धैर्य जो मन, प्राण और इन्द्रियों को थामे रखता है। और सात्त्विक सुख के बारे में वह प्रसिद्ध बात: "यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्", जो शुरू में ज़हर जैसा लगे और अन्त में अमृत जैसा निकले। और फिर चालीसवें श्लोक में एक बहुत भारी बात कही थी: पृथ्वी पर, या स्वर्ग में देवताओं में भी, ऐसा कुछ नहीं है जो प्रकृति के इन तीन गुणों से मुक्त हो।

अब ज़रा सोचिए, यह सुनकर अर्जुन के मन में, और हमारे मन में, कौन-सा सवाल उठेगा? अगर सब कुछ गुणों में बँधा है, मेरा काम भी, मेरी बुद्धि भी, मेरा सुख भी, तो फिर मैं छूटूँगा कैसे? श्रीधर स्वामी ठीक यही सवाल उठाते हैं, और कहते हैं कि इसी का उत्तर देने के लिए श्रीकृष्ण यहाँ से एक नया प्रसंग शुरू करते हैं, जो अध्याय के अन्त तक चलता है। और उस उत्तर को वे एक वाक्य में कहते हैं: अपने-अपने कर्म से परमेश्वर की आराधना, उनकी कृपा से ज्ञान, और ज्ञान से मुक्ति। श्रीधर कहते हैं, यह पूरी गीता का सार है, जो यहाँ एक जगह समेटा जा रहा है। नीलकण्ठ और मधुसूदन सरस्वती भी यही कहते हैं कि शास्त्र का विषय पूरा हो चुका, अब पूरी गीता का उपसंहार है। तो आज हम गीता के उपसंहार के बीचोंबीच बैठे हैं।

पहला श्लोक, इकतालीसवाँ। "ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप", हे परन्तप, ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों के, "कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः", कर्म उनके स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसार बाँटे गए हैं।

इस श्लोक को मैं बहुत धीरे कहना चाहता हूँ, क्योंकि यह उन शब्दों में से है जिन्हें सुनते ही आज बहुत लोग रुक जाते हैं, और कुछ लोग इसका अपनी-अपनी तरह से उपयोग भी करते हैं। तो हम वही करेंगे जो हर बार करते हैं: पहले देखेंगे कि श्लोक कहता क्या है, फिर हमारी टीका क्या कहती है, फिर आचार्य कहाँ-कहाँ अलग पढ़ते हैं। और फ़ैसला किसी पर थोपेंगे नहीं।

श्लोक में सबसे भारी शब्द है, "स्वभावप्रभवैर्गुणैः", स्वभाव से उत्पन्न गुणों से। ध्यान दीजिए, कर्म बाँटने का आधार यहाँ स्वभाव और गुण बताया गया है। हमारी टीका इसका अर्थ बहुत साफ़ करती है: यहाँ आधार स्वभाव है, यानी गुणों का वह मेल जो मनुष्य पिछले जन्मों से लेकर आता है। और टीका यह भी कहती है कि उपदेश अब गुणों की सामान्य बात से हटकर इस पर आ रहा है कि ये गुण हर व्यक्ति के कर्म को कैसे बनाते हैं। यानी पिछले सत्संग में जो गुणों की बात थी, बुद्धि में, धृति में, सुख में, वही अब हमारे रोज़ के काम में उतर रही है।

आपको याद होगा, तेरहवें सत्संग में चौथे अध्याय का एक श्लोक आया था: "चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः", गुण और कर्म के विभाग से चारों वर्ण मेरे द्वारा रचे गए हैं। यहाँ अठारहवें अध्याय में वही बात खुलकर, एक-एक वर्ण के नाम के साथ कही जा रही है।

अब आचार्य। और यहाँ मैं आपको ईमानदारी से बताऊँगा कि वे एक जैसा नहीं पढ़ते। शंकराचार्य "स्वभाव" शब्द के तीन अर्थ देते हैं। पहला, ईश्वर की तीन गुणों वाली प्रकृति। दूसरा, हर वर्ण के स्वभाव में किसी एक गुण का प्रधान होना। और तीसरा, पिछले जन्मों के संस्कार, जो इस जन्म में अपना फल देने को सामने आ गए हैं। और फिर शंकराचार्य स्वयं एक प्रश्न उठाते हैं: ये कर्म तो शास्त्र ने बाँटे हैं, फिर इन्हें गुणों से बँटा हुआ क्यों कहा? और उत्तर देते हैं कि शास्त्र ने भी ये कर्म गुणों को देखकर ही बाँटे हैं, बिना गुणों के नहीं।

रामानुजाचार्य "स्वभाव" का अर्थ करते हैं वह पुराना कर्म, जो ब्राह्मण आदि के रूप में जन्म का कारण बना। यानी उनकी पढ़त में जन्म और गुण साथ-साथ चलते हैं: पिछले कर्म से जन्म, और उसी से गुण। मधुसूदन सरस्वती भी जन्म के साथ जोड़कर पढ़ते हैं, और धर्मसूत्रों के वचन देकर बताते हैं कि शास्त्र में किस वर्ण के कौन-से कर्तव्य गिनाए गए हैं।

और लोकमान्य तिलक लिखते हैं कि चार वर्णों की यह व्यवस्था स्वभाव से उत्पन्न गुणों के भेद पर बनी है, और यह बात पहली बार गीता में ही नहीं कही गई। वे महाभारत की कई जगहें गिनाते हैं जहाँ गुणों के भेद की यही बात, थोड़े अन्तर के साथ, मिलती है। उनमें से दो जगहें हम आज ख़ुद महाभारत में खोलकर सुनेंगे।

तो पढ़ने के ढंग अलग हैं। कोई जन्म पर अधिक बल देता है, जिसका कारण पिछला कर्म है, कोई गुण और स्वभाव पर। मैं यहाँ किसी एक का पक्ष नहीं लूँगा। आप दोनों को सुनिए, और अपने गुरु से, अपनी परम्परा से समझिए। पर दो बातें ऐसी हैं जिन पर कोई मतभेद नहीं, और वे इसी श्लोक में लिखी हैं। पहली, आधार का नाम स्वभाव और गुण है। और दूसरी बात, जो हम चार श्लोक बाद सुनेंगे: हर एक, अपने-अपने कर्म से, उसी एक सिद्धि तक पहुँचता है। इस श्लोक में किसी को किसी से छोटा नहीं कहा गया। काम बाँटे गए हैं, मनुष्य का मोल नहीं।

अब बयालीसवाँ श्लोक। "शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च", शम, दम, तप, शौच, क्षमा और सरलता, "ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्", ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकता, ये ब्राह्मण के स्वभाव से उत्पन्न कर्म हैं।

इन नौ शब्दों को एक-एक करके देखिए। हमारी टीका कहती है, शम है मन का शान्त होना, और दम है बाहर की इन्द्रियों का संयम। श्रीधर स्वामी भी यही कहते हैं: शम भीतर का थमना, दम बाहर का। तप, यानी वही शरीर, वाणी और मन का तप, जो आपने सैंतालीसवें सत्संग में सुना था। शौच, यानी पवित्रता, बाहर की भी और भीतर की भी। क्षान्ति, यानी क्षमा। और मधुसूदन सरस्वती इसका जो अर्थ करते हैं, वह सुनने लायक है: कोई गाली दे, या मार भी दे, तब भी मन में विकार न उठे, वह क्षान्ति है। आर्जव, यानी सीधापन, टेढ़ापन न होना।

फिर दो शब्द जो साथ-साथ आते हैं, ज्ञान और विज्ञान। हमारी टीका कहती है, ज्ञान शास्त्र की जानकारी है, और विज्ञान उसका जीवित अनुभव। यानी एक है किताब में पढ़ना कि क्रोध बुरा है, और दूसरा है किसी दिन क्रोध के बीच सचमुच रुक जाना। और आस्तिकता, यानी शास्त्र और ईश्वर में विश्वास।

अब ज़रा इस सूची को फिर से देखिए। क्या इसमें कोई अधिकार है? कोई सुविधा है? कोई आदर माँगने की बात है? इसमें कुछ नहीं है सिवाय अपने ऊपर लगाम के। शान्त रहो, संयम रखो, सहो, सीधे रहो, पढ़ो, अनुभव करो, विश्वास रखो। यानी जिसके हिस्से में यह कर्म आया, उसके हिस्से में असल में सबसे कठिन अनुशासन आया।

और मधुसूदन सरस्वती यहाँ एक बात कहते हैं जो बहुत सुंदर है। वे कहते हैं, ये नौ गुण चारों वर्णों में हो सकते हैं, जब मन में सत्त्व जागा हो; और इसीलिए दूसरे शास्त्रों में इन्हें सबका साझा धर्म भी कहा गया है। यानी शम, दम, क्षमा और सरलता पर किसी का ठेका नहीं है। आपके घर में भी कोई होगा, कोई दादी, कोई चाचा, कोई छोटी बहन, जिनके पास बैठते ही मन शान्त हो जाता है, जो झगड़े में भी आवाज़ ऊँची नहीं करते। वह शम है, वह क्षान्ति है, और वह जहाँ भी है, भगवान का दिया हुआ है।

अब तैंतालीसवाँ श्लोक। "शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्", शूरवीरता, तेज, धैर्य, दक्षता, और युद्ध में न भागना, "दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्", दान और स्वामिभाव, ये क्षत्रिय के स्वभाव से उत्पन्न कर्म हैं।

मधुसूदन सरस्वती हर शब्द का अर्थ खोलते हैं। शौर्य, यानी अपने से बलवान पर भी वार करने का साहस। तेज, यानी ऐसा होना कि कोई दबा न सके। धृति, यानी बड़ी से बड़ी विपत्ति में भी शरीर और इन्द्रियों का न टूटना। यह वही धृति है जिसके तीन रूप हमने पिछली बार सुने थे। दाक्ष्य, यानी दक्षता, और मधुसूदन इसका जो अर्थ करते हैं वह मुझे बहुत अच्छा लगता है: अचानक सामने आ खड़े हुए काम में घबराए बिना लग जाना। दान, यानी खुले हाथ से अपना धन दूसरे का कर देना। और ईश्वरभाव, जिसे हमारी टीका स्वामिभाव कहती है: दूसरों पर शासन करने और उनकी रक्षा करने वाले का भाव।

और हमारी टीका इस श्लोक पर एक वाक्य कहती है जो हमें सीधे रथ पर ले आता है। वह कहती है, अर्जुन क्षत्रिय हैं, और यह सूची उन्हें याद दिलाती है कि धर्मयुद्ध लड़ना उनका अपना कर्म है। सोचिए, कुरुक्षेत्र में खड़े अर्जुन, जिन्होंने पहले अध्याय में धनुष नीचे रख दिया था, जो दूसरे अध्याय में कह रहे थे कि इनको मारने से अच्छा तो भीख माँगकर खाना है, उनके सामने श्रीकृष्ण आज एक सूची रखते हैं। और उसमें एक पद है, "युद्धे चाप्यपलायनम्", युद्ध में न भागना।

आपको याद होगा, छठे सत्संग में हमने कुन्ती का वह सन्देश सुना था जो उन्होंने श्रीकृष्ण के हाथ युधिष्ठिर को भेजा था: तुम्हारे लिए भिक्षा मना है, खेती भी तुम्हें नहीं शोभती, तुम क्षत्रिय हो, भुजाओं के बल से जीने वाले। आज उस सन्देश को एक नए कोण से सुनिए। कुन्ती यह नहीं कह रहीं कि खेती छोटी है या भिक्षा बुरी है। अगले ही श्लोक में श्रीकृष्ण ख़ुद खेती को किसी का स्वाभाविक कर्म कहेंगे। कुन्ती बस इतना कह रही हैं कि यह तुम्हारा नहीं है। तुम्हारा अपना काम कुछ और है। माँ ने बेटे को वही याद दिलाया था जो आज भगवान अर्जुन को याद दिला रहे हैं।

और यह सूची आज के जीवन में कहाँ दिखती है? किसी अस्पताल के आपातकाल कक्ष में, जहाँ रात के तीन बजे कोई घायल लाया जाता है, और एक डॉक्टर बिना घबराए अपने काम में लग जाता है। वह दाक्ष्य है। या वह माँ, जो बीमार बच्चे के पास पूरी रात बैठी रहती है और सुबह फिर काम पर निकल जाती है। वह धृति है। शौर्य और अपलायन केवल युद्ध के मैदान के शब्द नहीं हैं। जो भी अपनी ज़िम्मेदारी के सामने से भागता नहीं, उसमें यही गुण जाग रहा है।

पर अभी एक बात बाकी है। अगले श्लोक में श्रीकृष्ण बाकी दो कर्म गिनाएँगे: खेती, गोपालन, व्यापार, और सेवा। और फिर एक ऐसी बात कहेंगे जो इन चारों को एक ही पंक्ति में ला खड़ा करती है। और उस बात को समझने के लिए हम बाणों की शय्या पर लेटे भीष्म के पास चलेंगे, और एक अजगर बने राजा के पास भी।

कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् । परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥ ४४ ॥
गीता 18.44 — अर्थ पढ़ें ›
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः । स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ॥ ४५ ॥
गीता 18.45 — अर्थ पढ़ें ›

चौवालीसवाँ श्लोक। "कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्", खेती, गोपालन और व्यापार वैश्य के स्वभाव से उत्पन्न कर्म हैं। "परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्", सेवा रूप कर्म भी शूद्र के स्वभाव से उत्पन्न कर्म है।

शंकराचार्य शब्द खोलते हैं। कृषि, यानी धरती को जोतना। गौरक्ष्य, यानी गायों की रक्षा करने वाले का भाव, जिसे वे पशुपालन कहते हैं। वाणिज्य, यानी ख़रीदना-बेचना, व्यापारी का काम। मधुसूदन सरस्वती कृषि का अर्थ करते हैं, अन्न उगाने के लिए धरती को जोतना। और परिचर्या, यानी सेवा, दूसरों के काम आना।

अब इन चार कामों को एक पल के लिए अपनी थाली के सामने रखकर देखिए। आज सुबह आपने जो रोटी खाई, उसका गेहूँ किसी ने बोया था, किसी ने काटा था। जो दूध पिया, उस गाय को किसी ने पाला था, उसे चारा दिया था, सर्दी में ढका था। जो नमक, जो कपड़ा, जो दवा आप तक पहुँची, वह किसी व्यापारी के हाथों से, किसी के गोदाम से, किसी की गाड़ी से होकर आई। और घर में, दफ़्तर में, अस्पताल में, जितना भी काम चलता दिखता है, उसके पीछे अनगिनत हाथ हैं जो सेवा कर रहे हैं, जिनके नाम हम कभी नहीं पूछते। जो आचार्य वेद पढ़ाता है, वह भी उसी किसान का उगाया अन्न खाकर पढ़ाता है। जो राजा रक्षा करता है, उसकी सेना भी उसी अन्न पर चलती है। यह संसार एक शरीर की तरह है, जिसमें हर अंग का अपना काम है, और कोई अंग दूसरे के बिना नहीं जीता।

उस समय के शास्त्र में इन कर्मों के साथ जन्म और अधिकार के नियम भी जुड़े थे, किसको वेद पढ़ने का अधिकार है, किसको नहीं, और आचार्यों की टीकाओं में यह सब साफ़ लिखा है। सत्ताईसवें सत्संग में, नौवें अध्याय के बत्तीसवें श्लोक पर, हमने इस बारे में आचार्यों के अलग-अलग मत आपके सामने रखे थे। आज मैं आपको महाभारत में ले चलता हूँ, क्योंकि महाभारत इस प्रश्न पर ख़ुद बोलता है, और एक आवाज़ में नहीं, दो आवाज़ों में।

पहली आवाज़ भीष्म की है। युद्ध के बाद, जब भीष्म बाणों की शय्या पर लेटे हैं, उसी शय्या की, जिसकी ख़बर सुनाकर सञ्जय ने यह पूरी कथा शुरू की थी, युधिष्ठिर उनके पास जाते हैं। शान्ति पर्व कहता है, युधिष्ठिर ने गंगापुत्र पितामह को प्रणाम किया, हाथ जोड़े, और पूछा: सब वर्णों के साझा धर्म कौन-से हैं, और चारों वर्णों के अलग-अलग धर्म कौन-से?

और भीष्म उत्तर शुरू करने से पहले क्या करते हैं? वे कहते हैं, महान धर्म को नमस्कार, और विधाता कृष्ण को नमस्कार। फिर वे सबसे पहले वह बताते हैं जो सबका है, किसी एक का नहीं: क्रोध न करना, सच बोलना, सबके साथ बाँटकर देना, पवित्रता, किसी से द्रोह न करना, सरलता, और जो आप पर निर्भर हैं उनका पालन-पोषण। भीष्म कहते हैं, ये सब वर्णों के साझा धर्म हैं। सोचिए, इस सूची में जो सबसे बड़ी बातें हैं, सच, क्षमा, सरलता, वे किसी एक वर्ण को नहीं, सबको दी गई हैं।

फिर भीष्म एक-एक वर्ण का धर्म बताते हैं, और उनकी बात में एक वाक्य बार-बार लौटता है जो मुझे बहुत गहरा लगता है। ब्राह्मण के बारे में वे कहते हैं, जिसका काम स्वाध्याय से पूरा हो गया, वह और कुछ करे या न करे, वह सबका मित्र ब्राह्मण कहलाता है। और राजा के बारे में भी ठीक वैसा ही वाक्य: जिस राजा का काम प्रजा की रक्षा से पूरा हो गया, वह और कुछ करे या न करे, वह इन्द्र का क्षत्रिय कहलाता है। वैश्य से वे कहते हैं, सब पशुओं का पालन पिता की तरह करो। देखिए, हर एक का काम अपने में पूरा है। किसी को पूरा होने के लिए दूसरे का काम नहीं करना पड़ता।

और भीष्म उसी अध्याय में एक बात और कहते हैं। हमने सुना है, वे कहते हैं, कि पैजवन नाम के एक शूद्र ने विधि से यज्ञ करके दक्षिणा में एक लाख दिए थे। और फिर: सब यज्ञों में पहले श्रद्धा का यज्ञ है, और इसलिए श्रद्धा का यज्ञ सब वर्णों के लिए बताया गया है। आपको याद होगा, सत्रहवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने कहा था, जिसकी जैसी श्रद्धा, वह वैसा ही है। भीष्म बाणों की शय्या से वही बात कह रहे हैं: भगवान तक पहुँचने का पहला दरवाज़ा श्रद्धा है, और वह दरवाज़ा सबके लिए खुला है।

और अब, इससे पहले कि हम दूसरी आवाज़ सुनें, एक छोटी-सी बात आपसे कहना चाहता हूँ। आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। जो आदमी इन चार श्लोकों को सुनकर यहीं उठ जाए, वह शायद यह सोचकर जाए कि गीता ने लोगों को बाँट दिया, या यह कि उसका अपना काम किसी गिनती में नहीं। जबकि अगले ही श्लोक से श्रीकृष्ण वह बात कहने वाले हैं जो इन चारों को एक साथ उठाकर भगवान के सामने खड़ा कर देती है। तो अगर आप यह सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की यह यात्रा बीच में न छूटे। और आज का यह सत्संग आख़िर तक सुनिए।

अब दूसरी आवाज़। चालीसवें सत्संग में आपने वह कथा सुनी थी, जब वनवास में भीम को एक विशाल अजगर ने जकड़ लिया था, और वह अजगर असल में राजा नहुष थे, जो घमण्ड के कारण इन्द्र के पद से गिरे थे। और उन्होंने युधिष्ठिर से कहा था, मेरे प्रश्नों का उत्तर दो तो तुम्हारे भाई को छोड़ दूँगा। उस दिन हमने उसी बातचीत का एक ही हिस्सा सुना था, कि जानने योग्य क्या है। पर नहुष का दूसरा प्रश्न भी था, जो हमने उस दिन छोड़ दिया था, और वह आज के श्लोकों के लिए ही बचा रखा था: ब्राह्मण कौन है? और युधिष्ठिर ने कहा, जिसमें सत्य, दान, क्षमा, अच्छा आचरण, कोमलता, तप और दया दिखें, वही ब्राह्मण माना गया है। उसके ठीक बाद एक बहस होती है।

अजगर कहता है, युधिष्ठिर, सत्य, दान, क्रोध न करना, कोमलता, अहिंसा और दया तो शूद्रों में भी पाए जाते हैं। और युधिष्ठिर उत्तर देते हैं: यदि ब्राह्मण का लक्षण शूद्र में दिखे और द्विज में न पाया जाए, तो वह शूद्र शूद्र नहीं, और वह ब्राह्मण ब्राह्मण नहीं। जिसमें यह आचरण दिखता है, वही ब्राह्मण माना गया है।

अजगर फिर पूछता है, अगर तुम आचरण से परखते हो, तो जब तक कर्म न हों, जन्म व्यर्थ हुआ? और युधिष्ठिर कहते हैं, सत्य को देखने वाले जानते हैं कि अच्छा आचरण ही मुख्य है। और अन्त में कहते हैं, जिसमें संस्कारों के साथ अच्छा आचरण पाया जाता है, उसी को मैंने ब्राह्मण कहा था। यह सुनकर नहुष मान जाते हैं कि युधिष्ठिर जानने योग्य को जानते हैं।

तो देखिए। एक ही महाभारत में भीष्म हर वर्ण के अलग कर्तव्य गिनाते हैं, और युधिष्ठिर आचरण को सबसे भारी बताते हैं, संस्कार को साथ रखकर। और लोकमान्य तिलक ठीक इसी नहुष-युधिष्ठिर संवाद को उन जगहों में गिनाते हैं जहाँ गुणों के भेद की बात मिलती है। मैं आपको दोनों आवाज़ें सुना रहा हूँ, फ़ैसला नहीं। पर दोनों आवाज़ों में एक बात साझा है, और वही आज के सत्संग की जड़ है: सच, क्षमा, दया और श्रद्धा किसी के जन्म की बपौती नहीं हैं। और अपना काम, चाहे जो भी हो, भगवान तक पहुँचने का रास्ता बन सकता है।

तो पैंतालीसवाँ श्लोक। "स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः", अपने-अपने कर्म में लगा हुआ मनुष्य सिद्धि पाता है। "स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु", अपने कर्म में लगा हुआ मनुष्य किस प्रकार सिद्धि पाता है, वह सुनो।

पहले दो शब्द देखिए, "स्वे स्वे", अपने-अपने। यह दो बार कहा गया है। जैसे कोई चार अलग-अलग लोगों की ओर बारी-बारी से उँगली उठाकर कहे: तुम अपने में, तुम अपने में, तुम अपने में। और फिर फल किसका क्या है? "संसिद्धिं लभते नरः", मनुष्य सिद्धि पाता है। यहाँ ब्राह्मण नहीं कहा, क्षत्रिय नहीं कहा। कहा, "नरः", मनुष्य। चारों के लिए सिद्धि एक ही रखी गई है।

अब "कर्मण्यभिरतः", कर्म में रमा हुआ। शंकराचार्य इसका अर्थ करते हैं, "तत्परः", पूरी तरह उसी में लगा हुआ। श्रीधर स्वामी कहते हैं, "परिनिष्ठितः", उसमें जमा हुआ। यानी अपना काम आधे मन से, बेगार की तरह नहीं, उसमें रमकर।

और "सिद्धि" का अर्थ क्या है? यहाँ आचार्यों में एक बारीक अन्तर है। हमारी टीका कहती है, यहाँ सिद्धि का पहला अर्थ ज्ञान की योग्यता है: इतना शुद्ध मन कि वह पचासवें श्लोक से आगे बताया गया मार्ग अपना सके। शंकराचार्य और श्रीधर स्वामी भी यही कहते हैं: अपने कर्म से मन का मैल धुलता है, और मनुष्य ज्ञान के योग्य बनता है। रामानुजाचार्य सीधा कहते हैं, सिद्धि यानी परम पद की प्राप्ति। और नीलकण्ठ कहते हैं, यह वह सिद्धि है जो आगे नैष्कर्म्य-सिद्धि के नाम से बताई जाएगी। यानी कोई इसे सीढ़ी का पहला डण्डा कहता है, कोई सीढ़ी का अन्त। पर किसी के मत में यह सीढ़ी किसी एक वर्ण के लिए नहीं बनी।

और श्लोक की आख़िरी पंक्ति में श्रीकृष्ण एक वादा करते हैं: "यथा विन्दति तच्छृणु", वह कैसे पाता है, यह सुनो। यानी भगवान केवल यह नहीं कह रहे कि अपना काम करते रहो, सब ठीक हो जाएगा। वे कह रहे हैं, ठहरो, मैं तुम्हें बताता हूँ कि काम सिद्धि में बदलता कैसे है। क्योंकि रोज़ काम तो सब करते हैं, पर सबका काम सिद्धि नहीं बनता।

पर अभी एक बात बाकी है। वह "कैसे" अगले श्लोक में है, और वह गीता के सबसे सुंदर श्लोकों में से एक है। उसमें बताया गया है कि खेत में हल चलाता किसान, दुकान पर बैठा व्यापारी, और किसी की सेवा में लगा हाथ, सब एक साथ पूजा कैसे कर सकते हैं। और फिर हम मिथिला के उस कसाईखाने को फिर से याद करेंगे, जहाँ एक तपस्वी ब्राह्मण धर्म सीखने गया था।

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् । स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥ ४६ ॥
गीता 18.46 — अर्थ पढ़ें ›
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् । स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥ ४७ ॥
गीता 18.47 — अर्थ पढ़ें ›

छियालीसवाँ श्लोक। और इसे मैं आज बहुत धीरे कहूँगा, क्योंकि आज के पूरे सत्संग का दिल यही है। "यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्", जिससे सब प्राणियों की उत्पत्ति होती है, और जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, "स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः", उस परमेश्वर की अपने कर्म से पूजा करके मनुष्य सिद्धि पाता है।

श्लोक की पहली पंक्ति बताती है कि पूजा किसकी है। "यतः प्रवृत्तिर्भूतानां", जिससे प्राणियों की प्रवृत्ति है। शंकराचार्य कहते हैं, "प्रवृत्ति" के दो अर्थ हैं: उत्पत्ति भी, और चेष्टा भी, यानी हिलना-डुलना, काम करना। और यह सब उस अन्तर्यामी ईश्वर से है जो भीतर बैठा है। ज़रा सोचिए, इसका क्या मतलब हुआ। आपके हाथ जो रोटी बेलते हैं, आपकी उँगलियाँ जो हिसाब लिखती हैं, आपके पैर जो खेत की मेड़ पर चलते हैं, उनमें जो चलने की शक्ति है, वह भी उसी से आ रही है। "येन सर्वमिदं ततम्", जिससे यह सब व्याप्त है। रामानुजाचार्य यहाँ नौवें अध्याय का वह वचन याद दिलाते हैं, "मया ततमिदं सर्वं", मुझसे यह सारा जगत् व्याप्त है, जो आपने पच्चीसवें सत्संग में सुना था।

और अब दूसरी पंक्ति, जिसके लिए यह पूरा श्लोक है: "स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य"। "तमभ्यर्च्य", यानी उनकी अर्चना करके, पूजा करके। और किससे? फूल से नहीं, दीये से नहीं, किसी विशेष मन्त्र से नहीं। "स्वकर्मणा", अपने कर्म से।

हमारी टीका इसे बहुत सरल शब्दों में कहती है: जब कर्म भगवान को अर्पित किया जाता है, तो वही पूजा बन जाता है। अपना कर्म अच्छी तरह, और उनके लिए करने से अलग, किसी विशेष अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं। लोकमान्य तिलक भी अपनी टीका में यही लिखते हैं: अपने कर्मों के द्वारा पूजा, केवल वाणी से या फूलों से नहीं। और नीलकण्ठ एक वाक्य में कहते हैं, अपने रोज़ के कर्म परमेश्वर को अर्पित करना ही मोक्ष का द्वार है।

और संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर जो कहते हैं, उसे मैं जितनी बार पढ़ता हूँ, मन भर आता है। वे कहते हैं, उस सबके आत्मा ईश्वर की पूजा अपने कर्म के फूलों से करो। "स्वकर्मकुसुमांची", अपने कर्म के फूल। यानी किसान की पूजा का फूल उसका हल है, माँ की पूजा का फूल उसकी रसोई है, शिक्षक की पूजा का फूल उसकी कक्षा है। और ज्ञानेश्वर आगे कहते हैं, इस पूजा से प्रसन्न होकर आत्मा का राजा, यानी ईश्वर, उसे प्रसाद में वैराग्य देता है।

अब आप पूछेंगे, फिर अपना काम तो सब करते हैं। रोज़ सुबह उठकर सब काम पर जाते हैं। तो क्या सबकी पूजा हो रही है? यहीं बारीकी है। हमारी टीका के दो शब्द याद रखिए: "अच्छी तरह", और "उनके लिए"। अच्छी तरह, यानी बेगार की तरह नहीं, मन लगाकर, ईमानदारी से। और उनके लिए, यानी यह याद रखकर कि जिसके लिए कर रहा हूँ, वह वही है जिससे मेरे हाथों में चलने की शक्ति आई है। नौवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने कहा था, "यत्करोषि यदश्नासि", जो करते हो, जो खाते हो, "तत्कुरुष्व मदर्पणम्", वह मुझे अर्पण करो। यहाँ वही बात एक क़दम आगे है: अर्पण किया हुआ कर्म केवल भेंट नहीं, पूजा है, और उसी से सिद्धि मिलती है।

आपको याद होगा, चौदहवें सत्संग में हमने एक कथा सुनी थी। कौशिक नाम के एक वेदपाठी तपस्वी ब्राह्मण, जिनकी क्रोध भरी दृष्टि से एक बगुली गिर पड़ी थी, एक पतिव्रता स्त्री के कहने पर मिथिला गए, धर्म सीखने। और वहाँ उन्हें धर्म सिखाने वाला मिला एक व्याध, जो कसाईखाने में बैठकर मांस बेचता था, और जो उन्हें अपने घर ले गया और अपने बूढ़े माता-पिता दिखाकर बोला, ये ही मेरे सबसे बड़े देवता हैं। उस दिन हमने उस कथा को इस तरह सुना था कि हर काम पूजा बन सकता है। आज छियालीसवें श्लोक के बाद उसे फिर से सुनिए। उस व्याध ने कौशिक से कहा था, जैसे ब्राह्मण भेंट लाकर देवताओं की सेवा करते हैं, वैसे ही मैं इन दोनों की सेवा करता हूँ। यह "स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य" का जीता-जागता रूप है। और लोकमान्य तिलक ने अपनी टीका में, इसी प्रसंग के पास, समाज के लिए ज़रूरी लोगों की गिनती में बढ़ई, कुम्हार, और "मांसविक्रेता व्याध" तक का नाम लिया है। यानी गीता के टीकाकार भी जब "अपने कर्म से पूजा" समझाने बैठे, तो उन्हें वही मिथिला का व्याध याद आया। उसी व्याध की एक और बात हम आज थोड़ी देर बाद सुनेंगे, जो उस दिन अनकही रह गई थी।

अब सैंतालीसवाँ श्लोक। "श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्", अपना धर्म, कमी वाला हो तब भी, दूसरे के अच्छी तरह किए गए धर्म से श्रेष्ठ है। "स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्", स्वभाव से नियत कर्म करते हुए मनुष्य पाप नहीं पाता।

यह पहली पंक्ति आपने पहले भी सुनी है। हमारी टीका बताती है कि यही बात तीसरे अध्याय के पैंतीसवें श्लोक में कही गई थी, जिस पर बारहवें सत्संग में हमने बात की थी। तो भगवान इसे दोबारा क्यों कह रहे हैं? हमारी टीका उत्तर देती है: ताकि अर्जुन योद्धा के अपने धर्म को छोड़कर संन्यासी के अधिक पवित्र दिखने वाले जीवन की ओर न जाएँ। श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती दोनों साफ़ कहते हैं: अर्जुन, यह मत सोचना कि भाइयों के वध से जुड़े युद्ध से तो भिक्षा माँगकर जीना श्रेष्ठ है। तुम्हारे लिए तुम्हारा युद्ध ही तुम्हारा धर्म है।

अब दो शब्द। "विगुणः", यानी गुण से रहित, कमी वाला, ठीक से न निभाया हुआ। और "स्वनुष्ठितात्", यानी भली-भाँति निभाया हुआ। यह तुलना देखिए। भगवान यह नहीं कह रहे कि अपना धर्म हमेशा अच्छा दिखेगा। वे मान रहे हैं कि उसमें कमी होगी, और दूसरे का धर्म बहुत सुंदर ढंग से निभाया हुआ दिखेगा। फिर भी, अपना ही श्रेष्ठ है।

और दूसरी पंक्ति, "स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्"। इस पर शंकराचार्य एक चित्र देते हैं जो याद रह जाता है। वे कहते हैं, जैसे विष में ही पैदा हुए कीड़े को वह विष हानि नहीं करता, वैसे ही अपने स्वभाव से नियत कर्म करने वाले को पाप नहीं लगता।

और संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर चित्रों की एक माला पिरो देते हैं। सुनिए। वे कहते हैं, नीम कड़वा होता है, पर जब उसी से अपना भला होना है, तो उसकी कड़वाहट से कोई नहीं उकताता। केले के पेड़ को फल आने से पहले देखो, तो लगता है इससे क्या मिलेगा; पर जो उसे तब काट दे, उसे फल कहाँ से मिलेगा? और फिर वह बात जो मुझे सबसे गहरी लगती है। ज्ञानेश्वर कहते हैं, अपनी माँ अगर कुबड़ी भी हो, तो भी बच्चे को जो प्रेम उससे मिलता है, वह कहीं और नहीं मिलता; दूसरी स्त्रियाँ अप्सरा से भी सुंदर हों, तो बच्चे को उनसे क्या? घी में पानी से बहुत अधिक गुण हैं, पर मछली उसमें कैसे रहेगी? और जो पैरों का काम सिर से करने चले, वह कहाँ पहुँचेगा?

अब इसे आज की आँख से सुनिए। आचार्य यहाँ वर्ण के धर्म की बात कर रहे हैं, और श्लोक का पहला अर्थ वही है, अर्जुन के सामने उसका क्षत्रिय धर्म। पर इसी श्लोक का एक सीधा पाठ हर घर में काम आता है। आज हम हर दिन दूसरों के जीवन की चमकती तस्वीरें देखते हैं। फ़ोन खोला, किसी की विदेश यात्रा, किसी की नई गाड़ी, किसी का सफल व्यापार। और मन में आता है, मेरा जीवन तो कुछ भी नहीं, मेरा काम तो कितना फीका है। सैंतालीसवाँ श्लोक कहता है, दूसरे का धर्म बाहर से "स्वनुष्ठित", यानी बहुत सुंदर ढंग से निभाया हुआ दिख सकता है। पर आपकी सिद्धि आपकी अपनी राह पर है। आपके बूढ़े माता-पिता की सेवा, आपकी अपनी दुकान, आपकी अपनी कक्षा, आपके अपने बच्चे, यह आपकी कुबड़ी माँ है। इससे जो मिलेगा, वह किसी और की अप्सरा जैसी सुंदर राह से नहीं मिलेगा।

पर अभी एक बात बाकी है। मान लीजिए आप अपना काम पूरे मन से कर रहे हैं, पर आपको दिखता है कि उसमें कुछ न कुछ ग़लत होता ही है। किसी को चोट पहुँचती है, किसी का नुक़सान होता है, कहीं समझौता करना पड़ता है। तो क्या उसे छोड़ दें? अगला श्लोक ठीक इसी डर का उत्तर है, और उसमें धुएँ और आग का एक ऐसा चित्र है जो आप कभी नहीं भूलेंगे।

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् । सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥ ४८ ॥
गीता 18.48 — अर्थ पढ़ें ›
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः । नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥ ४९ ॥
गीता 18.49 — अर्थ पढ़ें ›

अड़तालीसवाँ श्लोक। "सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्", हे कौन्तेय, स्वाभाविक कर्म को, दोष वाला होने पर भी, नहीं छोड़ना चाहिए। "सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः", क्योंकि सब कर्म किसी न किसी दोष से वैसे ही ढके हुए हैं जैसे धुएँ से आग।

आज के सत्संग की दूसरी चिन्ता यही थी: मेरे काम में तो दोष है। और श्रीकृष्ण उसका उत्तर इनकार से नहीं देते। वे यह नहीं कहते कि तुम्हारे काम में दोष नहीं है। वे कहते हैं, "सदोषमपि", दोष वाला होने पर भी। यानी भगवान पहले मान लेते हैं कि दोष है। और फिर एक ऐसा वाक्य कहते हैं जो सारी दुनिया पर लागू होता है: "सर्वारम्भा हि दोषेण", जो भी काम शुरू किया जाए, सबमें कोई न कोई दोष है।

हमारी टीका इसे बहुत साफ़ कहती है: कोई भी कर्म पूरी तरह हानि से मुक्त नहीं है। दोष के कारण अपना कर्म छोड़कर दूसरा अपनाना, केवल एक तरह के दोषों को दूसरी तरह के दोषों से बदलना है। और शब्द "सहजं" को देखिए। सह-ज, यानी साथ जन्मा हुआ। शंकराचार्य और श्रीधर इसे स्वभाव से मिला हुआ कर्म कहते हैं। और लोकमान्य तिलक इसका अर्थ लिखते हैं, जो जन्म से ही गुण-कर्म के विभाग के अनुसार नियत हो गया है। यहाँ भी वही दो धाराएँ हैं जो हमने आज की शुरुआत में देखीं, जन्म और गुण, और तिलक दोनों को एक साथ रख देते हैं।

अब वह चित्र, धुआँ और आग। जब आप चूल्हा जलाते हैं, या हवन की आग सुलगाते हैं, तो पहले धुआँ उठता है। आँखों में लगता है, खाँसी आती है। पर कोई यह कहकर आग नहीं बुझा देता कि इसमें धुआँ है। श्रीधर स्वामी इसे बहुत सुंदर ढंग से खोलते हैं। वे कहते हैं, जैसे आग के धुएँ वाले दोष को हटाकर उसकी गर्मी अँधेरा और ठण्ड दूर करने के लिए काम में ली जाती है, वैसे ही कर्म के दोष वाले अंश को छोड़कर, उसका गुण वाला अंश मन की शुद्धि के लिए अपनाया जाता है। यानी धुआँ कम करो, आग मत बुझाओ।

और रामानुजाचार्य एक बात जोड़ते हैं। वे कहते हैं, दोष और दुःख तो कर्म के मार्ग में भी है, और ज्ञान के मार्ग में भी। पर कर्म का मार्ग करने में सरल है, और उसमें फिसलने का डर कम है।

और अब संत ज्ञानेश्वर, जो इस श्लोक पर एक के बाद एक ऐसे चित्र देते हैं जैसे कोई गाँव का बुज़ुर्ग आँगन में बैठकर समझा रहा हो। वे कहते हैं, सीधी सड़क पर चलो तो भी पैर थकते हैं, और ऊबड़-खाबड़ जंगल में दौड़ो तो भी वही पैर थकते हैं। पीठ पर पत्थर लादो या रास्ते के भोजन की पोटली, बोझ तो दोनों का है; पर उसे उठाओ जिसे ढोकर पड़ाव पर विश्राम मिले। अनाज कूटो या भूसा, मेहनत बराबर है। रोज़ के हवन की आग फूँको या यूँ ही कोई आग, धुआँ तो वही सहना है। यानी मेहनत और दोष से कोई काम बचा नहीं है। तो वह काम क्यों न करें जिससे अन्त में भगवान मिलें?

अब मैं आपको मिथिला के उसी व्याध के पास फिर ले चलता हूँ, क्योंकि उसने कौशिक को ठीक यही बात कही थी, और चौदहवें सत्संग में यह हिस्सा अनकहा रह गया था। उस दिन हमने इतना ही सुना था कि व्याध ने ख़ुद माना था कि उसका काम कठोर है, और वह अपने इस दोष को मिटाने का यत्न करता है।

पर उसके आगे व्याध एक प्रश्न रखता है, जो अड़तालीसवें श्लोक की टीका जैसा लगता है। वह कहता है, लोग खेती को अच्छा मानते हैं, पर उसमें भी बड़ी हिंसा मानी गई है। हल से धरती जोतते हुए लोग मिट्टी में रहने वाले बहुत-से जीवों को मारते हैं। जिन्हें लोग धान आदि के बीज कहते हैं, वे भी जीव ही हैं। चलते-फिरते लोग धरती पर रहने वाले जीवों को पैरों से कुचल देते हैं, बैठे और लेटे हुए भी, जाने-अनजाने, अनेक जीवों को मारते हैं। और हर बार वह पूछता है, "उस विषय में तुम्हें क्या लगता है?"

और फिर वह एक बात कहता है जो मैं आपको लगभग उसी के शब्दों में सुनाना चाहता हूँ। बहुत सोच-विचार करके देखें तो यहाँ कोई ऐसा नहीं है जो किसी को हानि न पहुँचाए। अहिंसा में लगे संन्यासी भी हिंसा करते ही हैं; सावधानी से वह केवल कम हो जाती है। और अन्त में व्याध कहता है, धर्म और अधर्म के बारे में बहुत कुछ कहा जा सकता है, पर जो अपने काम में लगा रहता है, वह बड़ा यश पाएगा।

देखिए, एक व्याध ने कौशिक जैसे वेदपाठी के सामने वही बात रखी जो श्रीकृष्ण अर्जुन के सामने रख रहे हैं। "सर्वारम्भा हि दोषेण", सबमें धुआँ है। और व्याध के शब्दों में उपाय भी वही है जो श्रीधर का है: सावधानी से धुआँ कम होता है।

अब यह आज के जीवन में। एक डॉक्टर ऑपरेशन करता है, तो चीरा लगता है, दर्द होता है, कभी-कभी कुछ बिगड़ भी जाता है। एक न्यायाधीश फ़ैसला सुनाता है, तो किसी न किसी का दिल टूटता है। एक शिक्षक डाँटता है, तो बच्चे का मुँह उतर जाता है। एक दुकानदार मुनाफ़ा लेता है, तो कहीं न कहीं किसी की जेब से जाता है। तो क्या डॉक्टर सर्जरी छोड़ दे? न्यायाधीश फ़ैसले छोड़ दे? माँ-बाप बच्चों को टोकना छोड़ दें? श्रीकृष्ण कहते हैं, नहीं। धुआँ कम करो। सावधानी बढ़ाओ, स्वार्थ घटाओ, और काम उन्हें अर्पित करो। पर आग मत बुझाओ, क्योंकि उसी आग से किसी का अँधेरा और किसी की ठण्ड दूर हो रही है।

अब उनचासवाँ श्लोक। "असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः", जिसकी बुद्धि सब जगह आसक्ति रहित है, जिसने अपने को जीत लिया है और जो कामना रहित है, "नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति", वह संन्यास से परम नैष्कर्म्य-सिद्धि पाता है।

तीन विशेषण हैं। "असक्तबुद्धिः सर्वत्र", शंकराचार्य कहते हैं, पुत्र, पत्नी और उन सब चीज़ों में जिनमें मन अटकता है, उनमें न अटकने वाली बुद्धि। "जितात्मा", अपने मन को जीत लेने वाला। "विगतस्पृहः", शंकराचार्य कहते हैं, शरीर, जीवन और भोगों की प्यास से छूटा हुआ।

अब वह बड़ा शब्द, "नैष्कर्म्य"। सुनने में लगता है, कर्म का न होना। तो क्या भगवान अब तक की सारी बात पलट रहे हैं? हमारी टीका यहाँ बहुत साफ़ है: नैष्कर्म्य निठल्ला बैठना नहीं है। यह उसकी अवस्था है जो जानता है कि आत्मा कुछ नहीं करता, इसलिए कर्म चले या रुके, वह उसे नहीं छूता।

और यहाँ आचार्य अलग-अलग राह से पढ़ते हैं, जो मैं आपके सामने रखता हूँ। शंकराचार्य कहते हैं, यह परम सिद्धि सही ज्ञान से, या उस ज्ञान के बाद सब कर्मों के संन्यास से मिलती है; यह उस आत्मा में टिक जाना है जो कुछ नहीं करता। श्रीधर स्वामी कहते हैं, यहाँ संन्यास का पहला अर्थ वही है जो इस अध्याय की शुरुआत में बताया गया था, आसक्ति और फल का त्याग; और इसी से मन शुद्ध होकर आगे की परम अवस्था मिलती है। रामानुजाचार्य कहते हैं, यह व्यक्ति कर्म करता रहता है, बस इस भाव से कि करने वाले परम पुरुष हैं, मैं नहीं; और इसी से उसे ध्यान की परम अवस्था मिलती है। और लोकमान्य तिलक ज़ोर देकर लिखते हैं कि नैष्कर्म्य-सिद्धि के लिए कर्म छोड़ने की आवश्यकता नहीं; अगर कर्म छोड़े बिना मोक्ष न मिलता, तो सबको अपना-अपना व्यवसाय छोड़कर संन्यासी बन जाना पड़ता, जबकि समाज को चलाने के लिए बढ़ई और कुम्हार जैसे लोगों की भी ज़रूरत है। तो कोई इसे संन्यासी का मार्ग पढ़ता है, कोई कर्म करते हुए अनासक्ति का। दोनों में एक बात साझा है: बन्धन कर्म से नहीं, आसक्ति से है।

संत ज्ञानेश्वर इस अनासक्ति का चित्र देते हैं: जब फल पूरा पक जाता है, तो न डण्ठल फल को पकड़ता है, न फल डण्ठल को। वह गिरता नहीं, छूट जाता है, बिना किसी खिंचाव के। और ग्यारहवें सत्संग में आपने राजा जनक का वह वचन सुना था, मिथिला जले तो मेरा कुछ नहीं जलता। वह भी यही पका हुआ फल था, जो राजमहल में बैठा था, पर किसी डण्ठल से बँधा नहीं था।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अपने कर्म से सिद्धि मिलती है, और फिर कि आसक्ति छूटे तो परम सिद्धि। पर उस सिद्धि के बाद क्या? वहाँ से ब्रह्म तक कैसे पहुँचा जाता है? अगले श्लोक में भगवान कहते हैं, "समासेनैव", यह मैं तुम्हें संक्षेप में बताता हूँ। और फिर तीन श्लोकों का एक ऐसा लम्बा वाक्य आता है, जो एक साधक का पूरा चित्र खींच देता है।

सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे । समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ॥ ५० ॥
गीता 18.50 — अर्थ पढ़ें ›
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च । शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥ ५१ ॥
गीता 18.51 — अर्थ पढ़ें ›

पचासवाँ श्लोक। "सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे", हे कौन्तेय, सिद्धि को प्राप्त हुआ मनुष्य किस प्रकार ब्रह्म को पाता है, "समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा", जो ज्ञान की परम निष्ठा है, वह मुझसे संक्षेप में जानो।

अब तक जो सुना, उसे एक सीढ़ी की तरह देखिए। पहला डण्डा: अपना काम, अच्छी तरह और भगवान के लिए। दूसरा: उस पूजा से मन शुद्ध होना, जिसे पैंतालीसवें और छियालीसवें श्लोक में सिद्धि कहा गया। तीसरा: आसक्ति का छूटना, नैष्कर्म्य-सिद्धि। और अब श्रीकृष्ण कहते हैं, उस सिद्धि को पाकर मनुष्य ब्रह्म तक कैसे पहुँचता है, वह सुनो। श्रीधर स्वामी बताते हैं कि भगवान यह बात छह श्लोकों में कहते हैं, इस पचासवें से पचपनवें तक। यानी आज हम उस सीढ़ी के ऊपरी डण्डों की ओर देख रहे हैं।

"निबोध मे", मुझसे जानो। शंकराचार्य कहते हैं, इसका अर्थ है, मेरे वचन से इसे निश्चय के साथ अपने भीतर बिठा लो। और "समासेनैव", संक्षेप में ही। सोचिए, जो बात बड़े-बड़े ग्रन्थों में विस्तार से कही गई है, श्रीकृष्ण उसे रथ पर, युद्ध से ठीक पहले, कुछ ही वाक्यों में कह रहे हैं। जैसे कोई बड़ा वैद्य जाते-जाते रोगी के हाथ में एक छोटी पर्ची थमा दे, कि बस यही करते रहना।

अब "निष्ठा ज्ञानस्य या परा", ज्ञान की परम निष्ठा। "निष्ठा" का अर्थ शंकराचार्य करते हैं, पर्यवसान, यानी अन्त, पूर्णता। ज्ञान जहाँ जाकर पूरा होता है। रामानुजाचार्य इसे दूसरी तरह पढ़ते हैं। वे कहते हैं, यह सिद्धि वह है जो रोज़-रोज़ किए गए कर्मयोग से, जीवन के अन्त तक, ध्यान के रूप में मिलती है; और "ज्ञान की परम निष्ठा" का अर्थ है, ध्यान रूपी ज्ञान का सबसे ऊँचा लक्ष्य। तो एक आचार्य इसे ज्ञान का पूर्ण होना कहते हैं, दूसरे ध्यान का अपने लक्ष्य तक पहुँचना। रास्ते का वर्णन दोनों का एक ही है, जो अगले तीन श्लोकों में आता है।

और हमारी टीका यहाँ एक बात बताती है जो इन श्लोकों को समझने की चाबी है: इक्यावन से तिरपन तक के श्लोक एक ही वाक्य हैं, जो उस व्यक्ति का वर्णन करते हैं जो ब्रह्मभाव के योग्य है। यानी अब जो आएगा, उसे एक-एक टुकड़ा अलग करके नहीं, एक साँस में सुनना है। जैसे किसी एक मनुष्य की तस्वीर, जिसके हर अंग का वर्णन अलग है, पर मनुष्य एक है।

तो इक्यावनवाँ श्लोक। "बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च", विशुद्ध बुद्धि से युक्त होकर, धृति से अपने को वश में करके, "शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च", शब्द आदि विषयों को छोड़कर, और राग-द्वेष को दूर करके।

पहला अंग, "बुद्ध्या विशुद्धया", शुद्ध बुद्धि। श्रीधर स्वामी कहते हैं, यह वही सात्त्विक बुद्धि है जिसका वर्णन अभी इसी अध्याय में हुआ था। पिछले सत्संग में आपने सुना था, वह बुद्धि जो जानती है कब चलना है और कब रुकना है, क्या करना है और क्या नहीं, किससे डरना है और किससे नहीं। यानी ब्रह्म की ओर पहला क़दम कोई चमत्कार नहीं, साफ़ सोच है।

दूसरा अंग, "धृत्यात्मानं नियम्य च", धृति से अपने को वश में करके। श्रीधर कहते हैं, यह सात्त्विक धृति है, जो उसी बुद्धि को डगमगाने नहीं देती। देखिए, गीता कितनी सधी हुई है। पिछले सत्संग में जो बुद्धि और धृति के प्रकार गिनाए गए थे, वे केवल जानकारी के लिए नहीं थे। वे यहाँ आकर साधक के औज़ार बन गए। एक ने रास्ता दिखाया, दूसरी ने उस पर टिकाए रखा।

तीसरा अंग, "शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा", शब्द आदि विषयों को छोड़कर। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, यानी वह सब जो कान, त्वचा, आँख, जीभ और नाक तक पहुँचता है। तो क्या साधक को सुनना, देखना, खाना सब छोड़ देना है? शंकराचार्य यहाँ बहुत व्यावहारिक बात कहते हैं। वे कहते हैं, इसका अर्थ है: जो केवल शरीर को बनाए रखने के लिए ज़रूरी है, उसे छोड़कर, उससे अधिक जो केवल सुख के लिए है, वह छोड़ दो। यानी भोजन नहीं छूटता, भोजन का लालच छूटता है। कपड़ा नहीं छूटता, दिखावे का कपड़ा छूटता है।

और चौथा अंग, "रागद्वेषौ व्युदस्य च", राग और द्वेष को दूर करके। शंकराचार्य कहते हैं, जो चीज़ें शरीर के लिए ज़रूरी होकर आ ही गईं, उनमें भी राग और द्वेष छोड़ दो। यह बहुत बारीक बात है। मान लीजिए आपने सादा भोजन रखा है। अब उसमें भी मन कहता है, आज दाल में नमक कम है, कल वाली सब्ज़ी अच्छी थी, यह मुझे पसन्द नहीं। चीज़ तो ज़रूरी थी, पर उसके चारों ओर पसन्द-नापसन्द की एक बाड़ खड़ी हो गई। श्रीकृष्ण कहते हैं, चीज़ को रहने दो, बाड़ हटा दो।

और यह सब आज के जीवन में कहाँ उतरता है? शायद सबसे पहले हमारे फ़ोन पर। सुबह उठते ही कान में कुछ, आँख के सामने कुछ, रात को सोने तक कुछ न कुछ चलता ही रहता है। शब्द आदि विषयों को छोड़ना आपके लिए शायद यह हो कि दिन में कुछ समय ऐसा रखें जब कुछ भी न चले। कोई ख़बर नहीं, कोई वीडियो नहीं, बस आप, और आपकी साँस। यह संन्यास नहीं, यह संन्यास की एक छोटी-सी झलक है। और गीता कहती है, ब्रह्म का रास्ता यहीं से शुरू होता है।

पर अभी एक बात बाकी है। यह वाक्य अभी पूरा नहीं हुआ। अगले दो श्लोकों में उस साधक की और बातें आती हैं: वह कहाँ रहता है, कितना खाता है, किसका आश्रय लेता है, और कौन-सी छह चीज़ें उसे छोड़नी होती हैं। और उन छह में से एक को समझने के लिए हम एक ऐसे दृश्य में चलेंगे जहाँ देवराज इन्द्र, अपने ऐरावत हाथी पर बैठे, एक सूने घर में एक गधे से बात कर रहे हैं।

विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः । ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥ ५२ ॥
गीता 18.52 — अर्थ पढ़ें ›
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् । विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ५३ ॥
गीता 18.53 — अर्थ पढ़ें ›

बावनवाँ श्लोक। "विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः", एकान्त में रहने वाला, थोड़ा खाने वाला, वाणी, शरीर और मन को वश में रखने वाला, "ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः", सदा ध्यानयोग में लगा हुआ, और वैराग्य का आश्रय लिया हुआ।

"विविक्तसेवी"। शंकराचार्य कहते हैं, जंगल, नदी का किनारा, पर्वत की गुफा, ऐसी एकान्त जगहों में रहने का स्वभाव। श्रीधर स्वामी छोटा-सा अर्थ करते हैं, शुद्ध स्थान में रहने वाला। "लघ्वाशी", थोड़ा खाने वाला। शंकराचार्य बताते हैं कि एकान्त और थोड़ा भोजन यहाँ इसलिए रखे गए हैं कि ये नींद और आलस्य जैसे दोषों को हटाते हैं, और मन को प्रसन्न करते हैं। और रामानुजाचार्य इसका अर्थ करते हैं: न बहुत अधिक खाना, न बिल्कुल भूखे रहना। उन्नीसवें सत्संग में छठे अध्याय की वह बात आपने सुनी थी, न ज़्यादा, न कम। यहाँ वही संतुलन साधक के भोजन में है।

और इस "थोड़ा खाने" पर भीष्म की वह बात याद कीजिए जो उन्नीसवें सत्संग में आई थी: महीने भर का उपवास अगर शरीर को हानि पहुँचाए, तो वह तप नहीं, उत्तम तप त्याग है। शान्ति पर्व में वही बातचीत फिर आती है, और वहाँ उसका एक पहलू है जो हमने तब नहीं सुना था। युधिष्ठिर पूछते हैं, कोई सदा उपवासी कैसे हो सकता है? और भीष्म उत्तर देते हैं: सुबह के भोजन और शाम के भोजन के बीच, जो फिर नहीं खाता, वह सदा उपवासी है। देखिए, "लघ्वाशी" कोई कठोर व्रत नहीं। बस बीच-बीच का खाना, बिना भूख का खाना, छूट जाए।

फिर "यतवाक्कायमानसः", वाणी, शरीर और मन, तीनों पर लगाम। और "ध्यानयोगपरो नित्यं", सदा ध्यान में लगा हुआ। शंकराचार्य कहते हैं, "नित्यं" शब्द यह दिखाता है कि इस अवस्था के साधक के लिए अब ध्यान के सिवा कोई दूसरा कर्तव्य नहीं बचा। और "वैराग्यं समुपाश्रितः", वैराग्य का आश्रय। श्रीधर स्वामी कहते हैं, बार-बार, दृढ़ता से वैराग्य को पकड़ना, ताकि ध्यान बीच में टूटे नहीं।

संत ज्ञानेश्वर इस साधक का जो चित्र देते हैं, वह बहुत कोमल है। वे कहते हैं, वह भोजन करते समय यह नहीं देखता कि शरीर में बल आए, या भूख मिटे, या जीभ की इच्छा पूरी हो; वह बस उतना खाता है जितने से प्राण टिके रहें। और उसका शरीर धरती को छूता है, तो बस दण्डवत् प्रणाम करते समय।

अब आप कहेंगे, यह तो किसी गुफा वाले संन्यासी की बात है, मुझ घर-गृहस्थी वाले का इससे क्या? शंकराचार्य इस पूरे वर्णन को उसी संन्यासी का मार्ग मानते हैं जो ज्ञान में टिका है, और रामानुज इसे ध्यानयोग में लगे साधक का। पर आप इसे अपने घर में छोटे रूप में उतार सकते हैं। दिन में दस मिनट का "विविक्त", एक कोना, जहाँ कोई न हो। रात का भोजन थोड़ा हल्का। दिन में एक घण्टा ऐसा जब ज़ुबान बेवजह न चले। जो सीढ़ी के ऊपर बैठा है, उसका जीवन पूरा ऐसा है। जो नीचे है, वह इसी की ओर एक-एक डण्डा चढ़ता है।

अब तिरपनवाँ श्लोक, जिस पर यह लम्बा वाक्य पूरा होता है। "अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्", अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रह को, "विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते", छोड़कर, ममता रहित और शान्त होकर, वह ब्रह्मभाव के योग्य होता है।

छह चीज़ें हैं जिन्हें छोड़ना है। पहली, अहंकार। और श्रीधर स्वामी यहाँ एक ऐसी बात कहते हैं जो साधक के लिए बहुत बड़ी चेतावनी है। वे कहते हैं, यहाँ अहंकार में यह अहंकार भी आता है, "मैं विरक्त हूँ"। यानी सब छोड़ देने का भी घमण्ड हो सकता है, और वह भी छोड़ना है।

दूसरा, बल। हमारी टीका कहती है, यहाँ बल शरीर की शक्ति नहीं, बल्कि कामना और क्रोध के साथ चलने वाला हठ है। शंकराचार्य भी कहते हैं, शरीर का बल तो स्वाभाविक है, उसे कोई छोड़ नहीं सकता; छोड़ना वह बल है जो काम और राग से जुड़ा है। तीसरा, दर्प। शंकराचार्य इसकी परिभाषा देते हैं: दर्प वह है जो ख़ुशी के बाद आता है, और जो मनुष्य से धर्म की मर्यादा लँघवा देता है। फिर काम, क्रोध, और परिग्रह, यानी चीज़ें जमा करना, अपने पास रखना।

और इस दर्प को समझने के लिए अब वह दृश्य, जिसका वादा मैंने किया था। यह भी शान्ति पर्व में है, बाणों की शय्या पर लेटे भीष्म युधिष्ठिर को सुनाते हैं। युधिष्ठिर ने पूछा था, जो राजा अपनी श्री से गिर गया हो, वह किस बुद्धि से जिए? और भीष्म ने इन्द्र और बलि का पुराना संवाद सुनाया। असुरों को जीतने के बाद इन्द्र ने ब्रह्मा से पूछा, बलि कहाँ है? वह बलि, जिसका धन देते-देते भी कभी नहीं घटता था। ब्रह्मा ने कहा, वह किसी सूने घर में, ऊँट, गाय, गधे या घोड़े, इनमें से किसी के रूप में मिलेगा। और कहा, उसे मारना मत।

तो इन्द्र ऐरावत के कन्धे पर चढ़कर, श्री से घिरे हुए, धरती पर घूमे, और उन्होंने बलि को देखा: एक सूने घर में, गधे का रूप लिए। और इन्द्र ताना मारते हैं। अरे दानव, अब तुम गधे बनकर भूसी खाते हो। कभी तुम हज़ारों रथों के साथ, अपने भाई-बन्धुओं से घिरे, सब लोकों को तपाते चलते थे, और हमें कुछ नहीं समझते थे। तुम्हारा सोने का छत्र, तुम्हारी माला, सब कहाँ गए? आज इस दशा पर तुम शोक करते हो या नहीं?

और भीष्म कहते हैं, बलि हँसे। और बोले: अहो, देवराज, यह तुम्हारा बचपना! जिनकी बुद्धि पकी हुई है, जो ज्ञान से तृप्त और क्षमाशील हैं, वे सज्जन दुःख में शोक नहीं करते, और सुख में फूलते नहीं। तुम साधारण बुद्धि से डींग मार रहे हो; जब तुम मेरे जैसे हो जाओगे, तब ऐसा नहीं कहोगे।

और फिर बलि की वह बात, जो आज के श्लोक से सीधी जुड़ती है। वे कहते हैं, काल के चक्र को अनित्य देखकर मैं शोक नहीं करता। सफलता और विफलता, जीवन और मृत्यु, सुख और दुःख, इनमें से किसी से मैं न द्वेष करता हूँ, न इन्हें चाहता हूँ। और कहते हैं, अगर काल मेरी आँखों के सामने प्राणियों का नाश न करता, तो मुझमें हर्ष होता, दर्प होता, और क्रोध होता। ऐश्वर्य और प्रताप कभी किसी के पास टिके नहीं रहते। इन्द्र, ठीक से देखो, और स्थिर बुद्धि पाओ। मुझे न उस पर शोक है, न अपने गिरने पर।

अब इस दृश्य को तिरपनवें श्लोक के सामने रखिए। एक ओर इन्द्र हैं, हाथी पर, श्री से घिरे, जीत की ख़ुशी में। और शंकराचार्य ने कहा था, दर्प ख़ुशी के बाद आता है। वही हुआ। जीत की ख़ुशी ताना बनकर निकली। दूसरी ओर बलि हैं, सब कुछ खोकर, एक सूने घर में, पर "निर्ममः शान्तो", ममता से छूटे और शान्त। भीष्म यह कथा युधिष्ठिर को इसलिए सुना रहे हैं कि जीत हो या हार, राज्य मिले या छूटे, बड़ा वह नहीं जो ऊपर बैठा है, बड़ा वह है जिसका मन नहीं डोलता।

और श्लोक के अन्त में फल: "ब्रह्मभूयाय कल्पते", वह ब्रह्मभाव के योग्य होता है। ध्यान दीजिए, "योग्य होता है", अभी पहुँचा नहीं कहा। और अगला श्लोक, चौवनवाँ, यहीं से उठता है: "ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति", ब्रह्मभूत होकर, प्रसन्न मन वाला, वह न शोक करता है, न इच्छा करता है, और फिर उसे भगवान की परा भक्ति मिलती है। ज्ञान के इस शिखर पर भक्ति कैसे आती है, और उसके बाद श्रीकृष्ण अर्जुन से अपने हृदय की कौन-सी बात कहते हैं, वह अगले सत्संग में।

तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली बात। आपका काम छोटा नहीं है। "स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः", अपने-अपने कर्म में लगा हर मनुष्य उसी एक सिद्धि की ओर चलता है। काम बाँटे गए हैं, मनुष्य का मोल नहीं। और सच, क्षमा, दया और श्रद्धा पर किसी का ठेका नहीं।

दूसरी बात। अपना काम ही पूजा है, बशर्ते दो बातें हों: अच्छी तरह करना, और उनके लिए करना, जिनसे आपके हाथों में चलने की शक्ति आई है। रसोई, दुकान, खेत, कक्षा, वही आपके फूल हैं।

तीसरी बात। हर काम में धुआँ है। धुएँ से डरकर आग मत बुझाइए। सावधानी से धुआँ कम कीजिए, और आग को किसी का अँधेरा दूर करने दीजिए। और जब ऊपर चढ़ें, तो यह याद रखिए कि "मैंने सब छोड़ दिया" का घमण्ड भी छोड़ना है।

आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आपका अपना काम कौन-सा है, जिसे कभी-कभी आप छोटा समझ बैठते हैं? और कल उसे भगवान की पूजा बनाने के लिए आप उसमें कौन-सी एक छोटी बात बदलेंगे? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।

जिससे सब प्राणी चलते हैं, और जिससे यह सब भरा है, उसकी पूजा अपने ही काम से। यही आज का फूल है।

जय श्री कृष्ण।

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् । स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥ ४६ ॥
गीता 18.46 — अर्थ पढ़ें ›

तीन बातें

  1. आपका काम छोटा नहीं है। "स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः", अपने-अपने कर्म में लगा हर मनुष्य उसी एक सिद्धि की ओर चलता है। काम बाँटे गए हैं, मनुष्य का मोल नहीं। और सच, क्षमा, दया और श्रद्धा पर किसी का ठेका नहीं।
  2. अपना काम ही पूजा है, बशर्ते दो बातें हों: अच्छी तरह करना, और उनके लिए करना, जिनसे आपके हाथों में चलने की शक्ति आई है। रसोई, दुकान, खेत, कक्षा, वही आपके फूल हैं।
  3. हर काम में धुआँ है। धुएँ से डरकर आग मत बुझाइए। सावधानी से धुआँ कम कीजिए, और आग को किसी का अँधेरा दूर करने दीजिए। और जब ऊपर चढ़ें, तो यह याद रखिए कि "मैंने सब छोड़ दिया" का घमण्ड भी छोड़ना है।