ज़हर पहले, अमृत बाद में
गीता 18.29–18.40 · 74 मिनट
तीन तरह की बुद्धि, धैर्य और सुख
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु ।
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय ॥ २९ ॥
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३० ॥
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥ ३१ ॥
क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि जो चीज़ शुरू में बहुत कड़वी लगी, वही आगे चलकर जीवन की सबसे मीठी चीज़ निकली? सुबह जल्दी उठने की आदत, कोई कठिन पढ़ाई, किसी बुरी लत को छोड़ना। और उल्टा भी हुआ होगा, कि जो चीज़ पहले दिन अमृत जैसी लगी, उसी ने आगे चलकर नींद, पैसा और मन की शान्ति, सब छीन लिए। आज का सत्संग इसी बात पर है: ज़हर पहले, अमृत बाद में। श्रीकृष्ण आज सुख को तीन हिस्सों में बाँटकर दिखाएँगे, और उससे पहले बुद्धि और धैर्य को भी।
जय श्री कृष्ण।
आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का पचासवाँ सत्संग है। पचास सत्संग। जब यह यात्रा शुरू हुई थी, तब हम कुरुक्षेत्र के मैदान में दो सेनाओं के बीच खड़े थे, और एक अन्धे राजा का प्रश्न सुन रहे थे। आज हम गीता के अन्तिम अध्याय के बीच में हैं। जो लोग पहले दिन से साथ चल रहे हैं, और जो आज पहली बार आए हैं, आप सबका मन से धन्यवाद। गीता का अठारहवाँ अध्याय, "मोक्षसंन्यासयोग", महाभारत के भीष्म पर्व का बयालीसवाँ अध्याय है। और हर बार की तरह याद रखिए कि यह सब हमें सञ्जय सुना रहे हैं, हस्तिनापुर के महल में, अन्धे राजा धृतराष्ट्र को, उस दिन जब भीष्म बाणों की शय्या पर गिर चुके हैं।
पहले याद कर लें कि पिछली बार हम कहाँ रुके थे। पिछला सत्संग एक बड़े प्रश्न पर था: करने वाला कौन है? श्रीकृष्ण ने बताया था कि हर कर्म के पाँच कारण होते हैं: "अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्", शरीर, कर्ता, अनेक प्रकार के करण, अलग-अलग चेष्टाएँ, और पाँचवाँ दैव। इसलिए जो अपने को ही अकेला कर्ता मानता है, वह ठीक नहीं देखता। फिर श्रीकृष्ण ने ज्ञान, कर्म और कर्ता, तीनों को तीन गुणों की कसौटी पर रखा था। सात्त्विक ज्ञान वह, जिससे मनुष्य "सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते", सब प्राणियों में एक ही अविनाशी भाव को देखता है। और सात्त्विक कर्ता की पहचान में एक शब्द आया था, जिसे आज याद रखना है: "धृत्युत्साहसमन्वितः", धैर्य और उत्साह से भरा हुआ। धृति, यानी धैर्य, पकड़े रहने की शक्ति। आज श्रीकृष्ण उसी धृति को खोलकर दिखाएँगे, और उसके साथ बुद्धि को भी।
तो आज का पहला श्लोक, उनतीसवाँ। "बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु", हे धनञ्जय, अब गुणों के अनुसार बुद्धि और धृति का तीन प्रकार का भेद सुनो, "प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय", जो पूरी तरह और अलग-अलग कहा जा रहा है।
पहले दो शब्द समझ लें, क्योंकि आज का आधा सत्संग इन्हीं पर टिका है। रामानुजाचार्य बुद्धि का अर्थ करते हैं: सोच-विचार करके किसी निश्चय पर पहुँचने वाला ज्ञान। यानी बुद्धि वह है जो कहती है, "यह करना है, यह नहीं।" और धृति का अर्थ वे बहुत सुन्दर करते हैं: जो काम शुरू कर दिया, उसमें बीच में बाधाएँ आ पड़ें, तब भी उसे थामे रखने का सामर्थ्य। सोचिए, बुद्धि रास्ता दिखाती है, और धृति उस रास्ते पर पैर टिकाए रखती है। एक के बिना दूसरी अधूरी है। रास्ता मालूम हो पर चलने का धैर्य न हो, तो आदमी वहीं खड़ा रह जाता है। और धैर्य बहुत हो पर रास्ता गलत हो, तो आदमी बड़े धैर्य से गलत जगह पहुँच जाता है।
और यहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को "धनञ्जय" कहकर पुकारते हैं। शंकराचार्य बताते हैं कि यह नाम इसलिए पड़ा, क्योंकि दिग्विजय में अर्जुन ने मनुष्यों का भी और देवताओं का भी बहुत-सा धन जीता था। और मधुसूदन सरस्वती कहते हैं कि यह नाम लेकर भगवान अर्जुन की उस महिमा को याद दिलाते हुए उनका उत्साह बढ़ा रहे हैं। मानो कह रहे हों, जिसने इतना धन जीता, वह आज यह धन भी जीत ले, समझ का धन।
संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर एक प्रश्न पूछते हैं: संसार में ऐसी कौन-सी लकड़ी है, जिसके भीतर आग न छिपी हो? वैसे ही दिखने वाली इस सृष्टि में ऐसी कौन-सी चीज़ है, जो तीन प्रकार की न हो? इसलिए बुद्धि भी तीन गुणों से तीन तरह की है, और धृति भी।
अब तीसवाँ श्लोक, सात्त्विकी बुद्धि। "प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये", हे पार्थ, जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्ति को, कर्तव्य और अकर्तव्य को, भय और अभय को, "बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी", और बन्धन तथा मोक्ष को जानती है, वह सात्त्विकी है।
यहाँ चार जोड़े हैं, और चारों जीवन के सबसे कठिन प्रश्न हैं। पहला जोड़ा, प्रवृत्ति और निवृत्ति। हमारी टीका बताती है: प्रवृत्ति है धर्म के अनुसार चलने वाला कर्ममय जीवन, और निवृत्ति है सांसारिक लक्ष्यों से हटकर मुक्ति की ओर मुड़ना। और फिर एक बहुत ज़रूरी बात कहती है: सात्त्विकी बुद्धि जानती है कि कब कौन-सा लागू होता है। यानी सवाल यह नहीं कि कर्म अच्छा है या संन्यास। सवाल यह है कि इस समय, इस जगह, मेरे लिए, क्या ठीक है।
रामानुजाचार्य दूसरे जोड़े, कर्तव्य और अकर्तव्य, पर ठीक यही बात जोड़ते हैं: देश, काल और अवस्था के अनुसार, यह करना है और यह नहीं करना। श्रीधर स्वामी भी कहते हैं: किस देश में, किस काल में, क्या करने योग्य है और क्या नहीं। और अब ज़रा सोचिए, यह बात किसके सामने कही जा रही है। अर्जुन के। वही अर्जुन, जो पहले अध्याय के अन्त में धनुष रखकर बैठ गए थे, और दूसरे अध्याय में कह रहे थे कि गुरुजनों को मारने से तो भिक्षा माँगकर जीना अच्छा है। उन्हें उस समय निवृत्ति अच्छी लग रही थी, जबकि समय प्रवृत्ति का था। और दूसरे अध्याय में उन्होंने ख़ुद माना था: "पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः", मैं आपसे पूछता हूँ, क्योंकि धर्म के विषय में मेरा चित्त मोहित है। अर्जुन की पूरी उलझन यही थी: कब रुकना है, कब चलना है, यह समझ नहीं आ रहा था। और आज, गीता के अन्त के पास, श्रीकृष्ण बता रहे हैं कि जो बुद्धि यह समझ ले, वही सात्त्विकी है।
तीसरा जोड़ा, भय और अभय। शंकराचार्य कहते हैं, जिससे डरना चाहिए और जिससे नहीं, उन दोनों के कारणों को जानना। यह छोटी बात नहीं है। हममें से बहुत लोग उन चीज़ों से डरते हैं जिनसे डरना नहीं चाहिए, लोग क्या कहेंगे, और उन चीज़ों से नहीं डरते जिनसे सच में डरना चाहिए, जैसे एक छोटा-सा झूठ जो धीरे-धीरे आदत बन जाता है। और चौथा जोड़ा, बन्धन और मोक्ष। मधुसूदन सरस्वती बताते हैं कि बन्धन की जड़ है कर्तापन का अभिमान, यानी वही "मैं करता हूँ" वाला बोझ जिसकी बात पिछले सत्संग में हुई थी।
संत ज्ञानेश्वर इस सात्त्विकी बुद्धि के लिए बहुत से चित्र देते हैं। वे कहते हैं, ठीक कर्म करने से मोक्ष वैसे ही निश्चित है जैसे प्यासे का पानी से जीना, बाढ़ में गिरे का तैरकर बचना, और अँधेरे कुएँ में सूरज की किरण से रास्ता दिखना। और जो काम नहीं करना चाहिए, उसे देखकर ऐसी बुद्धि वैसे ही ठिठक जाती है जैसे कोई आग में नहीं घुसता, फुफकारते नाग के आगे हाथ नहीं डालता, और बाघ की गुफ़ा में नहीं जाता। और फिर वे कहते हैं: जैसे सुनार असली और खोटे सोने को परख लेता है, वैसे ही जो बुद्धि करने और न करने को परख ले, उसे सात्त्विकी जानो।
अब इकतीसवाँ श्लोक, राजसी बुद्धि। "यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च", हे पार्थ, जिस बुद्धि से मनुष्य धर्म और अधर्म को, कर्तव्य और अकर्तव्य को, "अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी", ठीक से नहीं जानता, वह राजसी है।
यहाँ एक शब्द पर ध्यान दीजिए: "अयथावत्", ठीक-ठीक नहीं। यह नहीं कहा कि राजसी बुद्धि कुछ नहीं जानती। हमारी टीका यही बात बहुत साफ़ कहती है: यह बुद्धि अन्धी नहीं, भ्रमित है। कामना इसके निर्णय को झुका देती है, इसलिए यह साफ़-साफ़ नहीं बता पाती कि कौन क्या है। श्रीधर स्वामी और नीलकण्ठ इसका अर्थ करते हैं: सन्देह के साथ जानना। और मधुसूदन सरस्वती इस मन की आवाज़ भी लिख देते हैं: "यह ऐसा है, या वैसा, या शायद नहीं।" यानी राजसी बुद्धि के पास जानकारी होती है, पर उस जानकारी पर टिकने का साहस नहीं होता, क्योंकि भीतर कोई चाह बैठी होती है जो हर बार तराज़ू को अपनी ओर झुका देती है।
और इस श्लोक का सबसे जीता-जागता उदाहरण वही आदमी है, जो आज यह श्लोक सुन रहा है। धृतराष्ट्र। आपको याद होगा, नौवें सत्संग में हमने उस जागती रात के अन्त में, उद्योग पर्व के चालीसवें अध्याय में, विदुर को दिया हुआ उनका उत्तर सुना था: आपकी बात सुनकर तो मेरी बुद्धि वैसी ही हो जाती है, पर "दुर्योधनं समासाद्य पुनर्विपरिवर्तते", दुर्योधन के पास पहुँचते ही वह फिर पलट जाती है। आज उसी उत्तर को इस श्लोक के सामने रखिए।
सुनिए, कितना सच्चा वाक्य है। धृतराष्ट्र अनजान नहीं थे। वे धर्म जानते थे, विदुर की बात को सही मानते थे। पर बेटे का मोह जैसे ही सामने आता, बुद्धि घूम जाती। यही "अयथावत्" है, जानते हुए भी ठीक-ठीक न जानना। और फिर उन्होंने एक और बात कही, जो इस घूमी हुई बुद्धि का बहाना बन जाती है: कोई भी प्राणी भाग्य को लाँघ नहीं सकता, मैं भाग्य को ही अटल मानता हूँ, और पुरुषार्थ को व्यर्थ। जब बुद्धि अपने ही निर्णय पर नहीं टिक पाती, तो वह भाग्य को दोष देने लगती है। और आज, बेटों के सामने कुरुक्षेत्र खड़ा है, भीष्म गिर चुके हैं, और सञ्जय उन्हीं धृतराष्ट्र को बता रहे हैं कि ऐसी बुद्धि को राजसी कहते हैं।
संत ज्ञानेश्वर राजसी बुद्धि के लिए भी चित्र देते हैं। वे कहते हैं, जैसे बगुलों के गाँव में दूध और पानी साथ-साथ ही पी लिए जाते हैं, उन्हें अलग करना तो हंस का काम माना जाता है, और जैसे अन्धे के लिए दिन और रात का भेद नहीं, वैसी ही यह बुद्धि है। और फिर वे कहते हैं, जैसे कोई बिना आँखों के मोती चुने, तो कभी-कभी अच्छा मोती हाथ आ भी जाता है, पर वह संयोग है, परख नहीं। राजसी बुद्धि से भी कभी-कभी ठीक काम हो जाता है, पर अपने बल पर नहीं।
आज के जीवन में यह कैसा दिखता है, यह मैं अपनी ओर से एक उदाहरण देकर कहूँ। एक आदमी जानता है कि डॉक्टर ने मीठा मना किया है। वह दिन भर यह बात दूसरों को भी समझाता है। पर शाम को जब मिठाई का डिब्बा सामने आता है, तो उसके मन में तर्क आने लगते हैं: आज तो त्योहार है, एक टुकड़े से क्या होगा, कल से पक्का। उसकी बुद्धि सोई नहीं है। बस डिब्बे के पास पहुँचते ही "पुनर्विपरिवर्तते", फिर पलट जाती है।
तो इन तीन श्लोकों से आज के लिए यह बात निकलती है: सात्त्विकी बुद्धि केवल यह नहीं जानती कि अच्छा क्या है। वह यह भी जानती है कि अभी, इस समय, क्या करना है, और किससे डरना है। और राजसी बुद्धि भी बहुत कुछ जानती है, पर किसी चाह के पास पहुँचते ही उसका काँटा हिल जाता है। इसलिए अपनी बुद्धि को परखना हो, तो यह मत देखिए कि आप कितना जानते हैं। यह देखिए कि जिस चीज़ से आपको मोह है, उसके सामने आपकी समझ टिकती है या पलट जाती है।
पर अभी एक बात बाकी है। राजसी बुद्धि कम से कम इतना तो जानती है कि वह उलझी हुई है। पर एक बुद्धि ऐसी भी है जो उलझी हुई नहीं लगती, बल्कि बहुत पक्की लगती है, और फिर भी हर चीज़ को उलटा देखती है। अगले श्लोकों में हम ऐसे ही एक राजा से मिलेंगे, जिसके शत्रुओं ने उसकी जान बचाई, और उसे वह उपकार ही सबसे बड़ा अपमान लगा।
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता ।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥ ३२ ॥
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः ।
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३३ ॥
यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन ।
प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ॥ ३४ ॥
बत्तीसवाँ श्लोक, तामसी बुद्धि। "अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता", हे पार्थ, जो बुद्धि तम से ढकी हुई अधर्म को धर्म मानती है, "सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी", और सब बातों को उलटा देखती है, वह तामसी है।
राजसी बुद्धि और इस बुद्धि में अन्तर समझिए। राजसी बुद्धि डगमगाती है, "यह या वह"। तामसी बुद्धि नहीं डगमगाती। वह पक्के भरोसे के साथ गलत होती है। रामानुजाचार्य इसे पूरी सूची बनाकर कहते हैं: वह अधर्म को धर्म मानती है और धर्म को अधर्म, जो है उसे "नहीं है" मानती है और जो नहीं है उसे "है", सबसे ऊँचे तत्त्व को नीचा मानती है और नीचे को ऊँचा। एवं सब कुछ उलटा। श्रीधर स्वामी इसे एक ही शब्द में कहते हैं: "विपरीतग्राहिणी", उलटा पकड़ने वाली।
संत ज्ञानेश्वर इसके लिए एक ऐसा चित्र देते हैं जो याद रह जाता है। वे कहते हैं, जिस रास्ते से राजा जाता है, वही रास्ता चोरों को रुकावट लगता है, और राक्षसों के लिए दिन ही रात बन जाता है। अभागे के हाथ में ख़ज़ाना भी कोयले का ढेर बन जाता है। वैसे ही तामसी बुद्धि को सारे धर्म पाप दिखते हैं, सच झूठ दिखता है, और गुण दोष दिखते हैं। और दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण ने इसी उलटेपन का दूसरा पहलू बताया था: "या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी", जो सब प्राणियों के लिए रात है, उसमें संयमी जागता है। देखने वाले की आँख बदल जाए, तो दिन और रात भी अदल-बदल जाते हैं।
और अब महाभारत का वह प्रसंग, जिसका वादा मैंने किया था। आपको याद होगा, अठारहवें सत्संग में हमने सुना था कि वनवास के दिनों में दुर्योधन पाण्डवों को छाल और मृगचर्म में देखकर अपना सुख बढ़ाने द्वैतवन गए थे, वहाँ गन्धर्वों ने उन्हें बाँध लिया, और युधिष्ठिर ने अपने भाइयों को भेजकर उन्हें छुड़ाया था। और दुर्योधन लज्जित होकर लौटे थे। आज उस कथा का अगला हिस्सा, जो वन पर्व में आगे आता है। रास्ते में कर्ण उनसे मिलते हैं, और सोचते हैं कि दुर्योधन ने अपने पराक्रम से गन्धर्वों को हरा दिया होगा। तब दुर्योधन उन्हें सच बताते हैं।
वे कहते हैं: जब अर्जुन ने गन्धर्वराज से हमें छोड़ने को कहा, तो गन्धर्व ने सबके सामने बता दिया कि हम किस इरादे से निकले थे, कि राज्य पर बैठा मैं, अपनी पत्नियों के साथ, गिरे हुए, सम्पत्तिहीन पाण्डवों को देखूँगा। और दुर्योधन कहते हैं, जब गन्धर्व यह कह रहा था, मैं लज्जा से भर गया, और धरती में कोई दरार ढूँढने लगा जिसमें घुस जाऊँ। स्त्रियों के सामने, बँधा हुआ, मैं युधिष्ठिर को सौंपा गया। भला इससे बड़ा दुःख क्या होगा? और फिर वह वाक्य: जिन्हें मैंने सदा ठुकराया, जिनका मैं सदा शत्रु रहा, उन्हीं ने मुझ मूर्ख को छुड़ाया। अगर मैं उस युद्ध में मर जाता, तो अच्छा होता।
अब इस बात को तामसी बुद्धि के श्लोक के सामने रखकर देखिए। युधिष्ठिर ने शत्रु होते हुए भी अपने भाई की जान बचाई। यह इस पूरी कथा का सबसे उजला काम है। पर दुर्योधन की बुद्धि को यही उजला काम सबसे काला अपमान दिखा। उपकार में उन्हें बोझ दिखा, जीवन में मृत्यु से बुरा कुछ दिखा। "सर्वार्थान्विपरीतांश्च", सब बातों को उलटा देखना। और सबसे अद्भुत बात यह है कि उस दिन यह उलटापन जिसने पहचाना, वह कोई ऋषि नहीं था, शकुनि थे, वही शकुनि जिन्होंने जुआ खिलवाया था। शकुनि ने कहा: तुम्हारा तो सम्मान हुआ है। जहाँ तुम्हें प्रसन्न होना चाहिए और पाण्डवों का आदर करना चाहिए, वहाँ तुम शोक करते हो। तुम्हारा यह काम उलटा है।
और उस उलटी समझ से दुर्योधन ने जो निश्चय किया, वह हम पैंतीसवें श्लोक पर सुनेंगे, क्योंकि वहाँ बुद्धि की नहीं, धृति की बात है।
और अब, इससे पहले कि हम आगे बढ़ें, एक छोटी-सी बात आपसे कहना चाहता हूँ। अब तक हमने बुद्धि के तीन रूप सुने, और अगर कोई यहीं उठ जाए, तो शायद यह सोचकर जाए कि उसकी बुद्धि तो कभी-कभी राजसी हो जाती है, कभी तामसी भी, तो अब क्या उपाय। आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। आज का असली उत्तर अभी आगे है, सुख वाले श्लोकों में, जहाँ श्रीकृष्ण बताते हैं कि जो पहले कड़वा लगे, उसी में अमृत छिपा होता है। तो अगर आप यह सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की यह यात्रा बीच में न छूटे। और आज का यह सत्संग आख़िर तक सुनिए।
अब तैंतीसवाँ श्लोक, सात्त्विकी धृति। "धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः", हे पार्थ, जिस धृति से मनुष्य मन, प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को धारण करता है, "योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी", योग के द्वारा, अटल धृति से, वह सात्त्विकी है।
हमारी टीका इसे बहुत सरल शब्दों में कहती है: धृति पकड़े रहने की शक्ति है। सात्त्विक रूप में यह मन, प्राण और इन्द्रियों को लक्ष्य पर टिकाए रखती है और उन्हें दूसरी वस्तुओं के पीछे भटकने नहीं देती। नीलकण्ठ बताते हैं कि यहाँ "क्रियाएँ" किनकी हैं: मन की क्रिया है संकल्प, प्राण की क्रिया है साँस का आना-जाना, और इन्द्रियों की क्रिया है शब्द, रूप जैसे विषयों को पकड़ना। यानी सात्त्विकी धृति वह है जो विचारों को, साँस को और आँख-कान को, तीनों को एक दिशा में थामे रखे।
और "अव्यभिचारिण्या" का अर्थ श्रीधर स्वामी करते हैं: जो किसी दूसरे विषय को न पकड़े। जो एक को पकड़कर, बीच में छोड़कर, किसी और को न पकड़ ले। और "योगेन" का अर्थ रामानुजाचार्य करते हैं: भगवान की उपासना, जो मुक्ति का साधन है। यानी यह धृति किसी भी चीज़ के लिए नहीं, भगवान की ओर जाने के लिए लगाई गई पकड़ है। और यही शब्द, थोड़े अलग रूप में, आपने चौदहवें अध्याय में भी सुना था, इकतालीसवें सत्संग में: "मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते", जो अटल भक्तियोग से मेरी सेवा करता है, वह गुणों के पार हो जाता है। वहाँ भक्ति अटल थी, यहाँ धृति अटल है। दोनों एक ही बात कहते हैं: जो पकड़ो, उसे छोड़ो मत।
और सात्त्विकी धृति का सबसे बड़ा उदाहरण तो उसी कथा के भीतर है, जो सञ्जय आज सुना रहे हैं। आपने पहले के सत्संगों में कई बार सुना है कि बाणों की शय्या पर गिरे भीष्म ने, दक्षिणायन देखकर, कहा था: मैं धरती पर गिरकर भी अपने प्राणों को रोके रखूँगा, उत्तरायण की प्रतीक्षा में। आज उसी बात को इस श्लोक की आँख से देखिए। "धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः", मन, प्राण और इन्द्रियों को धारण करना। शरीर में बाण हैं, पीड़ा असह्य है, और एक बूढ़ा योद्धा अपने प्राण को अपनी इच्छा से थामे पड़ा है। धृति का इससे बड़ा चित्र और क्या होगा?
और एक और बात। उस दिन दुर्योधन को समझाते हुए कर्ण ने भी पाण्डवों का उदाहरण दिया था। कर्ण ने कहा: पाण्डवों को देखो। वे मन से अडिग रहे, और उन्होंने आमरण उपवास नहीं ठाना। सोचिए, राज्य छिन गया, द्रौपदी का अपमान हुआ, बरसों से वन में छाल पहनकर जी रहे हैं, फिर भी मन अडिग है। और एक दिन का अपमान दुर्योधन से सहा नहीं जाता। यह बात शत्रु के मित्र के मुँह से निकली थी, इसलिए और भी सच्ची है।
संत ज्ञानेश्वर सात्त्विकी धृति को एक राजा की तरह दिखाते हैं, धैर्य का राजा। वे कहते हैं, जैसे सूरज उगते ही चोरी के साथ अँधेरा थम जाता है, जैसे राजा की आज्ञा से गलत लेन-देन रुक जाते हैं, जैसे तेज़ हवा चलते ही बादलों का गरजना बन्द हो जाता है, वैसे ही जब भीतर यह धैर्य उठता है, तो मन, प्राण और इन्द्रियाँ अपनी-अपनी बकबक छोड़कर शान्त खड़ी हो जाती हैं।
अब चौंतीसवाँ श्लोक, राजसी धृति। "यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन", परन्तु हे अर्जुन, जिस धृति से मनुष्य धर्म, काम और अर्थ को धारण करता है, "प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी", अत्यन्त आसक्ति से, फल चाहते हुए, हे पार्थ, वह राजसी है।
यहाँ एक बात ध्यान से सुनिए। राजसी धृति कमज़ोर नहीं होती। हमारी टीका कहती है: ऐसा मनुष्य बहुत दृढ़ हो सकता है, पर केवल उसके लिए जो उसे मिलेगा। उसका धर्म भी पुरस्कार पाने का साधन होता है। श्रीधर स्वामी कहते हैं, यह धृति धर्म, अर्थ और काम को ही मुख्य मानकर पकड़े रहती है, छोड़ती नहीं। और मधुसूदन सरस्वती एक छोटी-सी बात जोड़ते हैं, जो इस श्लोक की चाबी है: धर्म, काम और अर्थ, तीनों को वह सदा करने योग्य मानता है, पर मोक्ष को कभी नहीं। यानी जीवन के चार पुरुषार्थों में से तीन पर उसकी पकड़ बहुत मज़बूत है, और चौथा उसकी सूची में है ही नहीं।
संत ज्ञानेश्वर इस धृति वाले को एक व्यापारी की तरह दिखाते हैं। वे कहते हैं, वह इच्छाओं के समुद्र में, धर्म, अर्थ और काम की नाव पर बैठकर, कर्म का व्यापार करता है। जो कर्म वह पूँजी में लगाता है, उसका चार गुना लौटकर आए, यह देखता है, और इसके लिए बड़ी से बड़ी मेहनत सह लेता है। यह मेहनत झूठी नहीं। बस उसकी आँख मुनाफ़े पर है।
और लोकमान्य तिलक यहाँ एक बहुत काम की बात कहते हैं। वे कहते हैं, निश्चय की दृढ़ता अपने आप में केवल मन की एक क्रिया है। वह अच्छी है या बुरी, यह इससे तय होता है कि उसे किस काम में लगाया गया। अगर वह फल की आशा छोड़कर योग में लगी, तो सात्त्विक, अगर फल की आशा से रोज़ के काम-धन्धे में लगी, तो राजस, और अगर नींद और आलस में ही पक्की हो गई, तो तामस। यानी धृति एक रस्सी है। वह आपको कुएँ से बाहर भी खींच सकती है, और किसी खूँटे से बाँध भी सकती है।
आज के जीवन में यह कैसा दिखता है, यह मैं अपनी ओर से एक उदाहरण देकर कहूँ। दो लोग हर मंगलवार बिना चूके व्रत रखते हैं, बरसों से। एक इसलिए कि उसे नौकरी में तरक्की चाहिए, घर बड़ा चाहिए। दूसरा इसलिए कि उस दिन उसका मन भगवान के पास रहता है। दोनों का धैर्य बराबर है, दोनों एक भी मंगलवार नहीं छोड़ते। पर अगर पहले वाले की तरक्की न हो, तो धीरे-धीरे उसका व्रत भी ढीला पड़ने लगता है, या भगवान से शिकायत शुरू हो जाती है। क्योंकि उसकी पकड़ भगवान पर नहीं, फल पर थी। यही "फलाकाङ्क्षी" है। और श्रीकृष्ण उसे बुरा नहीं कहते, बस राजसी कहते हैं, यानी अभी एक सीढ़ी और चढ़नी है।
तो इन तीन श्लोकों से आज के लिए यह बात निकलती है: बुद्धि जब उलट जाए, तो उपकार भी अपमान लगने लगता है, और धृति की परीक्षा इससे नहीं होती कि आप कितना पकड़े रहते हैं, बल्कि इससे कि क्या पकड़े रहते हैं। भगवान की ओर पकड़ी गई धृति सात्त्विकी है। फल की ओर पकड़ी गई, राजसी।
पर अभी एक बात बाकी है। एक तीसरी तरह की धृति भी है, जो सबसे पक्की दिखती है, और सबसे ज़्यादा नीचे गिराती है। अगले श्लोक में हम दुर्योधन के उस निश्चय को देखेंगे, जिससे उन्हें न भाई के आँसू डिगा सके, न मित्रों की विनती। और फिर श्रीकृष्ण सुख की ओर मुड़ेंगे, और उस शब्द को कहेंगे जो सब सुखों की चाबी है: अभ्यास।
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च ।
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥ ३५ ॥
सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ॥ ३६ ॥
पैंतीसवाँ श्लोक, तामसी धृति। "यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च", हे पार्थ, जिस धृति से दुर्बुद्धि मनुष्य निद्रा, भय, शोक, विषाद और मद को, "न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी", नहीं छोड़ता, वह तामसी है।
हमारी टीका इस श्लोक का पूरा भाव एक वाक्य में कह देती है: यह भी एक प्रकार की दृढ़ता है, पर यह उसी को पकड़े रहती है जो मनुष्य को नीचे गिराता है। सोचिए, कितनी अजीब बात है। धैर्य, जिसे हम सदा गुण मानते हैं, वह भी गलत चीज़ से चिपक जाए तो बन्धन बन जाता है।
अब पाँचों चीज़ों को एक-एक करके देखिए। "स्वप्न" का अर्थ यहाँ सपना नहीं, नींद है। श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती, दोनों यही कहते हैं। फिर भय, यानी डर। फिर शोक, जिसका अर्थ मधुसूदन सरस्वती करते हैं: किसी प्रिय के बिछड़ने से उठा हुआ सन्ताप। फिर विषाद, जिसे वे कहते हैं इन्द्रियों का ढीला पड़ जाना, भीतर से हार जाना। और अन्त में मद। शंकराचार्य इसका अर्थ करते हैं: विषयों के भोग को ही बहुत बड़ा मानते हुए, नशे में डूबे आदमी जैसी दशा। और श्रीधर स्वामी "दुर्मेधा" का अर्थ करते हैं: जिसकी समझ अविवेक से भरी हो, और ऐसा आदमी इन पाँचों को केवल पकड़े ही नहीं रहता, बार-बार लौटाकर लाता है।
और लोकमान्य तिलक यहाँ एक भ्रम दूर करते हैं। वे कहते हैं, "धृति" का अर्थ यहाँ शरीर की सहनशक्ति नहीं, मन का दृढ़ निश्चय है। यानी तामसी धृति वाला आदमी आलसी दिख सकता है, पर भीतर से वह बहुत पक्का है, अपने डर पर, अपने दुःख पर, अपने घमण्ड पर।
संत ज्ञानेश्वर इसके लिए एक के बाद एक चित्र देते हैं। वे कहते हैं, ऐसा आदमी आलस को अपनी बगल में दबाए रहता है, इसलिए नींद उसे कभी नहीं छोड़ती। शरीर और धन से इतना मोह है कि भय उसे वैसे ही नहीं छोड़ता, जैसे पत्थर अपनी कठोरता नहीं छोड़ता। और असन्तोष को उसने दिन-रात जी से लगा रखा है, इसलिए विषाद से उसकी पक्की दोस्ती हो गई है। जैसे लहसुन अपनी गन्ध नहीं छोड़ता, वैसे ही विषाद उसे नहीं छोड़ता।
और अब उस निश्चय की कथा, जिसकी बात पिछले खंड में अधूरी छोड़ी थी। गन्धर्वों से छुड़ाए जाने की लज्जा में दुर्योधन ने कर्ण से कहा: मैं यहीं आमरण उपवास करूँगा। तुम लोग घर जाओ। शत्रुओं से अपमानित होकर मैं नगर नहीं जाऊँगा। हस्तिनापुर पहुँचकर मैं राजा से, अपने पिता से, क्या कहूँगा? भीष्म, द्रोण, विदुर, सञ्जय मुझसे क्या कहेंगे? और फिर उन्होंने दुःशासन को बुलाकर कहा: मेरा दिया हुआ राज्याभिषेक स्वीकार करो, और राजा बनो।
अब दुःशासन की ओर देखिए। महाभारत में दुःशासन का नाम आते ही हमें सभा में द्रौपदी के केश याद आते हैं। पर यहाँ पाठ एक दूसरा चेहरा दिखाता है। भाई की यह बात सुनकर दुःशासन का गला रुँध गया, वह भाई के पैरों पर गिर पड़ा, और रोते हुए बोला: सारी धरती फट जाए, आकाश टुकड़े-टुकड़े हो जाए, सूरज अपनी चमक छोड़ दे, पर मैं तुम्हारे बिना धरती पर राज नहीं करूँगा। कृपा करो। और कर्ण ने भी समझाया, और उनकी बात बहुत ठीक थी: शोक करते रहने वाले का शोक कभी दूर नहीं होता। जब शोक, शोक करने वाले की विपत्ति हटाता ही नहीं, तो शोक में तुम्हें क्या लाभ दिखता है? धीरज धारण करो, और शोक करके शत्रुओं को प्रसन्न मत करो।
पर दुर्योधन नहीं उठे। पाठ कहता है, कर्ण के कहने पर भी उन्होंने उठने का मन बिलकुल नहीं बनाया। फिर शकुनि ने समझाया, भाइयों ने, मन्त्रियों ने। और दुर्योधन ने कहा: मुझे न धर्म से काम है, न धन से, न सुख से, न ऐश्वर्य से। मेरा संकल्प मत तोड़ो। मेरा मन पक्का है। और फिर उन्होंने कुश का बिछौना बिछाया, जल छूकर पवित्र हुए, कुश और छाल के वस्त्र पहने, मौन रखा, और पाठ के शब्दों में, मन में अपनी चिता बना ली।
अब इसे पैंतीसवें श्लोक के सामने रखिए। बाहर से देखें तो यह कठोर व्रत है, मौन है, कुश का आसन है, बड़ा दृढ़ निश्चय है। पर यह निश्चय किसे पकड़े बैठा है? लज्जा को, शोक को, विषाद को, और उसके नीचे छिपे मद को, उस घमण्ड को जो यह नहीं सह पा रहा कि जिन्हें वह तुच्छ समझता था, उन्होंने उसे बचाया। "न विमुञ्चति", नहीं छोड़ता।
और कथा यहीं ख़त्म नहीं होती। पाठ बताता है कि पाताल के दैत्यों और दानवों ने, जिन्हें देवताओं ने हराया था, यह जाना कि दुर्योधन मर गए तो उनका पक्ष कमज़ोर होगा। उन्होंने एक अनुष्ठान किया, उससे एक कृत्या प्रकट हुई, और वह दुर्योधन को उठाकर पल भर में रसातल ले गई। वहाँ दानवों ने उन्हें ढाढ़स बँधाया और लौटा दिया। लौटकर दुर्योधन ने सोचा कि यह सब एक सपना था, पर उनका निश्चय हो गया: मैं युद्ध में पाण्डवों को जीतूँगा। सुबह कर्ण ने उन्हें गले लगाकर कहा: अभी विषाद, भय या मृत्यु का समय नहीं है। और प्रतिज्ञा की कि वे युद्ध में अर्जुन को मारेंगे। और दुर्योधन उठ खड़े हुए।
देखिए, क्या हुआ। विषाद गया, भय गया, पर उनकी जगह क्या आया? एक और पक्का निश्चय, शत्रुता का। और पाठ उस घड़ी के बारे में एक बड़ा अर्थपूर्ण वाक्य कहता है: अर्जुन को मारने की शपथ लेने वाले संशप्तक योद्धाओं के मन रज और तम से घिर गए थे, और भीष्म, द्रोण और कृप जैसे बड़ों के मन में भी पाण्डवों के लिए पहले-सा स्नेह नहीं रहा। यानी तामसी धृति की पकड़ बदलती रहती है। कभी वह शोक को पकड़ती है, कभी घमण्ड को, कभी वैर को। पर उसकी मुट्ठी कभी खुलती नहीं। और उस दिन जो मुट्ठी बँधी, वह आज कुरुक्षेत्र में खुल रही है, जहाँ भीष्म गिर चुके हैं और सञ्जय यह सब धृतराष्ट्र को सुना रहे हैं।
आज के जीवन में यह कैसा दिखता है, यह मैं अपनी ओर से कहूँ। किसी के साथ कोई अन्याय हुआ, कोई दुःख आया। दुःख आना स्वाभाविक है। पर कुछ लोग उस दुःख को ऐसे पकड़ लेते हैं, जैसे वही उनकी पहचान हो। दस साल बाद भी वही बात, वही कड़वाहट, वही "मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ"। कोई समझाए, तो कहते हैं, तुम नहीं समझोगे। यह भी धृति है, बड़ी पक्की धृति। बस उसकी पकड़ गलत चीज़ पर है। और श्रीकृष्ण चाहते हैं कि हम अपनी पकड़ देखें, अपनी मुट्ठी खोलें।
अब छत्तीसवाँ श्लोक, जहाँ से सुख की बात शुरू होती है। "सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ", हे भरतश्रेष्ठ, अब मुझसे तीन प्रकार का सुख सुनो, "अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति", वह, जिसमें मनुष्य अभ्यास से रमता है, और जिसमें दुःख का अन्त पाता है।
हमारी टीका बताती है कि यह वाक्य अगले श्लोक में जारी है, और फिर एक बहुत ज़रूरी बात कहती है: सात्त्विक सुख एकदम नहीं मिलता, अभ्यास से धीरे-धीरे उसमें रस आता है। शंकराचार्य "अभ्यास" का अर्थ करते हैं, परिचय, बार-बार दोहराना। श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती एक तुलना जोड़ते हैं: विषयों के सुख में जैसे तुरन्त रस आ जाता है, वैसे इसमें नहीं आता। और मधुसूदन सरस्वती आगे कहते हैं, विषयों का सुख अन्त में बड़ा दुःख देता है, यह सुख सब दुःखों का अन्त करता है।
और "अभ्यास" शब्द आपने पहले भी सुना है। छठे अध्याय में, जब अर्जुन ने कहा था कि मन तो हवा की तरह है, उसे कैसे पकड़ें, तब श्रीकृष्ण ने कहा था: "अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते", हे कुन्तीपुत्र, यह अभ्यास और वैराग्य से वश में होता है। आज वही शब्द सुख के साथ लौटा है। मन भी अभ्यास से पकड़ में आता है, और सच्चा सुख भी अभ्यास से ही स्वाद देता है।
और "दुःखान्तं च निगच्छति", दुःख का अन्त पाता है। रामानुजाचार्य कहते हैं, सारे सांसारिक दुःख का अन्त। और नीलकण्ठ एक ऐसा उदाहरण देते हैं, जो मन को रोक देता है: पुत्र के शोक जैसे दुःख का भी अन्त। पुत्र का शोक। इससे बड़ा दुःख किसी माँ-बाप के लिए क्या होगा? और नीलकण्ठ कहते हैं, ऐसा सुख है जिसमें वह दुःख भी शान्त हो जाता है।
संत ज्ञानेश्वर अभ्यास के लिए दो चित्र देते हैं। वे कहते हैं, जैसे दिव्य औषध एक बार में नहीं, नाप-नापकर, मात्रा से लिया जाता है, और जैसे रस-विद्या में बार-बार की भावना देकर ही राँगे को चाँदी बनाया जाता है, वैसे ही आत्मा के सुख का ज़रा-सा अंश जब अभ्यास से बार-बार भीतर उतरता है, तब जीव होने का दुःख मिटता है।
आज के जीवन में अभ्यास का यह स्वाद कैसा दिखता है, यह मैं अपनी ओर से एक छोटे उदाहरण से कहूँ। जो आदमी पहली बार सुबह पाँच बजे उठकर दस मिनट चुप बैठता है, उसे वह दस मिनट बहुत लम्बे लगते हैं। पैर दुखते हैं, मन भागता है, नींद खींचती है। पर जो महीनों से यह कर रहा है, उससे पूछिए, तो वह कहेगा कि दिन का सबसे मीठा समय वही है। समय वही है, आसन वही है। बस अभ्यास ने उसमें रस भर दिया।
तो इन दो श्लोकों से आज के लिए यह बात निकलती है: जो धैर्य दुःख, डर और घमण्ड को पकड़े रहे, वह हमें धीरे-धीरे नीचे खींचता है, चाहे वह कितना ही पक्का दिखे। और सच्चा सुख एक दिन में नहीं मिलता। उसमें रस अभ्यास से आता है, धीरे-धीरे। इसलिए अगर कोई अच्छी आदत शुरू में फीकी लगे, तो उसे छोड़िए मत। हो सकता है अमृत अगले मोड़ पर हो।
पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण अगले श्लोक में वह बात कहने वाले हैं जो इस सत्संग का नाम है: जो सुख आरम्भ में विष जैसा लगता है, और परिणाम में अमृत जैसा। और उसके साथ हम एक ऐसी स्त्री का गीत सुनेंगे, जिसे एक रात उसके प्रेमी ने छोड़ दिया, और उसी रात उसने जीवन की सबसे गहरी नींद पाई।
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् ।
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥ ३७ ॥
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् ।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥ ३८ ॥
अब सैंतीसवाँ श्लोक, जो आज के सत्संग का दिल है, और जिसे हम आज के अन्त में दोबारा गाएँगे। "यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्", जो आरम्भ में विष जैसा और परिणाम में अमृत के समान है, "तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्", और अपनी बुद्धि की प्रसन्नता से उत्पन्न होता है, वह सुख सात्त्विक कहा गया है।
हमारी टीका इसे ऐसे कहती है, जैसे कोई बड़ा हमारे कन्धे पर हाथ रखकर कहे: अनुशासन, अध्ययन और संयम आरम्भ में कड़वे लगते हैं। उनकी मिठास बाद में आती है, शान्त और निर्मल हुए मन से, और उसे किसी बाहरी वस्तु की आवश्यकता नहीं होती। इस वाक्य का आख़िरी हिस्सा फिर से सुनिए: उसे किसी बाहरी वस्तु की आवश्यकता नहीं होती। यही सात्त्विक सुख की असली पहचान है।
अब यह विष शुरू में क्यों लगता है? शंकराचार्य कहते हैं: ज्ञान, वैराग्य, ध्यान और समाधि के आरम्भ में बहुत परिश्रम लगता है, इसलिए वह विष जैसा दुःख देता है। और जब ज्ञान और वैराग्य पक जाते हैं, तब वही अमृत बन जाता है। रामानुजाचार्य इसमें एक और कारण जोड़ते हैं, जो बहुत सच्चा है: शुरू में आत्मा का स्वरूप अभी अनुभव में आया ही नहीं होता। मेहनत पूरी है, फल अभी दिखा नहीं। इसलिए कड़वा लगता है। और श्रीधर स्वामी कहते हैं, यह कड़वाहट इसलिए है, क्योंकि यह सुख मन के संयम पर टिका है, और मन को रोकना शुरू में किसे मीठा लगता है?
अब इस श्लोक का सबसे सुन्दर शब्द, जिसे शंकराचार्य अलग करके यों लिखते हैं: "आत्मबुद्धिप्रसादजम्", अपनी बुद्धि की प्रसन्नता से जन्मा। शंकराचार्य "प्रसाद" का अर्थ करते हैं, निर्मलता, जैसे पानी की स्वच्छता। गन्दा पानी थिर हो जाए, मिट्टी नीचे बैठ जाए, तो वह साफ़ दिखने लगता है। श्रीधर स्वामी कहते हैं, रज और तम का मैल छूटने से बुद्धि का स्वच्छ होकर टिक जाना। और लोकमान्य तिलक बताते हैं कि "आत्मबुद्धि" के दो अर्थ हो सकते हैं: आत्मा में टिकी हुई बुद्धि, या केवल "अपनी" बुद्धि। और फिर कहते हैं, अर्थ कोई भी लें, बात एक ही है: सच्चा और टिकने वाला सुख इन्द्रियों के भोग में नहीं, बुद्धि से पकड़ा जाता है। छठे अध्याय में श्रीकृष्ण ने यही कहा था: "सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्", वह अनन्त सुख, जो बुद्धि से ग्रहण होता है और इन्द्रियों से परे है। और दूसरे अध्याय में: "प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते", प्रसन्नता होने पर सब दुःखों का नाश हो जाता है।
और विष पहले, अमृत बाद में, यह क्रम आपने महाभारत में भी सुना है। तीसवें सत्संग में हमने समुद्र-मन्थन की कथा सुनी थी, जो आदि पर्व में है। आज उसका केवल क्रम देखिए: अमृत से पहले निकला हालाहल, जिसे रुद्र ने पीकर कण्ठ में रख लिया, और उसके बाद ही रत्न और अमृत। यानी जिसे अमृत चाहिए, उसे पहले विष को सँभालने का धैर्य चाहिए।
और संत ज्ञानेश्वर, इस श्लोक पर, ठीक इसी कथा को अपना चित्र बनाते हैं। वे कहते हैं: पहले वैराग्य के विष को धैर्य रूपी शम्भु अपने गले में धारण करते हैं, तब ज्ञान रूपी अमृत का उत्सव होता है। सुनिए, कितनी सुन्दर बात है। तैंतीसवें श्लोक में हमने सात्त्विकी धृति सुनी थी। ज्ञानेश्वर कहते हैं, वही धृति शिव है, जो इस सुख के आरम्भ का विष पी जाती है। और फिर वे दो छोटे चित्र देते हैं: दीपक जलाने में पहले धुआँ आता है, फिर उजाला। और कच्चे अंगूर पहले खट्टे होते हैं, पकने पर उनमें मिठास आती है।
और अब शान्ति पर्व की एक कथा, जो भीष्म युधिष्ठिर को सुनाते हैं, और जो इस श्लोक का जीता-जागता चित्र है। युधिष्ठिर पूछते हैं: धन, पत्नी या पुत्र के नष्ट होने पर, या पिता के मरने पर, किस बुद्धि से शोक दूर किया जाए? राजा सेनजित् का नाम आपने अट्ठाईसवें सत्संग में सुना था, उनके दुःख-गीत में। अब भीष्म बताते हैं कि पुत्र के शोक से तपे, उदास राजा सेनजित् के पास एक ब्राह्मण मित्र आया। राजा ने उससे पूछा: आपकी कौन-सी बुद्धि है, कौन-सा ज्ञान है, जिसे पाकर आप कभी खिन्न नहीं होते?
और ब्राह्मण ने बहुत-सी बातें कहीं। एक चित्र दिया: जैसे महासागर में एक लकड़ी दूसरी लकड़ी से मिलती है, और मिलकर बिछड़ जाती है, वैसे ही प्राणियों का मिलना है। सुख के बाद दुःख आता है, दुःख के बाद सुख, मनुष्यों के सुख और दुःख पहिए की तरह घूमते हैं। और फिर एक वाक्य, जो सात्त्विक सुख की सबसे ऊँची बात है: संसार का काम-सुख, और स्वर्ग का जो बड़ा दिव्य सुख है, ये दोनों मिलकर भी तृष्णा के मिट जाने के सुख की सोलहवीं कला के बराबर नहीं हैं।
और अन्त में ब्राह्मण ने एक स्त्री की गाथा सुनाई, पिङ्गला की। पिङ्गला एक वेश्या थी। एक रात वह अपने प्रेमी की प्रतीक्षा में मिलने की जगह पर बैठी रही, और प्रेमी नहीं आया। उसे छोड़ दिया गया। सोचिए, उस रात का दुःख। प्रतीक्षा, अपमान, अकेलापन। यही वह विष है जो इस श्लोक के आरम्भ में है। पर पाठ कहता है, उस संकट में पड़कर उसने अपनी बुद्धि को शान्त समझ में स्थिर किया। और फिर वह गाने लगी।
उसने कहा: मैं पागल थी, जो इतनी देर तक बाहर किसी के पीछे भागती रही, जबकि रमण करने वाला तो मेरे पास ही था, और मैंने उसे पहचाना नहीं। मैं इस एक खम्भे और नौ दरवाज़ों वाले छोटे-से घर को बन्द कर दूँगी। और फिर: अब मुझे कोई नहीं ठगेगा, मैं जाग गई हूँ, मैं जागती हूँ। और उसकी गाथा का अन्तिम वाक्य, जो सदियों से कहा जाता है: "सुखं निराशः स्वपिति नैराश्यं परमं सुखम्", आशा से रहित मनुष्य सुख से सोता है, आशा का न रहना परम सुख है। आशा को निराश करके पिङ्गला सुख से सोती है।
यहाँ "निराशा" का अर्थ हमारी बोलचाल वाली उदासी नहीं है। इसका अर्थ है, दूसरों से, बाहर की चीज़ों से, सुख की आस छोड़ देना। और अब इसे सैंतीसवें श्लोक के पास रखिए। आरम्भ में विष, छोड़ दिए जाने की चोट। परिणाम में अमृत, ऐसी नींद जो पहले कभी नहीं आई थी। और वह सुख आया कहाँ से? किसी नए प्रेमी से नहीं, किसी वस्तु से नहीं। पाठ के अनुसार, अपनी बुद्धि को शान्त समझ में टिकाने से। यही "आत्मबुद्धिप्रसादजम्" है। और भीष्म बताते हैं कि ब्राह्मण की इन बातों से राजा सेनजित् भी स्थिर हुए, और आनन्दित हुए।
अब अड़तीसवाँ श्लोक, राजस सुख, ठीक उलटा। "विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्", जो सुख विषयों और इन्द्रियों के संयोग से होता है, आरम्भ में अमृत के समान, "परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्", और परिणाम में विष जैसा, वह राजस माना गया है।
हमारी टीका कहती है: इन्द्रियों का सुख जब तक रहता है मीठा लगता है, फिर बल, धन, बुद्धि और शान्ति की हानि, और और अधिक की प्यास छोड़ जाता है। शंकराचार्य उस हानि की पूरी सूची देते हैं: बल, वीर्य, रूप, प्रज्ञा, मेधा, धन और उत्साह, सबकी हानि। और नीलकण्ठ एक छोटी-सी बात कहते हैं जो बहुत गहरी है: "आरम्भ" यानी भोग का समय, और "परिणाम" यानी बिछड़ने का समय। यानी राजस सुख का विष तब उतरता है, जब वह चीज़ हाथ से जाती है।
संत ज्ञानेश्वर इस सुख के लिए ऐसे चित्र देते हैं, जिनमें हल्की-सी मुस्कान भी है। वे कहते हैं, यह सुख वैसा है जैसे कर्ज़ लेकर बड़ी धूमधाम से शादी करना, उस दिन बड़ा उत्सव, फिर बरसों की किश्तें। या जैसे रोगी की जीभ को शक्कर के साथ केला मीठा लगता है। और फिर वे कहते हैं, जैसे बछनाग का विष पहले मीठा लगता है, पर अन्त में मार डालता है, वैसे ही यह सुख आदि में मीठा, अन्त में कड़वा है।
और पाँचवें अध्याय में श्रीकृष्ण यही बात कह चुके हैं, सत्रहवें सत्संग में: "ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते", विषयों के स्पर्श से उत्पन्न भोग दुःख के ही कारण हैं, "आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः", वे आदि और अन्त वाले हैं, बुद्धिमान उनमें नहीं रमता।
और महाभारत में इस श्लोक के सबसे बड़े गवाह राजा ययाति हैं, जिनकी कथा आपने बारहवें सत्संग में सुनी थी। हज़ार बरस सुख भोगने के बाद उन्होंने पूरु से यही कहा था कि भोगों को भोगने से कामना कभी शान्त नहीं होती। हज़ार बरस का अमृत, और अन्त में हाथ आई केवल और अधिक की प्यास। यही हमारी टीका के शब्दों में राजस सुख का विष है।
आज के जीवन में यह कैसा दिखता है, यह मैं अपनी ओर से एक उदाहरण देकर कहूँ। रात के ग्यारह बजे फ़ोन हाथ में है, और एक के बाद एक छोटे-छोटे वीडियो चल रहे हैं। हर वीडियो अमृत की एक बूँद है। एक और, बस एक और। और फिर रात के दो बज जाते हैं। अगली सुबह सिर भारी है, आँखें जल रही हैं, काम में मन नहीं लगता, और अजीब-सी खीझ है। किसी ने हमें ज़हर नहीं दिया। बस अमृत को परिणाम तक चलने दिया।
तो इन दो श्लोकों से आज के लिए यह बात निकलती है: किसी सुख को परखने का सबसे आसान तरीका है, यह देखना कि उसका अन्त कैसा है। जो शुरू में कड़वा हो, पर अन्त में मन को निर्मल और शान्त छोड़ जाए, वह सात्त्विक है। जो शुरू में मीठा हो, पर अन्त में थकान, खीझ और और अधिक की प्यास छोड़ जाए, वह राजस है। और सात्त्विक सुख किसी चीज़ से नहीं आता। वह भीतर की उस स्वच्छता से आता है, जो पिङ्गला को उस रात मिली।
पर अभी एक बात बाकी है। एक तीसरा सुख भी है, जो न शुरू में अमृत है, न अन्त में, फिर भी हम उसमें सबसे ज़्यादा समय बिताते हैं। अगले श्लोक में श्रीकृष्ण उसका नाम लेंगे, और हम युद्ध के बाद की उस सुबह में चलेंगे, जब युधिष्ठिर ने कहा था कि हम शत्रुओं को जीतकर भी हार गए।
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः ।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ ३९ ॥
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ।
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ॥ ४० ॥
उनतालीसवाँ श्लोक, तामस सुख। "यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः", जो सुख आरम्भ में और परिणाम में भी अपने को मोहित करता है, "निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्", और निद्रा, आलस्य तथा प्रमाद से उत्पन्न होता है, वह तामस कहा गया है।
सात्त्विक सुख पहले कड़वा, बाद में मीठा। राजस सुख पहले मीठा, बाद में कड़वा। और तामस सुख? वह न पहले साफ़ दिखता है, न बाद में। वह शुरू से अन्त तक एक धुन्ध है। रामानुजाचार्य "मोहन" का अर्थ करते हैं: जो वस्तु जैसी है, उसे वैसा न दिखने देना। और फिर तीनों जड़ों को खोलते हैं। नींद तो सीधे ही मोह देती है। आलस, यानी इन्द्रियों का धीमा पड़ जाना, और इन्द्रियाँ धीमी हों तो समझ भी धीमी हो जाती है। और प्रमाद का अर्थ श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती करते हैं: जो करना है उस पर ध्यान न देकर, बस मन ही मन हवाई महल बनाते रहना। यह आख़िरी बात हम सबको पहचानी-सी लगेगी।
और चौदहवें अध्याय में, चालीसवें सत्संग में, श्रीकृष्ण ने तमोगुण के बारे में यही तीन शब्द कहे थे: "प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत", हे भारत, वह प्रमाद, आलस्य और निद्रा से बाँधता है। उसी सत्संग में विदुर की वह बात भी आई थी कि समृद्धि चाहने वाले को छह दोष छोड़ने चाहिए, और उनमें पहला ही दोष है ज़रूरत से ज़्यादा नींद। यानी तामस सुख कोई बहुत बड़ा पाप नहीं दिखता। वह बस एक आरामदायक कम्बल जैसा लगता है।
और ठीक यही चित्र शान्ति पर्व में उसी ब्राह्मण ने दिया था, जिसने राजा सेनजित् को समझाया। उसने कहा था: दुर्बुद्धि मनुष्य, अपने कर्मों के बारे में सोचे बिना, सुख से सोता है, मानो अज्ञान के एक बड़े कम्बल से ढका हो। अब दो नींदें सामने रखिए। एक नींद पिङ्गला की, जो आशा छोड़कर, जागकर, सुख से सोई। और एक नींद उस आदमी की, जो सोचने से बचने के लिए सोता है। दोनों बाहर से एक-सी दिखती हैं। पर एक के नीचे प्रकाश है, दूसरी के नीचे कम्बल। और उसी ब्राह्मण ने एक और बात कही थी, जिसमें आज के तीनों सुख आ जाते हैं: "सुखं दुःखान्तमालस्यं", आलस सुखद है पर उसका अन्त दुःख में होता है, और दक्षता, यानी मेहनत और चुस्ती, कष्ट देती है, पर उससे सुख उपजता है।
और आलस्य की बात पर पिछले सत्संग का वह ऊँट याद कीजिए, जिसने कठोर तप करके ब्रह्मा से वर पाया, और वर में ऐसी सौ योजन लम्बी गर्दन माँगी कि चरने के लिए चलना ही न पड़े। आज उसका केवल एक कोना देखिए। मेहनत उसने पूरी की थी, वह कड़वा घूँट उसने पिया था जो सात्त्विक सुख के आरम्भ में आता है। पर जब फल माँगने की बारी आई, तो उसने अमृत नहीं, बिना हिले खाने का सुख माँगा। और वही सुख, जो शुरू में सबसे आरामदायक था, धीरे-धीरे उसकी मृत्यु बना।
यह बात हम सबके काम की है। कई बार हम बड़ी मेहनत से कोई अच्छी स्थिति पाते हैं, अच्छी नौकरी, आराम का घर, और फिर उसी आराम में ढीले पड़ जाते हैं। तपस्या सात्त्विक थी, पर उसका फल हमने तामस बना लिया। श्रीकृष्ण का यह श्लोक उस ढीलेपन को उसका सही नाम देता है।
और "प्रमाद" शब्द महाभारत में एक बहुत दुःख भरे क्षण में आता है। सैंतालीसवें सत्संग में आपने अश्वत्थामा की उस रात की कथा सुनी थी, जब सोते हुए पाञ्चालों और द्रौपदी के पुत्रों को मारा गया। सौप्तिक पर्व में उस रात के बाद की सुबह का वर्णन है। धृष्टद्युम्न का सारथि आकर युधिष्ठिर को बताता है कि द्रौपदी के पुत्र, असावधान और निश्चिन्त, रात में अपने शिविर में सोते हुए मारे गए। युधिष्ठिर पुत्रशोक से धरती पर गिर पड़ते हैं। होश आने पर वे कहते हैं: शत्रुओं को जीतकर भी हम हार गए। यह विजय पराजय के रूप में आई है।
और फिर वे एक बात बार-बार कहते हैं। जो राजकुमार कर्ण के क्रोध से बचकर निकल आए, जो द्रोण के समुद्र को पार कर गए, जो भीष्म की उस महा-दावाग्नि को पार कर गए, वे प्रमाद से मारे गए। और फिर वह वाक्य: "न हि प्रमादात्परमस्ति कश्चिद्, वधो नराणामिह जीवलोके", इस जीव-लोक में मनुष्यों के लिए प्रमाद से बड़ा कोई नाशक नहीं। असावधान मनुष्य को लाभ चारों ओर से छोड़ देते हैं, और अनर्थ घुस आते हैं। और एक चित्र दिया: जैसे समुद्र पार करके धनी हुए व्यापारी किसी छोटी-सी नदी में डूब जाएँ।
यहाँ ध्यान रखिए, युधिष्ठिर उन मरे हुए वीरों को दोष नहीं दे रहे। वे अपने ही पक्ष का दुःख कह रहे हैं। और आज सञ्जय जिन धृतराष्ट्र को उनतालीसवाँ श्लोक सुना रहे हैं, उनके सामने भीष्म का गिरना अभी ताज़ा है। उस महा-दावाग्नि के बुझने की ख़बर लेकर ही सञ्जय आए हैं।
आज के जीवन में यह प्रमाद कैसा दिखता है, यह मैं अपनी ओर से कहूँ। परीक्षा की पूरी तैयारी, और परीक्षा वाले दिन अलार्म बन्द करके "बस पाँच मिनट और"। बरसों की ईमानदारी, और एक दिन बिना पढ़े किसी काग़ज़ पर दस्तख़त। बड़े समुद्र पार हो जाते हैं, और आदमी छोटी नदी में डूब जाता है। इसलिए उस ऊँट की कथा के अन्त में भी भीष्म ने युधिष्ठिर से यही कहा था: सावधान रहकर विचरो।
अब चालीसवाँ श्लोक, जो इस लम्बे प्रसंग को समेटता है। "न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः", पृथ्वी पर, या फिर स्वर्ग में देवताओं में भी, ऐसी कोई वस्तु नहीं, "सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः", जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीनों गुणों से मुक्त हो।
हमारी टीका कहती है: इससे गुणों के अनुसार बाँटने का लम्बा प्रसंग पूरा होता है। प्रकृति से बनी हर वस्तु, देवताओं समेत, इनके अधीन है, केवल आत्मा इनसे परे है। नीलकण्ठ कहते हैं, केवल प्राणी ही नहीं, जड़ वस्तुएँ भी। और मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, आत्मा को छोड़कर कहीं कोई वस्तु ऐसी नहीं, जो तीन गुणों से रहित हो। संत ज्ञानेश्वर पूछते हैं: ऊन के बिना कम्बल कहाँ, मिट्टी के बिना घड़ा कहाँ, पानी के बिना लहर कहाँ? वैसे ही गुणों के बिना कोई प्राणी नहीं।
और इस श्लोक में एक बड़ी सान्त्वना छिपी है। अगर देवता भी इन गुणों से बाहर नहीं, तो हम अपने भीतर के रज और तम को देखकर इतना क्यों घबराएँ? सबमें तीनों हैं। प्रश्न यह नहीं कि आपमें रज और तम हैं या नहीं। प्रश्न यह है कि आप किस ओर बढ़ रहे हैं। लोकमान्य तिलक यही कहते हैं: इन सब भेदों में सात्त्विक भेद श्रेष्ठ है और अपनाने योग्य है, और गुणों के पार जाने वाली अवस्था कोई अलग, चौथा भेद नहीं, सात्त्विक की ही सबसे ऊँची सीढ़ी है। और गुणों के पार जाने का रास्ता हम आज ही सुन चुके हैं, चौदहवें अध्याय के उस वचन में: अटल भक्ति से भगवान की सेवा करने वाला इन गुणों को पार कर जाता है।
शंकराचार्य इस श्लोक के अन्त में कहते हैं कि यह सारा संसार, कर्म, उसके साधन और उसका फल, तीन गुणों से बना है, वही उल्टा पेड़, जिसकी बात पन्द्रहवें अध्याय में हुई थी, बयालीसवें सत्संग में, और जिसे असंग के मज़बूत शस्त्र से काटना है। अब बताना यह है कि जब सब कुछ गुणों से बना है, तो उससे निकलें कैसे। और वहीं से अगला श्लोक आता है: "ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप", हे परन्तप, ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों के, "कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः", कर्म उनके स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसार बाँटे गए हैं। यानी अब तक श्रीकृष्ण ने गुणों को बुद्धि, धृति और सुख में देखा। अगली बार वे उन्हीं गुणों को हर मनुष्य के अपने काम में दिखाएँगे, और बताएँगे कि अपना काम ही पूजा कैसे बनता है। उसका उत्तर अगले सत्संग में।
तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।
पहली बात। अपनी बुद्धि को इससे मत परखिए कि आप कितना जानते हैं। इससे परखिए कि जिस चीज़ से मोह है, उसके सामने आपकी समझ टिकती है या पलट जाती है। धृतराष्ट्र सब जानते थे, पर बेटे के पास पहुँचते ही उनकी बुद्धि घूम जाती थी।
दूसरी बात। धैर्य अपने आप में अच्छा या बुरा नहीं। देखिए कि वह क्या पकड़े बैठा है। भगवान की ओर पकड़ा धैर्य भीष्म को बाणों पर भी थामे रखता है, और शोक और घमण्ड को पकड़ा धैर्य दुर्योधन को कुश के आसन पर मरने बिठा देता है। अपनी मुट्ठी देखिए, और जो नीचे खींचता है, उसे खोल दीजिए।
तीसरी बात। किसी सुख को उसके अन्त से पहचानिए। जो पहले कड़वा लगे और अन्त में मन को निर्मल छोड़ जाए, उसे अभ्यास से पकड़े रहिए, चाहे शुरू में फीका लगे। विष पहले आता है, यह सच है। पर याद रखिए, समुद्र-मन्थन में भी अमृत आया था, बस विष के बाद।
आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आपके जीवन में ऐसी कौन-सी आदत है, या कौन-सा काम, जो शुरू में बहुत कड़वा लगा था, और आज आपको उसी में सबसे गहरी शान्ति मिलती है? नीचे अपने मन की बात लिखिए, ताकि किसी और को अपना पहला कड़वा घूँट पीने की हिम्मत मिले। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।
जो आरम्भ में विष जैसा लगे, और परिणाम में अमृत बन जाए। वही सात्त्विक सुख है।
जय श्री कृष्ण।
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् ।
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥ ३७ ॥
तीन बातें
- अपनी बुद्धि को इससे मत परखिए कि आप कितना जानते हैं। इससे परखिए कि जिस चीज़ से मोह है, उसके सामने आपकी समझ टिकती है या पलट जाती है। धृतराष्ट्र सब जानते थे, पर बेटे के पास पहुँचते ही उनकी बुद्धि घूम जाती थी।
- धैर्य अपने आप में अच्छा या बुरा नहीं। देखिए कि वह क्या पकड़े बैठा है। भगवान की ओर पकड़ा धैर्य भीष्म को बाणों पर भी थामे रखता है, और शोक और घमण्ड को पकड़ा धैर्य दुर्योधन को कुश के आसन पर मरने बिठा देता है। अपनी मुट्ठी देखिए, और जो नीचे खींचता है, उसे खोल दीजिए।
- किसी सुख को उसके अन्त से पहचानिए। जो पहले कड़वा लगे और अन्त में मन को निर्मल छोड़ जाए, उसे अभ्यास से पकड़े रहिए, चाहे शुरू में फीका लगे। विष पहले आता है, यह सच है। पर याद रखिए, समुद्र-मन्थन में भी अमृत आया था, बस विष के बाद।