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सत्संग ४९

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करने वाला कौन?

गीता 18.13–18.28 · 80 मिनट

"मैं करता हूँ" का बोझ; पाँच कारण

पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे । साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥ १३ ॥
गीता 18.13 — अर्थ पढ़ें ›
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् । विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥ १४ ॥
गीता 18.14 — अर्थ पढ़ें ›
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः । न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥ १५ ॥
गीता 18.15 — अर्थ पढ़ें ›

करने वाला कौन है? जब कोई काम अच्छा बन जाता है, तो हम बड़े आराम से कहते हैं, "मैंने किया।" और जब बिगड़ जाता है, तो उतने ही आराम से कहते हैं, "मेरी किस्मत ख़राब थी", या "उसकी वजह से हुआ।" कभी सारा श्रेय अपने सिर, कभी सारा बोझ अपने सिर, और कभी सारा दोष दूसरे के सिर। आज का सत्संग इसी एक प्रश्न पर है, जो सुनने में छोटा लगता है पर जिसमें पूरा जीवन समाया है: कोई भी काम असल में होता कैसे है, और उसमें "मैं" कितना हूँ?

जय श्री कृष्ण।

आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का उनचासवाँ सत्संग है। हम गीता के अन्तिम, अठारहवें अध्याय में हैं, जो महाभारत के भीष्म पर्व का बयालीसवाँ अध्याय है, "मोक्षसंन्यासयोग"। और हर बार की तरह याद रखिए कि यह सब हमें सञ्जय सुना रहे हैं, हस्तिनापुर के महल में, अन्धे राजा धृतराष्ट्र को, उस दिन जब भीष्म बाणों की शय्या पर गिर चुके हैं और युद्ध के दस दिन बीत चुके हैं।

पहले याद कर लें कि पिछली बार हम कहाँ रुके थे। यह अध्याय अर्जुन के अन्तिम प्रश्न से शुरू हुआ था: संन्यास क्या है, और त्याग क्या है? और श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया था: "काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः", कामना से किए जाने वाले कर्मों को छोड़ना संन्यास है, और "सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः", सब कर्मों के फल को छोड़ना त्याग है। फिर उन्होंने साफ़ कहा था कि यज्ञ, दान और तप कभी नहीं छोड़ने चाहिए, क्योंकि ये समझदार को भी पवित्र करते हैं। और फिर वह श्लोक आया था जो पिछले सत्संग की धुरी था: "न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः", देह धारण करने वाला कर्मों को पूरी तरह नहीं छोड़ सकता, "यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते", पर जो कर्मफल का त्याग करता है, वही त्यागी कहलाता है। और पिछले खंड के अन्त में श्रीकृष्ण ने कहा था कि कर्म का फल तीन तरह का होता है, अनचाहा, चाहा हुआ, और मिला-जुला, और यह उन्हें मिलता है जिन्होंने त्याग नहीं किया, पर संन्यासियों को कभी नहीं। अब यहाँ एक प्रश्न अपने आप उठता है। कर्म तो हो रहा है, और उसका फल भी बनता है, तो वह फल करने वाले से चिपकता क्यों नहीं? इसका उत्तर देने के लिए श्रीकृष्ण अब कर्म को खोलकर दिखाते हैं, जैसे कोई घड़ीसाज़ घड़ी खोलकर उसके पुर्ज़े दिखाता है।

तो आज का पहला श्लोक, तेरहवाँ। "पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे", हे महाबाहो, ये पाँच कारण मुझसे जानो, "साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्", जो सिद्धान्त रूप सांख्य में सब कर्मों की सिद्धि के लिए कहे गए हैं।

यहाँ दो शब्द समझने लायक हैं। पहला, "सांख्य"। हमारी टीका बताती है कि यहाँ सांख्य का अर्थ वह ज्ञान का उपदेश है जो आत्मा को अनात्मा से अलग पहचानता है; शंकराचार्य और मधुसूदन सरस्वती इसे वेदान्त कहते हैं, और लोकमान्य तिलक कपिल मुनि का सांख्य शास्त्र। हमारे लिए इतना काफ़ी है कि यह किसी एक आदमी की राय नहीं, शास्त्र का पक्का निर्णय है।

दूसरा शब्द, "कृतान्त"। "कृत" यानी किया हुआ, कर्म, और "अन्त" यानी जहाँ वह पूरा हो जाए। शंकराचार्य कहते हैं, वह ज्ञान जिसमें सारे कर्म समाप्त हो जाते हैं। आपको याद होगा, पन्द्रहवें सत्संग में हमने सुना था कि सारे कर्म अन्त में ज्ञान में ही पूरे होते हैं। और मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, "निबोध", यानी ध्यान से जानो, इसलिए कहा गया कि यह बात बिखरे मन से समझ में नहीं आती। तो आइए, हम भी अपना मन इकट्ठा कर लें।

चौदहवाँ श्लोक। "अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्", अधिष्ठान, कर्ता, और अनेक प्रकार के करण, "विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्", विविध अलग-अलग चेष्टाएँ, और पाँचवाँ दैव।

अब एक-एक को अपनी टीका से समझिए। पहला, "अधिष्ठान", यानी शरीर, वह जगह जहाँ सारा काम घटता है। शंकराचार्य कहते हैं, यह शरीर ही इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख और ज्ञान के प्रकट होने का आधार है। दूसरा, "कर्ता"। और यहाँ हमारी टीका एक ऐसी बात कहती है जो चौंका देती है: कर्ता वह अहंकार है जो कहता है, "मैं करता हूँ"। ध्यान दीजिए, आत्मा नहीं, अहंकार। श्रीधर स्वामी इसे और सुन्दर ढंग से कहते हैं: कर्ता चेतन और जड़ की वह गाँठ है, जिसे हम अहंकार कहते हैं। यानी जो "मैं" काम करता हुआ लगता है, वह भी पाँच पुर्ज़ों में से एक पुर्ज़ा भर है।

तीसरा, "करण", यानी साधन: इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि। आँख, कान, हाथ, ज़ुबान, और भीतर सोचने वाला मन। चौथा, "चेष्टाएँ", यानी प्राणों की क्रियाएँ, साँस का आना-जाना, भीतर की वह हलचल जिसके बिना एक उँगली भी नहीं हिलती। और पाँचवाँ, "दैव"। इसके अर्थ पर आचार्य अलग-अलग बात कहते हैं, और तीनों सुनने लायक हैं। हमारी टीका दो अर्थ देती है: इन्द्रियों के अधिष्ठाता देवता, जैसे आँख के पीछे सूर्य, या पिछले कर्मों का अदृश्य बल। शंकराचार्य पहला अर्थ लेते हैं, नीलकण्ठ दूसरा, पुण्य-पाप का बल। और रामानुजाचार्य एक तीसरी, बहुत गहरी बात कहते हैं: यह पाँचवाँ कारण स्वयं परमात्मा है, जो सबके भीतर अन्तर्यामी होकर बैठा है, और कर्म के होने में वही मुख्य कारण है। वे इसके लिए गीता का ही वचन याद दिलाते हैं, कि भगवान सबके हृदय में बैठे हैं।

लोकमान्य तिलक इसे खेती के उदाहरण से समझाते हैं, और वह बात सीधी गाँव के खेत में ले आती है। वे कहते हैं, खेती केवल किसान की मेहनत से नहीं होती। धरती, बीज, पानी, बैल, सब चाहिए, और संसार के और भी बहुत से काम, जो हमारे पक्ष या विपक्ष में चल रहे हैं और जिनका हमें पता भी नहीं। उन्हीं अनजानी बातों को दैव कहते हैं। और तिलक कहते हैं, जब इतनी चीज़ों के मिलने से काम बनता है, और उनमें से बहुत सी न हमारे वश में हैं, न हमें मालूम, तो यह घमण्ड करना कि "मैं ही करूँगा", या यह ज़िद करना कि "फल ऐसा ही होना चाहिए", नासमझी है।

और अब मैं आपको महाभारत का एक प्रसंग सुनाता हूँ, जिसमें दैव की बात ठीक इसी तरह आती है। इसे भी सञ्जय ही धृतराष्ट्र को सुनाते हैं, पर यह आज से कई दिन बाद की रात का है, युद्ध की अन्तिम रात का, सौप्तिक पर्व में। सैंतालीसवें सत्संग में आपने उस रात का एक अँधेरा हिस्सा सुना था: बरगद के नीचे अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा, और अश्वत्थामा की सोते हुए शत्रुओं को मारने की प्रतिज्ञा। आज उसी रात का एक दूसरा हिस्सा। अश्वत्थामा ने जब अपनी योजना बताई, तो कृपाचार्य ने उसे रोकने से पहले एक बात समझाई, और वह बात हमारे आज के श्लोक की टीका जैसी है।

कृपाचार्य ने कहा: सब मनुष्य दो बातों से बँधे हैं, दैव से और पुरुषार्थ से, और इन दोनों से परे कुछ नहीं। कोई काम अकेले दैव से सिद्ध नहीं होता, और न अकेले कर्म से। फिर उन्होंने एक चित्र दिया, जो भूलता नहीं: बादल अगर पहाड़ पर बरसे, तो कौन सा फल उगाएगा? और वही बादल जुते हुए खेत पर बरसे, तो क्या फल नहीं उगाएगा? अच्छी वर्षा हो और खेत ठीक से जोता गया हो, तब बीज की बड़ी उपज होती है। वैसे ही मनुष्य की सफलता होती है। और फिर कृपाचार्य ने एक बात कही जो बहुत ईमानदार है: इन दोनों में दैव को समझना कठिन है, वह अपने ही वश से चलता है, पर बुद्धिमान लोग दैव का आश्रय लेकर प्रयत्न में लगते हैं।

सोचिए। जुताई हमारे हाथ में है, बादल नहीं। जो किसान बादल के भरोसे जुताई छोड़ दे, वह मूर्ख है, और जो जुताई करके यह कहे कि फ़सल मैंने उगाई, बादल का कोई हाथ नहीं, वह भी पूरा सच नहीं कह रहा। श्रीकृष्ण के पाँच कारणों में हमारी जुताई कर्ता, करण और चेष्टा में आती है, और बादल दैव में। और दोनों के नीचे वह धरती है, अधिष्ठान, जिस पर सब टिका है।

अब पन्द्रहवाँ श्लोक। "शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः", मनुष्य शरीर, वाणी और मन से जो भी कर्म आरम्भ करता है, "न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः", चाहे वह न्याय के अनुसार हो या उसके उलटा, उसके ये पाँच कारण हैं।

यहाँ एक बात पर ध्यान दीजिए, "न्याय्यं वा विपरीतं वा", अच्छा हो या बुरा। शंकराचार्य कहते हैं, धर्म वाला काम भी, अधर्म वाला भी, और पलक झपकने जैसी छोटी-छोटी क्रियाएँ भी, सबके पीछे यही पाँच हैं। यानी ऐसा नहीं कि अच्छे काम पाँच कारणों से होते हैं और बुरे काम कोई और करता है। मशीन वही है, पुर्ज़े वही हैं। और यह बात आगे बहुत काम आएगी: जो मशीन अच्छा बनाती है वही बुरा भी बना सकती है, इसलिए असली सवाल यह है कि उसे चलाने वाला भाव कैसा है।

आज के जीवन में यह कैसा दिखता है, यह मैं अपनी ओर से एक उदाहरण देकर कहूँ। एक डॉक्टर ने किसी का कठिन ऑपरेशन किया और मरीज़ बच गया। अब ज़रा गिनिए कि उस बचने में क्या-क्या लगा। डॉक्टर का शरीर, जो छह घंटे खड़ा रहा, यह अधिष्ठान। उसके भीतर का "मैं यह कर सकता हूँ", यह कर्ता। उसकी आँखें, हाथ और बुद्धि, ये करण। उसकी साँस, थकते हुए भी स्थिर रहना, ये चेष्टाएँ। और फिर वह सब, जो उसके हाथ में था ही नहीं: मरीज़ का शरीर कैसे साथ देगा, और वह अनजाना कुछ, जिसे हम कहते हैं, "भगवान की कृपा थी।" यह दैव। अच्छा डॉक्टर यह जानता है। इसीलिए बहुत से बड़े डॉक्टर ऑपरेशन से पहले चुपचाप हाथ जोड़ते हैं, और ऑपरेशन के बाद कहते हैं, "हमने अपना काम किया, बाकी ऊपर वाले ने।" यह कमज़ोरी नहीं, यह इन पाँच कारणों को देख पाने वाली आँख है।

तो इन तीन श्लोकों से आज के लिए यह बात निकलती है: कोई भी काम अकेले हमसे नहीं होता। शरीर, अहंकार, इन्द्रियाँ, प्राण और दैव, पाँचों मिलते हैं, तब कुछ बनता है, अच्छा भी, बुरा भी। हम उन पाँच में से एक के हिस्सेदार हैं, पूरे मालिक नहीं।

पर अभी एक बात बाकी है। अगर पाँच कारण हैं, तो जो आदमी अपने को ही अकेला करने वाला मान बैठे, उसे श्रीकृष्ण क्या कहते हैं? और फिर वे एक ऐसा श्लोक कहते हैं जो पूरी गीता के सबसे गहरे, और सबसे ग़लत समझे जाने वाले श्लोकों में से है: वह आदमी मारकर भी नहीं मारता। उसे बहुत सावधानी से, आचार्यों के साथ बैठकर समझना होगा।

तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः । पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥ १६ ॥
गीता 18.16 — अर्थ पढ़ें ›
यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते । हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥ १७ ॥
गीता 18.17 — अर्थ पढ़ें ›
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना । करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः ॥ १८ ॥
गीता 18.18 — अर्थ पढ़ें ›

सोलहवाँ श्लोक। "तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः", ऐसा होने पर भी, यानी पाँच कारण होने पर भी, जो केवल शुद्ध आत्मा को कर्ता देखता है, "पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः", वह बुद्धि शुद्ध न होने के कारण ठीक नहीं देखता; वह "दुर्मतिः" है।

हमारी टीका इस श्लोक को एक वाक्य में खोल देती है: आत्मा पाँच कारणों में नहीं है, और आत्मा को ही करने वाला मान लेना वह मूल भूल है जिससे बन्धन होता है। पिछले श्लोक की सूची फिर से देखिए। शरीर, अहंकार, इन्द्रियाँ, प्राण, दैव। इनमें आत्मा कहीं नहीं है। आत्मा वह है जिसकी रोशनी में ये पाँचों काम करते हैं, जैसे सूरज की रोशनी में खेत में काम होता है, पर सूरज हल नहीं चलाता।

अकृतबुद्धि का अर्थ श्रीधर स्वामी और शंकराचार्य करते हैं, ऐसी बुद्धि जो शास्त्र और गुरु के उपदेश से सँवारी नहीं गई। और शंकराचार्य इस भूल के लिए ऐसे उदाहरण देते हैं जो हम सबने देखे हैं। जब बादल तेज़ी से भागते हैं, तो लगता है चाँद भाग रहा है। मधुसूदन सरस्वती एक और चित्र जोड़ते हैं: पानी में सूरज की परछाईं। पानी हिलता है, तो लगता है सूरज काँप रहा है। शरीर और मन का काम आत्मा पर ऐसे ही चढ़ा दिया जाता है। हिलता पानी है, और हम कहते हैं, सूरज हिला।

और रामानुजाचार्य इसी श्लोक को एक दूसरी ओर से पढ़ते हैं, जो भक्त के मन को छू जाती है। वे कहते हैं, जीव करता तो है, पर परमात्मा की अनुमति से, उसके दिए हुए शरीर और इन्द्रियों से। जो इस अनुमति को न देखकर केवल अपने को करने वाला मानता है, वह ठीक नहीं देखता। यानी शंकराचार्य के लिए भूल यह है कि हम आत्मा को कर्ता मानते हैं, और रामानुजाचार्य के लिए भूल यह है कि हम अपने को अकेला कर्ता मानते हैं और भगवान को भूल जाते हैं। रास्ते अलग हैं, पर दोनों आचार्य हमें एक ही जगह से उतारते हैं: "मैं ही सब करता हूँ" वाले ऊँचे आसन से।

आपको याद होगा, ग्यारहवें सत्संग में शल्य पर्व का एक दृश्य सुना था। युद्ध ख़त्म होने के बाद श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि पहले तुम रथ से उतरो, मैं बाद में उतरूँगा। और जैसे ही श्रीकृष्ण उतरे, वह रथ जल उठा, क्योंकि द्रोण और कर्ण के दिव्य अस्त्रों ने उसे बहुत पहले ही जला दिया था; वह बस इसलिए टिका था कि श्रीकृष्ण उस पर बैठे थे। आज उस दृश्य को इस श्लोक की आँख से देखिए। अठारह दिन अर्जुन ने बाण चलाए, यह सच है। पर उस विजय में रथ भी था, घोड़े भी थे, और वह सारथि भी, जिसके बैठे रहने से रथ बचा रहा। जो अर्जुन यह कहता कि "यह सब मैंने किया", वह "न स पश्यति", ठीक नहीं देखता।

अब सत्रहवाँ श्लोक। और मैं आपसे विनती करूँगा कि इसे पूरे ध्यान से सुनिए, क्योंकि इसका आधा सुना अर्थ बड़ा ख़तरनाक है। "यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते", जिसमें "मैं करता हूँ" का भाव नहीं है, और जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती, "हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते", वह इन लोगों को मारकर भी न मारता है, न बँधता है।

सबसे पहले हमारी अपनी टीका का पहला वाक्य सुनिए, क्योंकि वही इस श्लोक का दरवाज़ा है: यह मारने की अनुमति नहीं है। यह उस व्यक्ति का वर्णन है जो सचमुच देखता है कि आत्मा कुछ नहीं करता। और अर्जुन को यह दिखाया जा रहा है कि अहंकार और कामना के बिना लड़ने वाले को युद्ध लिप्त नहीं कर सकता। यानी यह श्लोक बताता है कि मुक्त मनुष्य कैसा होता है। यह नहीं बताता कि कोई भी मनुष्य कुछ भी करके अपने को मुक्त कह दे।

अब शब्द। "नाहङ्कृतो भावो", जिसमें यह भाव नहीं कि "मैंने किया"। और "बुद्धिर्यस्य न लिप्यते", जिसकी बुद्धि पर लेप नहीं चढ़ता। यह लेप क्या है? शंकराचार्य बहुत साफ़ बताते हैं: वह भीतर की बात, "यह मैंने किया, इसके कारण मैं नरक में जाऊँगा।" मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, यह लेप दो तरह का होता है: अच्छे काम पर फूल जाना, और बुरे काम पर भीतर-भीतर जलते रहना। दोनों के पीछे एक ही चीज़ है, "मैं करने वाला हूँ"। जिसका यह "मैं" ही नहीं रहा, उस पर न घमण्ड का लेप चढ़ता है, न पछतावे का।

अब वह कठिन हिस्सा, "मारकर भी नहीं मारता"। यह बात आपस में उलटी लगती है। शंकराचार्य इसका उत्तर देते हैं: दो नज़रों से। संसार की नज़र से, जो शरीर को ही आदमी समझती है, कहा गया "मारकर भी"। और सच की नज़र से, जो आत्मा को देखती है, कहा गया "न मारता है, न बँधता है"। और वे याद दिलाते हैं कि गीता यहीं से शुरू हुई थी। आपको याद होगा, पाँचवें सत्संग में दूसरे अध्याय का वह श्लोक: "नायं हन्ति न हन्यते", यह आत्मा न मारता है, न मारा जाता है। शंकराचार्य कहते हैं, जो बात गीता के आरम्भ में कही गई थी, बीच में जगह-जगह फैलाई गई, उसी को यहाँ समेटकर पूरी गीता का सार बाँध दिया गया।

और अब, इससे पहले कि हम आगे बढ़ें, एक छोटी-सी बात आपसे कहना चाहता हूँ। अभी तक आपने इस श्लोक का एक ही पहलू सुना है। आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। जो आदमी यहीं उठ जाए, वह या तो यह सोचकर जाए कि "मैं तो कुछ करता ही नहीं, तो मेरी कोई ज़िम्मेदारी नहीं", या यह कि "यह सब बड़े ज्ञानियों की बात है, मेरे काम की नहीं"। जबकि अभी आचार्यों की चेतावनियाँ आने वाली हैं, फिर महाभारत का वह प्रसंग जो इस श्लोक को उसकी सही जगह रखता है, और उसके भी आगे श्रीकृष्ण वह बताने वाले हैं जो हर साधारण आदमी के रोज़ के काम का है: अच्छा काम करने वाला कैसा होता है। तो अगर आप यह सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की यह यात्रा बीच में न छूटे। और आज का यह सत्संग आख़िर तक सुनिए।

पर अब आचार्यों की चेतावनियाँ सुनिए, क्योंकि वे इस श्लोक के चारों ओर बाड़ की तरह खड़ी हैं। नीलकण्ठ साफ़ कहते हैं: "मारकर भी" वाली बात केवल स्तुति है, यानी उस अवस्था की प्रशंसा का ढंग। क्योंकि जिसका कर्तापन मिट गया, उसमें वह राग और द्वेष ही नहीं बचता जो किसी को मारने के लिए उकसाता है। मधुसूदन सरस्वती भी यही कहते हैं: यह बात केवल ज़ोर देने के लिए कही गई है, यह नहीं कि ऐसा व्यक्ति सचमुच सब प्राणियों को मारता फिरता है। और लोकमान्य तिलक तो बिल्कुल सीधे शब्दों में लिखते हैं: इस श्लोक का यह अर्थ मत समझ लेना कि जिसकी फल की आशा छूट गई, वह चाहे जो बुरा काम कर सकता है। जिसका स्वार्थ और लोभ नष्ट हो गया, जिसके लिए सब प्राणी अपने जैसे हो गए, उससे किसी का अहित हो ही नहीं सकता। क्योंकि दोष बुद्धि में रहता है, कर्म में नहीं। और तिलक एक बात आगे भी कहते हैं, जो हम इसी सत्संग के आख़िरी खंडों में देखेंगे: बिना परिणाम सोचे किया गया काम श्रीकृष्ण के हिसाब से तामस है, सात्त्विक नहीं। यानी फल की चाह छोड़ने का अर्थ सोचना छोड़ना नहीं है।

और संत ज्ञानेश्वर इस मुक्त अवस्था को कुछ ऐसे चित्रों से दिखाते हैं जो समझ में उतर जाते हैं। वे कहते हैं, कुम्हार ने चाक से घड़ा उतार लिया, फिर भी चाक कुछ देर अपने पुराने वेग से घूमता रहता है। निशाना भेदने के बाद भी बाण तब तक उड़ता रहता है जब तक उसमें धनुष का दिया हुआ बल बचा है। वैसे ही, जिसका "मैं शरीर हूँ" वाला अभिमान चला गया, उसका शरीर पुराने संस्कारों के वेग से चलता रहता है, काम करता रहता है, पर उस काम में अब कोई "मैं" नहीं बैठा, जो उसे अपना कहे।

और अब महाभारत का वह प्रसंग, जो इस श्लोक को उसकी सही जगह पर रखता है। यह शान्ति पर्व में है, जिसे वैशम्पायन जनमेजय को सुनाते हैं। आपको याद होगा, पन्द्रहवें सत्संग में हमने इसकी एक झलक देखी थी: युद्ध ख़त्म हो चुका है, युधिष्ठिर शोक में डूबे हैं, और व्यास के सामने कहते हैं कि वे कर्म मुझे जलाते हैं, पकाते हैं, और व्यास उन्हें जीते जी प्रायश्चित्त की राह दिखाते हैं। आज उसी बातचीत का वह हिस्सा, जो हमारे श्लोक से सीधा जुड़ता है। युधिष्ठिर ने व्यास से यह भी कहा: गुरु, पितामह, मित्र, सब मुझ अकेले के राज्य-लोभ से मारे गए।

और व्यास पहले उन्हें उसी बात से सँभालते हैं जो हमारे सोलहवें श्लोक की है। वे पूछते हैं, कर्ता है कौन? ईश्वर, मनुष्य, संयोग, या पिछले कर्म? फिर वे कहते हैं: "न त्वं हन्ता", न तुम मारने वाले हो, न यह भीम, न अर्जुन, न दोनों जुड़वाँ भाई। काल अपने क्रम से देहधारियों के प्राण लेता है, और प्राणियों के हाथों प्राणियों को मरवाना, यह बस उसका साधन है, और यही उसका ईश्वरीय रूप है। आपको याद होगा, तैंतीसवें सत्संग में श्रीकृष्ण ने विश्वरूप में ठीक यही कहा था: "निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्", हे सव्यसाची, तुम केवल निमित्त बनो।

पर अब ध्यान से सुनिए कि व्यास इसके आगे क्या कहते हैं, क्योंकि वही इस पूरे प्रसंग की कुंजी है। वे कहते हैं: जो मनुष्य पाप के आरम्भ में उसी भाव से भरा होता है, करते हुए भी वैसा ही रहता है, और करके निर्लज्ज रहता है, उसमें सारा पाप पूरा टिकता है; उसके लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं, उसके पाप में कोई कमी नहीं। पर तुम, युधिष्ठिर, शुद्ध कुल के हो, दूसरों के दोष से यह कर्म तुमसे करवाया गया, तुम इसे चाहते नहीं थे, और करके तुम सन्तप्त हो।

देखिए कितनी बारीक बात है। "तुम कर्ता नहीं हो", यह दवा व्यास किसे दे रहे हैं? उसे, जो पछतावे से जल रहा है, जिसमें अहंकार नहीं, घाव है। और जो निर्लज्ज है, जो अपने किए पर अकड़ता है, उसके लिए वही व्यास कहते हैं, उसका सारा पाप उसी में टिका है। और फिर भी व्यास युधिष्ठिर को यह नहीं कहते कि बस, अब कुछ मत करो। वे कहते हैं, प्रायश्चित्त करो, अश्वमेध करो, जिन राजाओं को मारा गया उनके भाइयों, बेटों, पोतों को उनके राज्य में बिठाओ, जहाँ बेटा न हो वहाँ बेटी को, बच्चों और गर्भ में पल रहे शिशुओं तक से कोमलता रखो, और विधवाओं को ढाढ़स दो। यानी अहंकार का बोझ उतारो, पर ज़िम्मेदारी का हाथ मत छोड़ो। यही सत्रहवें श्लोक का सही पढ़ना है।

और सैंतालीसवें सत्संग की वह रात याद कीजिए, जब अश्वत्थामा ने सोते हुओं को मारा। वहाँ "मैं" ही "मैं" था: मेरे पिता का बदला, मेरी प्रतिज्ञा, मुझे कोई नहीं रोक सकता। ऐसा आदमी यह श्लोक अपने लिए नहीं पढ़ सकता। यह श्लोक उसका है जिसके भीतर न क्रोध बचा, न कामना, न "मैं"।

अब अठारहवाँ श्लोक। "ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना", ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता, ये तीन कर्म की प्रेरणा हैं, "करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः", और करण, कर्म और कर्ता, ये तीन कर्म का आधार हैं।

हमारी टीका इसे बहुत सरल कर देती है: कुछ भी करने से पहले कोई जानने वाला होता है, कुछ जाना हुआ होता है, और उन्हें जोड़ने वाला ज्ञान; यही कर्म के लिए प्रेरित करता है। और करते समय कर्ता होता है, साधन होता है, और वह कर्म। लोकमान्य तिलक इसे कुम्हार के उदाहरण से खोलते हैं। घड़ा बनाने से पहले कुम्हार, जो ज्ञाता है, मन में तय करता है कि मुझे घड़ा बनाना है, यह ज्ञेय है, और इस ढंग से बनाना है, यह ज्ञान। यह कर्मचोदना हुई, मन के भीतर की तैयारी। फिर वही कुम्हार, अब कर्ता बनकर, मिट्टी और चाक जैसे साधन, यानी करण, इकट्ठे करता है, और घड़ा, यानी कर्म, बनाता है। यह कर्मसंग्रह हुआ, बाहर का काम।

और अब इन पुर्ज़ों को एक-एक करके तीन गुणों की कसौटी पर रखा जाएगा।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण अब ज्ञान, कर्म और कर्ता, तीनों के तीन-तीन रूप बताने वाले हैं, और सबसे पहले ज्ञान। और वहाँ एक ऐसा श्लोक है, जो बताता है कि सबसे ऊँचा ज्ञान कैसे देखता है: टूटे हुए में भी एक, बँटे हुए में भी अनबँटा।

ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः । प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥ १९ ॥
गीता 18.19 — अर्थ पढ़ें ›
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते । अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥ २० ॥
गीता 18.20 — अर्थ पढ़ें ›

उन्नीसवाँ श्लोक। "ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः", ज्ञान, कर्म और कर्ता, गुणों के भेद से तीन-तीन प्रकार के हैं, "प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि", ऐसा गुणों की गणना वाले शास्त्र में कहा गया है; उन्हें भी ठीक-ठीक सुनो।

हमारी टीका बताती है कि यहाँ से चालीसवें श्लोक तक कर्म से जुड़ी हर चीज़ को तीन गुणों के अनुसार बाँटा गया है, और किसलिए: ताकि साधक पहचान सके कि वह किस प्रकार से जी रहा है, और सत्त्व की ओर बढ़े। यानी यह कोई सूची रटने के लिए नहीं, आईना देखने के लिए है।

"गुणसङ्ख्याने" का अर्थ शंकराचार्य और मधुसूदन सरस्वती करते हैं, कपिल का सांख्य शास्त्र। और शंकराचार्य यहाँ एक बहुत उदार बात कहते हैं: ब्रह्म की एकता के विषय में भले ही उस शास्त्र से हमारा मतभेद हो, पर गुणों के काम को समझाने में वे लोग कुशल हैं, इसलिए उनकी बात यहाँ प्रमाण के रूप में ली गई है। यह भी सीखने लायक है। जिससे किसी एक बात पर मतभेद हो, उसकी दूसरी सही बात को भी आदर से लेना।

और श्रीधर स्वामी बताते हैं कि गुणों की यह बात गीता में तीसरी बार आ रही है, और हर बार एक नए काम के लिए। चौदहवें अध्याय में दिखाया गया था कि गुण कैसे बाँधते हैं। सत्रहवें अध्याय में, कि सात्त्विक भोजन, यज्ञ, तप और दान से सात्त्विक स्वभाव कैसे बनाया जाए। और यहाँ, अठारहवें में, यह दिखाने के लिए कि क्रिया, साधन, फल, यह सब गुणों का खेल है, और आत्मा का इनसे कोई सम्बन्ध नहीं। "त्रिधैव" में "एव", यानी "ही", पर वे रुकते हैं: तीन ही, कोई चौथा प्रकार नहीं, गुणों से बाहर कुछ नहीं।

अब बीसवाँ श्लोक, जो आज के सबसे सुन्दर श्लोकों में से है। "सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते", जिस ज्ञान से मनुष्य सब प्राणियों में एक अविनाशी भाव को देखता है, "अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्", बँटे हुओं में अनबँटा, उस ज्ञान को सात्त्विक जानो।

हमारी टीका का वाक्य सुनिए: शरीर अनेक हैं और अलग-अलग हैं, फिर भी इस ज्ञान से देखने वाला उन सबमें एक ही अविभक्त, अविनाशी सत्ता देखता है। "विभक्तेषु", बँटे हुओं में। देखिए, श्रीकृष्ण यह नहीं कहते कि भेद दिखते ही नहीं। भेद हैं: कोई ऊँचा, कोई छोटा, कोई अमीर, कोई ग़रीब, कोई मनुष्य, कोई पशु। सात्त्विक ज्ञान इन भेदों से आँख नहीं मूँदता। वह इन भेदों के बीच से उस एक को देखता है, जो किसी में बँटा नहीं।

यहाँ आचार्य अपनी-अपनी परम्परा से अलग-अलग बात कहते हैं, और दोनों सुनने लायक हैं। शंकराचार्य कहते हैं, यह एक भाव स्वयं आत्मा है, जो हर शरीर में अलग-अलग नहीं, आकाश की तरह बिना टूटे सबमें एक है; और यही सच्चा देखना है। रामानुजाचार्य इसे दूसरी तरह पढ़ते हैं। वे कहते हैं, लोग ब्राह्मण, क्षत्रिय, ब्रह्मचारी, गृहस्थ के रूप में बँटे हैं, कोई गोरा, कोई लम्बा, पर हर एक के भीतर का आत्मा एक ही आकार का है, ज्ञान-स्वरूप, जिसमें ये ऊँच-नीच के भेद नहीं, और जो कभी बिगड़ता नहीं। एक आचार्य कहते हैं, सबमें एक ही आत्मा; दूसरे कहते हैं, सबमें एक-सा आत्मा। हम किसी का पक्ष नहीं लेंगे। पर ध्यान दीजिए कि रोज़ के बर्ताव में दोनों का फल एक ही निकलता है: किसी को उसके शरीर, जाति या पद से छोटा मत देखिए।

नीलकण्ठ इस श्लोक पर एक ऐसा उदाहरण देते हैं, जो हर घर की अलमारी में मिल जाएगा। वे कहते हैं, कंगन, कुण्डल, हार, सब अलग-अलग दिखते हैं, पर समझदार आदमी कहता है, यह सब सोना ही है। और संत ज्ञानेश्वर उसी चित्र को आगे बढ़ाते हैं: सोने को गहनों से अलग करने के लिए गहनों को गलाना नहीं पड़ता, और लहरों से पानी निकालने के लिए उन्हें छानना नहीं पड़ता। यानी एक को देखने के लिए अनेक को मिटाना नहीं पड़ता। बस देखने की आँख बदलनी पड़ती है।

आपको याद होगा, छठे अध्याय में, उन्नीसवें सत्संग में, श्रीकृष्ण ने योगी की यही आँख बताई थी: "सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि", वह आत्मा को सब प्राणियों में, और सब प्राणियों को आत्मा में देखता है। और सत्रहवें सत्संग में ज्ञानी की वह समान दृष्टि भी सुनी थी, जो विद्वान ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते, सबमें एक-सा देखती है। आज श्रीकृष्ण उसी आँख को एक नाम दे रहे हैं: सात्त्विक ज्ञान।

आज के जीवन में यह कैसा दिखता है, यह मैं अपनी ओर से एक उदाहरण देकर कहूँ। किसी बड़े सरकारी अस्पताल में एक बूढ़े वार्ड-सेवक हैं। उनके सामने हर दिन तरह-तरह के लोग आते हैं: कोई बड़े अफ़सर का रिश्तेदार, कोई गाँव से आया मज़दूर, कोई ऊँची आवाज़ में बोलने वाला, कोई इतना डरा हुआ कि बोल भी नहीं पाता। और वे सबको एक ही ढंग से उठाते हैं, एक ही ढंग से पानी पिलाते हैं। कोई पूछे कि ऐसा क्यों, तो वे बस इतना कहते हैं, "दर्द तो सबका एक-सा होता है, बाबूजी।" उन्होंने शायद कोई शास्त्र नहीं पढ़ा। पर "अविभक्तं विभक्तेषु" का एक छोटा-सा दिया उनके भीतर जल रहा है। बँटे हुए मरीज़ों में अनबँटा दर्द, और उसके पीछे अनबँटा जीव।

तो इन दो श्लोकों से आज के लिए यह बात निकलती है: सबसे ऊँचा ज्ञान वह नहीं जो सबसे ज़्यादा जानकारी रखे। सबसे ऊँचा ज्ञान वह है जो सबमें एक को देख ले। जिसकी आँख में यह एक उतर गया, उसके लिए कोई पराया नहीं रहता, और पराया न रहे तो किसी को चोट पहुँचाना भी कठिन हो जाता है।

पर अभी एक बात बाकी है। अगर सात्त्विक ज्ञान सबमें एक देखता है, तो राजस ज्ञान क्या देखता है? वह देखता है "मेरा" और "तेरा"। और आपको याद होगा, पूरी गीता का पहला श्लोक इसी "मेरा-तेरा" से निकला था, उसी धृतराष्ट्र के मुँह से, जो आज यह सब सुन रहे हैं।

पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् । वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ॥ २१ ॥
गीता 18.21 — अर्थ पढ़ें ›
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् । अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥
गीता 18.22 — अर्थ पढ़ें ›

इक्कीसवाँ श्लोक। "पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्", परन्तु जो ज्ञान सब प्राणियों में भिन्न-भिन्न प्रकार के अनेक भावों को अलग-अलग जानता है, "वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्", उस ज्ञान को राजस जानो।

हमारी टीका यहाँ बहुत सीधी बात कहती है: ऐसा ज्ञान हर शरीर में अलग-अलग आत्मा मानता है, और यही "मेरा" और "तेरा" का आधार है, जिससे कामना और होड़ बढ़ती है। ध्यान दीजिए, राजस ज्ञान झूठा नहीं देखता। वह जो देखता है, भेद, वे सचमुच दिखते हैं। उसकी कमी यह है कि वह भेद पर ही रुक जाता है, उसके पार नहीं देखता।

श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती इस अलगाव का एक रूप बताते हैं जो हम रोज़ जीते हैं: कोई सुखी, कोई दुःखी, और इसी के आधार पर हर एक को अलग, एक-दूसरे से बिल्कुल पराया मान लेना। और रामानुजाचार्य कहते हैं, यह वह ज्ञान है जो आत्मा को भी जाति, रंग और कद के भेद से अलग-अलग मानता है, और इसीलिए उसे फल से बँधने लायक समझता है। हमारे काम की बात इतनी है: जो ज्ञान हमें दूसरों से काटता है, वह राजस है।

और अब याद कीजिए, यह सब किसे सुनाया जा रहा है। पहले सत्संग में हमने गीता का पहला श्लोक सुना था, धृतराष्ट्र का प्रश्न: "मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय", मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया? उस दिन हमने देखा था कि एक ही कुल के बच्चों को "मेरे" और "पाण्डु के" में बाँटने वाला वह छोटा-सा शब्द, "मामकाः", पूरे महाभारत का बीज था। आज सञ्जय उन्हीं धृतराष्ट्र को बता रहे हैं कि श्रीकृष्ण के हिसाब से उस बँटवारे वाले ज्ञान का नाम क्या है: राजस। सोचिए, अन्धे राजा के कानों में यह शब्द कैसा लगा होगा। पूरी गीता उनके अपने पहले प्रश्न का उत्तर बनती जा रही है।

अब बाईसवाँ श्लोक। "यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्", परन्तु जो ज्ञान एक ही कार्य में, मानो वही सब कुछ हो, ऐसे आसक्त रहता है, युक्तिहीन है, "अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्", तत्त्व से रहित है और तुच्छ है, वह तामस कहा गया है।

हमारी टीका इसके दो रूप बताती है: शरीर को ही आत्मा मान लेना, या किसी एक वस्तु को ही सब कुछ मान लेना। और फिर वह एक बात कहती है जो इस ज्ञान की असली पहचान है: ऐसा ज्ञान "क्यों" नहीं पूछता, और सत्य तक नहीं पहुँचता। शंकराचार्य इस आसक्ति का स्वर बताते हैं: "बस इतना ही है, इसके आगे कुछ नहीं।" और "अल्प" का अर्थ वे करते हैं, जिसका दायरा भी छोटा, और फल भी छोटा।

लोकमान्य तिलक इन तीनों ज्ञानों को एक सीढ़ी की तरह रख देते हैं, और वह सीढ़ी हर घर में लगी है। वे कहते हैं, अपने बीवी-बच्चों को ही सारा संसार समझना तामस ज्ञान है। उससे एक सीढ़ी ऊपर चढ़ें तो दृष्टि थोड़ी बड़ी होती है, अपने गाँव या अपने देश का आदमी भी अपना-सा लगने लगता है, पर यह बुद्धि बनी रहती है कि दूसरे गाँवों और देशों के लोग अलग हैं; यह राजस ज्ञान है। और उससे भी ऊपर जाकर, सब प्राणियों में एक ही आत्मा को पहचानना, यह पूर्ण, सात्त्विक ज्ञान है। तिलक कहते हैं, अनेकता में एकता को पहचानना ही ज्ञान का सच्चा लक्षण है।

ध्यान दीजिए, तिलक यह नहीं कहते कि अपने परिवार से प्रेम करना बुरा है। वे कहते हैं, उसी को सारा संसार मान लेना, उसके आगे कुछ न देखना, यह अँधेरा है। प्रेम अपने घर से शुरू हो, यह ठीक है। वह घर की दीवार पर ही रुक जाए, यहाँ तामस शुरू होता है।

और फिर धृतराष्ट्र। पहले सत्संग में हमने आदि पर्व से उनका अपना एक वाक्य सुना था, जिसमें वे ख़ुद मानते हैं कि मैं अन्धा हूँ, पुत्र-प्रेम के कारण मैं दुर्योधन के साथ भटक जाता हूँ। यही "कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये" है: एक ही चीज़ में ऐसे चिपक जाना मानो वही सब कुछ हो। उनके लिए दुर्योधन ही राज्य था, दुर्योधन ही धर्म था, दुर्योधन ही भविष्य। और इस एक चीज़ के आगे उन्होंने जुए की सभा में विदुर की नहीं सुनी, और युद्ध से ठीक पहले व्यास की भी नहीं, जिनसे उन्होंने ख़ुद कहा था कि मैं सब जानता हूँ, पर संसार की तरह मैं भी अपने हित की जगह मोहित हूँ। "सक्तमहैतुकम्", आसक्त भी, और बिना युक्ति के भी। उन्होंने कभी यह "क्यों" नहीं पूछा कि जो मेरा बेटा माँग रहा है, वह ठीक है या नहीं।

आज के जीवन में यह कैसा दिखता है, यह मैं अपनी ओर से एक छोटा-सा उदाहरण देकर कहूँ। कोई आदमी अपनी गाड़ी बड़ी सावधानी से चलाता है जब उसमें उसका अपना बच्चा बैठा हो। और उसी सड़क पर, उसी शाम, किसी और के बच्चे को स्कूटर पर देखकर हॉर्न बजाता हुआ तेज़ निकल जाता है। उस आदमी में प्रेम की कमी नहीं, बस वह बहुत छोटे दायरे में बन्द है। और जिस दिन उसे स्कूटर पर बैठे उस अनजान बच्चे में भी अपना बच्चा दिख जाए, उस दिन वह सीढ़ी चढ़ गया।

तो इन दो श्लोकों से आज के लिए यह बात निकलती है: अपने ज्ञान को जानकारी से मत नापिए, उसके दायरे से नापिए। जो ज्ञान एक ही चीज़ में बन्द हो जाए, वह अँधेरा है। जो सबको अलग-अलग खानों में बाँटे, वह होड़ है। और जो सबमें एक देखे, वही रोशनी है।

पर अभी एक बात बाकी है। ज्ञान के बाद अब कर्म की बारी है। एक ही काम, एक ही मेहनत, एक के लिए हल्का और दूसरे के लिए भारी क्यों लगता है? श्रीकृष्ण अगले श्लोकों में इसका कारण बताते हैं, और वह कारण काम में नहीं, करने वाले के "मैं" में है।

नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम् । अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ॥ २३ ॥
गीता 18.23 — अर्थ पढ़ें ›
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः । क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥ २४ ॥
गीता 18.24 — अर्थ पढ़ें ›

तेईसवाँ श्लोक। "नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम्", जो कर्म नियत है, आसक्ति से रहित है, राग और द्वेष के बिना किया गया है, "अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते", और फल न चाहने वाले के द्वारा किया गया है, वह सात्त्विक कहा जाता है।

यहाँ चार बातें हैं, और हर एक पर आचार्यों ने कुछ ऐसा कहा है जो काम का है। पहली, "नियतं"। शंकराचार्य इसका अर्थ करते हैं, नित्य कर्म, जो रोज़ करना ही है। रामानुजाचार्य कहते हैं, अपने वर्ण और आश्रम के अनुसार उचित कर्म। और लोकमान्य तिलक कहते हैं, अपने धर्म के अनुसार जो काम हमें सौंपा गया है। यानी सात्त्विक कर्म कोई चमकदार, असाधारण काम नहीं। वह अक्सर वही काम है जो रोज़ सामने आता है, और जिसे करना ही है। आपको याद होगा, पिछले सत्संग में सात्त्विक त्याग का श्लोक सुना था: "कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन", जो नियत कर्म केवल इसलिए किया जाता है कि उसे करना है। आज वही बात कर्म के नाम से आई है।

दूसरी, "सङ्गरहित"। मधुसूदन सरस्वती इस आसक्ति का एक बहुत पहचाना हुआ रूप बताते हैं: "मैं ही बड़ा याज्ञिक हूँ", यानी अपने काम पर इतराना। तीसरी, राग और द्वेष के बिना। और यहाँ तीन आचार्य तीन उदाहरण देते हैं, जो मिलकर पूरी तस्वीर बनाते हैं। रामानुजाचार्य कहते हैं, न कीर्ति के मोह से, न अपयश के डर से। श्रीधर स्वामी कहते हैं, न बेटे के मोह में, न शत्रु के द्वेष में। और मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, न इस सोच से कि इससे मुझे राजा से सम्मान मिलेगा, न इस सोच से कि इससे मैं शत्रु को हराऊँगा। और चौथी, "अफलप्रेप्सुना", फल न चाहने वाले के द्वारा। आपको याद होगा, सातवें सत्संग में सुना था: "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन"।

पर यहाँ एक सूक्ष्म बात है। श्लोक कहता है, कर्म सात्त्विक है "अफलप्रेप्सुना", फल न चाहने वाले से किया गया। यानी कर्म की पहचान कर्म में नहीं, करने वाले के मन में है। लोकमान्य तिलक इसी पर ज़ोर देते हैं: गीता का सिद्धान्त है कि कर्म से बुद्धि बड़ी है, इसलिए कर्म के लक्षण बताते समय भी बार-बार करने वाले की बुद्धि की बात की गई है। एक ही रोटी, एक माँ बनाती है प्रेम से, तो सात्त्विक; और वही रोटी कोई बनाए इस हिसाब से कि देखो मैं कितना करती हूँ, कोई मेरी कद्र नहीं करता, तो उसका रंग बदल जाता है।

अब चौबीसवाँ श्लोक। "यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः", परन्तु जो कर्म कामना चाहने वाले के द्वारा, या अहंकार के साथ, "क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्", और बहुत परिश्रम से किया जाता है, वह राजस कहा गया है।

यहाँ हमारी टीका एक ऐसी बात कहती है जिसे मैं आज के सबसे काम के वाक्यों में गिनता हूँ। वह कहती है: यह परिश्रम काम से नहीं, अहंकार और कामना से आता है। जब मनुष्य को लगता है "मैं बहुत कुछ कर रहा हूँ", तो काम भारी लगता है। सोचिए। "बहुलायासं", बहुत थका देने वाला। हम मान लेते हैं कि थकान काम की होती है। श्रीकृष्ण कहते हैं, बहुत सी थकान "मैं" की होती है। जो काम हमें बोझ लगता है, उसमें आधा बोझ उस गठरी का है जो हम काम के साथ सिर पर उठाए फिरते हैं: लोग क्या कहेंगे, मुझे क्या मिलेगा, मैंने इतना किया।

रामानुजाचार्य इस अहंकार का स्वर बताते हैं: "यह भारी काम मुझसे ही हो रहा है।" और श्रीधर स्वामी उसका दूसरा स्वर: "मेरे जैसा विद्वान और कौन है?" और संत ज्ञानेश्वर इस राजस कर्म पर कुछ ऐसे चित्र देते हैं, जो मुस्कान भी लाते हैं और चुभते भी हैं। वे कहते हैं, ऐसा आदमी घर में माँ-बाप से ठीक से दो बात नहीं करता, और बाहर सारी दुनिया पर आदर लुटाता है। और फिर वे कहते हैं, एक दाने के लिए चूहा पूरा पहाड़ खोद डालता है, और काई के लिए मेंढक समुद्र मथ डालता है। यानी राजस कर्म में मेहनत पहाड़ जितनी होती है, और पाने को दाना भर।

आपको याद होगा, छियालीसवें सत्संग में दुर्योधन के वैष्णव यज्ञ की कथा सुनी थी: युधिष्ठिर का राजसूय देखकर जागी लालसा, फिर उसके बराबर का एक दूसरा यज्ञ, सोने का हल, भूमि की जुताई, और अन्त में मीठी बातें सुनकर उसका प्रसन्न होना। आज उस कथा को इस श्लोक के तीन शब्दों से तौलिए। "कामेप्सुना", राजसूय के बराबर दिखने की चाह। "साहङ्कारेण", अपने चचेरे भाई से बड़ा दिखने का अहंकार। और "बहुलायासं", सोने के हल तक की वह भारी तैयारी। तीनों लक्षण एक ही यज्ञ में। पवित्र काम था, यज्ञ था, पर उसके भीतर ईंधन होड़ का था।

आज के जीवन में यह कैसा दिखता है, यह मैं अपनी ओर से एक उदाहरण देकर कहूँ। दो पड़ोसी हैं, और दोनों के घर में बेटी की शादी है। एक परिवार अपनी हैसियत से, प्रेम से, शान्ति से तैयारी करता है। थकान उन्हें भी होती है, पर रात को सोते समय मन हल्का रहता है। दूसरा परिवार हर चीज़ पड़ोसी से बड़ी करना चाहता है: बड़ा पण्डाल, ज़्यादा पकवान, ऊँचा कर्ज़। उनकी थकान कभी नहीं उतरती, क्योंकि उनका हर काम किसी और से तौला जा रहा है। शादी दोनों घरों में हुई। पर एक घर में कर्म था, दूसरे घर में "बहुलायासं"।

तो इन दो श्लोकों से आज के लिए यह बात निकलती है: अगर कोई काम आपको बहुत भारी लगने लगे, तो एक बार यह देखिए कि बोझ काम का है या "मैं" का। काम हल्का करने का एक रास्ता काम कम करना है, और दूसरा रास्ता, जो गीता बताती है, उस गठरी को उतार देना है जो काम के साथ हम ढो रहे हैं।

पर अभी एक बात बाकी है। सात्त्विक और राजस के बाद तामस कर्म की बारी है, और मधुसूदन सरस्वती उसके उदाहरण में सीधा एक नाम लेते हैं, दुर्योधन। और महाभारत में ठीक यही बात एक ऐसे आदमी के मुँह से निकली है, जो अठारह दिन दुर्योधन की ओर से लड़ा था।

अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम् । मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥ २५ ॥
गीता 18.25 — अर्थ पढ़ें ›
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः । सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥ २६ ॥
गीता 18.26 — अर्थ पढ़ें ›

पच्चीसवाँ श्लोक। "अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम्", परिणाम, हानि, हिंसा और अपनी सामर्थ्य का विचार किए बिना, "मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते", जो कर्म मोह से आरम्भ किया जाता है, वह तामस कहा जाता है।

यहाँ चार चीज़ें हैं जिन्हें तामस आदमी नहीं देखता, और शंकराचार्य हर एक को खोलते हैं। "अनुबन्ध", यानी जो इस काम के बाद पीछे-पीछे आएगा। "क्षय", यानी इसमें कितनी शक्ति और कितना धन जाएगा। "हिंसा", यानी इससे किस-किस को चोट पहुँचेगी। और "पौरुष", यानी क्या मुझमें इसे पूरा करने की सामर्थ्य है भी। और ये चारों देखे बिना, "मोहादारभ्यते", केवल मोह से, बिना विवेक के, काम शुरू कर देना। मधुसूदन सरस्वती क्षय में तीन चीज़ें गिनाते हैं: शरीर की शक्ति, धन, और सेना। और फिर, उदाहरण के लिए, वे सीधा लिखते हैं: जैसे दुर्योधन का युद्ध।

और यहाँ लोकमान्य तिलक की वह बात याद कीजिए जिसका वादा मैंने सत्रहवें श्लोक पर किया था। वे कहते हैं, फल की आशा छूट जाने का यह अर्थ मत समझिए कि अब आगे-पीछे का विचार किए बिना कुछ भी करने की छुट्टी मिल गई। क्योंकि श्रीकृष्ण ख़ुद कह रहे हैं कि परिणाम का विचार किए बिना किया गया काम तामस है, सात्त्विक नहीं। यानी गीता का निष्काम कर्मयोगी आँख मूँदकर नहीं चलता। वह फल की लालसा छोड़ता है, फल का विचार नहीं।

और अब वह प्रसंग, जिसका वादा पिछले खंड के अन्त में किया था। सौप्तिक पर्व की वही अन्तिम रात, वही बरगद, जिसकी बात हमने आज के पहले खंड में की थी। कृपाचार्य ने दैव और पुरुषार्थ समझाने के बाद अश्वत्थामा से कहा: जो मनुष्य राग, क्रोध, भय या लोभ से अपना प्रयोजन साधना चाहता है, बिना सामर्थ्य के, दूसरों का तिरस्कार करता हुआ, वह जल्दी ही लक्ष्मी से गिर जाता है। और फिर उन्होंने वह वाक्य कहा: "असमर्थः समारब्धो मूढत्वादविचिन्तितः"। यही काम लोभी और दूर तक न देखने वाले दुर्योधन ने आरम्भ किया था, बिना सामर्थ्य के, मूढ़ता से, और बिना सोचे-विचारे।

अब इस वाक्य को श्रीकृष्ण के श्लोक के साथ रखकर देखिए। "दूर तक न देखने वाला", यह अनुबन्ध का न देखना है। "बिना सामर्थ्य के", यह पौरुष का न देखना। "मूढ़ता से", यह "मोहादारभ्यते"। और कृपाचार्य आगे कहते हैं, उसने हित चाहने वालों की उपेक्षा की, दुष्टों से सलाह ली, रोके जाने पर भी अधिक गुणवान पाण्डवों से वैर किया, और अब काम बिगड़ने पर तप रहा है। और फिर कृपाचार्य अपने ऊपर भी बात लेते हैं, जो बड़ा ईमानदार वाक्य है: क्योंकि हम उस पापी के पीछे चले, इसलिए यह भयंकर अनर्थ हम पर भी आ पड़ा।

और सोचिए, यह सब सञ्जय किसे सुना रहे होंगे। उन्हीं धृतराष्ट्र को, जिनके बेटे के बारे में यह कहा जा रहा है। और उसी रात, यह सलाह सुनने के बाद भी, अश्वत्थामा ने वही किया जो सैंतालीसवें सत्संग में आपने सुना: बिना परिणाम देखे, बिना किसी के रोके रुके, सोते हुओं पर वार। और उसका अनुबन्ध, जो पीछे-पीछे आया, वह था श्रीकृष्ण का शाप। एक ही रात में, एक ही पेड़ के नीचे, तामस कर्म की पहचान भी कही गई, और तामस कर्म किया भी गया।

अब छब्बीसवाँ श्लोक, जो मेरी समझ में आज का सबसे काम का श्लोक है, और जिसे हम आज के अन्त में दोबारा गाएँगे। "मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः", जो आसक्ति से मुक्त है, "मैं" नहीं कहता, धैर्य और उत्साह से भरा है, "सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते", और सफलता-असफलता में विकार रहित रहता है, वह कर्ता सात्त्विक कहा जाता है।

पाँच गुण, और हर एक पर आचार्यों की बात सुनिए। "मुक्तसङ्ग", यानी फल से चिपकाव नहीं। फिर "मैं" न कहना: श्रीधर स्वामी कहते हैं, घमण्ड की बात न करना; मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, "मैंने किया" कहने की आदत न होना, या अपने गुणों की प्रशंसा न करना। यह वही बात है जो सत्रहवें श्लोक में "नाहङ्कृतो भावो" थी, पर अब एक साधारण कर्ता के रोज़ के बर्ताव में।

और अब वे दो शब्द, जो इस श्लोक को सबसे अलग करते हैं: "धृत्युत्साहसमन्वितः", धैर्य और उत्साह से भरा। ध्यान दीजिए, अहंकार और आसक्ति छोड़ने वाले से यह नहीं कहा गया कि वह ढीला पड़ जाए। उसमें धृति है और उत्साह है। रामानुजाचार्य धृति का अर्थ करते हैं: काम शुरू करने के बाद, उसके पूरा होने तक, जो कष्ट आएँ उन्हें सह लेना। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं: विघ्न आ जाने पर भी शुरू किया काम न छोड़ना। और उत्साह का अर्थ नीलकण्ठ और मधुसूदन सरस्वती करते हैं, बुद्धि का यह पक्का निश्चय, "यह मैं पूरा करूँगा ही"। देखिए, यहाँ भी एक "मैं" है, पर यह अहंकार वाला "मैंने किया" नहीं, संकल्प वाला "मैं करूँगा" है।

और आख़िरी गुण, "सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः"। मधुसूदन सरस्वती इसे चेहरे तक ले आते हैं: सफलता पर चेहरा खिल न उठे, असफलता पर मुरझा न जाए। आपको याद होगा, सातवें सत्संग में यही सुना था: "सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते"।

संत ज्ञानेश्वर इस सात्त्विक कर्ता के कुछ बड़े सुन्दर चित्र देते हैं। वे कहते हैं, वह बहुत कुछ करता है, बड़े आदर से करता है, पर "मैं करने वाला हूँ" यह भाव उसमें नहीं उगता, जैसे बरसात के बादल, जो इतना बरसते हैं पर कुछ जताते नहीं। और अगर कभी काम बीच में रुक जाए, तो वह अपने को छोटा नहीं समझता; और अगर काम पूरा, बिना किसी कमी के, सफल हो जाए, तो उसका ढिंढोरा पीटना उसे आता ही नहीं।

और अब इस श्लोक के लिए महाभारत से एक प्रसंग, जो उस रात से बहुत पहले का है, वनवास के दिनों का। इसे वैशम्पायन जनमेजय को सुनाते हैं। आपको याद होगा, पैंतीसवें सत्संग में वन का वह संवाद सुना था, जब दुःखी द्रौपदी ने विधाता को दोष दिया था, और युधिष्ठिर ने कहा था कि मैं फल की चाह से धर्म नहीं करता। उसी संवाद में द्रौपदी आगे कर्म पर एक ऐसी बात कहती हैं जो इस श्लोक की धृति और उत्साह से भरी है।

वे कहती हैं: किसान हल से धरती जोतता है, बीज बोता है, और फिर चुपचाप बैठ जाता है, क्योंकि आगे का कारण बादल है। अगर वर्षा साथ न दे, तो किसान निर्दोष है। वह सोचता है, जो कोई दूसरा मनुष्य करता, वह मैंने अच्छी तरह कर दिया; इसमें मेरा कोई दोष नहीं। फिर द्रौपदी कहती हैं: "मैं कर्म करता हूँ फिर भी सफलता नहीं मिलती", ऐसा सोचकर निराश नहीं होना चाहिए। कर्म के दो ही परिणाम हैं, सफलता या असफलता। और कर्म तब सफल होता है जब अनेक कारण एक साथ मिलते हैं। सुनिए, यह द्रौपदी के मुँह से श्रीकृष्ण के पाँच कारणों की ही बात है। और अगर कुछ शुरू ही न किया जाए, तो न कभी फल दिखता है, न कोई गुण।

और फिर दो वाक्य, जो मैं चाहूँगा कि आप घर ले जाएँ। द्रौपदी कहती हैं, अगर असफलता भी हो जाए, तो वही आपकी, भीम की, अर्जुन की और दोनों जुड़वाँ भाइयों की महिमा होगी। और: मनुष्य को कभी भी अपने को तुच्छ नहीं समझना चाहिए; जो अपने को तुच्छ समझता है, उसे सुन्दर समृद्धि नहीं मिलती। और द्रौपदी बताती हैं कि यह बृहस्पति की नीति उन्होंने बचपन में पिता के घर सुनी थी।

देखिए, एक ही बात दो छोरों से आई। कृपाचार्य ने कहा था, जुता हुआ खेत चाहिए; द्रौपदी कहती हैं, खेत जोत दिया, अब बादल न बरसे तो अपने को दोष मत दो। जुताई में धृति और उत्साह, और बादल के आगे निर्विकार मन। यही सात्त्विक कर्ता है।

आज के जीवन में यह कैसा दिखता है, यह मैं अपनी ओर से कहूँ। कोई युवक तीसरी बार किसी कठिन परीक्षा में बैठा और फिर नहीं निकल पाया। राजस मन कहेगा, "मेरे साथ हमेशा अन्याय होता है", और तामस मन कहेगा, "छोड़ो, मुझसे कुछ नहीं होगा।" सात्त्विक मन दुःखी भी होगा, पर फिर देखेगा कि कहाँ कमी रही, और या तो फिर तैयारी करेगा, या शान्त मन से दूसरा रास्ता चुनेगा, और अपने को तुच्छ नहीं समझेगा। उसने अपनी जुताई पूरी की थी; बादल उसके हाथ में नहीं था।

तो इन दो श्लोकों से आज के लिए यह बात निकलती है: बिना सोचे, ज़िद में कूद पड़ना वीरता नहीं, तामस है। और अहंकार छोड़ना ढीला पड़ना नहीं, बल्कि धैर्य और उत्साह से भरकर काम करना है, और फिर फल के आगे मन को शान्त रखना। सात्त्विक कर्ता पूरी ताक़त से जोतता है, और बादल को भगवान पर छोड़ देता है।

पर अभी एक बात बाकी है। सात्त्विक कर्ता के बाद श्रीकृष्ण राजस और तामस कर्ता का चित्र खींचते हैं। और तामस कर्ता के लक्षणों में दो शब्द हैं, आलसी और काम टालने वाला। और आलस्य पर भीष्म ने युधिष्ठिर को एक ऊँट की कथा सुनाई थी, एक ऐसे ऊँट की, जिसकी गर्दन सौ योजन लम्बी थी।

रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः । हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥ २७ ॥
गीता 18.27 — अर्थ पढ़ें ›
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः । विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥ २८ ॥
गीता 18.28 — अर्थ पढ़ें ›

सत्ताईसवाँ श्लोक। "रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः", जो कर्ता रागी है, कर्मफल चाहता है, लोभी है, हिंसा के स्वभाव वाला है, अशुद्ध है, "हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः", और हर्ष और शोक से भरा रहता है, वह राजस कहा गया है।

"रागी" का अर्थ रामानुजाचार्य करते हैं, यश का भूखा। "लुब्ध" का अर्थ शंकराचार्य दो तरह से करते हैं: दूसरे के धन की प्यास वाला, या ऐसा आदमी जो तीर्थ जैसी जगह पर भी अपनी जेब से कुछ न छोड़ सके। और "हिंसात्मक" पर मधुसूदन सरस्वती एक बहुत सूक्ष्म बात कहते हैं: यह हिंसा केवल हाथ से मारना नहीं, दूसरों की रोज़ी काट देना भी है। और अन्त में, "हर्षशोकान्वितः"। सात्त्विक कर्ता सफलता-असफलता में "निर्विकार" था। राजस कर्ता हर नतीजे के साथ ऊपर-नीचे होता है, जैसे लहर पर नाव। आज सफल हुआ तो आसमान पर, कल चूका तो ज़मीन के नीचे।

अट्ठाईसवाँ श्लोक। "अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः", जो कर्ता असंयमी, असभ्य, घमण्डी, धूर्त, दूसरों का काम बिगाड़ने वाला और आलसी है, "विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते", विषादी और काम टालने वाला है, वह तामस कहा जाता है।

कुछ शब्दों पर रुकिए। "स्तब्ध" का अर्थ शंकराचार्य करते हैं, डण्डे की तरह अकड़ा हुआ, जो किसी के आगे नहीं झुकता। और संत ज्ञानेश्वर कहते हैं, ऐसा आदमी भगवान के आगे भी नहीं झुकता; अकड़ में वह पहाड़ को भी पीछे छोड़ दे। "शठ" का अर्थ शंकराचार्य और श्रीधर स्वामी करते हैं, जो अपनी शक्ति छिपाता है, यानी कर सकता है पर करता नहीं, और बहाना बनाता है। "नैष्कृतिक" का अर्थ हमारी टीका बताती है, दूसरों की जीविका या काम बिगाड़ने वाला। और "दीर्घसूत्री", हमारी टीका कहती है, वह जो एक दिन के काम को महीने भर खींचता है, और फिर भी पूरा नहीं करता। ज्ञानेश्वर इस पर एक चित्र देते हैं जो मुस्कान ले आता है: ऐसा आदमी योजनाएँ तो प्रलय के बाद तक की बनाता है, पर हाथ से घास का एक तिनका भी नहीं हिलता। हम सबने अपने भीतर कभी न कभी यह आदमी देखा है।

और अब वह कथा, जो भीष्म ने बाणों की शय्या से युधिष्ठिर को सुनाई थी, शान्ति पर्व में। युधिष्ठिर ने पूछा था, राजा को क्या करना चाहिए कि वह सुखी रहे। और भीष्म ने कहा, सुनो, कैसे नहीं चलना चाहिए। प्रजापति के कुल में एक बड़ा ऊँट था, जिसे अपने पिछले जन्म याद थे। उसने वन में कठोर तप किया, और ब्रह्मा प्रसन्न होकर बोले, वर माँगो। ऊँट ने माँगा, मेरी गर्दन इतनी लम्बी हो जाए कि मैं सौ योजन दूर तक चर सकूँ। और वर मिल गया। पर भीष्म कहते हैं, उसी वर के कारण वह आलसी हो गया, और चरने के लिए कहीं जाना ही नहीं चाहता था। बैठे-बैठे गर्दन फैलाता और चर लेता।

एक दिन वह इसी तरह सौ योजन लम्बी गर्दन फैलाए चर रहा था कि बड़ी आँधी आ गई। उसने सिर और गर्दन एक गुफा में रख दिए और वहीं पड़ा रहा। फिर भारी वर्षा हुई। और ठण्ड से ठिठुरता, भूखा एक सियार अपनी सियारिन के साथ उसी गुफा में घुस आया, और ऊँट की गर्दन खाने लगा। ऊँट ने जब जाना, तो गर्दन समेटने का यत्न किया। पर सौ योजन की गर्दन, वह जब तक उसे ऊपर-नीचे करके समेटता रहा, तब तक सियार और सियारिन ने उसे खा डाला। और भीष्म का निष्कर्ष, एक वाक्य: देखो, आलस्य से एक-एक कदम बढ़ते हुए कितना बड़ा अनर्थ आ गया। और फिर: मनु ने कहा है, विजय की जड़ बुद्धि है।

इस कथा में एक बात मुझे सबसे गहरी लगती है। ऊँट को जो वर मिला, वही उसके आलस्य का कारण बना। उसके पास सामर्थ्य बहुत थी। बहुत से लोगों का दुःख यह नहीं कि उनमें गुण नहीं, दुःख यह है कि गुण बैठे-बैठे गल जाते हैं।

और यहीं श्रीकृष्ण ने कर्ता के तीन रूप पूरे किए। अब एक बात साफ़ देखिए। सत्रहवें श्लोक में जिस मुक्त मनुष्य की बात थी, जो कर्तापन से छूट गया, वह इस अट्ठाईसवें श्लोक का आलसी, काम टालने वाला आदमी नहीं है। कर्तापन छोड़ना काम छोड़ना नहीं है। सात्त्विक कर्ता "मैं" छोड़ता है और धैर्य-उत्साह से काम करता है। तामस कर्ता काम छोड़ता है, और "मैं" को पकड़े बैठा रहता है।

और यह गुणों वाला प्रसंग अभी पूरा नहीं हुआ। श्रीकृष्ण अगले श्लोक में कहते हैं: "बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु", अब गुणों के अनुसार बुद्धि और धृति का तीन प्रकार का भेद सुनो, "प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय", हे धनञ्जय, जो पूरी तरह और अलग-अलग कहा जा रहा है। आज हमने ज्ञान, कर्म और कर्ता देखे। अगली बार बुद्धि, धृति, और फिर वह सुख, जो पहले ज़हर-सा लगता है और बाद में अमृत बन जाता है। उसकी बात अगले सत्संग में।

तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली बात। कोई भी काम अकेले आपसे नहीं होता। शरीर, अहंकार, इन्द्रियाँ, प्राण और दैव, पाँचों मिलते हैं। इसलिए सफलता पर अकेले फूलिए मत, और असफलता पर अकेले टूटिए मत। आप पाँच में से एक हिस्सेदार हैं, पूरे मालिक नहीं।

दूसरी बात। "मारकर भी नहीं मारता", यह उस मनुष्य का वर्णन है जिसका "मैं" सचमुच मिट गया। यह कोई छूट नहीं। व्यास ने युधिष्ठिर से यही कहा था: पछतावे से जलते मन को यह बात ठण्डक देती है, पर ज़िम्मेदारी नहीं छीनती; जो टूटा है, उसे जोड़ने का काम फिर भी करना है।

तीसरी बात। सात्त्विक कर्ता "मैंने किया" नहीं कहता, पर पूरे धैर्य और उत्साह से करता है, और नतीजे के आगे शान्त रहता है। अपनी जुताई पूरी कीजिए, बादल भगवान पर छोड़िए, और अपने को कभी तुच्छ मत समझिए।

आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आपके जीवन में कोई ऐसा समय आया है, जब आपने अपनी पूरी जुताई की, पर बादल नहीं बरसा, और फिर भी आपने अपने को सँभाल लिया? या आप किसी ऐसे आदमी को जानते हैं, जो बहुत करता है, पर कभी नहीं कहता कि "मैंने किया"? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।

आसक्ति छोड़ो, "मैं" मत कहो, धैर्य और उत्साह से करो, और सफलता हो या असफलता, मन को एक-सा रखो। यही सात्त्विक कर्ता है।

जय श्री कृष्ण।

मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः । सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥ २६ ॥
गीता 18.26 — अर्थ पढ़ें ›

तीन बातें

  1. कोई भी काम अकेले आपसे नहीं होता। शरीर, अहंकार, इन्द्रियाँ, प्राण और दैव, पाँचों मिलते हैं। इसलिए सफलता पर अकेले फूलिए मत, और असफलता पर अकेले टूटिए मत। आप पाँच में से एक हिस्सेदार हैं, पूरे मालिक नहीं।
  2. "मारकर भी नहीं मारता", यह उस मनुष्य का वर्णन है जिसका "मैं" सचमुच मिट गया। यह कोई छूट नहीं। व्यास ने युधिष्ठिर से यही कहा था: पछतावे से जलते मन को यह बात ठण्डक देती है, पर ज़िम्मेदारी नहीं छीनती; जो टूटा है, उसे जोड़ने का काम फिर भी करना है।
  3. सात्त्विक कर्ता "मैंने किया" नहीं कहता, पर पूरे धैर्य और उत्साह से करता है, और नतीजे के आगे शान्त रहता है। अपनी जुताई पूरी कीजिए, बादल भगवान पर छोड़िए, और अपने को कभी तुच्छ मत समझिए।