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सत्संग ४८

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असली त्याग क्या है

गीता 18.1–18.12 · 75 मिनट

काम छोड़ना या फल छोड़ना

अर्जुन उवाच संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् । त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥ १ ॥
गीता 18.1 — अर्थ पढ़ें ›
श्रीभगवानुवाच काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः । सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥ २ ॥
गीता 18.2 — अर्थ पढ़ें ›
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः । यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥ ३ ॥
गीता 18.3 — अर्थ पढ़ें ›

असली त्याग क्या है? क्या त्यागी वही है जो घर छोड़कर, सब कुछ छोड़कर, कहीं दूर चला जाए? या ऐसा भी हो सकता है कि कोई आदमी रोज़ सुबह दफ़्तर जाए, बच्चों की फ़ीस भरे, बूढ़े माता-पिता की दवा लाए, घर का हर काम करे, और फिर भी भीतर से सच्चा त्यागी हो? आज का सत्संग इसी प्रश्न पर है। और यह प्रश्न मेरा या आपका नहीं, अर्जुन का है, और गीता में अर्जुन का यह आख़िरी प्रश्न है।

जय श्री कृष्ण।

आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का अड़तालीसवाँ सत्संग है, और आज से गीता का अठारहवाँ अध्याय शुरू होता है, जो गीता का अन्तिम अध्याय है। महाभारत के भीष्म पर्व का बयालीसवाँ अध्याय ही गीता का अठारहवाँ अध्याय है, और उसका नाम है "मोक्षसंन्यासयोग"। और हर बार की तरह याद रखिए कि यह सब हमें सञ्जय सुना रहे हैं, हस्तिनापुर के महल में, अन्धे राजा धृतराष्ट्र को, उस दिन जब भीष्म बाणों की शय्या पर गिर चुके हैं और युद्ध के दस दिन बीत चुके हैं। सोचिए, सत्रह अध्याय सुनाए जा चुके हैं। धृतराष्ट्र अब तक सब सुनते रहे हैं। और अब वह अध्याय आता है जो पूरे उपदेश को एक साथ समेटता है।

पहले याद कर लें कि पिछली बार हम कहाँ रुके थे। सैंतालीसवें सत्संग में हमने सुना था कि तप तीन तरह का होता है, शरीर का, वाणी का और मन का, और दान भी सात्त्विक, राजस और तामस होता है। और फिर श्रीकृष्ण ने ब्रह्म के तीन शब्दों वाले नाम की बात की थी, "ॐ तत् सत्", जो हमारे अधूरे कर्मों को भी पूरा कर देते हैं, बशर्ते श्रद्धा हो। और पिछली बार के अन्त में मैंने कहा था कि अगली बार अर्जुन पूछेंगे कि छोड़ना किसे कहते हैं। आज वही प्रश्न है।

तो आज का पहला श्लोक। "अर्जुन उवाच", अर्जुन ने कहा: "संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्", हे महाबाहो, मैं संन्यास का तत्त्व जानना चाहता हूँ, "त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन", और हे हृषीकेश, हे केशिनिषूदन, त्याग का तत्त्व भी, दोनों को अलग-अलग।

अब पहला प्रश्न तो यही उठता है कि अर्जुन यह पूछ क्यों रहे हैं? सत्रह अध्याय सुन चुके हैं। संन्यास और त्याग, ये दोनों शब्द तो बार-बार आए हैं। हमारी अपनी टीका यही बात कहती है: ये दोनों शब्द पिछले अध्यायों में बार-बार आए हैं, कभी-कभी मानो एक ही अर्थ में, और उपदेश पूरा होने से पहले अर्जुन इन दोनों का भेद पूछते हैं।

श्रीधर स्वामी इसे और खोलकर कहते हैं। वे कहते हैं, कहीं भगवान ने कहा कि सब कर्मों को मन से छोड़कर सुख से रहो, और कहीं कहा कि कर्म करते रहो, बस फल की आसक्ति छोड़ दो। और भगवान, जो सब जानते हैं और परम दयालु हैं, परस्पर उलटी बातें तो कहेंगे नहीं। तो अर्जुन जानना चाहते हैं कि कर्म का छोड़ना और कर्म का करना, ये दोनों एक साथ कैसे सच हो सकते हैं। आपको याद होगा, सोलहवें सत्संग में, पाँचवें अध्याय के आरम्भ में भी अर्जुन ने लगभग यही पूछा था: "संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि", हे कृष्ण, आप कर्मों के संन्यास की भी प्रशंसा करते हैं, और फिर योग की भी। यानी यह प्रश्न अर्जुन के मन में पूरी गीता भर साथ चलता रहा है। और यह कोई कमज़ोरी नहीं। जो विद्यार्थी अन्त में बैठकर सबसे बुनियादी बात फिर से पूछ ले, वही असल में पढ़ रहा होता है।

और लोकमान्य तिलक एक बात जोड़ते हैं जो बड़ी काम की है। वे कहते हैं, ऐसा मत समझिए कि अर्जुन को "छोड़ने" का शब्दकोश वाला अर्थ नहीं पता था। बात यह है कि भगवान ने पूरी गीता में कहीं भी कर्म छोड़ देने की आज्ञा नहीं दी, जबकि उस समय की परम्परा में संन्यास का अर्थ ही था सब कर्म छोड़कर चले जाना। इसलिए अर्जुन साफ़-साफ़ जानना चाहते हैं कि श्रीकृष्ण इन शब्दों को किस अर्थ में बोल रहे हैं।

अब इस श्लोक के सम्बोधन देखिए। एक ही पंक्ति में तीन नाम: महाबाहो, हृषीकेश, केशिनिषूदन। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, इतने सारे सम्बोधन बहुत प्रेम के कारण हैं। और वे इनका एक सुन्दर भेद भी बताते हैं। महाबाहो और केशिनिषूदन, ये बाहर के संकट दूर करने की सामर्थ्य दिखाते हैं। और हृषीकेश, यानी इन्द्रियों के स्वामी, यह भीतर के संकट दूर करने की सामर्थ्य दिखाता है। अर्जुन मानो कह रहे हैं: आपने बाहर के राक्षस मारे हैं, अब मेरे भीतर का यह उलझाव भी काट दीजिए।

और "केशिनिषूदन", केशी को मारने वाले। हमारी टीका बताती है कि केशी घोड़े के रूप वाला एक असुर था, जिसे श्रीकृष्ण ने मारा था। यह कथा हमारे पास हरिवंश में है, और वैशम्पायन इसे सुनाते हैं। मथुरा के राजा कंस ने कृष्ण को मारने के लिए केशी के पास दूत भेजा था। केशी वृन्दावन पहुँचा, और वहाँ उसने ऐसा आतंक मचाया कि पूरा वन श्मशान जैसा हो गया। वह खुरों से धरती चीरता, वृक्ष तोड़ता, ग्वालों और गायों को मार डालता। उस ओर जाने वाला रास्ता सूना हो गया। एक दिन वह गोकुल की बस्ती तक आ पहुँचा। गोप भागे, और स्त्रियाँ बच्चों को लेकर रोती हुई कृष्ण की शरण में आईं। कृष्ण ने उन्हें अभय दिया और केशी की ओर दौड़े। बड़े-बूढ़े गोपों ने रोका: तात, तुम अभी बालक हो, और यह साधारण घोड़ा नहीं, कंस का प्राण है।

केशी ने अगले पैरों से कृष्ण की छाती पर वार किया, और अपने तीखे दाँतों से उनकी भुजा काटी। और तब कृष्ण ने अपनी भुजा को बढ़ाकर उसके खुले मुँह में डाल दिया। केशी न उस भुजा को खा सका, न तोड़ सका। उसके दाँत ढीले होकर गिरने लगे, और अन्त में कृष्ण की भुजा ने भीतर से ही उसे दो टुकड़ों में फाड़ दिया। श्रीधर स्वामी भी इसी बात को ऐसे कहते हैं कि कृष्ण ने अपनी बाईं भुजा उसके मुँह में डाली, वह भुजा उसी क्षण बढ़ गई, और उसने केशी को ककड़ी की तरह चीर दिया। इसीलिए अर्जुन यहाँ "महाबाहो" भी कहते हैं। और हरिवंश बताता है कि उसी समय आकाश से नारद मुनि बोले: क्योंकि केशी तुम्हारे हाथों मारा गया, इसलिए तुम संसार में केशव नाम से प्रसिद्ध होगे।

अब सोचिए, अर्जुन यह नाम इसी समय क्यों याद करते हैं। केशी वह था जिसने रास्ता बन्द कर दिया था, जिसके डर से कोई उस वन में नहीं जाता था। और अर्जुन के मन में भी एक रास्ता बन्द पड़ा है: कर्म करूँ या छोड़ूँ? अर्जुन मानो कह रहे हैं, जिसने वृन्दावन का बन्द रास्ता खोला, वही मेरा यह रास्ता भी खोलेगा।

अब दूसरा श्लोक, जहाँ से श्रीकृष्ण का उत्तर शुरू होता है। "श्रीभगवानुवाच", श्रीभगवान ने कहा: "काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः", ज्ञानी लोग कामना से किए जाने वाले कर्मों के त्याग को संन्यास जानते हैं, "सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः", और विचारशील लोग सब कर्मों के फल के त्याग को त्याग कहते हैं।

हमारी टीका यहाँ बहुत साफ़ बात कहती है: इस श्लोक में दो मत साथ रखे गए हैं। पहले में कुछ कर्म ही छोड़ दिए जाते हैं, वे जो कुछ पाने के लिए किए जाते हैं, जैसे धन के लिए या स्वर्ग के लिए किया गया अनुष्ठान। दूसरे में सब कर्म चलते रहते हैं, पर उनके फल पर अपना दावा छोड़ दिया जाता है।

"काम्य" कर्म किसे कहते हैं, इसे संत ज्ञानेश्वर बड़े प्यार से समझाते हैं। वे कहते हैं, जो कर्म किसी कामना की नींव पर खड़ा होता है, कुआँ, बावड़ी, बाग़, बड़े यज्ञ, तरह-तरह के व्रत, जिनकी जड़ में एक ही बात है, "मुझे यह मिले", वे सब काम्य हैं। और फिर वे एक चेतावनी देते हैं। ऐसा कर्म किया, तो उसका फल भोगना ही पड़ता है, जैसे लिया हुआ कर्ज़ बिना चुकाए नहीं छूटता। और वे कहते हैं, बिना जाने भी मुँह में गुड़ रख दो, तो वह मीठा ही लगेगा; राख समझकर आग पर पैर रख दो, तो वह जलाएगी ही। कामना वाले कर्म में अपना ही एक स्वभाव है कि वह फल देगा और बाँधेगा।

और फिर ज्ञानेश्वर वे कर्म गिनाते हैं जो कामना से नहीं, जीवन की स्थिति से आते हैं। जैसे ग्रहण के दिन का कर्म, माता-पिता की पुण्यतिथि, या घर पर कोई अतिथि आ जाए, ये अवसर से आने वाले कर्म हैं, जिन्हें नैमित्तिक कहते हैं। और सुबह, दोपहर, शाम के जो रोज़ के कर्म हैं, उन्हें वे ऐसा बताते हैं जैसे आँख में देखने की शक्ति, पैर में चलने की, दीपक में रोशनी, और चन्दन में सुगन्ध। यानी वे बाहर से जोड़े नहीं जाते, वे हमारे जीवन का अपना ही रूप हैं।

अब आज की भाषा में कहूँ, तो यह मेरी अपनी ओर से एक उदाहरण है। एक आदमी है जो नौकरी करता है, घर चलाता है, माँ की सेवा करता है। ये उसके नियत कर्म हैं। और उसी आदमी के मन में यह भी चलता है कि पड़ोसी से बड़ी गाड़ी लेनी है, किसी तरह नाम हो जाए, कोई ऐसा अनुष्ठान करवा लूँ कि अगले साल तरक़्क़ी पक्की हो। पहले वाले मत के अनुसार, संन्यास का अर्थ है ये दूसरी तरह के कर्म छोड़ देना। और दूसरे मत के अनुसार, त्याग का अर्थ है कि पहली तरह के कर्म भी पूरे मन से करो, पर उनके फल को अपनी मुट्ठी में मत भींचो।

और यहाँ आचार्यों में एक बड़ा भेद है, जिसे मैं ईमानदारी से आपके सामने रखना चाहता हूँ। शंकराचार्य मानते हैं कि सब कर्मों का पूरा संन्यास उस ज्ञानी के लिए है जिसने आत्मा को जान लिया, और यहाँ जो बात हो रही है वह उन लोगों के लिए है जो अभी कर्म के अधिकारी हैं। रामानुजाचार्य कहते हैं कि संन्यास और त्याग, दोनों का एक ही अर्थ है: करते हुए कर्मों में फल, ममता और कर्तापन का त्याग। और तिलक कहते हैं कि गीता का अपना पक्ष कर्मयोग का है: मृत्यु तक कर्म करते रहो, बस फल की आशा छोड़ दो। हम इनमें से किसी का पक्ष नहीं लेंगे। पर ध्यान दीजिए, तीनों एक बात पर सहमत हैं: जिसे फल की पकड़ अभी है, उसके लिए कर्म छोड़ना रास्ता नहीं है।

और अब तीसरा श्लोक। "त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः", कुछ विचारक कहते हैं कि कर्म को दोष की तरह छोड़ देना चाहिए, "यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे", और दूसरे कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप रूपी कर्म नहीं छोड़ने चाहिए।

हमारी टीका दोनों पक्षों को साफ़ रखती है। पहला पक्ष मानता है कि हर कर्म बाँधता है, क्योंकि अच्छे कर्मों में भी कुछ न कुछ हानि होती ही है, इसलिए साधक को सब कर्म छोड़ देने चाहिए। दूसरा पक्ष मानता है कि यज्ञ, दान और तप जैसे पवित्र कर्तव्य बने रहने चाहिए। श्रीधर स्वामी बताते हैं कि पहला मत सांख्य वालों का था, जिनका तर्क था कि यज्ञ में भी कहीं न कहीं हिंसा हो ही जाती है, और दूसरा मीमांसकों का, जो कहते थे कि वेद ने जो कर्म बताया है उसमें दोष नहीं।

अब "दोषवदित्येके", कुछ कहते हैं कि कर्म दोष वाला है, इस बात पर ज़रा रुकिए। हर कर्म में कुछ न कुछ दोष है, यह बात झूठी नहीं। खाना बनाओ तो धुआँ होता है, खेत जोतो तो कीड़े मरते हैं, किसी को नौकरी दो तो किसी और को नहीं मिलती। पर संत ज्ञानेश्वर यहाँ एक ऐसी बात कहते हैं जो इस पूरे पक्ष की नब्ज़ पकड़ लेती है। वे कहते हैं, जो लोग फल की चाह को नहीं छोड़ पाते, वही कर्म को बन्धन वाला कहते हैं। और फिर तीन चित्र देते हैं। जैसे जीभ का लालची रोगी अपनी बीमारी के लिए भोजन को दोष देता है। जैसे कोढ़ का रोगी अपने शरीर पर नहीं, मक्खियों पर ग़ुस्सा करता है। वैसे ही जो फल की चाह में कमज़ोर हैं, वे कहते हैं कि कर्म ही खोटा है।

और फिर वे दूसरे पक्ष की बात भी अपने चित्रों में कहते हैं। सोने को शुद्ध करना हो तो आग से ऊबना नहीं चाहिए। दर्पण को चमकाना हो तो राख से परहेज़ नहीं करना चाहिए। कपड़े साफ़ करने हों तो धुलाई के मैले पानी से घिन नहीं करनी चाहिए। वैसे ही, कर्म कष्ट देते हैं, यह सोचकर उन्हें दूर नहीं धकेलना चाहिए, क्योंकि मन का मैल उन्हीं से कटता है।

और अब एक बात जो मुझे इस श्लोक में बहुत अपनी-सी लगती है। आपको याद होगा, चौथे सत्संग में, दूसरे अध्याय के पाँचवें श्लोक में, अर्जुन ख़ुद क्या कह रहे थे: "श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके", इन गुरुओं को मारने से अच्छा है कि मैं इस संसार में भीख का अन्न खाकर जी लूँ। यानी गीता का आरम्भ ही इसी पहले पक्ष से हुआ था। अर्जुन को लगा था कि यह कर्म, यह युद्ध, दोष से भरा है, इसलिए इसे छोड़ दूँ। और अब, सत्रह अध्याय बाद, अर्जुन स्वयं पूछ रहे हैं कि छोड़ने का सच्चा अर्थ क्या है। सोचिए, कितनी लम्बी यात्रा है यह।

तो इन तीन श्लोकों से आज के लिए पहली बात यह निकलती है: छोड़ने के बारे में संसार में दो मत हमेशा से रहे हैं। एक कहता है, सब छोड़ दो, क्योंकि हर काम में दोष है। दूसरा कहता है, पवित्र कर्म मत छोड़ो। और हम में से हर एक के भीतर कभी न कभी ये दोनों आवाज़ें उठती हैं, ख़ासकर तब, जब जीवन भारी लगने लगता है।

पर अभी एक बात बाकी है। दो मत तो श्रीकृष्ण ने गिना दिए। पर उनका अपना निश्चय क्या है? अगले श्लोकों में वे कहते हैं, "मेरा निश्चय सुनो"। और वहाँ हम महाभारत के उस दिन में चलेंगे, जब युद्ध जीतकर भी युधिष्ठिर सब छोड़ देना चाहते थे, और उनके एक छोटे भाई ने दो-तीन अक्षरों में ऐसी बात कह दी, जो इस पूरे प्रश्न का उत्तर है।

निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम । त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः ॥ ४ ॥
गीता 18.4 — अर्थ पढ़ें ›
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् । यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥ ५ ॥
गीता 18.5 — अर्थ पढ़ें ›
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च । कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥ ६ ॥
गीता 18.6 — अर्थ पढ़ें ›

चौथा श्लोक। "निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम", हे भरतश्रेष्ठ, त्याग के विषय में मेरा निश्चय सुनो, "त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः", क्योंकि हे पुरुषसिंह, त्याग तीन प्रकार का कहा गया है।

दो मत गिनाने के बाद श्रीकृष्ण कहते हैं, अब "मेरा निश्चय"। यह शब्द ध्यान से सुनिए। अब तक बहस थी, अब फ़ैसला है। श्रीधर स्वामी इस श्लोक में एक सुन्दर बात पकड़ते हैं। वे कहते हैं, श्रीकृष्ण अर्जुन को "पुरुषव्याघ्र" कहकर मानो यह कह रहे हैं: यह मत सोचना कि त्याग तो सब जानते हैं, इसमें सुनने को क्या है। त्याग समझना कठिन है। सच भी है। "छोड़ दो" कहना बहुत आसान है। हम रोज़ किसी न किसी से कहते हैं, "छोड़ो यार, जाने दो।" पर क्या छोड़ना है, और कैसे, यह बहुत कम लोग जानते हैं।

और "त्रिविधः", तीन प्रकार का। हमारी टीका बताती है कि ये तीन प्रकार तामस, राजस और सात्त्विक त्याग हैं, जिनका वर्णन सातवें से नौवें श्लोक में आएगा। पर रामानुजाचार्य यहाँ "तीन" का एक और अर्थ भी देते हैं, जो मुझे बहुत काम का लगता है। वे कहते हैं, त्याग तीन चीज़ों का होता है। पहला, फल का त्याग: इस कर्म से स्वर्ग या कोई और फल मेरा हो, यह भाव छोड़ना। दूसरा, कर्म में ममता का त्याग: यह कर्म मेरा है, यह भाव छोड़ना। और तीसरा, कर्तापन का त्याग: यह मान लेना कि करने वाले असल में सबके स्वामी भगवान हैं, मैं अकेला नहीं। यानी रामानुजाचार्य के लिए त्याग कुछ फेंकना नहीं, तीन गाँठें खोलना है: फल की गाँठ, "मेरा" की गाँठ, और "मैंने किया" की गाँठ।

और संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर कहते हैं, जो सचमुच जागकर अपने को छुड़ाना चाहता है, उसे अपना सब कुछ लगाकर यही एक काम करना है।

और अब, इससे पहले कि हम आगे बढ़ें, एक छोटी-सी बात आपसे कहना चाहता हूँ। अभी तक हमने केवल प्रश्न सुना है और दो पुराने मत। आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। जो आदमी यहीं उठ जाए, वह शायद यह सोचकर जाए कि गीता भी कहती है, सब छोड़ दो, या शायद यह कि गीता कहती है, सब पकड़े रहो। जबकि श्रीकृष्ण का उत्तर इन दोनों से अलग है, और वह आज के इसी सत्संग में पूरा खुलेगा। तो अगर आप यह सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की यह यात्रा बीच में न छूटे। और आज का यह सत्संग आख़िर तक सुनिए।

अब पाँचवाँ श्लोक, जहाँ श्रीकृष्ण का निश्चय पहली बार साफ़ सुनाई देता है। "यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्", यज्ञ, दान और तप रूपी कर्म छोड़ने योग्य नहीं हैं, वे अवश्य करने चाहिए, "यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्", यज्ञ, दान और तप बुद्धिमानों को भी पवित्र करते हैं।

देखिए, पिछले सत्संग में हमने इन्हीं तीन को करने का सही ढंग सुना था, सात्त्विक यज्ञ, सात्त्विक तप, सात्त्विक दान। और अब श्रीकृष्ण कहते हैं, इन्हें कभी छोड़ना मत। और ध्यान दीजिए, वे कहते हैं "मनीषिणाम्", बुद्धिमानों के लिए भी। हमारी टीका इसका कारण बहुत सीधे शब्दों में देती है: जो समझदार हैं उन्हें भी इन तीनों की आवश्यकता है, क्योंकि रोज़ के जीवन से मन पर जो मैल जमता है, उसे ये साफ़ करते रहते हैं।

मुझे यह बात बहुत सच्ची लगती है। हम सोचते हैं कि पूजा, दान, संयम, ये शुरुआत के लोगों के लिए हैं, और जो आगे बढ़ गया उसे इनकी क्या ज़रूरत। पर घर को रोज़ बुहारना पड़ता है, चाहे वह कितना ही अच्छा घर हो। धूल रोज़ आती है, तो झाड़ू भी रोज़ लगती है।

नीलकण्ठ यहाँ एक सुन्दर बात जोड़ते हैं। वे बताते हैं कि यज्ञ और दान गृहस्थ के धर्म हैं, तप वानप्रस्थ का, और जो "कर्म" शब्द है उसे वे ब्रह्मचारी के धर्म की ओर इशारा मानते हैं। यानी इस एक पंक्ति में जीवन के हर पड़ाव के कर्तव्य आ गए। कोई भी उम्र ऐसी नहीं जिसमें मन को धोने की ज़रूरत ख़त्म हो जाए।

और संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर चित्रों की झड़ी लगा देते हैं। वे कहते हैं, जब तक मंज़िल न मिल जाए, यात्री रास्ता नहीं छोड़ता। जब तक पेट न भर जाए, थाली नहीं सरकाई जाती। जब तक नाव किनारे न लग जाए, उसे छोड़ा नहीं जाता। जब तक केला फल न दे दे, पेड़ काटा नहीं जाता। और जब तक खोई हुई चीज़ मिल न जाए, दीया बुझाया नहीं जाता। वैसे ही, जब तक आत्मज्ञान का पक्का निश्चय न हो जाए, यज्ञ, दान, तप से उदासीन नहीं होना चाहिए। और फिर वे एक बड़ी प्यारी बात कहते हैं: तीर्थ बाहर का मैल धोते हैं, और अच्छे कर्म भीतर को उजला करते हैं। इसलिए सच्चे तीर्थ तो अच्छे कर्म ही हैं।

अब छठा श्लोक, और यह इस प्रसंग का सबसे निर्णायक श्लोक है। "एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च", परन्तु ये कर्म भी आसक्ति और फल को छोड़कर करने चाहिए, "कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्", हे पार्थ, यह मेरा निश्चित और उत्तम मत है।

हमारी टीका कहती है, यह श्लोक तीसरे श्लोक की बहस पर श्रीकृष्ण का उत्तर है। और उत्तर क्या है? सुनिए: कर्म रखा जाता है; जो छोड़ा जाता है वह उससे चिपकना और उससे कुछ वापस पाने की चाह है। यानी पहला मत कहता था, कर्म छोड़ो। दूसरा कहता था, कर्म मत छोड़ो। और श्रीकृष्ण कहते हैं, कर्म मत छोड़ो, पर कर्म में से वह चीज़ छोड़ दो जो बाँधती है। बाँधने वाला कर्म नहीं, उसकी पकड़ है।

"सङ्गं" का अर्थ आचार्य अलग-अलग ढंग से खोलते हैं। श्रीधर स्वामी कहते हैं, "मैं करने वाला हूँ" का आग्रह छोड़कर, केवल भगवान की आराधना मानकर कर्म करो। रामानुजाचार्य कहते हैं, कर्म में ममता छोड़ो। और ज्ञानेश्वर इसे ऐसे चित्रों में कहते हैं जो एकदम घर के हैं। जो किसी और के पैसे से, किसी और की ओर से तीर्थयात्रा करने जाता है, उसे यह घमण्ड नहीं होता कि मैं यात्रा कर रहा हूँ। जो पुरोहित किसी यजमान का दान करवाता है, वह स्वयं को दाता नहीं समझता। और फिर वे कहते हैं: फल की आशा पहले ही तोड़कर कर्म शुरू करो, जैसे धाय किसी और के बच्चे को पालती है। जैसे पीपल को कोई फल की आशा से नहीं सींचता। और जैसे गाँव का ग्वाला गाँव भर की गायें चराता है, पर उनके दूध की आस नहीं रखता।

धाय वाला चित्र मुझे बहुत गहरा लगता है। धाय बच्चे को पूरे मन से पालती है। नहलाती है, खिलाती है, रात को जागती है, बीमार हो तो चिन्ता करती है। उसकी सेवा में कोई कमी नहीं। बस भीतर यह जानती है कि बच्चा मेरा नहीं है। कर्म पूरा, पकड़ नहीं। यही छठा श्लोक है।

और अब मैं आपको महाभारत के उस दिन में ले चलता हूँ, जिसकी बात मैंने पिछले खंड के अन्त में की थी। यह शान्ति पर्व में है, और इसे वैशम्पायन राजा जनमेजय को सुनाते हैं। आपको याद होगा, ग्यारहवें सत्संग में हमने देखा था कि युद्ध जीतने के बाद युधिष्ठिर का मन राज्य से उचट गया था। वे कहने लगे थे कि इससे तो अच्छा होता कि हम कहीं भिक्षा माँगकर जी लेते। और तब उनके भाइयों ने और द्रौपदी ने बारी-बारी से उन्हें समझाया। उस दिन हमने केवल इतना कहा था। आज मैं आपको उनमें से दो भाइयों की बात सुनाता हूँ, जो इस श्लोक का सबसे अच्छा भाष्य है।

पहले नकुल। महाभारत उन्हें ऐसे बताता है: चौड़ी छाती वाले, महाबाहु, और कम बोलने वाले। और कम बोलने वाले नकुल ने उस दिन कहा: जो मनुष्य घर छोड़कर वन चला जाता है, वह मूर्ख की तरह जाता है। और फिर उन्होंने वह बात कही जो छठे श्लोक के साथ रखने लायक है: भीतर या बाहर, जो कुछ भी मन में आसक्ति पैदा करता है, उसे छोड़कर मनुष्य त्यागी होता है; केवल छोड़ देने भर से वह स्थिर नहीं होता। सोचिए, यह बात युद्ध के मैदान से लौटे एक योद्धा की है, किसी आश्रम के आचार्य की नहीं।

और फिर सहदेव बोले। उन्होंने शुरुआत ही ऐसे की: हे भारत, बाहर की चीज़ें छोड़ देने से सिद्धि नहीं मिलती। फिर वे बोले: बाहर की चीज़ें छोड़कर भी जिसका मन अपने शरीर के सुखों का लालची है, ऐसा धर्म और ऐसा सुख हमारे शत्रुओं का हो। और जो भीतर की पकड़ छोड़कर पृथ्वी पर राज करता है, ऐसा धर्म और ऐसा सुख हमारे मित्रों का हो।

और फिर सहदेव ने वह बात कही, जो महाभारत के सबसे छोटे और सबसे गहरे वचनों में से है। उन्होंने कहा, मृत्यु दो अक्षर की है, और शाश्वत ब्रह्म तीन अक्षर का। "ममेति द्व्यक्षरो मृत्युर्न ममेति च शाश्वतम्"। "मम", यानी "मेरा", ये दो अक्षर मृत्यु हैं। और "न मम", "मेरा नहीं", ये तीन अक्षर शाश्वत हैं। और फिर सहदेव ने कहा: हे राजन्, वन में रहकर जंगल के अन्न पर जीने वाला भी, अगर उसकी चीज़ों में ममता है, तो वह मृत्यु के मुँह में रहता है।

अब इसे रामानुजाचार्य की उस बात के साथ रखिए, जो हमने अभी चौथे श्लोक पर सुनी: कर्म में ममता का त्याग। सहदेव और रामानुजाचार्य, दोनों एक ही बात कह रहे हैं। त्याग का माप यह नहीं कि आपके पास क्या है, यह है कि आप किस चीज़ को "मेरा" कहकर पकड़े हुए हैं। वन में बैठा आदमी अपनी कुटिया, अपनी माला, अपनी साधना को "मेरी" कहकर भी बँध सकता है। और महल में बैठा राजा, राज्य चलाते हुए भी, "मेरा नहीं" कहकर मुक्त रह सकता है।

और सहदेव ने अपनी बात कैसे ख़त्म की, यह भी सुनिए, क्योंकि उसमें एक बड़ी शिक्षा है। उन्होंने बड़े भाई से कहा: आप मेरे पिता हैं, माता हैं, भाई हैं, गुरु हैं। एक दुखी आदमी की दुख भरी बातों को क्षमा कीजिए। मैंने जो कहा, वह सच हो या ग़लत, इतना जानिए कि भक्ति से कहा है। कितनी बड़ी बात, और कितनी विनम्रता से कही गई।

अब आज के जीवन में यह कैसा दिखता है, यह मैं अपनी ओर से एक उदाहरण देकर कहूँ। एक माँ है, जिसने बेटे को पढ़ाया-लिखाया, बड़ा किया। अब बेटा अपने फ़ैसले ख़ुद लेता है, शायद दूसरे शहर चला गया है। वह माँ अपना कर्तव्य नहीं छोड़ती। फ़ोन करती है, त्योहार पर लड्डू भेजती है, बीमार हो तो दौड़कर जाती है। पर अगर उसके मन में यह गाँठ है कि "मेरा बेटा है, मेरी सुननी चाहिए", तो हर छोटी बात पर उसे चोट लगेगी। और अगर वह यही सब करते हुए मन में कह सके, "यह भगवान का दिया है, मुझे बस सेवा का मौक़ा मिला है", तो कर्म वही रहेगा, पर दुख की जड़ कट जाएगी। यही "सङ्गं त्यक्त्वा" है।

तो इन तीन श्लोकों से यह बात निकलती है: श्रीकृष्ण का निश्चय यह है कि यज्ञ, दान और तप कभी मत छोड़ो, क्योंकि वे मन को धोते हैं। पर उन्हें भी आसक्ति और फल छोड़कर करो। छोड़ना कर्म को नहीं, "मेरा" को है।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने कहा था, त्याग तीन प्रकार का है। सबसे नीचे वाला कौन-सा है? और कोई अपने कर्तव्य को छोड़ दे, और उसे लगे कि वह बहुत बड़ा धर्म कर रहा है, तो? अगले श्लोकों में हम कुछ ऐसे ही नौजवानों से मिलेंगे, जो घर छोड़कर वन चले गए थे, और जिन्हें समझाने के लिए स्वयं इन्द्र एक सुनहरे पक्षी का रूप लेकर आए।

नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते । मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ॥ ७ ॥
गीता 18.7 — अर्थ पढ़ें ›
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् । स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥ ८ ॥
गीता 18.8 — अर्थ पढ़ें ›

सातवाँ श्लोक। "नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते", परन्तु अपने नियत कर्तव्य-कर्म का त्याग उचित नहीं है, "मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः", मोह के कारण उसका त्याग तामस त्याग कहा गया है।

अब त्याग के तीन प्रकार शुरू होते हैं, और श्रीकृष्ण सबसे नीचे वाले से शुरू करते हैं। पहले "नियत" शब्द को समझ लें। हमारी टीका कहती है, नियत कर्म का अर्थ है वे रोज़ के और अवसर पर आने वाले कर्तव्य, जो अपने जीवन की स्थिति के अनुसार बनते हैं। लोकमान्य तिलक भी कहते हैं कि यहाँ "नियत" का वही अर्थ लेना चाहिए जो तीसरे अध्याय के आठवें श्लोक में है, "नियतं कुरु कर्म त्वं", तुम अपना नियत कर्म करो। यानी जो काम आपके हिस्से में आया है, आपके घर में, आपकी नौकरी में, आपके रिश्तों में, वही आपका नियत कर्म है।

और फिर हमारी टीका एक ऐसी बात कहती है जिसे मैं चाहूँगा कि आप याद रख लें: भ्रम से उन्हें छोड़ देना, लापरवाही को ही आध्यात्मिकता समझना, सबसे निचले प्रकार का त्याग है। शंकराचार्य इसमें एक तर्क की बात देखते हैं। वे कहते हैं, "नियत" का अर्थ ही है जिसे अवश्य करना है। और जिसे अवश्य करना है, उसी को छोड़ दिया, यह तो अपने आप में उलटी बात है। ऐसा उलटा काम मोह से ही होता है, और मोह तमोगुण है। रामानुजाचार्य यहाँ तीसरे अध्याय की ही एक और पंक्ति याद दिलाते हैं: "शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः", कर्म न करने से तो तुम्हारे शरीर का निर्वाह भी नहीं होगा। और वे आगे के एक श्लोक की ओर इशारा करते हैं, जहाँ श्रीकृष्ण तामसी बुद्धि को ऐसी बुद्धि कहेंगे जो अधर्म को धर्म मान लेती है।

संत ज्ञानेश्वर इस तामस त्याग को ऐसे चित्रों में दिखाते हैं कि उसका उलटापन आँख के सामने आ जाता है। वे कहते हैं, यह वैसा है जैसे अँधेरे से चिढ़कर कोई अपनी ही आँखों में नाख़ून गड़ा ले। जैसे सिर दर्द से नाराज़ होकर कोई सिर ही काट दे। और वे पूछते हैं, रास्ता ऊबड़-खाबड़ है, तो उसे पैर ही पार कराएँगे, या रास्ते के अपराध पर पैर ही काट दोगे? भूखे के सामने भोजन आया, और ज़रा गरम था, तो क्या वह थाली को लात मार देगा? वैसे ही कर्म की कठिनाई कर्म करने के सही ढंग से पार होती है, कर्म छोड़ने से नहीं। पर तामसी आदमी भ्रम के नशे में यह नहीं जानता।

और अब महाभारत का वह प्रसंग, जिसकी बात मैंने पिछले खंड के अन्त में की थी। हम उसी दिन में हैं, युद्ध के बाद, जब युधिष्ठिर सब छोड़ देना चाहते थे। उस दिन नकुल और सहदेव से पहले अर्जुन बोले थे, और अर्जुन ने एक पुरानी कथा सुनाई। सोचिए, कौन सुना रहा है। वही अर्जुन, जिसने कुरुक्षेत्र में ख़ुद कहा था कि भीख माँगकर जी लूँगा, और जिसने उसके बाद पूरी गीता सुनी। आज वही अर्जुन अपने बड़े भाई को समझा रहे हैं।

अर्जुन ने कहा: कुछ नादान ब्राह्मण युवक थे, जिनकी अभी दाढ़ी-मूँछ भी नहीं आई थी, अच्छे और समृद्ध घरों में जन्मे। उन्होंने सोचा, वन में तो सुख से जिया जा सकता है, और घर छोड़कर संन्यास लेकर वन में निकल आए। और महाभारत उनके बारे में एक बात कहता है जो इस पूरे श्लोक की चाबी है: "धर्मोऽयमिति मन्वानाः", "यह धर्म है", ऐसा मानकर उन्होंने अपने भाइयों को और माता-पिता को छोड़ दिया। और इन्द्र को उन पर दया आ गई।

इन्द्र एक सुनहरा पक्षी बनकर उनके पास आए, और बोले: यज्ञ से बचा हुआ अन्न खाने वाले जो करते हैं, वह मनुष्यों के लिए बहुत कठिन है। उनका कर्म पुण्य वाला है, उनका जीवन सराहा गया है। वे युवक आपस में बोले: अरे, यह पक्षी बचा हुआ खाने वालों की प्रशंसा कर रहा है। निश्चय ही यह हमारी बात कर रहा है, क्योंकि हम भी तो बचा-खुचा ही खाते हैं। और पक्षी ने उत्तर दिया: मैं आपकी प्रशंसा नहीं कर रहा। आप तो कीचड़ से सने, धूल से भरे, भ्रम में पड़े, जूठन खाने वाले हैं। यज्ञ का बचा अन्न खाने वाले दूसरे हैं।

तब उन युवकों की आँखें खुलीं। उन्होंने कहा, हमने तो इसी को सबसे बड़ा कल्याण मान लिया था। हे पक्षी, बताओ कि सच्चा कल्याण क्या है, हम तुम पर विश्वास करते हैं। और पक्षी ने उन्हें समझाया कि जो लोग कर्म की निन्दा करते हुए ग़लत रास्ते पर चले जाते हैं, उनका पाप उन्हीं पर रहता है। फिर कहा, गृहस्थ का धर्म निभाना कठिन है, और वही सब प्राणियों का आधार है। और फिर उसने बताया कि असल में "विघसाशी" कौन है: जो सुबह-शाम अपने घर में विधि से अन्न बाँटते हैं, अतिथियों को, देवताओं को, पितरों को और अपने लोगों को देकर, जो बचा है वह खाते हैं, उन्हें विघसाशी कहते हैं।

आपको याद होगा, छियालीसवें सत्संग में भीष्म के मुँह से भी हमने यही शब्द सुना था, विघसाशी, जो सबको खिलाकर बचा हुआ खाता है, वह केवल अमृत खाता है। और अर्जुन की कथा कहती है कि यह धर्म और अर्थ से भरी बात सुनकर उन युवकों ने अपनी उलटी बुद्धि छोड़ दी, और गृहस्थ धर्म को अपना लिया। और अर्जुन ने कथा के अन्त में भाई से कहा: इसलिए आप भी धीरज रखिए, और इस पृथ्वी पर राज कीजिए।

अब इस कथा को सातवें श्लोक के साथ रखिए। उन युवकों ने क्या छोड़ा था? माता-पिता की सेवा, भाइयों का साथ, घर का धर्म। यानी अपने नियत कर्म। और किस भाव से? "यह धर्म है", यह मानकर। यही मोह है। मोह का अर्थ केवल किसी चीज़ से चिपकना नहीं। मोह का अर्थ है उलटा देखना, अधर्म को धर्म समझ लेना। और जो त्याग इस उलटे देखने से निकले, उसे श्रीकृष्ण तामस त्याग कहते हैं। और ध्यान दीजिए, पक्षी ने उनसे घर का काम छीना नहीं, उन्हें घर लौटाया। और वहाँ उन्हें बचा हुआ खाना था, पर अब दूसरों को खिलाकर।

अब आठवाँ श्लोक। "दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्", जो कर्म को दुःख रूप समझकर, शरीर के कष्ट के डर से छोड़ देता है, "स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्", वह राजस त्याग करता है, और उसे त्याग का फल बिल्कुल नहीं मिलता।

यह दूसरा प्रकार पहले से अलग है। यहाँ आदमी भ्रम में नहीं है। वह जानता है कि यह काम उसका है। पर काम भारी लगता है, थकाता है, दुख देता है, और इसलिए वह उसे छोड़ देता है। हमारी टीका इसकी पहचान एक वाक्य में कर देती है: यह त्याग वैराग्य जैसा दिखता है, पर वास्तव में आराम की इच्छा है। सच्चे त्याग का फल, शान्ति और मुक्ति, इससे नहीं मिलता।

रामानुजाचार्य इसे बहुत बारीकी से खोलते हैं। वे कहते हैं, कोई सोचता है कि यह कर्म धन कमाने के कष्ट से होता है, बहुत मेहनत माँगता है, शरीर को थकाता है, मन को निढाल करता है, तो इसे छोड़कर मैं केवल ज्ञान के अभ्यास में लग जाऊँ। सुनने में यह कितनी ऊँची बात लगती है। पर रामानुजाचार्य कहते हैं, यह राजस त्याग है, और इससे वह ज्ञान भी नहीं मिलता जिसके लिए कर्म छोड़ा गया था। और श्रीधर स्वामी इसके नाम का कारण बताते हैं: दुःख रजोगुण का ही रूप है, इसलिए दुःख से भागकर किया गया त्याग राजस है।

संत ज्ञानेश्वर यहाँ भी चित्र देते हैं। वे कहते हैं, कर्म का पहला सिरा कड़वा होता है, जैसे नीम जीभ पर कड़वा लगता है, जैसे गाय के सींग से डर लगता है, और जैसे भोजन का सुख महँगा पड़ता है, क्योंकि पहले खाना पकाना पड़ता है। और फिर वे उस आदमी के मन की बात कहते हैं: यह शरीर तो बड़े भाग्य से मिला है, इसे पापी की तरह कर्मों में क्यों पीसूँ? जो हाथ में है, आज वही क्यों न भोग लूँ? और ज्ञानेश्वर कहते हैं, ऐसे आदमी का कर्म छूट तो जाता है, पर त्याग का फल नहीं मिलता। जैसे चूल्हे पर रखा दूध उफनकर आग में गिर जाए, तो आग में तो गया, पर उसे होम कोई नहीं कहता।

और अब, उसी दिन की ओर एक बार और लौटिए, क्योंकि आठवाँ श्लोक भी वहाँ खड़ा है। युधिष्ठिर ने भाइयों से कहा था कि वन में मैं कैसे जीऊँगा। और उनके शब्द इतने सुन्दर हैं कि सुनकर लगता है, कोई महान संन्यासी बोल रहा है। उन्होंने कहा: मैं वन में फल-मूल खाकर हिरनों के साथ रहूँगा। ठंड, हवा, धूप, भूख, प्यास सहूँगा। पक्षियों की आवाज़ें सुनूँगा, फूलों की गन्ध सूँघूँगा। किसी पेड़ के नीचे एक दिन रहूँगा, सूने घरों में सोऊँगा। न निन्दा से दुख होगा, न प्रशंसा से सुख। कोई मेरी एक भुजा बसूले से काटे, और कोई दूसरी पर चन्दन लगाए, तो दोनों में से किसी का न बुरा सोचूँगा, न भला। यही चित्र सोलहवें सत्संग में पाण्डु के मुँह से भी आया था।

सुनिए, ये तो वही लक्षण हैं जो गीता में श्रीकृष्ण ने अपने प्रिय भक्त के बताए थे, निन्दा और स्तुति में समान। फिर भाइयों ने इसे क्यों नहीं माना? क्योंकि उसी अध्याय में युधिष्ठिर अपने मन की असली जड़ भी कह देते हैं। वे कहते हैं: तृष्णा ने अज्ञान में मुझसे बहुत बड़ा पाप करवाया। यानी यह संन्यास शान्त, साफ़ समझ से नहीं, युद्ध के दुःख से, अपनों की मृत्यु के बोझ से निकल रहा था। "दुःखमित्येव", दुःख समझकर। ग्यारहवें सत्संग में हमने सुना था कि इसी बहस में अर्जुन ने राजा जनक की कथा भी सुनाई थी, जो राज्य छोड़कर भिक्षा पर जीने लगे थे, और उनकी रानी ने उनसे कहा था कि आपकी प्रतिज्ञा कुछ और है और आचरण कुछ और।

और यहाँ मैं एक बात बहुत सँभलकर कहना चाहता हूँ। युधिष्ठिर का दुःख सच्चा था, और बड़ा था। उसे छोटा करके देखना हमारा काम नहीं। पर आठवाँ श्लोक हमें इतना सिखाता है कि जो त्याग दुःख से भागने के लिए हो, वह दुःख को साथ ही ले जाता है। वन में भी वह बोझ साथ जाता। इसीलिए भाइयों ने कहा, यह बोझ यहीं, अपने कर्तव्य में, धर्म से राज्य चलाकर उतारिए।

अब आज के जीवन में यह कैसा दिखता है, यह मेरी अपनी ओर से एक उदाहरण है। किसी के घर में बूढ़े पिता बीमार हैं, रात-रात जागना पड़ता है, दवा, अस्पताल, सब। और थककर वह सोचने लगता है, मैं तो सब मोह-माया से ऊपर उठना चाहता हूँ, मुझे कुछ दिन अकेले कहीं जाकर ध्यान करना है। कुछ दिन का विश्राम लेना ग़लत नहीं, शरीर और मन को उसकी ज़रूरत होती है। पर अगर भीतर की असली बात यह है कि "यह सेवा मुझसे नहीं होती", और उसे हम वैराग्य का नाम दे दें, तो यही राजस त्याग है। श्रीकृष्ण उस थकान को डाँटते नहीं। बस इतना कहते हैं कि इसे त्याग मत कहो, क्योंकि इससे त्याग का फल, शान्ति, नहीं मिलेगी।

तो इन दो श्लोकों से यह बात निकलती है: अपने कर्तव्य को छोड़ने के दो ग़लत कारण होते हैं। एक मोह, जिसमें हम अधर्म को धर्म समझ लेते हैं। दूसरा दुःख का डर, जिसमें हम आराम की इच्छा को वैराग्य समझ लेते हैं। दोनों में कर्म छूट जाता है, पर बन्धन नहीं छूटता।

पर अभी एक बात बाकी है। अगर ये दोनों ग़लत हैं, तो सच्चा त्याग कैसा दिखता है? अगले श्लोकों में श्रीकृष्ण उसका रूप बताते हैं। और वहाँ मैं आपको कुरुक्षेत्र का एक ऐसा दृश्य दिखाऊँगा, जिसे देखकर शत्रु सेना भी चकित रह गई थी: युद्ध के बीच, बाणों की बौछार में, श्रीकृष्ण स्वयं रथ से उतरकर घोड़ों की सेवा कर रहे थे।

कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन । सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥ ९ ॥
गीता 18.9 — अर्थ पढ़ें ›
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते । त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥ १० ॥
गीता 18.10 — अर्थ पढ़ें ›

नौवाँ श्लोक। "कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन", हे अर्जुन, जब नियत कर्म केवल इसलिए किया जाता है कि उसे करना ही है, "सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः", और आसक्ति तथा फल भी छोड़ दिए जाते हैं, तो वह त्याग सात्त्विक माना गया है।

यह आज के सत्संग का हृदय है, और मैं चाहूँगा कि आप इसे धीरे-धीरे सुनें। हमारी टीका इस श्लोक पर कहती है: यहाँ बाहर से कुछ नहीं छोड़ा जाता; काम पूरा किया जाता है। जो छोड़ा जाता है वह भीतर का है। और फिर वह कहती है: यही अर्जुन के प्रश्न का उत्तर है। सच्चा त्याग आसक्ति और फल का है, कर्म का नहीं।

सोचिए, कितनी सुन्दर बात है। पहले दो त्यागों में कर्म छूट गया था, और भीतर की गाँठ वहीं की वहीं रही। और यहाँ, तीसरे में, कर्म वहीं का वहीं है, और भीतर की गाँठ छूट गई। बाहर से देखने वाले को यह आदमी कुछ भी छोड़ता हुआ नहीं दिखेगा। वह रोज़ की तरह दफ़्तर जाएगा, घर चलाएगा, पूजा करेगा। पर भीतर वह सबसे बड़ा त्यागी है।

"कार्यमित्येव", यानी "यह करना है, बस इसीलिए"। शंकराचार्य यहाँ एक बारीक बात पकड़ते हैं। कोई कहे, रोज़ के कर्मों का तो कोई फल बताया ही नहीं गया, फिर उनका फल छोड़ने की बात क्यों? शंकराचार्य कहते हैं, अज्ञानी मन फिर भी कोई फल गढ़ ही लेता है: इससे मेरा संस्कार बनेगा, या न करने का पाप नहीं लगेगा। भगवान उस गढ़े हुए फल को भी छोड़ने को कहते हैं।

और मधुसूदन सरस्वती यहाँ आपस्तम्ब की एक पुरानी उपमा देते हैं, जो मुझे बहुत प्यारी लगती है। जब कोई आम का पेड़ फल के लिए लगाता है, तो छाया और सुगन्ध अपने आप साथ आ जाती हैं। वैसे ही धर्म का पालन करो, तो उसके साथ बहुत से लाभ अपने आप आते हैं। बस उन लाभों के लिए धर्म मत करो। पेड़ लगाओ, क्योंकि पेड़ लगाना है।

संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर कहते हैं, अपने हिस्से में स्वभाव से जो कर्म आया है, उसे पूरी विधि और पूरे आदर से, सँवारकर करो। पर "यह मैं कर रहा हूँ", यह याद मन से छोड़ दो, और फल की आशा को पानी दे दो, यानी उसे विदा कर दो। और फिर वे एक चित्र देते हैं जो सीधे घर के भीतर ले आता है। वे कहते हैं, माँ के प्रति दो बातें मनुष्य को गिराती हैं: एक उसका अनादर, और दूसरी उससे कुछ पाने की कामना। तो ये दोनों छोड़ दो, और फिर माँ की सेवा करो। माँ की सेवा नहीं छोड़नी है, बस उसके साथ आई दो ग़लत चीज़ें छोड़नी हैं। और वे पूछते हैं, किसी प्यारे फल में छिलका और गुठली बेकार होते हैं, तो क्या उनके कारण कोई पूरा फल फेंक देता है? छिलका और गुठली फेंको, फल खाओ। कर्म रखो, आसक्ति फेंको।

अब दसवाँ श्लोक, जिसमें इस सात्त्विक त्यागी की पहचान दी गई है। "न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते", वह अप्रिय कर्म से द्वेष नहीं करता और प्रिय कर्म में आसक्त नहीं होता, "त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः", ऐसा त्यागी सत्त्वगुण से भरा, बुद्धिमान, और संशयों से मुक्त होता है।

हमारी टीका कहती है, सात्त्विक त्याग की पहचान अपने काम के प्रति समभाव है: कोई कर्तव्य कठिन या नीरस होने से टाला नहीं जाता, और सुखद होने से पकड़ा नहीं जाता। और श्रीधर स्वामी इसका ऐसा उदाहरण देते हैं कि आप मुस्करा देंगे। वे कहते हैं, जाड़े में सुबह-सुबह का स्नान, जो दुख देता है, उससे वह द्वेष नहीं करता। और गर्मी में दोपहर का स्नान, जो सुख देता है, उसमें वह रस नहीं ढूँढता। सच कहूँ, दिसम्बर की सुबह ठण्डे पानी का लोटा उठाते हुए इस श्लोक को याद करना भी एक साधना है।

और नीलकण्ठ इस श्लोक की बनावट में एक बड़ी सुन्दर बात देखते हैं। वे कहते हैं, इसका हर शब्द किसी एक ग़लत त्याग को अलग करता है। "त्यागी" शब्द उसे अलग करता है जो कुछ भी नहीं छोड़ता। "मेधावी", बुद्धिमान, उसे अलग करता है जिसने मोह से त्याग किया, यानी तामस त्यागी। और पहली पंक्ति, जिसमें न अप्रिय से द्वेष है, न प्रिय में राग, वह उसे अलग करती है जिसने शरीर के कष्ट के डर से कर्म छोड़ा, यानी राजस त्यागी। यानी यह एक श्लोक पिछले दोनों श्लोकों का उत्तर अपने भीतर रखे हुए है।

अब मैं आपको वह दृश्य दिखाता हूँ जिसकी बात मैंने पिछले खंड के अन्त में की थी। यह द्रोण पर्व में है, और इसे भी वही सञ्जय सुना रहे हैं, उसी राजा धृतराष्ट्र को। यह जयद्रथ के वध वाला दिन है। अर्जुन ने प्रतिज्ञा की है कि सूर्य डूबने से पहले वे सिन्धुराज जयद्रथ को मारेंगे, और श्रीकृष्ण उनका रथ कौरव सेना के बीच से ऐसे निकाल रहे हैं कि सारा संसार चकित है। पर दिन ढलने लगा है, और घोड़े थक गए हैं। सञ्जय कहते हैं, भूख और प्यास से पीड़ित उत्तम घोड़ों ने कठिनाई से रथ खींचा। शस्त्रों से बार-बार घायल होकर, थकान से भरकर, हवा जैसे तेज़ वे घोड़े धीमे पड़ गए।

तब अर्जुन ने मुस्कराते हुए श्रीकृष्ण से कहा: घोड़े बाणों से पीड़ित और थके हैं, और जयद्रथ दूर है। मेरा विचार है, हे माधव, घोड़ों को खोलकर आराम से उनके बाण निकाल दीजिए। मैं सब सेनाओं को रोके रखूँगा। श्रीकृष्ण ने कहा, जो तुमने कहा, वही मेरा भी मत है। और अर्जुन गाण्डीव लेकर रथ से उतरे, और धरती पर अचल पर्वत की तरह खड़े हो गए। कौरव योद्धाओं ने सोचा, यही अवसर है, और चारों ओर से टूट पड़े।

और यहाँ धृतराष्ट्र स्वयं बीच में पूछते हैं: जब अर्जुन धरती पर थे और केशव घोड़ों को सँभाल रहे थे, ऐसा अवसर पाकर भी पार्थ मारे कैसे नहीं गए? सञ्जय उत्तर देते हैं कि धरती पर खड़े होकर भी उस पार्थ ने रथों पर बैठे सब राजाओं को अकेले रोक दिया।

तब श्रीकृष्ण ने शान्त भाव से कहा: अर्जुन, यहाँ घोड़ों के लिए पानी नहीं है, और इन्हें पीने का पानी चाहिए। अर्जुन ने कहा, "यह रहा", और अस्त्र से धरती को बेधकर घोड़ों के लिए एक सुन्दर सरोवर बना दिया, निर्मल जल और खिले कमलों वाला। फिर बाणों के खम्भों और बाणों की छत वाला एक घर बना दिया। और श्रीकृष्ण हँसकर बोले, "बहुत अच्छा, बहुत अच्छा"।

और अब वह क्षण, जिसके लिए मैंने यह प्रसंग चुना। सञ्जय कहते हैं, महातेजस्वी वासुदेव तुरन्त रथ से उतरे, और बाणों से पीड़ित घोड़ों को खोल दिया। फिर बाणों के उस घर के भीतर, सब सेनाओं के देखते-देखते, कमलनयन श्रीकृष्ण ने शान्त भाव से घोड़ों की सेवा की। उन्हें धरती पर लोटाया, फिर उठाया, अपने हाथों से उनका शरीर मला, अपने हाथों से उनके शरीर में धँसे बाण निकाले, उन्हें धीरे-धीरे फिराया, और पानी पिलाया। घोड़ों की थकान, कमज़ोरी, झाग, काँपना और घाव, सब दूर कर दिए। और जब घोड़े पानी पीकर, नहाकर, खाकर, फिर से ताज़े हो गए, तो उन्होंने शास्त्र की विधि से उन्हें फिर रथ में जोता।

और सञ्जय बताते हैं कि कौरव योद्धा आपस में कह रहे थे: संसार में इससे बड़ा आश्चर्य क्या होगा, या पहले कब हुआ है, कि युद्ध के बीच पार्थ और गोविन्द ने घोड़ों को पानी पिलाया?

अब इस दृश्य को दसवें श्लोक के साथ रखिए। "न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म", वह अप्रिय कर्म से द्वेष नहीं करता। घोड़े मलना, उनके घाव साफ़ करना, उनके शरीर से बाण खींचना, यह सबसे छोटा, सबसे थका देने वाला काम है। सारथी का, बल्कि साईस का काम। और यह काम कौन कर रहा है? वह, जिसने युद्ध के आरम्भ में इसी अर्जुन को अपना विश्वरूप दिखाया था। वह, जिसके बारे में हम पूरी गीता में सुनते आए हैं कि वह सब लोकों का स्वामी है। और कैसे कर रहा है? शान्त भाव से। कोई जल्दी नहीं, कोई खीज नहीं। बाणों की बौछार चल रही है, सूरज ढल रहा है, प्रतिज्ञा का समय निकल रहा है, और श्रीकृष्ण घोड़े के घाव ऐसे साफ़ कर रहे हैं जैसे संसार में उस क्षण इससे ज़रूरी कोई काम नहीं।

यही "कार्यमित्येव" है। यह करना है, इसलिए पूरे मन से कर रहे हैं। न यह भाव कि यह काम मेरे योग्य नहीं, न यह कि इससे मेरी कोई बड़ाई होगी। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो सिखाया था, कुरुक्षेत्र में उसे स्वयं जीकर दिखा रहे हैं।

अब आज के जीवन में यह कैसा दिखता है, यह मैं अपनी ओर से एक उदाहरण देकर कहूँ। एक दफ़्तर है, और उसमें एक अनुभवी अधिकारी है। एक दिन बड़ी प्रस्तुति है, और ठीक उससे पहले कमरे का प्रोजेक्टर नहीं चल रहा, तार उलझे पड़े हैं, कुर्सियाँ बिखरी हैं। एक आदमी कहेगा, यह मेरा काम नहीं, किसी और को बुलाओ। और दूसरा चुपचाप घुटनों के बल बैठकर तार सुलझाने लगेगा, क्योंकि अभी यही करना है। उसके लिए प्रस्तुति देना कुशल कर्म है, और तार सुलझाना अकुशल। पर दोनों उसके लिए एक ही हैं। जो करना है, वही कर रहा है।

तो इन दो श्लोकों से यह बात निकलती है: सात्त्विक त्याग में बाहर से कुछ नहीं छूटता। काम पूरा होता है, पूरे आदर से। जो छूटता है, वह है "मैं कर रहा हूँ" का भाव, और "मुझे इससे क्या मिलेगा" की गाँठ। और इसकी पहचान यह है कि छोटा काम हो या बड़ा, प्रिय हो या अप्रिय, मन उसमें बराबर रहता है।

पर अभी एक बात बाकी है। कोई कह सकता है, यह सब तो ठीक है, पर अगर मैं सचमुच सब कुछ छोड़ दूँ, हर कर्म, तो क्या वह इससे भी ऊँचा त्याग नहीं होगा? अगले श्लोक में श्रीकृष्ण एक ऐसी बात कहते हैं जो इस प्रश्न को जड़ से काट देती है। और वहाँ भीम का एक वाक्य हमें याद आएगा, पहाड़ों और पेड़ों के बारे में।

न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः । यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥ ११ ॥
गीता 18.11 — अर्थ पढ़ें ›
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् । भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ॥ १२ ॥
गीता 18.12 — अर्थ पढ़ें ›

ग्यारहवाँ श्लोक। "न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः", क्योंकि देहधारी मनुष्य कर्मों को पूरी तरह नहीं छोड़ सकता, "यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते", परन्तु जो कर्मफल का त्याग करता है, वही त्यागी कहलाता है।

हमारी टीका इस पर इतनी सीधी बात कहती है कि उसके आगे कुछ जोड़ना कठिन है: साँस लेना, खाना और चुपचाप बैठना भी कर्म है। जब तक शरीर है, कर्म समाप्त नहीं हो सकता, इसलिए त्याग का अर्थ वह होना चाहिए जो सचमुच किया जा सके: फल को छोड़ना। श्रीधर स्वामी यहाँ तीसरे अध्याय की पंक्ति याद दिलाते हैं: "न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्", कोई भी एक क्षण भी बिना कर्म किए नहीं रहता।

और यहाँ भी आचार्यों का भेद आपके सामने रख दूँ। शंकराचार्य "देहभृत्" का अर्थ करते हैं, वह जो शरीर को ही "मैं" मानता है। ऐसा व्यक्ति सब कर्म नहीं छोड़ सकता; सब कर्मों का पूरा संन्यास वही कर सकता है जिसने आत्मा को जान लिया। रामानुजाचार्य कहते हैं, शरीर को चलाने के लिए खाना-पीना और उससे जुड़े कर्म तो छूट ही नहीं सकते। दोनों रास्ते अलग हैं, पर हम जैसे लोगों के लिए दोनों का निष्कर्ष एक है: आज, इसी शरीर में, जो त्याग हमारे हाथ में है, वह फल का त्याग है।

संत ज्ञानेश्वर इस पर कहते हैं, जो देह पाकर कर्म से ऊबते हैं, वे भोले हैं। मिट्टी का घड़ा मिट्टी को छोड़कर कहाँ जाएगा? आग अपनी गर्मी से ऊबे, या दीया अपनी रोशनी से द्वेष करे, तो कैसे चलेगा? पानी गीलापन छोड़ दे, तो पानी कहाँ रहेगा? और वे कहते हैं, सोते हुए भी साँस चलती रहती है। जिसे हम कुछ न करना कहते हैं, वह भी एक करना ही है। और फिर वे कहते हैं, कर्म छोड़कर उसे विश्राम कहना वैसा है जैसे कोई रोगी अपनी बेहोशी को ही आराम का नाम दे दे।

और अब उसी दिन की ओर आख़िरी बार लौटिए। उस बहस में भीम भी बोले थे, और भीम की ज़ुबान, आप जानते हैं, नरम नहीं थी। उन्होंने बड़े भाई से बहुत कड़ी बातें कहीं, जिन्हें मैं यहाँ नहीं दोहराऊँगा। पर उनमें एक वाक्य ऐसा था जो इस श्लोक का सीधा चित्र है। भीम ने कहा: यदि कोई राजा संन्यास से ही सिद्धि पा लेता, तो पहाड़ और पेड़ तो बहुत जल्दी सिद्धि पा लेते। ये तो सदा त्यागी दिखते हैं, किसी को नहीं सताते, इनके पास कोई सामान नहीं, और ये सदा ब्रह्मचारी हैं। और भीम ने अपनी बात इस पर समाप्त की: देखिए, सारा संसार अपने-अपने कर्म में लगा है; इसलिए कर्म ही करना चाहिए, बिना कर्म के सिद्धि नहीं।

अब सोचिए, अगर केवल कुछ न करना ही त्याग होता, तो सबसे बड़ा त्यागी हिमालय का कोई पत्थर होता। पर पत्थर को कोई त्यागी नहीं कहता, क्योंकि उसके पास छोड़ने को कुछ था ही नहीं। त्याग वहीं है जहाँ पकड़ने का मन हो सकता था, और आपने नहीं पकड़ा। और यह अवसर हमें रोज़ के कर्म में ही मिलता है।

और अब बारहवाँ श्लोक। "अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्", कर्म का फल तीन प्रकार का होता है, अनिष्ट, इष्ट और मिश्रित, "भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित्", यह मरने के बाद उन्हें मिलता है जिन्होंने त्याग नहीं किया, पर संन्यासियों को कभी नहीं मिलता।

हमारी टीका इन तीन फलों को खोलती है: अनिष्ट फल दुःख वाली योनि में जन्म है, इष्ट फल सुख वाली योनि में जन्म, और मिश्रित फल सुख-दुःख दोनों वाला मनुष्य-जीवन। जिसने फल छोड़ दिया, उसके कर्म उसे इनमें से किसी में नहीं ले जाते। ध्यान दीजिए, यहाँ अच्छा फल भी बन्धन की सूची में है। आपको याद होगा, सोलहवें सत्संग में मुद्गल ऋषि ने स्वर्ग का विमान लौटा दिया था, क्योंकि उन्होंने सुना था कि वहाँ केवल पहले के कर्मों का फल भोगा जाता है, और वह पुण्य ख़त्म होने पर गिरना पड़ता है। इष्ट फल भी आख़िर फल ही है।

और अब श्रीधर स्वामी इस श्लोक पर एक ऐसी बात कहते हैं जिससे आज का पूरा प्रश्न अपने आप हल हो जाता है। वे कहते हैं, यहाँ "संन्यासी" शब्द में वे लोग भी आते हैं जो कर्म करते हुए उसका फल छोड़ते हैं, और इसके प्रमाण में वे छठे अध्याय का पहला श्लोक रखते हैं: "अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः। स संन्यासी च योगी च", जो कर्मफल का आश्रय लिए बिना करने योग्य कर्म करता है, वही संन्यासी है और वही योगी। अर्जुन ने पूछा था, संन्यास और त्याग में भेद क्या है। और यात्रा के अन्त में दोनों शब्द एक ही आदमी पर आकर मिल जाते हैं: वह जो कर्म करता है और फल छोड़ता है।

संत ज्ञानेश्वर यहाँ खेती का एक चित्र देते हैं। बाली से दाना झड़ता है, धरती में गिरता है, उगता है, फिर बाली बनता है, फिर दाना झड़ता है। फल भोगने से नया फल पैदा होता है, और यह चक्र चलता रहता है। पर जब बीज ही ख़त्म हो जाए, तो खेती का काम अपने आप पूरा हो जाता है। फल का त्याग उसी बीज को ख़त्म करना है।

तो इन दो श्लोकों से यह बात निकलती है: जब तक यह शरीर है, कर्म रहेगा, और इसमें कोई लज्जा नहीं। गृहस्थ होना, नौकरी करना, घर चलाना, त्याग के रास्ते में बाधा नहीं। जो कर्मफल छोड़ता है, वही त्यागी है, वह चाहे वन में हो या आपकी तरह किसी शहर के छोटे-से घर में।

पर एक प्रश्न अब भी बचा है। फल छोड़ना कठिन क्यों लगता है? क्योंकि भीतर कहीं यह भाव बैठा है कि "मैंने किया", तो फल भी "मेरा" होना चाहिए। अगले सत्संग में श्रीकृष्ण इसी "मैंने किया" को खोलेंगे: "पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे", हे महाबाहो, मुझसे कर्म के पाँच कारण जानो। कोई भी काम अकेले "मुझसे" नहीं होता। वह कैसे, यह अगली बार।

तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली बात। त्याग कर्म का नहीं, उसकी पकड़ का होता है। यज्ञ, दान, तप और अपने रोज़ के कर्तव्य कभी मत छोड़िए, क्योंकि वे मन का मैल धोते हैं। छोड़ना है "मम", मेरा, और रखना है "न मम"।

दूसरी बात। जब मन कोई कर्तव्य छोड़ने को कहे, तो पूछिए, यह कहाँ से आ रहा है? अगर यह भ्रम से है, कि अधर्म को धर्म समझ लिया, तो वह तामस है। अगर यह थकान और दुःख से भागना है, तो वह राजस है। थकान को विश्राम दीजिए, पर उसे वैराग्य का नाम मत दीजिए।

तीसरी बात। जो करना है, उसे "करना है, इसलिए" कीजिए, पूरे आदर से, छोटा हो या बड़ा। याद रखिए, कुरुक्षेत्र में बाणों के बीच स्वयं श्रीकृष्ण घोड़ों के घाव साफ़ कर रहे थे।

आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आपके जीवन में कोई ऐसा काम है जो आप बरसों से कर रहे हैं, बिना किसी के धन्यवाद के, बस इसलिए कि वह करना है? किसी की सेवा, घर का कोई काम, कोई ज़िम्मेदारी? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।

कर्म पूरा, पकड़ नहीं। जो कर्मफल छोड़ता है, वही त्यागी है।

जय श्री कृष्ण।

न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः । यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥ ११ ॥
गीता 18.11 — अर्थ पढ़ें ›

तीन बातें

  1. त्याग कर्म का नहीं, उसकी पकड़ का होता है। यज्ञ, दान, तप और अपने रोज़ के कर्तव्य कभी मत छोड़िए, क्योंकि वे मन का मैल धोते हैं। छोड़ना है "मम", मेरा, और रखना है "न मम"।
  2. जब मन कोई कर्तव्य छोड़ने को कहे, तो पूछिए, यह कहाँ से आ रहा है? अगर यह भ्रम से है, कि अधर्म को धर्म समझ लिया, तो वह तामस है। अगर यह थकान और दुःख से भागना है, तो वह राजस है। थकान को विश्राम दीजिए, पर उसे वैराग्य का नाम मत दीजिए।
  3. जो करना है, उसे "करना है, इसलिए" कीजिए, पूरे आदर से, छोटा हो या बड़ा। याद रखिए, कुरुक्षेत्र में बाणों के बीच स्वयं श्रीकृष्ण घोड़ों के घाव साफ़ कर रहे थे।