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सत्संग ४७

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तप, दान और ॐ तत् सत्

गीता 17.14–17.28 · 79 मिनट

शरीर, वाणी, मन का तप; सही दान

देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् । ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥ १४ ॥
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अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् । स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥ १५ ॥
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मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः । भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥ १६ ॥
गीता 17.16 — अर्थ पढ़ें ›

क्या आपने कभी सोचा है कि तप किसे कहते हैं? हम यह शब्द सुनते हैं तो आँखों के सामने कोई साधु आता है, जो जंगल में धूप में खड़ा है, या पंचाग्नि के बीच बैठा है, या महीनों से भूखा है। पर अगर कोई आपसे कहे कि आज सुबह आपने घर में किसी से जो मीठा और सच्चा वचन कहा, वह भी तप था, और माँ के पैर दबाते हुए जो दस मिनट बीते, वह भी तप था, तो? आज का सत्संग इसी बात पर है: सच्चा तप क्या है, सच्चा दान क्या है, और वे तीन छोटे-से शब्द, "ॐ तत् सत्", जो हमारे अधूरे कर्मों को भी पूरा कर देते हैं।

जय श्री कृष्ण।

आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का सैंतालीसवाँ सत्संग है, और आज सत्रहवाँ अध्याय पूरा होगा। महाभारत के भीष्म पर्व का इकतालीसवाँ अध्याय ही गीता का सत्रहवाँ अध्याय है, जिसका नाम है "श्रद्धात्रय विभाग योग", यानी तीन प्रकार की श्रद्धा को अलग-अलग पहचानने का योग। और हर बार की तरह याद रखिए कि यह सब हमें सञ्जय सुना रहे हैं, हस्तिनापुर के महल में, अन्धे राजा धृतराष्ट्र को, उस दिन जब भीष्म बाणों की शय्या पर गिर चुके हैं और युद्ध के दस दिन बीत चुके हैं।

पहले याद कर लें कि पिछली बार हम कहाँ रुके थे। यह अध्याय अर्जुन के एक प्रश्न से शुरू हुआ था: "ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः", जो लोग शास्त्र की विधि को छोड़कर, पर श्रद्धा से भरकर पूजा करते हैं, उनकी स्थिति क्या है? सत्त्व, रज या तम? और श्रीकृष्ण ने उत्तर में एक ऐसी बात कही थी जो पूरे अध्याय की चाबी है: "श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः", यह पुरुष श्रद्धामय है, जिसकी जैसी श्रद्धा है, वह वैसा ही है। फिर उन्होंने चेताया था कि जो लोग शास्त्र में न बताए गए घोर तप से शरीर को सताते हैं, दम्भ और अहंकार से भरकर, वे शरीर के भीतर बैठे भगवान को भी सताते हैं: "मां चैवान्तःशरीरस्थं"। और फिर कहा था, "आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः", सबका प्रिय भोजन भी तीन प्रकार का होता है, और वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी। पिछली बार हमने भोजन के तीन प्रकार सुने, और यज्ञ के तीन प्रकार। आज बाकी दो की बारी है: तप और दान। पर तप के तीन प्रकार बताने से पहले श्रीकृष्ण बताते हैं कि तप होता किन-किन से है: शरीर से, वाणी से, और मन से।

तो आज का पहला श्लोक, चौदहवाँ। "देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्", देवता, द्विज, गुरु और ज्ञानी का पूजन, पवित्रता, सरलता, "ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते", ब्रह्मचर्य और अहिंसा, यह शरीर का तप कहा जाता है।

सबसे पहले हमारी अपनी टीका की बात सुनिए, क्योंकि वह इस पूरे प्रसंग का दरवाज़ा खोलती है। वह कहती है, यहाँ तप का अर्थ अपने को पीड़ा देना नहीं, बल्कि शरीर, वाणी और मन का अनुशासन है। और देखिए, इस सूची में न आग है, न काँटे, न भूख। इसमें है झुकना, साफ़ रहना, सीधा रहना, संयम रखना, और किसी को चोट न पहुँचाना।

अब एक-एक शब्द। "पूजन" किसका? देवता का, द्विज का, गुरु का, और प्राज्ञ, यानी ज्ञानी का। मधुसूदन सरस्वती बताते हैं कि गुरु में पिता, माता और आचार्य, सब आते हैं। और पूजन का अर्थ वे करते हैं: प्रणाम करना और सेवा करना। यानी यह पूजन केवल फूल चढ़ाना नहीं। यह झुककर किसी के काम आना है। "आर्जव", सरलता, यानी टेढ़ापन न होना। और "ब्रह्मचर्य" का अर्थ रामानुजाचार्य बहुत सूक्ष्म करते हैं: किसी स्त्री को भोग की वस्तु की नज़र से न देखना।

संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर कुछ ऐसी बातें कहते हैं जो सीधे घर के भीतर ले आती हैं। वे कहते हैं, सब तीर्थों में जो सबसे बड़े हैं, वे माता-पिता हैं, उनकी सेवा में इस शरीर को निछावर कर दो। और फिर वे एक बात कहते हैं जो बड़ी कोमल है: प्राणियों के नाम पर, बिना कारण, घास का एक तिनका भी मत तोड़ो।

और अब मैं आपको महाभारत का एक प्रसंग सुनाता हूँ, जो इस श्लोक के पहले शब्द, सेवा, का एक जीता-जागता चित्र है। यह वन पर्व में है, और इसे वैशम्पायन सुनाते हैं, जब जनमेजय पूछते हैं कि कर्ण के कवच और कुण्डल आए कहाँ से। बात तब की है जब कुन्ती अभी कुन्ती नहीं, पृथा थीं, राजा कुन्तिभोज की बेटी। वे वृष्णियों के कुल में शूर की बेटी थीं, वसुदेव की बहन, और शूर ने बहुत पहले अपनी पहली सन्तान कुन्तिभोज को देने का वचन दिया था, इसीलिए पृथा कुन्तिभोज के घर पलीं।

एक दिन राजा के पास एक ब्राह्मण आया। ऊँचा कद, प्रचण्ड तेज, जटा, दाढ़ी और हाथ में दण्ड। उसने कहा, मैं तुम्हारे घर में भिक्षा खाकर रहना चाहता हूँ, पर एक शर्त है: न तुम, न तुम्हारे सेवक, कोई मेरा अप्रिय न करे। मैं अपनी इच्छा से आऊँगा-जाऊँगा। राजा मान गए, और यह भार उन्होंने अपनी बेटी को सौंपते हुए कहा: बेटी, घमण्ड, दिखावा और अभिमान छोड़ दो, और इस ब्राह्मण को प्रसन्न रखो।

अब सुनिए कि वह सेवा कैसी थी। वह ब्राह्मण कहते, मैं सुबह आऊँगा, और आते शाम को, या रात में। कभी आते ही नहीं। कभी बहुत दुर्लभ भोजन माँगते, और डाँटते, कठोर बोलते। और पाठ कहता है कि पृथा उनके लिए सब कुछ ऐसे परोस देतीं, मानो पहले से ही तैयार रखा हो। वे शिष्य की तरह, बेटी की तरह, बहन की तरह सेवा करतीं, और वह सेवा दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही गई, कभी घटी नहीं। पूरा एक वर्ष बीता, और उस ब्राह्मण को पृथा में एक भी भूल नहीं दिखी।

और अब वह बात, जिसके लिए मैंने यह प्रसंग चुना। प्रसन्न होकर ब्राह्मण बोले, बेटी, ऐसे वर माँग लो जो संसार में दुर्लभ हैं। और पृथा ने कहा: आप मुझसे प्रसन्न हैं, मेरे पिता प्रसन्न हैं, मेरे सब मनोरथ पूरे हो गए। मुझे वरों से कोई काम नहीं। सोचिए। एक वर्ष की कठिन सेवा, और बदले में कुछ नहीं चाहिए। यह आगे आने वाले सत्रहवें श्लोक की भाषा में "अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः" है, फल न चाहने वालों का तप। ब्राह्मण ने फिर भी आग्रह करके उन्हें देवताओं को बुलाने का एक मन्त्र दिया, और उसी से आगे कर्ण का जन्म हुआ, जिनसे हम आज दान के खंड में मिलेंगे। अभी बस इतना रखिए कि यह शरीर का तप जंगल में नहीं, एक घर के आँगन में, एक क्रोधी अतिथि की सेवा में चला।

अब पन्द्रहवाँ श्लोक, जो मुझे आज के सारे श्लोकों में सबसे प्यारा लगता है, और जिसे हम आज के अन्त में दोबारा गाएँगे। "अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्", ऐसा वचन जो उद्वेग न करे, सत्य हो, प्रिय हो और हितकारी हो, "स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते", और स्वाध्याय का अभ्यास, यह वाणी का तप कहा जाता है।

यहाँ चार बातें हैं, और हमारी टीका की सबसे ज़रूरी बात यही है कि चारों एक साथ होनी चाहिए। वह कहती है, चोट पहुँचाने वाला सच, या प्रिय पर झूठा वचन, इसमें नहीं आता। शंकराचार्य इसे और कसकर कहते हैं: अगर किसी वचन में इन चारों में से एक भी कम हो, दो कम हों, या तीन, तो वह वाणी का तप नहीं है।

अब इन चारों को अलग-अलग देखिए। "अनुद्वेगकर", श्रीधर स्वामी कहते हैं, जो डर पैदा न करे; मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, जो किसी को दुःख न दे। और "उद्वेग" शब्द आपने बारहवें अध्याय में भी सुना था, छत्तीसवें सत्संग में, भगवान के प्रिय भक्त की पहचान में: "यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः", जिससे संसार उद्विग्न नहीं होता, और जो संसार से उद्विग्न नहीं होता। यानी वाणी का यह तप उसी भक्त की ज़ुबान है। "प्रिय" और "हित" का अन्तर नीलकण्ठ बहुत सुन्दर ढंग से करते हैं: प्रिय वह, जो सुनते समय सुख दे, और हित वह, जो आगे चलकर, परिणाम में, सुख दे। मधुसूदन सरस्वती तो उदाहरण के लिए एक पूरा वाक्य ही बना देते हैं, जिसमें चारों गुण हों। उसका भाव है: "बेटा, शान्त हो जाओ, स्वाध्याय और साधना करते रहो, इसी से तुम्हारा भला होगा।" इसमें न डर है, न झूठ, सुनने में मीठा है, और परिणाम में भला।

पर यह भी सच है कि जीवन में कई बार ऐसा सच कहना पड़ता है जो सुनने वाले को अच्छा नहीं लगता। तो फिर क्या करें? लोकमान्य तिलक इसी प्रश्न पर अपनी टिप्पणी में महाभारत की ओर इशारा करते हैं, और वह वाक्य हमारे पाठ में दो जगह है। जुए की सभा में, जब विदुर ने धृतराष्ट्र से जुआ रोकने का आग्रह किया और दुर्योधन ने उन्हें भरी सभा में बुरा-भला कहा, तब विदुर ने उत्तर दिया: "अप्रियस्य हि पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः"। और यही बात उद्योग पर्व में, उस लम्बी रात में, जब धृतराष्ट्र को नींद नहीं आ रही थी, विदुर ने धृतराष्ट्र से भी कही थी: हे राजन्, सदा मीठी बातें कहने वाले लोग आसानी से मिल जाते हैं, पर जो बात अप्रिय हो और फिर भी हितकारी हो, उसका कहने वाला भी दुर्लभ है, और सुनने वाला भी।

तो इन दोनों को साथ कैसे रखें? मैं इसे ऐसे समझता हूँ। श्लोक यह नहीं कहता कि अप्रिय सच कभी मत बोलो। श्लोक कहता है, जब बोलो, तो ऐसे प्रेम से कि वह सुनने वाले में घबराहट न जगाए, बल्कि उसका भला करे। कड़वी दवा भी माँ ऐसे देती है कि बच्चा डरे नहीं।

और उसी रात विदुर ने धृतराष्ट्र से वाणी के बारे में कुछ और भी कहा था, जो इस श्लोक का सबसे अच्छा भाष्य है। उन्होंने कहा: हे राजन्, वाणी का संयम सबसे कठिन माना गया है। फिर उन्होंने एक चित्र दिया: बाणों से बिंधा घाव भर जाता है, कुल्हाड़ी से काटा वन फिर उग आता है, पर कटु वचनों का घाव कभी नहीं भरता। और फिर: "वाक्सायका वदनान्निष्पतन्ति", वचन के बाण मुँह से निकलते हैं, और जिसे लगते हैं, वह रात-दिन दुःखी रहता है। वे दूसरे के मर्म के सिवा कहीं नहीं लगते, इसलिए ज्ञानी उन्हें दूसरों पर नहीं छोड़ता।

सोचिए, यह बात किससे कही जा रही थी। धृतराष्ट्र से। वही धृतराष्ट्र, जिनके बेटों ने जुए की सभा में ऐसे-ऐसे वचन बोले थे जिनके घाव तेरह बरस बाद भी नहीं भरे थे, और जिनका हिसाब अब कुरुक्षेत्र में चुकाया जा रहा है। आज सञ्जय उन्हीं धृतराष्ट्र को वाणी के तप का श्लोक सुना रहे हैं।

आज के जीवन में यह कैसा दिखता है, यह मैं अपनी ओर से एक उदाहरण देकर कहूँ। एक पिता का बेटा परीक्षा में कम नम्बर लेकर आया है। पिता के मुँह से निकल सकता है, "तुमसे कुछ नहीं होगा।" यह वाक्य शायद उस पल पिता को सच भी लगे। पर इसमें उद्वेग है, अप्रियता है, और कोई हित नहीं। और वही पिता कह सकता है, "इस बार नम्बर कम आए हैं, यह सच है। चलो बैठकर देखते हैं कि कहाँ चूक हुई। मुझे तुम पर भरोसा है।" इसमें सच भी है, कोई झूठी तसल्ली नहीं। पर डर नहीं है, और भला है। दोनों वाक्य एक ही मुँह से, एक ही दिन निकल सकते हैं। पहला वाक्य बाण है, दूसरा तप।

और श्लोक का आख़िरी हिस्सा, "स्वाध्यायाभ्यसनं", स्वाध्याय का अभ्यास। श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती इसका अर्थ करते हैं, विधि से वेद का अभ्यास। और संत ज्ञानेश्वर इसे हर घर तक ले आते हैं। वे कहते हैं, या फिर भगवान का एक ही नाम, शिव का हो या विष्णु का, जो जीभ पर बसा रहे, उसे भी वाणी का तप जानो। और ज्ञानेश्वर इस तप वाली वाणी के लिए एक बड़ा सुन्दर चित्र देते हैं: जैसे पारस लोहे को काटे बिना, तोड़े बिना, बस छूकर सोना बना देता है, वैसी वाणी, जो किसी को दुखाए बिना उसे बदल दे।

अब सोलहवाँ श्लोक, मन का तप। "मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः", मन की प्रसन्नता, सौम्यता, मौन, मन का संयम, "भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते", और भाव की शुद्धि, यह मन का तप कहा जाता है।

यहाँ पाँच बातें हैं। पहली, "मनःप्रसाद", मन की प्रसन्नता। शंकराचार्य इसका अर्थ करते हैं, मन का शान्त और स्वच्छ होना। रामानुजाचार्य कहते हैं, मन का क्रोध आदि से ख़ाली होना। सोचिए, अपनी चिड़चिड़ाहट को घर भर पर न फैलाना भी तप है। दूसरी, "सौम्यत्व", सौम्यता। रामानुजाचार्य इसका बहुत प्यारा अर्थ करते हैं: मन का दूसरों की उन्नति की ओर झुका रहना। यानी किसी की तरक़्क़ी देखकर जलना नहीं, ख़ुश होना।

तीसरी, "मौन"। अब यहाँ एक प्रश्न उठता है। मौन तो वाणी का होता है, उसे मन के तप में क्यों रखा? शंकराचार्य इसका उत्तर देते हैं: वाणी का संयम भी पहले मन के संयम से ही आता है, इसलिए यहाँ कारण को उसके फल के नाम से कहा गया है। चौथी, आत्मविनिग्रह, यानी मन को विषयों से रोकना। और पाँचवीं, "भावसंशुद्धि", भाव की शुद्धि। यहाँ शंकराचार्य, श्रीधर स्वामी और नीलकण्ठ, तीनों एक ही अर्थ करते हैं, और वह बहुत व्यावहारिक है: दूसरों के साथ व्यवहार करते समय छल न होना। यानी मन का तप किसी गुफा में ही पूरा नहीं होता। उसकी परीक्षा दुकान पर, दफ़्तर में, रिश्तों में होती है, जहाँ मुँह पर कुछ और, मन में कुछ और रखने का मौक़ा रोज़ आता है।

संत ज्ञानेश्वर मन के इस तप को तीन चित्रों में दिखाते हैं। जैसे सरोवर लहरों से छूटकर शान्त हो जाए, जैसे आकाश बादलों से छूटकर निर्मल हो जाए, और जैसे चन्दन का बाग़ साँपों से छूट जाए, वैसे ही मन तरह-तरह की उलझनों के जाल से छूटकर अपने ही स्वरूप में ठहर जाए। चन्दन का बाग़ सुगन्धित तो पहले भी था, बस साँपों के कारण कोई पास नहीं जाता था। मन में भी अच्छाई पहले से है।

तो इन तीन श्लोकों से आज के लिए यह बात निकलती है: तप कोई दूर की, डराने वाली चीज़ नहीं। वह रोज़ के जीवन में तीन जगह होता है: हाथों में, जो सेवा करते हैं; ज़ुबान पर, जो सच को भी प्रेम से कहती है; और मन में, जो प्रसन्न, सौम्य और छल से ख़ाली रहता है। जो व्यक्ति इन तीनों को साध ले, उसे जंगल जाने की ज़रूरत नहीं। उसका घर ही तपोवन है।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने बताया कि तप किन-किन से होता है। पर एक ही काम, एक ही सेवा, एक ही मौन, किसी के लिए मुक्ति का रास्ता बन जाता है और किसी के लिए घमण्ड का साधन। ऐसा क्यों? अगले श्लोकों में श्रीकृष्ण इसी तप को फिर से तीन भागों में बाँटते हैं, और वहाँ हम एक ऐसे योद्धा से मिलेंगे जिसने अपने को ही आग में अर्पित कर दिया, पर किसी का भला करने के लिए नहीं।

श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः । अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते ॥ १७ ॥
गीता 17.17 — अर्थ पढ़ें ›
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् । क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम् ॥ १८ ॥
गीता 17.18 — अर्थ पढ़ें ›
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः । परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम् ॥ १९ ॥
गीता 17.19 — अर्थ पढ़ें ›

सत्रहवाँ श्लोक। "श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः", यह तीन प्रकार का तप, यानी शरीर, वाणी और मन का, जब परम श्रद्धा से किया जाता है, "अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते", फल न चाहने वाले, एकाग्र मनुष्यों द्वारा, तो उसे सात्त्विक कहते हैं।

यहाँ तीन शर्तें हैं: परम श्रद्धा, फल की चाह न होना, और "युक्त" होना। शंकराचार्य श्रद्धा का अर्थ करते हैं, आस्तिक बुद्धि, यानी यह भरोसा कि जो कर रहा हूँ वह सच है, व्यर्थ नहीं। मधुसूदन सरस्वती "परया" पर रुकते हैं: ऐसी श्रद्धा, जिस पर सन्देह का कोई दाग़ न हो। और "युक्तैः" के दो सुन्दर अर्थ मिलते हैं। रामानुजाचार्य कहते हैं, युक्त वह है जो हर तप करते समय यह सोचता है कि यह परम पुरुष की आराधना है। और मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, युक्त वह है जो सफलता और असफलता, दोनों में एक-सा रहता है। आपको याद होगा, सातवें सत्संग में यही बात सुनी थी: सिद्धि और असिद्धि में सम रहना ही योग है।

अब पृथा को एक बार फिर याद कीजिए। एक वर्ष की सेवा, और जब वर माँगने को कहा गया, तो उत्तर था, मुझे वरों से कोई काम नहीं। शरीर का तप, वाणी में कोई कटुता नहीं, और मन में फल की कोई चाह नहीं। यही सात्त्विक तप है। उसमें कुछ पाने की हड़बड़ी नहीं होती, क्योंकि करने वाले को लगता है कि करने में ही पा लिया।

और अब, इससे पहले कि हम आगे बढ़ें, एक छोटी-सी बात आपसे कहना चाहता हूँ। अब तक हमने तप के तीन रूप सुने, शरीर, वाणी और मन, और अब उसके गुण-भेद शुरू हुए हैं। आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। जो आदमी यहीं उठ जाए, वह शायद यह सोचकर जाए कि उसके अपने तप में तो थोड़ा दिखावा मिला ही रहता है, तो सब बेकार है। जबकि इस अध्याय के अन्त में श्रीकृष्ण वही बात कहने वाले हैं जो हमारे अधूरे, मिले-जुले कर्मों को भी सँभाल लेती है। तो अगर आप यह सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की यह यात्रा बीच में न छूटे। और आज का यह सत्संग आख़िर तक सुनिए।

अब अठारहवाँ श्लोक। "सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्", जो तप सत्कार, मान और पूजा पाने के लिए, या दम्भ से किया जाता है, "क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्", वह यहाँ राजस कहा गया है, और वह अस्थिर और क्षणिक है।

यहाँ तीन शब्द हैं जो सुनने में एक जैसे लगते हैं, पर आचार्य उन्हें अलग-अलग खोलते हैं। शंकराचार्य कहते हैं: सत्कार, यानी लोग कहें, "यह बड़ा अच्छा तपस्वी है"; मान, यानी लोग देखकर उठ खड़े हों, प्रणाम करें; और पूजा, यानी लोग पैर धोएँ, आरती उतारें। रामानुजाचार्य इसे और बारीकी से बाँटते हैं: मन से आदर सत्कार है, वाणी से प्रशंसा मान है, और शरीर से नमस्कार पूजा है। यानी राजस तपस्वी को लोगों का मन भी चाहिए, उनकी ज़ुबान भी, और उनका सिर भी।

और फिर दो शब्द, "चलमध्रुवम्"। ऐसा तप अस्थिर क्यों है? रामानुजाचार्य कहते हैं, "चल" इसलिए कि उसमें सदा गिरने का डर रहता है, और अध्रुव इसलिए कि उसका फल घटता जाता है। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, ऐसा तप इसी लोक में थोड़े समय का फल देता है, परलोक के लिए नहीं। संत ज्ञानेश्वर इस पर दो चित्र देते हैं जो याद रह जाते हैं। वे कहते हैं, जैसे खड़ी फ़सल को पशु चर जाएँ, तो पकने के लिए कुछ बचता ही नहीं, वैसे ही जिस तप का ढोल पीटा गया, उसका फल वहीं चुक जाता है। और जैसे बिना मौसम का बादल गरजता है कि मानो ब्रह्माण्ड फाड़ देगा, पर क्या वह एक घड़ी भी टिकता है? राजस तप वैसा ही है: शोर बहुत, फल कुछ नहीं, और टिकता भी नहीं।

आज के जीवन में यह कैसा दिखता है, यह मैं अपनी ओर से एक छोटा-सा उदाहरण देकर कहूँ। कोई व्रत रखता है, और सुबह से शाम तक दस लोगों को बताता है कि आज मेरा निर्जल व्रत है। व्रत सच्चा है, भूख सच्ची है, प्यास सच्ची है। पर अगर मन का सारा रस उन दस लोगों की "वाह" में है, तो श्रीकृष्ण के शब्दों में वह तप "चल" है। किसी दिन कोई वाह न करे, तो व्रत भी फीका लगने लगता है। यही उसकी अस्थिरता है। जिस तप की जड़ दूसरों की तारीफ़ में है, वह उतनी ही देर टिकता है जितनी देर तारीफ़।

राजस तप की जड़ कहाँ होती है, यह महाभारत की एक कथा बहुत साफ़ दिखाती है। वन पर्व में लोमश ऋषि युधिष्ठिर को तीर्थ दिखाते हुए गंगा के किनारे रैभ्य के आश्रम पर रुकते हैं और कहते हैं, यहीं भरद्वाज के पुत्र यवक्रीत नष्ट हुए थे। भरद्वाज और रैभ्य मित्र थे और उसी वन में प्रेम से रहते थे। रैभ्य के दो बेटे थे, अर्वावसु और परावसु, और भरद्वाज का एक बेटा था, यवक्रीत। एक दिन यवक्रीत ने देखा कि उनके तपस्वी पिता को वह सम्मान नहीं मिलता जो रैभ्य को उनके पुत्रों के साथ ब्राह्मणों से मिलता है। पाठ कहता है, वे क्रोध से भर गए और दुःख से जलने लगे, और तब उन्होंने वेदों का ज्ञान पाने के लिए घोर तप शुरू किया। वे धधकती आग में अपने शरीर को तपाने लगे, और उस तप ने इन्द्र को भी चिन्ता में डाल दिया।

इन्द्र आए और पूछा, यह तप किसलिए? यवक्रीत ने कहा, गुरु के मुख से वेद बहुत लम्बे समय में मिलते हैं, मैं तप से ही सब जान लेना चाहता हूँ। इन्द्र ने कहा, जिस रास्ते से तुम जाना चाहते हो, वह गलत रास्ता है; अपना नाश करने से क्या मिलेगा, जाओ, गुरु के मुख से पढ़ो। पर यवक्रीत नहीं माने। उन्होंने और कठोर तप किया, और यहाँ तक कह दिया कि अगर मेरी इच्छा पूरी न हुई, तो मैं एक-एक अंग काटकर आग में होम कर दूँगा। तब इन्द्र ने सैकड़ों बरस के दुर्बल, रोगी ब्राह्मण का रूप लिया और जिस घाट पर यवक्रीत रोज़ स्नान करने आते थे, वहाँ गंगा में मुट्ठी भर-भरकर बालू डालकर बाँध बाँधने लगे। यवक्रीत ने हँसकर कहा, यह क्या कर रहे हैं, गंगा आपसे बाँधी नहीं जा सकती, असम्भव काम से लौट आइए। और इन्द्र ने उसी बात को उन्हीं की ओर मोड़ दिया: जैसे तुमने वेदों के लिए यह असम्भव तप उठाया है, वैसे ही मैंने यह बोझ उठाया है। तब यवक्रीत ने इन्द्र से कहा कि जो आपके लिए सम्भव है, वही करिए, मुझे दूसरे वर दीजिए जिनसे मैं विद्वान् बन जाऊँ। इन्द्र ने वर दे दिया कि पिता के साथ उन्हें वेद वैसे ही प्रकट होंगे जैसे वे चाहते हैं। यवक्रीत घर लौटे तो पिता भरद्वाज ने कहा, बेटा, मनचाहा वर पाकर तुममें घमंड आ जाएगा, और घमंड से भरकर तुम जल्दी ही नष्ट हो जाओगे। आगे की कथा दुःख की है, और मैं उसे यहीं छोड़ता हूँ।

अब देखिए, उस घोर तप की जड़ में क्या था। भगवान की खोज नहीं थी, "सत्कारमानपूजार्थं" की चोट थी, पिता को न मिले सम्मान की जलन, और उसके पीछे मान की भूख। यह मेरा पढ़ना है, पाठ ने इसे इस श्लोक से जोड़ा नहीं है, पर जलन और दुःख का शब्द पाठ में है। और इन्द्र ने जो कहा था, वह अगले श्लोक के मूढ़ हठ का भी उत्तर है: गलत रास्ता है, अपना नाश करने से क्या लाभ, जाओ, गुरु से सीखो।

अब उन्नीसवाँ श्लोक। "मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः", जो तप मूढ़ हठ से, अपने को पीड़ा देकर किया जाता है, "परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्", या दूसरे का नाश करने के लिए, वह तामस कहा गया है।

"मूढग्राह" का अर्थ श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती करते हैं, अविवेक से पैदा हुआ दुराग्रह, यानी ऐसी ज़िद जिसके पीछे कोई समझ नहीं। और रामानुजाचार्य एक बात जोड़ते हैं जो बहुत काम की है: अपनी शक्ति को परखे बिना, अपने को पीड़ा देकर। और "परस्योत्सादनार्थं", दूसरे को उखाड़ फेंकने के लिए। श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, यह वह तप है जो किसी के अनिष्ट के लिए, किसी पर अभिचार के लिए किया जाता है। तप की शक्ति, किसी को मिटाने के लिए।

अब उन्नीसवें श्लोक के लिए महाभारत का एक ऐसा प्रसंग, जिसे सुनाने वाले भी यही सञ्जय हैं, और सुनने वाले भी यही धृतराष्ट्र। पर यह आज से कई दिन बाद की रात का है, युद्ध के अठारहवें दिन की रात का, जो सौप्तिक पर्व में आती है। दुर्योधन की जाँघ टूट चुकी है, और कौरवों की ओर से केवल तीन योद्धा बचे हैं: द्रोण के पुत्र अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा। रात में एक बरगद के नीचे बैठे अश्वत्थामा प्रतिज्ञा करते हैं कि आज ही रात, सोते हुए पाञ्चालों को मारेंगे, जिन्होंने उनके पिता को शस्त्र रखे हुए गिराया था।

कृपाचार्य उन्हें रोकते हैं, और उनकी बात सीधी है: धर्म के अनुसार सोए हुओं का वध सराहा नहीं जाता, न उनका जिन्होंने शस्त्र रख दिए हों। जो उनकी उस अवस्था में उनसे द्रोह करे, वह बिना नाव वाले अथाह नरक में डूबता है। कल सुबह, सूरज उगने पर, सबके सामने खुले युद्ध में लड़ो। और अश्वत्थामा का उत्तर: संसार में ऐसा कोई पुरुष न जन्मा है, न होगा, जो इस निश्चय से मुझे लौटा सके। यही है "मूढग्राह", समझ के दरवाज़े बन्द करके पकड़ी गई ज़िद।

फिर शिविर के द्वार पर अश्वत्थामा को एक विशाल, भयानक प्राणी रास्ता रोके मिलता है, और उसके अस्त्र उस पर कुछ नहीं कर पाते। तब वह रथ से उतरता है, शिव की अनेक नामों से स्तुति करता है, और पाठ कहता है, उसने अपने धनुष को समिधा बनाया, बाणों को कुशा, और अपने आप को आहुति। वह दहकती अग्नि वाली वेदी पर चढ़कर, भुजाएँ उठाए, निश्चल बैठ गया, और बोला: यदि शत्रु मुझसे जीते न जा सकें, तो मुझे भेंट के रूप में स्वीकार कीजिए। सुनिए, क्या हो रहा है। एक मनुष्य अपने को ही आग में अर्पित कर रहा है। बाहर से देखें तो इससे बड़ा तप क्या होगा? पर किसलिए? सोते हुओं को मारने के लिए। "मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया", ज़िद और अपने को पीड़ा, और "परस्योत्सादनार्थं", दूसरों के नाश के लिए। श्रीकृष्ण के तीनों तामस लक्षण एक ही दृश्य में।

और उस रात जो हुआ, वह सौप्तिक पर्व का सबसे अँधेरा पन्ना है। सोते हुए धृष्टद्युम्न मारे गए, द्रौपदी के पाँचों पुत्र मारे गए। और सौप्तिक पर्व में धृतराष्ट्र का एक वाक्य दर्ज है, जो मन को रोक देता है। अश्वत्थामा के शिविर में घुसने की बात सुनकर वे सञ्जय से पूछते हैं: आशा है कि कृप और कृतवर्मा डरकर लौट तो नहीं गए, आशा है कि उसकी प्रतिज्ञा रात में सफल हुई। आज जो धृतराष्ट्र तामस तप का यह श्लोक सुन रहे हैं, वे उस रात उसी तप के सफल होने की आशा करेंगे। सुनना एक बात है, उतरना दूसरी।

और उस तप का फल क्या हुआ? सौप्तिक पर्व के अन्त में श्रीकृष्ण अश्वत्थामा को शाप देते हैं कि वह तीन हज़ार वर्ष इस पृथ्वी पर अकेला भटकेगा, किसी का साथ न पाता। और ऐसा ही एक प्रसंग आपने बीसवें सत्संग में भी सुना था: अम्बा का कठोर तप, जिसके बारे में उन्होंने ख़ुद कहा था कि यह स्वर्ग के लिए नहीं, भीष्म को मारने के लिए है। तप वही, आग वही, भूख वही। पर लक्ष्य किसी को मिटाना हो, तो श्रीकृष्ण उसे तामस कहते हैं।

और इसी अध्याय में, पिछले सत्संग में, श्रीकृष्ण ने कहा था कि ऐसा घोर तप करने वाले शरीर में बैठे भगवान को भी सताते हैं। जो आग किसी और को जलाने के लिए जलाई जाए, वह सबसे पहले जलाने वाले के भीतर के भगवान को ही झुलसाती है।

तो इन तीन श्लोकों से आज के लिए यह बात निकलती है: तप को उसके कष्ट से मत नापिए, उसकी नीयत से नापिए। जो तप श्रद्धा से हो, बिना फल की भूख के, वह भीतर टिकता है। जो तारीफ़ के लिए हो, वह तारीफ़ के साथ ही उड़ जाता है। और जो ज़िद से या किसी के अनिष्ट के लिए हो, वह करने वाले को ही जला देता है।

पर अभी एक बात बाकी है। तप के बाद श्रीकृष्ण दान की ओर मुड़ते हैं। और दान की बात आते ही महाभारत में एक नाम सबसे पहले याद आता है, जिसके दान की कथा सूर्य, इन्द्र और स्वयं धृतराष्ट्र तक पहुँचती है। अगले श्लोकों में हम उसी दान को श्रीकृष्ण की तराज़ू पर रखकर देखेंगे।

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे । देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥ २० ॥
गीता 17.20 — अर्थ पढ़ें ›
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः । दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥ २१ ॥
गीता 17.21 — अर्थ पढ़ें ›
अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते । असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥
गीता 17.22 — अर्थ पढ़ें ›

बीसवाँ श्लोक। "दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे", "दान देना कर्तव्य है", ऐसा समझकर जो दान उसे दिया जाता है जो बदले में उपकार न कर सके, "देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्", उचित स्थान, उचित समय और योग्य पात्र में, वह दान सात्त्विक माना गया है।

पहला शब्द है "दातव्यमिति", देना ही है, ऐसा समझकर। न कोई गिनती, न कोई हिसाब, बस यह भाव कि मेरे पास है, तो बाँटना मेरा धर्म है। फिर "दीयतेऽनुपकारिणे", जो बदले में उपकार न करे। शंकराचार्य इसका अर्थ दो तरह से करते हैं: जो बदला चुकाने में समर्थ ही न हो, या समर्थ हो भी, तो उससे कोई अपेक्षा न रखी जाए। और फिर तीन बातें, देश, काल और पात्र। आचार्य इनके परम्परा वाले उदाहरण देते हैं, जैसे कुरुक्षेत्र जैसा पवित्र स्थान, संक्रान्ति या ग्रहण जैसा पुण्य समय, और विद्या और तप से भरा पात्र। पर इसका सार इतना ही है कि दान आँख खोलकर दिया जाए: जहाँ ज़रूरत हो, जब ज़रूरत हो, और जिसे सचमुच ज़रूरत हो।

संत ज्ञानेश्वर इस दान के भाव को एक बहुत सुन्दर चित्र से कहते हैं। वे कहते हैं, ऐसे दो, जैसे किसी की रखी हुई धरोहर उसे लौटाकर आदमी कर्ज़ से छूट जाता है। यानी देने वाले के मन में यह अहंकार भी न हो कि मैंने दिया। बस यह राहत हो कि जो मेरे पास किसी और के हिस्से का रखा था, वह उस तक पहुँच गया। और पात्र कैसा हो, इस पर वे कहते हैं: जैसे आकाश को पुकारो तो वह प्रतिध्वनि नहीं लौटाता, वैसा, जिससे दिया हुआ लौटकर न आए।

आपको याद होगा, चौदहवें सत्संग में हमने युधिष्ठिर के अश्वमेध के बाद आए उस नेवले की कथा सुनी थी, जिसका आधा शरीर सोने का हो गया था, और जिसने कहा था कि यह विशाल यज्ञ कुरुक्षेत्र के उस गरीब ब्राह्मण के एक प्रस्थ सत्तू के बराबर नहीं। आज उस कथा को इस श्लोक के साथ रखिए। अकाल का समय, भूखा अतिथि, और परिवार का पूरा भोजन, जिसके बदले में उस अतिथि से कुछ मिलना ही नहीं था। "देशे काले च पात्रे च", और बदला न दे सकने वाला अतिथि, सब एक साथ। सात्त्विक दान की यही पहचान है: वह बड़ा हो या छोटा, सही जगह पहुँचता है।

अब इक्कीसवाँ श्लोक। "यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः", परन्तु जो दान बदले में उपकार पाने के लिए, या किसी फल को लक्ष्य करके, "दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्", या क्लेश के साथ दिया जाता है, वह राजस माना गया है।

यहाँ भी तीन बातें हैं। "प्रत्युपकारार्थं", शंकराचार्य कहते हैं, यह सोचकर देना कि समय आने पर यह मेरा भी कुछ करेगा। "फलमुद्दिश्य", किसी पुण्य-फल की इच्छा से, स्वर्ग की या नाम की। और "परिक्लिष्टं", इस पर मधुसूदन सरस्वती और नीलकण्ठ एक बहुत मानवीय बात कहते हैं: देने के बाद यह पछतावा कि इतना क्यों दे दिया। संत ज्ञानेश्वर यहाँ फिर घर के उदाहरण देते हैं: जैसे गाय को इस नज़र से चारा डालना कि दूध मिलेगा, या किसी रिश्तेदार के घर जाते समय नज़र इस पर रखना कि लौटते में क्या भेंट मिलेगी।

बाईसवाँ श्लोक। "अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते", जो दान अनुचित स्थान और समय में, कुपात्रों को दिया जाता है, "असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्", बिना सत्कार के, और तिरस्कार के साथ, वह तामस कहा गया है।

यहाँ "असत्कृतमवज्ञातं" में दो बातें बहुत ध्यान देने लायक हैं। पहली, बिना सत्कार के: नीलकण्ठ और मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, जिसमें न कोई मीठा वचन हो, न पैर धुलाना, न आदर। और दूसरी, अवज्ञा: शंकराचार्य कहते हैं, लेने वाले का अपमान करते हुए। यानी चीज़ भले अच्छी हो, अगर उसे ऐसे फेंककर दिया कि लेने वाला छोटा महसूस करे, तो वह दान तामस हो गया। आज के जीवन में यह मैं अपनी ओर से एक दृश्य से कहूँ। कोई गाड़ी का शीशा थोड़ा-सा नीचे करके, बिना देखे, एक सिक्का बाहर फेंक देता है, और झिड़ककर कहता है, "चलो, आगे बढ़ो।" सिक्का पहुँच गया, पर उसके साथ जो तिरस्कार गया, वह सिक्के से भारी था।

और अब मैं आपको वह कथा सुनाता हूँ, जिसका वादा पिछले खंड के अन्त में किया था। यह वन पर्व में है, और वैशम्पायन जनमेजय को सुनाते हैं। वनवास का बारहवाँ वर्ष बीत चुका था और तेरहवाँ आ गया था, और इन्द्र, जो पाण्डवों का भला चाहते थे, कर्ण से उनके कुण्डल माँगने की तैयारी कर रहे थे। कर्ण का स्वभाव सारा संसार जानता था। सज्जन माँगें, तो वे देते ही थे, किसी को मना नहीं करते थे। एक रात, जब कर्ण सो रहे थे, उनके पिता सूर्य स्नेह से भरकर एक ब्राह्मण के रूप में उनके सपने में आए और बोले: बेटा, इन्द्र ब्राह्मण के वेश में तुम्हारे कुण्डल माँगने आएँगे। मत देना। जब तक ये कवच और कुण्डल तुम्हारे पास हैं, कोई तुम्हें मार नहीं सकता।

और कर्ण ने जो उत्तर दिया, वह सुनने लायक है। उन्होंने कहा, सारा संसार मेरा व्रत जानता है: श्रेष्ठ ब्राह्मण माँगें, तो मैं अपने प्राण भी दे दूँगा। मैं कुण्डल और कवच दूँगा, ताकि तीनों लोकों में फैली मेरी कीर्ति नष्ट न हो। अपयश लेकर जीने से यश वाली मृत्यु अच्छी। और फिर एक वाक्य, जो उनके चरित्र की गहराई दिखाता है: मैं मृत्यु से उतना नहीं डरता, जितना झूठ से डरता हूँ।

सूर्य ने समझाया, कीर्ति जीवित के ही काम आती है; मरे हुए की कीर्ति ऐसी है, जैसे शव पर पड़ी माला। पर जब कर्ण नहीं माने, तो सूर्य ने एक बीच का रास्ता बताया: अगर देना ही है, तो बदले में इन्द्र से उनकी वह अचूक शक्ति माँग लेना, जो शत्रु को मारे बिना नहीं लौटती। और फिर वह दिन आया। ब्राह्मण के वेश में इन्द्र आए। कर्ण ने स्वागत किया और कहा, क्या दूँ? सोने के हार पहने युवतियाँ, गायों से भरे गाँव, भूमि, खेत, एक पूरा राज्य? ब्राह्मण ने कहा, कुछ नहीं, बस वह कवच और वे कुण्डल, जो तुम्हारे जन्म के साथ आए हैं।

कर्ण ने बहुत समझाया, और फिर हँसकर कहा: हे देवराज, मैं तुम्हें पहले से पहचानता था। तुम देवताओं के स्वामी हो, तुम्हें भी मुझे कुछ देना चाहिए। अदला-बदली कर लो। इन्द्र मान गए, और शक्ति दी, इस शर्त के साथ कि वह केवल एक शत्रु को मारकर लौट आएगी। और फिर पाठ कहता है, कर्ण ने तीखा शस्त्र उठाकर अपने शरीर से वह कवच काटा, और कानों से वे कुण्डल काटे। देवता, मनुष्य, दानव, सब देख रहे थे, और उनके मुख पर कोई बदलाव नहीं था। वे बार-बार मुस्करा रहे थे। आकाश से फूल बरसे, और पाठ कहता है, उसी कर्म के कारण वे कर्ण कहलाए।

और कथा का एक धागा इसी महल तक आता है, जहाँ सञ्जय बैठे हैं। आगे चलकर, द्रोण पर्व में, यही सञ्जय धृतराष्ट्र को बताएँगे कि वह शक्ति, जो बरसों से अर्जुन के लिए पूजकर रखी गई थी, एक रात घटोत्कच पर छोड़नी पड़ी। और धृतराष्ट्र बेचैन होकर पूछेंगे, सञ्जय, उसने वह शक्ति पार्थ पर क्यों नहीं छोड़ी? कवच के बदले मिली शक्ति, जिस एक काम के लिए माँगी गई थी, उस काम में नहीं आई।

अब इस दान को आज के तीनों श्लोकों की तराज़ू पर रखकर देखिए। और पहले ही कह दूँ, मैं कर्ण को छोटा नहीं कर रहा। अपने ही शरीर से कवच काटकर मुस्कराते हुए दे देना, ऐसा दान महाभारत में कम है। "दातव्यमिति" का भाव उनमें पूरा था, देना ही है, यह व्रत था। और "परिक्लिष्टं" का तो नामोनिशान नहीं, कोई पछतावा नहीं, चेहरे पर मुस्कान। पर कर्ण ने अपने ही शब्दों में कहा कि वे यह कीर्ति के लिए दे रहे हैं, "फलमुद्दिश्य"। और अन्त में अदला-बदली हुई, "प्रत्युपकारार्थं"। श्रीकृष्ण की भाषा में, यह दान सात्त्विक और राजस के बीच खड़ा है। उसमें बड़ा त्याग है, पर एक गाँठ भी है: कीर्ति की गाँठ, और बदले की गाँठ।

और अब इस खंड के पहले प्रसंग को याद कीजिए। कर्ण की कथा उसी अध्याय-समूह में है जिसमें पृथा की सेवा की कथा है। माँ ने एक वर्ष सेवा की, और जब वर माँगने को कहा गया, तो कहा, मुझे कुछ नहीं चाहिए। बेटे ने अपना कवच दे दिया, पर बदले में शक्ति माँगी। मैं यह तुलना किसी को ऊँचा-नीचा दिखाने के लिए नहीं करता। यह बस दिखाती है कि गीता की यह कसौटी कितनी बारीक है। त्याग कितना बड़ा है, इससे दान का गुण तय नहीं होता। गुण इससे तय होता है कि मन में कोई धागा बँधा है या नहीं, कुछ वापस आने का।

और यह बात हम सबके लिए है। हम मन्दिर में कुछ चढ़ाते हैं, और साथ में एक छोटी-सी अर्ज़ी भी रख देते हैं। किसी की मदद करते हैं, और मन के किसी कोने में यह भी लिख लेते हैं कि उसने धन्यवाद नहीं कहा। श्रीकृष्ण इसे बुरा नहीं कहते, बस राजस कहते हैं। और हमें बताते हैं कि अगली सीढ़ी कहाँ है: वह दान जो देकर भूल जाया जाए।

तो इन तीन श्लोकों से आज के लिए यह बात निकलती है: दान में यह मत देखिए कि कितना दिया, यह देखिए कि कैसे दिया। सही जगह, सही समय, सही हाथ में, बिना बदले की आशा के, बिना पछतावे के, और आदर के साथ। एक मुट्ठी सत्तू भी इन सब के साथ दिया जाए, तो सबसे बड़े यज्ञ से भारी हो जाता है।

पर अभी एक बात बाकी है। अब तक सुनकर किसी के मन में एक डर उठ सकता है। हमारा तो कोई तप, कोई दान, कोई यज्ञ पूरी तरह सात्त्विक नहीं होता। हर काम में थोड़ी गाँठ रह ही जाती है। तो क्या सब व्यर्थ है? इसी प्रश्न का उत्तर अगले श्लोक में आता है, ब्रह्म के तीन शब्दों वाले नाम में: ॐ तत् सत्।

ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः । ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥ २३ ॥
गीता 17.23 — अर्थ पढ़ें ›
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः । प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥ २४ ॥
गीता 17.24 — अर्थ पढ़ें ›

तेईसवाँ श्लोक। "ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः", "ॐ तत् सत्", यह ब्रह्म का तीन प्रकार का नाम माना गया है, "ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा", उसी से पहले ब्राह्मण, वेद और यज्ञ रचे गए।

पिछले खंड के अन्त में मैंने एक डर की बात कही थी: हमारा कोई कर्म पूरी तरह सात्त्विक नहीं होता, तो क्या सब व्यर्थ है? और आश्चर्य की बात यह है कि श्रीधर स्वामी इस श्लोक की टीका ठीक इसी प्रश्न से शुरू करते हैं। वे कहते हैं, कोई शंका कर सकता है कि अगर इतनी बारीकी से परखा जाए, तो सारे यज्ञ, तप और दान ज़्यादातर राजस और तामस ही निकलेंगे, फिर इतनी मेहनत किसलिए? और उत्तर में श्रीकृष्ण यह श्लोक कहते हैं, जो बताता है कि ऐसे कर्म को भी सात्त्विक कैसे बनाया जाए। हमारी टीका भी यही कहती है: दोष वाले कर्म पर ये शब्द कहने से वह पूर्ण हो जाता है, जैसा अगले श्लोक दिखाते हैं।

मधुसूदन सरस्वती इसका कारण बड़े मानवीय ढंग से बताते हैं। वे कहते हैं, कर्म करने वाले लोग भूलों से भरे होते हैं, कहीं विधि छूटती है, कहीं मन भटकता है। उस कमी को दूर करने के लिए भगवान का यह नाम लिया जाता है। और नीलकण्ठ इसे एक प्यारी उपमा से कहते हैं: जैसे सहस्रनाम में भगवान के हज़ार नाम पढ़े जाते हैं, वैसे ही यह भी एक नाम-पाठ है, जिसमें बस तीन ही नाम हैं। और तीनों के लिए वे उपनिषदों के वचन याद दिलाते हैं: "ॐ" को ब्रह्म कहने वाला तैत्तिरीय का वचन, "तत्" को उस महान सत्ता का नाम बताने वाला ऐतरेय का वचन, और छान्दोग्य का वह प्रसिद्ध वचन कि आरम्भ में केवल "सत्" ही था।

और दूसरी पंक्ति, "ब्राह्मण, वेद और यज्ञ उसी से रचे गए"। लोकमान्य तिलक याद दिलाते हैं कि तीसरे अध्याय में कहा गया था, सृष्टि के आरम्भ में प्रजापति ने यज्ञ के साथ प्रजा को रचा। यहाँ बताया जा रहा है कि वह सब जिस परब्रह्म से निकला, उसका नाम यही तीन शब्द हैं। यानी जिस नाम से सृष्टि का पहला यज्ञ शुरू हुआ, उसी नाम से हमारा छोटा-सा कर्म भी जुड़ सकता है।

संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर जो कहते हैं, वह मुझे बहुत छूता है। वे कहते हैं, ब्रह्म का तो कोई नाम है ही नहीं, कोई जाति नहीं। पर जैसे नया जन्मा बच्चा, जिसका अपना कोई नाम नहीं होता, जब उसका नाम रख दिया जाता है, तो उसी नाम से पुकारने पर "ओ" कहकर उठ जाता है। वैसे ही संसार की थकान से हारे हुए लोग जब अपना दुःख लेकर भगवान के पास आते हैं, तो जिस नाम से पुकारने पर भगवान "ओ" कहकर उत्तर देते हैं, वह संकेत यही है। और ज्ञानेश्वर आगे कहते हैं, सृष्टि से पहले ब्रह्मा अकेले थे, कुछ समझ नहीं पा रहे थे, सृष्टि नहीं कर पा रहे थे। इसी एक नाम के जप से उनमें संसार रचने की योग्यता आई।

अब चौबीसवाँ श्लोक। "तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः", इसलिए "ॐ" का उच्चारण करके यज्ञ, दान और तप की क्रियाएँ, "प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम्", जो विधि में कही गई हैं, वेद-वचन मानने वालों की सदा आरम्भ होती हैं।

यहाँ तीनों नामों में से पहला, "ॐ", खोला जा रहा है। नीलकण्ठ बताते हैं कि यज्ञ में हर ऋत्विज का काम ॐ से ही शुरू होता है: ब्रह्मा ॐ कहकर अनुमति देते हैं, सामवेद गाने वाले ॐ कहकर गाते हैं। और श्रीधर स्वामी इसका फल बताते हैं: ॐ कहकर शुरू की गई क्रियाएँ, उनके किसी अंग में कमी रह जाए, तब भी, पूरे गुण वाली हो जाती हैं।

और यह ॐ गीता में हमें पहले भी कई बार मिल चुका है। सातवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने कहा था, "प्रणवः सर्ववेदेषु", सब वेदों में मैं ओंकार हूँ। नौवें में, "पवित्रमोङ्कार", पवित्र ओंकार मैं हूँ। दसवें में, "गिरामस्म्येकमक्षरम्", वाणियों में मैं एक अक्षर हूँ। और आठवें अध्याय में, तेईसवें सत्संग में, आपने सुना था: "ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्", ॐ इस एक अक्षर ब्रह्म का उच्चारण करते हुए और मुझे याद करते हुए जो शरीर छोड़ता है, वह परम गति पाता है। यानी जो अक्षर जीवन के अन्त का साथी है, वही हर कर्म के आरम्भ का भी साथी है।

पर ज्ञानेश्वर यहाँ एक सावधानी भी देते हैं, और वह बहुत ज़रूरी है। वे कहते हैं, खाना भी पास हो और भूख भी, पर बच्चा खाना न जानता हो, तो भूखा ही रहता है। दीये का तेल हो, बत्ती हो, आग हो, पर जलाने का ढंग न आता हो, तो रोशनी नहीं होती। वैसे ही मुँह में भगवान का नाम हो और हाथ में अच्छा काम, पर यह न जाना कि नाम को कर्म से कैसे जोड़ें, तो वह भी अधूरा रह जाता है। इसीलिए श्रीकृष्ण आगे के श्लोकों में "तत्" और "सत्" का प्रयोग भी समझाते हैं।

आज के जीवन में यह कैसा दिखता है, यह मैं अपनी ओर से कहूँ। हमारे घरों में आज भी कई लोग नया बही-खाता खोलते हैं तो पहले पन्ने पर "श्री" लिखते हैं, चिट्ठी के ऊपर "ॐ" लिखते हैं, नए घर में पहला कदम रखते समय भगवान का नाम लेते हैं। इसे केवल रिवाज़ समझकर किया जाए, तो वह ज्ञानेश्वर का बिना जला दीया है। पर अगर उस एक अक्षर के साथ मन में यह भाव भी आए कि यह काम मेरा अकेले का नहीं, उसका है जिसके नाम से सृष्टि शुरू हुई, तो वही छोटा-सा "ॐ" काम के सारे टेढ़ेपन को सीधा करने लगता है।

और एक बात, जो शायद आपने ध्यान न दी हो। परम्परा से गीता के हर अध्याय के अन्त में जो पंक्ति पढ़ी जाती है, वह इन्हीं शब्दों से शुरू होती है: "ॐ तत्सदिति"। यानी हर अध्याय, अपनी सारी बातें कहकर, अन्त में अपने को इन्हीं तीन शब्दों को सौंप देता है।

तो इन दो श्लोकों से आज के लिए यह बात निकलती है: हमारे कर्म अधूरे होंगे, यह भगवान जानते हैं। इसीलिए उन्होंने अधूरे को पूरा करने का रास्ता भी दिया है, अपना नाम। कर्म ॐ से शुरू हो, तो उसकी कमी उस नाम में समा जाती है।

पर अभी एक बात बाकी है। ॐ तो आरम्भ का शब्द है। पर बीच वाला शब्द, "तत्", यानी "वह", वह किस काम आता है? और "सत्" किसे कहते हैं? अगले दो श्लोकों में श्रीकृष्ण बताते हैं कि "वह" कहकर काम करने से फल की भूख कैसे छूटती है, और एक बुरा आदमी भी "सत्" कैसे कहलाने लगता है।

तदित्यनभिसंधाय फलं यज्ञतपःक्रियाः । दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः ॥ २५ ॥
गीता 17.25 — अर्थ पढ़ें ›
सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते । प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते ॥ २६ ॥
गीता 17.26 — अर्थ पढ़ें ›

पच्चीसवाँ श्लोक। "तदित्यनभिसंधाय फलं यज्ञतपःक्रियाः", "तत्" कहकर, फल को लक्ष्य न करके, यज्ञ और तप की क्रियाएँ, "दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः", और दान की अनेक क्रियाएँ, मोक्ष चाहने वाले करते हैं।

"तत्", यानी "वह"। ज़रा इस शब्द पर रुकिए। हम भगवान को "मैं" नहीं कहते, "तुम" भी कम कहते हैं। यहाँ उन्हें "वह" कहा जा रहा है। हमारी टीका इसका अर्थ खोलती है: "तत्" ब्रह्म का नाम है, जिसे कर्म अर्पित किया जाता है, इसलिए कर्ता कोई फल अपना नहीं मानता। यानी "तत्" कहना एक तरह से अपने कर्म पर से अपना नाम हटा देना है। जब तक काम पर "मेरा" लिखा है, फल की चिन्ता भी मेरी है। जिस दिन उस पर "उसका" लिख दिया, उस दिन फल भी उसका हो गया।

रामानुजाचार्य यहाँ याद दिलाते हैं कि "तत्" ब्रह्म का प्रसिद्ध नाम है, और प्रमाण में विष्णुसहस्रनाम का वह नाम देते हैं, जहाँ भगवान को "यत्तत्पदमनुत्तमम्" कहा गया है, वह जो सबसे ऊँचा पद है। मधुसूदन सरस्वती "तत्त्वमसि" वाले उपनिषद-वचन की ओर इशारा करते हैं, जहाँ "तत्" वही परम सत्य है। और श्रीधर स्वामी इसका फल बताते हैं: "तत्" कहकर किया गया कर्म मन को शुद्ध करता है, फल के संकल्प को छुड़ाता है, और इसी से आदमी में मोक्ष की सच्ची चाह जागती है।

यह बात गीता में पहले भी आ चुकी है, बस दूसरे शब्दों में। सातवें सत्संग में आपने सुना था, "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन", तुम्हारा अधिकार कर्म में है, फल में कभी नहीं। और सत्ताईसवें सत्संग में, "यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्", जो करते हो, जो खाते हो, जो हवन करते हो, जो देते हो, वह सब मुझे अर्पण करो। आज का "तत्" उसी अर्पण का एक शब्द में रूप है। तप करो, दान करो, यज्ञ करो, और मन ही मन कहो, "वह", यह उसका है।

अब छब्बीसवाँ श्लोक। "सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते", "सत्" शब्द सत्यभाव में और श्रेष्ठभाव में प्रयोग किया जाता है, "प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते", और वैसे ही, हे पार्थ, उत्तम कर्म के लिए भी "सत्" शब्द का प्रयोग होता है।

यहाँ "सत्" के तीन अर्थ हैं, और शंकराचार्य तीनों के उदाहरण देते हैं। पहला, "सद्भाव", होना: जो नहीं था, वह हो जाए, जैसे जिस घर में पुत्र नहीं था, वहाँ पुत्र का जन्म हो, तो कहते हैं, अब है। और दूसरा, "साधुभाव", और इस अर्थ का उदाहरण बहुत सुन्दर है। शंकराचार्य कहते हैं: जो आदमी बुरे आचरण वाला था, असाधु था, उसका अच्छे आचरण वाला हो जाना, यह भी "सत्" है। सोचिए, ब्रह्म के नाम का अर्थ समझाने के लिए आचार्य ने कौन-सा उदाहरण चुना? एक बिगड़े हुए आदमी का सुधर जाना। यानी जब कोई गिरा हुआ उठता है, तो वह उठना भी भगवान का नाम है।

और यह आपको सत्ताईसवें सत्संग की वह बात याद दिलाएगा, जो गीता के सबसे बड़े भरोसों में से एक है: "अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्", अगर कोई बहुत बुरे आचरण वाला भी अनन्य भाव से मुझे भजता है, "साधुरेव स मन्तव्यः", तो उसे साधु ही मानना चाहिए। वहाँ श्रीकृष्ण ने कहा था कि ऐसा आदमी साधु माना जाए। यहाँ बताया जा रहा है कि वह साधु होना ही "सत्" है। जो बदलना चाहता है, उसके लिए यह श्लोक एक दरवाज़ा है: उसकी पुरानी कहानी उसका नाम नहीं, उसका बदलना उसका नाम है।

और तीसरा अर्थ, "प्रशस्त कर्म", उत्तम और मंगल कर्म। श्रीधर स्वामी और शंकराचार्य विवाह जैसे शुभ कर्मों का उदाहरण देते हैं, जिनके लिए कहा जाता है, "यह सत्कर्म है"। और मधुसूदन सरस्वती एक सूक्ष्म बात जोड़ते हैं: "सत्" कहने से उस शंका का भी उत्तर हो जाता है कि इस कर्म का फल होगा भी या नहीं। सत्, यानी जो है, जो व्यर्थ नहीं जाता।

आज के जीवन में यह कैसा दिखता है, यह मैं अपनी ओर से कहूँ। किसी परिवार में एक आदमी बरसों से शराब पीता था, घर में कलह थी, बच्चे उससे डरते थे। फिर एक दिन उसने छोड़ दी, धीरे-धीरे, गिरते-पड़ते, पर छोड़ दी। अब मोहल्ले में कुछ लोग आज भी उसकी पुरानी बातें याद करते हैं। पर शंकराचार्य की इस टीका के हिसाब से, उस घर में जो हुआ, वह "सत्" का जन्म है। और जो लोग पुराने आदमी को ही याद रखते हैं, वे उस नाम को नहीं पहचान रहे जो उस घर में अभी-अभी प्रकट हुआ है।

तो इन दो श्लोकों से आज के लिए यह बात निकलती है: "तत्" कहकर काम करने का अर्थ है, काम पर से अपना नाम हटा देना, और फल की भूख वहीं ढीली पड़ने लगती है। और "सत्" का अर्थ है, जो सच्चा है, जो अच्छा है, और जो बुरे से अच्छा बन रहा है।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने कहा, ये तीन शब्द अधूरे कर्म को पूरा कर देते हैं। पर क्या कोई कर्म ऐसा भी है जिसे ये तीनों शब्द भी नहीं बचा सकते? अगले दो श्लोकों में, जो इस अध्याय के आख़िरी श्लोक हैं, श्रीकृष्ण वह एक चीज़ बताते हैं, जिसके बिना सब कुछ "असत्" हो जाता है, न यहाँ काम का, न वहाँ।

यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते । कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते ॥ २७ ॥
गीता 17.27 — अर्थ पढ़ें ›
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् । असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥ २८ ॥
गीता 17.28 — अर्थ पढ़ें ›

सत्ताईसवाँ श्लोक। "यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते", यज्ञ, तप और दान में स्थिति भी "सत्" कही जाती है, "कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते", और उसके लिए किया गया कर्म भी "सत्" ही कहा जाता है।

"स्थिति" का अर्थ मधुसूदन सरस्वती करते हैं, निष्ठा, यानी उसमें टिके रहना। एक दिन का दान नहीं, एक दिन का व्रत नहीं, बल्कि बरसों का टिकाव। याद कीजिए, राजस तप को श्रीकृष्ण ने "चल" कहा था, हिलने वाला। और यहाँ उसका उलटा है, स्थिति, जो टिक जाए। जो टिक गया, वही सत् है।

और "तदर्थीयं", उसके लिए किया गया कर्म। हमारी टीका बताती है कि इसके दो अर्थ लिए जाते हैं: कुछ आचार्य इसे भगवान के लिए किया गया कर्म मानते हैं, और कुछ यज्ञ, तप और दान के लिए किया गया कर्म। श्रीधर स्वामी पहले अर्थ को ऐसे खोलते हैं कि हर घर उसमें आ जाता है। वे कहते हैं, भगवान की पूजा के लिए जो कुछ किया जाए, आँगन बुहारना, लीपना, रंगोली बनाना, सजाना, और उसके लिए जो दूसरे काम किए जाएँ, बग़ीचा लगाना, खेत जोतना, धन कमाना, वे भी, चाहे कितने ही दूर के हों, "सत्" ही कहलाते हैं। सोचिए, जो माँ सुबह उठकर पूजा की जगह साफ़ करती है, उसका झाड़ू भी ब्रह्म का नाम है।

और शंकराचार्य इस श्लोक के अन्त में पूरे प्रसंग का निचोड़ देते हैं। वे कहते हैं, यज्ञ, दान, तप जैसा कोई कर्म, जो सात्त्विक न हो, जिसमें गुण की कमी हो, वह भी अगर श्रद्धा के साथ किया जाए, तो ब्रह्म के इन तीन नामों के प्रयोग से गुण वाला और सात्त्विक बना दिया जाता है। नीलकण्ठ भी यही कहते हैं। पर ध्यान दीजिए, दोनों एक शर्त रखते हैं: श्रद्धा के साथ। और वहीं से अगला श्लोक आता है।

अब इस अध्याय का अन्तिम श्लोक, अट्ठाईसवाँ। "अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्", हे पार्थ, जो कुछ बिना श्रद्धा के हवन किया, दिया, तप किया, या किया जाता है, "असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह", वह "असत्" कहलाता है। वह न मरने के बाद काम का है, न यहाँ।

यह इस पूरे अध्याय का ताला बन्द करने वाला श्लोक है। हमारी टीका कहती है, यह अर्जुन के आरम्भिक प्रश्न का दूसरी ओर से उत्तर है। अर्जुन ने पूछा था, जो शास्त्र की विधि छोड़कर श्रद्धा से पूजते हैं, उनका क्या? और अब अन्त में श्रीकृष्ण कहते हैं: जो श्रद्धा के बिना, विधि से भी, कुछ करता है, वह फल नहीं देता। यानी पूरा अध्याय घूमकर एक ही शब्द पर आ टिका: श्रद्धा। ॐ तत् सत् अधूरे कर्म को पूरा कर सकते हैं, पर बिना श्रद्धा वाले कर्म को नहीं।

शंकराचार्य कहते हैं, ऐसा कर्म कितनी ही मेहनत से किया जाए, न परलोक में फल देता है, न यहाँ, क्योंकि सज्जन उसकी निन्दा करते हैं। श्रीधर स्वामी कहते हैं, यहाँ भी नहीं, क्योंकि उससे यश भी नहीं मिलता। और नीलकण्ठ इस अध्याय की टीका एक ऐसी बात पर समाप्त करते हैं, जो मुझे इस पूरे अध्याय का सबसे कोमल वाक्य लगता है। वे कहते हैं: इसलिए सात्त्विक श्रद्धा ही, माँ की तरह, सुख चाहने वालों की शरण बनाई जाए। श्रद्धा माँ है। जैसे माँ के बिना बच्चे का कोई खाना पूरा नहीं लगता, वैसे ही श्रद्धा के बिना कोई कर्म पूरा नहीं होता।

आपको याद होगा, सत्ताईसवें सत्संग की वह कथा, जिसे पिछली बार हमने "हृद्या" थाली के साथ फिर देखा था: श्रीकृष्ण ने दुर्योधन का सजा हुआ भोजन ठुकराकर विदुर के घर भोजन किया। आज उसी दिन की भेंट देखिए। दुर्योधन के घर सोने का पलंग था, गाय थीं, घर और राज्य तक की भेंट थी, पर प्रेम नहीं था, और श्रीकृष्ण के लिए वह सब "असत्" था। इतनी बड़ी भेंट, और भगवान ने उसे हाथ भी नहीं लगाया।

और यहीं सत्रहवाँ अध्याय पूरा होता है। इसमें भोजन, यज्ञ, तप और दान, चारों को तीन गुणों की कसौटी पर रखा गया, और अन्त में ब्रह्म का वह तीन शब्दों वाला नाम दिया गया, जो हमारे अधूरे कर्मों को पूरा करता है, बशर्ते श्रद्धा हो।

और अगला अध्याय, महाभारत के भीष्म पर्व का बयालीसवाँ, "मोक्षसंन्यासयोग", गीता का अन्तिम अध्याय है। वह अर्जुन के एक प्रश्न से शुरू होता है, और गीता में यह अर्जुन का आख़िरी प्रश्न है: "संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्", हे महाबाहो, मैं संन्यास का तत्त्व जानना चाहता हूँ, "त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन", और त्याग का भी, हे हृषीकेश, अलग-अलग। आज हमने तप, दान और यज्ञ को करने का सही ढंग सुना। अगली बार अर्जुन पूछेंगे कि छोड़ना किसे कहते हैं, और संन्यास और त्याग में अन्तर क्या है। उसका उत्तर अगले सत्संग में।

तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली बात। तप जंगल में नहीं, रोज़ के जीवन में होता है: हाथों से सेवा, ज़ुबान से ऐसा सच जो चुभे नहीं, प्रिय हो और भला करे, और मन में प्रसन्नता और छल से ख़ालीपन। और तप को उसके कष्ट से नहीं, उसकी नीयत से नापिए।

दूसरी बात। दान में यह मत देखिए कि कितना दिया, यह देखिए कि कैसे दिया: बिना बदले की आशा के, बिना पछतावे के, और आदर के साथ। पृथा ने वर ठुकराए, कर्ण ने कवच दिया पर बदले में शक्ति माँगी। दोनों बड़े थे, पर कसौटी गाँठ की है।

तीसरी बात। हमारा कोई कर्म पूरा नहीं होता, इसलिए डरिए मत। ॐ से शुरू कीजिए, "तत्" कहकर फल उसे सौंप दीजिए, और "सत्" की ओर बढ़ते रहिए। बस श्रद्धा मत छोड़िए, क्योंकि वह माँ है।

आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आपके जीवन में किसी का कोई ऐसा वचन है, जो सच भी था, मीठा भी, और जिसने आपका भला भी किया, जो आज भी याद आता है? या कोई ऐसा दान, जो किसी ने बिना बताए, बिना बदले के आपको दिया? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।

वचन ऐसा हो जो किसी को डराए नहीं, सच हो, प्रिय हो, और भला करे। यही वाणी का तप है।

जय श्री कृष्ण।

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् । स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥ १५ ॥
गीता 17.15 — अर्थ पढ़ें ›

तीन बातें

  1. तप जंगल में नहीं, रोज़ के जीवन में होता है: हाथों से सेवा, ज़ुबान से ऐसा सच जो चुभे नहीं, प्रिय हो और भला करे, और मन में प्रसन्नता और छल से ख़ालीपन। और तप को उसके कष्ट से नहीं, उसकी नीयत से नापिए।
  2. दान में यह मत देखिए कि कितना दिया, यह देखिए कि कैसे दिया: बिना बदले की आशा के, बिना पछतावे के, और आदर के साथ। पृथा ने वर ठुकराए, कर्ण ने कवच दिया पर बदले में शक्ति माँगी। दोनों बड़े थे, पर कसौटी गाँठ की है।
  3. हमारा कोई कर्म पूरा नहीं होता, इसलिए डरिए मत। ॐ से शुरू कीजिए, "तत्" कहकर फल उसे सौंप दीजिए, और "सत्" की ओर बढ़ते रहिए। बस श्रद्धा मत छोड़िए, क्योंकि वह माँ है।