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सत्संग ४६

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जैसी श्रद्धा, वैसा इंसान

गीता 17.1–17.13 · 77 मिनट

श्रद्धा और भोजन, तीन प्रकार के

अर्जुन उवाच ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः । तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः ॥ १ ॥
गीता 17.1 — अर्थ पढ़ें ›
श्रीभगवानुवाच त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा । सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु ॥ २ ॥
गीता 17.2 — अर्थ पढ़ें ›
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत । श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥ ३ ॥
गीता 17.3 — अर्थ पढ़ें ›

आप किस चीज़ पर भरोसा करते हैं? पैसे पर, लोगों की राय पर, अपनी किस्मत पर, या भगवान पर? और क्या आपने कभी सोचा है कि जिस चीज़ पर आदमी सच्चे मन से भरोसा करता है, धीरे-धीरे वह वैसा ही बनता चला जाता है? आज का सवाल यही है, और गीता उसका उत्तर एक छोटे-से वाक्य में देती है: जैसी श्रद्धा, वैसा इंसान।

जय श्री कृष्ण।

आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का छियालीसवाँ सत्संग है, और आज से सत्रहवाँ अध्याय शुरू होता है। महाभारत के भीष्म पर्व का इकतालीसवाँ अध्याय ही गीता का सत्रहवाँ अध्याय है, और उसका नाम है "श्रद्धात्रय विभाग योग", यानी तीन तरह की श्रद्धा को अलग-अलग पहचानने का योग। और हर बार की तरह याद रखिए कि यह सब हमें सञ्जय सुना रहे हैं, हस्तिनापुर के महल में, अन्धे राजा धृतराष्ट्र को, उस दिन जब भीष्म बाणों की शय्या पर गिर चुके हैं और युद्ध के दस दिन बीत चुके हैं।

पहले याद कर लें कि पिछली बार हम कहाँ रुके थे। पिछले सत्संग में सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ था। श्रीकृष्ण ने बताया था कि नरक के तीन दरवाज़े हैं, काम, क्रोध और लोभ, और ये तीनों आदमी का अपना ही नाश करते हैं, इसलिए इन तीनों को छोड़ देना चाहिए। और फिर अध्याय इन दो श्लोकों पर समाप्त हुआ था: "यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः", जो शास्त्र की विधि को छोड़कर मनमाने ढंग से चलता है, "न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्", वह न सिद्धि पाता है, न सुख, न परम गति। और इसलिए, "तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते", क्या करना है और क्या नहीं, इसका फ़ैसला करने में शास्त्र ही तुम्हारे लिए प्रमाण है।

अब ज़रा अर्जुन की जगह बैठकर सोचिए। यह बात सुनकर उनके मन में एक प्रश्न उठता है, और सच कहूँ तो यह प्रश्न हम में से बहुतों का प्रश्न है। शास्त्र को प्रमाण मानना ठीक है। पर संसार में कितने लोग हैं जिन्होंने शास्त्र पढ़े हैं? हमारी दादी-नानी, जो रोज़ सुबह तुलसी में जल चढ़ाती थीं, दीया जलाती थीं, व्रत रखती थीं, उन्होंने कौन-से वेद पढ़े थे? उन्हें विधि की बारीकियाँ नहीं पता थीं। पर उनकी श्रद्धा में कोई कमी नहीं थी। तो ऐसे लोगों का क्या? वे किस गिनती में आएँगे?

और ध्यान दीजिए, चौदहवें अध्याय के बाद, पूरे पन्द्रहवें और सोलहवें अध्याय में, श्रीकृष्ण ही बोलते रहे। अब अर्जुन फिर बोलते हैं, इसीलिए गाने में आपने सुना, "अर्जुन उवाच"।

वे पूछते हैं: "ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः", हे कृष्ण, जो लोग शास्त्र की विधि को छोड़कर, पर श्रद्धा से भरकर पूजा करते हैं, "तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः", उनकी स्थिति क्या है? सत्त्व, रज, या तम?

"निष्ठा" शब्द पर ध्यान दीजिए। निष्ठा यानी वह ज़मीन जिस पर कोई टिका हुआ है। अर्जुन पूछ रहे हैं, ऐसे आदमी के पैर किस ज़मीन पर हैं?

अब सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि अर्जुन किन लोगों के बारे में पूछ रहे हैं, क्योंकि इसी में पूरे अध्याय की कुंजी है। हमारी टीका साफ़ कहती है: अर्जुन उनके बारे में पूछते हैं जो शास्त्र को जानते नहीं, या उसका पालन नहीं कर पाते। उनके बारे में नहीं, जो पिछले अध्याय के अन्त में बताए अनुसार शास्त्र को तिरस्कार से ठुकरा देते हैं। यानी एक वह है जो कहता है, "मुझे शास्त्र से क्या लेना, मैं जो चाहूँगा वही करूँगा।" और एक वह है जो कहता है, "मुझे शास्त्र पता नहीं, पर मेरे बड़े जैसे करते आए हैं, मैं भी श्रद्धा से वैसे ही करता हूँ।" इन दोनों में ज़मीन-आसमान का अन्तर है।

शंकराचार्य यही बात कहते हैं। ये वे लोग हैं जिन्हें श्रुति या स्मृति की कोई विधि दिखती ही नहीं, और जो बस बड़े-बूढ़ों का व्यवहार देखकर, श्रद्धा से, देवताओं की पूजा करते हैं। श्रीधर स्वामी और जोड़ते हैं: कुछ लोग शास्त्र समझने को कठिन मानकर, या आलस से, उसे समझने की मेहनत नहीं करते, और केवल परम्परा के भरोसे श्रद्धा से पूजा करते हैं।

और मधुसूदन सरस्वती इस प्रश्न को बहुत सुन्दर ढंग से रखते हैं। वे कहते हैं, सोलहवें अध्याय के अन्त तक दो तरह के लोग तय हो चुके थे: जो शास्त्र भी मानते हैं और श्रद्धा भी रखते हैं, वे दैवी स्वभाव वाले, और जो दोनों को नहीं मानते, वे आसुरी। अब यह तीसरी तरह के लोग हैं, जिनमें दोनों का थोड़ा-थोड़ा है। विधि को छोड़ना आसुरी लोगों जैसा, और श्रद्धा से पूजा करना दैवी लोगों जैसा। तो अर्जुन को सन्देह हुआ, इन्हें किस ओर रखें?

नीलकण्ठ, जिन्होंने पूरे महाभारत पर टीका लिखी, यहाँ एक बहुत ज़मीनी उदाहरण देते हैं। वे कहते हैं, यहाँ "शास्त्र" में सज्जनों का आचरण और कुल की रीति भी आती है। फिर वे एक आदमी का चित्र खींचते हैं जो कहता है: "यह कुआँ मेरे पिता ने बनवाया था। मेरे लिए यह सौ गंगाओं से बढ़कर है। इसी में नहाऊँगा, और मुझे मेरा फल ज़रूर मिलेगा।" ऐसे आदमी को हम सब जानते हैं। पिता के प्रति इतना आदर सात्त्विक लगता है, और छोटी-सी चीज़ को सबसे बड़ा मान लेना तामसी भ्रम। अर्जुन का प्रश्न ठीक यही उलझन है।

और संत ज्ञानेश्वर इन लोगों के प्रति बहुत कोमल हैं। वे कहते हैं, किसी को शास्त्र पढ़ने का समय नहीं मिला, पढ़ाने वाला दूर रहा, साधन नहीं जुटे। तो उसने उन्हें देखा जो पवित्र जीवन जीते हैं, और मन में ठाना कि मुझे भी इनके जैसा बनना है। और ज्ञानेश्वर इसका एक प्यारा चित्र देते हैं: जैसे छोटा बच्चा पट्टी पर लिखे अक्षरों के ठीक नीचे वैसे ही अक्षर बनाता है, वैसे ही ये लोग बड़ों के आचरण को अपनी श्रद्धा का प्रमाण बना लेते हैं।

तो क्या उस भोले आदमी की पूजा बेकार है, जो कहता है, "मैं ज़्यादा पढ़ा-लिखा नहीं हूँ, विधि मुझे नहीं आती"?

और अब दूसरा श्लोक। यहाँ से उत्तर शुरू होता है, इसलिए गाने में "श्रीभगवानुवाच" आया। "त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा", देहधारियों की श्रद्धा तीन प्रकार की होती है, और वह उनके स्वभाव से उत्पन्न होती है, "सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु", सात्त्विकी, राजसी और तामसी। उसके बारे में सुनो।

ध्यान दीजिए, श्रीकृष्ण सीधे यह नहीं कहते कि ऐसे लोग सात्त्विक हैं या तामसी। शंकराचार्य कहते हैं, यह प्रश्न इतना सामान्य है कि इसका उत्तर बाँटकर ही दिया जा सकता है।

और "स्वभावजा", स्वभाव से जन्मी। हमारी टीका बताती है कि यहाँ स्वभाव का अर्थ है वे संस्कार जो हर आदमी पिछले जन्मों से अपने साथ लाता है। यानी हम खाली स्लेट लेकर पैदा नहीं होते। कुछ रुचियाँ, कुछ झुकाव, कुछ डर, कुछ भरोसे हमारे साथ ही आते हैं।

रामानुजाचार्य यहाँ श्रद्धा की एक बहुत सुन्दर परिभाषा देते हैं। वे कहते हैं, जहाँ रुचि होती है, वहीं श्रद्धा पैदा होती है। और श्रद्धा है यह भरोसा कि "यह रास्ता मुझे वहाँ पहुँचा देगा जहाँ मैं पहुँचना चाहता हूँ", और उस भरोसे के साथ उस रास्ते पर चल पड़ने की उतावली। जिस आदमी को सचमुच भरोसा है कि सुबह की सैर उसके लिए अच्छी है, वह जाड़े में भी उठ जाता है। और जिसे भरोसा नहीं, वह करवट बदलकर सो जाता है। श्रद्धा केवल मानना नहीं है। श्रद्धा वह है जो पैरों को चला दे।

श्रीधर स्वामी यहाँ एक बात जोड़ते हैं जो आगे बहुत काम आएगी। जो शास्त्र को समझकर चलते हैं, उनकी श्रद्धा एक ही तरह की होती है, सात्त्विकी, क्योंकि शास्त्र का विवेक स्वभाव को बदलने की शक्ति रखता है। पर जो केवल लोक की रीति के भरोसे चलते हैं, उनकी श्रद्धा वैसी ही बन जाती है जैसा उनका स्वभाव है।

और संत ज्ञानेश्वर यहाँ एक चेतावनी देते हैं, बड़े प्रेम से। वे कहते हैं, अर्जुन, केवल इसलिए सन्तुष्ट मत हो जाना कि किसी चीज़ को "श्रद्धा" कहा गया है। चन्दन ठंडा होता है, पर आग से मिल जाए तो क्या हाथ नहीं जलाएगा? श्रद्धा अपने आप में शुद्ध है, पर जिस आदमी में वह गिरती है, उसके गुणों का रंग पकड़ लेती है।

और यही बात तीसरा श्लोक खोलकर कहता है, जो इस पूरे अध्याय का हृदय है, और आज के सत्संग का भी।

"सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत", हे भारत, सबकी श्रद्धा उनके अन्तःकरण के अनुरूप होती है। "श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः", यह पुरुष श्रद्धामय है। जिसकी जैसी श्रद्धा है, वह वैसा ही है।

यहाँ "सत्त्व" का अर्थ गुण वाला सत्त्व नहीं है। शंकराचार्य और रामानुजाचार्य, दोनों कहते हैं, यहाँ सत्त्व का अर्थ है अन्तःकरण, यानी भीतर का मन, बुद्धि, वह सब जो संस्कारों से भरा हुआ है। जैसा भीतर का बर्तन, वैसा उसमें भरा भरोसा।

और फिर वह वाक्य: "श्रद्धामयोऽयं पुरुषो"। मनुष्य श्रद्धामय है, श्रद्धा से भरा हुआ। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, जैसे कोई कहे कि यह यज्ञ अन्नमय है, यानी इसमें अन्न ही अन्न है, वैसे ही आदमी में श्रद्धा ही श्रद्धा भरी है। और रामानुजाचार्य इससे भी आगे जाते हैं। वे कहते हैं, आदमी अपनी श्रद्धा का ही परिणाम है, उसका ही बदला हुआ रूप।

संत ज्ञानेश्वर इस पर एक ऐसा चित्र देते हैं जो भूलता नहीं। वे कहते हैं, पानी तो जीवन ही है। पर वही पानी ज़हर में मिल जाए तो मारता है, मिर्च में जाए तो तीखा हो जाता है, और गन्ने में जाए तो मीठा। श्रद्धा भी ऐसी ही है। और वे कहते हैं, यह सारा संसार श्रद्धा से ही ढला हुआ है।

अब इसे अपनी ज़िन्दगी पर रखकर देखिए। हर आदमी किसी न किसी चीज़ पर श्रद्धा रखता है। कोई कहता है, "मैं तो किसी को नहीं मानता", पर वह भी किसी चीज़ को मानता है। अपनी चतुराई को, अपने बैंक के खाते को, या इस बात को कि "दुनिया में सब धोखेबाज़ हैं"। और देखिए क्या होता है। जिसकी श्रद्धा इस बात में है कि सब धोखेबाज़ हैं, वह धीरे-धीरे हर किसी पर शक करने लगता है, उसके दोस्त कम होते जाते हैं, उसका चेहरा सख़्त होता जाता है। उसकी श्रद्धा उसे गढ़ रही है। और जिसकी श्रद्धा इस बात में है कि भलाई कभी व्यर्थ नहीं जाती, वह मार खाकर भी भला बना रहता है, और उसके चारों ओर एक भरोसे का घेरा बनता चला जाता है। "यो यच्छ्रद्धः स एव सः।" जो जिस पर भरोसा करता है, वह वही हो जाता है।

और इस सत्य को देखने के लिए हमें कहीं दूर नहीं जाना है। आज जो दो लोग यह अध्याय सुन और सुना रहे हैं, उन्हीं को देखिए। आपको याद होगा, सत्ताईसवें सत्संग में हमने सुना था कि धृतराष्ट्र ने सञ्जय से पूछा था, "तुम माधव को कैसे जानते हो, और मैं क्यों नहीं जानता?" और सञ्जय ने कहा था, "मैं छल का सहारा नहीं लेता, व्यर्थ के कर्मकाण्ड नहीं करता। भक्ति से मैंने शुद्ध मन पाया है, और शास्त्रों से मैं जनार्दन को जानता हूँ।" एक ही महल, एक ही कृष्ण, एक ही कथा। पर सञ्जय की श्रद्धा जनार्दन में थी, और धृतराष्ट्र की श्रद्धा अपने बेटे में। और दोनों वही बने, जिस पर उनका भरोसा था।

पर यहाँ एक डर भी उठ सकता है। अगर श्रद्धा स्वभाव से बनती है, और स्वभाव पिछले जन्मों से आता है, तो क्या मैं अपने स्वभाव में बँधा हूँ? जैसा हूँ, वैसा ही रहूँगा? तिलक यहाँ ठीक यही प्रश्न उठाते हैं, और बहुत भरोसे वाला उत्तर देते हैं। वे कहते हैं, आत्मा स्वतन्त्र है। इसलिए देह का यह स्वभाव अभ्यास और वैराग्य से धीरे-धीरे बदला जा सकता है। और श्रीधर स्वामी की बात हमने अभी सुनी: शास्त्र का विवेक स्वभाव को जीत लेता है, और तब श्रद्धा एक ही रह जाती है, सात्त्विकी।

और एक बात और याद कर लीजिए, जो श्रीकृष्ण सातवें अध्याय में कह चुके हैं, और जो हमने बाईसवें सत्संग में सुनी थी: "यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति", जो-जो भक्त जिस-जिस रूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, "तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्", उस-उस की उसी श्रद्धा को मैं अचल कर देता हूँ। यानी श्रद्धा का दीया चाहे जिस घर में जले, उसमें तेल वही डालते हैं।

तो आज की पहली बात इतनी ही है। आप वही हैं, जिस पर आप भरोसा करते हैं। और भरोसा बदला जा सकता है।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रद्धा तो भीतर छिपी रहती है। किसी की श्रद्धा सात्त्विक है या राजसी या तामसी, यह पहचाना कैसे जाए? श्रीकृष्ण इसका एक बहुत सीधा-सा निशान बताते हैं: देखो, वह आदमी किसे पूजता है। आइए, वह श्लोक सुनते हैं।

यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः । प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः ॥ ४ ॥
गीता 17.4 — अर्थ पढ़ें ›
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः । दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ॥ ५ ॥
गीता 17.5 — अर्थ पढ़ें ›

चौथा श्लोक। "यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः", सात्त्विक लोग देवताओं को पूजते हैं, राजस लोग यक्षों और राक्षसों को, "प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः", और दूसरे, तामस लोग, प्रेतों और भूतगणों को पूजते हैं।

यह वही पहचान है जिसकी बात हम कर रहे थे। श्रद्धा दिखती नहीं, पर उसका निशान दिखता है। शंकराचार्य कहते हैं, कोई किसे पूजता है, इस काम को निशान मानकर उसके भीतर के गुण का अनुमान किया जाता है। ठीक वैसे, जैसे हम धुआँ देखकर आग का अनुमान करते हैं। और हमारी टीका भी यही कहती है: कोई किसे पूजता है, इससे उसकी श्रद्धा का गुण प्रकट होता है।

अब ये शब्द ठीक से समझ लें। देवता प्रकाश के, देने वाले, पालने वाले। हमारी टीका बताती है कि यक्ष धन और शक्ति वाले प्राणी हैं, और राक्षस उग्र और हिंसक। मधुसूदन सरस्वती उदाहरण देते हुए यक्षों में कुबेर का नाम लेते हैं, जो धन के स्वामी हैं। और प्रेत और भूतगण वे हैं जो इस शरीर को छोड़ चुके हैं पर किसी नीचे की अवस्था में अटके हुए माने जाते हैं।

पर अब मैं एक बात बहुत साफ़ कह दूँ, ताकि कोई ग़लत अर्थ न निकले। यह श्लोक किसी के कुल-देवता या गाँव की देवी का अपमान नहीं है। श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि पूजा के पीछे जो भाव है, वह किस रंग का है, यह देखो। और नौवें अध्याय में, जो हमने छब्बीसवें सत्संग में सुना था, वे कह चुके हैं: "येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः", जो दूसरे देवताओं के भक्त श्रद्धा से उनकी पूजा करते हैं, "तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्", वे भी मुझे ही पूजते हैं, बस विधि से नहीं। वही दो बातें जो आज अर्जुन के प्रश्न में हैं, "श्रद्धयान्विताः" और विधि का न होना। जो दरवाज़ा भगवान ने पहले खोला था, वह आज भी खुला है।

तो इस श्लोक को अपनी ज़िन्दगी में कैसे पढ़ें? मुझे लगता है, यह पूछकर कि मैं दौड़कर किसके पास जाता हूँ। रामानुजाचार्य यहाँ तीनों श्रद्धाओं का फल बताते हैं। सात्त्विक श्रद्धा उस सुख की ओर ले जाती है जिसमें दुःख की मिलावट नहीं। राजसी श्रद्धा थोड़ा सुख देती है, पर दुःख से मिला हुआ। और तामसी में दुःख ही ज़्यादा है, सुख बहुत थोड़ा।

अब सोचिए, यक्ष धन और शक्ति के प्रतीक हैं। आज भी बहुत लोग उसी की पूजा करते हैं, भले मन्दिर में न करें। जिसके पास पैसा है, जिसके पास ताक़त है, उसके आगे झुकना, उसी की हाँ में हाँ मिलाना, उसी से उम्मीद रखना। और देखिए, उससे सुख मिलता भी है, पर दुःख से मिला हुआ। आज वह ख़ुश है तो सब ठीक, कल रूठ गया तो सब गया। और जिसकी श्रद्धा डर से बनी है, "कहीं कुछ बुरा न हो जाए, कहीं कोई नज़र न लग जाए, कहीं कोई अनिष्ट न हो जाए", उसकी पूजा भी एक बोझ बन जाती है। उसमें प्रेम कम, घबराहट ज़्यादा होती है।

और सात्त्विक श्रद्धा? वह प्रकाश की ओर जाती है। वह माँगती कम है, धन्यवाद ज़्यादा देती है। ऐसी श्रद्धा से जो सुख आता है, उसमें डर की मिलावट नहीं होती।

और अब वह बात, जो मैं पहले प्रश्न के उत्तर के रूप में आपको सुनाना चाहता था। क्या उस भोले आदमी की पूजा बेकार है, जिसने शास्त्र नहीं पढ़ा? संत ज्ञानेश्वर इसका उत्तर बहुत प्रेम से देते हैं। वे कहते हैं, जिसकी श्रद्धा सात्त्विक है, उसके लिए मोक्ष कोई हौआ नहीं। चाहे उसने ब्रह्मसूत्र न पढ़ा हो, चाहे सारे शास्त्र न खँगाले हों। पर जो बड़े लोग श्रुति और स्मृति का अर्थ अपने जीवन में उतारकर, मानो उसकी मूर्ति बनकर, संसार को दिखाते हैं, उनके पैरों के निशानों पर जो सात्त्विक श्रद्धा से चलता है, उसे वही फल मिलता है। और फिर ज्ञानेश्वर तीन चित्र देते हैं। एक आदमी बड़ी मेहनत से दीया जलाता है, और दूसरा आकर उसके पास बैठ जाता है, तो क्या दूसरे को रोशनी नहीं मिलती? कोई बहुत पैसा लगाकर घर बनाता है, तो क्या उसमें रहने वाले उसका सुख नहीं पाते? कोई तालाब खुदवाता है, तो क्या वह केवल उसी की प्यास बुझाता है? और आख़िरी चित्र: गंगा गौतम ऋषि के लिए धरती पर आईं, तो क्या बाकी सारे संसार के लिए वह एक नाली बन गईं?

इसलिए ज्ञानेश्वर कहते हैं, जो लोग अपनी-अपनी तरह से शास्त्र को जीते हैं, उनके पीछे जो श्रद्धा से चलता है, वह मूर्ख भी हो तो तर जाता है। तो अपनी दादी-नानी की तुलसी को, उनके दीये को, उनके व्रत को कभी छोटा मत समझिए। अगर उसमें सात्त्विक श्रद्धा थी, तो वह किसी विद्वान की पूजा से कम नहीं थी।

और यहाँ एक पल रुककर मैं आपसे एक निवेदन करना चाहता हूँ। आधा सुना सत्य भ्रम देता है। आज का यह अध्याय भोजन की बात करने वाला है, यज्ञ की बात करने वाला है, और कठोर तप की बात करने वाला है। और इनमें से हर बात आधी सुनी जाए, तो उसका उल्टा अर्थ निकल सकता है। कोई सोच सकता है कि गीता खाने की थाली देखकर लोगों को छोटा-बड़ा बताती है, या कि शरीर को सताना ही भक्ति है। ऐसा बिल्कुल नहीं है, और यह आपको अगले कुछ श्लोकों में साफ़ दिखेगा। इसलिए आज का सत्संग पूरा सुनिए। और अगर यह यात्रा आपको अच्छी लग रही है, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि अगला सत्संग आपसे न छूटे।

अब पाँचवाँ श्लोक। और यहाँ श्रीकृष्ण एक बिल्कुल अलग तरह के लोगों की बात शुरू करते हैं। हमारी टीका बताती है कि पाँचवाँ और छठा श्लोक मिलकर एक ही वाक्य हैं, इसलिए आज हम पाँचवाँ सुनकर एक कथा शुरू करेंगे, और छठा सुनकर उसे पूरा करेंगे।

"अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः", जो लोग शास्त्र में न बताया गया घोर तप करते हैं, "दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः", दम्भ और अहंकार से युक्त, काम, राग और बल के अभिमान से भरे हुए।

एक-एक शब्द देखिए, क्योंकि हर शब्द एक बीमारी का नाम है। "अशास्त्रविहितं", जो शास्त्र ने कहा ही नहीं। "घोरं", शंकराचार्य कहते हैं, जो दूसरे प्राणियों को भी पीड़ा दे और अपने को भी। फिर दम्भ। मधुसूदन सरस्वती इसका अर्थ करते हैं: दुनिया में अपने को धार्मिक दिखाना। अहंकार, यानी यह घमंड कि मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ। काम, किसी चीज़ की चाह। राग, उस चाह से चिपक जाना। और बल। मधुसूदन इसका एक अर्थ देते हैं: ज़िद। यह हठ कि "मैं यह तो करके ही रहूँगा", चाहे जो हो।

और महाभारत में एक कथा है जिसमें ये सारे शब्द एक साथ दिखते हैं। यह कथा वन पर्व में है, और इसे सुनाने वाले हैं मार्कण्डेय ऋषि। आपको याद होगा, तीसवें सत्संग में हमने सुना था कि जयद्रथ के हाथ से द्रौपदी को छुड़ाने के बाद युधिष्ठिर ने मार्कण्डेय से पूछा था, "क्या मुझसे अधिक अभागा कोई राजा हुआ है?" और तब मार्कण्डेय ने उन्हें श्रीराम की कथा सुनाई थी। उस रामकथा के आरम्भ में ही एक प्रसंग है, जिसे हम आज सुनेंगे। रावण, कुम्भकर्ण और विभीषण, इन तीन भाइयों के तप का प्रसंग।

मार्कण्डेय बताते हैं कि विश्रवा नाम के एक मुनि थे, और कुबेर उनके पुत्र थे, धन के स्वामी, जो उस समय लङ्का में रहते थे। विश्रवा के और भी पुत्र हुए: दशग्रीव, जिसे आगे चलकर संसार ने रावण कहा, कुम्भकर्ण, और विभीषण। और पाठ कहता है, ये सब वेद जानने वाले थे, वीर थे, और अपने व्रतों का ठीक पालन करते थे। पिता के साथ गन्धमादन पर्वत पर प्रसन्न होकर रहते थे।

फिर एक दिन उन्होंने देखा कि उनके भाई कुबेर परम ऐश्वर्य के साथ पिता के पास बैठे हैं। और मार्कण्डेय एक छोटा-सा वाक्य कहते हैं, जिसमें पूरी कथा का बीज है: "जलन से भरकर उन्होंने तप करने का निश्चय किया।"

सोचिए। तप, जो भगवान तक पहुँचने का रास्ता माना जाता है, उसकी शुरुआत यहाँ भगवान से नहीं, भाई की दौलत देखकर उठी जलन से हो रही है।

और तप भी कैसा। दशग्रीव हज़ार वर्षों तक एक पैर पर खड़ा रहा, हवा पीकर, पाँच अग्नियों के बीच। कुम्भकर्ण ज़मीन पर सोता था, बहुत थोड़ा खाता था। और विभीषण केवल एक सूखा पत्ता खाते थे, उपवास में रुचि रखते थे, और सदा जप में लगे रहते थे। और हज़ार वर्ष पूरे होने पर, पाठ कहता है, दशग्रीव ने अपना सिर काटकर आग में होम कर दिया। यही वह "घोरं" है जिसकी बात पाँचवाँ श्लोक करता है। पर इसे वीरता समझकर मत सुनिए। श्रीकृष्ण अगले ही श्लोक में ऐसे तप का जो नाम रखते हैं, वह हम अभी सुनेंगे।

अब इस प्रसंग को पाँचवें श्लोक के साथ रखकर देखिए। दम्भ और अहंकार: हम भी कुछ कम नहीं, हम भी उतना ही पाकर दिखाएँगे। काम और राग: वह ऐश्वर्य, जो भाई के पास है, हमें भी चाहिए। और बल, वह ज़िद, जो हज़ार वर्ष एक पैर पर खड़ा रख सके, पर भीतर की जलन को एक दिन भी शान्त न कर सके। मेहनत में कोई कमी नहीं थी। कमी उस जड़ में थी जिससे मेहनत निकल रही थी।

और एक बात पर और ध्यान दीजिए। तप पूरा होने पर ब्रह्मा स्वयं आए, और पाठ कहता है, उन्होंने उन्हें तप से रोका। "प्यारे पुत्रो, अब रुक जाओ, और वर माँगो।" यानी जिसके नाम पर यह सारा कष्ट उठाया जा रहा था, उसकी पहली इच्छा यही थी कि यह कष्ट बन्द हो।

पर अभी एक बात बाकी है। तीनों भाइयों ने एक ही तरह का तप किया था, एक ही जगह, उतने ही वर्ष। पर जब वर माँगने की बारी आई, तो तीनों ने तीन बिल्कुल अलग चीज़ें माँगीं। और जो जिसने माँगा, उसने बता दिया कि वह भीतर से क्या था। वह, और यह बात कि ऐसे तप से शरीर के भीतर बैठे भगवान पर क्या बीतती है, अगले श्लोक के साथ।

कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः । मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् ॥ ६ ॥
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आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः । यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु ॥ ७ ॥
गीता 17.7 — अर्थ पढ़ें ›

पहले वरों की बात पूरी कर लें, फिर श्लोक पर आएँगे, क्योंकि वरों में ही इस श्लोक का उत्तर छिपा है।

ब्रह्मा ने कहा, अमरता को छोड़कर जो चाहो माँग लो। दशग्रीव ने माँगा: मेरी हार न गन्धर्वों से हो, न देवताओं से, न असुरों से, न यक्षों से, न राक्षसों से, न नागों से, न भूतों से। ब्रह्मा ने कहा, इन सबसे तुम्हें कोई भय नहीं होगा, केवल मनुष्य को छोड़कर। और मार्कण्डेय कहते हैं, यह सुनकर दशग्रीव प्रसन्न हो गया, क्योंकि वह दुष्ट बुद्धि वाला मनुष्यों को तुच्छ समझता था। देखिए, उसकी सूची में मनुष्य का नाम ही नहीं आया। जिसे वह छोटा समझता था, उससे बचने की उसने सोची ही नहीं। और आगे की कथा आप जानते हैं, उसका अन्त एक मनुष्य के हाथों ही हुआ, श्रीराम के हाथों।

फिर ब्रह्मा ने कुम्भकर्ण से कहा, वर माँगो। और पाठ उसके लिए एक शब्द रखता है: "अंधकार से घिरे मन वाला।" उसने माँगी, लम्बी नींद। हज़ार वर्ष का तप, और माँगी नींद। तम का इससे सच्चा चित्र और क्या होगा?

और फिर विभीषण की बारी आई। ब्रह्मा ने बार-बार कहा, पुत्र, तुम भी माँगो। और विभीषण ने जो माँगा, उसे मैं चाहता हूँ कि आप याद रख लें। उन्होंने कहा: "बड़ी से बड़ी विपत्ति में भी मेरी बुद्धि अधर्म में न जाए।" और ब्रह्मा ने जो उत्तर दिया, वह आज के सत्संग का सबसे भरोसे वाला वाक्य है: "राक्षस की योनि में जन्म लेकर भी तुम्हारी बुद्धि अधर्म में नहीं लगती। इसलिए मैं तुम्हें अमरता देता हूँ।" जो अमरता दूसरे दोनों माँगकर भी नहीं पा सके, वह उसे मिली जिसने माँगी ही नहीं थी।

अब पहले सुने हुए तीसरे श्लोक को फिर से याद कीजिए: "यो यच्छ्रद्धः स एव सः", जिसकी जैसी श्रद्धा, वह वैसा ही। एक ही पिता, एक ही घर, एक ही तप, एक ही ब्रह्मा। पर जब मन की बात मुँह पर आई, तो एक ने ताक़त माँगी, एक ने नींद माँगी, और एक ने धर्म। एक में रज बोला, एक में तम, और एक में सत्त्व। तप ने उन्हें बदला नहीं। तप ने बस वह बाहर निकाल दिया जो भीतर पहले से था।

और विभीषण की बात में एक और भरोसा है। वे राक्षस-कुल में जन्मे थे। स्वभाव की बात करें, तो उनके चारों ओर का सब कुछ उन्हें दूसरी ओर खींच रहा था। फिर भी उनकी बुद्धि धर्म में टिकी रही। तिलक की वह बात याद कीजिए, जो पहले खंड में सुनी थी: आत्मा स्वतन्त्र है, और स्वभाव धीरे-धीरे बदला जा सकता है। जन्म और घर हमारा आरम्भ तय करते हैं, अन्त नहीं।

और कथा का अगला हिस्सा भी बहुत कुछ कहता है। वर पाकर दशग्रीव ने अपने ही भाई कुबेर को युद्ध में हराकर लङ्का से निकाल दिया, और उनका पुष्पक विमान बलपूर्वक छीन लिया। कुबेर ने उससे कहा, "तुमने मेरा, अपने बड़े का, अपमान किया है, इसलिए तुम जल्दी ही नहीं रहोगे।" और विभीषण? पाठ कहता है, धर्मात्मा विभीषण सज्जनों के मार्ग को याद रखते हुए कुबेर के पीछे चले गए। जिस जलन से तप शुरू हुआ था, उसी जलन ने रावण से उसका भाई छीनवाया, और उसी जगह विभीषण ने भाई का साथ चुना।

और मार्कण्डेय यह भी बताते हैं कि उस दस मुख वाले का नाम रावण क्यों पड़ा: क्योंकि उसने लोकों को रुलाया। घोर तप का फल, जो अहंकार से किया गया था, आख़िर में यही निकला, दूसरों के आँसू।

अब छठा श्लोक, जो पाँचवें का बाकी आधा वाक्य है। "कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः", वे अविवेकी लोग शरीर में स्थित भूतों के समूह को कष्ट देते हैं, "मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्", और शरीर के भीतर रहने वाले मुझको भी कष्ट देते हैं। उन्हें आसुरी निश्चय वाला जानो।

"कर्षयन्तः", यानी सुखाते हुए, दुबला करते हुए, खींच-खींचकर कष्ट देते हुए। भूतग्राम, भूतों का समूह, यानी यह शरीर, जो पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से बना है, और उसकी इन्द्रियाँ। और फिर वह पंक्ति जिस पर रुकना चाहिए: "मां चैवान्तःशरीरस्थं"। और मुझको भी, जो इस शरीर के भीतर बैठा हूँ।

सोचिए श्रीकृष्ण क्या कह रहे हैं। जो आदमी भगवान के नाम पर अपने शरीर को सताता है, वह भगवान को ही सता रहा है। क्योंकि भगवान उसी शरीर के भीतर बैठे हैं।

शंकराचार्य यहाँ एक बहुत बारीक बात कहते हैं। भगवान को कोई सचमुच कैसे सता सकता है? वे कहते हैं, मेरी आज्ञा न मानना ही मुझे सताना है। और श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती, दोनों साफ़ शब्द रखते हैं: ऐसे लोग व्यर्थ के उपवास आदि से शरीर को सुखाते हैं।

और संत ज्ञानेश्वर, जैसे हमेशा, इसे दिल तक ले जाते हैं। भगवान कहते हैं: ये लोग अपने शरीर को और दूसरों के शरीर को जो-जो दुःख देते हैं, उतनी ही थकान मुझे, आत्मा को, होती है। और ज्ञानेश्वर ऐसे आदमी को उस रोगी जैसा बताते हैं जो वैद्य से रूठकर दवा ही फेंक दे।

और "तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्" पर मधुसूदन सरस्वती एक बहुत न्याय वाली बात कहते हैं। श्रीकृष्ण यह नहीं कहते कि "ये असुर हैं।" वे कहते हैं, "इनका निश्चय आसुरी है।" क्योंकि ये दिखने में मनुष्य ही हैं, जन्म से असुर नहीं। बस इनका निश्चय, इनका इरादा, असुरों जैसा है। यानी दोष आदमी में नहीं, उसके इरादे में है। और इरादा बदला जा सकता है।

अब मैं यहाँ बहुत सीधी बात कहना चाहता हूँ, बिना किसी घुमाव के। गीता शरीर को सताने को तप नहीं मानती। गीता ऐसे कष्ट की प्रशंसा नहीं करती। आपको याद होगा, उन्नीसवें सत्संग में हमने सुना था कि भीष्म ने युधिष्ठिर से साफ़ कहा था: जो महीने या पखवाड़े के उपवास से अपने शरीर को हानि पहुँचाता है, वह न तपस्वी है, न धर्म को जानने वाला। और अगले सत्संग में, जब यह अध्याय आगे बढ़ेगा, श्रीकृष्ण बताएँगे कि सच्चा तप असल में होता क्या है। शरीर का, वाणी का, और मन का। और आप देखेंगे कि उसमें शरीर को सताने का कहीं नाम नहीं।

और अगर कभी आपका मन, किसी दुःख में, किसी पछतावे में, अपने ही शरीर को सज़ा देने की ओर जाने लगे, तो उसे भक्ति मत समझिए। उस दिन किसी अपने के पास बैठिए, किसी भरोसे वाले से खुलकर बात कीजिए। आपके भीतर जो बैठे हैं, वे आपको सताकर नहीं, सँभालकर प्रसन्न होते हैं।

और अब सातवाँ श्लोक, जहाँ से यह अध्याय एक नई दिशा लेता है। "आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः", सबका प्रिय भोजन भी तीन प्रकार का होता है, "यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु", और वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी। उनके इस भेद को सुनो।

अब तक श्रीकृष्ण श्रद्धा की बात कर रहे थे, जो भीतर छिपी है। अब वे चार ऐसी चीज़ें गिनाते हैं जो बाहर दिखती हैं: भोजन, यज्ञ, तप और दान। और हमारी टीका इस श्लोक का पूरा उद्देश्य दो वाक्यों में कह देती है: मनुष्य की रुचि उसके स्वभाव को प्रकट करती है। यह देखकर वह सात्त्विक की ओर मुड़ सकता है।

यानी ये सूचियाँ दूसरों को नापने के लिए नहीं हैं। ये अपने को पहचानने के लिए हैं। शंकराचार्य यही कहते हैं: भोजन के ये तीन वर्ग इसलिए बताए जा रहे हैं कि आदमी देखे कि उसे किस तरह के भोजन से ज़्यादा प्रेम है, और उस निशान से अपने भीतर का गुण पहचाने। और यज्ञ, तप और दान के भेद भी इसीलिए, कि राजसी और तामसी को पहचानकर छोड़ सके और सात्त्विक को अपना सके।

और एक शब्द पर ध्यान दीजिए: "प्रियः"। प्रिय। श्रीकृष्ण यह नहीं कह रहे कि सात्त्विक आदमी को यह खाना चाहिए। वे कह रहे हैं कि सात्त्विक आदमी को यह अच्छा लगता है। संत ज्ञानेश्वर कहते हैं, खाने वाले की रुचि गुणों की दासी है। जीव, जो करने वाला भी है और भोगने वाला भी, अपने गुणों के अनुसार तीन तरह का होता है, और इसलिए उसकी हर चेष्टा भी तीन तरह की होती है।

और रामानुजाचार्य यहाँ उपनिषद् का एक वचन याद दिलाते हैं, जिसे तिलक भी उठाते हैं: "आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः", आहार शुद्ध हो, तो भीतर का सत्त्व शुद्ध होता है। यानी बात केवल थाली की नहीं, मन की है। जो हम भीतर लेते हैं, वह हमें गढ़ता है, और जो हमें गढ़ता है, वही आगे हमारी रुचि बनता है।

पर अभी एक बात बाकी है। अगले श्लोकों में श्रीकृष्ण भोजन के तीनों रूप एक-एक करके बताएँगे। और मैं पहले से कह दूँ, उन्हें सुनते हुए अपनी थाली की ओर देखिए, किसी दूसरे की थाली की ओर नहीं। आइए, सुनते हैं।

आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः । रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥ ८ ॥
गीता 17.8 — अर्थ पढ़ें ›
कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः । आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ॥ ९ ॥
गीता 17.9 — अर्थ पढ़ें ›

इन दो श्लोकों पर बात शुरू करने से पहले मैं एक बात साफ़ कर दूँ, ताकि आगे कोई भ्रम न रहे। यह किसी डॉक्टर की पर्ची नहीं है, और न खाने की कोई सूची कि यह खाओ और यह मत खाओ। आपके शरीर के लिए क्या ठीक है, यह आपकी उम्र, आपकी सेहत, आपके डॉक्टर या वैद्य जानते हैं, और उसमें मैं अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ूँगा। श्रीकृष्ण यहाँ थाली के बहाने मन का दर्पण दिखा रहे हैं। जो जैसा है, उसे क्या अच्छा लगता है। बस इतनी बात। और हम उतनी ही बात करेंगे जितनी श्लोक और हमारे आचार्य कहते हैं।

आठवाँ श्लोक। "आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः", आयु, सत्त्व, बल, आरोग्य, सुख और प्रसन्नता को बढ़ाने वाले, "रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः", रसीले, चिकने, देर तक पोषण देने वाले और मन को भाने वाले भोजन सात्त्विक लोगों को प्रिय होते हैं।

आयु, यानी जीवन। सत्त्व, और यहाँ इसका अर्थ बदल जाता है। श्रीधर स्वामी और नीलकण्ठ इसका अर्थ करते हैं, उत्साह। मधुसूदन सरस्वती इससे भी गहरा अर्थ करते हैं: मन का धीरज, ऐसा धीरज कि बड़ा दुःख आने पर भी मन न डोले। और रामानुजाचार्य कहते हैं, यहाँ सत्त्व का अर्थ है ज्ञान, क्योंकि चौदहवें अध्याय में कहा ही गया है कि सत्त्व से ज्ञान उत्पन्न होता है। फिर बल, यानी शक्ति, और आरोग्य, यानी रोग का न होना। और फिर सुख, जिसका अर्थ श्रीधर स्वामी करते हैं, चित्त की प्रसन्नता। और प्रीति, जिसका अर्थ मधुसूदन बड़ी प्यारी बारीकी से करते हैं: खाने के बाद जो तृप्ति का आनन्द आता है।

ज़रा इस सूची को देखिए। छह में से कम से कम तीन चीज़ें, सत्त्व, सुख और प्रीति, मन की हैं, शरीर की नहीं। गीता का भोजन केवल पेट नहीं भरता। उसका काम है मन को धीरज और प्रसन्नता देना।

अब दूसरी पंक्ति के चार शब्द। "रस्याः", रस से भरे, जिनमें स्वाद हो। "स्निग्धाः", स्नेह वाले, चिकने। "स्थिरा", शंकराचार्य कहते हैं, जो शरीर में देर तक टिकें, और श्रीधर स्वामी कहते हैं, जिनका सार देर तक शरीर में बना रहे। और चौथा शब्द, जो मुझे सबसे सुन्दर लगता है: "हृद्या"। हृदय को भाने वाले। श्रीधर स्वामी कहते हैं, जो देखते ही मन को अच्छे लगें। और मधुसूदन कहते हैं, जिनमें दुर्गन्ध न हो, गन्दगी न हो, कोई दोष न हो।

संत ज्ञानेश्वर इस भोजन के बारे में एक बात कहते हैं जो मैं कभी नहीं भूलता। वे कहते हैं, यह भोजन आकार में छोटा, पर परिणाम में बड़ा होता है, जैसे गुरु के मुख से निकला एक अक्षर। थोड़े में ही अपार तृप्ति रहती है। और जैसा मुँह में मीठा, वैसा ही भीतर भी मीठा।

"हृद्या" शब्द सुनकर मुझे महाभारत का वह प्रसंग याद आता है जो आपने सत्ताईसवें सत्संग में सुना था। श्रीकृष्ण शान्ति-दूत बनकर हस्तिनापुर गए थे, और दुर्योधन ने उन्हें भोजन का न्योता दिया था। श्रीकृष्ण ने मना कर दिया, और कारण में एक वाक्य कहा: "भोजन या तो प्रेम के कारण खाया जाता है, या फिर संकट में। राजन्, आप हमसे प्रेम नहीं रखते, और हम संकट में भी नहीं हैं।" और फिर वे विदुर के घर जाकर भोजन करते हैं। आज इस श्लोक के साथ वह प्रसंग एक नया अर्थ देता है। दुर्योधन की थाली सोने की थी, उसमें सब कुछ था। पर वह "हृद्या" नहीं थी, क्योंकि उसके पीछे हृदय नहीं था। भोजन का पहला स्वाद उस भाव का होता है जिससे वह परोसा जाता है।

और अब एक बात जो पूरे श्लोक का सार है। श्लोक यह नहीं कहता कि सात्त्विक भोजन यह है, वह है। श्लोक कहता है कि ऐसा भोजन "सात्त्विकप्रियाः", सात्त्विक लोगों को प्रिय होता है। मधुसूदन सरस्वती इसका दोहरा उपयोग बताते हैं। एक, इन निशानों से सात्त्विक आदमी पहचाना जा सकता है। और दो, जो सात्त्विक बनना चाहे, वह इन्हें अपना सकता है। यानी यह श्लोक दर्पण भी है, और रास्ता भी।

अब नौवाँ श्लोक। "कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः", कड़वे, खट्टे, नमकीन, बहुत गरम, तीखे, रूखे और जलन करने वाले, "आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः", ऐसे भोजन राजस आदमी को प्रिय होते हैं, और वे दुःख, शोक और रोग देते हैं।

अब यहाँ एक बात पर बहुत ध्यान दीजिए, क्योंकि इसी एक बात से यह श्लोक समझ में आता है, और इसी के न समझने से इसका ग़लत अर्थ निकलता है। हमारी टीका कहती है: "अति" शब्द हर शब्द के साथ जुड़ता है। अति कड़वा, अति खट्टा, अति नमकीन, और ऐसे ही आगे। शंकराचार्य भी यही कहते हैं, और श्रीधर स्वामी, मधुसूदन और नीलकण्ठ भी।

क्यों ज़रूरी है यह बात? क्योंकि श्रीधर स्वामी जब इन शब्दों के उदाहरण देते हैं, तो वे उदाहरण हमारी रोज़ की रसोई के हैं। बहुत कड़वे के लिए नीम, बहुत तीखे के लिए काली मिर्च, बहुत जलन करने वाले के लिए सरसों। अब सोचिए, नीम, काली मिर्च और सरसों, ये तो हर घर में हैं। तो क्या गीता इन्हें मना कर रही है? नहीं। गीता "अति" की बात कर रही है। उस हद की, जहाँ स्वाद भोजन के लिए नहीं, जीभ को झटका देने के लिए रह जाता है।

और राजस मन की पहचान भी यही है। राजस का अर्थ है बेचैनी, और बेचैन मन को हर चीज़ "ज़्यादा" चाहिए। ज़्यादा तेज़, ज़्यादा गरम, ज़्यादा चटपटा। संत ज्ञानेश्वर इस आदमी का बड़ा मज़ेदार चित्र खींचते हैं: उसे इतना गरम चाहिए, मानो गरमी के बहाने मुँह से आग ही निगल रहा हो, और खाने के बाद पानी का बर्तन उसके मुँह से छूटता ही नहीं। पर इस हँसी के पीछे एक सच्ची बात है। जो मन भीतर से बेचैन है, वही बाहर से झटके ढूँढता है। थाली में भी, बातों में भी, ख़बरों में भी, मनोरंजन में भी।

और श्लोक का दूसरा आधा: "दुःखशोकामयप्रदाः", दुःख, शोक और रोग देने वाले। श्रीधर स्वामी इन तीन शब्दों का अर्थ अलग-अलग करते हैं: दुःख, यानी उसी समय की जलन और बेचैनी। शोक, यानी बाद में आने वाली उदासी। और आमय, यानी रोग। यहाँ मैं श्लोक के शब्द आपके सामने रख रहा हूँ, बस। इसमें अपनी ओर से कोई डॉक्टरी दावा नहीं जोड़ रहा। पर इन तीन शब्दों के क्रम पर ध्यान दीजिए, क्योंकि वह केवल भोजन का नहीं, रज के हर सुख का क्रम है। पहले पल में झटका और जलन, फिर बाद में उदासी। जो सुख केवल तेज़ी से आता है, वह अक्सर अपने पीछे एक ख़ालीपन छोड़ जाता है।

मधुसूदन सरस्वती यहाँ एक बहुत सुन्दर बात पकड़ते हैं। वे कहते हैं, राजस और तामस भोजन का हर गुण, सात्त्विक भोजन के किसी न किसी गुण का उल्टा है। रूखा, यह चिकने का उल्टा। बहुत गरम, यह मन को भाने का उल्टा। और दुःख-शोक देने वाला, यह सुख और प्रसन्नता का उल्टा। यानी श्रीकृष्ण तीन अलग-अलग सूचियाँ नहीं दे रहे। वे एक ही बात कह रहे हैं: जो मन को धीरज और प्रसन्नता दे, वह सत्त्व की ओर ले जाता है, और जो मन को झटका देकर ख़ाली छोड़ दे, वह रज की ओर।

तो इन दो श्लोकों से घर ले जाने वाली बात यह है कि अपनी रुचि को ध्यान से देखिए। अगर आप पाते हैं कि आपको हर चीज़ "ज़्यादा" चाहिए, तो उसे दोष मानकर अपने को कोसिए मत। बस इतना जानिए कि मन में रज बढ़ा हुआ है। और रज का इलाज भूखा रहना नहीं है, यह हम छठे श्लोक में सुन चुके हैं। रज का इलाज धीरे-धीरे "अति" से लौटना है। मन जब शान्त होता है, तो साधारण भोजन भी हृदय को भाने लगता है।

पर अभी एक बात बाकी है। तीसरे प्रकार का भोजन, तामस, सबसे नाज़ुक है, क्योंकि उसे ग़लत समझा जाए तो किसी ग़रीब की थाली का अपमान हो सकता है, और किसी माँ के त्याग का भी। उसे बहुत सँभलकर, ठीक श्लोक के शब्दों में सुनेंगे।

यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् । उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥ १० ॥
गीता 17.10 — अर्थ पढ़ें ›
अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते । यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ॥ ११ ॥
गीता 17.11 — अर्थ पढ़ें ›

दसवाँ श्लोक। "यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्", जो भोजन अधपका या देर से पड़ा हुआ, रसहीन, दुर्गन्ध वाला और बासी है, "उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्", और जो जूठा और अपवित्र है, वह तामस लोगों को प्रिय होता है।

शब्द देख लें। "यातयामं", हमारी टीका बताती है कि इसका शब्दार्थ है, "जिसे एक पहर बीत गया"। कुछ आचार्य इसका अर्थ अधपका लेते हैं, जैसे शंकराचार्य, और कुछ बहुत देर से रखा हुआ, जैसे श्रीधर स्वामी, जो कहते हैं, पका हुआ भात जो पहर बीतने पर ठंडा पड़ गया। "गतरसं", जिसका रस चला गया। "पूति", जिसमें से दुर्गन्ध आए। "पर्युषितं", शंकराचार्य कहते हैं, जो पककर रात भर पड़ा रहा। उच्छिष्ट, यानी जूठा, किसी के खाने के बाद बचा हुआ। और अमेध्य, शंकराचार्य इसका अर्थ करते हैं, जो यज्ञ में चढ़ाने योग्य न हो।

अब मैं वह बात कहूँ जिसके लिए पिछले खंड के अन्त में आपको रोका था। बहुत से घरों में रात की बची रोटी सुबह खाई जाती है। बहुत से मज़दूर सुबह का बँधा खाना दोपहर को खोलते हैं, जो तब तक ठंडा हो चुका होता है। बहुत सी माँएँ सबको खिलाकर अन्त में जो बचा, वही खा लेती हैं। क्या यह श्लोक इन सबको तामसी कह रहा है? नहीं। और इसका उत्तर श्लोक के अपने शब्द में है: "तामसप्रियम्"। तामस आदमी को प्रिय। शंकराचार्य की वह बात याद कीजिए जो हमने सातवें श्लोक पर सुनी थी: गुण का निशान है अपने भीतर किसी चीज़ से ज़्यादा प्रेम। श्लोक उस आदमी की बात कर रहा है जिसे सड़ा, बेस्वाद और गन्दा ही अच्छा लगता है, जो भोजन की ओर ध्यान ही नहीं देता, जिसके लिए खाना बस पेट में कुछ डाल देना है। जो मजबूरी में खाया जाए, वह मजबूरी है, स्वभाव नहीं। और श्रीकृष्ण स्वभाव की बात कर रहे हैं।

और उस माँ की बात, जो सबको खिलाकर अन्त में खाती है, उसके लिए तो महाभारत में भीष्म के मुँह से एक बहुत सुन्दर वचन है। अनुशासन पर्व में भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं: जो मनुष्य सदा अपने सेवकों और अतिथियों के खा चुकने के बाद खाता है, वह केवल अमृत खाता है। और आगे कहते हैं, जो देवताओं, पितरों और अपने आश्रितों के बाद बचा हुआ खाता है, उसे "विघसाशी" कहते हैं, यानी बचे हुए को खाने वाला, और ऐसे लोगों के लिए ब्रह्मा के धाम में अनन्त लोक हैं। तो जिसे हम "बचा हुआ" कहते हैं, भीष्म उसे अमृत कहते हैं। फ़र्क़ बस इतना है कि वह किसी को खिलाकर बचा है, या किसी की उपेक्षा से।

और रामानुजाचार्य यहाँ उच्छिष्ट और अमेध्य, दोनों शब्दों पर एक बारीक बात कहते हैं। वे उच्छिष्ट का अर्थ करते हैं, गुरुजनों को छोड़कर दूसरों का जूठा। यानी गुरु के खाने के बाद जो बचे, वह जूठा नहीं, प्रसाद है। और अमेध्य का अर्थ वे करते हैं, "अयज्ञशिष्ट", जो यज्ञ में अर्पित होकर बचा नहीं है। आपको याद होगा, दसवें सत्संग में हमने सुना था: "यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः", यज्ञ से बचा हुआ खाने वाले सज्जन सब पापों से छूट जाते हैं। जो भोजन पहले भगवान को चढ़ाया गया, प्रेम से परोसा गया, वह सादा हो, ठंडा हो, तब भी प्रसाद है।

और यहाँ नौवें अध्याय की वह बात भी साथ रख लीजिए, जो सत्ताईसवें सत्संग में सुनी थी: "पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति", जो प्रेम से मुझे पत्ता, फूल, फल या जल अर्पित करता है, वह मैं स्वीकार करता हूँ। भगवान ने कभी नहीं कहा कि छप्पन भोग लाओ। उन्होंने कहा, "भक्त्या", प्रेम से लाओ।

तो भोजन के इन तीन श्लोकों का निचोड़ क्या निकला? सात्त्विक मन उस भोजन को पसन्द करता है जो धीरज और प्रसन्नता दे, और जो हृदय को भाए। राजस मन उसे, जो "अति" हो, जो झटका दे। और तामस मन उसे, जिसकी ओर ध्यान ही न दिया गया हो, जो किसी को अर्पित न हुआ हो। और तीनों में फ़ैसला थाली का नहीं, रुचि का है, और रुचि के पीछे के मन का।

अब ग्यारहवाँ श्लोक, और यहाँ से यज्ञ की बात शुरू होती है। "अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते", जो यज्ञ फल न चाहने वालों द्वारा, विधि के अनुसार किया जाता है, "यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः", "यज्ञ करना ही कर्तव्य है", इस विचार में मन को स्थिर करके, वह सात्त्विक है।

तीन बातें हैं इस श्लोक में। पहली, "अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो", फल की चाह के बिना। दूसरी, "विधिदृष्टो", जैसा शास्त्र ने बताया, वैसा। और तीसरी, जो सबसे गहरी है, "यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय", यह करना ही है, इस बात पर मन को टिकाकर।

शंकराचार्य इसका अर्थ करते हैं: यज्ञ को ठीक से पूरा करना ही मेरा काम है, इससे मुझे अपना कोई और प्रयोजन नहीं साधना। श्रीधर स्वामी कहते हैं, "मनः समाधाय" का अर्थ है, मन को एकाग्र करके। और रामानुजाचार्य इसमें भक्ति का रंग भर देते हैं। वे कहते हैं, "यष्टव्यमेवेति" का अर्थ है, यह भगवान की आराधना है, और भगवान की आराधना अपने आप में ही प्रयोजन है। उससे आगे कुछ पाना नहीं।

संत ज्ञानेश्वर इस यज्ञ के लिए कई चित्र देते हैं, पर एक चित्र मेरे मन में बस गया है। वे कहते हैं, जैसे कोई बड़े जतन से तुलसी के पौधे की सेवा करता है, सींचता है, उसके चारों ओर क्यारी बनाता है, जबकि उससे न फल की आशा है, न फूल की, न छाया की। सात्त्विक यज्ञ ऐसा ही होता है। सेवा पूरी, आशा कोई नहीं।

और महाभारत में इसी श्लोक की गूँज युधिष्ठिर के मुँह से सुनाई देती है। आपको याद होगा, पैंतीसवें सत्संग में हमने सुना था कि वनवास में, जब द्रौपदी ने दुःख में पूछा कि धर्म का क्या फल मिला, तो युधिष्ठिर ने कहा था: "मैं धर्म के फल की चाह से आचरण नहीं करता। मैं देता हूँ, क्योंकि देना चाहिए। मैं यज्ञ करता हूँ, क्योंकि यज्ञ करना चाहिए।" अब ग्यारहवें श्लोक के "यष्टव्यमेवेति" के साथ इसे रखिए। "यज्ञ करना चाहिए, इसलिए करता हूँ।" शब्द लगभग वही हैं। और युधिष्ठिर ने उसी जगह यह भी कहा था, "मैं शास्त्रों का उल्लंघन नहीं करता, और सज्जनों के आचरण को देखकर चलता हूँ।" यानी "विधिदृष्टो" भी। श्लोक की तीनों बातें एक आदमी के जीवन में।

और आज के लिए इसका अर्थ? आपकी रोज़ की पूजा, आपका दीया, आपका व्रत, इनमें से कितना "यष्टव्यमेवेति" वाले भाव से होता है, और कितना "कुछ मिल जाए" से? यह प्रश्न अपने को दोषी ठहराने के लिए नहीं है। ज़्यादातर हम सब माँगने से ही शुरू करते हैं। पर जैसे-जैसे श्रद्धा पकती है, माँग पीछे छूटती जाती है और बस "करना है" बचता है। और जो फल नहीं माँगता, उसे फल न मिलने का डर भी नहीं सताता।

पर अभी एक बात बाकी है। वही यज्ञ, वही विधि, वही सामग्री, अगर उसके पीछे की नीयत बदल जाए, तो वह सात्त्विक नहीं रहता। और महाभारत में एक ऐसा यज्ञ है जिसमें सब कुछ शास्त्र के अनुसार हुआ, सोने का हल तक बना, फिर भी उसकी जड़ में कुछ और था। वह अगले श्लोक के साथ।

अभिसंधाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् । इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ॥ १२ ॥
गीता 17.12 — अर्थ पढ़ें ›
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् । श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ॥ १३ ॥
गीता 17.13 — अर्थ पढ़ें ›

बारहवाँ श्लोक। "अभिसंधाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्", परन्तु जो यज्ञ फल को लक्ष्य करके, या केवल दिखावे के लिए किया जाता है, "इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्", हे भरतश्रेष्ठ, उसे राजस जानो।

"अभिसंधाय", यानी निशाना बाँधकर। जैसे धनुर्धर लक्ष्य पर आँख टिकाता है, वैसे ही यह यज्ञ फल पर आँख टिकाकर होता है। और "दम्भार्थमपि", दिखावे के लिए। मधुसूदन सरस्वती दम्भ का अर्थ वही करते हैं जो पाँचवें श्लोक पर किया था: दुनिया में अपने को धार्मिक दिखाना। श्रीधर स्वामी कहते हैं, अपनी बड़ाई फैलाने के लिए।

संत ज्ञानेश्वर इस यज्ञ का एक चित्र देते हैं जो हमारे समाज में आज भी उतना ही सच है। वे कहते हैं, जैसे कोई अपने घर के श्राद्ध में राजा को न्योता दे। सोचता है, राजा घर आएगा तो बहुत काम बनेंगे, नाम भी होगा, और श्राद्ध भी हो जाएगा। श्राद्ध हो गया, पर किसके लिए हुआ? पितरों के लिए, या राजा की नज़र के लिए?

और अब महाभारत का वह यज्ञ, जिसका वादा मैंने किया था। यह भी वन पर्व में है, उन्हीं दिनों का, जब पाण्डव वन में थे। कर्ण पृथ्वी जीतकर लौटा, और उसने दुर्योधन से कहा: आज पृथ्वी तुम्हारी है, कोई शत्रु नहीं बचा, इन्द्र की तरह राज करो। और दुर्योधन ने अपने मन की एक बात बताई। उसने कहा: "जब मैंने पाण्डव का राजसूय देखा, जो सबसे श्रेष्ठ यज्ञ है, तब से मेरे मन में उसकी लालसा जागी है। उसे पूरा करो।"

ध्यान दीजिए, यज्ञ की इच्छा कहाँ से उठी। भगवान से नहीं, किसी कर्तव्य से नहीं। भाई का यज्ञ देखकर। और यह बात हमने आज पहले भी सुनी है, रावण की कथा में, जो भाई का ऐश्वर्य देखकर तप करने बैठा था। वहाँ तप था, यहाँ यज्ञ है, पर बीज वही, जलन।

दुर्योधन ने अपने पुरोहित से कहा, शास्त्र के अनुसार, उत्तम दक्षिणा के साथ राजसूय कराइए। और पुरोहित ने, दूसरे ब्राह्मणों के साथ, एक साफ़ उत्तर दिया: युधिष्ठिर के जीवित रहते तुम्हारे कुल में राजसूय नहीं हो सकता। और तुम्हारे पिता धृतराष्ट्र भी जीवित हैं, इस कारण भी यह तुम्हारे लिए वर्जित है। फिर उन्होंने एक दूसरा यज्ञ सुझाया, जो राजसूय के बराबर माना जाता है: वैष्णव यज्ञ। कर देने वाले राजा सोना लाएँ, उस सोने से एक हल बने, और उस सोने के हल से यज्ञ की भूमि जोती जाए।

और सब कुछ विधि से हुआ। कारीगरों ने सोने का हल बनाया। धृतराष्ट्र ने यज्ञ आरम्भ करने की आज्ञा दी। पाठ कहता है, दुर्योधन शास्त्र के अनुसार, क्रम से दीक्षित हुआ। राजा आए, ब्राह्मण आए, सबका विधि से सम्मान हुआ। और एक सुन्दर बात यह कि धृतराष्ट्र ने विदुर से कहा, ऐसी व्यवस्था करो कि सब लोग भरपेट भोजन पाकर सुखी रहें। और धर्म को जानने वाले विदुर ने सब वर्णों के लोगों का, हर एक का उचित मान रखकर, सत्कार किया, खाने-पीने की वस्तुएँ दीं, मालाएँ दीं, वस्त्र दिए। यज्ञ के अन्त में दुर्योधन ने हज़ारों राजाओं और ब्राह्मणों को धन देकर विदा किया।

तो इसमें कमी क्या थी? विधि पूरी, अन्न भरपूर, दक्षिणा भरपूर। कमी समझने के लिए दो दृश्य देखिए, जो यज्ञ के ठीक बाद के हैं।

पहला दृश्य। दुर्योधन नगर में लौटा, लोगों ने खीलें बरसाईं। तब कुछ लोग, जिन्हें पाठ "मुँहफट" कहता है, उससे बोले: यह यज्ञ युधिष्ठिर के यज्ञ के बराबर नहीं है, उसके सोलहवें हिस्से के बराबर भी नहीं। और उसके मित्र बोले: नहीं, यह सबसे बढ़कर है। ययाति, नहुष, मान्धाता और भरत ने भी यही यज्ञ किया था। और पाठ कहता है, मित्रों की ये मीठी बातें सुनकर राजा प्रसन्न हुआ। यानी यज्ञ पूरा होने के बाद उसके मन में एक ही प्रश्न था: लोग क्या कह रहे हैं? मैं युधिष्ठिर से बड़ा दिखा या नहीं? यही "दम्भार्थमपि" है।

और दूसरा दृश्य। घर आकर, भाइयों के बीच बैठकर, दुर्योधन ने कहा: "मैं कब सब पाण्डवों को मारकर वह सबसे उत्तम राजसूय यज्ञ करूँगा?" अभी-अभी एक महायज्ञ पूरा हुआ है, अभी-अभी हज़ारों ब्राह्मणों को दक्षिणा दी गई है, और उस यज्ञ से उठा पहला विचार है, भाइयों को मारने का। "अभिसंधाय तु फलं।" उस यज्ञ की आँख शुरू से एक ही फल पर टिकी थी, युधिष्ठिर से आगे निकलना।

और इसी कथा में एक और छोटा-सा दृश्य है। दुःशासन ने एक दूत को द्वैतवन भेजा, पाण्डवों को न्योता देने। और युधिष्ठिर ने दूत से कहा: "सौभाग्य की बात है कि राजा सुयोधन श्रेष्ठ यज्ञ कर रहे हैं। हम भी आएँगे, पर अभी नहीं, तेरहवाँ वर्ष पूरा होने तक हमें अपनी प्रतिज्ञा निभानी है।" जिसका राज्य छीना गया, जो वन में रह रहा है, वह उसी के यज्ञ पर कहता है, "सौभाग्य की बात है।" एक का यज्ञ जलन से निकला, दूसरे की बधाई प्रेम से।

और अब तेरहवाँ श्लोक, जो तामस यज्ञ की बात करता है। "विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्", जो यज्ञ विधि से रहित हो, जिसमें अन्न-दान न हो, जो मन्त्रों से रहित हो, जिसमें दक्षिणा न हो, "श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते", और जो श्रद्धा से रहित हो, उसे तामस कहते हैं।

पाँच कमियाँ गिनाई गई हैं। विधिहीन, यानी जिसमें विधि का ध्यान न हो। असृष्टान्न, शंकराचार्य कहते हैं, जिसमें ब्राह्मणों को अन्न न दिया गया हो, और श्रीधर स्वामी कहते हैं, ब्राह्मण आदि को, यानी किसी को खिलाया ही न जाए। मन्त्रहीन, शंकराचार्य कहते हैं, जिसमें मन्त्र स्वर से या अक्षर से बिगड़ा हुआ हो। अदक्षिण, जिसमें दक्षिणा न हो। और पाँचवीं, जो बाकी चारों की जड़ है: "श्रद्धाविरहितं"। मधुसूदन सरस्वती एक उदाहरण देते हैं: जैसे यज्ञ कराने वालों से ही द्वेष हो।

अब दुर्योधन के यज्ञ को इस श्लोक के साथ रखिए, और एक बड़ी सीख मिलती है। उसमें विधि थी, अन्न था, दक्षिणा थी। इसलिए वह तामस नहीं था। पर फिर भी वह सात्त्विक नहीं था, क्योंकि नीयत फल और दिखावे की थी। वह राजस था। मधुसूदन सरस्वती इन दोनों का अन्तर भी बताते हैं: राजस यज्ञ, शास्त्र के अनुसार होने के कारण, कुछ न कुछ फल तो देता है, भले भीतर की शुद्धि न दे। पर तामस यज्ञ, जो न विधि से है, न श्रद्धा से, उससे कुछ भी नहीं बनता। यानी गुण बाहर की सामग्री में नहीं, भीतर की नीयत में है।

और अब एक बात उन सबके लिए जो सोच रहे हैं, "मेरे पास तो यज्ञ के लिए न सोना है, न पुरोहित, न दक्षिणा। तो मेरा क्या?" वन पर्व में पुलस्त्य ऋषि भीष्म से यही बात कहते हैं। बड़े यज्ञों में बहुत सामग्री चाहिए, वे राजा या धनी लोग ही कर पाते हैं, ग़रीब नहीं। और फिर कहते हैं: आदमी जिस चीज़ पर ख़ुद गुज़ारा करता है, साग हो, कन्द-मूल हो, या फल, वही श्रद्धा से, और बिना मन में कुढ़े, किसी ब्राह्मण को दे दे, तो उसी से वह अश्वमेध का फल पाता है। सोने के हल से जोते गए यज्ञ से ज़्यादा, श्रद्धा से दिया गया साग का एक पत्ता। यही इस पूरे सत्संग का सार है।

तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली बात। आप वही हैं, जिस पर आपका भरोसा है। "यो यच्छ्रद्धः स एव सः।" इसलिए अपने भरोसे को ध्यान से चुनिए। और याद रखिए, विभीषण राक्षस-कुल में जन्मे थे, फिर भी उनकी बुद्धि धर्म में टिकी रही। स्वभाव आरम्भ है, अन्त नहीं।

दूसरी बात। भगवान के नाम पर अपने शरीर को सताना भक्ति नहीं है। श्रीकृष्ण कहते हैं, ऐसा करने वाला मुझे भी सताता है, जो उसी शरीर के भीतर बैठा हूँ। जिसके भीतर भगवान बैठे हों, उस शरीर को सँभालिए।

तीसरी बात। थाली में, यज्ञ में, पूजा में, गुण सामग्री का नहीं, नीयत का होता है। अपनी रुचि को दर्पण की तरह देखिए, दूसरों की थाली को तराज़ू की तरह नहीं। और जो कुछ दीजिए, जो कुछ चढ़ाइए, "यष्टव्यमेवेति" वाले भाव से, प्रेम से। सोने का हल नहीं, श्रद्धा का पत्ता।

अगली बार, सैंतालीसवें सत्संग में, श्रीकृष्ण इसी अध्याय में आगे तप की बात करेंगे। और पहला ही श्लोक बताएगा कि शरीर का तप असल में क्या होता है। आज हमने शरीर को सताने वाला तप देखा। अगली बार देखेंगे कि शरीर को साधने वाला तप कैसा होता है।

आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आपके जीवन में कोई ऐसा है, शायद कोई दादी, नानी, कोई बुज़ुर्ग, जिसने कभी शास्त्र नहीं पढ़ा, पर जिसकी श्रद्धा देखकर आपको भगवान पर भरोसा हुआ? उनकी कोई एक बात, कोई एक आदत, नीचे लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।

जिसकी जैसी श्रद्धा, वह वैसा ही। इसलिए श्रद्धा को उसी पर टिकाइए, जो आपको वैसा बना दे जैसा आप बनना चाहते हैं।

जय श्री कृष्ण।

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत । श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥ ३ ॥
गीता 17.3 — अर्थ पढ़ें ›

तीन बातें

  1. आप वही हैं, जिस पर आपका भरोसा है। "यो यच्छ्रद्धः स एव सः।" इसलिए अपने भरोसे को ध्यान से चुनिए। और याद रखिए, विभीषण राक्षस-कुल में जन्मे थे, फिर भी उनकी बुद्धि धर्म में टिकी रही। स्वभाव आरम्भ है, अन्त नहीं।
  2. भगवान के नाम पर अपने शरीर को सताना भक्ति नहीं है। श्रीकृष्ण कहते हैं, ऐसा करने वाला मुझे भी सताता है, जो उसी शरीर के भीतर बैठा हूँ। जिसके भीतर भगवान बैठे हों, उस शरीर को सँभालिए।
  3. थाली में, यज्ञ में, पूजा में, गुण सामग्री का नहीं, नीयत का होता है। अपनी रुचि को दर्पण की तरह देखिए, दूसरों की थाली को तराज़ू की तरह नहीं। और जो कुछ दीजिए, जो कुछ चढ़ाइए, "यष्टव्यमेवेति" वाले भाव से, प्रेम से। सोने का हल नहीं, श्रद्धा का पत्ता।