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सत्संग ४५

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नरक के तीन दरवाज़े

गीता 16.11–16.24 · 76 मिनट

काम, क्रोध, लोभ; शास्त्र को प्रमाण मानना

चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः । कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः ॥ ११ ॥
गीता 16.11 — अर्थ पढ़ें ›
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः । ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसंचयान् ॥ १२ ॥
गीता 16.12 — अर्थ पढ़ें ›
इदमद्य मया लब्धमिदं प्राप्स्ये मनोरथम् । इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् ॥ १३ ॥
गीता 16.13 — अर्थ पढ़ें ›

नरक कहाँ है? हम बचपन से सुनते आए हैं कि मरने के बाद कोई अँधेरी, डरावनी जगह है, जहाँ बुरे काम करने वाले जाते हैं। पर गीता आज एक अलग बात कहती है। वह कहती है कि नरक के दरवाज़े हैं, और वे तीन हैं, और वे कहीं दूर नहीं, हमारे अपने भीतर खुलते हैं। आज का सवाल यही है: नरक के वे तीन दरवाज़े कौन-से हैं, वे खुलते कैसे हैं, और उन्हें बन्द कैसे किया जाता है?

जय श्री कृष्ण।

आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का पैंतालीसवाँ सत्संग है, और आज हम सोलहवें अध्याय को पूरा करेंगे। महाभारत के भीष्म पर्व का चालीसवाँ अध्याय ही गीता का यह सोलहवाँ अध्याय है, "दैवासुर सम्पद् विभाग योग", यानी दैवी और आसुरी सम्पदा को अलग-अलग पहचानने का योग। और आपको याद रहे कि यह सब हमें सञ्जय सुना रहे हैं, हस्तिनापुर में, अन्धे राजा धृतराष्ट्र को, उस दिन जब भीष्म बाणों की शय्या पर गिर चुके हैं।

पहले जल्दी से याद कर लें कि पिछली बार हम कहाँ रुके थे। पिछले सत्संग में श्रीकृष्ण ने उन गुणों की एक लम्बी माला गिनाई थी जिनके साथ मुक्ति की ओर जाने वाला मनुष्य जन्म लेता है, और उस माला का पहला मोती था अभय: "अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।" निडरता, मन की शुद्धि, ज्ञान और योग में टिकना, फिर दान, संयम, सरलता, अहिंसा, सत्य, क्षमा, धैर्य, और ऐसे छब्बीस गुण। फिर छह छोटे और तीखे शब्दों में आसुरी सम्पदा आई: दम्भ, घमण्ड, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञान। और यह सुनते ही अर्जुन के मन में कहीं यह डर न बैठ जाए कि मैं किस ओर हूँ, इसलिए श्रीकृष्ण ने तुरन्त कहा था: "मा शुचः संपदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव।" शोक मत करो, पाण्डव, तुम दैवी सम्पदा लेकर जन्मे हो। फिर उन्होंने आसुरी मन का चित्र खींचना शुरू किया: जो नहीं जानता कि किधर जाना है और किधर से लौटना है, जो कहता है कि इस संसार के पीछे कोई सच्चाई नहीं, कोई ईश्वर नहीं, बस चाह ही चाह है, और जो कभी न भरने वाली कामना का सहारा लेकर चलता है।

आज वह चित्र और गहरा होगा। और इससे पहले कि हम उसमें उतरें, मैं एक बात साफ़ कर देना चाहता हूँ, क्योंकि आज के श्लोक कठिन हैं। श्रीकृष्ण यहाँ किसी जाति, किसी समूह, किसी धर्म या किसी पड़ोसी की ओर उँगली नहीं उठा रहे। हमारी टीका तेरहवें से पन्द्रहवें श्लोक के बारे में कहती है कि ये आसुरी मन की अपनी आवाज़ हैं। आवाज़। और आवाज़ किसी एक के भीतर नहीं रहती। यह वह आवाज़ है जो कभी न कभी हम सबके भीतर बोली है, बस किसी में धीमे, किसी में ज़ोर से। इसलिए आज इन श्लोकों को सुनते हुए किसी और का चेहरा याद मत कीजिए। अपने भीतर कान लगाइए। गीता आईना है, दूरबीन नहीं।

तो आइए, ग्यारहवें श्लोक से।

"चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः।" ऐसी चिन्ता का सहारा लिए हुए, जिसे नापा न जा सके, और जो मृत्यु तक चलती रहे।

दो शब्दों पर रुकिए। पहला, "चिन्तामपरिमेयां", ऐसी चिन्ता जिसका कोई नाप नहीं। दूसरा, "प्रलयान्तामुपाश्रिताः", जिसका अन्त प्रलय पर है। शंकराचार्य, श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती, तीनों यहाँ प्रलय का अर्थ मरण लेते हैं। यानी वह चिन्ता जो साँस के साथ ही रुकती है। मधुसूदन सरस्वती बताते हैं कि यह चिन्ता किस बात की है: "मेरा जो है वह बचा रहे, और जो नहीं है वह मिल जाए।" पाने और बचाने की चिन्ता। और एक बारीक बात वे जोड़ते हैं: ऐसा मन दिन-रात चिन्ता करता है, पर कभी आगे की, परलोक की, आत्मा की चिन्ता नहीं करता। उसकी सारी चिन्ता इसी शरीर के सुख के घेरे में घूमती है।

फिर दूसरी पंक्ति। "कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः।" विषयों का भोग ही जिनके लिए सबसे ऊँची चीज़ है, और जिन्होंने पक्का कर लिया है कि बस, इतना ही है।

"एतावदिति।" बस इतना ही। यह छोटा-सा शब्द पूरे श्लोक की चाबी है। शंकराचार्य कहते हैं, ऐसे मन ने तय कर लिया है कि भोग ही मनुष्य का सबसे बड़ा प्रयोजन है। नीलकण्ठ और भी साफ़ करते हैं: यह शरीर ही आत्मा है, और भोग ही पुरुषार्थ है, इसके आगे कुछ नहीं। अब सोचिए, जिसने मान लिया कि "बस इतना ही है", उसके लिए चिन्ता अपार क्यों न होगी? अगर यही एक जीवन है, यही एक शरीर, और यही थोड़े-से बरस, तो हर छूटा हुआ सुख एक हार है, हर खोई चीज़ एक मौत है। इसीलिए दोनों बातें एक ही श्लोक में हैं। "बस इतना ही" की मान्यता और "मृत्यु तक की चिन्ता", ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

और ज़रा देखिए कि यह श्लोक कौन सुन रहा है। धृतराष्ट्र। सातवें सत्संग में, और उसके बाद भी कई बार, हमने उस रात को याद किया है जब युद्ध से पहले सञ्जय पाण्डवों के पास से लौटे थे, और धृतराष्ट्र ने आधी रात को विदुर को बुलवाकर कहा था: "मैं जाग रहा हूँ और जल रहा हूँ, मेरी नींद उड़ गई है, मेरी एक ही बड़ी चिन्ता है।" जो आदमी आज यह श्लोक सुन रहा है, वह स्वयं जानता है कि अपार चिन्ता किसे कहते हैं। मैं उन पर कोई ठप्पा नहीं लगा रहा। मैं बस इतना कह रहा हूँ कि गीता के ये शब्द उस अन्धेरे कमरे में किसी किताब की बात की तरह नहीं, सुनने वाले के अपने अनुभव की तरह गूँज रहे होंगे।

अब बारहवाँ श्लोक। "आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः।" आशा की सैकड़ों फाँसियों से बँधे, काम और क्रोध के भरोसे जीने वाले।

आशा की फाँसी। आशा तो हम अच्छा शब्द मानते हैं। "आशा मत छोड़ो", हम कहते हैं। पर यहाँ आशा का अर्थ वह भरोसा नहीं जो अँधेरे में दीया बनता है। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, यह वह माँग है जिसका उपाय या तो सम्भव नहीं, या पता नहीं, फिर भी मन उसके पीछे खिंचता रहता है। और शंकराचार्य एक चित्र देते हैं: ऐसा आदमी सैकड़ों रस्सियों से बँधा है, और हर रस्सी उसे अलग दिशा में खींच रही है। एक रस्सी कहती है, "वह घर", दूसरी कहती है, "वह पद", तीसरी, "उसकी नज़र में ऊँचा दिखना"। आदमी एक है, और खींचने वाली रस्सियाँ सौ।

महाभारत में इस आशा पर एक अनोखी कथा है, जो भीष्म ने शरशय्या पर युधिष्ठिर को सुनाई थी। ऋषभ नाम के एक ऋषि ने बदरी के पास, नर-नारायण के आश्रम के निकट, तनु नाम के एक मुनि को देखा था, जो इतने दुबले थे कि उनका शरीर छोटी उँगली जितना पतला लगता था। वहीं एक राजा आया, वीरद्युम्न, जिसका इकलौता बेटा वन में खो गया था, और वह इस आशा में दुबला हुआ घूम रहा था कि "यहीं देखूँगा, यहीं मिलेगा।" राजा ने उन दुबले मुनि से पूछा, "आशा का स्वरूप क्या है?" और मुनि का उत्तर था, "दुबलेपन में आशा के बराबर कुछ नहीं।" यानी मैं, जो इतना दुबला दिखता हूँ, आशा मुझसे भी पतली है। और उसी कथा में एक वाक्य आता है जो मुझे बहुत सच्चा लगता है: आशा सामने खड़ी होकर बड़े आदमी को भी बच्चे की तरह बोलने पर मजबूर कर देती है। ऋषभ ने यह कथा सुनाकर कहा था, इसलिए इस बहुत पतली आशा को जल्दी छोड़ दो। और भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं, तुम भी हिमालय की तरह अटल और स्थिर रहो।

आशा पतली क्यों है? क्योंकि वह टूटती भी जल्दी है, और फिर भी छूटती नहीं। धागा पतला हो तो काटना आसान होना चाहिए, पर सैकड़ों पतले धागे मिलकर रस्सी बन जाते हैं। "आशापाशशतैर्बद्धाः", सैकड़ों फाँसियों से बँधे।

फिर दूसरी पंक्ति। "ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसंचयान्।" भोगों के लिए वे अन्याय से धन के ढेर जोड़ने की कोशिश करते हैं।

यहाँ गीता धन के विरुद्ध नहीं बोल रही। ध्यान दीजिए, श्लोक कहता है अन्याय से। शंकराचार्य इसका अर्थ बताते हैं, दूसरे का धन हड़पना। और उद्देश्य है केवल भोग; शंकराचार्य साफ़ जोड़ते हैं, धर्म के लिए नहीं। और मधुसूदन सरस्वती एक बहुत गहरी बात एक व्याकरण के छोटे-से संकेत से निकालते हैं। धन के लिए श्लोक का शब्द बहुवचन में है: धन के ढेर, एक ढेर नहीं। वे कहते हैं, यह बहुवचन बताता है कि धन मिल जाने पर भी प्यास नहीं जाती; जितना मिलता है, प्यास उतनी ही बढ़ती है। और इसी को, वे कहते हैं, लोभ कहते हैं। इस शब्द को याद रखिए, लोभ। आज यह शब्द एक दरवाज़ा बनकर लौटेगा।

और अब तेरहवाँ श्लोक, जहाँ श्रीकृष्ण वर्णन करना छोड़कर सीधे उस मन की आवाज़ सुनाने लगते हैं। "इदमद्य मया लब्धमिदं प्राप्स्ये मनोरथम्।" यह मैंने आज पाया है। यह मनोरथ मैं पूरा करूँगा। "इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्।" यह धन मेरा है, और यह भी फिर मेरा हो जाएगा।

इस श्लोक को एक बार धीरे से अपने मन में दोहराइए। "यह आज मिला। वह कल मिलेगा। यह मेरा है। वह भी मेरा होगा।" क्या यह आवाज़ अनजानी लगती है? मुझे तो नहीं लगती। तनख़्वाह बढ़ी तो उसी शाम अगली बढ़त का हिसाब। नया फ़ोन आया तो अगले महीने वाले मॉडल की ख़बर। एक मकान बना तो दूसरे की ज़मीन। श्रीधर स्वामी इस श्लोक को "मनोराज्य" कहते हैं, यानी मन के भीतर का राज्य, जहाँ आदमी बैठे-बैठे राजा बनता रहता है।

पर रामानुजाचार्य इस श्लोक में एक ऐसी बात देखते हैं जो सबसे ज़रूरी है। वे कहते हैं, इस आवाज़ का असली ज़ोर "मया" पर है, "मेरे द्वारा"। यह सब मैंने अपनी ही सामर्थ्य से पाया, किसी अदृष्ट से नहीं, किसी कृपा से नहीं, किसी और के सहारे से नहीं। यानी समस्या पाना नहीं है। समस्या यह भूल जाना है कि जो मिला, उसमें कितने हाथ लगे थे: माता-पिता के, गुरु के, समय के, भाग्य के, और उस अन्तर्यामी के, जिसके बारे में पिछले अध्याय में श्रीकृष्ण ने कहा था कि मैं सबके हृदय में बैठा हूँ। जिस क्षण "मुझे मिला" की जगह "मैंने लिया" आ जाता है, उस क्षण धन्यवाद मर जाता है। और धन्यवाद के बिना जो धन है, वह भूख बन जाता है।

तो यहाँ से एक बात लेकर चलिए: नरक की शुरुआत किसी भयानक अपराध से नहीं होती। वह एक छोटे-से वाक्य से होती है, "बस इतना ही है", और एक छोटे-से शब्द से, "मेरा"।

पर अभी एक बात बाकी है। अब तक यह आवाज़ केवल चाहती थी। अगले श्लोक में यह आवाज़ किसी को रास्ते से हटाती है, और फिर अपने को भगवान कहने लगती है।

असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि । ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥ १४ ॥
गीता 16.14 — अर्थ पढ़ें ›
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया । यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥ १५ ॥
गीता 16.15 — अर्थ पढ़ें ›
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः । प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ ॥ १६ ॥
गीता 16.16 — अर्थ पढ़ें ›

चौदहवाँ श्लोक। "असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि।" वह शत्रु मैंने मार डाला, और दूसरों को भी मारूँगा।

पिछले श्लोक में आवाज़ धन गिन रही थी। इस श्लोक में वह लाशें गिन रही है। मधुसूदन सरस्वती इन तीन श्लोकों का क्रम बहुत सुन्दर ढंग से खोलते हैं। वे कहते हैं, तेरहवें श्लोक में श्रीकृष्ण ने लोभ को फैलाकर दिखाया, "यह मिला, वह मिलेगा"। और अब इस चौदहवें श्लोक में, उसी मन की बात सुनाकर, वे क्रोध को फैलाकर दिखाते हैं। नीलकण्ठ इसे और बाँटकर कहते हैं: इस श्लोक की पहली पंक्ति क्रोध की है, दूसरी काम की। तो इसे ध्यान से सुनिए। अभी हम जिन तीन दरवाज़ों तक पहुँचने वाले हैं, काम, क्रोध और लोभ, श्रीकृष्ण उन्हें नाम लेकर बताने से पहले, इन श्लोकों में उन्हें बोलते हुए सुना रहे हैं। नाम बाद में आएगा। आवाज़ पहले।

शंकराचार्य इस पंक्ति को उस मन के शब्दों में भरते हैं: "वह जो बहुत कठिनाई से जीता जाने वाला शत्रु था, उसे मैंने मार दिया। बाकी तो बेचारे हैं, ये क्या कर लेंगे? मेरे बराबर तो कोई है ही नहीं।" आज के समय में हम शायद तलवार से किसी को नहीं मारते। पर यह आवाज़ आज भी बोलती है। दफ़्तर में, "उसे तो मैंने किनारे लगा दिया, अब अगले की बारी।" किसी बहस में, "आज मैंने उसकी बोलती बन्द कर दी।" परिवार के झगड़े में, "देख लेना, एक-एक को सबक सिखाऊँगा।" "हनिष्ये चापरानपि", दूसरों को भी। क्रोध की यही पहचान है कि वह एक जीत पर रुकता नहीं; हर जीत अगले शत्रु की तलाश बन जाती है।

फिर दूसरी पंक्ति, जो इस पूरे चित्र का सबसे ऊँचा सुर है। "ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी।" मैं स्वामी हूँ। मैं भोगने वाला हूँ। मैं सफल हूँ, बलवान् हूँ, सुखी हूँ।

"ईश्वरोऽहमहं भोगी।" मैं ईश्वर हूँ, मैं भोगी हूँ। सोचिए, यह शब्द कहाँ आ रहा है। इसी गीता में श्रीकृष्ण ने अभी पिछले अध्याय में कहा था कि सबके हृदय में मैं बैठा हूँ। ईश्वर वह है जो सबके भीतर है। और यहाँ एक आदमी अपने आप को ईश्वर कह रहा है, उस अर्थ में कि मैं सब पर हुक्म चलाने वाला हूँ। रामानुजाचार्य इसका अर्थ यही करते हैं: मैं अपने अधीन हूँ, किसी के अधीन नहीं, और दूसरों को चलाने वाला भी मैं ही हूँ। और "मैं भोगी हूँ" का अर्थ, मैं अपने ही बल से भोगता हूँ, किसी पिछले पुण्य से नहीं, किसी कृपा से नहीं। शंकराचार्य इस आवाज़ का अगला वाक्य भी सुना देते हैं: "सुखी तो बस मैं हूँ; बाकी लोग तो धरती पर बोझ बनकर पैदा हुए हैं।" इतना कठोर वाक्य कहना भी कठिन लगता है। पर ईमानदारी से सोचिए, क्या कभी किसी ऊँचे मंच से, किसी भीड़ को देखते हुए, हमारे भीतर भी कोई छोटी-सी आवाज़ यह नहीं बोली कि "ये लोग किस काम के हैं"?

चालीसवें सत्संग में आपने नहुष की कथा सुनी थी, जो अपने यज्ञ, तप और पराक्रम से इन्द्र के आसन तक पहुँचे थे, और फिर उसी ऐश्वर्य के मद में गिरकर अजगर बने। गुफा में युधिष्ठिर से उन्होंने स्वयं कहा था, "मैं वही हूँ, ऐश्वर्य के मोह में मद से भरकर गिरा, अब जागा हूँ, और तुम्हें सचेत करता हूँ।" आज उस कथा का एक नया कोना देखिए। "मैं ईश्वर हूँ" की आवाज़ किसी बुरे आदमी के भीतर नहीं, एक ऐसे आदमी के भीतर उठी थी जिसने बड़े पुण्य से वह आसन कमाया था। यानी यह आवाज़ अक्सर असफलता में नहीं, सफलता में आती है। "सिद्धोऽहं बलवान्सुखी", मैं सफल हूँ, बलवान् हूँ, सुखी हूँ। जिस दिन हम सफल होते हैं, उसी दिन इस दरवाज़े पर सबसे ज़्यादा भीड़ होती है।

अब पन्द्रहवाँ श्लोक। "आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।" मैं धनी हूँ, ऊँचे कुल वाला हूँ। मेरे समान दूसरा कौन है?

"आढ्योऽभिजनवानस्मि" में ऊँचे कुल वाली बात पर रुकिए। शंकराचार्य कहते हैं, ऐसा कुल जिसमें सात पीढ़ियों से विद्वान होते आए हों। यानी अब घमण्ड केवल अपनी कमाई का नहीं, बाप-दादा की कमाई का भी है। और फिर वह प्रश्न, जो इस आवाज़ का सबसे प्यारा प्रश्न है: "कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया", मेरे जैसा और कौन? ध्यान दीजिए, यह आवाज़ अकेले सुखी नहीं हो सकती। उसे अपने सुख के लिए किसी को अपने से नीचे देखना पड़ता है। उसका सुख तुलना का सुख है। जब तक कोई बराबर का दिखता रहे, तब तक उसे चैन नहीं, और जब कोई बराबर का न बचे, तब भी चैन नहीं, क्योंकि फिर डर लगता है कि कोई आ न जाए।

और अब इस श्लोक का वह हिस्सा जो मुझे सबसे ज़्यादा सोचने पर मजबूर करता है, क्योंकि यह हम जैसे लोगों के लिए है, जो सत्संग सुनते हैं, पूजा करते हैं, दान देते हैं। "यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः।" मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा, मौज करूँगा: इस प्रकार अज्ञान से मोहित होकर वे सोचते हैं।

यज्ञ और दान! यज्ञ को तो गीता ने तीसरे और चौथे अध्याय में इतना ऊँचा कहा था, और दान पिछले सत्संग में दैवी सम्पदा की सूची में गिना गया था। फिर यहाँ ये आसुरी आवाज़ के मुँह में क्यों हैं? हमारी टीका इसका सीधा उत्तर देती है: उनके यज्ञ और दान भी दूसरों से आगे दिखने के साधन हैं। श्रीधर स्वामी कहते हैं, "यक्ष्ये", यानी यज्ञ करके मैं दूसरे यज्ञ करने वालों से बड़ी प्रतिष्ठा पाऊँगा; और "दास्यामि", यानी मेरी तारीफ़ करने वालों को दूँगा। शंकराचार्य कहते हैं, यज्ञ से भी मैं दूसरों को दबा दूँगा। यानी काम वही, पर भीतर की बात उलटी। भण्डारा वही, पर बैनर पर अपना नाम सबसे बड़ा। दान वही, पर फ़ोटो पहले। रामानुजाचार्य एक और बारीक बात कहते हैं: यह मन मानता है कि यज्ञ और दान भी मैं अपने ही बल से कर लूँगा, ईश्वर की कृपा की कोई ज़रूरत नहीं। पूजा भी "मेरी" पूजा बन जाती है।

पर इस पंक्ति के अन्त का शब्द मत भूलिए। "इत्यज्ञानविमोहिताः।" अज्ञान से मोहित। श्रीकृष्ण यह नहीं कहते कि ये लोग दुष्ट हैं, इसलिए ऐसा सोचते हैं। वे कहते हैं, अज्ञान ने इन्हें भ्रम में डाल दिया है। और जो रोग अज्ञान से है, उसकी दवा ज्ञान है। यह बात आज के कठिन श्लोकों तक पहुँचते समय अपने साथ रखिएगा।

और यहाँ, इससे पहले कि हम सोलहवें श्लोक में उतरें, एक छोटी-सी बात आपसे कहना चाहता हूँ। आज के ये श्लोक ऐसे हैं कि अगर कोई इन्हें आधा सुनकर उठ जाए, तो उसे लग सकता है कि गीता डरा रही है, या किसी को कोस रही है। पर आधा सुना हुआ सच, सच नहीं रहता, वह भ्रम बन जाता है। इस अध्याय के अन्त तक श्रीकृष्ण इसी अँधेरे से बाहर निकलने का रास्ता दिखाने वाले हैं, बहुत साफ़ और बहुत सरल। तो अगर आप यह सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की यह यात्रा बीच में न छूटे। और आज का यह सत्संग आख़िर तक सुनिए।

अब सोलहवाँ श्लोक। "अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः।" अनेक प्रकार से भटके हुए चित्त वाले, मोह के जाल में फँसे।

"अनेकचित्त।" नीलकण्ठ इस शब्द का बड़ा सुन्दर अर्थ करते हैं: जिसके पास सोचने के लिए एक चीज़ नहीं, अनेक हैं; जिसका मन बहुत-से विषयों में एक साथ लगा है, और जो इसी उलझन में घूमता है कि "पहले यह साधूँ या वह?" आज की भाषा में कहें तो एक साथ बीस खिड़कियाँ खुली हैं, और किसी एक पर भी मन नहीं टिकता। और "मोहजाल", मोह का जाल। श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती, दोनों एक ही चित्र देते हैं: जैसे मछली धागे के जाल में फँस जाती है। मछली को जाल दिखता नहीं। उसे बस चारा दिखता है। और जाल का हर धागा पतला है, ठीक उस आशा की तरह, जो उस दुबले मुनि से भी पतली थी।

संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर कहते हैं, जैसे तेज़ बुख़ार में रोगी कुछ का कुछ बड़बड़ाता है, वैसे ही ये अपने संकल्पों में बड़बड़ाते रहते हैं। यह चित्र मुझे बहुत करुणा भरा लगता है। बुख़ार में बड़बड़ाने वाले पर कोई गुस्सा नहीं करता। उसके माथे पर ठंडी पट्टी रखी जाती है।

फिर दूसरी पंक्ति। "प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ।" भोगों में डूबे हुए वे अपवित्र नरक में गिरते हैं।

यहाँ पहली बार इस अध्याय में "नरक" शब्द आया है। और इस पर दो आचार्यों की दो बातें आपको सुनाना चाहता हूँ। रामानुजाचार्य एक छोटा-सा शब्द जोड़ते हैं: "मध्ये मृताः", बीच में ही मरकर। याद कीजिए तेरहवाँ श्लोक: "प्राप्स्ये", मैं पाऊँगा, "भविष्यति", मेरा होगा। उस आवाज़ की हर बात भविष्य में थी। और मृत्यु उस सूची के बीच में ही आ जाती है, जब आधे मनोरथ अभी बाकी हैं। और संत ज्ञानेश्वर इससे भी आगे की बात कहते हैं। वे कहते हैं, जब पाप अपने बल से इकट्ठे होते जाते हैं, तब ऐसे लोग जीते-जी ही नरक में आ जाते हैं। जीते-जी। यानी नरक केवल मरने के बाद की कोई जगह नहीं। अपार चिन्ता, सौ रस्सियों का खिंचाव, हर किसी से तुलना, हर जीत के बाद अगला शत्रु, और बुख़ार जैसी बड़बड़ाहट, यह सब अपने आप में भी एक जलन है।

और यहाँ से यह बात साथ रखिए: यह आवाज़ अक्सर हार में नहीं, जीत में आती है। और वह हमारे अच्छे कामों को भी अपना मंच बना लेती है।

पर अभी एक बात बाकी है। अगले श्लोक में यही आवाज़ धर्म के कपड़े पहनकर यज्ञशाला में बैठती है। और फिर श्रीकृष्ण एक ऐसी बात कहते हैं जो सुनने में छोटी है, पर बहुत भारी है: कि यह आवाज़ असल में किससे द्वेष करती है।

आत्मसंभाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः । यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् ॥ १७ ॥
गीता 16.17 — अर्थ पढ़ें ›
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः । मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥ १८ ॥
गीता 16.18 — अर्थ पढ़ें ›

सत्रहवाँ श्लोक। "आत्मसंभाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः।" अपने ही मन में अपने को बड़ा मानने वाले, अकड़े हुए, धन और मान के नशे में चूर।

"आत्मसंभाविताः।" शंकराचार्य इसका अर्थ बहुत साफ़ करते हैं: जिन्हें उन्होंने ख़ुद ही आदरणीय मान लिया, सज्जनों ने नहीं। यानी प्रमाणपत्र अपने ही हाथ का लिखा हुआ है। कोई सन्त, कोई गुरु, कोई बड़ा उन्हें श्रेष्ठ नहीं कहता; वे ख़ुद अपने को कहते हैं। और "स्तब्धा", अकड़े हुए। शंकराचार्य कहते हैं, जो झुकते नहीं। संत ज्ञानेश्वर इसका एक चित्र देते हैं: जैसे ढले हुए लोहे के खम्भे, जो मुड़ना जानते ही नहीं। पिछले सत्संग की दैवी सम्पदा याद कीजिए। उसमें एक गुण था, "नातिमानिता", बहुत अधिक मान न होना, और एक था "मार्दवं", कोमलता। यहाँ ठीक उसका उलटा है। कोमल पेड़ आँधी में झुककर बच जाता है; लोहे का खम्भा अकड़ा खड़ा रहता है, और जब गिरता है तो पूरा गिरता है।

फिर दूसरी पंक्ति। "यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्।" वे दिखावे से, विधि के विरुद्ध, नाम-मात्र के यज्ञ करते हैं।

"नामयज्ञ।" इस शब्द के दो अर्थ आचार्यों ने किए हैं, और दोनों सच्चे हैं। शंकराचार्य कहते हैं, नाम-मात्र के यज्ञ, यानी जिनका केवल नाम यज्ञ है, भीतर कुछ नहीं। और श्रीधर स्वामी तथा मधुसूदन सरस्वती एक दूसरा अर्थ भी देते हैं: नाम के लिए किए गए यज्ञ, ताकि लोग "दीक्षित" या "सोमयाजी" जैसी उपाधि से पुकारें। अभिनवगुप्त इसमें बस एक शब्द जोड़ते हैं: ऐसे यज्ञ फल नहीं देते। और "दम्भेन", दिखावे से। मधुसूदन सरस्वती इसके लिए एक बहुत सटीक शब्द इस्तेमाल करते हैं, "धर्मध्वजिता", यानी धर्म का झण्डा उठाकर चलना, और फिर साफ़ कहते हैं: श्रद्धा से नहीं।

युद्ध से पहले की उन जागती रातों में विदुर ने धृतराष्ट्र से एक बात कही थी जो इस श्लोक के बिल्कुल पास बैठती है। उन्होंने चार काम गिनाए जो मनुष्य को निर्भय बनाते हैं, अग्निहोत्र, मौन, अध्ययन और यज्ञ, और फिर कहा कि यही चार काम अगर ठीक से न किए जाएँ, तो भय देते हैं: घमण्ड से किया अग्निहोत्र, घमण्ड से रखा मौन, घमण्ड से किया अध्ययन, और घमण्ड से किया यज्ञ। मौन भी घमण्ड से रखा जा सकता है! ज़रा सोचिए। "देखो, मैं कितना शान्त हूँ, मैं बोलता ही नहीं।" अध्ययन भी घमण्ड से हो सकता है: "मैंने इतने ग्रन्थ पढ़े हैं।" और मुझे लगता है कि यह बात आज के इस सत्संग पर भी लागू होती है। गीता सुनना भी घमण्ड से हो सकता है, अगर सुनने के बाद हम बस यह सोचें कि "अब मैं दूसरों से ज़्यादा जानता हूँ।" जो साधन निर्भय बनाने के लिए था, वह भय का कारण बन जाता है, क्योंकि जिसे दिखाना है, उसे हमेशा डर रहता है कि कहीं पोल न खुल जाए।

और एक शब्द को अभी के लिए अलग रख लीजिए: "दम्भेनाविधिपूर्वकम्", दिखावे से, विधि के विरुद्ध। इस अध्याय के बिल्कुल अन्त में श्रीकृष्ण इसी "विधि" पर लौटेंगे, और पूरा अध्याय उसी पर बन्द होगा।

अब अठारहवाँ श्लोक। "अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः।" अहंकार, बल, घमण्ड, काम और क्रोध का सहारा लेकर।

शंकराचार्य इन पाँचों को एक-एक करके खोलते हैं। अहंकार, यानी अपने में जो गुण हैं और जो नहीं हैं, सबको जोड़कर "मैं" को बड़ा मानना; और वे कहते हैं, यह सब दोषों की जड़ है, सबसे कष्टदायक। बल, यानी वह ताक़त जो दूसरों को दबाने के लिए हो। दर्प, यानी वह घमण्ड जिसके उठते ही आदमी धर्म की सीमा लाँघ जाता है। और फिर वही दो, काम और क्रोध, जिन्हें हमने पिछले श्लोकों में बोलते सुना।

और अब दूसरी पंक्ति, जो इस पूरे वर्णन की सबसे गहरी पंक्ति है। "मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः।" दूसरों में दोष ढूँढ़ने वाले ये लोग अपने और दूसरों के शरीरों में बैठे मुझसे द्वेष करते हैं।

"माम्", मुझसे। यह आदमी कहता तो यह है कि मैं अपने शत्रु से नफ़रत करता हूँ, अपने प्रतिद्वन्द्वी से, अपने नौकर से, उस पड़ोसी से जो मुझसे आगे निकल गया। पर श्रीकृष्ण कहते हैं, तुम जिससे भी द्वेष करते हो, उसके भीतर मैं बैठा हूँ। तुम्हारी नफ़रत का पता चाहे कोई भी लिखा हो, चिट्ठी मुझ तक पहुँचती है। हमारी टीका यही कहती है: दूसरों को कष्ट देना, और भगवान् की आज्ञा की उपेक्षा करना, उनमें रहने वाले भगवान् से ही द्वेष करना है।

पर श्लोक में केवल दूसरों का शरीर नहीं लिखा। "मामात्मपरदेहेषु" लिखा है, अपने और पराए, दोनों शरीरों में। अपने शरीर में भगवान से द्वेष कैसे होता है? मधुसूदन सरस्वती एक ऐसी बात कहते हैं जो दिल को छू जाती है। वे कहते हैं, ऐसे लोग अपने शरीर में, और अपने ही बेटे-बेटियों, अपनी पत्नी के शरीरों में भी, जिनसे वे सबसे ज़्यादा प्रेम करते हैं, वहाँ साक्षी बनकर बैठे उस परमात्मा से द्वेष करते हैं जो सबसे अधिक प्रेम के योग्य है। यानी क्रोध जब घर में उतरता है, तो वह जिन पर बरसता है, वे हमारे अपने होते हैं, और उनके भीतर भी वही बैठा है। संत ज्ञानेश्वर भगवान के मुँह से कहलवाते हैं: वे जिन शरीरों को जलाते हैं, उनमें जो मैं हूँ, चोटें मुझ पर पड़ती हैं।

उनतालीसवें सत्संग में हमने तेरहवें अध्याय का वह श्लोक सुना था: "समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्। न हिनस्त्यात्मनात्मानं।" जो सब जगह एक ही ईश्वर को समान रूप से टिका देखता है, वह अपने द्वारा अपने को नहीं मारता। आज का श्लोक उसी का उलटा चित्र है। जो दूसरों में भगवान नहीं देखता, वह दूसरों को चोट पहुँचाते हुए असल में अपने ही को चोट पहुँचा रहा है, क्योंकि दोनों के भीतर एक ही है।

और उसी लम्बी रात में, आगे चलकर, विदुर ने धृतराष्ट्र को धर्म का पूरा सार एक पंक्ति में दिया था: "न तत्परस्य सन्दध्यात्प्रतिकूलं यदात्मनः।" जो अपने लिए बुरा लगे, वह दूसरे के साथ मत करो; संक्षेप में यही धर्म है। और उसके आगे विदुर ने चार शब्द और कहे थे, जिन्हें मैं आपके लिए अभी सँभालकर रख रहा हूँ, क्योंकि वे आज के आख़िरी श्लोक की चाबी हैं।

और "प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः", द्वेष करने वाले, दोष ढूँढ़ने वाले। शंकराचार्य इसका अर्थ करते हैं: जो अच्छे मार्ग पर चलने वालों के गुणों को सह नहीं पाते। यह भी बहुत पहचानी हुई आदत है। कोई सचमुच अच्छा काम कर रहा हो, तो मन तुरन्त ढूँढ़ने लगता है कि "इसके पीछे इसका कोई स्वार्थ होगा।" किसी की भलाई को सह न पाना, उसमें कोई छिपा खोट ढूँढ़ लेना, यह भी उसी भीतर बैठे से द्वेष है, क्योंकि जो गुण उस आदमी में चमक रहा है, वह भी उसी की रोशनी है।

इसलिए यह बात मन में बैठा लीजिए: हम किसी से भी द्वेष करें, उसका पता एक ही है। इसलिए किसी पर हाथ उठाने से पहले, या ज़बान उठाने से पहले, एक पल रुककर यह याद कर लेना कि उसके भीतर कौन बैठा है, अपने आप में एक साधना है।

पर अभी एक बात बाकी है, और वह आज की सबसे कठिन बात है। अगले दो श्लोकों में श्रीकृष्ण बताते हैं कि ऐसे मन का अन्त में क्या होता है। वे श्लोक भारी हैं, और कई लोग उन्हें सुनकर डर जाते हैं। हम उन्हें ठीक वैसे ही पढ़ेंगे जैसे वे लिखे हैं, और फिर देखेंगे कि हमारे आचार्य उन्हें कैसे पढ़ते हैं।

तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् । क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥ १९ ॥
गीता 16.19 — अर्थ पढ़ें ›
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि । मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् ॥ २० ॥
गीता 16.20 — अर्थ पढ़ें ›

पहले मैं इन दोनों श्लोकों को ठीक वैसे पढ़ता हूँ जैसे वे हैं, बिना कुछ घटाए, बिना कुछ नरम किए।

"तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्। क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु।" उन द्वेष करने वाले, क्रूर, अशुभ, नीच मनुष्यों को मैं संसार में बार-बार आसुरी योनियों में ही डालता हूँ।

"आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि। मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्।" हे कुन्तीपुत्र, जन्म-जन्म में आसुरी योनि को पाकर वे मूढ़ लोग मुझे न पाकर उससे भी नीची गति को जाते हैं।

यह कठिन बात है, और मैं इसे छिपाऊँगा नहीं। श्रीकृष्ण "तानहं" कहते हैं, उन्हें मैं। "क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु", मैं लगातार डालता हूँ। और "जन्मनि जन्मनि", जन्म दर जन्म। तो स्वाभाविक है कि मन में प्रश्न उठे: क्या भगवान किसी से बदला लेते हैं? क्या वे किसी को हमेशा के लिए नीचे फेंक देते हैं? इन प्रश्नों के उत्तर के लिए आइए, अपने आचार्यों के पास चलें, क्योंकि उन्होंने ये प्रश्न हमसे बहुत पहले पूछे थे।

पहली बात हमारी अपनी टीका कहती है, एक छोटे-से वाक्य में: यह उनके अपने कर्मों का फल है, जिसे भगवान् केवल देते हैं। श्रीधर स्वामी भी यही कहते हैं: उन पाप कर्म करने वालों को मैं वैसा ही फल देता हूँ। नीलकण्ठ एक बहुत सुन्दर बात जोड़ते हैं। वे कहते हैं, भगवान सब प्राणियों में समान हैं; और वे बाहर खड़े कोई तटस्थ न्यायाधीश नहीं, भीतर के अन्तरात्मा हैं, इसलिए उनमें पक्षपात का प्रश्न ही नहीं उठता। अपने पुराने संस्कारों के कारण वे वैसा ही करते हैं, और उसके अनुरूप फल पाते हैं। और मधुसूदन सरस्वती इसी बात के लिए व्यासजी के ब्रह्मसूत्र की ओर इशारा करते हैं, जो कहता है कि ईश्वर में न पक्षपात है, न निर्दयता, क्योंकि फल जीव के अपने कर्मों पर टिका है। यानी "मैं डालता हूँ" का अर्थ यह नहीं कि भगवान ग़ुस्से में किसी को धक्का देते हैं। जैसे धरती बीज को उसके अपने स्वभाव के अनुसार उगाती है, नीम को नीम और आम को आम, वैसे ही कर्म अपना फल लाता है, और फल देने वाले वे हैं। बीज हमारा है।

दूसरी बात ईमानदारी से कहनी होगी। कुछ आचार्य इन श्लोकों को बहुत गम्भीर ढंग से पढ़ते हैं। मधुसूदन सरस्वती और बलदेव विद्याभूषण, दोनों ख़ुद यह प्रश्न उठाते हैं कि क्या बहुत जन्मों के बाद आपकी कृपा से इनका भी उद्धार नहीं होगा? और वे कहते हैं, जब तक ये उसी द्वेष में डूबे रहते हैं, तब तक नहीं; क्योंकि नीचे जाते-जाते वह योग्यता ही दुर्लभ हो जाती है जिससे ऊपर उठने का साधन किया जा सके। पर इसी के ठीक बाद मधुसूदन सरस्वती जो निष्कर्ष निकालते हैं, वही इस श्लोक का असली प्रयोजन है। वे कहते हैं: इसलिए जब तक यह मनुष्य-शरीर मिला हुआ है, तब तक पूरे प्रयत्न से, और जल्दी से, आसुरी सम्पदा को छोड़कर दैवी सम्पदा का पालन करना चाहिए। और वे एक पुराना वचन सुनाते हैं: जो यहीं नरक रूपी रोग का इलाज नहीं करता, वह ऐसी जगह जाकर क्या करेगा जहाँ कोई दवा ही नहीं? यह एक वैद्य की जल्दी है, न्यायाधीश की नहीं। वैद्य जब कहता है कि "यह रोग बढ़ गया तो कठिन होगा", तो वह डराने के लिए नहीं, इलाज शुरू करवाने के लिए कहता है। और इलाज का समय है अभी, इसी शरीर में।

तीसरी बात उस छोटे-से शब्द में है, "मामप्राप्यैव", मुझे न पाकर ही। शंकराचार्य कहते हैं, यहाँ भगवान को पाने की बात तो उठती ही नहीं, इसलिए इसका अर्थ है: मेरे बताए हुए सज्जनों के मार्ग को न पाकर। यानी समस्या मार्ग का न मिलना है। और विश्वनाथ चक्रवर्ती इस शब्द में एक बहुत आशा भरी बात देखते हैं। वे कहते हैं, ध्यान दो, लिखा है "न पाकर", "पाकर" नहीं। जो सचमुच उन तक पहुँच गए, शत्रु बनकर भी, उन्हें भी भगवान ने मुक्ति दे दी, क्योंकि वे करुणा के अपार सागर हैं। तेरहवें और तैंतीसवें सत्संग में आपने शिशुपाल की कथा सुनी थी: श्रीकृष्ण ने कहा था कि यही पहले हिरण्यकशिपु था, यही रावण, जन्म-जन्म उसी वैर में, और चक्र चलने पर उसके शरीर से उगते सूरज जैसा तेज उठा और श्रीकृष्ण में समा गया। "जन्मनि जन्मनि", जन्म दर जन्म वही स्वभाव; और फिर एक दिन, उनके सामने पहुँचते ही, सब ख़त्म। "मामप्राप्यैव", जब तक मुझे न पाएँ।

और चौथी बात एक सम्बोधन में छिपी है। इस कठोर श्लोक के बीच में श्रीकृष्ण अर्जुन को "कौन्तेय" कहते हैं, कुन्ती के बेटे। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, अपना यह रिश्ता याद दिलाकर भगवान अर्जुन को संकेत दे रहे हैं कि तुम इससे पहले ही पार हो चुके हो। यह वही बात है जो पाँचवें श्लोक में सीधे कही गई थी: "मा शुचः", शोक मत करो। श्रीकृष्ण यह चित्र अर्जुन को डराने के लिए नहीं दिखा रहे। वे उसे यह दिखा रहे हैं कि जिस रास्ते पर वह नहीं है, वह किधर जाता है।

और संत ज्ञानेश्वर इन श्लोकों पर जो कहते हैं, उसके बाद मुझे लगता है कोई डर बचता ही नहीं। वे श्रीकृष्ण के मुँह से कहलवाते हैं: "अहा, यह बताते हुए मेरी वाणी रोती है, याद करते हुए मेरा मन सिहर उठता है।" वाणी रोती है। यह किसी क्रोधित राजा का फ़ैसला नहीं, एक रोते हुए पिता की चेतावनी है, जो अपने बच्चे को आग के पास जाते देख रहा है।

अब महाभारत ने अपने बिल्कुल अन्त में नरक का जो चित्र दिखाया है, वह भी सुन लीजिए, क्योंकि वह इन श्लोकों को समझने में बहुत मदद करता है। युधिष्ठिर अपने शरीर के साथ स्वर्ग पहुँचे। और वहाँ पहली चीज़ जो उन्होंने देखी, वह थी दुर्योधन, सूरज की तरह चमकता हुआ, देवताओं के बीच, तेज भरे आसन पर। युधिष्ठिर क्रोध से भर गए और लौट पड़े। ऊँचे स्वर में बोले, "मैं उस लोभी, अदूरदर्शी दुर्योधन के साथ कोई लोक नहीं चाहता।" और नारद ने मानो हँसते हुए कहा, "ऐसा नहीं, राजन्। स्वर्ग में रहते हुए वैर भी मिट जाता है। दुर्योधन के बारे में ऐसा मत कहो। जुए में जो हुआ, उसे मन में मत रखो।" सोचिए। धर्मराज युधिष्ठिर भी, स्वर्ग के दरवाज़े पर खड़े होकर, किसी पर "लोभी" का ठप्पा लगा रहे थे, और उन्हें भी रोका गया। गीता के इन श्लोकों को सुनकर किसी पर ठप्पा लगाना हमारा काम नहीं है।

फिर युधिष्ठिर ने कहा, "मेरे भाई कहाँ हैं? जहाँ वे हैं, वही मेरा स्वर्ग है।" एक देवदूत उन्हें ले चला, और रास्ता अँधेरे से ढका था, दुर्गन्ध भरा, वही मार्ग जिस पर पाप कर्म करने वाले आते-जाते हैं। युधिष्ठिर थककर लौटने को मुड़े ही थे कि चारों ओर से दीन आवाज़ें आईं: "हे धर्मपुत्र, एक क्षण रुक जाओ। तुम्हारे आने से यहाँ पवित्र हवा बही है, हमें सुख मिला है। तुम रुकते हो तो यातना हमें नहीं सताती।" युधिष्ठिर ने कहा, "हाय, कैसा कष्ट!" और रुक गए। पूछा, "आप कौन हैं?" और उत्तर आया: "मैं कर्ण हूँ, मैं भीम हूँ, मैं अर्जुन हूँ, मैं नकुल, मैं सहदेव, मैं द्रौपदी।" युधिष्ठिर ने देवताओं को और धर्म को भी कोसा, और देवदूत से कहा, "जाओ, उनसे कह दो कि मैं यहीं रुकूँगा, क्योंकि मेरे ये दुखी भाई मेरे सहारे से सुखी हैं।"

और वे एक क्षण वहाँ खड़े रहे। फिर इन्द्र और देवता वहाँ आए, और स्वयं धर्म भी। और पाठ कहता है, उनके आते ही वह अँधेरा चला गया। यातनाएँ दिखनी बन्द हो गईं, वह नदी, वह काँटेदार पेड़, सब ग़ायब। और ठंडी, सुगन्ध भरी हवा बहने लगी। इन्द्र ने समझाया: "नरक हर राजा को देखना पड़ता है। शुभ और अशुभ की दो राशियाँ होती हैं, और हर एक अपनी-अपनी का फल पाता है। तुमने द्रोण को उनके पुत्र के विषय में छल से भ्रम में डाला था, इसलिए तुम्हें भी नरक छल से ही दिखाया गया।" और धर्म ने कहा, "तुम्हारे भाई नरक के योग्य नहीं हैं, यह माया थी। और यह मेरी तीसरी परीक्षा थी, कि तुम अपने भाइयों के लिए यहाँ रुकना चाहते हो।" फिर युधिष्ठिर ने आकाशगंगा में स्नान किया, और पाठ कहता है, उनका मानव शरीर छूट गया, और वे वैर और ताप से रहित हो गए। और महाभारत की उस कथा का आख़िरी चित्र यह है: वे वहाँ गए जहाँ पाण्डव और धृतराष्ट्र के पुत्र, सब, क्रोध से मुक्त होकर अपने-अपने स्थान में रहते थे।

इस कथा से तीन बातें निकलती हैं, जो आज के श्लोकों के बहुत पास हैं। पहली, नरक एक सच्चाई है, और वह अपने ही कर्मों का फल है, किसी का दिया हुआ दण्ड नहीं; युधिष्ठिर जैसे धर्मात्मा को भी अपने एक छल का फल एक क्षण के लिए देखना पड़ा। दूसरी, वह नापा-तुला है, दो राशियों का हिसाब, कोई अन्धा ग़ुस्सा नहीं। और तीसरी, जो मुझे सबसे सुन्दर लगती है: उस अँधेरे में भी एक धर्मात्मा के खड़े होने से दुखियों को चैन मिला। और जिसने करुणा से वहाँ रुकना चुना, उसी के लिए अँधेरा हटा। नरक का सबसे पक्का इलाज करुणा है। जिस मन में दूसरे के दुख पर "हाय, कैसा कष्ट!" निकलता है, उस मन के लिए "आसुरी" शब्द बचता ही नहीं।

तो आज इन दो कठिन श्लोकों से क्या लेकर उठें? यह नहीं कि कौन-सा आदमी नरक जाएगा। यह कि कर्म बीज है, और फल उसी जाति का आता है। यह कि जो स्वभाव बार-बार दोहराया जाता है, वह जन्मों तक साथ चलता है, इसलिए आज का एक छोटा-सा बदलाव भी कल का स्वभाव बनाता है। और यह कि यह सब कहते हुए भगवान की वाणी रोती है, क्योंकि वे चाहते हैं कि हम उस रास्ते पर न जाएँ।

पर अभी एक बात बाकी है, और वह इस पूरे अध्याय की सबसे ज़रूरी बात है। श्रीकृष्ण ने जो लम्बा, अँधेरा चित्र खींचा, उसे अब वे तीन शब्दों में समेटते हैं। और जिस बात को समेटा जा सके, उसे छोड़ा भी जा सकता है।

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः । कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥ २१ ॥
गीता 16.21 — अर्थ पढ़ें ›
एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः । आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम् ॥ २२ ॥
गीता 16.22 — अर्थ पढ़ें ›

"त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।" नरक का यह द्वार तीन प्रकार का है, और यह अपना ही नाश करने वाला है। "कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्।" काम, क्रोध और लोभ। इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।

यही वह श्लोक है जिसके लिए आज का पूरा सत्संग है। और देखिए, कितना सरल है। इतना लम्बा, इतना अँधेरा चित्र, अपार चिन्ता, सौ फाँसियाँ, "मैं ईश्वर हूँ", नाम के यज्ञ, अपने ही भीतर बैठे भगवान से द्वेष, और फिर जन्म-जन्म की नीची गति। और यह सारा चित्र श्रीकृष्ण तीन शब्दों में समेट देते हैं।

मधुसूदन सरस्वती यहाँ ठीक वही प्रश्न उठाते हैं जो हमारे मन में उठता है। वे कहते हैं, आसुरी सम्पदा के तो अनगिनत रूप हैं; एक मनुष्य की छोटी-सी आयु में इन सबको कोई कैसे छोड़ेगा? और उत्तर देते हैं: इसीलिए भगवान ने उसे समेटकर तीन में रख दिया। ये तीन सारी आसुरी सम्पदा की जड़ हैं; इन तीनों को छोड़ने से सारी आसुरी सम्पदा छूट जाती है। जैसे पेड़ की हज़ार पत्तियाँ एक-एक करके तोड़ने बैठें तो उम्र बीत जाए, पर जड़ ढीली हो जाए तो पत्तियाँ अपने आप सूखती हैं।

आठवें सत्संग में हमने दूसरे अध्याय की वह सीढ़ी सुनी थी: "सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते", आसक्ति से कामना, और कामना से क्रोध। और बारहवें सत्संग में तीसरे अध्याय का वह उत्तर, जब अर्जुन ने पूछा था कि आदमी न चाहते हुए भी पाप क्यों कर बैठता है: "काम एष क्रोध एष", यह काम है, यही क्रोध है, यही असली शत्रु है। उन दोनों जगहों पर काम और क्रोध की जोड़ी थी। आज उस जोड़ी में तीसरा आ मिला है: लोभ। काम कहता है, "मुझे चाहिए।" क्रोध कहता है, "जो बीच में आया, उसे हटा दूँगा।" और लोभ कहता है, "जो मिल गया, वह कम है, और जो मेरा है, उसमें से किसी को कुछ नहीं दूँगा।" चालीसवें सत्संग में भीष्म ने लोभ को एक बड़ा मगरमच्छ कहा था, जो कभी भरता नहीं। और याद कीजिए, आज के पहले श्लोकों में श्रीकृष्ण ने तीनों को बोलते हुए सुनाया था। "यह मिला, वह मिलेगा", वह लोभ था। "वह शत्रु मारा, दूसरों को भी मारूँगा", वह क्रोध था। "मैं भोगी हूँ, मौज करूँगा", वह काम था। नाम अब आया है। आवाज़ हम पहले सुन चुके हैं।

अब "द्वार" शब्द पर रुकिए। श्लोक में "द्वारं" एकवचन में है, एक द्वार, पर "त्रिविधं", तीन प्रकार का। मुझे यह ऐसा लगता है जैसे एक ही दरवाज़े के तीन पल्ले हों: कोई भी एक खुले, भीतर का रास्ता वही है। और शंकराचार्य "नाशनमात्मनः" पर एक बहुत गहरी बात कहते हैं: यह ऐसा द्वार है कि इसमें घुसते ही आत्मा का नाश हो जाता है, यानी मनुष्य किसी भी पुरुषार्थ के योग्य नहीं रहता। घुसते ही। नरक कहीं आगे नहीं, दरवाज़े पर ही है।

रामानुजाचार्य इसे और साफ़ कर देते हैं। वे इस श्लोक का अर्थ करते हैं: इस आसुरी स्वभाव रूपी नरक का यह तीन प्रकार का द्वार। आसुरी स्वभाव रूपी नरक! यानी स्वभाव ही नरक है। और वेदान्त देशिक इस पर कहते हैं कि रौरव जैसे नरक तो एक तरह से पाप को चुकाने की जगह हैं, पर यह आसुरी स्वभाव उनसे भी भयानक है, क्योंकि यह नया पाप कमाता चला जाता है। संत ज्ञानेश्वर इसी बात को अपने ढंग से कहते हैं: रौरव जैसे नरकों की बात तब तक बस परदे के पीछे की कहानी है, जब तक ये तीनों भीतर नहीं उठते। जिस दिन ये उठ गए, उस दिन वह कहानी नहीं रहती।

और अब एक ऐसी बात, जिसे सुनकर मुझे लगता है कि उस अन्धेरे कमरे में धृतराष्ट्र एक पल को चुप हो गए होंगे। उस रात, युद्ध से पहले, जब धृतराष्ट्र जाग रहे थे और जल रहे थे, और विदुर उन्हें धर्म और नीति की बातें सुना रहे थे, तब विदुर ने यही श्लोक कहा था। ठीक यही, अक्षर-अक्षर: "त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्।" वही राजा, जिसने यह श्लोक युद्ध से पहले अपने छोटे भाई से सुना था, आज इसे दोबारा सुन रहा है, इस बार सञ्जय के मुँह से, श्रीकृष्ण के शब्दों में, उस दिन जब भीष्म गिर चुके हैं। मैं इसमें धृतराष्ट्र को दोष नहीं देना चाहता। हम सबके साथ यही होता है। बहुत-सी सच्ची बातें हम पहली बार सलाह की तरह सुनते हैं, और टाल देते हैं, और फिर वही बात जीवन हमें दोबारा सुनाता है, किसी और के मुँह से, किसी और दिन। अच्छी बात यह है कि वह दोबारा सुनाता है। और जब तक साँस है, तीसरी बार भी।

अब बाईसवाँ श्लोक, और यही वह श्लोक है जो इस पूरे अँधेरे चित्र में दरवाज़ा बाहर की ओर खोलता है। "एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः।" हे कुन्तीपुत्र, अन्धकार के इन तीन द्वारों से मुक्त हुआ मनुष्य, "आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्", अपने कल्याण का आचरण करता है, और उससे परम गति को जाता है।

एक शब्द पर ध्यान दीजिए: "नरः", मनुष्य। उन्नीसवें श्लोक में शब्द था "नराधमान्", नीच मनुष्य। और बाईसवें में बस "नरः"। मुझे यह संयोग नहीं लगता। मनुष्य वही है। उन्नीसवें और बाईसवें के बीच कोई दूसरी जाति, कोई दूसरा कुल, कोई दूसरा जन्म नहीं खड़ा है। बीच में केवल तीन दरवाज़े हैं। जो उनमें घुसता गया, वह नराधम हुआ; जो उनसे छूट गया, वह फिर से नर हो गया, और परम गति की ओर चल पड़ा।

शंकराचार्य इस श्लोक पर एक बहुत आशा भरी बात कहते हैं। वे कहते हैं, इन तीनों से छूटा हुआ मनुष्य अब वह कल्याण करने लगता है, जिसे पहले, इनसे बँधा होने के कारण, वह कर ही नहीं पाता था। यानी भलाई करने की शक्ति हम में पहले से थी। ये तीनों बस रास्ता रोके खड़े थे। मधुसूदन सरस्वती भी यही कहते हैं: पहले वह कल्याण नहीं करता था और अकल्याण करता था; अब रुकावट हटी, तो अकल्याण छूटा और कल्याण होने लगा। और नीलकण्ठ बताते हैं कि यह कल्याण क्या है: भगवान की आराधना, और उसी से मोक्ष।

और "ततो याति परां गतिम्", ये शब्द आपने पहले भी सुने हैं। उनतालीसवें सत्संग में, तेरहवें अध्याय के उसी श्लोक के अन्त में, जिसे हमने अभी अठारहवें श्लोक पर याद किया था: "न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्।" जो अपने द्वारा अपने को नहीं मारता, वह परम गति को जाता है। और आज का श्लोक कहता है, ये तीन द्वार "नाशनमात्मनः" हैं, अपना ही नाश करने वाले। दोनों जगह एक ही बात है: मनुष्य को कोई बाहर वाला नहीं गिराता। छठे अध्याय वाली बात, "आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः", आप ही अपने मित्र, आप ही अपने शत्रु।

तो इन्हें छोड़ें कैसे? मधुसूदन सरस्वती इसके दो चरण बताते हैं, और वे इतने व्यावहारिक हैं कि मैं उन्हें आपको ज्यों के त्यों देना चाहता हूँ। पहला चरण: जो उठ चुका है, उसे विवेक से काम करने से रोकना। क्रोध उठ गया, ठीक है, उठ गया; पर उसे ज़बान तक नहीं पहुँचने देना। फ़ोन पर किसी की कड़वी बात सुनी, तो उत्तर देने से पहले एक साँस। किसी चीज़ का लालच उठा, तो उसी पल ख़रीदना नहीं, एक रात रुक जाना। और दूसरा चरण: फिर धीरे-धीरे उसका उठना ही बन्द होना। यह दूसरा चरण पहले के बिना नहीं आता। जो आदमी हर बार उठे हुए क्रोध को दरवाज़े पर रोक लेता है, एक दिन पाता है कि क्रोध ने आना ही कम कर दिया है, क्योंकि उसे पता चल गया कि इस घर में उसकी सुनवाई नहीं होती।

संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर कहते हैं: जिस दिन यह तीन कड़ियों की ज़ंजीर टूट जाती है, उस दिन आदमी सुख से अपने रास्ते पर चल पाता है। और फिर उसे मोक्ष के रास्ते पर सज्जनों का साथ मिलता है, और सत्संग के बल से, अच्छे शास्त्र के बल से, वह जन्म-मृत्यु के जंगलों को पार कर जाता है।

तो इस श्लोक का सार इतना है: नरक के दरवाज़े भीतर की ओर खुलते हैं, पर उनकी कुण्डी भी भीतर ही है। और उन्हें बन्द करने का पहला कदम बहुत छोटा है: उठे हुए को बस एक पल रोकना।

पर अभी एक बात बाकी है। ज्ञानेश्वर ने अभी "अच्छे शास्त्र" का नाम लिया। और श्रीकृष्ण भी इस अध्याय को ठीक इसी शब्द पर बन्द करने वाले हैं: शास्त्र। कि रास्ता किसके भरोसे चलें, अपने मन के, या किसी और प्रकाश के?

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः । न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥ २३ ॥
गीता 16.23 — अर्थ पढ़ें ›
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ । ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥ २४ ॥
गीता 16.24 — अर्थ पढ़ें ›

तेईसवाँ श्लोक। "यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।" जो शास्त्र की विधि को छोड़कर मनमाने ढंग से चलता है, "न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्", वह न सिद्धि पाता है, न सुख, न परम गति।

"कामकारतः।" इस शब्द को ध्यान से सुनिए। इसका सीधा अर्थ है, काम के कहे पर चलना, इच्छा के हुक्म पर। यानी श्रीकृष्ण यहाँ शास्त्र के सामने "आज़ादी" को नहीं रख रहे। वे शास्त्र के सामने "काम" को रख रहे हैं, वही काम जो अभी दो श्लोक पहले नरक का पहला दरवाज़ा था। जब हम कहते हैं "मैं तो वही करूँगा जो मेरा मन कहे", तो अक्सर मन नहीं, मन में बैठा काम बोल रहा होता है। विदुर ने उस रात धर्म का जो सार दिया था, "जो अपने लिए बुरा लगे, वह दूसरे के साथ मत करो", उसके आगे उन्होंने वे चार शब्द जोड़े थे जिनका वादा मैंने किया था: "कामादन्यः प्रवर्तते", इससे अलग जो भी आचरण है, वह कामना से उपजता है। यानी धर्म का उलटा अधर्म से पहले काम है।

और तीन चीज़ें छूटती हैं। शंकराचार्य बताते हैं: सिद्धि, यानी मनुष्य होने के प्रयोजन की योग्यता; सुख, इसी लोक का; और परम गति। इनमें बीच वाला शब्द मुझे सबसे ज़्यादा चौंकाता है: "न सुखं"। काम ने तो सुख का ही वादा किया था। "मौज करूँगा", पन्द्रहवें श्लोक की आवाज़ यही कह रही थी। और श्रीकृष्ण कहते हैं, ऊँची बातें छोड़ो, उसे वह सुख भी नहीं मिलता जिसके लिए उसने सब छोड़ा।

और अब इस अध्याय का अन्तिम श्लोक। "तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।" इसलिए क्या करना है और क्या नहीं, इसके निर्णय में शास्त्र ही तुम्हारे लिए प्रमाण है। "ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि।" शास्त्र की विधि में कहे हुए कर्म को जानकर तुम्हें यहाँ कर्म करना चाहिए।

"प्रमाण।" आज हम इस शब्द को "सबूत" के अर्थ में बोलते हैं। पर पुराना अर्थ है, जिससे नापा जाए। तराज़ू, गज़, कसौटी। दर्ज़ी कपड़ा अन्दाज़े से नहीं काटता; वह फ़ीता रखता है। और श्रीकृष्ण कहते हैं, जीवन का कपड़ा काटते समय भी एक फ़ीता चाहिए, और वह फ़ीता केवल अपनी इच्छा नहीं हो सकती, क्योंकि इच्छा तो हर घड़ी नाप बदल देती है। अभिनवगुप्त इस श्लोक पर बहुत सीधी बात कहते हैं: यह मत सोचो कि यह किसी आदमी की कही बात है, इसलिए छोड़ दो; और क्या करना है, क्या नहीं, इसका फ़ैसला केवल अपनी बुद्धि के भरोसे मत करो।

पर क्या इसका अर्थ यह है कि किताब खोलो और आँख बन्द करके चल पड़ो? अठारहवें सत्संग में आपने सरोवर के किनारे यक्ष के प्रश्नों की कथा सुनी थी। उन प्रश्नों में एक प्रश्न था, "कः पन्थाः", रास्ता क्या है? और युधिष्ठिर का उत्तर आज के श्लोक के बिल्कुल पास बैठता है: तर्क स्थिर नहीं है; श्रुतियाँ अलग-अलग बातें कहती हैं; कोई एक मुनि ऐसा नहीं जिसकी बात अन्तिम हो; धर्म का तत्त्व गुफा में छिपा है। और फिर: "महाजनो येन गतः स पन्थाः", रास्ता वही है जिस पर महापुरुष चले हैं। यानी शास्त्र अकेली किताब नहीं है। वह एक रास्ता है, जिस पर बड़े लोग चलकर गए हैं, और जिसके किनारे उनकी जलाई हुई बत्तियाँ अब भी जल रही हैं। मनमानी का अर्थ है उस रास्ते को छोड़कर अँधेरे खेत में उतर जाना, यह सोचकर कि मुझे अपना रास्ता ख़ुद पता है।

संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर शास्त्र को तीन नामों से पुकारते हैं, और तीनों बहुत कोमल हैं। वे कहते हैं, वेद वह दीपक है जो सबको बिना भेद के, करुणा से, हित और अहित दिखाता है, और वह पिता है। फिर कहते हैं, अगर अपना खोया हुआ ख़ज़ाना हाथ में आना है, तो आदमी दीया आदर से आगे रखकर चलता है। और फिर वह पंक्ति, जो मुझे इस पूरे अध्याय का सबसे मीठा उत्तर लगती है: जो अहित से निकाल ले, और हित देकर बढ़ाए, ऐसी श्रुति से बढ़कर संसार की कोई माँ नहीं। दीपक, पिता, और माँ। जिस शास्त्र को हम कभी-कभी डंडा समझ लेते हैं, ज्ञानेश्वर उसे माँ कहते हैं।

और नीलकण्ठ एक ऐसी बात कहते हैं जो आज के कठिन श्लोकों के बाद सबसे बड़ी सान्त्वना है। वे कहते हैं, शास्त्र केवल यह नहीं बताता कि यह करो और यह मत करो; वह यह भी बताता है कि अगर नियम टूट जाए, तो लौटने का उपाय क्या है, यानी प्रायश्चित्त। जो शास्त्र रास्ता दिखाता है, वही गिरने पर वापसी का रास्ता भी दिखाता है। इसलिए शास्त्र को प्रमाण मानने वाला कभी पूरी तरह भटका हुआ नहीं होता, क्योंकि उसके पास लौटने का नक्शा भी है।

और इस श्लोक के अन्त में, "कर्तुमिहार्हसि" में, दो छोटे शब्द छिपे हैं। पहला, यहाँ। शंकराचार्य कहते हैं, यहाँ यानी इस कर्म-भूमि में, इसी मनुष्य-जीवन में। मधुसूदन सरस्वती ने भी तो यही कहा था: जब तक यह मनुष्य-शरीर है। और दूसरा, तुम योग्य हो। वेदान्त देशिक कहते हैं, यह शब्द बताता है कि दैवी सम्पदा लेकर जन्मे अर्जुन इसके पूरी तरह योग्य हैं। अध्याय "मा शुचः" से चला था, शोक मत करो; और "कर्तुमिहार्हसि" पर रुकता है, तुम यहीं कर सकते हो।

और इसी के साथ गीता का सोलहवाँ अध्याय, महाभारत के भीष्म पर्व का चालीसवाँ, पूरा होता है। एक बात ध्यान दीजिए: इस पूरे अध्याय में अर्जुन एक बार भी नहीं बोले। चौबीस श्लोक, और सब श्रीकृष्ण के। पर इस आख़िरी श्लोक ने अर्जुन के मन में एक प्रश्न जगा दिया है, और अगला अध्याय, भीष्म पर्व का इकतालीसवाँ, "श्रद्धात्रय विभाग योग", उसी प्रश्न से खुलता है: "ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः।" जो लोग शास्त्र की विधि तो छोड़ देते हैं, पर श्रद्धा के साथ पूजा करते हैं, उनका क्या? आज के तेईसवें श्लोक के शब्द ही, पर एक नए शब्द के साथ: श्रद्धा। उसका उत्तर क्या है, यह अगले सत्संग में।

तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली बात। नरक किसी बड़े अपराध से नहीं, दो छोटे वाक्यों से शुरू होता है: "बस इतना ही है", और "यह सब मैंने किया"। इसलिए जो मिला है, उसे "मुझे मिला" कहने की आदत डालिए। धन्यवाद वाला मन सौ फाँसियों में से आधी अपने आप ढीली कर देता है।

दूसरी बात। काम, क्रोध और लोभ एक ही दरवाज़े के तीन पल्ले हैं, और उसकी कुण्डी भीतर है। पहला कदम छोटा है: जो उठ चुका है, उसे बस एक साँस के लिए दरवाज़े पर रोक लीजिए। जो रोज़ रोका जाता है, वह धीरे-धीरे आना ही कम कर देता है।

तीसरी बात। अपने मन के अँधेरे खेत में अकेले मत उतरिए। शास्त्र का दीया आगे रखिए, और उस रास्ते पर चलिए जिस पर बड़े चलकर गए हैं। और अगर कभी फिसल भी जाएँ, तो याद रखिए, बाईसवाँ श्लोक किसी ख़ास आदमी के लिए नहीं, हर "नरः" के लिए है, हर मनुष्य के लिए: इन तीनों से छूटा, तो परम गति।

आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। इन तीन दरवाज़ों में से कौन-सा आपके घर पर सबसे ज़्यादा दस्तक देता है, काम, क्रोध या लोभ? और इस हफ़्ते आप उसे एक बार दरवाज़े पर कैसे रोकेंगे? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।

उन्नीसवें श्लोक का "नराधमान्" और बाईसवें का "नरः", दोनों एक ही आदमी हैं। बीच में बस तीन दरवाज़े हैं, और कुण्डी आपके हाथ में है।

जय श्री कृष्ण।

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः । कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥ २१ ॥
गीता 16.21 — अर्थ पढ़ें ›

तीन बातें

  1. नरक किसी बड़े अपराध से नहीं, दो छोटे वाक्यों से शुरू होता है: "बस इतना ही है", और "यह सब मैंने किया"। इसलिए जो मिला है, उसे "मुझे मिला" कहने की आदत डालिए। धन्यवाद वाला मन सौ फाँसियों में से आधी अपने आप ढीली कर देता है।
  2. काम, क्रोध और लोभ एक ही दरवाज़े के तीन पल्ले हैं, और उसकी कुण्डी भीतर है। पहला कदम छोटा है: जो उठ चुका है, उसे बस एक साँस के लिए दरवाज़े पर रोक लीजिए। जो रोज़ रोका जाता है, वह धीरे-धीरे आना ही कम कर देता है।
  3. अपने मन के अँधेरे खेत में अकेले मत उतरिए। शास्त्र का दीया आगे रखिए, और उस रास्ते पर चलिए जिस पर बड़े चलकर गए हैं। और अगर कभी फिसल भी जाएँ, तो याद रखिए, बाईसवाँ श्लोक किसी ख़ास आदमी के लिए नहीं, हर "नरः" के लिए है, हर मनुष्य के लिए: इन तीनों से छूटा, तो परम गति।