दैवी गुण, अभय से शुरुआत
गीता 16.1–16.10 · 76 मिनट
अपने भीतर के अच्छे-बुरे स्वभाव को पहचानना
श्रीभगवानुवाच
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः ।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥ १ ॥
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् ।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥ २ ॥
क्या आपने कभी रात को अकेले बैठकर अपने ही भीतर झाँका है, और सोचा है कि मुझमें अच्छा कितना है और बुरा कितना? और अगर उस झाँकने में कोई ग़ुस्सा दिख जाए, कोई घमण्ड दिख जाए, कोई छोटी-सी बेईमानी दिख जाए, तो मन पूछने लगता है, क्या मैं बुरा आदमी हूँ? आज का सत्संग इसी सवाल के बारे में है। गीता यहाँ अच्छे और बुरे स्वभाव की दो सूचियाँ देती है, और पहली सूची का पहला शब्द है, अभय। दैवी गुण, अभय से शुरुआत।
जय श्री कृष्ण।
आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का चौवालीसवाँ सत्संग है, और आज से गीता का सोलहवाँ अध्याय शुरू होता है। महाभारत के भीष्म पर्व का चालीसवाँ अध्याय ही गीता का सोलहवाँ अध्याय है, और उसका नाम है "दैवासुर सम्पद् विभाग योग", यानी दैवी और आसुरी सम्पदा को अलग-अलग पहचानने का योग। और हर बार की तरह याद रखिए कि यह सब हमें सञ्जय सुना रहे हैं, हस्तिनापुर के महल में, अन्धे राजा धृतराष्ट्र को, उस दिन जब भीष्म बाणों की शय्या पर गिर चुके हैं और युद्ध के दस दिन बीत चुके हैं।
पहले याद कर लें कि पिछली बार हम कहाँ रुके थे। पिछले सत्संग में श्रीकृष्ण ने बताया था कि सूरज में, चन्द्रमा में और आग में जो तेज है, वह उन्हीं का है। धरती में समाकर वही सब प्राणियों को धारण करते हैं, और हमारे शरीर में वैश्वानर अग्नि बनकर वही हमारा भोजन पचाते हैं। फिर वह वचन आया था जो हर दिल को छूता है: "सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो", मैं सबके हृदय में बैठा हूँ, और मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और उनका भूल जाना होता है। फिर उन्होंने क्षर और अक्षर से भी ऊपर अपने को पुरुषोत्तम बताया, और अध्याय इस बात पर पूरा हुआ: "इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ", हे निष्पाप, यह सबसे गुप्त शास्त्र मैंने तुमसे कहा, और इसे जानकर मनुष्य बुद्धिमान और कृतकृत्य हो जाता है।
अब यहाँ से सोलहवाँ अध्याय कैसे निकलता है, इस पर श्रीधर स्वामी एक बहुत सुन्दर बात कहते हैं। वे कहते हैं, पिछला अध्याय कहकर रुका था कि इसे जानकर आदमी कृतकृत्य हो जाता है। तो स्वाभाविक प्रश्न उठता है, इसे जानता कौन है, और कौन नहीं जान पाता? किस तरह का मन इस ज्ञान को पकड़ पाता है? सोलहवाँ अध्याय इसी का उत्तर है। और नीलकण्ठ एक शब्द पकड़ते हैं, "मयानघ", यानी हे अनघ, हे निष्पाप। वे कहते हैं, श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अनघ कहकर पहले ही इशारा कर दिया था कि अर्जुन में दैवी सम्पदा है। अब उसी को खोलकर बताते हैं।
और एक शब्द पर आप भी ध्यान दीजिए: सम्पदा। श्रीकृष्ण इन गुणों को सम्पदा कहते हैं, यानी धन, पूँजी, विरासत। हम धन को तिजोरी में गिनते हैं, ज़मीन को काग़ज़ों में गिनते हैं। गीता कहती है, असली विरासत वह है जो स्वभाव में लेकर आदमी पैदा होता है। और आज के श्लोकों को सुनने से पहले एक बात मन में बिठा लीजिए। ये सूचियाँ दूसरों को नापने का फीता नहीं हैं, अपने को देखने का आईना हैं। जिस क्षण मन किसी और का चेहरा याद करने लगे, समझिए कि आईना उल्टा पकड़ लिया।
तो आज का पहला श्लोक। "अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः", अभय, अन्तःकरण की शुद्धि, ज्ञान और योग में स्थिति, "दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्", दान, इन्द्रियों का दमन, यज्ञ, स्वाध्याय, तप और सरलता। हमारी टीका बताती है कि पहले से तीसरे श्लोक तक एक ही वाक्य है, जिसमें दैवी सम्पदा के छब्बीस लक्षण गिनाए गए हैं।
अब सोचिए, छब्बीस गुण गिनाने हैं। श्रीकृष्ण चाहते तो सत्य से शुरू करते, या दया से, या भक्ति से। पर पहला शब्द है "अभयं", निडरता। संत ज्ञानेश्वर कहते हैं, दैवी गुणों की इस पंक्ति में सबसे आगे, सिरे पर, जो बैठा है, उसका नाम अभय है।
अभय का अर्थ आचार्य अलग-अलग गहराई से करते हैं, और हर अर्थ कुछ नया खोलता है। शंकराचार्य सीधा कहते हैं, अभीरुता, यानी डरपोक न होना। रामानुजाचार्य डर की जड़ तक जाते हैं। वे कहते हैं, डर वह दुःख है जो यह देखकर पैदा होता है कि कोई प्रिय चीज़ छिन सकती है या कोई अप्रिय चीज़ आ सकती है। उस दुःख का मिट जाना अभय है। सोचिए, कितनी सच्ची बात है। हमारा हर डर इन्हीं दो में से एक है। कुछ छिन न जाए, या कुछ आ न जाए। नीलकण्ठ इससे भी भीतर जाते हैं: अभय का अर्थ है, यह भाव ही न रहना कि मैं मिट जाऊँगा। और आपको याद होगा, पाँचवें सत्संग में श्रीकृष्ण ने यही समझाया था कि आत्मा न जन्मती है, न मरती है। जिसने यह बात सचमुच समझ ली, उसके डर की सबसे गहरी जड़ कट जाती है।
पर संत ज्ञानेश्वर यहाँ एक बहुत व्यावहारिक बात भी कहते हैं, ताकि कोई अभय को लापरवाही न समझ ले। वे कहते हैं, जो बाढ़ में कूदता ही नहीं, उसे डूबने का डर नहीं होता; जो परहेज़ से रहता है, उसके घर रोग का डर नहीं आता। यानी अभय का अर्थ यह नहीं कि आँख मूँदकर आग में कूद जाओ। अभय वह है जो सही ढंग से जीने से अपने-आप आता है।
और मधुसूदन सरस्वती अभय का एक और अर्थ बताते हैं जो मुझे बहुत प्यारा लगता है। वे कहते हैं, अभय का अर्थ यह भी है कि सब प्राणियों को अभय देने का व्रत निभाना। यानी केवल ख़ुद न डरना नहीं, किसी को डराना भी नहीं। शान्ति पर्व में बाणों की शय्या से भीष्म युधिष्ठिर को यही बात कहते हैं: जिससे प्राणियों को भय नहीं, और जिसे प्राणियों से भय नहीं, वह शरीर छूटने के बाद भी कहीं से भय नहीं पाता।
और अब मैं आपको महाभारत का एक ऐसा प्रसंग सुनाता हूँ जहाँ यह दूसरे तरह का अभय, अभय देना, स्वयं अर्जुन के हाथों हुआ। आदि पर्व में खाण्डव वन जल रहा है। अग्नि देव की तृप्ति के लिए श्रीकृष्ण और अर्जुन ने वह वन जलवाया है, और कोई प्राणी बाहर नहीं निकल पा रहा। तभी तक्षक नाग के घर से एक असुर भागता हुआ दिखता है। उसका नाम है मय, असुरों का सबसे बड़ा शिल्पी। श्रीकृष्ण उसे देखकर अपना चक्र उठा लेते हैं, और शरीर धारण किए अग्नि गरजते हुए उसके पीछे दौड़ती है।
और उस घड़ी मय पुकारता है: अर्जुन, दौड़कर आओ, मुझे बचाओ! और पाठ कहता है, उसकी डरी हुई आवाज़ सुनकर, "मा भैरिति धनंजयः", धनञ्जय ने कहा, मत डरो। फिर एक बहुत सुन्दर वाक्य आता है: पार्थ ने मय को ऐसे उत्तर दिया मानो उसे जीवन लौटा रहे हों। दया से भरे पार्थ ने कहा, डरने की कोई बात नहीं। और जैसे ही अर्जुन ने अभय दे दिया, श्रीकृष्ण ने मय को मारने की इच्छा छोड़ दी, और अग्नि ने भी उसे नहीं जलाया।
अब इस कथा को आज के अध्याय के साथ रखकर देखिए। आज का अध्याय दैवी और आसुरी की बात करता है। और महाभारत हमें दिखाती है कि जिसे लोग असुर कहते थे, उसी को अर्जुन ने अभय दिया। और आगे सभा पर्व की शुरुआत में वही मय हाथ जोड़कर कहता है, तुमने मुझे क्रोधित कृष्ण से और जलाने को आतुर अग्नि से बचाया, बताओ मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ? मैं असुरों का विश्वकर्मा हूँ। और अर्जुन मुस्कुराकर कहते हैं, तुमने पहले ही सब कर दिया, कुशल से जाओ, मुझसे स्नेह रखना, हम भी तुमसे स्नेह रखेंगे। मेरा व्रत है कि जिसकी मैंने सहायता की, उससे मैं कुछ नहीं लूँगा। यह है अभय के साथ दान और त्याग, एक ही साँस में। और फिर वही मय कृतज्ञता से वह अद्भुत सभा बनाता है। जिसे डर से छुड़ाया गया, वह भीतर से बदल गया।
आज के जीवन में अभय कैसा दिखता है, यह मैं अपनी ओर से एक उदाहरण देकर कहूँ। एक माँ है जिसे रात को अस्पताल से फ़ोन आता है कि बेटे की रिपोर्ट ठीक नहीं है। डर आता है, आएगा ही। पर अभय वाली माँ डर में डूबकर हाथ-पैर नहीं छोड़ देती। वह रो भी लेती है, पर फिर उठकर अगला काम करती है, डॉक्टर से बात करती है, घर को सँभालती है। और घर के बाकी लोग उसे देखकर सँभल जाते हैं। यही दूसरा अभय है: जिसके पास बैठकर दूसरों का डर कम हो जाए।
अब दूसरा शब्द, सत्त्वसंशुद्धि, यानी अन्तःकरण की शुद्धि। शंकराचार्य इसका एक बहुत ज़मीनी अर्थ करते हैं: रोज़ के व्यवहार में दूसरे को ठगना, छल करना और झूठ बोलना छोड़ देना, और शुद्ध भाव से व्यवहार करना। मधुसूदन सरस्वती इन तीनों को अलग-अलग खोलते हैं, और ये तीन परिभाषाएँ सुनने लायक हैं। ठगना, यानी किसी बहाने से दूसरे को अपने वश में कर लेना। छल, यानी हृदय में कुछ और रखकर बाहर कुछ और व्यवहार करना। और झूठ, यानी जैसा देखा वैसा न कहना। सोचिए, शुद्धि की बात आई तो आचार्य ने गंगा-स्नान से पहले लेन-देन की ईमानदारी की बात की।
संत ज्ञानेश्वर इस शुद्धि का एक चित्र देते हैं: गंगा जैसी, जो बरसात में अपनी मर्यादा नहीं छोड़ती और गरमी में अपने को नहीं छोड़ देती, बीच में अपने ही रूप में बहती रहती है। यानी शुद्ध मन वह है जो अच्छा-बुरा कुछ भी सामने आए, अपने स्वभाव से नहीं डिगता।
फिर "ज्ञानयोगव्यवस्थितिः", ज्ञान और योग में टिके रहना। शंकराचार्य कहते हैं, शास्त्र और गुरु से आत्मा को समझना ज्ञान है, और मन को एकाग्र करके उसे अपना अनुभव बना लेना योग है। और वे यह भी कहते हैं कि अभय, शुद्धि और यह टिकना, ये तीन दैवी सम्पदा में प्रधान हैं।
अब "दानं", दान। शंकराचार्य कहते हैं, अपनी शक्ति के अनुसार अन्न आदि बाँटना। रामानुजाचार्य दो शर्तें जोड़ते हैं: धन न्याय से कमाया हुआ हो, और योग्य व्यक्ति को दिया जाए। और संत ज्ञानेश्वर का चित्र तो जैसे आँखों के सामने खड़ा हो जाता है। वे कहते हैं, रास्ते के किनारे खड़ा पेड़ देखिए। जो भी आए, उसे पत्ते, फूल, छाया, फल, जड़, सब देता है, कभी नहीं चूकता। और ज्ञानेश्वर कहते हैं, दुखी होकर अगर शत्रु भी आए, तो उसे भी वंचित न करना, यही दान है। पेड़ यह नहीं पूछता कि छाया में कौन बैठा है।
फिर "दमश्च", इन्द्रियों का दमन। शंकराचार्य बताते हैं कि यहाँ दम का अर्थ बाहरी इन्द्रियों को रोकना है, और मन की शान्ति के लिए अलग से "शान्ति" शब्द आगे आएगा। फिर "यज्ञश्च", यज्ञ। रामानुजाचार्य कहते हैं, फल की इच्छा छोड़कर भगवान की आराधना के रूप में किया गया कर्म। फिर स्वाध्याय, यानी शास्त्र का नियम से पाठ। फिर तप, जिसके तीन रूप, शरीर, वाणी और मन का तप, श्रीधर स्वामी के अनुसार श्रीकृष्ण सत्रहवें अध्याय में बताएँगे। उसकी बात हम आगे के एक सत्संग में करेंगे।
और इस श्लोक का अन्तिम शब्द है "आर्जवम्", सरलता। शंकराचार्य कहते हैं, सदा सीधापन। रामानुजाचार्य इसे और साफ़ करते हैं: मन, वाणी और शरीर के कामों का दूसरों के प्रति एक-सा होना। जो सोचा, वही कहा, वही किया। और ज्ञानेश्वर कहते हैं, जैसे माँ का दूध बच्चे के भले के लिए ही होता है, वैसे ही सब प्राणियों के प्रति कोमल सीधापन, यही आर्जव है।
और यहाँ मधुसूदन सरस्वती एक प्रश्न उठाते हैं जो शायद आपके मन में भी आया हो। इन छब्बीस गुणों में भक्ति का नाम क्यों नहीं? वे उत्तर देते हैं, भक्ति के बिना मन शुद्ध हो ही नहीं सकता, इसलिए वह तो इन सबके भीतर है। और भक्ति इतनी श्रेष्ठ है कि उसे इस गिनती में नहीं रखा गया। फिर वे नौवें अध्याय का वह श्लोक याद करते हैं जो हमने छब्बीसवें सत्संग में सुना था: "महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः", दैवी प्रकृति का आश्रय लिए हुए महात्मा मुझे अनन्य मन से भजते हैं। यानी दैवी स्वभाव का सबसे सुन्दर फूल भक्ति है।
अब दूसरा श्लोक। "अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्", अहिंसा, सत्य, क्रोध न करना, त्याग, शान्ति, चुगली न करना, "दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्", प्राणियों पर दया, लोभ न होना, कोमलता, बुरे काम में लज्जा, और चंचलता का न होना।
अहिंसा का अर्थ शंकराचार्य करते हैं, किसी प्राणी को पीड़ा न देना। और ज्ञानेश्वर इसे बहुत बड़ा कर देते हैं: शरीर, वाणी और मन से जगत के सुख के लिए ही जीना, यही अहिंसा का रूप है। फिर सत्य। शंकराचार्य कहते हैं, जैसा है वैसा कहना, पर अप्रिय और झूठ से बचकर। रामानुजाचार्य एक शब्द और जोड़ते हैं: ऐसा वचन जो प्राणियों का हित करे। और ज्ञानेश्वर का चित्र: सत्य चमेली की कली जैसा है, नोक तीखी, पर छूने में कोमल। या ऐसी दवा जैसा जो रोग तो मिटा दे, पर जीभ को कड़वी न लगे। और माँ जैसा, जो बच्चे के अहित पर ग़ुस्सा करती है, पर लाड़ में फूल-सी कोमल होती है।
शान्ति पर्व में भीष्म ने युधिष्ठिर को सत्य के तेरह रूप गिनाए, और उनमें समता, क्षमा, लज्जा, त्याग, धैर्य और दया सब आ जाते हैं, मानो सत्य ही इन सब गुणों की जड़ हो। और भीष्म ने कहा, एक ओर हज़ार अश्वमेध यज्ञ और दूसरी ओर सत्य तराज़ू पर रखे गए, तो सत्य ही भारी निकला।
फिर अक्रोध, क्रोध न करना। शंकराचार्य इसकी परिभाषा बड़ी सावधानी से करते हैं: किसी के गाली देने या मारने पर जो क्रोध उठ आए, उसे शान्त कर देना। ध्यान दीजिए, उठ आए क्रोध को शान्त करना। इसमें और अगले श्लोक की क्षमा में एक बारीक अन्तर है, जो हम अगले खंड में देखेंगे।
फिर त्याग। शंकराचार्य कहते हैं, दान पहले आ चुका, इसलिए यहाँ त्याग का अर्थ संन्यास है। श्रीधर स्वामी इसे उदारता कहते हैं। फिर शान्ति, यानी मन का भीतर से थम जाना। और फिर एक ऐसा शब्द जिस पर हम सबको रुकना चाहिए: अपैशुन, चुगली न करना। शंकराचार्य परिभाषा देते हैं: किसी की कमज़ोरी किसी तीसरे के सामने खोल देना पैशुन है। श्रीधर स्वामी और साफ़ करते हैं: पीठ पीछे। आज के समय में यह कितना आसान हो गया है। एक संदेश आया, किसी के बारे में कोई बात, और अँगूठे से आगे भेज दिया। यह उदाहरण मेरा है, पर गीता के इस शब्द पर पूरा बैठता है।
और ज्ञानेश्वर अपैशुन का जो रूप बताते हैं, वह किसी भी घर को स्वर्ग बना दे। वे कहते हैं, सामने वाले का दोष पहले अपने गुण से ढको, फिर उसकी ओर देखो। जैसे पहले भगवान की पूजा करते हैं, फिर दर्शन करते हैं। और किसी के मर्म पर चोट न करना, उसे दोष वाले नाम से न पुकारना।
फिर दया। शंकराचार्य कहते हैं, दुखी प्राणियों पर कृपा। रामानुजाचार्य कहते हैं, दूसरों का दुःख सहन न कर पाना। और ज्ञानेश्वर कहते हैं, दया पूर्णिमा की चाँदनी जैसी है, जो छोटे-बड़े में भेद किए बिना सबको ठण्डक देती है। और जैसे पैर में काँटा चुभे तो पीड़ा भीतर हृदय तक पहुँचती है, वैसे ही दयालु दूसरे के संकट में जलता है।
फिर अलोलुपता, लोभ न होना। शंकराचार्य कहते हैं, विषय सामने हों तब भी इन्द्रियों का न डोलना। फिर "मार्दवं", कोमलता, यानी क्रूरता का न होना। मधुसूदन सरस्वती इसका एक प्यारा उदाहरण देते हैं: शिष्य बेकार के तर्क भी करे, तो भी गुरु कड़वा बोले बिना उसे समझा दे, यह मार्दव है। फिर ह्री, लज्जा, बुरा काम शुरू करते समय उसे रोकने वाली शर्म। और अन्त में अचापल, चंचलता का न होना। शंकराचार्य की परिभाषा सुनिए: बिना प्रयोजन के वाणी, हाथ और पैर को न चलाना। अब यह परिभाषा आज सुनाऊँ तो मुझे अपने हाथ में पकड़ा फ़ोन याद आता है, जिसे अँगूठा बिना किसी प्रयोजन के ऊपर-नीचे सरकाता रहता है। यह भी मेरा अपना उदाहरण है। पर अचापल का अर्थ यही है: जो करना है, वही करना, और बाकी समय मन और शरीर को चैन से रहने देना।
तो इन दो श्लोकों से आज के लिए पहली बात यह निकलती है: दैवी स्वभाव की नींव अभय है। न किसी से डरना, और न किसी को डराना। और उस पर जो घर बनता है, उसकी दीवारें बहुत रोज़मर्रा की हैं: लेन-देन में ईमानदारी, रास्ते के पेड़ जैसा बाँटना, सच जो कड़वा न लगे, और पीठ पीछे किसी की कमज़ोरी न खोलना।
और अब, अगले श्लोक में उतरने से पहले, एक छोटी-सी बात आपसे कहना चाहता हूँ। अभी हमने दैवी गुणों की सूची का बड़ा हिस्सा सुना है। आगे आसुरी सूची आएगी, और उसके बाद आसुरी मन का पूरा चित्र। आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। जो यहीं उठ जाए, वह या तो इन गुणों को अपने में गिनकर फूल जाएगा, या आगे के कठोर श्लोकों का कोई टुकड़ा सुनकर किसी और पर उँगली उठाने लगेगा। जबकि इस अध्याय की सबसे प्यारी बात, श्रीकृष्ण का अर्जुन से "मा शुचः" कहना, अभी आगे है। तो अगर आप यह सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की यह यात्रा बीच में न छूटे। और आज का यह सत्संग आख़िर तक सुनिए।
पर अभी एक बात बाकी है। अगले श्लोक में छह गुण और आते हैं, तेज, क्षमा, धैर्य, शुद्धि, द्रोह न करना और अति मान न करना। और फिर एक शब्द आता है जो सुनने वाले के मन में एक चिन्ता जगा देता है: "दैवीमभिजातस्य", जो दैवी सम्पदा लेकर जन्मा है। क्या ये गुण जन्म से ही मिलते हैं? और जो इन्हें लेकर नहीं जन्मा, उसका क्या?
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता ।
भवन्ति संपदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥ ३ ॥
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च ।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ संपदमासुरीम् ॥ ४ ॥
तीसरा श्लोक। "तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता", तेज, क्षमा, धैर्य, शुद्धि, द्रोह न करना और अति मान न होना, "भवन्ति संपदं दैवीमभिजातस्य भारत", हे भारत, ये दैवी सम्पदा लेकर जन्मे हुए व्यक्ति के लक्षण हैं।
पहला शब्द, तेज। हम तेज सुनते हैं तो चेहरे की चमक सोचते हैं। पर शंकराचार्य साफ़ कहते हैं, तेज का अर्थ है प्रागल्भ्य, यानी भीतर का साहस और आत्मविश्वास, त्वचा की चमक नहीं। रामानुजाचार्य कहते हैं, दुष्ट लोग जिसे दबा न सकें, वह तेज है। यानी जो शान्त है, कोमल है, क्षमा करता है, वह कमज़ोर नहीं है। उसके भीतर एक ऐसी रीढ़ है जो झुकती नहीं।
अब क्षमा। पिछले खंड में मैंने कहा था कि अक्रोध और क्षमा में एक बारीक अन्तर है। शंकराचार्य वह अन्तर खोलते हैं। अक्रोध का अर्थ है, किसी ने गाली दी, क्रोध उठा, और आपने उसे शान्त कर दिया। क्षमा का अर्थ है, किसी ने गाली दी, और भीतर कोई विकार उठा ही नहीं। यानी अक्रोध आग बुझाना है, और क्षमा वह मन है जिसमें आग पकड़ती ही नहीं। और मधुसूदन सरस्वती एक शर्त जोड़ते हैं: बदला लेने की सामर्थ्य होते हुए भी क्रोध न उपजना। जो बदला ले ही नहीं सकता, उसकी चुप्पी क्षमा नहीं, मजबूरी है। संत ज्ञानेश्वर क्षमा का चित्र देते हैं: जैसे शरीर अपने रोम-रोम को ढोता है, पर उसे पता भी नहीं चलता कि वह कुछ ढो रहा है।
फिर धृति, धैर्य। शंकराचार्य कहते हैं, जब शरीर और इन्द्रियाँ थककर बैठने लगें, तब भीतर की वह शक्ति जो उन्हें थाम ले। रामानुजाचार्य कहते हैं, बड़ी से बड़ी आपत्ति में भी यह तय रखना कि अब क्या करना है। ज्ञानेश्वर कहते हैं, आकाश में धुएँ की लकीर कितनी भी ऊँची उठे, हवा का एक झोंका उसे निगल जाता है। वैसे ही मन में उठी हलचल को धैर्य एक झोंके में समेट लेता है।
फिर शौच, शुद्धि। शंकराचार्य दो तरह की बताते हैं: मिट्टी और जल से बाहर की, और मन-बुद्धि की भीतर की, जिसमें छल और राग का मैल न हो। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, यहाँ ख़ास तौर पर भीतर की शुद्धि लेनी है, धन के लेन-देन में छल और झूठ का न होना। और ज्ञानेश्वर कहते हैं, शुद्ध आदमी ऐसे सोने के कलश जैसा है जिसमें गंगाजल भरा हो। बाहर से भी सोना, भीतर से भी अमृत।
फिर अद्रोह, द्रोह न करना। शंकराचार्य कहते हैं, दूसरे को मारने या मिटाने की इच्छा का न होना। रामानुजाचार्य एक बड़ी आधुनिक-सी बात कहते हैं: दूसरों की स्वतन्त्रता में रुकावट न डालना। और अन्त में "नातिमानिता", अति मान न होना। शंकराचार्य कहते हैं, अपने को बहुत पूजने योग्य न मानना। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, पूज्य लोगों के सामने नम्र रहना। और ज्ञानेश्वर का चित्र देखिए: गंगा, जो धरती पर इतनी विशाल है, शिवजी के सिर पर पहुँचकर सिमट जाती है। सम्मान मिले तो लजा जाना, यही नातिमानिता है।
अब ये छब्बीस गुण पूरे हुए। और लोकमान्य तिलक इन पर दो बातें ध्यान दिलाते हैं। पहली, तेरहवें अध्याय में ज्ञान के जो बीस लक्षण आए थे, जो हमने सैंतीसवें सत्संग में सुने, "अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्", वे और ये छब्बीस असल में एक ही हैं। ज्ञान जब स्वभाव बन जाता है, तो यही दैवी सम्पदा कहलाता है। और दूसरी बात, तिलक कहते हैं कि महाभारत के शान्ति पर्व में भीष्म ने दम का जो वर्णन किया है, उसमें यही सब गुण आ जाते हैं।
तो चलिए, उस वर्णन को सुनें। बाणों की शय्या पर लेटे भीष्म से युधिष्ठिर पूछते हैं: पितामह, धर्म का मार्ग बहुत बड़ा है, उसकी बहुत शाखाएँ हैं। इन सबकी परम जड़ क्या है, वह बताइए। भीष्म कहते हैं, धर्म की विधियाँ एक नहीं हैं, महर्षियों ने अपने-अपने ज्ञान से अनेक बताईं, पर दम उन सबका परम आधार है। और फिर एक ऐसी बात कहते हैं जो हर थके हुए मन को अच्छी लगेगी: संयमी सुख से सोता है और सुख से जागता है, और उसका मन प्रसन्न रहता है। असंयमी बार-बार कष्ट पाता है, और अपने ही दोषों से नए-नए अनर्थ रचता रहता है।
फिर भीष्म दम के लक्षण गिनाते हैं, और ज़रा ध्यान से सुनिए: क्षमा, धैर्य, अहिंसा, समता, सत्य, सरलता, इन्द्रियों पर जय, कोमलता, लज्जा, चंचलता का न होना, क्रोध का न होना, सन्तोष, प्रिय बोलना, किसी को चोट न देना, और अनसूया। लगता है जैसे गीता का ही पाठ हो रहा हो। अर्जुन ने कुरुक्षेत्र में यह सूची श्रीकृष्ण से सुनी, और युद्ध के बाद युधिष्ठिर ने लगभग यही सूची भीष्म से सुनी।
और फिर भीष्म एक ऐसी बात कहते हैं जिस पर हल्की मुस्कान आ जाती है। वे कहते हैं, दम में एक ही दोष है, दूसरा नहीं मिलता: लोग संयमी आदमी को असमर्थ मान लेते हैं। फिर तुरन्त जोड़ते हैं, यह एक दोष हो सकता है, फिर भी यह बहुत बड़ा गुण है, क्योंकि सहनशीलता दुर्लभ है। और अन्त में वह वाक्य जो गृहस्थ के लिए वरदान है: संयमी के लिए वन जाने की क्या ज़रूरत? संयमी जहाँ रहे, वही वन है, वही आश्रम है।
अब इस श्लोक का वह शब्द जिस पर पिछले खंड में मैं रुका था: "दैवीमभिजातस्य", जो दैवी सम्पदा लेकर जन्मा है। हमारी टीका इसका अर्थ करती है: इन्हें विरासत के रूप में लेकर जन्मना, पिछले शुभ कर्मों का फल, जो मनुष्य के स्वभाव में प्रकट होता है। और शंकराचार्य और श्रीधर स्वामी, दोनों यहाँ एक बहुत आशा भरा शब्द रखते हैं: "भाविकल्याण", यानी वह जिसका कल्याण होने वाला है। यानी ये गुण किसी बीते हुए पुण्य की रसीद ही नहीं, आने वाले कल्याण की आहट भी हैं। संत ज्ञानेश्वर इन छब्बीस गुणों को आरती के छब्बीस दीये कहते हैं, जो गीता अपने स्वामी, आत्मा, के सामने उतार रही है।
अब चौथा श्लोक। "दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च", दम्भ, घमण्ड, अभिमान, क्रोध और कठोरता, "अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ संपदमासुरीम्", और अज्ञान: हे पार्थ, ये आसुरी सम्पदा लेकर जन्मे हुए व्यक्ति के लक्षण हैं।
देखिए, दैवी सूची के लिए तीन श्लोक लगे, छब्बीस गुण। आसुरी सूची एक ही श्लोक में आ गई, छह दोष। हमारी अध्याय-भूमिका कहती है, आसुरी सम्पदा छोटी और तीखी है। बुराई को बहुत शब्दों की ज़रूरत नहीं होती। छह काफ़ी हैं।
पहला दोष, दम्भ। शंकराचार्य एक शब्द में कहते हैं, "धर्मध्वजित्व", धर्म का झण्डा उठाकर चलना। रामानुजाचार्य इसे खोलते हैं: धार्मिक कहलाने के लिए धर्म का आचरण करना। और संत ज्ञानेश्वर यहाँ एक चित्र देते हैं जो भूलता नहीं। वे कहते हैं, बाढ़ में डूबते आदमी को जो नाव उस पार ले जाती, वही नाव अगर सिर पर बाँध ली जाए, तो उसी को डुबो देती है। धर्म हमें पार लगाने के लिए है। जब उसका ढिंढोरा चौराहे पर पीटा जाने लगे, तो वही धर्म अधर्म बन जाता है। और याद कीजिए, ज्ञान के लक्षणों में "अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा" के बीच दम्भ न करना भी आया था। यहाँ वही दम्भ आसुरी सूची में पहले नम्बर पर खड़ा है।
फिर दर्प, घमण्ड। शंकराचार्य कहते हैं, विद्या, धन और अपने लोगों के कारण मन का फूल जाना। ज्ञानेश्वर का चित्र: छोटे गड्ढे के पानी के बल पर मछली समुद्र को कुछ नहीं समझती; और एक दिन का पराया भोजन मिल जाए तो ओछा आदमी इतराने लगता है। फिर अभिमान। और यहाँ मधुसूदन सरस्वती एक पुरानी वैदिक कथा याद दिलाते हैं: देवता और असुर दोनों प्रजापति की सन्तान थे और आपस में होड़ करते थे। असुरों ने अति मान में सोचा, हम किसमें आहुति दें, और अपने ही मुँह में आहुति डालने लगे। और उसी अति मान से वे हार गए। मधुसूदन उस कथा का निष्कर्ष कहते हैं: अति मान हार का मुँह है।
फिर क्रोध, और ज्ञानेश्वर इसका एक तीखा चित्र देते हैं: जो दूसरों का सुख देखकर जलने लगे, जैसे चाँद को देखकर सियार के पेट में आग लगती है। फिर पारुष्य, कठोरता। शंकराचार्य इसका ऐसा उदाहरण देते हैं जो आज भी हर जगह सुनाई देता है: काने से कहना, "वाह, क्या आँखें हैं", बदसूरत से कहना, "क्या सुन्दर हो"। यानी ताना, व्यंग्य, चुभती बात। रामानुजाचार्य कहते हैं, ऐसा स्वभाव जो सज्जनों को बेचैन कर दे। और अन्त में अज्ञान, यानी क्या करना है और क्या नहीं, इसकी समझ का न होना। ज्ञानेश्वर कहते हैं, कलछी हर पकवान में घूमती है, पर किसी का स्वाद नहीं जानती।
और अब मैं आपको महाभारत की एक कथा सुनाता हूँ जिसमें यही दर्प और अभिमान एक राजा के रूप में खड़े हैं। उद्योग पर्व में श्रीकृष्ण सन्धि का प्रस्ताव लेकर कौरवों की सभा में बोल चुके हैं। सभा सन्न है, किसी के मुँह से उत्तर नहीं निकलता। तब जमदग्नि के पुत्र परशुराम उठते हैं और एक उदाहरण सुनाते हैं।
बहुत पहले दम्भोद्भव नाम का एक राजा सारी पृथ्वी पर राज करता था। वह रोज़ सुबह उठकर पूछता: क्या कोई शस्त्रधारी है जो युद्ध में मुझसे बढ़कर हो, या मेरे बराबर भी हो? पाठ कहता है, वह बड़े घमण्ड से मतवाला होकर किसी दूसरे को कुछ नहीं समझता था। ब्राह्मणों ने उसे बार-बार रोका, पर वह पूछता ही रहा। तब उन्होंने कहा: गन्धमादन पर्वत पर दो तपस्वी हैं, नर और नारायण। तुम उनके बराबर कभी नहीं हो सकोगे।
राजा बड़ी सेना लेकर वहाँ पहुँचा। और उसने क्या देखा? भूख-प्यास से दुबले, नसें दिखती हुईं, ठण्ड, हवा और धूप से सूखे दो तपस्वी। उन्होंने उसका कंद-मूल-फल और जल से सत्कार किया और पूछा, आपका क्या काम करें? राजा बोला, अतिथि-सत्कार में मुझे युद्ध दीजिए। और नर-नारायण का उत्तर सुनिए: राजन्, यह आश्रम क्रोध और लोभ से रहित है। यहाँ युद्ध नहीं होता। यहाँ शस्त्र कहाँ से हों, कुटिल मनुष्य कहाँ से हों?
पर राजा नहीं माना, ललकारता ही रहा। तब नर ने सरकंडे की एक मुट्ठी उठाई। राजा ने बाणों की वर्षा की, और मुनि ने उन्हें बेकार कर दिया। फिर सरकंडों से ही सैनिकों की आँखें, कान और नाक बींध दिए, यहाँ तक कि सारा आकाश सरकंडों से सफ़ेद हो गया। और राजा उनके चरणों में गिर पड़ा।
अब नर ने उसे जो सीख दी, उसे गीता के आज के श्लोकों के साथ सुनिए। उन्होंने कहा: घमण्ड में भरकर किसी का अपमान मत करना, चाहे वह छोटा हो या बड़ा। लोभ और अहंकार से रहित, संयमी, इन्द्रियों को वश में रखने वाले, सहनशील और कोमल बनकर प्रजा का पालन करो। और किसी का बल जाने बिना फिर कभी उसका अपमान मत करना। सुना आपने? दर्प और अभिमान वाले राजा को जो दवा दी गई, वह दैवी सम्पदा की ही सूची है: संयम, क्षमा, कोमलता, अति मान का न होना। और पाठ कहता है, राजा अपने नगर लौटकर भली-भाँति धर्म का पालन करने लगा। यानी घमण्ड से मतवाला वही राजा बदल गया।
और कथा के अन्त में परशुराम कहते हैं, वे नर और नारायण ही अर्जुन और केशव हैं। तेरहवें सत्संग में आपने भीष्म के मुँह से सुना था कि नर और नारायण प्राचीन ऋषि होकर साथ-साथ मनुष्य लोक में आए हैं। तो आज कुरुक्षेत्र के रथ पर जो अर्जुन यह आसुरी सूची सुन रहे हैं, वे वही नर हैं जिन्होंने कभी एक घमण्डी राजा का घमण्ड सरकंडे की मुट्ठी से उतारा था।
तो इन दो श्लोकों से दूसरी बात यह निकलती है: तेज और क्षमा एक-दूसरे के उलटे नहीं हैं, एक ही रीढ़ के दो रूप हैं। और आसुरी सूची छोटी है, पर उसका पहला दोष दम्भ है, यानी धर्म को ही दिखावे की चीज़ बना लेना। इसलिए यह सूची सबसे पहले उनके लिए है जो धर्म की ओर चल पड़े हैं।
पर अभी एक बात बाकी है। कुछ आचार्य कहते हैं कि आसुरी सूची के छह दोष सुनकर अर्जुन के मन में एक डर उठा होगा। क्रोध, कठोरता, और मैं तो अभी धनुष उठाकर अपने ही पूज्य जनों पर बाण चलाने वाला हूँ। कहीं यह आसुरी सम्पदा मेरी ही तो नहीं? और श्रीकृष्ण आगे बढ़ने से पहले रुककर उस डर का उत्तर देते हैं।
दैवी संपद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता ।
मा शुचः संपदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव ॥ ५ ॥
द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च ।
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु ॥ ६ ॥
पाँचवाँ श्लोक। "दैवी संपद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता", दैवी सम्पदा मुक्ति के लिए और आसुरी बन्धन के लिए मानी गई है। "मा शुचः संपदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव", हे पाण्डव, शोक मत करो, तुम दैवी सम्पदा लेकर जन्मे हो।
पहली पंक्ति दोनों सम्पदाओं का फल बताती है। संत ज्ञानेश्वर इसे दो चित्रों में कहते हैं: दैवी सम्पदा मुक्ति के सूरज से पहले फूटने वाली भोर है, और आसुरी सम्पदा मोह के लोहे की पक्की ज़ंजीर। भोर अपने-आप दिन में बदलती है, और ज़ंजीर हर दिन थोड़ी और कसती है।
पर इस श्लोक का दिल दूसरी पंक्ति में है। हमारी टीका कहती है, आसुरी लक्षण सुनकर अर्जुन के मन में शंका हो सकती थी कि उनकी सम्पदा कौन-सी है, और श्रीकृष्ण आगे बढ़ने से पहले यह शंका दूर कर देते हैं। शंकराचार्य कहते हैं, भगवान ने अर्जुन के भीतर का भाव देख लिया, कि वे मन ही मन सोच रहे हैं, मैं आसुरी सम्पदा वाला हूँ या दैवी? रामानुजाचार्य कहते हैं, अपनी प्रकृति तय न कर पाने से अर्जुन बहुत डर गए थे। श्रीधर स्वामी कहते हैं, उनका मन इस सन्देह से व्याकुल था कि क्या मैं इस ज्ञान का अधिकारी हूँ भी या नहीं।
और विश्वनाथ चक्रवर्ती और बलदेव विद्याभूषण अर्जुन के डर को और भी ठोस बना देते हैं। वे कहते हैं, अर्जुन सोच रहे थे, मैं तो बाणों की वर्षा से अपने ही पूज्य जनों को मारने चला हूँ, मुझमें क्रोध है, कठोरता है, तो यह आसुरी सम्पदा तो मेरी ही दिखती है। और श्रीकृष्ण का भाव, उनके अनुसार, यह है: तुम क्षत्रिय कुल में जन्मे हो, धर्मयुद्ध में शत्रु पर कठोर होना तुम्हारे लिए शास्त्र का बताया धर्म है। वही कठोरता और हिंसा अगर कहीं और हो, तो आसुरी है। यानी एक ही काम का रंग इससे बदलता है कि वह किस भाव से, किस धर्म के लिए, किस जगह किया गया।
और अब उस छोटे-से वाक्य को सुनिए: "मा शुचः", शोक मत करो। आपको याद होगा, चौथे सत्संग में अर्जुन ने स्वयं अपने बारे में कहा था, "कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः", दीनता के दोष ने मेरे स्वभाव को दबा दिया है। अर्जुन ने अपना स्वभाव टूटा हुआ बताया था। और आज, इतने अध्यायों के बाद, श्रीकृष्ण उसी स्वभाव के बारे में कहते हैं, तुम दैवी सम्पदा लेकर जन्मे हो। जो दबा हुआ था, वह मिटा नहीं था। बादल था, सूरज नहीं।
और देखिए, गीता का पहला उपदेश भी शोक पर ही था। पाँचवें सत्संग में दूसरे अध्याय का वह श्लोक आया था: "अशोच्यानन्वशोचस्त्वं", जिनका शोक नहीं करना चाहिए, तुम उनका शोक कर रहे हो। और आगे अठारहवें अध्याय के अन्त में ये ही दो शब्द, मा शुचः, एक बार फिर आने वाले हैं। जैसे पूरी गीता के बीच-बीच में श्रीकृष्ण अर्जुन का कन्धा थपथपाते चलते हों।
संत ज्ञानेश्वर यहाँ श्रीकृष्ण के मुँह से एक बहुत प्यारी बात कहलवाते हैं: यह सुनकर कहीं मन में डर मत ले लेना। क्या दिन को कभी रात का डर लगता है? और फिर "पाण्डव" सम्बोधन। रामानुजाचार्य कहते हैं, इसका भाव है, तुम तो धर्मात्माओं में अग्रणी पाण्डु के पुत्र हो। इकतालीसवें सत्संग में आपने पाण्डु की वह कथा सुनी थी, कि शाप के बाद वे राज-पाट छोड़कर निन्दा और स्तुति में एक-से होकर वन में रहने लगे थे। और मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, पाण्डु के बाकी पुत्रों में भी दैवी सम्पदा प्रसिद्ध है, तो तुममें क्यों न हो?
अब यह श्लोक हमारे लिए क्या कहता है? आज की सूचियाँ सुनकर बहुत-से लोगों के मन में वही प्रश्न उठता है जो अर्जुन के मन में उठा था। मुझमें तो क्रोध है, मुझमें घमण्ड भी है, कभी-कभी कठोर बोल देता हूँ, तो क्या मैं आसुरी हूँ? यह बात मैं अपनी ओर से कहूँ: जिसे यह डर लगता है कि कहीं मैं आसुरी तो नहीं, उस डर में ही एक दैवी बात छिपी है, क्योंकि वह अपने को आईने में देख रहा है। और ऐसे हर मन से श्रीकृष्ण का पहला शब्द यही है: मा शुचः, शोक मत करो।
अब छठा श्लोक। "द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च", इस लोक में दो प्रकार की प्राणी-सृष्टि है, दैवी और आसुरी। "दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु", दैवी का विस्तार से वर्णन हो चुका, हे पार्थ, अब आसुरी के विषय में मुझसे सुनो।
पहला प्रश्न: आसुरी का वर्णन इतना विस्तार से क्यों? शंकराचार्य उत्तर देते हैं, ताकि उसे छोड़ा जा सके। और मधुसूदन सरस्वती इसे एक सीधे नियम में बाँध देते हैं: जो बात अच्छी तरह जान ली जाए, उसी को छोड़ा जा सकता है। जिस साँप को पहचानते ही नहीं, उससे बचेंगे कैसे?
और "दैवो विस्तरशः प्रोक्त", दैवी का विस्तार से वर्णन हो चुका, इस पर मधुसूदन सरस्वती याद दिलाते हैं कि कहाँ-कहाँ: दूसरे अध्याय में स्थितप्रज्ञ के लक्षण, बारहवें में प्रिय भक्त के, तेरहवें में ज्ञान के, चौदहवें में गुणातीत के, और यहाँ अभय आदि। यानी अब तक के हमारे बहुत-से सत्संग, असल में, दैवी सम्पदा का ही विस्तार थे।
और अब इस खंड की सबसे ज़रूरी बात, जिसे पकड़कर आगे के कठोर श्लोक सुनने हैं। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, दैवी और आसुरी के बीच कोई तीसरी श्रेणी नहीं है। और फिर वे लिखते हैं: जब कोई मनुष्य शास्त्र के संस्कार के बल से अपने स्वभाव में बैठे राग और द्वेष को दबाकर धर्म में लगता है, तब वह उस समय देव है। और जब वही मनुष्य राग-द्वेष के बल से शास्त्र के संस्कार को दबाकर अधर्म में लगता है, तब वह उस समय असुर है। बलदेव विद्याभूषण भी यही कहते हैं। सुना आपने? उस समय। यानी देव और असुर दो अलग जातियों के लोग नहीं, एक ही आदमी के दो मौसम हैं। सुबह की पूजा में जो देव था, दोपहर के झगड़े में वही असुर हो सकता है, और शाम को क्षमा माँगकर फिर देव।
और मधुसूदन सरस्वती यहाँ उपनिषद् की एक छोटी-सी कथा याद दिलाते हैं। प्रजापति के पास उनकी सन्तानें उपदेश माँगने आईं, और प्रजापति ने बस एक अक्षर कहा, "द"। और उस एक अक्षर में तीन सीखें थीं: दम, यानी अपने को वश में रखो; दान, यानी बाँटो; और दया, यानी करुणा रखो। मधुसूदन कहते हैं, आज भी बादल गरजते हैं तो वही दिव्य वाणी दोहराते हैं, द, द, द। दैवी सम्पदा की पूरी सूची इन तीन शब्दों में समा जाती है।
और संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर एक बात कहते हैं जो आगे के लिए दीया बनेगी। वे कहते हैं, यह आसुरी प्रकृति अकेले कहीं दिखती नहीं। जैसे बिना वाद्य के नाद सुनाई नहीं देता, बिना फूल के मकरन्द नहीं मिलता, और आग लकड़ी पकड़कर ही दिखती है, वैसे ही यह स्वभाव किसी न किसी शरीर में प्रकट होकर ही दिखता है। यानी जब गीता आसुरी कहती है, तो वह किसी ख़ास शरीर, किसी ख़ास परिवार, किसी ख़ास समूह का नाम नहीं ले रही। वह एक स्वभाव की बात कर रही है, जो किसी भी लकड़ी को पकड़ सकता है, मेरी को भी।
और गीता के शब्द भी यही कहते हैं। इक्कीसवें सत्संग में सातवें अध्याय का वह श्लोक आया था जो कहता था, "आसुरं भावमाश्रिताः", जिन्होंने आसुरी भाव का आश्रय लिया है। और पच्चीसवें सत्संग में नौवें अध्याय का, "राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः"। आश्रय लिया, सहारा पकड़ा। यह मेरा अपना अवलोकन है, पर ध्यान देने लायक है: जिसका सहारा पकड़ा जाता है, उसे छोड़ा भी जा सकता है।
तो इन दो श्लोकों से तीसरी बात यह निकलती है: अपने भीतर दोष देखकर घबराना नहीं है। श्रीकृष्ण का पहला शब्द "मा शुचः" है। और दैवी या आसुरी कोई स्थायी ठप्पा नहीं, हर घड़ी का चुनाव है।
पर अभी एक बात बाकी है। अब श्रीकृष्ण आसुरी मन का चित्र भीतर से खींचना शुरू करते हैं। और पहले ही श्लोक में वे तीन चीज़ें गिनाते हैं जो ऐसे मन में नहीं होतीं, और उनमें तीसरी है सत्य। उसके साथ मैं आपको एक राजसभा में ले चलूँगा, जहाँ एक स्त्री अपने बालक का हाथ पकड़े खड़ी है, और राजा कह रहा है, मैं तुम्हें नहीं जानता।
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः ।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ॥ ७ ॥
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।
अपरस्परसंभूतं किमन्यत्कामहैतुकम् ॥ ८ ॥
इन श्लोकों से पहले एक बार फिर वही बात। अब जो चित्र आएगा, उसे सुनते हुए मन अपने-आप किसी पड़ोसी का, किसी जान-पहचान वाले का, किसी रिश्तेदार का चेहरा ढूँढने लगेगा। उसे वहीं रोक दीजिए। यह चित्र भीतर देखने के लिए है।
सातवाँ श्लोक। "प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः", आसुरी लोग नहीं जानते कि किसमें प्रवृत्त होना है और किससे निवृत्त होना है, "न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते", उनमें न शुद्धि है, न सदाचार, न सत्य।
प्रवृत्ति और निवृत्ति, यानी किस ओर बढ़ना है और कहाँ से लौट आना है। शंकराचार्य कहते हैं, जिस काम से मनुष्य का सच्चा भला होता है उसमें लगना प्रवृत्ति है, और जो अनर्थ का कारण है उससे हट जाना निवृत्ति। ध्यान दीजिए, यह पढ़ाई-लिखाई की कमी की बात नहीं है। बहुत पढ़ा-लिखा आदमी भी यह भूल सकता है कि कहाँ रुकना है। यह दिशा की बात है।
संत ज्ञानेश्वर इसका एक चित्र देते हैं: रेशम का कीड़ा, जो अपने ही बनाए कोये में बन्द हो जाता है, और न निकलने का रास्ता जानता है, न भीतर आने का। और फिर तीन चीज़ें जो नहीं होतीं। शौच, यानी शुद्धि। आचार, यानी अच्छा आचरण, और रामानुजाचार्य कहते हैं, आचार ही वह है जिससे भीतर-बाहर की शुद्धि आती है। और सत्य, जिसे मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, प्रिय, हितकारी और यथार्थ वचन।
अब आठवाँ श्लोक, जो इस मन की जड़ में बैठी सोच को खोलता है। "असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्", वे कहते हैं कि संसार असत्य है, बिना आधार का है, बिना ईश्वर का है, "अपरस्परसंभूतं किमन्यत्कामहैतुकम्", स्त्री-पुरुष के संयोग से उत्पन्न हुआ है, काम के सिवा इसका और क्या कारण है?
यहाँ "असत्य" शब्द को ठीक से समझना ज़रूरी है। हमारी टीका कहती है, यहाँ असत्य का अर्थ है कि इसके पीछे कोई नैतिक सत्य नहीं: न धर्म, न शास्त्र, न कोई शासन करने वाला। शंकराचार्य बाकी शब्द खोलते हैं: बिना आधार का, यानी इसका आधार धर्म और अधर्म नहीं; और बिना ईश्वर का, यानी ऐसा कोई नहीं जो धर्म और अधर्म को तौलकर फल दे। और "अपरस्परसंभूतं" के अर्थ पर आचार्यों में अलग-अलग राय है; तिलक तो इस पर लम्बी चर्चा करते हैं। पर पूरी बात का निचोड़ एक ही है: सब कुछ बस चाह से चल रहा है, और चाह के सिवा कुछ है ही नहीं।
रामानुजाचार्य यहाँ याद दिलाते हैं कि वे यह नहीं कहते कि यह संसार भगवान में टिका है और भगवान से चलता है, जबकि श्रीकृष्ण दसवें अध्याय में कह चुके हैं, "अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते", मैं सबका उद्गम हूँ, मुझसे ही सब चलता है। और संत ज्ञानेश्वर इस सोच की भीतर की आवाज़ को उसी के शब्दों में सुनाते हैं, जैसे वह अपने को सही ठहराती हो: चोरी का धन आ गया, तो किसको विष हो गया? परलोक दिखता नहीं, भगवान दिखते नहीं, तो सब बेकार।
अब ध्यान दीजिए, यह सोच किसी एक किताब में या किसी एक समूह में बन्द नहीं है। यह एक धीमी आवाज़ है जो किसी भी मन में, किसी भी दिन, बोल सकती है। जब हम कोई ग़लत काम करने वाले होते हैं, तो भीतर से वह कहती है: कोई देख नहीं रहा। किसी को पता नहीं चलेगा। इससे कुछ होता नहीं। यही "बिना ईश्वर का" संसार है, छोटे रूप में। उस घड़ी आदमी मुँह से भगवान को मानता रहे, फिर भी मन में मान लेता है कि इस कमरे में मेरे सिवा कोई नहीं।
और अब वह राजसभा, जिसका मैंने वादा किया था। आदि पर्व में शकुन्तला अपने बालक का हाथ थामे राजा दुष्यन्त की सभा में पहुँचती है। कण्व के आश्रम में दुष्यन्त ने उससे विवाह किया था और वचन दिया था। वह कहती है, महाराज, यह आपका पुत्र है, इसे युवराज बनाइए, आश्रम में दिया अपना वचन याद कीजिए। और पाठ एक बहुत बारीक बात कहता है। राजा ने उसकी बात सुनी, उसे याद भी रखा, मन ही मन प्रसन्न भी हुए, फिर भी बोले: भद्रे, मुझे तुम्हारे साथ किसी मिलन की याद नहीं है।
शकुन्तला लज्जा और दुःख से खम्भे की तरह निश्चल खड़ी रह जाती है। आँखें लाल हो जाती हैं, होंठ काँपते हैं, और पाठ कहता है, तप से जमा हुआ उसका तेज क्रोध से भड़क उठा, पर उसने उसे रोके रखा। फिर वह बोलती है, और उसके वचन आज के श्लोक पर ऐसे बैठते हैं जैसे उसी के लिए कहे गए हों। वह कहती है: महाराज, आप सच जानते हैं, फिर भी किसी साधारण आदमी की तरह बेझिझक कहते हैं, मैं नहीं जानता? यहाँ क्या सच है और क्या झूठ, यह आपका हृदय जानता है। आप अपने ही भीतर के साक्षी का अपमान कर रहे हैं।
और फिर वह वचन: "एकोऽहमस्मीति च मन्यसे त्वं न हृच्छयं वेत्सि मुनिं पुराणम्"। आप सोचते हैं, मैं अकेला हूँ। आप हृदय में रहने वाले उस प्राचीन मुनि को नहीं जानते, जो हर बुरे कर्म को जानता है, और उसी के सामने आप यह कर रहे हैं। सुनिए, पिछले सत्संग में श्रीकृष्ण ने कहा था, "सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो", मैं सबके हृदय में बैठा हूँ। और यहाँ शकुन्तला उसी को हृदय में रहने वाला प्राचीन मुनि कहती है। आठवें श्लोक की "बिना ईश्वर का" वाली सोच का सबसे सीधा उत्तर यही है।
और शकुन्तला आगे कहती है: आदमी बुरा काम करके सोचता है, मेरे बारे में कोई नहीं जानता, पर देवता जानते हैं, और उसके भीतर का पुरुष भी जानता है। सूरज, चन्द्रमा, हवा, आग, आकाश, धरती, जल, हृदय, दिन, रात, दोनों सन्ध्याएँ और धर्म, ये सब मनुष्य का आचरण जानते हैं। और एक वाक्य जो दम्भ की सबसे गहरी परिभाषा है: जो होता कुछ और है और अपने को दिखाता कुछ और, वह अपनी ही आत्मा को चुराने वाला चोर है। याद कीजिए, मधुसूदन सरस्वती ने छल की यही परिभाषा दी थी, हृदय में कुछ और, बाहर कुछ और।
फिर दुष्यन्त और कठोर बोलते हैं, और शकुन्तला का उत्तर वह वाक्य है जो इस पूरे अध्याय को सुनने की कुञ्जी है। वह कहती है: राजन्, दूसरों के दोष सरसों के दाने जितने छोटे हों, तो भी आप देख लेते हैं; अपने दोष बेल के फल जितने बड़े हैं, फिर भी देखते हुए नहीं देखते। और फिर एक कहावत: कुरूप आदमी जब तक दर्पण में अपना मुँह नहीं देखता, तब तक अपने को दूसरों से सुन्दर मानता है। पर जब दर्पण में देख लेता है, तब, अगर उसमें लज्जा हो, तो वह अन्तर पहचान लेता है और दूसरों को दोष नहीं देता। देखिए, लज्जा, ह्री, वही गुण जो आज दूसरे श्लोक में दैवी सम्पदा में गिना गया था। आईना वही काम करता है जिसके भीतर लज्जा बची है।
और फिर शकुन्तला सत्य पर आती है: सौ कुओं से एक बावड़ी बढ़कर है, सौ बावड़ियों से एक यज्ञ, सौ यज्ञों से एक पुत्र, और सौ पुत्रों से सत्य। और वही तराज़ू, जो भीष्म के मुँह से हमने सुना था: हज़ार अश्वमेध और सत्य तौले गए, और सत्य ही भारी निकला।
कोई साक्षी न पाकर शकुन्तला बालक को लेकर लौटने लगती है। तभी आकाश से एक वाणी आती है: शकुन्तला ने सच कहा है, इस बालक का भरण करो, और इसीलिए इसका नाम भरत होगा। और पाठ कहता है, भरत से ही यह कुल भारत कहलाया। सोचिए, कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण आज अर्जुन को "भारत" कहकर ही ये गुण गिना रहे हैं। उस नाम की जड़ में एक स्त्री का सत्य खड़ा है।
और कथा का अन्त भी सुन लीजिए, ताकि किसी पर ठप्पा न लगे। वाणी सुनकर दुष्यन्त सिंहासन से उठते हैं और कहते हैं, मैं भी इसे अपना पुत्र जानता था; पर अगर केवल इसके कहने से मान लेता, तो लोग बालक पर शंका करते। फिर वे शकुन्तला से अपने कठोर वचनों के लिए क्षमा माँगते हैं और उसे पटरानी बनाते हैं। मैं दुष्यन्त का पक्ष नहीं ले रहा, न उनके विरुद्ध फ़ैसला सुना रहा हूँ। महाभारत ने दोनों बातें रख दी हैं। बात बस इतनी है: एक बड़े कुल का राजा भी, एक घड़ी के लिए, ऐसे बोल गया मानो हृदय में कोई साक्षी न हो। वह घड़ी किसी के भी जीवन में आ सकती है। आज के श्लोक उसी घड़ी को पहचानना सिखाते हैं।
तो इन दो श्लोकों से चौथी बात यह निकलती है: आसुरी मन की पहली पहचान कोई बड़ा अपराध नहीं, एक छोटी-सी सोच है: कोई देख नहीं रहा। और उसकी दवा है हृदय में बैठे उस साक्षी को याद रखना, और दूसरों के सरसों से पहले अपने बेल को देखना।
पर अभी एक बात बाकी है। यह सोच मन में बैठ जाए तो अकेली नहीं रहती। अगले श्लोक में श्रीकृष्ण बताते हैं कि इस दृष्टि को कसकर पकड़ लेने वाले के साथ आगे क्या होता है, और वह एक ऐसी भूख को अपना सहारा बना लेता है जो कभी नहीं भरती।
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः ।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥ ९ ॥
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः ।
मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः ॥ १० ॥
नौवाँ श्लोक। "एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः", इस दृष्टि को पकड़कर, नष्ट स्वभाव वाले, मन्द बुद्धि वाले, "प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः", क्रूर कर्म करने वाले ये लोग संसार के अहित करने वाले बनकर उसके नाश के लिए उत्पन्न होते हैं।
इस श्लोक का पहला शब्द देखिए: "एतां दृष्टिमवष्टभ्य", इस दृष्टि को पकड़कर। यानी सब कुछ एक देखने के ढंग से शुरू होता है। पहले एक सोच आती है, कोई देख नहीं रहा, चाह के सिवा कुछ नहीं, और फिर आदमी उसे कसकर पकड़ लेता है। फिर एक सीढ़ी उतरती है। शंकराचार्य कहते हैं, नष्टात्मा, यानी जिनके ऊपर उठने के साधन नष्ट हो गए; और अल्पबुद्धि, यानी जिनकी बुद्धि केवल विषयों तक सिमट गई। नीलकण्ठ कहते हैं, काम के वश होकर जिनका धैर्य नष्ट हो गया, और जिनकी बुद्धि केवल छोटे, दिखने वाले सुख पर टिकी है। फिर उस छोटी बुद्धि से उग्र कर्म निकलते हैं, और वे कर्म संसार का अहित करते हैं।
संत ज्ञानेश्वर कहते हैं, आग को आगे-पीछे जलाने के सिवा कुछ आता ही नहीं; वैसे ही यह मन जो भी छूता है, उसका उल्टा ही कर बैठता है। पर इस सीढ़ी को उल्टा पढ़िए, तो इसमें एक बड़ी आशा है। अगर सब एक दृष्टि से शुरू होता है, तो बचाव भी दृष्टि से ही शुरू होगा। इसीलिए दैवी सूची में अभय के बाद ज्ञान और योग में टिके रहना आया था। जो देखने का ढंग ठीक रखता है, उसकी सीढ़ी ऊपर की ओर जाती है।
अब दसवाँ श्लोक। "काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः", कभी पूरी न होने वाली कामना का आश्रय लेकर, दम्भ, मान और मद से युक्त होकर, "मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः", मोह से मिथ्या सिद्धान्तों को ग्रहण करके, वे अपवित्र व्रतों के साथ आचरण करते हैं।
"दुष्पूरं", जिसे भरा न जा सके। शंकराचार्य कहते हैं, जिसका पूरा होना असम्भव है। बारहवें सत्संग में तीसरे अध्याय में श्रीकृष्ण ने काम को यही कहा था, "दुष्पूरेणानलेन च", कभी न भरने वाली आग। और ज्ञानेश्वर का चित्र: जाल को पानी से भरा नहीं जा सकता, और आग को ईंधन से तृप्त नहीं किया जा सकता। ऐसी भूख को सहारा बना लेना, यही "काममाश्रित्य" है। सहारा उसका लिया जाता है जो गिरने से बचाए। और यहाँ आदमी उसका सहारा ले रहा है जो उसे और गिराता है।
फिर दम्भ, मान और मद। मधुसूदन सरस्वती तीनों की बहुत सटीक परिभाषा देते हैं: दम्भ, यानी धार्मिक न होते हुए भी धार्मिक दिखाना; मान, यानी पूज्य न होते हुए भी अपने को पूज्य जताना; और मद, यानी कोई बड़ाई न होते हुए भी अपने में बड़ाई मान लेना। ज्ञानेश्वर कहते हैं, जैसे मतवाले हाथी को ऊपर से मदिरा पिला दी जाए।
और यहाँ मुझे परशुराम की वह कथा फिर याद आती है जो आज दूसरे खंड में सुनी थी, घमण्डी राजा दम्भोद्भव की। कथा के अन्त में परशुराम ने आठ भयानक अस्त्रों के नाम लिए थे, जिनसे बिंधा आदमी पागल-सा हो जाता है, सुध-बुध खो देता है, कभी रोता है, कभी हँसता है। और फिर उन्होंने ख़ुद पहेली खोल दी: वे आठ अस्त्र हैं काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मान, ईर्ष्या और अहंकार। देखिए, आज के श्लोक के मान और मद उसी सूची में हैं। ये बाहर से चलाए गए अस्त्र नहीं, भीतर से चलने वाले अस्त्र हैं। और उनका इलाज नर के हाथ में था, सरकंडे की एक मुट्ठी, यानी तप और संयम।
अब "मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः"। पहले असद्ग्राह शब्द। शंकराचार्य कहते हैं, असद्ग्राह, यानी अशुभ निश्चय। नीलकण्ठ "ग्राह" शब्द का अर्थ करते हैं, अत्यन्त अड़ जाना, किसी बात को ज़िद से पकड़ लेना। ग्राह का अर्थ मगरमच्छ भी होता है, जो पकड़ ले तो छोड़ता नहीं। यह मेरा अपना जोड़ है, पर ज़िद ऐसी ही होती है। और रामानुजाचार्य एक और अर्थ देते हैं: अन्याय से जुटाई हुई चीज़ें, जिन्हें आदमी पकड़े रहता है। और अन्त में अशुचिव्रत, जिनके बारे में शंकराचार्य कहते हैं, जिनके व्रत ही अपवित्र हैं। यानी उनका भी एक नियम है, एक लगन है, पर वह लगन गन्दगी की ओर है।
अब आज की सबसे ज़रूरी बात, जिसके बिना ये सब श्लोक उल्टे पड़ जाएँगे। शान्ति पर्व में युधिष्ठिर ने भीष्म से कहा था: पितामह, सज्जनों को देखकर मैं जानता हूँ कि अक्रूरता क्या है, पर क्रूर मनुष्य को मैं नहीं पहचानता। और भीष्म ने क्रूर मनुष्य के लक्षण गिनाए। उनमें एक लक्षण यह है: वह धर्मशील और गुणवान को भी पापी समझता है, और अपने स्वभाव से दूसरों को तौलकर किसी का विश्वास नहीं करता।
इस पर ज़रा रुकिए। जो आदमी आज के श्लोक सुनकर चारों ओर असुर ही असुर देखने लगे, हर किसी को दम्भी, हर किसी को घमण्डी मानने लगे, भीष्म के शब्दों में वह अपने स्वभाव से दूसरों को तौल रहा है। और शकुन्तला ने भी तो यही कहा था, दूसरों के सरसों दिखते हैं, अपने बेल नहीं। इसलिए इन श्लोकों का सही उपयोग एक ही है: रात को अकेले बैठकर, अपने दिन को इन शब्दों के सामने रखना। आज कहाँ दम्भ था? कहाँ मान था? कहाँ कोई ज़िद पकड़ी? और फिर पहले श्लोक की ओर लौटना, अभय की ओर, ज़रा-सी शुद्धि की ओर, ज़रा-से दान की ओर।
और अगले श्लोक में श्रीकृष्ण इस मन का चित्र और भीतर तक खींचते हैं: "चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः", मृत्यु तक रहने वाली अपार चिन्ता का आश्रय लिए हुए, और यह निश्चय कि बस इतना ही सुख है। इस मन के भीतर की आवाज़, यह मैंने आज पाया, वह कल पाऊँगा, और फिर नरक के तीन दरवाज़े, यह सब अगले सत्संग में।
तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।
पहली बात। दैवी स्वभाव की शुरुआत अभय से होती है। न किसी से डरना, और न किसी को डराना, जैसे अर्जुन ने जलते वन में मय से कहा था, मत डरो। और उसके बाद के गुण बहुत रोज़ के हैं: लेन-देन में ईमानदारी, बाँटना, सच जो कड़वा न लगे, और पीठ पीछे चुगली न करना।
दूसरी बात। दैवी और आसुरी दो जातियाँ नहीं, एक ही मन के दो मौसम हैं। जब शास्त्र की सीख राग-द्वेष पर भारी पड़े, उस घड़ी आदमी देव है; जब राग-द्वेष भारी पड़ें, उस घड़ी असुर। इसलिए ये सूचियाँ आईना हैं, दूसरों को नापने का फीता नहीं।
तीसरी बात। अपने भीतर दोष दिखें तो घबराइए नहीं। आईने में देखने वाले से श्रीकृष्ण का पहला शब्द है, मा शुचः, शोक मत करो। और हृदय में बैठा वह साक्षी, जिसकी बात शकुन्तला ने की, केवल देखता ही नहीं, साथ भी देता है।
आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। इन छब्बीस दैवी गुणों में से कौन-सा गुण आपने अपने किसी प्रियजन में सबसे साफ़ देखा है, माँ में, पिता में, किसी गुरु में? और कौन-सा एक गुण आप इस महीने अपने भीतर थोड़ा बढ़ाना चाहेंगे? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।
शोक मत करो। तुम दैवी सम्पदा लेकर जन्मे हो। यह बात अर्जुन से कही गई थी, और आज आपसे भी।
जय श्री कृष्ण।
दैवी संपद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता ।
मा शुचः संपदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव ॥ ५ ॥
तीन बातें
- दैवी स्वभाव की शुरुआत अभय से होती है। न किसी से डरना, और न किसी को डराना, जैसे अर्जुन ने जलते वन में मय से कहा था, मत डरो। और उसके बाद के गुण बहुत रोज़ के हैं: लेन-देन में ईमानदारी, बाँटना, सच जो कड़वा न लगे, और पीठ पीछे चुगली न करना।
- दैवी और आसुरी दो जातियाँ नहीं, एक ही मन के दो मौसम हैं। जब शास्त्र की सीख राग-द्वेष पर भारी पड़े, उस घड़ी आदमी देव है; जब राग-द्वेष भारी पड़ें, उस घड़ी असुर। इसलिए ये सूचियाँ आईना हैं, दूसरों को नापने का फीता नहीं।
- अपने भीतर दोष दिखें तो घबराइए नहीं। आईने में देखने वाले से श्रीकृष्ण का पहला शब्द है, मा शुचः, शोक मत करो। और हृदय में बैठा वह साक्षी, जिसकी बात शकुन्तला ने की, केवल देखता ही नहीं, साथ भी देता है।