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सत्संग ४३

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हर दिल में वही

गीता 15.12–15.20 · 75 मिनट

भोजन से पहले यह अध्याय क्यों (15.14); पुरुषोत्तम

यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् । यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥ १२ ॥
गीता 15.12 — अर्थ पढ़ें ›
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा । पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥ १३ ॥
गीता 15.13 — अर्थ पढ़ें ›

क्या आपने कभी सोचा है कि जिस भगवान को हम मन्दिर में, तस्वीर में, आसमान में कहीं दूर ढूँढते हैं, वे अगर सचमुच इतने पास हों कि आपकी हर साँस में, आपके हर कौर में, और आपके दिल की हर धड़कन में बैठे हों, तो जीना कैसा लगेगा? आज का सवाल यही है। भगवान कहाँ हैं? और गीता का उत्तर चार शब्दों में है: हर दिल में वही।

जय श्री कृष्ण।

आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का तैंतालीसवाँ सत्संग है, और आज पन्द्रहवाँ अध्याय पूरा होगा। महाभारत के भीष्म पर्व का उनतालीसवाँ अध्याय ही गीता का पन्द्रहवाँ अध्याय है, जिसका नाम है "पुरुषोत्तम योग"। और हर बार की तरह याद रखिए कि यह सब हमें सञ्जय सुना रहे हैं, हस्तिनापुर के महल में, अन्धे राजा धृतराष्ट्र को, उस दिन जब भीष्म बाणों की शय्या पर गिर चुके हैं और युद्ध के दस दिन बीत चुके हैं।

पहले याद कर लें कि पिछली बार हम कहाँ रुके थे। बयालीसवें सत्संग में श्रीकृष्ण ने संसार को एक उल्टे पीपल के पेड़ की तरह दिखाया था: "ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्", जिसकी जड़ ऊपर है और शाखाएँ नीचे फैली हैं, वेद के छन्द जिसके पत्ते हैं, गुण जिसकी शाखाओं को बढ़ाते हैं, और विषय जिसकी कोंपलें हैं। फिर उन्होंने कहा था कि इस पक्की जड़ों वाले पेड़ को असंगता की, यानी आसक्ति न रखने की, मज़बूत कुल्हाड़ी से काटो, और उस पद को खोजो जहाँ जाकर कोई लौटता नहीं। और उस पद के बारे में कहा था: "न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः", उसे न सूरज प्रकाशित करता है, न चन्द्रमा, न आग। फिर बताया था कि हमारे भीतर जो जीव है, वह भगवान का ही सनातन अंश है, "ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः"। वह एक शरीर से दूसरे शरीर में मन और इन्द्रियों को ऐसे ले जाता है जैसे हवा फूलों से सुगन्ध ले जाती है। और यह भी कहा था कि मोह में पड़े लोग उसे आते-जाते नहीं देखते, ज्ञान की आँख वाले देखते हैं, और यत्न करने वाले योगी उसे अपने भीतर देखते हैं।

तो अब एक प्रश्न अपने आप उठता है। अगर वह परम धाम इतना ऊँचा है कि सूरज भी उसे रोशन नहीं कर सकता, तो क्या भगवान बस वहीं दूर बैठे हैं? हमारी इस धूल-मिट्टी वाली दुनिया से उनका कोई लेना-देना नहीं? आज के श्लोक इसी का उत्तर हैं। श्रीकृष्ण अब बताते हैं कि वे इस दुनिया में कहाँ-कहाँ हैं। और ध्यान दीजिए, यह सूची ऊपर से शुरू होती है, सूरज से, और उतरते-उतरते आपके पेट तक, और फिर आपके दिल तक आ जाती है।

तो आज का पहला श्लोक, बारहवाँ। "यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्", सूर्य में स्थित जो तेज सारे संसार को प्रकाशित करता है, "यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्", और जो चन्द्रमा में है, और जो आग में है, उस तेज को मेरा जानो।

अभी-अभी पिछले श्लोकों में श्रीकृष्ण ने कहा था कि सूरज, चन्द्रमा और आग उनके धाम को रोशन नहीं कर सकते। और अब कहते हैं कि सूरज, चन्द्रमा और आग में जो रोशनी है, वह मेरी है। मधुसूदन सरस्वती इन दोनों बातों को एक साथ रखकर समझाते हैं। वे उपनिषद् का भाव याद दिलाते हैं: वहाँ सूरज नहीं चमकता, चन्द्रमा और तारे नहीं चमकते, बिजली नहीं चमकती, तो यह आग कैसे चमकेगी? उसी के चमकने से सब चमकता है, उसी की रोशनी से यह सब रोशन है। यानी सूरज उस धाम को रोशन नहीं करता, क्योंकि सूरज की अपनी कोई रोशनी है ही नहीं। जो है, वह उधार की है। दीया सूरज को क्या दिखाएगा? सूरज उस परम प्रकाश को क्या दिखाएगा?

पर यहाँ एक प्रश्न उठता है, और शंकराचार्य स्वयं उसे उठाते हैं। अगर भगवान की चेतना की रोशनी हर जगह एक-सी है, पत्थर में भी, पेड़ में भी, तो सूरज और चन्द्रमा का नाम अलग से क्यों लिया? उनका उत्तर बहुत सुन्दर है। वे कहते हैं, सोचिए, आपका चेहरा सामने है, पर लकड़ी या दीवार में वह नहीं दिखता, दर्पण में दिखता है। और जितना साफ़ दर्पण, उतना साफ़ चेहरा। वैसे ही सूरज, चन्द्रमा, आग में सत्त्व बहुत है, वे बहुत साफ़ दर्पण हैं, इसलिए वहाँ वह रोशनी सबसे ज़्यादा खुलकर दिखती है। रोशनी वहाँ ज़्यादा नहीं है, बस वहाँ ज़्यादा दिखती है।

नीलकण्ठ इसमें एक और परत खोलते हैं, जो सीधे हमारे भीतर उतरती है। वे कहते हैं, सूरज के साथ आँख भी समझो, चन्द्रमा के साथ मन, और आग के साथ वाणी। यानी आपकी आँख जो देखती है, आपका मन जो समझता है, और आपकी ज़बान जो कहती है, उन तीनों में जो रोशनी है, वह भी उन्हीं की है। आप किसी को देखकर पहचानते हैं, किसी बात को समझकर "अच्छा, यह बात है" कहते हैं, किसी को एक मीठा शब्द कहकर उसका दिन बना देते हैं, तो उस हर पल में वही तेज काम कर रहा है।

और संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक को एक माँ की तरह समझाते हैं। वे कहते हैं, सूरज के साथ जो यह सारी सृष्टि दिखाई देती है, वह चमक मेरी है, शुरू से अन्त तक। सूरज जब धरती का पानी सोख लेता है, तो जो नमी फिर से लौटाता है, वह चन्द्रमा में मेरी चाँदनी है। और जो जलाता है और पकाता है, बिना रुके, वह आग में मेरा ही तेज है। देखिए, एक सुखाता है, एक नमी लौटाता है, एक पकाता है। तीनों अलग काम, पर तेज एक।

आज के जीवन में यह कैसा दिखता है, यह मैं अपनी ओर से एक छोटी-सी बात कहकर बताऊँ। सोचिए, रात के दो बजे किसी अस्पताल में बिजली चली जाए। एक पल में सब रुक जाता है, और लोग घबराकर इधर-उधर देखने लगते हैं। फिर जनरेटर चलता है, बत्तियाँ लौटती हैं, और सबके मुँह से एक साथ निकलता है, "शुक्र है"। हम जिस रोशनी को रोज़ बिना सोचे इस्तेमाल करते हैं, उसका मूल्य उसके जाने पर ही समझ आता है। यह श्लोक कहता है कि सुबह की धूप को भी कभी उसी "शुक्र है" के साथ देखिए। हर सुबह जो रोशनी खिड़की से आती है, वह किसी की दी हुई है।

अब तेरहवाँ श्लोक। "गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा", पृथ्वी में प्रवेश करके मैं अपनी शक्ति से सब प्राणियों को धारण करता हूँ, "पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः", और रस से भरा चन्द्रमा बनकर मैं सब औषधियों को पुष्ट करता हूँ।

"गामाविश्य", यानी पृथ्वी में प्रवेश करके। और "धारयाम्यहमोजसा", अपने बल से मैं धारण करता हूँ। मधुसूदन सरस्वती और नीलकण्ठ, दोनों यहाँ एक ऐसा चित्र देते हैं जिस पर हम कभी सोचते ही नहीं। वे कहते हैं, यह पृथ्वी आख़िर है क्या? धूल की एक मुट्ठी। अगर भगवान इसमें घुसकर इसे कसकर न थामें, तो यह रेत की मुट्ठी की तरह बिखर जाए, या नीचे डूब जाए। और शंकराचार्य कहते हैं कि वह बल, जिसमें न कोई कामना है न राग, पृथ्वी में बैठा है, और उसी से इतनी भारी धरती न गिरती है, न फटती है।

संत ज्ञानेश्वर यहाँ फिर एक प्यारी बात कहते हैं। वे कहते हैं, मैं धरती में समाया हुआ हूँ, इसीलिए समुद्र के इतने बड़े जल में भी यह मिट्टी का ढेला घुलकर बह नहीं जाता। सोचिए, चारों ओर इतना पानी, और बीच में यह मिट्टी की धरती, और फिर भी टिकी है। हम पहाड़ों को, ज़मीन को, सबसे पक्की चीज़ मानते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं, वह पक्कापन भी मेरा है।

और फिर दूसरी पंक्ति। "सोमो भूत्वा रसात्मकः", रस से भरा सोम बनकर। सोम शब्द के दो अर्थ होते हैं: चन्द्रमा भी, और सोम नाम की एक बेल भी। लोकमान्य तिलक लिखते हैं कि यहाँ आगे-पीछे के सन्दर्भ से चन्द्रमा ही अर्थ है। और शंकराचार्य कहते हैं, चन्द्रमा सब रसों की खान है। वह अपने रस को धान, जौ जैसी सब औषधियों में भरकर उन्हें पुष्ट और स्वादिष्ट बनाता है। संत ज्ञानेश्वर इसे और सुन्दर कहते हैं: मैं आकाश में चन्द्रमा के बहाने अमृत का एक चलता-फिरता सरोवर बन गया हूँ, और उससे जो किरणें फैलती हैं, उनसे सब औषधियों को भरता हूँ, धान की हर फ़सल को अच्छा बनाता हूँ, और अन्न के द्वारा सब प्राणियों को जीवन का रस देता हूँ।

आपको याद होगा, दसवें सत्संग में हमने वनवास के पहले दिनों की बात सुनी थी, जब पाण्डवों के पुरोहित धौम्य ने युधिष्ठिर को समझाया था कि सूरज पानी को ऊपर खींचता है और फिर बरसाता है, और औषधियों के स्वामी चन्द्रमा सूरज का तेज लेकर धरती में पौधे उगाते हैं, और यही अन्न प्राणियों का प्राण है। आज वही बात श्रीकृष्ण अपने मुँह से कह रहे हैं, और एक बात और जोड़ रहे हैं: वह सूरज भी मैं, वह चन्द्रमा भी मैं।

और अब महाभारत की एक ऐसी कथा सुनिए, जो इस श्लोक को उल्टी तरफ़ से दिखाती है। यानी जब चन्द्रमा का रस घटने लगे, तो क्या होता है? यह कथा शल्य पर्व में है। युद्ध के आख़िरी दिनों में, जब भीम और दुर्योधन का गदा-युद्ध होने वाला था, बलराम तीर्थयात्रा से लौटकर वहाँ आए थे। और जनमेजय ने वैशम्पायन से पूछा कि बलराम उस यात्रा में कहाँ-कहाँ गए। वैशम्पायन बताते हैं कि वे सबसे पहले पवित्र प्रभास तीर्थ पहुँचे, जहाँ चन्द्रमा क्षय रोग से घटते-घटते शाप से छूटा, और फिर तेज पाकर सारे जगत को प्रकाशित करने लगा।

फिर कथा सुनाते हैं। प्रजापति दक्ष ने अपनी सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमा को ब्याह दीं। वे सब सुन्दर थीं, पर रोहिणी रूप में सबसे बढ़कर थी, और चन्द्रमा का मन उसी में लग गया। वह सदा उसी के पास रहता। बाकी बहनें दुखी होकर पिता के पास गईं। दक्ष ने चन्द्रमा से कहा, "सबके साथ समान व्यवहार करो, कहीं बड़ा अधर्म तुम्हें न छू ले।" चन्द्रमा ने नहीं माना। दूसरी बार कहा, फिर भी नहीं माना। तीसरी बार बेटियाँ सिर झुकाकर आईं और बोलीं, "आप हमारी शरण बनिए"। तब दक्ष ने क्रोध में चन्द्रमा पर क्षय रोग डाल दिया, और वह दिन-ब-दिन घटने लगा।

और अब वह पंक्ति सुनिए जो सीधे आज के श्लोक से जुड़ती है। वैशम्पायन कहते हैं, चन्द्रमा के घटने पर औषधियाँ उगनी बन्द हो गईं। जो उगीं, वे सब स्वाद और रस से ख़ाली, और बल से रहित हो गईं। औषधियाँ घटीं तो प्राणी भी घटने लगे, और सारी प्रजा दुबली हो गई। देवता घबराकर दक्ष के पास गए और बोले, "चन्द्रमा पर प्रसन्न होइए, उसके क्षय से लताएँ, औषधियाँ, बीज और मनुष्य, सब क्षय को पहुँच रहे हैं।" दक्ष ने कहा, "मेरा वचन यों ही पलटा नहीं जा सकता। पर एक उपाय है। चन्द्रमा सब पत्नियों के साथ समान रहे, और सरस्वती के उस तीर्थ में डुबकी लगाए जहाँ सरस्वती समुद्र से मिलती है। तब वह आधे महीने घटेगा और आधे महीने बढ़ेगा।" चन्द्रमा ने अमावस्या के दिन प्रभास में डुबकी लगाई, लोकों को फिर से प्रकाशित किया, और फिर से शीतल किरणों वाला हो गया। और प्रजा प्रसन्न होकर पहले की तरह फिर यज्ञ करने लगी।

इस कथा में दो बातें छिपी हैं, और दोनों आज के श्लोक की हैं। पहली बात यह कि फ़सल का स्वाद, फल का रस, अन्न का बल, ये सब किसी डोर से बँधे हैं। चन्द्रमा का रस घटा तो खेतों का स्वाद चला गया। और श्रीकृष्ण कहते हैं कि वह रस भी चन्द्रमा का अपना नहीं, "सोमो भूत्वा", मैं ही सोम बनकर पुष्ट करता हूँ। और दूसरी बात यह कि जिसके हाथ में सबको रस बाँटने का काम हो, उसे सबके साथ समान रहना होता है। चन्द्रमा का रोग एक के प्रति पक्षपात से आया था, और उसका इलाज था सबके साथ समानता। जो भगवान सबको धारण करते हैं, वे किसी एक के नहीं, सबके हैं। और जो उनका तेज लेकर दूसरों तक पहुँचाता है, वह भी तभी चमकता है जब उसके मन में सबके लिए जगह हो।

यह बात हमारे घर पर भी लागू होती है। घर में जो माँ या पिता सबको खिलाते-सँभालते हैं, वे भी तो एक तरह के चन्द्रमा ही हैं। जब तक सब बच्चों के लिए एक-सा प्रेम रहता है, घर हरा-भरा रहता है। और जिस दिन एक बच्चा "रोहिणी" बन जाए और बाकी अनदेखे रह जाएँ, उस दिन घर का रस घटने लगता है। यह किसी को दोष देने की बात नहीं। बस इतना याद रखने की बात है कि जो रस हम बाँटते हैं, वह हमारा अपना नहीं। वह उसी का है जो पूरी धरती को धारण करता है।

तो इन दो श्लोकों से आज की पहली बात यह निकलती है: भगवान कहीं दूर नहीं बैठे। सुबह की धूप में, रात की चाँदनी में, चूल्हे की आँच में, पैरों के नीचे की पक्की धरती में, और थाली के हर दाने के स्वाद में, एक ही शक्ति काम कर रही है। और जिस दिन यह दिखने लगे, उस दिन हर सुबह एक प्रसाद बन जाती है।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अन्न में रस मैं भरता हूँ। पर अन्न थाली में आ जाए, मुँह में चला जाए, तो भी काम पूरा नहीं होता। उसे पचना भी तो है। और वह काम कौन करता है? अगले श्लोक में श्रीकृष्ण आसमान से उतरकर सीधे आपके शरीर के भीतर आ जाते हैं, और वह श्लोक ऐसा है कि लोग उसे भोजन से पहले याद करते हैं।

अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः । प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥ १४ ॥
गीता 15.14 — अर्थ पढ़ें ›
सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च । वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥ १५ ॥
गीता 15.15 — अर्थ पढ़ें ›

अब चौदहवाँ श्लोक, जो शायद इस पूरे अध्याय का सबसे घरेलू श्लोक है। "अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः", मैं वैश्वानर अग्नि बनकर प्राणियों के शरीर में रहता हूँ, "प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्", और प्राण और अपान से जुड़कर चार प्रकार के अन्न को पचाता हूँ।

"वैश्वानर" कौन है? शंकराचार्य और मधुसूदन सरस्वती, दोनों उपनिषद् की बात याद दिलाते हैं: यह जो आग पुरुष के भीतर है, जिससे यह खाया हुआ अन्न पचता है, वही वैश्वानर है। यानी पेट की वह आग, जिसे हम आज की भाषा में पाचन की शक्ति कहते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं, वह आग मैं हूँ। आप भोजन करके उठ जाते हैं, बात करते हैं, सो जाते हैं, और भीतर कोई चुपचाप उस अन्न को खून, बल और जीवन में बदल रहा होता है। आपने उसे कभी आदेश नहीं दिया, फिर भी वह काम कर रहा है।

और "प्राणापानसमायुक्तः", प्राण और अपान से जुड़कर। श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, प्राण और अपान, भीतर आती और बाहर जाती ये दोनों हवाएँ, उस आग को सुलगाती हैं। संत ज्ञानेश्वर इसका ऐसा चित्र बनाते हैं कि आँखों के सामने आ जाता है। वे कहते हैं, मैंने हर प्राणी के शरीर में नाभि के पास एक चूल्हा जलाया है, और प्राण और अपान की दो धौंकनियों से दिन-रात फूँक-फूँककर, न जाने कितना अन्न पेट में पचाता रहता हूँ। सूखा हो या चिकना, अच्छी तरह पका हो या जला हुआ, चारों तरह का अन्न मैं ही पचाता हूँ।

अब "चतुर्विधम्", चार प्रकार का अन्न। हमारी टीका इसे सीधा कहती है: चबाने वाला, निगलने वाला, चाटने वाला और चूसने वाला। श्रीधर स्वामी इसके घरेलू उदाहरण देते हैं। जो दाँतों से तोड़-तोड़कर खाया जाए, जैसे पुआ, वह चबाने वाला। जो बस जीभ से घुमाकर निगल लिया जाए, जैसे खीर, वह निगलने वाला। जो जीभ पर रखकर स्वाद लेते-लेते धीरे-धीरे उतरे, जैसे पिघला हुआ गुड़, वह चाटने वाला। और जिसे दाँतों से दबाकर रस निगल लें और बाकी छोड़ दें, जैसे गन्ना, वह चूसने वाला। यानी थाली में जो कुछ भी आए, किसी भी रूप में, उसे पचाने वाला एक ही है।

इसीलिए लोग इस श्लोक को भोजन से पहले याद करते हैं। "अहं वैश्वानरो भूत्वा", यह याद करके थाली के सामने बैठना कि जो खा रहा है, वह भी मैं अकेला नहीं हूँ, मेरे भीतर बैठा वह भी है। और इस भाव का सबसे गहरा अर्थ शंकराचार्य, मधुसूदन सरस्वती और नीलकण्ठ, तीनों एक ही बात में देते हैं। वे कहते हैं, खाने वाला वैश्वानर अग्नि है, और खाया जाने वाला अन्न सोम है। पिछले श्लोक में भगवान सोम बने, इस श्लोक में अग्नि बने। तो जो आदमी यह देखता है कि खाने वाला भी वही, खाया जाने वाला भी वही, सब अग्नि और सोम ही है, उस पर अन्न का दोष नहीं लगता। यानी भोजन एक साधारण काम नहीं रहता, एक यज्ञ बन जाता है, जिसमें आग भी भगवान की है और आहुति भी भगवान की।

आपको याद होगा, उन्नीसवें सत्संग में हमने वनवास की वह कथा सुनी थी, जब दुर्वासा अपने हज़ारों शिष्यों के साथ भोजन माँगने आए, और द्रौपदी के पास सूर्य की दी हुई बटलोई में कुछ नहीं बचा था। श्रीकृष्ण ने बटलोई के किनारे चिपका साग और अन्न का एक कण खाया और कहा, "इससे विश्व की आत्मा देव प्रसन्न और तृप्त हों"। और नदी में स्नान कर रहे सब मुनियों को अन्न के स्वाद वाली डकारें आने लगीं, वे पूरी तरह तृप्त हो गए। आज उस कथा को इस श्लोक के साथ रखिए। जो सब प्राणियों के शरीर में बैठकर अन्न पचाता है, उसने एक कण खाया, और हज़ारों पेट भर गए। क्योंकि वह हर पेट में पहले से बैठा था। और ध्यान दीजिए, वह बटलोई भी सूर्य की दी हुई थी, और सूर्य का तेज भी, बारहवें श्लोक के अनुसार, उन्हीं का है।

और यहाँ मैं एक पल रुककर आपसे एक बात कहना चाहता हूँ। आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। यह अध्याय आज पूरा हो रहा है, और इसका असली रहस्य, पुरुषोत्तम कौन है, वह अभी आगे आने वाला है। तो अगर आप यह सत्संग किसी पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि कोई कड़ी छूटे नहीं, और अगर वीडियो पर देख रहे हैं, तो साथ बने रहिए। आइए, आगे चलें।

अब महाभारत की एक और कथा, जो पेट की इस आग की शक्ति को एक अनोखे ढंग से दिखाती है। यह वन पर्व में है। तीर्थयात्रा करते हुए पाण्डव अगस्त्य मुनि के आश्रम पहुँचे, और युधिष्ठिर ने लोमश मुनि से पूछा, अगस्त्य ने यहाँ वातापि को क्यों समाप्त किया? लोमश बताते हैं, मणिमती नगरी में इल्वल नाम का एक दैत्य था, और वातापि उसका छोटा भाई। इल्वल ने एक तपस्वी ब्राह्मण से इन्द्र जैसा पुत्र माँगा, उसने नहीं दिया, और उसी दिन से इल्वल ब्राह्मणों का शत्रु बन गया। वातापि जो चाहे रूप धर सकता था। इल्वल उसे मेढ़ा बनाकर पकाता, ब्राह्मण अतिथि को खिलाता, और फिर ऊँचे स्वर में भाई का नाम लेकर पुकारता। और वातापि हँसता हुआ ब्राह्मण की पसली फाड़कर बाहर निकल आता। इस तरह उसने बहुत-से ब्राह्मणों को मार डाला।

फिर एक दिन अगस्त्य कुछ राजाओं के साथ इल्वल के राज्य में पहुँचे। इल्वल ने उनका सत्कार किया, और वही पका हुआ वातापि परोसा। राजा उसे देखकर हताश हो गए। तब अगस्त्य ने कहा, "आप दुख न करें। इस असुर को मैं खाऊँगा।" वे सम्मान के आसन पर बैठे, और अकेले पूरे वातापि को खा गए। और खाते-खाते, कथा कहती है, उन्होंने इल्वल से कहा, "मुझे अभी तुम्हारे बहुत-से भोजन की इच्छा है।" सोचिए, दैत्य के मन में उस पल क्या चल रहा होगा। फिर इल्वल ने पुकारा, "हे वातापि, जाग उठो, इससे पहले कि यह तपस्वी तुम्हें पचा डाले।" वातापि ने भीतर से पेट फाड़ने का ज़ोर लगाया। और अगस्त्य गरजे, "हे वातापि, तुम पच गए। मैंने संसार की शान्ति के लिए ऐसा किया।" इल्वल बार-बार पुकारता रहा, और अगस्त्य ने हँसकर कहा, "वह कैसे बाहर निकलेगा? उसे तो मैंने पचा दिया।"

यह कथा सुनने में एक चमत्कार लगती है, पर इसमें हमारे लिए एक गहरी बात है। जीवन हमारी थाली में भी कई बार ऐसा कुछ परोसता है जो भीतर जाकर हमें फाड़ना चाहता है। किसी का कड़वा वाक्य, कोई अपमान, कोई धोखा। हम उसे निगल तो लेते हैं, पर वह भीतर से पुकार सुनते ही फिर जाग उठता है। कोई उस आदमी का नाम ले ले, और पुराना घाव हँसता हुआ बाहर आ जाता है। अगस्त्य की आग तप की आग थी। और यह श्लोक कहता है कि वह आग, वैश्वानर, आपके भीतर भी है, और वह भगवान की है। जो आदमी भगवान को अपने भीतर बैठा जानकर जीता है, वह धीरे-धीरे उस कड़वाहट को भी पचाना सीख जाता है। और कह पाता है, "यह पच गया, मेरी शान्ति के लिए, और मेरे घर की शान्ति के लिए।" यह बात मेरी अपनी ओर से है, कथा का अर्थ नहीं, पर कथा उसकी ओर इशारा ज़रूर करती है।

अब उस श्लोक पर आते हैं जिससे आज के सत्संग का नाम निकला है। पन्द्रहवाँ श्लोक। "सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो", और मैं सबके हृदय में बैठा हूँ, "मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च", मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और उनका लोप होता है, "वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो", सब वेदों द्वारा जानने योग्य मैं ही हूँ, "वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्", वेदान्त का कर्ता और वेद को जानने वाला भी मैं ही हूँ।

ध्यान दीजिए, यात्रा कैसे उतरी है। सूरज, चन्द्रमा, आग, फिर धरती, फिर औषधियाँ, फिर पेट, और अब दिल। "सर्वस्य", सबके। किसी एक के नहीं, किसी अच्छे आदमी के ही नहीं, सबके। और "संनिविष्टो", अच्छी तरह बैठा हुआ, जैसे कोई अपने घर में आराम से बैठा हो। रामानुजाचार्य इसे उपनिषदों के साथ पढ़ते हैं: भीतर प्रवेश करके जो सब लोगों पर शासन करता है, जो आत्मा में रहकर भी आत्मा से अलग है और उसे भीतर से चलाता है। वे कहते हैं, हृदय वह जगह है जहाँ से हर ज्ञान उठता है, हर करना और न करना शुरू होता है, और वहीं बैठकर भगवान सबको अपने संकल्प से थामे रहते हैं।

संत ज्ञानेश्वर इसे सबसे सरल शब्दों में कहते हैं। वे कहते हैं, हर एक के हृदय में दिन-रात जो यह भाव चमकता रहता है कि "मैं हूँ, मैं फलाना हूँ", वह जो चमक है, वह मैं हूँ। सोचिए, सुबह आँख खुलते ही आपको सबसे पहले क्या पता चलता है? कि "मैं हूँ"। उसके बाद ही नाम याद आता है, काम याद आता है, चिन्ताएँ याद आती हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं, वह पहली चमक मैं हूँ।

अब "मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च"। तीन चीज़ें, और तीनों भगवान से। श्रीधर स्वामी इन्हें खोलकर कहते हैं: स्मृति, यानी जो पहले अनुभव किया उसकी याद; ज्ञान, यानी इन्द्रियों और विषयों के मिलने से जो अभी जाना जाता है; और अपोहन, यानी इन दोनों का खो जाना, भूल जाना। भूल जाना भी भगवान से? हाँ। और यहीं इस श्लोक की सबसे कोमल बात छिपी है।

हमारी टीका बताती है कि कुछ लोग अपोहन का अर्थ संशय और भ्रम का दूर होना लेते हैं। रामानुजाचार्य एक और अर्थ भी देते हैं, ऊहन, यानी सोच-विचार करके सही-ग़लत तय करने की शक्ति। और शंकराचार्य और नीलकण्ठ कहते हैं, पुण्य करने वालों को उनके कर्मों के अनुसार स्मृति और ज्ञान मिलते हैं, और पाप करने वालों से वे वैसे ही छिन जाते हैं। मधुसूदन सरस्वती यहाँ एक बहुत मानवीय बात जोड़ते हैं। वे कहते हैं, जिनका मन काम, क्रोध और शोक से व्याकुल है, उनकी स्मृति और ज्ञान का खो जाना भी मुझसे ही होता है।

इसे अपने जीवन में देखिए। आपको याद होगा, ग्यारहवें सत्संग में हमने सुना था कि युद्ध के बाद अर्जुन ने स्वयं श्रीकृष्ण से कहा, "जो आपने पहले मित्रता से कहा था, वह सब मेरे विचलित मन से खो गया"। यानी जिसने गीता अपने कानों से सुनी, उसकी भी स्मृति छूट गई। और अट्ठाईसवें सत्संग में हमने देखा था कि बाणों की शय्या पर पड़े भीष्म को श्रीकृष्ण ने वर दिया, "हे निष्पाप, सब ज्ञान आपको प्रकट होंगे", और भीष्म का घायल मन फिर से सारे धर्म को याद कर सका। यानी याद दिलाना भी उन्हीं के हाथ में, भुलवाना भी उन्हीं के हाथ में।

और कभी-कभी भूलना ही सबसे बड़ी कृपा होती है। एक उदाहरण मैं अपनी ओर से देता हूँ। किसी माँ का जवान बेटा चला गया। पहले साल हर सुबह वह दर्द पहली साँस के साथ जागता है। फिर बरसों बाद एक दिन ऐसा आता है जब वह बेटे को याद करके मुस्कुरा पाती है, और दर्द वैसा नहीं चुभता। वह बेटे को भूली नहीं है। बस वह धार कुछ कुन्द हो गई है जो रोज़ उसे काटती थी। वह भी अपोहन है, उसी का दिया हुआ। जो आपके दिल में बैठा है, वह जानता है कि कौन-सी याद को कितनी देर रहने देना है।

अब इस श्लोक का दूसरा आधा। "वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो", सब वेदों से जानने योग्य मैं ही हूँ। मधुसूदन सरस्वती वेद के एक मन्त्र का भाव याद दिलाते हैं: सत्य एक है, ज्ञानी उसे इन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि, अनेक नामों से बताते हैं। यानी वेद अलग-अलग देवताओं की स्तुति करते दिखते हैं, पर सबके भीतर जानने योग्य एक ही है।

और "वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्", वेदान्त का कर्ता और वेद को जानने वाला भी मैं ही। यहाँ मधुसूदन सरस्वती एक ऐसी बात कहते हैं जो हमें सीधे इस कथा के ढाँचे में ले आती है। वे कहते हैं, वेदान्त की परम्परा चलाने वाले भगवान ही हैं, वेदव्यास आदि के रूप में। और वेदव्यास कौन हैं? वही, जिन्होंने युद्ध से पहले धृतराष्ट्र के पास आकर सञ्जय को दिव्य दृष्टि दी थी, और कहा था कि सञ्जय सब जान लेगा, खुले में किया गया हो या छिपकर, दिन में हो या रात में, यहाँ तक कि मन में सोचा गया भी। सोचिए, सञ्जय मन में सोची बात जान सकें, यह वर व्यास ने दिया। और आज श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि जो सबके हृदय में बैठा है, वह तो बिना किसी वर के, सदा से, हर मन की हर बात जानता है। श्रीधर स्वामी इसमें बस इतना जोड़ते हैं: वेदान्त का कर्ता, यानी ज्ञान देने वाला गुरु भी मैं ही हूँ।

और संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर एक ऐसी बात कहते हैं जिसे मैं आज आपके हाथ में रखना चाहता हूँ। वे कहते हैं, सूरज निकल आए, तो सूरज को देखने के लिए सूरज ही चाहिए, कोई दीया नहीं। वैसे ही मुझे जानने के लिए भी मैं ही कारण हूँ। यानी आप भगवान को ढूँढने निकले हैं, तो यह ढूँढने की इच्छा भी आपके भीतर बैठे उसी ने जगाई है। आप उनके पास जा रहे हैं, क्योंकि वे पहले से आपके पास हैं।

तो इन दो श्लोकों से आज की दूसरी बात यह निकलती है: आप जो खाते हैं, उसे पचाने वाला भी वही है, और आप जो सोचते हैं, याद रखते हैं, भूलते हैं, उसके पीछे भी वही है। इसलिए थाली के सामने भी, और अपने मन के सामने भी, आप अकेले नहीं हैं।

पर अभी एक बात बाकी है। अगर वही सबके दिल में है, तो फिर यह जो "मैं" है, जो सुख-दुःख भोगता है, जन्म लेता है, मरता है, वह कौन है? और जो कभी नहीं बदलता, वह कौन? अगले दो श्लोकों में श्रीकृष्ण संसार को दो पुरुषों में बाँट देते हैं, और फिर एक तीसरे की ओर इशारा करते हैं जो दोनों से ऊपर है।

द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च । क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ १६ ॥
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उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥ १७ ॥
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अब सोलहवाँ श्लोक। "द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च", इस संसार में दो पुरुष हैं, क्षर और अक्षर, "क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते", सब प्राणी क्षर हैं, और जो कूटस्थ है, उसे अक्षर कहा जाता है।

"क्षर" का अर्थ है जो क्षरता है, घिसता है, बहता है, नष्ट होता है। और "अक्षर", जो नहीं क्षरता। यहाँ तक बात सीधी है। सब प्राणी क्षर हैं, यानी जो कुछ जन्मा है, बढ़ रहा है, बदल रहा है, और एक दिन मिट जाएगा। पर "कूटस्थ" कौन है, जो अक्षर है? यहीं आचार्यों के रास्ते अलग होते हैं, और हमारी टीका दोनों रास्ते सामने रखती है।

शंकराचार्य और मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, अक्षर भगवान की माया-शक्ति है, वह बीज जिससे यह नश्वर संसार उगता है। अनगिनत प्राणियों की कामनाओं और कर्मों के संस्कार उसी में रहते हैं। बीज अनन्त हैं, इसलिए वह कभी नहीं क्षरता। और "कूट" शब्द का अर्थ शंकराचार्य दो तरह से करते हैं: एक ढेर, जैसे राशि की तरह टिका हुआ; या माया, छल, टेढ़ापन, यानी जो अनेक तरह के छलावों के रूप में टिका है। मधुसूदन यह भी बताते हैं कि कुछ लोग अक्षर का अर्थ जीव लेते हैं, पर वे स्वयं इसे माया ही मानते हैं।

रामानुजाचार्य दूसरा रास्ता लेते हैं। वे कहते हैं, क्षर वे सब जीव हैं जो जड़ शरीर से बँधे हैं, ब्रह्मा से लेकर घास के तिनके तक। और अक्षर वह मुक्त आत्मा है, जो शरीर के बन्धन से छूटकर अपने शुद्ध रूप में है, और इसलिए किसी शरीर के बदलने से नहीं बदलता। और वे याद दिलाते हैं कि मुक्त आत्मा कोई एक नहीं है। चौथे अध्याय में श्रीकृष्ण ने कहा था, "बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः", बहुत-से लोग ज्ञान के तप से पवित्र होकर मेरे स्वरूप को पा चुके हैं।

श्रीधर स्वामी एक तीसरा, बहुत सुन्दर चित्र देते हैं। वे कहते हैं, क्षर ये सब शरीर हैं, क्योंकि नासमझ लोग शरीर को ही पुरुष मानते हैं। और कूटस्थ वह चेतन भोक्ता है जो पहाड़ की तरह टिका रहता है, शरीर नष्ट होते रहें, फिर भी वह नहीं बदलता। और लोकमान्य तिलक कहते हैं कि क्षर और अक्षर यहाँ सांख्य के व्यक्त और अव्यक्त हैं, यानी दिखने वाली सृष्टि और उसके पीछे की अनदेखी प्रकृति। हमारी टीका इन सबका सार एक वाक्य में रखती है: अर्थ कोई भी लें, अगले श्लोक का पुरुषोत्तम इन दोनों से ऊपर है। तो हम किसी एक का पक्ष नहीं लेंगे। यह जान लेना काफ़ी है कि संसार में एक बदलने वाला है, एक न बदलने वाला, और दोनों के ऊपर कोई और।

संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक को एक कहानी की तरह कहते हैं। वे कहते हैं, इस संसार नाम के नगर में बस दो ही लोग बसते हैं, जैसे आकाश में दिन और रात दोनों रहते हैं। उनमें से एक अन्धा है, पागल है, लँगड़ा है, और दूसरा हर अंग से पूरा और भला-चंगा। पर नगर के स्वभाव के कारण दोनों का साथ हो गया है। एक का नाम क्षर है, दूसरे का अक्षर। और फिर ज्ञानेश्वर धीरे से जोड़ते हैं, एक तीसरा पुरुष भी है, पर वह इन दोनों का नाम सहन नहीं करता। वह उगता है तो इन दोनों को नगर समेत निगल जाता है। उसकी बात थोड़ी देर बाद।

और क्षर पुरुष के बारे में ज्ञानेश्वर एक ऐसा चित्र देते हैं जो भूलता नहीं। वे कहते हैं, बहते-उछलते पानी में चाँदनी भी काँपती हुई दिखती है, जैसे चाँद ही हिल रहा हो। और जैसे ही वह पानी सूखता है, उसमें दिखने वाली चाँदनी भी साथ ही चली जाती है। चाँद न हिला था, न गया। हिलना और जाना पानी का था। वैसे ही जो चेतना शरीर और मन के पानी में दिखती है, वह शरीर के साथ काँपती, बदलती, आती-जाती लगती है, और इसीलिए उसे क्षर कहा जाता है।

श्रीधर स्वामी एक और कड़ी जोड़ते हैं। वे कहते हैं, छठे श्लोक में श्रीकृष्ण ने कहा था "तद्धाम परमं मम", वह मेरा परम धाम है। अब इन तीन श्लोकों में वे दिखा रहे हैं कि वह धाम सबसे ऊँचा क्यों है।

अब इसे अपने जीवन में देखिए। एक उदाहरण मैं अपनी ओर से देता हूँ। घर में एक पुराना फ़ोटो-एल्बम खोलिए। पहले पन्ने पर एक छोटा बच्चा है, माँ की गोद में। फिर स्कूल की वर्दी में एक लड़का। फिर शादी के दिन का एक नौजवान। फिर बच्चों के साथ एक थका हुआ पिता। और आज आईने में बालों की सफ़ेदी। हर तस्वीर में शरीर अलग है। चेहरा अलग, क़द अलग, आँखों की चमक अलग। यही क्षर है, जो हर पल बदल रहा है। पर हर तस्वीर पर उँगली रखकर आप कहते हैं, "यह मैं हूँ"। वह "मैं" जो हर तस्वीर में एक-सा है, जिसने बचपन भी देखा और बुढ़ापा भी, वह कौन है? श्रीधर स्वामी और रामानुजाचार्य के अर्थ से वही कूटस्थ, अक्षर है। और अब सोचिए, जिसने यह पूरा एल्बम सँभालकर रखा, हर तस्वीर को उसकी जगह पर, वह कौन है? श्रीकृष्ण अगले श्लोक में उसी की बात करते हैं।

सत्रहवाँ श्लोक। "उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः", पर उत्तम पुरुष तो कोई और है, जिसे परमात्मा कहा गया है, "यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः", वह अविनाशी ईश्वर, जो तीनों लोकों में प्रवेश करके उन्हें धारण करता है।

"उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः", उत्तम पुरुष तो कोई और है। यानी क्षर भी नहीं, अक्षर भी नहीं, उन दोनों से अलग। शंकराचार्य कहते हैं, वह इन दोनों से बिलकुल ही अलग है, और उसका नाम परमात्मा इसलिए है कि वह परम भी है और आत्मा भी। परम इसलिए कि अज्ञान से जिन्हें हम "मैं" मान बैठते हैं, शरीर, मन, उन सबसे ऊपर है। और आत्मा इसलिए कि वह सब प्राणियों का सबसे भीतर का "मैं" है। और वह तीनों लोकों को कैसे थामता है? शंकराचार्य कहते हैं, बस अपने होने भर से। उसे कुछ उठाना नहीं पड़ता।

मधुसूदन सरस्वती इसे उपनिषद् की भाषा में कहते हैं। वे कहते हैं, हमारे भीतर पाँच परतें हैं, जिन्हें हम अपना आप समझ लेते हैं: अन्न से बना शरीर, प्राण, मन, बुद्धि, और आनन्द की परत। परमात्मा इन पाँचों से परे है, और वही इन सबका आधार है। और वह तीनों लोकों को कैसे धारण करता है? सबको होना देकर, और सबको चमक देकर। नीलकण्ठ "तीन लोक" का एक और अर्थ करते हैं: ऊँचे, बीच के और नीचे के शरीर। यानी देवता हों, मनुष्य हों या पशु-पक्षी, सबके शरीर में प्रवेश करके वह उन्हें थामे है, और फिर भी अविनाशी है, न बढ़ता है, न घटता है।

और रामानुजाचार्य "तीन लोक" को तीन चीज़ें मानते हैं: जड़ प्रकृति, उससे बँधा जीव, और मुक्त जीव। वे कहते हैं, परमात्मा इन तीनों में आत्मा बनकर प्रवेश करता है और इन्हें धारण करता है, और इसीलिए वह इन तीनों से अलग है, जैसे धारण करने वाला धारण की जाने वाली चीज़ से अलग होता है, और शासन करने वाला उनसे अलग होता है जिन पर शासन है।

आपको याद होगा, तेरहवें अध्याय में भी यही शब्द आया था, "परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः", इस शरीर में जो परम पुरुष है, वह परमात्मा भी कहा गया है, साक्षी, अनुमति देने वाला, धारण करने वाला। वहाँ बात इस एक शरीर की थी। यहाँ बात तीनों लोकों की है। जो आपके भीतर बैठकर आपको थामे है, वही पूरे ब्रह्माण्ड को भी थामे है।

संत ज्ञानेश्वर इस उत्तम पुरुष को कुछ उपमाओं से दिखाते हैं। वे कहते हैं, जैसे लकड़ी के भीतर रहने वाली आग लकड़ी से अलग है, वैसे ही वह क्षर और अक्षर से अलग है। जैसे सपने और गहरी नींद से जागना बिलकुल दूसरी चीज़ है। जैसे सूरज की किरणों से और मृगजल से, सूरज का गोला बहुत अलग है। और फिर वे एक ऐसी बात कहते हैं जो सुनकर मन थम जाता है: वह ऐसा प्रकाश है जिसे चमकने के लिए किसी वस्तु की ज़रूरत नहीं, ऐसा स्वामी जिसे स्वामी होने के लिए किसी प्रजा की ज़रूरत नहीं।

अब "बिभर्त्यव्यय ईश्वरः", वह अविनाशी ईश्वर धारण करता है, इस धारण करने को एक चित्र के साथ रखिए। आपको याद होगा, पच्चीसवें सत्संग में हमने हरिवंश की वह कथा सुनी थी, जब इन्द्र ने क्रोध में सात रात तक गोकुल पर मूसलाधार वर्षा कराई, और श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उखाड़कर अपने हाथ पर थाम लिया, और ग्वाले और गायें उसके नीचे बच गए। उसी कथा की दो पंक्तियाँ आज के श्लोक के लिए ही मानो लिखी गई हैं। पर्वत उठाकर श्रीकृष्ण ग्वालों से कहते हैं, यह जो आश्रय मैंने बनाया है, यह तो तीनों लोकों की भी रक्षा कर सकता है, फिर गोकुल की क्या बात। और हरिवंश बताता है कि वे पर्वत के मूल में पत्थर के खम्भे की तरह खड़े होकर, एक हाथ से उस पर्वत को ऐसे थामे रहे, जैसे कोई किसी प्यारे अतिथि को थामता है। आज उस चित्र को इस श्लोक के साथ देखिए। एक गाँव के लिए एक पर्वत थामना हमें चमत्कार लगता है। पर यह श्लोक कहता है कि वह तीनों लोकों को हर पल ऐसे ही थामे हुए है, बोझ की तरह नहीं, प्यारे अतिथि की तरह। बस हमें उसका हाथ दिखाई नहीं देता।

तो इन दो श्लोकों से आज की तीसरी बात यह निकलती है: आपके भीतर एक बदलने वाला है, यह शरीर, यह मन, जो हर तस्वीर में अलग दिखता है; और एक न बदलने वाला है, जो हर तस्वीर में "मैं" कहता है। पर इन दोनों से ऊपर भी कोई है, जो इन दोनों को, और सारे संसार को, अपने होने भर से थामे हुए है। और जब जीवन का बोझ भारी लगे, तो याद रखिए कि बोझ उठाने वाला हाथ आपका अकेला नहीं है।

पर अभी एक बात बाकी है। इस उत्तम पुरुष का नाम क्या है? श्रीकृष्ण अब तक "वह" कहकर बात कर रहे थे। अगले श्लोक में वे "मैं" कहते हैं, और अपना वह नाम बताते हैं जो इस अध्याय का नाम बन गया। और उस नाम के साथ हस्तिनापुर के उस महल की एक पुरानी शाम भी जुड़ी है, जब धृतराष्ट्र ने स्वयं सञ्जय से यही नाम समझना चाहा था।

यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः । अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥ १८ ॥
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यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम् । स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥ १९ ॥
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अठारहवाँ श्लोक। "यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः", क्योंकि मैं क्षर से परे हूँ और अक्षर से भी उत्तम हूँ, "अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः", इसलिए लोक में और वेद में मैं पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूँ।

सुनिए, पिछले श्लोक में "वह" था: उत्तम पुरुष कोई और है, जो तीनों लोकों को थामे है। और इस श्लोक में वही "वह" अचानक "मैं" बन जाता है। मैं। अर्जुन के रथ पर बैठा, घोड़ों की लगाम हाथ में लिए यह सारथी कहता है, जिसकी तुम बात सुन रहे हो, वह मैं हूँ।

शंकराचार्य यहाँ "क्षर" का अर्थ सीधे पिछले सत्संग से जोड़ते हैं। वे कहते हैं, क्षर से परे, यानी संसार की माया के उस अश्वत्थ वृक्ष से परे, जिसका वर्णन इस अध्याय के आरम्भ में हुआ। और अक्षर से भी उत्तम, यानी उस वृक्ष के बीज से भी ऊपर। यानी उल्टा पीपल भी नहीं, उसका बीज भी नहीं, पर वह जिससे पेड़ और बीज, दोनों हैं। और शंकराचार्य बताते हैं कि इसी नाम से भक्त उन्हें जानते हैं, और कवि अपने काव्यों में इसी नाम को पिरोते हैं।

श्रीधर स्वामी कारण को और साफ़ कहते हैं। क्षर से परे इसलिए कि वे सदा मुक्त हैं, उन्हें कभी कुछ बाँध नहीं सकता। और अक्षर से उत्तम इसलिए कि वे नियन्ता हैं, सबको चलाने वाले। और नीलकण्ठ एक सीढ़ी बनाते हैं: जड़ शरीर से ऊपर चेतन जीव, जीव से ऊपर स्वतन्त्र माया, और माया से भी ऊपर वह जो किसी उपाधि से बँधा ही नहीं। उस सीढ़ी की सबसे ऊँची पायदान का नाम पुरुषोत्तम है।

और "लोके वेदे च", लोक में भी और वेद में भी। रामानुजाचार्य कहते हैं, वेद में, जैसे छान्दोग्य उपनिषद् में, जहाँ कहा गया है, वह उत्तम पुरुष है। और लोक का अर्थ वे स्मृति लेते हैं, यानी पुराण आदि, जैसे विष्णु पुराण, जिनमें यही नाम आता है।

पर इस "लोक" शब्द के साथ मुझे एक और लोक याद आता है, वह महल जहाँ यह गीता सुनाई जा रही है। आपको याद होगा, अट्ठाईसवें सत्संग में हमने उद्योग पर्व की वह शाम सुनी थी, जब युद्ध से पहले धृतराष्ट्र ने सञ्जय से कहा था, "हे सञ्जय, मुझे फिर से उन कमलनयन के बारे में बताओ, ताकि उनके नामों और कर्मों का अर्थ जानकर मैं पुरुषोत्तम को पा सकूँ।" और सञ्जय ने एक-एक नाम का अर्थ बताया था। उसी सूची में सञ्जय ने पुरुषोत्तम का अर्थ भी बताया था: वे सबको भरते हैं, और सब उन्हीं में टिके हैं, इसलिए वे पुरुषोत्तम हैं।

अब ज़रा उस महल की कल्पना कीजिए। वही धृतराष्ट्र, वही सञ्जय, वही कमरा। उस दिन धृतराष्ट्र ने स्वयं कहा था कि मैं पुरुषोत्तम को पाना चाहता हूँ। और आज, युद्ध के दस दिन बाद, भीष्म के गिरने के बाद, वही सञ्जय उन्हें बता रहे हैं कि रणभूमि में स्वयं वे कमलनयन अपने मुँह से कह रहे हैं, "मैं ही पुरुषोत्तम हूँ"। उस दिन नाम का अर्थ सुना था। आज नाम वाला स्वयं बोल रहा है। पर राजा का मन अभी भी अपने बेटों की जीत में अटका है। हम भी कभी-कभी ऐसे ही होते हैं। भगवान का नाम सुनते हैं, उसका अर्थ भी जानते हैं, और फिर भी मन किसी और चीज़ को पकड़े बैठा रहता है।

मधुसूदन सरस्वती इस श्लोक की टीका एक ऐसे श्लोक पर पूरी करते हैं जो उनके अपने मन की बात है। उसका भाव यह है: कुछ लोग इन्द्रियों को रोककर, भोग छोड़कर, निर्मल बुद्धि से योग में यत्न करते हैं। पर मैं तो नारायण की उस अनन्त, अपार महिमा का स्वाद लेता हुआ, जो अमृत का सार है, मुक्त हो गया हूँ। सोचिए, यह वे आचार्य कह रहे हैं जो अद्वैत के सबसे बड़े विद्वानों में गिने जाते हैं। पुरुषोत्तम का नाम आते ही उनकी विद्वत्ता भी भक्ति में घुल जाती है।

संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर बस दो पंक्तियाँ कहते हैं, क्योंकि आगे कहने को कुछ बचता नहीं। वे कहते हैं, जो अपने आप को अपने आप ही प्रकाशित करता है, जिसके सिवा दूसरा कुछ है ही नहीं, वह क्षर और अक्षर से उत्तम, एक मैं हूँ, इसीलिए वेद और लोक मुझे पुरुषोत्तम कहते हैं।

अब उन्नीसवाँ श्लोक। "यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम्", हे भारत, जो मोह से रहित होकर मुझे इस तरह पुरुषोत्तम जानता है, "स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत", वह सब कुछ जानने वाला है, और सब भाव से मुझे भजता है।

"यो मामेवमसंमूढो", जो मोह से रहित होकर मुझे जानता है। किस मोह से? मधुसूदन सरस्वती इसका बहुत सीधा उत्तर देते हैं। वे कहते हैं, इस मोह से कि "यह कृष्ण तो कोई मनुष्य ही है"। आपको याद होगा, तेरहवें सत्संग में हमने भीष्म पर्व में ही ब्रह्मा के वे वचन सुने थे, जो भीष्म ने दुर्योधन को सुनाए थे: "जो कहे 'यह केवल मनुष्य है', वह मन्दबुद्धि है।" दुर्योधन ने वह बात सुनी, और फिर भी नहीं माना। यही संमोह है, जिसके हटने की बात यह श्लोक करता है।

और जो यह जान लेता है, उसे "स सर्वविद्भजति मां" में सब जानने वाला क्यों कहा? श्रीधर स्वामी कहते हैं, जो उन्हें पुरुषोत्तम जानता है, वह सब भाव से उन्हें भजता है, और उसी से वह सब जानने वाला हो जाता है। नीलकण्ठ कहते हैं, इस ज्ञान का फल भी भक्ति ही है। और रामानुजाचार्य एक ऐसी बात कहते हैं जो बहुत भरोसा देती है। वे कहते हैं, भगवान को पाने के लिए जितनी तरह की पूजाएँ, जितनी तरह की उपासनाएँ बताई गई हैं, उन सबसे भगवान को जो प्रसन्नता होती है, वह अकेले इस बात को जान लेने से हो जाती है कि वे पुरुषोत्तम हैं। यानी इस एक सच को दिल से जान लेना ही सबसे बड़ी पूजा है।

"सर्वभावेन", सब भाव से। मधुसूदन सरस्वती इसका अर्थ प्रेम से भरा भक्ति-योग करते हैं, और कहते हैं कि अब पिछले अध्याय की वह बात भी समझ में आती है, "मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते", जो अटल भक्ति से मेरी सेवा करता है, वह गुणों के पार हो जाता है। और संत ज्ञानेश्वर कहते हैं, जैसे लहर समुद्र से अलग नहीं होती, जैसे सूरज और उसकी किरणें एक ही प्रेम में बँधी हैं, वैसे ही ऐसा भक्त मुझसे अलग होकर नहीं, मुझमें रहकर भजता है।

अब महाभारत के हरिवंश की एक छोटी-सी कथा सुनिए, जिसमें "लोके" और "वेदे", दोनों एक साथ खड़े हैं। गोवर्धन की उन सात रातों के बाद, जब इन्द्र लौट गए, श्रीकृष्ण गोकुल में लौटे। गोकुल के बड़े-बूढ़े और स्वजन उन्हें घेरकर बोले, "हम धन्य हैं। तुम्हारी कृपा से गायें वर्षा के भय से तर गईं, और हम एक बड़े भय से तर गए।" फिर वे बोले, "हम तुम्हारे कर्म देखते हैं, वे मनुष्य जैसे नहीं हैं। इस पर्वत को उठाने से हम जान गए कि तुम कोई देवता हो। तुम कौन हो? रुद्रों में, मरुतों में, वसुओं में कौन? और अगर ऐसा है तो वसुदेव तुम्हारे पिता क्यों हैं? लोकपालों जैसे होकर तुम ग्वाले के वेश में हमारे बीच गायें क्यों चराते हो?"

और फिर उनके मुँह से वह बात निकली जो मुझे लगता है भक्ति की सबसे सच्ची परिभाषाओं में से एक है। उन्होंने कहा, "तुम देवता हो या दानव, यक्ष हो या गन्धर्व, तुम हमारे बन्धु बनकर जन्मे हो। जो भी हो, तुम्हें नमस्कार। अगर किसी काम से तुम यहाँ रहते हो, तो हम सब तुम्हारे पीछे चलने वाले हैं, तुम्हारी शरण में आए हैं।"

श्रीकृष्ण ने मुस्कुराकर उत्तर दिया, "आप सब मुझे जैसा बलवान मानते हैं, वैसा मानिए, पर मेरी अवहेलना न हो। मैं आपकी अपनी जाति का, आपका बन्धु हूँ। और अगर सुनना ही है, तो समय की प्रतीक्षा कीजिए। तब आप सुनेंगे, और मुझे सच-सच देखेंगे।" और फिर वे एक ऐसा प्रश्न पूछते हैं जिसमें सारी गीता झलकती है: "अगर आपका यह बन्धु देवता जैसा चमकता है और आप उसकी सराहना करते हैं, तो जानकर क्या करना है? क्या यही मेरा अनुग्रह नहीं है?" हरिवंश कहता है, यह सुनकर ग्वाले चुप हो गए, और मुँह ढककर अपनी-अपनी दिशा में चले गए।

इस कथा को इन दो श्लोकों के साथ रखिए। ग्वालों के लोक में वे बन्धु थे, गायें चराने वाला अपना लड़का। वेद में वे पुरुषोत्तम हैं। श्रीकृष्ण ने ग्वालों से यह नहीं कहा कि तुम मुझे पहचानने में भूल कर रहे हो। उन्होंने कहा, पहचान समय पर होगी, अभी प्रेम काफ़ी है। और ध्यान दीजिए, ग्वालों की भक्ति में कोई मोह नहीं था। वे यह नहीं कह रहे थे कि "यह बस मनुष्य है"। वे कह रहे थे, "तुम जो भी हो, हमारे हो, और हम तुम्हारी शरण में हैं"। यही "सर्वभावेन" है। पूरा जान न पाएँ, तो भी पूरा दे देना।

और मधुसूदन सरस्वती, जिन्होंने उन्नीसवें श्लोक पर "मोह" का अर्थ "बस एक मनुष्य मानना" किया, उसी श्लोक की टीका को एक स्तुति पर ख़त्म करते हैं, जिसमें वे इन्हीं गोकुल वालों को याद करते हैं। उसका भाव है: जो चेतना और आनन्द का रूप हैं, जिनकी कान्ति बादल जैसी साँवली है, जो वेद की वाणी का सार हैं, और व्रज की स्त्रियों के गले का हार हैं, जो समझदारों के लिए संसार-सागर का दूसरा किनारा हैं, और धरती का भार उतारने को बार-बार अवतार लेते हैं, उस तेज को बार-बार भजिए। देखिए, एक ही साँस में "वेद की वाणी का सार" भी, और "व्रज की स्त्रियों का हार" भी। यही "लोके वेदे च" है।

हमारे लिए यह बहुत बड़ा भरोसा है। हम में से कोई क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम का पूरा शास्त्र नहीं समझ पाता। पर जो माँ रोज़ सुबह ठाकुर जी को स्नान कराकर भोग लगाती है, और उनसे अपने घर की बात ऐसे करती है जैसे किसी अपने से, वह भी उन्हें "बन्धु" जानकर भज रही है। और श्रीकृष्ण कहते हैं, क्या यही मेरा अनुग्रह नहीं है?

तो इन दो श्लोकों से आज की चौथी बात यह निकलती है: जो रथ पर बैठकर लगाम थामे है, जो गोकुल में गायें चराता है, जो आपके घर के मन्दिर में छोटा-सा बैठा है, वही क्षर से परे और अक्षर से भी उत्तम पुरुषोत्तम है। उसे "बस एक मनुष्य" मानना मोह है। और उसे अपना मानकर पूरे मन से भजना, यही सब कुछ जान लेना है।

पर अभी एक बात बाकी है। इतना कहकर श्रीकृष्ण इस अध्याय पर एक मुहर लगाते हैं। वे इसे एक ऐसा नाम देते हैं जो उन्होंने अब तक किसी अध्याय को नहीं दिया, और अर्जुन को एक ऐसे शब्द से पुकारते हैं जो बताता है कि यह रहस्य किसके हाथ में रखा जाता है।

इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ । एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥ २० ॥
गीता 15.20 — अर्थ पढ़ें ›

और अब इस अध्याय का अन्तिम श्लोक, बीसवाँ। "इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ", हे निष्पाप, इस तरह यह अत्यन्त गुप्त शास्त्र मैंने तुमसे कहा, "एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत", हे भारत, इसे जानकर मनुष्य बुद्धिमान और कृतकृत्य हो जाता है।

एक बात पर ध्यान दीजिए। गीता में "शास्त्र" शब्द यहाँ पहली बार आया है। चौदह अध्याय बीत गए, और श्रीकृष्ण ने अपनी बात को कभी शास्त्र नहीं कहा। और अब, बीस श्लोकों के इस छोटे-से अध्याय के अन्त में, वे कहते हैं, यह शास्त्र है, और सबसे गुप्त शास्त्र। शंकराचार्य इसका कारण बताते हैं। वे कहते हैं, वैसे तो पूरी गीता ही शास्त्र कहलाती है, पर यहाँ इसी अध्याय को शास्त्र कहा गया है, इसकी स्तुति के लिए, क्योंकि गीता का सारा अर्थ इस अध्याय में संक्षेप में आ गया है। और केवल गीता का ही नहीं, सारे वेदों का अर्थ भी यहाँ पूरा हो जाता है। याद कीजिए, इसी अध्याय के पहले श्लोक में कहा था, "यस्तं वेद स वेदवित्", जो उस उल्टे पेड़ को जानता है, वह वेद को जानता है। और पन्द्रहवें में कहा, "वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो", सब वेदों से जानने योग्य मैं ही हूँ। श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती भी यही कहते हैं: इस अध्याय में बीस श्लोक भर नहीं कहे गए, पूरा शास्त्र ही संक्षेप में कह दिया गया।

और अब वह सम्बोधन, "मयानघ", मैंने तुमसे कहा, हे निष्पाप। रामानुजाचार्य कहते हैं, यह सबसे गुप्त बात मैंने तुमसे इसलिए कही, क्योंकि तुम निष्पाप हो, इसलिए सबसे योग्य हो। और श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती निष्पाप का अर्थ करते हैं, जिसमें कोई बुरी लत नहीं, कोई व्यसन नहीं। इसे ध्यान से सुनिए। श्रीकृष्ण अर्जुन से यह नहीं कह रहे कि तुम पूर्ण हो, तुमसे कभी कोई भूल नहीं हुई। अर्जुन ने तो युद्ध की शुरुआत में ही धनुष नीचे रख दिया था। निष्पाप का अर्थ यहाँ है, तुम्हारा मन साफ़ है, तुम सच में जानना चाहते हो, तुम किसी छल से नहीं पूछ रहे। गुप्त बात उसी को कही जाती है जिसका मन खुला हो। और यह शब्द हम सबके लिए एक दरवाज़ा है। यह रहस्य ज्ञान के बड़े भण्डार वालों के लिए नहीं, साफ़ मन वालों के लिए है।

अब "कृतकृत्य", यानी जिसके करने योग्य सब काम हो चुके। नीलकण्ठ कहते हैं, जीवन के जितने लक्ष्य हैं, वे सब परमात्मा को जान लेने में ही पूरे होते हैं, इसके बाद कुछ करना बाकी नहीं रहता। और शंकराचार्य यहाँ चौथे अध्याय की बात याद दिलाते हैं, "सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते", हे पार्थ, सारे कर्म ज्ञान में ही पूरे होते हैं। और रामानुजाचार्य एक ऐसी बात कहते हैं जो हम जैसे साधारण सुनने वालों को बहुत भरोसा देती है। वे कहते हैं, यहाँ जो फल बताया गया, वह इस शास्त्र को समझने से ही मिलता है। यानी जो मन लगाकर, श्रद्धा से इस अध्याय को समझता है, उसका यह सुनना भी व्यर्थ नहीं जाता।

आज के जीवन में "कृतकृत्य" शब्द हम कब सुनते हैं? यह मैं अपनी ओर से कहूँ। बेटी की विदाई के बाद एक पिता हाथ जोड़कर कहता है, "आज मैं कृतकृत्य हो गया"। और उस रात वह सच में चैन से सोता है। पर अगली सुबह नई चिन्ता आ जाती है: बेटी ससुराल में ठीक है न? फिर बेटे की नौकरी, फिर अपनी दवाई। संसार का कृतकृत्य होना एक रात चलता है। श्रीकृष्ण जिस कृतकृत्य की बात करते हैं, वह ऐसा है जिसके बाद भी काम चलते रहते हैं, पर भीतर की वह भूख मिट जाती है कि "अभी कुछ पाना बाकी है"। क्योंकि जो सब कुछ है, वह तो मिल ही गया, अपने दिल में।

संत ज्ञानेश्वर इस अध्याय के अन्त में कहते हैं, यह शास्त्र केवल बोलने का शास्त्र नहीं है। यह संसार को जीतने वाला शस्त्र है, और इसके अक्षर ऐसे मन्त्र हैं जो आत्मा को उतार लाते हैं। और मधुसूदन सरस्वती अध्याय की अपनी टीका कुछ श्लोकों पर पूरी करते हैं, जिनमें पहला ऐसा है कि सुनकर आँखें भर आती हैं। उसका भाव है: जिनके हाथ बाँसुरी से सजे हैं, जिनकी आभा नए बादल जैसी है, जो पीताम्बर पहने हैं, जिनके होंठ पके बिम्ब फल जैसे लाल हैं, जिनका मुख पूर्णिमा के चाँद जैसा सुन्दर है, और आँखें कमल जैसी, "कृष्णात्परं किमपि तत्त्वमहं न जाने", उन कृष्ण से बढ़कर मैं कोई तत्त्व नहीं जानता।

और यहीं पन्द्रहवाँ अध्याय, "पुरुषोत्तम योग", पूरा होता है। एक उल्टे पेड़ से शुरू हुआ था, जिसे काटना था। और एक नाम पर पूरा हुआ, जिसे पकड़ना है। और उस महल में सञ्जय का स्वर अभी थमा नहीं है। धृतराष्ट्र सुन रहे हैं कि जो उनके बेटों के सामने रथ हाँक रहा है, वह सबके दिल में बैठा पुरुषोत्तम है। काश, जिस दिन उन्होंने सञ्जय से पुरुषोत्तम को पाने की इच्छा की थी, उस दिन की वह इच्छा उनके मन में टिकी रहती।

और अगला अध्याय, महाभारत के भीष्म पर्व का चालीसवाँ, "दैवासुर सम्पद् विभाग योग", एक सूची से शुरू होता है, उन गुणों की सूची जो दैवी स्वभाव लेकर जन्मे आदमी में होते हैं: "अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः"। और ध्यान दीजिए, उस सूची का पहला शब्द है "अभयं", निडरता। आज हमने सुना कि वही हर दिल में बैठा है। अगली बार श्रीकृष्ण बताएँगे कि जिसके भीतर वह जागता है, उसका स्वभाव कैसा होता है, और वह सूची निडरता से ही क्यों शुरू होती है। उसका उत्तर अगले सत्संग में।

तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली बात। भगवान दूर नहीं हैं। सूरज की धूप, चाँदनी, चूल्हे की आँच, पैरों के नीचे की धरती, थाली के दाने का स्वाद, और पेट की वह आग जो उसे पचाती है, सबमें वही काम कर रहे हैं। और जब वे एक कण खाते हैं, तो हज़ारों पेट भर जाते हैं, क्योंकि हर पेट में वे पहले से बैठे हैं।

दूसरी बात। वे सबके दिल में हैं। याद भी उन्हीं से है, समझ भी, और भूलना भी। इसलिए जो याद आपको बहुत चुभती थी और अब धीरे-धीरे कोमल हो रही है, उसे भी उन्हीं की कृपा मानिए।

तीसरी बात। बदलने वाला शरीर और न बदलने वाला "मैं", दोनों से ऊपर पुरुषोत्तम हैं, जो सबको प्यारे अतिथि की तरह थामे हैं। उन्हें पूरा समझ न पाएँ, तो भी गोकुल के ग्वालों की तरह कह दीजिए, "तुम जो भी हो, हमारे हो"। श्रीकृष्ण कहते हैं, यही मेरा अनुग्रह है।

आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। क्या आपके घर में भोजन से पहले कोई श्लोक या प्रार्थना बोली जाती है? और क्या कभी ऐसा हुआ कि किसी पल आपको सच में लगा हो कि भगवान आपके दिल में ही बैठे हैं, बाहर नहीं? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।

तुम जो भी हो, हमारे हो, और तुम्हें नमस्कार। यही सब भाव से भजना है।

जय श्री कृष्ण।

सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च । वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥ १५ ॥
गीता 15.15 — अर्थ पढ़ें ›

तीन बातें

  1. भगवान दूर नहीं हैं। सूरज की धूप, चाँदनी, चूल्हे की आँच, पैरों के नीचे की धरती, थाली के दाने का स्वाद, और पेट की वह आग जो उसे पचाती है, सबमें वही काम कर रहे हैं। और जब वे एक कण खाते हैं, तो हज़ारों पेट भर जाते हैं, क्योंकि हर पेट में वे पहले से बैठे हैं।
  2. वे सबके दिल में हैं। याद भी उन्हीं से है, समझ भी, और भूलना भी। इसलिए जो याद आपको बहुत चुभती थी और अब धीरे-धीरे कोमल हो रही है, उसे भी उन्हीं की कृपा मानिए।
  3. बदलने वाला शरीर और न बदलने वाला "मैं", दोनों से ऊपर पुरुषोत्तम हैं, जो सबको प्यारे अतिथि की तरह थामे हैं। उन्हें पूरा समझ न पाएँ, तो भी गोकुल के ग्वालों की तरह कह दीजिए, "तुम जो भी हो, हमारे हो"। श्रीकृष्ण कहते हैं, यही मेरा अनुग्रह है।