उल्टा पीपल
गीता 15.1–15.11 · 75 मिनट
संसार का पेड़ और उसे काटने की कुल्हाड़ी
श्रीभगवानुवाच
ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥ १ ॥
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा
गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।
अधश्च मूलान्यनुसंततानि
कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥ २ ॥
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते
नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा ।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलम्
असङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥ ३ ॥
क्या आपने कभी किसी पुराने पीपल के नीचे बैठकर ऊपर देखा है? हज़ारों पत्ते, एक-दूसरे में उलझी शाखाएँ, और हवा चले तो सारा पेड़ एक साथ काँप उठता है। अब ज़रा सोचिए, अगर यही पेड़ उल्टा हो। जड़ें ऊपर आकाश में, और शाखाएँ नीचे, हमारी ओर, हमारे घरों तक, हमारे मन तक फैली हुई। श्रीकृष्ण कहते हैं, यह संसार ऐसा ही एक उल्टा पीपल है। और आज का सवाल यही है: इस पेड़ में हम कहाँ फँसे हैं, और इसे काटने वाली कुल्हाड़ी कौन-सी है?
जय श्री कृष्ण।
आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का बयालीसवाँ सत्संग है, और आज से गीता का पन्द्रहवाँ अध्याय शुरू होता है। महाभारत के भीष्म पर्व का उनतालीसवाँ अध्याय ही गीता का पन्द्रहवाँ अध्याय है, और उसका नाम है "पुरुषोत्तम योग", यानी उस परम पुरुष को जानने का योग जो सबसे ऊपर है। हमारी टीका की भूमिका कहती है कि यह छोटा-सा अध्याय पूरी गीता के उपदेश को एक चित्र और एक नाम में समेट देता है: एक उल्टा पेड़, और पुरुषोत्तम। और हर बार की तरह याद रखिए कि यह सब हमें सञ्जय सुना रहे हैं, हस्तिनापुर के महल में, अन्धे राजा धृतराष्ट्र को, उस दिन जब भीष्म बाणों की शय्या पर गिर चुके हैं और युद्ध के दस दिन बीत चुके हैं।
पहले याद कर लें कि पिछली बार हम कहाँ रुके थे। इकतालीसवें सत्संग में चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ था। अर्जुन ने पूछा था कि जो तीनों गुणों के पार चला गया, वह कैसा दिखता है, कैसे जीता है, और वहाँ तक पहुँचता कैसे है। श्रीकृष्ण ने उसकी पहचान बताई थी, जो सुख-दुःख में, निन्दा-प्रशंसा में एक-सा रहे, और रास्ता बताया था: "मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते", जो अटल भक्ति से मेरी सेवा करता है, वह इन गुणों के पार चला जाता है। आपको याद होगा, उस दिन हमने अनुशासन पर्व की वह कथा सुनी थी, उस तोते की, जिसने विष से सूखे पेड़ को भी नहीं छोड़ा था। और पिछले सत्संग के अन्त में मैंने पन्द्रहवें अध्याय का पहला श्लोक बस पढ़कर छोड़ दिया था, कि एक पीपल है जिसकी जड़ें ऊपर हैं। आज उसी पेड़ के पास बैठेंगे।
पर एक बात पहले देखिए। यह अध्याय किसी प्रश्न से शुरू नहीं होता। आठवें, बारहवें, चौदहवें अध्याय में अर्जुन ने प्रश्न पूछे थे। यहाँ अर्जुन चुप हैं, और सीधे "श्रीभगवानुवाच", श्रीकृष्ण बोलते हैं। मधुसूदन सरस्वती इस चुप्पी का एक बहुत सुन्दर कारण बताते हैं। वे कहते हैं, चौदहवें अध्याय के अन्त में श्रीकृष्ण ने कहा था, मैं ही ब्रह्म का, अमृत का, धर्म का और परम सुख का आधार हूँ। अर्जुन यह सुनकर विस्मय में डूब गए कि मेरे जैसा दिखने वाला यह मनुष्य ऐसी बात कैसे कह रहा है। और विस्मय में, कुछ भय और संकोच से, वे कुछ पूछ ही नहीं पाए। तब श्रीकृष्ण ने करुणा से, बिना पूछे ही, अपना स्वरूप बताना शुरू किया। और श्रीधर स्वामी बताते हैं कि यह अध्याय यहीं क्यों आता है। पिछले अध्याय में कहा गया कि अटल भक्ति से ब्रह्मभाव मिलता है। पर जिसके मन में संसार से वैराग्य नहीं, उसकी भक्ति भी एकान्त नहीं होती, और ज्ञान भी नहीं टिकता। इसलिए श्रीकृष्ण पहले संसार को एक पेड़ के रूप में दिखाते हैं, ताकि मन उससे थोड़ा हटे।
तो पहला श्लोक। "ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्", ऊपर जड़ और नीचे शाखाओं वाले एक अविनाशी अश्वत्थ वृक्ष की बात कही जाती है। "छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्", वेद के छन्द उसके पत्ते हैं, और जो उसे जानता है, वह वेद को जानने वाला है।
हमारी टीका इसे सीधे खोल देती है: यह वृक्ष संसार है। और उसकी जड़ परमात्मा है, जो सबसे ऊँचा होने से "ऊपर" कहा गया है। सोचिए, कितनी बड़ी बात है। हम जिस संसार में रहते हैं, उसकी जड़ नीचे किसी अँधेरी मिट्टी में नहीं, ऊपर भगवान में है। सब कुछ वहीं से निकला है, वहीं से रस पाता है।
अब "अश्वत्थ" शब्द। हम इसे पीपल जानते हैं, और यह सही भी है। आपको याद होगा, तीसवें सत्संग में दसवें अध्याय की विभूतियों में श्रीकृष्ण ने कहा था: "अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां", सब पेड़ों में मैं अश्वत्थ हूँ। पर यहाँ शंकराचार्य, श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती, तीनों इस शब्द में एक और अर्थ खोलते हैं। वे कहते हैं, "श्वः" यानी आने वाला कल, और अश्वत्थ यानी वह जो कल तक भी टिका नहीं रहेगा। श्रीधर स्वामी लिखते हैं, जो कल सुबह तक भी नहीं रहेगा, इसलिए उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। यह संसार का पेड़ ऐसा ही है। आज जो है, कल वैसा नहीं रहेगा।
पर फिर इसी श्लोक में उसे अव्यय, यानी अविनाशी, क्यों कहा गया? जो कल तक नहीं टिकता, वह अविनाशी कैसे? हमारी टीका इसका उत्तर देती है: उसका प्रवाह अनादि है, इसलिए वह अविनाशी कहलाता है, यद्यपि उसे काटा जा सकता है। संत ज्ञानेश्वर इस पर एक बहुत सुन्दर चित्र देते हैं। वे कहते हैं, जैसे बहती नदी का पानी हर पल आगे निकल जाता है, और पीछे से उतना ही नया पानी आ मिलता है, तो देखने वाले को नदी वैसी की वैसी लगती है। वैसे ही इस पेड़ की एक शाखा सूखकर गिरती है, तो उसी पल करोड़ों नई फूट आती हैं। एक शरीर जाता है, तो दूसरे जन्म लेते हैं। हर पत्ता क्षण भर का है, पर पेड़ सदा हरा दिखता है।
और यह पेड़ उल्टा क्यों है? आचार्य यहाँ अलग-अलग चित्र देते हैं, और हर चित्र कुछ नया दिखाता है। श्रीधर स्वामी कहते हैं, ऊपर की जड़ पुरुषोत्तम हैं, और नीचे की शाखाएँ उनसे निकले ब्रह्मा आदि। रामानुजाचार्य कहते हैं, सातों लोकों के ऊपर बैठे चतुर्मुख ब्रह्मा से यह पेड़ शुरू होता है, और नीचे मनुष्य, पशु, पक्षी, कीड़े और पेड़-पौधों तक फैलता है। और नीलकण्ठ एक ऐसा चित्र देते हैं जो मुझे बहुत प्यारा लगता है। वे कहते हैं, आनन्द की एक सीढ़ी सोचिए। सबसे नीचे मनुष्य का सुख, उससे ऊपर सौ गुना, उससे ऊपर फिर सौ गुना, और सबसे ऊपर वह परम आनन्द जिसके आगे कुछ नहीं। वही इस पेड़ की जड़ है। और उससे नीचे, सीढ़ी के डण्डों की तरह, शाखाएँ उतरती आती हैं। यानी हम जितने नीचे की शाखा पर बैठे हैं, सुख उतना ही पतला है। रस तो जड़ में है।
अब पत्ते। "छन्दांसि यस्य पर्णानि", वेद के छन्द उसके पत्ते हैं। यह अजीब लगता है। वेद तो पवित्र हैं, वे संसार के पेड़ के पत्ते क्यों? हमारी टीका कहती है, जैसे पत्ते पेड़ की रक्षा करते हैं, वैसे ही वेद के कर्मकाण्ड इस संसार को चलाए रखते हैं। रामानुजाचार्य इसे और साफ़ करते हैं। वेद में ऐसे यज्ञ बताए गए हैं जो किसी कामना से किए जाते हैं, धन के लिए, सन्तान के लिए, स्वर्ग के लिए। उन कर्मों से यह पेड़ और बढ़ता है, जैसे पत्तों से पेड़ बढ़ता है। आपको याद होगा, सातवें सत्संग में दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण ने कहा था, "त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन", वेद तीन गुणों के विषयों की बात करते हैं, अर्जुन, तुम तीन गुणों से ऊपर उठो। यहाँ वही बात एक चित्र बनकर आई है।
और फिर श्लोक का अन्त: "यस्तं वेद स वेदवित्", जो इस पेड़ को ऐसे जानता है, वही वेद को जानने वाला है। रामानुजाचार्य कहते हैं, वेद ही इस पेड़ को काटने का उपाय भी बताते हैं, और जिसे काटना है उसका रूप जाने बिना उसे काटा कैसे जाए? इसलिए पेड़ को जानना ही वेद को जानना है। और शंकराचार्य बताते हैं कि यह उल्टे पेड़ का चित्र उपनिषद् में भी है, कठ उपनिषद् में, जहाँ ऊपर जड़ और नीचे शाखाओं वाले सनातन अश्वत्थ की बात आती है।
अब दूसरा श्लोक, जो इस पेड़ को और पास से दिखाता है। "अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा", उसकी शाखाएँ नीचे और ऊपर फैली हुई हैं, "गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः", गुणों से बढ़ी हुई, और विषय उसकी कोंपलें हैं। "अधश्च मूलान्यनुसंततानि", और नीचे भी उसकी जड़ें फैली हैं, "कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके", मनुष्य-लोक में, जो कर्मों से बाँधती हैं।
हमारी टीका कहती है, ये शाखाएँ जन्म हैं, सबसे नीचे से लेकर देवताओं तक। कोई शाखा ऊपर जाती है, देवताओं और गन्धर्वों की ओर, कोई नीचे, पशुओं और पेड़ों की ओर। और ये शाखाएँ बढ़ती किससे हैं? "गुणप्रवृद्धा", गुणों से। श्रीधर स्वामी कहते हैं, सत्त्व, रज और तम पानी की तरह इस पेड़ को सींचते रहते हैं। यानी पिछले सत्संग में जो तीन गुण हमने समझे थे, वे इस पेड़ की सिंचाई हैं। जिस गुण को जितना पानी दिया, शाखा उसी ओर उतनी बढ़ी।
फिर "विषयप्रवालाः"। प्रवाल यानी कोंपल, नई कोमल पत्ती। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, यही इस पेड़ की कोंपलें हैं। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, कोंपलें शाखा के सिरे पर होती हैं, और इन्द्रियाँ ही उन सिरों तक पहुँचती हैं। कोंपल की एक ख़ास बात सोचिए। वह सबसे कोमल होती है, सबसे चमकीली, सबसे सुन्दर। आँख उसी पर जाती है। मैं अपनी ओर से कहूँ, तो आज के जीवन में फ़ोन पर आई हर नई सूचना, हर नई चीज़ जो देखते ही मन को खींच ले, ऐसी ही एक कोंपल है। चमकती है, बुलाती है, और जिस शाखा पर निकली है, उसे थोड़ा और आगे बढ़ा देती है।
अब इस श्लोक की सबसे गहरी बात: नीचे की जड़ें। पहले श्लोक में जड़ ऊपर थी। अब कहा कि नीचे भी जड़ें हैं, मनुष्य-लोक में। हमारी टीका इन्हें साफ़ बताती है: ये नीचे की जड़ें पिछले कर्मों से बनी वासनाएँ और संस्कार हैं, जो मनुष्य-लोक में, जहाँ कर्म किया जाता है, फिर से कर्म उपजाते हैं। नीलकण्ठ इसे एक चक्र की तरह कहते हैं: वासना से कर्म, और कर्म से फिर वासना, बिना रुके। जैसे बीज से अंकुर, और अंकुर से फिर बीज। हमारी आदतें ऐसे ही बनती हैं। एक बार किया, फिर मन हुआ, फिर किया, और जड़ भीतर उतरती गई।
पर इस श्लोक में एक बड़ा भरोसा भी छिपा है। ये जड़ें "मनुष्यलोके" हैं, मनुष्य-लोक में। शंकराचार्य और श्रीधर स्वामी कहते हैं, कर्म करने का अधिकार इसी मनुष्य-लोक में है, दूसरे लोकों में नहीं। यानी जहाँ बाँधने वाली जड़ें हैं, वहीं काटने वाला हाथ भी है। पशु अपनी आदत नहीं बदल सकता, देवता अपने भोग में डूबे हैं। मनुष्य ही वह जगह है जहाँ इस पेड़ की जड़ तक पहुँचा जा सकता है।
और अब तीसरा श्लोक। "न रूपमस्येह तथोपलभ्यते", इसका रूप यहाँ वैसा नहीं दिखता, "नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा", न इसका अन्त दिखता है, न आदि, न यह कि यह टिका किस पर है। "अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलम्", इस बहुत गहरी जड़ों वाले अश्वत्थ को, "असङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा", असंगता के दृढ़ शस्त्र से काटकर।
पहली पंक्ति पर रुकिए। श्रीकृष्ण ने अभी इस पेड़ का इतना सुन्दर वर्णन किया, और अब कहते हैं कि यहाँ बैठे किसी को इसका यह रूप दिखता ही नहीं। तो हमें दिखता क्या है? रामानुजाचार्य इसका उत्तर ऐसे देते हैं कि सुनकर अपने ऊपर हल्की मुस्कान आ जाती है। वे कहते हैं, संसार में बैठे आदमी को बस इतना दिखता है: मैं मनुष्य हूँ, फ़लाने का बेटा हूँ, फ़लाने का पिता हूँ, और यह मेरा घर-बार है। बस। पूरा पेड़ नहीं दिखता, अपनी एक टहनी दिखती है, और उस टहनी पर अपना छोटा-सा घोंसला। न यह दिखता कि यह पेड़ कब से है, न यह कि कहाँ तक जाएगा, न यह कि किस पर टिका है।
शंकराचार्य और मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, इसका रूप सपने जैसा है, मृगतृष्णा के पानी जैसा। और संत ज्ञानेश्वर यहाँ एक ऐसा चित्र देते हैं जो डर को ही हल्का कर देता है। वे कहते हैं, इतने बड़े पेड़ को उखाड़ने की बात सुनकर तुम डरो मत, अर्जुन। जो हौआ बच्चे को डराता है, उसे भगाने के लिए कोई बड़ी मेहनत करनी पड़ती है क्या? और फिर कहते हैं, जब तक जागना नहीं होता, तब तक नींद का कोई अन्त है क्या? वैसे ही जब तक भीतर विवेक सिर नहीं उठाता, तब तक इस पेड़ का अन्त नहीं दिखता।
और फिर वह शब्द आता है जिस पर यह पूरा प्रसंग टिका है: "असङ्गशस्त्रेण", असंगता का शस्त्र, यानी आसक्ति न रखने की कुल्हाड़ी। और वह कुल्हाड़ी "दृढेन", मज़बूत होनी चाहिए, क्योंकि पेड़ "सुविरूढमूलम्" है, उसकी जड़ें बहुत गहरी जमी हैं। यह कुल्हाड़ी मज़बूत कैसे बनती है? हमारी टीका कहती है: यह शस्त्र परमात्मा की ओर दृढ़ता से मुड़ने और बार-बार विवेक का अभ्यास करने से दृढ़ होता है। शंकराचार्य इसे धार लगाने के चित्र से कहते हैं: पुत्र की, धन की, और ऊँचे लोकों की चाह से ऊपर उठना, यही असंगता है, और उसे बार-बार विवेक के पत्थर पर घिसकर पैना किया जाता है।
और अब मैं आपको महाभारत का एक ऐसा प्रसंग सुनाता हूँ जिसमें यही पेड़ फिर से आता है, और श्रीकृष्ण ही उसे फिर से सुनाते हैं। युद्ध के बाद, जब अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा कि जो आपने युद्ध में बताया था, वह मेरे विचलित मन से छूट गया, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें अनुगीता सुनाई। उसमें एक प्रसंग है, एक बुद्धिमान शिष्य का, जो अपने गुरु के पास जाकर हाथ जोड़कर पूछता है: मैं कहाँ से आया, आप कहाँ से आए, ये सब प्राणी कहाँ से उपजे? और गुरु उत्तर में एक पेड़ का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं, एक विशाल वृक्ष है, जो अव्यक्त बीज से उपजा है। बुद्धि उसका तना है, अहंकार उसकी बड़ी डालियाँ, इन्द्रियाँ उसके अंकुर और कोटर, और पाँच महाभूत उसकी शाखाएँ। वह सदा पत्तों से भरा रहता है, सदा फूलों से, और शुभ और अशुभ, दोनों फल देता है। सब प्राणी उसी से जीते हैं, उसका बीज ब्रह्म है, और वह सनातन है। और फिर गुरु कहते हैं, इसे और इन तत्त्वों को जानकर, ज्ञान की परम तलवार से इसे काटकर, मनुष्य अमरता पाता है, और जन्म और मृत्यु दोनों को छोड़ देता है।
लोकमान्य तिलक ने अपनी टीका में अनुगीता के इसी ब्रह्मवृक्ष की ओर ध्यान दिलाया है। गीता का अश्वत्थ और अनुगीता का यह वृक्ष, एक ही संसार के दो चित्र हैं। पर एक अन्तर देखिए। गीता कहती है "असङ्गशस्त्रेण", असंगता का शस्त्र। अनुगीता कहती है, ज्ञान की परम तलवार। ये दो अलग हथियार नहीं हैं। शंकराचार्य ने जो कहा, वही याद कीजिए: असंगता की कुल्हाड़ी विवेक के पत्थर पर पैनी होती है। यानी ज्ञान धार है, और असंगता उसकी पकड़। बिना धार की कुल्हाड़ी पेड़ पर बस चोट करती है, काटती नहीं। और बिना पकड़ की धार हाथ से छूट जाती है।
और उसी गुरु ने वहीं कहा था: जो कुछ नहीं चाहता, और कुछ भी अपना नहीं मानता, वह यहीं संसार में रहते हुए ब्रह्मभाव के योग्य हो जाता है। यानी यह पेड़ काटने के लिए जंगल नहीं जाना पड़ता। उसी घर में, उसी दफ़्तर में, भीतर की पकड़ ढीली करनी होती है।
तो पहली बात यह: इस पेड़ की जड़ भगवान में है, गुण इसे सींचते हैं, और इसकी नीचे की जड़ें हमारी ही आदतों में उतरी हैं। हमें बस अपनी एक टहनी दिखती है, और उसे ही हम पूरा संसार मान बैठते हैं।
पर अभी एक बात बाकी है। आपने ध्यान दिया होगा, तीसरा श्लोक "छित्त्वा" पर ख़त्म हुआ, यानी "काटकर"। वाक्य पूरा नहीं हुआ। काटकर फिर क्या? पेड़ कट गया, तो आदमी खड़ा कहाँ होगा? हमारी टीका कहती है कि तीसरा और चौथा श्लोक मिलकर एक ही वाक्य हैं। और उस वाक्य का दूसरा हिस्सा वह है जिसके बिना कुल्हाड़ी चलाना ही अधूरा है।
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं
यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः ।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये
यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥ ४ ॥
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा
अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्
गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥ ५ ॥
और इससे पहले कि हम चौथे श्लोक में उतरें, एक छोटी-सी बात आपसे कहना चाहता हूँ। अब तक हमने पेड़ देखा, उसकी जड़ें देखीं, और कुल्हाड़ी उठती हुई देखी। आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। जो आदमी यहीं उठ जाए, वह सोचेगा कि गीता बस इतना कहती है, सब छोड़ दो, सब काट दो। और फिर वह या तो डर जाएगा, या रूखा हो जाएगा। जबकि असली बात, कि काटने के बाद आदमी कहाँ खड़ा होता है, किसकी शरण में, और उसका अपना असली रूप क्या है, यह अभी आगे है। तो अगर आप यह सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की यह यात्रा बीच में न छूटे। और आज का यह सत्संग आख़िर तक सुनिए।
अब चौथा श्लोक, जो तीसरे का वाक्य पूरा करता है। "ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं", उसके बाद उस पद को खोजना चाहिए, "यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः", जहाँ गए हुए फिर नहीं लौटते, "तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये", यह भाव रखकर कि मैं उसी आदि पुरुष की शरण लेता हूँ, "यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी", जिससे यह पुरानी प्रवृत्ति फैली है।
पहला शब्द "ततः", उसके बाद। कुल्हाड़ी चल गई, अब आगे क्या? नीलकण्ठ यहाँ एक बहुत ज़रूरी बात कहते हैं। वे कहते हैं, केवल असंगता से, केवल पकड़ छोड़ देने से, आदमी कृतार्थ नहीं हो जाता। काटने के बाद खोजना पड़ता है। सोचिए, अगर कोई अपने पुराने घर से निकल आए, और उसके पास जाने को कोई नया घर न हो, तो वह आज़ाद नहीं, बेघर है। गीता किसी को बेघर नहीं करती। एक हाथ से पेड़ काटने को कहती है, तो दूसरे हाथ से वह जगह दिखाती है जहाँ जाना है।
"परिमार्गितव्यं", खोजना चाहिए। यह शब्द बड़ा सुन्दर है। मार्ग से बना है, यानी रास्ता ढूँढ़ना, जैसे कोई खोई चीज़ को चारों ओर ढूँढ़ता है। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, यह खोज गुरु के पास जाकर, शास्त्र के वचनों पर विचार करके होती है। और श्रीधर स्वामी कहते हैं, यह खोज एकान्त भक्ति से होती है, "मैं उसकी शरण हूँ" इस भाव से।
और वह पद कैसा है? "यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः", जहाँ से कोई लौटता नहीं। आपको याद होगा, चौबीसवें सत्संग में आठवें अध्याय का वह भरोसा सुना था: "आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन", ब्रह्मा के लोक तक के सब लोक लौटकर आने वाले हैं, "मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते", पर मुझे पाकर फिर जन्म नहीं होता। यहाँ वही पद फिर सामने है।
अब तीसरी पंक्ति पर ध्यान दीजिए, क्योंकि यहाँ कुछ अनोखा होता है। "तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये"। "प्रपद्ये" का अर्थ है, मैं शरण लेता हूँ। "मैं"। श्रीकृष्ण अर्जुन से बात करते-करते अचानक "मैं" बोलने लगते हैं। शंकराचार्य बताते हैं कि यहाँ अर्थ यह है: उस पद को इस भाव से खोजना चाहिए कि "मैं उसी आदि पुरुष की शरण लेता हूँ"। यानी श्रीकृष्ण यहाँ हमारे मुँह में एक वाक्य रख रहे हैं। जैसे कोई माँ बच्चे को प्रार्थना सिखाते हुए ख़ुद बोलकर दिखाती है, "बोलो बेटा, ऐसे कहो"। नीलकण्ठ भी कहते हैं कि यह वचन लोगों को सिखाने के लिए है। लोकमान्य तिलक बताते हैं कि कुछ पाठों में यहाँ "शरण लेनी चाहिए" जैसा अर्थ भी पढ़ा गया है। पर जो पाठ हमारे सामने है, उसमें "प्रपद्ये" है, और मुझे यही बहुत प्यारा लगता है। गीता यहाँ उपदेश देती-देती प्रार्थना बन जाती है।
और अन्तिम पंक्ति: "यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी", जिससे यह पुरानी प्रवृत्ति, यह संसार का पुराना बहाव निकला है। शंकराचार्य इसकी तुलना एक जादूगर से करते हैं, जिससे उसका सारा माया का खेल निकलता है। पर नीलकण्ठ यहाँ जो कहते हैं, वह मुझे इस श्लोक की सबसे गहरी बात लगती है। वे उपनिषद् की वह पुरानी बात याद करते हैं कि सृष्टि के आरम्भ में उस एक ने चाहा, मैं बहुत हो जाऊँ। और नीलकण्ठ कहते हैं, वही पुरानी चाह बहती हुई हम तक भी आ गई है। इसीलिए हम भी चाहते हैं, धन से और बढ़ें, परिवार से और फैलें, और, और, और। यह "और" की भूख कहाँ से आती है, यह आपने कभी सोचा है? नीलकण्ठ कहते हैं, यह उसी आदि पुरुष से बही है। और जिसने यह चाह चलाई, उसी को प्रणाम करने से यह शान्त होगी।
इसलिए यह श्लोक कुल्हाड़ी और शरण को एक साथ रखता है। रामानुजाचार्य यहाँ पूछते हैं, जो आसक्ति अनादि काल से चली आ रही है, उसकी जड़ में जो उल्टा ज्ञान है, वह छूटेगा कैसे? और उत्तर देते हैं: उसी आदि पुरुष की शरण लेने से। फिर वे सातवें अध्याय की वही बात याद करते हैं, जो पिछली बार भी हमने सुनी थी, कि तीन गुणों वाली यह माया पार करनी कठिन है, पर जो मेरी शरण आते हैं, वे इसे पार कर जाते हैं। यानी कुल्हाड़ी हमारे हाथ में है, पर उसे उठाने का बल शरण से आता है।
आज के जीवन में यह कैसा दिखता है, यह मैं अपनी ओर से एक उदाहरण देकर कहूँ। एक आदमी है जो बरसों से किसी एक बात पर अटका है, किसी पुराने अपमान पर, किसी के छोड़ जाने पर। वह हर सुबह तय करता है, आज से उसके बारे में नहीं सोचूँगा। और दोपहर तक फिर वहीं होता है। क्योंकि वह बस काटने की कोशिश कर रहा है, और मन के पास जाने की कोई दूसरी जगह नहीं है। जिस दिन वह उस खाली जगह में कुछ और रख देता है, भगवान का नाम, किसी की सेवा, कोई ऐसा काम जो उसे अपने से बड़ा लगे, उस दिन पुरानी बात की पकड़ अपने आप ढीली होने लगती है। ख़ाली हाथ से पुरानी डाल नहीं छूटती। दूसरा सहारा मिलते ही हाथ खुल जाता है।
अब पाँचवाँ श्लोक, जो बताता है कि उस पद तक पहुँचने वाले कैसे होते हैं। "निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा", मान और मोह से रहित, आसक्ति के दोष को जीते हुए, "अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः", सदा आत्मा में लगे, कामनाओं से लौटे हुए, "द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्", सुख-दुःख नाम वाले द्वन्द्वों से मुक्त, "गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्", ऐसे मोह-रहित लोग उस अविनाशी पद को जाते हैं।
एक-एक शब्द को देखिए। "निर्मान", मान से रहित। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, मान यानी अहंकार, घमण्ड। और "मोह" यानी विवेक का न होना, चीज़ों को उल्टा देखना। मान और मोह साथ-साथ क्यों रखे गए? शायद इसलिए कि दोनों एक-दूसरे को पालते हैं। जो अपने को बहुत बड़ा मानता है, वह साफ़ देख नहीं पाता, और जो साफ़ नहीं देखता, वह छोटी-छोटी बातों को अपनी इज़्ज़त का सवाल बना लेता है।
"जितसङ्गदोषा", जिन्होंने आसक्ति के दोष को जीत लिया। मधुसूदन सरस्वती इसका अर्थ बड़ा व्यावहारिक करते हैं: प्रिय और अप्रिय चीज़ पास हो, तब भी राग और द्वेष न उठे। यानी यह परीक्षा तब नहीं होती जब मिठाई दूर रखी हो। तब होती है जब सामने रखी हो। "अध्यात्मनित्या", शंकराचार्य कहते हैं, सदा परमात्मा के स्वरूप के चिन्तन में लगे। "विनिवृत्तकामाः", जिनकी कामनाएँ पूरी तरह लौट गई हैं।
और फिर एक बहुत बारीक शब्द: "सुखदुःखसंज्ञैर्", सुख-दुःख नाम वाले द्वन्द्व। श्रीधर स्वामी कहते हैं, सर्दी-गर्मी जैसे द्वन्द्व सुख-दुःख देते हैं, इसलिए उन्हें सुख-दुःख का नाम मिल गया है। यह सुनकर मुझे लगता है जैसे श्रीकृष्ण कह रहे हों, ये बस नाम हैं, संज्ञाएँ हैं, लेबल हैं। एक ही बारिश किसान के लिए सुख का नाम पाती है और बारात वाले के लिए दुःख का। चीज़ एक, नाम दो। जो नाम के पीछे की चीज़ को देख लेता है, वह नाम से हिलता कम है।
संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर कहते हैं, जिनका मन मान और मोह को ऐसे छोड़ देता है, जैसे बरसात के अन्त में बादल आकाश को छोड़ देते हैं। और फिर एक ऐसा चित्र देते हैं जो आज के पेड़ के प्रसंग में बहुत सटीक बैठता है। वे कहते हैं, जैसे पेड़ में आग लगी देखकर पक्षी इधर-उधर उड़ जाते हैं, वैसे ही उनके मन से सारे विकल्प उड़ गए होते हैं।
और इसी श्लोक से मिलती-जुलती बात अनुगीता में भी है, उसी प्रसंग में जहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को एक सिद्ध महात्मा की बातें सुनाते हैं। वह सिद्ध मुक्त पुरुष के लक्षण बताते हुए कहता है: जो मान और अभिमान से रहित है, जो जीवन और मृत्यु में, सुख और दुःख में, लाभ और हानि में, प्रिय और अप्रिय में एक-सा रहता है, जो न किसी की चाह करता है, न किसी का तिरस्कार, जो द्वन्द्वों से रहित और राग-रहित मन वाला है, वह सब प्रकार से मुक्त ही है। देखिए, युद्ध से पहले श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो बताया, युद्ध के बाद भी वही बात दूसरे शब्दों में लौटकर आती है। सच्ची बात बदलती नहीं, बस उसके कपड़े बदलते हैं।
पर इतने ऊँचे लक्षण सुनकर कोई सोच सकता है, ये तो बड़े संन्यासियों की बात है, मेरे जैसे आदमी के बस की कहाँ। रामानुजाचार्य इस डर का उत्तर देते हैं, और यही इस श्लोक की सबसे बड़ी सांत्वना है। वे कहते हैं, ये सब लक्षण उन लोगों के हैं जो पहले मेरी शरण आए। और जो मेरी शरण आ जाते हैं, उनके लिए मेरी कृपा से ये सब बातें सहज हो जाती हैं, और अन्त तक पूरी होती हैं। क्रम देखिए। चौथा श्लोक पहले आया, "प्रपद्ये", मैं शरण लेता हूँ। पाँचवाँ उसके बाद, ये गुण। यानी ये गुण शरण की शर्त नहीं हैं, शरण का फल हैं। पहले हाथ पकड़ा जाता है, फिर चलना सधता है।
और श्लोक के अन्त में एक शब्द है, "गच्छन्त्यमूढाः", यानी अमूढ़ लोग, जो मोह में नहीं, वे जाते हैं। इस शब्द को याद रखिएगा, क्योंकि आज के आख़िरी श्लोकों में इसका उल्टा, "विमूढा", फिर आएगा, और वहाँ पता चलेगा कि मोह किस चीज़ को देखने नहीं देता।
तो इन दो श्लोकों से दूसरी बात यह निकलती है: काटना अकेले काफ़ी नहीं, काटने के बाद खोजना है, और वह खोज एक छोटे-से वाक्य से शुरू होती है जो श्रीकृष्ण ने ख़ुद हमारे मुँह में रखा है, "मैं उसी आदि पुरुष की शरण लेता हूँ"। और जो शरण आता है, उसके लिए मान, मोह और आसक्ति छोड़ना उसकी अपनी कमाई नहीं रहता, कृपा बन जाता है।
पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने कहा, वे उस अविनाशी पद को जाते हैं। पर वह पद है कैसा? वहाँ उजाला किसका है? महाभारत में अर्जुन एक बार सचमुच एक ऐसे लोक में गए थे जहाँ न सूरज चमकता था, न चाँद, न आग। तो क्या वही श्रीकृष्ण का परम धाम था? अगले श्लोक में इसका उत्तर है, और उस उत्तर में एक ऐसा अन्तर छिपा है जो हमारी सारी पूजा-पाठ की दिशा बदल सकता है।
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ ६ ॥
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥ ७ ॥
छठा श्लोक। "न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः", उसे न सूर्य प्रकाशित करता है, न चन्द्रमा, न अग्नि। "यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम", जहाँ जाकर लोग नहीं लौटते, वह मेरा परम धाम है।
हमारी टीका एक वाक्य में इसका रहस्य खोल देती है: वह स्वयं प्रकाश है, इसलिए उसे दिखाने के लिए किसी और प्रकाश की आवश्यकता नहीं। मधुसूदन सरस्वती इसे बड़े ध्यान से खोलते हैं। वे कहते हैं, सोचिए, सूरज सब कुछ दिखाता है, पर उसे नहीं दिखा सकता। आप कहेंगे, सूरज डूब जाए तो चाँद दिखाता है। चाँद भी नहीं। और दोनों डूब जाएँ, तो आग दिखाती है। आग भी नहीं। क्यों? क्योंकि जो चीज़ किसी के प्रकाश से दिखती है, वह उसी को नहीं दिखा सकती जिसके प्रकाश से वह ख़ुद चमक रही है। संत ज्ञानेश्वर कहते हैं, ये सूर्य और चन्द्रमा जैसे बड़े-बड़े तेज भी उसी के आधार पर चमकते हैं।
रामानुजाचार्य इसे हमारे अपने भीतर ले आते हैं। वे कहते हैं, ज्ञान ही सबको प्रकाशित करता है। बाहर के ये सब उजाले, सूर्य, चन्द्रमा, आग, बस इतना करते हैं कि आँख और चीज़ के बीच का अँधेरा हटा देते हैं। पर देखता कौन है? आप दीया जलाकर कमरे में एक किताब देखते हैं। दीये ने अँधेरा हटाया, ठीक। पर किताब को "देखा" किसने? उस भीतर वाले ने, जिसके सामने दीया भी एक चीज़ है। और नीलकण्ठ यहाँ एक बड़ा सुन्दर मेल बिठाते हैं। वे कहते हैं, सूर्य आँख की सहायता करता है, चन्द्रमा मन की, और अग्नि वाणी की। और वह धाम न आँख से दिखता है, न मन से सोचा जाता है, न वाणी से कहा जाता है। लोकमान्य तिलक बताते हैं कि यही श्लोक लगभग इन्हीं शब्दों में कठ, मुण्डक और श्वेताश्वतर उपनिषदों में भी मिलता है।
और अब वह कथा जिसकी ओर मैंने पिछली बार इशारा किया था। वनवास के दिनों में अर्जुन दिव्य अस्त्र पाने के लिए हिमालय गए थे। लोकपालों के चले जाने के बाद वे इन्द्र के रथ के आने की बात सोच ही रहे थे कि मातलि से जुता, आकाश के अँधेरे को चीरता हुआ एक चमकता रथ आ पहुँचा। मातलि ने झुककर कहा, आपके पिता इन्द्र आपको देखना चाहते हैं। मेरे साथ देवलोक चलिए। और फिर एक वाक्य कहा जिसे आज के श्लोक के साथ रखकर सुनिए: "लब्धास्त्रः पुनरेष्यसि", अस्त्र पाकर आप फिर लौट आएँगे।
अर्जुन ने गंगा में स्नान किया, पितरों का तर्पण किया, और मन्दर पर्वत से विदा ली, यह कहकर कि मैं तुम्हारी ढलानों पर ऐसे खेला हूँ जैसे बालक पिता की गोद में। फिर रथ ऊपर उठा। पाठ कहता है, वे धरती पर चलने वाले मनुष्यों की आँखों से ओझल हो गए, और उन्होंने हज़ारों अद्भुत विमान देखे। और अब यह सुनिए। पाठ कहता है: वहाँ न सूर्य चमकता है, न चन्द्रमा, न अग्नि। वहाँ सब अपनी ही प्रभा से चमकते हैं, जो पुण्य से पाई गई है। और जो चमकती ज्योतियाँ हमें धरती से तारों के रूप में दिखती हैं, बहुत बड़ी होने पर भी दूर होने से छोटी दिखती हैं, वे वहाँ अपनी-अपनी जगह अपनी ज्योति से जगमगा रही थीं। अर्जुन विस्मय से भर गए और मातलि से पूछा। मातलि ने कहा: पार्थ, ये पुण्यात्मा हैं। धरती से आपने इन्हें तारों के रूप में देखा है।
अब सोचिए। अगली बार जब आप रात को छत पर खड़े होकर तारे देखें, तो महाभारत कहता है, वे पुण्य करने वालों के लोक हैं। कितना सुन्दर चित्र है। पर अब इसे आज के श्लोक के साथ रखिए। स्वर्ग का वर्णन भी लगभग वही है जो परम धाम का: सूर्य नहीं, चन्द्र नहीं, अग्नि नहीं। तो क्या स्वर्ग ही वह परम धाम है? नहीं। दो अन्तर हैं, और दोनों इसी कथा में छिपे हैं।
पहला अन्तर: स्वर्ग का प्रकाश "पुण्य से पाया गया" है। कमाया हुआ। और जो कमाया जाता है, वह ख़र्च भी होता है। अनुगीता में एक सिद्ध महात्मा काश्यप को यही बताते हैं। वे कहते हैं, ये सब तारे, यह चन्द्रमण्डल, और जहाँ सूर्यमण्डल अपनी दीप्ति से चमकता है, इन्हें पुण्य कर्म वाले लोगों के स्थान जानो। पर कर्मों के क्षीण होने पर वे सब बार-बार वहाँ से गिरते हैं। और फिर एक ऐसी बात कहते हैं जो मन को छू जाती है: वहाँ भी, और अधिक चमकती शोभा देखकर सन्तोष नहीं होता। यानी स्वर्ग में भी किसी का तारा किसी और से कम चमकता है, और वहाँ भी मन तुलना करता है। आपको याद होगा, छब्बीसवें सत्संग में नौवें अध्याय की यही बात सुनी थी: "क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति", पुण्य क्षीण होने पर वे फिर मनुष्य-लोक में आ जाते हैं।
दूसरा अन्तर, मातलि के उसी वाक्य में: "पुनरेष्यसि", तुम फिर लौट आओगे। स्वर्ग की यात्रा में लौटने का टिकट साथ बँधा था। और आज के श्लोक का दूसरा आधा ठीक यहीं पर उल्टा खड़ा है: "यद्गत्वा न निवर्तन्ते", जहाँ जाकर कोई नहीं लौटता। स्वर्ग का उजाला उधार का है, उस धाम का उजाला उसका अपना है। उधार की रोशनी लौटानी पड़ती है, अपनी रोशनी कहीं नहीं जाती।
पर यहाँ एक सवाल उठता है, और शंकराचार्य ख़ुद यह सवाल उठाते हैं। वे कहते हैं, यह तो सब जानते हैं कि हर जाना लौटने में ख़त्म होता है, और हर मिलन बिछड़ने में। आपको याद होगा, पाँचवें सत्संग में विदुर का धृतराष्ट्र से कहा वह वाक्य सुना था, "पतनान्ताः समुच्छ्रयाः", हर ऊँचाई का अन्त गिरने में है, और हर मिलन का अन्त बिछड़ने में। मधुसूदन सरस्वती भी यही वाक्य उठाकर पूछते हैं। तो फिर किसी जगह जाकर कोई कभी न लौटे, यह कैसे हो सकता है? इसका उत्तर अगले ही श्लोक में है, और शंकराचार्य कहते हैं, "सुनो, इसका कारण यह है"।
सातवाँ श्लोक। "ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः", मेरा ही सनातन अंश जीव-लोक में जीवात्मा बना हुआ है, "मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति", और वह प्रकृति में स्थित मन सहित पाँच इन्द्रियों को अपनी ओर खींचता है।
पहले शब्द पर रुकिए: "ममैव", मेरा ही। श्रीकृष्ण यह नहीं कहते कि जीव मेरा बनाया हुआ है, या मेरा सेवक है, या मुझसे अलग कोई प्राणी है। वे कहते हैं, मेरा ही अंश। मेरा अपना हिस्सा। जो आदमी कभी अपने को बहुत छोटा, बहुत अकेला, बहुत दूर का समझता है, उसके लिए गीता में इससे बड़ा भरोसा कम ही है। आप इस संसार में किसी के बिछड़े हुए नहीं हैं, किसी के भूले हुए नहीं हैं। आप उसके अपने हैं, और "सनातन", सदा से।
अब "अंश" का अर्थ क्या है? यहाँ आचार्य दो रास्तों से चलते हैं, और हमारी टीका दोनों को साथ रखती है। कुछ "अंश" को घड़े के भीतर के आकाश जैसा मानते हैं, जो घड़े के कारण ही अलग भाग लगता है, और घड़ा न रहे तो केवल आकाश है। दूसरे इसे भगवान का वास्तविक और सनातन अंश मानते हैं, जो स्वभाव में उनके समान होकर भी सदा उनसे भिन्न और उनका सेवक है। शंकराचार्य पहले रास्ते से चलते हैं, और इसी से पिछले सवाल का उत्तर देते हैं। वे कहते हैं, जैसे पानी में सूरज की परछाईं सूरज का ही अंश है। पानी सूख जाए, तो परछाईं कहाँ जाती है? सूरज में ही मिल जाती है, और फिर वहाँ से लौटती नहीं। जैसे घड़ा फूटे, तो घड़े का आकाश बड़े आकाश में मिल जाता है, लौटता नहीं। इसलिए उस धाम में जाना असल में कहीं जाना नहीं, अपने घर लौटना है। और जो अपने घर लौट आया, उसके लिए फिर लौटने को कोई दूसरी जगह ही नहीं।
संत ज्ञानेश्वर इसी को अपने चित्रों में कहते हैं। जो नदियाँ समुद्र में मिल गईं, वे पीछे पाँव नहीं लौटातीं। नमक की पुतली नमक के समुद्र में उतार दी जाए, तो वह लौटकर नहीं आती। आग की लपटें आकाश में चली जाएँ, तो वापस नहीं आतीं। और रामानुजाचार्य दूसरे रास्ते से उतना ही प्यारा अर्थ देते हैं। वे कहते हैं, जीव भगवान का सचमुच सनातन अंश है, पर अनादि कर्म के आवरण से उसका ज्ञान बहुत सिकुड़ गया है, इसलिए वह अपने को छोटा मानता है और इन्द्रियों के पीछे इधर-उधर खिंचता है। और जो इस आवरण से छूट जाता है, वह अपने असली रूप में ठहर जाता है। एक अर्थ कहता है, लहर समुद्र ही है; दूसरा कहता है, बच्चा माँ का अपना है, फिर भी बच्चा है। मैं इनमें से किसी का पक्ष नहीं लेता। दोनों रास्ते एक ही जगह पहुँचाते हैं: आप पराए नहीं हैं।
अब श्लोक का दूसरा आधा: "मनःषष्ठानीन्द्रियाणि", मन जिनमें छठा है, ऐसी इन्द्रियाँ, यानी कान, आँख, त्वचा, जीभ, नाक, और मन। "प्रकृतिस्थानि कर्षति", जो प्रकृति में स्थित हैं, उन्हें यह जीव अपनी ओर खींचता है। लोकमान्य तिलक कहते हैं, इसी को सूक्ष्म शरीर कहा जाता है।
"कर्षति", खींचता है। श्रीधर स्वामी यहाँ एक ऐसी बात कहते हैं जो हमारी रोज़ की नींद से जुड़ी है। वे कहते हैं, गहरी नींद में और प्रलय में सब जीव एक तरह से मुझमें ही लीन होते हैं, क्योंकि वे मेरे अंश हैं। पर अज्ञान से ढके हुए, अपनी वासनाओं के साथ। इसलिए वे फिर जागते हैं, और प्रकृति में सोई पड़ी इन्द्रियों को फिर से खींच लाते हैं। ज़रा अपनी सुबह को याद कीजिए। गहरी नींद में न कोई चिन्ता थी, न कोई दुश्मन, न कोई कर्ज़। और आँख खुलते ही, एक पल में, सब लौट आता है। हाथ फ़ोन की ओर जाता है, मन कल की बात की ओर, कान बाहर की आवाज़ की ओर। यही "कर्षति" है, जीव का अपनी इन्द्रियों को फिर से खींचकर संसार में उतर आना। और श्रीधर स्वामी कहते हैं, ज्ञानी का उनमें लीन होना शुद्ध होता है, इसलिए वह लौटता नहीं।
तो इन दो श्लोकों से तीसरी बात यह निकलती है: स्वर्ग का उजाला भी कमाया हुआ है और लौटने वाला है, पर उस धाम का उजाला उसका अपना है। और हम उस धाम के लिए पराए नहीं, क्योंकि "ममैवांशो", हम उसी के अंश हैं। वहाँ जाना कहीं दूर जाना नहीं, घर लौटना है।
पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने कहा, जीव इन्द्रियों को खींचता है। पर कब? और खींचकर ले कहाँ जाता है? जब कोई इस शरीर को छोड़ता है, तो क्या ये आँख, कान, मन भी यहीं छूट जाते हैं? अगले श्लोक में श्रीकृष्ण इसका उत्तर एक ऐसे चित्र से देते हैं जिसे आपने हज़ार बार अनुभव किया है, पर शायद कभी इस तरह सोचा नहीं: फूलों के पास से गुज़रती हवा।
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥ ८ ॥
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥ ९ ॥
आठवाँ श्लोक। "शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः", जब शरीर का स्वामी शरीर को पाता है, और जब उसे छोड़कर निकलता है, "गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्", तब वह इन्हें साथ लेकर चला जाता है, जैसे हवा फूलों से गन्ध ले जाती है।
पहले एक शब्द पर ध्यान दीजिए जो चौंकाता है: "ईश्वरः"। हम ईश्वर शब्द भगवान के लिए सुनते हैं। पर यहाँ शंकराचार्य और श्रीधर स्वामी बताते हैं कि ईश्वर का अर्थ है इस शरीर और इन्द्रियों का स्वामी, यानी जीव। सोचिए, गीता आपको यहाँ "ईश्वर" कहकर पुकार रही है। आप इस शरीर के मालिक हैं, शरीर आपका मालिक नहीं। आँख, कान, मन, ये सब आपके सेवक हैं, जिन्हें आप साथ लेकर आते हैं और साथ लेकर जाते हैं।
और अब वह चित्र। "वायुर्गन्धानिवाशयात्", जैसे हवा गन्ध को उसके आशय से, उसके ठिकाने से ले जाती है। रामानुजाचार्य यहाँ ठिकाने गिनाते हैं: फूलों की माला, चन्दन, कस्तूरी। हवा उनके पास से गुज़रती है, और उनके सूक्ष्म कणों के साथ उनकी गन्ध लेकर दूसरी जगह पहुँचा देती है। ज़रा इस चित्र को धीरे से देखिए। हवा फूल को नहीं उठाती। फूल वहीं रह जाता है, डाल पर, या धरती पर गिरकर मुरझा जाता है। हवा बस उसकी गन्ध ले जाती है। वैसे ही जीव जब जाता है, शरीर यहीं रह जाता है, और वह अपने साथ मन और इन्द्रियों को, उनकी सूक्ष्म गन्ध को लेकर चला जाता है।
आपको याद होगा, पाँचवें सत्संग में दूसरे अध्याय का वह श्लोक सुना था, कि जैसे आदमी पुराने कपड़े छोड़कर नए पहनता है, वैसे ही देही पुराने शरीर छोड़कर नए में जाता है: "संयाति नवानि देही"। वहाँ भी यही शब्द था, "संयाति", और यहाँ भी "संयाति"। वहाँ बताया गया था कि वह जाता है। यहाँ बताया जा रहा है कि क्या साथ लेकर जाता है।
संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर तीन चित्र एक साथ रखते हैं। वे कहते हैं, जैसे अपमानित होकर घर से लौटा अतिथि उस घर का पुण्य अपने साथ ले जाता है। जैसे डूबता सूरज लोगों की देखने की शक्ति अपने साथ ले जाता है, कि सूरज गया तो आँखें होते हुए भी कुछ नहीं दिखता। और जैसे हवा गन्ध ले जाती है। वैसे ही, ज्ञानेश्वर कहते हैं, यह देह का राजा जब देह से जाता है, तो मन सहित इन छहों इन्द्रियों को साथ ले जाता है।
और महाभारत में इसका एक बहुत पवित्र चित्र है, जिसे आपने सत्रहवें सत्संग में सुना था। विदुर के अन्तिम दिन, जब वे वन में एक पेड़ का सहारा लिए खड़े थे, और युधिष्ठिर दौड़कर उनके पास पहुँचे। विदुर ने बिना पलक झपकाए युधिष्ठिर की आँखों में आँखें डालीं, और पाठ कहता है, वे अंगों से अंगों में, प्राणों से प्राणों में, और इन्द्रियों से इन्द्रियों में प्रवेश कर गए। आज के श्लोक के साथ उसे फिर सुनिए। "गृहीत्वैतानि संयाति", इन्हें लेकर जाता है। विदुर ने यह योग के बल से, होश में, अपने प्रिय युधिष्ठिर में किया। और पेड़ के सहारे उनका शरीर वहीं छूट गया, जैसे फूल डाल पर छूट जाता है।
और जीव नए शरीर में आता कैसे है? अनुगीता में वही सिद्ध महात्मा, जिनकी बात हमने अभी स्वर्ग के तारों के बारे में सुनी, काश्यप को यह भी बताते हैं। वे कहते हैं, सब प्राणियों का वह जीव गर्भ में प्रवेश करके प्राणों के स्थानों में ठहरता है, और तुरन्त चेतना जगा देता है, और फिर वह गर्भ अंग हिलाने लगता है। फिर तीन चित्र देते हैं। जैसे पिघला लोहा साँचे में डाला जाए तो साँचे का रूप ले लेता है। जैसे आग लोहे के गोले में घुसकर उसे पूरा तपा देती है। और जैसे जलता दीपक घर को प्रकाशित करता है, वैसे ही चेतन आत्मा शरीरों को प्रकाशित करता है।
अब ये चित्र मिलाकर देखिए। हवा गन्ध ले जाती है, आग लोहे में उतरती है, दीपक घर को रोशन करता है। तीनों में एक बात समान है: जो आता-जाता है, वह शरीर से अलग है। लोहा आग नहीं है, घर दीपक नहीं है, फूल हवा नहीं है।
पर इस श्लोक का एक और पहलू है, जो हमारे आज के जीवन से सीधा जुड़ता है। मैं इसे अपनी ओर से कहूँ। हवा कोई चुनाव नहीं करती। वह गुलाब के बगीचे से गुज़रे तो गुलाब की ख़ुशबू ले जाती है, और कूड़े के ढेर से गुज़रे तो उसकी गन्ध। हवा का दोष नहीं, वह बस वही ले जाती है जिसके पास से गुज़री। हमारे मन और इन्द्रियाँ भी रोज़ किसी न किसी के पास से गुज़रते हैं। दिन भर क्या सुना, क्या देखा, किस बात को मन में घुमाया, किस संगत में बैठे। दूसरे श्लोक में हमारी टीका ने कहा था, नीचे की जड़ें पिछले कर्मों से बनी वासनाएँ और संस्कार हैं। वही गन्ध है। इसलिए डरने की ज़रूरत नहीं, बस इतना ध्यान रखने की ज़रूरत है कि आज मन किस बगीचे से गुज़र रहा है। क्योंकि जो गन्ध आज उठाई, वही आगे साथ जाएगी।
अब नौवाँ श्लोक, जो बताता है कि वे "ये" कौन-सी चीज़ें हैं जिन्हें जीव साथ ले जाता है। "श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च", कान, आँख, त्वचा, जीभ और नाक, "अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते", और मन का आश्रय लेकर, यह विषयों को भोगता है।
यह श्लोक सीधा है, पर इसकी गिनती पर ध्यान दीजिए। पाँच इन्द्रियाँ और मन, ठीक वही छह जिनकी बात सातवें श्लोक में हुई थी, "मनःषष्ठानीन्द्रियाणि"। शंकराचार्य कहते हैं, मन हर इन्द्रिय के साथ लगा रहता है। आँख देखती है, पर मन साथ न हो तो सामने की चीज़ भी नहीं दिखती। आपने कभी अनुभव किया होगा, किसी चिन्ता में डूबे हों, और कोई आपके सामने से निकल जाए, और आपको पता ही न चले। आँखें खुली थीं, पर मन कहीं और था। मधुसूदन सरस्वती जोड़ते हैं कि इसमें कर्म करने वाली इन्द्रियाँ और प्राण भी समझ लेने चाहिए।
और "अधिष्ठाय" का अर्थ है, उन पर बैठकर, उन्हें अपना आधार बनाकर। नीलकण्ठ यहाँ दीपक का चित्र देते हैं। वे कहते हैं, दीपक को जलने के लिए तेल और बाती चाहिए, पर रोशनी तो वह अपनी ही देता है, तेल और बाती रोशनी नहीं करते। वैसे ही जीव को देखने-सुनने के लिए इन्द्रियाँ चाहिए, पर देखने वाला वह स्वयं है। और संत ज्ञानेश्वर कहते हैं, जैसे बुझा हुआ दीपक अपनी रोशनी के साथ चला जाता है, और फिर कहीं जलाया जाए तो वहाँ वैसे ही फैल जाता है, वैसे ही जीव जहाँ भी नया शरीर पाता है, स्वर्ग में हो या यहाँ, वहाँ मन और इन्द्रियाँ फिर वैसे ही फैल जाती हैं।
और अब इस श्लोक के अन्तिम शब्द को सुनिए, क्योंकि उसमें एक छोटी-सी सुन्दरता छिपी है। "विषयानुपसेवते", यानी विषयों को भोगता है, उनका सेवन करता है। इस शब्द के भीतर "सेवते" है। और पिछले सत्संग में, चौदहवें अध्याय का जो श्लोक हमने अन्त में गाया था, उसमें भी यही शब्द था: "भक्तियोगेन सेवते", जो भक्ति से मेरी सेवा करता है। यह मेल मैं अपनी ओर से देख रहा हूँ, आचार्य इसे नहीं जोड़ते। पर सोचने लायक़ है। वही जीव, वही मन, वही इन्द्रियाँ। एक ओर वे विषयों का सेवन करती हैं, दूसरी ओर भगवान की सेवा। क्रिया एक है, सेवा, बस दिशा बदलती है। आँख वही है जो किसी चीज़ को लालच से देखती है, और वही आँख भगवान की मूर्ति को प्रेम से देखती है। कान वही है जो निन्दा सुनता है, और वही कथा सुनता है।
तो इन दो श्लोकों से चौथी बात यह निकलती है: आप इस शरीर के स्वामी हैं, और जब जाते हैं तो मन और इन्द्रियों को ऐसे साथ ले जाते हैं जैसे हवा गन्ध ले जाती है। इसलिए रोज़ यह देखना काफ़ी है कि आज कौन-सी गन्ध उठाई, और आज इन छह सेवकों से किसकी सेवा करवाई।
पर अभी एक बात बाकी है। यह सब होता रहता है, जीव आता है, रहता है, भोगता है, जाता है, और हमारे सामने होता है। हर घर में, हर अस्पताल में, हर दिन। फिर भी हम इसे देखते क्यों नहीं? श्रीकृष्ण अगले श्लोक में इसका उत्तर देते हैं, और महाभारत उसी उत्तर के लिए एक छोटे-से जुगनू का चित्र देता है।
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥ १० ॥
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥ ११ ॥
दसवाँ श्लोक। "उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्", शरीर छोड़ते हुए, शरीर में रहते हुए, या गुणों से युक्त होकर भोगते हुए, "विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः", उसे मूढ़ लोग नहीं देखते, ज्ञान की आँख वाले देखते हैं।
तीन अवस्थाएँ गिनाई गईं: जाते हुए, ठहरे हुए, भोगते हुए। यानी कोई ऐसा पल नहीं जब वह सामने न हो। शंकराचार्य और मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, वह देखे जाने के बिल्कुल पास है, फिर भी मूढ़ लोग उसे नहीं देखते, क्योंकि उनका मन देखे और अनदेखे भोगों की चाह से खिंचा रहता है। और फिर दोनों आचार्य एक ऐसी बात कहते हैं जो इस श्लोक को एक नया रंग दे देती है। वे कहते हैं, यहाँ भगवान दुःख से कहते हैं, "अहो कष्टं", हाय, कितने दुःख की बात है। यानी यह श्लोक किसी को मूर्ख कहकर डाँटना नहीं है। यह एक पिता की आह है, जो देख रहा है कि उसका बच्चा अपने ही घर में बैठा अपने ही घर को ढूँढ़ रहा है।
"विमूढा", और याद कीजिए, पाँचवें श्लोक में "गच्छन्त्यमूढाः" आया था, जो मोह में नहीं, वे उस पद तक जाते हैं। यहाँ उसका उल्टा। रामानुजाचार्य बताते हैं कि ये विमूढ़ कौन हैं: जो इस मनुष्य के शरीर को ही अपना आप मान बैठे हैं। वे शरीर को आते-जाते देखते हैं, पर जो शरीर में आता-जाता है, उसे नहीं।
और अब वह जुगनू, जिसका वादा किया था। अनुगीता में वही सिद्ध महात्मा काश्यप को जीव के शरीर छोड़ने की बात बताते-बताते कहते हैं: ज्ञान से सम्पन्न लोग लक्षणों से पहचान लेते हैं कि जाने वाला पुण्य करके गया है या नहीं। और फिर कहते हैं, जैसे अँधेरे में इधर-उधर चमकते जुगनू को आँख वाले देख लेते हैं, वैसे ही "ज्ञानचक्षुषः", ज्ञान की आँख वाले देखते हैं। सुना आपने? वही शब्द। "ज्ञानचक्षुषः"। जो शब्द गीता के इस श्लोक का अन्तिम शब्द है, वही अनुगीता में भी आता है, और वहाँ उसके साथ एक चित्र भी है। अँधेरी रात, खेत, और उसमें एक छोटा-सा जुगनू। जिसकी आँखें खुली हैं, उसे वह दिख जाता है। जिसकी बन्द हैं, उसके लिए रात बस अँधेरी है। और वह सिद्ध कहते हैं, सिद्ध पुरुष दिव्य दृष्टि से जीव को निकलते, जन्म लेते और नए गर्भ में प्रवेश करते देखते हैं।
आपको उन्नीसवें सत्संग की सावित्री याद होगी। वन में सत्यवान ने सिर के दर्द से उसकी गोद में सिर रखा, और सावित्री ने यम को देखा। और पाठ कहता है, यम ने सत्यवान के शरीर से पाश में बँधे, अँगूठे भर के एक पुरुष को खींच निकाला, और वह शरीर साँस-रहित, कान्ति-रहित पड़ा रह गया। वहाँ से कोई और गुज़रता, तो उसे बस एक स्त्री दिखती जो अपने पति का सिर गोद में लिए बैठी है। सावित्री को वह दिखा जो जा रहा था, और वह उसी के पीछे चल पड़ी। यही "पश्यन्ति" है।
संत ज्ञानेश्वर इस पर एक बहुत सीधा-सा तर्क देते हैं। वे कहते हैं, पेड़ हिलता दिखे तो मान लेते हैं कि हवा चल रही है। पर जहाँ पेड़ नहीं, वहाँ क्या हवा नहीं है? वैसे ही शरीर हिलता-डुलता है तो हम कहते हैं, जीव आया। शरीर गिर गया तो कहते हैं, जीव चला गया। पर वह तो वहीं था, बस जिस पेड़ से हम उसे पहचानते थे, वह पेड़ गिर गया।
और अब इस सत्संग का अन्तिम श्लोक, ग्यारहवाँ। "यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्", यत्न करने वाले योगी इसे अपने भीतर स्थित देखते हैं, "यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः", पर जिनका मन शुद्ध नहीं हुआ, वे विवेकहीन लोग यत्न करते हुए भी इसे नहीं देखते।
इस श्लोक में एक अजीब बात है। दोनों पंक्तियों में एक ही शब्द है: "यतन्तो", यत्न करते हुए। पहली पंक्ति वाले भी यत्न करते हैं, दूसरी वाले भी। तो फ़र्क़ कहाँ है? हमारी टीका बहुत साफ़ कहती है: केवल यत्न पर्याप्त नहीं; पहले उचित आचरण से मन को शुद्ध करना होता है। शंकराचार्य बताते हैं कि "यतन्तोऽप्यकृतात्मानो" में यह अकृतात्मा कौन है: जिसका मन तप और इन्द्रिय-संयम से सधा नहीं, जो बुरे आचरण से रुका नहीं, जिसका घमण्ड शान्त नहीं हुआ। वह शास्त्र भी पढ़ता है, प्रयत्न भी करता है, फिर भी नहीं देखता। और रामानुजाचार्य एक शब्द में इसका कारण देते हैं: जिन्होंने मेरी शरण नहीं ली। यानी हम फिर चौथे श्लोक पर लौट आए, "प्रपद्ये"।
संत ज्ञानेश्वर यहाँ इतनी साफ़ बात कहते हैं कि सुनकर मन ठहर जाता है। वे कहते हैं, सारे शास्त्र तुम्हारे हाथ आ जाएँ, बुद्धि हर बारीक बात की गिनती कर ले, पर अगर मन में वैराग्य नहीं उतरा, तो मुझसे भेंट नहीं होती। मुँह विचारों से भरा हो, और भीतर विषयों का डेरा हो, तो मैं नहीं मिलता। यह बात मुझे सबसे पहले अपने लिए कहनी चाहिए। गीता पढ़ना, सुनना, उस पर बोलना, यह सब "यतन्तो" है। और यह श्लोक याद दिलाता है कि यह सब होते हुए भी आदमी विवेकहीन रह सकता है, अगर भीतर की ज़मीन तैयार न हो।
और ज़रा इस श्लोक को उस सुनने वाले की ओर मोड़कर देखिए जिसे यह सब सुनाया जा रहा है। धृतराष्ट्र ने अपने जीवन में बहुत कुछ सुना था। विदुर की नीति सुनी, सनत्सुजात का उपदेश सुना, और अब सञ्जय के मुँह से स्वयं श्रीकृष्ण की गीता सुन रहे हैं। पर पिछली बार हमने संत ज्ञानेश्वर के मुँह से सुना था कि राजा बीच में पूछ बैठे, यह सब छोड़ो, विजय की बात कहो। सुनना था, पर मन कहीं और था।
पर इस श्लोक को निराशा की तरह मत सुनिए। "यतन्तो योगिनश्चैनं", यत्न करने वाले योगी इसे देखते हैं। यानी देखना हो सकता है, और यत्न से हो सकता है। बस वह यत्न सही ज़मीन पर होना चाहिए: थोड़ा मान कम, थोड़ा मोह कम, थोड़ी पकड़ ढीली, और सबसे पहले उस आदि पुरुष की शरण। बीज अच्छा हो, पर ज़मीन पत्थर की हो, तो उगता नहीं। ज़मीन नरम कर दीजिए, बीज अपने आप उग आता है।
और आज हमने सुना कि उस परम धाम को सूर्य प्रकाशित नहीं करता। तो फिर इस सूर्य में जो प्रकाश है, जो सारे संसार को रोशन करता है, वह किसका है? चन्द्रमा में, आग में, और हमारे अपने पेट में जो आग भोजन पचाती है, वह किसकी है? पन्द्रहवें अध्याय का बाकी आधा, अगले सत्संग में, इसी का उत्तर है। श्रीकृष्ण बताएँगे कि उल्टे पेड़ की जड़ में बैठा वह परम पुरुष कहाँ-कहाँ छिपा है।
तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।
पहली बात। यह संसार एक उल्टा पीपल है। उसकी जड़ ऊपर भगवान में है, और नीचे की जड़ें हमारी अपनी आदतों में उतरी हैं। उसे काटने की कुल्हाड़ी है असंगता, और वह विवेक के पत्थर पर रोज़ थोड़ी-थोड़ी पैनी होती है।
दूसरी बात। काटना अकेले काफ़ी नहीं। काटने के बाद एक वाक्य कहना है, जो श्रीकृष्ण ने ख़ुद हमें सिखाया: मैं उसी आदि पुरुष की शरण लेता हूँ। ख़ाली हाथ से पुरानी डाल नहीं छूटती, दूसरा सहारा मिलते ही हाथ खुल जाता है।
तीसरी बात। आप उसके अपने हैं, "ममैवांशो", उसी के सनातन अंश। स्वर्ग का उजाला कमाया हुआ है और लौटने वाला है, पर वह धाम आपका घर है। और जब आप जाएँगे, तो मन और इन्द्रियों को ऐसे ले जाएँगे जैसे हवा गन्ध ले जाती है, इसलिए आज मन को अच्छे बगीचे से गुज़ारिए।
आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आपके जीवन में कौन-सी ऐसी डाल है जिसे आप बरसों से छोड़ना चाहते हैं, पर हाथ नहीं खुलता? और क्या कभी ऐसा हुआ कि किसी बड़े सहारे के मिलते ही वह पकड़ अपने आप ढीली हो गई? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।
मैं उसी आदि पुरुष की शरण लेता हूँ, जिससे यह पुराना संसार बहा है। और मैं उसी का अंश हूँ।
जय श्री कृष्ण।
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥ ७ ॥
तीन बातें
- यह संसार एक उल्टा पीपल है। उसकी जड़ ऊपर भगवान में है, और नीचे की जड़ें हमारी अपनी आदतों में उतरी हैं। उसे काटने की कुल्हाड़ी है असंगता, और वह विवेक के पत्थर पर रोज़ थोड़ी-थोड़ी पैनी होती है।
- काटना अकेले काफ़ी नहीं। काटने के बाद एक वाक्य कहना है, जो श्रीकृष्ण ने ख़ुद हमें सिखाया: मैं उसी आदि पुरुष की शरण लेता हूँ। ख़ाली हाथ से पुरानी डाल नहीं छूटती, दूसरा सहारा मिलते ही हाथ खुल जाता है।
- आप उसके अपने हैं, "ममैवांशो", उसी के सनातन अंश। स्वर्ग का उजाला कमाया हुआ है और लौटने वाला है, पर वह धाम आपका घर है। और जब आप जाएँगे, तो मन और इन्द्रियों को ऐसे ले जाएँगे जैसे हवा गन्ध ले जाती है, इसलिए आज मन को अच्छे बगीचे से गुज़ारिए।