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सत्संग ४१

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गुणों के पार

गीता 14.14–14.27 · 75 मिनट

जो सुख-दुःख में एक-सा रहे

यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् । तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥ १४ ॥
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रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते । तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ॥ १५ ॥
गीता 14.15 — अर्थ पढ़ें ›
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् । रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ॥ १६ ॥
गीता 14.16 — अर्थ पढ़ें ›

क्या आपने कभी किसी ऐसे आदमी को देखा है जिसके चेहरे पर बड़ी ख़ुशी की ख़बर आने पर भी वैसी ही शान्ति रहती है जैसी किसी बुरी ख़बर के आने पर? जिसकी कोई तारीफ़ करे तो वह फूलता नहीं, और कोई बुरा कह दे तो भीतर से टूटता नहीं? आज का सवाल यही है। क्या ऐसा जीना सचमुच हो सकता है? और अगर हो सकता है, तो वहाँ तक पहुँचने का रास्ता क्या है? गीता इसे एक शब्द में कहती है: गुणों के पार।

जय श्री कृष्ण।

आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का इकतालीसवाँ सत्संग है, और आज चौदहवाँ अध्याय पूरा होगा। महाभारत के भीष्म पर्व का अड़तीसवाँ अध्याय ही गीता का चौदहवाँ अध्याय है, जिसका नाम है "गुणत्रय विभाग योग", यानी तीन गुणों को अलग-अलग पहचानने का योग। और हर बार की तरह याद रखिए कि यह सब हमें सञ्जय सुना रहे हैं, हस्तिनापुर के महल में, अन्धे राजा धृतराष्ट्र को, उस दिन जब भीष्म बाणों की शय्या पर गिर चुके हैं और युद्ध के दस दिन बीत चुके हैं।

पहले याद कर लें कि पिछली बार हम कहाँ रुके थे। पिछले सत्संग का सवाल था, "मैं ऐसा क्यों हूँ?" कभी मन में शान्ति और समझ होती है, कभी बेचैनी और भाग-दौड़, और कभी ऐसा आलस कि कुछ करने का मन ही नहीं होता। श्रीकृष्ण ने बताया था कि यह सब तीन गुणों का खेल है: "सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः", सत्त्व, रज और तम, प्रकृति से उत्पन्न ये तीन गुण, अविनाशी आत्मा को शरीर में बाँधते हैं। और तीनों के बाँधने का ढंग अलग है। सत्त्व सुख और ज्ञान की आसक्ति से बाँधता है, यानी अच्छी चीज़ भी बाँध सकती है। रज राग से, तृष्णा से, और कर्म की आसक्ति से बाँधता है। और तम प्रमाद, आलस्य और नींद से बाँधता है। फिर उन्होंने कहा था कि ये तीनों आपस में होड़ करते रहते हैं: "रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत", रज और तम को दबाकर सत्त्व बढ़ता है, और ऐसे ही बाकी दोनों भी एक-दूसरे को दबाकर बढ़ते हैं। और फिर हर गुण के बढ़ने की पहचान बताई थी। जब शरीर के सब द्वारों में, आँख, कान, वाणी, मन में, ज्ञान का प्रकाश चमके, तो समझिए सत्त्व बढ़ा है। जब लोभ हो, भाग-दौड़ हो, नए-नए काम शुरू करने की बेचैनी हो, और मन को चैन न हो, तो रज बढ़ा है। और जब अँधेरा-सा हो, कुछ करने का मन न हो, लापरवाही हो, और मोह हो, तो तम बढ़ा है।

आज श्रीकृष्ण पहले बताते हैं कि इन गुणों का अन्त में क्या फल होता है। और फिर अर्जुन वह प्रश्न पूछते हैं जो इस अध्याय का मुकुट है: जो इन तीनों के पार चला गया, वह दिखता कैसा है?

तो आज का पहला श्लोक, चौदहवाँ। "यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्", जब सत्त्व बढ़ा हुआ हो और उस समय देहधारी मृत्यु को प्राप्त हो, "तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते", तब वह उत्तम तत्त्व को जानने वालों के निर्मल लोकों को प्राप्त होता है।

यहाँ "प्रलय" शब्द पर ध्यान दीजिए। हम प्रलय सुनते हैं तो सारी सृष्टि के डूबने की बात सोचते हैं। पर यहाँ शंकराचार्य, श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती, सब एक ही अर्थ करते हैं: मरण, एक आदमी की मृत्यु। यानी एक आदमी की मृत्यु भी उसके लिए एक छोटा-सा प्रलय ही है। उसकी पूरी दुनिया उस दिन समेट ली जाती है।

और "तदोत्तमविदां" में ये उत्तम को जानने वाले कौन हैं? श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, ये हिरण्यगर्भ जैसे ऊँचे तत्त्वों के उपासक हैं, और उनके लोक प्रकाश से भरे हैं। और वे लोक निर्मल हैं, मल से रहित। मधुसूदन बताते हैं कि मल यानी रज और तम का मैल। पर रामानुजाचार्य यहाँ एक बहुत प्यारी बात जोड़ते हैं। वे कहते हैं, सत्त्व के बढ़ने पर मरने वाला आत्मा को जानने वालों के कुल में जन्म लेता है, और वहाँ उसे वे पुण्य कर्म करने का अवसर मिलता है जो आत्मा के ज्ञान तक ले जाते हैं।

आपको याद होगा, बीसवें सत्संग में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यही भरोसा दिया था कि जिसकी साधना बीच में छूट गई, वह पवित्र और बुद्धिमान लोगों के घर जन्म लेता है, और वहाँ फिर से वहीं से शुरू करता है जहाँ छोड़ा था। रामानुजाचार्य इस श्लोक को उसी भरोसे के साथ पढ़ते हैं। यानी सत्त्व में किया हुआ कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता।

और यह श्लोक सुनकर आपको आठवें अध्याय की वह बात भी याद आई होगी, जो हमने तेईसवें सत्संग में सुनी थी: "यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्", अन्त समय में जिस-जिस भाव को याद करते हुए आदमी शरीर छोड़ता है, उसी को वह प्राप्त होता है। वहाँ बात अन्तिम विचार की थी। यहाँ बात उस विचार के पीछे के मौसम की है। अन्त में कौन-सा विचार आएगा, यह इस पर निर्भर करता है कि उस घड़ी भीतर कौन-सा गुण बढ़ा हुआ है। और कौन-सा गुण बढ़ा होगा, यह इस पर निर्भर करता है कि जीवन भर किस गुण को रोज़ खाना-पानी दिया गया।

संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर एक बहुत सुन्दर चित्र देते हैं। वे कहते हैं, कोई राजा अपने राजपने के साथ पहाड़ पर चला जाए, तो क्या वह वहाँ जाकर कुछ कम राजा हो जाता है? या यहाँ का दीया उठाकर दूसरे गाँव ले जाएँ, तो क्या वहाँ जाकर वह दीया नहीं रहता? वैसे ही जो सत्त्व के साथ इस शरीर से निकलता है, वह अगली जगह भी सत्त्व का ही नया रूप होकर पहुँचता है। जो रोशनी लेकर चला, वह रोशनी लेकर ही पहुँचेगा।

अब पन्द्रहवाँ श्लोक। "रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते", रज के बढ़े होने पर मृत्यु को प्राप्त होकर आदमी उन लोगों में जन्म लेता है जो कर्म में आसक्त हैं। "तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते", और वैसे ही तम में मरकर वह मूढ़ योनियों में जन्म लेता है।

"कर्मसङ्गिषु", यानी कर्म से चिपके हुए लोग। शंकराचार्य और श्रीधर स्वामी कहते हैं, यह मनुष्यों का ही लोक है, कर्म की आसक्ति वाले मनुष्य। यानी रज में मरने वाला फिर से इसी भाग-दौड़ वाली दुनिया में लौटता है। और संत ज्ञानेश्वर इस पर एक ऐसी बात कहते हैं जिस पर हल्की मुस्कान आ जाती है। वे कहते हैं, बैल को चाहे किसी बड़े आदमी की बारात में ले जाओ, वहाँ भी उसके कन्धे पर जुआ ही रखा जाएगा। यानी जो रज के साथ गया, वह मनुष्य तो बनता है, पर फिर उसी पंक्ति में जोत दिया जाता है जहाँ दिन-रात काम ही काम है, चैन नहीं।

और फिर दूसरी पंक्ति, जो सुनने में कठोर है: तम में मरने वाला मूढ़ योनियों में जन्म लेता है। हमारी टीका इसका अर्थ साफ़ करती है: मूढ़ योनियाँ, यानी पशु, वृक्ष आदि के जन्म, जिनमें सोचने-विचारने की शक्ति दुर्बल होती है। यह बात डराने के लिए नहीं कही गई। यह जगाने के लिए कही गई है। सोचिए, मनुष्य के पास सबसे क़ीमती चीज़ क्या है? सोचने की, चुनने की, रुककर पूछने की शक्ति। तम उसी शक्ति को ढकता है। और जो आदमी जीवन भर उस शक्ति को ढकता रहे, नशे में, लापरवाही में, आलस में, उसकी यात्रा उसी ओर मुड़ती है जहाँ वह शक्ति और भी धुँधली है। यानी भगवान किसी को सज़ा नहीं दे रहे। जो दिशा आदमी ने रोज़ चुनी, यात्रा उसी दिशा में आगे बढ़ती है।

अब सोलहवाँ श्लोक, जो इन दोनों का सार है। "कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्", अच्छे कर्म का फल सात्त्विक और निर्मल कहा गया है। "रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम्", पर रज का फल दुःख है, और तम का फल अज्ञान।

यह श्लोक बहुत सीधा लगता है, पर इसमें एक चौंकाने वाली बात छिपी है। रज का फल दुःख है। अब रज क्या है? भाग-दौड़, महत्त्वाकांक्षा, कुछ पाने की लगन। और हम तो यही सोचकर भागते हैं कि इससे सुख मिलेगा। श्रीकृष्ण कहते हैं, नहीं, उसका फल दुःख है। मधुसूदन सरस्वती इसे समझाते हैं: राजस कर्म पुण्य भी होता है, पर उसमें पाप मिला होता है, इसलिए उसका फल दुःख से भरा होता है, सुख थोड़ा। और श्रीधर स्वामी याद दिलाते हैं कि कौन-सा कर्म सात्त्विक है, कौन राजस, कौन तामस, यह श्रीकृष्ण अठारहवें अध्याय में विस्तार से बताएँगे।

संत ज्ञानेश्वर यहाँ फिर एक ऐसा चित्र देते हैं जो भूलता नहीं। वे कहते हैं, राजस कर्म का फल नीम की निम्बोली जैसा है: ऊपर से मीठा, भीतर विष। और इन्द्रायण के फल जैसा, जो देखने में सुन्दर, पर खाने में कड़वा। बाहर से सुख का चित्र बनाकर आता है, और भीतर से दुःख फलता है।

आज के जीवन में यह कैसा दिखता है, यह मैं अपनी ओर से एक उदाहरण देकर कहूँ। एक आदमी है जो दफ़्तर में एक बड़े पद के पीछे सालों भागता है। रात-रात जागता है, घर देर से लौटता है, बच्चों का स्कूल का कार्यक्रम छूट जाता है, माँ की दवाई का समय भूल जाता है। फिर एक दिन पद मिल जाता है। और उस शाम वह अकेला बैठा सोचता है, ख़ुशी उतनी क्यों नहीं हुई जितनी सोची थी? क्योंकि पद के साथ नई चिन्ता आ गई, नया डर आ गया कि यह छिन न जाए, और नई भूख आ गई कि इससे भी ऊपर क्या है। यही है रज का फल, दुःख। ऊपर से मीठा, भीतर कड़वा। और यह श्लोक उस आदमी को काम छोड़ने को नहीं कहता। गीता ने तो बार-बार कहा है कि कर्म करो। यह बस उस भीतर की आग की ओर इशारा करता है जो कर्म को राजस बनाती है: फल की भूख, और कभी न भरने वाली लालसा।

तो इन तीन श्लोकों से आज के लिए पहली बात यह निकलती है: अन्त की तैयारी अन्त में नहीं होती। मृत्यु के समय कौन-सा गुण बढ़ा होगा, यह आज की सुबह, आज की शाम, आज का भोजन, आज की संगत तय कर रही है। और कर्म का फल वैसा ही होता है जैसा उसके पीछे का भाव। इसलिए डरने की ज़रूरत नहीं, बस रोज़ थोड़ा-थोड़ा सत्त्व की ओर मुड़ने की ज़रूरत है।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने कहा, रज का फल दुःख है। पर यह दुःख आता कहाँ से है? कौन-सी चीज़ है जो रज से पैदा होती है और फिर दुःख बन जाती है? और सत्त्व से क्या पैदा होता है, जो उसे निर्मल बनाता है? अगले श्लोक में श्रीकृष्ण तीनों गुणों की जड़ एक-एक शब्द में खोल देते हैं।

सत्त्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च । प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥ १७ ॥
गीता 14.17 — अर्थ पढ़ें ›
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः । जघन्यगुणवृत्तस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥ १८ ॥
गीता 14.18 — अर्थ पढ़ें ›
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति । गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥ १९ ॥
गीता 14.19 — अर्थ पढ़ें ›

सत्रहवाँ श्लोक। "सत्त्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च", सत्त्व से ज्ञान उत्पन्न होता है, और रज से लोभ। "प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च", तम से प्रमाद और मोह होते हैं, और अज्ञान भी।

पिछले श्लोक में फल बताए गए थे, इस श्लोक में उनकी जड़। श्रीधर स्वामी इसे बहुत सीधे जोड़ते हैं: सत्त्व से ज्ञान होता है, इसलिए सात्त्विक कर्म का फल प्रकाश और सुख है। रज से लोभ होता है, और लोभ दुःख का कारण है, इसलिए राजस कर्म का फल दुःख है। और तम से प्रमाद, मोह और अज्ञान होते हैं, इसलिए तामस कर्म और गहरा अज्ञान ही देता है। यानी जैसा बीज, वैसा पेड़।

अब रज की जड़ में एक ही शब्द रखा गया है: लोभ। और मधुसूदन सरस्वती लोभ की जो परिभाषा देते हैं, वह सुनने लायक है। वे कहते हैं, लोभ वह विशेष चाह है जो करोड़ों चीज़ें मिल जाने पर भी रोकी नहीं जा सकती। वह लगातार बढ़ती रहती है, उसे भरा नहीं जा सकता, और इसीलिए वह सदा दुःख का कारण है। सोचिए, कितनी सटीक बात है। भूख होती है तो खाना खाकर मिट जाती है। प्यास होती है तो पानी पीकर बुझ जाती है। पर लोभ ऐसी भूख है जो खाने से और बढ़ती है। जितना मिला, उससे ज़्यादा की ओर देखती है।

और तम की ओर से तीन चीज़ें आती हैं। रामानुजाचार्य इन्हें एक सीढ़ी की तरह खोलते हैं, जो नीचे की ओर जाती है। पहले प्रमाद, यानी ध्यान न देना, असावधानी, जिससे आदमी गलत काम में लग जाता है। फिर उससे मोह, यानी उलटी समझ, जो है उसे कुछ और समझ लेना। फिर उससे और गहरा तम। और फिर उससे अज्ञान, यानी समझ का ही न रहना। यह सीढ़ी पहचान लेने लायक है, क्योंकि यह एक ही दिन में नहीं उतरी जाती। एक छोटी-सी लापरवाही से शुरू होती है। एक बार ध्यान नहीं दिया, फिर उसे ठीक मान लिया, फिर आदत बन गई, फिर आदमी को पता भी नहीं कि वह कहाँ खड़ा है।

और अब मैं आपको महाभारत के एक ऐसे प्रसंग पर ले चलता हूँ जहाँ यही बात एक दूसरे ढंग से कही गई है। आपको याद होगा, ग्यारहवें सत्संग में हमने सुना था कि युद्ध के बाद अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा था कि आपने युद्ध से पहले मित्रता से जो कहा था, वह मेरे विचलित मन से छूट गया। और तब श्रीकृष्ण ने वह ज्ञान फिर से दूसरे रूप में सुनाया, जिसे अनुगीता कहते हैं। उसी अनुगीता में श्रीकृष्ण एक गुरु और शिष्य का पुराना संवाद सुनाते हैं, और उसके भीतर ब्रह्मा जी ऋषियों को तीन गुण समझाते हैं।

तमस्, रजस् और सत्त्व के लक्षण एक-एक करके गिनाने के बाद ब्रह्मा जी एक बहुत गहरी बात कहते हैं: गुणों को पूरी तरह अलग-अलग कहा ही नहीं जा सकता। रज, सत्त्व और तम सदा साथ-साथ दिखते हैं। वे एक-दूसरे में रमते हैं, एक-दूसरे पर जीते हैं, एक-दूसरे का सहारा लेते हैं। जब तक सत्त्व है, रज भी है; जब तक तम और सत्त्व हैं, रज भी है। वे मिलकर, एक टोली की तरह, यात्रा करते हैं। यानी कोई आदमी पूरा सात्त्विक या पूरा तामसिक नहीं होता। तीनों हर किसी में होते हैं, बस कौन आगे है, इसका फ़र्क़ होता है।

और फिर ब्रह्मा जी एक ऐसा उदाहरण देते हैं जो आज के श्लोक को आँखों के सामने रख देता है। वे कहते हैं: सूरज उगता है। उसे देखकर चोरों को डर लगता है। और राह चलते यात्री उसकी गरमी से तपकर दुखी होते हैं। फिर वे खोलते हैं: सूरज सत्त्व है। चोर तम हैं। और यात्रियों की तपन रज का गुण है। प्रकाश सत्त्व है, गरमी रज, और ग्रहण के दिन जो अँधेरा छाता है, वह तम।

देखिए, सूरज एक ही है। पर एक को उससे प्रकाश मिलता है, एक को डर, एक को जलन। जो भीतर है, वही बाहर की एक ही चीज़ से अलग-अलग फल निकाल लेता है। "सत्त्वात्संजायते ज्ञानं", जिसके भीतर सत्त्व है, उसे उसी सूरज से रास्ता दिखता है।

अब अठारहवाँ श्लोक। "ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः", सत्त्व में स्थित लोग ऊपर जाते हैं, राजस बीच में रहते हैं, "जघन्यगुणवृत्तस्था अधो गच्छन्ति तामसाः", और निकृष्ट गुण के आचरण में स्थित तामस लोग नीचे जाते हैं। हमारी टीका इसे खोलती है: ऊपर का अर्थ है ऊँचे लोक, बीच का अर्थ है मनुष्य-लोक, और नीचे का अर्थ है निम्न योनियाँ।

और यहाँ एक बात आपको अच्छी लगेगी। अनुगीता के उसी प्रसंग में ब्रह्मा जी ऋषियों से लगभग यही श्लोक, लगभग इन्हीं शब्दों में कहते हैं: सत्त्व में स्थित ऊपर जाते हैं, राजस मध्य में रहते हैं, और नीच गुण से युक्त तामस नीचे जाते हैं। लोकमान्य तिलक ने अपनी टीका में यह ध्यान दिलाया है। यानी जो बात श्रीकृष्ण ने युद्ध से पहले कही, वही उन्होंने युद्ध के बाद ब्रह्मा जी के मुँह से फिर कहलवाई। जो सच है, वह समय बदलने पर बदलता नहीं।

अब इस श्लोक का एक शब्द है "जघन्यगुणवृत्तस्था", निकृष्ट गुण के आचरण में स्थित। मधुसूदन सरस्वती इस पर एक ऐसी बात कहते हैं जिससे बहुत-से लोगों के मन का बोझ उतर जाएगा। वे कहते हैं, कभी-कभी सात्त्विक और राजस लोग भी तम के आचरण में पड़ जाते हैं, नींद में, आलस में। इसलिए श्रीकृष्ण ने अन्त में "तामसाः" कहा, यानी वे जो सदा तम-प्रधान हैं। दूसरों का कभी-कभी उस आचरण में होना उन्हें तामस नहीं बना देता। तो अगर किसी दिन आप थके हुए हैं और देर तक सोते रह गए, या किसी शाम कुछ करने का मन नहीं हुआ, तो यह श्लोक आपको डाँट नहीं रहा। प्रश्न यह नहीं कि तम कभी आया या नहीं। प्रश्न यह है कि जीवन की गाड़ी कौन चला रहा है।

और तिलक यहाँ एक और ज़रूरी बात कहते हैं। सत्त्व से स्वर्ग भी मिल जाए, तो भी स्वर्ग का सुख सदा का नहीं है। इसलिए सत्त्व भी अन्तिम ठिकाना नहीं। ऊपर जाना अच्छा है, पर ऊपर जाना भी इसी सीढ़ी पर रहना है। गीता अब सीढ़ी से उतरने की नहीं, सीढ़ी के पार जाने की बात करने वाली है।

और अब, इससे पहले कि हम उन्नीसवें श्लोक में उतरें, एक छोटी-सी बात आपसे कहना चाहता हूँ। अब तक हमने गुणों का बाँधना सुना, उनकी होड़ सुनी, उनके फल सुने, ऊपर-नीचे जाना सुना। आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। जो आदमी यहीं उठ जाए, वह सोचेगा कि जीवन बस इन तीनों के बीच झूलते रहने का नाम है, कभी ऊपर, कभी नीचे, और इससे निकलने का कोई रास्ता नहीं। जबकि इस अध्याय का सबसे सुन्दर हिस्सा, गुणों के पार जाने वाले की पहचान और वहाँ तक पहुँचने का रास्ता, अभी आगे है। तो अगर आप यह सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की यह यात्रा बीच में न छूटे। और आज का यह सत्संग आख़िर तक सुनिए।

अब उन्नीसवाँ श्लोक, जहाँ से अध्याय मुड़ता है। "नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति", जब देखने वाला गुणों के सिवा किसी दूसरे को कर्ता नहीं देखता, "गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति", और गुणों से परे को जानता है, तब वह मेरे भाव को प्राप्त होता है।

श्रीधर स्वामी कहते हैं, अब तक गुणों के संग से बना संसार बताया गया, अब उन्हें अलग पहचानने से मोक्ष बताया जा रहा है। और यह बात गीता में पहली बार नहीं आई। ग्यारहवें सत्संग में हमने तीसरे अध्याय के ये वचन सुने थे: "प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः", सब कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं, और अहंकार से मोहित आदमी मानता है कि मैं कर्ता हूँ। और फिर, "गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते", तत्त्व को जानने वाला यह मानकर कि गुण ही गुणों में बरत रहे हैं, उनमें आसक्त नहीं होता।

पर यहाँ एक नया शब्द है: "द्रष्टा", देखने वाला। और दूसरी पंक्ति में एक नई बात: "गुणेभ्यश्च परं वेत्ति", वह गुणों से परे को भी जानता है। मधुसूदन सरस्वती इसे एक चित्र से समझाते हैं। पानी में सूरज की परछाईं पड़ती है, पानी हिलता है तो परछाईं काँपती है। पर सूरज नहीं काँपता। वैसे ही गुण हिलते हैं, शरीर, मन, इन्द्रियाँ, सब काम करते हैं, पर जो उन्हें प्रकाशित कर रहा है, वह साक्षी, उनसे छुआ नहीं जाता। और संत ज्ञानेश्वर एक दूसरा चित्र देते हैं: कुशल नट मंच पर कितने ही रूप धरे, अपनी ही कला से वह स्वयं धोखा नहीं खाता। वह जानता है कि रूप बदल रहे हैं, वह नहीं।

पर इस श्लोक का एक उलटा अर्थ भी लोग निकाल लेते हैं, उससे बचना है। कोई ग़ुस्सा करे और फिर कहे, "मैं क्या करूँ, रज ने किया", तो यह इस श्लोक का अर्थ नहीं है। श्रीकृष्ण "द्रष्टा" की बात कर रहे हैं, जो देख रहा है, जाग रहा है। और साथ में यह भी कहते हैं कि वह गुणों से परे को जानता है। यानी यह बहाना बनाने की नहीं, जागने की बात है। जो सच में देख लेता है कि यह ग़ुस्सा रज की लहर है, मैं नहीं, उसके और उस ग़ुस्से के बीच एक दूरी बन जाती है। और उसी दूरी में आदमी को चुनने की जगह मिलती है।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने कहा, "मद्भावं सोऽधिगच्छति", वह मेरे भाव को प्राप्त होता है। पर यह भाव है क्या? और उसे पाकर आदमी को मिलता क्या है? अगले श्लोक में श्रीकृष्ण इसका उत्तर देते हैं, और वह उत्तर सुनकर अर्जुन से रहा नहीं जाता।

गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् । जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥ २० ॥
गीता 14.20 — अर्थ पढ़ें ›
अर्जुन उवाच कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो । किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ॥ २१ ॥
गीता 14.21 — अर्थ पढ़ें ›

बीसवाँ श्लोक। "गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्", इन तीन गुणों को, जिनसे यह शरीर उत्पन्न होता है, पार करके देही, "जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते", जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और दुःखों से मुक्त होकर अमृत को प्राप्त करता है।

पहले एक शब्द, "देहसमुद्भवान्"। ये गुण वे हैं जिनसे शरीर उत्पन्न होता है। यानी यह शरीर, ये इन्द्रियाँ, यह मन, सब इन्हीं तीन धागों से बुना हुआ है। और श्रीकृष्ण कहते हैं, जिस कपड़े से आप बने हैं, उसी के पार भी जाया जा सकता है। यह छोटी बात नहीं है। हम अक्सर सोचते हैं, मेरा स्वभाव ही ऐसा है, मैं क्या करूँ। यह श्लोक कहता है, स्वभाव तुम्हारा कपड़ा है, तुम नहीं।

और फिर वह शब्द जिस पर शंकराचार्य और मधुसूदन सरस्वती, दोनों रुकते हैं। वे दोनों एक ही बात जोड़ते हैं: "जीवन्नेव", जीते-जी ही। यानी यह पार जाना मरने के बाद की कोई बात नहीं है। आदमी जीते-जी गुणों को पार करता है, जीते-जी जन्म, मृत्यु और बुढ़ापे के दुःख से छूटता है, और फिर शरीर छूटने पर उस अमृत को पूरी तरह पाता है। श्रीधर स्वामी "अमृत" का अर्थ करते हैं, ब्रह्म का आनन्द।

अब यहाँ एक सवाल अपने-आप उठता है। बुढ़ापे से मुक्त, इसका क्या अर्थ है? जिसने गुणों को पार कर लिया, क्या उसके बाल सफ़ेद नहीं होते? क्या उसके घुटनों में दर्द नहीं होता? होता है। शरीर तो प्रकृति का है, प्रकृति के नियम से चलेगा। पर श्लोक में शब्द ध्यान से सुनिए: "जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तो", जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और दुःखों से मुक्त। बुढ़ापा आता है, पर बुढ़ापे का दुःख उसे पकड़ नहीं पाता। मृत्यु आती है, पर मृत्यु का भय उसे नहीं डसता।

आपको याद होगा, सैंतीसवें सत्संग में हमने तेरहवें अध्याय में ज्ञान के लक्षण सुने थे, और उनमें एक था: "जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्", जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे, रोग और दुःख के दोषों को बार-बार देखना। वहाँ साधक को कहा गया था, इन दुःखों को ठीक से देखो। और यहाँ उसी साधना का फल बताया जा रहा है: जिसने इन्हें ठीक से देखा, और गुणों के पार चला गया, वह इन्हीं से छूट जाता है। जिस दुःख को आँख खोलकर देखा, वही अन्त में हार जाता है।

यह मैं अपनी ओर से एक दृश्य से कहूँ। अस्पताल के किसी वार्ड में दो बूढ़े आदमी पास-पास के बिस्तरों पर हैं। दोनों की बीमारी लगभग एक जैसी, दोनों की उम्र लगभग एक जैसी। एक हर आने वाले से शिकायत करता है, डॉक्टर से, बेटे से, भगवान से। दूसरा दर्द में भी मुस्कुराकर नर्स का नाम पूछता है, और कहता है, "बेटा, तुमने आज बहुत भाग-दौड़ की, थोड़ा बैठ जाओ।" शरीर दोनों का बूढ़ा है, पर बुढ़ापे का दुःख एक को ही खा रहा है।

और संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक के बाद एक बहुत प्यारी पंक्ति लिखते हैं। वे कहते हैं, देव के ये वचन सुनकर पार्थ इतने सुखी हुए, जैसे बादलों को देखकर मोर। और जब मोर बादल देखता है, तो वह चुप नहीं बैठता, नाचने लगता है। अर्जुन भी चुप नहीं बैठे। उन्होंने प्रश्न किया।

अब इक्कीसवाँ श्लोक, और यहाँ अर्जुन बोलते हैं। "कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो", हे प्रभो, इन तीन गुणों से अतीत हुआ व्यक्ति किन लक्षणों से पहचाना जाता है? "किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते", उसका आचरण कैसा होता है, और वह इन तीन गुणों को कैसे पार करता है?

इस एक श्लोक में तीन प्रश्न हैं, और सब आचार्य इन्हें अलग-अलग गिनते हैं। पहला: उसके लक्षण क्या हैं, यानी वह भीतर से कैसा होता है। दूसरा: उसका आचरण क्या है, यानी वह बाहर कैसे जीता है। तीसरा: वह इन गुणों को पार कैसे करता है, यानी रास्ता क्या है। और हमारी टीका यह भी बताती है कि श्रीकृष्ण इन तीनों का उत्तर क्रम से देंगे। बाईसवाँ और तेईसवाँ श्लोक पहले प्रश्न का उत्तर हैं, लक्षण का। चौबीसवाँ और पच्चीसवाँ दूसरे का, आचरण का। और छब्बीसवाँ तीसरे का, रास्ते का। तो आज का बचा हुआ सत्संग, सच कहें तो, अर्जुन के इसी एक प्रश्न का उत्तर है।

अब सम्बोधन सुनिए: "प्रभो"। मधुसूदन सरस्वती इस पर एक कोमल बात कहते हैं। अर्जुन ने "प्रभो", हे स्वामी, इसलिए कहा, मानो यह जता रहे हों कि सेवक का दुःख स्वामी को ही दूर करना है। यानी अर्जुन इस प्रश्न को किसी पाठशाला के प्रश्न की तरह नहीं पूछ रहे। वे उस सेवक की तरह पूछ रहे हैं जो जानता है कि उसके उलझे हुए मन को सुलझाना अब मालिक की ज़िम्मेदारी है।

और दूसरे प्रश्न, "किमाचारः", पर मधुसूदन एक ऐसा सवाल खोलते हैं जो आज भी उतना ही ज़रूरी है। वे पूछते हैं, जो गुणों के पार चला गया, क्या वह जैसा चाहे वैसा करता है, या वह नियम में रहता है? यह सवाल इसलिए ज़रूरी है कि दुनिया में ऐसे लोग भी मिल जाते हैं जो कहते हैं, "मैं तो इन सबसे ऊपर उठ चुका हूँ, मेरे लिए कोई नियम नहीं।" और फिर उसी बहाने मनमानी करते हैं। अर्जुन का यह प्रश्न ठीक उसी भ्रम के आगे दीवार खड़ी कर देता है। गुणातीत का भी एक आचरण होता है, और श्रीकृष्ण अभी उसे बताने वाले हैं।

और विश्वनाथ चक्रवर्ती और बलदेव विद्याभूषण, दोनों, इसी बात को आगे एक बहुत साफ़ वाक्य में कहते हैं: गुणातीत उसे कहना चाहिए जिसमें ये लक्षण और यह आचरण दिखे, उसे नहीं जो गुणातीत होने के तर्क बहुत अच्छे ढंग से बोल लेता हो। यानी बातों से नहीं, जीवन से पहचान होती है।

अब एक और बात, जो श्रीधर स्वामी, मधुसूदन सरस्वती, बलदेव और लोकमान्य तिलक, सब ध्यान दिलाते हैं। अर्जुन यह प्रश्न पहली बार नहीं पूछ रहे। आठवें सत्संग में आपने दूसरे अध्याय का वह प्रश्न सुना था: "स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव", हे केशव, जिसकी बुद्धि स्थिर हो गई, उसकी पहचान क्या है, "स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्", वह कैसे बोलता है, कैसे बैठता है, कैसे चलता है? वहाँ भी श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया था। तो अब फिर क्यों? श्रीधर स्वामी कहते हैं, वहाँ उत्तर मिल चुका था, फिर भी और विशेष जानने की इच्छा से अर्जुन फिर पूछते हैं, और श्रीकृष्ण भी उसे दूसरे ढंग से समझाते हैं।

और एक बात मुझे इससे भी सुन्दर लगती है। सातवें सत्संग में आपने दूसरे अध्याय का यह वचन सुना था: "त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन", वेद तीन गुणों के कार्यों का वर्णन करते हैं, हे अर्जुन, तुम तीनों गुणों से ऊपर उठो। उस दिन श्रीकृष्ण ने बस एक वाक्य में कह दिया था, "निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन", अर्जुन, गुणों के पार हो जाओ। अर्जुन ने तब नहीं पूछा था कि कैसे। बारह अध्याय बीत गए। विश्वरूप देख लिया, भक्ति के लक्षण सुन लिए, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ समझ लिया, तीनों गुणों को अलग-अलग पहचान लिया। और अब, जाकर, अर्जुन पूछते हैं: वह गुणों के पार जाने वाला दिखता कैसा है, और वहाँ जाते कैसे हैं? कभी-कभी एक वाक्य को समझने में बारह अध्याय लगते हैं। और उसमें कोई बुराई नहीं।

हमारे जीवन में भी यही होता है। किसी बड़े ने बरसों पहले एक बात कही थी, "बेटा, जो होता है, होने दो, मन को मत गिराओ।" उस दिन वह बात हमें एक साधारण-सी सलाह लगी थी। फिर जीवन ने बहुत कुछ दिखाया, कुछ खोया, कुछ पाया, और एक दिन वही बात भीतर से लौटकर आई, और हम उसके सामने बैठकर पूछने लगे, "पर यह होता कैसे है?" यह उस आदमी का प्रश्न है जिसने बहुत सुन लिया है, और अब जीना चाहता है।

तो इन दो श्लोकों से आज के लिए दूसरी बात यह निकलती है: गुणों के पार जाना मरने के बाद का सपना नहीं, जीते-जी की सम्भावना है। और उसे पहचानने का तरीका बातें नहीं, लक्षण और आचरण हैं। अपने भीतर भी, और किसी गुरु या साधु में भी।

पर अभी एक बात बाकी है। अर्जुन ने पूछा, उसके लक्षण क्या हैं? और श्रीकृष्ण का पहला उत्तर बहुत चौंकाने वाला है, क्योंकि वह कहते हैं कि गुणातीत के भीतर भी सत्त्व आता है, रज आता है, मोह भी आता है। फिर फ़र्क़ कहाँ है? आइए, सुनते हैं।

श्रीभगवानुवाच प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव । न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥ २२ ॥
गीता 14.22 — अर्थ पढ़ें ›
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते । गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥ २३ ॥
गीता 14.23 — अर्थ पढ़ें ›

बाईसवाँ श्लोक, और यहाँ से श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं। "प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव", हे पाण्डव, प्रकाश, प्रवृत्ति और मोह, "न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति", जब ये आते हैं तो वह इनसे द्वेष नहीं करता, और जब चले जाते हैं तो इनकी इच्छा नहीं करता।

पहले तीन शब्द समझ लें। हमारी टीका कहती है, प्रकाश, प्रवृत्ति और मोह, ये सत्त्व, रज और तम के कार्य हैं। प्रकाश यानी समझ की रोशनी, जो सत्त्व से आती है। प्रवृत्ति यानी काम में लग जाने की हलचल, जो रज से आती है। और मोह यानी धुँधलापन, जो तम से आता है।

अब ध्यान दीजिए, श्रीकृष्ण यह नहीं कह रहे कि गुणातीत के भीतर ये तीनों आते ही नहीं। वे कह रहे हैं, "संप्रवृत्तानि", जब ये आ जाते हैं। यानी आते हैं। उसके मन में भी कभी साफ़ समझ चमकती है, कभी काम की हलचल उठती है, कभी थकान का धुँधलापन छाता है। शरीर है, मन है, तो ये मौसम आएँगे ही। फ़र्क़ बस इतना है कि वह इनसे लड़ता नहीं, और इनके पीछे भागता नहीं। आए तो द्वेष नहीं, गए तो चाह नहीं।

मधुसूदन सरस्वती इसे और खोलते हैं। वे कहते हैं, जो दुःख देने वाला है, वह आए, तो भी उसे दुःख मानकर वह उससे द्वेष नहीं करता। और जो सुख देने वाला है, वह चला जाए, तो भी उसे सुख मानकर वह उसकी चाह नहीं करता। अभिनवगुप्त इसमें एक वाक्य जोड़ते हैं, जो मुझे बहुत भाता है। वे कहते हैं, ये प्रकाश वगैरह तो सबके भीतर चलते हैं, योगियों के भीतर भी। पर योगी इन्हें बस शरीर के धर्म की तरह देखते हैं, और मानते हैं: ये मुझे हिला देने के लिए काफ़ी नहीं।

और अब शंकराचार्य की वह बात, जो इस श्लोक को एक अलग ही ऊँचाई पर रख देती है। वे कहते हैं, यह लक्षण दूसरे को दिखने वाला नहीं है। यह अपने ही भीतर दिखने वाला है। क्योंकि किसी के भीतर द्वेष है या चाह है, यह दूसरा आदमी नहीं देख सकता। मधुसूदन सरस्वती और बलदेव विद्याभूषण भी यही दोहराते हैं। इसका अर्थ समझिए। यह श्लोक दूसरों को नापने का फ़ीता नहीं है। यह अपने भीतर झाँकने का दीया है। हम अक्सर किसी साधु या किसी बड़े को देखकर कहते हैं, "वह तो बिल्कुल शान्त है", या "उसमें तो अभी बहुत राग है।" पर इस श्लोक का लक्षण बाहर से कोई नहीं जाँच सकता। इसे केवल अपने भीतर जाँचा जा सकता है।

यह बात साधना करने वालों के लिए बहुत काम की है, इसलिए मैं अपनी ओर से एक उदाहरण दूँ। आप सुबह ध्यान में बैठे। पहले दस मिनट मन बहुत साफ़ था, बड़ी शान्ति थी, जैसे भीतर रोशनी हो। फिर अचानक दफ़्तर की कोई बात याद आ गई, और मन उधर दौड़ने लगा। फिर थोड़ी देर में नींद-सी आने लगी। अब ज़्यादातर लोग क्या करते हैं? नींद आई तो अपने आप पर ग़ुस्सा, "मुझसे कुछ नहीं होता।" और वह साफ़ शान्ति वाला पल चला गया तो उसकी याद में तड़प, "कल जैसा आज क्यों नहीं हुआ?" यह श्लोक कहता है, न नींद से लड़िए, न बीते हुए पल को पकड़िए। प्रकाश आया, अच्छा। प्रवृत्ति आई, देख लिया। मोह आया, वह भी देख लिया। आए तो द्वेष नहीं, जाए तो चाह नहीं। जो आता है, आने दीजिए, जो जाता है, जाने दीजिए, और आप वहीं बैठे रहिए।

और संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर चित्रों की झड़ी लगा देते हैं। वे कहते हैं, सूरज को कोई सुबह, दोपहर और शाम की गिनती नहीं होती; वह तो बस है। बारिश से समुद्र बड़ा नहीं होता। बर्फ़ से हिमालय काँपता नहीं। और गरमी के मौसम में आग को कौन जलाता है? यानी जो अपने स्वरूप में बैठा है, उसके ऊपर से गुणों के मौसम ऐसे गुज़र जाते हैं, जैसे समुद्र के ऊपर से बारिश।

अब तेईसवाँ श्लोक। "उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते", जो उदासीन के समान बैठा रहता है, और गुणों द्वारा विचलित नहीं किया जाता, "गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते", "गुण ही बरत रहे हैं" ऐसा जानकर जो स्थिर रहता है, और डोलता नहीं।

"उदासीन" शब्द पर रुकना ज़रूरी है, क्योंकि आज की हिन्दी में इसका अर्थ बदल गया है। आज हम उदासीन कहते हैं तो लगता है, जो उदास है, जिसे किसी चीज़ में रुचि नहीं, जो रूखा है। पर यहाँ यह अर्थ नहीं है। मधुसूदन सरस्वती और बलदेव विद्याभूषण इसका सीधा अर्थ करते हैं: जैसे दो लोग झगड़ रहे हों, और बीच में खड़ा तीसरा आदमी किसी का पक्ष न ले, न किसी पर रीझे, न किसी से चिढ़े। यानी उदासीन वह जो किसी पक्ष में खिंचा नहीं। और श्लोक में उदासीन के साथ "वत्" भी लगा है, यानी उदासीन के समान। वह सचमुच रूखा नहीं हो गया। वह भीतर से पूरा जीवित है, प्रेम से भरा है, बस गुणों के झगड़े में किसी का पक्ष लेकर खिंचता नहीं।

और यहाँ एक बात आपको चौंकाएगी। ये शब्द, "उदासीनवदासीनो", गीता में पहले भी आ चुके हैं। पच्चीसवें सत्संग में आपने नौवें अध्याय का यह श्लोक सुना था, जहाँ श्रीकृष्ण अपने बारे में कहते हैं: "न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय", हे धनञ्जय, वे कर्म मुझे नहीं बाँधते, "उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु", क्योंकि मैं उन कर्मों में उदासीन के समान बैठा हूँ, असक्त। वहाँ भगवान ने बताया था कि वे सारी सृष्टि को चलाते हुए भी उसमें कैसे रहते हैं। और यहाँ, गुणातीत का वर्णन करते हुए, वे वही शब्द दोहराते हैं। यानी जो गुणों के पार गया, वह इस संसार में उसी ढंग से जीता है जिस ढंग से भगवान स्वयं इस संसार में रहते हैं। सब करते हुए, किसी से बँधे बिना।

फिर दूसरी पंक्ति: "गुणा वर्तन्त इत्येव", गुण ही बरत रहे हैं। उन्नीसवें श्लोक में हमने यही बात सुनी थी, और तीसरे अध्याय में भी। पर यहाँ उसके साथ दो क्रियाएँ जुड़ी हैं: "योऽवतिष्ठति", जो स्थिर रहता है, और "नेङ्गते", वह डोलता नहीं। रामानुजाचार्य कहते हैं, वह गुणों के काम के अनुसार चेष्टा नहीं करता, यानी जो लहर उठी, उसके पीछे बह नहीं जाता।

संत ज्ञानेश्वर यहाँ फिर बहुत सुन्दर बात कहते हैं। हवा चलती है और थमती है, पर आकाश अपनी जगह स्थिर रहता है। समुद्र में ज्वार चन्द्रमा के कारण उठता है, चन्द्रकान्त मणि चाँदनी में पिघलती है, कुमुद खिलते हैं, और चन्द्रमा चुपचाप वहीं है।

अब यह हमारे घर में कैसा दिखता है, यह मैं अपनी ओर से कहूँ। एक छोटा बच्चा ज़िद पकड़ लेता है, रोता है, चीज़ें फेंकता है। एक माँ उसी पल ख़ुद भी चिल्लाने लगती है, और फिर दो लोग रो रहे होते हैं। दूसरी माँ बच्चे के पास बैठ जाती है, शान्त, और भीतर से जानती है, "यह थकान है, भूख है, यह लहर है, यह गुज़र जाएगी।" वह बच्चे से प्यार करना बन्द नहीं करती। वह रूखी नहीं हो गई। बस उस लहर के साथ बह नहीं गई। "गुणा वर्तन्त इत्येव"। और अक्सर, उसी शान्ति को छूकर, बच्चा भी थोड़ी देर में शान्त हो जाता है।

और यहाँ एक बात आचार्यों के बीच के फ़र्क़ की भी कह दूँ, ताकि आप उलझें नहीं। हमारी टीका कहती है, बाईसवाँ और तेईसवाँ श्लोक लक्षण बताते हैं, और चौबीसवाँ-पच्चीसवाँ आचरण। पर श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती बाँटते हैं कि लक्षण केवल बाईसवें श्लोक में है, जो अपने भीतर दिखता है, और तेईसवें से पच्चीसवें तक आचरण है, जो दूसरों को भी दिखता है। दोनों तरह बात एक ही है। एक भीतर की बात है जो केवल आप जानते हैं, और एक बाहर की, जो दुनिया देखती है।

तो इन दो श्लोकों से आज के लिए तीसरी बात यह निकलती है: गुणों के पार जाने का अर्थ यह नहीं कि भीतर कोई मौसम ही न आए। अर्थ यह है कि मौसम आए, तो आप उससे लड़ें नहीं, और जाए, तो उसके पीछे न भागें। बैठे रहें, जैसे भगवान इस संसार में बैठे हैं, सब करते हुए, किसी से बँधे बिना।

पर अभी एक बात बाकी है। अब तक भीतर की बात हुई। पर ऐसा आदमी बाहर की दुनिया में, सोने और मिट्टी के बीच, तारीफ़ और गाली के बीच, दोस्त और दुश्मन के बीच, कैसे जीता है? अगले दो श्लोक उसका पूरा चित्र खींचते हैं, और उस चित्र के लिए महाभारत में एक ऐसा आदमी है जिसका यह निश्चय सुनकर कभी स्वयं धृतराष्ट्र का मन शोक से भर गया था।

समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः । तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥ २४ ॥
गीता 14.24 — अर्थ पढ़ें ›
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः । सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥ २५ ॥
गीता 14.25 — अर्थ पढ़ें ›

चौबीसवाँ श्लोक। "समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः", वह दुःख और सुख में सम है, अपने स्वरूप में स्थित है, मिट्टी के ढेले, पत्थर और सोने को समान मानता है। "तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः", प्रिय और अप्रिय में समान है, धीर है, और अपनी निन्दा और अपनी स्तुति में समान है।

इस श्लोक का हर शब्द एक छोटा-सा दरवाज़ा है। पहला शब्द, "समदुःखसुखः"। यह शब्द आपने अभी कुछ ही दिन पहले बारहवें अध्याय में सुना था, जहाँ श्रीकृष्ण अपने प्रिय भक्त के लक्षण बता रहे थे: "निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी"। यानी जो भक्त भगवान को प्रिय है, और जो गुणों के पार गया है, उनकी पहचान एक ही शब्द से शुरू होती है।

दूसरा शब्द, "स्वस्थः"। आज की हिन्दी में स्वस्थ का अर्थ है जिसकी तबीयत ठीक हो। पर इस शब्द का पुराना और गहरा अर्थ है, जो अपने में स्थित है। शंकराचार्य इसे खोलते हैं, "स्वे आत्मनि स्थितः", अपने आत्मा में स्थित, और प्रसन्न। और मधुसूदन सरस्वती इसे पहले शब्द का कारण बताते हैं। वह सुख-दुःख में सम क्यों है? क्योंकि वह स्वस्थ है, अपने में टिका है। सोचिए, कितनी सुन्दर बात है। असली तन्दुरुस्ती वह है जब आदमी अपने घर में टिका हो, और बाहर की हवा उसे उड़ा न ले जाए।

तीसरा शब्द, "समलोष्टाश्मकाञ्चनः", मिट्टी का ढेला, पत्थर और सोना, तीनों बराबर। यह भी आपने पहले सुना है। अठारहवें सत्संग में छठे अध्याय में योगी की पहचान यही थी: "युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः"। संत ज्ञानेश्वर इसे अपनी भाषा में और भी सीधा कहते हैं: उसके लिए गोबर और सोने में कोई अन्तर नहीं, रत्न और कंकड़ में कोई भेद नहीं। इसका अर्थ यह नहीं कि वह सोने को पहचानता नहीं, या उसे फेंक देता है। अर्थ यह है कि सोना उसके मन को खींचता नहीं, और मिट्टी उसके मन को छोटा नहीं करती।

फिर धीर। शंकराचार्य इसका अर्थ करते हैं, बुद्धिमान। मधुसूदन कहते हैं, बुद्धिमान या धैर्यवान। और नीलकण्ठ एक ऐसा चित्र देते हैं जो इस पूरे श्लोक की कुंजी है। वे कहते हैं, जैसे कोई शूरवीर तीखे प्रहार की पीड़ा से दुखी होकर भी मूर्च्छित नहीं होता; पीड़ा को अनुभव करता है, पर धीरज से डिगता नहीं। यह बात बहुत ज़रूरी है। गुणातीत पत्थर नहीं हो जाता। उसे भी चोट लगती है, उसे भी दर्द होता है। वह अनुभव करता है। पर वह डिगता नहीं।

और आख़िरी शब्द, "तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः", अपनी निन्दा और अपनी स्तुति, दोनों बराबर। संत ज्ञानेश्वर कहते हैं, वह राख की तरह है, जो न फिर से जलती है, न बुझती है।

और अब महाभारत के आदि पर्व का वह राजा, जिसके मुँह से यही शब्द, ठीक यही शब्द, निकले थे। अर्जुन के पिता पाण्डु। उनकी कथा आपने सोलहवें सत्संग में सुनी थी: मुनि किन्दम को हिरन समझकर बाण चलाना, उनका शाप, और पाण्डु का सब छोड़कर केवल मुक्ति का निश्चय करना। उसे मैं दोबारा नहीं सुनाऊँगा।

आज बस वही जगह फिर खोलता हूँ, क्योंकि वहाँ दो पंक्तियाँ आज के श्लोक के बहुत पास बैठती हैं। जिस जीवन का पाण्डु ने निश्चय किया था, उसका वर्णन करते हुए वे कहते हैं: न शोक करूँगा, न हर्षित होऊँगा, और अपनी निन्दा और अपनी स्तुति को एक समान मानूँगा। मूल में शब्द हैं "तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः", जो आज श्रीकृष्ण के गुणातीत वाले श्लोक का भी आख़िरी शब्द है। और उसी जगह वह पंक्ति भी है जो सोलहवें सत्संग में आई थी: कोई एक बाँह बसूले से काटे और दूसरा दूसरी बाँह पर चन्दन लगाए, तो न एक का बुरा सोचूँगा, न दूसरे का भला। यही गीता का "तुल्यप्रियाप्रियो" है। प्रिय और अप्रिय में समान।

और उस कथा का एक छोटा-सा हिस्सा तब नहीं कहा था। जब सेवकों ने हस्तिनापुर पहुँचकर सब बताया, तो धृतराष्ट्र केवल पाण्डु के लिए शोक करने लगे। उन्हें शय्या में, आसन में, भोजन में, कहीं आनन्द नहीं मिलता था। वही धृतराष्ट्र आज सञ्जय के मुँह से सुन रहे हैं कि श्रीकृष्ण उसी पाण्डु के बेटे को गुणातीत की पहचान बता रहे हैं। और बाईसवें श्लोक में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को किस नाम से पुकारा था, याद है? "पाण्डव"। मैं नहीं कहता कि यह जान-बूझकर था। पर सुनने वाले के लिए यह संयोग बहुत कुछ कह जाता है।

अब पच्चीसवाँ श्लोक। "मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः", मान और अपमान में समान, मित्र और शत्रु के पक्ष में समान, "सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते", सब आरम्भों का त्यागी, वह गुणातीत कहा जाता है।

पिछले श्लोक में निन्दा और स्तुति आई थी, यहाँ मान और अपमान। क्या ये एक ही बात नहीं? मधुसूदन सरस्वती और बलदेव विद्याभूषण एक बारीक फ़र्क़ बताते हैं। निन्दा और स्तुति शब्दों से होती है। पर मान और अपमान बिना शब्द के भी हो सकते हैं, शरीर से, व्यवहार से। किसी ने आपको सभा में आगे की कुर्सी दी, यह मान है। किसी ने आपको देखकर भी अनदेखा कर दिया, यह अपमान है। एक शब्द नहीं बोला गया, फिर भी दिल पर चोट लगी। गुणातीत उस चोट में भी सम रहता है।

और "मित्रारिपक्षयोः", मित्र और शत्रु के पक्ष में। शंकराचार्य यहाँ एक सवाल उठाते हैं: जो सबके प्रति उदासीन है, उसका कौन मित्र, कौन शत्रु? और उत्तर देते हैं, वह स्वयं तो किसी को मित्र या शत्रु नहीं मानता, पर दूसरे लोग अपनी ओर से उसके मित्र या शत्रु बन जाते हैं। यह बहुत सच्ची बात है। आप किसी से वैर न रखें, तो भी कोई आपसे वैर रख सकता है। गुणातीत उसे रोक नहीं सकता। पर वह उसके वैर का उत्तर वैर से नहीं देता।

और फिर "सर्वारम्भपरित्यागी"। यहाँ आचार्यों में सचमुच फ़र्क़ है, और वह फ़र्क़ आपके सामने रखना ठीक है। शंकराचार्य और मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, इसका अर्थ है शरीर चलाने भर के कामों को छोड़कर सब कर्मों का त्याग, यानी संन्यासी का जीवन। लोकमान्य तिलक इससे सहमत नहीं। वे कहते हैं, ये लक्षण दूसरे अध्याय के स्थितप्रज्ञ और बारहवें अध्याय के भक्त के लक्षणों जैसे ही हैं, और गीता ने तीसरे, चौथे, पाँचवें अध्याय में पक्का कर दिया है कि निष्काम कर्म किसी से नहीं छूटता; इसलिए ये सब कर्मयोग के मार्ग के लोग हैं।

मैं किसी का पक्ष नहीं लूँगा। बस इतना ध्यान दिलाऊँगा कि पिछले सत्संग में रज के लक्षणों में एक शब्द आया था, आरम्भ, यानी कर्मों का आरम्भ, नए-नए काम शुरू करने की बेचैनी। तो जो सब आरम्भों का त्यागी है, उसने कम से कम वह बेचैनी छोड़ दी है जो हर दिन कुछ नया पकड़ने को दौड़ाती है। और सोलहवें सत्संग वाली पाण्डु की कथा भी यही दिखाती है। वे अकेले भिक्षु बनने निकले थे, पर कुन्ती और माद्री ने कहा था, धर्म में रहते हुए साथ रहकर भी तप हो सकता है। जो निन्दा-स्तुति में सम हो, वह वन में भी हो सकता है, और घर में भी।

और अब मधुसूदन सरस्वती की वह बात, जो इन दोनों श्लोकों को सुनकर घबराए हुए मन को सहारा देती है। वे कहते हैं, ये जो उदासीनता वगैरह के लक्षण बताए गए, वे ज्ञान होने से पहले साधक के लिए प्रयत्न से साधने की चीज़ हैं; और ज्ञान हो जाने पर वही बिना प्रयत्न के स्वभाव बनकर रहते हैं। यानी आज अगर किसी की कड़वी बात पर मन दुखता है, और आप फिर भी कोशिश करके चुप रह जाते हैं, तो आप ग़लत नहीं कर रहे। आप वही कर रहे हैं जो एक साधक को करना है। जो आज कोशिश है, वही कल स्वभाव बनेगा।

पर अभी एक बात बाकी है, और वह इस पूरे अध्याय की सबसे बड़ी बात है। अर्जुन का तीसरा प्रश्न था: वह इन गुणों को पार कैसे करता है? पाण्डु ने तप चुना था। पर श्रीकृष्ण इसका उत्तर एक बिल्कुल अलग शब्द में देने वाले हैं। आइए, सुनते हैं।

मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते । स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ २६ ॥
गीता 14.26 — अर्थ पढ़ें ›
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च । शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥ २७ ॥
गीता 14.27 — अर्थ पढ़ें ›

छब्बीसवाँ श्लोक। "मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते", और जो अटल भक्तियोग से मेरी सेवा करता है, "स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते", वह इन गुणों को भली-भाँति पार करके ब्रह्म होने के योग्य हो जाता है। हमारी टीका कहती है, यही अर्जुन के तीसरे प्रश्न का उत्तर है: गुणों को पार कैसे करें।

सोचिए, उत्तर क्या आया। अर्जुन ने पूछा था, रास्ता क्या है? और हम सोच रहे होंगे कि अब कोई कठिन साधना बताई जाएगी, कोई तप, कोई लम्बा अभ्यास। पर श्रीकृष्ण कहते हैं, "मां च", मुझे। मेरी सेवा, अटल भक्ति से। रामानुजाचार्य बताते हैं कि यह उत्तर क्यों ज़रूरी था। वे कहते हैं, उन्नीसवें श्लोक में जो कहा गया, गुणों को कर्ता देखना और आत्मा को अलग जानना, वह विवेक अकेला गुणों के पार नहीं ले जाता, क्योंकि अनादि काल से चले आ रहे उलटे संस्कार उस विवेक को बार-बार दबा देते हैं। इसलिए उस भगवान की भक्ति चाहिए जो, रामानुजाचार्य के शब्दों में, शरण आए हुओं पर स्नेह का समुद्र है।

और यह बात गीता में पहले भी आ चुकी है। इक्कीसवें सत्संग में सातवें अध्याय का वह श्लोक आपने सुना था: "दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया", मेरी यह तीन गुणों वाली दैवी माया पार करने में कठिन है, "मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते", जो मेरी ही शरण आते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं। रामानुजाचार्य यहाँ उसी को याद करते हैं।

अब सबसे ज़रूरी बात: अव्यभिचार, यानी न डिगना। शंकराचार्य कहते हैं, ऐसी भक्ति जो कभी डिगती नहीं। नीलकण्ठ इसे तेल की धार जैसा बताते हैं, जो बीच में टूटती नहीं। और अभिनवगुप्त इस पर एक ऐसी बात कहते हैं जो मुझे इस श्लोक की सबसे सुन्दर टीका लगती है। वे कहते हैं, जो फल चाहकर भगवान को साधन बनाता है, उसकी भक्ति अव्यभिचारिणी नहीं। सच्चा भक्त वह है जिससे कोई पूछे, "यह क्या बेकार का काम करते हो?", तो वह कोई तर्क नहीं देता। उसके रोम खड़े हो जाते हैं, शरीर काँपता है, आँखों से आँसू बहते हैं, और वह चुप रहकर ही उत्तर दे देता है।

और अब मैं आपको महाभारत की एक छोटी-सी कथा सुनाता हूँ, जिसे भीष्म ने अनुशासन पर्व में, उसी बाणों की शय्या से, युधिष्ठिर को सुनाया था। युधिष्ठिर ने पूछा था, पितामह, दया के और भक्त के गुण बताइए।

भीष्म बोले: काशी के राज्य में एक व्याध विष लगा बाण लेकर हिरन का शिकार करने निकला। उसने बाण चलाया, पर बाण हिरन को न लगकर पास के एक विशाल पेड़ में जा धँसा। विष इतना तेज़ था कि पेड़ के फल और पत्ते झड़ गए, और वह सूख गया। उस पेड़ के कोटर में बहुत समय से एक तोता रहता था। पाठ कहता है, पेड़ की ऐसी दशा हो जाने पर भी वह तोता उस पेड़ की भक्ति के कारण उसे नहीं छोड़ता था। न कहीं उड़कर जाता, न कुछ खाता। थका हुआ, धीमी आवाज़ वाला, वह कृतज्ञ तोता पेड़ के साथ-साथ ख़ुद भी सूखने लगा।

और अब वह शब्द सुनिए जिसके लिए मैंने यह कथा चुनी। पाठ कहता है, उस तोते को "समदुःखसुखं" देखकर, यानी सुख और दुःख में समान देखकर, इन्द्र चकित हो गए। वही शब्द, जिससे आज के चौबीसवें श्लोक में गुणातीत की पहचान शुरू हुई थी। और वह किसी दार्शनिक में नहीं, एक छोटे-से पक्षी में दिखा, जिसने कोई शास्त्र नहीं पढ़ा था, बस एक पेड़ से प्रेम किया था।

इन्द्र ब्राह्मण का वेश धरकर आए और पूछा: यह वन इतना बड़ा है, इसमें पत्तों से ढके, सुन्दर, हरे-भरे कितने पेड़ हैं। इस सूखे, फल-पत्तों से ख़ाली, बेसहारा पेड़ की सेवा क्यों करते हो? बुद्धि से सोचो, इसे छोड़ दो। तोते ने सिर झुकाकर प्रणाम किया और कहा, देवराज, मैंने आपको पहचान लिया। फिर एक लम्बी साँस भरकर बोला: मैं इसी पेड़ में जन्मा, बचपन में इसी ने मेरी रक्षा की, यहाँ कभी किसी शत्रु ने मुझे नहीं सताया। जिस पर अच्छे दिनों में जीवन बिताया, उसे बुरे दिनों में कोई कैसे छोड़ दे?

इन्द्र उसकी बात से इतने प्रसन्न हुए कि बोले, वर माँगो। और तोते ने अपने लिए कुछ नहीं माँगा। उसने माँगा कि यह पेड़ फिर से जी उठे। इन्द्र ने पेड़ को अमृत से सींच दिया, और पाठ कहता है, तोते की दृढ़ भक्ति के कारण वह पेड़ फिर से फल, पत्तों और सुन्दर शाखाओं से भर गया। और भीष्म ने कथा इस वाक्य पर समाप्त की: जैसे पेड़ ने तोते को पाकर सब कुछ पा लिया, वैसे ही जो किसी भक्त का आश्रय लेता है, वह सब अर्थों की सिद्धि पाता है।

अब इस कथा को अव्यभिचारी भक्ति के साथ रखिए। हमारी भक्ति अक्सर कैसी होती है? जब तक प्रार्थना सुनी जा रही है, जब तक पेड़ हरा है, फल दे रहा है, तब तक हम वहीं बैठे रहते हैं। और जिस दिन कोई प्रार्थना पूरी नहीं हुई, कोई अपना चला गया, कोई काम बिगड़ गया, उस दिन हम दूसरे हरे पेड़ की तलाश में उड़ जाते हैं। अव्यभिचारिणी भक्ति वह है जो सूखे पेड़ को भी नहीं छोड़ती। और यही भक्ति आदमी को सुख-दुःख में सम बना देती है। तोते ने गुणों को पार करने की कोई विधि नहीं सीखी थी। प्रेम ने ही उसे पार करा दिया।

"ब्रह्मभूयाय कल्पते" का अर्थ आचार्य अलग-अलग करते हैं। शंकराचार्य और मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, ब्रह्म ही हो जाना, यानी मोक्ष; बलदेव विद्याभूषण कहते हैं, जीव का अपना शुद्ध स्वरूप पा लेना। रास्ता दोनों के लिए एक ही है: अटल भक्ति।

और अब इस अध्याय का अन्तिम श्लोक, सत्ताईसवाँ, जो बताता है कि भक्ति ही रास्ता क्यों है। "ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च", क्योंकि मैं ब्रह्म का, और अविनाशी अमृत का आधार हूँ, "शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च", सनातन धर्म का, और अखण्ड सुख का आधार हूँ।

"हि", क्योंकि। जिसकी सेवा की जा रही है, वही तो वह सब है जिसे पाना है। ब्रह्म भी, अमृत भी, धर्म भी, सुख भी। श्रीधर स्वामी इसे सूरज के उदाहरण से कहते हैं: जैसे सूरज का गोला घना हुआ प्रकाश ही है, वैसे ही मैं घना हुआ ब्रह्म ही हूँ। और मधुसूदन सरस्वती "ऐकान्तिक सुख" का अर्थ करते हैं, वह सुख जो इन्द्रियों और विषयों के मेल से नहीं आता, और जो हर जगह, हर समय रहता है। फिर इस अध्याय की अपनी टीका एक श्लोक पर समाप्त करते हैं, जिसका भाव है: मैं उस तेज को प्रणाम करता हूँ जो परम ब्रह्म है, मनुष्य की आकृति में, सुन्दरता का सार, नन्द का बेटा।

और यहीं चौदहवाँ अध्याय पूरा होता है। पर सुनने वाले की ओर एक बार देखिए। संत ज्ञानेश्वर बताते हैं कि जब सञ्जय यह अध्याय सुना रहे थे, तो धृतराष्ट्र बीच में बोल पड़े: सञ्जय, तुमसे यह सब किसने पूछा? बेकार की बातें क्यों करते हो? मेरी चिन्ता दूर करो, विजय की ख़बर सुनाओ। और ज्ञानेश्वर कहते हैं, सञ्जय मन ही मन चकित होकर सोचने लगे, इनका भगवान से ऐसा उलटा भाव क्यों है? गुणातीत के लक्षण सामने रखे हैं, अमृत का रास्ता खुला है, और राजा पूछ रहा है, जीत किसकी होगी? हम भी कई बार वही करते हैं। सत्संग में बैठे होते हैं, और मन पूछ रहा होता है, मेरा वह काम बनेगा या नहीं।

और अगला अध्याय, महाभारत के भीष्म पर्व का उनतालीसवाँ, "पुरुषोत्तम योग", एक अनोखे पेड़ से शुरू होता है: "ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्", एक अश्वत्थ, पीपल का पेड़, जिसकी जड़ें ऊपर हैं और शाखाएँ नीचे, और वेद के छन्द जिसके पत्ते हैं। आज हमने एक तोते को एक सूखे पेड़ से चिपके देखा। अगली बार श्रीकृष्ण एक उल्टे पेड़ की बात करेंगे, जिससे छूटना है। वह पेड़ क्या है, इसका उत्तर अगले सत्संग में।

तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली बात। अन्त की तैयारी आज से होती है। मृत्यु के समय कौन-सा गुण बढ़ा होगा, यह रोज़ का भोजन, रोज़ की संगत, रोज़ का मन तय करता है। और रज का फल ऊपर से मीठा, भीतर कड़वा होता है।

दूसरी बात। गुणों के पार जाने का अर्थ यह नहीं कि भीतर कोई मौसम न आए। प्रकाश आए, हलचल आए, धुँधलापन आए, आए तो द्वेष नहीं, जाए तो चाह नहीं। और यह लक्षण दूसरों को नापने का नहीं, अपने भीतर झाँकने का है।

तीसरी बात। वहाँ तक पहुँचने का रास्ता अटल भक्ति है, उस तोते जैसी, जो सूखे पेड़ को भी नहीं छोड़ता। और जो आज कोशिश करके सम रहना है, वही कल स्वभाव बन जाता है।

आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आपके जीवन में कोई ऐसा व्यक्ति है, या रहा है, जो तारीफ़ और निन्दा, दोनों में एक-सा रहता था? और क्या कभी ऐसा हुआ कि कोई प्रार्थना पूरी नहीं हुई, फिर भी आपने भगवान का हाथ नहीं छोड़ा? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।

जिस पर अच्छे दिनों में जीवन बिताया, उसे बुरे दिनों में कोई कैसे छोड़ दे। यही अव्यभिचारिणी भक्ति है।

जय श्री कृष्ण।

मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते । स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ २६ ॥
गीता 14.26 — अर्थ पढ़ें ›

तीन बातें

  1. अन्त की तैयारी आज से होती है। मृत्यु के समय कौन-सा गुण बढ़ा होगा, यह रोज़ का भोजन, रोज़ की संगत, रोज़ का मन तय करता है। और रज का फल ऊपर से मीठा, भीतर कड़वा होता है।
  2. गुणों के पार जाने का अर्थ यह नहीं कि भीतर कोई मौसम न आए। प्रकाश आए, हलचल आए, धुँधलापन आए, आए तो द्वेष नहीं, जाए तो चाह नहीं। और यह लक्षण दूसरों को नापने का नहीं, अपने भीतर झाँकने का है।
  3. वहाँ तक पहुँचने का रास्ता अटल भक्ति है, उस तोते जैसी, जो सूखे पेड़ को भी नहीं छोड़ता। और जो आज कोशिश करके सम रहना है, वही कल स्वभाव बन जाता है।