मैं ऐसा क्यों हूँ
गीता 14.1–14.13 · 77 मिनट
आलस, बेचैनी, शांति: तीन गुण
श्रीभगवानुवाच
परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ।
यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥ १ ॥
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥ २ ॥
मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् ।
संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥ ३ ॥
कभी आपने अपने आप से यह पूछा है? किसी सुबह आँख खुलती है और मन अपने आप हल्का होता है, साफ़ होता है, हर बात समझ में आती है, किसी पर गुस्सा नहीं आता। फिर किसी दिन वही आप, उसी घर में, उसी बिस्तर से उठते हैं, और मन में बेचैनी भरी होती है, एक काम ख़त्म नहीं होता कि दूसरा सिर पर, फ़ोन हाथ से छूटता नहीं। और किसी और दिन कुछ करने का मन ही नहीं करता, जो करना है वह भी टलता जाता है, आँखें खुली हैं पर जैसे कुछ दिखता नहीं। और रात को लेटकर हम सोचते हैं: मैं ऐसा क्यों हूँ? मैं एक जैसा क्यों नहीं रह पाता?
जय श्री कृष्ण।
आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का चालीसवाँ सत्संग है, और आज हम गीता के चौदहवें अध्याय का दरवाज़ा खोल रहे हैं। यह वह अध्याय है जो आपके इस सवाल का, कि मैं ऐसा क्यों हूँ, सबसे सीधा उत्तर देता है। पर पहले जल्दी से याद कर लें कि पिछली बार हम कहाँ रुके थे। उनतालीसवें सत्संग में तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ था, और उसकी बात थी: सबमें एक ही भगवान। "समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्", जो सब प्राणियों में एक-सा बैठे परमेश्वर को देखता है, जो नष्ट होने वाली चीज़ों के बीच उस न नष्ट होने वाले को देखता है, वही सचमुच देखता है। फिर यह बात आई कि सारे काम प्रकृति ही करती है, और जो अपने आत्मा को करने वाला नहीं, देखने वाला जानता है, वही ठीक देखता है। फिर आकाश की उपमा, जो सब जगह होकर भी किसी चीज़ से मैला नहीं होता। और फिर सूरज: "यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः", जैसे एक सूरज पूरे संसार को रोशन करता है, वैसे ही भीतर बैठा वह जानने वाला पूरे शरीर को रोशन करता है। और अध्याय के आख़िर में कहा गया कि जो ज्ञान की आँख से शरीर और उसे जानने वाले का यह भेद देख लेता है, और यह जान लेता है कि प्राणी प्रकृति से कैसे छूटते हैं, वह परम पद को जाता है।
पर एक बात तेरहवें अध्याय में बीच में कही गई थी, और फिर अधूरी छोड़ दी गई थी। श्रीकृष्ण ने कहा था, "कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु", गुणों का संग ही इस जीव के अच्छी-बुरी योनियों में जन्म का कारण है। गुणों का संग। कौन-से गुण? वे बाँधते कैसे हैं? किस गुण के संग से क्या होता है? और उनसे छूटें कैसे? मधुसूदन सरस्वती और नीलकण्ठ, दोनों कहते हैं कि यही सवाल बचे थे, और इन्हें खोलकर समझाने के लिए चौदहवाँ अध्याय शुरू होता है।
और याद रखिए, यह सब हमें सुनाया कौन जा रहा है। हस्तिनापुर के महल में अन्धे राजा धृतराष्ट्र बैठे हैं, और सञ्जय उन्हें सुना रहे हैं, उस दिन जब भीष्म बाणों की शय्या पर गिर चुके हैं। महाभारत के भीष्म पर्व के पच्चीसवें से बयालीसवें अध्याय तक गीता है, और उसमें अड़तीसवाँ अध्याय गीता का चौदहवाँ अध्याय है, जिसका नाम है "गुणत्रय विभाग योग"। यानी तीन गुणों को अलग-अलग पहचानने का योग। सत्त्व, रज और तम।
और एक बात मैं शुरू में ही बता दूँ, क्योंकि आज के पूरे सत्संग में यह हमारे साथ चलेगी। ग्यारहवें और पंद्रहवें सत्संग में आपने सुना था कि युद्ध के बाद अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा था, "आपने जो मित्रता से कहा था, वह मेरे विचलित मन से छूट गया।" तब श्रीकृष्ण ने वही बातें एक दूसरे रास्ते से, पुरानी कथाओं के रूप में, फिर सुनाईं। इसे अनुगीता कहते हैं, और यह आश्वमेधिक पर्व में है। उस अनुगीता में एक जगह स्वयं ब्रह्मा ऋषियों को तीनों गुणों के लक्षण एक-एक करके गिनाते हैं: तम के, रज के, और सत्त्व के। यानी महाभारत ने यह विषय इतना ज़रूरी माना कि इसे दो बार कहा। आज जहाँ-जहाँ ठीक लगेगा, ब्रह्मा की वह सूची भी हम खोलेंगे।
तो पहला श्लोक, और इसमें श्रीकृष्ण बोलते हैं। "परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्।" मैं फिर वह परम ज्ञान कहूँगा, जो सब ज्ञानों में उत्तम है। "यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः", जिसे जानकर सब मुनि यहाँ से परम सिद्धि को प्राप्त हुए।
पहले "भूयः", यानी फिर से। शंकराचार्य कहते हैं, यह ज्ञान पिछले अध्यायों में बार-बार कहा जा चुका है, फिर भी श्रीकृष्ण इसे फिर कहते हैं। यह बात मुझे बहुत अपनी लगती है। अच्छा शिक्षक एक बार कहकर नहीं छोड़ देता। माँ भी बच्चे से एक ही बात दस बार कहती है, और हर बार इस आशा से कहती है कि शायद इस बार बैठ जाए। भगवान भी हमारे साथ ऐसे ही धीरज से चलते हैं।
फिर दो शब्द: "परं", और "ज्ञानमुत्तमम्" में छिपा उत्तम। मधुसूदन सरस्वती इन दोनों में एक बारीक भेद दिखाते हैं। "परं" इसलिए, कि इसका विषय सबसे ऊँचा है। और उत्तम इसलिए, कि इसका फल सबसे ऊँचा है। और शंकराचार्य एक बात और कहते हैं: बताने से पहले श्रीकृष्ण इस ज्ञान की प्रशंसा इसलिए करते हैं, ताकि सुनने वाले के मन में रुचि जागे। जैसे कोई बुज़ुर्ग कहानी शुरू करने से पहले कहे, "अब जो बताने जा रहा हूँ, उसे ध्यान से सुनना, यह सबसे काम की बात है।" बलदेव विद्याभूषण इसके लिए एक घरेलू उपमा देते हैं: यह ज्ञान ऐसा है जैसे दूध को मथकर ऊपर निकाला हुआ मक्खन।
और "यज्ज्ञात्वा", जिसे जानकर। अभिनवगुप्त इस शब्द पर रुकते हैं और कहते हैं, इससे पता चलता है कि यह ज्ञान अनुभव में परखा हुआ है, जाना-माना है। और सच कहूँ तो आज की बात में यही सबसे सुंदर है। सत्त्व, रज और तम कोई ऐसी चीज़ नहीं जिस पर आपको आँख मूँदकर भरोसा करना पड़े। आज के सत्संग के बाद, आज ही शाम को, आप अपने ही मन में इन्हें पहचानकर देख सकते हैं। संत ज्ञानेश्वर कहते हैं, इस ज्ञान के सामने दूसरे ज्ञान ऐसे हैं जैसे आग के सामने घास, या जैसे सूरज उगने पर चाँद और तारों की रोशनी छिप जाती है।
अब दूसरा श्लोक। "इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः।" जो इस ज्ञान का सहारा लेकर मेरे स्वरूप की समानता को प्राप्त हो गए हैं, "सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च", वे सृष्टि के समय भी जन्म नहीं लेते, और प्रलय के समय भी व्यथित नहीं होते।
"मम साधर्म्यमागताः", मेरे जैसे धर्म को, मेरे जैसे स्वरूप को पा गए। यहाँ आचार्यों में एक पुराना और सुंदर मतभेद है, और मैं उसे आपके सामने वैसा ही रखूँगा। शंकराचार्य और मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, यहाँ साधर्म्य का अर्थ है भगवान के स्वरूप में एक हो जाना, क्योंकि गीता जीव और ईश्वर में अन्त में कोई भेद नहीं मानती। रामानुजाचार्य, वल्लभाचार्य और विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं, यहाँ अर्थ है भगवान जैसा हो जाना, उनकी समानता पाना, पर भक्त भक्त ही रहता है, अपने भगवान के पास। दोनों रास्ते सदियों से चलते आए हैं, और दोनों पर चलकर लोग शान्ति तक पहुँचे हैं। हमारे लिए आज इतना काफ़ी है कि यह ज्ञान आदमी को वहाँ ले जाता है जहाँ भगवान हैं।
और उसका फल देखिए: न सृष्टि में जन्म, न प्रलय में व्यथा। आपको याद होगा, चौबीसवें सत्संग में हमने ब्रह्मा के दिन और रात की बात सुनी थी, कि हज़ार युगों का एक दिन होता है, और उतनी ही लम्बी रात, और रात आने पर सब कुछ उसी अव्यक्त में लौट जाता है। तो जो इस ज्ञान में टिक गया, उसके लिए वह पूरा दिन-रात का चक्का भी कोई डर नहीं रहा। और अगर हम इतने बड़े पैमाने से नीचे उतरकर अपने छोटे-से जीवन में देखें, तो "न व्यथन्ति", व्यथित नहीं होते, यह शब्द हमारे बहुत काम का है। हमारे जीवन में भी छोटी-छोटी सृष्टियाँ और छोटे-छोटे प्रलय आते रहते हैं: कोई नया काम शुरू होता है, कोई पुराना रिश्ता टूटता है, घर बसता है, घर बिखरता है। यह ज्ञान आँधी को रोकता नहीं, पर आँधी में आपको उखड़ने नहीं देता।
अब तीसरा श्लोक, जहाँ से असली बात शुरू होती है। "मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्।" महत् प्रकृति मेरी योनि है, और उसमें मैं बीज रखता हूँ। "संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत", उसी से, हे भारत, सब प्राणियों का जन्म होता है।
यहाँ "महद्ब्रह्म" शब्द पर अटकिए मत। हमारी टीका साफ़ कहती है कि यहाँ इसका अर्थ प्रकृति है, जो सब रूपों का स्रोत है, और अपने सब कामों से, अपनी सब रचनाओं से बड़ी होने के कारण "महत्" कहलाती है। और बीज क्या है? हमारी टीका कहती है, बीज चेतन अंश है: वे जीव, अपने-अपने पिछले कर्मों के संस्कारों के साथ, जिन्हें हर सृष्टि के आरम्भ में प्रकृति में रखा जाता है।
मधुसूदन सरस्वती यहाँ एक बहुत मानवीय उपमा देते हैं, जो इस श्लोक की भाषा में ही है: जैसे एक पिता माता के गर्भ में बीज रखता है, और उसी से सन्तान को शरीर मिलता है, वैसे ही प्रलय में भगवान में लीन पड़े जीवों को, सृष्टि के समय, भगवान प्रकृति से शरीर दिलाते हैं। रामानुजाचार्य इसे सातवें अध्याय से जोड़ते हैं, जो हमने इक्कीसवें सत्संग में सुना था: भगवान की दो प्रकृतियाँ हैं, एक जड़, धरती, जल, आग, हवा, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार वाली, और एक चेतन, जीव वाली। रामानुज कहते हैं, यहाँ भगवान अपने संकल्प से उस चेतन प्रकृति को उस जड़ प्रकृति से मिलाते हैं, और उसी मिलन से ब्रह्मा से लेकर घास के तिनके तक सब जन्म लेते हैं।
और अब ज़रा सोचिए, श्रीकृष्ण ने यह अध्याय कहाँ से शुरू किया। अर्जुन को और हमें यह बताना है कि हम ऐसे क्यों हैं, हमारे भीतर आलस क्यों है, बेचैनी क्यों है, शान्ति कभी-कभी ही क्यों आती है। पर यह सब बताने से पहले वे बताते हैं कि हम किसकी सन्तान हैं। यह बात मुझे बहुत गहरी लगती है। जब कोई बच्चा बिगड़ता है, या उदास रहता है, तो समझदार बड़े पहले उसे डाँटते नहीं। पहले उसे गोद में लेकर बताते हैं कि तुम हमारे हो। फिर उसकी आदतों की बात करते हैं। श्रीकृष्ण भी यही करते हैं। गुणों की बात बाद में। पहले यह, कि बीज मेरा है।
पर अभी एक बात बाकी है। अगर सबका बीज एक ही पिता से है, तो फिर उसकी सन्तानें इतनी अलग-अलग क्यों हैं? और एक ही आदमी कभी ऐसा, कभी वैसा क्यों हो जाता है? इसका उत्तर अगले दो श्लोकों में है, और उनमें पहली बार उन तीन नामों का उच्चारण होगा।
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः संभवन्ति याः ।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥ ४ ॥
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः ।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥ ५ ॥
चौथा श्लोक। "सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः संभवन्ति याः।" हे कुन्तीपुत्र, सब योनियों में जो भी शरीर जन्म लेते हैं, "तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता", उन सबकी योनि, यानी माता, महत् प्रकृति है, और मैं बीज देने वाला पिता हूँ।
"सर्वयोनिषु", सब योनियों में। रामानुजाचार्य इस एक शब्द को खोलकर गिनाते हैं: देवता, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, मनुष्य, पशु, हिरन, पक्षी, रेंगने वाले जीव। श्रीधर स्वामी कहते हैं, चलने वाले भी और न चलने वाले भी, पेड़-पौधे भी। कोई बाहर नहीं छूटा। जो साँस लेता है, जो उगता है, जो रेंगता है, जो उड़ता है, सबकी माँ एक, और सबके पिता एक।
संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर बड़े प्रेम से कहते हैं, मैं पिता हूँ, यह महत् प्रकृति माता है, और यह सारा फैला हुआ संसार हमारी सन्तान है। फिर वे एक बात कहते हैं जो मुझे इस पूरे अध्याय की कुंजी लगती है: इतने अलग-अलग शरीर देखकर मन में भेद मत करना। एक ही बीज से ऊँची-नीची, टेढ़ी-सीधी, कितनी तरह की डालियाँ निकलती हैं, पर पेड़ एक है। सोने के कितने गहने बनते हैं, कंगन, हार, अँगूठी, पर गहना बनने से सोने का सोनापन चला नहीं जाता। और वल्लभाचार्य कहते हैं, इसीलिए पुराणों में लक्ष्मी-नारायण और गौरी-शंकर को संसार के माता-पिता के रूप में देखा गया है।
और एक छोटी-सी बात, जो मेरी अपनी पढ़त है। यह श्लोक माता की बात कर रहा है, सब प्राणियों की माता की। और ठीक इसी श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन को किस नाम से बुलाते हैं? "कौन्तेय", कुन्ती के बेटे। यानी अर्जुन को उसकी माँ के नाम से पुकारकर वे उस बड़ी माँ की बात करते हैं, जिसकी गोद में हम सब हैं।
अब मैं यहाँ एक बात साफ़ कह देना चाहता हूँ, क्योंकि आज के पूरे सत्संग की नींव यही है। अभी हम सत्त्व, रज और तम की बात करेंगे, और उनके लक्षण सुनेंगे। आलस, लालच, मोह, ये सब नाम आएँगे। इन्हें सुनकर मन बड़ी जल्दी दूसरों की ओर उँगली उठाने लगता है: "वह तो बड़ा तामसी है", "उसके घर में सब राजसी हैं"। श्रीकृष्ण ने गुणों की बात शुरू करने से पहले ही यह श्लोक इसलिए रखा है, कि हम यह भूल न जाएँ: सबका पिता एक है। ये तीन गुण किसी आदमी की, किसी परिवार की, किसी जाति या किसी देश की पहचान नहीं हैं। ये मौसम की तरह हैं, जो हर आँगन में आते-जाते हैं। इन्हें अपने मन को समझने के लिए सुनिए, दूसरों पर चिपकाने के लिए नहीं।
और अब पाँचवाँ श्लोक, जिसमें पहली बार तीनों नाम एक साथ आते हैं। "सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः।" सत्त्व, रज और तम, ये प्रकृति से उत्पन्न गुण, "निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्", हे महाबाहो, अविनाशी देही को शरीर में बाँध देते हैं।
हमारी टीका तीनों को एक-एक वाक्य में पहचान देती है। सत्त्व है निर्मलता और अच्छाई। रज है राग, और बेचैन करने वाली प्रेरणा, कुछ न कुछ करते रहने का धक्का। और तम है अँधेरा और जड़ता, भारीपन। बस, इतना याद रखिए: साफ़, बेचैन, और भारी।
अब "गुण" शब्द पर एक मिनट रुकिए, क्योंकि यहाँ एक बड़ी सुंदर बात छिपी है। संस्कृत में गुण का एक अर्थ है रस्सी, डोरी। धनुष की डोरी को भी गुण कहते हैं। और वल्लभाचार्य कहते हैं, इन्हें गुण इसीलिए कहा गया, क्योंकि ये बाँधते हैं। नीलकण्ठ इसके लिए गाँव की एक तस्वीर देते हैं: जैसे खूँटे से रस्सी द्वारा बछड़ा बँधा होता है, वैसे ही ये गुण रस्सी बनकर देही को बाँध लेते हैं, जबकि वह अपने आप में बिना बदलने वाला है। बछड़ा भागना चाहता है, पर रस्सी जितनी लम्बी है, उतना ही घूम पाता है। हम भी अपने स्वभाव की रस्सी जितना ही घूम पाते हैं।
पर यहाँ एक प्रश्न उठता है, और आचार्यों ने उसे छोड़ा नहीं। श्लोक कहता है, "देहिनमव्ययम्", जो अविनाशी है, जिसमें कोई विकार नहीं, उसी को ये बाँधते हैं। जो कभी बदलता नहीं, वह बँधेगा कैसे? हमारी टीका यहाँ दोनों मत रखती है। कुछ आचार्य मानते हैं कि आत्मा सचमुच कभी नहीं बँधता, बस जब तक वह गुणों से बनी चीज़ों को अपना मानता है, तब तक बँधा-सा लगता है। शंकराचार्य इसीलिए यहाँ एक छोटा-सा शब्द जोड़ते हैं, "इव", यानी मानो बाँधते हैं। और मधुसूदन सरस्वती इसकी उपमा देते हैं: आकाश में एक सूरज है, पर पानी से भरे बहुत-से घड़ों में उसकी परछाईं पड़ती है, और घड़े का पानी हिले तो लगता है सूरज काँप रहा है। सूरज नहीं काँपता, पानी काँपता है। दूसरे आचार्य मानते हैं कि बन्धन सचमुच है, और भगवान की कृपा से छूटता है। हमारी टीका दोनों को आदर से रखती है, और मैं भी रखूँगा। दोनों बातें एक जगह मिल जाती हैं: बन्धन जैसा भी हो, जीने वाले को तो वह सच्चा ही लगता है, और छूटने का रास्ता इसी अध्याय में आगे है।
संत ज्ञानेश्वर बताते हैं कि यह बन्धन शुरू कब होता है। वे मछुआरे की उपमा देते हैं: जब तक मछली काँटे का चारा मुँह में नहीं लेती, मछुआरा धीरज से डोरी ढीली रखता है, खींचता नहीं। वैसे ही, जिस घड़ी जीव कहता है "यह शरीर मैं हूँ", उसी घड़ी चारा मुँह में चला गया, और फिर गुण डोरी खींचने लगते हैं।
और श्लोक का सम्बोधन देखिए: "महाबाहो", हे बड़ी भुजाओं वाले। शंकराचार्य कहते हैं, ऐसी लम्बी, समर्थ भुजाएँ, जो घुटनों तक पहुँचें। सोचिए, श्रीकृष्ण बन्धन की बात कर रहे हैं, और जिससे कर रहे हैं उसे "बलवान भुजाओं वाला" कहकर बुला रहे हैं। जैसे कह रहे हों: अर्जुन, तुम्हारी भुजाएँ धरती के बड़े-बड़े योद्धाओं को हरा सकती हैं, पर ये तीन डोरियाँ भुजाओं से नहीं कटतीं।
और अब, इससे पहले कि मैं आपको एक कथा सुनाऊँ, एक छोटी-सी बात आपसे कहना चाहता हूँ। अभी हमने तीनों गुणों के नाम सुने हैं, और यह कि तीनों बाँधते हैं। इसके ठीक बाद वाले श्लोक में श्रीकृष्ण एक ऐसी बात कहेंगे जो पहली बार सुनने पर चौंका देती है: कि सबसे अच्छा गुण, सत्त्व, वह भी बाँधता है। आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। जो आदमी यहीं उठ जाए, वह या तो यह मानकर चला जाएगा कि सत्त्व ही मंज़िल है, या यह सोचकर डर जाएगा कि जब अच्छाई भी बाँधती है तो फिर रास्ता क्या है। उसका उत्तर इसी सत्संग में आगे, एक-एक कदम करके आएगा। तो अगर आप यह सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की यह यात्रा बीच में न छूटे। और आज का यह सत्संग आख़िर तक सुनिए।
तो अब वह कथा। "महाबाहो" वाली इसी बात पर महाभारत के वन पर्व में एक कथा है, जो अर्जुन के अपने भाई के साथ घटी थी। वनवास के दिन थे। पाण्डव हिमालय की ढलानों पर एक आश्रम में रह रहे थे। एक दिन भीम अकेले, धनुष लिए, तलवार बाँधे, वन में घूमने निकले। उनमें दस हज़ार हाथियों का बल था। वे पेड़ उखाड़ते, पर्वत की चोटियों को रौंदते, ऐसी गर्जना करते कि सिंह और हाथी अपनी गुफाएँ छोड़कर भाग जाते। उनके शोर से डरकर साँप भागे, और उनका पीछा करते-करते भीम एक पहाड़ी गुफा के पास पहुँचे, जिसे एक विशाल अजगर अपने शरीर से ढके पड़ा था। पर्वत जैसा शरीर, हल्दी जैसा रंग, गुफा जैसा मुँह। उस भूखे अजगर ने झपटकर भीम को दोनों भुजाओं से पकड़ लिया। और पाठ कहता है, उसके छूते ही भीम की चेतना सुन्न हो गई, क्योंकि उस अजगर को एक वरदान मिला हुआ था। दस हज़ार हाथियों का बल भुजाओं में था, और भीम हिल नहीं पा रहे थे।
भीम ने उससे पूछा, "मैं पाण्डुपुत्र भीमसेन हूँ। सिंह, बाघ, हाथी, राक्षस, कोई मेरी भुजाओं का वेग नहीं सह सका। तुमने मुझे वश में कैसे कर लिया? यह किसी विद्या का बल है या वरदान?" और फिर उनके मुँह से वह वाक्य निकला जो किसी बलवान के मुँह से कम निकलता है: "अब मेरा मन मानता है कि मनुष्य का पराक्रम टिकता नहीं।"
तब अजगर ने बताया कि वह कौन है। "मैं नहुष हूँ, तुम्हारा ही पूर्वज।" वही राजर्षि नहुष, जिसने यज्ञों से, तप से और पराक्रम से तीनों लोकों का ऐश्वर्य पाया था, इन्द्र के आसन तक पहुँचा था। और फिर, उसके अपने शब्दों में, वह ऐश्वर्य पाकर उसमें घमंड आ गया। एक हज़ार ब्राह्मणों से उसने अपनी पालकी ढुलवाई, और अगस्त्य मुनि के शाप से वह स्वर्ग से गिरकर अजगर बन गया। गिरते हुए उसने विनती की थी, तो मुनि ने दया करके दो बातें कहीं: तुम जिसे पकड़ोगे, वह कितना भी बलवान हो, उसका बल नष्ट हो जाएगा; और जो आत्मा और अनात्मा का भेद जानने वाला तुम्हारे प्रश्नों का उत्तर देगा, वही तुम्हें छुड़ाएगा।
उधर आश्रम में युधिष्ठिर को अपशकुन दिखे, मन बेचैन हुआ, द्रौपदी से पूछा, "भीम कहाँ है?" और धौम्य के साथ भीम के पदचिह्नों का पीछा करते हुए, टूटे पेड़ों और गिरे हाथियों के सहारे, वे उस गुफा तक पहुँचे। अपने भाई को अजगर की कुण्डली में निश्चेष्ट पड़ा देखा। नहुष ने कहा, "मेरे प्रश्नों का उत्तर दो, तो इसे छोड़ दूँगा।" और पहले ही प्रश्न में युधिष्ठिर से यह भी पूछा गया: जानने योग्य क्या है? युधिष्ठिर ने कहा, "जानने योग्य वह परम ब्रह्म है, जो सुख और दुःख दोनों से परे है।" नहुष ने कहा, मुझे ऐसी कोई स्थिति दिखती ही नहीं जो दोनों से परे हो। और युधिष्ठिर ने उत्तर दिया, "है, जैसे गर्मी और सर्दी के बीच एक बिन्दु होता है, जहाँ न गर्मी है, न सर्दी।" प्रश्न और उत्तर चलते रहे, और अन्त में नहुष ने भीम को छोड़ दिया, उसका शाप ख़त्म हुआ, और वह दिव्य शरीर पाकर स्वर्ग चला गया।
अब इस कथा को इस श्लोक के पास रखकर देखिए। दस हज़ार हाथियों जितनी भुजाएँ एक छुअन से बँध गईं। जितना ज़ोर लगाया, उतना ही कसाव बढ़ा। और वह बन्धन किससे खुला? किसी और बड़ी भुजा से नहीं। एक भाई के ज्ञान से, उस उत्तर से कि जानने योग्य क्या है। मुझे लगता है, श्रीकृष्ण "महाबाहो" कहकर अर्जुन को यही याद दिला रहे हैं, जो उन्होंने पहले श्लोक में कहा था: "यज्ज्ञात्वा", जिसे जानकर। गुणों की डोरी बल से नहीं, जानने से ढीली होती है।
पर अभी एक बात बाकी है। नहुष ने गुफा में युधिष्ठिर से एक बात और कही थी, कि इतना ज्ञानी होकर भी वह गिरा क्यों। वह बात अगले श्लोक की, सत्त्व के बन्धन की, सबसे सच्ची तस्वीर है।
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् ।
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ॥ ६ ॥
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ॥ ७ ॥
छठा श्लोक, और अब श्रीकृष्ण तीनों को एक-एक करके खोलते हैं, सबसे अच्छे से शुरू करके। "तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्।" उनमें सत्त्व निर्मल होने के कारण प्रकाश करने वाला है, और विकार से रहित है। "सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ", और हे निष्पाप अर्जुन, वह सुख की आसक्ति से और ज्ञान की आसक्ति से बाँधता है।
पहले सत्त्व की पहचान। "निर्मलत्वात्", निर्मल होने से। शंकराचार्य कहते हैं, स्फटिक की तरह। साफ़ काँच में जो भी रखो, वैसा ही साफ़ दिखता है। फिर "प्रकाशकमनामयम्", इसमें दो शब्द जुड़े हैं। प्रकाशक, यानी रोशनी करने वाला: जब सत्त्व होता है तो चीज़ें जैसी हैं वैसी दिखती हैं। और अनामय, जिसमें कोई रोग नहीं, कोई उपद्रव नहीं। रामानुजाचार्य कहते हैं, यह आरोग्य का कारण है। श्रीधर स्वामी कहते हैं, यानी शान्त। आपने भी देखा होगा, जिस दिन मन साफ़ होता है, उस दिन शरीर भी हल्का लगता है।
और फिर वह मोड़: "सुखसङ्गेन बध्नाति।" यह सत्त्व भी बाँधता है। हमारी टीका इसे एक वाक्य में कहती है: सबसे अच्छा गुण भी बाँधता है, और जाल इस सोच में है कि "मैं सुखी हूँ, मैं ज्ञानी हूँ", यानी सुख और ज्ञान को अपना मान लेना।
शंकराचार्य इसे और बारीकी से कहते हैं। सुख और ज्ञान मन की लहरें हैं, मन के धर्म हैं। आत्मा तो उन्हें देखने वाला है। जब देखने वाला कहने लगे "मैं सुखी", तो उसने मन की चीज़ अपने ऊपर ओढ़ ली। और विश्वनाथ चक्रवर्ती "चानघ", हे निष्पाप, इस सम्बोधन में एक प्यारी बात देखते हैं। वे कहते हैं, श्रीकृष्ण मानो कह रहे हैं: अर्जुन, तुम निष्पाप हो, तो "मैं सुखी हूँ, मैं ज्ञानी हूँ" वाला यह पाप अपने ऊपर मत लेना।
संत ज्ञानेश्वर इस बन्धन का चित्र बड़ी बारीकी से खींचते हैं। वे कहते हैं, सत्त्व एक शिकारी की तरह सुख और ज्ञान के फंदे बिछाता है, और जीव हिरन की तरह उनमें फँसता है। थोड़ी-सी विद्या मिली तो मन फूल गया, थोड़ा-सा लाभ हुआ तो हर्ष, और फिर मन कहता है, "मेरा भाग्य देखो, आज मुझसे सुखी कोई नहीं।" और फिर विद्वत्ता का भूत सवार होता है: "आज मेरे सिवा कोई समझदार नहीं।" ज्ञानेश्वर इसके लिए एक उपमा देते हैं: जैसे कोई राजा सपने में भिखारी बन जाए, और दो दाने पाकर ख़ुद को इन्द्र समझने लगे।
और अब वह बात, जिसका वादा पिछले हिस्से में किया था। उस गुफा में, जब युधिष्ठिर के उत्तरों से नहुष प्रसन्न हो गया था, तब युधिष्ठिर ने उससे एक प्रश्न पूछा। "आप तो सब जानते थे, स्वर्ग में रहते थे, ऐसे अद्भुत काम किए थे। फिर आपमें मोह घुसा कैसे? यही मेरा बड़ा सन्देह है।" और नहुष ने जो उत्तर दिया, वह इस श्लोक की सबसे सच्ची टीका है। उन्होंने कहा, "वैभव बहुत बुद्धिमान और वीर आदमी को भी मोह में डाल देता है।" और फिर, "वर्तमानः सुखे सर्वो नावैतीति", जो सुख में रह रहा होता है, वह कोई भी साफ़ नहीं समझ पाता। "मैं वही हूँ। ऐश्वर्य के मोह में, मद से भरकर मैं गिरा। अब मैं जाग गया हूँ, और तुम्हें सचेत करता हूँ।"
देखिए, नहुष कोई बुरे आदमी नहीं थे। यज्ञ, तप, वेद का अध्ययन, संयम, इन्हीं से वे इन्द्र के आसन तक पहुँचे थे। यह सब सत्त्व की कमाई थी। पर सुख की ऊँचाई पर पहुँचकर उन्होंने उस सुख को अपनी पहचान बना लिया। और वहीं से फिसलन शुरू हुई।
अब इसे अपने जीवन में देखिए। कभी-कभी ज़िन्दगी में एक अच्छा दौर आता है। काम ठीक चल रहा है, घर में शान्ति है, पूजा-पाठ नियम से हो रहा है, गीता भी सुन रहे हैं। यह सत्त्व का समय है, और यह बहुत अच्छा है। पर उसी समय, बहुत चुपचाप, मन में एक बात आ बैठती है: "मैं तो ठीक हूँ। बाकी लोग गड़बड़ हैं।" किसी की बेचैनी देखकर हम मुँह बना लेते हैं, किसी के आलस पर मन ही मन ऊँचे बैठ जाते हैं। वहीं सत्त्व की सुनहरी डोरी कस जाती है। डोरी सोने की हो, तब भी डोरी है।
पर एक बात बहुत ध्यान से सुनिए, ताकि गलत न समझें। श्रीकृष्ण यह नहीं कह रहे कि सत्त्व छोड़ दो, या अच्छाई से डरो। सत्त्व सीढ़ी है, और उसी पर चढ़कर ऊपर जाना है। वे बस यह कह रहे हैं कि सीढ़ी पर घर मत बसा लेना। उससे आगे जाने का रास्ता इसी अध्याय के दूसरे हिस्से में है, जिसे हम अगले सत्संग में सुनेंगे।
अब सातवाँ श्लोक, रज की पहचान। "रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम्।" रज को राग-रूप जानो, जो तृष्णा और आसक्ति को जन्म देता है। "तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्", हे कुन्तीपुत्र, वह देही को कर्म की आसक्ति से बाँधता है।
"रागात्मकं", राग से बना हुआ। राग का अर्थ है रंग। शंकराचार्य कहते हैं, जैसे गेरू कपड़े को रंग देता है, वैसे ही रज मन को रंग देता है। रज आते ही हर चीज़ पर एक रंग चढ़ जाता है: यह मुझे चाहिए, वह मेरा होना चाहिए।
फिर दो शब्द, जिन्हें हमारी टीका बड़ी सफ़ाई से अलग करती है। तृष्णा, उस चीज़ की प्यास जो अभी नहीं है। और आसक्ति, उस चीज़ से चिपके रहना जो अभी है। मधुसूदन सरस्वती आसक्ति की एक और परत खोलते हैं: जो मिला हुआ है, वह नष्ट होने लगे तब भी उसे बचाए रखने की छटपटाहट। यानी एक हाथ आगे बढ़ा है, जो नहीं है उसे पकड़ने को, और दूसरा हाथ कसकर बँधा है, जो है उसे छोड़ने के डर से। रज के समय आदमी की यही मुद्रा होती है। हमारी टीका यह भी कहती है कि कुछ लोग इस समास को उलटा पढ़ते हैं, कि रज तृष्णा और आसक्ति से पैदा होता है। जो भी पढ़ें, दोनों एक-दूसरे को बढ़ाते हैं। प्यास से दौड़, और दौड़ से और प्यास।
और "कर्मसङ्गेन", कर्म की आसक्ति से। मधुसूदन सरस्वती इसे एक वाक्य में पकड़ते हैं: "मैं यह कर रहा हूँ, और इसका फल मैं भोगूँगा।" यही रज की डोरी है।
संत ज्ञानेश्वर यहाँ फिर बोलते हैं, और उनकी बातें सुनकर लगता है जैसे वे आज के शहर में बैठे लिख रहे हों। वे कहते हैं, तृष्णा ऐसी आग है जिस पर घी डाला गया हो। मेरु पर्वत भी हाथ आ जाए, तो मन कहता है, अब कोई और ऊँचा पहाड़ चढ़ें। और वे कहते हैं, गर्मी के मौसम की हवा जैसे विश्राम नहीं जानती, वैसे ही रज वाला मन दिन और रात नहीं पहचानता, बस काम, काम, काम।
अनुगीता में ब्रह्मा रज की जो सूची ऋषियों को गिनाते हैं, उसमें एक पंक्ति है जो मुझे पूरी सूची का सार लगती है: "इदं मे स्यादिदं मे स्यात्", यह मेरा हो जाए, वह मेरा हो जाए। और उसी सूची में ब्रह्मा कुछ ऐसी चीज़ें भी गिनाते हैं जिन्हें पढ़कर हम चौंकते हैं: व्रत और नियम, यज्ञ करना और कराना, पढ़ना और पढ़ाना, दान देना और लेना। और साथ में वह भाव, "मुझे सदा श्रेष्ठ चीज़ आशीर्वाद सहित मिलती रहे।" यानी पूजा भी रज की हो सकती है, अगर उसके पीछे मन बस "मुझे मिले, मुझे मिले" कह रहा हो। काम वही है; किस गुण का है, यह मन तय करता है।
और यहाँ भी एक बात साफ़ कर दूँ। रज कोई गाली नहीं है। रज के बिना न खेत जुतता है, न घर चलता है, न बच्चे पढ़ते हैं। सुबह उठकर काम पर निकलने का धक्का भी रज ही देता है। बन्धन काम में नहीं, "कर्मसङ्गेन" में है, काम से चिपक जाने में। जब काम रुकते ही मन छटपटाने लगे, जब छुट्टी के दिन भी फ़ोन पर दफ़्तर चलता रहे, जब बच्चे से बात करते हुए भी मन अगले काम में हो, तब समझिए डोरी कस गई है।
पर अभी एक बात बाकी है। दो गुण हो गए: एक जो सुख से बाँधता है, एक जो काम से। तीसरा गुण सबसे अलग है। वह न सुख देता है, न काम कराता है। वह बस ढक देता है। और उसकी तीन डोरियाँ हम सब रोज़ छूते हैं।
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् ।
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥ ८ ॥
सत्त्वं सुखे संजयति रजः कर्मणि भारत ।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे संजयत्युत ॥ ९ ॥
आठवाँ श्लोक। "तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्।" पर तम को अज्ञान से उत्पन्न जानो, जो सब देहधारियों को मोहित करता है। "प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत", हे भारत, वह प्रमाद, आलस्य और नींद से बाँधता है।
श्लोक में एक छोटा-सा शब्द है, "तु", यानी "पर"। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, यह शब्द बताता है कि तम पहले दोनों से अलग किस्म का है। सत्त्व कम से कम सुख और रोशनी देता है, रज कम से कम काम कराता है। तम न रोशनी देता है, न काम कराता है। वह ढकता है।
और "मोहनं सर्वदेहिनाम्", सब देहधारियों को मोहित करने वाला। यह "सर्व" शब्द सुनिए। कोई बड़ा, कोई साधु, कोई विद्वान इससे बाहर नहीं। हम सबकी कोई न कोई सुबह ऐसी होती है जब तम आकर बैठ जाता है। इसलिए किसी और को देखकर "यह तो तामसी है" कहने से पहले यह शब्द याद कर लीजिए: सबको।
अब तीन डोरियाँ। पहली, प्रमाद। रामानुजाचार्य कहते हैं, प्रमाद वह असावधानी है जिससे आदमी जो करना चाहिए उसे छोड़कर कुछ और करने लगता है। दूसरी, आलस्य। रामानुज कहते हैं, काम शुरू ही न करने का स्वभाव, एक तरह की जकड़न। श्रीधर स्वामी कहते हैं, उद्यम का न होना। और तीसरी, निद्रा, नींद, जिसे श्रीधर कहते हैं मन का डूब जाना।
और मधुसूदन सरस्वती और नीलकण्ठ इन तीनों को एक बहुत सुंदर ढंग से बाँधते हैं। वे कहते हैं, प्रमाद सत्त्व की रोशनी का विरोधी है, यानी वह देखने नहीं देता। आलस्य रज की गति का विरोधी है, यानी वह चलने नहीं देता। और नींद दोनों की विरोधी है, न देखने देती है, न चलने। तीन डोरियाँ, और तीनों का काम एक: आदमी को वहीं का वहीं रोके रखना।
अभिनवगुप्त प्रमाद की जो परिभाषा देते हैं, वह मुझे हमेशा भीतर तक छू जाती है। वे कहते हैं, प्रमाद है उस मनुष्य-जीवन को व्यर्थ बिता देना, जो सैकड़ों पुण्यों के बाद, बड़ी मुश्किल से मिला है, और जो मुक्ति का एकमात्र दरवाज़ा है। और वे एक पुरानी बात उद्धृत करते हैं: आयु का एक क्षण भी सारे रत्न देकर नहीं ख़रीदा जा सकता, और जो उसे व्यर्थ बिता दे, वही प्रमादी है।
संत ज्ञानेश्वर तम का जो चित्र बनाते हैं, उसे सुनकर शायद आप मुस्कुराएँ, क्योंकि उसमें हम सब कहीं न कहीं हैं। वे कहते हैं, तम आते ही अंग-अंग टूटने लगते हैं, जम्हाइयों की झड़ी लग जाती है, आँखें खुली हैं पर कुछ दिखता नहीं। धरती पाताल में चली जाए, या आकाश नीचे आ गिरे, पर उठने का भाव ही नहीं जागता। और वे कहते हैं, अगर नींद आ रही हो, तो उस समय कोई अमृत भी दे, तो आदमी उसे भी नहीं लेता। और प्रमाद के बारे में वे एक कठोर उपमा देते हैं: जैसे पतंगा जलते जंगल को अपने पंखों से बुझाने चले, वैसे ही प्रमाद में आदमी बिना सोचे ऐसे दुस्साहस में कूद पड़ता है जो उसके बस का नहीं।
अब एक बात ज़रूर साफ़ हो जाए। नींद कोई पाप नहीं है। उन्नीसवें सत्संग में हमने छठे अध्याय में सुना था कि योग न बहुत सोने वाले का है, न बहुत जागने वाले का। शरीर को नींद चाहिए, और ठीक समय की ठीक नींद तो सेहत है। बात उस नींद की है जो ज़रूरत से नहीं, भागने के लिए आती है। जब कोई कठिन काम सामने हो और अचानक बहुत थकान लगने लगे, जब कोई ज़रूरी बात करनी हो और मन कहे "कल देखेंगे"।
और इस पर महाभारत में विदुर का एक वचन है, जो ठीक इसी श्लोक के पास बैठता है। आपको याद होगा, सातवें और नौवें सत्संग में हमने धृतराष्ट्र की वह रात सुनी थी, जब सञ्जय पाण्डवों के पास से लौटे थे और राजा को नींद नहीं आ रही थी। उन्होंने विदुर को बुलवाया था, "मैं जाग रहा हूँ और जल रहा हूँ।" उसी रात विदुर ने उन्हें बहुत-सी बातें कहीं, और उनमें एक श्लोक यह था: जो आदमी उन्नति चाहता है, उसे छह दोष छोड़ देने चाहिए: "निद्रा तन्द्री भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता।" बहुत ज़्यादा नींद, ऊँघ, डर, क्रोध, आलस्य, और टालमटोल।
अब ज़रा इस दृश्य की विडम्बना देखिए। विदुर नींद को दोष गिना रहे हैं, उस राजा से, जिसकी उस रात नींद ही उड़ी हुई है। मुझे लगता है, यह संयोग हमें कुछ सिखाता है। धृतराष्ट्र की नींद तम से नहीं, रज से उड़ी थी, चिन्ता से, बेटे के मोह से, इस जलन से कि कल सभा में क्या कहा जाएगा। तो एक तरफ़ तम है, जो ज़रूरत से ज़्यादा सुला देता है, और दूसरी तरफ़ रज है, जो ज़रूरत भर भी सोने नहीं देता। सड़क के दोनों ओर गड्ढे हैं। और बीच की सड़क, ठीक नींद, ठीक जागना, यही सत्त्व की सड़क है।
और गीता में अर्जुन का एक नाम आपने बार-बार सुना है: गुडाकेश। हमारी टीका, पहले अध्याय में, इसका अर्थ बताती है: नींद को जीतने वाले, जिन्होंने आलस्य को जीत लिया था। बीसवें सत्संग में हमने सुना था कि हवा से दीया बुझ गया था, अँधेरे में भी अर्जुन का हाथ मुँह तक ठीक पहुँचा, और उसी से उन्होंने समझा कि अभ्यास अँधेरे में भी काम करता है, और रात में भी धनुष चलाने लगे। गुडाकेश ऐसे ही बनता है।
अब नौवाँ श्लोक, जो तीनों का सार एक साथ रखता है। "सत्त्वं सुखे संजयति रजः कर्मणि भारत।" हे भारत, सत्त्व सुख में लगाता है, रज कर्म में। "ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे संजयत्युत", पर तम ज्ञान को ढककर प्रमाद में लगाता है।
श्रीधर स्वामी इस श्लोक में हर गुण की ताकत दिखाते हैं, और यह बात बहुत काम की है। वे कहते हैं, सत्त्व इतना बलवान होता है कि दुःख और शोक के कारण सामने हों, तब भी आदमी को सुख की ओर मोड़ देता है। रज इतना बलवान होता है कि सुख और आराम के कारण सामने हों, तब भी आदमी को काम में खींच ले जाता है। छुट्टी है, परिवार साथ बैठा है, और मन फिर भी काम में। और तम? श्रीधर कहते हैं, बड़े लोगों के संग से जो ज्ञान पैदा होता है, उसे भी तम ढक देता है, और बड़े जो सिखाते हैं उस पर ध्यान ही नहीं जाने देता।
"ज्ञानमावृत्य", ज्ञान को ढककर। ध्यान दीजिए, तम ज्ञान को मिटाता नहीं, ढकता है। ज्ञान भीतर है, पर उस पर परदा पड़ा है। और इसकी सबसे सच्ची तस्वीर वही आदमी है जिसे यह गीता सुनाई जा रही है। तीसरे सत्संग में आपने सुना था, युद्ध से पहले व्यास ने धृतराष्ट्र को समझाया था कि अपने ही बन्धुओं को मारना नीच कर्म है, पाण्डवों को राज्य दे दो। और धृतराष्ट्र ने क्या कहा था? "जैसे आप जानते हैं, वैसे मैं भी जानता हूँ। पर संसार अपने स्वार्थ में मोहित हो जाता है। मुझे भी संसार जैसा ही जानिए।" जानता हूँ, पर। यही "ज्ञानमावृत्य" है। ज्ञान था, उस पर मोह का परदा था।
और गुफा वाले नहुष को एक बार फिर याद कीजिए। जब अगस्त्य के शाप से वे गिर रहे थे और उन्होंने क्षमा माँगी, तो अपनी भूल को उन्होंने किस शब्द से कहा? "प्रमादात्संप्रमूढस्य", प्रमाद से मूढ़ हो गए मुझ को क्षमा कीजिए। यानी जो सत्त्व की ऊँचाई पर बैठा था, वह सुख के मद से, रज की अकड़ से होता हुआ, आख़िर प्रमाद तक पहुँचा, और वहीं ठोकर खाई। तीनों गुण एक ही आदमी की एक ही कहानी में।
और यही अगली बात का दरवाज़ा है। अगर एक ही आदमी में तीनों आते-जाते हैं, तो फिर किसी समय कौन-सा जीतता है, और क्यों? यही दसवाँ श्लोक है, और यही आपके इस सवाल का सबसे सीधा उत्तर है, कि मैं ऐसा क्यों हूँ। पर अभी एक बात बाकी है।
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥ १० ॥
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते ।
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ॥ ११ ॥
दसवाँ श्लोक। "रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत।" हे भारत, रज और तम को दबाकर सत्त्व बढ़ता है। "रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा", सत्त्व और तम को दबाकर रज बढ़ता है, और वैसे ही सत्त्व और रज को दबाकर तम।
यह श्लोक आज के सत्संग का दिल है, और आपके उस सवाल का सीधा उत्तर, जिससे हमने शुरू किया था। आप एक जैसे क्यों नहीं रहते? क्योंकि आपके भीतर तीनों हर समय मौजूद हैं, और हर समय उनमें एक खींचतान चल रही है। हमारी टीका इसे बड़े सीधे शब्दों में कहती है: तीनों सदा उपस्थित रहते हैं। कौन-सा प्रकट होता है, यह इस पर निर्भर है कि उस समय कौन बलवान है।
यानी आप "ऐसे" नहीं हैं। आप कभी ऐसे होते हैं, कभी वैसे। जिस सुबह मन हल्का था, उस सुबह सत्त्व ऊपर था। जिस दोपहर बेचैनी थी, उस दोपहर रज ऊपर था। और जिस शाम कुछ करने का मन नहीं था, उस शाम तम ने बाकी दोनों को दबा रखा था। यह बात सुनने में छोटी लगती है, पर इससे भीतर की भाषा बदल जाती है। "मैं आलसी हूँ" कहने और "अभी मुझमें तम बढ़ा हुआ है" कहने में बड़ा फ़र्क है। पहला वाक्य एक कैद है। दूसरा वाक्य एक मौसम की ख़बर है, और मौसम बदलता है।
संत ज्ञानेश्वर इसके लिए शरीर और ऋतुओं की उपमाएँ देते हैं। वे कहते हैं, जैसे शरीर में जब पित्त, कफ और वात को दबाकर ऊपर आ जाता है, तो पूरा शरीर तपने लगता है। जैसे बारिश, धूप और ठंड में से कोई एक दूसरी दोनों को जीतकर अपना मौसम बना लेती है। और जैसे गहरी नींद आती है, तो कुछ देर के लिए जागना भी छिप जाता है और सपने भी, और मन बस वही हो जाता है। वैसे ही, ज्ञानेश्वर कहते हैं, जब रज और तम हार जाते हैं और सत्त्व ऊपर आता है, तब जीव से कहलवाता है, "देखो, मैं कितना सुखी हूँ।"
और अनुगीता में ब्रह्मा ऋषियों से एक बात कहते हैं जो इस श्लोक के ठीक पीछे खड़ी है। वे कहते हैं, ये तीनों गुण एक-दूसरे के जोड़े हैं, एक-दूसरे के सहारे जीते हैं। तम का जोड़ा सत्त्व, सत्त्व का जोड़ा रज। यानी ऐसा कोई आदमी नहीं जिसमें केवल एक हो। तिलक भी यहीं कहते हैं कि कोई भला काम करना सत्त्व का लक्षण है, पर उस काम को करने की प्रवृत्ति, उठकर करने का धक्का, रज का धर्म है। इसलिए सबसे सात्त्विक स्वभाव में भी थोड़ा रज मिला ही रहता है।
और इस श्लोक का सबसे बड़ा उदाहरण वह आदमी है जिससे यह कहा जा रहा है। याद कीजिए, पहले अध्याय में अर्जुन कैसे थे। रथ आगे बढ़वाते हैं, "यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्", मैं देख लूँ कि युद्ध की इच्छा से कौन-कौन खड़े हैं, मुझे किनसे लड़ना है। यह उत्साह था, युद्ध का धक्का। और कुछ ही पल बाद वही अर्जुन धनुष छोड़कर रथ में बैठ गए। दूसरे अध्याय में उन्होंने अपनी दशा ख़ुद बताई थी: "कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः", दीनता के दोष ने मेरे स्वभाव को दबा दिया है, "धर्मसम्मूढचेताः", धर्म के बारे में मेरा चित्त मोहित है। सुनिए, अर्जुन यह नहीं कहते कि मेरा स्वभाव ही यह है। वे कहते हैं, मेरे स्वभाव को दबा दिया गया है। यही "रजस्तमश्चाभिभूय" वाला दबाना है। और इस यात्रा के अन्त में, अठारहवें अध्याय में, यही अर्जुन कहेंगे, "नष्टो मोहः", मेरा मोह नष्ट हुआ। वह बात हम वहीं पहुँचकर सुनेंगे। आज इतना काफ़ी है कि जो मौसम अर्जुन पर आया था, वह गया भी।
अब सवाल उठता है, कौन-सा कब बढ़ता है? क्या यह बस संयोग है? आचार्य दो कारण बताते हैं। रामानुजाचार्य और बलदेव विद्याभूषण कहते हैं: एक, पिछले कर्म, और दो, भोजन। पिछले कर्म हमारे हाथ में अब नहीं हैं, वे बीज बोए जा चुके। पर भोजन, और उसके साथ हम जो कुछ दिन भर आँखों और कानों से भी भीतर लेते हैं, वह आज हमारे हाथ में है। भोजन के तीन प्रकारों की पूरी बात सत्रहवें अध्याय में आएगी, पर इतना आज ही समझ लीजिए कि गुणों की खींचतान में हम केवल दर्शक नहीं हैं। जिस पलड़े में हम रोज़ थोड़ा-थोड़ा वज़न डालते हैं, वही पलड़ा झुकता है।
और यहाँ मैं अपने अनुभव से एक छोटी-सी बात जोड़ूँ, जो किसी आचार्य की नहीं, मेरी अपनी है। जब तम भारी हो, जब बिस्तर से उठने का मन न हो, तब सीधे ध्यान में बैठने की कोशिश अक्सर काम नहीं करती; आँख बन्द करते ही नींद आ जाती है। ऐसे समय पहले थोड़ा चल लीजिए, घर का कोई छोटा काम कर लीजिए, किसी को पानी दे दीजिए। यानी पहले थोड़ा रज जगाइए। फिर जब शरीर चल पड़े, तब बैठिए, तब सत्त्व के लिए जगह बनती है। और जब रज बहुत बढ़ा हो, जब मन दौड़ रहा हो, तब और काम मत जोड़िए; कुछ देर रुककर बैठिए, साँस देखिए, कोई श्लोक धीरे से पढ़िए।
अब ग्यारहवाँ श्लोक, जहाँ से श्रीकृष्ण पहचान के चिह्न देना शुरू करते हैं। "सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते।" जब इस शरीर के सब द्वारों में प्रकाश उत्पन्न होता है, "ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत", जब ज्ञान की रोशनी होती है, तब जानना चाहिए कि सत्त्व बढ़ा हुआ है।
कौन-से द्वार? हमारी टीका कहती है, द्वार इन्द्रियाँ और मन हैं। आँख, कान, जीभ, त्वचा, नाक, और भीतर मन। और जब सत्त्व बलवान होता है, तो ये जो कुछ भीतर लाते हैं, वह साफ़ दिखता है। जैसे घर की सब खिड़कियाँ खोल दी गई हों, और सुबह की धूप हर कोने में पहुँच रही हो।
श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती एक छोटे-से शब्द पर ध्यान दिलाते हैं: "उत", यानी "भी"। वे कहते हैं, सत्त्व को केवल ज्ञान की रोशनी से ही नहीं, सुख से भी पहचाना जा सकता है। और विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं, वह सुख बाहर से आया हुआ नहीं, भीतर से उठा हुआ होता है।
अब इसे अपने दिन में पहचानिए। सत्त्व के समय कोई आपसे बात करता है, तो आप सचमुच सुनते हैं, बीच में अपना जवाब नहीं गढ़ते। गीता का कोई श्लोक पढ़ते हैं, तो वह खुल जाता है, जैसे पहले कभी ऐसे पढ़ा ही न हो। किसी की कड़वी बात सुनकर भी भीतर कुछ ठहरा रहता है। खाना खाते समय स्वाद आता है, और पेट भरने पर रुकना भी आता है।
और अनुगीता में ब्रह्मा सत्त्व के लक्षणों की जो सूची देते हैं, वह इस श्लोक का पूरा विस्तार है। आनन्द, प्रेम, उत्साह, प्रकाश, सुख। कंजूसी का न होना, हड़बड़ी का न होना। सन्तोष, श्रद्धा, क्षमा, धैर्य, अहिंसा, समता, सत्य, सरलता, क्रोध का न होना, दूसरों में दोष न खोजना, पवित्रता। और फिर दो शब्द जो इस सूची में देखकर कई लोग चौंकते हैं: कुशलता, और पराक्रम। यानी सत्त्व का अर्थ कमज़ोर या ढीला होना नहीं है। सात्त्विक आदमी काम में कुशल होता है और ज़रूरत पड़े तो पराक्रमी भी। उसकी ताकत में बस शोर नहीं होता।
उसी सूची के अगले हिस्से में ब्रह्मा कहते हैं: विश्वास, लज्जा, सहनशीलता, त्याग, और ऊँघ का न होना। विदुर ने जिन छह दोषों में ऊँघ गिनाई थी, ब्रह्मा उसी ऊँघ के न होने को सत्त्व का चिह्न बताते हैं। और सत्त्व वाला अध्याय ब्रह्मा इस वाक्य पर पूरा करते हैं: जो मनुष्य इन गुणों को सदा जानता है, वह गुणों को भोगता है, पर गुणों से बँधता नहीं। आज हम यही कर रहे हैं। पहचानना ही छूटने का पहला कदम है।
पर अभी एक बात बाकी है। सत्त्व के चिह्न सुन लिए, अब बाकी दोनों के चिह्न। और उनके लिए महाभारत में एक ऐसी सभा का दृश्य है, जिसके फ़र्श स्फटिक के थे, जहाँ पानी फ़र्श जैसा दिखता था और फ़र्श पानी जैसा।
लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा ।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥ १२ ॥
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ।
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥ १३ ॥
बारहवाँ श्लोक, रज के चिह्न। "लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा।" लोभ, प्रवृत्ति, कर्मों का आरम्भ, अशान्ति और लालसा: "रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ", हे भरतश्रेष्ठ, रज के बढ़ने पर ये पैदा होते हैं।
पाँच शब्द हैं, और आचार्य एक-एक को खोलते हैं। पहला, लोभ। यहाँ दो अलग पढ़तें हैं, और दोनों सच्ची हैं। शंकराचार्य कहते हैं, लोभ है दूसरे की चीज़ लेने की इच्छा। रामानुजाचार्य कहते हैं, लोभ है अपनी चीज़ को न छोड़ पाना, कंजूसी। एक लोभ बाहर की ओर हाथ बढ़ाता है, दूसरा भीतर की ओर मुट्ठी कसता है। और मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, बहुत धन आ जाने पर भी जो चाह हर पल बढ़ती जाए, वही लोभ है।
दूसरा, प्रवृत्ति। रामानुज इसकी जो परिभाषा देते हैं, वह आज के समय पर ऐसी बैठती है जैसे आज ही लिखी गई हो: बिना किसी प्रयोजन के भी चलते रहने का स्वभाव। फ़ोन उठाया, कुछ खोजना नहीं था, बस उँगली चलती रही। एक कमरे से दूसरे कमरे, कोई काम नहीं, बस बैठा नहीं जाता।
तीसरा, आरम्भ, कर्मों का। श्रीधर स्वामी कहते हैं, जैसे बड़ा घर बनाने की योजनाएँ। एक के बाद एक नए-नए काम उठा लेना। चौथा, अशम, यानी शान्ति का न होना। श्रीधर और मधुसूदन इसकी जो तस्वीर देते हैं, वह हम सबने अपने भीतर देखी है: "यह करके फिर वह करूँगा, वह करके फिर वह", संकल्पों की एक धारा जो कभी रुकती नहीं। और पाँचवाँ, स्पृहा। श्रीधर कहते हैं, जो भी ऊँची-नीची चीज़ आँख के सामने आए, उसे पकड़ लेने की चाह। दुकान की खिड़की में देखी, किसी के हाथ में देखी, स्क्रीन पर देखी, और मन ने कहा, "यह भी।"
शान्ति पर्व में युधिष्ठिर ने बाणों की शय्या पर लेटे भीष्म से पूछा था, "पाप का आधार क्या है, पाप कहाँ से पैदा होता है?" और भीष्म ने उत्तर दिया, "एको लोभो महाग्राहो", अकेला लोभ ही बड़ा मगरमच्छ है, लोभ से ही पाप चलता है। फिर भीष्म ने दो बातें कहीं जो मैं कभी भूल नहीं पाता। एक, कि लोभ को किसी तरह भरा नहीं जा सकता, जैसे गहरे जल वाली नदियाँ सदा गिरती रहती हैं, फिर भी समुद्र कभी नहीं भरता। और दूसरी, कि जन्म से, बचपन से, जवानी से, आदमी अपना एक काम नहीं छोड़ता, वह चीज़ जो आदमी के बूढ़े हो जाने पर भी बूढ़ी नहीं होती। बाल सफ़ेद हो जाते हैं, दाँत चले जाते हैं, पर चाह जवान ही रहती है।
अब तेरहवाँ श्लोक, तम के चिह्न। "अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च।" अप्रकाश, अप्रवृत्ति, प्रमाद और मोह: "तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन", हे कुरुनन्दन, तम के बढ़ने पर ये पैदा होते हैं।
अप्रकाश, यानी रोशनी का न होना। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, उपदेश सामने हो, समझाने वाला सामने हो, फिर भी बात भीतर न उतरे। नीलकण्ठ कहते हैं, गुरु सामने बैठे हों, तब भी। अप्रवृत्ति, यानी कुछ न करना। मधुसूदन कहते हैं, क्या करना है यह पता हो, फिर भी करने का बल न जागे। ध्यान दीजिए, रज के पाँच चिह्नों में एक था प्रवृत्ति, और तम के चिह्नों में है अप्रवृत्ति। एक में आदमी रुक नहीं पाता, दूसरे में चल नहीं पाता।
प्रमाद। मधुसूदन कहते हैं, जो काम इसी समय करना है, उसकी ओर ध्यान ही न जाना। और विश्वनाथ चक्रवर्ती और बलदेव विद्याभूषण प्रमाद की एक ऐसी परिभाषा देते हैं जिसे सुनकर हर घर में कोई न कोई मुस्कुराएगा: कोई चीज़ अपने हाथ में हो, या अपने गले में पड़ी हो, फिर भी यह मान लेना कि वह है ही नहीं। चश्मा माथे पर चढ़ा है, और हम पूरे घर में चश्मा ढूँढ रहे हैं। यह हँसने की बात है, पर इसके पीछे एक गहरी बात है। जो भगवान हमारे भीतर बैठे हैं, उन्हें हम बाहर कहाँ-कहाँ नहीं ढूँढते।
और अन्त में, मोह। रामानुजाचार्य कहते हैं, मोह है उलटा ज्ञान, चीज़ को जैसी है उससे उलटा देखना। श्रीधर कहते हैं, झूठी बात पर अड़ जाना। और अनुगीता में ब्रह्मा तम की सूची के अन्त में यही कहते हैं: जो अतत्त्व में तत्त्व देखता है, जो नहीं है उसे सच मान लेता है, यह भी तम का लक्षण है।
और अब वह सभा। महाभारत के सभा पर्व में, युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के बाद, दुर्योधन शकुनि के साथ इन्द्रप्रस्थ की उस अद्भुत सभा में रुका रहता है, और धीरे-धीरे पूरी सभा देखता है। ऐसी रचनाएँ उसने हस्तिनापुर में कभी नहीं देखी थीं। एक जगह वह स्फटिक के एक फ़र्श पर पहुँचता है, और उसे शंका होती है कि यह पानी है। पाठ का शब्द है, "बुद्धिमोहितः", बुद्धि धोखा खा गई, और वह अपने कपड़े ऊपर उठा लेता है। फिर एक बावड़ी आती है, जिसका पानी स्फटिक जैसा साफ़ है, स्फटिक के कमलों से सजी। उसे सूखा फ़र्श मानकर वह कपड़ों समेत पानी में गिर पड़ता है।
भीम हँसे, सेवक हँसे, फिर अर्जुन और दोनों जुड़वाँ भाई भी हँस पड़े। और दुर्योधन वह हँसी सह नहीं सका। आगे स्फटिक के एक दरवाज़े से भीतर जाते हुए उसका सिर टकराया, और वह चकराया-सा खड़ा रह गया। स्फटिक के चौड़े किवाड़ों वाले दूसरे दरवाज़े को उसने दोनों हाथों से धकेला, और निकलते ही आगे गिर पड़ा। और फिर वह एक ऐसे दरवाज़े पर पहुँचा जो सचमुच खुला दिखता था, और यह सोचकर कि फिर वही होगा, उस दरवाज़े से पीछे हट गया।
इस आख़िरी बात पर ठहरिए, क्योंकि मोह का पूरा रूप इसी में है। पहले पानी को फ़र्श समझा, फ़र्श को पानी। और फिर जब सचमुच खुला दरवाज़ा सामने आया, तो उस पर भी भरोसा नहीं रहा। मोह केवल झूठ को सच नहीं मानता; एक बार ठोकर खाने के बाद, वह सच को भी झूठ मानने लगता है।
और फिर देखिए, यह तम आगे किसमें बदला। लौटते हुए, पाठ कहता है, दुर्योधन सोच में ऐसा डूबा था कि शकुनि बार-बार बोलते रहे और उसने उत्तर नहीं दिया; वहाँ शब्द है "प्रमत्तो"। और फिर उसके मुँह से निकला, "मैं जलन से भरा हूँ, दिन-रात जल रहा हूँ, जैसे गर्मी में थोड़ा-सा पानी सूख जाता है।" उन्नीसवें सत्संग में हमने सुना था कि हस्तिनापुर पहुँचकर वह पीला और दुबला हो गया था, और पिता से कहा था कि पाण्डवों की लक्ष्मी देखकर अब अपना भोग भी अच्छा नहीं लगता। यानी मोह से शुरू हुआ, और जलन, लोभ और बेचैनी तक पहुँचा। भीष्म ने शान्ति पर्व में यही कहा था: लोभ और अज्ञान बराबर के हैं, अज्ञान लोभ से पैदा होता है और बढ़ता ही जाता है।
पर इस कथा को किसी एक आदमी पर उँगली उठाने के लिए मत सुनिए। उस सभा में हँसने वालों की हँसी भी हल्की बात नहीं थी, और आगे के बड़े दुःखों की एक जड़ वहीं से निकली। यह कथा उस हर पल की है जब हमारी अपनी आँखें पानी को फ़र्श समझ लेती हैं, और जब किसी पुरानी ठोकर के कारण हम सामने खुले दरवाज़े से भी लौट आते हैं। ऐसा हम सबके साथ होता है।
अगले सत्संग में यह अध्याय आगे बढ़ेगा। श्रीकृष्ण बताएँगे कि जिस गुण के बढ़े रहते मृत्यु आती है, आगे का रास्ता उसी के अनुसार खुलता है। और फिर अर्जुन एक बहुत अपना-सा प्रश्न पूछेंगे: जो इन तीनों के पार चला गया, उसे पहचानें कैसे? उसका उत्तर अगले सत्संग में।
तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।
पहली बात। आप "ऐसे" नहीं हैं। "रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत", तीनों गुण हर समय भीतर हैं, और बारी-बारी से ऊपर आते हैं। इसलिए अपने लिए "मैं आलसी हूँ, मैं गुस्सैल हूँ" जैसे वाक्य छोड़िए, और दूसरों के लिए तो बिलकुल। सबका बीज देने वाला पिता एक है। मौसम बदलता है, आँगन वही रहता है।
दूसरी बात। चिह्न पहचानिए। जब इन्द्रियों की खिड़कियों से साफ़ रोशनी आए, तो सत्त्व है; उसे सँभालिए। जब "बस एक काम और" की धारा न रुके, तो रज है; कुछ देर रुककर बैठिए। और जब चश्मा माथे पर हो और हम घर भर में ढूँढ रहे हों, जब जानते हुए भी कदम न उठे, तो तम है; तब पहले उठकर कोई छोटा-सा काम कीजिए, फिर बैठिए।
तीसरी बात। सत्त्व की सुनहरी डोरी को भी पहचानिए। जिस दिन सब अच्छा चल रहा हो, उस दिन "मैं सुखी हूँ, मैं समझदार हूँ" को कसकर मत पकड़िए। नहुष ने कहा था, जो सुख में रह रहा होता है, वह साफ़ नहीं देख पाता। अपना सुख और अपनी समझ उसी पिता को लौटा दीजिए, जिसने बीज दिया था।
आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आपके दिन में कौन-सा गुण किस समय सबसे ज़्यादा आता है, सुबह, दोपहर या शाम? और कल आप उसके लिए कौन-सा एक छोटा-सा कदम उठाएँगे? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।
आप सत्त्व नहीं हैं, रज नहीं हैं, तम नहीं हैं। आप उसकी सन्तान हैं जिसने कहा, "बीजप्रदः पिता", मैं बीज देने वाला पिता हूँ।
जय श्री कृष्ण।
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥ १० ॥
तीन बातें
- आप "ऐसे" नहीं हैं। "रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत", तीनों गुण हर समय भीतर हैं, और बारी-बारी से ऊपर आते हैं। इसलिए अपने लिए "मैं आलसी हूँ, मैं गुस्सैल हूँ" जैसे वाक्य छोड़िए, और दूसरों के लिए तो बिलकुल। सबका बीज देने वाला पिता एक है। मौसम बदलता है, आँगन वही रहता है।
- चिह्न पहचानिए। जब इन्द्रियों की खिड़कियों से साफ़ रोशनी आए, तो सत्त्व है; उसे सँभालिए। जब "बस एक काम और" की धारा न रुके, तो रज है; कुछ देर रुककर बैठिए। और जब चश्मा माथे पर हो और हम घर भर में ढूँढ रहे हों, जब जानते हुए भी कदम न उठे, तो तम है; तब पहले उठकर कोई छोटा-सा काम कीजिए, फिर बैठिए।
- सत्त्व की सुनहरी डोरी को भी पहचानिए। जिस दिन सब अच्छा चल रहा हो, उस दिन "मैं सुखी हूँ, मैं समझदार हूँ" को कसकर मत पकड़िए। नहुष ने कहा था, जो सुख में रह रहा होता है, वह साफ़ नहीं देख पाता। अपना सुख और अपनी समझ उसी पिता को लौटा दीजिए, जिसने बीज दिया था।