सबमें एक ही भगवान
गीता 13.24–13.34 · 74 मिनट
सबमें एक दिखे तो किससे वैर
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना ।
अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥ २४ ॥
अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते ।
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ॥ २५ ॥
यावत्संजायते किंचित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥ २६ ॥
अगर सचमुच सबमें एक ही भगवान बैठे हैं, तो फिर मैं किससे वैर करूँ? उस रिश्तेदार से, जिसने बरसों पहले जायदाद के कागज़ों में धोखा किया? उस आदमी से, जिसकी एक बात आज भी रात को नींद उड़ा देती है? और अगर उसमें भी वही भगवान हैं, तो जो चोट मुझे लगी, उसका क्या? आज का सवाल यही है, और आज तेरहवाँ अध्याय इसी सवाल पर पूरा होगा।
जय श्री कृष्ण।
आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का उनतालीसवाँ सत्संग है, और आज गीता का तेरहवाँ अध्याय पूरा होगा। महाभारत में भीष्म पर्व का सैंतीसवाँ अध्याय ही गीता का तेरहवाँ अध्याय है, "क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग", यानी शरीर और उसे जानने वाले को अलग-अलग पहचानने का योग। और यह पूरी बातचीत हमें सञ्जय सुना रहे हैं, हस्तिनापुर के महल में, अन्धे राजा धृतराष्ट्र को, उस दिन जब भीष्म पितामह बाणों की शय्या पर गिर चुके हैं। यह बात हम हर बार याद करते हैं, क्योंकि सुनने वाले का दुःख ही इस कथा का रंग तय करता है।
पहले याद कर लें कि पिछली बार हम कहाँ रुके थे। पिछले सत्संग में श्रीकृष्ण ने बताया था कि जानने योग्य वस्तु क्या है। "सर्वतःपाणिपादं तत्", उसके हाथ-पैर सब ओर हैं, आँखें, सिर और मुख सब ओर हैं, वह सारे संसार को घेरकर खड़ा है। वह "अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्", बँटा हुआ नहीं है, फिर भी प्राणियों में बँटा हुआ-सा दिखता है। वह ज्योतियों की भी ज्योति है, और "हृदि सर्वस्य विष्ठितम्", सबके हृदय में बैठा है। फिर प्रकृति और पुरुष की बात आई, और श्रीकृष्ण ने कहा कि इस शरीर में जो परम पुरुष है, वह साक्षी है, अनुमति देने वाला है, धारण करने वाला है, महेश्वर है। और जो इस प्रकार पुरुष को और गुणों सहित प्रकृति को जान लेता है, वह सब तरह से जीवन जीता हुआ भी फिर जन्म नहीं लेता।
अब यहाँ एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है, जो शायद आपके मन में भी उठा हो। ठीक है, यह सब सुनने में बहुत ऊँची बात है। पर मैं इसे जानूँ कैसे? मैं कोई ऋषि नहीं, कोई विद्वान नहीं। मेरे पास घर है, नौकरी है, बच्चों की फ़ीस है, बूढ़े माता-पिता की दवाइयाँ हैं। मेरे जैसा आदमी उस साक्षी को, उस महेश्वर को, अपने भीतर कैसे देखे? आज का पहला श्लोक इसी का उत्तर है। और उत्तर बहुत उदार है।
"ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना"। कुछ लोग ध्यान से, शुद्ध मन के द्वारा, अपने भीतर आत्मा को देखते हैं। "अन्ये सांख्येन योगेन", दूसरे ज्ञान के योग से, यानी सोच-विचार और विवेक से। "कर्मयोगेन चापरे", और कुछ और लोग कर्मयोग से।
यानी एक नहीं, कई दरवाज़े हैं। और श्रीकृष्ण यहाँ किसी दरवाज़े को छोटा नहीं कहते। आचार्यों ने इन तीनों को बड़े प्यार से खोलकर समझाया है। शंकराचार्य ध्यान का अर्थ बताते हुए एक सुंदर उपमा देते हैं: जैसे तेल की धार एक बर्तन से दूसरे में गिरती है, बिना टूटे, लगातार, वैसे ही मन का एक ही विचार में लगातार बहते रहना, यही ध्यान है। और सांख्य, यानी ज्ञान का मार्ग, उसे वे इस तरह बताते हैं कि मनुष्य बैठकर यह विचार करे: ये जो सुख-दुःख, उत्साह-आलस, ये सब बदलते हुए भाव हैं, ये सब मेरे देखे जा रहे हैं, और मैं इनसे अलग हूँ, इन्हें देखने वाला, सदा रहने वाला। और कर्मयोग, यानी अपना रोज़ का काम भगवान को अर्पित करके करना। शंकराचार्य कहते हैं, ऐसा काम धीरे-धीरे मन को शुद्ध करता है, और शुद्ध मन में ज्ञान अपने-आप उगता है।
अब इन तीनों का आपस में रिश्ता क्या है? क्या ये तीन अलग-अलग रास्ते हैं, या एक ही सीढ़ी के तीन डंडे? यहाँ आचार्यों में थोड़ा भेद है, और दोनों बातें सुनने लायक हैं। श्रीधर स्वामी कहते हैं, असल में ये सब क्रम से जुड़ते भी हैं, पर अलग-अलग लोगों की अलग-अलग निष्ठा देखकर इन्हें अलग-अलग कहा गया है। नीलकण्ठ तो साफ़ कहते हैं कि यह विकल्प नहीं, सीढ़ी है: पहले निष्काम कर्म से मन शुद्ध होता है, फिर जानने की इच्छा जागती है, फिर विचार आता है, फिर ध्यान पकता है। और मधुसूदन सरस्वती इसमें मनुष्यों की चार श्रेणियाँ देखते हैं। कुछ बहुत तैयार हैं, उनके लिए ध्यान। कुछ बीच वाले हैं, उनके लिए विचार। कुछ धीमे हैं, उनके लिए कर्मयोग। और एक चौथी श्रेणी भी है, जो इनमें से कुछ भी ठीक से नहीं कर पाती। उनके लिए अगला श्लोक है। और मुझे सच कहूँ तो अगला श्लोक मुझे इस पूरे अध्याय के सबसे कोमल श्लोकों में से लगता है।
पर उससे पहले एक बात आपके घर की। एक ही घर में देखिए। माँ सुबह चार बजे उठकर माला लेकर बैठ जाती हैं, घंटा भर आँखें मूँदे रहती हैं। बड़ा बेटा पढ़ने वाला है, वह रात को गीता की टीकाएँ पढ़ता है, सोचता है, प्रश्न करता है। और छोटा बेटा न माला फेरता है, न किताब पढ़ता है, पर दफ़्तर से लौटकर पिताजी के पैर दबाता है, उनकी दवाई का समय याद रखता है, मोहल्ले में किसी को अस्पताल ले जाना हो तो सबसे पहले वही पहुँचता है। अक्सर इन तीनों में तुलना होने लगती है। माँ सोचती हैं छोटा बेटा धर्म से दूर है। बड़ा बेटा सोचता है माँ बस आदत से माला फेरती हैं। और छोटा सोचता है ये दोनों बातें बहुत करते हैं। गीता का यह श्लोक तीनों से कहता है: रुको। तीनों उसी एक को देख रहे हो, अपने-अपने दरवाज़े से। तिलक इस बात पर ज़ोर देते हैं कि लोक के भले के लिए कर्मयोग सबसे ऊँचा है, और शंकराचार्य ज्ञान पर। आचार्य अपनी-अपनी जगह से बोलते हैं। पर श्लोक का अपना स्वर साफ़ है: कोई भी दरवाज़ा छोटा नहीं।
अब पच्चीसवाँ श्लोक। "अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते"। परन्तु दूसरे, जो इस प्रकार नहीं जानते, जो न ध्यान कर पाते हैं, न गहरा विचार, वे दूसरों से सुनकर उपासना करते हैं। "तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः"। वे भी, सुने हुए को ही अपना सहारा बनाकर, निश्चय ही मृत्यु को पार कर जाते हैं।
हमारी टीका यहाँ एक वाक्य कहती है जो मैं चाहता हूँ आप घर ले जाएँ: गुरु के वचन में श्रद्धा अपने-आप में एक मार्ग है, उसके लिए पहले विद्वत्ता ज़रूरी नहीं। मधुसूदन सरस्वती "तेऽपि" के "अपि" पर रुकते हैं, यानी "वे भी"। वे कहते हैं, जब केवल श्रद्धा से सुनने वाले भी पार हो जाते हैं, तो जो स्वयं विचार कर सकते हैं, उनके बारे में क्या कहना। और संत ज्ञानेश्वर इन सुनने वालों का बहुत प्यारा चित्र खींचते हैं। वे कहते हैं, ये लोग अपना अभिमान देश-निकाला देकर, किसी एक के भरोसे पर उसके शब्दों का सहारा ले लेते हैं, किसी ऐसे के, जो उनका हित-अहित देखता है, उनकी थकान पोंछता है। और उसके मुँह से जो निकलता है, उसे वे आदर से, पूरे शरीर और मन से सुनते हैं, और उन अक्षरों पर अपना जीवन न्योछावर कर देते हैं। ज्ञानेश्वर कहते हैं, अन्त में वे भी मृत्यु के समुद्र से सुंदर ढंग से पार निकल जाते हैं। रामानुजाचार्य एक और बारीक बात जोड़ते हैं: ऐसे सुनने वालों के पाप सुनने से धुलते हैं, और फिर धीरे-धीरे वे कर्मयोग जैसे साधन भी शुरू कर देते हैं। यानी सुनना पहला कदम है, और पहला कदम ही आगे के कदम खींच लाता है।
अब ज़रा इस श्लोक को उस कमरे में रखकर देखिए जहाँ यह सुनाया जा रहा है। हस्तिनापुर का महल। धृतराष्ट्र देख नहीं सकते। और जब भगवान व्यास ने उन्हें आँखें देनी चाहीं, तो उन्होंने कहा था, मैं अपने कुटुम्ब का वध देखना नहीं चाहता, पर सुनना चाहता हूँ। यानी गीता का पहला श्रोता ख़ुद "श्रुत्वा", सुनकर ही इसे पा रहा है। और हम सब भी तो यही कर रहे हैं। हममें से कोई रथ पर नहीं था। हम सब सञ्जय से, व्यास से, आचार्यों से, अपने दादा-दादी से सुनकर ही यहाँ तक पहुँचे हैं। श्रीकृष्ण कह रहे हैं, यह कमी नहीं है। यह भी एक रास्ता है, और यह भी मृत्यु के पार ले जाता है।
और इसी बात की एक तसल्ली महाभारत में भी है, जो आप पहले सुन चुके हैं। ग्यारहवें सत्संग में आपने सुना था कि युद्ध के बाद अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा था, जो आपने मित्रता से कहा था, वह मेरे विचलित मन से नष्ट हो गया, और श्रीकृष्ण ने उन्हें गले लगाकर एक पुरानी कथा सुनाई थी। पन्द्रहवें सत्संग में हमने उसी कथा के काश्यप को एक सिद्ध के चरण पकड़कर सुनते देखा था। उसे मैं दोबारा नहीं सुनाऊँगा।
आज उसमें से बस इतना देखिए। भगवान ख़ुद, जब अपने सबसे प्रिय सखा को दोबारा समझाते हैं, तो "सुनी हुई बात" का रास्ता चुनते हैं। सुनने वाले से सुना हुआ, उससे सुना हुआ। यही "श्रुत्वान्येभ्य उपासते" है। अर्जुन भी, इतने बड़े दर्शन के बाद, आख़िर में एक सुनने वाले ही रहे। तो अगर आप भी कभी सोचें कि मुझे तो कुछ याद नहीं रहता, सत्संग सुनता हूँ और अगले दिन भूल जाता हूँ, तो याद रखिए, अर्जुन भी भूल गए थे। और भगवान ने उन्हें छोड़ा नहीं, गले लगाया, और फिर से सुनाया।
अब इस खंड का तीसरा श्लोक, छब्बीसवाँ, जो अगले बड़े श्लोकों की नींव है। "यावत्संजायते किंचित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम्"। हे भरतश्रेष्ठ, जो कुछ भी प्राणी पैदा होता है, चाहे वह एक जगह खड़ा रहने वाला पेड़-पौधा हो, या चलने-फिरने वाला जीव, "क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ", उसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के मेल से पैदा हुआ जानो।
यानी जहाँ भी जीवन है, वहाँ दो चीज़ें मिली हुई हैं। एक, जो जाना जाता है: शरीर, मन, इन्द्रियाँ। और दूसरा, जो जानता है। अकेला शरीर लाश है, और अकेला जानने वाला किसी को दिखता नहीं। जब दोनों मिलते हैं, तब एक जीता-जागता प्राणी सामने आता है।
पर यह मेल है किस तरह का? यहाँ हमारी टीका दोनों पुराने मत सामने रखती है। कुछ आचार्य, जैसे शंकराचार्य, कहते हैं कि यह मेल असल में एक को दूसरा समझ लेने की भूल है। आत्मा तो आकाश की तरह बिना टुकड़ों का है, उसे कोई चीज़ रस्सी की तरह बाँध नहीं सकती। जैसे अँधेरे में रस्सी में साँप दिख जाता है, वैसे ही जानने वाले में शरीर के गुण, और शरीर में जानने वाले की चेतना दिखने लगती है। दूसरे आचार्य, जैसे रामानुजाचार्य, कहते हैं कि यह सचमुच का मेल है, चेतन जीव और जड़ प्रकृति का, जो पुराने कर्मों से हुआ है, और जो ज्ञान और भक्ति से छूटता है। दोनों मत अपनी जगह पूरे हैं, और हम यहाँ किसी का पक्ष नहीं लेते। दोनों में एक बात साझी है: जो जानने वाला है, वह इस शरीर-मन की गठरी से अलग है, और उसे अलग पहचानना ही रास्ता है।
संत ज्ञानेश्वर इस मेल के लिए प्रकृति से उपमाएँ लाते हैं। जैसे हवा पानी से मिलती है, तो लहरें उठती हैं। जैसे बादलों की धार धरती पर गिरती है, तो तरह-तरह के अंकुर फूटते हैं। वैसे ही यह सारा चलता-ठहरता संसार इन दोनों के मेल से पैदा होता है। और फिर वे एक बात कहते हैं जो आज के पूरे सत्संग की चाबी है: इसलिए, अर्जुन, ये अलग-अलग दिखने वाले सारे प्राणी उन दोनों से, उस जानने वाले से और उस प्रकृति से, अलग नहीं हैं।
ज़रा रुककर इसे सुनिए। अगर हर जीव में, पेड़ में, पशु में, आपके दुश्मन में, आपके बच्चे में, यही मेल है, शरीर एक तरफ़ और भीतर एक जानने वाला, तो उस जानने वाले के बारे में अब आगे क्या कहा जाएगा? क्या हर शरीर में अलग-अलग जानने वाला है, या एक ही? अगले श्लोक में श्रीकृष्ण इसका उत्तर देते हैं, और वह श्लोक इतना प्रसिद्ध है कि उसका आख़िरी पद लोग कहावत की तरह बोलते हैं।
पर अभी एक बात बाकी है।
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥ २७ ॥
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ॥ २८ ॥
"समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्"। जो सब प्राणियों में समान रूप से खड़े परमेश्वर को, "विनश्यत्स्वविनश्यन्तं", नष्ट होने वालों के बीच नष्ट न होने वाले को, "यः पश्यति स पश्यति", जो देखता है, वही सचमुच देखता है।
"यः पश्यति स पश्यति"। जो देखता है, वही देखता है। सुनने में यह बात दोहराई हुई-सी लगती है। आँखें तो सबके पास हैं, सब देख ही रहे हैं, फिर यह कहने की क्या ज़रूरत? शंकराचार्य ने यही प्रश्न ख़ुद उठाया है, और उत्तर एक उपमा से दिया है। वे कहते हैं, जिसकी आँख में रोग हो, उसे आकाश में एक चन्द्रमा की जगह कई चन्द्रमा दिखते हैं। वह भी देख रहा है, पर उलटा देख रहा है। उसकी तुलना में जिसे एक ही चन्द्रमा दिखता है, उसी के बारे में कहा जाता है कि वह ठीक देखता है। वैसे ही हम सब देख रहे हैं, पर हमें हर शरीर में एक अलग "मैं" दिखता है, एक अलग टुकड़ा, जो किसी से छोटा है, किसी से बड़ा, किसी का दुश्मन, किसी का अपना। श्रीकृष्ण कहते हैं, जिसकी आँख ठीक हो गई, उसे सबमें वही एक दिखता है।
अब इस श्लोक के तीन शब्द ध्यान से देखिए। पहला, "समं", समान रूप से। रामानुजाचार्य यहाँ बड़ी बारीकी से कहते हैं कि देवता का शरीर, मनुष्य का शरीर, पशु का शरीर, ये सब अलग-अलग ढाँचे के हैं, ऊँचे-नीचे हैं, पर भीतर जो जानने वाला है, वह जानने के रूप में सबमें एक-सा है। और जो उस भीतर वाले को भी ऊँचा-नीचा देखता है, शरीर के हिसाब से, वह बार-बार इसी संसार में घूमता रहता है।
दूसरा शब्द, "परमेश्वरम्"। यहाँ श्रीकृष्ण केवल "आत्मा" नहीं कह रहे, "परमेश्वर" कह रहे हैं। यह बात थोड़ी अलग है उससे जो हमने पहले सुनी थी। आपको याद होगा, सत्रहवें सत्संग में पाँचवें अध्याय का वह श्लोक आया था: "शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः", ज्ञानी लोग विद्वान ब्राह्मण में, गाय में, हाथी में, कुत्ते में और चाण्डाल में भी समान देखते हैं। और उन्नीसवें सत्संग में छठे अध्याय का "आत्मौपम्येन सर्वत्र", अपने समान मानकर सबका सुख-दुःख देखना। वहाँ बात बराबरी की थी, और अपने जैसा समझने की। यहाँ, तेरहवें अध्याय में, बात एक क़दम आगे है। यहाँ कहा जा रहा है कि वह जो सबमें बराबर बैठा है, वह कोई साधारण चीज़ नहीं, वह परमेश्वर है। यानी जब आप किसी के सामने खड़े हैं, तो आप सिर्फ़ एक "अपने जैसे" आदमी के सामने नहीं, उस महेश्वर के सामने खड़े हैं जिसकी बात पिछले श्लोकों में हुई, जो साक्षी है, जो धारण करने वाला है।
और तीसरा शब्द, जो मुझे इस श्लोक में सबसे गहरा लगता है: "विनश्यत्स्वविनश्यन्तं", नष्ट होने वालों के बीच नष्ट न होने वाला। शंकराचार्य कहते हैं कि यह शब्द इसलिए रखा गया, ताकि प्राणियों और परमेश्वर का पूरा अन्तर दिख जाए। जन्म से शुरू होकर हर बदलाव का अन्त नाश में होता है। पर उनके भीतर जो है, वह इन बदलावों में से किसी में नहीं आता।
इसे एक तस्वीर से समझिए। आपके घर में आपके पिताजी की तीन तस्वीरें होंगी। एक जब वे पाँच साल के थे, एक जब उनकी शादी हुई, और एक आख़िरी बरसों की, जब चेहरे पर झुर्रियाँ थीं और चश्मा मोटा हो गया था। तीनों में शरीर बिल्कुल अलग है। पर आप तीनों को देखकर कहते हैं, ये पिताजी हैं। वह "पिताजी" कौन है जो तीनों में एक है? श्रीकृष्ण कहते हैं, उसी को देखो। और जब वह आख़िरी तस्वीर भी पुरानी हो जाए, जब वह शरीर भी न रहे, तब भी जो उन आँखों से बाहर देखता था, वह नष्ट नहीं हुआ। "विनश्यत्स्वविनश्यन्तं"। श्मशान में खड़े होकर यह श्लोक याद आए, तो आँसू तो आएँगे, पर उनके नीचे की ज़मीन नहीं खिसकेगी।
संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर एक के बाद एक उपमाएँ देते हैं। एक ही बेल पर लौकी के फल लगते हैं, कोई लम्बा, कोई टेढ़ा, कोई गोल, पर सब एक ही बेल के हैं। आग की बहुत-सी चिनगारियाँ हैं, पर गर्मी सबमें एक-सी है। घड़े में आकाश, मठ में आकाश, आकाश एक ही है। और सोने के कंगन, बाजूबंद, सबमें सोना एक है। और फिर ज्ञानेश्वर कहते हैं, ज्ञान की आँख वाले जितने हैं, उनमें सबसे अच्छी आँख वाला वही है जिसे यह एकता दिखती है। और वे जोड़ते हैं, यह मैं उसकी झूठी तारीफ़ नहीं कर रहा, वह सचमुच भाग्यवान है।
और अब, इससे पहले कि हम अगले श्लोक में उतरें, एक छोटी-सी बात आपसे कहना चाहता हूँ। आज का सत्संग ऐसी जगह खड़ा है जहाँ तेरहवाँ अध्याय अपनी सबसे बड़ी बात कह रहा है, और उसके बाद श्रीकृष्ण बताएँगे कि यह बात हमारे गुस्से, हमारी चोटों और हमारे अपने दोषों पर कैसे लागू होती है। आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। जो यहीं उठ जाए, वह सोचेगा कि "सबमें भगवान" का मतलब है हर गलत बात को चुपचाप सह लेना, जबकि गीता आगे बहुत साफ़ बताती है कि काम कौन करता है और भीतर वाला किससे अछूता रहता है। तो अगर आप यह सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की यह यात्रा बीच में न छूटे। और आज का यह सत्संग आख़िर तक सुनिए।
अब एक छोटी-सी याद, इक्कीसवें सत्संग से। आपको उदंक मुनि याद होंगे, जिन्होंने श्रीकृष्ण से विनती की थी कि मुझे अपना वैष्णव रूप दिखाइए, और उन्होंने वही रूप देखा जो अर्जुन ने देखा था। और फिर उसी उदंक को मरुभूमि में प्यास लगी, और एक मैला-कुचैला, कुत्तों से घिरा आदमी उन्हें जल देने आया, और उन्होंने उसे झिड़ककर लौटा दिया। बाद में पता चला कि वह इन्द्र थे, श्रीकृष्ण के कहने पर अमृत लेकर आए थे। आज उस कथा का एक नया कोण। विराट रूप में भगवान को देख लेना, शायद उतना कठिन नहीं, जितना अपने सामने खड़े किसी मैले, अप्रिय आदमी में उन्हें देख पाना। "समं सर्वेषु भूतेषु", सबमें, यह शब्द उसी आदमी के लिए है।
अब अट्ठाईसवाँ श्लोक, जो इस बात का फल बताता है। "समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्"। क्योंकि जो सब जगह समान रूप से स्थित ईश्वर को देखता है, "न हिनस्त्यात्मनात्मानं", वह अपने द्वारा अपने को नष्ट नहीं करता, "ततो याति परां गतिम्", इसलिए वह परम गति को जाता है।
"अपने द्वारा अपने को नष्ट नहीं करता"। यह कैसी बात है? कोई अपने को क्यों मारेगा? हमारी टीका इसका अर्थ बहुत साफ़ बताती है: आत्मा को भूलकर अपने को केवल शरीर मान लेना, यही जन्म-जन्म में बार-बार अपने को मारना है। जो सब जगह ईश्वर को देखता है, वह यह करना छोड़ देता है। शंकराचार्य इसे और खोलते हैं। वे कहते हैं, अज्ञानी आदमी अपने असली स्वरूप को एक तरफ़ हटाकर शरीर को "मैं" मान लेता है। फिर उस शरीर के साथ कर्म करता है, वह शरीर गिरता है, नया शरीर लेता है, वह भी गिरता है। तो वह बार-बार अपने को मार रहा है। और जिसने स्वरूप देख लिया, वह यह सिलसिला तोड़ देता है।
पर नीलकण्ठ यहाँ एक दूसरा अर्थ भी देते हैं, जो सीधे हमारे आज के प्रश्न पर आता है। वे कहते हैं, जो सबमें एक ही आत्मा देखता है, वह दूसरे को भी अपने ही जैसा मानकर चोट नहीं पहुँचाता। वह सबके प्रति दयालु हो जाता है। यानी किसी और को मारना भी, असल में, उसी एक को मारना है जो मेरे भीतर है। दूसरे को चोट देना, अपने को चोट देना है। तिलक इसे छठे अध्याय की उस बात से जोड़ते हैं कि आत्मा ही अपना मित्र है, और आत्मा ही अपना शत्रु।
अब मैं आपको महाभारत का वह दृश्य सुनाता हूँ जिसमें यह श्लोक, मुझे लगता है, सबसे सच्चे ढंग से दिखाई देता है। यह कथा युद्ध के बाद की है, और जिसके बारे में है, वह इस युद्ध में कौरवों की ओर खड़ा है, दुर्योधन का सबसे बड़ा सहारा। उसका नाम है कर्ण।
युद्ध ख़त्म हुआ। स्त्री पर्व में वैशम्पायन बताते हैं कि सब लोग गंगा के किनारे पहुँचे, अपने-अपने मरे हुओं को जल देने। गहने उतारे, कवच उतारे, पानी में उतरे। कुरु वंश की स्त्रियाँ अपने पिताओं, भाइयों, बेटों, पतियों के लिए रोती हुई जल दे रही थीं। और तभी, रोती हुई, शोक से दुबली हुई कुन्ती ने, लाज से धीमी आवाज़ में, अपने बेटों से कहा: वह महाधनुर्धर, जिसे तुम सूत का बेटा, राधा का बेटा मानते हो, जो सेना के बीच सूर्य की तरह चमकता था, जो अर्जुन के हाथ मारा गया, उस कर्ण के लिए भी जल दो। "वह तुम्हारा बड़ा भाई था। सूर्य से, मुझसे जन्मा"।
पाण्डव यह सुनकर सन्न रह गए। और युधिष्ठिर साँप की तरह लम्बी साँस भरते हुए माँ से बोले, जिसके बाणों के आगे अर्जुन के सिवा कोई टिक नहीं सकता था, वह आपका बेटा कैसे हुआ? आपने उसे ऐसे कैसे छिपाकर रखा, जैसे कोई आग को कपड़े से ढक दे? और फिर उन्होंने वह वाक्य कहा जो आज के हमारे प्रश्न का सबसे सीधा उत्तर है। युधिष्ठिर कहते हैं: अगर वह भाई जाना गया होता, तो स्वर्ग की चीज़ भी हमारे लिए दुर्लभ न रहती, और कौरवों का अन्त करने वाला यह भयानक संहार भी न होता।
सुन रहे हैं आप? "अगर वह जाना गया होता।" एक पहचान की कमी थी, बस। जिसे शत्रु समझकर पूरे युद्ध में उसके विरुद्ध लड़े, और जो आख़िर में मारा गया, वह सगा बड़ा भाई था। और युधिष्ठिर कहते हैं, अभिमन्यु के मरने से, द्रौपदी के बेटों के मरने से भी सौ गुना बड़ा यह दुःख मुझ पर आ पड़ा है, मैं जैसे आग में डाला गया जल रहा हूँ। फिर उन्होंने भाई के प्रेम से कर्ण की पत्नियों को परिवार सहित बुलवाया, और उनके साथ बैठकर कर्ण के सारे क्रिया-कर्म विधि से किए।
पर इस कथा का सबसे कोमल हिस्सा उसके बाद आता है, शान्ति पर्व के पहले अध्याय में। युद्ध के बाद पाण्डव एक महीना गंगा किनारे नगर के बाहर ठहरे थे, यह हमने सातवें सत्संग में सुना था, और वहाँ नारद आदि ऋषि आए थे। उस दिन युधिष्ठिर नारद से कर्ण के बारे में पूछते हैं, और बताते हैं: अर्जुन भी उसे अपना भाई नहीं जानता था, न मैं, न भीम, न जुड़वाँ भाई। "पर वह हमें सचमुच जानता था।" चौंतीसवें सत्संग में आपने सुना था कि भीष्म ने शरशय्या पर कर्ण को गले लगाकर कहा था, तुम कुन्ती के पुत्र हो, राधा के नहीं। यानी भीष्म जानते थे, कर्ण जानता था, कुन्ती जानती थीं। बस युधिष्ठिर नहीं जानते थे।
और फिर युधिष्ठिर नारद से वह बात कहते हैं, जिसे सुनकर मेरा मन हर बार भर आता है। वे कहते हैं: जब सभा में धृतराष्ट्र के बेटे मुझे सताते थे, जब जुए के समय कर्ण दुर्योधन का भला चाहते हुए कठोर, कड़वे वचन बोलता था, तब मेरे भीतर अचानक क्रोध उठता था। पर फिर मैं उसके पैरों की ओर देखता था, और मेरा रोष मिट जाता था। "कुन्त्या हि सदृशौ पादौ", मुझे लगता था, कर्ण के पैर कुन्ती के पैरों जैसे हैं। और युधिष्ठिर कहते हैं, मैं बहुत सोचता था कि माँ के पैरों और उसके पैरों में यह समानता क्यों है, पर बहुत सोचने पर भी मुझे कोई कारण नहीं मिलता था।
इस दृश्य को आज के दोनों श्लोकों के साथ रखिए। युधिष्ठिर को पूरा सच नहीं पता था। फिर भी, अपने सबसे कड़वे विरोधी में, उन्हें माँ की एक झलक दिख जाती थी, और वह झलक क्रोध को बुझा देती थी। श्रीकृष्ण आज यही कह रहे हैं, बस उससे बहुत आगे तक। हर उस आदमी में, जिससे आपका झगड़ा है, कुछ ऐसा है जो आपकी माँ के पैरों जैसा है। केवल शरीर के रिश्ते की बात नहीं। उसके भीतर वही परमेश्वर खड़ा है, जो आपके भीतर है। "समं सर्वेषु भूतेषु"। और जिसे यह पहचान नहीं मिलती, वह पूरा युद्ध लड़ लेता है, और फिर गंगा के किनारे बैठकर रोता है कि यह तो मेरा ही भाई था। यही "न हिनस्त्यात्मनात्मानं" का उलटा है: अपने ही हाथ से अपने को मारना।
आज के घर-परिवार में इसे सोचिए। दो भाई, जिनका दस साल से बोलचाल बंद है, एक मकान के बँटवारे पर। एक बहन, जिसकी भाभी से नहीं बनती। एक दफ़्तर, जिसमें कोई आदमी आपको हर मीटिंग में नीचा दिखाता है। अगली बार जब उसके सामने क्रोध उठे, तो एक पल के लिए युधिष्ठिर की तरह उसके पैरों की ओर देखिए। मन ही मन कहिए, इसके भीतर भी वही बैठा है जिसे मैं सुबह दीपक दिखाता हूँ। इससे उसकी गलत बात सही नहीं हो जाएगी। पर आपके भीतर की आग, जो आपको ही जला रही है, थोड़ी ठंडी हो जाएगी।
पर यहाँ एक कठिन प्रश्न खड़ा होता है, और आप भी शायद पूछ रहे होंगे। अगर कर्ण में भी वही परमेश्वर थे, तो वे कठोर वचन किसने कहे? सभा में जो अपमान हुआ, वह किसने किया? अगर भीतर वाला एक है और पवित्र है, तो ये सारे बुरे काम कौन कर रहा है? अगले दो श्लोक ठीक इसी प्रश्न का उत्तर हैं।
पर अभी एक बात बाकी है।
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।
यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति ॥ २९ ॥
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म संपद्यते तदा ॥ ३० ॥
"प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः"। जो देखता है कि सब कर्म, सब प्रकार से, प्रकृति के द्वारा ही किए जा रहे हैं, "यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति", और इसी तरह आत्मा को अकर्ता, यानी करने वाला नहीं, देखता है, वही सही देखता है।
देखिए, "स पश्यति" फिर आया। पिछले खंड में श्रीकृष्ण ने कहा था, जो सबमें एक परमेश्वर देखता है, वही देखता है। अब कह रहे हैं, जो यह देखता है कि काम प्रकृति कर रही है और आत्मा करने वाला नहीं, वह भी वही देखता है। यानी ये दोनों बातें एक ही दृष्टि के दो हिस्से हैं।
श्रीधर स्वामी इस श्लोक से पहले वही प्रश्न रखते हैं जिस पर हम पिछले खंड में रुके थे। वे पूछते हैं: जब हम साफ़ देखते हैं कि कोई अच्छे काम करता है, कोई बुरे, तो सबमें बैठा आत्मा समान कैसे हुआ? और उत्तर देते हैं: काम शरीर और इन्द्रियों के रूप में बदली हुई प्रकृति कर रही है। आत्मा में करने का भाव अपने-आप नहीं है, वह शरीर को "मैं" मानने से आता है। मधुसूदन सरस्वती भी यही कहते हैं, और आगे जोड़ते हैं कि जैसे आकाश एक है, वैसे ही करने वाले शरीर अलग-अलग होने पर भी भीतर वाले में कोई भेद नहीं।
संत ज्ञानेश्वर इसे घर की उपमा से कहते हैं, और यह उपमा मुझे बहुत अच्छी लगती है। घर में रहने वाले लोग घर में चलते-फिरते हैं, खाना बनाते हैं, झगड़ते हैं, हँसते हैं। पर घर ख़ुद कुछ नहीं करता। आकाश में बादल दौड़ते हैं, पर आकाश अपनी जगह शान्त रहता है। वैसे ही, वे कहते हैं, प्रकृति आत्मा के प्रकाश में तरह-तरह के खेल खेलती है, गुणों के सहारे, और आत्मा एक खम्भे की तरह स्थिर खड़ा रहता है, उसे पता भी नहीं कि क्या चल रहा है।
यह बात हमने पहले भी सुनी है। तीसरे अध्याय में श्रीकृष्ण ने कहा था, "प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः", सब कर्म प्रकृति के गुणों से हो रहे हैं, पर अहंकार से मोहित आदमी मानता है, "मैं करने वाला हूँ"। और पाँचवें अध्याय में, "स्वभावस्तु प्रवर्तते", स्वभाव ही बरत रहा है। और तैंतीसवें सत्संग में आपने वह कठोर वचन सुना था, "निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्", तुम केवल निमित्त बनो। वहाँ यह बात युद्ध के बड़े चित्र में कही गई थी। यहाँ यही बात हर आदमी के भीतर उतर आई है।
अब इसे अपने शरीर में देखिए। आपका दिल इस समय धड़क रहा है। क्या आप उसे धड़का रहे हैं? सुबह जो खाना खाया, वह पच रहा है। क्या आप पचा रहे हैं? रात को नींद आती है, सुबह आँख खुलती है। हम इतना कुछ "अपने-आप" होते देखते हैं, फिर भी कहते हैं, मैंने किया। श्रीकृष्ण कहते हैं, ज़रा ध्यान से देखो, जिसे तुम "मैं" कहते हो, उसके चारों ओर एक पूरी मशीन चल रही है, और तुम उसके देखने वाले हो।
पर एक सावधानी, जो बहुत ज़रूरी है। पिछले सत्संग के आख़िरी श्लोक पर हमारी टीका ने कहा था: यह किसी भी आचरण की छूट नहीं है। कोई यह न सोचे कि "प्रकृति कर रही है" कहकर मैं कुछ भी कर लूँ और ज़िम्मेदारी से छूट जाऊँ। यह बात उसके लिए है जो अपने को सचमुच अलग जान चुका है। और ऐसे आदमी के हाथ से बुरा काम होता ही नहीं, क्योंकि बुरे काम की जड़, "मैं" और "मेरा", ही कट चुकी होती है।
अब इसे आज के हमारे प्रश्न पर लाइए, किससे वैर करूँ। जब कर्ण सभा में कठोर बातें बोल रहा था, तो वह क्या था? उसका गुस्सा, उसकी होड़, दुर्योधन के प्रति उसकी वफ़ादारी, उसके अपने घाव। ये सब प्रकृति के खेल हैं, उसके स्वभाव के। पर उसके पैरों में जो कुन्ती के पैरों जैसा था, वह इन खेलों से अलग था। युधिष्ठिर बिना जाने यही कर रहे थे: वचन सुनते थे, और पैरों की ओर देखते थे। यानी आप किसी की गलत बात का विरोध कर सकते हैं, उसके गलत काम को रोक सकते हैं, धर्म के लिए उससे लड़ भी सकते हैं, जैसे अर्जुन लड़ रहे हैं। पर जिसका विरोध है, वह उसकी प्रकृति है। उसके भीतर जो परमेश्वर है, उससे आपका कोई झगड़ा नहीं। और यह भी याद रखिए कि यही बात आप पर भी लागू होती है। आपका गुस्सा भी आपकी प्रकृति है, आप नहीं। अगले अध्याय में श्रीकृष्ण बताएँगे कि प्रकृति किन तीन धागों से बुनी है, जो हमें इस तरह नचाती है।
अब तीसवाँ श्लोक, जो इस दृष्टि को उसके शिखर पर ले जाता है। "यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति"। जब वह प्राणियों के अलग-अलग होने को, उनके इस "पृथग्भाव" को, एक में स्थित देखता है, "तत एव च विस्तारं", और उसी एक से उनका फैलाव देखता है, "ब्रह्म संपद्यते तदा", तब वह ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।
यह श्लोक दो बातें कहता है। पहली, ये जितने अलग-अलग प्राणी दिखते हैं, ये सब एक में टिके हैं। दूसरी, यह सारा फैलाव उसी एक से निकला है। जैसे एक पेड़ की सारी डालियाँ, पत्ते, फूल, सब एक बीज में थे, और उसी बीज से निकले।
यहाँ आचार्यों के स्वर फिर थोड़े अलग हैं, और दोनों सुंदर हैं। शंकराचार्य इसे उपनिषद् के वचन से जोड़ते हैं कि यह सब आत्मा ही है, और आत्मा से ही प्राण, आकाश, अग्नि, जल, सब निकलते हैं। श्रीधर स्वामी कहते हैं, प्रलय के समय सारे प्राणी ईश्वर की शक्ति, एक प्रकृति में समा जाते हैं, और सृष्टि के समय उसी से फैलते हैं। और रामानुजाचार्य कहते हैं, देवता होना, मनुष्य होना, छोटा होना, लम्बा होना, ये सारे भेद प्रकृति में हैं, आत्मा में नहीं। जो यह देख लेता है, वह अपने असली, बिना सीमा वाले ज्ञान-स्वरूप को पा लेता है। संत ज्ञानेश्वर कहते हैं, जैसे लहरें पानी में, जैसे धूल के कण धरती में, जैसे किरणें सूर्य के मण्डल में, जैसे चिनगारियाँ एक आग में, वैसे ही सारे प्राणी एक के हैं। जब यह दृष्टि सच में भीतर उतरती है, तो फिर जिधर देखो, उधर ब्रह्म ही दिखता है।
आपको इक्कीसवें सत्संग की वह कथा याद होगी, जब मार्कण्डेय मुनि ने प्रलय में एक बालक के भीतर पूरा संसार देखा था, गंगा, हिमालय, समुद्र, सब। वह इसी श्लोक का एक चित्र था: सारा फैलाव एक में।
और अब एक कथा, जो इस श्लोक को बिल्कुल नई तरह से खोलती है। वन पर्व में, जब पाण्डव तीर्थयात्रा पर हैं, लोमश मुनि युधिष्ठिर को यमुना के पास एक जगह दिखाते हैं, और कहते हैं, यहाँ राजा उशीनर ने यज्ञ किया था। इन्द्र और अग्नि उनकी परीक्षा लेने उनकी सभा में आए। इन्द्र बाज बनकर, और अग्नि कबूतर बनकर। बाज के डर से कबूतर राजा की गोद में आ गिरा, और वहीं छिप गया, शरण माँगता हुआ।
बाज आया और बोला, हे राजन्, सब राजा तुम्हें धर्मात्मा कहते हैं, फिर तुम धर्म के विरुद्ध काम क्यों कर रहे हो? मैं भूखा हूँ, और यह मेरा तय किया हुआ भोजन है। राजा ने कहा, यह पक्षी डरा हुआ है, जीना चाहता है, मेरी शरण में आया है, इसे सौंप देना पाप है। और फिर बाज ने एक ऐसी बात कही जो सुनने लायक है। उसने कहा, आज अगर मेरा भोजन छिन गया, तो मैं मर जाऊँगा, और मेरे मरने पर मेरी पत्नी और बच्चे भी नष्ट हो जाएँगे। कबूतर को बचाकर तुम बहुत से प्राणों को नहीं बचा रहे। जो धर्म बहुतों को हानि पहुँचाए, वह धर्म नहीं।
देखिए, कथा कितनी ईमानदार है। उसमें शिकारी की भूख भी गिनी गई है। बाज बुरा नहीं है, बाज भूखा है। राजा ने उसे दूसरा भोजन देना चाहा, बैल, हिरन, जो चाहो, यहाँ तक कि अपना राज्य भी। बाज ने कहा, मैं वह नहीं खाता, मुझे तो यही कबूतर चाहिए। और अगर तुम्हें इतना प्रेम है, तो अपने शरीर का मांस काटकर इसके बराबर तौल दो।
राजा ने कहा, यह तुम्हारी कृपा है। तराज़ू मँगाया। एक पलड़े में कबूतर, दूसरे में अपना काटा हुआ मांस। पर कबूतर भारी निकला। राजा ने और काटा, फिर भी कबूतर भारी। और आख़िर में, लोमश बताते हैं, कटे हुए अंगों वाले वे राजा ख़ुद पूरे के पूरे तराज़ू पर चढ़ गए। तब बाज ने कहा, हे धर्मज्ञ, मैं इन्द्र हूँ, और यह कबूतर अग्नि हैं। हम तुम्हारी परीक्षा लेने आए थे। तुम्हारी कीर्ति सदा रहेगी।
अब इस कथा को तीसवें श्लोक के साथ रखिए। सामने दो प्राणी थे, जो एक-दूसरे के बिल्कुल उलटे दिखते थे। एक शिकारी, एक शिकार। एक डराने वाला, एक डरा हुआ। "भूतपृथग्भाव", अलगाव इससे ज़्यादा क्या होगा? और अन्त में पता चला कि दोनों देवता थे, दोनों एक ही यज्ञ में आए मेहमान। अलगाव केवल वेश था, पंख और चोंच का। भीतर दोनों एक ही दैवी खेल के हिस्से थे। एक में स्थित। और एक बात और। एक छोटा-सा कबूतर, राजा के कटे हुए मांस से भारी पड़ता गया, जब तक राजा ने अपने को पूरा नहीं रख दिया। जैसे कथा कह रही हो, सबसे छोटे प्राणी में भी जो है, उसका तौल पूरा "आप" ही है, उससे कम कुछ नहीं। यह अर्थ मैं अपनी ओर से कह रहा हूँ, कथा केवल इतना कहती है कि कबूतर भारी पड़ता रहा।
हमारे घरों में यह कैसे दिखता है? घर में दो बच्चे झगड़ते हैं, एक रो रहा है, एक ज़िद कर रहा है। हम झट से एक को "बेचारा" और दूसरे को "बदमाश" बना देते हैं। उशीनर की तरह देखिए, ज़िद करने वाले की भूख भी असली है, रोने वाले का डर भी। दोनों आपके हैं, दोनों में वही एक है। जो दोनों को एक साथ थाम ले, वह सच्चा बड़ा है।
पर यहाँ अब एक और प्रश्न खड़ा होता है, जो शायद सबसे कठिन है। अगर वह एक परमेश्वर सबमें है, तो वह गन्दे शरीर में भी है, बीमार शरीर में भी, पापी के शरीर में भी। क्या उस पर उस शरीर की गन्दगी, उसके पाप, उसके दुःख का दाग़ नहीं लगता? अगले दो श्लोकों में श्रीकृष्ण इसके लिए एक ऐसी उपमा देते हैं जो आप रोज़ अपने सिर के ऊपर देखते हैं।
पर अभी एक बात बाकी है।
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥ ३१ ॥
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते ।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ॥ ३२ ॥
"अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः"। हे कुन्तीपुत्र, यह परमात्मा अनादि है, यानी इसका कोई आरम्भ नहीं, और निर्गुण है, यानी गुणों से रहित, इसलिए यह अविनाशी है। "शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते", शरीर में रहता हुआ भी यह न कुछ करता है, न किसी चीज़ से लिप्त होता है।
शंकराचार्य इस श्लोक का तर्क बहुत सीधे ढंग से रखते हैं। जिस चीज़ का आरम्भ होता है, उसका अन्त भी होता है। जिसमें गुण होते हैं, वह गुणों के घटने-बढ़ने से बदलता है। यह परमात्मा न आरम्भ वाला है, न गुणों वाला, इसलिए इसमें कोई घटती नहीं होती। और फिर दूसरी बात: यह कुछ करता नहीं, और जो करता नहीं, उसे कर्म का फल नहीं चिपकता। फल तो करने वाले को लगता है।
मधुसूदन सरस्वती एक उपमा देते हैं जो आप किसी भी तालाब के किनारे देख सकते हैं। पानी में सूरज की परछाईं पड़ती है। हवा चलती है, पानी हिलता है, और परछाईं भी काँपने लगती है। पर क्या आसमान का सूरज काँप रहा है? नहीं। वह अपनी जगह वैसा ही है। वैसे ही, वे कहते हैं, शरीर हिलता है, काम करता है, थकता है, बीमार होता है, और लगता है भीतर वाला भी यह सब कर रहा है। पर वह नहीं कर रहा।
संत ज्ञानेश्वर इसी को आगे ले जाते हैं। वे कहते हैं, जैसे पानी में दिखता सूरज पानी से गीला नहीं होता, जैसे शीशे में दिखता चेहरा शीशे में रहता नहीं, केवल वहाँ दिखता है, वैसे ही आत्मा "शरीर में रहता है", यह कहने की बात भर है। और फिर वे शरीर के बारे में बहुत खरी बात कहते हैं। यह शरीर पाँच तत्त्वों से बना है, कर्मों के धागों में गुँथा है, जन्म-मृत्यु के चाक पर चढ़ा है। वे कहते हैं, यह काल की आग के मुँह में रखा मक्खन का गोला है। यह कठोर लगता है, पर इसके ठीक बाद वे कहते हैं: और आत्मा इसमें ऐसा है, सदा सिद्ध, अपने-आप, बिना आरम्भ का। जैसे मठ के भीतर का आकाश "मठ का आकाश" कहलाता है, पर मठ गिरने से आकाश नहीं गिरता।
अब बत्तीसवाँ श्लोक, उसी बात की उपमा। "यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते"। जैसे आकाश सब जगह है, फिर भी अपनी सूक्ष्मता के कारण किसी चीज़ से लिप्त नहीं होता, "सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते", वैसे ही शरीर में सब जगह स्थित आत्मा लिप्त नहीं होता।
आकाश के बारे में सोचिए। जिस आकाश के नीचे शादी का पण्डाल लगा है, फूल, बत्तियाँ, ढोल, उसी आकाश के नीचे कुछ दूर श्मशान में चिता जल रही है। उसी आकाश में मन्दिर का शिखर है, और उसी में कूड़े का ढेर। श्रीधर स्वामी कहते हैं, आकाश कीचड़ में भी है, पर कीचड़ से गन्दा नहीं होता। नीलकण्ठ कहते हैं, धुआँ आकाश में उठता है, पर आकाश को काला नहीं कर पाता। कुछ देर में धुआँ चला जाता है, और आकाश वैसा ही नीला। और श्रीधर स्वामी एक बहुत ज़रूरी बात जोड़ते हैं: "उत्तमे मध्यमेऽधमे वा", उत्तम शरीर हो, मध्यम हो या अधम, आत्मा किसी में भी शरीर के गुण-दोषों से नहीं जुड़ता। रामानुजाचार्य भी यही कहते हैं: देवता का शरीर हो या मनुष्य का, आत्मा अपनी अत्यन्त सूक्ष्मता के कारण उस शरीर के स्वभाव से नहीं बँधता।
संत ज्ञानेश्वर यहाँ दो घरेलू उपमाएँ और देते हैं। चुम्बक के पास रखा लोहा हिलने लगता है, पर लोहा चुम्बक नहीं बन जाता। और दीपक की लौ से घर का सारा काम चलता है, खाना बनता है, बच्चे पढ़ते हैं, पर दीपक और घर अलग-अलग ही रहते हैं। वे कहते हैं, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ में बस इतना ही रिश्ता है। एक की मौजूदगी से दूसरा चलता है, पर दोनों एक नहीं होते।
यह बात हमारी समदृष्टि के लिए बहुत बड़ी है। हम अक्सर मन में मानते हैं कि भगवान अच्छे लोगों में ज़्यादा हैं, साफ़-सुथरे लोगों में, पूजा करने वालों में। और जो गन्दा है, बीमार है, जेल में है, जिसने कोई बड़ी भूल की है, उसमें शायद कम। यह श्लोक कहता है, नहीं। आकाश झोंपड़ी में भी उतना ही है जितना महल में। धुएँ से भरे कमरे में भी उतना ही है जितना खुले मैदान में। फ़र्क़ केवल धुएँ का है, आकाश का नहीं।
अब एक कथा, जो इसी आकाश की उपमा को महाभारत के भीतर से खोलती है। शान्ति पर्व में, शरशय्या पर लेटे भीष्म से युधिष्ठिर पूछते हैं कि यह सारा चलता-ठहरता संसार किसने रचा, और जीवों का जीव कैसा है, मरने वाले कहाँ जाते हैं। भीष्म उत्तर में वही भृगु और भरद्वाज का संवाद सुनाते हैं जो आपने सैंतीसवें सत्संग में सुना था, जहाँ भृगु ने शरीर को पाँच महाभूतों में बाँटा था। वहाँ बात शरीर की थी। आज उसी संवाद के अगले अध्यायों में बात उसकी है जो इस शरीर में रहता है।
भरद्वाज के प्रश्न बहुत आज के जैसे हैं, आपको हैरानी होगी। वे कहते हैं: अगर हवा ही साँस लेती है, आग ही खाना पचाती है, तो फिर जीव नाम की अलग चीज़ की क्या ज़रूरत? मरते हुए आदमी में कोई जीव निकलता दिखता नहीं, बस साँस रुक जाती है और गर्मी चली जाती है। और फिर वे कहते हैं: शरीर तो मांस और खून का पिण्ड है, चर्बी, नसों और हड्डियों का ढेर। इसे चीरकर देखो, तो जीव कहीं नहीं मिलता। पर फिर वे ख़ुद ही एक प्रश्न जोड़ देते हैं: अगर इस शरीर में कोई जीव नहीं, तो शरीर या मन का दुःख कौन महसूस करता है? कौन ख़ुश होता है, कौन गुस्सा करता है, कौन शोक करता है?
भृगु का उत्तर सुनिए। वे कहते हैं: जब लकड़ियाँ जल जाती हैं, तो आग दिखनी बंद हो जाती है। पर आग नष्ट नहीं हुई। वह आकाश में चली गई, और बिना आधार के, सूक्ष्म होने के कारण, पकड़ में नहीं आती। वैसे ही शरीर छोड़ने पर जीव आकाश में आश्रित हो जाता है, और सूक्ष्म होने से पकड़ा नहीं जाता, जैसे बिना ईंधन की ज्योति। और फिर भृगु कहते हैं, इस पाँच तत्त्वों वाले शरीर में एक ही अन्तरात्मा है, जो सब अंगों में फैला है, गन्ध, रस, शब्द, स्पर्श, रूप सब वही जानता है, सुख-दुःख वही जानता है।
और अब वह पंक्ति, जिसके लिए मैं यह कथा लाया। भृगु कहते हैं, उस आत्मा को जानो जो सब लोकों को पकाने वाला है। वह इस शरीर में ऐसे रहता है, जैसे कमल के पत्ते पर जल की बूँद। कमल का पत्ता पानी में ही रहता है, पर उस पर बूँद ठहरती है, फैलती नहीं, पत्ते को गीला नहीं करती, और ज़रा-सा हिलाओ तो लुढ़क जाती है। भृगु आगे कहते हैं, प्रकृति के गुणों से जुड़ा आत्मा क्षेत्रज्ञ कहलाता है, और उन गुणों से मुक्त होने पर परमात्मा। देखिए, यह वही "क्षेत्रज्ञ" शब्द है जिससे यह पूरा अध्याय शुरू हुआ था। भीष्म की शय्या से निकली यह बात और कुरुक्षेत्र के रथ पर कही गई गीता, एक ही सुर में बोल रही हैं।
और भृगु की एक और पंक्ति अगले खंड का रास्ता खोलती है। वे कहते हैं, इस तरह वह सब प्राणियों में छिपा हुआ, ढका हुआ विचरता है, पर तत्त्व को देखने वाले उसे श्रेष्ठ और सूक्ष्म बुद्धि से देखते हैं। यानी उसे देखने के लिए कोई और आँख चाहिए। उस आँख का नाम अगले श्लोकों में आएगा।
अब इसे अपने घर में लाइए। मान लीजिए आपके पिताजी अस्पताल में हैं। नलियाँ लगी हैं, बोल नहीं पा रहे, शरीर बहुत दुबला हो गया है, और आप उन्हें देखकर डर जाते हैं कि यह वह आदमी नहीं जिसकी उँगली पकड़कर आप मेले में गए थे। यह श्लोक धीरे से कहता है, उस शरीर पर रोग का धुआँ है, पर भीतर का आकाश वैसा ही है। जो आपको पहचानता था, वह अब भी उतना ही साफ़ है। उनका हाथ पकड़िए, उनसे बात कीजिए, नाम लीजिए। धुएँ के पार वही बैठा है।
और एक बात अपने लिए भी। हम में से बहुत लोग अपनी किसी पुरानी भूल को सालों ढोते रहते हैं। कोई कठोर शब्द जो माँ से कहा था, कोई ग़लत फ़ैसला, कोई टूटा हुआ रिश्ता। भूल को भूल मानना ज़रूरी है, उसे सुधारना ज़रूरी है, माफ़ी माँगनी हो तो माँगिए। पर अपने को ही गन्दा मान बैठना, यह मान लेना कि मैं अब कभी शुद्ध नहीं हो सकता, यह वही "अपने द्वारा अपने को मारना" है जिसकी बात अट्ठाईसवें श्लोक ने की। आकाश पर धुआँ था, धुआँ था। आकाश वही है।
तो आकाश ने बताया कि भीतर वाला किसी चीज़ से लिप्त नहीं होता। पर आकाश तो चुपचाप है, कुछ दिखाता नहीं। क्या भीतर वाला भी बस चुप बैठा है? या वह कुछ और भी करता है? अध्याय के आख़िरी दो श्लोकों में श्रीकृष्ण एक दूसरी उपमा देते हैं, और वह उपमा सुबह-सुबह आपकी खिड़की से भीतर आती है।
पर अभी एक बात बाकी है।
यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥ ३३ ॥
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् ॥ ३४ ॥
"यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः"। हे भारत, जैसे एक ही सूर्य इस पूरे संसार को प्रकाशित करता है, "क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत", वैसे ही क्षेत्री, यानी क्षेत्र का मालिक, जानने वाला, पूरे क्षेत्र को प्रकाशित करता है।
हमारी टीका इस श्लोक को दो छोटे वाक्यों में बाँध देती है: सूर्य सबको प्रकाशित करता है, पर किसी से छुआ नहीं जाता। वैसे ही आत्मा सारे क्षेत्र को प्रकट करता है, और उसके किसी दोष को नहीं अपनाता।
पिछले खंड में आकाश था, जो सब जगह है पर कुछ करता नहीं दिखता। अब सूर्य है, जो सब जगह रोशनी पहुँचाता है। श्रीधर स्वामी यही अन्तर बताते हैं: आकाश की उपमा से कहा गया कि वह किसी से चिपकता नहीं, और सूर्य की उपमा से कहा गया कि जो प्रकाश देता है, वह प्रकाशित चीज़ों के गुणों से नहीं जुड़ता। शंकराचार्य कहते हैं, सूर्य की उपमा यहाँ दो बातें एक साथ कहती है। एक, सब क्षेत्रों में एक ही आत्मा है, जैसे एक ही सूर्य। और दो, वह किसी से लिपता नहीं। नीलकण्ठ इसमें एक बहुत सुंदर बारीकी देखते हैं। वे कहते हैं, सूर्य संसार को केवल अपने होने से प्रकाशित करता है, जुलाहे की तरह मेहनत करके कपड़ा नहीं बुनता। और जिस चीज़ पर रोशनी पड़ती है, उसकी दुर्गन्ध सूर्य तक नहीं पहुँचती। और रामानुजाचार्य कहते हैं, क्षेत्री अपने ज्ञान से पूरे क्षेत्र को, पैर के तलवे से सिर तक, भीतर-बाहर, ऐसे जानता है: यह मेरा क्षेत्र है, ऐसा है। जैसे सूर्य उस संसार से अलग है जिसे वह रोशन करता है, वैसे ही जानने वाला उस शरीर से बिल्कुल अलग है जिसे वह जानता है।
सुबह की धूप के बारे में सोचिए। वही धूप मन्दिर के कलश पर पड़ती है, और वही नाली के पानी पर। वही धूप राजा की छत पर, और वही सड़क पर सोए आदमी के चेहरे पर। धूप नाली पर पड़कर गन्दी नहीं होती, और कलश पर पड़कर घमण्डी नहीं होती। और एक बात और। जिस चीज़ पर धूप पड़ती है, वही दिखती है। आपका मन, आपकी यादें, आपकी इच्छाएँ, आपका दर्द, ये सब इसलिए दिखते हैं क्योंकि भीतर कोई रोशनी है जो इन्हें दिखा रही है। "क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति"। आप वह रोशनी हैं, वह कमरा नहीं जिसमें रोशनी पड़ रही है।
और आज की हमारी कर्ण की कथा यहाँ अपने आप पूरी हो जाती है। कुन्ती ने गंगा किनारे कहा था, वह सूर्य से जन्मा था, कुण्डल और कवच वाला, सूर्य के समान तेजस्वी। और तैंतीसवें सत्संग में आपने सुना था कि जब कर्ण गिरा, तो उसके शरीर से एक तेज निकला, आकाश में फैला, और सूर्य में समा गया। उस दिन वही सूर्य कर्ण के रथ पर भी चमक रहा था, और अर्जुन के रथ पर भी। दोनों भाई एक-दूसरे को मारने के लिए खड़े थे, और ऊपर एक ही सूर्य दोनों पर बराबर रोशनी डाल रहा था, न किसी का पक्ष, न किसी से वैर। एक ही सूर्य। उसी तरह, उस कुरुक्षेत्र के हर शरीर में, कौरव हों या पाण्डव, एक ही क्षेत्री बैठा था।
अब तेरहवें अध्याय का आख़िरी श्लोक। "क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा"। जो ज्ञान की आँख से इस प्रकार क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का अन्तर जानते हैं, "भूतप्रकृतिमोक्षं च", और प्राणियों की प्रकृति से छूटने का रास्ता जानते हैं, "ये विदुर्यान्ति ते परम्", वे परम पद को जाते हैं।
हमारी टीका कहती है, "प्राणियों की प्रकृति" वह प्रकृति है जिससे सारे शरीर पैदा होते हैं, और कुछ आचार्य इसे अविद्या ही मानते हैं। और दोनों का भेद जानना, उससे निकलने का रास्ता है। शंकराचार्य "ज्ञानचक्षु" का अर्थ बताते हैं: शास्त्र और आचार्य की कृपा से, उनके उपदेश से, भीतर जो जानने की आँख खुलती है। यानी यह आँख किसी अकेले के पुरुषार्थ से नहीं खुलती, इसमें गुरु की कृपा और सुना हुआ वचन दोनों हैं। पच्चीसवाँ श्लोक याद कीजिए: "श्रुत्वान्येभ्य उपासते", सुनकर उपासना करने वाले भी पार हो जाते हैं। अध्याय जिस बात से इस खंड में चला था, उसी पर लौट आया।
तिलक यहाँ एक बहुत काम की बात कहते हैं, जो आपको इन सत्संगों का एक धागा पकड़ा देगी। वे कहते हैं, ध्यान दीजिए, गीता अलग-अलग जगह अलग-अलग आँखों की बात करती है। नौवें अध्याय की राजविद्या "प्रत्यक्षावगमं" है, सीधे अनुभव में आने वाली। ग्यारहवें अध्याय का विश्वरूप "दिव्यं ददामि ते चक्षुः", दिव्य आँख से दिखा। और यहाँ, तेरहवें में, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का भेद "ज्ञानचक्षुषा", ज्ञान की आँख से दिखता है।
और अब उस कमरे की ओर लौटिए जहाँ यह सब सुनाया जा रहा है। धृतराष्ट्र के पास शरीर की आँखें नहीं हैं। सञ्जय के पास व्यास की दी हुई दिव्य दृष्टि है, जिससे वे कुरुक्षेत्र में जो कुछ होता है, मन में सोची हुई बात तक, सब जान लेते हैं। पर यह श्लोक कहता है कि असली आँख इन दोनों से अलग है। ज्ञान की आँख। वह न शरीर की आँखों से मिलती है, न किसी चमत्कार से। वह मिलती है उस भेद को समझने से जो आज हमने समझा: यह शरीर, यह मन, यह क्षेत्र है, और जो इसे देख रहा है, वह इससे अलग है, और वही सबमें एक है। और इस आँख के खुलने का रास्ता धृतराष्ट्र के लिए भी बंद नहीं था। वह सुन रहे थे। सुनना ही इस आँख की पहली पलक है।
यहीं गीता का तेरहवाँ अध्याय पूरा होता है। तीन सत्संगों में हमने इसे सुना। सैंतीसवें सत्संग में अर्जुन ने पूछा था, प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ, ज्ञान और ज्ञेय, मैं यह जानना चाहता हूँ। और श्रीकृष्ण ने कहा था, यह शरीर क्षेत्र है, और सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ मुझे जानो। फिर उन्होंने ज्ञान को किसी किताब की तरह नहीं, गुणों की तरह गिनाया: मान न चाहना, दम्भ न करना, सहनशीलता, सरलता। अड़तीसवें सत्संग में वह जानने योग्य वस्तु आई, जिसके हाथ-पैर सब ओर हैं, जो दूर भी है और पास भी। और आज, उनतालीसवें में, वही एक, सबमें, समान, अविनाशी, न करने वाला, न लिपने वाला, सबको रोशन करने वाला। महाभारत में भीष्म पर्व का सैंतीसवाँ अध्याय यहीं समाप्त होता है।
और अगला अध्याय, भीष्म पर्व का अड़तीसवाँ, गीता का चौदहवाँ, "गुणत्रय विभाग योग", श्रीकृष्ण के एक वचन से शुरू होता है: "परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्"। मैं फिर से वह परम ज्ञान कहूँगा, जो सब ज्ञानों में उत्तम है। "भूयः", फिर से। जैसे वे जानते हों कि अर्जुन भूल जाएँगे, जैसे हम भूल जाते हैं, और इसलिए एक बार और कहना ज़रूरी है। आज हमने बार-बार कहा कि काम प्रकृति करती है। अगला अध्याय बताएगा कि वह प्रकृति किन तीन गुणों से बनी है, जो हम सबको बाँधते हैं, और उनसे पार कैसे हुआ जाए। वह अगले सत्संग में।
तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।
पहली बात। भगवान तक पहुँचने के कई दरवाज़े हैं: ध्यान, विचार, सेवा भरा काम, और श्रद्धा से सुनना। किसी के दरवाज़े को छोटा मत समझिए, और अपने को भी नहीं। अगर आप केवल सुन पाते हैं, तो सुनते रहिए। अर्जुन भी भूले थे, और भगवान ने उन्हें गले लगाकर फिर से सुनाया।
दूसरी बात। "यः पश्यति स पश्यति"। जो सबमें एक परमेश्वर देखता है, वही देखता है। और जो नहीं देख पाता, वह दूसरे को नहीं, अपने आप को ही चोट देता है। अगली बार जिससे आपका मन खट्टा हो, युधिष्ठिर की तरह एक पल उसके पैरों की ओर देखिए। उसमें कुछ ऐसा है जो आपकी माँ के पैरों जैसा है।
तीसरी बात। काम प्रकृति के हैं, भीतर वाला आकाश की तरह अछूता है और सूर्य की तरह सबको रोशन करता है। इसलिए किसी की गलत बात का विरोध कीजिए, पर उससे वैर मत पालिए। और अपनी पुरानी भूलों को सुधारिए, पर अपने आप को कभी गन्दा मत मानिए। धुआँ आता-जाता है, आकाश वही रहता है।
आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। क्या कभी ऐसा हुआ है कि किसी ऐसे आदमी में, जिससे आपकी नहीं बनती थी, अचानक आपको कुछ अपना-सा दिख गया हो, कोई आदत, कोई हँसी, कोई बात, जिससे आपका गुस्सा पिघल गया हो? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।
जिसके पैरों में माँ के पैर दिख जाएँ, उससे वैर टिकता नहीं। और सबके पैरों में वही एक खड़ा है।
जय श्री कृष्ण।
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥ २७ ॥
तीन बातें
- भगवान तक पहुँचने के कई दरवाज़े हैं: ध्यान, विचार, सेवा भरा काम, और श्रद्धा से सुनना। किसी के दरवाज़े को छोटा मत समझिए, और अपने को भी नहीं। अगर आप केवल सुन पाते हैं, तो सुनते रहिए। अर्जुन भी भूले थे, और भगवान ने उन्हें गले लगाकर फिर से सुनाया।
- "यः पश्यति स पश्यति"। जो सबमें एक परमेश्वर देखता है, वही देखता है। और जो नहीं देख पाता, वह दूसरे को नहीं, अपने आप को ही चोट देता है। अगली बार जिससे आपका मन खट्टा हो, युधिष्ठिर की तरह एक पल उसके पैरों की ओर देखिए। उसमें कुछ ऐसा है जो आपकी माँ के पैरों जैसा है।
- काम प्रकृति के हैं, भीतर वाला आकाश की तरह अछूता है और सूर्य की तरह सबको रोशन करता है। इसलिए किसी की गलत बात का विरोध कीजिए, पर उससे वैर मत पालिए। और अपनी पुरानी भूलों को सुधारिए, पर अपने आप को कभी गन्दा मत मानिए। धुआँ आता-जाता है, आकाश वही रहता है।