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सत्संग ३८

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हर जगह हाथ-पैर वाला

गीता 13.12–13.23 · 77 मिनट

भगवान दूर भी, पास भी

ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते । अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥ १२ ॥
गीता 13.12 — अर्थ पढ़ें ›
सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ १३ ॥
गीता 13.13 — अर्थ पढ़ें ›
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥ १४ ॥
गीता 13.14 — अर्थ पढ़ें ›

कभी रात को अकेले बैठे-बैठे मन में यह सवाल उठा है कि भगवान आख़िर हैं कहाँ? किसी बहुत ऊँचे, बहुत दूर के लोक में, जहाँ तक हमारी पुकार शायद पहुँचती भी न हो? या यहीं कहीं पास, इतने पास कि हम उन्हें पहचान ही नहीं पाते? आज के श्लोक इसी सवाल का उत्तर देते हैं। और उत्तर ऐसा है जो पहली बार सुनने में अजीब लगता है: वे दूर भी हैं, और पास भी। उनके हाथ-पैर हर जगह हैं, और फिर भी उनके कोई हाथ-पैर नहीं।

जय श्री कृष्ण।

आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का अड़तीसवाँ सत्संग है, और हम तेरहवें अध्याय के बीच में हैं, जिसका नाम है "क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग"। महाभारत में यह भीष्म पर्व का सैंतीसवाँ अध्याय है। और यह सब हमें सञ्जय सुना रहे हैं, हस्तिनापुर के महल में, अन्धे राजा धृतराष्ट्र को, उस दिन जब भीष्म बाणों की शय्या पर गिर चुके हैं।

पहले याद कर लें कि पिछली बार हम कहाँ रुके थे। तेरहवाँ अध्याय अर्जुन के एक प्रश्न से खुला था। उन्होंने पूछा था, हे केशव, प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ, ज्ञान और ज्ञेय, मैं यह सब जानना चाहता हूँ। और श्रीकृष्ण ने पहला ही उत्तर बहुत सीधा दिया: "इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते", हे कुन्तीपुत्र, यह शरीर क्षेत्र कहलाता है, एक खेत, और जो इसे जानता है वह क्षेत्रज्ञ है। फिर एक बहुत बड़ी बात कही: "क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत", सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ भी मुझे ही जानो। और फिर, पिछले सत्संग का सबसे सुन्दर हिस्सा, श्रीकृष्ण ने बताया कि ज्ञान असल में कैसा दिखता है। कोई किताब नहीं, कोई सिद्धान्त नहीं, बल्कि कुछ गुण: "अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्", मान न चाहना, दिखावा न करना, किसी को चोट न पहुँचाना, सहना, सीधापन। और अन्त में कहा, यह सब ज्ञान है, और जो इसके उलटा है, वह अज्ञान है।

तो ज्ञान के साधन बता दिए गए। अब स्वाभाविक प्रश्न है: इन साधनों से जानना किसे है? आज का पहला श्लोक, बारहवाँ, इसी से शुरू होता है। "ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि", जो जानने योग्य है, उसे मैं कहूँगा, "यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते", जिसे जानकर मनुष्य अमृत को पाता है। "अनादिमत्परं ब्रह्म", वह अनादि परम ब्रह्म है, "न सत्तन्नासदुच्यते", वह न सत् कहा जाता है, न असत्।

पहले यह देखिए कि श्रीकृष्ण कैसे शुरू करते हैं। वे सीधे नहीं बताते कि वह क्या है। पहले बताते हैं कि उसे जानने से क्या मिलेगा: अमृत। शंकराचार्य और मधुसूदन सरस्वती दोनों कहते हैं, यह इसलिए कि सुनने वाले का मन खिंच आए, वह सामने होकर सुने। जैसे कोई बड़ा कहे, "बैठो, आज तुम्हें वह बात बताता हूँ जिसके बाद डर नहीं रहेगा।" और "अमृत" का अर्थ शंकराचार्य बहुत सादे शब्दों में करते हैं: वह फिर नहीं मरता। यानी यह ज्ञान किसी परीक्षा में पास होने का ज्ञान नहीं, यह मृत्यु के डर से छूटने का ज्ञान है।

फिर उस ज्ञेय का पहला लक्षण: "अनादिमत्", जिसका कोई आदि नहीं, कोई शुरुआत नहीं। संसार की हर चीज़ कहीं से शुरू होती है। यह घर किसी दिन बना था, यह पेड़ किसी बीज से उगा, और हम भी किसी दिन जन्मे। पर जिसे जानना है, उसकी कोई पहली तारीख़ नहीं।

और अब वह पंक्ति जो सबसे कठिन लगती है: "न सत्तन्नासदुच्यते", उसे न "है" कहा जाता है, न "नहीं है"। सुनकर लगता है, यह कैसी पहेली है? जो है, वह है; जो नहीं, वह नहीं। हमारी टीका इसे बहुत साफ़ खोलती है। हमारे शब्द किसी चीज़ का वर्णन चार ही तरह से करते हैं: उसकी जाति से, जैसे "यह गाय है"; उसके गुण से, जैसे "यह सफ़ेद है"; उसकी क्रिया से, जैसे "यह दौड़ रही है"; या उसके सम्बन्ध से, जैसे "यह राम की है"। ब्रह्म में इनमें से कुछ भी नहीं है। इसलिए उसे बाकी वस्तुओं की तरह "है" कहकर किसी ख़ाने में नहीं रखा जा सकता। और "नहीं है" भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि जिसके कारण सब कुछ "है" दिखता है, वह स्वयं "नहीं" कैसे हो?

संत ज्ञानेश्वर यहाँ एक बहुत सुन्दर बात कहते हैं। वे कहते हैं, उसे "नहीं है" कहने जाओ, तो वह सारे विश्व के रूप में सामने दिखता है। और "यह विश्व ही है" कहो, तो यह माया है। इसलिए "है" और "नहीं है", ये दोनों शब्द उसे देखकर गूँगे हो गए, और विचार का रास्ता वहीं टूट गया। फिर एक घरेलू उदाहरण देते हैं: जैसे मिट्टी ही घड़े, सकोरे और बर्तनों के आकार में रहती है, वैसे ही वह वस्तु सब कुछ होकर सबमें रहती है।

और अब महाभारत की एक कथा, जो इस श्लोक को बहुत अपनेपन से खोलती है। यह शान्ति पर्व में है। युद्ध के बाद युधिष्ठिर भीष्म से पूछते हैं, ज्ञान का क्या फल है, और प्राणियों की आत्मा कैसे जानी जाए? और भीष्म उन्हें एक पुराना संवाद सुनाते हैं, प्रजापति मनु और महर्षि बृहस्पति का। अब ज़रा सोचिए, बृहस्पति कौन हैं। देवताओं के गुरु। जिनके पास देवता सलाह लेने जाते हैं। वही बृहस्पति शिष्य बनकर मनु के पास आते हैं, प्रणाम करते हैं, और कहते हैं: "मैंने ऋक्, साम और यजुः के मन्त्र पढ़े, छन्द पढ़े, नक्षत्रों की गति पढ़ी, निरुक्त, व्याकरण, कल्प और शिक्षा पढ़ी। और यह सब पढ़कर भी मैं प्राणियों की असली प्रकृति नहीं जानता।" और एक बात और कहते हैं, जो मुझे बहुत ईमानदार लगती है: "जब मैं उस सबसे पुरानी वस्तु को जानता ही नहीं, तो मैं झूठे मन से उसके लिए प्रयत्न कैसे करूँ?"

देवताओं के गुरु यह कह रहे हैं, "मैं नहीं जानता"। यही वह विनम्रता है जो पिछले सत्संग में ज्ञान के पहले गुण के रूप में आई थी, मान न चाहना। जो सब कुछ पढ़ चुका हो, उसके लिए "मैं नहीं जानता" कहना सबसे कठिन है। पर इसी दरवाज़े से ज्ञेय तक पहुँचा जाता है।

और मनु क्या उत्तर देते हैं? वे लम्बी बात करते हैं, पर उस परम का वर्णन वे जिन शब्दों में करते हैं, वे आज के श्लोक के बहुत पास हैं। वे कहते हैं: जिससे यह सारा जगत उत्पन्न हुआ, जिसे जानकर आत्मवान शान्ति पाते हैं, जो मन्त्रों के शब्दों से भी प्रकट नहीं होता, वह रस, गन्ध, शब्द, स्पर्श और रूप से रहित है, पकड़ में न आने वाला, एक। और फिर: वह न स्त्री है, न पुरुष, न नपुंसक; "न सत् है, न असत्, न दोनों"। जिसे ब्रह्म को जानने वाले देखते हैं, उसे अक्षर जानो। सुना आपने? जो बात कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण एक पंक्ति में कह रहे हैं, वही बात मनु ने बृहस्पति से कही थी। और आगे चलकर, इसी संवाद में, मनु एक बात और कहते हैं: हम उसे सूक्ष्म मन से जानते हैं, पर वाणी से कह नहीं सकते।

हमारे जीवन में यह कैसा दिखता है? माँ का प्यार लीजिए। कोई पूछे, "तुम्हारी माँ तुमसे कितना प्यार करती है, नापकर बताओ, उसका रंग बताओ, उसका आकार बताओ", तो हम चुप हो जाएँगे। पर क्या इससे वह प्यार "नहीं है" हो गया? जो चीज़ जितनी गहरी होती है, शब्द उसके सामने उतने ही छोटे पड़ जाते हैं।

पर यहाँ एक प्रश्न उठता है। अगर वह शब्दों में नहीं आता, तो श्रीकृष्ण अगले ही श्लोक में उसके हाथ, पैर, आँखें और मुख कैसे गिनाने लगते हैं? आइए, देखते हैं।

तेरहवाँ श्लोक, और आज का शीर्षक इसी से है। "सर्वतःपाणिपादं तत्", उसके हाथ और पैर सब ओर हैं, "सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्", आँखें, सिर और मुख सब ओर हैं, "सर्वतःश्रुतिमल्लोके", कान सब ओर हैं, "सर्वमावृत्य तिष्ठति", वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है।

अभी-अभी कहा कि उसे "है" भी नहीं कह सकते, और अब उसके हाथ-पैर गिनाए जा रहे हैं। यह उलटी बात क्यों? शंकराचार्य इसका उत्तर एक पुराने नियम से देते हैं, जो गुरु-परम्परा में चलता आया है: जो किसी भी विस्तार से परे है, उसे पहले विस्तार के सहारे समझाया जाता है, और फिर वह विस्तार हटा दिया जाता है। पहले कहा जाता है, "यह सब वही है", फिर कहा जाता है, "पर वह इनमें से कुछ नहीं"। ज्ञानेश्वर इसे और सरल करते हैं। वे कहते हैं, शून्य दिखाना हो, तो भी एक बिन्दु बनाना पड़ता है। वैसे ही जो एक है, उसे शब्दों में कहना हो, तो दो की भाषा बोलनी ही पड़ती है।

अब इस श्लोक का सबसे सीधा और सबसे सुन्दर अर्थ, जो हमारी टीका देती है: संसार के सारे हाथ और सारी आँखें इसीलिए काम करते हैं कि वह उनमें उपस्थित है, इसलिए वे उसी के कहे गए। आपका हाथ जब किसी को पानी देता है, तो वह हाथ चलता किसकी शक्ति से है? आँख जब किसी अपने को पहचानती है, तो उस पहचान के पीछे रोशनी किसकी है? मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, हाथ, पैर, आँखें, ये अपने आप में जड़ हैं; इन्हें चलाने वाला एक चेतन है। जहाँ भी कोई हाथ उठ रहा है, वहाँ वह है। इसलिए "सर्वतःपाणिपादं", सब ओर उसके हाथ-पैर।

ज्ञानेश्वर यहाँ कुछ बहुत प्यारी उपमाएँ देते हैं। सूर्य के शरीर में आँखें अलग-अलग नहीं होतीं, पूरा सूर्य ही देखने जैसा है। आग की हर लपट ही उसका मुख है, जो कुछ भी उसमें डालो, वह खाती है। और आकाश हर वस्तु से सटा रहता है, इसलिए हर ध्वनि उसके कान में है।

आपको याद होगा, उन्नीसवें सत्संग में हमने वनवास का वह प्रसंग सुना था, जब दुर्वासा मुनि दस हज़ार शिष्यों के साथ भोजन माँगने आ गए, और द्रौपदी की बटलोई ख़ाली थी। श्रीकृष्ण आए, बटलोई के किनारे चिपका साग का एक पत्ता खाया, और कहा, "इससे विश्व की आत्मा तृप्त हो।" और नदी में स्नान कर रहे मुनियों को अन्न के स्वाद वाली डकारें आने लगीं, वे गले तक तृप्त हो गए। आज के श्लोक की रोशनी में वह कथा फिर से देखिए। एक मुख ने खाया, और दस हज़ार पेट भर गए। क्योंकि जो खा रहा था, वह "सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्" है, सबके मुख उसी के मुख हैं।

हमारे लिए इसका अर्थ क्या है? जब आप किसी भूखे को खिलाते हैं, किसी बीमार की सेवा करते हैं, किसी बूढ़े का हाथ पकड़कर सड़क पार कराते हैं, तो आप किसी "दूसरे" की सेवा नहीं कर रहे। आप उसी के हाथ थाम रहे हैं, जिसके हाथ सब ओर हैं।

और फिर दूसरा प्रश्न। अगर सबके हाथ-पैर उसी के हैं, तो क्या वह भी हमारी तरह हाथ-पैरों में बँधा है? हमारी तरह थकता है, चिपकता है? अगला श्लोक कहता है, नहीं।

चौदहवाँ श्लोक। "सर्वेन्द्रियगुणाभासं", वह सब इन्द्रियों के कामों के द्वारा प्रकाशित होता है, "सर्वेन्द्रियविवर्जितम्", फिर भी सब इन्द्रियों से रहित है। "असक्तं सर्वभृच्चैव", वह किसी से चिपका नहीं, फिर भी सबको धारण करता है। "निर्गुणं गुणभोक्तृ च", वह गुणों से रहित है, फिर भी गुणों का भोक्ता है।

तीन जोड़े हैं, और हर जोड़े में दो उलटी बातें। श्रीधर स्वामी पहले जोड़े का अर्थ करते हैं: आँख जब रूप देखती है, कान जब शब्द सुनता है, तो उन्हीं के आकार में वह चमकता है; या यों कहें, वही सब इन्द्रियों और उनके विषयों को रोशन करता है। और फिर भी उसकी अपनी कोई इन्द्रिय नहीं। यहाँ श्रीधर, शंकराचार्य और रामानुजाचार्य तीनों उपनिषद् का एक वचन याद दिलाते हैं, जिसका अर्थ है: उसके हाथ-पैर नहीं, फिर भी वह दौड़ता है और पकड़ता है; आँख नहीं, फिर भी देखता है; कान नहीं, फिर भी सुनता है।

रामानुजाचार्य इसे और सरल करते हैं। वे कहते हैं, वह इन्द्रियों के ज़रिए भी जान सकता है, पर स्वभाव से वह इन्द्रियों के बिना ही सब कुछ जानता है। दूसरा जोड़ा, "असक्तं सर्वभृच्चैव"। शंकराचार्य कहते हैं, जैसे मृगतृष्णा का पानी भी रेत के बिना नहीं दिखता, वैसे ही हर चीज़ के "होने" के पीछे वही है। सबको थामे है, और किसी से चिपका नहीं।

ज्ञानेश्वर यहाँ फिर अपने चित्रों से समझाते हैं। गुड़ की मिठास उसकी डली के आकार में नहीं बँधी होती। दूध में घी रहता है, पर घी दूध नहीं होता। और सबसे सुन्दर: जैसे आकाश बादलों को थामे रहता है, या दर्पण चेहरे को, या पानी सूर्य के प्रतिबिम्ब को, बिना किसी बन्धन के, वैसे ही वह निर्गुण सबको थामे है।

और अब उस कथा की शुरुआत, जो आज हमें दूर तक ले जाएगी। यह भी शान्ति पर्व में है, और इसे भीष्म युधिष्ठिर को सुनाते हैं, और कहते हैं कि यह मुझे स्वयं नारद ने सुनाई थी। एक बार देवर्षि नारद के मन में आया, "मैं हरि का तत्त्व जानूँगा।" वे हिमालय पर बैठ गए, और कहते हैं, सौ दिव्य वर्ष तक बिना साँस, बिना भोजन, ध्यान में रहे। तब आकाश से एक वाणी आई, मेघ जैसी गम्भीर, पर उसका कोई शरीर नहीं दिख रहा था। वाणी ने कहा, "तुम किसलिए ध्यान कर रहे हो? मैं तुम्हें ज्ञान देता हूँ।" नारद घबरा गए, और पूछा, "आप कौन हैं? आपका कोई रूप नहीं दिखता।" वाणी ने कहा, "मैं अनन्त हूँ, सबसे बड़ा हूँ। मूढ़ मुझे नहीं जानते, ज्ञानी जानते हैं।" नारद ने कहा, "मुझे अपना स्वरूप बताइए, आप कैसे हैं?" और तब, पाठ कहता है, सब प्राणियों के स्वामी हँसे, और बोले: "मेरा न मुख है, न कान, न नाक, न जीभ, न आँख, न त्वचा। मैं बिना देह का हूँ। तो अपने बारे में कैसे कहूँ?"

यही तो आज का श्लोक है, "सर्वेन्द्रियविवर्जितम्"। जो बोल रहा है, उसका मुख नहीं। जो सुन रहा है, उसके कान नहीं। फिर भी वाणी आ रही है, और नारद की हर बात सुनी जा रही है। और फिर वह वाणी चुप हो गई। नारद मुस्कराए भी और उदास भी हुए, और सोचने लगे, "वह प्रभु कहाँ चला गया? उसने कहा था, मैं अनन्त हूँ, सबसे बड़ा हूँ। तो सबमें सबसे बड़ा कौन है?" और नारद उसे ढूँढने निकल पड़े।

पर अभी एक बात बाकी है। नारद कहाँ-कहाँ गए, और आख़िर में वह "सबसे बड़ा" उन्हें कहाँ मिला, यह आपको सुनकर आश्चर्य होगा। क्योंकि वह जहाँ मिला, वह अगले श्लोक की सबसे सुन्दर पंक्ति है: वह दूर भी है, और पास भी। आइए, अगले तीन श्लोक सुनते हैं।

बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च । सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥ १५ ॥
गीता 13.15 — अर्थ पढ़ें ›
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् । भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥ १६ ॥
गीता 13.16 — अर्थ पढ़ें ›
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते । ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् ॥ १७ ॥
गीता 13.17 — अर्थ पढ़ें ›

पन्द्रहवाँ श्लोक। "बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च", वह सब प्राणियों के बाहर भी है और भीतर भी; वह अचल भी है और चलने वाला भी। "सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं", सूक्ष्म होने के कारण वह जानने में नहीं आता। "दूरस्थं चान्तिके च तत्", वह दूर भी है, और पास भी।

पहले नारद की खोज पूरी कर लें, क्योंकि यह श्लोक उसी के अन्त में खुलता है। नारद ने सोचा, जो सबसे बड़ा है, अनन्त है, वह कौन हो सकता है? शायद यह पृथ्वी, जो इतनी विशाल है, जिसमें सारे प्राणी समा जाते हैं। वे पृथ्वी के पास गए, प्रणाम किया, और पूछा, "आप अनन्त हैं, सबसे बड़ी हैं, आप कैसी हैं?" और पृथ्वी मुस्कराकर बोली, "नहीं, मैं न सबसे बड़ी हूँ, न अनन्त। मेरा कारण मुझसे बड़ा है, उससे पूछो।" नारद समुद्र के पास गए। समुद्र ने कहा, "मैं नहीं।" अग्नि के पास गए। अग्नि हँसे और बोले, "मैं नहीं, आगे पूछो।" वायु के पास गए। वायु ने कहा, "मैं नहीं।" आकाश के पास गए, जो सबसे फैला हुआ लगता है। आकाश ने भी हँसकर कहा, "मैं नहीं।" फिर वेद के पास, जो शब्द का रूप है। वेद ने कहा, "मैं ब्रह्मा की बुद्धि में रहता हूँ, उनसे पूछो।"

और नारद ब्रह्मलोक गए। वहाँ चार मुखों वाले ब्रह्मा बैठे थे, लोकपाल, ऋषि, नदियाँ, पर्वत, गन्धर्व, सब उनकी स्तुति कर रहे थे। नारद ने वही प्रश्न पूछा। और ब्रह्मा ने भी कुछ मुस्कराकर कहा, "नहीं, मैं सबसे बड़ा नहीं। सबसे बड़ा वह है जो सब लोकों का और मेरा भी स्वामी है।" और फिर ब्रह्मा ने जो पता बताया, वह सुनिए: "नन्द ग्वाले के कुल में, ग्वाल-बालों से घिरा हुआ, सब जगतों का रक्षक ग्वाले के वेश में रहता है। वही मेरा कारण है। उससे पूछो।"

नारद ब्रह्मलोक से उतरे और नन्द के घर पहुँचे। और पाठ बताता है कि उन्होंने वहाँ क्या देखा: बालक की तरह खेलते हुए, बछड़ों के झुंड से घिरे, उन्हें दूध पिलाकर फिर बाँधते हुए, धूल से धूसर मुख वाले परम पुरुष को, और चारों ओर ग्वाल-बाल उछल रहे थे, हँस रहे थे, नाच रहे थे, ताली और बाँसुरी बजा रहे थे। नारद ने प्रणाम किया और वही प्रश्न पूछा। और श्रीकृष्ण हँसे, और बोले: "मुझसे बड़ा कोई नहीं। सब मुझमें स्थित है। आकाश से पहले तुमसे मैंने ही बात की थी।" और फिर: "कोई मनुष्य मुझे नहीं जानता, मेरी माया पार करना कठिन है। पर जो योगी एकनिष्ठ भक्ति से जुड़े हैं, वे मुझे जानते हैं। तुम मुझे प्रिय हो, तुम मेरे भक्त हो। मैं तुम्हें वह ज्ञान देता हूँ जिससे तुम तत्त्व देख सको।" और यह कहकर, पाठ कहता है, श्रीकृष्ण नन्द के घर भीतर चले गए।

देखिए, यही है "दूरस्थं चान्तिके च तत्"। नारद उसे खोजने ब्रह्मलोक तक गए, जितना दूर जाया जा सकता है। और वह मिला एक ग्वाले के आँगन में, धूल भरे मुँह से बछड़े बाँधता हुआ। जिसकी वाणी आकाश में गूँजी थी, वह गोकुल की मिट्टी में खेल रहा था। और एक बात पर ध्यान दीजिए। यह कथा भीष्म सुना रहे हैं, युधिष्ठिर को, और उस सभा में श्रीकृष्ण स्वयं बैठे हैं। कथा के अन्त में भीष्म कहते हैं: "वह मुझे और तुम्हें भी मोहित करता हुआ, मेरे कहे इन्हीं वचनों को सुन रहा है।" जिसे नारद ब्रह्मलोक तक ढूँढते रहे, वह कथा सुनाने वाले के सामने बैठा उसकी कथा सुन रहा है।

अब श्लोक के शब्दों पर लौटें। "बहिरन्तश्च", बाहर भी और भीतर भी। श्रीधर स्वामी दो उपमाएँ देते हैं: जैसे सोना कंगन और कुण्डल के भीतर भी है और बाहर भी, और जैसे पानी लहरों के भीतर भी है और बाहर भी। लहर कहीं भी जाए, पानी से बाहर नहीं जा सकती।

फिर "सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं", सूक्ष्म होने के कारण जानने में नहीं आता। शंकराचार्य कहते हैं, आकाश की तरह सूक्ष्म। आकाश हर जगह है, पर किसी ने आकाश को हाथ में पकड़कर नहीं देखा। और यहाँ मनु का वह संवाद फिर काम आता है, जो बृहस्पति से हुआ था। मनु एक बहुत सुन्दर उदाहरण देते हैं: हिमालय के उस पार का भाग, या चन्द्रमा की पीठ, किसी मनुष्य ने कभी नहीं देखी। पर इतने से यह नहीं कहा जा सकता कि वह है ही नहीं। वैसे ही प्राणियों के भीतर की आत्मा, सूक्ष्म और ज्ञानमय, आँखों से कभी नहीं देखी गई, पर इतने से वह "नहीं है" ऐसा नहीं। और फिर मनु कहते हैं: बुद्धि के दीपक से ज्ञानी उस दूर की वस्तु के पास बैठते हैं।

और "दूरस्थं चान्तिके च", दूर और पास, इसे हमारी टीका एक वाक्य में खोलती है: जो उसे नहीं जानता, उसके लिए वह दूर है; जो जानता है, उसके लिए वह सबसे पास है। शंकराचार्य और मधुसूदन सरस्वती इसे और तीखा करते हैं। वे कहते हैं, जो साधन से ख़ाली है, उसके लिए वह करोड़ों वर्षों में भी पहुँच से बाहर है, जैसे लाखों कोस दूर हो। और रामानुजाचार्य एक बहुत मार्मिक बात जोड़ते हैं: जिनमें पिछले सत्संग वाले गुण नहीं, विनम्रता, सरलता, सहनशीलता, उनके लिए वह अपने ही शरीर में रहते हुए भी बहुत दूर है। और जिनमें वे गुण हैं, उनके लिए वही पास है।

यानी दूरी मीलों की नहीं है। दूरी हमारे अहंकार की है। जैसे कोई चश्मा माथे पर चढ़ाए पूरे घर में चश्मा ढूँढता फिरे। चश्मा कहीं गया नहीं, बस नज़र उस पर नहीं जा रही।

और अब, इससे पहले कि हम अगले श्लोक पर चलें, एक छोटी-सी बात आपसे कहनी है। आज के श्लोक भगवान के बारे में दो उलटी-सी बातें एक साथ कह रहे हैं: हाथ-पैर सब ओर, और फिर भी इन्द्रियाँ नहीं; दूर भी, पास भी। आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। जो यहाँ तक सुनकर उठ जाए, उसके मन में बस एक पहेली रह जाएगी। पर इसी श्लोक-माला के अन्त में श्रीकृष्ण यह भी बताएँगे कि वह हमारे शरीर के भीतर किस रूप में बैठा है, और उसे पहचान लेने से क्या बदल जाता है। तो अगर आप यह सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की यह यात्रा बीच में न छूटे। और आज का यह सत्संग आख़िर तक सुनिए।

अब सोलहवाँ श्लोक। "अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्", वह बँटा हुआ नहीं है, फिर भी प्राणियों में बँटा हुआ-सा स्थित है। "भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं", वह जानने योग्य प्राणियों का पालन करने वाला है, "ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च", और निगलने वाला भी, और उत्पन्न करने वाला भी।

"विभक्तमिव", बँटा हुआ-सा। यह "सा" बहुत ध्यान देने योग्य है। शंकराचार्य और मधुसूदन सरस्वती उपमा देते हैं आकाश की। एक घड़े के भीतर का आकाश, एक कमरे के भीतर का आकाश, बाहर का खुला आकाश। लगता है तीन आकाश हैं। पर घड़ा फूट जाए, तो कौन-सा आकाश कहाँ गया? आकाश कभी बँटा ही नहीं था, बस घड़े ने उसे बँटा हुआ-सा दिखाया। ज्ञानेश्वर इसके लिए एक बहुत प्यारा चित्र देते हैं: हज़ारों घड़ों में पानी भरा हो, तो हर घड़े में चाँद दिखेगा, पर चाँदनी बँटती नहीं। नमक के हज़ार दानों में खारापन एक ही है, और गन्ने के हर पोर में मिठास एक ही।

और यहाँ मनु के उसी संवाद की एक पंक्ति याद आती है, जो इक्कीसवें सत्संग के उस श्लोक जैसी है, "मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव", धागे में पिरोए मोतियों की तरह सब मुझमें पिरोया है। मनु कहते हैं: वह ब्रह्म मणियों में पिरोए धागे की तरह दिखता है। वही धागा सोने में भी है, मोतियों और मूँगों में भी, मिट्टी और चाँदी में भी, और गायों, घोड़ों, मनुष्यों, हाथियों और कीड़ों-पतंगों में भी। मोती अलग-अलग हैं, उनके रंग अलग, आकार अलग, दाम अलग। पर जिस धागे में वे पिरोए हैं, वह एक ही है।

फिर श्लोक का दूसरा हिस्सा: पालन, संहार और उत्पत्ति। श्रीधर स्वामी और शंकराचार्य इसे समय के तीन पड़ावों से जोड़ते हैं: टिके रहने के समय वह पालता है, प्रलय के समय निगलता है, सृष्टि के समय फिर उत्पन्न करता है। रामानुजाचार्य इसमें एक बहुत व्यावहारिक बात देखते हैं। वे कहते हैं, जो शरीर को पालता है, जो भोजन को पचाता है, और जो उस पचे हुए से फिर नया बल बनाता है, वह शरीर से अलग है। क्योंकि मरे हुए शरीर में न पालन दिखता है, न पचाना, न उपजाना। आप रोज़ जो खाते हैं, वह रक्त कैसे बनता है, आप नहीं जानते। पर कोई है जो यह रोज़ कर रहा है, आपकी नींद में भी।

ज्ञानेश्वर यहाँ एक बात कहते हैं जो इस श्लोक को घर ले आती है। वे कहते हैं, जैसे बचपन, जवानी और बुढ़ापे में शरीर एक ही रहता है, और जैसे सुबह, दोपहर और शाम बदलती है पर आकाश वही रहता है, वैसे ही उत्पत्ति, पालन और संहार में वह एक, अखण्ड रहता है।

और अब सत्रहवाँ श्लोक, जिसे आज के अन्त में हम दोबारा सुनेंगे। "ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते", वह ज्योतियों की भी ज्योति है, और अन्धकार से परे कहा जाता है। "ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं", वह ज्ञान है, जानने योग्य है, और ज्ञान से पाने योग्य है। "हृदि सर्वस्य विष्ठितम्", वह सबके हृदय में स्थित है।

ज्योतियों की ज्योति, यानी? हमारी टीका कहती है, सूर्य और अग्नि भी उसी के प्रकाश से चमकते हैं। श्रीधर स्वामी यहाँ उपनिषद् का एक वचन याद दिलाते हैं, जिसका अर्थ है: वहाँ न सूर्य चमकता है, न चाँद-तारे, न बिजली, तो यह आग कहाँ से चमकेगी; उसी के चमकने से सब चमकता है। और शंकराचार्य और मधुसूदन सरस्वती दूसरा वचन याद दिलाते हैं: जिसके तेज से जलकर सूर्य तपता है, उसी की रोशनी से यह सब चमकता है। ज्ञानेश्वर इसे एक लम्बी माला में पिरोते हैं: वह अग्नि को जलाने वाला है, चन्द्रमा का जीवन है, सूर्य की आँखें उसी से देखती हैं; वह मन का मन है, आँख की आँख है, कान का कान, वाणी की वाणी, प्राण का प्राण।

सोचिए, इसका अर्थ क्या है। आप सूर्य को देखते हैं, तो सूर्य दिखता है। पर सूर्य को देख रहा कौन है? आँख? आँख को कौन जान रहा है कि वह देख रही है? जो हर देखने के पीछे बैठा है, वह स्वयं कभी "दिखने" वाली चीज़ नहीं बनता। मनु भी बृहस्पति से यही कहते हैं: आँख अपना रूप नहीं देखती, कान अपने को नहीं सुनता, पर सबको देखने वाला क्षेत्रज्ञ उन सबको देखता है।

फिर "ज्ञानगम्यं", ज्ञान से पाने योग्य। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, यहाँ "ज्ञान" का अर्थ वही गुण हैं जो पिछले सत्संग में गिनाए गए थे: मान न चाहना, दिखावा न करना, सहना, सरलता। उन्हीं से वह पाया जाता है, उनके बिना नहीं।

और अब वह पंक्ति, "हृदि सर्वस्य विष्ठितम्", सबके हृदय में स्थित। शंकराचार्य यहाँ एक बहुत कोमल बात कहते हैं। वे कहते हैं, यह पंक्ति उसके लिए है जो यह सुनकर हिम्मत हार बैठा हो कि ज्ञान बहुत कठिन है। उसे थामने के लिए श्रीकृष्ण कहते हैं: वह कहीं दूर नहीं, तुम्हारे ही हृदय में बैठा है। और मधुसूदन सरस्वती एक उपमा देते हैं: सूर्य का प्रकाश सब जगह है, पर दर्पण में वह विशेष रूप से चमकता है। वैसे ही वह सब जगह है, पर हृदय में, बुद्धि में, विशेष रूप से प्रकट होता है।

शान्ति पर्व में एक गुरु अपने शिष्य से यही बात एक और चित्र में कहते हैं। वे कहते हैं, शरीर नौ द्वारों वाला एक नगर है, और उसमें वह महान आत्मा व्याप्त होकर रहता है। सब प्राणियों में वह दीपक की तरह है, दीपक छोटा हो या बड़ा, रोशनी वही। और फिर: जैसे लकड़ी को मथने पर ही उसमें छिपी आग दिखती है, वैसे ही शरीर में बैठा आत्मा योग से ही दिखता है। आग लकड़ी में पहले से थी। मथने से वह बनी नहीं, बस प्रकट हुई।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने अब तक तीन चीज़ें बताईं: क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय। अब वे इन तीनों को एक साथ बाँधकर बताएँगे कि यह सब किसके लिए कहा गया है, और उसे जानकर क्या मिलता है। और यहीं से एक नया जोड़ा शुरू होगा: प्रकृति और पुरुष। आइए, अगले दो श्लोक सुनते हैं।

इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः । मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥ १८ ॥
गीता 13.18 — अर्थ पढ़ें ›
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि । विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान् ॥ १९ ॥
गीता 13.19 — अर्थ पढ़ें ›

अठारहवाँ श्लोक। "इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः", इस प्रकार क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय संक्षेप में कहे गए। "मद्भक्त एतद्विज्ञाय", मेरा भक्त इसे भली-भाँति जानकर, "मद्भावायोपपद्यते", मेरे स्वरूप को पाने योग्य हो जाता है।

यह श्लोक एक पड़ाव है, जैसे लम्बी यात्रा में कोई रुककर पीछे मुड़कर देखे कि कितना रास्ता तय हुआ। क्षेत्र, यानी यह शरीर और उसके सारे विकार, पिछले सत्संग में बताया गया। ज्ञान, यानी विनम्रता से लेकर तत्त्व पर नज़र रखने तक के गुण, वह भी बताया गया। और ज्ञेय, जिसके हाथ-पैर सब ओर हैं और जो हृदय में बैठा है, वह आज अभी-अभी बताया गया।

और "समासतः", संक्षेप में। मधुसूदन सरस्वती यहाँ एक बहुत बड़ी बात कहते हैं: इतना ही तो सारे वेदों का अर्थ है, और सारी गीता का भी। श्रीधर स्वामी कहते हैं, जो बात वसिष्ठ जैसे ऋषियों ने विस्तार से कही, वह मैंने संक्षेप में कह दी। और मधुसूदन यह भी जोड़ते हैं कि संक्षेप में इसलिए कहा, ताकि साधारण बुद्धि वाले पर भी कृपा हो।

संत ज्ञानेश्वर इस "संक्षेप" को एक माँ के चित्र से समझाते हैं। वे श्रीकृष्ण के मुँह से कहलवाते हैं: सच तो यह है कि सब कुछ एक आत्मा ही है, पर अगर मैं सीधे यही कह देता, तो तुम्हारे मन में न बैठता। इसलिए एक ही चीज़ को मैंने चार हिस्सों में बाँट दिया, क्षेत्र, ज्ञान, ज्ञेय और अज्ञान। जैसे बच्चे को खाना खिलाते हैं, तो एक कौर के बीस छोटे-छोटे कौर बना देते हैं। खाना वही है, बस बच्चे के मुँह के नाप का कर दिया गया। और फिर ज्ञानेश्वर बताते हैं कि यह सुनकर अर्जुन रोमांचित हो उठे।

अब इस श्लोक का सबसे ज़रूरी शब्द: "मद्भक्त", मेरा भक्त। ध्यान दीजिए, यह पूरा अध्याय ज्ञान का अध्याय है, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ, प्रकृति-पुरुष, बड़े दार्शनिक शब्द। और ठीक उसके बीच श्रीकृष्ण कहते हैं, यह सब जानकर मेरा भक्त मुझे पाता है। ज्ञान का फल भक्त को मिलता है। शंकराचार्य "मद्भक्त" की बहुत सुन्दर परिभाषा देते हैं: जिसने अपना सब कुछ मुझ वासुदेव को सौंप दिया, और जो कुछ भी देखता, सुनता या छूता है, उसमें यही भाव रखता है कि यह सब भगवान वासुदेव ही हैं। यानी जिसके लिए "सर्वतःपाणिपादं" केवल एक श्लोक नहीं रहा, आँखों का रोज़ का अनुभव बन गया।

और "मद्भावाय", मेरे भाव को, मेरे स्वरूप को। यहाँ आचार्य अपने-अपने ढंग से बोलते हैं। शंकराचार्य कहते हैं, परमात्मा का भाव, यानी मोक्ष। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, सब दुःखों से ख़ाली परम आनन्द की अवस्था। और रामानुजाचार्य कहते हैं, भगवान जैसा स्वभाव, जो संसार में बँधा नहीं रहता। शब्द अलग हैं, पर दिशा एक है: जो इस ज्ञान को भक्ति के साथ पकड़ता है, वह फिर संसार के चक्कर में बँधा नहीं रहता।

और अब महाभारत की एक कथा, जो इस "मद्भक्त" शब्द को बहुत जीवन्त कर देती है, और जो आज के तेरहवें श्लोक की भी याद दिलाएगी। यह भी शान्ति पर्व में है, और यह भीष्म के अपने जीवन की बात है। युधिष्ठिर भीष्म से पूछते हैं, विष्णु का तत्त्व सचमुच कौन जानता है? और भीष्म कहते हैं: बहुत पहले मैं गंगा के एक द्वीप पर दस वर्ष तक वासुदेव के ध्यान में बैठा रहा, और मेरी माता, स्वयं गंगा देवी, मेरी रक्षा के लिए मेरे पास बैठी रहीं। उन्हीं दिनों पक्षियों के राजा गरुड़ गंगा के दर्शन को आए, और भीष्म ने उनसे पूछा, "आप तो सदा नारायण के साथ रहते हैं, मुझे उनका सच्चा स्वरूप बताइए।"

और गरुड़ ने अपनी कहानी सुनाई, और यह कहानी एक भूल की कहानी है। उसका पहला हिस्सा आपने तीसवें सत्संग में सुना था: सोम लेकर उड़ते गरुड़ को भगवान का वर देना, गरुड़ का उनसे ऊपर रहने का वर माँगना, और भगवान का मुस्कराकर उन्हें अपना ध्वज और वाहन बना लेना। उसे मैं दोबारा नहीं सुनाऊँगा। बस इतना जोड़ता हूँ कि यहाँ गरुड़ उसी घटना को अपनी भूल की तरह सुनाते हैं: "मैं गर्व में आ गया था, इसलिए मैंने कहा, पहले तुम मुझसे वर माँगो।"

और फिर, गरुड़ बताते हैं, वह प्रभु उनके सामने प्रकट हुए। और जिन शब्दों में गरुड़ ने उस रूप का वर्णन किया, उन्हें सुनिए: शंख, चक्र और गदा धारण किए, हज़ार पैरों वाले, हज़ार सूर्यों जैसे, हज़ार सिरों वाले, हज़ार आँखों वाले, हज़ार मुकुटों वाले, हज़ार मुखों वाले। आज का तेरहवाँ श्लोक याद कीजिए: "सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्"। जो श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्र में शब्दों से बता रहे हैं, वही गरुड़ ने आँखों से देखा था।

पर कहानी का असली हिस्सा अभी बाकी है। भगवान ने गरुड़ से कहा, "आओ।" और गरुड़ उड़े, लाखों, करोड़ों योजन, अँधेरों और भयानक जगहों से होकर। और एक जगह उन्हें अपने जैसे पक्षियों का एक झुंड मिला, हज़ार सूर्यों जैसे तेज वाले, उनसे कहीं बड़े गरुड़। और उन बड़े गरुड़ों ने उन्हें देखकर आश्चर्य से कहा: "अरे, एक पक्षी आया है! यह छोटे प्राण और छोटे शरीर वाला कौन है जो यहाँ तक आ गया?" और गरुड़ कहते हैं, यह सुनकर मेरा गर्व नष्ट हो गया। मैं डरा हुआ था, लज्जा से भरा हुआ।

जो गरुड़ भगवान को हराने चले थे, उन्हें भगवान ने न डाँटा, न दण्ड दिया। बस अपनी बड़ाई का थोड़ा-सा हिस्सा दिखा दिया, और गर्व अपने-आप पिघल गया। और कथा के अन्त में गरुड़ भीष्म से जो कहते हैं, वही इस श्लोक का निचोड़ है: योगी ज्ञान पाकर उन परम हरि को देखते हैं, और किसी तरह उनका रूप नहीं जाना जा सकता; और वे एकनिष्ठ भक्ति से भी पाए जा सकते हैं। और भीष्म अपनी ओर से जोड़ते हैं: इसलिए, हे राजन, सबकी आत्मा वासुदेव ज्ञान और भक्ति से सुलभ हैं, और किसी तरह नहीं। यही मेरा मत है।

ज्ञान और भक्ति, दोनों साथ। यही तो "मद्भक्त एतद्विज्ञाय" है: भक्त, जो जानकर। हमारे जीवन में भी यही होता है। जो केवल पढ़ता है, उसमें कभी-कभी गरुड़ जैसा गर्व आ जाता है, "मैं जानता हूँ।" और जो केवल भावुक होता है, वह पहली ठोकर में डगमगा जाता है। पर जो समझता भी है और झुकता भी है, वही टिकता है।

अब तक ज्ञेय की बात हुई। अब श्रीकृष्ण वही बात दूसरे शब्दों में कहना शुरू करते हैं, जिन्हें अर्जुन ने अध्याय के पहले प्रश्न में पूछा था: प्रकृति और पुरुष।

उन्नीसवाँ श्लोक। "प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि", प्रकृति और पुरुष, दोनों को ही अनादि जानो। "विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान्", और विकारों तथा गुणों को प्रकृति से उत्पन्न जानो।

पहले यह समझ लें कि ये दो शब्द नए नहीं हैं। संत ज्ञानेश्वर साफ़ कहते हैं: जिसे पहले क्षेत्र कहा, वही यहाँ प्रकृति है, और जिसे क्षेत्रज्ञ कहा, वही पुरुष है। नाम अलग हैं, बात वही। और हमारी टीका इन्हें इक्कीसवें सत्संग से जोड़ती है। आपको याद होगा, सातवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने अपनी दो प्रकृतियाँ बताई थीं। एक अपरा: "भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च", पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार। और दूसरी परा, "जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्", जीव-रूप, जिससे यह जगत धारण किया जाता है। वही अपरा यहाँ प्रकृति है, और वही परा यहाँ पुरुष। मधुसूदन सरस्वती भी यही कहते हैं, इसलिए आगे-पीछे की बात में कोई विरोध नहीं।

अब "विद्ध्यनादी उभावपि", दोनों को अनादि जानो। इसका अर्थ क्या है? हमारी टीका कहती है: दोनों अनादि हैं, इसलिए संसार के आने-जाने का कोई पहला क्षण नहीं है। श्रीधर स्वामी इसका कारण भी बताते हैं: अगर प्रकृति की कोई शुरुआत होती, तो उसे भी किसी और प्रकृति से आना पड़ता, और फिर उसे किसी और से, और यह सिलसिला कभी रुकता नहीं। शंकराचार्य कहते हैं, ईश्वर नित्य है, तो उसकी दोनों शक्तियाँ भी नित्य होनी चाहिए। इन्हीं दो से वह जगत को रचता, थामता और समेटता है।

ज्ञानेश्वर यहाँ फिर अपने घरेलू चित्र लाते हैं। वे कहते हैं, पुरुष और प्रकृति ऐसे साथ हैं जैसे दिन और रात, जैसे रूप के साथ लगी परछाईं, जैसे दाने के साथ बढ़ती भूसी। परछाईं वाली बात मनु के उस संवाद में भी आती है। मनु कहते हैं, शरीर के बिना परछाईं नहीं होती; वैसे ही उस परम के बिना यहाँ प्रकृति का कोई काम नहीं चलता।

फिर दूसरी पंक्ति: विकार और गुण प्रकृति से उत्पन्न हैं। विकार, यानी शरीर, इन्द्रियाँ, मन। और गुण, यानी सत्त्व, रज, तम, जो सुख, दुःख और मोह बनकर हमें घेरते हैं। रामानुजाचार्य यहाँ एक बहुत आशा भरी बात कहते हैं। वे कहते हैं, यही प्रकृति अपने इच्छा-द्वेष जैसे विकारों से पुरुष को बाँधती है, और यही प्रकृति अपने विनम्रता जैसे गुणों से उसे छुड़ाती भी है। यानी जिस मिट्टी में आदमी फिसलता है, उसी मिट्टी पर पैर जमाकर वह खड़ा भी होता है।

इसका हमारे लिए क्या अर्थ है? जब मन में ग़ुस्सा उठता है, या कोई पुरानी चोट दुखती है, या थकान घेर लेती है, तो हम सोचते हैं, "मैं ऐसा ही हूँ।" यह श्लोक धीरे से कहता है: नहीं, यह सब प्रकृति का है, विकार और गुण प्रकृति से उत्पन्न हैं। तुम वह हो जो इन्हें देख रहा है।

पर अभी एक बात बाकी है। अगर करने वाली प्रकृति है, तो सुख-दुःख कौन भोगता है? और हम बार-बार जन्म क्यों लेते हैं? अगले दो श्लोक इसका उत्तर देते हैं। आइए, सुनते हैं।

कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते । पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥ २० ॥
गीता 13.20 — अर्थ पढ़ें ›
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् । कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥ २१ ॥
गीता 13.21 — अर्थ पढ़ें ›

बीसवाँ श्लोक। "कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते", शरीर और इन्द्रियों को उत्पन्न करने में प्रकृति कारण कही जाती है। "पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते", और सुख-दुःख को भोगने में पुरुष कारण कहा जाता है।

दो कठिन-से शब्द हैं, "कार्य" और "करण", पर हमारी टीका इन्हें बहुत सीधा कर देती है। कार्य है यह शरीर। और करण हैं तेरह साधन: दस इन्द्रियाँ, यानी पाँच जानने वाली, आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा, और पाँच करने वाली, हाथ, पैर, वाणी और शरीर की दो और इन्द्रियाँ; फिर मन, बुद्धि और अहंकार। टीका आगे कहती है: सब करना प्रकृति का है। और भोग वहीं होता है जहाँ पुरुष उपस्थित है।

इसे एक घर से समझिए। रसोई में गैस जल रही है, कुकर की सीटी बज रही है, पंखा घूम रहा है, बत्तियाँ जल रही हैं। सारा काम मशीनें कर रही हैं। पर किसी के लिए कर रही हैं। अगर घर में कोई न हो, तो खाना किसके लिए पके, और पंखे की हवा किसे लगे? श्रीधर स्वामी यहाँ एक सवाल उठाते हैं जो हर सोचने वाले के मन में आएगा। प्रकृति तो जड़ है, उसमें चेतना नहीं; तो वह कर्ता कैसे? और पुरुष तो बदलता नहीं; तो वह भोगने वाला कैसे? और उत्तर में वे तीन बहुत सुन्दर उदाहरण देते हैं: जैसे आग की लपट अपने-आप ऊपर उठती है, जैसे हवा अपने-आप तिरछी बहती है, और जैसे बछड़े के पास आते ही गाय के थन से दूध अपने-आप बहने लगता है। गाय कोई हिसाब नहीं लगाती। बछड़ा पास है, बस इतना काफ़ी है। वैसे ही, श्रीधर कहते हैं, पुरुष के पास होने भर से प्रकृति काम करने लगती है।

और अब महाभारत की वह बातचीत, जो इसी बात को एक और चित्र से कहती है। शान्ति पर्व में भीष्म युधिष्ठिर को एक गुरु और शिष्य का पुराना संवाद सुनाते हैं। शिष्य बहुत बुद्धिमान है, कल्याण चाहता है, और गुरु के चरण पकड़कर पूछता है: हम कहाँ से आए, और प्राणी ऐसा उल्टा आचरण क्यों करते हैं? और गुरु जो समझाते हैं, उसकी एक पंक्ति आज के श्लोक के लिए जैसे बनी है। वे कहते हैं: बुद्धि आत्मा के पीछे चलती है, और मन बुद्धि के पीछे, जैसे लोहा चुम्बक के पास होने पर। और फिर: जैसे अचेतन लोहा चुम्बक की ओर दौड़ता है, वैसे ही ये सब भाव चलते हैं। चुम्बक लोहे को धक्का नहीं देता, हाथ पकड़कर नहीं खींचता। वह बस है। और उसके होने भर से लोहा चल पड़ता है। "कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते", चलना लोहे का है, खिंचाव चुम्बक की उपस्थिति का।

पर फिर सवाल उठता है: अगर सारा करना प्रकृति का है, तो सुख-दुःख पुरुष को क्यों होता है? संत ज्ञानेश्वर इसका क्रम बताते हैं। पहले इच्छा उठती है, फिर बुद्धि और अहंकार उसे पकड़ते हैं, फिर मन इन्द्रियों को काम पर लगाता है। अगर सत्त्व बढ़ा हो तो अच्छे कर्म होते हैं, रज से बीच के, तम से बुरे। अच्छे कर्मों से सुख निकलता है, बुरों से दुःख। और ज्ञानेश्वर कहते हैं: जब तक सुख-दुःख पैदा होते रहते हैं, तब तक प्रकृति मेहनत करती है, और पुरुष भोगता है।

रोज़ के जीवन में यह कैसे दिखता है? आपकी उँगली में चोट लगी। चोट उँगली को लगी, जो प्रकृति का हिस्सा है। पर दर्द "मुझे" हो रहा है। उँगली को अपना दर्द पता नहीं। जो जान रहा है, वह दर्द को महसूस कर रहा है। यही "पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते" है: अनुभव वहीं होता है जहाँ चेतना है।

पर अभी आधी बात हुई है। अगर पुरुष स्वभाव से शुद्ध है, निर्गुण है, जैसा चौदहवें श्लोक में कहा, तो वह इस सुख-दुःख में फँसा कैसे? और अगर फँसा है, तो बार-बार जन्म क्यों? इसका उत्तर अगले श्लोक में है, और यह इस पूरे अध्याय की सबसे ज़रूरी पंक्तियों में से एक है।

इक्कीसवाँ श्लोक। "पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्", प्रकृति में स्थित पुरुष ही प्रकृति से उत्पन्न गुणों को भोगता है। "कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु", गुणों का संग ही इसके अच्छी-बुरी योनियों में जन्म का कारण है।

पहला शब्द, "प्रकृतिस्थो", प्रकृति में स्थित। शंकराचार्य इसका अर्थ करते हैं: प्रकृति को ही अपना आप मान बैठा हुआ। और फिर बताते हैं कि यह मान लेना कैसा दिखता है: "मैं सुखी हूँ", "मैं दुःखी हूँ", "मैं मूर्ख हूँ", "मैं पण्डित हूँ"। ध्यान दीजिए, गड़बड़ सुख-दुःख के आने में नहीं है। सुख-दुःख तो प्रकृति का मौसम है, आएगा, जाएगा। गड़बड़ है "मैं" जोड़ देने में। बारिश हो रही है, यह एक बात है। "मैं बारिश हूँ", यह दूसरी बात है।

संत ज्ञानेश्वर यहाँ एक बहुत कोमल उपमा देते हैं, और मुझे यह इस श्लोक की सबसे सुन्दर व्याख्या लगती है। वे कहते हैं, पुरुष का पुरुषपन प्रकृति की दशा में आकर ऐसा हो जाता है, जैसे अमावस्या में पड़ा चन्द्रमा। और यही चन्द्रमा मनु के उस संवाद में भी आता है, जो हमने आज शुरू में सुना था। मनु बृहस्पति से कहते हैं: जैसे अमावस्या में चन्द्रमा दिखता नहीं, फिर भी उसका नाश नहीं होता, वैसे ही देहधारी को जानो। जैसे चन्द्रमा फिर नई कला पाकर चमकता है, वैसे ही देहधारी शरीर छोड़कर दिखता नहीं, और दूसरा शरीर पाकर फिर चमकता है। और फिर मनु एक बहुत बारीक बात कहते हैं: जन्म, बढ़ना और घटना, ये चन्द्रमा के दिखने के हैं, चन्द्रमा के नहीं। चाँद कभी घटा ही नहीं। घटता-बढ़ता हमें दिखता है। वैसे ही आत्मा कभी जन्मी नहीं, मरी नहीं। जन्म और मृत्यु उसके शरीर के दिखने और छिपने के हैं।

अब दूसरी पंक्ति, "कारणं गुणसङ्गोऽस्य", गुणों से चिपकना ही कारण है। "सदसद्योनिजन्मसु", अच्छी और बुरी योनियों में जन्म का। मधुसूदन सरस्वती इसे तीन हिस्सों में बाँटते हैं: अच्छी योनियाँ, जैसे देवता, जहाँ सात्त्विक फल भोगा जाता है; बुरी योनियाँ, जैसे पशु, जहाँ तामस फल; और मनुष्य, जिसमें धर्म और अधर्म मिले हुए हैं, जहाँ मिला-जुला फल। और मधुसूदन यहाँ उपनिषद् का एक वचन याद दिलाते हैं, जिसका भाव है: जैसी मनुष्य की कामना होती है, वैसा उसका संकल्प बनता है; जैसा संकल्प, वैसा कर्म; और जैसा कर्म, वैसा ही वह बन जाता है।

मनु भी अपने संवाद में यही कहते हैं, और उनका चित्र आज के तेरहवें श्लोक वाले धागे का दूसरा पहलू है। वे कहते हैं, वही आत्मा गायों, घोड़ों, मनुष्यों, हाथियों, हिरनों, कीड़ों और पतंगों में अपने कर्मों से आसक्त होकर रहता है। और यह जिस-जिस शरीर से जो-जो कर्म करता है, उस-उस शरीर से वही फल भोगता है।

और वह गुरु, जिसकी बात अभी चुम्बक के साथ सुनी, यहाँ एक कड़ा चित्र देते हैं। वे कहते हैं, यह संसार एक बड़ा चक्र है, जिसकी नाभि अव्यक्त है, अरे व्यक्त हैं, और जो क्षेत्रज्ञ से चलाया जाता है। और इस चक्र पर सारा जगत तिल की तरह पीसा जाता है, अज्ञान से उत्पन्न भोगों के दबाव से, जैसे कोल्हू में तिल। तिल कोल्हू में क्यों पिसता है? क्योंकि उसमें तेल है, चिकनाई है। सूखा कंकड़ कोल्हू से निकल जाता है। मुझे लगता है, आज के श्लोक की भाषा में वह चिकनाई ही चिपकना है, "गुणसङ्ग"। जिसमें जितना चिपकना है, उतना ही पिसना है।

रामानुजाचार्य यहाँ एक आशा की बात भी कहते हैं, और उसके बिना यह श्लोक भारी लग सकता है। वे कहते हैं, आदमी तभी तक संसार में घूमता है, जब तक वह उन गुणों को नहीं अपनाता जो आत्मा तक ले जाते हैं, यानी विनम्रता, सरलता, सहनशीलता, वही जो पिछले सत्संग में गिनाए गए। यानी जन्म का कारण भी बताया, और छूटने का रास्ता भी उसी साँस में।

हमारे लिए इसका अर्थ? हम सब किसी न किसी चीज़ से चिपके हैं। कोई अपने मान से, कोई अपने पैसे से, कोई किसी पुराने ग़ुस्से से, कोई किसी के प्यार से। चीज़ों का होना बन्धन नहीं है। घर, परिवार, काम, ये सब प्रकृति का हिस्सा हैं, और रहेंगे। बन्धन है उनसे ऐसे चिपक जाना कि लगे, "यही मैं हूँ।" अगली बार जब मन किसी बात से बहुत चिपके, तो बस इतना याद कर लीजिए: अमावस्या में भी चाँद पूरा है। जो दिख रहा है, वह मैं नहीं; जो देख रहा है, वह मैं हूँ।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने कहा, पुरुष प्रकृति में बैठकर भोगता है। तो क्या इस शरीर में बस यही भोगने वाला जीव है? या कोई और भी है, उससे ऊपर, जो पास खड़ा होकर सब देख रहा है? अगला श्लोक उसके छह नाम गिनाता है। आइए, आज के आख़िरी दो श्लोक सुनते हैं।

उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः । परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥ २२ ॥
गीता 13.22 — अर्थ पढ़ें ›
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह । सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥ २३ ॥
गीता 13.23 — अर्थ पढ़ें ›

बाईसवाँ श्लोक। "उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः", साक्षी, अनुमति देने वाला, धारण करने वाला, भोक्ता, महेश्वर, "परमात्मेति चाप्युक्तो", और परमात्मा भी कहा गया है, "देहेऽस्मिन्पुरुषः परः", वह जो इस शरीर में परम पुरुष है।

छह नाम हैं, और हर नाम एक सीढ़ी जैसा है। पहला, "उपद्रष्टा"। "द्रष्टा" यानी देखने वाला, और "उप" यानी पास। पास खड़ा होकर देखने वाला। हमारी टीका कहती है: वह पास खड़ा होकर देखता है, पर स्वयं कर्म नहीं करता। शंकराचार्य इसके लिए यज्ञ का एक चित्र देते हैं, जो उस समय के हर आदमी ने देखा होगा। यज्ञ हो रहा है, पुरोहित मन्त्र पढ़ रहे हैं, यजमान आहुति दे रहा है, सब अपने-अपने काम में लगे हैं। और एक ओर एक विद्वान बैठा है, जो यज्ञ-विद्या में निपुण है। वह कुछ करता नहीं, पर सबको देख रहा है, और जानता है कि कहाँ ठीक हुआ, कहाँ चूक हुई। वैसे ही, शंकराचार्य कहते हैं, शरीर और इन्द्रियाँ अपने काम में लगे हैं, और वह उनके पास बैठा सब देख रहा है।

और आज यह शब्द सुनते हुए मुझे सञ्जय की याद आती है, जो यह सब धृतराष्ट्र को सुना रहे हैं। आपको याद होगा, युद्ध से पहले व्यास जी ने धृतराष्ट्र से कहा था: यह सञ्जय तुम्हें युद्ध सुनाएगा, इससे कुछ भी छिपा नहीं रहेगा। खुले में किया गया हो या छिपकर, दिन में हो या रात में, यहाँ तक कि मन में सोचा गया भी, सञ्जय सब जान लेगा। शस्त्र इसे भेदेंगे नहीं, और थकान इसे सताएगी नहीं। सोचिए, दोनों ओर की विशाल सेनाएँ लड़ रही हैं, बाण चल रहे हैं, रथ टूट रहे हैं, और उस सबके बीच एक आँख है जो सब देख रही है, यहाँ तक कि योद्धाओं के मन की बात भी, और कोई बाण उसे छूता नहीं। सञ्जय तो एक मनुष्य थे, जिन्हें कुछ दिनों के लिए यह दृष्टि मिली थी। पर हर शरीर में एक ऐसा साक्षी सदा बैठा है, जो सब देखता है, मन की बात भी, और जिसे कोई बाण नहीं छूता।

फिर दूसरा नाम, जो "उपद्रष्टानुमन्ता" में पहले से जुड़ा हुआ है: अनुमति देने वाला। शंकराचार्य और मधुसूदन सरस्वती इसके दो अर्थ देते हैं: वह ख़ुद काम में नहीं लगता, पर पास होने से ऐसा लगता है मानो साथ दे रहा हो; या, वह साक्षी बनकर इन्द्रियों को उनके काम से कभी रोकता नहीं। श्रीधर स्वामी एक शब्द में कहते हैं: केवल पास होने से कृपा करने वाला। यह वही चुम्बक है, जिसकी बात पिछले श्लोकों में हुई। वह धक्का नहीं देता, बस है, और उसके होने भर से सब चलता है।

फिर "भर्ता", धारण करने वाला, और "भोक्ता", भोगने वाला। हमारी टीका कहती है: वह शरीर और मन को कर्म करने देता है, इसलिए उसे भोक्ता भी कहा गया। और फिर "महेश्वर", बड़ा स्वामी, और अन्त में "परमात्मा"। यहाँ एक सुन्दर बात देखिए। एक ही शरीर में दो बैठे हैं: एक जीव, जो पिछले श्लोक में गुणों से चिपककर भोग रहा था और जन्म ले रहा था; और एक "पुरुषः परः", परम पुरुष, जो पास खड़ा होकर देख रहा है। श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती दोनों कहते हैं: इस शरीर में रहते हुए भी वह परम पुरुष प्रकृति के गुणों से छुआ नहीं जाता।

संत ज्ञानेश्वर इसके लिए दो चित्र देते हैं। पहला: जैसे चमेली की बेल के पास खड़ा खम्भा, बेल उस पर चढ़ती है, पर खम्भा बेल नहीं बनता। और दूसरा, जो मुझे बहुत प्रिय है: प्रकृति एक नदी है, और वह उसके किनारे खड़ा मेरु पर्वत है। नदी के पानी में मेरु का प्रतिबिम्ब दिखता है, पर नदी की धारा मेरु को बहा नहीं ले जाती।

और वह गुरु, जिनकी बात चुम्बक और कोल्हू के साथ सुनी, यहाँ भी एक उपमा देते हैं: सत्त्व, रज और तम के भाव क्षेत्रज्ञ के पीछे ऐसे चलते हैं, जैसे हवा से उड़ी धूल हवा के पीछे चलती है। पर हवा उस धूल से छुई नहीं जाती। हवा धूल के साथ भी होती है, और धूल के बिना भी। आँधी में धूल उड़ती है, तो लगता है हवा मैली हो गई। पर आँधी थमते ही धूल नीचे बैठ जाती है, और हवा वैसी की वैसी।

हमारे लिए इसका क्या अर्थ? जब जीवन में कोई तूफ़ान आए, घर में झगड़ा, दफ़्तर में अपमान, अस्पताल में किसी अपने की लम्बी बीमारी, तो मन धूल से भर जाता है। उस घड़ी याद रखिए कि आपके भीतर कोई है जो इस सबको देख रहा है, और जिसे यह धूल छू नहीं सकती। उसी के पास थोड़ी देर बैठ जाइए। तूफ़ान अपने-आप बैठ जाएगा।

और अब आज का आख़िरी श्लोक, तेईसवाँ। "य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह", जो इस प्रकार पुरुष को, और गुणों सहित प्रकृति को जानता है, "सर्वथा वर्तमानोऽपि", सब प्रकार से बर्ताव करता हुआ भी, "न स भूयोऽभिजायते", वह फिर जन्म नहीं लेता।

"सर्वथा वर्तमानोऽपि", सब प्रकार से बर्ताव करता हुआ भी। इस पंक्ति को कोई ग़लत न पढ़ ले, इसलिए हमारी टीका तुरन्त कहती है: यह किसी भी आचरण की छूट नहीं है। वह जानता है कि वह कर्ता नहीं है, इसलिए किसी कर्म को अपना नहीं मानता, और कोई कर्म उसे नहीं बाँधता। शंकराचार्य और मधुसूदन सरस्वती भी "वर्तमानोऽपि" के "भी" पर रुकते हैं। वे कहते हैं, जब हर हाल में रहते हुए भी वह नहीं बँधता, तो जो अपने धर्म में ठीक से रहता है, उसकी तो बात ही क्या। रामानुजाचार्य इसका एक और कोमल अर्थ देते हैं: इस ज्ञान वाला चाहे देवता, मनुष्य या किसी भी शरीर में बहुत कष्ट के साथ जी रहा हो, फिर भी वह फिर नहीं बँधता। यानी "सर्वथा" का अर्थ यह भी है: कितनी भी कठिन परिस्थिति हो।

संत ज्ञानेश्वर इसे एक पंक्ति में कहते हैं: वह शरीर के साथ रहकर सब कर्म करता है, पर जैसे आकाश धुएँ से मैला नहीं होता, वैसा रहता है। आपको याद होगा, ग्यारहवें सत्संग में राजा जनक की वह बात आई थी, जो युधिष्ठिर को सुनाई गई थी: "मेरा धन अनन्त है, और मेरे पास कुछ भी नहीं; मिथिला जल जाए, तो भी मेरा कुछ नहीं जलता।" जनक राज्य चला रहे थे, सभा कर रहे थे, न्याय कर रहे थे। "सर्वथा वर्तमानोऽपि", सब कुछ करते हुए भी, भीतर कुछ चिपका नहीं था।

और वह गुरु भी अपने संवाद का अन्त इसी बात से करते हैं। वे कहते हैं: जो अभ्यास से सत्त्व और क्षेत्रज्ञ के इस भेद को देख लेता है, वह फिर प्रकृति में नहीं जाता। और फिर एक उपमा, जिससे सुन्दर इस श्लोक की व्याख्या मुझे नहीं मिली: जैसे आग में भुने बीज फिर नहीं उगते, वैसे ही ज्ञान से क्लेश जल जाने पर आत्मा फिर जन्म नहीं लेता। भुना हुआ चना देखने में वैसा ही चना है। उसे हाथ में लो, खाओ, किसी को दो। पर उसे मिट्टी में बो दो, तो वह उगेगा नहीं। ज्ञानी का शरीर भी चलता-फिरता, काम करता वैसा ही दिखता है। बस अब उसमें फिर से उगने वाला बीज नहीं बचा।

तो आज का सत्संग यहाँ पूरा होता है। आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली बात: भगवान दूर भी हैं, और पास भी। जो उन्हें नहीं जानता, उसके लिए वे ब्रह्मलोक से भी दूर हैं; जो जानता है, उसके लिए नन्द के आँगन जितने पास। और दूरी मीलों की नहीं, अहंकार की है। विनम्रता, सरलता और सहनशीलता से वह दूरी घटती है।

दूसरी बात: सबके हाथ-पैर उसी के हाथ-पैर हैं। इसलिए जब आप किसी की सेवा करते हैं, तो उसी की सेवा करते हैं। और जो सबको थामे है, वह किसी से चिपका नहीं। हम भी सबको थाम सकते हैं, बिना चिपके।

और तीसरी बात: करना प्रकृति का है, चिपकना हमारा। सुख-दुःख प्रकृति का मौसम है। आपके भीतर एक साक्षी बैठा है, जिसे कोई बाण नहीं छूता, जैसे मेरु को नदी नहीं बहाती। कठिन घड़ी में उसी के पास बैठिए। अमावस्या में भी चाँद पूरा है।

और एक प्रश्न आपके लिए, नीचे टिप्पणी में लिखिए: आपके जीवन में कभी ऐसा क्षण आया है, जब भगवान बहुत दूर लगते-लगते अचानक बहुत पास लगे हों? किसी अस्पताल में, किसी यात्रा में, किसी अपने के चेहरे में? अगर लिखने का मन न हो, तो बस एक शब्द लिख दीजिए: जय श्रीकृष्ण।

अगले सत्संग में श्रीकृष्ण बताएँगे कि अलग-अलग लोग इस आत्मा को अलग-अलग रास्तों से कैसे देखते हैं: "ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना", कुछ लोग ध्यान से अपने भीतर आत्मा को देखते हैं। और बाकी लोग कैसे? वह अगली बार।

और अब, विदा से पहले, आज का वह श्लोक एक बार फिर, जो कहता है कि जिसे हम ब्रह्मलोक तक ढूँढते हैं, वह ज्योतियों की भी ज्योति है, और हमारे ही हृदय में बैठा है। "हृदि सर्वस्य विष्ठितम्"। आँखें बन्द कीजिए, और सुनिए।

ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते । ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् ॥ १७ ॥
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तीन बातें

  1. भगवान दूर भी हैं, और पास भी। जो उन्हें नहीं जानता, उसके लिए वे ब्रह्मलोक से भी दूर हैं; जो जानता है, उसके लिए नन्द के आँगन जितने पास। और दूरी मीलों की नहीं, अहंकार की है। विनम्रता, सरलता और सहनशीलता से वह दूरी घटती है।
  2. सबके हाथ-पैर उसी के हाथ-पैर हैं। इसलिए जब आप किसी की सेवा करते हैं, तो उसी की सेवा करते हैं। और जो सबको थामे है, वह किसी से चिपका नहीं। हम भी सबको थाम सकते हैं, बिना चिपके।
  3. करना प्रकृति का है, चिपकना हमारा। सुख-दुःख प्रकृति का मौसम है। आपके भीतर एक साक्षी बैठा है, जिसे कोई बाण नहीं छूता, जैसे मेरु को नदी नहीं बहाती। कठिन घड़ी में उसी के पास बैठिए। अमावस्या में भी चाँद पूरा है।