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सत्संग ३७

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ज्ञान असल में कैसा दिखता है

गीता 13.0–13.11 · 76 मिनट

शरीर और उसे जानने वाला; विनम्रता, सहनशीलता

अर्जुन उवाच प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च । एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव ॥ ० ॥
गीता 13.0 — अर्थ पढ़ें ›
श्रीभगवानुवाच इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते । एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥ १ ॥
गीता 13.1 — अर्थ पढ़ें ›
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत । क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥ २ ॥
गीता 13.2 — अर्थ पढ़ें ›

हम सबने अपने जीवन में कुछ ऐसे लोग देखे हैं जो बहुत पढ़े-लिखे हैं, जिन्हें शास्त्रों के श्लोक याद हैं, जो किसी भी विषय पर घंटों बोल सकते हैं, पर जिनके पास बैठकर मन को शान्ति नहीं मिलती। और कुछ ऐसे लोग भी देखे हैं, कोई दादी, कोई पुराने मास्टर जी, कोई साधारण-सा पड़ोसी, जिन्होंने शायद कोई ग्रन्थ पूरा नहीं पढ़ा, पर जिनके पास दो मिनट बैठ जाओ तो लगता है कि कुछ भीतर ठहर गया। तो आज का सवाल यही है। ज्ञान असल में कैसा दिखता है? क्या वह किताबों में रहता है, या आदमी के स्वभाव में दिखता है?

जय श्री कृष्ण।

आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का सैंतीसवाँ सत्संग है, और आज से गीता का तेरहवाँ अध्याय शुरू होता है। महाभारत के भीष्म पर्व का सैंतीसवाँ अध्याय ही गीता का तेरहवाँ अध्याय है, "क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग"। और याद रहे, यह सब हमें सञ्जय सुना रहे हैं, हस्तिनापुर के महल में, अन्धे राजा धृतराष्ट्र को, उस दिन जब भीष्म बाणों की शय्या पर गिर चुके हैं। बाहर युद्ध चल रहा है, और भीतर एक बूढ़े राजा को वह बात सुनाई जा रही है जो युद्ध के पहले दिन की सुबह रथ पर कही गई थी।

पहले याद कर लें कि पिछली बार हम कहाँ रुके थे। पिछले सत्संग में बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ था, और श्रीकृष्ण ने उस भक्त की पहचानें गिनाई थीं जो उन्हें प्रिय है। "अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च", जो किसी प्राणी से द्वेष नहीं करता, सबका मित्र है, दयालु है। "समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः", जो शत्रु और मित्र में, मान और अपमान में एक-सा रहता है। और अध्याय के अन्त में उन्होंने कहा था कि जो इस धर्ममय अमृत को श्रद्धा से जीते हैं, वे मुझे अत्यन्त प्रिय हैं। इस बात को मन में रखिए, क्योंकि आज आप एक आश्चर्य देखेंगे। आज श्रीकृष्ण ज्ञान की पहचानें गिनाएँगे, और आप पाएँगे कि वे प्रिय भक्त की पहचानों से कितनी मिलती-जुलती हैं।

अब एक बात इस अध्याय की जगह के बारे में। पुराने आचार्य गीता के अठारह अध्यायों को छह-छह के तीन हिस्सों में बाँटकर पढ़ते हैं, और हमारी टीका कहती है कि अन्तिम छह अध्याय भक्ति से उस ज्ञान की ओर मुड़ते हैं जो मुक्त करता है। मधुसूदन सरस्वती इसे अपने ढंग से कहते हैं: पहले छह में "तुम" कौन हो, यह बताया गया, बीच के छह में "वह" कौन है, और अब अन्तिम छह में इन दोनों का मेल। यानी आज से गीता का तीसरा और अन्तिम हिस्सा शुरू होता है।

पर यही मधुसूदन सरस्वती इस अध्याय की टीका से पहले एक छोटा-सा श्लोक लिखते हैं, जो मुझे बहुत प्यारा लगता है: योगी लोग ध्यान से उस निर्गुण, निष्क्रिय ज्योति को देखते हैं, तो देखें; हमारी आँखों के लिए तो बस वही नीला-सा तेज चमत्कार बना रहे, जो यमुना की रेत पर दौड़ता फिरता है। जो आदमी ज्ञान के सबसे ऊँचे अध्यायों की व्याख्या करने बैठा है, वह पहली पंक्ति में यमुना किनारे दौड़ते साँवले को याद करता है। यानी ज्ञान के इस हिस्से में आने का मतलब भक्ति को पीछे छोड़ना नहीं है।

और श्रीधर स्वामी इस अध्याय को पिछले अध्याय से जोड़ते हैं। वहाँ श्रीकृष्ण ने वचन दिया था, "तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्", जो मुझमें मन लगाते हैं, उन्हें मैं मृत्यु के संसार-सागर से उबार लेता हूँ। श्रीधर स्वामी कहते हैं, अपने आप को ठीक से जाने बिना संसार से छूटना सम्भव नहीं, इसलिए उस वचन को पूरा करने के लिए यह अध्याय कहा जा रहा है।

अब आज का पहला श्लोक, जो अर्जुन का प्रश्न है। "प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च", प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ, "एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव", और ज्ञान और ज्ञेय, यानी जानने योग्य वस्तु: हे केशव, मैं यह जानना चाहता हूँ।

देखिए, अर्जुन छह शब्द रखते हैं, तीन जोड़ियों में। प्रकृति और पुरुष। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ। ज्ञान और ज्ञेय। इस श्लोक के बारे में हमारी टीका एक सीधी बात कहती है: यह प्रश्न गीता की बहुत-सी प्रतियों में नहीं मिलता, वहाँ अध्याय सीधे अगले श्लोक से शुरू होता है। हमारे पाठ में यह है, और जो गीता हमने गाई है उसमें भी यह गाया गया है, इसलिए हम इसके साथ बैठते हैं। और हमारी टीका यह भी कहती है कि यह प्रश्न पहले ही उन छह विषयों का नाम ले लेता है जिनका उत्तर यह पूरा अध्याय देगा। जैसे कोई अच्छा विद्यार्थी पाठ शुरू होने से पहले ही गुरु से कह दे, मुझे ये छह बातें समझनी हैं। आज हम पहली दो जोड़ियों में उतरेंगे, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ, और फिर ज्ञान। ज्ञेय, यानी जिसे जानना है, अगले सत्संग का विषय है।

और अब श्रीभगवान बोलते हैं। "इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते", हे कुन्तीपुत्र, यह शरीर क्षेत्र कहलाता है। "एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः", और जो इसको जानता है, उसे इन दोनों को जानने वाले क्षेत्रज्ञ कहते हैं।

क्षेत्र का सीधा अर्थ है खेत। और हमारी टीका बताती है कि शरीर को खेत क्यों कहा: क्योंकि इसमें बोए गए कर्मों के बीज इसी में फल देते हैं। खेत में जो बोया जाता है, वही उगता है। गेहूँ बोओगे तो गेहूँ, काँटे बोओगे तो काँटे। और यह शरीर, ये हाथ, ये आँखें, यह मन, सब वह खेत है जिसमें हम रोज़ कुछ न कुछ बोते हैं।

शंकराचार्य इस शब्द के और भी अर्थ गिनाते हैं। क्षेत्र इसलिए, कि यह चोट से बचाता है; या इसलिए कि यह घटता है, क्षीण होता है; या इसलिए कि यह नष्ट होता है; या फिर खेत की तरह, कि इसमें कर्मों का फल पकता है। और श्रीधर स्वामी तथा मधुसूदन सरस्वती दोनों एक किसान की उपमा देते हैं। जो इस शरीर को "मैं" और "मेरा" मानता है, उसे क्षेत्रज्ञ कहते हैं, क्योंकि वह किसान की तरह इस खेत का फल भोगता है। खेत किसान का है, पर किसान खेत नहीं है।

अब इस श्लोक की सबसे गहरी बात, जो हमारी टीका एक वाक्य में कहती है: जो कुछ देखा या जाना जाता है, वह क्षेत्र है; जो देखता और जानता है, वह उसका भाग नहीं है।

एक छोटा-सा प्रयोग कीजिए, अभी, जहाँ बैठे हैं वहीं। अपने हाथ की ओर देखिए। हाथ दिख रहा है, है ना? तो हाथ देखी जाने वाली चीज़ है। अब अपने मन की ओर देखिए। अभी मन में क्या चल रहा है, कोई चिन्ता, कोई याद, कोई थकान? वह भी दिख रहा है, जाना जा रहा है। तो सवाल यह है कि देखने वाला कौन है? हम रोज़ कहते हैं, "मेरा हाथ", "मेरा सिर दुख रहा है", "मेरा मन आज ठीक नहीं"। कभी सोचा है कि इस "मेरा" के पीछे जो "मैं" खड़ा है, वह कौन है? हाथ उसका है, सिर उसका है, मन भी उसका है। तो वह स्वयं इनमें से कुछ नहीं हो सकता।

नीलकण्ठ, जिन्होंने पूरे महाभारत पर टीका लिखी, इसके लिए दीये और घड़े की उपमा देते हैं। घड़ा दीये से प्रकाशित होता है। घड़ा दिखता है, दीया दिखाता है। घड़ा दीया नहीं बन जाता, और दीया घड़ा नहीं बन जाता। और मधुसूदन सरस्वती इस श्लोक के शब्दों में एक बहुत बारीक बात पकड़ते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं, यह शरीर क्षेत्र "कहलाता है", यानी कोई भी इसे क्षेत्र कह सकता है, इसमें कोई विशेष योग्यता नहीं चाहिए। पर क्षेत्रज्ञ के बारे में कहते हैं, "तद्विदः", उसे वे कहते हैं जो दोनों को जानते हैं। मधुसूदन कहते हैं, क्योंकि जानने वाला मोटी आँखों से नहीं दिखता; उसे केवल विवेक वाले ही पहचानते हैं।

अब इसे ज़िन्दगी के पास लाते हैं। अस्पताल के किसी वार्ड में कभी-कभी कोई बुज़ुर्ग माँ मिल जाती हैं, बहुत बीमार, और कोई उनसे पूछता है, "माँ जी, कैसी हैं?" और वे मुस्कुराकर कहती हैं, "शरीर थका है बेटा, मैं ठीक हूँ।" ऐसी माँ ने शायद गीता का तेरहवाँ अध्याय कभी नहीं पढ़ा होगा। पर उन्होंने जो कहा, वह इसी श्लोक का सार है। बीमारी सच है, थकान सच है, दर्द भी सच है। पर ये सब खेत में हो रहे हैं। और खेत के किनारे कोई खड़ा है जो इन्हें देख रहा है। जब आदमी को उस खड़े होने की जगह का पता चल जाता है, तो दर्द भले रहे, पर वह उसे पूरा का पूरा निगल नहीं पाता।

अब दूसरा श्लोक, और यहाँ श्रीकृष्ण एक ऐसी बात कहते हैं जिस पर बड़े-बड़े आचार्य रुककर सोचते रहे हैं। "क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत", हे भारत, सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ भी मुझे ही जानो। "क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम", क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है, वही मेरे मत में ज्ञान है।

सब क्षेत्रों में। यानी आपके शरीर में भी, मेरे शरीर में भी, उस चींटी में भी जो अभी दीवार पर चल रही है, और उस राजा में भी जो हस्तिनापुर में बैठा यह सुन रहा है। हर खेत में जो जानने वाला है, उसके बारे में श्रीकृष्ण कहते हैं, उसे भी मुझे ही जानो।

इसका अर्थ क्या है, इस पर हमारी टीका दोनों मत सामने रखती है, और मैं भी आपके सामने दोनों रखूँगा। कुछ आचार्य इसका अर्थ यह लेते हैं कि हर शरीर में जानने वाला वही एक परमेश्वर है, इसलिए जीव अन्त में उनसे भिन्न नहीं। शंकराचार्य, मधुसूदन सरस्वती और श्रीधर स्वामी इसी ओर हैं; श्रीधर स्वामी यहाँ उपनिषद् का महावाक्य याद करते हैं, "तत्त्वमसि", वह तुम हो। दूसरे आचार्य इसका अर्थ यह लेते हैं कि परमेश्वर हर क्षेत्र में जीव के साथ, उसके भीतर बैठे अन्तर्यामी ज्ञाता के रूप में रहते हैं, और जीव उनसे भिन्न रहकर उन पर आश्रित है। रामानुजाचार्य यही कहते हैं, और इसके लिए उपनिषद् का वह वचन रखते हैं जिसका भाव है: जो आत्मा के भीतर रहता है, जिसे आत्मा नहीं जानती, आत्मा जिसका शरीर है, और जो भीतर से उसका नियमन करता है, वही तुम्हारा अन्तर्यामी, अमृत आत्मा है। और तिलक इसे एक छोटे-से वाक्य में कहते हैं: जो पिण्ड में है, वही ब्रह्माण्ड में है। यह भेद पुराना है, और दोनों ओर बड़े सन्त हुए हैं। मैं इसमें कोई पक्ष नहीं लूँगा। पर एक बात पर सब एक हैं: आपके भीतर जो जानने वाला है, वह अकेला नहीं है। उसके साथ, उसके भीतर, भगवान हैं।

और श्लोक के दूसरे आधे पर श्रीधर स्वामी की एक बात बहुत सीधी है, थोड़ी चुभने वाली भी। श्रीकृष्ण कहते हैं, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का ज्ञान ही मेरे मत में ज्ञान है। श्रीधर स्वामी कहते हैं, यही ज्ञान है क्योंकि यह मुक्ति का कारण है; बाकी सब तो बस बेकार की विद्वत्ता है, क्योंकि वह बाँधती है। और वे एक पुराना वचन याद करते हैं: "सा विद्या या विमुक्तये", विद्या वही है जो मुक्त करे। हम बहुत कुछ जानते हैं, क्रिकेट के आँकड़े, मोबाइल की हर नई सुविधा, रिश्तेदारों की हर ख़बर। इनमें बुराई नहीं। पर इनमें से कौन-सा जानना आपको आज रात थोड़ा हल्का करके सुलाएगा?

और अब मैं आपको महाभारत का एक दृश्य सुनाता हूँ, जहाँ श्रीकृष्ण यही बात, लगभग इन्हीं शब्दों में, दोबारा कहते हैं। पर युद्ध के मैदान में नहीं, युद्ध के बहुत बाद।

चौदहवें सत्संग में आपने सुना था कि युद्ध के बाद श्रीकृष्ण अर्जुन को एक पुराना संवाद सुनाते हैं, एक ब्राह्मण और उसकी पत्नी का। पत्नी उलाहना देती है कि तुमने सब कर्म छोड़ दिए, मैं तुम्हारे साथ किस लोक जाऊँगी, और ब्राह्मण मुस्कुराकर उत्तर देता है। वह संवाद आश्वमेधिक पर्व में बहुत लम्बा चलता है, और आज मैं आपको उसका अन्त सुनाता हूँ, जो वहाँ नहीं सुनाया गया था।

बातचीत के अन्त में पत्नी पूछती है: ब्रह्म का जो यह चिह्न "क्षेत्रज्ञ" कहलाता है, उसका लक्षण बताओ, जिससे उसे पकड़ा जा सके। और ब्राह्मण कहता है: उसका कोई चिह्न नहीं, कोई गुण नहीं, शरीर में उसका कोई कारण नहीं; मैं केवल वह उपाय कह सकता हूँ जिससे उसकी भावना पकड़ी जाती है। पाठ कहता है कि तब उस ब्राह्मणी की बुद्धि क्षेत्र से परे, क्षेत्रज्ञ की ओर चल पड़ी।

और कथा सुनकर अर्जुन पूछते हैं: हे कृष्ण, वह ब्राह्मणी कहाँ है, और वह श्रेष्ठ ब्राह्मण कहाँ है, जिन्होंने यह सिद्धि पाई? मुझे उनके बारे में बताइए। और श्रीकृष्ण का उत्तर सुनिए: "मेरे मन को ब्राह्मण जानो, और मेरी बुद्धि को ब्राह्मणी। और जो क्षेत्रज्ञ कहा गया है, सोऽहमेव धनंजय, हे धनंजय, वह मैं ही हूँ।"

देखिए, जिस कथा को अर्जुन किसी दूर के गाँव के पति-पत्नी की कहानी समझ रहे थे, वह भीतर की कहानी निकली। मन और बुद्धि आपस में बात कर रहे थे, और उन दोनों के पीछे जो जानने वाला बैठा था, वह स्वयं भगवान। युद्ध के पहले दिन रथ पर कहा था, "क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि", और युद्ध के बाद, शान्त दिनों में, वही बात एक कहानी के अन्त में रख दी। अच्छा गुरु यही करता है। एक बार सिद्धान्त कहता है, और फिर किसी दिन कहानी बनाकर वही बात चुपके से दिल में रख देता है।

तो इन तीन श्लोकों से आज के लिए पहली बात यह निकलती है: आप अपने शरीर के साथ हैं, पर आप केवल शरीर नहीं हैं। आपका मन आपके साथ है, पर आप केवल मन नहीं हैं। जो यह सब देख रहा है, वह इनसे अलग है, और उसके भीतर भगवान हैं। जिस दिन शरीर थके या मन उदास हो, उस दिन इतना कह लीजिए: "खेत में आज मौसम खराब है। खेत का स्वामी ठीक है।"

पर अभी एक बात बाकी है। अगर यह शरीर खेत है, तो इस खेत में है क्या-क्या? और श्रीकृष्ण कहेंगे कि यह बात बहुत पहले से ऋषि गाते आए हैं। आइए, अगले तीन श्लोक सुनते हैं।

तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् । स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु ॥ ३ ॥
गीता 13.3 — अर्थ पढ़ें ›
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् । ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ॥ ४ ॥
गीता 13.4 — अर्थ पढ़ें ›
महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च । इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥ ५ ॥
गीता 13.5 — अर्थ पढ़ें ›

तीसरा श्लोक एक वादा है। "तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत्", वह क्षेत्र क्या है, कैसा है, किन विकारों वाला है, किससे क्या उत्पन्न हुआ है; "स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु", और वह क्षेत्रज्ञ कौन है, किस प्रभाव वाला है: यह संक्षेप में मुझसे सुनो।

"समासेन", संक्षेप में। यह शब्द मुझे बहुत अपनापन भरा लगता है। जो विषय ऋषियों ने हज़ारों मन्त्रों में कहा, श्रीकृष्ण कहते हैं, मैं तुम्हें थोड़े में कहूँगा। शंकराचार्य कहते हैं कि अगला श्लोक इस ज्ञान की प्रशंसा इसलिए करता है, ताकि सुनने वाले के मन में रुचि जागे। अच्छा शिक्षक यही करता है। पहले बताता है कि आगे कितनी अनमोल चीज़ आने वाली है, ताकि सुनने वाला सीधा होकर बैठ जाए।

और वह प्रशंसा चौथे श्लोक में है। "ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्", इसे ऋषियों ने बहुत प्रकार से गाया है, विविध वेदमन्त्रों में अलग-अलग, "ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः", और ब्रह्म का बोध कराने वाले उन पदों में भी, जो युक्ति से भरे और भली-भाँति निश्चित हैं।

"ब्रह्मसूत्रपद" क्या है, इस पर हमारी टीका दोनों मत रखती है: यहाँ इसे ब्रह्म के विषय में उपनिषदों के वाक्य माना गया है, और कुछ इसे ब्रह्मसूत्र के सूत्र मानते हैं। तिलक दूसरी बात की ओर हैं, और बताते हैं कि ब्रह्मसूत्र के दूसरे अध्याय के तीसरे पाद में पहले क्षेत्र का और फिर क्षेत्रज्ञ का विचार है, इसलिए उन सूत्रों को "शारीरक सूत्र" भी कहते हैं, यानी शरीर का विचार करने वाले सूत्र। रामानुजाचार्य यहाँ तैत्तिरीय उपनिषद् की एक सुन्दर सीढ़ी याद करते हैं। पहले कहा गया कि यह पुरुष अन्न के रस से बना है, यानी यह शरीर। फिर, उसके भीतर प्राण से बना। उसके भीतर मन से बना। उसके भीतर समझ से बना। और सबसे भीतर आनन्द से बना। जैसे प्याज़ की परतें, या जैसे घर के भीतर कमरा, कमरे के भीतर एक छोटा-सा पूजाघर। ऋषियों ने यही गाया: बाहर से भीतर चलो, हर परत को पहचानो, और जो सबसे भीतर है उस तक पहुँचो।

और ऋषियों ने यह कैसे गाया, इसका एक उदाहरण महाभारत में ही है। शान्ति पर्व में बाणों की शय्या पर लेटे भीष्म युधिष्ठिर को एक पुराना संवाद सुनाते हैं। कैलास की चोटी पर तेज से दमकते महर्षि भृगु बैठे हैं, और भरद्वाज उनसे प्रश्न पूछ रहे हैं। भरद्वाज पूछते हैं: ब्रह्मा ने तो हज़ारों प्राणी रचे, फिर केवल पाँच को ही "महाभूत" क्यों कहा जाता है? और भृगु उत्तर देते हैं: जो चलना-फिरना है, वह वायु है; जो खोखलापन है, वह आकाश; जो गर्मी है, वह अग्नि; जो बहता है, वह जल; और जो ठोस है, वह पृथ्वी। यह शरीर इन्हीं पाँच से बना है।

फिर भृगु शरीर को इन पाँचों में बाँटकर दिखाते हैं, और यह सूची सुनने लायक है। त्वचा, मांस, हड्डियाँ, मज्जा और नसें: यह पृथ्वी का भाग है। तेज, क्रोध, आँखें, शरीर की गर्मी और जो भोजन पचाती है: यह अग्नि का भाग। कान, नाक, मुँह, हृदय और पेट: ये आकाश के, यानी खाली जगह के। और कफ, पित्त, पसीना, चर्बी और रक्त: यह जल का भाग। ध्यान दीजिए, भृगु क्रोध को भी शरीर की अग्नि में गिनते हैं। यानी जिस गुस्से को हम "मैं" समझ बैठते हैं, वह भी इसी खेत की एक आग है। यह बात अगले ही श्लोक में और साफ़ होगी।

और यहाँ, इससे पहले कि हम अगले श्लोक में उतरें, एक छोटी-सी बात आपसे कहना चाहता हूँ। अभी कुछ देर हम खेत की चीज़ें गिनेंगे, और यह हिस्सा किसी को थोड़ा सूखा भी लग सकता है, गिनती जैसा। पर इसके ठीक बाद इस अध्याय का सबसे जीवित हिस्सा आने वाला है, जहाँ श्रीकृष्ण बताएँगे कि ज्ञानी आदमी पहचाना कैसे जाता है: उसका व्यवहार, उसकी बोली, उसका धीरज। आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। जो यहीं उठ जाए, वह सोचेगा कि गीता का ज्ञान बस तत्त्वों की एक सूची है, जबकि असली उत्तर थोड़ा ही आगे खड़ा है। तो अगर आप यह सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की यह यात्रा बीच में न छूटे। और आज का यह सत्संग आख़िर तक सुनिए।

अब पाँचवाँ श्लोक, जहाँ श्रीकृष्ण खेत की चीज़ें गिनाते हैं। "महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च", पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि और अव्यक्त; "इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः", दस इन्द्रियाँ और एक मन, और इन्द्रियों के पाँच विषय।

हमारी टीका इन्हें गिनकर बताती है कि ये चौबीस तत्त्व हैं। पाँच महाभूत: धरती, जल, अग्नि, वायु, आकाश। फिर अहंकार, यानी "मैं" का भाव। बुद्धि। और अव्यक्त प्रकृति, जिससे यह सब निकला। फिर पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, कान, त्वचा, आँख, जीभ, नाक; और पाँच कर्मेन्द्रियाँ, वाणी, हाथ, पैर, और मल-मूत्र की दो इन्द्रियाँ। फिर मन। और फिर शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, ये पाँच विषय। और हमारी टीका एक बात और कहती है: श्लोक पाँच और छह एक ही वाक्य हैं, यानी सूची अगले श्लोक में भी चलती रहेगी।

शंकराचार्य बताते हैं कि यही चौबीस तत्त्व सांख्य दर्शन वाले गिनते हैं। तो क्या श्रीकृष्ण यहाँ सांख्य दर्शन मान रहे हैं? नीलकण्ठ यहाँ साफ़ कहते हैं, भ्रम में मत पड़िए। सांख्य वाले प्रकृति को स्वतन्त्र मानते हैं, अपने आप में चलने वाली; और गीता की दृष्टि में वह भगवान की शक्ति है, उनके अधीन। मधुसूदन सरस्वती भी यही कहते हैं, और सातवें अध्याय का वचन याद दिलाते हैं, जहाँ भगवान ने इसी को "मेरी माया" कहा था, जिसे पार करना कठिन है।

रामानुजाचार्य यहाँ विष्णु पुराण का एक संवाद याद करते हैं, जिसमें एक ज्ञानी एक राजा से पूछता है: क्या तुम यह सिर हो? या यह गर्दन? या यह पेट? या ये पैर? हे राजन्, तुम इन सब अंगों से अलग हो। तो कुशल होकर बस इतना सोचो, "मैं कौन हूँ?" यह सवाल बहुत सीधा है, पर बहुत गहरा जाता है। चौबीस चीज़ें गिनाने का मतलब यही है कि हम एक-एक को देखकर कह सकें: यह मैं नहीं, यह भी नहीं। और जो अन्त तक देखता हुआ बचता है, वही क्षेत्रज्ञ है।

पर इस सूची में सबसे चौंकाने वाली बात कौन-सी है, जानते हैं? अहंकार और बुद्धि भी खेत में गिने गए हैं। सोचिए। शरीर को तो हम आसानी से मान लेते हैं कि यह बदलता है, बूढ़ा होता है। पर अपनी बुद्धि को, अपनी समझदारी को, और उस "मैं" को, जिसे हम सबसे ज़्यादा अपना मानते हैं, श्रीकृष्ण कहते हैं, ये भी देखी जाने वाली चीज़ें हैं। कभी आपने अपने भीतर महसूस किया होगा, "अरे, मुझमें आज अकड़ आ रही है।" उस घड़ी अकड़ भी थी, और उसे पकड़ने वाला भी था। अकड़ खेत में उगी, और पकड़ने वाला खेत के किनारे खड़ा था।

पर अभी एक बात बाकी है। खेत में अभी कुछ और चीज़ें गिनी जानी हैं, और वे ऐसी हैं जिन्हें हम खेत की नहीं, अपनी मानते हैं: इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख। और उसके बाद वह श्लोक, जिसके लिए यह पूरा सत्संग है। आइए, सुनते हैं।

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः । एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥ ६ ॥
गीता 13.6 — अर्थ पढ़ें ›
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् । आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥ ७ ॥
गीता 13.7 — अर्थ पढ़ें ›

छठा श्लोक सूची को पूरा करता है। "इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः", इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, स्थूल देह का पिण्ड, चेतना और धृति; "एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्", यह विकारों सहित क्षेत्र संक्षेप में कहा गया।

हमारी टीका यहाँ एक बात कहती है जो पहली बार सुनने में अजीब लगती है: इच्छा, सुख और चेतना भी क्षेत्र के ही हैं। वे जाने जाते हैं, इसलिए वे जानने वाले नहीं हैं। हम कहते हैं, "मुझे यह चाहिए", "मुझे उससे चिढ़ है", "मैं बहुत दुखी हूँ"। श्रीकृष्ण कहते हैं, ये सब खेत में उगने वाली फ़सलें हैं। शंकराचार्य इच्छा की परिभाषा बड़ी बारीकी से देते हैं: पहले किसी चीज़ से सुख मिला था, अब वैसी ही चीज़ फिर सामने आई, तो मन उसे पाना चाहता है; यही इच्छा है। और द्वेष उसका उलटा: पहले किसी चीज़ से दुःख मिला था, वैसी ही फिर सामने आई, तो मन उससे दूर भागता है। यानी हमारी ज़्यादातर पसन्द-नापसन्द पुरानी यादों की गूँज है। और वह गूँज खेत में बजती है।

"चेतना" के लिए शंकराचार्य और नीलकण्ठ दोनों एक सुन्दर उपमा देते हैं: आग में तपा हुआ लोहे का गोला। लोहा आग नहीं है, पर तपकर आग जैसा चमकने लगता है। वैसे ही शरीर और मन अपने आप में जड़ हैं, पर भीतर के आत्मा की रोशनी से जीवित-से चमकते हैं। और धृति, यानी वह धीरज जो थके हुए शरीर और इन्द्रियों को सँभाले रखता है, वह भी खेत में है। श्रीधर स्वामी उपनिषद् का एक वचन याद करते हैं, जिसका भाव है: कामना, संकल्प, सन्देह, श्रद्धा, अश्रद्धा, धीरज, अधीरता, लज्जा, समझ, डर, यह सब मन ही है।

मधुसूदन सरस्वती यहाँ असली कसौटी बताते हैं: बदलना ही क्षेत्र का चिह्न है। जो बदलता है, वह खेत है। और जो इन हज़ारों बदलावों को देखता रहता है, वह स्वयं नहीं बदलता। सोचिए, कल रात आप किसी बात पर बहुत परेशान थे। आज सुबह वह परेशानी आधी रह गई। शाम तक शायद याद भी न रहे। परेशानी आई, बदली, चली गई। पर जो कल रात परेशान था, जो आज सुबह थोड़ा हल्का हुआ, जो शाम को उसे भूल जाएगा, वह एक ही है। वह आप हैं। और इसी में एक बड़ी तसल्ली है: आपकी कोई भी भावना आपकी पूरी पहचान नहीं है।

अब सातवाँ श्लोक, और यहाँ से इस अध्याय की वह बात शुरू होती है जिसके लिए आज का सत्संग है। "अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्", मान न चाहना, दम्भ न करना, अहिंसा, क्षमा, सरलता; "आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः", गुरु की सेवा, पवित्रता, स्थिरता और मन का संयम।

अर्जुन ने पूछा था, ज्ञान क्या है। कोई भी सोचता कि अब श्रीकृष्ण कोई गहरा सिद्धान्त कहेंगे, कोई परिभाषा, कोई सूत्र। और वे कहते हैं: मान न चाहना। दम्भ न करना। किसी को न सताना। हमारी टीका इस अध्याय के सार में इसे "आश्चर्य की बात" कहती है: श्रीकृष्ण ज्ञान को किसी सिद्धान्त के रूप में नहीं, गुणों के समूह के रूप में बताते हैं। और इस श्लोक की टीका कहती है कि श्लोक सात से ग्यारह तक बीस लक्षण गिनाए गए हैं, जिन्हें "ज्ञान" कहा गया है, क्योंकि वे ज्ञान तक ले जाते हैं, और उसके होने का प्रमाण हैं।

तिलक इस पर बहुत साफ़ बात कहते हैं: ज्ञान का अर्थ केवल बुद्धि से यह जान लेना नहीं कि फलाँ चीज़ ऐसी है। उस ज्ञान का असर आदमी के स्वभाव पर पड़ना चाहिए, नहीं तो वह ज्ञान कच्चा है। जब ये गुण आदमी के स्वभाव में दिखने लगें, तभी उसे ज्ञान कहना चाहिए। यानी ज्ञान को कमरे में बैठकर नहीं, आदमी के व्यवहार में देखा जाता है। आज के सत्संग का पहला सवाल यहीं उत्तर पाता है।

अब इन नौ को एक-एक करके देखते हैं, आराम से।

पहला, अमानित्व: मान न चाहना। शंकराचार्य कहते हैं, मानित्व का अर्थ है अपनी बड़ाई आप करना। मधुसूदन सरस्वती जोड़ते हैं, अपने उन गुणों से भी, जो हैं, और उनसे भी, जो हैं ही नहीं। संत ज्ञानेश्वर ऐसे आदमी का चित्र खींचते हैं: उसे सम्मान बोझ लगता है। कोई उसके गुण गाने लगे, तो वह ऐसे घबराता है जैसे शिकारियों से घिरा हिरन। उसके पास बृहस्पति जितना ज्ञान भी हो, तो उसे भोलेपन में छिपा लेता है, बड़प्पन के डर से।

और मान का असली रोग क्या है, यह महाभारत की एक छोटी-सी कथा में बहुत साफ़ दिखता है, जो भीष्म शान्ति पर्व में युधिष्ठिर को सुनाते हैं। हिमालय के पास एक बहुत बड़ा शाल्मलि, यानी सेमल का पेड़ था। बरसों में बढ़ा हुआ, सौ हाथ चौड़ा, घनी छाया वाला। गर्मी से थके हाथी उसके नीचे आराम करते, तोते-मैना उसमें चहचहाते, काफ़िले और तपस्वी उसकी छाँव में रुकते। एक दिन नारद वहाँ आए और उसकी बहुत प्रशंसा की, और पूछा: जो वायु पर्वतों की चोटियाँ हिला देता है, वह तुम्हारी एक डाल भी नहीं तोड़ता; क्या पवन तुम्हारा मित्र है? और पेड़ ने कहा: वायु न मेरा मित्र है, न बन्धु। मेरा बल इतना है कि वायु मेरे बल की अठारहवीं कला तक भी नहीं पहुँचता। मैंने उसे कई बार रोका है, तोड़ा है।

नारद ने कहा, तुम्हारी दृष्टि उलटी है, और जाकर वायु को सब बता दिया। वायु आया, और उसने पेड़ से जो कहा, वह इस कथा का दिल है। उसने कहा: मैं तुम्हें जानता हूँ। सृष्टि के समय पितामह ब्रह्मा ने तुम पर विश्राम किया था। उनके विश्राम के कारण ही मैंने तुम पर यह कृपा की, और तुम्हें नहीं तोड़ता। फिर रात हुई, पेड़ ने अकेले में सोचा और समझ गया कि वह वायु के बराबर नहीं। घबराकर उसने अपनी शाखाएँ, पत्ते और फूल ख़ुद ही गिरा दिए। सुबह वायु आया, उसे ठूँठ-सा खड़ा देखा, मुस्कुराया और बोला: क्रोध में मैं भी तुम्हारे साथ यही करता, जो तुमने अपने हाथ से कर लिया। और पेड़ लज्जित हुआ।

भीष्म यह कथा राजनीति की सीख के रूप में सुनाते हैं, कि दुर्बल को बलवान से वैर नहीं करना चाहिए। पर मुझे इसमें अमानित्व का पूरा रहस्य दिखता है। पेड़ जिस चीज़ को अपना बल समझ रहा था, वह असल में किसी और की कृपा थी, एक पुराने विश्राम की याद। हमारे साथ भी ज़्यादातर यही होता है। हमारी नौकरी, हमारा नाम, हमारी सेहत, घर में हमारी बात का वज़न, इनमें से कितना हमारा अपना बल है, और कितना माँ-बाप के आशीर्वाद, किसी गुरु के सिखाए, किसी अनजान की मदद, या बस भगवान की कृपा का फल? जिस दिन यह दिख जाता है, उस दिन मान चाहने का मन अपने आप ढीला पड़ जाता है।

दूसरा, अदम्भित्व: दम्भ न करना। शंकराचार्य कहते हैं, अपने धर्म-कर्म का ढिंढोरा पीटना दम्भ है। मधुसूदन सरस्वती और साफ़ करते हैं: लाभ, पूजा और प्रसिद्धि के लिए अपने धर्म को दिखाना। संत ज्ञानेश्वर यहाँ किसान का चित्र देते हैं: किसान बीज बोकर उसे मिट्टी से ढक देता है; वैसे ही ऐसा आदमी अपना दान-पुण्य ढक देता है। वे कहते हैं, केले का तना देखने में हल्का और खोखला लगता है, पर उसका फल रस से भरा होता है; बादल देखने में ऐसा हल्का कि हवा उड़ा ले जाए, पर बरसता है तो धरती भर देता है। आज के समय में यह बात और चुभती है, जब दान करते हुए फ़ोटो खिंचवाना आम हो गया है। बीज जितना गहरा ढका हो, उतना ही अच्छा उगता है।

तीसरा, अहिंसा। शंकराचार्य कहते हैं, किसी प्राणी को पीड़ा न देना; रामानुजाचार्य जोड़ते हैं, वाणी से, मन से और शरीर से। और यहाँ संत ज्ञानेश्वर की उपमाएँ सबसे कोमल हो जाती हैं। ऐसा आदमी कैसे चलता है? जैसे बगुला पानी में पैर रखता है, कि कोई लहर न टूटे। जैसे भौंरा कमल पर हौले से पैर रखता है, कि पराग न कुचल जाए। और जब वह बोलता है, तो पहले स्नेह आगे निकलता है, शब्द पीछे-पीछे आते हैं; पहले कृपा, फिर बोली। और ज्ञानेश्वर यह भी कहते हैं कि अहिंसा पहले मन में उगती है; जो बीज धरती में होता है, वही ऊपर पेड़ बनता है। हम में से ज़्यादातर लोग किसी को हाथ से नहीं मारते। पर ज़बान से, ताने से, किसी की कमज़ोरी पर हँसकर, रोज़ कितनी चोट दे देते हैं। अहिंसा वहीं से शुरू होती है।

चौथा, क्षान्ति: क्षमा, सहनशीलता। शंकराचार्य कहते हैं, दूसरा अपराध करे, फिर भी मन में विकार न आना। रामानुजाचार्य कहते हैं, दूसरों से सताए जाने पर भी उनके प्रति मन न बिगड़ना। संत ज्ञानेश्वर कहते हैं, जैसे मेरु पर्वत अपनी चोटियों का बोझ नहीं जानता, जैसे समुद्र नदियों के आने पर अपना पेट बड़ा कर लेता है, वैसे वह सहता है, और उसे यह भी याद नहीं रहता कि वह सह रहा है।

आठवें सत्संग में आपने वन का वह दृश्य सुना था, जब द्रौपदी युधिष्ठिर से कहती हैं कि अब क्षमा का समय नहीं, और युधिष्ठिर मुस्कुराकर क्रोध के नुकसान गिनाते हैं। उस दिन उसका एक हिस्सा छूट गया था, जो ठीक इसी श्लोक के साथ बैठता है। युधिष्ठिर कहते हैं: यदि मनुष्यों में पृथ्वी जैसे क्षमा करने वाले न होते, तो कोई मेल न होता। गाली के बदले गाली, मार के बदले मार चलती। पिता पुत्रों को मारते और पुत्र पिताओं को, पति पत्नियों को और पत्नियाँ पतियों को, और किसी का जन्म ही न होता; क्योंकि प्राणियों का जन्म मेल पर टिका है। और फिर वे काश्यप ऋषि की गाई हुई क्षमा की गाथाएँ सुनाते हैं: "क्षमा धर्मः क्षमा यज्ञः", क्षमा धर्म है, क्षमा यज्ञ है, क्षमा वेद है, क्षमा तप है, क्षमा पवित्रता है; यह जगत् क्षमा से ही टिका है। और उसी जगह एक बात और है, जो क्षमा को कमज़ोरी समझने वालों के लिए है: जो सामर्थ्यवान होकर भी क्षमा करता है, उसके लोक सनातन हैं। क्षमा वह है जो कर सकता है, पर नहीं करता।

पाँचवाँ, आर्जव: सरलता, सीधापन। शंकराचार्य कहते हैं, टेढ़ापन न होना। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, जैसा हृदय में है वैसा ही व्यवहार करना, किसी को न ठगना। रामानुजाचार्य कहते हैं, दूसरों के प्रति वाणी, मन और शरीर, तीनों एक-से रहें। संत ज्ञानेश्वर कहते हैं, सूरज किसी का मुँह देखकर नहीं चमकता, और आकाश सबको एक-सी जगह देता है; और जैसे बच्चा माँ के पास बिना किसी शंका के दौड़ा चला जाता है, वैसे ही वह लोगों के सामने अपना मन खोलने में हिचकता नहीं।

छठा, आचार्योपासन: गुरु की सेवा। शंकराचार्य कहते हैं, उस आचार्य की सेवा, जो मुक्ति का साधन सिखाता है; मधुसूदन सरस्वती साफ़ करते हैं कि यहाँ केवल अक्षर पढ़ाने वाला नहीं, मुक्ति का मार्ग दिखाने वाला गुरु अभिप्रेत है। रामानुजाचार्य इसमें प्रणाम, प्रश्न और सेवा गिनाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे चौथे अध्याय में कहा गया था। और आज जिस ब्राह्मण-ब्राह्मणी के संवाद का अन्त हमने सुना, उसी में पत्नी पूछती है कि यह समझ किस उपाय से मिलती है, और ब्राह्मण कहता है: तुम नीचे की अरणी हो, और गुरु ऊपर की अरणी; तप और शास्त्र मथानी हैं, और उनसे ज्ञान की अग्नि पैदा होती है। यज्ञ की आग दो लकड़ियों को रगड़कर पैदा होती थी। एक लकड़ी अकेले कितनी भी पड़ी रहे, आग नहीं निकलती।

और अब मैं आपको महाभारत की वह कथा सुनाता हूँ, जिसमें गुरु-सेवा का सबसे कठिन दृश्य भी है, और यह भी कि एक लक्षण के न होने से क्या होता है। युद्ध के बाद नारद यह कथा युधिष्ठिर को सुनाते हैं, कर्ण के बारे में।

कर्ण ने द्रोण से ब्रह्मास्त्र माँगा, ताकि वह अर्जुन के बराबर हो सके, और द्रोण ने मना कर दिया। तब कर्ण महेन्द्र पर्वत पर परशुराम के पास गया, सिर झुकाकर प्रणाम किया, और कहा: "मैं भृगुवंश का ब्राह्मण हूँ।" परशुराम ने उसे प्रेम से अपना लिया। पाठ कहता है कि परशुराम कर्ण के बल, विनय, संयम और गुरु-सेवा से बहुत प्रसन्न हुए, और उसे ब्रह्मास्त्र सिखा दिया। एक दिन उपवास से थके परशुराम कर्ण की गोद में सिर रखकर सो गए। तभी एक भयंकर कीड़ा आया और कर्ण की जाँघ काटने लगा। गुरु की नींद न टूटे, इसलिए कर्ण न उसे हटा सका, न बोल सका। उसने वह असहनीय पीड़ा धीरज से दबा ली, और गुरु को हिलने तक नहीं दिया।

जब बहता हुआ रक्त गुरु के शरीर को छू गया, तब परशुराम जागे। सब देखा, और फिर बोले: इतना कष्ट कोई ब्राह्मण नहीं सह सकता; तुम्हारा धैर्य क्षत्रिय जैसा है; सच बताओ। और कर्ण ने काँपते हुए बताया कि वह सूत है, राधा का पुत्र, और उसने सोचा था कि वेद-विद्या देने वाला पिता के समान होता है, इसलिए गुरु का गोत्र अपना बताया। परशुराम का उत्तर कठोर था: तुमने अस्त्र के लोभ से मुझसे झूठ बोलकर ठगा, इसलिए यह ब्रह्मास्त्र तुम्हें तुम्हारी मृत्यु के समय याद नहीं आएगा। जाओ, यहाँ झूठ के लिए जगह नहीं है।

कर्ण के प्रति मेरे मन में बहुत आदर है, और इस कथा को सुनाते हुए मन भारी होता है। पर इसे इस श्लोक के साथ रखकर देखिए। कर्ण में विनय था, संयम था, क्षमा जैसा अद्भुत धीरज था, गुरु-सेवा ऐसी कि जाँघ कटती रही और वह हिला नहीं। बस एक चीज़ नहीं थी, आर्जव, सीधापन। और जो विद्या सबसे ज़रूरी घड़ी में काम आनी थी, वही उस घड़ी में याद नहीं आई। मधुसूदन सरस्वती अगले श्लोक की टीका में ठीक यही बात कहते हैं: इन बीसों का एक साथ होना ही ज्ञान कहा गया है; इनमें से एक का भी न होना नहीं। ये बीस अलग-अलग गहने नहीं हैं कि एक पहन लिया, एक छोड़ दिया। ये एक माला के मोती हैं।

अब बाकी तीन, संक्षेप में। सातवाँ, शौच: पवित्रता। शंकराचार्य और श्रीधर स्वामी दोनों दो तरह की पवित्रता गिनाते हैं: बाहर की, मिट्टी और जल से; और भीतर की, राग-द्वेष का मैल धोना। संत ज्ञानेश्वर कहते हैं, भीतर शुद्ध न हो तो बाहर का नहाना-धोना ऐसा है जैसे कड़वी तुम्बी पर गुड़ लपेटना। आठवाँ, स्थैर्य: स्थिरता। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, साधना के रास्ते पर अनेक विघ्न आएँ, फिर भी उसे न छोड़ना, और बार-बार और ज़्यादा यत्न करना। ज्ञानेश्वर कहते हैं, शरीर भले इधर-उधर घूमे, मन की बैठक नहीं टूटती; जैसे गाय दूर जंगल में चरती है, पर उसका मन बछड़े में रहता है। और नौवाँ, आत्मविनिग्रह: मन का संयम। शंकराचार्य कहते हैं, यह शरीर और इन्द्रियों का समूह स्वभाव से हर ओर दौड़ता है; उसे रोककर अच्छे रास्ते पर टिकाना ही आत्मविनिग्रह है। ज्ञानेश्वर कहते हैं, ऐसा आदमी अपने मन की रखवाली ऐसे करता है, जैसे माँ अपने इकलौते बच्चे पर झुकी रहती है।

तो आज के लिए दूसरी बात यह निकलती है: ज्ञान की परीक्षा परीक्षा-भवन में नहीं, रसोई में, दफ़्तर में, बाज़ार में होती है। कोई आपकी प्रशंसा करे तब, कोई आपका अपमान करे तब, किसी को आपकी ज़रूरत हो तब। वहाँ जो दिखता है, वही आपका असली ज्ञान है।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण की सूची अभी आधी भी नहीं हुई। आगे वे एक ऐसी बात कहने वाले हैं जो पहली बार सुनने में उदास लगती है: जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और रोग के दुःख को बार-बार देखना। और फिर, घर, बच्चों और जीवनसाथी के बारे में एक बहुत नाज़ुक बात। आइए, सुनते हैं।

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च । जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥ ८ ॥
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असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु । नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥ ९ ॥
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आठवाँ श्लोक। "इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च", इन्द्रियों के विषयों में वैराग्य, और अहंकार का न होना; "जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्", और जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और रोग में दुःख और दोष को बार-बार देखना।

पहले वैराग्य। शंकराचार्य कहते हैं, देखे हुए और सुने हुए, दोनों तरह के भोगों से मन का हट जाना; यानी इस लोक के सुखों से भी, और स्वर्ग के सुने हुए सुखों से भी। रामानुजाचार्य बताते हैं कि यह वैराग्य आता कैसे है: विषयों के दोष देखते-देखते मन उनसे उकता जाता है। संत ज्ञानेश्वर कहते हैं, जैसे कोई जलते हुए घर में नहीं घुसता, या बाघ की गुफा में बसेरा नहीं करता, वैसे ही उसका मन विषयों की बात से अपने आप पीछे हट जाता है। पर ध्यान रहे, वैराग्य का अर्थ जीवन से नफ़रत नहीं है। जिसे जलते घर का पता है, वह घर से नफ़रत नहीं करता; वह बस आग में हाथ नहीं डालता।

फिर अनहंकार। सातवें श्लोक में "मान न चाहना" आ चुका था, तो यह क्या नया है? मधुसूदन सरस्वती इसका भेद बताते हैं: कोई अपनी बड़ाई मुँह से न भी करे, फिर भी मन के भीतर एक गर्व उठ सकता है, "मैं सबसे अच्छा हूँ"। उस भीतर के गर्व का न होना अनहंकार है। संत ज्ञानेश्वर इसके लिए पेड़ की उपमा देते हैं: पेड़ मौसम आने पर फल देते हैं, पर उन्हें पता ही नहीं होता कि "हमने फल दिए"। सूरज उगता है, पर अभिमान के बिना; गंगा बहती है, पर किसी काम के लिए नहीं। पिछले सत्संग में आपने प्रिय भक्त की पहचान में यही शब्द सुना था, "निरहंकारः"। देखिए, भक्त की पहचान और ज्ञानी की पहचान एक ही जगह आकर मिल रही है।

और अब इस श्लोक का वह हिस्सा, जो पहली बार सुनने में उदास लगता है: जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और रोग के दुःख और दोष को बार-बार देखना। श्रीधर स्वामी अनुदर्शन का अर्थ बताते हैं: बार-बार सोचना, बार-बार देखना। शंकराचार्य हर एक को गिनाते हैं। जन्म में गर्भ का वास और बाहर आने का कष्ट। मृत्यु का दुःख। बुढ़ापे में समझ, शक्ति और तेज का घटना, और लोगों का अनादर। रोग, और तरह-तरह के दुःख। और फिर शंकराचार्य एक बारीक बात कहते हैं: जन्म आदि अपने आप में दुःख नहीं, दुःख का कारण हैं, इसलिए दुःख कहलाते हैं। और यह देखते रहने से विषयों से वैराग्य आता है, और इन्द्रियाँ बाहर से मुड़कर भीतर, अपने आप को देखने की ओर चलने लगती हैं। रामानुजाचार्य इसे और सीधा कहते हैं: जब तक शरीर है, ये चार दोष टाले नहीं जा सकते; यह याद रखना।

और यह बात महाभारत में किसने किसको सबसे साफ़ कही, जानते हैं? उसी राजा से, जो इस समय सञ्जय से गीता सुन रहे हैं। युद्ध के बाद, जब धृतराष्ट्र के सौ पुत्र मारे जा चुके थे, विदुर उन्हें सँभालने बैठते हैं। पाँचवें और छठे सत्संग में आपने विदुर की शुरुआती बातें सुनी थीं, और सत्ताईसवें में कुएँ का दृष्टान्त। आज उनके बीच की बातें।

धृतराष्ट्र पूछते हैं: अनचाहे के मिलने और मनचाहे के छूटने से जो मन का दुःख होता है, उससे समझदार लोग कैसे छूटते हैं? और विदुर एक कुम्हार का चित्र रखते हैं। चाक पर चढ़ा मिट्टी का बर्तन कभी भी टूट सकता है: जब अभी थोड़ा ही बना हो, या पूरा बन गया हो, या चाक से उतारा जा रहा हो, गीला हो या सूखा हो, भट्टी में पक रहा हो, या निकलकर काम में आ रहा हो। वैसे ही देहधारी हैं: गर्भ में, या अभी-अभी जन्मे, दस दिन के, महीने भर के, एक साल के, दो साल के, जवानी में, अधेड़ उम्र में, या बूढ़े होकर, प्राणी चला जाता है।

फिर धृतराष्ट्र पूछते हैं, इस संसार के गहन को कैसे समझें, और विदुर गर्भ से शुरू करते हैं: जीव पहले कुछ समय कलल अवस्था में रहता है, पाँचवें महीने के बाद मांस बनता है, फिर सब अंग पूरे होते हैं; वह मल के बीच, सिर नीचे और पैर ऊपर, रहता है, और बड़े कष्ट से बाहर आता है। जन्म के बाद संकट उसके पीछे ऐसे लगते हैं जैसे कुत्ते मांस के पीछे; फिर रोग आते हैं; और इन्द्रियों की रस्सियों से बँधा वह कभी तृप्त नहीं होता।

और फिर विदुर वह बात कहते हैं, जो मुझे इस पूरे प्रसंग का सबसे सीधा सच लगती है। आदमी ऊँचे कुल में मगन रहता है और नीचे कुल वालों की निन्दा करता है; धन के घमण्ड में निर्धनों की निन्दा करता है; दूसरों को मूर्ख कहता है और अपने को नहीं देखता। पर जब समझदार और मूर्ख, धनी और निर्धन, कुलीन और अकुलीन, मान वाले और बिना मान वाले, सब श्मशान में पहुँचते हैं, तो वहाँ हड्डियों और नसों के ढाँचे बनकर एक-से सोते हैं। वहाँ कोई क्या भेद देखेगा, जिससे कुल या रूप पहचाना जाए? देखिए, जन्म-मृत्यु के दुःख को देखने का पहला फल वही निकलता है जो सातवें श्लोक का पहला शब्द था: अमानित्व। जो श्मशान को ठीक से देख लेता है, उसका मान अपने आप उतर जाता है।

पर अगर बात यहीं रुक जाती, तो यह श्लोक केवल डराने वाला होता। संत ज्ञानेश्वर इसे एक बहुत सुन्दर मोड़ देते हैं। वे कहते हैं, ऐसा आदमी जवानी में ही बुढ़ापे को देख लेता है, और फिर सोचता है: जब तक कान सुनते हैं, जो सुनने लायक है वह सुन लूँ; जब तक पैर चलते हैं, जहाँ जाना है वहाँ चला जाऊँ; जब तक आँखें हैं, जो देखने लायक है देख लूँ; वाणी जाने से पहले अच्छी बातें कह लूँ; और हाथ जब तक काम करते हैं, दान कर लूँ। वे कहते हैं, तैरने वाला गहरे पानी में उतरने से पहले, किनारे पर ही अपनी तैरने वाली तुम्बी बाँध लेता है; और समझदार आदमी प्राण जाने से पहले ही दवा के लिए दौड़ता है। यानी जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे को देखना उदासी नहीं, जागना है। जो जानता है कि दीया सीमित तेल का है, वह उसकी रोशनी में पढ़ने में देर नहीं करता।

अब नौवाँ श्लोक, जो सबसे नाज़ुक है, क्योंकि यह घर की बात करता है। "असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु", आसक्ति न होना, पुत्र, स्त्री, घर आदि में ममता से न चिपकना; "नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु", और प्रिय और अप्रिय के आने पर सदा समचित्त रहना।

यहाँ दो शब्द हैं, असक्ति और अनभिष्वङ्ग, और हमारी टीका दोनों का भेद बताती है। असक्ति का अर्थ है वस्तुओं में अपनेपन का लगाव न होना। अनभिष्वङ्ग उससे गहरा है: उनके सुख-दुःख को अपना सुख-दुःख न मान लेना। शंकराचार्य इसे बहुत साफ़ बताते हैं: अभिष्वङ्ग वह गहरी आसक्ति है जिसमें आदमी दूसरे को अपने से अलग देख ही नहीं पाता; दूसरा सुखी हो तो "मैं सुखी", दूसरा दुखी हो तो "मैं दुखी", वह जिए तो "मैं जिऊँगा", वह मरे तो "मैं मरूँगा"।

और यहाँ मैं साफ़ कह दूँ, क्योंकि यह श्लोक अक्सर गलत समझा जाता है: श्रीकृष्ण यहाँ घर छोड़ने, बच्चों से प्रेम न करने की बात नहीं कह रहे। तिलक इस पर ज़ोर देकर कहते हैं कि यहाँ केवल यह बताया जा रहा है कि ज्ञान क्या है, और वह ज्ञान बाल-बच्चों और घर-गृहस्थी में अनासक्ति है, इसमें कोई विवाद नहीं; घर छोड़ना या न छोड़ना एक अलग प्रश्न है। संत ज्ञानेश्वर इसके लिए यात्री की उपमा देते हैं: रास्ते में चलते हुए किसी पेड़ की छाँव मिल जाए, तो यात्री उसमें आराम करता है, पर उस छाँव पर घर जैसा हक़ नहीं जमाता।

और इस श्लोक का सबसे बड़ा उदाहरण वही राजा हैं, जो इस समय सुन रहे हैं। बाईसवें सत्संग में आपने दुर्योधन के जन्म का दिन सुना था: अपशकुन हुए, और विदुर और ब्राह्मणों ने कहा कि कुल के लिए एक को त्याग दीजिए। पर पुत्र-स्नेह से बँधे राजा ने वैसा नहीं किया। आज उसी दिन को इस श्लोक की नज़र से देखिए। प्रेम में कोई दोष नहीं था। दोष यह था कि धीरे-धीरे बेटे की हर चाह पिता की चाह बन गई; बेटे का अपमान पिता का अपमान, बेटे की ज़िद पिता की ज़िद। शंकराचार्य जिसे अभिष्वङ्ग कहते हैं, "वह सुखी तो मैं सुखी", वही। और आज वह पिता सञ्जय के सामने बैठकर अपने बेटों के युद्ध का हाल सुन रहा है।

हमारे घरों में यह बहुत चुपचाप होता है। बच्चे के नम्बर कम आए, तो माँ-बाप ऐसे टूटते हैं जैसे उनकी अपनी परीक्षा थी। बेटा अपनी पसन्द से कोई रास्ता चुने, तो लगता है हमारा अपमान हो गया। अनभिष्वङ्ग का अर्थ है: प्रेम पूरा, पर बच्चे का जीवन बच्चे का। हम छाँव दें, पर पेड़ बनकर बच्चे की धूप न रोकें।

और फिर समचित्तत्व: प्रिय और अप्रिय के आने पर सदा एक-सा मन। शंकराचार्य कहते हैं, मनचाहा मिले तो फूलकर न उछलना, अनचाहा आए तो बिगड़ न जाना। मधुसूदन सरस्वती इसे हर्ष और विषाद से खाली मन कहते हैं। और रामानुजाचार्य एक छोटा-सा शब्द जोड़ते हैं: ये प्रिय-अप्रिय हमारे अपने संकल्पों से ही पैदा होते हैं। संत ज्ञानेश्वर कहते हैं, जैसे समुद्र गर्मी में भी उतना ही, बरसात में भी उतना ही; जैसे सूरज सुबह, दोपहर और शाम में तीन नहीं हो जाता, वैसे ही सुख-दुःख में उसका मन नहीं बँटता।

तो आज के लिए तीसरी बात यह निकलती है: जीवन की सीमा को देखना डरना नहीं, जागना है; और घर से प्रेम करना बन्धन नहीं, पर घर वालों के जीवन को अपना जीवन बना लेना बन्धन है। अपनों को अपना मानिए, पर उन्हें अपना बनाकर कैद मत कीजिए।

पर अभी एक बात बाकी है। ज्ञान के इन लक्षणों के ठीक बीच में श्रीकृष्ण अब एक ऐसा शब्द रखने वाले हैं, जिसकी किसी ने उम्मीद नहीं की होगी: भक्ति। ज्ञान की सूची में भक्ति। आइए, सुनते हैं।

मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी । विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥ १० ॥
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अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् । एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥ ११ ॥
गीता 13.11 — अर्थ पढ़ें ›

दसवाँ श्लोक। "मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी", अनन्य योग से मुझमें अटल भक्ति; "विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि", एकान्त स्थान में रहना, और लोगों की भीड़ में रुचि न होना।

सुना आपने? ज्ञान के लक्षणों की सूची चल रही है, मान न चाहना, क्षमा, वैराग्य, समचित्तता, और ठीक बीच में श्रीकृष्ण कहते हैं: मुझमें अटल भक्ति। आज सत्संग की शुरुआत में मधुसूदन सरस्वती का वह श्लोक याद कीजिए, यमुना की रेत पर दौड़ता नीला तेज। ज्ञान का अध्याय भक्ति को बाहर नहीं निकालता, उसे बीच में बिठाता है।

और सबसे सुन्दर बात यह है कि इस श्लोक की सबसे भक्ति भरी व्याख्या शंकराचार्य की है, जिन्हें लोग केवल ज्ञान-मार्ग का आचार्य मानते हैं। वे कहते हैं: भगवान वासुदेव से बढ़कर कोई नहीं है, इसलिए वही हमारी गति हैं; यह पक्का निश्चय ही अनन्य योग है। उस निश्चय के साथ भजना, जो कभी भटके नहीं, वह अव्यभिचारिणी भक्ति है। और फिर वे दो शब्द जोड़ते हैं: "सा च ज्ञानम्", और वह भी ज्ञान है। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, यह भक्ति वह प्रेम है जो भगवान के सबसे ऊँचे होने को जानकर उपजता है, और जिसे कोई भी उल्टी परिस्थिति रोक नहीं सकती। श्रीधर स्वामी इसे एक शब्द में कहते हैं: एकान्त-भक्ति। और संत ज्ञानेश्वर कहते हैं, जैसे गंगा का जल समुद्र में मिलकर भी समुद्र की ओर बहता ही रहता है, वैसे ही ऐसा भक्त उनमें मिलकर भी उन्हें भजता रहता है।

फिर विविक्त देश, यानी एकान्त स्थान। शंकराचार्य बताते हैं कि ऐसा स्थान कैसा हो: अपने स्वभाव से या सँवारकर साफ़-सुथरा, जहाँ साँप-बाघ का डर न हो, जैसे वन, नदी का किनारा, या कोई मन्दिर; क्योंकि ऐसे स्थानों में चित्त प्रसन्न होता है, और तब भीतर की बात सूझती है। हम में से ज़्यादातर लोग जंगल या नदी किनारे नहीं जा सकते। पर घर का एक कोना, सुबह के बीस मिनट, जब फ़ोन दूसरे कमरे में हो, वह भी विविक्त देश है।

और फिर, भीड़ में रुचि न होना। क्या इसका अर्थ है कि लोगों से दूर भागो? आचार्य यहाँ बहुत सावधानी से बोलते हैं। शंकराचार्य कहते हैं, यहाँ उन लोगों की भीड़ का अर्थ है जिनमें न संस्कार है न विनय; संस्कार वाले, विनीत लोगों की संगति तो ज्ञान में मदद करती है। मधुसूदन सरस्वती और साफ़ कहते हैं: जो लोग आत्मज्ञान से मुँह फेरे हुए हैं और विषयों में ही डूबे रहना सिखाते हैं, उनकी भीड़ में रुचि न हो; पर साधुओं की संगति में रुचि तो उचित ही है। और वे एक पुराना वचन याद करते हैं: संग पूरी तरह छोड़ना चाहिए, और अगर न छूटे, तो सज्जनों का संग करो, क्योंकि "सन्तसङ्गो हि भेषजम्", सन्तों का संग ही दवा है। और तिलक याद दिलाते हैं कि इस एक पंक्ति के सहारे कुछ लोगों ने यह कहना चाहा कि गीता संन्यास ही सिखाती है, पर वह ठीक नहीं; यहाँ बात आसक्ति की है, घर-संसार छोड़ने की नहीं। आज की भीड़ केवल बाज़ार में नहीं, जेब में भी रहती है: हर समय बजता फ़ोन, हर ख़बर पर बहस, हर किसी की राय। उसमें रस कम हो जाए, यह भी ज्ञान का एक लक्षण है।

अब ग्यारहवाँ श्लोक, जो इस सूची को पूरा करता है। "अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्", आत्मज्ञान में निरन्तर लगे रहना, और तत्त्वज्ञान के लक्ष्य को सामने रखना; "एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा", यह ज्ञान कहा गया है; जो इसके विपरीत है, वह अज्ञान है।

पहले, आत्मज्ञान में निरन्तरता। आत्मज्ञान कोई एक दिन की परीक्षा नहीं कि पास कर ली और भूल गए। महाभारत में ही इसकी एक बहुत मानवीय गवाही है, जो आपने ग्यारहवें सत्संग में सुनी थी: युद्ध के बाद स्वयं अर्जुन ने, जिन्होंने यह गीता श्रीकृष्ण के मुँह से सुनी थी, उनसे कहा कि आपने मित्रता से जो कहा था, वह मेरे विचलित मन से खो गया। जब अर्जुन से छूट सकता है, तो हमसे क्यों नहीं? इसीलिए "नित्य", रोज़, थोड़ा-थोड़ा।

और फिर, तत्त्वज्ञान का लक्ष्य सामने रखना। हमारी टीका कहती है कि तत्त्वज्ञान का लक्ष्य मुक्ति है, और उसे सामने रखने से बाकी साधनाएँ अपने-आप में लक्ष्य नहीं बन जातीं। यह बहुत बारीक बात है। कोई आदमी विनम्रता का अभ्यास करते-करते अपनी विनम्रता पर ही घमण्ड करने लगे; कोई पूजा-पाठ को ही मंज़िल मान ले। शंकराचार्य कहते हैं, फल पर नज़र रहे, तभी साधन में मन लगता है। संत ज्ञानेश्वर इसे एक चित्र में कहते हैं: अन्धे के हाथ में दीया किस काम का? ज्ञान की रोशनी हो, पर नज़र उस पर न पड़े जो दिखाना था, तो सारा ज्ञान व्यर्थ।

और अन्त में श्रीकृष्ण एक ही वाक्य में उलटी तस्वीर भी दे देते हैं: जो इसके विपरीत है, वह अज्ञान है। शंकराचार्य उसे गिनाते हैं: मान चाहना, दम्भ, हिंसा, अक्षमा, टेढ़ापन; और कहते हैं कि इन्हें इसलिए जानना चाहिए ताकि इनसे बचा जा सके। संत ज्ञानेश्वर अज्ञानी का ऐसा चित्र देते हैं कि हँसी भी आती है और अपना चेहरा भी दिखता है। कुछ मिल जाए तो वह धौंकनी की तरह फूल जाता है, और छिन जाए तो पिचक जाता है; प्रशंसा मिले तो बवंडर की धूल की तरह आकाश तक चढ़ जाता है, और ज़रा-सी निन्दा सुनी तो माथा पकड़कर बैठ जाता है, जैसे बारिश की बूँदों से कीचड़ बैठ जाता है। यह आदमी हम सबने कहीं न कहीं देखा है, और कभी-कभी आईने में भी।

आचार्य इन्हें गिनते भी अलग-अलग हैं। श्रीधर स्वामी, मधुसूदन सरस्वती और नीलकण्ठ इन्हें बीस लक्षण कहते हैं, और संत ज्ञानेश्वर अठारह। गिनती चाहे जो हो, बात एक है: ज्ञान कोई एक गुण नहीं, गुणों की एक पूरी बनावट है। और ज्ञानेश्वर कहते हैं, श्रीकृष्ण ने यह ज्ञान ऐसे साफ़ दिखा दिया, जैसे हथेली पर रखा आँवला।

और इसी के साथ आज की यात्रा अगले मोड़ पर रुकती है। श्रीकृष्ण ने अभी तक बताया कि क्षेत्र क्या है, और ज्ञान कैसा दिखता है। अगले ही श्लोक में वे कहते हैं: "ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते", अब मैं वह बताऊँगा जो जानने योग्य है, जिसे जानकर मनुष्य अमृत पाता है। वह जानने योग्य क्या है, जिसके हाथ-पैर हर ओर हैं, यह अगले सत्संग में।

तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली बात। आप अपने शरीर के साथ हैं, अपने मन के साथ हैं, पर आप केवल शरीर या मन नहीं हैं। जो इन्हें देख रहा है, वह इनसे अलग है, और उसके भीतर भगवान हैं। जिस दिन खेत में मौसम खराब हो, उस दिन खेत के स्वामी को याद कीजिए।

दूसरी बात। ज्ञान किताब में नहीं, स्वभाव में दिखता है: मान न चाहना, दिखावा न करना, किसी को न सताना, क्षमा, सीधापन। और ये सब एक माला के मोती हैं; कर्ण की कथा याद रखिए, एक मोती छूटा, तो पूरी माला काम न आई।

तीसरी बात। जीवन की सीमा को देखिए, डरने के लिए नहीं, जागने के लिए; अपनों से पूरा प्रेम कीजिए, पर उन्हें अपना बनाकर कैद मत कीजिए; और इस सबके बीच, भक्ति को मत छोड़िए। श्रीकृष्ण ने ज्ञान की सूची के बीच में भी भक्ति को रखा है।

आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। इन बीस लक्षणों में से कौन-सा एक है जो आपको अपने भीतर सबसे कम दिखता है, और जिस पर आप इस हफ़्ते काम करना चाहेंगे? और कौन-सा एक है जो आपने किसी अपने में देखा, किसी दादी, माँ, पिता या गुरु में, और जो आपको आज भी याद है? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।

ज्ञान वह नहीं जो आप बोलते हैं। ज्ञान वह है जो आपके पास बैठने वाले को महसूस होता है।

जय श्री कृष्ण।

अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् । आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥ ७ ॥
गीता 13.7 — अर्थ पढ़ें ›

तीन बातें

  1. आप अपने शरीर के साथ हैं, अपने मन के साथ हैं, पर आप केवल शरीर या मन नहीं हैं। जो इन्हें देख रहा है, वह इनसे अलग है, और उसके भीतर भगवान हैं। जिस दिन खेत में मौसम खराब हो, उस दिन खेत के स्वामी को याद कीजिए।
  2. ज्ञान किताब में नहीं, स्वभाव में दिखता है: मान न चाहना, दिखावा न करना, किसी को न सताना, क्षमा, सीधापन। और ये सब एक माला के मोती हैं; कर्ण की कथा याद रखिए, एक मोती छूटा, तो पूरी माला काम न आई।
  3. जीवन की सीमा को देखिए, डरने के लिए नहीं, जागने के लिए; अपनों से पूरा प्रेम कीजिए, पर उन्हें अपना बनाकर कैद मत कीजिए; और इस सबके बीच, भक्ति को मत छोड़िए। श्रीकृष्ण ने ज्ञान की सूची के बीच में भी भक्ति को रखा है।