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सत्संग ३६

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भगवान को प्रिय कौन

गीता 12.13–12.20 · 73 मिनट

प्रिय भक्त के लक्षण

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च । निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी ॥ १३ ॥
गीता 12.13 — अर्थ पढ़ें ›
संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः । मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १४ ॥
गीता 12.14 — अर्थ पढ़ें ›

कभी आपके मन में यह सवाल उठा है कि भगवान को सचमुच कौन प्रिय होता है? वह जो सबसे ज़्यादा पूजा करता है, सबसे बड़ा दान देता है, सबसे लम्बा व्रत रखता है? या कोई और? आज का सवाल यही है: भगवान को प्रिय कौन? और इसका उत्तर कोई और नहीं, श्रीकृष्ण स्वयं दे रहे हैं, अपने मुँह से, एक-एक लक्षण गिनाकर।

जय श्री कृष्ण।

आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का छत्तीसवाँ सत्संग है, और आज बारहवाँ अध्याय पूरा होगा। महाभारत के भीष्म पर्व का छत्तीसवाँ अध्याय ही गीता का बारहवाँ अध्याय है, "भक्तियोग"। और हर बार की तरह याद रखिए, यह सब हमें सञ्जय सुना रहे हैं, हस्तिनापुर के महल में, अन्धे राजा धृतराष्ट्र को, उस दिन जब भीष्म बाणों की शय्या पर गिर चुके हैं। आज की बात इतनी छोटी-सी है कि आठ ही श्लोक हैं, और इतनी बड़ी है कि पूरी ज़िंदगी उसमें समा जाए।

पहले याद कर लें कि पिछली बार हम कहाँ रुके थे। पिछले सत्संग में अर्जुन ने एक बहुत सीधा सवाल पूछा था: जो आपके इस रूप की, साकार रूप की, प्रेम से उपासना करते हैं, और जो अविनाशी, निराकार ब्रह्म की उपासना करते हैं, इन दोनों में योग को अधिक कौन जानता है? और श्रीकृष्ण ने कहा था, "मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते", जो मन को मुझमें लगाकर, सदा जुड़े रहकर, परम श्रद्धा से मुझे भजते हैं, "ते मे युक्ततमा मताः", उन्हें मैं सबसे श्रेष्ठ योगी मानता हूँ। निराकार की राह भी मुझ तक ही पहुँचती है, पर "क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्", जिनका मन अव्यक्त में लगा है, उनकी राह में कष्ट अधिक है, क्योंकि जो अपने को शरीर मानता है, उसके लिए बिना रूप वाले को पकड़ना कठिन है। और फिर वह वचन, जिसके लिए यह अध्याय याद किया जाता है: "तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्", ऐसे भक्तों को मैं स्वयं मृत्यु के इस संसार-सागर से निकालने वाला बन जाता हूँ, और देर से नहीं, "नचिरात्", जल्दी।

और फिर श्रीकृष्ण ने एक सीढ़ी दी थी, जो मुझे पूरी गीता की सबसे दयालु बातों में से एक लगती है। मन मुझमें लगाओ। न लगे, तो बार-बार लौटाने का अभ्यास करो। अभ्यास भी न हो, तो सब काम मेरे लिए करो। और यह भी न हो सके, तो कम से कम अपने कर्मों के फल छोड़ दो। और उस सीढ़ी का आख़िरी पायदान था: "त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्", त्याग से तुरन्त शान्ति मिलती है। यानी पिछली बार श्रीकृष्ण ने बताया कि क्या करें। आज वे बताएँगे कि जो यह सब करते-करते पक जाता है, वह आदमी दिखता कैसा है। उसका स्वभाव कैसा होता है, वह लोगों से कैसे मिलता है, अपमान पर क्या करता है, सुख-दुःख में कैसा रहता है। आज श्रीकृष्ण अपने प्रिय भक्त का चित्र बना रहे हैं।

और एक बात पहले ही बता दूँ, जो हमारी टीका में लिखी है। आज के आठ श्लोकों में पाँच चित्र हैं, और हर चित्र एक ही बात पर ख़त्म होता है: "स मे प्रियः", वह मुझे प्रिय है। आज आप इन तीन शब्दों को बार-बार सुनेंगे। और जब भी सुनें, याद रखिए, यह भगवान किसी दूसरे के बारे में नहीं बोल रहे, किसी दूर के ऋषि के बारे में नहीं। वे उस आदमी का चेहरा बना रहे हैं, जिसे वे प्यार करते हैं। और गीता यह चेहरा हमारे सामने इसलिए रखती है, कि हम भी धीरे-धीरे वैसे बन सकें।

तो अब पहला श्लोक, तेरहवाँ। "अद्वेष्टा सर्वभूतानां", जो किसी भी प्राणी से द्वेष नहीं करता। "मैत्रः करुण एव च", जो सबका मित्र है, और दयालु भी। "निर्ममो निरहंकारः", जिसमें "मेरा" का भाव नहीं, और "मैं" का घमण्ड नहीं। "समदुःखसुखः क्षमी", जो दुःख और सुख में सम है, और क्षमा करने वाला है।

हमारी टीका कहती है कि यह श्लोक और अगला, चौदहवाँ, एक ही वाक्य हैं। यानी तेरहवें में वाक्य पूरा नहीं होता, वह चौदहवें के अन्त में जाकर पूरा होता है, "स मे प्रियः" पर। इसलिए ये दोनों आज एक साथ गाए गए।

अब पहला शब्द देखिए, "अद्वेष्टा"। श्रीकृष्ण ने "प्रेमी" से शुरू नहीं किया। उन्होंने "जो द्वेष नहीं करता" से शुरू किया। क्यों? क्योंकि प्रेम का पहला काम कुछ जोड़ना नहीं, कुछ निकालना है। जैसे किसी बर्तन में दूध डालना हो, तो पहले उसमें पड़ा पुराना, खट्टा पानी फेंकना पड़ता है। मन में किसी के लिए कड़वाहट बैठी हो, तो उसमें भगवान का प्रेम भी खट्टा हो जाता है।

और "सर्वभूतानां", सब प्राणियों से। यह शब्द बहुत भारी है। हम सब बहुत लोगों से द्वेष नहीं करते, यह सच है। पर "सब" से? उस रिश्तेदार से भी, जिसने जायदाद के बँटवारे में धोखा किया? उस साथी से भी, जिसने आपकी मेहनत का श्रेय ले लिया? रामानुजाचार्य यहाँ बहुत गहरी बात कहते हैं। वे कहते हैं, यह भक्त उनसे भी द्वेष नहीं करता जो उससे द्वेष करते हैं और उसका बुरा करते हैं। और वह ऐसा कैसे कर पाता है? वह मन में सोचता है कि ये लोग मेरे ही पिछले कर्मों के अनुसार, भगवान की व्यवस्था से, मेरे सामने आए हैं। इसका मतलब यह नहीं कि वह बुराई को अच्छा कहने लगता है। इसका मतलब यह है कि वह अपनी चोट को किसी के लिए ज़हर नहीं बनने देता।

फिर "मैत्रः करुण एव च"। श्रीधर स्वामी इन तीन शब्दों को तीन तरह के लोगों पर बाँटते हैं, और यह बाँट मुझे बहुत सुंदर लगती है। जो हमसे बड़े हैं, गुणों में, ज्ञान में, उनके लिए "अद्वेष्टा", उनसे जलन नहीं। जो हमारे बराबर हैं, उनके लिए "मैत्रः", उनसे दोस्ती। और जो हमसे नीचे हैं, दुखी हैं, कमज़ोर हैं, उनके लिए "करुण", उन पर दया। ज़रा अपने दिन को इसी नज़र से देखिए। दफ़्तर में जो आपसे ऊपर है, उससे जलन तो नहीं? जो साथ बैठता है, उससे होड़ तो नहीं? और जो घर में काम करने आती है, या सड़क पर सामान बेचता है, उससे बात करते समय आवाज़ में दया है, या रूखापन?

और नीलकण्ठ एक बारीक बात पकड़ते हैं। वे कहते हैं, कोई सोच सकता है कि जो किसी से द्वेष नहीं करता, वह तो बस उदासीन होगा, सबसे कटा हुआ, न किसी से लेना न देना। नहीं, इसीलिए साथ में "मैत्रः" कहा गया। वह सदा मित्र है, कभी भी ठंडा तटस्थ नहीं। और अगर कोई शत्रु बनकर सामने आ जाए, तो? तब "करुण"। नीलकण्ठ लिखते हैं, जो उसे दुःख देता है, उसे भी वह करुणा के कारण चोट नहीं पहुँचाना चाहता, बल्कि उसे बचाना चाहता है।

अब यह बात सुनने में बहुत ऊँची लगती है। तो मैं आपको एक कथा सुनाता हूँ, जो महाभारत के शान्ति पर्व में भीष्म ने युधिष्ठिर को सुनाई थी, उसी शरशय्या से। युधिष्ठिर ने पूछा था कि कृतघ्न और मित्र से द्रोह करने वाले के बारे में बताइए। और भीष्म ने एक बगुले की कथा सुनाई। पर मुझे यह कथा कृतघ्न के लिए नहीं, उस बगुले के लिए याद रहती है।

गौतम नाम का एक आदमी था, जन्म से ब्राह्मण, पर अपना रास्ता छोड़ चुका था, धन के लोभ में भटकता हुआ। समुद्र की ओर जाते एक काफ़िले के साथ चला, रास्ते में एक मतवाले हाथी ने काफ़िले को उजाड़ दिया, और वह डरा हुआ, दिशा भूला, एक सुंदर वन में जा पहुँचा। वहाँ एक बड़े बरगद के नीचे, थका-माँदा, सो गया।

शाम को उस बरगद पर एक बगुला उतरा। साधारण बगुला नहीं। उसका नाम था राजधर्मा, बगुलों का राजा, कश्यप ऋषि का पुत्र और ब्रह्मा का मित्र, सोने के गहनों से चमकता हुआ। और पाठ यहाँ एक वाक्य कहता है जो रोंगटे खड़े कर देता है: भूख-प्यास से घिरे गौतम ने उस पक्षी को देखा, तो मारने की नज़र से देखा।

और राजधर्मा ने क्या कहा? "हे ब्राह्मण, आपका स्वागत है। सौभाग्य से आप मेरे घर पधारे हैं। सूरज डूब गया है, साँझ आ गई है। आप मेरे प्रिय अतिथि हैं, आज रात रुकिए, सुबह जाइए।" उसने साल के फूलों का आसन बिछाया, भोजन जुटाया, आग जलाई, और जब अतिथि खा चुका, तो अपने पंखों से उसे हवा की, ताकि उसकी थकान उतरे। फिर पूछा, आप किस काम से निकले हैं? गौतम ने कहा, मैं निर्धन हूँ, धन के लिए समुद्र जा रहा हूँ। और बगुले ने कहा, "चिन्ता मत कीजिए। धन पाने के चार रास्ते होते हैं: मित्र, विद्या, सोना और बुद्धि। मैं आपका मित्र बनकर आया हूँ।"

सुबह उसने गौतम को अपने मित्र, राक्षसों के राजा विरूपाक्ष के पास भेजा, जो उस दिन, कार्तिक की पूर्णिमा पर, हज़ार ब्राह्मणों को भोजन कराकर रत्न बाँट रहा था। विरूपाक्ष ने सोचा, यह मेरे मित्र का भेजा हुआ है, इसका भला करूँगा। और गौतम सोने का भारी बोझ लेकर लौटा, उसी बरगद के नीचे। राजधर्मा ने फिर उसका स्वागत किया, फिर पंखों से हवा की, और रात को उसकी रक्षा के लिए पास में एक बड़ी आग जला दी, ताकि कोई जंगली जानवर पास न आए। और फिर, पाठ कहता है, वह उसके पास विश्वास से सो गया।

और गौतम जागता रहा। उसने सोचा, रास्ता लम्बा है, खाने को कुछ नहीं, और पास में यह बड़ा पक्षी बैठा है। और उसने सोते हुए अपने मित्र को जलती लकड़ी से मार डाला, और सोना लेकर भाग गया।

अब आगे सुनिए। जब दो साँझ बीत गईं और राजधर्मा नहीं आया, तो विरूपाक्ष बेचैन हो गया, अपने बेटे को भेजा। बरगद के नीचे केवल हड्डियाँ मिलीं। राक्षस गौतम को पकड़ लाए, और विरूपाक्ष ने उसे दण्ड देने का आदेश दिया। फिर विरूपाक्ष ने अपने मित्र का बड़े आदर से दाह-संस्कार करवाया। और कथा कहती है कि कामधेनु सुरभि के मुख से गिरा दूध जैसा झाग हवा में उड़कर उस चिता पर गिरा, इन्द्र आए, और राजधर्मा अमृत से सींचा जाकर फिर जी उठा।

और अब वह वाक्य, जिसके लिए मैंने यह पूरी कथा सुनाई। जी उठते ही राजधर्मा ने इन्द्र से जो पहली बात कही, वह यह थी: "ब्राह्मण गौतम कहाँ है? उसे छोड़ दिया जाए। वह मेरा प्रिय मित्र है।"

सोचिए। जिसने विश्वास से सोते हुए को मारा, उसके लिए जी उठने वाले के मुँह से पहला शब्द "मेरा प्रिय मित्र"। और कथा कहती है कि इन्द्र प्रसन्न हुए, राजधर्मा के कहने पर उन्होंने गौतम को छोड़ दिया, और वह अपने घर लौट गया। भीष्म ने यह कथा कृतघ्नता की निन्दा के लिए सुनाई थी, और वह निन्दा सच है, उस पर कोई पर्दा नहीं। पर इसी कथा के बीच एक ऐसा पक्षी खड़ा है, जिसके बारे में श्रीकृष्ण के शब्द ज्यों के त्यों बैठ जाते हैं: "अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।"

अब इसका यह अर्थ नहीं कि आपको आँख मूँदकर हर किसी पर भरोसा करना है, या जो चोट दे उसके पास बार-बार लौटना है। विरूपाक्ष ने गौतम को पहचान लिया था, और समझदारी से उसे दूर भी रखा जा सकता है। गीता यह नहीं कहती कि अपनी रक्षा मत करो। गीता यह कहती है कि मन में ज़हर मत पालो। दूर रहना एक बात है, और भीतर द्वेष की आग जलाए रखना दूसरी। पहली समझदारी है। दूसरी अपने ही घर में आग है।

अब "निर्ममो निरहंकारः"। "मम" यानी मेरा, "अहम्" यानी मैं। और यहाँ मुझे एक बात कहनी है जो इस पूरी श्रृंखला को एक धागे में बाँध देती है। आपको याद होगा, गीता का पहला श्लोक किस शब्द पर टिका था? धृतराष्ट्र ने पूछा था, "मामकाः पाण्डवाश्चैव", मेरे बेटे और पाण्डु के बेटे। गीता "मेरे" से शुरू हुई थी, एक ऐसे पिता के मुँह से जिसके "मेरे" ने पूरा कुरुक्षेत्र भर दिया। और आज, छत्तीस सत्संगों के बाद, श्रीकृष्ण अपने प्रिय भक्त का पहला लक्षण गिनाते हुए कहते हैं, "निर्ममः", जिसमें "मेरा" नहीं। जिस रोग से गीता शुरू हुई, आज उसकी दवा का नाम आ गया।

विश्वनाथ चक्रवर्ती यहाँ बहुत व्यावहारिक बात कहते हैं। वे पूछते हैं, जो द्वेष करते हैं उन पर भी मित्रता और करुणा कैसे हो? और उत्तर देते हैं: क्योंकि बेटे-पत्नी जैसे सम्बन्धों में उसकी ममता नहीं, और शरीर में अहंकार नहीं, इसलिए उसके मन में द्वेष का पौधा उगता ही नहीं। बात सीधी है। हमारा ज़्यादातर गुस्सा "मेरा" और "मैं" की चोट से ही आता है। मेरी चीज़ छू ली, मेरी बात काट दी, मेरा अपमान हो गया। जितना "मेरा" छोटा होता जाए, उतनी चोट लगने की जगह कम होती जाती है।

और अभिनवगुप्त अहंकार के कुछ रूप गिनाते हैं, जो हम सबके भीतर बैठे हैं: मैं उदार हूँ, मैं तेजस्वी हूँ, मैं सहनशील हूँ। देखिए, "मैं सहनशील हूँ" भी अहंकार है। यानी अपनी अच्छाई का घमण्ड भी इसी गिनती में आता है।

फिर "समदुःखसुखः क्षमी"। श्रीधर स्वामी एक बहुत कोमल अर्थ देते हैं: कृपालु होने के कारण, दूसरों के साथ जिसके सुख और दुःख एक हो गए हों। यानी "सम" का मतलब केवल यह नहीं कि मेरा दुःख आए तो मैं न हिलूँ। इसका एक मतलब यह भी है कि दूसरे का दुःख मुझे अपने जितना लगे। और "क्षमी"। शंकराचार्य कहते हैं, कोई गाली दे या मारे, तब भी वह बिगड़ता नहीं, वैसा ही बना रहता है। और अभिनवगुप्त कहते हैं, क्षमा यानी जिसने अपकार किया, उस शत्रु के प्रति भी द्वेष की बुद्धि का न होना।

अब चौदहवाँ श्लोक, जहाँ यह वाक्य पूरा होता है। "संतुष्टः सततं योगी", जो सदा सन्तुष्ट है, योगी है। "यतात्मा दृढनिश्चयः", जिसने अपने को वश में रखा है, जिसका निश्चय दृढ़ है। "मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः", जिसने अपना मन और अपनी बुद्धि मुझे अर्पित कर दी है, ऐसा मेरा भक्त, वह मुझे प्रिय है।

"संतुष्टः सततं"। शंकराचार्य और मधुसूदन सरस्वती दोनों कहते हैं, शरीर चलाने के लिए जो चाहिए, वह मिले तो भी, न मिले तो भी, उसके मन में "बस, इतना काफ़ी है" का भाव बना रहता है। संत ज्ञानेश्वर इस सन्तोष के लिए समुद्र की उपमा देते हैं: जैसे समुद्र बरसात के बिना भी सदा जल से भरा रहता है, वैसा भरा हुआ, बिना किसी दिखावे के। बरसात आए तो समुद्र उछलता नहीं, न आए तो सूखता नहीं। आपको याद होगा, दूसरे अध्याय के अन्त में भी श्रीकृष्ण ने भरे हुए समुद्र की बात की थी। वही समुद्र आज भक्त के हृदय में आ गया।

फिर "दृढनिश्चयः"। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, ऐसा निश्चय जिसे कुतर्क करने वाले हिला न सकें। और बलदेव विद्याभूषण उस निश्चय को एक वाक्य में कहते हैं: "मैं हरि का सेवक हूँ।" आज के समय में यह शब्द बहुत काम का है। आज हर दिन कोई न कोई आपकी श्रद्धा को हिलाने आता है, फ़ोन पर, बातचीत में, बहस में। दृढ़ निश्चय का मतलब हर बहस जीतना नहीं है। इसका मतलब है कि बहस हार भी जाएँ, तो भीतर का दीया न बुझे।

और आख़िर में, "मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः"। मन, जो सोचता और चाहता है। बुद्धि, जो तय करती है। दोनों भगवान को सौंप दिए। और शंकराचार्य यहाँ एक कड़ी जोड़ते हैं, जो इस पूरे हिस्से की चाबी है। वे कहते हैं, सातवें अध्याय में जो बात इशारे से कही गई थी, वह यहाँ खोलकर कही जा रही है। सातवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने कहा था, "प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः", मैं ज्ञानी को अत्यन्त प्रिय हूँ, और वह मुझे प्रिय है। बाईसवें सत्संग में हमने वह श्लोक सुना था। वहाँ बस इतना कहा गया था, "वह मुझे प्रिय है।" आज श्रीकृष्ण बता रहे हैं कि वह प्रिय आदमी है कैसा।

और संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर पहुँचकर जैसे अपने आप को रोक नहीं पाते। वे श्रीकृष्ण के मुँह से कहलवाते हैं: अर्जुन, ऐसा भक्त ही योगी है, वही मुक्त है, और वह मुझे ऐसा प्यारा है जैसे प्रिय पत्नी को उसका पति। फिर कहते हैं, नहीं, यह उपमा भी छोटी है, वह मुझे अपने प्राणों के बराबर प्यारा है। और फिर ज्ञानेश्वर के श्रीकृष्ण एक बहुत मानवीय बात कहते हैं: प्रिय की बात हो, ऊपर से सुनने वाला भी प्रेमी हो, तो बात की मिठास दुगनी हो जाती है। अर्जुन, तुम ही प्रिय हो और तुम ही सुनने वाले। और ज्ञानेश्वर लिखते हैं, यह कहते-कहते भगवान डोलने लगे।

तो पहला चित्र पूरा हुआ: द्वेष से खाली, मित्रता और दया से भरा, "मेरा" और "मैं" से हल्का, क्षमा करने वाला, सन्तुष्ट, और जिसका मन-बुद्धि भगवान के पास रखे हुए हैं। पर अभी एक बात बाकी है। अब तक हमने देखा कि यह भक्त दूसरों को कैसे देखता है। अगला श्लोक कुछ और पूछता है: दूसरे लोग उसे कैसे पाते हैं? उसके पास आकर उन्हें कैसा लगता है? और जब दुनिया उसे परेशान करने आए, तब वह कैसा रहता है?

यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः । हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥ १५ ॥
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अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः । सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १६ ॥
गीता 12.16 — अर्थ पढ़ें ›

और अब, इससे पहले कि हम इन दो श्लोकों में उतरें, एक छोटी-सी बात आपसे कहना चाहता हूँ। श्रीकृष्ण आज पाँच चित्र बना रहे हैं, और अभी हमने केवल पहला देखा है। आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। जो आदमी आज केवल "अद्वेष्टा" और "क्षमी" सुनकर उठ जाए, वह सोच सकता है कि भगवान का भक्त बस चुपचाप सहने वाला, दबा हुआ आदमी होता है। जबकि अगले ही श्लोक में श्रीकृष्ण कहेंगे "दक्ष", कुशल, और आख़िरी श्लोक में वह बात आएगी जो हम जैसे अधूरे लोगों के लिए सबसे बड़ा भरोसा है। तो अगर आप यह सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की यह यात्रा बीच में न छूटे। और आज का यह सत्संग आख़िर तक सुनिए।

अब पंद्रहवाँ श्लोक। "यस्मान्नोद्विजते लोको", जिससे संसार उद्विग्न नहीं होता, घबराता नहीं, "लोकान्नोद्विजते च यः", और जो संसार से उद्विग्न नहीं होता। "हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः", जो हर्ष, अमर्ष, भय और उद्वेग से छूट चुका है, "स च मे प्रियः", वह भी मुझे प्रिय है।

यह श्लोक मुझे इस पूरे अध्याय का सबसे व्यावहारिक श्लोक लगता है, क्योंकि इसकी जाँच हर घर में रोज़ होती है। पहला हिस्सा: जिससे लोग नहीं घबराते। ज़रा सोचिए, जब आप घर लौटते हैं और दरवाज़े की घंटी बजती है, तो भीतर बैठे लोगों के मन में क्या आता है? चैन, या "अब क्या होगा"? दफ़्तर में जब आप कमरे में आते हैं, तो लोग खुलकर साँस लेते हैं, या सँभलकर बैठ जाते हैं? यह श्लोक आपकी पूजा का नहीं, आपकी उपस्थिति का हिसाब माँगता है।

रामानुजाचार्य इसे सीधे कहते हैं: वह कोई ऐसा काम करता ही नहीं जिससे दूसरों को उद्वेग हो। और दूसरा हिस्सा, कि वह दुनिया से भी नहीं घबराता, उसके बारे में वे कहते हैं: क्योंकि उसने तय कर लिया है कि उसका किसी से विरोध नहीं, इसलिए लोग भी उसके साथ ऐसा काम नहीं करते। पर मधुसूदन सरस्वती इसमें एक और रंग जोड़ते हैं, जो ज़्यादा सच्चा लगता है। वे कहते हैं, दुनिया में ऐसे दुष्ट लोग भी होते हैं जिनका एक ही व्रत है, बिना कारण दूसरों को सताना। वह भक्त उनसे भी नहीं घबराता। क्योंकि वह क्षमाशील है, बहुत करुणा वाला है। यानी दुनिया उसे परेशान न करे, यह ज़रूरी नहीं। परेशान करे, तब भी भीतर कुछ नहीं हिलता।

संत ज्ञानेश्वर यहाँ समुद्र और मछलियों की उपमा देते हैं। समुद्र में मछलियों को डर नहीं लगता, और मछलियों से समुद्र ऊबता नहीं। और फिर वे कहते हैं, जैसे शरीर अपने ही अंगों से नहीं थकता, वैसे वह जीवों से नहीं थकता, क्योंकि सारा जगत ही उसका शरीर हो गया है।

अब चार शब्द: हर्ष, अमर्ष, भय, उद्वेग। शंकराचार्य हर्ष की पहचान बताते हैं: मनचाही चीज़ मिलने पर मन का उछलना, जिसके निशान हैं रोंगटे खड़े होना, आँसू आ जाना। "अमर्ष" शब्द आज कम सुनाई देता है, पर उसकी चीज़ बहुत सुनाई देती है। हमारी टीका कहती है, अमर्ष यानी दूसरे का भला देखकर होने वाली जलन। श्रीधर स्वामी भी यही कहते हैं: दूसरे के लाभ को सह न पाना। पड़ोसी ने नई गाड़ी ले ली, रिश्तेदार का बेटा विदेश चला गया, साथ वाले की तरक़्क़ी हो गई, और मन में एक छोटी-सी चुभन। वही अमर्ष है। फिर भय, यानी त्रास। और उद्वेग, जिसके लिए मधुसूदन सरस्वती एक बहुत सच्चा उदाहरण देते हैं: वह बेचैनी कि "मैं अकेला, बिना किसी सहारे के, कैसे जिऊँगा?" बलदेव विद्याभूषण भी लगभग यही कहते हैं: "बिना कमाई के मेरा जीवन कैसे चलेगा?" आज रात बहुत लोग इसी सवाल के साथ सोएँगे।

और अब वह बात जो मुझे इस श्लोक में सबसे सुंदर लगती है। श्रीकृष्ण ने कहा "मुक्तः", इनसे छूटा हुआ। मधुसूदन सरस्वती, नीलकण्ठ और बलदेव तीनों एक बात कहते हैं: ये भाव उसे अपने आप छोड़कर चले गए। वह इन्हें छोड़ने के लिए लड़ता नहीं बैठा। जैसे सुबह होने पर अँधेरे को धक्का देकर निकालना नहीं पड़ता। रोशनी आती है, अँधेरा अपने आप चला जाता है।

अब एक कथा, जो महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्म ने युधिष्ठिर को सुनाई। भार्गव ऋषि च्यवन, बड़े तपस्वी, एक दिन राजा कुशिक के पास पहुँचे और बोले, "मैं तुम्हारे साथ रहना चाहता हूँ।" राजा और रानी ने आसन दिया, पैर धोए, मधुपर्क दिया, और राजा बोला, "भगवन्, यह राज्य, यह धन, यह घर आपका है। हम दोनों आपके सेवक हैं।" च्यवन बोले, "मुझे न राज्य चाहिए, न धन। बस तुम दोनों बिना शंका के मेरी सेवा करो।"

और फिर परीक्षा शुरू हुई। भोजन माँगा, फिर सोने गए, और कहा, "मुझे जगाना मत, मेरे पाँव दबाते रहना।" और वे एक ही करवट इक्कीस दिन सोए। राजा और रानी बिना भोजन के, पाठ कहता है, प्रसन्न होकर, पाँव दबाते रहे। ऋषि उठे, एक शब्द कहे बिना बाहर निकले, और उनकी आँखों के सामने अन्तर्धान हो गए। लौटकर देखा, तो फिर उसी शय्या पर सोए हुए हैं, और फिर इक्कीस दिन। फिर कहा, तेल मलो, स्नान करूँगा, और स्नान की सारी तैयारी छोड़कर फिर गायब। फिर भोजन मँगवाया, हर तरह के पकवान, फल, मिठाइयाँ, और सब कुछ ढेर करके आग लगा दी। और पाठ हर बार एक ही बात दोहराता है: उन पति-पत्नी ने कोई असूया नहीं की, क्रोध नहीं किया, कोई विकार नहीं दिखाया।

फिर कहा, युद्ध का रथ जोतो। और राजा ने घोड़ों की जगह रानी को बाईं ओर और अपने को दाईं ओर जोत दिया। ऋषि ने रथ पर बैठकर रास्ते भर धन लुटाया, और नुकीले चाबुक से उन्हें चलाया। नगर के लोग शोक से व्याकुल होकर देखते रहे और आपस में कहने लगे, "राजा और रानी का धैर्य तो देखो।" और भीष्म एक छोटा-सा वाक्य कहते हैं, जो इस श्लोक के "दक्ष" शब्द की सबसे अच्छी व्याख्या है: राजभवन में हर तरह का भोजन, शय्याएँ, स्नान की सामग्री, सब पहले से तैयार रहता था, इसलिए च्यवन को कोई छिद्र नहीं मिला।

अन्त में च्यवन ने अपने हाथों से उनके घावों को छुआ, और दोनों पहले से भी सुंदर, जवान और स्वस्थ हो गए। अगले दिन उन्होंने गंगा के किनारे सोने का एक अद्भुत वन रचकर दिखाया, जैसे स्वर्ग का एक टुकड़ा। और फिर कारण बताया: मैं तुम्हारे कुल को जलाने आया था, पर तुम्हारे घर में मुझे तुम्हारा कोई दोष नहीं मिला। "तुम दोनों के मन में ज़रा-सा भी क्रोध नहीं हुआ, इसी से मैं प्रसन्न हूँ।" और वर दिया कि इसी कुल में आगे विश्वामित्र जैसा तपस्वी जन्मेगा।

अब मैं इस कथा पर एक बात बहुत साफ़ कहना चाहता हूँ। यह एक तपस्वी की, अपने समय की, एक अनोखी परीक्षा की कथा है, और पाठ ख़ुद मानता है कि राजा के मन में ऋषि के शाप का डर भी था। इसका यह मतलब बिलकुल नहीं कि आपके घर में कोई आपको चोट पहुँचाए और आप चुपचाप सहते रहें, उसे गीता का धर्म समझकर। गीता का "क्षमी" अपने को मिटने देना नहीं है। इस कथा से जो लेना है, वह इतना है: आदमी के भीतर इतनी गहरी शान्ति हो सकती है कि बाहर का तूफ़ान भीतर तक न पहुँचे। हम उस ऊँचाई पर न भी हों, तो भी यह जानना अच्छा है कि वह ऊँचाई है।

अब सोलहवाँ श्लोक। "अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः", जिसे किसी चीज़ की आकांक्षा नहीं, जो पवित्र है, कुशल है, पक्षपात से दूर है, जिसकी व्यथा चली गई है। "सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः", जिसने सब आरम्भों को छोड़ दिया है, ऐसा मेरा भक्त मुझे प्रिय है।

"शुचिः", पवित्र। शंकराचार्य कहते हैं, बाहर से भी और भीतर से भी। और संत ज्ञानेश्वर इस शब्द पर एक अद्भुत बात कहते हैं। काशी मोक्ष देती है, पर उसके लिए शरीर छोड़ना पड़ता है। गंगा पाप धो देती है, पर उसमें डूबने का डर भी है। पर सन्त की पवित्रता ऐसी है कि उसमें डूबना नहीं, और जीते-जी मोक्ष।

फिर "दक्ष", कुशल। यह शब्द उन सबके लिए है जो सोचते हैं कि भक्त होने का मतलब है ढीला-ढाला होना। शंकराचार्य कहते हैं, जो काम सामने आ जाए उसे तुरन्त और ठीक-ठीक समझकर करने में समर्थ। और श्रीधर स्वामी एक शब्द में कहते हैं, "अनलसः", जो आलसी नहीं। कुशिक के महल में च्यवन को कोई छिद्र नहीं मिला। भक्ति और कुशलता दुश्मन नहीं हैं।

फिर "उदासीनो"। हमारी टीका यहाँ सावधान करती है: उदासीन का अर्थ है किसी का पक्ष न लेना, दूसरों के प्रति रूखापन नहीं। जैसे एक अच्छा पंच, जो दोनों पक्षों को एक नज़र से सुनता है। और "गतव्यथः" पर मधुसूदन सरस्वती एक बारीक भेद बताते हैं। "क्षमी" वह है जिसे चोट लगे, फिर भी वह बदला न ले। "गतव्यथ" वह है जिसे चोट के कारण सामने हों, तब भी पीड़ा उठे ही नहीं। पहला पहली सीढ़ी है, दूसरा बहुत ऊपर की।

और अन्त में "सर्वारम्भपरित्यागी"। अगर कोई इसका सीधा अर्थ करे, कि सब काम शुरू करना छोड़ दो, तो गृहस्थ का जीवन वहीं रुक जाए। हमारी टीका साफ़ कहती है: छोड़ने वाले आरम्भ वे हैं, जो अपने लाभ की कामना से शुरू किए जाते हैं। और तिलक इस पर ज़ोर देकर कहते हैं कि यहाँ सारे कर्म छोड़ने का अर्थ लेना ठीक नहीं; इसका अर्थ वही है जो चौथे अध्याय में कहा गया, "यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः", जिसके सब काम कामना और स्वार्थ के संकल्प से खाली हैं। यानी काम चलता रहे, बस उसके पीछे की "मुझे क्या मिलेगा" वाली खींचतान ढीली पड़ जाए।

तो दूसरा और तीसरा चित्र भी पूरा हुआ: जिससे लोग नहीं घबराते, जो लोगों से नहीं घबराता, जलन और डर जिसे छोड़ गए, जो पवित्र भी है और कुशल भी। पर अभी एक बात बाकी है। अगले श्लोक में श्रीकृष्ण कुछ ऐसी बातें फिर से कहेंगे, जो वे पहले कह चुके हैं। भगवान अपनी बात क्यों दोहराते हैं? और अगले श्लोक में एक शब्द है जो सुनने में अजीब लगता है: शुभ को भी छोड़ देना। शुभ को क्यों छोड़ें?

यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति । शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ॥ १७ ॥
गीता 12.17 — अर्थ पढ़ें ›
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः । शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥ १८ ॥
गीता 12.18 — अर्थ पढ़ें ›

सत्रहवाँ श्लोक। "यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति", जो न हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है। "शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः", जिसने शुभ और अशुभ दोनों को छोड़ दिया है, और जो भक्ति से भरा है, वह मुझे प्रिय है।

चार "न" हैं, और शंकराचार्य इन्हें चार मौक़ों पर बाँट देते हैं, जो हम सबकी ज़िंदगी के चार कोने हैं। मनचाहा मिल गया, तो उछलना नहीं। अनचाहा आ गया, तो चिढ़ना नहीं। जो प्यारा था वह छिन गया, तो शोक में डूबना नहीं। और जो मिला नहीं, उसके लिए तरसना नहीं। मिलना, न चाहा मिलना, खोना, और न मिलना। इन चार के सिवा ज़िंदगी में और होता भी क्या है?

और इनमें आख़िरी, "न काङ्क्षति", शायद आज के समय में सबसे कठिन है। हमारे चारों ओर हर चीज़ हमें यही सिखाती है कि अभी जो है वह कम है: एक और चीज़, एक और तरक़्क़ी, एक और बड़ा घर। भक्त भी मेहनत करता है, आगे बढ़ता है; पर जो नहीं मिला, उसकी तड़प में जो मिला हुआ है उसका सुख नहीं खोता। चाह का होना एक बात है, और चाह का आपको चलाना दूसरी।

और यहाँ एक सवाल उठता है, जो शायद आपके मन में भी आया हो। "न द्वेष्टि" तो तेरहवें श्लोक में "अद्वेष्टा" कहकर आ चुका। सुख-दुःख में सम होना भी आ चुका। भगवान बात दोहरा क्यों रहे हैं? मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, यह श्लोक पहले कही बातों का खुलासा है: "समदुःखसुखः" का अर्थ यहाँ खोला गया। पर विश्वनाथ चक्रवर्ती और बलदेव विद्याभूषण एक बहुत प्यारी बात कहते हैं: कुछ गुण फिर से इसलिए कहे गए, ताकि पता चले कि वे कितने दुर्लभ हैं। जैसे माँ बच्चे को घर से निकलते समय वही बात दो बार कहती है, "ध्यान से जाना"। इसलिए नहीं कि बच्चा पहली बार में समझा नहीं, इसलिए कि बात ज़रूरी है।

अब "शुभाशुभपरित्यागी"। सुनते ही मन अटकता है: अशुभ छोड़ना तो ठीक, शुभ क्यों छोड़ें? क्या भक्त अच्छे काम करना भी छोड़ देता है? नहीं। हमारी टीका कहती है, शुभ और अशुभ का अर्थ है फल के लिए किए जाने वाले दोनों प्रकार के कर्म, पुण्य और पाप। वह किसी से नहीं बँधता। और रामानुजाचार्य इसका कारण देते हैं: पाप की तरह पुण्य भी बाँधने वाला है। लोहे की ज़ंजीर भी ज़ंजीर है, सोने की ज़ंजीर भी। भक्त अच्छा काम करता है, बहुत करता है, पर उसके बदले स्वर्ग का टिकट, नाम, या किसी पर एहसान का हिसाब नहीं रखता। वह अच्छाई करता है और भूल जाता है।

शान्ति पर्व में भीष्म युधिष्ठिर को एक ब्राह्मण की बात सुनाते हैं, जिसका नाम था शम्याक। युधिष्ठिर ने पूछा था कि धनी और निर्धन, दोनों के पास सुख-दुःख कैसे आते हैं। भीष्म कहते हैं, यह शम्याक ने मुझसे कहा था, हस्तिनापुर में, बहुत पहले। एक ब्राह्मण, जिसने त्याग अपनाया था, फटे कपड़ों में, भूख से जूझता हुआ। और उसने जो कहा, वह सत्रहवें श्लोक का जैसे सीधा अनुवाद है: "संसार में जन्मे आदमी के पास जन्म से ही दुःख भी आते हैं और सुख भी। दोनों रास्तों में वह चले जो शान्ति तक ले जाए: सुख पाकर हर्षित न हो, और दुःख पाकर न जले।"

फिर शम्याक कहता है, जिसके पास कुछ नहीं, वह सुख से सोता है और सुख से उठता है। और वह एक तस्वीर देता है जो भुलाई नहीं जाती: उसे न आग से डर, न सूरज से, न चोर से, क्योंकि उसका धन छीना ही नहीं जा सकता। और अन्त में वह कहता है, संसार का नियम समझो, कि जो टिका दिखता है वह भी बदलने वाली चीज़ों के साथ ही चल रहा है। "बिना छोड़े आदमी सुख नहीं पाता, बिना छोड़े निर्भय होकर नहीं सोता।"

अब आप कहेंगे, मैं तो गृहस्थ हूँ, सब छोड़कर फटे कपड़ों में तो नहीं घूम सकता। और गीता आपसे यह माँग भी नहीं रही। शम्याक की बात का सार है वह "छोड़ना" जो भीतर होता है: चीज़ें रहें, पर उनकी पकड़ ढीली हो। रात को सोने से पहले जिस चिन्ता को आप बार-बार उलटते-पलटते हैं, उसे भगवान के हाथ में रखकर सोना भी एक छोटा-सा त्याग है। और उसके बाद की नींद, शम्याक की भाषा में, सुख की नींद है।

संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर सूरज की उपमा देते हैं: जैसे सूरज के लिए रात और दिन होते ही नहीं। सूरज कभी डूबता नहीं, धरती घूमती है। भक्त के भीतर का सूरज भी वैसा ही है। बाहर रात-दिन बदलते हैं, भीतर रोशनी वही रहती है।

अब अठारहवाँ श्लोक, जो अगले श्लोक के साथ मिलकर एक वाक्य बनाता है, हमारी टीका यही कहती है। "समः शत्रौ च मित्रे च", जो शत्रु और मित्र में सम है, "तथा मानापमानयोः", और मान और अपमान में भी। "शीतोष्णसुखदुःखेषु समः", सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख में सम, "सङ्गविवर्जितः", और आसक्ति से रहित।

"समः शत्रौ च मित्रे च"। आज के सत्संग की पहली कथा याद कीजिए। राजधर्मा के लिए मित्र कौन था और शत्रु कौन? जिसे उसने पंखों से हवा की, वही उसका हत्यारा निकला, और फिर भी उसके मुँह से निकला "मेरा प्रिय मित्र"। और अठारहवें सत्संग में आपने द्वैतवन की वह घटना सुनी थी, जब गन्धर्वों ने दुर्योधन को बाँध लिया, और युधिष्ठिर ने भीम से कहा था, "आपस के झगड़े में हम पाँच हैं और वे सौ, पर जब पराए अपमान करें, तब हम एक सौ पाँच हैं।" जो आदमी पाण्डवों को छाल के कपड़ों में देखकर हँसने आया था, उसी को छुड़ाने के लिए युधिष्ठिर ने अपने भाई भेजे।

और संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर उपमाओं की ऐसी झड़ी लगाते हैं कि मैं उनमें से तीन आपके साथ रखना चाहता हूँ। पहली: दीपक। दीपक यह नहीं जानता कि घर वालों के लिए रोशनी करूँ और पराए के लिए अँधेरा। दूसरी: पेड़। जो उसे काटने के लिए कुल्हाड़ी चलाता है, और जिसने उसे लगाया था, दोनों को वह एक जैसी छाया देता है। और तीसरी: गन्ना। जो उसे पालता है उसके लिए मीठा, और जो उसे कोल्हू में पेरता है, उसके लिए भी कड़वा नहीं होता। और फिर ज्ञानेश्वर कहते हैं, जैसे चाँदनी राजा और भिखारी दोनों पर एक-सी मीठी पड़ती है, वैसा वह सब प्राणियों के लिए सम है।

"मानापमानयोः"। शंकराचार्य दो शब्द देते हैं: पूजा और तिरस्कार। जिसकी आरती उतारी जाए, और जिसे धक्का देकर निकाला जाए। हमारे घरों में मान-अपमान सबसे ज़्यादा कहाँ चुभता है, आप जानते हैं। शादी-ब्याह में किसे पहले बुलाया, किसे बाद में, किसके नाम का कार्ड पहले आया, किसे मंच पर जगह मिली और किसे नहीं। कई परिवारों में बरसों की बोलचाल इसी पर टूट जाती है कि एक शादी में किसी को ठीक से पूछा नहीं गया। भक्त को भी यह सब दिखता है, वह अन्धा नहीं। बस उसके भीतर यह हिसाब जमा नहीं होता कि कौन मुझे कितना मानता है।

और "शीतोष्ण", सर्दी और गर्मी। आपको याद होगा, दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण ने यही शब्द पहली बार कहे थे: "मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः", इन्द्रियों और विषयों का मेल सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख देता है, "आगमापायिनोऽनित्याः", ये आते-जाते हैं, टिकते नहीं। वहाँ यह एक सलाह थी, "तांस्तितिक्षस्व भारत", इन्हें सहो। यहाँ, बारहवें अध्याय में, वही सलाह किसी के स्वभाव में उतर चुकी है। ज्ञानेश्वर कहते हैं, जैसे आकाश तीनों ऋतुओं में एक-सा रहता है। और जैसे मेरु पर्वत दक्षिण और उत्तर की हवाओं में नहीं डोलता।

और आख़िर में, "सङ्गविवर्जितः"। नीलकण्ठ इसे एक वाक्य में खोल देते हैं: जो आसक्त है, वही व्यथित होता है, जो आसक्ति से छूट गया, वह नहीं। ज़रा सोचिए, आपको सबसे ज़्यादा चोट किसकी बात से लगती है? किसी अजनबी की बात से, या अपने किसी बहुत क़रीबी की? जहाँ पकड़ गहरी है, वहीं चोट भी गहरी है। सङ्ग छोड़ने का अर्थ प्रेम छोड़ना नहीं; उस पकड़ को छोड़ना है जो कहती है, "तुम्हें वैसा ही होना पड़ेगा जैसा मैं चाहूँ।"

पर अभी एक बात बाकी है। यह वाक्य अभी अधूरा है। मान-अपमान की बात शुरू हुई है, पर अगले श्लोक में श्रीकृष्ण उसे एक क़दम और आगे ले जाते हैं: निन्दा और स्तुति। और वहाँ दो ऐसे शब्द हैं जिन पर आचार्यों में सबसे ज़्यादा चर्चा हुई है: "मौनी" और "अनिकेतः", जिसका कोई घर नहीं। तो क्या भगवान को प्रिय होने के लिए घर छोड़ना पड़ेगा?

तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी संतुष्टो येन केनचित् । अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥ १९ ॥
गीता 12.19 — अर्थ पढ़ें ›

उन्नीसवाँ श्लोक, जहाँ पिछला वाक्य पूरा होता है। "तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी", जिसके लिए निन्दा और स्तुति बराबर हैं, जो मौन रहने वाला है, "संतुष्टो येन केनचित्", जो कुछ मिल जाए उसी में सन्तुष्ट, "अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः", जो किसी घर से बँधा नहीं, जिसकी बुद्धि स्थिर है, भक्ति से भरा ऐसा मनुष्य मुझे प्रिय है।

एक शब्द पर ध्यान दीजिए: "नरः", मनुष्य। अब तक हर चित्र "भक्त" पर ख़त्म होता था। यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं, ऐसा "मनुष्य"। जैसे याद दिला रहे हों कि ये सब लक्षण किसी देवता के नहीं, हाड़-माँस के आदमी के हैं। यह ऊँचाई मनुष्य की पहुँच में है।

अब "तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी" का पहला हिस्सा, निन्दा और स्तुति में बराबरी। मधुसूदन सरस्वती दोनों का अर्थ देते हैं: निन्दा यानी दोष गिनाना, स्तुति यानी गुण गिनाना। और दोनों बराबर इसलिए हैं, कि दोनों ही मन में दुःख या सुख की लहर उठा सकती हैं, और उसके मन में दोनों नहीं उठातीं। और देखिए, कठिन क्या है? निन्दा सहना कठिन है, यह सब मानते हैं। पर तारीफ़ में न बहना, यह शायद और कठिन है। निन्दा की चोट दिखती है; तारीफ़ का नशा दिखता भी नहीं।

शान्ति पर्व में युधिष्ठिर भीष्म से एक बहुत आज का-सा सवाल पूछते हैं: "पितामह, अगर भरी सभा में कोई ढीठ, कठोर आदमी किसी समझदार और कोमल स्वभाव वाले को गाली दे, तो वह क्या करे?" और भीष्म कहते हैं, समझदार आदमी छोटी बुद्धि वाले की कठोर बातें सह लेता है। वह प्रशंसा करे या निन्दा, क्या कर लेगा? वन में बेसमझ कौए की तरह वह बस काँव-काँव करता है। फिर कहते हैं, वह बार-बार उलटा जवाब दे, तो सुनकर दुखी मत होना। और अन्त में: जो सभा में दुष्टों की गाली सह लेता है और इस बात को याद रखता है, उसे वाणी से कभी डर नहीं लगता।

आज सभा बहुत बड़ी हो गई है। आज भरी सभा फ़ोन की स्क्रीन पर है, जहाँ कोई अजनबी आपके एक वाक्य पर दस बातें लिख देता है, और कोई दूसरा आपकी तारीफ़ के पुल बाँध देता है। भीष्म की सीख वहाँ भी उतनी ही काम की है: वन का कौआ अपनी आदत से बोलता है। हर काँव-काँव का उत्तर देना ज़रूरी नहीं।

अब "मौनी"। हमारी टीका दो अर्थ बताती है: कुछ आचार्य इसका अर्थ लेते हैं कम और संयम से बोलना, दूसरे, भगवान का शान्त मनन करने वाला। शंकराचार्य और श्रीधर स्वामी पहला अर्थ लेते हैं, "संयतवाक्", जिसकी वाणी वश में है। बलदेव विद्याभूषण दोनों अर्थ साथ रखते हैं। और मधुसूदन सरस्वती एक ज़रूरी बात जोड़ते हैं: इसका अर्थ यह नहीं कि वह बोलता ही नहीं, जीवन चलाने के लिए जितना बोलना ज़रूरी है, वह बोलता है। संत ज्ञानेश्वर इसे सबसे सुंदर ढंग से कहते हैं: वह बोलता भी है, फिर भी न बोलने वाला, मौनी हो गया। यानी शब्द बाहर निकलते हैं, पर भीतर की चुप्पी नहीं टूटती।

फिर "संतुष्टो येन केनचित्"। शंकराचार्य यहाँ महाभारत के ही शान्ति पर्व की एक पंक्ति का हवाला देते हैं, जिसका भाव है: जो किसी भी चीज़ से तन ढक ले, जो कुछ भी मिल जाए खा ले, जहाँ जगह मिले सो जाए, उसे देवता ब्राह्मण जानते हैं। और मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, अपने किसी विशेष प्रयत्न के बिना, जो उसके कर्मों के अनुसार सामने आ जाए, उसी से सन्तुष्ट।

और अब वह शब्द, जिस पर आचार्य सचमुच दो राहों पर चले हैं: "अनिकेतः"। निकेत यानी घर, ठिकाना। शंकराचार्य और नीलकण्ठ इसे संन्यासी का लक्षण मानते हैं, जिसका कोई निश्चित निवास नहीं; नीलकण्ठ तो कहते हैं, वह रहने के लिए एक कुटिया भी नहीं बनाता। पर तिलक इस पर बहुत ज़ोर से बोलते हैं। वे कहते हैं, गीता का स्थिर सिद्धान्त है कि केवल फल की आशा छोड़नी है, कर्म नहीं। इसलिए "अनिकेत" का अर्थ घर छोड़ने वाला नहीं, बल्कि वह, जिसका मन घर-गृहस्थी में फँसा नहीं। और वे चौथे अध्याय का एक शब्द याद दिलाते हैं: "नित्यतृप्तो निराश्रयः", जो फल की आसक्ति छोड़कर सदा तृप्त है, किसी सहारे पर टिका नहीं, और फिर भी काम में पूरी तरह लगा है। हमारी टीका भी यही बीच की राह लेती है: अनिकेत यानी किसी घर को अपना मानकर उससे न बँधना। और रामानुजाचार्य कहते हैं, उसकी बुद्धि आत्मा में स्थिर है, इसलिए घर-ठिकानों में आसक्त नहीं।

तो दोनों परम्पराएँ अपनी जगह पूरी श्रद्धा से खड़ी हैं। संन्यासी के लिए यह शब्द सचमुच बिना घर का जीवन है, और गृहस्थ के लिए वह घर, जिसमें वह रहता है, पर जो उसमें नहीं रहता। संत ज्ञानेश्वर दोनों को एक उपमा में मिला देते हैं: जैसे हवा का किसी एक जगह डेरा नहीं होता, फिर भी सारा आकाश उसका घर है। और फिर वह पंक्ति, जो मुझे इस शब्द की सबसे सुंदर व्याख्या लगती है: "यह सारा विश्व ही मेरा घर है", ऐसी जिसकी बुद्धि स्थिर हो गई। जिसका एक घर छूट गया, उसके लिए हर घर अपना हो गया।

फिर, जिसकी बुद्धि स्थिर है। "स्थिर बुद्धि", यह सुनकर आपको कुछ याद आया? दूसरे अध्याय के अन्त में अर्जुन ने पूछा था, स्थिर बुद्धि वाला आदमी कैसा होता है, कैसे बोलता है, कैसे बैठता है, कैसे चलता है। और श्रीकृष्ण ने कहा था, "दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः", जो दुःख में घबराता नहीं, सुख की लालसा नहीं रखता, "वीतरागभयक्रोधः", जिसका राग, भय और क्रोध चला गया। मधुसूदन सरस्वती साफ़ कहते हैं कि यही बात पहले स्थितप्रज्ञ के लक्षणों के रूप में कही जा चुकी है। यानी दूसरे अध्याय का स्थितप्रज्ञ और बारहवें अध्याय का प्रिय भक्त दो अलग आदमी नहीं हैं। वहाँ उसे ज्ञान की आँख से देखा गया था, यहाँ प्रेम की आँख से। वहाँ श्रीकृष्ण ने कहा था "उसकी बुद्धि स्थिर है", यहाँ कहते हैं "वह मुझे प्रिय है"। एक ही चेहरा, दो खिड़कियों से।

और फिर "भक्तिमान्"। मधुसूदन सरस्वती एक बात पकड़ते हैं जो आज के इन श्लोकों में आपने भी सुनी होगी: "भक्तिमान्" सत्रहवें में आया, यहाँ फिर आया, और "मद्भक्तः" उससे पहले बार-बार। वे कहते हैं, भक्ति का यह बार-बार लेना इसलिए है, कि यह बात पक्की हो जाए: मोक्ष का पूरा कारण भक्ति ही है।

और अब संत ज्ञानेश्वर, जो इस श्लोक पर पहुँचकर भगवान के मुँह से ऐसी बातें कहलवाते हैं कि सुनने वाले की आँखें भर आएँ। श्रीकृष्ण कहते हैं: ऐसे भक्त को मैं अपने सिर पर मुकुट बनाकर रखता हूँ। उसकी एड़ी को मैं अपने हृदय पर धारण करता हूँ। उसे देखने की चाह में मुझ आँखों से परे को आँखें मिलीं। उसे गले लगाने के लिए मैं दो भुजाओं पर दो भुजाएँ और लेकर आया। और उसके संग के सुख के लिए, मुझ बिना देह वाले को देह धारण करनी पड़ी।

सोचिए। हम सोचते थे भक्त भगवान को ढूँढता है। ज्ञानेश्वर कहते हैं, भगवान भी अपने भक्त को देखने के लिए रूप लेकर आते हैं। ग्यारहवें अध्याय में अर्जुन ने चतुर्भुज रूप माँगा था। ज्ञानेश्वर के शब्दों में, वे चार भुजाएँ इसी भक्त को गले लगाने के लिए हैं।

पर अभी एक बात बाकी है। और यह बात इस पूरे सत्संग की, और शायद इस पूरे अध्याय की, सबसे बड़ी बात है। अब तक हमने जो सुना, वह एक बहुत ऊँचे आदमी का चित्र है। और हम में से बहुत लोग इसे सुनकर सोच रहे होंगे: यह तो मैं नहीं हूँ, मुझमें तो अभी द्वेष भी है, जलन भी है, डर भी है। तो क्या मैं भगवान को प्रिय नहीं? अगला, आख़िरी श्लोक एक छोटे-से शब्द से शुरू होता है, "तु", "परन्तु"। और वही "परन्तु" आपके लिए है।

ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते । श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ॥ २० ॥
गीता 12.20 — अर्थ पढ़ें ›

बारहवें अध्याय का अन्तिम श्लोक। "ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते", परन्तु जो इस धर्ममय अमृत का, जैसा कहा गया है वैसा ही, पालन करते हैं, "श्रद्दधाना मत्परमा", श्रद्धा रखकर, मुझे ही परम मानकर, "भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः", वे भक्त मुझे अत्यन्त प्रिय हैं।

अब ध्यान से सुनिए, क्योंकि आज का सबसे बड़ा भरोसा इसी श्लोक में है। अब तक सात श्लोकों में श्रीकृष्ण कहते आए, "स मे प्रियः", वह मुझे प्रिय है। और यहाँ, आख़िर में, वे कहते हैं, "भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः", अत्यन्त प्रिय। तो ये "अत्यन्त प्रिय" कौन हैं, जो उन सिद्ध भक्तों से भी आगे निकल गए?

हमारी टीका इसका उत्तर बहुत साफ़ देती है: ऊपर बताए लक्षण सिद्ध पुरुष में स्वाभाविक होते हैं। साधक के लिए वे पालन करने की साधना हैं, और जो श्रद्धा से उनके लिए प्रयत्न करता है, वह और भी अधिक प्रिय है। मधुसूदन सरस्वती और नीलकण्ठ दोनों एक पुराने वचन का हवाला देते हैं: जिसे आत्मा का बोध हो गया, उसमें द्वेष न करना जैसे गुण बिना प्रयत्न के अपने आप आते हैं, वे उसके लिए साधन नहीं हैं। यानी जो पहुँच गया, उसके लिए ये गुण उसका स्वभाव हैं। और जो अभी रास्ते में है, उसके लिए यही गुण उसका रास्ता हैं।

और विश्वनाथ चक्रवर्ती एक बात कहते हैं जिसे मैं चाहता हूँ आप आज घर ले जाएँ। वे कहते हैं, ऊपर जिन भक्तों का वर्णन हुआ, उनमें कोई एक गुण में पक्का है, कोई दूसरे में। पर ये साधक, जो इन सारे अच्छे लक्षणों को पाने की चाह रखते हैं, वे उन सिद्धों से भी श्रेष्ठ हैं। "इसीलिए 'अतीव' शब्द है।"

समझ रहे हैं आप? भगवान यह नहीं कह रहे कि जब तुम पूरे हो जाओगे, तब मैं तुम्हें प्यार करूँगा। वे कह रहे हैं, जो पूरा होने की कोशिश में लगा है, श्रद्धा से, गिरते-उठते, वह मुझे अत्यन्त प्रिय है। जैसे कोई पिता अपने उस बच्चे को देखता है जो पहली बार चलना सीख रहा है, गिरता है, फिर उठता है, फिर दो क़दम चलता है। उस घड़ी पिता की आँखों में जो चमक होती है, वह बड़े बेटे के तेज़ दौड़ने पर भी नहीं होती।

अब शब्द देखिए। "धर्म्यामृतमिदं"। श्रीधर स्वामी कहते हैं, यह धर्म ही अमृत है, क्योंकि यह अमरता तक ले जाता है। और मधुसूदन सरस्वती एक और अर्थ जोड़ते हैं: या इसलिए अमृत है कि इसका स्वाद अमृत जैसा मीठा है। यानी ये लक्षण कोई कड़वी दवा नहीं, जिसे नाक बन्द करके पीना हो। जिसने थोड़ा भी क्षमा करके देखा है, वह जानता है कि उसके बाद मन में जो हल्कापन आता है, उसका स्वाद मीठा है।

फिर दो शब्द, जो इन साधकों की पहचान हैं: "श्रद्दधाना मत्परमा"। श्रद्धा रखने वाले, और मुझे परम मानने वाले। ध्यान दीजिए, श्रीकृष्ण यहाँ यह नहीं कहते कि जिन्होंने ये सब लक्षण पा लिए। वे कहते हैं, जिन्हें इन पर श्रद्धा है, और जिनकी आख़िरी मंज़िल मैं हूँ। मधुसूदन सरस्वती "मत्परमा" का अर्थ करते हैं: जिनके लिए पाने योग्य सबसे ऊँची गति मैं ही हूँ। यानी साधक की कसौटी यह नहीं कि वह आज कहाँ खड़ा है। कसौटी यह है कि उसका मुँह किस ओर है। जिसका मुँह भगवान की ओर है, वह धीरे चले, रुक-रुककर चले, फिर भी पहुँच रहा है।

"यथोक्तं", जैसा कहा गया है। और रामानुजाचार्य यहाँ एक बहुत सुंदर कड़ी जोड़ते हैं। वे कहते हैं, "जैसा कहा गया", यानी जैसा इस अध्याय के दूसरे श्लोक में कहा गया था, "मय्यावेश्य मनो ये मां", जो मन को मुझमें लगाकर मुझे भजते हैं। अध्याय जहाँ से शुरू हुआ था, वहीं लौट आया। पिछले सत्संग की शुरुआत में श्रीकृष्ण ने कहा था, जो श्रद्धा से मन मुझमें लगाते हैं, "ते मे युक्ततमा मताः", वे सबसे श्रेष्ठ योगी हैं। और आज अन्त में कहते हैं, वे "भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः"। पहले उन्हें श्रेष्ठ कहा, अब प्यारा।

और संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर अपने अध्याय का अन्त ऐसे करते हैं, जो इस सत्संग में बैठे हर आदमी को छूता है। वे भगवान के मुँह से कहलवाते हैं: जो इन बातों को सुनकर अपने अनुभव में उतारते हैं, जिनके मन में ये श्रद्धा से फैलती हैं, वही तीर्थ हैं, वही पवित्र भूमि हैं। और फिर: जो प्रेमी भक्तों की कथा कहते और सुनते हैं, उन्हें हम अपना परम देवता मानते हैं। यानी आप जो आज यहाँ बैठकर भगवान के प्रिय भक्त की बात सुन रहे हैं, ज्ञानेश्वर के श्रीकृष्ण कहते हैं, यह सुनना भी उन्हें प्यारा है।

और फिर ज्ञानेश्वर लिखते हैं: सञ्जय कहते हैं, राजा, सुनो। हाँ, सञ्जय। यह सब उस राजा को सुनाया जा रहा है, जिसके "मेरे" ने युद्ध बुलाया, और जिसकी सबसे बड़ी आशा, भीष्म, आज बाणों पर पड़ी है। "निर्ममः", "अद्वेष्टा", "क्षमी", ये शब्द उस अन्धे राजा के कानों तक पहुँचे। हम नहीं जानते उस घड़ी उसके मन में क्या हुआ। पर इतना जानते हैं कि भगवान ने अपना सबसे प्यारा चित्र उस आदमी के सामने भी रखा, जो उससे सबसे दूर खड़ा था।

और अब वह बात, जिसका इस अध्याय के साथ पूरा होना है। आज केवल बारहवाँ अध्याय समाप्त नहीं हो रहा। बीसवें सत्संग में मैंने आपसे कहा था कि पुराने आचार्य गीता के अठारह अध्यायों को छह-छह के तीन हिस्सों में देखते हैं, और उस दिन पहला षट्क पूरा हुआ था। आज दूसरा षट्क, सातवें से बारहवें अध्याय तक, पूरा हो रहा है।

सोलह सत्संग हुए इन छह अध्यायों में। धागे में पिरोए मोतियों से हम चले थे, कि सब कुछ भगवान में वैसे ही पिरोया है। फिर चार तरह के भक्त, और यह भरोसा कि दुखी होकर पुकारना भी भक्ति है। फिर अन्त समय में क्या याद आएगा, और लौटकर न आने का रास्ता। फिर "पत्रं पुष्पं फलं तोयं", और यह कि दुराचारी भी लौट आए तो साधु ही माना जाए। फिर भगवान का ख़ुद समझ का दीया जलाना, और हर सुंदर चीज़ में उनकी झलक। फिर वह विराट रूप, जिसने अर्जुन को कँपा दिया, "कालोऽस्मि", और फिर वही प्यारा, अपना-सा रूप। और इस अध्याय में, साकार और निराकार का प्रश्न, साधना की सीढ़ी, और आज वह चेहरा, जिसे भगवान प्यार करते हैं।

मधुसूदन सरस्वती इस अध्याय के अन्त में लिखते हैं कि बीच के इन छह अध्यायों से यह सिद्ध हुआ कि जिसे पाना है, वह भगवान कौन है, उसकी पहचान उपासना के रास्ते से पक्की हुई। नीलकण्ठ भी यही कहते हैं, उपासना प्रधान यह विचार यहाँ पूरा हुआ, और इसके आगे जीव और ब्रह्म के एक होने का विचार होगा। और बलदेव विद्याभूषण इस अध्याय का सार एक छोटे-से श्लोक में देते हैं, जिसका भाव है: श्रीकृष्ण उनके वश में हैं जो केवल उन्हीं का सेवन करते हैं, और जो केवल उनकी भक्ति का सेवन करते हैं, उनके तो प्रेम से वे अत्यन्त वश में हैं। बीसवें सत्संग में विश्वनाथ चक्रवर्ती ने कहा था, छठे अध्याय का आख़िरी श्लोक अगले छह अध्यायों का सूत्र है, जो भक्ति के बारे में हैं। आज वह सूत्र पूरा बुना गया।

और अब आगे की एक झलक, बस एक झलक। तेरहवाँ अध्याय, महाभारत के भीष्म पर्व का सैंतीसवाँ, "क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग"। उसकी शुरुआत में अर्जुन फिर कुछ जानना चाहते हैं: "प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च", प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ। और श्रीकृष्ण उत्तर शुरू करते हैं: "इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते", हे कुन्तीपुत्र, यह शरीर क्षेत्र कहलाता है। आज हमने भक्त का हृदय देखा। अगली बार बात उस शरीर से शुरू होगी जिसमें हम सब रहते हैं, और उससे जो इस शरीर को जानता है। वह जानने वाला कौन है, यह अगले सत्संग में।

तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली बात। भगवान को प्रिय होने की शुरुआत किसी बड़े कर्मकाण्ड से नहीं, "अद्वेष्टा" से होती है, मन से किसी एक आदमी के लिए पाली हुई कड़वाहट को धीरे-धीरे निकाल देने से। दूर रहना ज़रूरी हो तो दूर रहिए। पर ज़हर मत पालिए। राजधर्मा जी उठा, तो उसके मुँह से पहला शब्द था, "वह मेरा प्रिय मित्र है।"

दूसरी बात। अपनी पूजा के साथ अपनी उपस्थिति को भी देखिए। "यस्मान्नोद्विजते लोको", जिससे लोग नहीं घबराते। आज घर में, दफ़्तर में, आपके आने से लोगों ने चैन की साँस ली या सँभलकर बैठ गए, यह भी भक्ति का हिसाब है। और भक्ति का मतलब ढीलापन नहीं: "दक्ष", कुशल, जिसमें कोई छिद्र न मिले।

तीसरी बात, और सबसे बड़ी। अगर आज इन लक्षणों को सुनकर आपको लगा कि यह तो मैं अभी नहीं हूँ, तो निराश मत होइए। ये लक्षण पहुँचे हुए का स्वभाव हैं, और रास्ते में चलने वाले का रास्ता। जो श्रद्धा से इनकी ओर चल रहा है, गिरते-उठते, वही "भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः", भगवान को अत्यन्त प्रिय है।

आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। इन सब लक्षणों में से, कौन-सा एक लक्षण है जिसकी ओर आप इस हफ़्ते एक छोटा-सा क़दम उठाना चाहेंगे? किसी को मन से क्षमा करना, किसी की तरक़्क़ी पर सच्ची ख़ुशी, या तारीफ़ और निन्दा दोनों में थोड़ा शान्त रहना? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।

भगवान ने अपने प्रिय भक्त का चित्र बनाया, और फिर कहा, जो इस चित्र की ओर चल रहा है, वह मुझे और भी प्रिय है। वह चलने वाला आप हैं।

जय श्री कृष्ण।

यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः । हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥ १५ ॥
गीता 12.15 — अर्थ पढ़ें ›

तीन बातें

  1. भगवान को प्रिय होने की शुरुआत किसी बड़े कर्मकाण्ड से नहीं, "अद्वेष्टा" से होती है, मन से किसी एक आदमी के लिए पाली हुई कड़वाहट को धीरे-धीरे निकाल देने से। दूर रहना ज़रूरी हो तो दूर रहिए। पर ज़हर मत पालिए। राजधर्मा जी उठा, तो उसके मुँह से पहला शब्द था, "वह मेरा प्रिय मित्र है।"
  2. अपनी पूजा के साथ अपनी उपस्थिति को भी देखिए। "यस्मान्नोद्विजते लोको", जिससे लोग नहीं घबराते। आज घर में, दफ़्तर में, आपके आने से लोगों ने चैन की साँस ली या सँभलकर बैठ गए, यह भी भक्ति का हिसाब है। और भक्ति का मतलब ढीलापन नहीं: "दक्ष", कुशल, जिसमें कोई छिद्र न मिले।
  3. और सबसे बड़ी। अगर आज इन लक्षणों को सुनकर आपको लगा कि यह तो मैं अभी नहीं हूँ, तो निराश मत होइए। ये लक्षण पहुँचे हुए का स्वभाव हैं, और रास्ते में चलने वाले का रास्ता। जो श्रद्धा से इनकी ओर चल रहा है, गिरते-उठते, वही "भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः", भगवान को अत्यन्त प्रिय है।