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सत्संग ३५

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साकार या निराकार?

गीता 12.1–12.12 · 76 मिनट

किसकी पूजा करें; जितना हो सके, सीढ़ी दर सीढ़ी

अर्जुन उवाच एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते । ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥ १ ॥
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श्रीभगवानुवाच मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते । श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥ २ ॥
गीता 12.2 — अर्थ पढ़ें ›
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते । सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥ ३ ॥
गीता 12.3 — अर्थ पढ़ें ›

क्या कभी ऐसा हुआ है कि आप घर के छोटे-से मंदिर के सामने दीया जलाकर बैठे हों, और किसी ने हँसकर कह दिया हो, भगवान तो निराकार हैं, मूर्ति और तस्वीर में क्या रखा है? या उलटा, आप आँखें बन्द करके किसी ऐसे भगवान का ध्यान करना चाहते हों जिसका कोई रूप नहीं, और मन बार-बार किसी चेहरे की ओर भागता हो? आज का सवाल यही है। साकार या निराकार? किसकी पूजा करें? और अगर मन किसी में भी न टिके, तो फिर क्या करें?

जय श्री कृष्ण।

आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का पैंतीसवाँ सत्संग है, और आज से गीता का बारहवाँ अध्याय शुरू होता है। महाभारत के भीष्म पर्व का छत्तीसवाँ अध्याय ही गीता का बारहवाँ अध्याय है, और उसका नाम है "भक्तियोग"। और याद रहे, यह सब हमें सञ्जय सुना रहे हैं, हस्तिनापुर के महल में, अन्धे राजा धृतराष्ट्र को, उस दिन जब भीष्म बाणों की शय्या पर गिर चुके हैं।

पहले याद कर लें कि पिछली बार हम कहाँ रुके थे। पिछले सत्संग में अर्जुन ने डरकर फिर से वही प्यारा, जाना-पहचाना रूप माँगा था, और श्रीकृष्ण ने वह रूप दिखाकर कहा था कि यह दर्शन न वेदों से मिलता है, न तप से, न दान से, न यज्ञ से, केवल अनन्य भक्ति से। और ग्यारहवाँ अध्याय इस एक श्लोक पर पूरा हुआ था: "मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः", जो मेरे लिए काम करता है, मुझे ही परम मानता है, मेरा भक्त है, पकड़ से छूटा हुआ है, और किसी से वैर नहीं रखता, वह मुझे पाता है। और पिछली बार के अन्त में मैंने आपको आज का पहला श्लोक पढ़कर सुनाया था, बस प्रश्न के रूप में। आज उसका उत्तर सुनेंगे।

तो पहला श्लोक। अर्जुन पूछते हैं: "एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते।" कुछ भक्त इस प्रकार निरन्तर आपमें लगे रहकर आपकी उपासना करते हैं। "ये चाप्यक्षरमव्यक्तं", और दूसरे उस अविनाशी, अव्यक्त की उपासना करते हैं। "तेषां के योगवित्तमाः", इन दोनों में योग को सबसे अच्छा कौन जानता है?

पहला शब्द है "एवं", इस प्रकार। हमारी टीका कहती है, यह शब्द पीछे की ओर इशारा करता है, ठीक उसी आख़िरी श्लोक की ओर जो मैंने अभी सुनाया। यानी अर्जुन कह रहे हैं: जो भक्त उस तरह जीते हैं जैसा आपने अभी बताया, आपके लिए काम करते हुए, आपको परम मानते हुए, वे एक ओर। और दूसरी ओर वे, जो "अक्षर" की उपासना करते हैं। अक्षर यानी जिसका कभी क्षय न हो, जो कभी न घटे। और "अव्यक्त" यानी जो किसी रूप में प्रकट नहीं, जिसे आँख न देख सके, हाथ न छू सके। हमारी टीका इसे सीधे शब्दों में कहती है: दूसरा समूह निराकार, निर्गुण ब्रह्म की उपासना करता है।

पर एक बात सोचिए। अर्जुन यह प्रश्न अभी क्यों पूछ रहे हैं? मधुसूदन सरस्वती और नीलकण्ठ, दोनों यहाँ एक बहुत सुन्दर बात पकड़ते हैं। वे कहते हैं, श्रीकृष्ण अब तक दोनों तरह से "मैं" और "मुझे" कहते आए हैं। सातवें अध्याय में उन्होंने कहा था, "वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः", जो यह जान ले कि सब कुछ वासुदेव ही है, वह महात्मा बहुत दुर्लभ है। वहाँ "मैं" का अर्थ है सब कुछ, जिसका कोई एक रूप नहीं। और अभी-अभी, विश्वरूप के बाद, उन्होंने कहा, "नाहं वेदैर्न तपसा", मुझे इस रूप में न वेदों से देखा जा सकता है, न तप से। वहाँ "मैं" का अर्थ है एक रूप, जो सामने खड़ा है। तो अर्जुन के मन में स्वाभाविक उलझन है: जिस "आप" की मुझे उपासना करनी है, वह कौन-सा है? रूप वाला, या रूप से परे वाला?

और मधुसूदन सरस्वती एक बात और जोड़ते हैं, जो मुझे बहुत ईमानदार लगती है। वे कहते हैं, अर्जुन यह प्रश्न किसी बहस के लिए नहीं पूछ रहे। वे अपने लिए पूछ रहे हैं: मैं, जो मुक्ति चाहता हूँ, मुझे किसका चिन्तन करना चाहिए? यानी मेरा अपना रास्ता कौन-सा है? श्रीधर स्वामी भी यही कहते हैं कि अब तक दोनों की प्रशंसा हो चुकी थी, भक्त की भी और ज्ञानी की भी, इसलिए अर्जुन जानना चाहते हैं कि दोनों में विशेष कौन है।

संत ज्ञानेश्वर अर्जुन के मुँह से इस प्रश्न को बड़े प्यार से कहलवाते हैं। अर्जुन कहते हैं: व्यक्त भी आप ही हैं, अव्यक्त भी आप ही। भक्ति से व्यक्त मिलता है, योग से अव्यक्त। आप तक पहुँचने के ये दो दरवाज़े हैं। फिर वे एक उदाहरण देते हैं। सोना एक बड़ी डली में हो या एक छोटे-से टुकड़े में, कसौटी पर उसका खरापन एक ही होता है। और अमृत के सागर में जो शक्ति है, वही उस एक लहर में भी है जो किसी ने अंजुली में भर ली। यानी अर्जुन को यह तो पता है कि दोनों में आप ही हैं। फिर भी पूछ रहे हैं, ताकि जान सकें। और ज्ञानेश्वर कहते हैं, यह सुनकर जगत् के बन्धु श्रीकृष्ण प्रसन्न हो गए और बोले, प्रश्न अच्छा पूछा तुमने।

अब एक बात महाभारत से, जो इस प्रश्न को और गहरा कर देती है। जो सञ्जय आज यह संवाद सुना रहे हैं, उन्होंने युद्ध से बहुत पहले, इसी धृतराष्ट्र के सामने, श्रीकृष्ण के बारे में एक बात कही थी। आपको याद होगा, अट्ठाईसवें सत्संग में हमने सञ्जय को श्रीकृष्ण के नामों का अर्थ बताते सुना था, और वहाँ उन्होंने कहा था कि वे अव्यक्त भी हैं और व्यक्त भी, सबके उद्गम भी और सबका लय भी। यानी जो प्रश्न आज अर्जुन पूछ रहे हैं, उसका उत्तर सञ्जय के मन में पहले से था: दोनों वही हैं।

और उसी बातचीत में, उससे थोड़ा पहले, सञ्जय ने एक और बात कही थी, जो आज के सवाल का दूसरा पहलू खोलती है। वे कहते हैं: महायोगी हरि सारे जगत् के स्वामी होते हुए भी एक साधारण किसान की तरह काम करना शुरू करते हैं। और इस तरह, अपनी माया की शक्ति से, वे लोकों को छलते हैं। पर जो मनुष्य उन्हीं की शरण लेते हैं, वे मोहित नहीं होते। सोचिए। जिसे सञ्जय काल, मृत्यु और सब प्राणियों का अकेला स्वामी कहते हैं, वही एक मनुष्य की तरह, एक किसान की तरह, मेहनत करता दिखता है। आज भी अर्जुन के सामने वही बैठे हैं, घोड़ों की लगाम हाथ में लिए, एक सारथी बनकर। अनन्त ने एक साधारण रूप ओढ़ लिया है। और अर्जुन पूछ रहे हैं: इस रूप को पकड़ूँ, या उस अनन्त को, जो किसी रूप में नहीं समाता?

अब दूसरा श्लोक, और यहाँ से श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं। "मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।" जो मन को मुझमें लगाकर, सदा मुझमें लगे रहकर मेरी उपासना करते हैं, "श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः", और जो परम श्रद्धा से युक्त हैं, उन्हें मैं सबसे श्रेष्ठ योगी मानता हूँ।

पहले शब्द को ध्यान से सुनिए: "आवेश्य"। सीधा अर्थ है, मन को मुझमें लगाकर। पर "आवेश" शब्द में कुछ और भी है, मन का किसी में पूरी तरह उतर जाना, उसी जैसा हो जाना। मधुसूदन सरस्वती इसके लिए एक बहुत सुन्दर उपमा देते हैं। जैसे लाख को सिन्दूर के रंग में डाल दें, तो लाख पूरी की पूरी उसी रंग की हो जाती है, वैसे ही मन भगवान में डूबकर उन्हीं के रंग का हो जाए। भक्त का मन भगवान के पास बैठता नहीं, भगवान के रंग में रंग जाता है।

फिर "नित्ययुक्ताः", सदा लगे हुए। शंकराचार्य कहते हैं, ऐसे भक्त दिन और रात, अपना पूरा समय, मन को भगवान में रखकर बिताते हैं, इसलिए उन्हें सबसे श्रेष्ठ कहना ठीक ही है। और फिर "श्रद्धया परया", परम श्रद्धा से। नीलकण्ठ इस श्रद्धा की बड़ी साफ़ परिभाषा देते हैं: यह भरोसा, यह पक्का निश्चय, कि जिस परमात्मा की हम आराधना कर रहे हैं, वे हमें अवश्य पार उतारेंगे। यह श्रद्धा कोई अन्धा विश्वास नहीं। यह वैसा भरोसा है जैसा एक बच्चे को अपनी माँ के हाथ पर होता है।

और संत ज्ञानेश्वर इस श्रद्धा को तीन चित्रों में दिखाते हैं। जैसे शाम को सूर्य पश्चिम के पहाड़ के पीछे उतरता है, तो उसकी किरणें भी उसके पीछे-पीछे चली जाती हैं, वैसे ही भक्त की सारी इन्द्रियाँ भगवान के पीछे चलती हैं। जैसे बरसात में नदी रोज़ और ऊपर चढ़ती है, वैसे ही भजन करते-करते श्रद्धा रोज़ नई दिखती है। और जैसे गंगा समुद्र तक पहुँचकर भी रुकती नहीं, पीछे से पानी आता ही रहता है, वैसे ही प्रेम का बहाव। ज्ञानेश्वर कहते हैं, जो भक्त इस तरह अपने आपको मुझे दे देते हैं, उन्हें ही मैं सबसे बड़ा योगी मानता हूँ।

तो उत्तर साफ़ आ गया? श्रीकृष्ण ने कहा, रूप वाले की भक्ति करने वाले सबसे श्रेष्ठ। पर यहाँ जल्दी मत कीजिए, क्योंकि आचार्य यहीं से अलग-अलग रास्ते पकड़ते हैं, और उनका सम्मान करते हुए हमें दोनों को सुनना चाहिए। शंकराचार्य इसी श्लोक पर एक प्रश्न उठाते हैं: तो क्या दूसरे, जो अक्षर की उपासना करते हैं, श्रेष्ठ नहीं हैं? और उत्तर देते हैं, नहीं, ऐसा नहीं; उनके बारे में जो कहना है, वह आगे सुनो। उनकी दृष्टि में अक्षर के उपासक तो वे हैं जिन्हें भगवान ने सातवें अध्याय में अपनी आत्मा ही कहा था, "ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्", ज्ञानी तो मेरी आत्मा ही है। और जो भगवान से एक ही हो गया, उसे "श्रेष्ठ योगी" या "कम श्रेष्ठ" कहने का प्रश्न ही नहीं उठता।

और रामानुजाचार्य इसी "युक्ततमाः" का अर्थ बिल्कुल दूसरी तरह करते हैं। वे कहते हैं, यहाँ प्रश्न यह है कि कौन जल्दी पहुँचता है। और उत्तर है: जो भगवान को प्रेम से भजते हैं, वे उन्हें सुख से और जल्दी पा लेते हैं। यानी एक आचार्य कहते हैं, दोनों मार्ग अपनी जगह, और दूसरा मार्ग अपने में पूरा है; दूसरे कहते हैं, भक्ति का मार्ग सबसे सीधा है। हम यहाँ किसी का पक्ष नहीं लेंगे। क्योंकि जैसा आप आगे देखेंगे, श्रीकृष्ण ख़ुद भी किसी को छोटा नहीं करते।

अब तीसरा श्लोक। "ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते।" परन्तु जो उस अविनाशी की उपासना करते हैं जिसका वर्णन नहीं हो सकता, जो अव्यक्त है, "सर्वत्रगमचिन्त्यं च", जो सब जगह है, जिसे सोचा नहीं जा सकता, "कूटस्थमचलं ध्रुवम्", जो कूटस्थ है, अचल है, और नित्य है।

इस एक श्लोक में सात विशेषण हैं, और मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, ये सात शब्द उस अक्षर को समझाने के लिए ही रखे गए हैं। "अनिर्देश्य", जिसका वर्णन नहीं हो सकता, क्योंकि शब्द उसी चीज़ को बता सकते हैं जिसका कोई रूप हो, कोई गुण हो, कोई काम हो। "अव्यक्त", जो किसी इन्द्रिय से प्रकट नहीं होता। "सर्वत्रग", जो आकाश की तरह सब जगह फैला है। "अचिन्त्य", जिसे मन सोच भी नहीं सकता, क्योंकि मन भी उसी को सोचता है जिसकी कोई सीमा हो।

और फिर एक बड़ा अनोखा शब्द, "कूटस्थ"। हमारी टीका इसका अर्थ एक चित्र से समझाती है: निहाई की तरह। लोहार की निहाई देखी है आपने? उस पर लोहे को रखकर पीटा जाता है, तलवार बनती है, हँसिया बनता है, कील बनती है, सब कुछ उस पर गढ़ा जाता है, पर निहाई वैसी की वैसी रहती है। सारा संसार उस पर बनता-बिगड़ता है, और वह नहीं बदलता। फिर "अचल", जो हिलता नहीं, और "ध्रुव", जो सदा रहता है।

शंकराचार्य यहाँ "उपासना" शब्द की एक बहुत सुन्दर परिभाषा देते हैं। वे कहते हैं, उपासना का अर्थ है किसी के पास जाकर बैठना, और लम्बे समय तक मन में एक ही भाव का बहना, ऐसे जैसे तेल की धार बहती है, बिना टूटे। और संत ज्ञानेश्वर इस अक्षर का वर्णन करते हुए मानो शब्दों को ही थका देते हैं। वे कहते हैं, जहाँ मन का नाखून भी नहीं लगता, जहाँ बुद्धि की आँख भी नहीं घुसती, जो न है ऐसा कह सकते हैं, न नहीं है ऐसा। उसे ये ज्ञानी अपने ही बल से पकड़ने निकलते हैं।

तो आज के पहले तीन श्लोकों से हमारे लिए पहली बात यह निकलती है: आपके मन में अगर कभी यह उलझन उठी हो कि भगवान को रूप में देखूँ या रूप से परे जानूँ, तो आप अकेले नहीं हैं। यही प्रश्न अर्जुन ने पूछा था, भगवान के सामने बैठकर। और भगवान ने उसे डाँटा नहीं, प्रसन्न हुए। क्योंकि यह प्रश्न वही पूछता है जो सचमुच पहुँचना चाहता है।

पर अभी एक बात बाकी है। तीसरा श्लोक अधूरा वाक्य है। उसमें यह तो बताया कि वे किसकी उपासना करते हैं, पर यह नहीं बताया कि उनका क्या होता है। क्या निराकार की उपासना करने वाले भटक जाते हैं? या वे भी वहीं पहुँचते हैं? आइए, अगले तीन श्लोक सुनते हैं।

संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः । ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥ ४ ॥
गीता 12.4 — अर्थ पढ़ें ›
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् । अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥ ५ ॥
गीता 12.5 — अर्थ पढ़ें ›
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः । अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥ ६ ॥
गीता 12.6 — अर्थ पढ़ें ›

अब वह वाक्य पूरा होता है जो पिछले श्लोक में अधूरा छूटा था। चौथा श्लोक। "संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः।" वे इन्द्रियों के पूरे समूह को भली-भाँति वश में करके, सब जगह समान बुद्धि रखकर, "ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः", और सब प्राणियों के हित में लगे रहकर, मुझको ही प्राप्त करते हैं।

सबसे पहले आख़िरी बात सुनिए, क्योंकि वही सबसे बड़ी है: "मामेव", मुझको ही। जो निराकार की उपासना करते हैं, वे भटकते नहीं, वे भी श्रीकृष्ण तक ही पहुँचते हैं। हमारी टीका इसे बहुत सीधे कहती है: जिस अक्षर को वे खोजते हैं, वह श्रीकृष्ण से अलग नहीं है, इसलिए दोनों मार्ग एक ही स्थान पर पहुँचते हैं। प्रश्न केवल यह है कि कौन-सा मार्ग सरल है।

मुझे यह बात इस अध्याय की सबसे बड़ी उदारता लगती है। भगवान ने अभी कहा था कि भक्त सबसे श्रेष्ठ योगी हैं, और अगली ही साँस में वे यह भी कह देते हैं कि दूसरे रास्ते वाले भी मुझे ही पाते हैं। जो लोग साकार और निराकार को लेकर आपस में बहस करते हैं, उन्हें इस एक शब्द पर ठहरना चाहिए: "मामेव"।

अब उन तीन बातों को देखिए जो इन उपासकों की पहचान हैं। पहली, "संनियम्येन्द्रियग्रामं", इन्द्रियों का पूरा गाँव, पूरा समूह, वश में। आँख, कान, जीभ, सब अपने-अपने विषयों की ओर दौड़ते हैं, और ये साधक उन्हें वहाँ से समेट लेते हैं। दूसरी, "सर्वत्र समबुद्धयः", सब जगह समान बुद्धि। शंकराचार्य कहते हैं, जो चाहा था वह मिले या जो नहीं चाहा था वह आ पड़े, दोनों में बुद्धि एक-सी रहे। और तीसरी, "सर्वभूतहिते रताः", सब प्राणियों के हित में रमे हुए। मधुसूदन सरस्वती यहाँ बताते हैं कि जो सबमें एक ही आत्मा देखता है, उसमें किसी को चोट पहुँचाने वाला द्वेष बचता ही नहीं। ऐसे संन्यासी सब प्राणियों को अभय का दान देकर निकलते हैं। देखिए, निराकार का साधक भी दुनिया से रूखा नहीं होता। वह सबका भला चाहता है।

और यहाँ भी आचार्यों की राह अलग होती है। शंकराचार्य कहते हैं, इन ज्ञानियों के बारे में कुछ और कहने की ज़रूरत ही नहीं; वे मुझे पाते हैं, बस, क्योंकि ज्ञानी तो मेरी आत्मा ही है। पर रामानुजाचार्य "अक्षर" का अर्थ ही दूसरा करते हैं। उनकी दृष्टि में यहाँ अक्षर का अर्थ है साधक की अपनी आत्मा का शुद्ध स्वरूप, जो शरीर से अलग है, जिसे "देवता" या "मनुष्य" जैसे नाम से नहीं बताया जा सकता। और वे कहते हैं कि ऐसे साधक भगवान जैसी, संसार से छूटी हुई आत्मा को पाते हैं; परमात्मा तो उस अक्षर से भी परे हैं, जैसा पन्द्रहवें अध्याय में आएगा, "कूटस्थोऽक्षर उच्यते"। एक ही श्लोक, और दो महान आचार्य, दो अलग अर्थ। दोनों के पीछे सदियों की साधना है। हम दोनों को प्रणाम करके आगे बढ़ते हैं।

और अब महाभारत से एक बात, जो "संनियम्य" शब्द पर बहुत सुन्दर रोशनी डालती है। आपको याद होगा, सत्ताईसवें सत्संग में हमने सुना था कि धृतराष्ट्र ने सञ्जय से पूछा था, तुम माधव को कैसे जानते हो, और मैं क्यों नहीं जानता? और सञ्जय ने कहा था, मैं छल का सहारा नहीं लेता, भक्ति से मैंने शुद्ध मन पाया है, और शास्त्रों से मैं जनार्दन को जानता हूँ।

उसी बातचीत के आगे का हिस्सा आज सुनिए। धृतराष्ट्र ने फिर पूछा: प्रिय सञ्जय, मुझे वह मार्ग बताओ जिसमें कहीं से भय न हो, जिससे मैं हृषीकेश तक पहुँच सकूँ। और सञ्जय ने जो उत्तर दिया, वह आज के श्लोक जैसा ही है। उन्होंने कहा: जिसने अपने आपको नहीं साधा, वह पूर्ण जनार्दन को कभी नहीं जान सकता। इन्द्रियों को वश में करने के सिवा साधना का कोई उपाय नहीं। फिर कहा: राजन्, बिना थके इन्द्रियों को वश में रखने में लगे रहिए। आपकी बुद्धि न भटके, और जहाँ-जहाँ से वह भटके, वहाँ-वहाँ से उसे रोक लीजिए। और अन्त में: जिनकी इन्द्रियाँ वश में नहीं हैं, वे केशव को नहीं पा सकते।

देखिए, सञ्जय भक्त हैं, और भक्ति से ही श्रीकृष्ण को जानते हैं। फिर भी वे अपने राजा से वही कहते हैं जो आज का श्लोक निराकार के साधक के लिए कहता है: पहले इन्द्रियों को समेटो। यानी रास्ता कोई भी हो, साकार या निराकार, यह एक बात दोनों में साझी है। मन और इन्द्रियाँ बिखरी रहें, तो न रूप पकड़ में आता है, न रूप से परे वाला। और जिस राजा से यह कहा गया था, वह आज उसी सञ्जय के मुँह से गीता सुन रहा है; उसी बातचीत में उसके बेटे ने केशव की शरण में जाने से साफ़ मना कर दिया था।

और अब, इससे पहले कि हम अगले श्लोक में उतरें, एक छोटी-सी बात आपसे कहना चाहता हूँ। हम इस अध्याय के सबसे नाज़ुक मोड़ पर हैं। अभी आपने सुना कि दोनों रास्ते भगवान तक पहुँचते हैं। अगला श्लोक कहेगा कि एक रास्ता बहुत कठिन है, और उसके बाद श्रीकृष्ण एक सीढ़ी देंगे, ऐसी सीढ़ी जिस पर हर आदमी, चाहे उसका मन कितना भी चंचल हो, कहीं न कहीं पैर रख सकता है। आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। जो आदमी यहीं उठ जाए, वह या तो यह सोचेगा कि निराकार की बात बेकार है, या यह कि मेरे जैसे के लिए कोई रास्ता ही नहीं। जबकि उत्तर इसी सत्संग में, कुछ ही आगे खड़ा है। तो अगर आप यह सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की यह यात्रा बीच में न छूटे। और आज का यह सत्संग आख़िर तक सुनिए।

अब पाँचवाँ श्लोक। "क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्।" जिनका चित्त अव्यक्त में लगा है, उनके लिए कष्ट अधिक है। "अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते", क्योंकि देहधारियों के लिए अव्यक्त की गति कठिनाई से मिलती है।

यहाँ एक शब्द पर सब कुछ टिका है: "देहवद्भिः", देह वालों के लिए। अब देह तो सबके पास है, भक्त के पास भी, ज्ञानी के पास भी। तो इसका क्या अर्थ? हमारी टीका कहती है, यहाँ देहधारी का अर्थ है वह जो अब भी शरीर को ही अपना स्वरूप मानता है। शंकराचार्य भी यही कहते हैं: अक्षर के साधक का कष्ट इसलिए अधिक है कि उसे शरीर से "मैं" का भाव छोड़ना पड़ता है। जब तक मुझे लगता है कि मैं यह शरीर हूँ, तब तक जिसका कोई शरीर नहीं, उसे पकड़ना मेरे लिए कठिन ही रहेगा।

और शंकराचार्य एक बात और कहते हैं जो बहुत ईमानदार है: कष्ट तो भगवान के लिए काम करने वालों को भी होता है, पर अक्षर के साधक को "अधिकतर"। मधुसूदन सरस्वती इसे और साफ़ करते हैं। वे कहते हैं, दोनों का फल एक ही है। अन्तर रास्ते का है। जो कठिन उपाय से पहुँचता है, उसकी तुलना में जो सरल उपाय से पहुँचता है, वह श्रेष्ठ कहलाता है। यानी "श्रेष्ठ" का अर्थ यहाँ "बड़ा आदमी" नहीं, "सरल रास्ते वाला" है।

नीलकण्ठ इस कठिनाई का एक चित्र देते हैं जो मुझे बहुत सच्चा लगता है। वे कहते हैं, साकार का ध्यान करने वाले के पास एक सहारा होता है, एक आलम्बन। वह सीढ़ी पर एक-एक पायदान चढ़ता हुआ ऊपर पहुँचता है। पर जिसका ध्यान बिना किसी सहारे का है, उसका ध्यान ऐसा है जैसे आकाश में युद्ध करना। वह पक्षी की तरह एकदम से ऊपर उड़ जाना चाहता है। और नीलकण्ठ एक ख़तरा भी बताते हैं: ऐसा साधक कभी-कभी मन के सुस्त होकर डूब जाने को ही समाधि समझ बैठता है।

और संत ज्ञानेश्वर यहाँ अपनी पूरी कविता उड़ेल देते हैं। वे कहते हैं, उस रास्ते पर प्यास लगे तो प्यास ही पीनी पड़ती है, भूख लगे तो भूख ही खानी पड़ती है। जिसके मुँह में दाँत न हों, उसे लोहे के चने चबाने पड़ें, तो पेट भरेगा या प्राण जाएँगे? हाथों से तैरकर कौन समुद्र पार करता है, और आकाश में सीढ़ियाँ बनाकर कौन चढ़ता है? और फिर वह पंक्ति: जैसे लँगड़ा आदमी हवा से होड़ नहीं कर सकता, वैसे ही देह वाले जीव के लिए अव्यक्त की गति कठिन है। और अन्त में ज्ञानेश्वर कहते हैं: जो भक्ति के रास्ते पर चल पड़े, वे इस पीड़ा को जानते ही नहीं।

अब यहाँ भी आचार्यों की आवाज़ें अलग-अलग सुनाई देती हैं। विश्वनाथ चक्रवर्ती, जो चैतन्य परम्परा के आचार्य हैं, बहुत कड़ी बात कहते हैं: भक्ति के बिना केवल ब्रह्म की उपासना करने वालों को कष्ट ही मिलता है, और कुछ नहीं। पर शंकराचार्य और मधुसूदन की परम्परा में अक्षर का यह मार्ग कठिन है, पर अपने आप में पूरा है, और उसका फल परम है। हमारी अपनी टीका बीच में खड़ी है: दोनों एक ही जगह पहुँचते हैं, एक रास्ता सरल है, एक कठिन। मैं इतना ही कहूँगा कि यह श्लोक किसी रास्ते की निन्दा नहीं करता। यह केवल एक सच्चे वैद्य की तरह बताता है कि किस रास्ते में कितनी चढ़ाई है।

हम में से बहुत से लोग यह अनुभव जानते हैं। कोई कहता है, आँखें बन्द कीजिए और उस अनन्त को महसूस कीजिए जिसका कोई रूप नहीं। आप बैठते हैं, और दो मिनट में मन या तो दफ़्तर की किसी बात पर चला जाता है, या नींद आने लगती है। और वहीं घर की एक बूढ़ी अम्मा, जो पढ़ी-लिखी नहीं, ठाकुर जी की छोटी-सी मूर्ति के सामने बैठकर उनसे ऐसे बात करती है जैसे बेटे से कर रही हो, और उसका मन घंटों वहीं टिका रहता है। इसमें कोई छोटा या बड़ा नहीं है। बस, अम्मा के पास एक सहारा है, और भगवान ने वह सहारा जानबूझकर दिया है।

अब छठा श्लोक। "ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः।" परन्तु जो सब कर्मों को मुझमें अर्पण करके, मेरे परायण होकर, "अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते", अनन्य योग से मेरा ध्यान करते हुए मेरी उपासना करते हैं।

"संन्यस्य" शब्द पर ध्यान दीजिए। यहाँ इसका अर्थ कर्म छोड़ देना नहीं है, कर्म भगवान को सौंप देना है। लोकमान्य तिलक इस पर बहुत ज़ोर देते हैं। वे कहते हैं, भक्ति के मार्ग में भी कर्म छोड़े नहीं जाते, ईश्वर को अर्पण करके किए जाते हैं, और इसीलिए यहाँ "सब कर्म मुझमें संन्यस्त करके" कहा गया। रामानुजाचार्य यह भी बताते हैं कि "सब कर्म" में क्या-क्या आता है: शरीर चलाने वाले रोज़ के काम, खाना-पीना तक, और पूजा, दान, यज्ञ जैसे धर्म के काम भी। सब उन्हीं को सौंपे जाएँ। और ऐसे भक्त के लिए ध्यान, पूजा, प्रणाम, स्तुति और कीर्तन कोई बोझ नहीं रहते; रामानुज कहते हैं, ये अपने आप में इतने प्यारे हो जाते हैं कि मानो यही मंज़िल हों।

और अब वह प्रश्न, जो आज के सवाल का दिल है: किस रूप का ध्यान करें? मधुसूदन सरस्वती यहाँ एक पूरी माला गूँथ देते हैं। वे कहते हैं, ध्यान करो भगवान वासुदेव का, जो सारी सुन्दरता का भण्डार हैं, आनन्द से घना जिनका शरीर है: दो भुजाओं वाले रूप का, या चार भुजाओं वाले का; उस रूप का जो अपनी मुरली के सात मधुर स्वरों से सबका मन मोह लेता है; या उस रूप का जिसके हाथों में शंख, कमल, गदा और चक्र हैं; या नरसिंह रूप का, या परम करुणामय, सुन्दरों में सुन्दर श्री रघुनन्दन के रूप का, या वराह आदि रूपों का, या उसी विश्वरूप का जो अभी अर्जुन को दिखाया गया। सुनिए, कितनी खुली बात है। भगवान एक हैं, पर मन जिस रूप पर टिक जाए, वही रूप उस मन का दरवाज़ा है।

और "अनन्येनैव योगेन", अनन्य योग से। श्रीधर स्वामी कहते हैं, अनन्य वह जिसमें भजने योग्य कोई दूसरा न हो। और संत ज्ञानेश्वर कहते हैं, ऐसे भक्तों ने ध्यान के बहाने मेरा घर बना लिया है। उन्होंने भोग और मोक्ष दोनों को छोड़ दिया, और जीव, मन और शरीर से मेरे हाथ बिक गए। फिर भगवान पूछते हैं: तो उनके बारे में और क्या कहूँ? उनका तो सब कुछ मैं ही करता हूँ।

इन तीन श्लोकों से दूसरी बात यह निकलती है: अगर आपका मन किसी एक रूप पर टिकता है, किसी मूर्ति पर, किसी तस्वीर पर, किसी नाम पर, तो उसे छोटा मत समझिए। श्रीकृष्ण ने ख़ुद कहा है कि देह को ही "मैं" मानने वाले के लिए निराकार की राह कठिन है। रूप भगवान की दी हुई सीढ़ी है, और उस पर चढ़ने में कोई शर्म नहीं।

पर अभी एक बात बाकी है। छठा श्लोक भी अधूरा वाक्य है। उसमें बताया कि ये भक्त क्या करते हैं, पर यह नहीं बताया कि भगवान उनके लिए क्या करते हैं। और अगला श्लोक वही वचन है जिसे इस पूरी गीता के सबसे भरोसा देने वाले वचनों में गिना जाता है। आइए, सुनते हैं।

तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् । भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥ ७ ॥
गीता 12.7 — अर्थ पढ़ें ›
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय । निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥ ८ ॥
गीता 12.8 — अर्थ पढ़ें ›

अब वह वचन, जिसके लिए शायद यह पूरा अध्याय कहा गया। सातवाँ श्लोक, और यह छठे श्लोक के अधूरे वाक्य को पूरा करता है। "तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।" उनका, मैं, मृत्यु रूपी संसार-सागर से उद्धार करने वाला, "भवामि नचिरात्पार्थ", हे पार्थ, शीघ्र ही बन जाता हूँ, "मय्यावेशितचेतसाम्", उनका, जिन्होंने अपना चित्त मुझमें लगा दिया है।

इस श्लोक में सबसे भारी शब्द है "अहं", मैं। श्रीकृष्ण यह नहीं कहते कि वे पार हो जाएँगे। वे कहते हैं, मैं उन्हें पार ले जाऊँगा। हमारी टीका इस अन्तर को एक वाक्य में रख देती है: अव्यक्त का उपासक अपने प्रयत्न से पार होता है; भक्त को भगवान स्वयं पार ले जाते हैं। पाँचवें श्लोक में आपने सुना था कि एक रास्ते में चढ़ाई बहुत है। अब सुनिए कि दूसरे रास्ते पर चलने वाले का बोझ कौन उठाता है।

फिर "मृत्युसंसारसागरात्"। शंकराचार्य कहते हैं, संसार को सागर इसलिए कहा, क्योंकि इसे पार करना बहुत कठिन है, और इसके साथ मृत्यु जुड़ी है। जन्म, फिर मृत्यु, फिर जन्म, लहरों की तरह। और "नचिरात्", देर से नहीं, जल्दी। मधुसूदन सरस्वती तो कहते हैं, इसी जन्म में। और फिर वे एक छोटे-से शब्द पर रुकते हैं जिसे हम अक्सर अनसुना कर देते हैं: "पार्थ"। वे कहते हैं, यह सम्बोधन ढाढ़स देने के लिए है। मानो श्रीकृष्ण अर्जुन का नाम लेकर, उनकी माँ पृथा का नाम लेकर, कंधे पर हाथ रखकर कह रहे हों: बेटे, डरो मत, यह मैं कह रहा हूँ।

विश्वनाथ चक्रवर्ती एक बहुत कोमल बात देखते हैं। वे कहते हैं, देखिए, भगवान यहाँ भक्तों को पार होने का कोई तरीक़ा नहीं बताते। कोई विधि नहीं, कोई क्रम नहीं। बस इतना कहते हैं, मैं उन्हें तारूँगा। यह भगवान का वात्सल्य है, जैसे माँ बच्चे को नदी पार कराते समय उसे तैरना नहीं सिखाती, उसे गोद में उठा लेती है।

और संत ज्ञानेश्वर यहाँ इतना सुन्दर लिखते हैं कि मैं बस उनका भाव आपके सामने रख देता हूँ। श्रीकृष्ण कहते हैं: जो बच्चा माँ की कोख में आ गया, वह माँ का कितना अपना होता है। वैसे ही मेरे भक्त जैसे भी हों, मेरे अपने हैं। मैंने देखा कि यह सारी सृष्टि जन्म और मृत्यु की लहरों में डूब-उतर रही है, और मन में डर उठा कि कहीं मेरे भक्त भी न डर जाएँ। इसलिए मैं अनेक रूप लेकर उनके गाँव तक दौड़ता हुआ आया। मैंने अपने हज़ार नामों की नावें सजाईं, और संसार के सागर में मल्लाह बन गया। जो अकेले थे, उन्हें ध्यान की रस्सी से बाँधा; जिनके परिवार थे, उन्हें नाव में बिठाया; और प्रेम की पेटी उनके सीने से बाँधकर उन्हें किनारे तक ले आया। नामों की नावें। सोचिए, जब आप भगवान का एक नाम लेते हैं, तो ज्ञानेश्वर के हिसाब से आप एक नाव में पैर रखते हैं, और मल्लाह वे ख़ुद हैं।

अब इस वचन को महाभारत के एक दृश्य में देखिए। यह गीता के कई वर्ष बाद का है, युद्ध के बाद का, और इसे सञ्जय नहीं, व्यास के शिष्य वैशम्पायन राजा जनमेजय को सुनाते हैं। युद्ध के बाद युधिष्ठिर अश्वमेध यज्ञ की तैयारी कर रहे थे। उसी समय श्रीकृष्ण द्वारका से हस्तिनापुर आए, बलराम, सुभद्रा और यादवों के साथ, कुन्ती, द्रौपदी और उत्तरा से मिलने, और उन स्त्रियों को सान्त्वना देने जिनके पति युद्ध में मारे गए थे।

उन्हीं दिनों अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ से बालक का जन्म हुआ। पर युद्ध के अन्त में अश्वत्थामा ने जो ब्रह्मास्त्र छोड़ा था, उससे पीड़ित वह बालक मरा हुआ जन्मा। पाठ कहता है, लोगों की ख़ुशी की आवाज़ सब दिशाओं में फैली, और फिर लौट आई। श्रीकृष्ण बहुत जल्दी अन्तःपुर में गए, उनका मन व्यथित था। और उन्होंने देखा कि उनकी बुआ कुन्ती उनकी ओर दौड़ी आ रही हैं, बार-बार पुकारती हुई: "वासुदेव, दौड़ो!" पीछे द्रौपदी, सुभद्रा और पाण्डवों के घर की स्त्रियाँ करुण स्वर में रो रही थीं।

कुन्ती ने आँसुओं से रुँधे गले से कहा: "वासुदेव, तुम हमारी गति हो, हमारा आधार हो, यह कुल तुम पर ही टिका है। तुमने उस अस्त्र के बारे में प्रतिज्ञा की थी कि मरे हुए जन्मे बालक को तुम जिलाओगे। यह वही बालक है। इसे देखो।" सुभद्रा ने भाई से कहा: "जैसे बादल बरसकर सूखती फसल को जिला देता है, वैसे इसे जिला दो। तुम चाहो तो तीनों लोकों के मरे हुओं को जिला सकते हो। यह तुम्हारी बहन है, और तुम्हारी शरण में आई है।" और उत्तरा, बालक को गोद में लेकर, उससे बोली: "तुम धर्म जानने वाले के बेटे हो, फिर भी धर्म नहीं समझते? देखो, वृष्णियों के वीर आए हैं, और तुम उन्हें प्रणाम भी नहीं करते। उठो बेटा, उठकर लोकनाथ का कमल जैसी आँखों वाला मुख देखो।" फिर वह उठी, और हाथ जोड़कर भूमि पर ही श्रीकृष्ण को प्रणाम किया।

और तब श्रीकृष्ण ने जल का स्पर्श करके उस ब्रह्मास्त्र को समेट लिया, और सारे जगत् को सुनाते हुए कहा: "उत्तरा, मैं झूठ नहीं कहता। मैंने कभी हँसी में भी झूठ नहीं कहा, कभी युद्ध से पीठ नहीं दिखाई। उस सत्य से यह बालक जी उठे। जैसे सत्य और धर्म मुझमें सदा टिके हैं, वैसे ही अभिमन्यु का यह बेटा जी उठे।" फिर उन्होंने अपने कमल जैसे पाँव से, पाठ कहता है, ब्रह्मा और रुद्र जिसकी पूजा करते हैं उस पाँव से, बालक को तलवों से सिर तक छुआ। और छूते ही वह बालक धीरे-धीरे चेतना पाने लगा, और धीरे-धीरे हिलने लगा।

पाठ आगे कहता है, वह घर बालक के तेज से जगमगा उठा, और आकाश से आवाज़ आई: "साधु केशव, साधु!" और फिर वह वाक्य, जिसके लिए मैं यह कथा आज आपको सुना रहा हूँ: कुन्ती, द्रौपदी, सुभद्रा और उत्तरा ऐसे प्रसन्न हुईं, मानो पार जाने के लिए उन्हें नाव मिल गई हो। श्रीकृष्ण ने बालक का नाम रखा: "क्योंकि यह कुल के क्षीण हो जाने पर जन्मा है, इसका नाम परीक्षित हो।" और एक बात सोचिए। वैशम्पायन यह कथा जनमेजय को सुनाते हुए बार-बार कहते हैं, "हे राजन्, आपके पिता"। जिस बालक को श्रीकृष्ण ने मृत्यु के सागर से उठाया, उसी का बेटा बैठकर यह पूरा महाभारत सुन रहा है।

"तेषामहं समुद्धर्ता", मैं उनका उद्धार करने वाला बनता हूँ। उस दिन उस घर में किसी के पास कोई उपाय नहीं बचा था। न वैद्य कुछ कर सकते थे, न रक्षा के लिए रखी चीज़ें। बचा था केवल एक पुकारता हुआ मन, "वासुदेव, दौड़ो"। और वे दौड़े। यह मेरी अपनी पढ़त है कि यह दृश्य इस श्लोक का चित्र है; पाठ ख़ुद इसे गीता से नहीं जोड़ता। पर "नाव मिल गई" वाला वाक्य पाठ का है, और "संसार-सागर" वाला शब्द गीता का।

अब आठवाँ श्लोक, और यहाँ से श्रीकृष्ण वह सीढ़ी शुरू करते हैं जिसका वादा मैंने किया था। "मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।" मन को मुझमें ही लगाओ, बुद्धि को मुझमें स्थिर करो। "निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः", इसके बाद तुम मुझमें ही निवास करोगे, इसमें संशय नहीं।

हमारी टीका कहती है, यह उस सीढ़ी का पहला और सबसे ऊँचा पायदान है जो ग्यारहवें श्लोक तक चलती है। और ध्यान दीजिए, यहाँ दो चीज़ें अलग-अलग माँगी गई हैं, मन और बुद्धि। शंकराचार्य और श्रीधर स्वामी दोनों बताते हैं कि मन वह है जो सोचता रहता है, यह करूँ या वह करूँ, यह ठीक है या वह। और बुद्धि वह है जो फ़ैसला करती है, निश्चय करती है। यानी श्रीकृष्ण कहते हैं, तुम्हारा सोचना भी मुझमें हो, और तुम्हारा निश्चय भी। ऐसा न हो कि मन तो पूजा में हो, और जीवन के फ़ैसले कहीं और से आएँ।

"अत ऊर्ध्वं", इसके बाद, पर किसके बाद? यहाँ फिर आचार्यों में सुन्दर अन्तर है। शंकराचार्य और श्रीधर स्वामी कहते हैं, शरीर छूटने के बाद, तुम मुझमें निवास करोगे। पर रामानुजाचार्य कहते हैं, नहीं, जैसे ही मन और बुद्धि मुझमें लग गए, उसके ठीक बाद, यानी अभी से, तुम मुझमें रहने लगोगे। एक कहते हैं, घर पहुँचोगे। दूसरे कहते हैं, घर में आ गए। मुझे दोनों बातें प्यारी लगती हैं, और दोनों सच्ची।

और मधुसूदन सरस्वती एक छोटी-सी बात पकड़ते हैं जिसे पढ़ने वाले अक्सर नहीं देखते। "मय्येव अत ऊर्ध्वं", यहाँ दो शब्द बिना सन्धि के, अलग-अलग रखे गए हैं, जबकि संस्कृत में आम तौर पर ये जुड़ जाते। वे कहते हैं, यह छन्द को पूरा करने के लिए है। मुझे यह छोटी-सी बात भी अच्छी लगती है, कि जहाँ भगवान कहते हैं "मुझमें ही", वहाँ वह "मुझमें" अपनी जगह अलग, साफ़ खड़ा रह गया।

और संत ज्ञानेश्वर कहते हैं: जब मन और बुद्धि ने मुझमें घर बना लिया, तो बताओ, फिर "मैं" और "तुम" कहने को बचता क्या है? जैसे दीया बुझते ही उसकी रोशनी भी चली जाती है, जैसे सूर्य के साथ ही धूप भी चली जाती है। और फिर श्रीकृष्ण ज्ञानेश्वर के मुँह से कहते हैं: इस बात में कुछ भी उलटा नहीं, मैं अपनी सौगन्ध खाकर कहता हूँ। यही है "न संशयः"। भगवान यहाँ कसम खा रहे हैं।

मन और बुद्धि का एक ही जगह टिक जाना कैसा दिखता है, इसका चित्र आपने सातवें सत्संग में देखा था। द्रोण ने पेड़ की चोटी पर नकली पक्षी रखवाया था, युधिष्ठिर और बाकी राजकुमार पेड़, गुरु और भाइयों को भी देखते रहे और हटा दिए गए, और अर्जुन ने कहा था कि मुझे केवल पक्षी का सिर दिखता है। उसे मैं दोबारा नहीं सुनाऊँगा।

सातवें सत्संग में हमने उसे फल की चिंता से छूटे काम की एकाग्रता के रूप में देखा था। आज उसी को "मय्येव" के सामने रखिए। वह कथा भगवान के ध्यान की नहीं, धनुर्विद्या की है। पर "मय्येव", मुझमें ही, उस "ही" का अर्थ इससे अच्छा कौन समझाएगा? जब मन पूजा में बैठे, तो पेड़, गुरु, भाई, पूरा संसार धीरे-धीरे पीछे हो जाए, और केवल वह रह जाए। और देखिए, जिस अर्जुन ने बचपन में पक्षी के सिर के सिवा कुछ नहीं देखा था, आज उसी से भगवान कह रहे हैं: अब वैसे ही मुझे देखो।

इन दो श्लोकों से तीसरी बात यह निकलती है: आपको अपने आप को अकेले पार नहीं उतारना है। अगर मन उनमें लगा है, तो पार उतारने का काम उनका है। "तेषामहं समुद्धर्ता।" जब जीवन में कोई ऐसा दिन आए जब कोई उपाय न बचे, तो कुन्ती की तरह पुकारिए, "वासुदेव, दौड़ो"। वे देर नहीं करते।

पर अभी एक बात बाकी है। यह पहला पायदान बहुत ऊँचा है। अर्जुन ने तो बचपन से एकाग्रता साधी थी। पर हम में से ज़्यादातर का मन एक मिनट भी एक जगह नहीं टिकता। तो क्या हमारे लिए यह रास्ता बन्द है? श्रीकृष्ण अगले ही श्लोक में इसका उत्तर देते हैं, और वह उत्तर बहुत कोमल है। आइए, सुनते हैं।

अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् । अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनंजय ॥ ९ ॥
गीता 12.9 — अर्थ पढ़ें ›
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव । मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ॥ १० ॥
गीता 12.10 — अर्थ पढ़ें ›

नौवाँ श्लोक, सीढ़ी का दूसरा पायदान। "अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम्।" यदि तुम चित्त को मुझमें स्थिर रूप से नहीं लगा सकते, "अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनंजय", तो हे धनंजय, अभ्यासयोग के द्वारा मुझे पाने की इच्छा करो।

पहले उस छोटे-से शब्द को सुनिए जिससे यह श्लोक शुरू होता है: "अथ", यदि। भगवान ने अभी सबसे ऊँची बात कही थी, और अगली ही साँस में कहते हैं, यदि यह न हो सके तो। न कोई डाँट, न कोई निराशा। जैसे कोई अच्छा शिक्षक कहे, यह सवाल कठिन लगा, कोई बात नहीं, इससे आसान वाला करके देखो।

हमारी टीका अभ्यास का अर्थ बहुत साफ़ बताती है: भटकते मन को बार-बार, जब भी वह भटके, भगवान में वापस लाना। शंकराचार्य भी यही कहते हैं: मन को सब ओर से समेटकर किसी एक सहारे पर बार-बार टिकाना, यही अभ्यास है। ध्यान दीजिए, यहाँ यह नहीं कहा कि मन भटकेगा नहीं। मान लिया गया है कि भटकेगा। अभ्यास भटकने का नाम नहीं, लौटा लाने का नाम है। जितनी बार भटके, उतनी बार लौटाइए, और हर लौटना अपने आप में साधना है।

और सहारा कौन-सा? मधुसूदन सरस्वती और नीलकण्ठ, दोनों यहाँ एक बहुत व्यावहारिक बात कहते हैं: मन को किसी एक आलम्बन पर टिकाओ, जैसे भगवान की प्रतिमा पर। नीलकण्ठ कहते हैं, वह सहारा भीतर का भी हो सकता है, बाहर का भी। और शंकराचार्य "इच्छ" का अर्थ करते हैं, प्रार्थना करो। यानी अभ्यास केवल मन की कसरत नहीं; उसके साथ एक माँग भी जुड़ी है, हे भगवान, मुझे अपने पास आने दो।

और "धनंजय", यह सम्बोधन भी ख़ाली नहीं है। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, अर्जुन, तुमने बहुत से शत्रुओं को जीतकर राजसूय के लिए धन जुटाया था। वैसे ही इस मन रूपी शत्रु को जीतकर ज्ञान का धन ले आओगे, इसमें तुम्हारे लिए कोई आश्चर्य की बात नहीं। नाम से ही याद दिला दिया कि जीतना तुम्हें आता है।

आपको याद होगा, बीसवें सत्संग में अर्जुन ने कहा था कि मन बहुत चंचल है, उसे रोकना हवा को रोकने जैसा है, और श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया था, "अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते", अभ्यास और वैराग्य से वह पकड़ में आता है। उसी सत्संग में हमने वह कथा भी सुनी थी, कि अँधेरे में हवा से दीया बुझ गया, फिर भी भोजन करते अर्जुन का हाथ मुँह तक ही गया, और उन्होंने समझ लिया कि यह अभ्यास का फल है, और रात में भी धनुष का अभ्यास करने लगे। आज वही बात भगवान भक्ति पर लागू कर रहे हैं।

संत ज्ञानेश्वर इस अभ्यास को इतना छोटा करके देते हैं कि कोई भी कर सके। श्रीकृष्ण कहते हैं: दिन-रात के आठों पहर में से बस एक पल मुझे देते जाओ। फिर जो-जो पल मेरे सुख को देखेगा, उतना-उतना विषयों का स्वाद फीका पड़ता जाएगा। जैसे शरद ऋतु आते ही नदी उतरने लगती है, जैसे पूर्णिमा के बाद चन्द्रमा रोज़ थोड़ा-थोड़ा घटता है, वैसे ही मन धीरे-धीरे संसार से निकलकर मुझमें आता जाएगा। और फिर वे कहते हैं, अभ्यास से कुछ भी असम्भव नहीं। अभ्यास से लोगों ने बाघ और साँप को भी सीधा कर लिया, विष को भोजन बना लिया, समुद्र में पगडण्डी बना ली।

अब महाभारत की एक कथा, जो अभ्यास और रूप, दोनों को एक साथ दिखाती है। और यह कथा कठिन भी है, इसलिए मैं इसे जैसी पाठ में है वैसी ही सुनाऊँगा। जब द्रोण हस्तिनापुर में राजकुमारों को धनुर्विद्या सिखा रहे थे, तब निषादों के राजा हिरण्यधनु का बेटा एकलव्य उनके पास आया। द्रोण ने उसे शिष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया, यह सोचकर कि यह निषाद का पुत्र है, और उन्होंने राजकुमारों का ही ध्यान रखा। एकलव्य ने सिर से उनके चरण छुए, और वन में चला गया। और वहाँ उसने द्रोण की एक मिट्टी की मूर्ति बनाई।

पाठ कहता है, उस मूर्ति के प्रति गुरु जैसा पूरा सम्मान रखते हुए, कठोर नियम पालकर, उसने धनुर्विद्या का अभ्यास शुरू किया। बड़ी श्रद्धा और पूरी एकाग्रता से उसने बाण चढ़ाने, खींचने और छोड़ने में इतनी फुर्ती पा ली कि जब एक दिन पाण्डवों के साथ आया एक कुत्ता उस पर भौंका, तो उसने कुत्ते के मुँह में सात बाण ऐसे भर दिए मानो एक साथ छोड़े हों। पाण्डवों ने आश्चर्य से उसे खोजा और पूछा, आप कौन हैं? उसने कहा: मुझे निषादराज हिरण्यधनु का पुत्र जानिए, और द्रोण का शिष्य।

आगे की बात आप जानते होंगे। अर्जुन को याद आया कि गुरु ने उनसे कहा था, तुमसे बढ़कर मेरा कोई शिष्य नहीं होगा। उन्होंने द्रोण से पूछा। द्रोण अर्जुन को लेकर एकलव्य के पास गए, और गुरुदक्षिणा में उसका दाहिना अँगूठा माँगा। एकलव्य ने कहा था, ऐसा कुछ नहीं जो मैं अपने गुरु को न दूँ। और पाठ कहता है, उसका मुख वैसा ही प्रसन्न रहा, मन में कोई दुख नहीं आया, और उसने अँगूठा काटकर दे दिया। उसके बाद वह पहले जितना तेज़ नहीं रहा।

इस कथा पर लोग बहुत कुछ कहते हैं, और मैं आज उस पर फ़ैसला सुनाने नहीं बैठा। पाठ भी कुछ नहीं छिपाता। पर आज के श्लोक के लिए जो बात इस कथा से निकलती है, वह यह है: गुरु सामने नहीं थे। सामने थी मिट्टी की एक मूर्ति। फिर भी उस मूर्ति के सामने, श्रद्धा के साथ, रोज़ के अभ्यास से, वह लड़का अपने समय के सबसे तेज़ धनुर्धरों में गिना गया। मधुसूदन सरस्वती ने कहा था, अभ्यास के लिए प्रतिमा जैसा कोई सहारा लो। एकलव्य ने ठीक वही किया। मूर्ति मिट्टी की थी; श्रद्धा और अभ्यास मिट्टी के नहीं थे।

अब दसवाँ श्लोक, तीसरा पायदान। "अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव।" यदि तुम अभ्यास में भी असमर्थ हो, तो मेरे लिए कर्म करने में तत्पर हो जाओ। "मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि", मेरे लिए कर्म करते हुए भी तुम सिद्धि पा लोगे।

फिर वही कोमलता: "अपि", भी। यदि अभ्यास भी न हो सके। भगवान किसी को सीढ़ी से नीचे नहीं धकेलते, बस अगला, थोड़ा नीचा पायदान दिखा देते हैं, ताकि पैर कहीं तो टिके।

"मत्कर्म", मेरे कर्म, यानी कौन-से कर्म? यहाँ आचार्य जो सूचियाँ देते हैं, वे बड़ी घरेलू हैं, और मुझे बहुत प्यारी लगती हैं। रामानुजाचार्य गिनाते हैं: भगवान का मन्दिर बनाना, फूलों की बगिया लगाना, दीया जलाना, बुहारना, जल छिड़कना, लीपना, फूल चुनना, पूजा करना, नाम का कीर्तन, परिक्रमा, प्रणाम और स्तुति। श्रीधर स्वामी कहते हैं, एकादशी का उपवास, व्रत, और नाम-संकीर्तन। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, भगवान की कथा सुनना और गाना। और नीलकण्ठ पूरी नौ तरह की भक्ति गिना देते हैं: सुनना, गाना, स्मरण, चरणों की सेवा, पूजा, वन्दना, दास-भाव, सखा-भाव, और अपने आपको सौंप देना।

सोचिए, इसमें कितनी जगह है। जिसका मन ध्यान में नहीं टिकता, वह फूल तो चुन सकता है। जिससे जप की माला पूरी नहीं होती, वह मन्दिर का आँगन तो बुहार सकता है। और शंकराचार्य कहते हैं, ऐसे काम, अभ्यास के बिना भी, केवल भगवान के लिए करते-करते मन शुद्ध होता है, और वही शुद्ध मन आगे योग और ज्ञान तक ले जाता है। "सिद्धिमवाप्स्यसि", सिद्धि मिलेगी, यह भगवान का वचन है।

और संत ज्ञानेश्वर इस पायदान को और भी बड़ा कर देते हैं, घर-गृहस्थी तक। श्रीकृष्ण कहते हैं: इन्द्रियों को मत रोको, भोग को मत काटो, जिस स्थिति में हो उसी में रहो, अपने कुल का धर्म निभाओ। बस इतना करो कि मन, वाणी और शरीर से जो काम हो, उसके लिए यह मत कहो कि "मैं कर रहा हूँ"। उस पानी जैसे बन जाओ जिसे माली जिधर ले जाए, उधर चुपचाप बह जाता है। रथ क्या कभी शिकायत करता है कि रास्ता सीधा है या टेढ़ा? और जो काम हो जाए, थोड़ा या बहुत, उसे बिना गिने मुझे सौंप दो।

और पिछली कथा का एक छोटा-सा दृश्य यहाँ भी याद आता है। परीक्षित के जी उठने के बाद, जब पाण्डव अश्वमेध के लिए धन लेकर लौट रहे थे, तो पाठ कहता है, वे भार ढोने वालों के साथ, हर पड़ाव पर रुकते हुए, परमेष्ठी भगवान का स्मरण करते हुए चले। और वहाँ राजा युधिष्ठिर को छोड़कर कोई ऐसा न था जो बिना भार के हो; भीम आदि भी यज्ञ के लिए बोझ ढो रहे थे। भीम जैसे योद्धा के कंधे पर बोझ, और मन में भगवान का स्मरण। "मदर्थमपि कर्माणि", मेरे लिए कर्म, शायद ऐसा ही दिखता है।

आज के घर में भी यह पायदान रोज़ दिखता है। एक माँ रसोई में खाना बनाती है, और पहली रोटी भगवान के लिए अलग रख देती है। एक बेटा दफ़्तर से थककर आता है, और जाते-जाते पूजा के दीये में तेल डाल देता है। कोई अस्पताल में किसी अनजान मरीज़ की सेवा को मन ही मन भगवान की सेवा मान लेता है। ये लोग शायद कभी ध्यान में न बैठ पाएँ। पर भगवान कहते हैं, ये भी सिद्धि पाएँगे।

इन दो श्लोकों से चौथी बात यह निकलती है: अगर आपका मन टिकता नहीं, तो उसे बार-बार लौटाइए; और अगर लौटाना भी कठिन लगे, तो हाथ से भगवान का कोई छोटा-सा काम कीजिए। किसी एक रूप के सामने, रोज़, थोड़ा-सा। मिट्टी की मूर्ति भी काफ़ी है, अगर श्रद्धा सच्ची हो।

पर अभी एक बात बाकी है। अगर किसी से यह भी न हो सके? न ध्यान, न अभ्यास, न पूजा-पाठ, न मन्दिर का कोई काम? क्या उसके लिए भी कोई पायदान है? श्रीकृष्ण कहते हैं, है। और वह इतना बड़ा है कि अगला श्लोक उसे बाकी सब से ऊपर रख देता है। आइए, आख़िरी दो श्लोक सुनते हैं।

अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः । सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥ ११ ॥
गीता 12.11 — अर्थ पढ़ें ›
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते । ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ॥ १२ ॥
गीता 12.12 — अर्थ पढ़ें ›

ग्यारहवाँ श्लोक, सीढ़ी का आख़िरी पायदान। "अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः।" यदि तुम यह भी करने में असमर्थ हो, तो मेरी शरण लेकर, "सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्", मन को वश में रखकर, सब कर्मों के फल का त्याग करो।

यहाँ एक भूल बहुत आसानी से हो सकती है, इसलिए हमारी टीका पहले ही सावधान कर देती है। इसका अर्थ कर्म छोड़ना नहीं है। अपने कर्तव्य करते रहो, पर उनके फल की इच्छा और आसक्ति छोड़ दो। और टीका एक बात और कहती है: यह पायदान अन्त में आता है, पर यह कोई छोटा मार्ग नहीं है। अगला श्लोक इसे बाकी सबसे ऊपर रखता है। टीका यह भी बताती है कि कुछ लोग "मेरी शरण लेकर" को पहले हिस्से से जोड़ते हैं: यदि मेरी शरण लेकर यह भी न कर सको, तो फल का त्याग करो।

श्रीधर स्वामी इस श्लोक का भाव एक ऐसे वाक्य में रखते हैं जो मुझे इस पूरे अध्याय का सबसे घरेलू वाक्य लगता है। वे कहते हैं, मानो साधक मन में यह सोचे: भगवान की आज्ञा से जितना बन पड़े, मुझे अपने काम करने हैं; उनका फल, दिखने वाला हो या न दिखने वाला, भगवान के अधीन है। और फिर वे कहते हैं, इस तरह सारा भार मुझ पर डालकर, फल की पकड़ छोड़कर जो जीता है, वह मेरी कृपा से कृतार्थ हो जाता है। भार मुझ पर डालकर। काम आपका, बोझ उनका।

संत ज्ञानेश्वर फल-त्याग के लिए प्रकृति से चित्र लेते हैं। जैसे पेड़ और बेलें पके फल को अपने आप गिरा देती हैं, वैसे ही हर काम पूरा होते ही उसका फल छोड़ते चलो। और फिर वे कहते हैं, यह फल-त्याग देखने में भले छोटा लगे, पर योगों में यह सबसे आगे का योग है। जिस कर्म का फल छोड़ दिया, वह फिर अंकुर नहीं देता, जैसे बाँस एक बार फूलकर बाँझ हो जाता है।

और रामानुजाचार्य यहाँ फिर एक अलग राह दिखाते हैं। वे कहते हैं, जिससे भक्ति के ये अंग भी न सधें, वह गीता के पहले छह अध्यायों वाला मार्ग पकड़े: फल छोड़कर भगवान की आराधना के रूप में कर्म करे। उससे पाप घटेंगे, मन शान्त होगा, आत्मा का ज्ञान होगा, और फिर परम भक्ति अपने आप जन्म लेगी। यानी उनकी दृष्टि में यह पायदान भी उसी भक्ति की ओर लौटता है।

अब महाभारत से एक दृश्य, जहाँ यही बात एक मनुष्य के मुँह से निकली है, गीता से बहुत पहले। आपको याद होगा, आठवें सत्संग में हमने वनवास के दिनों की वह बातचीत सुनी थी, जब द्रौपदी ने दुखी होकर युधिष्ठिर से कहा था कि अब तेज दिखाने का समय है, और युधिष्ठिर ने मुस्कुराकर क्रोध के बारे में उत्तर दिया था। उसी बातचीत में आगे द्रौपदी ने विधाता पर, और धर्म के फल पर भी, बड़े कड़वे प्रश्न उठाए। धर्म करने वाला वन में भटक रहा है, तो धर्म का फल कहाँ है?

और युधिष्ठिर ने जो उत्तर दिया, वह मानो आज के श्लोक की टीका है। उन्होंने कहा: "हे राजकुमारी, मैं धर्म के फल की चाह से आचरण नहीं करता। मैं देता हूँ, क्योंकि देना चाहिए। मैं यज्ञ करता हूँ, क्योंकि यज्ञ करना चाहिए। फल हो या न हो, घर में रहने वाले मनुष्य को जो करना चाहिए, वह मैं जितना बन सके, करता हूँ।" फिर कहा: "मेरा मन अपने स्वभाव से ही धर्म में टिका है। जो धर्म का व्यापार करता है, वह धर्म की बात करने वालों में सबसे नीचा है। जो धर्म को दुहना चाहता है, उसे धर्म का फल नहीं मिलता।"

धर्म का व्यापार। कितना सच्चा शब्द है। हम में से कितनी बार भगवान से सौदा करते हैं: इतने व्रत रखूँगा, तो यह काम हो जाए; इतना दान दूँगा, तो वह मिल जाए। युधिष्ठिर कहते हैं, यह व्यापार है, धर्म नहीं। और फिर उसी बातचीत में वे एक चित्र देते हैं: द्रौपदी, स्वर्ग जाने वालों के लिए धर्म ही नाव है, जैसे समुद्र पार जाना चाहने वाले व्यापारी के लिए नाव। आज फिर नाव आ गई। सातवें श्लोक में भगवान ख़ुद मल्लाह बने थे, परीक्षित के घर में स्त्रियों को लगा था कि नाव मिल गई, और यहाँ युधिष्ठिर कहते हैं, धर्म नाव है। और उनका अन्तिम वचन वही है जो इस श्लोक का "मद्योगमाश्रितः" है। वे कहते हैं: प्राणियों के विधाता ईश्वर की निन्दा मत करो। उन्हें जानो, उन्हें नमस्कार करो। उनकी कृपा से उनका भक्त अमरता पाता है।

अब बारहवाँ श्लोक, आज का अन्तिम श्लोक। "श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते।" अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञान से ध्यान श्रेष्ठ है। "ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्", ध्यान से कर्मफल का त्याग श्रेष्ठ है, और त्याग से तुरन्त शान्ति मिलती है।

अब यहाँ एक पहेली है, और सदियों से आचार्य इस पर रुके हैं। अभी-अभी सीढ़ी में फल-त्याग सबसे नीचे था, उसके लिए जिससे कुछ और न हो सके। और यहाँ वही फल-त्याग ध्यान से भी ऊपर रख दिया गया! यह कैसे?

हमारी टीका कहती है: यहाँ ज्ञान का अर्थ है शास्त्र से मिली समझ। ऐसी समझ के बिना किया गया अभ्यास उससे नीचे है। और फल-त्याग की प्रशंसा सबसे ऊपर इसलिए है कि उससे बिना किसी और कदम की प्रतीक्षा किए, तुरन्त शान्ति मिलती है।

शंकराचार्य इसे इस तरह समझाते हैं: यह फल-त्याग की प्रशंसा है, साधक का उत्साह बढ़ाने के लिए। जैसे कहा जाता है कि एक ब्राह्मण, अगस्त्य, ने समुद्र पी लिया था, तो उस नाते आज के ब्राह्मणों की भी प्रशंसा हो जाती है। वैसे ही, जिस ज्ञानी ने सब कामनाएँ छोड़ दीं, उसे तुरन्त शान्ति मिलती है; और फल छोड़ने वाला भी एक तरह से कामना ही छोड़ रहा है, इसलिए उसकी भी वही प्रशंसा। पर लोकमान्य तिलक इससे साफ़ असहमत हैं। वे कहते हैं, इसे केवल प्रशंसा मान लेना भूल है। गीता का अपना मत यही है कि निष्काम कर्मयोग सब मार्गों में श्रेष्ठ है, और बारहवाँ श्लोक उसी की पुष्टि करता है। और वे यह भी कहते हैं कि पिछले श्लोक का "ततः" बताता है कि फल-त्याग एक झटके में नहीं, धीरे-धीरे सधता है। हम यहाँ भी किसी का पक्ष नहीं लेंगे; दोनों बातें आपके सामने हैं।

और रामानुजाचार्य इस श्लोक को उलटी दिशा से पढ़ते हैं, जो मुझे बहुत सुन्दर लगता है। वे कहते हैं, फल छोड़कर किए गए कर्म से तुरन्त मन शान्त होता है; शान्त मन में ध्यान सधता है; ध्यान से ज्ञान आता है; और ज्ञान से परम भक्ति। यानी जो सबसे नीचे का पायदान लगता था, वही असल में सबसे पहला दरवाज़ा है। संत ज्ञानेश्वर भी यही कहते हैं: अभ्यास की सीढ़ी से ज्ञान तक, ज्ञान से ध्यान तक, ध्यान में कर्म अपने आप दूर होते हैं, वहाँ फल-त्याग सधता है, और त्याग से पूरी शान्ति।

और अन्त के उस शब्द को अपने साथ ले जाइए: "अनन्तरम्", तुरन्त, बिना बीच में किसी देरी के। शान्ति के लिए किसी बड़े दिन का इन्तज़ार नहीं करना। जिस पल आप किसी काम का फल भगवान पर छोड़ते हैं, उसी पल मन का एक बोझ उतर जाता है। परीक्षा का नतीजा, बेटे की नौकरी, अपनी रिपोर्ट, जो भी हो। काम पूरे मन से कीजिए, और फल उनके हाथ में रख दीजिए। देखिए, उसी पल साँस थोड़ी हल्की हो जाती है।

अगले सत्संग में श्रीकृष्ण इसी अध्याय का दूसरा भाग कहेंगे, और बताएँगे कि वह भक्त कैसा होता है जो उन्हें प्रिय है। आज बस इतना जान लीजिए कि उस भक्त तक पहुँचने की सीढ़ी आपने आज देख ली।

तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली बात। साकार और निराकार में झगड़ा मत कीजिए। श्रीकृष्ण ने भक्तों को सबसे श्रेष्ठ योगी कहा, पर निराकार के साधकों के लिए भी कहा, "मामेव", वे भी मुझे ही पाते हैं। जिस रूप पर आपका मन टिके, वही आपका दरवाज़ा है; और जो रूप से परे खोजता है, उसका भी सम्मान कीजिए।

दूसरी बात। भगवान ने एक सीढ़ी दी है, और उसमें हर आदमी के लिए एक पायदान है। मन टिके तो उसे उनमें लगाइए; न टिके तो बार-बार लौटाइए; वह भी न हो तो उनके लिए कोई छोटा-सा काम कीजिए; और वह भी न हो तो अपने हर काम का फल उन्हें सौंप दीजिए। आज ही देखिए कि आप किस पायदान पर खड़े हैं, और वहीं से एक कदम उठाइए।

तीसरी बात। आपको संसार का सागर अकेले पार नहीं करना है। "तेषामहं समुद्धर्ता", भगवान ख़ुद कहते हैं, मैं उन्हें पार ले जाता हूँ। जिस दिन कोई उपाय न बचे, उस दिन कुन्ती की तरह बस पुकारिए। वे दौड़कर आते हैं।

आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आपका मन भगवान के किस रूप पर सबसे सहज टिकता है, या आप उन्हें बिना किसी रूप के महसूस करते हैं? और इस सीढ़ी में आज आप किस पायदान पर खड़े हैं? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।

रूप हो या रूप से परे, पहुँचना उन्हीं तक है। और जो उनमें मन लगा दे, उसकी नाव वे ख़ुद खेते हैं।

जय श्री कृष्ण।

तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् । भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥ ७ ॥
गीता 12.7 — अर्थ पढ़ें ›

तीन बातें

  1. साकार और निराकार में झगड़ा मत कीजिए। श्रीकृष्ण ने भक्तों को सबसे श्रेष्ठ योगी कहा, पर निराकार के साधकों के लिए भी कहा, "मामेव", वे भी मुझे ही पाते हैं। जिस रूप पर आपका मन टिके, वही आपका दरवाज़ा है; और जो रूप से परे खोजता है, उसका भी सम्मान कीजिए।
  2. भगवान ने एक सीढ़ी दी है, और उसमें हर आदमी के लिए एक पायदान है। मन टिके तो उसे उनमें लगाइए; न टिके तो बार-बार लौटाइए; वह भी न हो तो उनके लिए कोई छोटा-सा काम कीजिए; और वह भी न हो तो अपने हर काम का फल उन्हें सौंप दीजिए। आज ही देखिए कि आप किस पायदान पर खड़े हैं, और वहीं से एक कदम उठाइए।
  3. आपको संसार का सागर अकेले पार नहीं करना है। "तेषामहं समुद्धर्ता", भगवान ख़ुद कहते हैं, मैं उन्हें पार ले जाता हूँ। जिस दिन कोई उपाय न बचे, उस दिन कुन्ती की तरह बस पुकारिए। वे दौड़कर आते हैं।