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सत्संग ३४

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फिर से वही प्यारा रूप

गीता 11.45–11.55 · 76 मिनट

डर से प्रेम तक; केवल भक्ति से दर्शन

अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे । तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ ४५ ॥
गीता 11.45 — अर्थ पढ़ें ›
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्त- मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव । तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ॥ ४६ ॥
गीता 11.46 — अर्थ पढ़ें ›
श्रीभगवानुवाच मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् । तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥ ४७ ॥
गीता 11.47 — अर्थ पढ़ें ›

कभी ऐसा हुआ है कि कोई बहुत बड़ी, बहुत भारी चीज़ सामने आ गई हो, अस्पताल का कोई लम्बा गलियारा, किसी डॉक्टर की गम्भीर आवाज़, या कोई ऐसी ख़बर जिसके आगे पूरा जीवन छोटा लगने लगे, और उस घड़ी मन ने बस एक ही चीज़ माँगी हो: माँ का चेहरा, किसी अपने का हाथ, कोई जानी-पहचानी आवाज़? आज का सवाल यही है। जब भगवान का वह बड़ा रूप दिख जाए, जो सब कुछ निगल रहा है, तो मन किस रूप पर टिके? क्या फिर से वही प्यारा, अपना-सा रूप मिल सकता है? और उस तक पहुँचने का रास्ता क्या है?

जय श्री कृष्ण।

आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का चौंतीसवाँ सत्संग है, और आज ग्यारहवाँ अध्याय पूरा होगा। महाभारत के भीष्म पर्व का पैंतीसवाँ अध्याय ही गीता का ग्यारहवाँ अध्याय है, "विश्वरूप दर्शन योग"। और याद रहे, यह सब हमें सञ्जय सुना रहे हैं, हस्तिनापुर में, अन्धे राजा धृतराष्ट्र को, उस दिन जब भीष्म बाणों की शय्या पर गिर चुके हैं।

पहले याद कर लें कि पिछली बार हम कहाँ रुके थे। पिछले सत्संग में श्रीकृष्ण ने अपना सबसे कठोर वचन कहा था: "कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो", मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ काल हूँ। ये योद्धा तुम्हारे बिना भी नहीं बचेंगे, ये मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं, "निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्", तुम केवल निमित्त बनो। और फिर अर्जुन काँपते हुए, हाथ जोड़कर, फिर से स्तुति करने लगे, और एक ऐसी क्षमा माँगी जो शायद ही किसी ने भगवान से माँगी हो: "सखेति मत्वा", आपको सखा मानकर मैंने जो "हे कृष्ण, हे यादव, हे सखा" कहा, खेलते, सोते, बैठते, खाते समय जो हँसी-मज़ाक किया, वह सब क्षमा कीजिए। "पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः", जैसे पिता पुत्र को, सखा सखा को, प्रिय प्रिया को सह लेता है, वैसे ही आप मुझे सह लीजिए।

अब आज का पहला श्लोक, पैंतालीसवाँ, उसी स्तुति का आख़िरी हिस्सा है। "अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा", जो पहले कभी नहीं देखा, वह देखकर मैं हर्षित हूँ, "भयेन च प्रव्यथितं मनो मे", और मेरा मन भय से बहुत व्याकुल है। "तदेव मे दर्शय देव रूपं", हे देव, मुझे अपना वही रूप दिखाइए। "प्रसीद देवेश जगन्निवास", हे देवों के स्वामी, हे जगत् के निवास, प्रसन्न होइए।

देखिए, अर्जुन एक ही साँस में दो उलटी बातें कह रहे हैं। हर्ष भी है, और भय भी। और यह झूठ नहीं है, यह मनुष्य का सच है। जिसने कभी समुद्र के किनारे खड़े होकर तूफ़ान आते देखा हो, वह जानता है कि एक ही समय में मन "वाह" भी कहता है और पीछे भी हटता है। श्रीधर स्वामी "प्रव्यथितं" का अर्थ करते हैं, हिला हुआ, अपनी जगह से डिगा हुआ। इसलिए अर्जुन अब इस बड़े रूप में और कुछ नहीं माँगते। वे कहते हैं, "तदेव", वही। वही रूप, जो मैं पहले से जानता हूँ।

और "वही रूप" कौन-सा है, इस पर आचार्यों के शब्द बड़े कोमल हैं। शंकराचार्य बस दो शब्द जोड़ते हैं: "यत् मत्सखम्", वह रूप जो मेरा सखा है। मधुसूदन सरस्वती लिखते हैं, वह पुराना रूप, जो मुझे अपने प्राणों से भी प्रिय है। और विश्वनाथ चक्रवर्ती तो इसे मधुरता का सागर कहते हैं, वसुदेव के बेटे का वह मनुष्य जैसा रूप। यानी जिसने अभी-अभी "हे सखा" कहने की क्षमा माँगी, वही अगली ही पंक्ति में उसी सखा को वापस माँग रहा है। क्षमा इसलिए नहीं माँगी कि दोस्ती छोड़नी है। क्षमा इसलिए माँगी कि दोस्ती और गहरी हो सके।

संत ज्ञानेश्वर यहाँ अर्जुन के मुँह से एक बहुत प्यारी बात कहलवाते हैं। अर्जुन कहते हैं: अब मन में यह चाह है कि आपसे बातें करूँ, आपकी निकटता का सुख लूँ, आपको गले लगाऊँ। पर इस रूप में किस मुख से बात करूँ, और किसे गले लगाऊँ? आपका तो कोई अन्त ही नहीं। फिर वे कहते हैं, हवा के साथ दौड़कर आकाश को गले नहीं लगाया जा सकता, और समुद्र में जल-क्रीड़ा कैसे हो? और आख़िर में वह पंक्ति, जो मुझे इस श्लोक की सबसे अच्छी व्याख्या लगती है: सारा संसार घूम-फिरकर देख लिया, अब अपने घर में सुख से रहना है। आपका चतुर्भुज रूप ही हमारा विश्राम है।

हम सबके साथ यही होता है। बड़े शहर, बड़ी यात्राएँ, बड़े अनुभव, सब अच्छे लगते हैं, पर थककर आदमी घर ही लौटना चाहता है। भगवान का वह रूप जो समय की तरह सबको निगल रहा है, वह सच है, और उसे देखना ज़रूरी भी था। पर उसके सामने रोज़ नहीं जिया जा सकता। रोज़ जीने के लिए एक चेहरा चाहिए, जिससे बात हो सके।

फिर छियालीसवाँ श्लोक, जिसमें अर्जुन बताते हैं कि "वही रूप" कैसा है। "किरीटिनं गदिनं", मुकुट पहने हुए, गदा लिए हुए, और हाथ में चक्र लिए हुए, मैं आपको वैसे ही देखना चाहता हूँ। "तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन", उसी चार भुजाओं वाले रूप में, "सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते", हे हज़ार भुजाओं वाले, हे विश्व के रूप वाले, आप हो जाइए।

सम्बोधन पर ध्यान दीजिए। अर्जुन इस क्षण भगवान को "सहस्रबाहो" कहते हैं, हज़ार भुजाओं वाले, क्योंकि अभी सामने वही रूप है। और माँग रहे हैं चार भुजाएँ। मानो कह रहे हों: हज़ार भुजाओं वाले, आप चार भुजाओं वाले बन जाइए।

और यहाँ एक सवाल उठता है, जिस पर हमारी टीका भी रुकती है। अर्जुन कहते हैं "वैसे ही", पर कैसे? कुछ लोग मानते हैं कि यह वह चतुर्भुज रूप है जिसे अर्जुन पहले से जानते थे। दूसरे कहते हैं, यह वह रूप है जो अर्जुन ने इसी दर्शन के शुरू में देखा था, क्योंकि सत्रहवें श्लोक में उन्होंने कहा था, "किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च", मुकुट, गदा और चक्र वाले आपको देखता हूँ। श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती पहली बात की ओर झुकते हैं; मधुसूदन तो यहाँ तक कहते हैं कि इससे पता चलता है कि अर्जुन भगवान को सदा चतुर्भुज रूप में ही देखते थे। नीलकण्ठ कहते हैं, यह वह रूप है जो अर्जुन के ध्यान में रहता था। दोनों तरह बात एक ही है, जैसा हमारी टीका कहती है: यह ऐसा रूप है जिसे अर्जुन देख सकें, सह सकें।

अब सैंतालीसवाँ श्लोक, और यहाँ से श्रीकृष्ण बोलते हैं। "मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात्।" हे अर्जुन, मैंने प्रसन्न होकर, अपने योग से, तुम्हें यह परम रूप दिखाया। "तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं", तेज से भरा, विश्वरूप, अनन्त और सबसे पहला, "यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्", जिसे तुम्हारे सिवा पहले किसी ने नहीं देखा।

पहला शब्द सुनिए: "प्रसन्नेन"। मधुसूदन सरस्वती इसके साथ एक छोटा-सा वाक्य जोड़ते हैं, मानो श्रीकृष्ण कह रहे हों: डरो मत। यह जो तुमने देखा, वह क्रोध से नहीं दिखाया गया, प्रसन्नता से दिखाया गया। तुम पर कृपा थी, इसलिए दिखाया। और नीलकण्ठ यहाँ एक बहुत गहरी बात कहते हैं: यह दर्शन करुणा से मिला, अधिकार से नहीं। और उसके लिए वे दूसरे अध्याय का वह प्रसिद्ध वचन याद दिलाते हैं, "कर्मण्येवाधिकारस्ते", तुम्हारा अधिकार केवल कर्म पर है। यानी दर्शन किसी का हक़ नहीं होता, जो वह गिनकर माँग ले। दर्शन भगवान का उपहार होता है।

और अब आख़िरी पंक्ति, "त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्", तुम्हारे सिवा किसी ने पहले नहीं देखा। यहाँ जो लोग महाभारत जानते हैं, उनके मन में एक प्रश्न उठेगा। पन्द्रहवें और इकत्तीसवें सत्संग में हमने हस्तिनापुर की वह सभा सुनी थी, जब श्रीकृष्ण ने दुर्योधन के सामने विराट रूप दिखाया था, और जिन थोड़े लोगों को दिव्य दृष्टि मिली, उनमें सञ्जय और धृतराष्ट्र दोनों थे। यानी जो सञ्जय आज यह श्लोक सुना रहे हैं, वे उस रूप की झलक पहले देख चुके हैं।

तो "किसी ने नहीं देखा" कैसे? बलदेव विद्याभूषण यही प्रश्न उठाते हैं, और उत्तर देते हैं कि हस्तिनापुर में दुर्योधन की सभा में जो विश्वरूप दिखा, वह इस प्रकार का नहीं था। वह एक चेतावनी थी। यह एक भक्त को दी गई कृपा है। और बत्तीसवें सत्संग में हमने उसी सभा की एक बात सुनी थी, कि देवता और ऋषि हाथ जोड़कर उस रूप से कह रहे थे, "अपना क्रोध समेट लीजिए।" देवता भी उस रूप के सामने वही माँग रहे थे जो आज अर्जुन माँग रहे हैं: समेट लीजिए।

और धृतराष्ट्र ने उस दिन रूप देखकर क्या माँगा था, यह भी आपको याद है: मेरी आँखें फिर बन्द हो जाएँ। दो आदमी, दोनों ने विराट देखा। एक ने कहा, अब मुझे फिर अन्धा कर दीजिए। दूसरे ने कहा, अब मुझे फिर अपना सखा दिखाइए। और आज वही धृतराष्ट्र सञ्जय के मुँह से अर्जुन की यह प्रार्थना सुन रहे हैं। उनके मन में क्या चल रहा होगा, यह पाठ नहीं बताता। पर इतना हम जानते हैं कि महाभारत के आरम्भ में वही धृतराष्ट्र कहते हैं, "जब मैंने सुना कि कृष्ण ने अर्जुन को अपने शरीर में सब लोक दिखाए, तब हे सञ्जय, मुझे विजय की आशा नहीं रही।"

और एक बात। इक्कीसवें सत्संग में आपने उदंक मुनि की कथा सुनी थी, जिन्होंने युद्ध के बाद श्रीकृष्ण से कहा था, "मुझे अपना वैष्णव रूप दिखाइए।" और पाठ कहता है कि श्रीकृष्ण ने उन्हें वही शाश्वत रूप दिखाया "जिसे बुद्धिमान धनंजय ने देखा था"। यानी महाभारत भी इस दर्शन को अर्जुन के नाम से ही पहचानता है। जो भी बाद में देखेगा, उसे कहा जाएगा, वही रूप जो अर्जुन ने देखा था।

तो इन तीन श्लोकों से आज के लिए पहली बात यह निकलती है: भगवान का बड़ा रूप देखना एक कृपा है, पर उस कृपा का अन्त डर में नहीं होना चाहिए। जब जीवन में भगवान का वह रूप दिखे जो छीन लेता है, जो समय बनकर सब ले जाता है, तब अर्जुन की तरह कहना सीखिए: "प्रसीद", प्रसन्न होइए, और मुझे फिर से वह रूप दिखाइए जिसके सहारे मैं जी सकूँ। यह कमज़ोरी नहीं है। यह भक्त का अधिकार नहीं, पर भक्त की प्रार्थना ज़रूर है।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने कहा, "तुम्हारे सिवा किसी ने नहीं देखा।" तो क्या वे यह भी बताएँगे कि बाकी लोग क्यों नहीं देख पाए? वेद पढ़ने वाले, यज्ञ करने वाले, बड़े-बड़े तपस्वी? आइए, अगले दो श्लोक सुनते हैं।

न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै- र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः । एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥ ४८ ॥
गीता 11.48 — अर्थ पढ़ें ›
मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् । व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥ ४९ ॥
गीता 11.49 — अर्थ पढ़ें ›

अड़तालीसवाँ श्लोक। "न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः", न वेदों और यज्ञों के अध्ययन से, न दान से, न कर्मकाण्ड की क्रियाओं से, न उग्र तपस्याओं से। "एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर।" हे कुरुवंश के वीर, मनुष्यों के लोक में, इस रूप वाला मैं, तुम्हारे सिवा किसी दूसरे से नहीं देखा जा सकता।

यह सूची ध्यान से सुनिए, क्योंकि उस समय के आदमी के लिए इसमें धर्म का लगभग सारा सामान आ जाता है। शंकराचार्य हर शब्द को खोलते हैं। वेदों का अध्ययन, यानी चारों वेद। दान, और यहाँ वे तुलापुरुष जैसे बड़े दानों का नाम लेते हैं, जिनमें आदमी अपने बराबर तौलकर सोना दान करता था। क्रियाएँ, यानी अग्निहोत्र जैसे नित्य के यज्ञ-कर्म। और उग्र तप, यानी चान्द्रायण जैसे कठोर व्रत। नीलकण्ठ "क्रियाओं" में बावड़ी, कुएँ और बगीचे बनवाने जैसे पुण्य के काम भी गिनते हैं। यानी पढ़ाई, पूजा, दान, सेवा, व्रत। जो कुछ भी एक धार्मिक आदमी जीवन भर कर सकता है, वह सब इस एक श्लोक में गिना गया, और हर एक के आगे "न" लगा दिया गया।

मधुसूदन सरस्वती इस "न" पर रुकते हैं। वे कहते हैं, हर साधन के साथ "न" अलग से दोहराया गया है, ताकि निषेध पक्का हो जाए। एक बार "न" कहना काफ़ी हो सकता था; यहाँ बार-बार कहा गया, न, न, न, न। और संत ज्ञानेश्वर इसे एक चित्र में कहते हैं: इस रूप की दिशा में पहुँचकर वेद भी मौन हो गए, यज्ञ करने वाले स्वर्ग तक जाकर लौट आए, और साधकों ने योग का कष्ट देखकर उसे छोड़ दिया।

पर यहाँ एक बात साफ़ समझ लेनी चाहिए, नहीं तो यह श्लोक उलटा सुनाई देगा। श्रीकृष्ण वेद, दान या तप का अपमान नहीं कर रहे। इसी गीता में आगे वे कहेंगे कि यज्ञ, दान और तप छोड़ने योग्य नहीं हैं। तो फिर "न" क्यों? रामानुजाचार्य एक छोटे-से शब्द से इसका उत्तर देते हैं: "केवलैः"। केवल इन साधनों से, यानी भक्ति के बिना, ये साधन अकेले उस रूप तक नहीं ले जाते। जैसे एक सुन्दर दीया हो, अच्छी बत्ती हो, पर उसमें तेल न हो। दीया बुरा नहीं, बत्ती बुरी नहीं, पर रोशनी तेल से होगी। वह तेल क्या है, यह श्रीकृष्ण छह श्लोक बाद एक शब्द में बताएँगे।

और दो छोटे शब्द इस श्लोक में और हैं। "नृलोके", मनुष्यों के लोक में। शंकराचार्य इसका सीधा अर्थ करते हैं, मनुष्य-लोक में। बलदेव विद्याभूषण इसमें एक बारीक बात देखते हैं: "मनुष्यों के लोक में" कहा गया, यानी भगवान के अपने धाम में उनके भक्त देवता इसे देख सकते हैं; पर यहाँ, धरती पर, अर्जुन के सिवा किसी ने नहीं। और "कुरुप्रवीर", कुरुओं में श्रेष्ठ वीर। जिस वंश के बड़े-बड़े लोग, भीष्म, द्रोण, स्वयं धृतराष्ट्र, सामने की सेना में खड़े हैं, उसी वंश के एक वीर को यह दर्शन मिला। वंश एक ही था, पर दर्शन उसी को मिला जो सारथी को सखा मानता था।

आज के जीवन में यह बात कैसी दिखती है? बहुत-से लोग मिलते हैं जिन्होंने सब कुछ किया है: तीर्थ गए, व्रत रखे, बड़े-बड़े अनुष्ठान कराए, दान दिए। और फिर भी कभी धीरे से कहते हैं, "पता नहीं, भगवान बहुत दूर लगते हैं।" और कभी कोई बूढ़ी माँ मिलती है, जिसने कोई ग्रन्थ नहीं पढ़ा, पर जो रसोई में आटा गूँधते हुए भी भगवान से ऐसे बात करती है जैसे वे पास बैठे हों। यह श्लोक उस पहले आदमी को डाँटता नहीं। वह बस बताता है कि कमी कहाँ है: साधन पूरे थे, तेल कम था।

और अब महाभारत की एक कथा, जो इस श्लोक को बहुत सुन्दर ढंग से खोलती है, और जिसे स्वयं श्रीकृष्ण सुनाते हैं। यह अनुशासन पर्व में है। युद्ध के बाद युधिष्ठिर भीष्म से महादेव की महिमा पूछते हैं, और भीष्म कहते हैं, यह कृष्ण से सुनो। श्रीकृष्ण की पहली बात ही आज के श्लोक जैसी है। वे कहते हैं: ईश्वर के कर्मों की गति यथार्थ में जानी नहीं जा सकती; ब्रह्मा आदि देवता, इन्द्र सहित, और महर्षि भी उन्हें ठीक-ठीक नहीं जानते।

फिर वे बताते हैं कि वे एक बार हिमालय में उपमन्यु मुनि के आश्रम गए, और उपमन्यु ने उन्हें अपनी कहानी सुनाई। उपमन्यु बचपन में एक दिन गाय को दुहते देख आए, और रोने लगे, "माँ, दूध दो, दूध दो।" वन में रहने वाली माँ के पास दूध कहाँ था। उसने आटा पानी में घोलकर दे दिया और कहा, यह दूध है। फिर एक दिन पिता उन्हें किसी यज्ञ में अपने बन्धुओं के यहाँ ले गए, और वहाँ उन्होंने असली दूध पी लिया, जिसका स्वाद अमृत जैसा था। अब जिस बच्चे ने एक बार असली दूध चख लिया हो, उसे आटे का घोल कब तक बहलाएगा। उसने कहा, "माँ, यह दूध नहीं है।" और माँ ने उसे गले लगाकर, आँसू भरी आँखों से उसका सिर सूँघकर कहा: बेटा, वन में रहने वाले मुनियों के लिए दूध-भात कहाँ से आएगा? महादेव को प्रसन्न किए बिना यह सुख कहाँ।

और पाठ कहता है, माँ की वह बात सुनकर उस दिन से उपमन्यु की भक्ति महादेव में अटल हो गई। फिर उन्होंने तप किया, और ऐसा तप जिसका वर्णन सुनकर ही थकान हो जाए: बाएँ पैर के अँगूठे पर खड़े होकर, फिर सौ वर्ष फल खाकर, फिर सौ वर्ष सूखे पत्ते, फिर सौ वर्ष केवल जल, और फिर सात सौ वर्ष केवल वायु पर।

अब असली मोड़। इतने तप के बाद भी पाठ यह नहीं कहता कि महादेव तुरन्त प्रकट हो गए। पाठ कहता है, प्रभु ने उन्हें एकनिष्ठ भक्त जानकर उनकी परीक्षा ली। वे इन्द्र का रूप धरकर आए, सफ़ेद ऐरावत हाथी पर, मुकुट, हार, छत्र, अप्सराएँ, गन्धर्वों का गान। और बोले: "मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, जो चाहो, वर माँगो।" और उपमन्यु प्रसन्न नहीं हुए। उन्होंने कहा: हे इन्द्र, महेश्वर को छोड़कर मुझे कोई दूसरी बात नहीं भाती। शंकर की आज्ञा से मैं कीड़ा या पतंगा भी बन जाऊँ, पर आपके दिए तीनों लोक भी नहीं चाहता। मैं न स्वर्ग माँगता हूँ, न देवताओं का राज्य, न ब्रह्मलोक। मैं केवल हर की दासता माँगता हूँ।

अब सोचिए, कहानी में तप कहाँ था और दर्शन कहाँ से आया। तप हज़ार वर्ष का था। पर दरवाज़ा उस क्षण खुला जब सामने स्वर्ग का राजा खड़ा था और बालक ने कहा, "मुझे आप नहीं चाहिए, मुझे वही चाहिए।" यही वह बात है जो आज का श्लोक कह रहा है। तप बुरा नहीं था। पर तप अकेला दरवाज़ा नहीं खोलता। दरवाज़ा तब खुलता है जब मन को उसके सिवा कुछ और न चाहिए।

और अब, इससे पहले कि हम अगले श्लोक में उतरें, एक छोटी-सी बात आपसे कहना चाहता हूँ। हम इस अध्याय के आख़िरी और सबसे कोमल हिस्से में आ गए हैं। डर का रूप पीछे छूट रहा है, और अब वह रूप लौटने वाला है जिसके लिए अर्जुन तरस रहे थे। और इसके बाद श्रीकृष्ण वह रास्ता बताएँगे जिससे यह दर्शन किसी को भी मिल सकता है। आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। जो आदमी "न वेदों से, न तप से" सुनकर यहीं उठ जाए, वह सोचेगा कि भगवान तक पहुँचने का कोई रास्ता ही नहीं, जबकि रास्ता तीन श्लोक आगे खड़ा है। तो अगर आप यह सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की यह यात्रा बीच में न छूटे। और आज का यह सत्संग आख़िर तक सुनिए।

अब उनचासवाँ श्लोक। "मा ते व्यथा मा च विमूढभावो", तुम्हें व्यथा न हो, और मूढ़ता न घेरे, "दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम्", मेरा यह ऐसा भयानक रूप देखकर। "व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं", भय छोड़कर, प्रसन्न मन से, तुम फिर से, "तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य", मेरा वही यह रूप देखो।

देखिए, श्रीकृष्ण पहले मना करते हैं, फिर देते हैं। पहले कहते हैं, "मा ते व्यथा", डरो मत। यह वही आवाज़ है जो एक माँ बच्चे से कहती है जब वह अँधेरे में किसी परछाईं से डर गया हो: डरो मत, मैं हूँ। रामानुजाचार्य इसे यों कहते हैं: जो सौम्य रूप तुम पहले से देखने के अभ्यस्त हो, वही मैं तुम्हें दिखाता हूँ।

पर संत ज्ञानेश्वर यहाँ श्रीकृष्ण के मुँह से थोड़ी मीठी झिड़की भी कहलवाते हैं। वे कहते हैं, क्या कोई अमृत का भरा समुद्र मिल जाए तो डूबने के डर से उसे छोड़ देता है? सोने का पहाड़ बड़ा है, इसलिए कोई उसे ठुकराता है? चन्द्रमा घर आ जाए तो कोई कहता है, बड़ी गर्मी है, हटो? यानी जो इतना बड़ा उपहार था, उससे तुम डर गए। और फिर ज्ञानेश्वर का श्रीकृष्ण कुछ ऐसा कहता है जो इस पूरे प्रसंग की कुंजी है। वे कहते हैं: ठीक है, बाहर से उस चतुर्भुज रूप का सखा-भाव भोगो, पर मन यहीं, इस विराट में बाँधकर रखो। जैसे गाय पहाड़ पर चरती है, पर उसका मन घर पर बँधे बछड़े में रहता है।

यह उपमा मुझे बहुत सच्ची लगती है। यानी श्रीकृष्ण यह नहीं कह रहे कि जो देखा उसे भूल जाओ। वे कह रहे हैं: जो देखा वह सच है, उसे भीतर रखो, और सामने वह रूप रखो जिसके साथ तुम जी सको। हमारे लिए इसका क्या अर्थ है? जीवन में कभी भगवान का वह रूप दिख जाता है जो डराता है, कोई मृत्यु, कोई भारी हानि, कोई ऐसा सच जिसके आगे हम छोटे हैं। उस घड़ी के बाद आदमी दो में से एक रास्ता पकड़ता है। या तो डर में जीने लगता है, या उस सच को भीतर रखकर फिर से प्रेम में लौट आता है। श्रीकृष्ण दूसरा रास्ता दिखा रहे हैं: "व्यपेतभीः प्रीतमनाः", भय छोड़कर, प्रसन्न मन से।

और उपमन्यु की कथा का अन्त भी यही है, इसलिए उसे यहीं पूरा कर दूँ। इन्द्र को ठुकराने के बाद उपमन्यु दुःखी होकर सोच रहे थे कि भगवान प्रसन्न क्यों नहीं होते। तभी वह ऐरावत एक सफ़ेद बैल बन गया। और फिर, पाठ कहता है, ऐसा तेज उठा जैसे हज़ार सूर्य, मेघों और गर्जन के साथ, मानो प्रलय की अग्नि सबको जलाने को तैयार हो। उपमन्यु का मन भी उद्विग्न हो गया, ठीक अर्जुन की तरह। और फिर, क्षण भर में, वह तेज शान्त हो गया, और उन्होंने देखा: बैल पर बैठे महादेव, सौम्य, शान्त, पार्वती के साथ, आँखों को आनन्द देने वाले। पहले हज़ार सूर्य, फिर सौम्य रूप। ठीक वही क्रम जो आज कुरुक्षेत्र में हो रहा है।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने कहा, "वही रूप फिर देखो।" अब सञ्जय बताएँगे कि वह क्षण कैसा था, जब विराट सिमटा और रथ पर फिर वही सारथी बैठा दिखा। आइए, अगले दो श्लोक सुनते हैं।

सञ्जय उवाच इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः । आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ॥ ५० ॥
गीता 11.50 — अर्थ पढ़ें ›
अर्जुन उवाच दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन । इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ॥ ५१ ॥
गीता 11.51 — अर्थ पढ़ें ›

आपने सुना होगा, इस श्लोक से पहले एक नई आवाज़ आई: "सञ्जय उवाच"। अब तक अर्जुन और श्रीकृष्ण आपस में बोल रहे थे। अब बीच में सञ्जय बोलते हैं, जो यह सब हस्तिनापुर में बैठे धृतराष्ट्र को सुना रहे हैं। मानो कथा कहने वाला एक पल के लिए रुककर कहता है: महाराज, अब जो हुआ, वह मैं अपने शब्दों में बताता हूँ, क्योंकि वह बात शब्दों से नहीं, एक बदलाव से कही गई।

"इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा", अर्जुन से ऐसा कहकर वासुदेव ने, "स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः", फिर से अपना रूप दिखाया। "आश्वासयामास च भीतमेनं", और इस डरे हुए अर्जुन को धीरज दिया, "भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा", उस महात्मा ने फिर से सौम्य शरीर वाला होकर।

"स्वकं रूपं", अपना रूप। यह कौन-सा रूप है? हमारी टीका दोनों पढ़तें सामने रखती है। कुछ लोग मानते हैं कि पहले चतुर्भुज रूप दिखा और फिर मनुष्य रूप; दूसरे कहते हैं, सीधे मनुष्य रूप। शंकराचार्य कहते हैं, वह रूप जो वसुदेव के घर में जन्मा था। श्रीधर स्वामी कहते हैं, मुकुट आदि वाला वही चतुर्भुज रूप, जैसा पहले था; और मधुसूदन सरस्वती उसमें कुण्डल, गदा, चक्र, वनमाला और पीताम्बर तक गिना देते हैं। विश्वनाथ चक्रवर्ती दोनों को एक क्रम में रखते हैं: पहले वह चतुर्भुज रूप जो अर्जुन ने माँगा था, और फिर पीले वस्त्र, कुण्डल और पगड़ी वाला दो भुजाओं का सौम्य रूप। और रामानुजाचार्य यहाँ विष्णु पुराण की एक बात याद करते हैं: कि चतुर्भुज रूप ही वसुदेव के पुत्र का अपना रूप था, और जन्म के समय, कंस से डरे वसुदेव की प्रार्थना पर, भगवान ने अपनी दो भुजाएँ छिपा ली थीं। यानी जो अर्जुन माँग रहे थे, वह कोई नया रूप नहीं था। वह घर का रूप था।

पर मुझे इस श्लोक में सबसे सुन्दर शब्द "आश्वासयामास" लगता है, धीरज दिया। सञ्जय यह नहीं कहते कि भगवान ने रूप बदला और बात ख़त्म। वे कहते हैं, "भीतमेनं", इस डरे हुए को, धीरज दिया। रूप बदलना काफ़ी नहीं था। डरे हुए आदमी को पास आकर, उसकी भाषा में, उसका हाथ पकड़ना भी ज़रूरी था। और इसलिए सञ्जय उन्हें यहाँ "महात्मा" कहते हैं। मधुसूदन सरस्वती इसका अर्थ करते हैं: परम करुणा वाले।

संत ज्ञानेश्वर इस क्षण पर इतने भाव से लिखते हैं कि उनकी दो उपमाएँ मैं आपको ज़रूर सुनाना चाहता हूँ। पहली: जैसे कोई सुनार सोने की डली तोड़कर अपनी पसन्द का गहना गढ़े, और फिर वह गहना मन को न भाए, तो उसे फिर गलाकर पहले जैसा कर दे। वैसे ही शिष्य के प्रेम में भगवान ने अपने कृष्ण-रूप को विश्वरूप बनाया, वह मन को नहीं भाया, तो फिर से कृष्ण बन गए। दूसरी: जैसे किसी तह किए हुए कपड़े को खोलकर ग्राहक को दिखाया जाए, और ग्राहक को न जँचे, तो उसे फिर तह करके रख दिया जाए। कृष्ण के रूप की तह के भीतर विश्वरूप का कपड़ा तह किया हुआ था; अर्जुन की चाह पर उसे खोलकर दिखाया, और फिर तह कर दिया। और फिर ज्ञानेश्वर सञ्जय के मुँह से पूछते हैं: शिष्य की ऐसी ज़िद इतनी दूर तक सहने वाले गुरु किस देश में मिलते हैं?

अब इक्यावनवाँ श्लोक, और अर्जुन बोलते हैं। "दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन", हे जनार्दन, आपके इस सौम्य, मनुष्य रूप को देखकर, "इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः", अब मैं स्थिर चित्त वाला हो गया हूँ, और अपनी स्वाभाविक स्थिति में आ गया हूँ।

दो शब्द हैं, "सचेताः" और "प्रकृतिं गतः"। सचेताः, यानी फिर से होश में, मन अपनी जगह पर। श्रीधर स्वामी इसका अर्थ करते हैं, प्रसन्न चित्त। और "प्रकृतिं गतः", अपनी प्रकृति में लौट आया, यानी मैं फिर से मैं हो गया। अभिनवगुप्त इस क्षण के बारे में एक बहुत शान्त बात कहते हैं: सब कुछ समेट लेने के बाद भगवान की यह सौम्यता परम शान्ति की अवस्था देती है।

और "मानुषं रूपं तव सौम्यं", मनुष्य जैसा, सौम्य रूप। शंकराचार्य इसके साथ फिर वही शब्द जोड़ते हैं जो उन्होंने पैंतालीसवें श्लोक पर कहा था: "मत्सखं", मेरा सखा, और "प्रसन्नं", प्रसन्न। और रामानुजाचार्य इस रूप का वर्णन करते हुए जैसे रुकते ही नहीं: असीम सौन्दर्य, कोमलता और लावण्य से भरा, केवल आपका अपना, मनुष्य के आकार में स्थित, अत्यन्त सौम्य रूप। सोचिए, जिस रूप को अर्जुन बरसों से देख रहे थे, भोजन पर, सभा में, वन में, उसे वे आज पहली बार इस तरह देख रहे हैं। विराट देखने के बाद सखा का चेहरा पहले से अधिक सुन्दर लगता है। जैसे लम्बी, डरावनी यात्रा से लौटकर घर का दरवाज़ा पहले से अधिक अपना लगता है।

और "जनार्दन", यह सम्बोधन भी ध्यान से सुनिए। अर्जुन ने पहले अध्याय में भी श्रीकृष्ण को इसी नाम से पुकारा था, जब वे अपनों को मारने के डर से काँप रहे थे। तब का "जनार्दन" एक घबराए हुए आदमी की पुकार थी। आज का "जनार्दन" एक लौटे हुए आदमी का धन्यवाद है।

और ज्ञानेश्वर अर्जुन के मुँह से कहलवाते हैं: यह रूप दिखाना ऐसा है जैसे कोई बच्चा भटक गया हो, और माँ ने उसे ढूँढकर, बहलाकर, दूध पिला दिया हो। मैं विश्वरूप के सागर में लहरों पर उछल रहा था, अब अपने निज रूप के किनारे पर आ लगा हूँ। मैं सूखता हुआ पेड़ था, और यह भेंट नहीं, बादल का बरस जाना है। और फिर वे एक चित्र खींचते हैं जो मुझे इस पूरे अध्याय के सबसे सुन्दर चित्रों में लगता है। जैसे सूर्य डूबने के बाद आकाश में फिर तारे दिखने लगते हैं, वैसे ही अर्जुन को फिर से धरती दिखने लगी। देखा तो वही कुरुक्षेत्र है, वैसे ही दोनों ओर अपने ही कुल के लोग, वीर शस्त्र बरसा रहे हैं, बाणों के उस मण्डप के बीच वैसा ही शान्त रथ खड़ा है, धुरे पर लक्ष्मीपति बैठे हैं, और वे ख़ुद नीचे।

ध्यान दीजिए, युद्ध नहीं बदला। सेनाएँ वहीं हैं, भीष्म वहीं हैं, द्रोण वहीं हैं, जो होना है वह होना ही है। बदला क्या? अर्जुन बदले। "सचेताः", वे फिर होश में आ गए। गीता हमें यही देती है। वह हमेशा परिस्थिति नहीं बदलती। वह परिस्थिति के बीच हमें फिर से हमारा आपा लौटा देती है।

और अब महाभारत का एक प्रसंग, जो इस "प्रकृतिं गतः" का दूसरा पहलू दिखाता है, उस दिन का जब अर्जुन सचमुच अपनी प्रकृति से बाहर चले गए थे, और उन्हें फिर से वापस लाने वाले वही सारथी थे। यह कर्ण पर्व में है, और इसे भी सञ्जय ही धृतराष्ट्र को सुनाते हैं।

युद्ध के उन दिनों की बात है जब कौरवों की ओर से कर्ण लड़ रहे थे। कर्ण के बाणों से बुरी तरह घायल होकर युधिष्ठिर शिविर लौट गए थे। अर्जुन और श्रीकृष्ण उन्हें देखने आए। युधिष्ठिर ने उन्हें खून से लथपथ देखा, तो समझे कि कर्ण मारा गया। पर जब सुना कि कर्ण अभी जीवित है, तो दर्द और गुस्से में वे अर्जुन पर बरस पड़े, और आख़िर में कह दिया: अगर तुम कर्ण को नहीं मार सकते, तो अपना गाण्डीव कृष्ण को दे दो।

और अर्जुन ने तलवार उठा ली। अपने बड़े भाई पर। बाद में उन्होंने कारण बताया: उनकी एक गुप्त प्रतिज्ञा थी कि जो उनसे कहे कि गाण्डीव किसी और को दे दो, वे उसका सिर काट देंगे। अब सोचिए, गीता सुनने वाला वही अर्जुन, जिसने इसी युद्ध के पहले दिन कहा था कि मैं अपनों को नहीं मारूँगा, आज एक वचन की खातिर अपने भाई पर तलवार उठाए खड़ा है। यह "प्रकृतिं गतः" का उलटा है। यह अपनी प्रकृति से बाहर चले जाना है।

और उस घड़ी श्रीकृष्ण क्या करते हैं? पाठ कहता है, मन की बात जानने वाले कृष्ण ने उनका क्रोध भाँपकर पूछा: अर्जुन, यह तलवार क्यों उठा रहे हो? यहाँ तो कोई ऐसा नहीं जिससे तुम्हें लड़ना हो। तुम राजा को देखने आए थे, तुमने उन्हें देख लिया, वे सकुशल हैं। फिर वह पंक्ति: "आनन्द के समय क्रोध ने तुम्हें क्यों घेर लिया? यह तुम्हारे मन का कैसा भ्रम है?"

फिर श्रीकृष्ण ने उन्हें धर्म की सूक्ष्मता समझाई, और समझाया कि राजा थके हुए हैं, घायल हैं, दुःखी हैं, कर्ण ने उन्हें बाणों से बुरी तरह मारा है, इसलिए दुःख में उन्होंने यह बात कह दी। और उन्होंने ऐसा रास्ता निकाला जिसमें वचन भी टूटा नहीं और भाई भी बच गया। और अन्त में, पाठ कहता है, अर्जुन लज्जा से भरकर युधिष्ठिर के चरणों में गिर पड़े और बार-बार कहने लगे, "प्रसन्न हों, क्षमा करें।" युधिष्ठिर ने उन्हें उठाया, स्नेह से गले लगाया, और रो पड़े। बहुत देर तक रोकर वे दोनों भाई शुद्ध हुए और प्रसन्न हो गए।

और युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से जो कहा, वह आज के श्लोक के "आश्वासयामास" का सबसे अच्छा अर्थ है: हे अच्युत, अज्ञान से मोहित हम दोनों आज आपको नाव के रूप में पाकर विपत्ति के भयंकर सागर से पार हो गए। आपकी बुद्धि की नाव पाकर हम दुःख और शोक के सागर से पार हो गए; हे अच्युत, हम आपसे सनाथ हैं।

कुरुक्षेत्र में अर्जुन डर से अपनी प्रकृति से बाहर गए थे, और कर्ण पर्व में क्रोध से। दोनों बार लौटाने वाला एक ही था, और दोनों बार उसने डाँटकर नहीं, धीरज देकर लौटाया। हमारे जीवन में भी ऐसे क्षण आते हैं जब हम अपने आप में नहीं रहते। डर में, गुस्से में, शोक में, आदमी वह कह देता है, वह कर बैठता है, जो वह असल में है ही नहीं। और फिर कोई सौम्य उपस्थिति, किसी का शान्त चेहरा, किसी की धीमी आवाज़, या भीतर भगवान का एक स्मरण, हमें फिर से "सचेताः" कर देता है। उस क्षण को पहचानिए। और जब आप लौटें, तो युधिष्ठिर की तरह कहिए: आपकी नाव से पार हुआ।

पर अभी एक बात बाकी है। अर्जुन अब शान्त हैं, और सामने वही सखा खड़ा है। तो क्या कहानी यहीं ख़त्म? नहीं। श्रीकृष्ण अब कुछ ऐसा कहने वाले हैं जिससे अर्जुन को समझ आए कि अभी-अभी उन्होंने क्या पाया है, और वह कितना दुर्लभ है। आइए, अगले दो श्लोक सुनते हैं।

श्रीभगवानुवाच सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम । देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः ॥ ५२ ॥
गीता 11.52 — अर्थ पढ़ें ›
नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया । शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥ ५३ ॥
गीता 11.53 — अर्थ पढ़ें ›

बावनवाँ श्लोक, और श्रीकृष्ण फिर बोलते हैं। "सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम", मेरा यह रूप, जो तुमने देखा है, इसका दर्शन बहुत ही कठिन है। "देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः", देवता भी इस रूप के दर्शन की सदा इच्छा करते रहते हैं।

"सुदुर्दर्शमिदं रूपं", यह रूप सुदुर्दर्श है, और इस शब्द में तीन हिस्से हैं। "दर्श", देखना; "दुर्", कठिन; और "सु", बहुत। बहुत ही कठिनाई से दिखने वाला। शंकराचार्य इसके साथ जोड़ते हैं: देवता इसे सदा देखना चाहते हैं, पर उन्होंने तुम्हारी तरह इसे देखा नहीं, और देखेंगे भी नहीं। नीलकण्ठ इसे और छोटा कर देते हैं: वे इच्छा ही करते रहते हैं, पाते नहीं। और मधुसूदन सरस्वती "नित्यं" पर रुकते हैं: सदा इसलिए कहा, क्योंकि उनकी चाह कभी बुझती ही नहीं।

पर अब वही प्रश्न फिर उठता है जो छियालीसवें श्लोक पर उठा था: "यह रूप" कौन-सा? हमारी टीका दोनों पढ़तें बताती है। कुछ लोग मानते हैं कि यह वह विश्वरूप है जो अभी-अभी समेटा गया। दूसरे मानते हैं कि यह वह सौम्य रूप है जो अब अर्जुन के सामने खड़ा है। श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती पहली बात कहते हैं: विश्वरूप। और बलदेव विद्याभूषण दूसरी बात पर ज़ोर देते हैं: विश्वरूप तो कठिन है ही, पर यह कृष्ण-रूप तो बहुत ही कठिन है। और वे सातवें अध्याय का वह वचन याद दिलाते हैं, जिसमें श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं सबके सामने प्रकट नहीं होता, योगमाया से ढका रहता हूँ। हमारी टीका दोनों के बीच की बात कहती है, और वही मुझे सबसे सच्ची लगती है: दोनों तरह, बात एक है। अर्जुन ने जो देखा, वह दुर्लभ कृपा है।

और विश्वनाथ चक्रवर्ती यहाँ एक ऐसी बात कहते हैं जिस पर मैं बार-बार लौटता हूँ। वे कहते हैं: भगवान ने अर्जुन को दिव्य आँखें तो दीं, पर दिव्य मन नहीं दिया। इसलिए दिव्य आँखों से भी अर्जुन को वह विश्वरूप पूरी तरह नहीं भाया, क्योंकि उनका मन तो मनुष्य-रूप की मधुरता को ही पकड़ने वाला था। यानी अर्जुन ने कोई ग़लती नहीं की। आँखें आठवें श्लोक में बदल दी गई थीं, "दिव्यं ददामि ते चक्षुः"। पर दिल वही पुराना था, सखा वाला दिल। और उस दिल को सखा ही चाहिए था।

संत ज्ञानेश्वर यहाँ श्रीकृष्ण से अर्जुन को मीठी डाँट दिलवाते हैं: अरे अन्धे अर्जुन, हाथ में आ जाए तो मेरु पर्वत भी छोटा लगता है। जो रूप शंकर को तप करके भी नहीं मिलता, जिसके लिए योगी अष्टांग योग में थक जाते हैं, उसे तुमने बिना किसी कष्ट के पा लिया। और देवता, ज्ञानेश्वर कहते हैं, आशा की अंजुलि हृदय के आगे फैलाए, चातक पक्षी की तरह, आठों पहर उसी दर्शन की राह देखते रहते हैं।

और अब एक पल के लिए हस्तिनापुर लौटिए। सञ्जय यह श्लोक सुना रहे हैं, "देवता भी इस रूप के दर्शन को सदा तरसते हैं", और सुनने वाले धृतराष्ट्र हैं। वही धृतराष्ट्र, जिन्हें उस सभा में दो दिव्य आँखें मिली थीं, और जिन्होंने कहा था, मेरी आँखें फिर बन्द कर दीजिए। जिस रूप के लिए देवता तरसते हैं, वह एक बार उनके सामने भी खड़ा था। उन्होंने उसे देखा, और फिर आँखें लौटा दीं, और अपने बेटे के पीछे चलते रहे। पाठ उनके मन की बात नहीं बताता, इसलिए मैं भी नहीं कहूँगा। पर इतना कहना ठीक है कि दर्शन मिल जाना एक बात है, और दर्शन को जीवन में उतार लेना दूसरी। अर्जुन का दर्शन रथ से उतरकर उनके कर्म में गया। यही अन्तर श्रीकृष्ण अध्याय के आख़िरी श्लोकों में खोलेंगे।

अब तिरपनवाँ श्लोक। "नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया", न वेदों से, न तप से, न दान से, न यज्ञ से, "शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा", इस प्रकार मैं देखा जा सकता हूँ, जैसे तुमने मुझे देखा है।

आपने ध्यान दिया होगा, यह लगभग वही बात है जो अड़तालीसवें श्लोक में कही गई थी। तो दोबारा क्यों? मधुसूदन सरस्वती और नीलकण्ठ दोनों यही कहते हैं: बात वही है, पर दोहराई गई है ताकि पता चले कि यह दर्शन कितना दुर्लभ है। जब कोई बड़ा अपनी बात दो बार कहे, तो समझिए कि वह चाहता है कि आप उसे भूलें नहीं।

और इस बार सूची में एक छोटा-सा बदलाव है। "न चेज्यया", यानी न यज्ञ से, और शंकराचार्य इसका दूसरा अर्थ भी देते हैं, पूजा से। यानी केवल बाहरी पूजा भी, अगर भीतर से भाव न हो, उस दर्शन तक नहीं ले जाती। और ज्ञानेश्वर इस श्लोक के अन्त में श्रीकृष्ण से कहलवाते हैं: मैं तो एक ही तरह से पकड़ में आता हूँ, सुनो, जब भक्ति आकर चित्त पर बैठ जाए। वह एक शब्द, जिसकी हम दो श्लोकों से राह देख रहे हैं, अगले श्लोक में आएगा।

पर उससे पहले मैं आपको महाभारत के अन्त के पास ले चलना चाहता हूँ, क्योंकि "सुदुर्दर्शमिदं रूपं" का अर्थ, बहुत ही कठिनाई से दिखने वाला, मुझे वहाँ जितना साफ़ दिखा, उतना कहीं नहीं। यह मौसल पर्व में है। युद्ध के बाद छत्तीसवाँ वर्ष आ गया था। द्वारका में यादव आपस में लड़कर नष्ट हो गए, बलराम ने योग से शरीर छोड़ दिया, और श्रीकृष्ण भी अपने धाम चले गए। सत्रहवें सत्संग में आपने उनके अन्तिम क्षण की कथा सुनी थी।

अर्जुन द्वारका पहुँचे, वहाँ के बचे हुए लोगों को साथ लेकर चले, और रास्ते में जब लुटेरों ने घेरा, तो जिस गाण्डीव से उन्होंने भीष्म, द्रोण और कर्ण का सामना किया था, वह उनसे चढ़ा तक नहीं। अस्त्र याद नहीं आए, बाण क्षण भर में चुक गए। और फिर वे टूटे हुए मन से व्यास के आश्रम पहुँचे। पाठ कहता है, वे बार-बार आहें भर रहे थे। और व्यास ने उन्हें देखकर पूछा: पार्थ, यह क्या है? तुम शोभाहीन-से दिखते हो। मैंने तुम्हें कभी टूटा हुआ नहीं जाना।

और अर्जुन ने जो कहा, वह सुनिए। "जो मेघ जैसे शरीर वाले थे, शोभा से भरे, बड़े कमल जैसी आँखों वाले, वे कृष्ण राम के साथ देह छोड़कर चले गए।" फिर कहा: "उनके वचन, उनके स्पर्श और उनके दर्शन का वह अमृत जैसा सुख याद करके मैं भ्रमित हो जाता हूँ।" और फिर वे शब्द, जो आज के श्लोकों के साथ रखकर सुनने लायक हैं: "शंख, चक्र और गदा धारण करने वाला, चार भुजाओं वाला, पीले वस्त्रों वाला, श्याम, कमल-दल जैसे नेत्रों वाला वह पुरुष, जो मेरे रथ के आगे चलता था, शत्रु-सेनाओं को जलाता हुआ, उसे मैं आज नहीं देखता।"

सुना आपने? चार भुजाओं वाला, शंख, चक्र, गदा। ठीक वही रूप, जो आज छियालीसवें श्लोक में अर्जुन ने माँगा था। कुरुक्षेत्र में उन्होंने कहा था, "वही रूप दिखाइए।" और छत्तीसवें वर्ष में, व्यास के आश्रम में, वही अर्जुन कह रहे हैं, "वह रूप अब नहीं दिखता।" "सुदुर्दर्शमिदं रूपं"। जो रूप अर्जुन ने रोज़ देखा, रथ पर, सभा में, भोजन पर, हँसी-मज़ाक में, वह कितना दुर्लभ था, यह उन्हें उस दिन पता चला जब वह नहीं रहा।

और व्यास ने उन्हें क्या उत्तर दिया? पाठ कहता है, व्यास ने कहा: जो चक्र और गदा धारण करके तुम्हारे रथ के आगे चलता था, वह पुराण ऋषि, चार भुजाओं वाले वासुदेव थे, "तव स्नेहात्", तुम्हारे स्नेह से वे ऐसा करते थे। सोचिए, यह कितनी बड़ी बात है। जिसके दर्शन के लिए देवता सदा तरसते हैं, वह एक मनुष्य के रथ के आगे-आगे चलता था, और कारण कोई तप नहीं, कोई यज्ञ नहीं, कोई दान नहीं। कारण था, तुम्हारा स्नेह। आज का तिरपनवाँ श्लोक और व्यास का यह वाक्य, दोनों एक ही बात कहते हैं।

फिर व्यास ने अर्जुन को धीरज दिया, और उनकी बातों में आज के अध्याय की गूँज है। उन्होंने कहा: मैं तुम्हें कृतकृत्य मानता हूँ, तुमने जो करना था, कर लिया। बल, बुद्धि, तेज और समझ, ये अच्छे समय में आते हैं और उलटे समय में चले जाते हैं। यह सब काल में जड़ वाला है, और काल ही अपनी इच्छा से इसे वापस ले लेता है। जो बलवान है, वही फिर दुर्बल होता है। और तुम्हारे अस्त्र अपना काम पूरा करके जैसे आए थे वैसे चले गए; जब समय आएगा, फिर तुम्हारे हाथ में आएँगे। "काल"। वही शब्द जो पिछले सत्संग में श्रीकृष्ण ने अपने लिए कहा था, "कालोऽस्मि"। कुरुक्षेत्र में काल ने भीष्म और द्रोण को लिया था। अब उसी काल ने अर्जुन का बल भी लिया। पर व्यास कहते हैं, इसमें शोक की बात नहीं; जो आया था, वह अपना काम करके गया।

तो इन दो श्लोकों से हमारे लिए क्या निकलता है? पहली बात यह कि जो रूप रोज़ सामने है, वही सबसे दुर्लभ है। घर में बैठे माँ-बाप, साथ चलता जीवनसाथी, रोज़ की पूजा में रखी छोटी-सी मूर्ति, सुबह का वह एक क्षण जब मन भगवान की ओर मुड़ता है। हम इन्हें साधारण मान लेते हैं, क्योंकि ये रोज़ हैं। अर्जुन ने भी अपने सखा को "हे यादव" कहकर हँसी में उड़ाया था। और दूसरी बात, जो व्यास ने कही: वह रूप स्नेह से आगे चलता था। तप, यज्ञ, दान, ये सब अच्छे हैं, पर भगवान को रथ के आगे चलाने वाली चीज़ स्नेह है।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने दो बार कहा, "न वेदों से, न तप से, न दान से, न यज्ञ से।" तो फिर किससे? अब वे वह शब्द कहेंगे, जिसके लिए यह सारा अध्याय रचा गया लगता है। और उसके बाद एक ऐसा श्लोक, जिसे कई आचार्य पूरी गीता का सार कहते हैं। आइए, अध्याय के आख़िरी दो श्लोक सुनते हैं।

भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन । ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप ॥ ५४ ॥
गीता 11.54 — अर्थ पढ़ें ›
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः । निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥ ५५ ॥
गीता 11.55 — अर्थ पढ़ें ›

चौवनवाँ श्लोक। "भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन", पर हे अर्जुन, अनन्य भक्ति से मैं इस प्रकार, "ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप", तत्त्व से जाना जा सकता हूँ, देखा जा सकता हूँ, और मुझमें प्रवेश किया जा सकता है, हे परन्तप।

आ गया वह शब्द। दो बार "न, न, न, न" सुनने के बाद, अब एक "त्वनन्यया" का "तु", पर। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, यह "तु" बाकी सब साधनों को अलग कर देने के लिए है। वेद नहीं, तप नहीं, दान नहीं, यज्ञ नहीं, पर भक्ति। और भक्ति भी कैसी? अनन्य।

अनन्य का अर्थ क्या है? शंकराचार्य इसकी बड़ी सुन्दर परिभाषा देते हैं: जो भगवान से कभी भी अलग न हो, वह अनन्य भक्ति है; जिसमें किसी भी इन्द्रिय से वासुदेव के सिवा और कुछ न दिखे। श्रीधर स्वामी इसे छोटा करके कहते हैं, एक मुझमें ही टिकी हुई। और मधुसूदन सरस्वती उसमें एक शब्द और जोड़ते हैं: सबसे ऊँचा प्रेम। अब उपमन्यु को याद कीजिए, जिनकी कथा हमने आज पहले सुनी। स्वर्ग का राजा सामने खड़ा है, सब कुछ देने को तैयार, और बालक कहता है, "महेश्वर को छोड़कर मुझे कोई दूसरी बात नहीं भाती।" यही अनन्य है। मन में दूसरा कोई विकल्प रखा ही नहीं।

संत ज्ञानेश्वर इसके लिए दो चित्र देते हैं। पहला: बादल से छूटी हुई बारिश धरती के सिवा कोई दूसरी राह नहीं जानती। दूसरा: गंगा अपना सारा जल लेकर समुद्र को ढूँढती है, और उसकी कोई दूसरी गति नहीं, वह मिलती है तो बस मिलती है। बारिश बीच में रुककर नहीं सोचती कि कहीं और चली जाऊँ। गंगा रास्ते में किसी और सागर की ओर नहीं मुड़ती।

और फिर तीन क्रियाएँ: जानना, देखना, प्रवेश करना। शंकराचार्य इन्हें तीन सीढ़ियाँ बताते हैं: शास्त्र से जानना, फिर साक्षात् देखना, और फिर प्रवेश, यानी मुक्ति। रामानुजाचार्य भी तीनों को "तत्त्व से" जोड़ते हैं, और यहाँ कठ उपनिषद् का वह वचन याद करते हैं जिसका भाव है कि यह आत्मा न प्रवचन से मिलता है, न बुद्धि से, न बहुत सुनने से; जिसे वह स्वयं चुन ले, उसी को मिलता है। और "प्रवेश" का अर्थ क्या है, इस पर हमारी टीका कहती है: कुछ लोग इसे भगवान से एक हो जाना मानते हैं; दूसरे उनके साथ सदा का मिलन। ज्ञानेश्वर इसके लिए आग और लकड़ी की उपमा देते हैं: आग लकड़ी में जलती है, तो लकड़ी का नाम मिट जाता है, वह आग ही हो जाती है। आचार्य यहाँ अलग-अलग राह से चलते हैं, और यह भेद पुराना है। पर एक बात पर सब एक हैं: वह द्वार भक्ति ही खोलती है।

और "परन्तप", शत्रुओं को तपाने वाले। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, यहाँ वह शत्रु अज्ञान है। जो अज्ञान नाम के शत्रु को तपा सके, वही इस प्रवेश के योग्य है।

अब इस अध्याय का अन्तिम श्लोक, पचपनवाँ। "मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः", जो मेरे लिए कर्म करता है, मुझे परम मानता है, मेरा भक्त है, आसक्ति से रहित है, "निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव", और सब प्राणियों में वैर से रहित है, हे पाण्डव, वह मुझे प्राप्त होता है।

इस श्लोक के बारे में शंकराचार्य एक ऐसी बात कहते हैं जो सुनकर रुक जाना चाहिए। वे कहते हैं, अब पूरे गीता-शास्त्र का सार, जो कल्याण के लिए है, आचरण में लाने के लिए एक जगह इकट्ठा करके कहा जा रहा है। मधुसूदन सरस्वती भी यही कहते हैं। और तिलक लिखते हैं कि शंकर-भाष्य के अनुसार इस श्लोक में पूरी गीता का तात्पर्य आ गया है। यानी अगर कोई आपसे पूछे कि सात सौ श्लोकों की गीता को एक श्लोक में कहिए, तो बहुत से आचार्य यही श्लोक सामने रखेंगे।

पाँच पहचानें हैं, और पाँचों को एक-एक करके देखते हैं। पहली दो पहचानें एक ही जुड़े हुए शब्द में हैं, "मत्कर्मकृन्मत्परमो"। पहली, मेरे लिए कर्म करने वाला। बलदेव विद्याभूषण इसके बहुत सीधे-सादे उदाहरण देते हैं: मन्दिर बनाना, उसे झाड़ना-बुहारना, फूलों की बगिया और तुलसी का वन सींचना। यानी बड़े काम नहीं, रोज़ के छोटे काम, उसके लिए। और रामानुजाचार्य कहते हैं, वेद पढ़ने से लेकर हर काम, यह सोचकर करना कि यह उसकी आराधना है।

दूसरी, मुझे परम मानने वाला। यहाँ शंकराचार्य एक बहुत सच्चा भेद दिखाते हैं। नौकर भी मालिक का काम करता है, पर मालिक को अपना अन्तिम लक्ष्य नहीं मानता; वह तनख़्वाह के लिए करता है। यह भक्त काम भी उसका करता है, और लक्ष्य भी उसी को मानता है। तीसरी, "मद्भक्तः", मेरा भक्त। रामानुजाचार्य कहते हैं, ऐसा भक्त जो भगवान के कीर्तन, स्तुति, ध्यान और प्रणाम के बिना अपने को सँभाल ही न पाए।

चौथी, "सङ्गवर्जितः", आसक्ति से रहित। शंकराचार्य इसमें धन, परिवार और मित्रों में अटकाव गिनाते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि परिवार छोड़ दो। इसका अर्थ है कि प्रेम रहे, पर पकड़ न रहे। जैसे पाँचवें अध्याय में सुना था, कमल का पत्ता पानी में रहकर भी गीला नहीं होता।

और पाँचवीं, जो मुझे इस श्लोक का दिल लगती है: "निर्वैरः सर्वभूतेषु", सब प्राणियों में वैर से रहित। शंकराचार्य कहते हैं, उनके प्रति भी, जो उसका बहुत बड़ा बुरा करने में लगे हों। रामानुजाचार्य इसके दो कारण बताते हैं: एक, वह अपने दुःख को अपने ही पिछले दोषों का फल मानता है, दूसरे को दोष नहीं देता; और दो, वह सब प्राणियों को भगवान के अधीन देखता है। तो वैर किस बात का? और नीलकण्ठ कहते हैं, यह तभी हो सकता है जब आदमी सारे जगत् को भगवान के रूप में देखे; भेद-बुद्धि वाले के लिए निर्वैर होना सम्भव ही नहीं।

पर अब ज़रा सोचिए, यह श्लोक कहाँ बोला जा रहा है। युद्ध के मैदान में। अभी-अभी अर्जुन ने भीष्म, द्रोण, कर्ण को काल के मुख में जाते देखा है। और अगले ही क्षण उनसे कहा जा रहा है, लड़ो, पर वैर के बिना। हमारी टीका ठीक यही बात पकड़ती है: अध्याय दर्शन पर नहीं, जीने के एक ढंग पर समाप्त होता है; और युद्ध के दर्शन के तुरन्त बाद "सब प्राणियों में वैर-रहित" होना ध्यान देने योग्य है, जिसे युद्ध करना है, वह भी बिना द्वेष के युद्ध करे। और तिलक इसी पर ज़ोर देते हैं: गीता का भक्तिमार्ग यह नहीं कहता कि आराम से बैठकर "राम राम" जपते रहो। वह कहता है, उत्कट भक्ति के साथ-साथ उत्साह से सब निष्काम कर्म करते रहो। इसीलिए निर्वैर के साथ "मेरे लिए कर्म करने वाला" जोड़ा गया, ताकि कोई निर्वैर का अर्थ निष्क्रिय न समझ ले।

और अब मैं आपको उस दृश्य पर ले चलता हूँ जिसे सञ्जय इसी भीष्म पर्व के बिल्कुल अन्त में सुनाते हैं, उसी रात का, जिस दिन भीष्म गिरे। मुझे इस श्लोक का इससे सच्चा चित्र महाभारत में कहीं नहीं मिला।

भीष्म चुप हो गए थे, और सब राजा अपने-अपने डेरों में लौट गए थे। तब कर्ण ने सुना कि भीष्म गिरा दिए गए हैं। पाठ कहता है, कुछ डरा हुआ-सा वह जल्दी से उनके पास आया। भीष्म आँखें मूँदे बाणों की शय्या पर लेटे थे। कर्ण का गला आँसुओं से रुँध गया, और वह उनके चरणों में गिर पड़ा और बोला: "कुरुश्रेष्ठ, मैं राधा का पुत्र हूँ, जो सदा आपकी आँखों में खटकता रहा।"

और भीष्म ने क्या किया? पहरेदारों को हटा दिया, देखा कि जगह सूनी है, और फिर, पाठ कहता है, एक हाथ से उसे ऐसे गले लगाया जैसे पिता पुत्र को लगाता है। और प्रेम से बोले: "बेटा, मैं तुमसे सच कहता हूँ, मुझमें तुम्हारे प्रति कोई द्वेष नहीं है।" फिर उन्होंने बताया कि उन्होंने कर्ण से जो कठोर बातें कहीं, वे केवल उसका अभिमान घटाने के लिए थीं, और कुल में फूट के डर से थीं। और फिर वह भेद खोला जो कर्ण के जीवन का सबसे बड़ा रहस्य था: "तुम कुन्ती के पुत्र हो, राधा के नहीं। पाण्डव तुम्हारे भाई हैं, एक ही माँ से जन्मे। यदि मुझे प्रसन्न करना चाहते हो, तो उनसे मिल जाओ।" और फिर वह वाक्य, जो कोई बाणों की शय्या से ही कह सकता था: "सूर्यपुत्र, यह वैर मेरे साथ ही समाप्त हो जाए। आज से धरती पर सब राजा सुरक्षित रहें।"

कर्ण ने उत्तर दिया कि वह यह सब जानता है, पर उसने दुर्योधन का ऐश्वर्य भोगा है, उसे झूठा नहीं कर सकता, और अर्जुन से लड़ेगा। फिर उसने कहा: उतावलेपन में मैंने आपसे जो कटु कहा या जो विरोध किया, उसे क्षमा कीजिए। और भीष्म ने उसे अनुमति दी, पर कैसे? "क्रोध और आवेश से रहित होकर, सज्जनों के आचरण पर चलते हुए, अपनी शक्ति के अनुसार युद्ध में अपना काम करो। अहंकार से रहित होकर लड़ो। क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्म के युद्ध से बढ़कर कुछ नहीं है।" और अन्त में: "मैंने शान्ति के लिए बहुत समय तक बहुत बड़ा प्रयत्न किया, पर सफल नहीं हुआ। यतो धर्मस्ततो जयः।"

अब इस दृश्य को आज के श्लोक के साथ रखिए। "निर्वैरः", भीष्म कहते हैं, मुझमें द्वेष नहीं। "सङ्गवर्जितः", जिस पक्ष के लिए वे लड़े, उससे बँधे नहीं, सच कहने से नहीं रुके। और "मेरे लिए कर्म", अपना काम, अपना धर्म, आख़िरी साँस तक। और भीष्म की यह सलाह, "क्रोध के बिना, अहंकार के बिना लड़ो", लगभग वही है जो गीता अर्जुन को दे रही है। एक बात और। "धर्म के युद्ध से बढ़कर क्षत्रिय के लिए कुछ नहीं", यह वाक्य आपने पहले भी सुना है, दूसरे अध्याय में, श्रीकृष्ण के मुँह से। यानी जो गीता उस सुबह रथ पर कही गई, वही उस रात भीष्म की शय्या से बोल रही थी। और इसी दृश्य के बाद सञ्जय कहते हैं, "महाराज, इस प्रकार मैंने आपको पूरा भीष्म पर्व सुनाया।" यानी जिस कथा के भीतर हम चौंतीस सत्संगों से बैठे हैं, उसका अन्तिम चित्र यही है: एक गिरा हुआ बूढ़ा योद्धा, जो अपने विरोधी को एक हाथ से गले लगाकर कहता है, यह वैर मेरे साथ ही ख़त्म हो जाए।

और यहीं ग्यारहवाँ अध्याय पूरा होता है। विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं, यह आख़िरी श्लोक सातवें अध्याय से अब तक जितने भक्तों की बात हुई, उन सबकी साझी पहचान है। और अगला अध्याय, महाभारत के भीष्म पर्व का छत्तीसवाँ, "भक्तियोग", अर्जुन के एक प्रश्न से शुरू होता है: "एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते। ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः।" अर्जुन ने अभी-अभी भगवान का रूप भी देखा है, और यह भी सुना है कि वे रूप से परे भी हैं। तो वे पूछते हैं: जो इस प्रकार आपकी उपासना करते हैं, और जो उस अविनाशी, अव्यक्त की, इन दोनों में योग को सबसे अच्छा कौन जानता है? रूप या निराकार? इसका उत्तर अगले सत्संग में।

तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली बात। भगवान का बड़ा, डराने वाला रूप भी सच है, और प्यारा रूप भी। जब जीवन में वह रूप दिखे जो छीन लेता है, तो अर्जुन की तरह "प्रसीद" कहिए, और उस रूप को माँगिए जिसके सहारे आप जी सकें। भगवान उसे देते हैं, और साथ में धीरज भी देते हैं: "मा ते व्यथा", डरो मत।

दूसरी बात। जो रोज़ सामने है, वही सबसे दुर्लभ है। "सुदुर्दर्शमिदं रूपं।" अर्जुन को अपने सखा का मूल्य उस दिन समझ आया जब रथ के आगे चलने वाला वह रूप नहीं रहा। आज ही अपने पास के लोगों को, और अपने घर के उस छोटे-से पूजा-स्थान को, एक बार नई नज़र से देखिए।

तीसरी बात। वह रूप वेद, तप, दान, यज्ञ से नहीं, अनन्य भक्ति से मिलता है, और उस भक्ति की पहचान यह है: उसके लिए काम करना, उसे परम मानना, उसे भजना, पकड़ छोड़ना, और किसी से वैर न रखना। अगर आज किसी के लिए मन में कोई गाँठ है, तो भीष्म की तरह कहकर देखिए: यह वैर मेरे साथ ही ख़त्म हो जाए।

आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आपके मन में भगवान का कौन-सा रूप सबसे प्यारा है, वह रूप जिसके सामने आप सबसे सहज होकर बात कर पाते हैं? और क्या कोई ऐसा वैर है जिसे आप आज छोड़ना चाहेंगे? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।

जिसके दर्शन को देवता तरसते हैं, वह एक मनुष्य के रथ के आगे चलता था। केवल स्नेह के कारण।

जय श्री कृष्ण।

मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः । निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥ ५५ ॥
गीता 11.55 — अर्थ पढ़ें ›

तीन बातें

  1. भगवान का बड़ा, डराने वाला रूप भी सच है, और प्यारा रूप भी। जब जीवन में वह रूप दिखे जो छीन लेता है, तो अर्जुन की तरह "प्रसीद" कहिए, और उस रूप को माँगिए जिसके सहारे आप जी सकें। भगवान उसे देते हैं, और साथ में धीरज भी देते हैं: "मा ते व्यथा", डरो मत।
  2. जो रोज़ सामने है, वही सबसे दुर्लभ है। "सुदुर्दर्शमिदं रूपं।" अर्जुन को अपने सखा का मूल्य उस दिन समझ आया जब रथ के आगे चलने वाला वह रूप नहीं रहा। आज ही अपने पास के लोगों को, और अपने घर के उस छोटे-से पूजा-स्थान को, एक बार नई नज़र से देखिए।
  3. वह रूप वेद, तप, दान, यज्ञ से नहीं, अनन्य भक्ति से मिलता है, और उस भक्ति की पहचान यह है: उसके लिए काम करना, उसे परम मानना, उसे भजना, पकड़ छोड़ना, और किसी से वैर न रखना। अगर आज किसी के लिए मन में कोई गाँठ है, तो भीष्म की तरह कहकर देखिए: यह वैर मेरे साथ ही ख़त्म हो जाए।