मैं काल हूँ, तुम निमित्त हो
गीता 11.32–11.44 · 78 मिनट
समय और विनाश का डर; "सखा समझकर जो कहा, क्षमा करो"
श्रीभगवानुवाच
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो
लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे
येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥ ३२ ॥
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व
जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव
निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥ ३३ ॥
द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च
कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् ।
मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा
युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् ॥ ३४ ॥
कभी रात को, जब घर में सब सो गए हों, आपको समय से डर लगा है? माँ-बाप बूढ़े हो रहे हैं, बच्चे बड़े होकर दूर जा रहे हैं, जिन दोस्तों के साथ बचपन बीता उनमें से कुछ अब नहीं रहे, और भीतर से एक आवाज़ उठती है कि जो कुछ हमने बनाया, जोड़ा, सँभाला, वह सब एक दिन चला जाएगा। आज का सवाल यही है: जब भगवान स्वयं कहें "मैं काल हूँ", तो हम डरें या भरोसा करें? और जिस भगवान से हम दोस्त की तरह बात करते आए हैं, उसकी असली महिमा दिख जाए, तो फिर उससे कैसे बात करें?
जय श्री कृष्ण।
आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का तैंतीसवाँ सत्संग है, और हम ग्यारहवें अध्याय के बीच में खड़े हैं। महाभारत के भीष्म पर्व का पैंतीसवाँ अध्याय ही गीता का ग्यारहवाँ अध्याय है, "विश्वरूप दर्शन योग"। और आपको याद रहे कि यह सब हमें सञ्जय सुना रहे हैं, हस्तिनापुर में, अन्धे राजा धृतराष्ट्र को, उस दिन जब भीष्म बाणों की शय्या पर गिर चुके हैं।
पहले जल्दी से याद कर लें कि पिछली बार हम कहाँ रुके थे। पिछले सत्संग में, पन्द्रहवें से इकतीसवें श्लोक तक, अर्जुन ने वह रूप देखा जिसकी उन्होंने माँग की थी, और वह रूप उनकी कल्पना से कहीं बड़ा निकला। पहले आश्चर्य था: सब देवता, कमल पर बैठे ब्रह्मा, अनगिनत भुजाएँ, पेट, मुख और नेत्र, और कहीं न आदि, न मध्य, न अन्त। फिर वह आश्चर्य डर में बदल गया। अर्जुन ने देखा कि दाढ़ों से विकराल, जलते हुए मुख हैं, और उनमें धृतराष्ट्र के सब पुत्र, भीष्म, द्रोण, कर्ण, और अपने पक्ष के योद्धा भी दौड़े चले जा रहे हैं, जैसे नदियाँ समुद्र की ओर दौड़ती हैं, जैसे पतंगे जलती आग में कूदते हैं। और तब अर्जुन के मुँह से वह सवाल निकला जिस पर पिछला सत्संग रुका था: "आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो", मुझे बताइए, इतने उग्र रूप वाले आप कौन हैं? "न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्", मैं आपकी प्रवृत्ति, आपका यह काम, समझ नहीं पा रहा।
आज उसी सवाल का उत्तर है। और यह उत्तर गीता के सबसे प्रसिद्ध और सबसे डराने वाले वाक्यों में से एक है।
"कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो।" मैं लोकों का नाश करने वाला, बढ़ा हुआ काल हूँ। "लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।" यहाँ मैं लोकों को समेटने के लिए प्रवृत्त हुआ हूँ। "ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः।" तुम्हारे बिना भी, विपक्ष की सेनाओं में जो योद्धा खड़े हैं, वे सब नहीं रहेंगे।
एक छोटी-सी बात पहले देखिए। अर्जुन ने कहा था, मैं आपकी "प्रवृत्ति" नहीं समझता। और श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं, "इह प्रवृत्तः", मैं यहाँ इसी काम में लगा हूँ। जिस शब्द में सवाल था, उसी शब्द में जवाब है। श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती दोनों कहते हैं कि अर्जुन ने दो बातें पूछी थीं, आप कौन हैं और क्या कर रहे हैं, और श्रीकृष्ण तीन श्लोकों में दोनों का उत्तर दे देते हैं।
अब "काल" शब्द। रामानुजाचार्य इसका अर्थ बड़ा सुंदर करते हैं। वे कहते हैं, "कलयति गणयति इति कालः", जो गिनता है, वह काल है। यानी काल वह है जो हर एक की आयु गिन रहा है। किसकी साँसें कितनी हैं, किसका दिन कब पूरा होगा, यह गिनती किसी बही में नहीं, उसके हाथ में है। और हमारी टीका इस श्लोक पर एक बात कहती है जो पूरे युद्ध को नई आँख से दिखाती है: जो युद्ध मनुष्यों का तय किया हुआ लगता है, वह असल में काल का काम है, और उसका अन्त पहले से निश्चित है।
और अब एक दृश्य सुनिए, जो महाभारत के उद्योग पर्व में है, और जो धृतराष्ट्र को याद होना चाहिए, क्योंकि वे उस सभा में बैठे थे। श्रीकृष्ण शान्ति का प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर की सभा में आए हैं। बात बहुत आगे बढ़ चुकी है। और एक क्षण आता है जब दुर्योधन क्रोध में सभा से उठ खड़ा होता है, सब बड़ों की अनदेखी करके, और बाहर चला जाता है। पाठ कहता है, उसके भाई, उसके मन्त्री, और सब राजा भी उसके पीछे-पीछे चल दिए। तब भीष्म, शन्तनु के पुत्र, जाते हुए उस राजकुमार को देखकर श्रीकृष्ण से कहते हैं: "कालपक्वमिदं मन्ये सर्वं क्षत्रं जनार्दन।" हे जनार्दन, मुझे लगता है कि यह सारा क्षत्रिय वर्ग काल के लिए पक चुका है, क्योंकि ये सब राजा मोह में उसके पीछे चले गए हैं।
"काल के लिए पक चुका है।" जैसे पेड़ पर फल पक जाए, और बस गिरने की देर हो। तिलक अपनी गीता-रहस्य में यहीं ठीक यही बात पकड़ते हैं: भीष्म ने जो उस दिन केवल शब्दों में कहा था, वही श्रीकृष्ण ने आज विश्वरूप में अर्जुन को आँखों से दिखा दिया। और सोचिए, आज यह बात कौन सुना रहा है, और किसे। जिस भीष्म ने वह वाक्य कहा था, वे अभी-अभी बाणों की शय्या पर गिरे हैं। जिस दुर्योधन के पीछे सब राजा चले गए थे, उसका पिता सामने बैठा है। फल गिरने लगे हैं।
अब "ऋतेऽपि त्वां" पर आचार्यों में एक प्यारा-सा भेद है, और मैं दोनों को आपके सामने रखता हूँ। शंकराचार्य, श्रीधर स्वामी, मधुसूदन सरस्वती और तिलक इसका अर्थ करते हैं "तुम्हारे बिना भी": तुम न भी लड़ो, तब भी ये नहीं बचेंगे। मधुसूदन तो यहाँ तक कहते हैं कि इस नाश में तुम्हारा अपना काम कुछ भी नहीं जोड़ता। पर संत ज्ञानेश्वर और बलदेव विद्याभूषण एक दूसरा अर्थ भी सुनते हैं: "तुम्हें छोड़कर"। ज्ञानेश्वरी में श्रीकृष्ण कहते हैं, इस संहार से तुम पाण्डव बाहर हो। और ज्ञानेश्वर लिखते हैं कि यह सुनते ही अर्जुन, जो मानो मृत्यु की महामारी में चले गए थे, फिर होश में आए, और उनके प्राण फिर लौट आए। दोनों अर्थ सच्चे हैं। एक कहता है, यह तुम्हारे बस का खेल नहीं है। दूसरा कहता है, डरो मत, तुम मेरी ओर हो।
अब तैंतीसवाँ श्लोक, जो इस पूरे अध्याय का सबसे काम का वाक्य है। "तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व।" इसलिए तुम उठो और यश प्राप्त करो। "जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्।" शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य को भोगो। "मयैवैते निहताः पूर्वमेव।" ये सब पहले ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। "निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्।" हे सव्यसाची, तुम केवल निमित्त बनो।
निमित्त, यानी माध्यम, जिसके हाथ से काम होता दिखता है। और यहाँ हमारी टीका एक बहुत ज़रूरी बात कहती है, जिसे मैं चाहता हूँ आप ध्यान से सुनें: निमित्त होने से अर्जुन कठपुतली नहीं बन जाते। उन्हें फिर भी कर्म करना है, और अच्छी तरह करना है। जो छोड़ना है, वह केवल यह मान्यता है कि परिणाम उनका अपना किया हुआ है।
तो फिर यश किस बात का? अगर सब पहले ही मारे जा चुके हैं, तो अर्जुन को यश क्यों मिले? मधुसूदन सरस्वती इसका उत्तर बड़ी कोमलता से देते हैं। वे कहते हैं, मैंने इन्हें रथ से नहीं गिराया, केवल तुम्हें यश दिलाने के लिए। तुम निमित्त बनो, ताकि संसार कहे कि अर्जुन ने इन्हें जीता। शंकराचार्य जोड़ते हैं कि ऐसा यश बड़े पुण्य से ही मिलता है। यानी भगवान काम अपने हाथ में रखते हैं, और श्रेय अपने भक्त को दे देते हैं। मुझे लगता है, किसी पिता को अपने बच्चे के साथ पतंग उड़ाते देखिए: डोर असल में पिता खींच रहे होते हैं, पर तालियाँ बच्चे के लिए बजती हैं, और पिता सबसे ज़ोर से बजाते हैं।
और "सव्यसाचिन्" सम्बोधन भी यहाँ यूँ ही नहीं है। सातवें सत्संग में आपने विराट नगर में अर्जुन के दस नाम सुने थे। उसी जगह अर्जुन ख़ुद बताते हैं कि गाण्डीव खींचने में उनकी दोनों भुजाएँ बराबर काम करती हैं, और बायीं भी उतनी ही कुशल है, इसलिए वे सव्यसाची कहलाते हैं, बाएँ हाथ से भी बाण चलाने वाले। श्रीकृष्ण मानो कह रहे हैं: तुम्हारे दोनों हाथ इस काम के लिए बने हैं। हाथ तुम्हारे होंगे, परिणाम मेरा।
और अब चौंतीसवाँ श्लोक, जिसमें श्रीकृष्ण नाम लेकर बात करते हैं। "द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान्।" द्रोण, भीष्म, जयद्रथ, कर्ण, और दूसरे भी वीर योद्धा, "मया हतांस्त्वं जहि", जो मेरे द्वारा मारे हुए हैं, उन्हें तुम मारो। "मा व्यथिष्ठा", व्याकुल मत हो। "युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्", युद्ध करो, तुम युद्ध में शत्रुओं को जीतोगे।
ये चार नाम ही क्यों? हमारी टीका कहती है, ये वही चार योद्धा हैं जिनसे अर्जुन सबसे ज़्यादा डरते थे, हर एक किसी अलग कारण से। शंकराचार्य और मधुसूदन सरस्वती एक-एक कारण गिनाते हैं। द्रोण, धनुर्वेद के आचार्य, दिव्य अस्त्रों वाले, और अर्जुन के अपने सबसे बड़े गुरु। भीष्म, जिनकी मृत्यु उनकी अपनी इच्छा से होगी, और जो परशुराम से युद्ध करके भी नहीं हारे थे। बीसवें सत्संग में अम्बा की कथा के साथ आपने वह युद्ध सुना था। कर्ण, जिनके पास इन्द्र की दी हुई वह शक्ति थी जो एक बार चलती तो खाली नहीं जाती, ऐसा शंकराचार्य कहते हैं। और जयद्रथ। उसका नाम यहाँ क्यों है, यह सुनने लायक़ है, क्योंकि उसकी कथा महाभारत के द्रोण पर्व में है, और उसे सुनकर यह श्लोक जीवित हो जाता है।
बाईसवें सत्संग में आपने जयद्रथ का वरदान सुना था, और यह कि उसका सिर कटकर उसके बूढ़े पिता की गोद में गिरा। उस गोद की कथा आज पूरी सुनिए। युद्ध के एक दिन, सूरज तेज़ी से ढल रहा था, और श्रीकृष्ण ने जल्दी में अर्जुन से कहा: "पार्थ, पार्थ, यह सिर धरती पर नहीं गिरना चाहिए। इसका कारण सुनो।" फिर उन्होंने बताया कि जयद्रथ के पिता वृद्धक्षत्र ने कठोर तप से यह पुत्र पाया था। और एक आकाशवाणी ने कहा था कि यह बालक गुणों में श्रेष्ठ होगा, पर एक क्रुद्ध शत्रु युद्ध में इसका सिर काटेगा। पुत्र के प्रेम में पिता ने देर तक सोचा, और फिर अपने सब बन्धुओं से कहा: "जो मेरे पुत्र का सिर धरती पर गिराएगा, उसका अपना सिर सौ टुकड़ों में फट जाएगा, अगर मेरे तप का कुछ भी फल है।" फिर वे पुत्र को राज्य देकर वन में तप करने चले गए, और वे उस समय युद्धभूमि, स्यमन्तपञ्चक, के ठीक बाहर तप कर रहे थे।
श्रीकृष्ण ने उपाय बताया: दिव्य अस्त्र से सिर काटो, और बाणों से ही उसे ले जाकर उसके पिता की गोद में गिरा दो, ऐसे कि उन्हें पता न चले। अर्जुन ने वैसा ही किया। पाठ कहता है, वृद्धक्षत्र उस समय सन्ध्या-उपासना कर रहे थे। काले बालों और कुण्डलों वाला वह सिर उनकी गोद में आ गिरा, और उन्होंने देखा नहीं। जप पूरा करके जैसे ही वे उठे, सिर धरती पर गिर पड़ा, और उसी क्षण उनका अपना सिर सौ टुकड़ों में फट गया। जो वरदान बेटे की रक्षा के लिए माँगा गया था, वही पिता का अन्त बन गया। काल की गिनती किसी वरदान से नहीं रुकती।
पर इस कथा का सबसे सुंदर हिस्सा उसके बाद आता है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गले लगाया और कहा, सौभाग्य से तुम्हारी बड़ी प्रतिज्ञा पूरी हुई, तुम्हारे सिवा कोई इस सेना से नहीं लड़ सकता था। और अर्जुन ने उत्तर दिया: "प्रसादात्तव माधव", माधव, यह प्रतिज्ञा मैंने आपकी कृपा से पार की, जो देवताओं के लिए भी कठिन थी। जिनके आप स्वामी हैं, उनकी जीत में कोई आश्चर्य नहीं। "तवैष भारो", यह भार आपका है, "तवैव विजयः प्रभो", और जीत भी आपकी ही है, प्रभु। देखिए, यह वही बात है जो आज रथ पर कही जा रही है, "मयैवैते निहताः पूर्वमेव", और उस दिन अर्जुन उसे अपने मुँह से दोहरा रहे थे। गीता सुनकर एक दिन में कोई निमित्त नहीं बनता। पर अर्जुन बन गए थे।
अब आपकी और मेरी ज़िंदगी में यह "निमित्त" कैसा दिखता है? मान लीजिए आप डॉक्टर हैं, और पूरी रात एक मरीज़ को बचाने में लगे रहे। अगर वह बच गया, तो मन कहता है, "मैंने बचाया।" और अगर नहीं बचा, तो वही मन कहता है, "मुझसे चूक हुई, मैं दोषी हूँ।" दोनों ही बार "मैं" बीच में खड़ा है, और दोनों ही बार वह आपको तोड़ता है, एक बार घमण्ड से, एक बार अपराध-बोध से। निमित्त का भाव कहता है: अपने हाथ पूरे मन से लगाइए, अपनी पूरी विद्या लगाइए, और फिर जो हो, उसे उसकी गिनती मानिए जो सबकी आयु गिनता है। इससे आपकी मेहनत कम नहीं होती, आपका बोझ कम होता है। माँ बच्चे को पालती है, पिता घर चलाता है, शिक्षक पढ़ाता है, और सब पूरे मन से करते हैं, पर जो इस श्लोक को समझ लेता है, वह रात को चैन से सो पाता है।
तो पहले खंड की बात यह है: काल डराता है, पर वही काल श्रीकृष्ण हैं। और जो काल के हाथ में अपने हाथ दे देता है, उसके लिए वही काल रक्षक बन जाता है।
पर अभी एक बात बाकी है। यह सुनकर अर्जुन के मन में क्या हुआ, यह अर्जुन नहीं बताते। यह बताते हैं सञ्जय। और सञ्जय उसे बताते समय धृतराष्ट्र से कुछ और भी कहना चाहते थे। आइए, अगले दो श्लोक सुनते हैं।
सञ्जय उवाच
एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य
कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी ।
नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं
सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ॥ ३५ ॥
अर्जुन उवाच
स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या
जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति
सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः ॥ ३६ ॥
आपने सुना होगा, इस खंड के पहले श्लोक से पहले गाने में "सञ्जय उवाच" आया। यानी यहाँ रथ पर चल रही बातचीत एक पल को रुकती है, और कथा सुनाने वाले सञ्जय स्वयं बीच में बोलते हैं, धृतराष्ट्र से। "एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य।" केशव का यह वचन सुनकर, "कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी", हाथ जोड़े, काँपते हुए मुकुटधारी अर्जुन ने, "नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं", नमस्कार करके फिर श्रीकृष्ण से कहा, "सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य", अत्यन्त डरे हुए, फिर से प्रणाम करके, गद्गद वाणी से।
एक शब्द पर रुकिए: "किरीटी"। सञ्जय यहाँ अर्जुन को उनके नाम से नहीं, उनके मुकुट से पुकारते हैं। सातवें सत्संग में आपने अर्जुन के दस नाम सुने थे, जो उन्होंने विराट के पुत्र उत्तर को बताए थे। उन्हीं में अर्जुन कहते हैं कि मेरे सिर पर सूर्य जैसा चमकता मुकुट है, जिसे इन्द्र ने दिया है, जो कट नहीं सकता और जिसे कोई छीन नहीं सकता, इसलिए मुझे किरीटी कहते हैं। मधुसूदन सरस्वती भी यही याद दिलाते हैं: इन्द्र का दिया मुकुट, और सबसे बड़े वीर के रूप में प्रसिद्ध। और वही किरीटी आज काँप रहा है। जिसका मुकुट कोई नहीं छीन सकता था, उसका सिर आज अपने आप झुका जा रहा है। एक बार नमस्कार, फिर दोबारा प्रणाम। कभी-कभी सबसे बड़ा मुकुट वही होता है जो झुकना जानता हो।
अब "सगद्गदं"। शंकराचार्य इसे बड़ी बारीकी से खोलते हैं। वे कहते हैं, गला दो कारणों से रुँधता है: डर की चोट से, और प्रेम से उठे आनन्द से। दोनों में आँखें भर आती हैं, गला अटक जाता है, और आवाज़ धीमी, टूटी-सी हो जाती है। और संत ज्ञानेश्वर यहाँ एक बड़ी ईमानदार बात कहते हैं। वे लिखते हैं कि अर्जुन ने वह वाणी सुनी, और उनका सारा शरीर काँप उठा, हाथ जुड़ गए, बार-बार माथा चरणों पर रखा, कुछ बोलना चाहा तो गला बन्द हो गया। फिर ज्ञानेश्वर कहते हैं: यह सुख था या भय, यह आप ही सोचिए। मुझे यह पंक्ति बहुत सच्ची लगती है। भगवान के बहुत पास पहुँचकर जो होता है, उसे केवल डर या केवल प्रेम कहना कठिन है। जैसे किसी बहुत बड़े आदमी के पैर छूते समय हाथ काँपते हैं, पर मन भरा हुआ होता है।
नीलकण्ठ एक और बात देखते हैं। जुड़े हुए हाथ इस बात का चिह्न हैं कि अब किरीटी भगवान की बात नहीं टालेंगे। यानी अभी जो "उठो, निमित्त बनो" कहा गया, उसका उत्तर अर्जुन के मुँह से नहीं, उनके हाथों से आ गया।
अब इस श्लोक की सबसे गहरी बात, जिसे शंकराचार्य और मधुसूदन सरस्वती दोनों उठाते हैं। सञ्जय ठीक यहीं बीच में क्यों बोले? वे कहते हैं, इसका एक अभिप्राय है। श्रीकृष्ण ने अभी नाम लेकर कहा कि द्रोण, भीष्म, जयद्रथ और कर्ण, जिन चारों के भरोसे दुर्योधन जीत की आशा कर रहा है, वे पहले ही मारे जा चुके हैं। सञ्जय ने सोचा होगा कि यह सुनकर अन्धा राजा समझ जाएगा कि दुर्योधन का कोई सहारा नहीं बचा, वह जीत की आशा छोड़कर सन्धि कर लेगा, और दोनों पक्षों में शान्ति हो जाएगी। और फिर शंकराचार्य एक छोटा-सा, बहुत भारी वाक्य लिखते हैं: पर धृतराष्ट्र ने वह भी नहीं सुना, जो होना था उसके वश में।
सोचिए इस क्षण को। भीष्म गिर चुके हैं। पर द्रोण अभी जीवित हैं, कर्ण अभी जीवित हैं, जयद्रथ अभी जीवित है। युद्ध अभी रोका जा सकता है। और सञ्जय, जो सब देख रहे हैं, गीता सुनाते-सुनाते, बीच में, अपने राजा को एक इशारा देते हैं: महाराज, सुनिए, भगवान ने क्या कहा। और राजा सुनता है, पर सुनता नहीं। हमारे जीवन में भी कई बार ऐसा होता है। कोई डॉक्टर, कोई बड़ा, कोई सच्चा दोस्त, बार-बार एक ही बात कहता है, और हम सुनते हैं, सिर भी हिलाते हैं, पर भीतर कुछ नहीं बदलता।
और यहीं, इससे पहले कि हम अर्जुन की स्तुति में उतरें, एक छोटी-सी बात आपसे कहना चाहता हूँ। हम इस अध्याय के सबसे डराने वाले मोड़ से गुज़र रहे हैं। अभी आपने "मैं काल हूँ" सुना, नाश की बात सुनी। अगर कोई यहीं उठ जाए, तो वह गीता से केवल डर लेकर जाएगा। आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। इसी डर के बाद अर्जुन के मुँह से वह स्तुति निकलती है, और वह क्षमा-याचना, "सखा समझकर जो कहा, उसे क्षमा करो", जो इस पूरे अध्याय का सबसे कोमल हिस्सा है। तो अगर आप यह सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की यह यात्रा बीच में न छूटे। और आज का यह सत्संग आख़िर तक सुनिए, क्योंकि आज का सबसे बड़ा भरोसा अभी आना बाकी है।
अब छत्तीसवाँ श्लोक, और गाने में फिर "अर्जुन उवाच" आया, यानी अब अर्जुन बोल रहे हैं। "स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च।" हे हृषीकेश, यह उचित ही है कि आपके कीर्तन से जगत् हर्षित होता है और आपसे प्रेम करने लगता है। "रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति", राक्षस डरकर सब दिशाओं में भागते हैं, "सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः", और सिद्धों के सब समूह आपको नमस्कार करते हैं।
"स्थाने" का अर्थ है, ठीक ही है, उचित ही है। शंकराचार्य बताते हैं कि यह सब उचित क्यों है: क्योंकि आप ईश्वर हैं, सबकी आत्मा हैं, और सब प्राणियों के मित्र हैं। यह आख़िरी बात सुनिए: "सब प्राणियों के मित्र"। अभी-अभी अर्जुन ने जलते हुए मुख देखे थे, और अब पहले ही वाक्य में वे कह रहे हैं कि जगत् आपसे प्रेम करता है। डर के बीच से प्रेम की पहली किरण निकल रही है।
श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती बताते हैं कि यहाँ से ग्यारह श्लोकों तक अर्जुन की स्तुति चलती है। और वे कहते हैं, अर्जुन का भाव यह है: आपके गुण सुनकर केवल मैं ही प्रसन्न नहीं होता, सारा जगत् होता है। और मधुसूदन सरस्वती और नीलकण्ठ, दोनों, एक बात लिखते हैं जो बहुत लोग नहीं जानते: यह श्लोक मन्त्र-शास्त्र में राक्षसों से रक्षा करने वाले मन्त्र के रूप में प्रसिद्ध है। यानी जिस श्लोक में डर से भागते राक्षसों का चित्र है, उसी को लोग डर भगाने के लिए पढ़ते आए हैं।
पर इस श्लोक में एक सवाल छिपा है। एक ही रूप देखकर जगत् प्रसन्न क्यों होता है, और राक्षस भाग क्यों जाते हैं? विश्वनाथ चक्रवर्ती और बलदेव विद्याभूषण इसका बहुत सुंदर उत्तर देते हैं। वे कहते हैं, भगवान का रूप अत्यन्त प्रसन्न भी है और अत्यन्त भयंकर भी, और यह भेद देखने वाले पर है: जो उनकी ओर मुख किए है, उसके लिए वह मधुर है, और जो उनसे मुँह फेरे है, उसके लिए भयंकर। अर्जुन ने एक ही पल में यह समझ लिया, और इसलिए वे अब डर की नहीं, स्तुति की भाषा बोल रहे हैं।
मुझे लगता है, यह बात हमारी ज़िंदगी के लिए बहुत काम की है। आग वही है जो रसोई में खाना पकाती है और वही है जो लापरवाह हाथ को जला देती है। धूप वही है जो खेत पकाती है और वही है जो बिना छाते के आदमी को थका देती है। काल भी वैसा ही है। जो उससे भागता है, उसके लिए वह मृत्यु है। जो उसके हाथ में हाथ देता है, उसके लिए वही समय हर दिन की नई सुबह है।
और संत ज्ञानेश्वर इसी श्लोक पर अर्जुन के मुँह से एक बड़ी मासूम बहस भी रखते हैं। अर्जुन कहते हैं, प्रभु, आप काल हैं, यह मानता हूँ, पर अभी तो प्रलय का समय नहीं है, अभी तो संसार के चलने का समय है। क्या दोपहर में कभी सूरज डूबता है? और ज्ञानेश्वर लिखते हैं कि श्रीकृष्ण ने इशारे से बताया: केवल इन दो सेनाओं का समय पूरा हुआ है, बाकी सब अपने समय पर। और उसी क्षण अर्जुन ने देखा कि संसार फिर अपनी जगह पर है। फिर अर्जुन कहते हैं, आप दुःख के सागर में गिरे हुए को जैसे बाहर निकालते हैं, आपकी वह कीर्ति मुझे याद आ रही है, और उसे याद करते-करते मैं आनन्द की लहरों पर लोट रहा हूँ।
तो जो डर पहले खंड में था, वह यहाँ आकर स्तुति बन गया।
पर अभी एक बात बाकी है। अर्जुन ने कहा, "यह उचित ही है कि सब आपको नमस्कार करते हैं।" पर क्यों उचित है? अगले दो श्लोकों में वे उसके कारण गिनाते हैं, और उन कारणों में भगवान का ऐसा परिचय है, जो आपको किसी डर में नहीं, एक बहुत गहरी शान्ति में ले जाएगा। आइए, सुनते हैं।
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्
गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ।
अनन्त देवेश जगन्निवास
त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥ ३७ ॥
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण-
स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम
त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ॥ ३८ ॥
सैंतीसवाँ श्लोक। "कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे।" हे महात्मन्, वे आपको नमस्कार क्यों न करें? आप तो ब्रह्मा से भी बड़े हैं, उनके भी आदि-कर्ता हैं। "अनन्त देवेश जगन्निवास।" हे अनन्त, हे देवताओं के स्वामी, हे जगत् के निवास। "त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्।" आप ही अक्षर हैं: सत्, असत्, और उन दोनों से परे जो है, वह भी आप ही हैं।
श्रीधर स्वामी इस श्लोक को एक बहुत सधे हुए वकील की तरह पढ़ते हैं। वे गिनते हैं: महात्मा, ब्रह्मा से बड़े, ब्रह्मा के भी जनक, अनन्त, देवेश, जगन्निवास, अक्षर, सत्-असत्, और उनसे परे। नौ कारण। और फिर कहते हैं, इन नौ कारणों से सब आपको नमस्कार करते हैं, तो इसमें आश्चर्य क्या? मधुसूदन सरस्वती इसमें एक बात और जोड़ते हैं। वे कहते हैं, इनमें से एक-एक कारण भी अकेले नमस्कार के लिए काफ़ी है। आप जगत् को नियम में रखते हैं, यही काफ़ी है। आप उपदेश देते हैं, यही काफ़ी है। आप सबके जनक हैं, यही काफ़ी है। और जहाँ इतने सारे गुण एक साथ हों, वहाँ नमस्कार न करना ही आश्चर्य होगा।
"जगन्निवास", यह नाम मुझे बहुत प्यारा लगता है। इसका एक अर्थ है, जिसमें जगत् रहता है। और दूसरा, जो जगत् में रहता है। अभी थोड़ी देर पहले अर्जुन ने देखा था कि सारा जगत् उन मुखों में जा रहा है। अब वे कहते हैं, आप जगत् का घर हैं। जो दृश्य निगलने जैसा दिख रहा था, वह असल में घर लौटने जैसा है।
अब इस श्लोक का सबसे कठिन पद: "सदसत्तत्परं यत्"। और यहाँ आचार्य अलग-अलग राह से चलते हैं। मैं तीनों को आपके सामने रखता हूँ, किसी को छोटा किए बिना। शंकराचार्य कहते हैं, सत् वह है जिसके बारे में बुद्धि कहती है "है", और असत् वह जिसके बारे में कहती है "नहीं है"। ये दोनों उस अक्षर के ऊपर की उपाधियाँ हैं, और असल में वह अक्षर दोनों से परे है, जिसे वेद जानने वाले अक्षर कहते हैं। और वह आप ही हैं, कोई और नहीं। श्रीधर स्वामी इसे सरल कर देते हैं: सत् यानी जो प्रकट है, असत् यानी जो अभी प्रकट नहीं हुआ, और उन दोनों से परे जो मूल कारण है, वह अक्षर ब्रह्म आप हैं। रामानुजाचार्य एक तीसरी राह दिखाते हैं। वे कहते हैं, अक्षर यानी जीवात्मा, जो कभी नष्ट नहीं होता, न जन्मता है, न मरता है। सत् और असत् यानी प्रकृति, अपने प्रकट और अप्रकट रूप में। और उनसे परे यानी मुक्त आत्माएँ। और ये सब आप ही हैं, क्योंकि आप इन सबकी भीतर की आत्मा हैं।
तीनों रास्ते अलग हैं, पर तीनों एक ही जगह पहुँचते हैं: जो कुछ है, जो कुछ नहीं दिखता, और जो इन दोनों से भी परे है, उसमें ऐसा कुछ नहीं जो श्रीकृष्ण से बाहर हो। तिलक यहाँ हमें आगे का एक श्लोक याद दिलाते हैं, तेरहवें अध्याय का, जहाँ ब्रह्म के बारे में कहा जाएगा, "न सत्तन्नासदुच्यते", उसे न सत् कहा जाता है, न असत्। उस श्लोक तक हम अपने समय पर पहुँचेंगे।
अब अड़तीसवाँ श्लोक। अर्जुन कहते हैं, आप आदिदेव हैं, पुरातन पुरुष हैं। आप इस विश्व के परम निधान हैं, "परं निधानम्"। "वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम", आप जानने वाले हैं, जानने योग्य भी हैं, और परम धाम भी। "त्वया ततं विश्वमनन्तरूप", हे अनन्तरूप, यह सारा विश्व आपसे व्याप्त है।
"निधान" शब्द पर ठहरिए, क्योंकि आज के डर का उत्तर इसी शब्द में छिपा है। शंकराचार्य कहते हैं, निधान वह है जिसमें महाप्रलय के समय सारा जगत् रख दिया जाता है। रख दिया जाता है। फेंका नहीं जाता, मिटाया नहीं जाता, रखा जाता है। मधुसूदन सरस्वती भी कहते हैं, यह लय का स्थान है, जहाँ सब कुछ जाकर ठहरता है। और संत ज्ञानेश्वर लिखते हैं कि कल्प के अन्त में सारा महद्-ब्रह्म आपके भीतर समा जाता है।
अब इसे पहले खंड के साथ रखकर देखिए। वहाँ श्रीकृष्ण ने कहा था, "मैं काल हूँ, लोकों को समेटने आया हूँ।" और यहाँ अर्जुन कहते हैं, "आप परम निधान हैं।" यानी जो समेटता है, वही सँभालकर रखता भी है। मुझे लगता है, यह किसान के खलिहान जैसा है। फ़सल काटी जाती है, खेत ख़ाली हो जाता है, देखने वाले को लगता है कि सब उजड़ गया। पर दाना फेंका नहीं गया, वह खलिहान में रखा गया है, और अगले मौसम का बीज उसी से निकलेगा। काल ले जाता है, पर कहीं खो नहीं देता। वह अपने ही घर में ले जाता है।
और एक छोटी-सी बात, जो मुझे बहुत छूती है। अठारहवें श्लोक में, जब अर्जुन ने पहली बार यह रूप देखा था और अभी आश्चर्य में थे, तब भी उन्होंने ठीक यही शब्द कहे थे: "त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्"। फिर बीच में डर आया, जलते मुख आए, भीष्म और द्रोण उन मुखों में जाते दिखे। और अब, उस सारे डर के बाद, अर्जुन फिर वही शब्द कहते हैं। डर ने उनकी आस्था को नहीं तोड़ा। डर से गुज़रकर वह आस्था और पक्की होकर लौटी।
अब "पुरुषः पुराणः", पुरातन पुरुष। शंकराचार्य "पुरुष" का अर्थ बताते हैं, जो शरीर रूपी नगर में शयन करता है। और नीलकण्ठ कहते हैं, "पुराण" यानी जो शरीर के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता। और यह "पुरातन" बात महाभारत में भी आती है। तेरहवें सत्संग में आपने सुना था कि भीष्म रात में दुर्योधन को ब्रह्मा के वचन सुना रहे थे, और उनमें ब्रह्मा देवताओं से कहते हैं कि नर और नारायण नाम के दो प्राचीन ऋषि साथ-साथ मनुष्य लोक में जन्मे हैं, और मूर्ख उन्हें पहचान नहीं पाते। यानी जो रथ हाँक रहा है और जो रथ पर खड़ा है, दोनों का रिश्ता इस जन्म से बहुत पुराना है। यह बात हमें आगे क्षमा-याचना वाले श्लोकों में फिर काम आएगी।
और "वेत्तासि वेद्यं च", जानने वाले भी आप, जानने योग्य भी आप। हम पूरी ज़िंदगी कुछ न कुछ जानने में लगाते हैं: पैसे का हिसाब, लोगों का मन, अपना भविष्य। और अर्जुन कहते हैं कि जो सब कुछ जानता है, वही जानने लायक़ भी है। जिसने उसे जान लिया, उसे बाकी जानने की इतनी बेचैनी नहीं रहती।
तो इस खंड की बात यह है: जिस काल से डर लगता है, वही परम निधान है, सबका ठिकाना। आपके जो अपने चले गए, वे कहीं ग़ायब नहीं हुए। वे उसी घर में रखे गए हैं, जिसमें एक दिन हम सब पहुँचेंगे।
पर अभी एक बात बाकी है। इतने कारण गिनाने के बाद अर्जुन के पास अब कहने के लिए शब्द कम पड़ने लगते हैं। और जब शब्द कम पड़ते हैं, तो एक ही चीज़ बचती है: नमस्कार, बार-बार नमस्कार। आइए, अगले दो श्लोक सुनते हैं।
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः
प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः
पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥ ३९ ॥
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते
नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं
सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥ ४० ॥
उनतालीसवाँ श्लोक। "वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।" आप ही वायु हैं, यम हैं, अग्नि हैं, वरुण हैं, चन्द्रमा हैं। आप ही प्रजापति हैं, और सबके प्रपितामह। "नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः", आपको नमस्कार हो, हज़ार बार नमस्कार हो, "पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते", और फिर, और फिर भी, नमस्कार हो, नमस्कार हो।
पहले प्रजापति और प्रपितामह को समझ लें। हमारी टीका कहती है, प्रजापति यहाँ ब्रह्मा हैं, जो सारी प्रजा के पितामह, यानी दादा हैं। और श्रीकृष्ण उनके भी मूल हैं, इसलिए प्रपितामह, परदादा। यहाँ एक छोटा-सा भेद भी है। शंकराचार्य प्रजापति का अर्थ कश्यप आदि प्रजापति करते हैं, जिनसे सृष्टि आगे बढ़ी। और तिलक कहते हैं कि कुछ लोग ऐसा ही अर्थ लेते हैं, पर यहाँ शब्द एकवचन में है, इसलिए ब्रह्मा अर्थ अधिक ठीक बैठता है, और तब "प्रपितामह" शब्द अपने आप सार्थक हो जाता है। अर्थ जो भी लें, भाव एक है: जिसे आप पूरे वंश का सबसे पुराना पूर्वज समझते थे, उससे भी पहले वह है।
अब इस सूची को अर्जुन की अपनी ज़िंदगी के साथ रखकर देखिए, तो यह श्लोक केवल देवताओं की गिनती नहीं रह जाता। दूसरे सत्संग में आपने सुना था कि वनवास के दिनों में, हिमालय पर, किरात-वेशी शिव से युद्ध के बाद, लोकपाल अर्जुन के पास आए थे, और यम ने उन्हें बताया था कि आगे तुम्हें भीष्म को जीतना है। उसी अध्याय में आगे लिखा है कि जल के स्वामी वरुण आए, धन के स्वामी कुबेर आए, हाथ में दण्ड लिए यम आए, और अन्त में ऐरावत पर इन्द्र। यम ने अर्जुन को अपना दण्ड-अस्त्र दिया, वरुण ने अपने पाश दिए, कुबेर ने अपना अस्त्र। और अग्नि? खाण्डव वन में वे अर्जुन से मिल चुके थे। यानी अर्जुन आज जिन नामों को गिना रहे हैं, वायु, यम, अग्नि, वरुण, उनमें से कई को वे आमने-सामने देख चुके हैं, उनके हाथ से अस्त्र ले चुके हैं। और आज रथ पर उन्हें दिख रहा है कि वे सब इसी एक के रूप थे। जिन-जिन से जीवन में कुछ मिला था, सबके पीछे एक ही देने वाला खड़ा था।
और अब वह पंक्ति, जो इस श्लोक का दिल है: "नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते।" नमस्कार, नमस्कार, हज़ार बार, फिर, और फिर भी। शंकराचार्य कहते हैं, यह बार-बार कहना दिखाता है कि श्रद्धा और भक्ति की अधिकता से अर्जुन का मन भर ही नहीं रहा। श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती भी यही कहते हैं: नमस्कार करते हुए "बस, इतना काफ़ी है" का भाव आता ही नहीं। और मधुसूदन अर्जुन के मुँह में एक बहुत विनम्र शब्द रखते हैं: सब देवता आपको नमस्कार करते हैं, तो मुझ बेचारे का भी नमस्कार स्वीकार कीजिए।
संत ज्ञानेश्वर इस क्षण का चित्र ऐसे खींचते हैं, जैसे वे वहाँ खड़े हों। वे लिखते हैं, अर्जुन ने प्रेम से नमस्कार किया, फिर कहा, "नमस्ते, नमस्ते प्रभो"। फिर उस रूप को सिर से पाँव तक निहारा, और फिर कहा, "नमस्ते, नमस्ते प्रभो"। देखते-देखते मन को शान्ति मिली, और फिर कहा, "नमस्ते"। चर-अचर सब प्राणियों में उन्हें देखा, और फिर कहा, "नमस्ते"। और ज्ञानेश्वर कहते हैं कि अर्जुन को कोई और स्तुति याद ही नहीं आ रही थी, और वे चुप बैठ भी नहीं पा रहे थे, बस प्रेम में ऊँचे स्वर से यही कहते जा रहे थे। जिसने कभी किसी बहुत बड़ी कृपा के सामने "धन्यवाद" कहा हो, वह यह समझ सकता है। एक बार कहने से मन नहीं भरता। अस्पताल से ठीक होकर लौटा आदमी डॉक्टर का हाथ पकड़कर बार-बार वही एक शब्द कहता है, क्योंकि उसके पास उससे बड़ा कोई शब्द नहीं होता।
और यहीं से समझ में आता है कि हमारे घरों में माला पर एक ही नाम एक सौ आठ बार क्यों लिया जाता है। लोग पूछते हैं, एक बार कहने से क्या भगवान नहीं सुनते? सुनते हैं। पर बार-बार कहना भगवान के लिए नहीं, हमारे लिए है। "सहस्रकृत्वः" कहने वाला कोई गिनती पूरी नहीं कर रहा, वह अपने भरे हुए मन को बहने का रास्ता दे रहा है। बीसवें सत्संग में आपने सुना था कि भीष्म ने शरशय्या पर अपनी लम्बी स्तुति के अन्त में केवल "नमः" कहकर प्रणाम किया था। स्तुति जहाँ पूरी होती है, वहाँ केवल नमस्कार बचता है।
अब चालीसवाँ श्लोक। "नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते", आपको आगे से नमस्कार, और पीछे से भी, "नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व", हे सर्व, आपको सब ओर से नमस्कार। "अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं", आपका सामर्थ्य अनन्त है और पराक्रम अपार। "सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः", आप सबको व्याप्त किए हुए हैं, इसलिए आप ही सर्व हैं।
शंकराचार्य "वीर्य" और "विक्रम" का भेद बताते हैं। वीर्य है सामर्थ्य, और विक्रम है उस सामर्थ्य को काम में लाना। वे कहते हैं, कोई सामर्थ्यवान होकर भी कभी-कभी पराक्रम नहीं दिखाता, या ढीला दिखाता है। आपमें सामर्थ्य भी अनन्त है और पराक्रम भी। मधुसूदन सरस्वती इसे युद्धभूमि की भाषा में कहते हैं। मनुष्यों में ये दोनों बँटे रहते हैं: कोई बल में बढ़ा होता है, कोई शस्त्र चलाने की कुशलता में। आपमें दोनों अनन्त हैं। और "सर्व" होने की बात श्रीधर स्वामी एक सुनार की दुकान से समझाते हैं: जैसे सोना कंगन में भी है और कुण्डल में भी, गहने अलग दिखते हैं पर भीतर सोना एक ही है, वैसे ही आप सबके भीतर-बाहर व्याप्त हैं।
अब "आगे से और पीछे से नमस्कार", इस पर संत ज्ञानेश्वर एक बड़ी प्यारी बात कहते हैं। वे अर्जुन से कहलवाते हैं: प्रभु, आपकी पीठ है या नहीं, आगे-पीछे है या नहीं, यह मुझे नहीं पता। पर आप मेरी पीठ के पीछे भी खड़े हैं, इसलिए आपको पीछे से भी नमस्कार। सच कहिए, कितनी बार ऐसा हुआ है कि हम किसी मुश्किल से निकल आए, और बाद में समझ आया कि कोई पीछे खड़ा था, जिसे हमने देखा ही नहीं। तिलक भी यहाँ उपनिषद की उस पंक्ति की याद दिलाते हैं जिसमें कहा गया है कि ब्रह्म आगे है, ब्रह्म पीछे है, दाएँ, बाएँ, ऊपर, नीचे, सब ओर वही है।
और नीलकण्ठ इस पंक्ति का एक ऐसा अर्थ करते हैं, जो सीधे हमारे रोज़ के जीवन में उतर आता है। वे कहते हैं, "पुरस्तात्", यानी कर्मों के आरम्भ में नमस्कार, "पृष्ठतः", यानी कर्मों के पूरे होने पर नमस्कार, और "सर्वतः", यानी बीच में भी नमस्कार। सोचिए, यह कितना सरल साधन है। सुबह काम पर निकलने से पहले एक नमस्कार। रसोई में चूल्हा जलाने से पहले, बच्चे की परीक्षा से पहले, किसी कठिन बातचीत से पहले। फिर काम पूरा होने पर, वह जैसा भी हुआ हो, एक नमस्कार। और बीच में, जब काम अटक जाए, मन घबरा जाए, तब भी एक नमस्कार। पहले खंड में हमने निमित्त होने की बात की थी। यही उसका अभ्यास है। आरम्भ में नमस्कार याद दिलाता है कि करने वाला अकेला मैं नहीं। अन्त में नमस्कार याद दिलाता है कि फल भी मेरा अकेले का नहीं।
तो इस खंड की बात यह है: जब भगवान की महिमा सामने खुलती है, तो शब्द कम पड़ जाते हैं, और नमस्कार ही सबसे सच्ची भाषा बन जाता है।
पर अभी एक बात बाकी है। इतनी बड़ी महिमा देखकर, नमस्कार करते-करते, अर्जुन को अचानक कुछ याद आता है। बरसों की यादें। वे सब पल, जब इसी महान रूप वाले को उन्होंने "अरे कृष्ण" कहकर पुकारा था, उनके साथ हँसी-मज़ाक किया था, एक ही पलंग पर बैठकर बातें की थीं। और वह याद अर्जुन के मन में एक कसक बनकर उठती है। आइए, अगले दो श्लोक सुनते हैं।
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं
हे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।
अजानता महिमानं तवेदं
मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥ ४१ ॥
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि
विहारशय्यासनभोजनेषु ।
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं
तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥ ४२ ॥
हमारी टीका बताती है कि ये दोनों श्लोक मिलकर एक ही वाक्य हैं, इसलिए इन्हें एक साथ सुनना चाहिए। "सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।" आपको सखा मानकर मैंने हठ से जो कुछ कहा, "हे कृष्ण, हे यादव, हे सखा", "अजानता महिमानं तवेदं", आपकी इस महिमा को न जानते हुए, "मया प्रमादात्प्रणयेन वापि", असावधानी से, या प्रेम से भी। "यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि", और हँसी-हँसी में जो आपका अनादर हुआ, "विहारशय्यासनभोजनेषु", घूमते-खेलते, सोते, बैठते और खाते समय, "एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं", हे अच्युत, अकेले में या दूसरों के सामने, "तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्", उस सबके लिए मैं आप अप्रमेय से क्षमा माँगता हूँ।
हमारी टीका इस क्षण को एक वाक्य में पकड़ लेती है: अर्जुन ने अभी-अभी देखा है कि उनका मित्र कौन है, और जिन परिचित नामों से वे बरसों से उन्हें पुकारते रहे, वे अचानक अनादर जैसे लगने लगे हैं।
अब उन तीन नामों को सुनिए, जिन पर अर्जुन को आज शर्म आ रही है। बलदेव विद्याभूषण और विश्वनाथ चक्रवर्ती बड़ी बारीकी से बताते हैं कि हर नाम में क्या "कमी" थी। "हे कृष्ण", बिना किसी आदर-सूचक शब्द के, सीधे नाम से। "हे यादव", यानी तुम यदुवंश के हो, जिसमें राजा होने का अधिकार नहीं, जबकि मैं पुरु के राजवंश का हूँ। और "हे सखा", शंकराचार्य कहते हैं, सखा यानी बराबर की उम्र वाला, बस एक हमउम्र साथी। तीनों नाम हम अपनों के लिए ही इस्तेमाल करते हैं। माँ बेटे को नाम से बुलाती है, भाई भाई को "अरे" कहता है, दोस्त दोस्त को उसके गाँव या उसके कुल के नाम से छेड़ता है। अर्जुन ने भी यही किया था। फ़र्क बस इतना था कि जिसे वे छेड़ रहे थे, वह सारे जगत् का निवास था।
और "प्रसभं", हठ से, ज़ोर देकर। मधुसूदन सरस्वती और नीलकण्ठ कहते हैं, यानी अपने को ऊपर दिखाते हुए। और "प्रणय" का अर्थ शंकराचार्य बताते हैं: स्नेह से उपजा भरोसा, वह अपनापन जिसमें आदमी बिना सोचे कुछ भी कह देता है। अर्जुन ईमानदार हैं। वे यह नहीं कहते कि मुझसे कभी कोई भूल नहीं हुई। वे दो कारण बताते हैं: कभी ध्यान नहीं था, और कभी इतना प्रेम था कि ध्यान की ज़रूरत ही नहीं लगी।
फिर वे चार जगहें गिनाते हैं: विहार, शय्या, आसन, भोजन। मधुसूदन सरस्वती इन्हें खोलते हैं: विहार यानी खेलना या घूमना-फिरना, शय्या यानी बिछौना, आसन यानी बैठने की ऊँची जगहें, और भोजन यानी बहुतों के साथ एक पंक्ति में बैठकर खाना। और इन चारों का कोई काल्पनिक चित्र बनाने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि महाभारत का आदि पर्व हमें ये चारों अपनी आँखों से दिखा देता है।
पहले विहार और आसन। इन्द्रप्रस्थ बस चुका है, युधिष्ठिर के राज्य में प्रजा सुखी है। गर्मी के दिन हैं। और एक दिन अर्जुन श्रीकृष्ण से कहते हैं: "हे कृष्ण, गर्मी के दिन चल रहे हैं, चलो, यमुना की ओर चलें। मित्रों के साथ वहाँ घूम-फिरकर शाम को लौट आएँगे।" सुना आपने? "हे कृष्ण।" वही पुकार, जिसके लिए आज क्षमा माँगी जा रही है। और श्रीकृष्ण कोई आपत्ति नहीं करते। वे कहते हैं, "कुन्ती के पुत्र, मुझे भी यह अच्छा लगता है, पार्थ, चलो, मित्रों के साथ जल में मनचाहा खेलें।" फिर पाठ बताता है कि वे खाने-पीने की चीज़ों और मालाओं से भरे एक सुन्दर स्थान पर पहुँचे, सब लोग अपनी-अपनी मौज में लगे, और ये दोनों पास ही एक बहुत मनोहर जगह जाकर क़ीमती आसनों पर बैठ गए, और बीते दिनों के पराक्रमों की, और भी बहुत-सी बातें करते हुए आनन्द में डूब गए, स्वर्ग में बैठे दो अश्विनीकुमारों की तरह।
और इसी अध्याय में, इस हँसी-ख़ुशी के बीच, एक पंक्ति है जो आज के सत्संग से सीधे जुड़ती है। पाठ कहता है कि अर्जुन के साथ यमुना के किनारे घूमते हुए श्रीकृष्ण ने खाण्डव वन को देखा, और उसके पेड़ों, प्राणियों और पक्षियों सहित उसका विनाश पहले ही देख लिया। दोस्त के साथ पिकनिक पर निकले थे, और भीतर काल की आँख खुली थी। अर्जुन को वह पिकनिक का दिन लगा। श्रीकृष्ण को वह आने वाले कल का दिन भी दिख रहा था। और ठीक तभी, उन आसनों के पास, एक ब्राह्मण के वेश में अग्नि आए, जिसकी कथा आप पहले सत्संगों में सुन चुके हैं, कैसे खाण्डव के बाद इन्द्र के वर में श्रीकृष्ण ने अर्जुन के साथ सदा की मित्रता माँगी थी।
अब शय्या और भोजन। यह भी आदि पर्व में है, उससे कुछ पहले की बात। अर्जुन एक नियम के कारण तीर्थयात्रा पर निकले हैं, और घूमते-घूमते पश्चिमी समुद्र के किनारे प्रभास पहुँचते हैं। उन्होंने श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा के गुण सुन रखे हैं, और वे संन्यासी का वेश बनाकर, त्रिदण्ड, मुँड़ा सिर, कमण्डलु लेकर, बरसती बारिश में एक बरगद के कोटर में बैठकर केशव का ध्यान करने लगते हैं। और उधर केशव, सत्यभामा के साथ पलंग पर लेटे, यह सब जान लेते हैं, और बार-बार हँसने लगते हैं। सत्यभामा पूछती हैं, क्यों हँस रहे हैं? और श्रीकृष्ण कहते हैं, मेरी बुआ का बेटा अर्जुन संन्यासी बनकर बैठा है, "योग का भार उठाए हुए भी वह मन का दुःख पा रहा है, प्रिये, इसी पर मैं हँसा।" और फिर वे पलंग से उठते हैं, और अकेले प्रभास जाते हैं। पाठ कहता है, दोनों ने वन में एक-दूसरे को गले लगाया, कुशल पूछी, और फिर "प्रियसखायौ", वे प्यारे मित्र, नर और नारायण ऋषि, साथ बैठ गए।
फिर रैवतक पर्वत, जिसे श्रीकृष्ण के कहने पर पहले से सजा दिया गया था, और वहाँ भोजन पहुँचा दिया गया था। अर्जुन ने भोजन किया, दोनों ने साथ बैठकर नट और नर्तक देखे। और फिर रात को, सुन्दर पलंग पर लेटे-लेटे, अर्जुन श्रीकृष्ण को अपनी यात्रा सुनाने लगे: कौन-से तीर्थ देखे, कौन-से सरोवर, पर्वत, नदियाँ, वन। और पाठ कहता है, सुनाते-सुनाते ही उन्हें नींद ने घेर लिया। सोचिए उस दृश्य को। जगत् का निवास पास बैठा सुन रहा है, और उसका दोस्त अपनी कहानी पूरी किए बिना सो गया। ऐसा अपनापन केवल वहीं होता है जहाँ कोई डर न हो।
और हँसी-मज़ाक केवल एक ओर से नहीं था। अगले अध्याय में रैवतक के उत्सव में दोनों साथ घूम रहे हैं, और अर्जुन की नज़र सखियों के बीच खड़ी सुभद्रा पर पड़ती है। श्रीकृष्ण देख लेते हैं कि पार्थ का मन एक ही जगह अटक गया है, और पाठ कहता है, मानो हँसते हुए बोले: "एक वनवासी का यह मन काम से क्यों मथा जा रहा है?" फिर वही दोस्त गम्भीर होकर सलाह भी देता है, और एक बात कहता है, "यथा कालविपाकता", जब समय पके। देखिए, इस हँसी-मज़ाक में भी काल का शब्द छिपा था।
और अब बाईसवें सत्संग की एक याद, बस एक-दो वाक्य में, पर नए कोण से। आपने सुना था कि युद्ध से पहले सञ्जय सन्देश लेकर पाण्डवों के पास गए थे, और उन्हें भीतर के कक्ष में ले जाया गया था। वहाँ उन्होंने देखा कि श्रीकृष्ण और अर्जुन रत्नों से जड़े सोने के एक ही आसन पर बैठे हैं, श्रीकृष्ण के पैर अर्जुन की गोद में हैं। और सञ्जय ने लौटकर धृतराष्ट्र को बताया था कि उन दोनों को एक ही शय्या पर देखकर मुझमें बड़ा भय भर गया, और मैंने सोचा, धर्मराज का कोई संकल्प अधूरा नहीं रहेगा, क्योंकि नर और नारायण दोनों उनकी बात मानते हैं। वही सञ्जय आज वही धृतराष्ट्र को सुना रहे हैं कि उस आसन पर बैठने वाला अर्जुन अब उसी के लिए क्षमा माँग रहा है। जिस निकटता को देखकर सञ्जय डर गए थे, आज उसी निकटता को याद करके अर्जुन काँप रहे हैं।
संत ज्ञानेश्वर अर्जुन के इस पछतावे को कुछ उपमाओं में बाँधते हैं, जो सुनकर हँसी भी आती है और आँख भी भरती है। अर्जुन कहते हैं, यह तो ऐसा हुआ जैसे किसी ने अमृत से आँगन पोंछ दिया, या कल्पवृक्ष काटकर खेत की बाड़ बना दी। और फिर वे कहते हैं, आज ही देख लो, कितना बड़ा युद्ध है, और यहाँ परब्रह्म को हमने अपना सारथी बना लिया। कौरवों के घर आपको दूत बनाकर भेजा। अपने काम के लिए हमने आपको बेच दिया।
और बलदेव विद्याभूषण "अच्युत" सम्बोधन में एक बहुत कोमल अर्थ सुनते हैं: अपराध होने पर भी जो मित्रता से कभी नहीं गिरा, कभी नहीं हटा। यानी क्षमा माँगते-माँगते अर्जुन के मुँह से जो नाम निकलता है, उसी में उत्तर छिपा है।
और यह बात हमारी ज़िंदगी में भी होती है। किसी पिता को बेटा बरसों "पापा, आप कुछ नहीं समझते" कहता रहता है। फिर एक दिन वह ख़ुद पिता बनता है, रात को बीमार बच्चे के पास जागता है, और अचानक उसे वे सब रातें याद आती हैं जब उसका पिता भी ऐसे ही जागा होगा, और उसने कभी पूछा तक नहीं। उस दिन जो शर्म आती है, वह सज़ा के डर की नहीं होती। वह प्रेम की शर्म होती है। अर्जुन की क्षमा-याचना वैसी ही है।
पर अभी एक बात बाकी है। क्या अब अर्जुन यह मित्रता छोड़ देंगे? क्या अब वे श्रीकृष्ण को केवल दूर खड़े होकर, डरते-डरते, ईश्वर कहकर ही पुकारेंगे? अगले दो श्लोकों में अर्जुन ख़ुद इसका उत्तर देते हैं, और वह उत्तर इस पूरे सत्संग का सबसे बड़ा भरोसा है। आइए, सुनते हैं।
पितासि लोकस्य चराचरस्य
त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो
लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥ ४३ ॥
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं
प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् ।
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः
प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् ॥ ४४ ॥
तैंतालीसवाँ श्लोक। "पितासि लोकस्य चराचरस्य", आप इस चर-अचर जगत् के पिता हैं, "त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान्", इसके पूज्य हैं, गुरु हैं, सबसे बड़े हैं। "न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव", हे अनुपम प्रभाव वाले, तीनों लोकों में आपके बराबर भी कोई नहीं, तो आपसे बढ़कर कोई और कहाँ से होगा?
मधुसूदन सरस्वती तीनों शब्दों को अलग-अलग खोलते हैं। पिता, क्योंकि आप सबको जन्म देने वाले हैं। पूज्य, क्योंकि आप सबके ईश्वर हैं। गुरु, क्योंकि आप शास्त्र का उपदेश देने वाले हैं। और यह आख़िरी बात अर्जुन से ज़्यादा कौन जानता होगा? दूसरे अध्याय से अब तक यही गुरु इसी रथ पर उन्हें पढ़ा रहा है। संत ज्ञानेश्वर तो यहाँ तक कहते हैं कि आप वह आदिगुरु हैं जो वेदान्त को भी पढ़ाते हैं। शंकराचार्य "न त्वत्समः" पर एक सीधी बात कहते हैं: दो ईश्वर हो ही नहीं सकते, इसलिए आपके बराबर भी कोई नहीं, बढ़कर की तो बात ही क्या।
छब्बीसवें सत्संग में आपने युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ का वह दिन सुना था, जब भीष्म ने कहा था कि छह लोग अर्घ्य के योग्य होते हैं: आचार्य, ऋत्विज, सम्बन्धी, स्नातक, मित्र और राजा, और उनमें सबसे श्रेष्ठ को पहले, और फिर सबसे पहला अर्घ्य श्रीकृष्ण को दिया गया था। आज अर्जुन अपने मन के भीतर वही सूची दोहरा रहे हैं, अपने शब्दों में: पिता, पूज्य, गुरु, और अगले ही श्लोक में सखा और प्रिय। सभा में जो सम्मान बाहर से दिया गया था, आज वह भीतर से उठ रहा है।
और नीलकण्ठ इस श्लोक का अर्थ एक बहुत प्यारी दिशा में मोड़ देते हैं। वे कहते हैं, अर्जुन का भाव यह है: आप हमारे पिता हैं, इसलिए हम बच्चों ने जो भूलें की हैं, वे आपको क्षमा करनी ही होंगी। यानी जो "पिता" शब्द ऊपर से महिमा का लगता है, वह असल में एक बच्चे की ज़िद है। बड़ा मानकर दूर नहीं जा रहे, बड़ा मानकर और पास आ रहे हैं।
और अब चौवालीसवाँ श्लोक, आज के सत्संग का सबसे कोमल श्लोक। "तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम्।" इसलिए मैं अपना शरीर झुकाकर, प्रणाम करके, स्तुति के योग्य आप ईश्वर को प्रसन्न करना चाहता हूँ। "पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्।" हे देव, जैसे पिता पुत्र के, सखा सखा के, और प्रिय प्रिया के अपराध सह लेता है, वैसे ही आप मेरे अपराध सहने के योग्य हैं।
"प्रणिधाय कायं", श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, यानी दण्ड की तरह पूरा शरीर धरती पर डाल देना। किरीटी, जिसका मुकुट कोई छीन नहीं सकता था, अब पूरा का पूरा धरती पर लेटा है।
अब तीन उपमाएँ। पहली, "पितेव पुत्रस्य", जैसे पिता पुत्र की भूल सह लेता है। श्रीधर स्वामी कहते हैं, कृपा से। दूसरी, "सखेव सख्युः", जैसे सखा सखा की। श्रीधर यहाँ सखा के लिए एक बहुत सुंदर शब्द लिखते हैं: बिना किसी शर्त का बन्धु। और तीसरी उपमा पर आचार्यों में भेद है, जिसे हमारी टीका भी दर्ज करती है। शंकराचार्य, श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती इसे पढ़ते हैं: जैसे प्रेमी अपनी प्रिया की भूल सह लेता है। पर तिलक कहते हैं कि व्याकरण की दृष्टि से यह पढ़त खिंचती है, और सीधा अर्थ यह है: हे प्रिय, आप अपने प्रिय के, यानी मेरे, अपराध सह लीजिए। हमारी टीका कहती है कि दोनों पढ़तों में भाव एक ही है: निकट और क्षमा करने वाला प्रेम। मैं दोनों को आपके सामने छोड़ता हूँ।
पर अब इस श्लोक की असली बात देखिए, जिसके लिए मैंने पिछले खंड के अन्त में आपसे रुकने को कहा था। अर्जुन ने अभी-अभी क्षमा माँगी थी कि मैंने आपको सखा समझा। और क्षमा किस आधार पर माँग रहे हैं? "सखेव सख्युः", जैसे सखा सखा को क्षमा करता है। यानी अर्जुन मित्रता छोड़ नहीं रहे। वे उसी मित्रता के भरोसे क्षमा माँग रहे हैं। जो रिश्ता अपराध लगा था, वही रिश्ता अब शरण बन गया है। महिमा जान लेने के बाद भी वे श्रीकृष्ण को पिता कहते हैं, सखा कहते हैं, प्रिय कहते हैं। फ़र्क बस इतना है कि अब इन शब्दों के साथ आँखें झुकी हुई हैं।
और यह बात महाभारत ख़ुद पक्की करती है। ग्यारहवें सत्संग में आपने सुना था कि युद्ध के बाद अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा था, "युद्ध के समय मैंने आपकी महिमा और आपका ईश्वरीय रूप जाना, पर जो आपने पहले मित्रता से कहा था, वह सब मुझ विचलित मन वाले का नष्ट हो गया।" और श्रीकृष्ण ने उन्हें गले लगाकर उत्तर दिया। सुना आपने? विश्वरूप देखने के बरसों बाद भी अर्जुन गीता को "मित्रता से कही हुई बात" कहते हैं। ईश्वर को जान लेने से दोस्ती ख़त्म नहीं हुई। वह और गहरी हो गई।
और संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर अर्जुन से कहलवाते हैं: मुझमें यह विनती करने की योग्यता कहाँ है? पर जैसे बच्चा अपने पिता से बिना झिझक कुछ भी कह देता है, वैसे ही कह रहा हूँ। पुत्र के अपराध कितने भी बड़े हों, पिता उन्हें बिना कुछ कहे सह लेता है। सखा की उद्दण्डता को सखा चुपचाप सह लेता है। और नीलकण्ठ, पिछले श्लोक पर, एक बात याद दिलाते हैं जो इस भरोसे को और पक्का कर देती है: श्रीकृष्ण वे हैं जिन्होंने शिशुपाल जैसे शत्रुओं को भी उत्तम गति दी। तेरहवें सत्संग में आपने सुना था कि शिशुपाल की माँ को श्रीकृष्ण ने वचन दिया था कि उसके सौ अपराध क्षमा करेंगे, और अन्त में उसका तेज भी उन्हीं में समा गया था। जो शत्रु के सौ अपमान सह गया, वह दोस्त के हँसी-मज़ाक का क्या हिसाब रखेगा?
तो आज के दूसरे सवाल का उत्तर यही है। भगवान की महिमा दिख जाए, तो भी उनसे दोस्त की तरह, बच्चे की तरह, अपने की तरह बात करते रहिए। बस अब उस अपनेपन में आदर भी जोड़ दीजिए। "हे कृष्ण" कहिए, पर झुककर कहिए।
अगले सत्संग में अर्जुन एक और बात कहेंगे, जो इस डर और प्रेम के बीच से निकलती है: "अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे।" पहले कभी न देखा हुआ यह रूप देखकर मैं हर्षित हूँ, और भय से मेरा मन व्याकुल भी है। फिर वे क्या माँगते हैं, और श्रीकृष्ण कैसे उत्तर देते हैं, यह अगले सत्संग में।
तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।
पहली बात। काल से डरिए मत, उसे पहचानिए। "कालोऽस्मि", काल श्रीकृष्ण ही हैं। और जो काल ले जाता है, उसे वह "परं निधानम्" में रखता है, अपने ही घर में। आपके जो अपने चले गए, वे खोए नहीं, सँभालकर रखे गए हैं।
दूसरी बात। "निमित्तमात्रं भव", पूरे मन से अपना काम कीजिए, पर परिणाम का बोझ अपने सिर मत रखिए। काम शुरू करने से पहले एक नमस्कार, काम पूरा होने पर एक नमस्कार, और बीच में, जब मन घबराए, तब भी एक नमस्कार। अर्जुन ने भी जीत के बाद यही कहा था, "तवैव विजयः", जीत आपकी है।
तीसरी बात। भगवान से दूर मत जाइए, पास आइए। अगर कभी आपने उनसे शिकायत की हो, ग़ुस्से में कुछ कह दिया हो, उन्हें भूल गए हों, तो अर्जुन की तरह झुककर कह दीजिए, "पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः"। जो पिता है, वह सह लेगा। जो सखा है, वह सह लेगा।
आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आप भगवान को किस रिश्ते से पुकारते हैं: पिता, माँ, सखा, या स्वामी? और क्या कभी कोई बात कही है, जिसके लिए आज आप उनसे क्षमा माँगना चाहेंगे? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।
जिसने अर्जुन के बरसों के हँसी-मज़ाक सह लिए, और फिर भी उनके रथ के घोड़े हाँकता रहा, वह आपकी हर शिकायत भी सह लेगा।
जय श्री कृष्ण।
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं
प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् ।
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः
प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् ॥ ४४ ॥
तीन बातें
- काल से डरिए मत, उसे पहचानिए। "कालोऽस्मि", काल श्रीकृष्ण ही हैं। और जो काल ले जाता है, उसे वह "परं निधानम्" में रखता है, अपने ही घर में। आपके जो अपने चले गए, वे खोए नहीं, सँभालकर रखे गए हैं।
- "निमित्तमात्रं भव", पूरे मन से अपना काम कीजिए, पर परिणाम का बोझ अपने सिर मत रखिए। काम शुरू करने से पहले एक नमस्कार, काम पूरा होने पर एक नमस्कार, और बीच में, जब मन घबराए, तब भी एक नमस्कार। अर्जुन ने भी जीत के बाद यही कहा था, "तवैव विजयः", जीत आपकी है।
- भगवान से दूर मत जाइए, पास आइए। अगर कभी आपने उनसे शिकायत की हो, ग़ुस्से में कुछ कह दिया हो, उन्हें भूल गए हों, तो अर्जुन की तरह झुककर कह दीजिए, "पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः"। जो पिता है, वह सह लेगा। जो सखा है, वह सह लेगा।