जब भगवान का रूप डरा दे
गीता 11.15–11.31 · 83 मिनट
भगवान केवल मीठे नहीं; विराट का भय
अर्जुन उवाच
पश्यामि देवांस्तव देव देहे
सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् ।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ-
मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ॥ १५ ॥
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं
पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं
पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥ १६ ॥
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च
तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् ।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्
दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥ १७ ॥
हम में से ज़्यादातर लोग भगवान को एक ही रूप में जानते हैं। मुस्कुराते हुए, बाँसुरी वाले, माखन चुराने वाले, हाथ उठाकर आशीर्वाद देते हुए। मन्दिर में, कैलेंडर पर, पूजा की अलमारी में, भगवान हमेशा मीठे होते हैं। पर ज़िंदगी में कभी ऐसे दिन भी आते हैं जब वही संसार, जिसे हम भगवान का बनाया कहते हैं, बहुत डरावना लगता है। कोई अपना अचानक चला जाता है। कोई बाढ़, कोई बीमारी, कोई खबर, जो भीतर तक हिला देती है। और तब मन में एक सवाल उठता है जिसे हम ज़ोर से कहने से भी डरते हैं। जब भगवान का रूप डरा दे, तब क्या करें? क्या भगवान केवल मीठे हैं, या उनका कोई ऐसा रूप भी है जिसे देखकर बड़े से बड़ा वीर काँप जाए?
जय श्री कृष्ण।
आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का बत्तीसवाँ सत्संग है, और आज हम ग्यारहवें अध्याय के सबसे गम्भीर हिस्से में उतरेंगे। पहले जल्दी से याद कर लें कि पिछली बार हम कहाँ रुके थे। पिछले सत्संग में, पहले से चौदहवें श्लोक तक, अर्जुन ने एक बड़ी हिम्मत वाली माँग रखी थी। दसवें अध्याय की विभूतियाँ सुनकर उन्होंने कहा था, "हे परमेश्वर, आप अपने को जैसा कहते हैं, वह ठीक ऐसा ही है। फिर भी मैं आपके ईश्वरीय रूप को देखना चाहता हूँ।" और बड़ी विनम्रता से जोड़ा था, "यदि आप मानते हैं कि मैं उसे देख सकता हूँ, तो हे योगेश्वर, मुझे अपना अविनाशी स्वरूप दिखाइए।" श्रीकृष्ण ने कहा था, "पर तुम मुझे अपनी इन आँखों से नहीं देख सकते। मैं तुम्हें दिव्य नेत्र देता हूँ।" और फिर सञ्जय ने राजा को वह दृश्य सुनाया था: अनेक मुख, अनेक नेत्र, दिव्य माला और वस्त्र, और ऐसा प्रकाश कि अगर आकाश में हज़ार सूर्य एक साथ उग आएँ, तो शायद वह उस महात्मा के प्रकाश के बराबर हो। अर्जुन ने उस एक शरीर में पूरा जगत्, अनेक भागों में बँटा हुआ, एक जगह खड़ा देखा। और चौदहवें श्लोक में, आश्चर्य से भरे, रोंगटे खड़े हुए, उन्होंने सिर झुकाकर प्रणाम किया, हाथ जोड़े, और बोलना शुरू किया।
आज वही बोलना है। पंद्रहवें श्लोक से इकतीसवें तक, सत्रह श्लोक, लगभग सब अर्जुन के मुँह से। हमारी टीका इतना ही कहती है कि अर्जुन जो देखते हैं, उसकी यह स्तुति इकतीसवें श्लोक तक चलती है। पर यह स्तुति एक जैसी नहीं रहती। वह आश्चर्य से शुरू होती है, और धीरे-धीरे भय में बदल जाती है। और आपको याद रहे, यह सब हमें कौन सुना रहा है। सञ्जय, हस्तिनापुर में, अन्धे राजा धृतराष्ट्र को, उस दिन जब भीष्म बाणों की शय्या पर गिर चुके हैं। महाभारत के भीष्म पर्व का पैंतीसवाँ अध्याय ही गीता का ग्यारहवाँ अध्याय है, "विश्वरूप दर्शन योग"। और आज के श्लोकों में एक ऐसी घड़ी आएगी जब सञ्जय को उस अन्धे पिता के सामने उसका अपना नाम लेना पड़ेगा, और बताना पड़ेगा कि अर्जुन ने उसके बेटों को कहाँ जाते देखा। उस घड़ी तक हम धीरे-धीरे पहुँचेंगे।
अभी पहले श्लोक पर। "अर्जुन उवाच", अर्जुन बोले: "पश्यामि देवांस्तव देव देहे।" हे देव, मैं आपके शरीर में सब देवताओं को देखता हूँ। एक शब्द पर ध्यान दीजिए: "पश्यामि", मैं देखता हूँ। यह शब्द आज के श्लोकों में बार-बार आएगा। अर्जुन अब कोई सुनी हुई बात नहीं कह रहे। दसवें अध्याय तक वे सुन रहे थे। अब वे देख रहे हैं। और जो देख रहे हैं, उसकी सूची सुनिए: सब देवता, अनेक तरह के प्राणियों के समूह, कमल के आसन पर बैठे स्वामी ब्रह्मा, सब ऋषि, और दिव्य सर्प।
"कमल के आसन पर बैठे ब्रह्मा", यह कौन-सा कमल है? श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती दोनों दो अर्थ देते हैं। एक, कि पृथ्वी स्वयं एक कमल है और उसके बीच मेरु पर्वत उसकी कर्णिका है, जहाँ ब्रह्मा बैठे हैं। और दूसरा, कि वह कमल भगवान की अपनी नाभि से निकला है, जिस पर ब्रह्मा बैठे हैं। दूसरा अर्थ मुझे बहुत सुंदर लगता है। जिस ब्रह्मा ने यह सृष्टि रची, वे भी उसी के शरीर से निकले कमल पर बैठे हैं जो इस समय अर्जुन के रथ की लगाम पकड़े खड़ा है। नीलकण्ठ यहाँ एक और बारीक बात कहते हैं। ब्रह्मा का लोक बहुत ऊँचा है और नाग बहुत नीचे, पाताल में। तो अर्जुन एक साथ बहुत दूर का भी देख रहे हैं, और छिपे हुए का भी। दिव्य दृष्टि का यही अर्थ है: न दूरी आड़े आती है, न परदा।
ज्ञानेश्वर महाराज ने ज्ञानेश्वरी में इस श्लोक पर एक चित्र दिया है। वे कहते हैं, जैसे मन्दराचल पर्वत के शरीर पर जगह-जगह जंगली जानवरों के झुंड रहते हैं, या जैसे किसी बड़े पेड़ पर पक्षियों के घोंसले, वैसे ही अर्जुन को भगवान के एक शरीर पर अनगिनत भुवन दिखते हैं। एक तरफ़ स्वर्ग, देवताओं के साथ। दूसरी तरफ़ कैलाश, जहाँ महादेव भवानी के साथ भगवान के ही एक अंश में दिखते हैं। यानी जिन लोकों को हम अलग-अलग मानते हैं, वे सब एक ही देह पर उगे हैं।
अब सोलहवाँ श्लोक, आज के मुख्य श्लोकों में से एक। "अनेक भुजाओं, पेटों, मुखों और नेत्रों वाला, सब ओर अनन्त रूपों वाला मैं आपको देखता हूँ।" और फिर वह पंक्ति, जिसे बहुत-से लोग ग्यारहवें अध्याय की पहचान मानते हैं: "नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप।" हे विश्वेश्वर, हे विश्वरूप, मैं आपका न अन्त देखता हूँ, न मध्य, और न आदि।
सोचिए, इसका क्या मतलब हुआ। हम जो कुछ भी देखते हैं, उसका कहीं न कहीं किनारा होता है। सबसे बड़ा पहाड़ भी कहीं जाकर ख़त्म होता है। समुद्र भी किसी तट पर रुकता है। आँख को किनारा चाहिए, नहीं तो वह समझ ही नहीं पाती कि वह क्या देख रही है। और अर्जुन कह रहे हैं कि मैं जिधर देखता हूँ, किनारा मिलता ही नहीं। श्रीधर स्वामी इसका कारण एक शब्द में देते हैं: क्योंकि आप सब जगह हैं। जो सब जगह है, उसका किनारा कहाँ होगा? नीलकण्ठ एक घरेलू-सी उपमा देते हैं: जैसे बहुत लम्बी रस्सी पड़ी हो और उसके दोनों सिरे दिखें ही नहीं।
और मधुसूदन सरस्वती एक बात पकड़ते हैं जो मुझे बहुत मानवीय लगती है। अर्जुन एक ही साँस में दो सम्बोधन बोलते हैं, "विश्वेश्वर" और "विश्वरूप"। मधुसूदन कहते हैं, यह घबराहट और अचरज की वजह से है। आपने देखा होगा, जब कोई बहुत भारी चीज़ सामने आ जाए, तो हम एक नाम से पुकारते हैं, फिर तुरन्त दूसरे से, जैसे एक नाम काफ़ी न हो। "हे भगवान, हे राम!" यह भाषा का दोष नहीं है। यह उस मन की हालत है जो अपने से बहुत बड़ी चीज़ के सामने खड़ा है।
और अब ज्ञानेश्वरी की वह पंक्ति, जिसके लिए मैं चाहता हूँ कि आप आज का सत्संग याद रखें। अर्जुन अनन्त भुजाएँ देखते हैं, अनगिनत पेट, जैसे ब्रह्माण्ड के भण्डार खुल गए हों, मुख, नेत्र, और कहीं कोई ख़ाली जगह नहीं। फिर वे सोचते हैं, यह सारा पसारा फैलाकर खड़ा कौन है? किसका है यह? और ज्ञानेश्वर अर्जुन से कहलवाते हैं: "देखा, तो यह तो वही है, हमारा सारथी।" वही, जो अभी तक घोड़ों की लगाम पकड़े बैठा था। ज्ञानेश्वर आगे कहते हैं, आप तो सदा से ऐसे ही सब में फैले हुए हैं, पर भक्त पर कृपा करके एक छोटा-सा रूप धर लेते हैं: साँवला, चार भुजाओं वाला, जिसे देखकर आँखें ठण्डी हों, और जिसे गले लगाना हो तो दो बाँहों में समा जाए।
यह बात आज के पूरे सत्संग की चाबी है। आगे जो डरावने मुख आएँगे, जलती अग्नि आएगी, वह सब किसी अनजाने का नहीं है। वह उसी का है जिसके साथ अर्जुन ने बरसों खाया-पिया, हँसी-मज़ाक किया। जिसका न आदि दिखता है, न अन्त, वही रथ पर बैठा है।
अब सत्रहवाँ श्लोक। "किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च।" मुकुट वाले, गदा वाले, चक्र वाले। "मैं आपको सब ओर से प्रकाशमान तेज का ढेर, कठिनता से देखे जाने योग्य, जलती अग्नि और सूर्य जैसी चमक वाले, और अप्रमेय, यानी जिसे नापा न जा सके, देखता हूँ।"
यहाँ एक छोटी-सी बात है जो आसानी से छूट जाती है। इतने बड़े, इतने अनजाने रूप में भी अर्जुन को कुछ जानी-पहचानी चीज़ें दिखती हैं: मुकुट, गदा, चक्र। ये विष्णु के चिह्न हैं। ज्ञानेश्वर अर्जुन से कहलवाते हैं: "यह सिर पर वही मुकुट तो नहीं है, श्रीहरि? वही चक्र, ऊपर के हाथ में, वही गदा। पहचान का निशान मिटा नहीं।" बस तेज इतना बढ़ गया है कि वही चीज़ें नई लगती हैं। यह मुझे बहुत भरोसा देने वाली बात लगती है। जब ज़िंदगी में कुछ बहुत बड़ा, बहुत अनजाना सामने आता है, तब भी उसमें कहीं न कहीं कोई पहचान का निशान होता है। जो उसे ढूँढ लेता है, उसका डर आधा हो जाता है।
अब "दुर्निरीक्ष्यं", जिसे देखना कठिन है। मधुसूदन यहाँ एक सवाल उठाते हैं और ख़ुद उसका जवाब देते हैं। अगर रूप देखा ही नहीं जा सकता, तो अर्जुन "देखता हूँ" कैसे कह रहे हैं? उत्तर है: दिव्य नेत्र के बिना वह देखा नहीं जा सकता। जिसे दिव्य नेत्र मिला, वह देखता है। यानी देखने की ताकत अर्जुन की अपनी नहीं है, दी हुई है। जो दिख रहा है, वह भी भगवान का, और जिस आँख से दिख रहा है, वह भी भगवान की।
तो पहले तीन श्लोकों में हमने अर्जुन का आश्चर्य देखा। सब कुछ एक शरीर में। कहीं कोई किनारा नहीं। और फिर भी, उस बेकिनारे रूप में, सिर पर वही मुकुट, हाथ में वही चक्र। अर्जुन अभी डरे नहीं हैं। अभी वे चकित हैं, और उनकी आँखें जो देख रही हैं, उसके लिए शब्द खोज रही हैं।
पर अभी एक बात बाकी है। देखने के बाद अब अर्जुन समझने लगते हैं कि यह कौन है। अगले श्लोक में वे वह बात कहते हैं जो उपनिषद् कहते आए थे, और जिसे आज उन्होंने आँखों से देख लिया। और उसके ठीक बाद, पहली बार, इस दर्शन में डर की छाया पड़ती है। आइए, सुनते हैं।
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं
त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता
सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥ १८ ॥
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य-
मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं
स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ॥ १९ ॥
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि
व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।
दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं
लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥ २० ॥
अठारहवें श्लोक में अर्जुन की आवाज़ बदलती है। अब तक वे बता रहे थे कि क्या दिख रहा है। अब वे बता रहे हैं कि जो दिख रहा है, वह कौन है। "त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं।" आप ही जानने योग्य परम अक्षर हैं। "त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।" आप ही इस विश्व के परम आश्रय हैं। आप अविनाशी हैं, सनातन धर्म के रक्षक हैं, और मेरे मत में आप ही सनातन पुरुष हैं।
"अक्षर" का अर्थ है जो कभी क्षीण न हो, जो घटे नहीं, मिटे नहीं। शंकराचार्य, श्रीधर और मधुसूदन तीनों कहते हैं कि यही वह परम ब्रह्म है जिसे मुक्ति चाहने वाले को जानना है। और "निधान" शब्द बहुत प्यारा है। निधान वह जगह है जहाँ कुछ रखा जाता है, सँभालकर, जैसे घर की तिजोरी, या माँ की वह पुरानी पेटी जिसमें वे सबसे क़ीमती चीज़ें रखती हैं। अर्जुन कह रहे हैं, यह सारा विश्व आप में रखा हुआ है। नीलकण्ठ इसी शब्द का एक और अर्थ देते हैं: वह जगह जहाँ सब अन्त में लौटकर लीन हो जाता है। यह अर्थ याद रखिए, क्योंकि आज के आख़िरी श्लोकों तक पहुँचते-पहुँचते यही बात एक डरावने चित्र में बदल जाएगी।
अब "शाश्वतधर्मगोप्ता", सनातन धर्म के रक्षक। रामानुजाचार्य इस पर कहते हैं, ऐसे ही अवतारों के द्वारा आप ही सनातन धर्म की रक्षा करते हैं। आपको याद होगा, तेरहवें सत्संग में हमने सुना था, "यदा यदा हि धर्मस्य", जब-जब धर्म की हानि होती है, मैं आता हूँ। अर्जुन ने वह बात चौथे अध्याय में कानों से सुनी थी। आज वे आँखों से देख रहे हैं कि जो धर्म की रक्षा के लिए आता है, वह कितना बड़ा है। और रामानुज की एक पंक्ति मुझे बहुत छूती है। वे अर्जुन के मन की बात यूँ कहते हैं: उपनिषद् जिस सनातन पुरुष की बात करते हैं, वह आप ही हैं, यदुकुल के तिलक, और आज मैंने आपको प्रत्यक्ष देख लिया।
नीलकण्ठ यहाँ एक गहरी बात कहते हैं जो मैं आपके सामने रख देता हूँ, बिना उस पर कोई फ़ैसला सुनाए। वे कहते हैं, यह गुणों वाला, आकार वाला रूप उस निर्गुण की ओर इशारा करता है, जैसे पेड़ की डाल चाँद की ओर इशारा करती है। माँ बच्चे को कहती है, "देखो, उस डाल के ऊपर चाँद।" बच्चा डाल देखता है, और डाल के सहारे चाँद तक पहुँचता है। रामानुज जैसे आचार्य इस रूप को ही भगवान का सच्चा दिव्य शरीर मानते हैं, और नीलकण्ठ जैसे आचार्य इसे उस निराकार तक ले जाने वाली डाल मानते हैं। दोनों परम्पराएँ पुरानी हैं, दोनों बड़ी हैं। हमारे लिए इतना काफ़ी है कि दोनों रास्ते इसी रूप से होकर जाते हैं।
अब उन्नीसवाँ श्लोक, आज का दूसरा मुख्य श्लोक। "मैं आपको आदि, मध्य और अन्त से रहित, अनन्त सामर्थ्य वाले, अनन्त भुजाओं वाले, चन्द्रमा और सूर्य रूपी नेत्रों वाले, जलती अग्नि रूपी मुख वाले, और अपने तेज से इस विश्व को तपाते हुए देखता हूँ।"
सोलहवें श्लोक में अर्जुन ने कहा था, मैं आपका आदि, मध्य, अन्त नहीं देखता। वहाँ बात जगह की थी, कि किनारा नहीं मिलता। मधुसूदन कहते हैं, यहाँ बात कुछ और है: आदि यानी जन्म, मध्य यानी टिके रहना, अन्त यानी नाश। आपका न जन्म है, न बीच का कोई दौर, न अन्त। नीलकण्ठ दोनों को एक साथ रखते हैं: न जगह में आपका कोई किनारा है, न समय में। अब सोचिए, हम सब जिस चीज़ से सबसे ज़्यादा डरते हैं, वह क्या है? अन्त। अपना अन्त, अपनों का अन्त। और अर्जुन उस एक के सामने खड़े हैं जिसका कोई अन्त नहीं। यही बात अभी आश्चर्य है, और थोड़ी देर में डर बन जाएगी।
अब "शशिसूर्यनेत्रम्", चन्द्रमा और सूर्य जिसकी आँखें हैं। रामानुजाचार्य इस पर एक बहुत सुंदर बात कहते हैं। चन्द्रमा की आँख शीतल है, कृपा वाली, और सूर्य की आँख तेज़ है, प्रताप वाली। जो झुकते हैं, प्रणाम करते हैं, उनके लिए भगवान की नज़र चाँदनी जैसी है। और जो विरोध में खड़े हैं, उनके लिए वही नज़र सूरज जैसी तपती है। ज्ञानेश्वर भी यही कहते हैं: एक आँख से आप किसी पर रूठते हैं, दूसरी से किसी को कृपा की नज़र से पालते हैं। एक ही चेहरा, दो आँखें। आपने अपने घर में भी यह देखा होगा। वही पिता, जो बच्चे के गिरने पर दौड़कर उठाते हैं, वही पिता बच्चे के झूठ बोलने पर ऐसी नज़र से देखते हैं कि बच्चा काँप जाए। दोनों नज़रें एक ही प्रेम से निकलती हैं।
और फिर: "दीप्तहुताशवक्त्रं", जलती अग्नि जैसा मुख, और "स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्", अपने तेज से इस विश्व को तपाते हुए। ज्ञानेश्वर यहाँ एक चित्र देते हैं: जैसे जंगल की आग में पहाड़ धधक रहे हों, और लपटें ऊपर उठ रही हों, वैसे दाढ़ों-दाँतों को चाटती जीभ लपलपा रही है। सुनिए, दर्शन किस तरफ़ मुड़ रहा है। सत्रहवें श्लोक में मुकुट था, चक्र था। उन्नीसवें तक आते-आते मुख में आग है।
अब बीसवाँ श्लोक, और हमारी टीका इस पर एक ही वाक्य कहती है: यहाँ से दर्शन आश्चर्य से भय की ओर मुड़ता है। "स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का यह सारा स्थान, और सब दिशाएँ, एक आपसे ही भरी हुई हैं। हे महात्मन्, आपके इस अद्भुत और भयंकर रूप को देखकर तीनों लोक बहुत व्याकुल हैं।" "लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्।"
पहला सवाल: अर्जुन ने यह रूप दिखाने को कहा क्यों था, और भगवान ने यह भयंकर पहलू क्यों दिखाया? शंकराचार्य इसी श्लोक पर एक बात कहते हैं जो पूरे अध्याय को खोल देती है। वे याद दिलाते हैं कि दूसरे अध्याय में अर्जुन ने कहा था, "हम नहीं जानते कि हम जीतेंगे या वे हमें जीतेंगे।" आपको याद होगा, चौथे सत्संग में हम उसी उलझन के साथ बैठे थे। शंकराचार्य कहते हैं, उस सन्देह को मिटाने के लिए भगवान अब पाण्डवों की निश्चित जीत दिखाने जा रहे हैं। यानी यह भयंकर दृश्य डराने के लिए नहीं, एक पुराना सवाल सुलझाने के लिए है। पर सवाल का जवाब इतना बड़ा है कि पूछने वाला काँप उठा।
दूसरा सवाल: ये "तीनों लोक" कौन हैं जो काँप रहे हैं? रामानुज कहते हैं, ब्रह्मा आदि देवता, असुर, पितर, सिद्ध, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, जो इस युद्ध को देखने के लिए आए थे, अनुकूल भी, विरोधी भी, बीच वाले भी। और वे कहते हैं, उन्हें भी भगवान ने उस समय वही दिव्य दृष्टि दी थी। सोचिए, कुरुक्षेत्र में केवल दो सेनाएँ नहीं खड़ी थीं। ऊपर आकाश में पूरा ब्रह्माण्ड दर्शक बना खड़ा था। और जब उन्होंने यह रूप देखा, तो वे भी काँप गए।
और तीसरी बात, उस एक सम्बोधन में: "महात्मन्"। मधुसूदन इसका अर्थ देते हैं: हे महात्मन्, जो सज्जनों को अभय देते हैं। और मधुसूदन तथा नीलकण्ठ दोनों कहते हैं कि इस सम्बोधन के पीछे एक अनकही प्रार्थना है: अब इसे समेट लीजिए। यह बहुत कोमल बात है। अर्जुन सीधे नहीं कहते, "बस करो।" वे कहते हैं, "हे महात्मन्", आप तो वह हैं जो भय मिटाते हैं। जैसे कोई बच्चा डर जाए, तो माँ से "डर लग रहा है" नहीं कहता, बस उसका आँचल कसकर पकड़ लेता है। भाषा कुछ और कहती है, हाथ कुछ और।
ज्ञानेश्वरी में इस श्लोक पर अर्जुन के मन का एक बहुत सच्चा चित्र है। अर्जुन कहते हैं, जब तक आपका यह रूप नहीं देखा था, तब तक संसार अच्छा लगता था। अब देख लिया, तो संसार के सुखों से जी उचट गया। और आपको गले लगाने की हिम्मत भी नहीं होती। पीछे हटूँ, तो संसार रास्ता रोके खड़ा है। आगे बढ़ूँ, तो आप पकड़ में नहीं आते। यह वह जगह है जहाँ कभी-कभी सच्चा साधक भी पहुँचता है। पुरानी दुनिया फीकी पड़ गई, और नई अभी इतनी बड़ी है कि उसमें घर नहीं बनता। ज्ञानेश्वर इसकी उपमा देते हैं: जैसे आग से तपा हुआ कोई ठण्डक के लिए समुद्र के पास जाए, और वहाँ उठती लहरों को देखकर और भी डर जाए।
तो इन तीन श्लोकों में अर्जुन ने पहचान लिया कि यह कौन है: अक्षर, निधान, सनातन पुरुष। और पहचानते ही वे उस जगह पहुँच गए जहाँ पहचान डर में बदलने लगती है। जिसका न आदि है, न अन्त, उसके मुख में आग है, और तीनों लोक काँप रहे हैं।
पर अभी एक बात बाकी है। अगले श्लोक में अर्जुन कुछ ऐसा देखते हैं जो किसी भी सेना के लिए सबसे अजीब दृश्य होगा। देवताओं के झुंड, उसी भयंकर रूप की ओर चलते हुए, उसमें समाते हुए। कुछ डरे हुए हाथ जोड़े खड़े हैं, और कुछ ऋषि बस इतना कह रहे हैं: कल्याण हो। आइए, सुनते हैं।
अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति
केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ।
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः
स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥ २१ ॥
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या
विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा
वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ॥ २२ ॥
रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं
महाबाहो बहुबाहूरुपादम् ।
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं
दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् ॥ २३ ॥
और अब, इससे पहले कि हम इन श्लोकों में उतरें, एक छोटी-सी बात आपसे कहना चाहता हूँ। आज का यह हिस्सा गीता के सबसे कठिन हिस्सों में से है। इसमें आग है, डर है, और थोड़ी देर में वे योद्धा भी आएँगे जिन्हें अर्जुन बहुत प्यार करते थे। आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। जो आदमी यह सुनकर उठ जाए कि भगवान का रूप बहुत भयंकर था, वह गीता से केवल डर लेकर जाएगा। और गीता डर देने के लिए नहीं बोली गई। इस डर का अर्थ आज के आख़िरी श्लोकों में खुलता है, और उसका उत्तर अगले सत्संगों में। तो अगर आप यह सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की यह यात्रा बीच में न छूटे। और आज का यह सत्संग आख़िर तक सुनिए।
अब इक्कीसवाँ श्लोक। "ये देवताओं के समूह आपमें प्रवेश कर रहे हैं। कुछ डरे हुए, हाथ जोड़कर आपका गुणगान कर रहे हैं। महर्षियों और सिद्धों के समूह 'कल्याण हो' कहकर उत्तम स्तोत्रों से आपकी स्तुति कर रहे हैं।"
देवता भगवान में प्रवेश कर रहे हैं, इसका क्या मतलब? यहाँ आचार्यों की दो अलग पढ़तें हैं, और दोनों सुनने लायक हैं। श्रीधर स्वामी कहते हैं, देवता डरकर शरण के लिए आप में प्रवेश कर रहे हैं, और जो बहुत डरे हैं, वे दूर से ही हाथ जोड़कर पुकार रहे हैं, "जय हो, जय हो, रक्षा करो, रक्षा करो।" यानी डर का पहला काम है भगवान की ओर भागना। पर शंकराचार्य और मधुसूदन एक दूसरी बात कहते हैं, जो इस युद्ध के बारे में कुछ बहुत गहरा बताती है। वे कहते हैं, ये "देवताओं के समूह" वे देवता हैं जो धरती का भार उतारने के लिए मनुष्य बनकर उतरे थे, और जो इस समय कुरुक्षेत्र में योद्धा बनकर लड़ रहे हैं। अर्जुन उन्हें भगवान में प्रवेश करते देख रहे हैं।
आपको याद होगा, चौबीसवें सत्संग में हमने स्वर्गारोहण पर्व की वह बात सुनी थी, कि युद्ध के बाद, कर्मों के अन्त में, हर वीर अपने ही मूल में जा मिला: भीष्म वसुओं में, द्रोण बृहस्पति में, कर्ण सूर्य में। आज यहाँ एक नई बात जुड़ती है। वहाँ महाभारत "प्रवेश" शब्द बार-बार कहता है: प्रविष्ट हुए, प्रवेश किया। और यहाँ गीता भी वही कहती है: "विशन्ति", प्रवेश कर रहे हैं। यानी जो अर्जुन इस सुबह, युद्ध के पहले दिन, दिव्य दृष्टि से देख रहे हैं, वही युद्ध के अन्त में सच हुआ।
और फिर: "स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः।" ऋषि और सिद्ध "कल्याण हो" कहकर स्तुति कर रहे हैं। मधुसूदन कहते हैं, ये नारद आदि ऋषि हैं जो युद्ध देखने आए थे, और जब उन्होंने उत्पात और अपशकुन देखे, तो बोले, "सारे जगत् का कल्याण हो।" ये ऋषि युद्ध रोक नहीं सकते। पर जो कर सकते हैं, वह करते हैं: पूरे जगत् के लिए भला माँगते हैं। कभी-कभी हमारे हाथ में भी इतना ही होता है। किसी बड़ी विपदा की खबर आती है, किसी दूर शहर में भूकम्प, किसी अपने की लम्बी बीमारी, और हम कुछ कर नहीं सकते। उस समय हाथ जोड़कर "सबका भला हो" कहना कमज़ोरी नहीं है। ऋषि भी यही करते हैं।
और यह दृश्य महाभारत में पहले भी एक बार आ चुका था। पंद्रहवें सत्संग में हमने सुना था कि जब श्रीकृष्ण शान्ति का सन्देश लेकर कौरवों की सभा में गए, और दुर्योधन ने उन्हें बाँधने की सोची, तब उन्होंने वहीं अपना विराट रूप दिखाया था। उस दिन भी देवता और ऋषि हाथ जोड़कर खड़े हो गए थे, और उनकी स्तुति में एक बात थी जो आज भी लागू होती है। उन्होंने कहा, "हे प्रभो, अपना क्रोध समेट लीजिए, यह रूप समेट लीजिए। ये राजा कितने छोटे हैं, इनमें कितना बल है, फिर भी इनके लिए आपने अपना दिव्य रूप दिखाया।" यानी जो रूप आज रथ पर खुला है, वह युद्ध से कुछ ही दिन पहले हस्तिनापुर की सभा में भी खुल चुका था। जिसने देखना चाहा, उसने देखा।
अब बाईसवाँ श्लोक, एक लम्बी सूची: "रुद्र और आदित्य, वसु और साध्य, विश्वेदेव, दोनों अश्विनीकुमार, मरुत और पितर, गन्धर्वों, यक्षों, असुरों और सिद्धों के समूह, ये सब विस्मित होकर आपको देख रहे हैं।"
इस सूची में एक शब्द ऐसा है जो आसानी से छूट जाता है। "ऊष्मपा"। हमारी टीका कहती है, यह पितरों का नाम है, और इसका अर्थ है गरम भोजन पीने वाले, क्योंकि माना जाता था कि पितर अपने लिए दिए गए भोजन का केवल गरम भाग ग्रहण करते हैं। श्रीधर स्वामी इस पर एक पुरानी स्मृति का वचन देते हैं: जब तक अन्न गरम रहता है, और जब तक खाने वाले चुपचाप खाते हैं, तब तक पितर भी खाते हैं। आपके घर में भी शायद श्राद्ध के दिन कोई बड़े-बूढ़े कहते होंगे कि भोजन गरम परोसो, और बात मत करो। वह छोटी-सी परम्परा इसी पुरानी समझ से आई है। और देखिए, उस विराट रूप के सामने हमारे पितर भी खड़े हैं, विस्मित होकर देखते हुए। जिनके लिए हम श्राद्ध में थाली परोसते हैं, वे भी उसी एक के सामने हाथ बाँधे खड़े हैं।
एक और बात। इस श्लोक में असुर भी हैं, और वे भी विस्मित होकर देख रहे हैं। देवता भी, असुर भी, यक्ष भी, सिद्ध भी। आश्चर्य किसी एक पक्ष का नहीं होता। जो सच में बड़ा है, उसके सामने मित्र और शत्रु दोनों का मुँह एक-सा खुला रह जाता है। ज्ञानेश्वरी कहती है, ये सब अपने-अपने लोक से उत्सुक होकर उस महामूर्ति को देख रहे हैं, और देखते-देखते हर क्षण और विस्मित होते जाते हैं, और अपने मुकुटों से आपकी आरती उतारते हैं।
अब तेईसवाँ श्लोक, और यहाँ अर्जुन पहली बार ख़ुद को भी गिनती में रखते हैं। "हे महाबाहो, आपके बहुत मुखों और नेत्रों वाले, बहुत भुजाओं, जाँघों और पैरों वाले, बहुत पेटों वाले, और बहुत दाढ़ों से विकराल महान् रूप को देखकर सब लोक व्याकुल हैं, और मैं भी।" "दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम्।"
"और मैं भी।" ये दो शब्द सुनिए। अब तक अर्जुन कह रहे थे कि तीनों लोक काँप रहे हैं, देवता डरे हुए हैं। अब वे मानते हैं, मैं भी डरा हूँ। यह अर्जुन कौन है? वह जिसने स्वर्ग जाकर इन्द्र के शत्रुओं से युद्ध किया, जिसने किरात-वेश में शिव से भी लड़ाई की। ज्ञानेश्वर अर्जुन से कहलवाते हैं: "जिससे संहार करने वाले रुद्र भी डरते हैं, जिसके डर से मृत्यु छिप जाती है, वह मैं यहाँ थर-थर काँप रहा हूँ। आपने मुझे ऐसा कर दिया।"
मुझे यह बात बहुत सच्ची लगती है। बहादुरी का अर्थ यह नहीं कि डर न लगे। जिसने कभी डर देखा ही नहीं, उसकी बहादुरी की अभी परीक्षा ही नहीं हुई। अर्जुन संसार के किसी शत्रु से नहीं डरे। पर जब संसार का पूरा सच, उसका जन्म और उसका अन्त, एक साथ सामने आ गया, तो वे काँप गए। और उन्होंने यह छिपाया नहीं। "और मैं भी।" हम भी अक्सर दूसरों के सामने मज़बूत दिखते रहते हैं। घर में सबसे बड़े हैं, तो डरना मना है। दफ़्तर में ज़िम्मेदारी है, तो घबराना मना है। पर भगवान के सामने अर्जुन ने कहा, "मैं डरा हूँ।" और अगले ही श्लोकों में देखिए, यही ईमानदारी उन्हें प्रार्थना तक ले जाती है।
तो इन तीन श्लोकों में हमने देखा कि यह डर अकेले अर्जुन का नहीं है। देवता काँप रहे हैं, ऋषि "कल्याण हो" कह रहे हैं, पितर, गन्धर्व, असुर, सब विस्मित खड़े हैं। और उन सबके बीच एक आदमी ईमानदारी से कहता है: "और मैं भी।"
पर अभी एक बात बाकी है। अगले दो श्लोकों में अर्जुन का डर अपनी पूरी गहराई तक पहुँचता है। वे कहते हैं, मुझे न धीरज मिलता है, न शान्ति, न दिशाएँ सूझती हैं। और फिर, उसी डर के बीच से, उनके मुँह से एक शब्द निकलता है जो इस पूरे दर्शन का पहला सहारा है। आइए, सुनते हैं।
नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं
व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।
दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा
धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥ २४ ॥
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि
दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि ।
दिशो न जाने न लभे च शर्म
प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ २५ ॥
चौबीसवाँ श्लोक आज का तीसरा मुख्य श्लोक है, और शायद सबसे सच्चा। "हे विष्णो, आकाश को छूते हुए, प्रकाशमान, अनेक रंगों वाले, फैलाए हुए मुखों और चमकती विशाल आँखों वाले आपको देखकर मैं भीतर से व्याकुल हूँ।" और फिर वह पंक्ति: "धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो।" मुझे न धीरज मिलता है, न शान्ति।
दो शब्द हैं, धृति और शम। ये दोनों अलग चीज़ें हैं, और रामानुजाचार्य इन्हें बहुत साफ़ अलग करते हैं। धृति, वे कहते हैं, शरीर को थामे रखने की ताकत है। और शम है मन और इन्द्रियों का शान्त होना। यानी अर्जुन कह रहे हैं: मेरे हाथ-पैर ढीले पड़ रहे हैं, शरीर साथ नहीं दे रहा, और भीतर मन भी नहीं ठहरता। आपने कभी ऐसा अनुभव किया है? किसी अस्पताल के गलियारे में डॉक्टर ने कोई रिपोर्ट हाथ में देकर बात की, और आपको लगा कि पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई। घुटने काँपने लगे, यह धृति का जाना है। और रात भर दिमाग़ में वही बात घूमती रही, नींद नहीं आई, यह शम का जाना है। अर्जुन को एक साथ दोनों का अनुभव हो रहा है।
अब इस श्लोक का सम्बोधन सुनिए: "विष्णो"। नीलकण्ठ इस एक शब्द पर रुकते हैं। विष्णु का अर्थ है, जो सब जगह फैला हुआ है। और नीलकण्ठ कहते हैं, अर्जुन के इस सम्बोधन में एक बेबसी है: आपसे घिरी इस जगह को छोड़कर मैं कहीं और जा भी नहीं सकता, क्योंकि आप तो सब जगह हैं। सोचिए यह कितनी अजीब हालत है। डर लगे तो आदमी भागता है। पर जिससे डर लग रहा है, वह हर दिशा में है। भागोगे कहाँ?
और यहीं, मुझे लगता है, इस श्लोक का सबसे बड़ा भरोसा छिपा है। जब भागने की कोई जगह नहीं बचती, तब अर्जुन क्या करते हैं? वे उसी को पुकारते हैं। "विष्णो।" डर में भी उनके मुँह से नाम निकलता है। छोटा बच्चा जब पिता की ऊँची आवाज़ से डरता है, तो कहाँ भागता है? उसी पिता की टाँगों से लिपट जाता है। डर भी उसी की ओर ले जाता है जिससे डर लगा।
ज्ञानेश्वरी में इस श्लोक पर अर्जुन की एक बात बहुत ईमानदार है। वे कहते हैं, "देवा, विश्वरूप देखने की जो चाह मैंने की थी, उसका फल मुझे मिल गया। बाप रे, अब आँखें जितनी ठण्डी होनी थीं, हो गईं।" इसमें एक हल्की-सी कड़वी मुस्कान है, जो हम सबने कभी न कभी महसूस की है। हम कुछ बहुत चाहते हैं, ज़िद करके माँगते हैं, और जब वह मिलता है, तो पता चलता है कि हम उसके लिए तैयार नहीं थे। और ज्ञानेश्वर आगे कहते हैं, शरीर तो मिट्टी का है, उसकी किसे चिन्ता। पर आज मेरा भीतर का चैतन्य भी काँप रहा है, वह भीतर का आत्मा भी, जो केवल आनन्द है, सिहर उठा। यहाँ तक कि अर्जुन कहते हैं, आज गुरु और शिष्य का यह नाता किसी तरह बचा रहे, यही बहुत है।
तो इस श्लोक से एक बात साफ़ है, और यही आज के सवाल का पहला उत्तर है। भगवान केवल मीठे नहीं हैं। जो मुकुट और चक्र वाला है, जिसकी आँख चाँदनी-सी है, उसी के मुख में प्रलय की आग भी है। और यह कोई डराने वाली बात नहीं, यह सच है। जिस भगवान को हम केवल मीठा मानते हैं, उस पर भरोसा तभी तक टिकता है जब तक जीवन मीठा है। जिस दिन जीवन कड़वा होता है, वह भरोसा टूट जाता है, क्योंकि हमें लगता है कि यह कड़वाहट भगवान के बाहर से आई। गीता कहती है, नहीं। सुख भी उसी में है, प्रलय भी उसी में। और इसलिए जिस दिन प्रलय आए, उस दिन भी हम उसी के भीतर हैं, उसके बाहर नहीं।
अब पच्चीसवाँ श्लोक। "दाढ़ों से विकराल और प्रलयकाल की अग्नि के समान आपके मुखों को देखते ही मुझे दिशाओं का ज्ञान नहीं रहता, और सुख नहीं मिलता। हे देवेश, हे जगन्निवास, प्रसन्न होइए!"
"दिशो न जाने", मुझे दिशाएँ नहीं सूझतीं। शंकराचार्य कहते हैं, पूरब कौन-सा है, पश्चिम कौन-सा, यह भेद मिट गया। आप कभी घने कोहरे में फँसे हैं? सड़क पर, या पहाड़ पर, जहाँ हाथ भर आगे कुछ न दिखे? वहाँ सबसे पहले दिशा जाती है। फिर आप रुक जाते हैं, क्योंकि आगे बढ़ने का कोई अर्थ नहीं रहता। अर्जुन रथ पर हैं, युद्ध के बीच। उन्हें दिशा चाहिए, कि किधर बाण चलाएँ, किसकी रक्षा करें। और इस घड़ी में वे कहते हैं, मुझे दिशा ही नहीं सूझती।
अब यहाँ शंकराचार्य एक ऐसी बात कहते हैं जो पहली बार सुनने में उलटी लगती है। इस श्लोक के ठीक बाद वे लिखते हैं: जिनसे मुझे हार का डर था, वह डर अब चला गया। यानी अर्जुन का पुराना डर, कि शायद हम हार जाएँ, वह यहीं ख़त्म हो गया। क्योंकि अगले श्लोकों में वे देखेंगे कि शत्रु-सेना के सब बड़े योद्धा पहले ही उन मुखों में जा रहे हैं। पर देखिए, छोटा डर गया, और उसकी जगह एक बहुत बड़ा डर आ गया। हार का डर गया, और मृत्यु के पूरे सच का डर आ गया। यह बात हमारे जीवन में भी होती है। जब कोई बहुत बड़ा सच सामने आता है, तो छोटी चिन्ताएँ अपने आप छूट जाती हैं। जिसके घर में कोई गम्भीर बीमार हो, उसे उस हफ़्ते दफ़्तर की तरक्की की चिन्ता नहीं सताती।
अब इस श्लोक का आख़िरी शब्द, जिसके लिए मैंने आपसे कहा था कि यह इस दर्शन का पहला सहारा है: "प्रसीद"। प्रसन्न होइए। अब तक अर्जुन देख रहे थे, वर्णन कर रहे थे, डर रहे थे। अब पहली बार वे कुछ माँगते हैं। और क्या माँगते हैं? न यह कि रूप हट जाए, न यह कि युद्ध टल जाए। बस इतना: आप प्रसन्न हो जाइए। रामानुज कहते हैं, इसका अर्थ है, मुझ पर ऐसी कृपा कीजिए कि मैं अपनी सहज अवस्था में लौट आऊँ। और मधुसूदन एक और कोमल बात कहते हैं: प्रसन्न होइए, ताकि डर मिट जाए, और मैं आपके दर्शन का सुख पा सकूँ। यानी अर्जुन दर्शन से भागना नहीं चाहते। वे चाहते हैं कि यही दर्शन डर के बिना हो।
और दो सम्बोधन, "देवेश", देवताओं के स्वामी, और "जगन्निवास", जिसमें जगत् रहता है। सोचिए, जिस घड़ी अर्जुन को सारा जगत् उन मुखों में जलता दिख रहा है, उसी घड़ी वे उन्हें "जगन्निवास" कहते हैं, जगत् का घर। यही भक्ति की पहचान है। डर में भी यह याद रहे कि जो डरा रहा है, वही घर है। ज्ञानेश्वरी में अर्जुन यहाँ कहते हैं: "आप हमारे स्वामी हैं, तो मेरे प्राणों पर ढाल रखिए। यह महामारी का पसारा फिर से समेट लीजिए। मुझे इस महाभय से निकालिए।" और एक जगह वे अपने पर ही हैरान होकर कहते हैं: "जो मैं काल के मुँह से भी नहीं डरा, वह आज इतना डरपोक हो गया।"
तो इन दो श्लोकों में अर्जुन का डर पूरी गहराई तक पहुँचा। शरीर ने साथ छोड़ा, मन ने शान्ति छोड़ी, आँखों ने दिशा छोड़ी। और उस सबके बीच से एक शब्द निकला: "प्रसीद"। जो डर प्रार्थना बन जाए, वह डर हार नहीं है, वह रास्ता है।
पर अभी एक बात बाकी है। और अब हम उस घड़ी पर पहुँच रहे हैं जिसकी बात मैंने शुरू में की थी। अगले श्लोक में सञ्जय को अन्धे राजा के सामने उसका अपना नाम लेना पड़ता है: "धृतराष्ट्र के ये सब पुत्र।" उसके बाद तीन नाम आते हैं जो उस राजा की आख़िरी आशा थे। मैं चाहता हूँ कि आप इन श्लोकों को बहुत धीरे सुनें। आइए।
अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः
सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः ।
भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ
सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ॥ २६ ॥
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति
दंष्ट्राकरालानि भयानकानि ।
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु
सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः ॥ २७ ॥
हमारी टीका इन दो श्लोकों के बारे में पहले एक बात बताती है: ये दोनों मिलकर एक ही वाक्य हैं। और फिर एक और बात: अर्जुन अब युद्ध होने से पहले ही उसका परिणाम देख रहे हैं। वाक्य यह है: "धृतराष्ट्र के ये सब पुत्र, राजाओं के समूहों सहित, भीष्म, द्रोण, और वह सूतपुत्र कर्ण, और हमारे पक्ष के मुख्य योद्धा भी, वेग से दौड़ते हुए आपके दाढ़ों से विकराल, भयानक मुखों में प्रवेश कर रहे हैं। कुछ, जिनके सिर चूर हो गए हैं, दाँतों के बीच फँसे दिखते हैं।"
यह गीता का सबसे भारी वाक्य है। और मैं चाहता हूँ कि इसे हम उस कमरे में बैठकर सुनें जहाँ यह पहली बार बोला गया था।
हस्तिनापुर। एक अन्धा राजा। दस दिन से युद्ध चल रहा है, और अभी-अभी सञ्जय दौड़ते हुए लौटे हैं, और प्रणाम करके कहा है, "महाराज, शन्तनु के पुत्र, भरतवंश के पितामह भीष्म मारे गए। जो सब योद्धाओं के मुकुट थे, वे आज बाणों की शय्या पर पड़े हैं।" राजा ने कहा, सब शुरू से बताओ। और सञ्जय सुना रहे हैं। पहले दिन की सुबह, शंख, अर्जुन का रथ, और अब यह दर्शन। और इस वाक्य तक आकर सञ्जय को कहना पड़ता है: "अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः।" धृतराष्ट्र के ये सब पुत्र।
सोचिए, सुनने वाला धृतराष्ट्र है। और वाक्य में उसका अपना नाम आता है। कोई दूसरा पिता नहीं, कोई दूसरे बेटे नहीं। उसके बेटे, नाम लेकर। और उसके बाद तीन नाम आते हैं। भीष्म: वे तो गिर ही चुके हैं, जिस खबर से यह सारी कथा शुरू हुई। द्रोण: वे अभी जीवित हैं, अभी सेनापति बनेंगे। कर्ण: वह अभी लड़ा तक नहीं। पर सञ्जय, जिन्हें व्यास ने दिव्य दृष्टि दी है, और जिनके बारे में महाभारत कहता है कि वे भूत, वर्तमान और भविष्य जानते हैं, ये नाम एक साथ बोल रहे हैं। जो गिर चुका, और जो अभी गिरेंगे, सब एक ही वाक्य में।
आपको याद होगा, पहले सत्संग में हमने धृतराष्ट्र की वह पंक्ति सुनी थी: "जब मैंने सुना कि कृष्ण ने अर्जुन को अपने शरीर में सब लोक दिखाए, तब सञ्जय, मुझे विजय की आशा नहीं रही।" आज हम ठीक उसी घड़ी पर हैं जिसकी वे बात कर रहे थे। और पन्द्रहवें और इकत्तीसवें सत्संग वाली कौरव-सभा याद कीजिए, जहाँ यही राजा इसी रूप को एक बार आँखों से देख चुके थे। उस दिन उन्होंने इसे देखा था। आज वे उसी रूप के मुखों में अपने बेटों का जाना कानों से सुन रहे हैं।
अब श्लोक के शब्दों पर, बहुत आदर के साथ। "भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ।" भीष्म, जिनकी गोद में अर्जुन बचपन में खेले थे। द्रोण, जिन्होंने अर्जुन को धनुष पकड़ना सिखाया। और "सूतपुत्र", वह, कर्ण। मधुसूदन सरस्वती इन नामों पर एक बात कहते हैं: ये वे हैं जिन्हें सब अजेय मानते थे। जिन पर दुर्योधन ने सारा भरोसा रखा था। और मधुसूदन एक छोटी-सी बात और जोड़ते हैं: धृतराष्ट्र के सौ बेटे, युयुत्सु को छोड़कर, सब। आपको याद होगा, बाईसवें सत्संग में हमने सुना था कि गीता के ठीक बाद युयुत्सु ने युधिष्ठिर की पुकार पर पक्ष बदल लिया था। उस एक बेटे की राह अलग हुई।
और फिर वे शब्द जिन्हें हम आसानी से अनसुना कर देते हैं: "सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः।" हमारे पक्ष के मुख्य योद्धा भी। शंकराचार्य धृष्टद्युम्न का नाम लेते हैं, श्रीधर स्वामी शिखण्डी और धृष्टद्युम्न का। यानी अर्जुन केवल शत्रुओं को नहीं देख रहे। वे अपनों को भी उन्हीं मुखों में जाते देख रहे हैं। और महाभारत गवाह है कि ऐसा हुआ। शान्ति पर्व की शुरुआत में युधिष्ठिर उन्हीं को गिनते हैं: बालक अभिमन्यु, द्रौपदी के पुत्र, धृष्टद्युम्न, विराट, राजा द्रुपद। मृत्यु पक्ष नहीं देखती। जो दर्शन अर्जुन को जीत का भरोसा दे रहा है, वही उन्हें यह भी दिखा रहा है कि जीत की कीमत क्या होगी।
अब सत्ताईसवें श्लोक का दूसरा आधा, जिसे मैं बिना बढ़ाए, जैसा है वैसा कहूँगा, क्योंकि गीता ने भी उसे एक ही पंक्ति में कहा है: कुछ योद्धा दाँतों के बीच फँसे दिखते हैं, उनके सिर चूर हो गए हैं। इस पंक्ति पर ज्ञानेश्वर महाराज की नज़र बहुत अलग है, और मुझे लगता है कि यह नज़र हमें याद रखनी चाहिए। वे कहते हैं, ऐसा लगता है मानो विश्वरूप काल ने लोगों के शरीर तो निगल लिए, पर सिर वहीं बचे रह गए, क्योंकि सिर शरीर का उत्तम अंग है। गीता का शब्द भी यही है, "चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः", चूर हुए उत्तम अंगों के साथ। ज्ञानेश्वर कहते हैं, महाकाल के मुँह में भी उत्तम अंग बचा रह गया। मैं इसे अपने ढंग से ऐसे समझता हूँ: काल शरीर को ले जाता है, पर मनुष्य में जो उत्तम है, उसकी कीर्ति, उसका धर्म, उसकी भलाई, वह काल के दाँतों में भी पूरी तरह चबाई नहीं जाती।
और नीलकण्ठ यहाँ एक बहुत बारीक बात देखते हैं, शब्दों के क्रम में। छब्बीसवें श्लोक में लिखा है, धृतराष्ट्र के पुत्र "त्वां", यानी आपमें प्रवेश करते हैं। और सत्ताईसवें में भीष्म आदि "वक्त्राणि", यानी आपके मुखों में। नीलकण्ठ कहते हैं, यह भेद जानबूझकर है। भीष्म आदि भक्त हैं, और वे भगवान के उस मुख में जाते हैं जिससे पुराने ग्रन्थों के अनुसार अग्नि, ब्राह्मण और वेद प्रकट हुए। और जो जीवन भर पाप में डूबे रहे, वे उस विराट शरीर में अपने कर्मों के अनुसार दूसरी गति पाते हैं। चौबीसवें सत्संग में हमने स्वर्गारोहण पर्व से सुना ही था कि भीष्म वसुओं में गए, द्रोण बृहस्पति में, कर्ण सूर्य में, और धृतराष्ट्र के पुत्रों ने यातुधानों को पाया। यानी एक ही मृत्यु, एक ही युद्धभूमि, पर हर किसी की गति अपनी। मृत्यु सबको एक-सा लेती है, पर कर्म सबको अलग-अलग जगह पहुँचाते हैं।
अब इस भारी दृश्य से हम अपने जीवन में क्या ले जाएँ? मैं आपसे बहुत धीरे कहूँगा। हम सब कभी न कभी किसी श्मशान में खड़े हुए हैं। वहाँ एक बात साफ़ दिखती है: चिता पर अमीर भी जलता है, ग़रीब भी, विद्वान भी, अनपढ़ भी। आग पक्ष नहीं देखती। पर लौटते हुए, घर के रास्ते में, लोग किसी एक के बारे में कहते हैं, "बहुत भला आदमी था", और किसी के बारे में चुप रह जाते हैं। शरीर सबका एक-सा गया। जो पीछे रहा, वह अलग-अलग है। भीष्म, द्रोण, कर्ण, ये सब उन मुखों में गए। पर आज हज़ारों साल बाद भी हम उनका नाम आदर से लेते हैं। काल ने उनका शरीर लिया, उनका उत्तम अंग नहीं।
और धृतराष्ट्र? उस कमरे में बैठे, यह सब सुनते हुए? महाभारत यहाँ उनके मन की बात नहीं लिखता। सञ्जय आगे सुनाते जाते हैं, और राजा सुनते जाते हैं। मैं भी उनके मन की बात गढ़ूँगा नहीं। बस इतना कहूँगा कि जो पिता सब सुनकर भी अपने बेटे को रोक न सका, उसके लिए यह वाक्य सुनना कैसा रहा होगा, यह हर पिता, हर माँ अपने मन में जानते हैं।
पर अभी एक बात बाकी है। ये योद्धा उन मुखों में जा कैसे रहे हैं? अगले दो श्लोकों में अर्जुन दो उपमाएँ देते हैं: एक नदियों की, एक पतंगों की। और हमारी टीका कहती है कि ये दोनों उपमाएँ अलग हैं, क्योंकि दर्शन में दो तरह की मृत्यु है। और उन्हीं के साथ मैं आपको कर्ण की वह बातचीत सुनाऊँगा, जिसमें उसने युद्ध से पहले ही यह सब देख लिया था। आइए, सुनते हैं।
यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः
समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।
तथा तवामी नरलोकवीरा
विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ॥ २८ ॥
यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा
विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।
तथैव नाशाय विशन्ति लोका-
स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥ २९ ॥
अट्ठाईसवाँ श्लोक। "जैसे नदियों के बहुत से जल-प्रवाह समुद्र की ओर ही दौड़ते हैं, वैसे ही मनुष्य-लोक के ये वीर आपके सब ओर से जलते हुए मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।" "समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति।" समुद्र की ओर ही मुँह किए दौड़ते हैं।
नदी समुद्र की ओर क्यों बहती है? वह कोई फ़ैसला नहीं करती। पहाड़ से उतरती है, मैदान पार करती है, कभी मुड़ती है, कभी धीमी होती है, पर उसका रास्ता एक ही दिशा में है। श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती दोनों कहते हैं, यह उपमा उनके लिए है जो बिना चाहे, बेबस होकर प्रवेश करते हैं। और हमारी टीका भी यही कहती है: नदियाँ स्वभाव से, बिना चुने, समुद्र की ओर बहती हैं। श्रीधर एक छोटी बात जोड़ते हैं: अनेक रास्तों से चली हुई नदियाँ। गंगा एक रास्ते से, यमुना दूसरे से, कोई पूरब से, कोई पश्चिम से। पर पहुँचती सब एक ही समुद्र में।
ज्ञानेश्वर महाराज इस श्लोक पर जो कहते हैं, वह सीधे हमारे जीवन की बात है। वे कहते हैं, प्राणी आयु के रास्ते पर दिन और रात की गिनती पिरोते हुए, तेज़ी से उन मुखों से मिलने चले जा रहे हैं। सोचिए, एक दिन, एक रात, फिर एक दिन, एक रात। कैलेंडर के पन्ने पलटते जाते हैं। हम सोचते हैं कि हम कहीं पहुँच रहे हैं: नौकरी, घर, बच्चों की शादी। और हम पहुँच भी रहे हैं। पर उन सब पड़ावों के पार भी एक समुद्र है, जिसकी ओर हर नदी बहती है। छठे सत्संग में हमने सुना था, "जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च", जो जन्मा है, उसकी मृत्यु निश्चित है, और जो मरा है, उसका जन्म। आज अर्जुन वही बात एक चित्र में देख रहे हैं।
पर इस उपमा में डर से ज़्यादा एक शान्ति भी है, अगर हम उसे देखें। नदी समुद्र में जाकर मिटती नहीं, समुद्र बन जाती है। उसका नाम छूट जाता है, पानी नहीं छूटता। और जिसमें सब नदियाँ गिर रही हैं, वह कोई अनजाना गड्ढा नहीं है। वह वही है जिसे अर्जुन ने अभी कुछ श्लोक पहले "निधान" कहा था, जगत् का आश्रय, और "जगन्निवास", जगत् का घर।
अब उनतीसवाँ श्लोक, और यहाँ उपमा बदल जाती है। "जैसे पतंगे नष्ट होने के लिए बड़े वेग से जलती हुई अग्नि में प्रवेश करते हैं, वैसे ही ये सब लोक भी नष्ट होने के लिए बड़े वेग से आपके मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।" "विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः।"
नदी और पतंगे में क्या फ़र्क है? श्रीधर स्वामी साफ़ कहते हैं: नदी का उदाहरण बेबस प्रवेश के लिए था, पतंगे का उदाहरण जान-बूझकर किए गए प्रवेश के लिए है। मधुसूदन भी यही कहते हैं, और जोड़ते हैं: बिना आगे का सोचे। पतंगा आग को देखता है, उसकी चमक से खिंचता है, और ख़ुद उड़कर उसमें गिरता है। कोई उसे धकेलता नहीं। हमारी टीका इतना ही कहती है: पतंगे अपनी चाह से खिंचकर आग में गिरते हैं, और इस दर्शन में दोनों तरह की मृत्यु है।
और अब मैं आपको वह बातचीत सुनाता हूँ जिसकी बात मैंने कही थी। यह महाभारत के उद्योग पर्व में है, युद्ध से कुछ ही दिन पहले। श्रीकृष्ण शान्ति का प्रयास करके हस्तिनापुर से लौट रहे हैं, और कर्ण को अपने रथ पर बिठाकर नगर से बाहर ले जाते हैं। बारहवें सत्संग में हमने उसका पहला हिस्सा सुना था: श्रीकृष्ण ने कर्ण को बताया कि वह कुन्ती का पुत्र है, और पाण्डवों के साथ आ जाए तो राज्य उसका होगा। और कर्ण ने मना कर दिया था, क्योंकि जिन्होंने उसे पाला, और जिस दुर्योधन ने उस पर भरोसा किया, उन्हें वह धोखा नहीं दे सकता था।
पर उस बातचीत का आगे का हिस्सा, जो हमने अभी तक नहीं सुना, आज के श्लोकों का जैसे पहले से लिखा हुआ भाष्य है। कर्ण कहता है, "हे कृष्ण, धृतराष्ट्र के पुत्र का एक शस्त्रों का यज्ञ होगा। उस यज्ञ के जानकार निरीक्षक आप होंगे, और अध्वर्यु का काम भी आपका होगा।" और फिर वह पूरे युद्ध को एक यज्ञ की तरह गिनाता है: गाण्डीव उसकी स्रुवा, अर्जुन के दिव्य अस्त्र उसके मन्त्र, युधिष्ठिर जप और होम में लगे ब्रह्मा। और फिर वह आगे की बात भी कहता है: "हे कृष्ण, जब आप मुझे सव्यसाची के हाथों मारा गया देखेंगे, तब इस यज्ञ की वेदी फिर से चिनी जाएगी। जब दोनों पाञ्चाल द्रोण और भीष्म को गिराएँगे, तब यज्ञ का विराम होगा।" और फिर: "धृतराष्ट्र की बहुएँ और पोतों की बहुएँ, जिनके पति, पुत्र और रक्षक मारे गए, गान्धारी के साथ रोएँगी, और वह रोना इस यज्ञ का अवभृथ स्नान होगा।"
सुनिए। यह वही सूची है जो अर्जुन आज देख रहे हैं: भीष्म, द्रोण, सूतपुत्र, धृतराष्ट्र के पुत्र। अर्जुन ने इसे दिव्य दृष्टि से देखा। कर्ण ने इसे युद्ध से पहले अपनी आँखों से, अपने मन से देख लिया था। और उसी बातचीत में आगे कर्ण अपना एक सपना बताता है। "हे जनार्दन, मैंने देखा कि महारथी भीष्म और द्रोण, मैं, और धृतराष्ट्र का पुत्र, ऊँटों से जुती एक गाड़ी पर सवार होकर दक्षिण की ओर जा रहे हैं, अगस्त्य की दिशा की ओर। बहुत जल्दी हम यमलोक पहुँचेंगे।" और फिर वह वाक्य, जो इस श्लोक के पतंगे के साथ रखकर सुनने लायक है: "मैं, दूसरे राजा, और क्षत्रियों का वह सारा समूह, गाण्डीव की आग में प्रवेश करेंगे। इसमें मुझे कोई सन्देह नहीं।"
गाण्डीव की आग में प्रवेश। आग, और प्रवेश, और जानते हुए। तब श्रीकृष्ण कर्ण से एक वाक्य कहते हैं, जो मुझे लगता है पतंगे की पूरी कथा खोल देता है। वे कहते हैं, "तात, जब सब प्राणियों का विनाश निकट होता है, तब अनीति नीति जैसी दिखती है, और हृदय से हटती नहीं।" पतंगे को आग आग नहीं दिखती, रोशनी दिखती है। जो रास्ता विनाश का है, वह उस घड़ी सही लगता है। और यही बात हम अपने जीवन में भी देखते हैं। कोई आदत, कोई ज़िद, कोई गुस्सा, जिसके बारे में भीतर से हम जानते हैं कि यह ठीक नहीं। फिर भी उस घड़ी वही ठीक लगता है, और मन उसे छोड़ता नहीं।
पर कर्ण को मैं केवल पतंगा नहीं कहूँगा, और महाभारत भी नहीं कहता। उसने आग देखी, जानी, और फिर भी गया, क्योंकि उसने तय कर लिया था कि जिस मित्र ने उस पर भरोसा किया, उसका साथ नहीं छोड़ेगा। और उस बातचीत का अन्त सुनिए। कर्ण कहता है, "हे कृष्ण, शायद हम इस महायुद्ध से जीवित पार होकर आपको फिर देखें। या फिर, हमारा मिलन निश्चय ही स्वर्ग में होगा।" और यह कहकर उसने माधव को कसकर गले लगाया, रथ से उतरा, और उदास मन से लौट गया। जो आदमी जानता है कि वह आग की ओर जा रहा है, और फिर भी जाते-जाते भगवान को गले लगाकर जाता है, उसकी कथा केवल हार की कथा नहीं है।
और जब वह दिन आया, कर्ण पर्व में सञ्जय उसे इन शब्दों में धृतराष्ट्र को सुनाते हैं। अर्जुन ने अन्तिम बाण चढ़ाया, तो सारा जगत् काँप उठा, और ऋषियों ने कहा, "सारे जगत् का कल्याण हो।" वही कल्याण की कामना, जो आज इक्कीसवें श्लोक में ऋषि कर रहे थे। और जब कर्ण गिरा, तो महाभारत कहता है, उसके शरीर से एक तेज निकला, आकाश में फैला, और सूर्य में समा गया। सब योद्धाओं ने वह अद्भुत बात देखी। सूर्य का पुत्र, सूर्य में लौट गया। नदी, समुद्र में।
तो इन दो श्लोकों में दो तरह का जाना है। नदी जैसा, जो स्वभाव से है, समय से है, जिससे कोई नहीं बचता। और पतंगे जैसा, जो अपनी चाह से है, जिसमें विनाश रोशनी जैसा दिखता है। पहले से हम बच नहीं सकते। दूसरे से बच सकते हैं, अगर समय रहते पहचान लें कि जो रोशनी हमें खींच रही है, वह आग तो नहीं।
पर अभी एक बात बाकी है। अब अर्जुन उस रूप को एक ऐसे काम में देखते हैं जिसे देखकर वे अपने सखा को पहचानना ही भूल जाते हैं। और फिर वे वह सवाल पूछते हैं जो इस पूरे दर्शन का केन्द्र है: "आप हैं कौन?" आइए, सुनते हैं।
लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्-
लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः ।
तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं
भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ॥ ३० ॥
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो
नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं
न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥ ३१ ॥
तीसवाँ श्लोक। "हे विष्णो, आप सम्पूर्ण लोकों को अपने जलते हुए मुखों से सब ओर से निगलते हुए चाट रहे हैं। आपका उग्र प्रकाश सारे जगत् को तेज से भरकर तपा रहा है।"
"लेलिह्यसे", बार-बार चाट रहे हैं। नीलकण्ठ इस शब्द में अर्जुन की एक शिकायत सुनते हैं: आप तो करुणा वाले हैं, फिर भी इन गिरने वालों को रोकते नहीं, उलटे और निगलना चाहते हैं। और फिर भी आपका तेज घटता नहीं, बढ़ता ही जाता है। ज्ञानेश्वर इस पर एक बहुत गहरी बात कहते हैं। आग अपने जलाने के गुण से ख़ुद नहीं जलती, उसे पता ही नहीं कि वह किसी को जला रही है। ज़हर नहीं जानता कि वह मारता है। वैसे ही आपको अपनी उग्रता का भान ही नहीं है, पर इस तरफ़ जगत् ख़त्म हुआ जा रहा है।
और यह चित्र महाभारत में एक और जगह, बिल्कुल इन्हीं शब्दों में आता है, पर इस बार दर्शन में नहीं, सचमुच। युद्ध की नौवीं रात, पाण्डवों के शिविर में, युधिष्ठिर श्रीकृष्ण से कहते हैं: "कृष्ण, भीष्म को देखो। हम उनकी ओर देखने का साहस भी नहीं कर पाते। वे भड़की हुई आग की तरह सेनाओं को चाट रहे हैं।" और उसी रात वे कहते हैं, "जैसे जलती आग की ओर दौड़ता पतंगा अकेला ही मृत्यु पाता है, वैसे ही मैं भीष्म के सामने आ पहुँचा हूँ।" सोचिए। जो पतंगे की उपमा अर्जुन ने पहले दिन की सुबह शत्रुओं के लिए देखी, नौवें दिन धर्मराज ने वही अपने लिए कही। युद्ध में कोई पक्ष ऐसा नहीं था जिसे कभी न लगा हो कि वह आग के सामने पतंगा है।
आज हमारे लिए इस श्लोक का अर्थ शायद इतना है: समय सबको चाटता जाता है। बचपन के दोस्त, माँ-बाप की आवाज़, पुराना मोहल्ला, सब धीरे-धीरे उसके मुँह में जाते दिखते हैं। और यह देखकर मन वही कहता है जो अर्जुन ने कहा: आप रोकते क्यों नहीं? इसका उत्तर अर्जुन को अगले श्लोक के बाद मिलेगा। अभी वे बस पूछते हैं।
अब इकतीसवाँ श्लोक, आज का आख़िरी, और आज का चौथा मुख्य श्लोक। "आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो।" मुझे बताइए, उग्र रूप वाले आप कौन हैं? "नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद।" हे देवश्रेष्ठ, आपको नमस्कार है, प्रसन्न होइए। "मैं आप आदिपुरुष को जानना चाहता हूँ, क्योंकि मैं आपकी प्रवृत्ति को नहीं समझता।" "न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्।"
सोचिए, यह सवाल कौन पूछ रहा है। अर्जुन, जो बरसों से श्रीकृष्ण के सखा रहे, जिन्होंने अभी दसवें अध्याय में उनकी सारी विभूतियाँ सुनीं, जिन्होंने अठारहवें श्लोक में ख़ुद कहा, "आप ही सनातन पुरुष हैं।" और वही अर्जुन अब पूछ रहे हैं, "आप हैं कौन?" नीलकण्ठ कहते हैं, इस तेज से घबराकर अर्जुन भूल ही गए कि ये भगवान हैं। और मधुसूदन एक छोटा-सा शब्द जोड़ते हैं जो मुझे बहुत छूता है: आपका सखा होकर भी मैं आपकी चेष्टा नहीं समझ पाता।
सखा होकर भी नहीं समझ पाता। यह हमारे जीवन का बहुत सच्चा अनुभव है। जिसे हम सबसे ज़्यादा जानते हैं, कभी-कभी वही सबसे अनजाना लगता है। और भगवान के साथ तो यह और भी होता है। बरसों हम उन्हें पूजते हैं, उनसे बात करते हैं, और फिर जीवन में कोई ऐसी घटना होती है कि मन पूछ उठता है: "यह आप हैं? यह आपका काम है? मैं आपको समझ नहीं पाता।"
और अब इस श्लोक का सबसे सुंदर हिस्सा देखिए, क्योंकि यही आज के सवाल का असली उत्तर है। अर्जुन डरे हुए हैं, उलझे हुए हैं, अपने सखा को पहचान नहीं पा रहे। पर वे तीन काम करते हैं, उसी एक श्लोक में। पहला, वे पूछते हैं: "आख्याहि मे", मुझे बताइए। डर ने उन्हें चुप नहीं किया। दूसरा, वे प्रणाम करते हैं: "नमोऽस्तु ते"। न समझते हुए भी सिर झुकाते हैं। और तीसरा, वे फिर कहते हैं: "प्रसीद"। रामानुज इसी श्लोक पर अर्जुन के मन की बात यूँ कहते हैं: आप बताइए कि किस इरादे से यह संहार करने वाला रूप प्रकट किया, और फिर प्रसन्न रूप वाले हो जाइए। पूछना, झुकना, और कृपा माँगना। जब भगवान का रूप डरा दे, तो अर्जुन यही करते हैं। वे भागते नहीं, न शिकायत में मुँह मोड़ते हैं।
और इस सवाल का उत्तर अगले ही श्लोक में आता है, ग्यारहवें अध्याय के सबसे प्रसिद्ध वचनों में से एक: "कालोऽस्मि।" इतना ही आज। वह उत्तर क्या है, और अर्जुन के लिए उसमें क्या आज्ञा है, यह अगले सत्संग में। ज्ञानेश्वर इशारा भर करते हैं कि भगवान अर्जुन से एक भ्रम छुड़ाना चाहते थे, जो उसके मन में बहुत गहरा बैठा था।
तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।
पहली बात। भगवान केवल मीठे नहीं हैं, और यह जानना भरोसे को कमज़ोर नहीं, मज़बूत करता है। जिसकी एक आँख चाँदनी है और दूसरी सूरज, उसी में सुख भी है और प्रलय भी। इसलिए जिस दिन जीवन में आग आए, उस दिन भी आप उसके बाहर नहीं हैं। वह "जगन्निवास" है, जगत् का घर।
दूसरी बात। डर को छिपाइए मत, उसे प्रार्थना बना दीजिए। अर्जुन ने कहा, "और मैं भी डरा हूँ", और फिर कहा, "प्रसीद"। डर में भी उनके मुँह से नाम निकला, "विष्णो"। आज रात, अगर मन में कोई डर है, तो उसे भगवान के सामने नाम लेकर रख दीजिए।
तीसरी बात। नदी बनिए, पतंगा नहीं। समय की नदी से कोई नहीं बचता, वह सबको समुद्र तक ले जाती है, और समुद्र वही है जिसका न आदि है न अन्त। पर पतंगे वाली आग, जो विनाश को रोशनी बनाकर दिखाती है, उससे बचा जा सकता है। श्रीकृष्ण का वह वाक्य याद रखिए: जब विनाश निकट होता है, तो अनीति नीति जैसी दिखती है। जो रोशनी आपको खींच रही है, एक बार रुककर देख लीजिए, कहीं वह आग तो नहीं।
आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आपके जीवन में कभी ऐसा समय आया जब भगवान का कोई रूप, या जीवन की कोई घटना, आपको बहुत डरा गई? और उस समय आपने क्या किया? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।
जिसका न आदि दिखता है, न मध्य, न अन्त, वही रथ पर आपकी लगाम पकड़े बैठा है।
जय श्री कृष्ण।
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं
पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं
पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥ १६ ॥
तीन बातें
- भगवान केवल मीठे नहीं हैं, और यह जानना भरोसे को कमज़ोर नहीं, मज़बूत करता है। जिसकी एक आँख चाँदनी है और दूसरी सूरज, उसी में सुख भी है और प्रलय भी। इसलिए जिस दिन जीवन में आग आए, उस दिन भी आप उसके बाहर नहीं हैं। वह "जगन्निवास" है, जगत् का घर।
- डर को छिपाइए मत, उसे प्रार्थना बना दीजिए। अर्जुन ने कहा, "और मैं भी डरा हूँ", और फिर कहा, "प्रसीद"। डर में भी उनके मुँह से नाम निकला, "विष्णो"। आज रात, अगर मन में कोई डर है, तो उसे भगवान के सामने नाम लेकर रख दीजिए।
- नदी बनिए, पतंगा नहीं। समय की नदी से कोई नहीं बचता, वह सबको समुद्र तक ले जाती है, और समुद्र वही है जिसका न आदि है न अन्त। पर पतंगे वाली आग, जो विनाश को रोशनी बनाकर दिखाती है, उससे बचा जा सकता है। श्रीकृष्ण का वह वाक्य याद रखिए: जब विनाश निकट होता है, तो अनीति नीति जैसी दिखती है। जो रोशनी आपको खींच रही है, एक बार रुककर देख लीजिए, कहीं वह आग तो नहीं।