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सत्संग ३१

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मुझे अपना असली रूप दिखाओ

गीता 11.1–11.14 · 78 मिनट

भगवान को देखने की चाह; दिव्य दृष्टि

अर्जुन उवाच मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् । यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥ १ ॥
गीता 11.1 — अर्थ पढ़ें ›
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया । त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥ २ ॥
गीता 11.2 — अर्थ पढ़ें ›
एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर । द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥ ३ ॥
गीता 11.3 — अर्थ पढ़ें ›

आपके मन में कभी यह इच्छा उठी है? मन्दिर में मूर्ति के सामने खड़े होकर, या किसी शाम चुपचाप बैठकर, या किसी बहुत बड़े दुःख के बीच, कि भगवान, आपके बारे में बहुत सुना है, बहुत पढ़ा है, बहुत माना है, बस एक बार, एक बार अपनी आँखों से देख लूँ कि आप सचमुच कैसे हैं। आज का सवाल यही है, अर्जुन के अपने शब्दों में: मुझे अपना असली रूप दिखाओ। क्या भगवान को सचमुच देखा जा सकता है? और अगर हाँ, तो किन आँखों से?

जय श्री कृष्ण।

आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का इकतीसवाँ सत्संग है, और आज हम गीता के उस अध्याय का दरवाज़ा खोल रहे हैं जिसे बहुत-से लोग गीता का सबसे अद्भुत अध्याय कहते हैं। पर पहले जल्दी से याद कर लें कि पिछली बार हम कहाँ रुके थे। पिछले सत्संग में दसवाँ अध्याय पूरा हुआ था। श्रीकृष्ण अपनी विभूतियाँ गिना रहे थे, यानी वे जगहें जहाँ उनकी झलक सबसे साफ़ दिखती है, और फिर उन्होंने एक नियम दे दिया था, जो पूरी सूची को हमारे काम का बना देता है: "यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा", जहाँ भी कोई चीज़ ऐश्वर्य वाली हो, सुंदर हो, या बल से भरी हो, उसे मेरे तेज के एक अंश से उपजी हुई जानो। और आख़िर में वह वाक्य, जिस पर दसवाँ अध्याय रुका था: "विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्", मैं इस पूरे जगत को अपने एक छोटे-से अंश से थामकर खड़ा हूँ।

अब ज़रा सोचिए, यह वाक्य सुनकर अर्जुन के मन में क्या हुआ होगा। जिसके एक अंश में पूरा ब्रह्माण्ड टिका है, वह अभी उनके सामने रथ की लगाम पकड़े बैठा है। इतना सुनने के बाद मन में एक ही बात उठती है: तो वह पूरा रूप कैसा होगा? ग्यारहवाँ अध्याय इसी एक इच्छा से शुरू होता है।

और याद रखिए, यह सब हमें सुनाया कौन जा रहा है। हस्तिनापुर के महल में, अन्धे राजा धृतराष्ट्र के पास बैठे सञ्जय सुना रहे हैं, उस दिन जब भीष्म बाणों की शय्या पर गिर चुके हैं। महाभारत के भीष्म पर्व के पच्चीसवें से बयालीसवें अध्याय तक गीता है, और उसमें पैंतीसवाँ अध्याय गीता का ग्यारहवाँ अध्याय है, जिसका नाम है "विश्वरूप दर्शन योग"। और इस अध्याय में एक बात ख़ास होने वाली है, जिसे आज के सत्संग में मैं बार-बार छूऊँगा: पहले अध्याय के बाद से सञ्जय गीता में बहुत कम बोले हैं, पर आज के श्लोकों में, नौवें से चौदहवें तक, सञ्जय ख़ुद आगे आकर, अपनी आँखों देखी बात, एक अन्धे राजा को सुनाएँगे। उसकी बात हम ठीक जगह पर करेंगे।

तो पहला श्लोक, और इसमें अर्जुन बोलते हैं। "मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम्।" मुझ पर कृपा करने के लिए आपने जो परम गोपनीय, अध्यात्म नाम का वचन कहा, "यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम", उससे मेरा यह मोह चला गया।

पहले "मदनुग्रहाय", मुझ पर कृपा के लिए। अर्जुन यह नहीं कहते कि मैंने बड़ी मेहनत से समझ लिया। वे कहते हैं, आपने मेरे ऊपर दया करके कहा। जो सीखता है, उसके मन में जब यह भाव आ जाए कि यह मेरी कमाई नहीं, देने वाले की कृपा है, तो समझिए सीखना ठीक दिशा में चल पड़ा।

और कौन-सा मोह गया? यहाँ आचार्य बड़ी सुंदर बात कहते हैं। रामानुज बताते हैं कि अध्यात्म वाला यह वचन दूसरे अध्याय के बारहवें श्लोक से शुरू होकर छठे अध्याय के अन्त तक चला, जहाँ आत्मा की बात हुई थी। और श्रीधर स्वामी तथा मधुसूदन सरस्वती उस मोह को एक वाक्य में पकड़ लेते हैं: "मैं इन्हें मारने वाला हूँ, ये मेरे हाथों मारे जा रहे हैं", यही मोह था। आपको याद होगा, पाँचवें सत्संग में श्रीकृष्ण ने कहा था, "नायं हन्ति न हन्यते", आत्मा न किसी को मारती है, न मारी जाती है। अर्जुन कह रहे हैं, वह बात अब भीतर उतर गई।

संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर अर्जुन के मुँह से एक बहुत सच्ची बात कहलवाते हैं। वे कहते हैं, मैं एक बुरा सपना देख रहा था, कि मैं अकेला अर्जुन हूँ, ये कौरव मेरे अपने हैं, और इन्हें मारकर मैं किस पाप में गिरूँगा, और उसी सपने के बीच प्रभु ने मुझे जगा दिया। बुरा सपना जब चल रहा होता है, तब वह बिलकुल सच लगता है। आँख खुलने पर ही पता चलता है कि डर किस चीज़ का था।

पर एक बात पर ध्यान दीजिए। अर्जुन यहाँ कहते हैं, "मोहोऽयं विगतो मम", मेरा मोह गया। और गीता के बिलकुल अन्त में, अठारहवें अध्याय में, वही अर्जुन फिर कहेंगे, "नष्टो मोहः", मोह नष्ट हुआ। मुझे लगता है, यह गीता हमें बहुत धीरे से कुछ सिखा रही है। मोह एक बार में नहीं जाता, परत-दर-परत जाता है। कोई एक परत हटती है तो हम सच में कहते हैं, अब सब साफ़ है, और फिर आगे चलकर एक और गहरी परत दिखती है। इसलिए अगर आपको कभी लगा था कि अब मैं समझ गया, और फिर किसी दिन वही पुराना डर लौट आया, तो घबराइए मत। अर्जुन के साथ भी यही हुआ। रास्ता यही है।

अब दूसरा श्लोक। "भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया।" मैंने आपसे प्राणियों की उत्पत्ति और प्रलय विस्तार से सुने हैं, "त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम्", और हे कमलनयन, आपकी कभी न घटने वाली महिमा भी।

मधुसूदन सरस्वती बताते हैं कि पहले श्लोक में अर्जुन ने पहले छह अध्यायों का हिसाब दिया था, और यहाँ सातवें से दसवें तक का: सब कुछ आपसे निकलता है, आप में ही लौटता है, और फिर भी आप वैसे के वैसे रहते हैं, अविनाशी। और फिर वह सम्बोधन, "कमलपत्राक्ष", कमल की पंखुड़ी जैसी आँखों वाले। सोचिए, अर्जुन ब्रह्माण्ड के जन्म और प्रलय की गम्भीर बात कर रहे हैं, और बीच में अचानक श्रीकृष्ण की आँखों की बात आ जाती है। मधुसूदन कहते हैं, यह सुंदरता का बखान प्रेम की अधिकता से निकला है। जिसे हम बहुत चाहते हैं, उसके बारे में बड़ी-बड़ी बातें करते हुए भी, बीच में उसका चेहरा याद आ ही जाता है।

अब तीसरा श्लोक, आज के मुख्य श्लोकों में पहला। "एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर।" हे परमेश्वर, आप अपने को जैसा बताते हैं, वह ठीक वैसा ही है। "द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम।" फिर भी, हे पुरुषोत्तम, मैं आपका वह ईश्वरीय रूप देखना चाहता हूँ।

इस श्लोक का क्रम देखिए। पहले "एवमेतद्यथात्थ", आप जैसा कहते हैं, यह ऐसा ही है। फिर "द्रष्टुमिच्छामि", मैं देखना चाहता हूँ। हमारी टीका इसे बहुत साफ़ कहती है: अर्जुन को सुनी हुई बात पर सन्देह नहीं है। जिस पर वे पहले से विश्वास करते हैं, उसे अपनी आँखों से देखना चाहते हैं। मधुसूदन सरस्वती "पुरुषोत्तम" वाले सम्बोधन में यह भाव सुनते हैं, मानो अर्जुन कह रहे हों: आप तो सबके भीतर बैठे हैं, आप जानते हैं कि मेरे मन में आपकी बात पर अविश्वास नहीं है, बस देखने की बहुत गहरी चाह है। और श्रीधर स्वामी एक बड़ा मानवीय शब्द इस्तेमाल करते हैं: कौतूहल। अर्जुन की यह इच्छा उत्सुकता से भी उठी है।

और यहाँ आचार्यों में एक बारीक अन्तर भी है, जो जानने लायक है। नीलकण्ठ कहते हैं, अर्जुन जिसे देखना चाहते हैं वह भगवान की माया से बना, सारे जगत को समेटे हुए रूप है, और उनका असली स्वरूप तो इससे भी परे है। विश्वनाथ चक्रवर्ती, जिनकी बात हम आगे सुनेंगे, इसे दूसरी तरह देखते हैं। दोनों बड़े आचार्य हैं, और हमें किसी एक का पक्ष लेने की ज़रूरत नहीं। इतना ही काफ़ी है कि अर्जुन की चाह सच्ची है।

अब इस बात को अपने जीवन पर रखकर देखिए। बहुत-से लोग सोचते हैं कि भगवान को देखने की इच्छा, उन्हें अनुभव करने की बेचैनी, शायद अविश्वास की निशानी है, कि मुझमें श्रद्धा कम है इसलिए मैं सबूत माँग रहा हूँ। अर्जुन बताते हैं कि ऐसा ज़रूरी नहीं। माँ की आवाज़ फ़ोन पर रोज़ सुनने वाला बेटा भी, बरसों बाद घर लौटते समय, उसका चेहरा देखने को तरसता है। वह इसलिए नहीं तरसता कि उसे माँ के होने पर शक है। वह इसलिए तरसता है क्योंकि वह उसे बहुत मानता है। विश्वास और देखने की चाह एक-दूसरे के दुश्मन नहीं हैं। कई बार चाह विश्वास से ही जन्म लेती है।

और इसी बात का एक बहुत सुंदर उलटा रूप महाभारत में है, जो मुझे आज के सत्संग के लिए सबसे सही कथा लगती है। यह वन पर्व में है, वनवास के दिनों की, और इसमें एक भाई अपने बड़े भाई से ठीक वही माँगता है जो अर्जुन आज श्रीकृष्ण से माँग रहे हैं।

पाण्डव गन्धमादन पर्वत पर ठहरे हुए हैं, अर्जुन की प्रतीक्षा में। एक दिन हवा उड़ाकर एक दिव्य कमल द्रौपदी के पास ले आती है, हज़ार पंखुड़ियों वाला, सूर्य जैसा चमकता हुआ, जिसे सौगन्धिक कहते थे। द्रौपदी बहुत प्रसन्न होती है और भीम से कहती है कि ऐसे और बहुत-से फूल ले आओ। भीम धनुष उठाकर हवा की दिशा में चल पड़ते हैं, गरजते हुए, केलों के वन को रौंदते हुए। और उसी वन में एक बूढ़ा वानर सोया हुआ है। पाठ कहता है, उस गर्जना से वानर ने जान लिया कि यह मेरा भाई भीम है, और भाई की रक्षा के लिए, ताकि वह आगे देवताओं के मार्ग पर न जाए, वह उस संकरे रास्ते पर लेटकर बैठ गया।

भीम आते हैं और कहते हैं, उठो, रास्ता दो। वानर कहता है, मैं बूढ़ा हूँ, उठ नहीं सकता, मुझे लाँघकर चले जाओ। और यहाँ भीम एक ऐसी बात कहते हैं जो उनकी पूरी छवि बदल देती है। वे कहते हैं, "तुम्हारे शरीर में गुणों से परे परमात्मा रहता है। मैं उसका अपमान नहीं करूँगा, उसे नहीं लाँघूँगा।" यह वही भीम हैं जिन्हें हम केवल गदा और भूख के लिए याद करते हैं।

फिर वानर कहता है, ठीक है, बस मेरी पूँछ हटाकर निकल जाओ। भीम हँसकर बाएँ हाथ से पूँछ पकड़ते हैं, और वह हिलती तक नहीं। फिर दोनों हाथों से, पसीने में भीगकर, पूरा ज़ोर लगाकर, और पूँछ ज़रा भी नहीं उठती। भीम लज्जा से सिर झुकाकर खड़े हो जाते हैं, हाथ जोड़ते हैं, अपने कड़वे शब्दों की क्षमा माँगते हैं, और पूछते हैं, आप कौन हैं? "मैं शिष्य की तरह पूछता हूँ, मैं आपकी शरण में आया हूँ।" सुनकर दूसरे अध्याय के अर्जुन याद आते हैं न, "शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्"? और वानर बताता है, "मैं हनुमान हूँ, वायु का पुत्र।" यानी भीम के बड़े भाई। पहले और दूसरे सत्संग में आपने सुना था कि दोनों भाई पवन के पुत्र हैं, और इसी भेंट में हनुमान ने वचन दिया था कि वे अर्जुन की ध्वजा पर बैठेंगे।

अब ध्यान से सुनिए, क्योंकि यहीं हमारे श्लोक से इसकी कड़ी जुड़ती है। हनुमान भीम को राम की कथा सुनाते हैं, और फिर भीम प्रणाम करके कहते हैं, "मुझसे अधिक भाग्यशाली कोई नहीं, कि मैंने आपको देख लिया। पर मेरी एक इच्छा पूरी कर दीजिए। समुद्र लाँघते समय आपका जो अनुपम रूप था, मैं उसे देखना चाहता हूँ।" और फिर वे जोड़ते हैं, "इससे मैं सन्तुष्ट हो जाऊँगा, और आपकी बात पर विश्वास करूँगा।"

फ़र्क़ सुना आपने? भीम कहते हैं, दिखाइए, तब विश्वास करूँगा। और अर्जुन पहले कहते हैं, यह ऐसा ही है, मुझे विश्वास है, और इसीलिए देखना चाहता हूँ। एक में देखना विश्वास की शर्त है। दूसरे में देखना विश्वास का फल है। और मैं भीम को छोटा नहीं कर रहा, उनकी माँग भी प्रेम से भरी है। पर अर्जुन का क्रम हमें बताता है कि भगवान के पास किस भाव से जाना सबसे सुंदर है।

और हनुमान का उत्तर क्या था? पाठ कहता है, वे हँसे, और बोले, "वह रूप न तुम देख सकते हो, न कोई और। तब समय दूसरा था, अब वैसा नहीं है।" हर युग के साथ बल, शरीर, प्रभाव घटते-बढ़ते हैं, और समय को लाँघा नहीं जा सकता। यानी पहला उत्तर था: नहीं, तुम नहीं देख सकते।

पर अभी एक बात बाकी है। भीम ने "नहीं" सुनकर हार नहीं मानी। और अर्जुन भी अब जो कहने वाले हैं, उसमें एक बहुत विनम्र "अगर" छिपा है। वह "अगर" ही भगवान के दर्शन की पहली सीढ़ी है। आइए, अगले तीन श्लोक सुनते हैं।

मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो । योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ॥ ४ ॥
गीता 11.4 — अर्थ पढ़ें ›
श्रीभगवानुवाच पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः । नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥ ५ ॥
गीता 11.5 — अर्थ पढ़ें ›
पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा । बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत ॥ ६ ॥
गीता 11.6 — अर्थ पढ़ें ›

चौथा श्लोक, आज के मुख्य श्लोकों में दूसरा। अर्जुन अपनी माँग पूरी करते हैं। "मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो।" हे प्रभो, अगर आप मानते हैं कि वह रूप मुझसे देखा जा सकता है, "योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम्", तो हे योगेश्वर, आप मुझे अपने उस अविनाशी स्वरूप का दर्शन कराइए।

पहला शब्द सुनिए: "मन्यसे यदि", अगर आप मानते हैं। अर्जुन यह नहीं कहते कि मैं योग्य हूँ, दिखाइए। वे फ़ैसला श्रीकृष्ण पर छोड़ देते हैं। मुझमें वह देखने की शक्ति है या नहीं, यह आप तय कीजिए।

संत ज्ञानेश्वर इस "अगर" पर बहुत प्यारी बात कहते हैं। वे अर्जुन से कहलवाते हैं: अपनी योग्यता मैं ख़ुद नहीं जानता। रोगी क्या अपने रोग का निदान ख़ुद कर सकता है? और जो बहुत प्यासा होता है, वह कहता है कि मुझे पूरा समुद्र भी कम पड़ेगा, यानी चाह के ज़ोर में आदमी अपनी सीमा भूल जाता है। इसलिए, ज्ञानेश्वर कहते हैं, जैसे माँ जानती है कि बच्चा कितना पचा सकता है, वैसे ही आप मेरी सामर्थ्य को देखकर ही आगे बढ़िए।

और "योगेश्वर" सम्बोधन पर विश्वनाथ चक्रवर्ती और बलदेव विद्याभूषण एक बात कहते हैं जो मुझे बहुत भरोसा देती है। वे कहते हैं, इस सम्बोधन में अर्जुन का भाव यह है: मैं इसके योग्य नहीं हूँ, पर मुझे योग्य बना देना आपकी योग-शक्ति का काम है। वल्लभाचार्य भी यही कहते हैं, यह दर्शन मेरे प्रयत्न से नहीं, आपकी इच्छा से मिलेगा। यानी अर्जुन अपनी अयोग्यता छिपाते भी नहीं, और उसके कारण रुकते भी नहीं। वे उसे भगवान के हाथ में रख देते हैं।

अब वापस गन्धमादन चलिए, क्योंकि भीम ने भी हनुमान का "नहीं" सुनकर यही किया था। उन्होंने कहा, "आपका पहले वाला रूप देखे बिना मैं किसी भी तरह नहीं जाऊँगा।" और फिर, पाठ के शब्द हैं, "यदि तेऽहमनुग्राह्यो दर्शयात्मानमात्मना", अगर मैं आपकी कृपा के योग्य हूँ, तो आप स्वयं अपना वह रूप मुझे दिखाइए। सुना आपने? भीम कहते हैं "दर्शयात्मानमात्मना", स्वयं अपने आप को दिखाइए। और अर्जुन के श्लोक में भी ठीक यही बात है, "दर्शयात्मानमव्ययम्", अपने अविनाशी स्वरूप को दिखाइए। दो भाई, दो अलग जगहें, एक ही विनती। और दोनों में एक "अगर" है: अगर मैं योग्य हूँ, अगर आप मानते हैं।

और फिर क्या हुआ? हनुमान मुस्कुराए, और भाई का मनचाहा पूरा करने के लिए अपना शरीर बढ़ाने लगे। केलों का पूरा कुंज उनके शरीर से ढक गया। वे पर्वत जितने ऊँचे हो गए, मानो दूसरा पर्वत खड़ा हो, आँखें ताँबे-सी लाल, लम्बी पूँछ से दिशाएँ भरती हुई। भीम चकित रह गए, बार-बार प्रसन्न होते रहे। और फिर पाठ कहता है, वह रूप सूर्य जैसा तेजस्वी था, सोने के पर्वत जैसा, जलते हुए आकाश जैसा, और उसे देखकर भीम ने आँखें मूँद लीं।

और हनुमान ने मुस्कुराते हुए कहा, "यहाँ तुम मेरा इतना ही रूप देख सकते हो। मैं इससे भी कहीं अधिक बढ़ सकता हूँ।" यही तो अर्जुन के "अगर" का अर्थ है। देने वाला जानता है कि लेने वाला कितना सह पाएगा। हनुमान ने उतना ही दिखाया जितना भीम की आँखें झेल सकती थीं, और फिर भी भीम की आँखें बन्द हो गईं। तब भीम ने हाथ जोड़कर कहा, अब अपने रूप को समेट लीजिए, मैं आपको देख नहीं पा रहा, आप उगते सूर्य जैसे हैं। यह बात भी याद रखिएगा। इस अध्याय के अन्त की ओर अर्जुन भी कुछ ऐसा ही कहेंगे।

और एक बात जो मुझे इस पूरी कथा में सबसे सुंदर लगती है। जिस हनुमान ने उस दिन भीम को अपना बड़ा रूप दिखाया था, वे आज इस रथ की ध्वजा पर बैठे हैं, उसी वचन के कारण जो उन्होंने उस दिन भीम को दिया था। यानी कुरुक्षेत्र में, ठीक इस क्षण, रथ के ऊपर वह बैठा है जिसने एक बार अपना विशाल रूप दिखाया था, और रथ के भीतर वह बैठा है जिसके विशाल रूप के आगे हनुमान का रूप भी एक छोटी-सी झलक है। यह जोड़ मेरा अपना है, महाभारत इसे इन शब्दों में नहीं कहता, पर दोनों बातें उसी में लिखी हैं।

और अब, इससे पहले कि श्रीकृष्ण उत्तर दें, एक छोटी-सी बात आपसे कहना चाहता हूँ। हम गीता के उस मोड़ पर खड़े हैं जहाँ भगवान अपने को दिखाने वाले हैं। अगले कुछ श्लोकों में वे अर्जुन से "देखो, देखो" कहेंगे, और फिर एक ऐसी बात कहेंगे जिसके बिना यह सब देखा ही नहीं जा सकता। आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। जो यहीं उठ जाए, वह यह मानकर जाएगा कि भगवान को देखना केवल अर्जुन जैसे किसी विशेष आदमी का भाग्य था। पूरी बात सुनने वाला जानेगा कि आँख देने वाला कौन है। तो अगर आप यह सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की यह यात्रा बीच में न छूटे। और आज का यह सत्संग पूरा सुनिए।

अब पाँचवाँ श्लोक, और यहाँ से श्रीकृष्ण बोलते हैं। "पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः।" हे पार्थ, मेरे सैकड़ों और हज़ारों रूप देखो, "नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च", अनेक प्रकार के, दिव्य, अनेक रंगों और आकारों वाले।

पहली बात, श्रीकृष्ण कोई भूमिका नहीं बाँधते, कोई शर्त नहीं रखते। अर्जुन ने कहा "अगर", और उत्तर में सीधा आता है: "पश्य", देखो। मधुसूदन सरस्वती ध्यान दिलाते हैं कि अगले चार श्लोकों में "पश्य" बार-बार आता है, और यह दोहराना ऐसा है जैसे कोई बहुत अद्भुत चीज़ दिखाने से पहले कहे, ध्यान से, सावधान होकर देखना। और श्रीधर स्वामी एक बारीक बात कहते हैं: रूप तो एक ही है, पर उसमें इतने प्रकार हैं कि श्रीकृष्ण "रूपाणि" कहते हैं, बहुत-से रूप।

संत ज्ञानेश्वर यहाँ रंगों और रूपों की लम्बी माला गूँथते हैं: कुछ दुबले, कुछ भारी, कुछ छोटे, कुछ विशाल, कुछ शान्त, कुछ क्रोधित, कुछ सोए हुए, कुछ जागे हुए, कुछ बिना शस्त्र के, कुछ शस्त्र उठाए, कुछ भयानक, कुछ अत्यन्त पवित्र, कुछ तपे हुए सोने के रंग के, कुछ नए बादल जैसे साँवले। यानी उस एक रूप में वह सब है जो संसार में कहीं भी है, सुंदर भी, डरावना भी। आज हम सुंदर की ओर से चलेंगे। डरावना हिस्सा अगले सत्संग में आएगा।

फिर छठा श्लोक। "पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा।" हे भारत, आदित्यों, वसुओं, रुद्रों, दोनों अश्विनीकुमारों और मरुतों को देखो। "बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत", और बहुत-से ऐसे आश्चर्य देखो जो पहले कभी देखे नहीं गए।

आचार्य इन देवताओं की गिनती बताते हैं: बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र, दो अश्विनीकुमार, और उनचास मरुत। शंकराचार्य "बहून्यदृष्टपूर्वाणि" में पहले न देखे गए आश्चर्यों का अर्थ करते हैं: जो मनुष्य-लोक में न तुमने देखे, न किसी और ने। रामानुज इसमें और जोड़ते हैं: जो आँखों से भी कभी नहीं देखे गए, और शास्त्रों में भी जिनका पूरा वर्णन नहीं मिलता।

पर इन नामों को सुनकर मुझे महाभारत की एक रात याद आती है, जो युद्ध के बरसों बाद की है, और जो इस श्लोक को एक बिलकुल नई रोशनी में दिखाती है। आश्रमवासिक पर्व में धृतराष्ट्र, गान्धारी और कुन्ती वन के एक आश्रम में तप कर रहे हैं। पाण्डव उनसे मिलने आए हैं। और व्यास वहाँ आकर धृतराष्ट्र से कहते हैं, मैं तुम्हारा, गान्धारी का, कुन्ती का, द्रौपदी का, सुभद्रा का दुःख जानता हूँ, बोलो, क्या वर दूँ? गान्धारी कहती हैं, सोलह वर्ष शोक में बीत गए, हमें हमारे पुत्र दिखा दीजिए। और व्यास, उन्हें दिखाने से पहले, गान्धारी को बताते हैं कि युद्ध में मरने वाले असल में कौन थे।

और अब सुनिए उनकी सूची, और इसे छठे श्लोक के साथ रखकर सुनिए। व्यास कहते हैं: कर्ण को सूर्य जानो। यानी आदित्य। गंगापुत्र भीष्म एक वसु के बल से मनुष्य बने देवता थे। यानी वसु; पिछले सत्संग में आपने वसिष्ठ की गाय वाली वह कथा सुनी थी, जिसमें एक वसु को मनुष्य बनकर जन्म लेना पड़ा। द्रोण के पुत्र अश्वत्थामा रुद्र से उपजे थे। यानी रुद्र। नकुल और सहदेव, जुड़वाँ भाई, अश्विनीकुमार थे। और भीम, और उनके पिता पाण्डु, मरुतों के गण के थे। आदित्य, वसु, रुद्र, अश्विनौ, मरुत। श्रीकृष्ण जिन पाँच नामों से अर्जुन को अपना रूप दिखा रहे हैं, उन पाँचों के अंश उसी समय कुरुक्षेत्र के मैदान में, दोनों सेनाओं में, खड़े थे। और उसी सूची में व्यास ने कहा था: इस पार्थ धनञ्जय को नर ऋषि जानो, और हृषीकेश को नारायण।

अब इसे सञ्जय की आँखों से देखिए, क्योंकि यह सब वे सुना किस दिन रहे हैं। जिस दिन भीष्म गिरे। सञ्जय धृतराष्ट्र को बता रहे हैं कि श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा, "वसुओं को देखो", और उसी दिन, उसी मैदान में, एक वसु बाणों की शय्या पर लेटा है। यह पढ़त मेरी अपनी है, सञ्जय यह बात नहीं कहते। पर मुझे लगता है, इस श्लोक का एक अर्थ यह भी है: जिन्हें हम केवल चाचा, भाई, गुरु, दुश्मन के रूप में देखते हैं, उनके भीतर भी कुछ दिव्य है, जो उसी एक रूप का हिस्सा है। हमारी आँखें उसे नहीं देखतीं।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण कहते जा रहे हैं, देखो, देखो। और अर्जुन चुप हैं। ज्ञानेश्वर कहते हैं, अर्जुन यह भी नहीं कहते कि मैं देख रहा हूँ या नहीं। क्यों? उसका उत्तर अगले दो श्लोकों में है, और वही इस अध्याय की कुंजी है।

इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् । मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद् द्रष्टुमिच्छसि ॥ ७ ॥
गीता 11.7 — अर्थ पढ़ें ›
न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा । दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥ ८ ॥
गीता 11.8 — अर्थ पढ़ें ›

सातवाँ श्लोक। "इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम्।" हे गुडाकेश, यहाँ, एक ही जगह में स्थित, चर और अचर सहित सम्पूर्ण जगत को आज देखो, "मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद् द्रष्टुमिच्छसि", मेरे इस शरीर में, और जो कुछ और तुम देखना चाहते हो, वह भी।

इस श्लोक का पूरा भार दो छोटे टुकड़े उठाते हैं। "इहैकस्थं", यानी यहीं, एक जगह में। और "पश्याद्य", यानी आज, अभी देखो। श्रीधर स्वामी कहते हैं, जो सारा जगत करोड़ों वर्ष घूम-घूमकर भी कोई देख न पाए, उसे तुम अभी, यहीं, एक जगह देखो। और नीलकण्ठ इसे और छोटा कर देते हैं। वे कहते हैं, एक जगह का अर्थ है, मेरे शरीर के एक अंग में, मानो नाखून की नोक भर जगह में, पूरा वर्तमान जगत, और जो बीत गया, जो आने वाला है, जो दूर है, जो छिपा है, वह सब भी। पिछले सत्संग का वाक्य याद कीजिए, मैं अपने एक अंश से सारे जगत को थामे हूँ। श्रीकृष्ण ने वहाँ कहा था, और यहाँ दिखा रहे हैं।

फिर सम्बोधन, "गुडाकेश"। नीलकण्ठ इसका अर्थ करते हैं, जिसने नींद को जीत लिया हो। और मुझे यह सम्बोधन यहाँ बहुत ठीक लगता है। जो दिखाया जाने वाला है, उसके लिए पूरी तरह जागा हुआ मन चाहिए। आधी नींद में भगवान नहीं दिखते।

और फिर वह छोटा-सा वाक्यांश, "यच्चान्यद् द्रष्टुमिच्छसि", और जो कुछ तुम देखना चाहते हो। हमारी टीका कहती है कि इसमें युद्ध का परिणाम भी आता है, जिसे अर्जुन आगे छब्बीसवें से तीसवें श्लोक तक देखेंगे। और शंकराचार्य इसे दूसरे अध्याय से जोड़ते हैं। चौथे सत्संग में आपने अर्जुन की वह उलझन सुनी थी: "यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः", हम नहीं जानते कि हम जीतेंगे या वे हमें जीतेंगे। श्रीकृष्ण मानो कह रहे हैं, वह प्रश्न भी तुम्हारे मन में अब तक है, तो उसका उत्तर भी इसी रूप में देख लो। पर वह उत्तर कैसा दिखेगा, यह अगले सत्संग की बात है।

और अब आठवाँ श्लोक, आज का सबसे भरोसा देने वाला श्लोक, और इस अध्याय की कुंजी। "न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा।" परन्तु तुम मुझे अपनी इन आँखों से नहीं देख सकते। "दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्।" मैं तुम्हें दिव्य नेत्र देता हूँ, मेरे ईश्वरीय योग को देखो।

अब याद कीजिए, पिछले श्लोक के अन्त में अर्जुन चुप क्यों थे। संत ज्ञानेश्वर इसका बड़ा मीठा दृश्य खींचते हैं। वे कहते हैं, श्रीकृष्ण "देखो, देखो" कहते गए, और अर्जुन कुछ नहीं बोले। तब श्रीकृष्ण ने उनकी ओर देखा, तो अर्जुन वैसे के वैसे खड़े थे, बस चाह का गहना पहने हुए। तब भगवान हँसे, और बोले, अर्जुन, मैंने रूप तो दिखा दिया, पर तुम देख ही नहीं रहे। और अर्जुन ने जो उत्तर दिया, ज्ञानेश्वर उसे बड़े अपनेपन से कहते हैं: प्रभु, कमी किसकी है? आप तो बगुले को चाँदनी चराने चले हैं, अन्धे के आगे आईना रख रहे हैं, बहरे के आगे गा रहे हैं। जो इन्द्रियों से परे है, उसे आपने चमड़े की आँखों के सामने रख दिया, मैं कैसे देखूँ? और ज्ञानेश्वर कहते हैं, भगवान ने इसे मान लिया: सच है, दिखाने से पहले देखने की शक्ति देनी थी, पर प्रेम में बोलते-बोलते मैं जल्दी कर गया।

अन्धे के आगे आईना। यह शब्द सुनते ही मेरा मन उस कमरे की ओर चला जाता है जहाँ यह सब सुनाया जा रहा है। क्योंकि ठीक यही शब्द, "मैं तुम्हें दृष्टि देता हूँ", महाभारत में एक बार पहले भी बोले गए थे, और जिससे बोले गए थे, वह इस समय सञ्जय के सामने बैठा है।

पहले सत्संग में आपने यह सुना था। युद्ध से पहले व्यास धृतराष्ट्र के पास आए थे और कहा था, अगर तुम यह युद्ध देखना चाहते हो, तो, पाठ के शब्द हैं, "चक्षुर्ददानि ते पुत्र", हे पुत्र, मैं तुम्हें दृष्टि देता हूँ। सुना आपने? "चक्षुर्ददानि ते", और आज श्रीकृष्ण कहते हैं, "दिव्यं ददामि ते चक्षुः"। वही "देता हूँ", वही "आँख"। और धृतराष्ट्र ने क्या कहा था? "मैं अपने कुटुम्बियों का वध देखना नहीं चाहता, बस सुनना चाहता हूँ।" और तब व्यास ने वह आँख सञ्जय को दी: दिव्य दृष्टि से युक्त सञ्जय तुम्हें युद्ध सुनाएगा, खुले में हो या छिपकर, दिन हो या रात, मन में सोचा हुआ भी, वह सब जान लेगा।

तो अब इस दृश्य को पूरा देखिए। कुरुक्षेत्र में भगवान अर्जुन को दिव्य आँख दे रहे हैं। और हस्तिनापुर में एक आदमी, जिसे ऐसी ही आँख एक ऋषि की कृपा से मिली है, वह यह सब देख रहा है, और उस राजा को बता रहा है जिसने वही आँख लेने से मना कर दिया था। मैं धृतराष्ट्र को दोष नहीं दे रहा। अपने बेटों को मरते देखना कौन चाहेगा? पर बात इतनी है कि उस दिन जो आँख उन्होंने ठुकराई थी, उसी आँख से आज वह दर्शन हो रहा है जिसके लिए ऋषि-मुनि तरसते हैं। और वे केवल सुन रहे हैं।

अब यह प्रश्न कि यह "दिव्य चक्षु" है क्या। यहाँ आचार्य अलग-अलग ढंग से बात करते हैं, और तीनों बातें सुनने लायक हैं। श्रीधर स्वामी कहते हैं, यह कोई और जोड़ी आँखें नहीं, यह ज्ञान से बनी दृष्टि है, अलौकिक। शंकराचार्य और रामानुज कहते हैं, ये साधारण आँखें सीमित चीज़ें पकड़ने के लिए बनी हैं, जो असीम है उसे पकड़ने के लिए अप्राकृत, यानी इस संसार से न बनी हुई, दृष्टि चाहिए।

नीलकण्ठ एक क़दम और आगे जाते हैं, और उनकी बात हम सबके काम की है। वे उपनिषद का एक वचन याद दिलाते हैं, कि मन ही इसकी दैवी आँख है। यानी दिव्य दृष्टि असल में वह मन है जो बहुत सूक्ष्म, बहुत शुद्ध हो गया हो। और वे ध्यान का एक क्रम भी बताते हैं, जिसकी बात हम आज के आख़िरी हिस्से में करेंगे।

और विश्वनाथ चक्रवर्ती इसमें एक प्रेम भरी बात कहते हैं। वे कहते हैं, अर्जुन की अपनी आँखें तो रोज़ श्रीकृष्ण का माधुर्य, उनकी मिठास, देखती ही थीं। सखा का मुस्कुराता चेहरा, रथ पर बैठे सारथी का रूप, यह सब तो वे इन्हीं आँखों से देखते थे। दिव्य आँख इसलिए दी गई कि वे भगवान का ऐश्वर्य, उनका प्रताप, भी देख सकें। और विश्वनाथ साफ़ कहते हैं, अर्जुन यह न समझें कि यह कोई जादू या माया का खेल है। यह भगवान का सच्चा, चेतन, आनन्द से भरा रूप है। आपने ध्यान दिया होगा, नीलकण्ठ इसे माया से बना रूप कहते थे, और विश्वनाथ माया नहीं मानते। दो बड़े आचार्य, दो दृष्टियाँ। हम दोनों को आदर से रखते हैं।

पर इन सब बातों के बीच इस श्लोक का सबसे बड़ा सन्देश कहीं छूट न जाए। "न तु मां शक्यसे", तुम नहीं देख सकते। यह भगवान ने ख़ुद कहा। अर्जुन जैसे वीर, जिन्होंने महादेव से युद्ध किया था, जो स्वर्ग जाकर लौटे थे, उनकी आँखें भी भगवान को नहीं देख सकती थीं। तो अगर आपको कभी लगा कि मुझे भगवान क्यों नहीं दिखते, मेरी पूजा में, मेरे जप में, कुछ कमी है क्या, तो आज यह श्लोक आपसे कहता है: कमी आपकी आँखों में नहीं है। ये आँखें उस काम के लिए बनी ही नहीं।

और फिर दूसरी आधी पंक्ति, जो पहली से भी बड़ी है: "दिव्यं ददामि ते चक्षुः", मैं तुम्हें देता हूँ। अर्जुन ने आँख माँगी भी नहीं थी। उन्होंने रूप माँगा था। आँख भगवान ने अपनी ओर से दी, बिना माँगे। वल्लभाचार्य ने चौथे श्लोक पर यही कहा था, यह दर्शन मेरे प्रयत्न से नहीं, आपकी इच्छा से मिलेगा। यानी भगवान को देखने वाली आँख कमाई नहीं जाती, दी जाती है। और जो देता है, वह देने के लिए तैयार बैठा है। हमें बस अर्जुन की तरह सामने खड़ा रहना है, चाह के साथ, और विनम्र "अगर" के साथ।

आज के दिन ये तीन शब्द याद रखने लायक हैं: "दिव्यं ददामि ते चक्षुः"।

पर अभी एक बात बाकी है। आँख मिल गई। अब श्रीकृष्ण चुप होते हैं, अर्जुन भी चुप हैं, और जो बोलता है वह है सञ्जय, अन्धे राजा से, हे राजा कहकर। आइए, अगले दो श्लोक सुनते हैं।

सञ्जय उवाच एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः । दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ॥ ९ ॥
गीता 11.9 — अर्थ पढ़ें ›
अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् । अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥ १० ॥
गीता 11.10 — अर्थ पढ़ें ›

नौवाँ श्लोक, और आपने सुना, इसके पहले अब "सञ्जय उवाच" गाया गया। "एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः।" हे राजन्, ऐसा कहकर फिर महायोगेश्वर हरि ने, "दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्", पार्थ को अपना परम ईश्वरीय रूप दिखाया।

इस श्लोक का सबसे भारी शब्द पहली पंक्ति के बीच में छिपा है, "ततो राजन्महायोगेश्वरो", उसमें वह सम्बोधन, राजन्, हे राजा। पहले अध्याय में युद्धभूमि का वर्णन करने के बाद सञ्जय गीता में बहुत कम बोलते हैं, और जब बोलते हैं तो ज़्यादातर बस यह बताने के लिए कि अब कौन बोला। यहाँ वे कुछ और कर रहे हैं। हमारी टीका कहती है: सञ्जय अन्धे राजा धृतराष्ट्र से कह रहे हैं, और उन्हें मिली दिव्य दृष्टि से जो देख रहे हैं, वह बता रहे हैं। श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती बताते हैं कि नौवें से चौदहवें तक, ये पूरे छह श्लोक, सञ्जय के अपने वचन हैं। श्रीकृष्ण बोल चुके, अर्जुन अभी बोले नहीं, और बीच में यह वर्णन कोई और नहीं, वह आदमी कर रहा है जो हमें पूरी गीता सुना रहा है।

और मधुसूदन सरस्वती इस सम्बोधन के साथ एक छोटी-सी बात जोड़ते हैं, जो मुझे बहुत मार्मिक लगती है। वे कहते हैं, इसका भाव है: हे राजा धृतराष्ट्र, अब स्थिर हो जाइए, सुनने के लिए। मानो सञ्जय कह रहे हों, महाराज, अब तक आपने बातें सुनीं, अब जो मैं बताने जा रहा हूँ वह देखी हुई चीज़ है, सँभलकर बैठिए।

और अब सोचिए, सञ्जय यह किससे कह रहे हैं। इस राजा के बारे में महाभारत हमें तीन बातें बताता है, और तीनों आँखों के बारे में हैं।

पहली बात उद्योग पर्व में है। युद्ध से पहले, जब श्रीकृष्ण शान्ति का प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर आने वाले थे, और धृतराष्ट्र को यह समाचार मिला, तो वे प्रसन्न होकर सञ्जय से बोले थे, पाठ के शब्द हैं, "चक्षुष्मतां वै स्पृहयामि सञ्जय", सञ्जय, मुझे आँखों वालों से सचमुच ईर्ष्या होती है। क्यों? क्योंकि वे वासुदेव को पास से देखेंगे, अपने परम रूप से चमकते हुए, दिशाओं और उपदिशाओं को प्रकाशित करते हुए। और फिर उसी अध्याय में वे श्रीकृष्ण की स्तुति करते हैं: वे पुरातन पुरुष हैं, हज़ार सिरों वाले, जिनका न आदि है, न मध्य, न अन्त, और मैं उनकी शरण लेता हूँ।

सुना आपने? अन्धा राजा, जिसे दिखता कुछ नहीं, अपने मन में ठीक वही रूप सोच रहा है जो आज कुरुक्षेत्र में खुलने वाला है: दिशाओं को प्रकाशित करता हुआ, जिसका न आदि है, न मध्य, न अन्त। ये दोनों बातें अगले कुछ श्लोकों में अर्जुन की आँखों के सामने सच होंगी।

दूसरी बात आपने पंद्रहवें सत्संग में सुनी थी, इसलिए केवल याद दिला रहा हूँ। जब श्रीकृष्ण कौरवों की सभा में आए, और दुर्योधन ने उन्हें बाँधने की सोची, तब उन्होंने वहीं अपना विराट रूप दिखाया था। डर के मारे राजाओं ने आँखें बन्द कर लीं, और जनार्दन ने केवल कुछ लोगों को दिव्य दृष्टि दी। धृतराष्ट्र को दो दिव्य आँखें मिलीं, और उन्होंने भगवान का परम रूप देखा। और फिर उन्होंने कहा, मेरी आँखें फिर बन्द हो जाएँ, मैं आपको देख चुका हूँ, अब यहाँ किसी और को देखना नहीं चाहता। यानी जिसकी ईर्ष्या थी, वह मिला भी, और फिर उन्होंने आँखें लौटा दीं। उस वाक्य को कोई भक्ति कहेगा, कोई थकान; पाठ उसका कारण नहीं खोलता।

और उसी अध्याय में एक छोटी-सी बात है, जो आज के श्लोक को और गहरा कर देती है। उस सभा में जिन थोड़े-से लोगों को दिव्य दृष्टि मिली थी, पाठ उनके नाम गिनाता है: द्रोण, भीष्म, विदुर, ऋषि, धृतराष्ट्र, और सञ्जय। यानी जो आदमी आज यह रूप बता रहा है, वह इसे पहली बार नहीं देख रहा। उसने एक बार कौरवों की सभा में भी इसकी झलक देखी थी, उसी राजा के पास खड़े होकर।

और तीसरी बात यह कमरा है। भीष्म गिर चुके हैं। बेटे मैदान में हैं। और जो आँख व्यास ने देनी चाही थी, वह सञ्जय के पास है। अब सञ्जय उसी भगवान का वही रूप बता रहे हैं, उसी आदमी को, जिसने कभी उसे देखने को तरसकर ईर्ष्या की थी, फिर देखकर आँखें बन्द करवा ली थीं। मैं यह नहीं कह सकता कि उस क्षण धृतराष्ट्र के मन में क्या चल रहा था। महाभारत यह नहीं बताता। पर उस एक सम्बोधन में, हे राजा, मुझे लगता है, एक पुकार है। सञ्जय मानो कह रहे हैं, महाराज, जो आप चाहते थे, वह यह है।

संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर सञ्जय के मुँह से एक बहुत सुंदर बात कहलवाते हैं। सञ्जय राजा से कहते हैं, महाराज, मुझे बार-बार यही आश्चर्य होता है कि तीनों लोकों में इस अर्जुन जैसा भाग्यशाली कौन है? जिस भगवान को योगी आठों पहर ढूँढ़ते हुए थक जाते हैं, वे इस अर्जुन के ऐसे वश में हैं कि यह रूठे तो मनाने जाते हैं। और फिर सञ्जय ख़ुद ही उत्तर देते हैं: इसमें आश्चर्य क्या, जिसे श्रीकृष्ण अपना लें, उसका भाग्य ऐसे ही जागता है।

अब "राजन्महायोगेश्वरो हरिः" के बाकी शब्दों पर एक बात। चौथे श्लोक में अर्जुन ने "योगेश्वर" कहा था। यहाँ सञ्जय महायोगेश्वर कहते हैं, बड़े योगेश्वर। और हरि, जिसका अर्थ मधुसूदन सरस्वती करते हैं: भक्तों के सब क्लेश हर लेने वाले। और रामानुज इसी श्लोक पर एक ऐसी बात कहते हैं जो पूरे दृश्य को बहुत अपना बना देती है। वे कहते हैं, यह रूप किसने दिखाया? जो सारथी बनकर बैठा था, जो पार्थ की माँ के भाई का बेटा था। और किसे दिखाया? पृथा के पुत्र को, अपनी बुआ के बेटे को। यानी ब्रह्माण्ड का स्वामी अपना सबसे बड़ा रूप किसी अजनबी को नहीं, घर के अपने को दिखा रहा है।

अब दसवाँ श्लोक, सञ्जय का वर्णन शुरू होता है। "अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम्।" अनेक मुखों और नेत्रों वाला, अनेक अद्भुत दृश्यों वाला, "अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम्", अनेक दिव्य आभूषणों वाला, और अनेक दिव्य शस्त्र उठाए हुए।

हमारी टीका बताती है कि दसवाँ और ग्यारहवाँ श्लोक मिलकर एक ही वाक्य हैं, रूप का एक लम्बा वर्णन। और ध्यान दीजिए, सञ्जय का पहला शब्द है अनेक। इस एक श्लोक में अनेक शब्द चार बार आता है। अनेक मुख, अनेक आँखें, अनेक अद्भुत दृश्य, अनेक आभूषण, अनेक शस्त्र। जब कोई चीज़ इतनी बड़ी हो कि गिनी न जा सके, तो बताने वाले के पास बस एक ही शब्द बचता है, अनेक।

संत ज्ञानेश्वर यहाँ अर्जुन की आँखों को चलते हुए दिखाते हैं। पहले वे मुख देखते हैं। कुछ मुख इतने सुंदर, मानो सौन्दर्य के ख़ज़ाने खुल गए हों, आनन्द के वन खिल गए हों। और उन्हीं के बीच कुछ मुख ऐसे, मानो मृत्यु को ही मुँह निकल आए हों, प्रलय की आग के कुण्ड खुल गए हों। फिर अर्जुन आँखें देखते हैं, जैसे अनेक रंगों के कमल-वन खिल गए हों। फिर हाथ, और उनमें शस्त्र, जो प्रलय की ज्वाला जैसे चमक रहे हैं। और ज्ञानेश्वर एक पंक्ति कहते हैं जो पूरे श्लोक का सार है: वे स्वयं ही शरीर हैं, स्वयं ही गहने; स्वयं ही हाथ, स्वयं ही हथियार।

अब इसे अपने जीवन पर रखिए। अनेक मुख, अनेक आँखें। हम भगवान को अक्सर एक चेहरे में सोचते हैं, मन्दिर की मूर्ति का चेहरा, किसी तस्वीर का चेहरा। और वह ठीक है, वह चेहरा प्रेम का दरवाज़ा है। पर यह श्लोक कहता है कि उस एक चेहरे के पीछे अनगिनत चेहरे हैं। मुझे लगता है, इसका एक अर्थ यह भी है कि भगवान की आँखें हर ओर हैं। कोई कोना ऐसा नहीं जहाँ आप अकेले हों। अस्पताल के गलियारे में रात के दो बजे, जब घर का कोई भीतर ऑपरेशन में है, और आप बेंच पर अकेले बैठे हैं, वहाँ भी कोई आँख आपको देख रही है। यह डराने वाली बात नहीं, सँभालने वाली बात है।

और एक बात, ईमानदारी के लिए। ज्ञानेश्वर ने कहा, कुछ मुख सुंदर थे, कुछ भयानक। आज हम सुंदर की ओर ही ठहरेंगे, क्योंकि आज के श्लोक आश्चर्य के हैं। पर यह याद रखिए कि यही रूप आगे चलकर अर्जुन को काँपने पर मजबूर करेगा। भगवान केवल मीठे नहीं हैं। उसकी बात अगली बार।

पर अभी एक बात बाकी है। सञ्जय अभी रुके नहीं हैं। अब वे उस रूप की माला, उसके वस्त्र, उसकी सुगन्ध की बात करेंगे, और फिर एक ऐसी उपमा देंगे जो हज़ारों वर्षों से लोगों के मन में बसी है, हज़ार सूर्यों वाली।

दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् । सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥ ११ ॥
गीता 11.11 — अर्थ पढ़ें ›
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता । यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥ १२ ॥
गीता 11.12 — अर्थ पढ़ें ›

ग्यारहवाँ श्लोक, सञ्जय के उसी वाक्य का दूसरा हिस्सा। "दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम्।" दिव्य माला और दिव्य वस्त्र धारण किए हुए, दिव्य सुगन्ध का लेप लगाए हुए, "सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम्", सब आश्चर्यों से भरा हुआ, अनन्त, सब ओर मुख वाला देव।

एक बात पर ध्यान दीजिए। सञ्जय केवल वह नहीं बता रहे जो दिखता है। माला और वस्त्र तो दिखते हैं, पर "दिव्यगन्धानुलेपनम्", दिव्य सुगन्ध का लेप, वह सुगन्ध तो दिखती नहीं, उसे तो अनुभव किया जाता है। यानी यह दर्शन केवल आँखों का नहीं रहा। मधुसूदन सरस्वती बताते हैं कि मालाएँ फूलों की भी थीं और रत्नों की भी। और संत ज्ञानेश्वर उस सुगन्ध पर लिखते हैं कि उसकी महिमा कौन बखाने, जिसके लेप से स्वयं प्रकाश की कान्ति बढ़ जाती है।

फिर दूसरी पंक्ति के आख़िरी तीन शब्द, "देवमनन्तं विश्वतोमुखम्"। देव, शंकराचार्य और श्रीधर कहते हैं, जो प्रकाश से भरा हो, चमकता हुआ। अनन्त, जिसका कोई अन्त नहीं, न देश में, न काल में, रामानुज कहते हैं, जो तीनों कालों के सारे जगत का आधार है, उसे किसी सीमा में नहीं बाँधा जा सकता। और विश्वतोमुख, सब ओर मुख वाला। शंकराचार्य कहते हैं, क्योंकि वह सब प्राणियों की आत्मा है।

और इस सब ओर मुख वाले रूप पर संत ज्ञानेश्वर एक ऐसा दृश्य लिखते हैं जो मुझे इस पूरे वर्णन में सबसे प्यारा लगता है। वे कहते हैं, अर्जुन घबराकर सामने से नज़र हटाते हैं, तो पीछे भी वही मुख, वही हाथ, वही पैर। आँखें खोलकर देखते हैं, तो सब कुछ उसी मूर्ति से भरा है। और अगर सोचें कि अब नहीं देखूँगा, और आँखें बन्द कर लें, तो भीतर भी वही। ज्ञानेश्वर कहते हैं, देखने पर दिखे, इसमें क्या अचरज? अचरज तो यह है कि न देखने पर भी दिखे। भगवान ने अर्जुन के देखने को भी, और न देखने को भी, दोनों को अपने में ले लिया। और फिर ज्ञानेश्वर एक पंक्ति जोड़ते हैं: यह बात सञ्जय हस्तिनापुर में राजा को सुना रहे हैं। यानी उस राजा को, जिसकी आँखें बाहर से बन्द हैं, सञ्जय बता रहे हैं कि एक आदमी को आँखें बन्द करने पर भी भगवान दिख रहे हैं।

इसमें हमारे लिए एक गहरी बात है। हम सोचते हैं कि भगवान को देखने के लिए किसी विशेष जगह जाना होगा, किसी विशेष समय पर बैठना होगा। और वह सब ठीक है, उसकी अपनी जगह है। पर यह श्लोक कहता है कि जो सब ओर मुख वाला है, उससे मुँह मोड़कर कहाँ जाएँगे? जिस दिन यह बात भीतर उतरती है, उस दिन भगवान की खोज बदल जाती है। फिर वह ढूँढ़ना नहीं रहता, पहचानना बन जाता है।

अब बारहवाँ श्लोक, आज के मुख्य श्लोकों में से एक, और शायद पूरी गीता के सबसे प्रसिद्ध श्लोकों में भी। "दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता।" अगर आकाश में हज़ार सूर्यों का प्रकाश एक साथ उदय हो जाए, "यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः", तो शायद वह उस महात्मा के प्रकाश जैसा हो।

इस श्लोक की बनावट पर ध्यान दीजिए, क्योंकि सारी सुंदरता उसी में है। इसमें दो बार "यदि" है। अगर हज़ार सूर्य एक साथ उगें, और अगर वह प्रकाश उसके जैसा हो सके। मधुसूदन सरस्वती और नीलकण्ठ इसे "अभूत-उपमा" कहते हैं, यानी ऐसी चीज़ से तुलना जो कभी हुई ही नहीं। हज़ार सूर्य एक साथ किसने देखे हैं? किसी ने नहीं। तो सञ्जय एक असम्भव चीज़ की कल्पना करते हैं, और फिर भी कहते हैं, शायद तब भी बराबरी न हो। शंकराचार्य साफ़ कहते हैं, अगर वह बराबर हो तो हो, नहीं तो विश्वरूप का प्रकाश उससे भी बढ़कर है। और श्रीधर स्वामी का निष्कर्ष एक वाक्य में: इसकी कोई और उपमा है ही नहीं।

यह एक कथावाचक की बड़ी ईमानदारी है। सञ्जय के पास दिव्य दृष्टि है, वे सब देख रहे हैं, पर जब बताने बैठते हैं तो उन्हें शब्द नहीं मिलते। तो वे सबसे बड़ी चीज़ लेते हैं जो मनुष्य जानता है, सूर्य, उसे हज़ार से गुणा करते हैं, और फिर भी "शायद" कहते हैं। भगवान के बारे में जो सच्चा बोलता है, वह अन्त में "शायद" पर ही आता है।

और महाभारत में इस हज़ार सूर्य वाले रूप की गवाही एक और जगह भी है। इक्कीसवें सत्संग में आपने मुनि उदंक की कथा सुनी थी, जिन्हें युद्ध के बाद द्वारका लौटते हुए श्रीकृष्ण मरुभूमि में मिले थे। उदंक ने कहा था, अगर मैं आपकी कृपा के योग्य हूँ, तो मुझे अपना वैष्णव रूप दिखाइए। सुना आपने, फिर वही "अगर"। और पाठ कहता है, श्रीकृष्ण ने उन्हें वही रूप दिखाया जो धनञ्जय ने देखा था, हज़ार सूर्यों जैसा, आकाश को ढककर खड़ा, चारों ओर मुख वाला। यानी अर्जुन ने आज जो देखा, वह एक बार का चमत्कार नहीं था। जिसने सच्चे मन से माँगा, उसे वह फिर दिखा।

और पहले भाग में भीम की कथा याद कीजिए। हनुमान का बढ़ा हुआ रूप सूर्य जैसा तेजस्वी था, और भीम ने आँखें मूँद लीं। एक सूर्य जैसा तेज भीम की आँखें नहीं सह पाईं। और यहाँ हज़ार सूर्य हैं। फिर भी अर्जुन ने आँखें नहीं मूँदीं। क्यों? आठवें श्लोक का उत्तर याद है न: क्योंकि आँख उन्हें भगवान ने दी थी। जिसे देखना है, वही देखने की शक्ति भी दे, तो हज़ार सूर्य भी सहे जाते हैं।

अब इस श्लोक को अपने जीवन पर रखिए। सूर्य को हम सीधे नहीं देख सकते। एक क्षण भी देखें तो आँखें चौंधिया जाती हैं। पर ज़रा सोचिए, उसी सूर्य के प्रकाश से हम हर चीज़ देखते हैं। सुबह घर में जो रोशनी आती है, जिसमें आप अख़बार पढ़ते हैं, बच्चे का चेहरा देखते हैं, चाय का कप उठाते हैं, वह उसी सूर्य की है जिसकी ओर आप एक क्षण नहीं देख सकते। मुझे लगता है, भगवान भी ऐसे ही हैं। उनका पूरा रूप हमारी आँखें नहीं सह सकतीं। पर उन्हीं के प्रकाश में हम सब कुछ देख रहे हैं। पिछले सत्संग की बात याद कीजिए, जहाँ भी सुंदरता है, बल है, शोभा है, वह उसी तेज का एक अंश है। हज़ार सूर्य तो अर्जुन ने देखे। हमें रोज़ की धूप में ही एक सूर्य की याद रखनी है।

पर अभी एक बात बाकी है। सञ्जय ने रूप बताया, प्रकाश बताया। पर उस प्रकाश के भीतर क्या था? अगले श्लोक में सञ्जय बताएँगे कि अर्जुन ने उस एक शरीर में क्या देखा, और फिर वह क्षण, जब अर्जुन का शरीर ख़ुद बोल पड़ा, उनके मुँह खोलने से पहले।

तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा । अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥ १३ ॥
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ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः । प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ॥ १४ ॥
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तेरहवाँ श्लोक, आज के मुख्य श्लोकों में आख़िरी। "तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा।" तब पाण्डुपुत्र ने वहाँ, देवों के देव के शरीर में, अनेक प्रकार से बँटे हुए सम्पूर्ण जगत को, "अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा", एक जगह स्थित देखा।

सातवें श्लोक में श्रीकृष्ण ने कहा था, "इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम्", एक जगह स्थित सारा जगत आज देखो। और यहाँ सञ्जय कहते हैं, "तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं", और फिर "अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे", उसने देवों के देव के शरीर में देखा। मधुसूदन सरस्वती और नीलकण्ठ यही बात कहते हैं: भगवान ने जो आज्ञा दी थी, अर्जुन ने वही अनुभव किया। कहा हुआ और देखा हुआ एक हो गया।

और एक शब्द नया है: "प्रविभक्तमनेकधा", अनेक प्रकार से बँटा हुआ। शंकराचार्य कहते हैं, देवता, पितर, मनुष्य, सब अपने-अपने भेद के साथ। नीलकण्ठ एक सुंदर उपमा देते हैं: बरसात में इमली का बीज फूटे तो उसमें पूरा पेड़ सूक्ष्म रूप में छिपा होता है, पर अलग-अलग दिखता नहीं। यहाँ ऐसा नहीं था। हर चीज़ अपनी जगह, अलग-अलग, साफ़ दिख रही थी। यानी सब एक में था, फिर भी कुछ भी आपस में घुल-मिलकर खो नहीं गया था। हर चीज़ अपनी जगह पर थी।

संत ज्ञानेश्वर इसे ऐसे कहते हैं: उस विश्वरूप के एक कोने में सारा जगत ऐसे दिख रहा था जैसे महासागर में बुलबुले, या आकाश में बादलों का नगर, या मेरु पर्वत पर बैठे धूल के कण।

और इस श्लोक के साथ मुझे इक्कीसवें सत्संग के मार्कण्डेय मुनि याद आते हैं, जिनकी कथा आपने विस्तार से सुनी थी। प्रलय के जल में भटकते हुए उन्हें बरगद की डाल पर एक बालक मिला था, और उस बालक के मुख में जाकर उन्होंने उसके पेट में पृथ्वी, नदियाँ, समुद्र, पर्वत, देवता, सब कुछ देखा था, सौ वर्षों से अधिक घूमते रहे, और उस शरीर का अन्त नहीं पाया। मार्कण्डेय ने वह जगत भीतर जाकर देखा, अर्जुन ने बाहर खड़े होकर। पर दोनों ने एक ही बात देखी: सारा संसार एक शरीर में।

और पहले भाग वाले भीम की एक बात यहाँ फिर लौटती है। जब हनुमान रास्ते में लेटे थे, भीम ने कहा था, तुम्हारे शरीर में परमात्मा रहता है, मैं उसे नहीं लाँघूँगा। अर्जुन आज देख रहे हैं कि सारा जगत भगवान के शरीर में है। और भीम ने उस दिन माना था कि भगवान हर शरीर में हैं, एक बूढ़े वानर के शरीर में भी। मुझे लगता है, ये दोनों एक ही सच के दो छोर हैं। सब उसमें है, और वह सबमें है। जिसने एक देख लिया, वह दूसरे को भी कभी लाँघकर नहीं जाता।

और नीलकण्ठ इसी श्लोक पर वह ध्यान का क्रम बताते हैं जिसकी बात मैंने आठवें श्लोक पर की थी, और यह हम सबके लिए है। वे कहते हैं, पहले भगवान के चतुर्भुज रूप का ध्यान करो। जब मन वहाँ टिक जाए, तो धीरे-धीरे एक-एक अंग पर आओ, उनकी मुस्कान पर, या उनके चरण के नख पर। जब मन वहाँ भी टिक जाए, तो वहाँ से विश्वरूप की ओर उठो। और वे कहते हैं, दिव्य आँख और कुछ नहीं, यही मन है जो इस तरह सूक्ष्म बना लिया गया हो। यानी अर्जुन को आँख एक क्षण में मिली, पर हमें वह धीरे-धीरे मिलती है, एक मुस्कान पर मन टिकाने से शुरू होकर।

अब चौदहवाँ श्लोक, और सञ्जय का यह वर्णन यहीं पूरा होता है। "ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः।" तब आश्चर्य से भरे, रोमांचित धनञ्जय ने, "प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत", देव को सिर से प्रणाम करके, हाथ जोड़कर कहा।

अर्जुन के बोलने से पहले उनका शरीर बोलता है। विस्मय से भरे, रोंगटे खड़े, सिर झुका, हाथ जुड़े। संत ज्ञानेश्वर इसका बड़ा कोमल चित्र देते हैं। वे कहते हैं, जैसे पहली बारिश के बाद पहाड़ के सारे अंग पर कोमल अंकुर उग आते हैं, वैसे अर्जुन के शरीर पर रोमांच हो आए। आँखों से आँसू की बूँदें गिरने लगीं, और भीतर का सुख ऐसे उमड़ा जैसे चाँद निकलने पर भरा हुआ समुद्र और भर जाए।

और मधुसूदन सरस्वती यहाँ एक ऐसी बात कहते हैं जो पूरी कथा को जोड़ देती है। वे कहते हैं, इतना अद्भुत दृश्य देखकर भी अर्जुन डरे नहीं, उन्होंने आँखें बन्द नहीं कीं, घबराकर अपना कर्तव्य नहीं भूले, वहाँ से भागे नहीं। बड़े धैर्य से, उस समय जो उचित था, वही किया: प्रणाम। बलदेव विद्याभूषण भी यही कहते हैं, यहाँ भय और आँखें मूँदना नहीं हुआ, केवल अद्भुत रस जागा। अब भीम को याद कीजिए। एक सूर्य जैसे हनुमान को देखकर उन्होंने आँखें मूँद ली थीं। और फिर भी, पाठ कहता है, भीम ने भी रोमांचित होकर, हाथ जोड़कर, हनुमान से बात की थी। दो भाई, दो दर्शन, और अन्त में दोनों का शरीर एक ही मुद्रा में: रोंगटे खड़े, हाथ जुड़े। सच्चे दर्शन का यही चिह्न है। वह आदमी को बड़ा नहीं बनाता, झुका देता है।

और धनञ्जय नाम। सातवें सत्संग में आपने सुना था कि अर्जुन को धनञ्जय क्यों कहते हैं, जो सब जीतकर धन के बीच खड़ा रहा। मधुसूदन यहाँ यही नाम उठाकर कहते हैं, जिसने इतने राजाओं को जीता, जिसने महादेव से युद्ध किया, वह आज सिर ज़मीन पर रखकर प्रणाम कर रहा है। सब कुछ जीतने वाले की सबसे बड़ी जीत यही थी, कि उसने झुकना जाना।

और अब, आज के सत्संग को समेटने से पहले, उस अन्धे राजा की ओर एक बार और लौटते हैं, जिन्हें यह सब सुनाया जा रहा है। क्योंकि उनकी आँखों की कथा का अन्त यहाँ नहीं होता।

युद्ध के बरसों बाद, उसी वन-प्रवास में, जिसकी बात हमने छठे श्लोक पर की थी, व्यास गान्धारी को वचन देते हैं कि तुम सब अपने मरे हुए अपनों को देखोगे, मानो सोकर उठे हों। रात होती है। व्यास गंगा के पवित्र जल में उतरकर सब लोकों को पुकारते हैं। जल के किनारे बड़ा कोलाहल उठता है, और पाठ कहता है, भीष्म और द्रोण को आगे करके, हज़ारों राजा अपनी सेनाओं सहित जल से उठ आते हैं। विराट, द्रुपद, अभिमन्यु, कर्ण, दुर्योधन, सब, चमकते हुए शरीरों में, दिव्य वस्त्र पहने, दिव्य मालाएँ धारण किए, और, पाठ के शब्द हैं, वैर, अहंकार, क्रोध और डाह से रहित।

और फिर वह पंक्ति: तब सत्यवती के पुत्र मुनि व्यास ने प्रसन्न होकर, अपने तप के बल से, धृतराष्ट्र को दिव्य दृष्टि दी। सारा जनसमूह उस अद्भुत, रोमांचकारी दृश्य को विस्मित होकर, बिना पलक झपकाए देखता रहा। और धृतराष्ट्र, पाठ कहता है, मुनि की कृपा से, दिव्य दृष्टि से उन सबको देखते हुए, प्रसन्न हुए।

सोचिए। युद्ध से पहले जिस आँख को उन्होंने यह कहकर ठुकराया था कि मैं अपनों का वध नहीं देखना चाहता। कौरवों की सभा में जिस आँख से भगवान को देखकर उन्होंने उसे लौटा दिया था। जिस आँख के न होने से वे आज यह गीता केवल सुन रहे हैं। वही आँख, बरसों बाद, एक रात के लिए, फिर उन्हें दी गई, और उस रात उन्होंने अपने बेटों को वैर से मुक्त, शान्त, चमकते हुए देखा, और प्रसन्न हुए। और ध्यान दीजिए, वहाँ भी वही शब्द हैं जो आज के श्लोकों में थे: दिव्य वस्त्र, दिव्य माला, विस्मय, रोमांच। यह जोड़ मेरा अपना है। पर मुझे लगता है, महाभारत हमें यह कह रहा है कि दिव्य आँख का द्वार कभी हमेशा के लिए बन्द नहीं होता। जिसने एक बार मना किया, उसे भी कृपा फिर ढूँढ़ लेती है।

पर अभी, इस कमरे में, उस रात तक बहुत दूर है। अभी तो सञ्जय ने इतना ही बताया है कि अर्जुन ने हाथ जोड़कर कहा। क्या कहा? अगले सत्संग में अर्जुन के अपने शब्द शुरू होंगे, "पश्यामि देवांस्तव देव देहे", हे देव, मैं आपके शरीर में सब देवताओं को देख रहा हूँ। और वहीं से यह आश्चर्य धीरे-धीरे किसी और भाव में बदलेगा। वह क्या है, यह अगली बार।

तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली बात। भगवान को देखने की चाह अविश्वास नहीं है। अर्जुन ने पहले कहा, "एवमेतद्यथात्थ", आप जैसा कहते हैं वह ऐसा ही है, और फिर कहा, मैं देखना चाहता हूँ। आपकी वह चाह भी, कि एक बार उन्हें अनुभव कर लूँ, आपके विश्वास से ही जन्मी है। उसे दबाइए मत। बस उसके साथ अर्जुन वाला विनम्र "अगर" जोड़ दीजिए: अगर आप मानें कि मैं योग्य हूँ।

दूसरी बात। ये आँखें भगवान को देखने के लिए बनी ही नहीं, और यह कहने वाले ख़ुद भगवान हैं। "न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा"। इसलिए अगर अब तक उनका दर्शन नहीं हुआ, तो अपने को दोष मत दीजिए। और आँख कमाई नहीं जाती, दी जाती है, "दिव्यं ददामि ते चक्षुः"। आपका काम है रोज़ उनके सामने खड़े होना, एक मुस्कान पर, एक नाम पर, मन टिकाना। आँख देना उनका काम है।

तीसरी बात। जो उनके प्रकाश को सीधे नहीं देख पाता, वह भी उसी प्रकाश में जी रहा है। हज़ार सूर्य अर्जुन ने देखे, हम रोज़ की धूप में जीते हैं, पर धूप उसी की है। और जिस दिन थोड़ा-सा भी दिखे, किसी बच्चे की हँसी में, किसी की सेवा में, किसी भजन में, उस दिन अर्जुन की तरह बस झुक जाइए, हाथ जोड़ लीजिए। दर्शन का पहला उत्तर शब्द नहीं, प्रणाम है।

आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आपके जीवन में कभी कोई ऐसा क्षण आया, किसी मन्दिर में, किसी नदी के किनारे, किसी बहुत कठिन दिन में, जब एक पल के लिए लगा हो कि भगवान पास हैं, और रोंगटे खड़े हो गए हों? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।

अर्जुन ने रूप माँगा था। भगवान ने रूप से पहले आँख दी। वे आज भी यही करते हैं।

जय श्री कृष्ण।

न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा । दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥ ८ ॥
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तीन बातें

  1. भगवान को देखने की चाह अविश्वास नहीं है। अर्जुन ने पहले कहा, "एवमेतद्यथात्थ", आप जैसा कहते हैं वह ऐसा ही है, और फिर कहा, मैं देखना चाहता हूँ। आपकी वह चाह भी, कि एक बार उन्हें अनुभव कर लूँ, आपके विश्वास से ही जन्मी है। उसे दबाइए मत। बस उसके साथ अर्जुन वाला विनम्र "अगर" जोड़ दीजिए: अगर आप मानें कि मैं योग्य हूँ।
  2. ये आँखें भगवान को देखने के लिए बनी ही नहीं, और यह कहने वाले ख़ुद भगवान हैं। "न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा"। इसलिए अगर अब तक उनका दर्शन नहीं हुआ, तो अपने को दोष मत दीजिए। और आँख कमाई नहीं जाती, दी जाती है, "दिव्यं ददामि ते चक्षुः"। आपका काम है रोज़ उनके सामने खड़े होना, एक मुस्कान पर, एक नाम पर, मन टिकाना। आँख देना उनका काम है।
  3. जो उनके प्रकाश को सीधे नहीं देख पाता, वह भी उसी प्रकाश में जी रहा है। हज़ार सूर्य अर्जुन ने देखे, हम रोज़ की धूप में जीते हैं, पर धूप उसी की है। और जिस दिन थोड़ा-सा भी दिखे, किसी बच्चे की हँसी में, किसी की सेवा में, किसी भजन में, उस दिन अर्जुन की तरह बस झुक जाइए, हाथ जोड़ लीजिए। दर्शन का पहला उत्तर शब्द नहीं, प्रणाम है।