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सत्संग ३०

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जहाँ सुंदरता, वहाँ भगवान

गीता 10.26–10.42 · 81 मिनट

रोज़मर्रा में भगवान की झलक

अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः । गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः ॥ २६ ॥
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उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् । ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम् ॥ २७ ॥
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आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् । प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥ २८ ॥
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भगवान को आप कहाँ ढूँढते हैं? मन्दिर में, आँखें बन्द करके, आरती की लौ के सामने? वहाँ तो ढूँढते ही हैं। पर कभी ऐसा हुआ है कि सुबह की धूप में पीपल के पत्ते चमक उठे, या किसी बच्चे ने खिलखिलाकर हँस दिया, और भीतर से आवाज़ आई कि यह जो अभी दिखा, यह कुछ और ही था? आज का सवाल यही है: क्या रोज़ की ज़िन्दगी में भगवान की झलक मिल सकती है? और अगर मिल सकती है, तो पहचानें कैसे? श्रीकृष्ण आज इसका एक सीधा नियम देंगे: जहाँ सुंदरता, वहाँ भगवान।

जय श्री कृष्ण।

आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का तीसवाँ सत्संग है, और दसवें अध्याय का आख़िरी। पहले याद कर लें कि पिछली बार हम कहाँ रुके थे। पिछले सत्संग में, बारहवें से पच्चीसवें श्लोक तक, अर्जुन ने श्रीकृष्ण की स्तुति की थी, और फिर एक बहुत सच्चा प्रश्न पूछा था: "केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया", हे भगवन्, मैं किन-किन चीज़ों में आपका चिन्तन करूँ? और श्रीकृष्ण ने उत्तर की शुरुआत सबसे भीतर से की थी: "अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः", मैं सब प्राणियों के हृदय में बैठी आत्मा हूँ। फिर सूची शुरू हुई, और पिछली बार वह यहाँ पहुँची थी: "यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि", यज्ञों में मैं जप का यज्ञ हूँ। आज वही सूची आगे चलती है, और फिर अपने आख़िर में एक ऐसी बात पर पहुँचती है जिसके लिए शायद पूरी सूची कही गई।

और आपको याद रहे कि यह सब हमें कौन सुना रहा है। हस्तिनापुर में, अन्धे राजा धृतराष्ट्र के पास, सञ्जय बैठे हैं, उस दिन जब भीष्म बाणों की शय्या पर गिर चुके हैं। महाभारत के भीष्म पर्व का चौंतीसवाँ अध्याय ही गीता का दसवाँ अध्याय है, "विभूति योग"। विभूति, यानी भगवान का ऐश्वर्य, उनकी शोभा, उनकी झलक जो संसार की चीज़ों में चमकती है।

अब छब्बीसवाँ श्लोक। "अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः।" सब वृक्षों में मैं पीपल हूँ, देवर्षियों में नारद। "गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः।" गन्धर्वों में चित्ररथ, और सिद्धों में कपिल मुनि।

पीपल क्यों? रामानुज एक शब्द में कहते हैं: सब पेड़ों में जो पूजा जाता है। और संत ज्ञानेश्वर इसमें एक प्यारी बात जोड़ते हैं। वे कहते हैं, कल्पवृक्ष भी है, पारिजात भी है, चन्दन भी अपने गुण के लिए प्रसिद्ध है, फिर भी पेड़ों की इस पूरी जाति में जो पीपल है, वह मैं हूँ। सोचिए, गाँव के बीच का वह पुराना पीपल, जिसके नीचे दादी दिया रखती थीं। श्रीकृष्ण कह रहे हैं, उसे देखो तो मुझे याद करो।

फिर नारद। देवर्षि का अर्थ शंकराचार्य बताते हैं: जो देवता होते हुए भी मन्त्रों को देखने के कारण ऋषि बन गए। और यहाँ एक छोटा-सा मेल है जिसे पकड़ लीजिए। पिछले सत्संग में, तेरहवें श्लोक में, अर्जुन ने कहा था कि सब ऋषि आपको परम ब्रह्म कहते हैं, "देवर्षिर्नारदस्तथा", देवर्षि नारद भी, और व्यास भी। अर्जुन ने जिन गवाहों के नाम लिए थे, आज श्रीकृष्ण उन्हीं को अपनी विभूति में गिन रहे हैं। नारद आज, और व्यास थोड़ी देर बाद। यानी जो भगवान की गवाही देते हैं, उनमें भी भगवान ही चमक रहे हैं।

अब चित्ररथ, गन्धर्वों में। आदि पर्व में एक रात की कथा है: पाण्डव पाञ्चाल की ओर जाते हुए आधी रात को गंगा पहुँचे, और वहाँ एक गन्धर्वराज ने अर्जुन को ललकारा। अर्जुन के आग्नेय अस्त्र से उसका रंग-बिरंगा रथ जल गया, और उसने कहा, "मैं जो चित्ररथ था, चमकीले रथ वाला, अब दग्धरथ हूँ, जले रथ वाला।" और फिर, पाठ बताता है, दोनों मित्र बन गए। यह वही चित्ररथ है या कोई दूसरा, पाठ नहीं बताता; पर इस वर्ग के किसी से अर्जुन कभी लड़कर दोस्त बन चुके थे।

और सिद्धों में कपिल मुनि। शंकराचार्य कहते हैं, सिद्ध वे जिन्हें धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य जन्म से ही, बिना प्रयत्न के, मिला हो। कपिल मुनि को आपने बीसवें सत्संग में देखा था, जब सगर के पुत्र उनका अनादर करके भस्म हुए, और अंशुमान् ने सिर झुकाकर वरदान पाया।

अब सत्ताईसवाँ श्लोक। "उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम्।" घोड़ों में अमृत के साथ उत्पन्न उच्चैःश्रवा मुझे जानो। "ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्।" श्रेष्ठ हाथियों में ऐरावत, और मनुष्यों में राजा।

"माममृतोद्भवम्", अमृत के साथ जन्मा मुझे जानो। हमारी टीका कहती है, इन्द्र का घोड़ा उच्चैःश्रवा और इन्द्र का हाथी ऐरावत, दोनों समुद्र-मन्थन में निकले थे। और यह कथा आदि पर्व में बहुत विस्तार से है। देवता मेरु की चोटी पर बैठकर सोच रहे थे कि अमृत कैसे मिले, और नारायण ने कहा, देवता और असुर मिलकर समुद्र को मथें। मन्दर पर्वत इतना बड़ा था कि देवता उसे उखाड़ ही न सके, तब नाग अनन्त ने उसे उखाड़ा। एक कछुए ने अपनी पीठ दी, मन्दर मथानी बना, और नागराज वासुकि रस्सी बने। असुरों ने मुँह की ओर पकड़ा, देवताओं ने पूँछ की ओर। पहले विष निकला, हालाहल, जिससे लोक जलने लगे, और रुद्र ने लोकों की भलाई के लिए उसे पीकर कण्ठ में रख लिया। फिर समुद्र से एक-एक करके निकले: चन्द्रमा, श्वेत वस्त्र में श्री, मन जैसा तेज़ घोड़ा, सुरभि गाय, चार दाँतों वाला महान हाथी, और आख़िर में धन्वन्तरि, अमृत का कमण्डलु लिए। और पाठ उस घोड़े के बारे में कहता है कि वह अमृत के मथे जाते समय पैदा हुआ, और सब देवताओं ने प्रसन्न होकर उसका आदर किया। वही, अमृत के साथ जन्मा।

अब इसका एक अर्थ अपने लिए देखिए। समुद्र में ये रत्न पहले से थे, पर दिखे तब, जब मथा गया, और मथने में पहले विष निकला। हमारी ज़िन्दगी भी बीमारी से, घाटे से, किसी अपने के जाने से मथी जाती है, और पहले कड़वाहट ही ऊपर आती है। पर जो धीरज से मथता रहता है, उसके भीतर से भी एक दिन चाँद निकलता है। श्रीकृष्ण कह रहे हैं, मथने के बाद जो सबसे उजला निकले, उसमें मुझे देखो।

और "नराणां च नराधिपम्", मनुष्यों में राजा। ज्ञानेश्वर कहते हैं, वह राजा, जिसकी सेवा सारे लोग प्रजा बनकर करते हैं। अब ज़रा सोचिए, यह वाक्य सञ्जय किसे सुना रहे हैं? एक राजा को। धृतराष्ट्र को। राजा होना भगवान की विभूति है, यह पद उनका दिया हुआ है, किसी की अपनी जायदाद नहीं। हमारे छोटे-छोटे राज्य भी ऐसे ही हैं: घर में बड़ा होना, दफ़्तर में मुखिया होना। सौंपी हुई चीज़ अमानत होती है।

अब अट्ठाईसवाँ श्लोक। "आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्।" शस्त्रों में मैं वज्र हूँ, गायों में कामधेनु। "प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः।" सन्तान उत्पन्न करने वाला कामदेव मैं हूँ, और सर्पों में वासुकि।

वज्र के बारे में शंकराचार्य और मधुसूदन याद दिलाते हैं कि वह दधीचि ऋषि की हड्डियों से बना था। सबसे बड़ा शस्त्र किसी के त्याग से बना।

फिर कामधेनु। मधुसूदन कहते हैं, यह वसिष्ठ ऋषि की कामधेनु है, जो समुद्र-मन्थन से निकली थी। और अब महाभारत की वह कथा सुनिए, जो सीधे उस आदमी से जुड़ती है जो आज बाणों की शय्या पर पड़ा है। आदि पर्व में गंगा राजा शान्तनु को बताती हैं कि वरुण के पुत्र वसिष्ठ, मेरु के किनारे अपने आश्रम में, एक गाय रखते थे, नन्दिनी, जो सुरभि की बेटी थी और सब इच्छाएँ पूरी करने वालों में सबसे अच्छी। एक दिन आठों वसु देवता उस वन में आए। वसु द्यु की पत्नी ने अपनी एक मानवी सखी के लिए वह गाय माँगी, क्योंकि उसका दूध पीने वाला दस हज़ार वर्ष जवान रहता है, और द्यु ने भाइयों के साथ उसे चुरा लिया। ऋषि लौटे, गाय नहीं मिली, दिव्य दृष्टि से सब जाना, और शाप दिया कि वसु मनुष्य बनकर जन्म लेंगे। वसुओं ने विनती की, तो वसिष्ठ ने कहा, सात तो एक वर्ष में छूट जाएँगे, पर यह द्यु, जिसके कारण यह हुआ, लम्बे समय तक मनुष्यों में रहेगा। वह धर्मात्मा होगा, सब शास्त्रों का जानकार होगा, और पिता के प्रिय के लिए स्त्री-सुख त्याग देगा।

आप पहचान गए होंगे। गंगा ने सात पुत्रों को जन्म लेते ही जल में डाल दिया, और आठवाँ बचा। पाठ कहता है, वह देवव्रत कहलाया, गाङ्गेय कहलाया, और वह द्यु ही था। भीष्म। यानी जिस भीष्म के गिरने की खबर से आज यह पूरी गीता सुनाई जा रही है, वे एक कामधेनु के कारण धरती पर आए थे। और आज श्रीकृष्ण कहते हैं, गायों में वह कामधेनु मैं हूँ। जिस दूध की चाह में एक देवता ने भूल की, वह दूध भी भगवान का ही था। चाहने लायक़ चीज़ में भगवान हैं; पर उसे छीन लेने में नहीं।

और कन्दर्प, कामदेव। हमारी टीका यहाँ साफ़ है: काम का नाम यहाँ केवल नया जीवन उत्पन्न करने वाले रूप में है, उस तृष्णा के रूप में नहीं जिसे गीता तीसरे अध्याय में शत्रु कहती है। घर में नया बच्चा आए, वह आनन्द भी उसी की विभूति है। और सर्पों में वासुकि, वही जो मन्थन में रस्सी बने थे। सर्प और नाग में क्या भेद है, इस पर आचार्य अलग-अलग बोलते हैं, और तिलक ईमानदारी से कहते हैं कि यह भेद पक्का नहीं बताया जा सकता।

पर अभी एक बात बाकी है। मन्थन से जो घोड़ा निकला, उसी की पूँछ के रंग पर दो बहनों ने एक शर्त लगाई थी, और उस शर्त में एक माँ दासी बन गई। उसका बेटा आज की सूची में पक्षियों का राजा है। आइए, अगले तीन श्लोक सुनते हैं।

अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् । पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् ॥ २९ ॥
गीता 10.29 — अर्थ पढ़ें ›
प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् । मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् ॥ ३० ॥
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पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् । झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी ॥ ३१ ॥
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उनतीसवाँ श्लोक। "अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्।" नागों में मैं अनन्त हूँ, जल के प्राणियों में वरुण। "पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्।" पितरों में अर्यमा, और नियम में रखने वालों में यमराज।

अनन्त, जिन्हें शेष भी कहते हैं। मन्दर को उन्हीं ने उखाड़ा था, पर आदि पर्व में उनकी एक और कथा है। अपने भाइयों के द्वेष से दुखी होकर शेष माँ को छोड़कर केवल हवा पीकर तप करने चले गए, और जब शरीर सूखकर नसों का ढाँचा रह गया, तब ब्रह्मा ने कहा, वर माँगो। और शेष ने क्या माँगा? पाठ के शब्दों में, बस इतना कि मेरा मन धर्म में, शान्ति में और तप में रमा रहे। ब्रह्मा इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने शेष को एक काम सौंपा: यह डोलती हुई धरती, पर्वतों, वनों, समुद्रों और नगरों समेत, तुम थामे रखो। और शेष धरती के नीचे जाकर उसे अपने सिर पर धारण करते हैं। जिसने अपने लिए कुछ नहीं माँगा, केवल शान्त मन माँगा, उसी को सारी धरती का भार सौंपा गया। घर में भी सारा बोझ अक्सर उसी के कन्धों पर आता है जिसका मन शान्त हो, और वही उसे उठा भी पाता है।

फिर वरुण, जल के प्राणियों के राजा, जिनके पुत्र वसिष्ठ थे। अर्यमा, पितरों के राजा। और यमराज, नियम में रखने वालों में। मधुसूदन सरस्वती इसे खोलते हैं: जो धर्म और अधर्म का फल देकर, कृपा भी करते हैं और रोकते भी हैं। यमराज का नाम सुनकर डर लगता है, पर श्रीकृष्ण उन्हें न्याय के रूप में गिन रहे हैं। जहाँ हिसाब ठीक-ठीक होता है, वहाँ भी भगवान हैं।

अब तीसवाँ श्लोक। "प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्।" दैत्यों में मैं प्रह्लाद हूँ, गिनती करने वालों में काल। "मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्।" पशुओं में सिंह, और पक्षियों में विनता का पुत्र गरुड़।

प्रह्लाद पर हमारी टीका एक बहुत सुंदर बात कहती है: वे देवताओं के शत्रु दैत्यों में जन्मे, फिर भी महान भक्त थे; भगवान की विभूति वहाँ भी दिखती है जहाँ उसकी सबसे कम आशा हो। मधुसूदन उनके नाम में ही अर्थ देखते हैं: जो अपने सात्त्विक स्वभाव से सबको बहुत आनन्द दे, "प्र-ह्लाद"। तो अगर आपका जन्म किसी कठिन घर में हुआ, जहाँ भक्ति की बात तक नहीं होती थी, तो प्रह्लाद को याद कीजिए। कुल से विभूति नहीं रुकती। और प्रह्लाद की एक कथा, जो स्वयं धृतराष्ट्र ने कभी अपने बेटे को सुनाई थी, मैं अगले खंड में सुनाऊँगा।

"कालः कलयतामहम्", गिनती करने वालों में काल। शंकराचार्य कहते हैं, कलन यानी गणना। घड़ी, पंचांग, उम्र, सबमें सबसे बड़ा गिनने वाला समय है। फिर पशुओं में सिंह। और फिर वह, जिसका वादा पिछले खंड के अन्त में किया था।

वैनतेय, यानी विनता का बेटा, गरुड़। आदि पर्व में कथा उसी घोड़े से शुरू होती है जो मन्थन से निकला था। कद्रू और विनता दो बहनें थीं। विनता ने कहा, यह घोड़ा बिल्कुल सफ़ेद है; कद्रू ने कहा, इसकी पूँछ काली है; और शर्त लगी कि जो हारेगी, वह दासी बनेगी। और फिर रात को कद्रू ने छल करने के लिए अपने हज़ार सर्प पुत्रों से कहा, काजल जैसे काले बाल बनकर उस घोड़े की पूँछ में समा जाओ। अगले दिन घोड़ा चाँदनी जैसा सफ़ेद था, पर पूँछ पर काले बाल लटक रहे थे। विनता हार गई, और दुःख से जलती हुई दासी का जीवन जीने लगी।

फिर गरुड़ का जन्म हुआ, आग के ढेर जैसा तेज लिए। उन्होंने देखा कि उन्हें सर्पों की आज्ञा माननी पड़ती है, और माँ से पूछा, क्यों? विनता ने बताया, मैं एक ऐसी शर्त हारकर अपनी सौत की दासी बनी, जिसे सर्पों ने छल से झूठा कर दिया। गरुड़ ने सर्पों से पूछा, क्या लाकर मैं तुम्हारी दासता से छूट सकता हूँ? उन्होंने कहा, अपने बल से अमृत ले आओ।

गरुड़ गए। देवताओं ने अमृत के चारों ओर छुरे जैसी धार वाला लोहे का चक्र लगा रखा था, और दो भयंकर साँप पहरे पर थे। गरुड़ ने शरीर छोटा करके आरों के बीच से रास्ता निकाला, पहरेदारों को हराया, और अमृत लेकर उड़ गए। और अब वह पंक्ति, जिसके लिए मैंने यह पूरी कथा सुनाई। पाठ कहता है, पक्षी ने अमृत को ज़रा भी बिना पिए उठाया और निकल आया। और आकाश में विष्णु उनसे मिले, और नारायण उनके उस लोभ-रहित काम से प्रसन्न हुए। सोचिए, अमरता हाथ में थी, एक घूँट से कोई रोकने वाला नहीं था, और उन्होंने नहीं पिया, क्योंकि वह माँ को छुड़ाने के लिए लाया गया था, अपने लिए नहीं।

विष्णु ने वर देना चाहा। गरुड़ ने माँगा, मैं आपसे ऊपर रहूँ, और बिना अमृत के भी अमर रहूँ। फिर गरुड़ ने कहा, अब आप भी मुझसे कुछ माँग लीजिए। और विष्णु ने उन्हें अपना वाहन चुना, और कहा, तुम मेरे ऊपर रहोगे, मेरे ध्वज पर। रास्ते में इन्द्र ने उन पर वज्र चलाया। गरुड़ हँसे, और मीठी वाणी में बोले, मुझे कोई पीड़ा नहीं हुई, पर जिन ऋषि की हड्डी से यह वज्र बना है, उनका, इस वज्र का और आपका सम्मान करने के लिए मैं अपना एक पंख गिराता हूँ। उस सुंदर पंख को देखकर लोगों ने उनका नाम रखा, सुपर्ण। यह वही वज्र है जिसे पिछले श्लोक में श्रीकृष्ण ने अपनी विभूति कहा था, और गरुड़ ने उसके पीछे के त्याग को प्रणाम किया। फिर गरुड़ ने अमृत सर्पों के सामने कुश पर रखा और कहा, आज से मेरी माँ दासी नहीं है। और विनता छूट गईं।

पक्षियों में गरुड़ क्यों? मुझे लगता है, उस एक घड़ी के लिए, जब हाथ में अमृत था और मुँह बन्द था। जिस दिन आपके हाथ में कुछ ऐसा आए जो किसी और के लिए सौंपा गया हो, किसी का पैसा, किसी का भरोसा, किसी का राज़, और आप उसमें से एक घूँट भी न लें, उस दिन आपके भीतर भी गरुड़ उड़ता है।

और अब, इससे पहले कि हम आगे बढ़ें, एक छोटी-सी बात आपसे कहनी है। यह अध्याय एक लम्बी सूची जैसा लग सकता है, और सूची सुनते-सुनते मन कहने लगता है, ठीक है, समझ गया, भगवान सब जगह हैं। पर इस सूची का असली अर्थ आख़िरी दो श्लोकों में खुलता है, जहाँ श्रीकृष्ण स्वयं सूची को एक ओर रख देते हैं। आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। जो यहीं उठ जाए, वह गीता से बस नामों की एक सूची लेकर जाएगा, और वह नज़र नहीं ले जाएगा जिसके लिए यह सूची बोली गई। तो अगर आप यह सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की यह यात्रा बीच में न छूटे। और आज का यह सत्संग आख़िर तक सुनिए।

अब इकतीसवाँ श्लोक। "पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्।" पवित्र करने वालों में मैं वायु हूँ, शस्त्रधारियों में राम। "झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी।" जल-जन्तुओं में मगर, और नदियों में गंगा।

राम, शस्त्रधारियों में। शंकराचार्य और मधुसूदन कहते हैं, दशरथ के पुत्र राम। और मधुसूदन यहाँ एक प्रश्न का उत्तर भी देते हैं: राम तो स्वयं भगवान हैं, उन्हें विभूति में क्यों गिना? इसलिए कि उस रूप में उनका ध्यान किया जा सके। महाभारत में राम की पूरी कथा वन पर्व में है। जब जयद्रथ द्रौपदी को हर ले गया था और पाण्डव उसे छुड़ा लाए, तब युधिष्ठिर ने मार्कण्डेय मुनि से पूछा, क्या मुझसे अधिक अभागा कोई मनुष्य आपने देखा या सुना है? और उत्तर में मार्कण्डेय ने राम की कथा सुनाई, और अन्त में कहा, राम ने भी वन में बड़ा कष्ट सहा, और उनके पास तो केवल वानर और भालू मित्र थे, फिर भी उन्होंने वैदेही को लौटाया। तुम्हारे पास तो धनञ्जय और भीम जैसे भाई हैं। यानी राम की कथा महाभारत में एक दुखी आदमी को ढाढ़स देने के लिए आई।

और श्रीधर स्वामी एक दूसरा अर्थ भी देते हैं: या फिर परशुराम। उद्योग पर्व में भीष्म स्वयं बताते हैं कि परशुराम उनके गुरु थे, जिन्होंने बचपन में उन्हें धनुर्विद्या सिखाई थी, और एक दिन कुरुक्षेत्र में ही गुरु और शिष्य को आमने-सामने लड़ना पड़ा। और दोनों के बीच भीष्म की माँ गंगा आईं, पहले बेटे से विनती करती हुई, फिर गुरु से। अन्त में ऋषियों और भागीरथी के कहने पर युद्ध रुका, घायल भीष्म ने गुरु को प्रणाम किया, और परशुराम ने मुस्कुराकर कहा, धरती पर तुम्हारे जैसा कोई क्षत्रिय नहीं।

अब इस श्लोक की दूसरी पंक्ति फिर सुनिए: "स्रोतसामस्मि जाह्नवी", नदियों में मैं गंगा हूँ। यानी एक ही श्लोक में शस्त्रधारियों में राम, और नदियों में गंगा, और भीष्म के जीवन में ये दोनों एक ही मैदान पर खड़े हुए थे, एक गुरु बनकर, एक माँ बनकर। और मगर के बारे में हमारी टीका इतना ही कहती है कि यह मगरमच्छ जैसा बड़ा जल-जन्तु है, जिस पर चित्रों में गंगा विराजती हैं। गंगा के साथ उसका वाहन भी विभूति बन गया।

पर अभी एक बात बाकी है। अब तक सूची में चीज़ें थीं, प्राणी थे, लोग थे। अगले श्लोकों में श्रीकृष्ण भीतर की चीज़ों पर आते हैं: विद्या, बहस, अक्षर, और वे सात गुण जिन्हें आप शायद रोज़ अपने घर में देखते हैं पर पहचानते नहीं। आइए, सुनते हैं।

सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन । अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ॥ ३२ ॥
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अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च । अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः ॥ ३३ ॥
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मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् । कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥ ३४ ॥
गीता 10.34 — अर्थ पढ़ें ›

बत्तीसवाँ श्लोक। "सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन।" हे अर्जुन, सृष्टियों का आदि, अन्त और मध्य भी मैं ही हूँ। "अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्।" विद्याओं में अध्यात्मविद्या, और बहस करने वालों में सत्य के निर्णय के लिए होने वाला वाद।

पहली पंक्ति शायद पहले भी सुनी लगे। बीसवें श्लोक में श्रीकृष्ण ने कहा था, "अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च", मैं प्राणियों का आदि, मध्य और अन्त हूँ। तो फिर दोबारा क्यों? शंकराचार्य, मधुसूदन और तिलक तीनों एक ही उत्तर देते हैं: वहाँ बात जीवित प्राणियों की थी, यहाँ पूरी सृष्टि की है, जड़ चीज़ों की भी। पहाड़ भी, नदी भी, यह ज़मीन भी, जिस पर आप बैठे हैं। उसका बनना, टिकना और मिटना, तीनों में वही।

फिर "अध्यात्मविद्या विद्यानां"। शंकराचार्य कहते हैं, यह इसलिए प्रधान है कि यह मुक्ति देती है। बाकी विद्याएँ रोटी देती हैं, नाम देती हैं; पर जो विद्या यह बताए कि मैं कौन हूँ, उसमें भगवान सबसे साफ़ चमकते हैं।

और फिर एक बहुत काम की बात: "वादः प्रवदतामहम्"। श्रीधर स्वामी बताते हैं कि पुराने शास्त्रों में बहस तीन तरह की गिनी गई। जल्प, जिसमें दोनों छल से भी दूसरे को गिराना चाहते हैं; वितण्डा, जिसमें एक आदमी अपनी कोई बात रखता ही नहीं, बस काटता जाता है; और वाद, जो दो ऐसे लोगों में होता है जिनमें राग-द्वेष नहीं, जैसे गुरु और शिष्य, और जिसका फल है सच का पता चलना। हमारी टीका इसे एक वाक्य में कहती है: विवाद सत्य जानने के लिए भी हो सकता है, और केवल जीतने या दूसरे को गिराने के लिए भी, और केवल पहले को भगवान की विभूति कहा गया है। अब अपने घर की बहसें याद कीजिए। उनमें से कितनी सच जानने के लिए थीं, और कितनी जीतने के लिए? और एक बात देखिए: यह पूरी गीता ही एक वाद है। एक शिष्य पूछ रहा है, एक गुरु उत्तर दे रहा है, और दोनों सच चाहते हैं।

अब तैंतीसवाँ श्लोक। "अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च।" अक्षरों में मैं अकार हूँ, और समासों में द्वन्द्व। "अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः।" अक्षय काल मैं ही हूँ, और सब ओर मुख वाला, सबको धारण करने वाला भी मैं।

हमारी टीका बताती है कि संस्कृत की वर्णमाला के हर व्यंजन में "अ" की ध्वनि रहती है। श्रीधर एक श्रुति याद दिलाते हैं, कि अकार ही सारी वाणी है। "क" बोलिए, "म" बोलिए, उसके भीतर "अ" छिपा है। ऐसे ही हर चीज़ के भीतर वह छिपा है, जिसके बिना वह बोली ही नहीं जा सकती।

फिर द्वन्द्व समास। हमारी टीका कहती है, यह वह समास है जिसमें शब्द बराबर होकर जुड़ते हैं, और हर शब्द का पूरा अर्थ बना रहता है। श्रीधर स्वामी इसका उदाहरण देते हैं, "राम-कृष्ण"। दोनों बराबर, कोई किसी के नीचे नहीं। जिस रिश्ते में दो लोग इस तरह जुड़ें कि दोनों पूरे रहें, कोई किसी को मिटाए नहीं, उस जोड़ में भी भगवान हैं।

और अक्षय काल। तीसवें श्लोक में "कालः कलयतामहम्" आया था। श्रीधर स्वामी दोनों का भेद बताते हैं: वहाँ वह काल था जो आयु गिनता है, सौ बरस, जो आयु के साथ ख़त्म हो जाता है। यहाँ वह काल है जो प्रवाह की तरह बहता रहता है, जिसका कभी अन्त नहीं होता। आपकी घड़ी रुक सकती है, समय नहीं रुकता। और "धाताहं विश्वतोमुखः", शंकराचार्य कहते हैं, सबके कर्मों का फल देने वाला, जिसका मुख हर ओर है। कोई कोना ऐसा नहीं, जो उसकी नज़र से छूटा हो।

अब चौंतीसवाँ श्लोक, जो आज के सबसे प्यारे श्लोकों में से एक है। "मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्।" सबको हर लेने वाली मृत्यु मैं हूँ, और आगे होने वालों की उत्पत्ति भी मैं। "कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा।" स्त्रियों में कीर्ति, श्री, वाणी, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा मैं हूँ।

पहले मृत्यु। शंकराचार्य कहते हैं, मृत्यु दो तरह की होती है, एक धन आदि छीनने वाली, और एक प्राण छीनने वाली, और जो प्राण छीने, वही "सर्वहर" है, सब कुछ हर लेने वाली। विश्वनाथ चक्रवर्ती एक और कोमल अर्थ देते हैं: वह मृत्यु जो सब स्मृतियाँ हर ले जाती है। तेईसवें सत्संग में आपने वह कथा सुनी थी, कि जब मृत्यु को पहली बार प्राणियों को हरने का काम सौंपा गया, तो वह रो पड़ी थी। आज श्रीकृष्ण कहते हैं, वह भी मैं हूँ। और उसी साँस में कहते हैं, जो आगे होने वाले हैं, उनका जन्म भी मैं हूँ। एक ही हाथ ले जाता है, और वही हाथ लाता है। जिस घर से कोई बूढ़ा गया, उसी घर में कभी कोई बच्चा भी आता है। दोनों के पीछे एक ही है।

और अब वे सात। कीर्ति, श्री, वाणी, स्मृति, मेधा, धृति, क्षमा। हमारी टीका बताती है कि ये सातों संस्कृत में स्त्रीलिंग शब्द हैं, और हर एक की देवी के रूप में पूजा भी होती थी। और महाभारत का आदि पर्व इसकी गवाही देता है। वहाँ दक्ष प्रजापति अपनी दस कन्याएँ धर्म को देते हैं, और उनके नाम हैं: कीर्ति, लक्ष्मी, धृति, मेधा, पुष्टि, श्रद्धा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा और मति। और पाठ एक बहुत सुंदर बात कहता है: ये दस धर्म की पत्नियाँ हैं, और स्वयम्भू ने इन्हें धर्म के द्वार बनाया। यानी धर्म के घर में घुसना हो, तो इन्हीं दरवाज़ों से घुसना होगा।

अब मधुसूदन सरस्वती इन सातों को एक-एक करके खोलते हैं, और उनकी परिभाषाएँ इतनी सीधी हैं कि आप इन्हें अपने घर में ढूँढ सकते हैं। कीर्ति, यानी धर्म के कारण दूर-दूर तक फैला अच्छा नाम। श्री, यानी सम्पत्ति, या शरीर की शोभा, या कान्ति। वाणी, यानी वह बोली जो हर बात को साफ़ कर दे। स्मृति, यानी बहुत पहले अनुभव की हुई बात को याद रखने की शक्ति। मेधा, यानी बहुत-से ग्रन्थों का अर्थ धारण करने की शक्ति। धृति, यानी जब शरीर और मन थककर बैठने लगें, तब भी उन्हें थामे रखने की शक्ति। और क्षमा, यानी हर्ष में भी और विषाद में भी मन का न बिगड़ना। अब सोचिए, आपकी माँ, जो रात को तीन बार उठकर बीमार बच्चे का माथा छूती थी और सुबह फिर रसोई में खड़ी होती थी, वह धृति थी। आपकी दादी, जिन्हें पचास साल पुराने रिश्तों के नाम और तिथियाँ याद थीं, वह स्मृति थी। और घर में कोई ऐसा, जो कड़वी बात सुनकर भी चुप रह जाए और अगले दिन फिर मुस्कुराकर बोले, वह क्षमा थी। शंकराचार्य कहते हैं, इन गुणों की छाया भर से भी लोग अपने को धन्य मानते हैं। आपके घर में भगवान रोज़ आते थे; बस हमने उनका नाम नहीं लिया।

और श्री के बारे में एक कथा, जिसका वादा मैंने पिछले खंड में किया था। शान्ति पर्व में भीष्म युधिष्ठिर को बताते हैं कि जब दुर्योधन पाण्डवों की समृद्धि देखकर जल रहा था, तब धृतराष्ट्र ने उससे कहा था, बेटा, युधिष्ठिर जैसी समृद्धि चाहिए तो शीलवान बनो, शील से तीनों लोक जीते जाते हैं। और प्रमाण में धृतराष्ट्र ने प्रह्लाद की कथा सुनाई। प्रह्लाद ने शील के सहारे इन्द्र का राज्य ले लिया था। इन्द्र ब्राह्मण बनकर उनके शिष्य बने, बड़े मन से सेवा की, और प्रसन्न प्रह्लाद ने वर माँगने को कहा। ब्राह्मण ने माँगा, मुझे आपका शील चाहिए। प्रह्लाद ने दे दिया। और फिर उनके शरीर से एक-एक करके तेजस्वी रूप निकलने लगे। पहले शील, फिर धर्म, फिर सत्य, फिर सदाचार, फिर बल। और आख़िर में एक प्रभामयी देवी निकलीं, और बोलीं, मैं श्री हूँ, और मैं बल के पीछे जाती हूँ। और जाते-जाते श्री ने कहा, धर्म, सत्य, सदाचार, बल, और मैं भी, हम सबकी जड़ शील है।

और आज सञ्जय उन्हीं धृतराष्ट्र को सुना रहे हैं, "श्रीर्वाक्च नारीणां"। धृतराष्ट्र जानते थे कि श्री शील के पीछे चलती है, और शील की परिभाषा भी उन्होंने ख़ुद दी थी: कर्म, मन और वाणी से किसी से द्रोह न करना, दया और दान। जानना और जीना, दोनों अलग बातें हैं।

पर अभी एक बात बाकी है। इन सात गुणों के बाद श्रीकृष्ण महीनों और ऋतुओं की बात करते हैं, और फिर एक ऐसा शब्द बोलते हैं जिसे सुनकर धृतराष्ट्र का मन ज़रूर काँपा होगा। वह शब्द है जुआ। आइए, अगले दो श्लोक सुनते हैं।

बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् । मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः ॥ ३५ ॥
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द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् । जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम् ॥ ३६ ॥
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पैंतीसवाँ श्लोक। "बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्।" सामों में मैं बृहत्साम हूँ, और छन्दों में गायत्री। "मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः।" महीनों में मार्गशीर्ष, और ऋतुओं में फूलों की खान, वसन्त।

पिछले सत्संग में श्रीकृष्ण ने कहा था, वेदों में मैं सामवेद हूँ, वह वेद जो गाया जाता है। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, आज उसी के भीतर और भीतर जाकर बताया जा रहा है कि गाए जाने वाले सामों में भी बृहत्साम, जो इन्द्र की स्तुति का एक बड़ा गान है। और छन्दों में गायत्री। श्रीधर स्वामी कहते हैं, गायत्री इसलिए श्रेष्ठ है कि वही द्विज को दूसरा जन्म देती है, यानी जिस मन्त्र से उपनयन में जीवन की नई शुरुआत होती है। बहुत-से घरों में सुबह किसी बूढ़े की धीमी आवाज़ में वह मन्त्र गूँजता है; उस गूँज में वे हैं।

फिर महीनों में मार्गशीर्ष। हमारी टीका कहती है, यह नवम्बर-दिसम्बर में पड़ता है, जब फसल घर आ जाती है और मौसम सुहावना होता है। मधुसूदन भी कहते हैं, न बहुत ठंड न बहुत धूप। और तिलक एक ऐतिहासिक बात जोड़ते हैं: उस समय बारह महीनों की गिनती मार्गशीर्ष से ही शुरू होती थी, जैसे आजकल चैत्र से होती है, इसलिए उसे पहला स्थान मिला। और इसकी एक झलक महाभारत में भी है। आश्वमेधिक पर्व में श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को बारह द्वादशियों के उपवास बताते हैं, और उस सूची का पहला महीना मार्गशीर्ष है, जिसमें वे कहते हैं कि मुझे केशव नाम से पूजो। और परम्परा मानती है कि गीता जयन्ती भी इसी महीने में आती है। हमारी यह सत्संग-यात्रा भी धीरे-धीरे उसी की ओर बढ़ रही है।

और ऋतुओं में "कुसुमाकरः", फूलों की खान, वसन्त। जब सर्दी के बाद पहली बार पेड़ों पर नई कोंपल दिखे, सरसों के खेत पीले हो जाएँ, हवा में कोई ख़ुशबू हो जिसका स्रोत आप ढूँढ न पाएँ, तब रुकिए। श्रीकृष्ण कहते हैं, वह वसन्त मैं हूँ। आज के सत्संग का नाम, "जहाँ सुंदरता, वहाँ भगवान", ऐसी ही घड़ियों के लिए है।

अब छत्तीसवाँ श्लोक, और यहाँ सूची एक ऐसा मोड़ लेती है कि सुनने वाला चौंक जाता है। "द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्।" छल करने वालों में मैं जुआ हूँ, तेजस्वियों का तेज मैं हूँ। "जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्।" मैं विजय हूँ, मैं निश्चय हूँ, और सात्त्विक लोगों का सत्त्व मैं हूँ।

जुआ? भगवान जुआ भी हैं? हमारी टीका इस प्रश्न का सीधा उत्तर देती है, और मैं उसे लगभग वैसा ही आपके सामने रखता हूँ: यहाँ जुए की प्रशंसा नहीं है। बात यह है कि किसी भी वर्ग में, बुरे वर्ग में भी, जो सबसे प्रबल है, उसकी शक्ति भगवान से आती है; यह सूची भगवान को सब जगह देखने के लिए है, हर चीज़ को ठीक ठहराने के लिए नहीं। मधुसूदन सरस्वती भी यही कहते हैं: छल करने वालों के सब साधनों में जुआ सबसे बड़ा, क्योंकि वह आदमी का सब कुछ छीन लेता है। यानी यहाँ भगवान यह नहीं कह रहे कि जुआ अच्छा है। वे कह रहे हैं, अगर बुराई में भी कोई ताक़त दिखे, तो जानो कि ताक़त मेरी है, और बुराई उसका ग़लत इस्तेमाल।

और अब उस कमरे की कल्पना कीजिए। सञ्जय बोल रहे हैं, धृतराष्ट्र सुन रहे हैं। वही धृतराष्ट्र, जिनकी सभा में पासे फेंके गए थे, जिसमें युधिष्ठिर राज्य, भाई और द्रौपदी तक हार गए। पहले सत्संगों में आपने वह सभा देखी थी। आज उसी राजा के कानों में यह वाक्य पड़ रहा है, "द्यूतं छलयतामस्मि"। उस घड़ी उनके मन में क्या उठा, पाठ नहीं बताता। पर इतना याद रखिए कि पिछले खंड में उच्चैःश्रवा की पूँछ पर भी छल का ही एक दाँव लगा था, और उसकी कीमत एक माँ ने दासी बनकर चुकाई थी। छल का दाँव हर बार किसी निर्दोष से कीमत वसूलता है।

पर वन पर्व में जुए की एक और कथा है, जो दिखाती है कि इस श्लोक का दूसरा आधा, "जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि", पहले आधे पर कैसे भारी पड़ता है। वनवास के दिन थे, अर्जुन अस्त्र लेने इन्द्र के लोक गए हुए थे, और युधिष्ठिर दुःख में डूबे थे। तभी बृहदश्व ऋषि आए, और युधिष्ठिर ने उनसे अपना मन खोलकर कहा: छल में निपुण जुआरियों ने मुझे बुलाकर मेरा राज्य छीन लिया, मैं पासे नहीं जानता था, मेरी पत्नी सभा में लाई गई, और अब मुझे डर है कि लौटने पर वे मुझे फिर जुए के लिए बुलाएँगे, और मैं मना नहीं कर पाऊँगा। और फिर वह प्रश्न: पृथ्वी पर मुझसे अधिक अभागा कोई राजा नहीं; क्या आपने कहीं ऐसा कोई देखा या सुना है? आपने ध्यान दिया? यही प्रश्न युधिष्ठिर ने बाद में मार्कण्डेय से भी पूछा था, और उत्तर में राम की कथा आई थी। पहली बार उत्तर में नल की कथा आई।

बृहदश्व ने कहा, एक राजा था जो तुमसे भी अधिक दुखी था: निषध का राजा नल। कलि ने उसमें एक छोटी-सी भूल का मौक़ा पाकर प्रवेश किया, और फिर उसके भाई पुष्कर को उकसाया कि नल से जुआ खेलो, मैं तुम्हें जिताऊँगा। और कलि स्वयं मुख्य पासा बनकर पुष्कर के साथ चला। नल महीनों तक हारते रहे। नगर के लोग द्वार पर खड़े रहे, दमयन्ती आँसू भरी आवाज़ में कहती रहीं कि उनसे मिल लीजिए, पर कलि के वश में पड़े नल एक शब्द नहीं बोले। आख़िर सब हारकर नल दमयन्ती के साथ वन में निकल गए, और वहाँ उनसे भी बिछड़ गए।

पर कथा यहाँ ख़त्म नहीं होती। बहुत समय बाद, जब नल राजा ऋतुपर्ण के सारथि बनकर रथ हाँक रहे थे, राजा ने एक पेड़ के पत्ते और फल बिना गिने ठीक-ठीक बता दिए। नल ने रथ रोककर गिना, तो गिनती ठीक निकली। राजा ने कहा, मैं पासों का रहस्य जानता हूँ और गिनती में निपुण हूँ। नल ने बदले में घोड़ों का अपना ज्ञान देने का वचन दिया, और वह विद्या ले ली। और पाठ कहता है, जैसे ही नल ने पासों का रहस्य जाना, कलि उनके शरीर से बाहर निकल आया। जिस चीज़ में आदमी हारा था, जब उसकी समझ आ गई, तो उसका डर भी चला गया।

फिर नल लौटे और पुष्कर को फिर से खेलने को कहा। पुष्कर हँसा, अपनी जीत पक्की मानकर। और पाठ कहता है, नल ने एक ही दाँव में उसे हरा दिया। अब सुनिए कि जीतकर नल ने क्या किया, क्योंकि यही इस कथा का सबसे बड़ा क्षण है। उन्होंने पुष्कर से कहा, पहले जो मैं हारा था, वह तुमने नहीं, कलि ने किया था। दूसरे का दोष मैं तुम पर नहीं डालूँगा। तुम्हारे प्राण तुम्हें लौटाता हूँ, तुम्हारा भाग भी लौटाता हूँ, तुम मेरे भाई हो, सौ वर्ष जियो। और उन्होंने उसे बार-बार गले लगाया।

और कथा सुनाकर बृहदश्व ने युधिष्ठिर से कहा, नल ने अकेले इतना बड़ा दुःख सहा और फिर भी अच्छे दिन पाए; तुम्हारे साथ तो भाई हैं, कृष्णा है। फिर एक वाक्य, जो आज हम सबके लिए है: जब भाग्य उलटा हो जाए और प्रयत्न निष्फल हो जाए, तब भीतर के बल का सहारा लेने वाले लोग अपने को दुखी नहीं करते। और फिर बृहदश्व ने युधिष्ठिर को पासों का पूरा रहस्य दे दिया, ताकि उनका वह डर मिट जाए, और पाठ कहता है, युधिष्ठिर शोक से मुक्त हो गए।

अब श्लोक का दूसरा आधा फिर सुनिए: "जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि"। व्यवसाय का अर्थ यहाँ दुकान नहीं है। श्रीधर स्वामी इसे उद्यम कहते हैं, और मधुसूदन कहते हैं, ऐसा उद्यम जो फल से कभी न चूके। नल का वर्षों तक रथ हाँकते हुए भी हार न मानना, वह व्यवसाय था। एक ही दाँव में सब लौट आना, वह जय थी। और जीतकर भाई को गले लगाना, वह "सत्त्वं सत्त्ववतामहम्" था, सात्त्विक आदमी का सत्त्व। जुआ भी उसी सूची में है, और जय भी। पर कथा बताती है कि अन्त में जय उसी की हुई जिसने छल नहीं, धीरज रखा।

पर अभी एक बात बाकी है। अगले श्लोक में श्रीकृष्ण कुछ ऐसे नाम लेते हैं जो इसी कथा के लोग हैं: वे स्वयं, अर्जुन, और वह मुनि जिनकी कृपा से सञ्जय यह सब देख रहे हैं। आइए, सुनते हैं।

वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः । मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ॥ ३७ ॥
गीता 10.37 — अर्थ पढ़ें ›
दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् । मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ॥ ३८ ॥
गीता 10.38 — अर्थ पढ़ें ›

सैंतीसवाँ श्लोक। "वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः।" वृष्णिवंशियों में मैं वासुदेव हूँ, पाण्डवों में धनञ्जय। "मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः।" मुनियों में व्यास, और कवियों में कवि उशना, यानी शुक्राचार्य।

वृष्णियों में वासुदेव। अब यह तो वे स्वयं हैं। जो बोल रहे हैं, वही अपने को अपनी विभूति में गिन रहे हैं। और यहाँ आचार्य अलग-अलग दिशाओं में जाते हैं, और तीनों दिशाएँ सुनने लायक़ हैं। शंकराचार्य और श्रीधर स्वामी सीधा कहते हैं: यही मैं, तुम्हारा सखा, जो तुम्हें उपदेश दे रहा है। मधुसूदन जोड़ते हैं कि साक्षात् ईश्वर का नाम भी विभूतियों में इसलिए है कि उस रूप में उनका ध्यान हो सके। पर विश्वनाथ चक्रवर्ती इसे वसुदेव, यानी श्रीकृष्ण के पिता, पर ले जाते हैं, और बलदेव विद्याभूषण वसुदेव के पुत्र बलराम पर, क्योंकि उनके मत में जो स्वयं भगवान हैं, वे अपनी ही विभूति कैसे होंगे। मैं इनमें से किसी का पक्ष नहीं लूँगा। हर अर्थ में एक सुंदरता है: पहले में भगवान अपने सबसे पास वाले रूप को दिखाते हैं, दूसरे में अपने परिवार को।

और फिर "पाण्डवानां धनञ्जयः", पाण्डवों में धनञ्जय। हमारी टीका कहती है, श्रीकृष्ण जिससे बात कर रहे हैं, उसे भी अपनी विभूतियों में गिनते हैं। शंकराचार्य दो शब्द में कहते हैं, "त्वमेव", तुम ही। सोचिए अर्जुन पर क्या बीती होगी। अब तक वे सूची सुन रहे थे, हिमालय, गंगा, गरुड़, और अचानक उसमें उनका अपना नाम आ गया। "धनञ्जय" नाम क्यों पड़ा, यह आपने सातवें सत्संग में सुना था, विराट पर्व में अर्जुन की अपनी ज़ुबानी: सब जनपद जीतकर, धन के बीच खड़ा रहा, इसलिए। और आज की एक कथा से एक और धागा जुड़ता है। मन्थन के बाद, आदि पर्व कहता है, नर ने अपने बाणों से असुरों को रोके रखा, और अन्त में इन्द्र ने अमृत का वह ख़ज़ाना रक्षा के लिए मुकुटधारी नर को सौंप दिया। और उद्योग पर्व में नर को ही सव्यसाची कहा गया है। यानी जिसे कभी अमृत की रखवाली मिली थी, आज उसी के कानों में गीता का अमृत डाला जा रहा है।

फिर मुनियों में व्यास। यह वह नाम है जिसके बिना यह सत्संग ही नहीं होता। भीष्म पर्व के आरम्भ में, जब धृतराष्ट्र ने कहा कि मैं अपने कुल का वध देखना नहीं चाहता, केवल सुनना चाहता हूँ, तब व्यास ने सञ्जय को दिव्य दृष्टि दी, और कहा, युद्ध में इससे कुछ छिपा नहीं रहेगा, खुले में हो या छिपकर, मन में सोचा गया भी। और गीता के अन्त में सञ्जय स्वयं कहेंगे कि व्यास की कृपा से ही मैंने यह परम गोपनीय योग साक्षात् योगेश्वर श्रीकृष्ण से सुना। यानी आज सञ्जय एक ऐसा वाक्य सुना रहे हैं जिसमें उस मुनि का नाम है जिसने उन्हें सुनने की शक्ति दी। और याद कीजिए, तेरहवें श्लोक में अर्जुन ने भी व्यास को गवाह बताया था।

और कवियों में उशना, शुक्राचार्य, असुरों के गुरु। पिछले सत्संग में श्रीकृष्ण ने कहा था, पुरोहितों में मैं बृहस्पति हूँ, देवताओं के गुरु। आज असुरों के गुरु भी उसी सूची में आ गए। ज्ञान किसी एक पक्ष का नहीं होता। और इन दोनों गुरुओं को जोड़ने वाली एक कथा आदि पर्व में है, जो मुझे बहुत प्रिय है।

देवताओं और असुरों का युद्ध चल रहा था, और शुक्राचार्य के पास संजीवनी विद्या थी, जो मरे हुए को जीवित कर देती है। इसलिए असुर हर युद्ध के बाद फिर उठ खड़े होते, और देवता मरे ही रहते। तब देवताओं ने बृहस्पति के पुत्र कच को शुक्राचार्य के पास शिष्य बनकर भेजा। कच ने पाँच सौ वर्ष गुरु की और उनकी बेटी देवयानी की सेवा की। असुरों ने उन्हें दो बार मारा, और दोनों बार शुक्राचार्य ने उन्हें जीवित कर दिया। तीसरी बार उन्होंने कच की राख मदिरा में मिलाकर स्वयं शुक्राचार्य को पिला दी। अब जब शुक्राचार्य ने विद्या से कच को पुकारा, तो आवाज़ उनके अपने पेट से आई। कच बाहर तभी आ सकते थे जब गुरु मरें। तब शुक्राचार्य ने वहीं, अपने भीतर बैठे शिष्य को संजीवनी विद्या सिखा दी, और कहा, मेरे पुत्र बनकर निकलो, और फिर मुझे जीवित करना। कच निकले, जैसे पूर्णिमा का चाँद, और गिरे हुए गुरु को तुरन्त उठा दिया। और फिर गुरु को प्रणाम करके कहा: जो अज्ञानी के कानों में अमृत जैसी विद्या उँडेलता है, उसे मैं अपना पिता और माता मानता हूँ।

कवि, शंकराचार्य बताते हैं, वह जो दूर तक, आर-पार देखे। शुक्राचार्य ने अपने प्राण दाँव पर लगाकर वह विद्या दे दी जो उनके पक्ष की सबसे बड़ी शक्ति थी, क्योंकि एक शिष्य उनके भीतर था। सच्चा गुरु अपनी विद्या को अपनी तिजोरी नहीं मानता।

अब अड़तीसवाँ श्लोक, आज के मुख्य श्लोकों में से एक। "दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्।" दमन करने वालों का दण्ड मैं हूँ, और विजय चाहने वालों की नीति। "मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्।" गोपनीय बातों में मैं मौन हूँ, और ज्ञानियों का ज्ञान।

पहले दण्ड। श्रीधर स्वामी कहते हैं, वह दण्ड जिससे असंयमी भी संयमी बन जाते हैं। मधुसूदन कहते हैं, जो ग़लत रास्ते पर जाने वालों को सही रास्ते पर लौटाए। और महाभारत में दण्ड की सबसे साफ़ बात, आपको आश्चर्य होगा, धनञ्जय के ही मुँह से है। युद्ध के बाद, जब युधिष्ठिर राज्य छोड़कर वन जाना चाहते थे, शान्ति पर्व में अर्जुन ने उनसे कहा: दण्ड सब प्रजा पर शासन करता है, दण्ड ही रक्षा करता है, और जब सब सोते हैं, तब दण्ड जागता है। और अर्जुन इसके नाम का अर्थ भी बताते हैं: क्योंकि यह अदमित को वश में करता है, इसलिए ज्ञानी इसे दण्ड कहते हैं। श्लोक के शब्द भी यही हैं, "दण्डो दमयतामस्मि"। और एक शर्त भी जोड़ते हैं: प्रजा तब नहीं भटकती, जब नेता ठीक देखता है। माँ-बाप की डाँट, शिक्षक का अनुशासन, ठीक देखकर दिया जाए तो उसमें भी भगवान हैं; ग़ुस्से में दिया जाए तो वह दण्ड नहीं, अपना बोझ उतारना है।

फिर नीति, विजय चाहने वालों की। श्रीधर कहते हैं, साम आदि उपाय, यानी पहले समझाना, फिर देना, और ऐसे ही दूसरे सोचे-समझे रास्ते। जो जीतना चाहे, उसकी जीत का रास्ता नीति से खुलता है, ज़िद से नहीं।

और फिर वह शब्द जिस पर मैं रुकना चाहता हूँ: "मौनं चैवास्मि गुह्यानां", गोपनीयों में मैं मौन हूँ। श्रीधर स्वामी इसका कारण एक छोटे-से वाक्य में देते हैं: चुप बैठे आदमी का मन कोई नहीं जान सकता। छठे सत्संग में आपने देखा था, गीता के ठीक बाद युधिष्ठिर कवच उतारकर, रथ से उतरकर, हाथ जोड़े चुपचाप शत्रु-सेना की ओर चल पड़े थे, और भाइयों के पूछने पर भी कुछ नहीं बोले। उनके मन की बात उस मौन में सुरक्षित रही। और मधुसूदन सरस्वती मौन का एक और गहरा अर्थ देते हैं: भीतर का वह मौन, जिसमें मन आत्मा पर टिक जाता है। रोज़ की ज़िन्दगी में इसका सबसे सरल रूप है: किसी ने आपको अपना दुःख बताया, अपना राज़ बताया, और आपने उसे कहीं नहीं कहा। वह चुप्पी पूजा है।

और "ज्ञानं ज्ञानवतामहम्", ज्ञानियों का ज्ञान। मधुसूदन कहते हैं, वह ज्ञान जो सुनने, सोचने और ध्यान के पकने से जन्मे, और सारे अज्ञान को मिटा दे। कच की कथा फिर याद कीजिए। वह विद्या किताब से नहीं आई थी, गुरु के भीतर से आई थी। ज्ञानी का ज्ञान ऐसा ही होता है, उसके भीतर से निकलकर दूसरे को जीवन देता है।

पर अभी एक बात बाकी है। इतने नाम हो गए, और श्रीकृष्ण स्वयं अब कहने वाले हैं कि यह तो कुछ भी नहीं। अगले दो श्लोकों में सूची अपने को ख़ुद छोटा बताती है। आइए, सुनते हैं।

यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन । न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् ॥ ३९ ॥
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नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप । एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥ ४० ॥
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उनतालीसवाँ श्लोक। "यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन।" हे अर्जुन, सब प्राणियों का जो बीज है, वह भी मैं ही हूँ। "न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्।" चलने वाला या न चलने वाला, ऐसा कोई प्राणी नहीं जो मेरे बिना हो।

सुनिए, यहाँ सूची का स्वर बदल गया। अब तक श्रीकृष्ण कह रहे थे, इस वर्ग में सबसे अच्छा मैं, उस वर्ग में सबसे अच्छा मैं। अब वे कहते हैं, सबका बीज मैं। यानी सबसे अच्छे में ही नहीं, हर एक की जड़ में। और महाभारत अपनी शुरुआत में ही यह चित्र देता है। आदि पर्व के पहले ही अध्याय में सौति कहते हैं: जब यह संसार प्रकाश से ख़ाली था और चारों ओर अन्धकार से ढका था, तब एक विशाल अण्डा उत्पन्न हुआ, "प्रजानां बीजमव्ययम्", सब प्राणियों का अविनाशी बीज। महाभारत उसी बीज से शुरू होता है, और आज गीता उस बीज के पीछे वाले को दिखा रही है।

फिर दूसरी पंक्ति, जो बहुत गहरी है। शंकराचार्य कहते हैं, अगर कोई चीज़ मुझसे अलग की जाए, तो वह बिना आत्मा की, ख़ाली, शून्य रह जाएगी; इसलिए सब कुछ मुझसे ही बना है। रामानुज इसे बीसवें श्लोक से जोड़ते हैं, "अहमात्मा गुडाकेश", मैं सबके भीतर आत्मा बनकर बैठा हूँ, और इसीलिए कोई भी चीज़ मेरे बिना नहीं। अब इसे अपनी ओर मोड़िए। जिस दिन आप अपने को सबसे ख़ाली, सबसे अकेला महसूस करें, उस दिन यह पंक्ति याद कीजिए: "न तदस्ति विना यत्स्यान्मया", ऐसा कुछ भी नहीं जो मेरे बिना हो। आप भी नहीं। अकेलापन एक अनुभव है, सच नहीं।

अब चालीसवाँ श्लोक। "नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप।" हे परन्तप, मेरी दिव्य विभूतियों का अन्त नहीं है। "एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया।" यह जो विस्तार मैंने कहा, वह तो केवल संक्षेप से, एक झलक भर।

संत ज्ञानेश्वर यहाँ उपमाओं की झड़ी लगा देते हैं। वे कहते हैं, बारिश की धाराओं का हिसाब लिखा जा सकता है क्या? धरती पर उगने वाली घास की हर कोंपल गिनी जा सकती है क्या? समुद्र की लहरों का कोई लेखा रखा जा सकता है क्या? वैसे ही मेरी विभूतियों का कोई माप नहीं। और शंकराचार्य सीधा कहते हैं, सबकी आत्मा जो ईश्वर है, उसकी दिव्य विभूतियों की गिनती न कोई कह सकता है, न जान सकता है।

"एष तूद्देशतः प्रोक्तो", तिलक इसका अर्थ करते हैं, दिशा भर दिखाना। जैसे कोई राह पूछे, और आप उँगली उठाकर कहें, उधर। उँगली रास्ता नहीं है, रास्ता उधर है। यह सारी सूची वही उँगली है। पीपल, गंगा, गरुड़, वसन्त, ये सब उँगली हैं, और उँगली जिस ओर उठी है, वह अनन्त है।

और "परन्तप", शत्रुओं को तपाने वाले। मधुसूदन सरस्वती इस सम्बोधन को भी भीतर ले आते हैं: वे शत्रु जो अर्जुन को तपाने हैं, बाहर के नहीं, भीतर के, काम, क्रोध, लोभ। यानी अनन्त को सुनने की तैयारी वही कर सकता है जिसने भीतर के शत्रुओं को थोड़ा ठण्डा कर लिया हो।

इक्कीसवें सत्संग में आपने मार्कण्डेय मुनि की वह कथा सुनी थी, कि प्रलय के जल में उन्होंने एक बालक को देखा, और विवश होकर उसके भीतर गए, तो वहाँ पूरा संसार देखा: गंगा और यमुना, हिमालय और मेरु, समुद्र, सूर्य और चन्द्रमा से चमकता आकाश, देवता और दैत्य। वही सब, जिनके नाम इस सूची में आए। जिसके एक छोटे-से रूप में सारा संसार समा जाए, उसकी विभूतियों की सूची कोई कहाँ तक बनाए? और यहीं एक बात आपके लिए भी है। गीता आपसे यह नहीं माँगती कि आप भगवान की सारी विभूतियाँ याद कर लें। वह बस इतना माँगती है कि जो एक-दो झलकें आपको अपनी ज़िन्दगी में मिली हैं, उन्हें आप भगवान की झलक के रूप में पहचान लें। बाकी का कोई अन्त नहीं, और अन्त गिनना ज़रूरी भी नहीं।

पर अभी एक बात बाकी है। अनन्त की सूची नहीं बनती, तो फिर हम पहचानें कैसे? श्रीकृष्ण अब एक नियम देंगे, एक ऐसी कसौटी जो किसी सूची की मोहताज नहीं। और फिर एक वाक्य, जिसमें यह पूरा अध्याय समा जाता है। आइए, आज के आख़िरी दो श्लोक सुनते हैं।

यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा । तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम् ॥ ४१ ॥
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अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन । विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥ ४२ ॥
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इकतालीसवाँ श्लोक, और आज का सबसे बड़ा श्लोक। "यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।" जो-जो वस्तु ऐश्वर्य से भरी है, शोभा से भरी है, या बल से भरी है, "तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्।" उस-उसको तुम मेरे तेज के एक अंश से ही उत्पन्न जानो।

अब तक श्रीकृष्ण नाम ले रहे थे। अब वे एक नियम दे रहे हैं। हमारी टीका कहती है, यही नियम पूरी सूची को काम का बनाता है: उदाहरण कभी पूरे नहीं हो सकते, पर जहाँ भी श्रेष्ठता दिखे, मन वहाँ से सीधे उसके स्रोत पर जा सकता है। पहली पंक्ति में तीन बातें हैं। "विभूतिमत्", जिसमें ऐश्वर्य हो, कोई बड़प्पन, कोई प्रभाव। फिर "श्रीमदूर्जितमेव वा" में दो और: श्री वाला, मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, जिसमें सम्पत्ति हो, या शोभा हो, या कान्ति हो; और ऊर्जित, शंकराचार्य कहते हैं, जो उत्साह से भरा हो; श्रीधर कहते हैं, जो किसी बल या प्रभाव में बढ़ा-चढ़ा हो। यानी केवल सुंदर चेहरा नहीं। किसी का बड़ा मन भी, किसी की चमकती आँखें भी, किसी का कठिन समय में उत्साह भी।

और नीलकण्ठ इस श्लोक का सार एक वाक्य में कहते हैं, जो आज के सत्संग का नाम बन गया: संसार में जो भी अत्यन्त रमणीय है, उसे भगवान का रूप मानकर उसका ध्यान करे। जहाँ सुंदरता, वहाँ भगवान। और संत ज्ञानेश्वर इसमें एक ऐसी शर्त जोड़ते हैं जो मुझे बहुत प्यारी लगती है। वे कहते हैं, जहाँ-जहाँ सम्पत्ति और दया दोनों एक साथ आकर बसी हों, उसे मेरी विभूति जानो। केवल धन नहीं, केवल शक्ति नहीं; धन के साथ दया। जिस घर में पैसा भी हो और दरवाज़े पर आए आदमी के लिए नरमी भी, वहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं, मैं हूँ।

अब अंश शब्द पर ध्यान दीजिए, "तेजोंऽशसम्भवम्"। आदि पर्व में एक पूरा अध्याय है कि इस कथा के लोग किन-किन के अंश से जन्मे, और उसमें आज की सूची की कितनी ही बातें लौट आती हैं। पाठ कहता है, मनुष्यों में प्रतापी वासुदेव नारायण के अंश थे। महाबली बलराम शेष नाग के अंश थे, वही अनन्त, जो धरती थामे हैं। श्री का एक भाग रुक्मिणी बनकर जन्मा। द्रौपदी शची के भाग से जन्मीं। और फिर एक पंक्ति: सिद्धि और धृति नाम की दो देवियाँ पाँचों पाण्डवों की माताएँ, कुन्ती और माद्री, बनकर जन्मीं, और मति सुबल की पुत्री बनकर। सुबल की पुत्री, यानी गान्धारी, धृतराष्ट्र की अपनी पत्नी। और जिस भीष्म के लिए आज यह सब सुनाया जा रहा है, वे, आपने पहले खंड में सुना, एक वसु थे। इस अध्याय के अन्त में पाठ एक भरोसा देता है: जो प्राणियों के जन्म और लय को जानता है, वह बुद्धिमान संकटों में दुखी नहीं होता। जिस गुण को आप अपनी माँ में, जीवनसाथी में, किसी दोस्त में देखते हैं, वह किसी बड़े स्रोत का अंश है। उसे पहचानना ही उसे प्रणाम करना है।

और एक सावधानी, जो हमने जुए वाले श्लोक में सुनी थी। यह नियम हर चमकती चीज़ को ठीक ठहराने के लिए नहीं है। चमक उसकी है; उसका उपयोग हमारा है। ज्ञानेश्वर की शर्त फिर याद कीजिए: सम्पत्ति के साथ दया।

अब बयालीसवाँ श्लोक, दसवें अध्याय का अन्तिम श्लोक। "अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन।" अथवा हे अर्जुन, इतना बहुत जानने से तुम्हें क्या लेना? "विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्।" मैं इस सम्पूर्ण जगत को अपने एक अंश से धारण करके स्थित हूँ।

"अथवा"। यह शब्द सुनिए। इतनी लम्बी सूची के बाद श्रीकृष्ण मानो मुस्कुराकर कहते हैं, या फिर, छोड़ो यह सब। श्रीधर स्वामी और मधुसूदन दोनों इसका भाव खोलते हैं: इस टुकड़ों वाले ज्ञान से क्या होगा? सब जगह मुझे ही देखो। और अभिनवगुप्त एक बहुत सुंदर बात कहते हैं। वे कहते हैं, अगर सूची ही सब कुछ होती, तो कोई सोच सकता था कि बस हिमालय ही भगवान है, बाकी पहाड़ नहीं, बस गंगा ही, बाकी नदियाँ नहीं। इसीलिए सूची की शुरुआत "अहमात्मा", सबके भीतर की आत्मा से हुई थी, और इसीलिए उसका अन्त इस वाक्य से होता है, कि सब कुछ मेरे एक अंश में है। शुरू में भी सब, अन्त में भी सब; बीच की सूची तो बस आँख को साधने के लिए थी।

और "कृत्स्नमेकांशेन", सारा जगत एक अंश से। हमारी टीका कहती है, लम्बी सूची के बाद एक वाक्य में सब कह दिया गया: पूरा ब्रह्माण्ड, अपनी हर विभूति सहित, भगवान का केवल एक छोटा अंश है, और वे उससे परे भी हैं। शंकराचार्य और श्रीधर यहाँ पुरुष-सूक्त की वह बात याद दिलाते हैं, कि सारे प्राणी उसका एक पाद हैं, एक चौथाई। और रामानुज विष्णु पुराण का वह भाव लाते हैं कि यह सारी विश्व-शक्ति उसके दस-हज़ारवें के भी दस-हज़ारवें अंश में टिकी है। सोचिए। यह पूरा आकाश, ये सारे तारे, यह सारी पृथ्वी, यह सारा महाभारत, और इसमें हमारी छोटी-सी ज़िन्दगी, सब उसका एक अंश। और वह फिर भी उससे बड़ा है।

और इस अध्याय के अन्त में मधुसूदन सरस्वती अपनी टीका रोककर अपना एक श्लोक लिखते हैं, जो किसी आचार्य का नहीं, एक भक्त का मन है। उसका भाव यह है: कुछ भाग्यवान लोग अपने मन को अनन्त में रखकर बाकी सब विषयों से शान्ति पा लेते हैं; पर हे मधु के शत्रु, मेरा मन तो आपके चरण-कमलों से टपकती मकरन्द की बूँदें चखकर बार-बार मतवाला हो जाता है। और विश्वनाथ चक्रवर्ती पूरे अध्याय का सार यों कहते हैं: यह सारा विश्व श्रीकृष्ण ही है, उन्हीं की दी हुई बुद्धि से उनकी सेवा करो, और वही हैं जिनकी मिठास चखने लायक़ है।

तो आज दसवाँ अध्याय पूरा हुआ, भीष्म पर्व का चौंतीसवाँ, "विभूति योग"। तीन सत्संगों में हमने इसे सुना: पहले में भगवान ने भीतर समझ का दीया जलाया, दूसरे में अर्जुन ने पूछा, आपको कहाँ देखूँ, और आज उत्तर पूरा हुआ, कि जहाँ भी शोभा, ऐश्वर्य या बल दिखे, वहाँ, और अन्त में, सब जगह।

अब भीष्म पर्व का पैंतीसवाँ अध्याय, गीता का ग्यारहवाँ, "विश्वरूप दर्शन योग"। और वह अर्जुन के इन शब्दों से शुरू होता है: "मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम्। यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम।" दो शब्द पहचान लीजिए, क्योंकि वे आज ही आए थे: "गुह्य", जिसके बारे में श्रीकृष्ण ने कहा था कि गोपनीयों में मैं मौन हूँ, और "अध्यात्म", वह विद्या जिसे उन्होंने विद्याओं में अपना रूप बताया। आज अर्जुन ने सुना कि सारा जगत उनके एक अंश में है। जिसने यह सुन लिया, उसके मन में अब क्या उठेगा, यह अगले सत्संग में।

तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली बात। भगवान को केवल मन्दिर में मत ढूँढिए। "यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा", जहाँ भी शोभा, ऐश्वर्य या बल दिखे, वहाँ से मन को सीधे उसके स्रोत पर ले जाइए। दिन में एक बार, बस एक झलक: कोई पेड़, कोई चेहरा, कोई अच्छा काम, और मन में इतना कि यह उसी का अंश है।

दूसरी बात। विभूति आपके घर में है। धृति, जो थककर भी थामे रखे; स्मृति, जो रिश्तों को याद रखे; क्षमा, जो सुख-दुःख में न बिगड़े; और वह मौन, जो किसी का राज़ अपने भीतर रखे। इन्हें पहचानिए, और जिसमें दिखें, उसका आदर कीजिए।

तीसरी बात। चमक उसकी है, उपयोग हमारा। जुए में भी ताक़त उसी की थी, पर जीत नल की हुई, जिसने धीरज रखा और जीतकर भाई को गले लगाया। और जिस दिन आप अपने को अकेला पाएँ, याद रखिए, "न तदस्ति विना यत्स्यान्मया", कुछ भी उसके बिना नहीं है, आप भी नहीं।

आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आज, या इस हफ़्ते, आपने भगवान की कौन-सी झलक देखी? किसी पेड़ में, किसी चेहरे में, किसी के धीरज में? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।

आज आपने जो सबसे सुंदर चीज़ देखी, वह भी उसी का एक अंश थी। और जिसने उसे सुंदर देखा, वह आँख भी।

जय श्री कृष्ण।

यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा । तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम् ॥ ४१ ॥
गीता 10.41 — अर्थ पढ़ें ›

तीन बातें

  1. भगवान को केवल मन्दिर में मत ढूँढिए। "यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा", जहाँ भी शोभा, ऐश्वर्य या बल दिखे, वहाँ से मन को सीधे उसके स्रोत पर ले जाइए। दिन में एक बार, बस एक झलक: कोई पेड़, कोई चेहरा, कोई अच्छा काम, और मन में इतना कि यह उसी का अंश है।
  2. विभूति आपके घर में है। धृति, जो थककर भी थामे रखे; स्मृति, जो रिश्तों को याद रखे; क्षमा, जो सुख-दुःख में न बिगड़े; और वह मौन, जो किसी का राज़ अपने भीतर रखे। इन्हें पहचानिए, और जिसमें दिखें, उसका आदर कीजिए।
  3. चमक उसकी है, उपयोग हमारा। जुए में भी ताक़त उसी की थी, पर जीत नल की हुई, जिसने धीरज रखा और जीतकर भाई को गले लगाया। और जिस दिन आप अपने को अकेला पाएँ, याद रखिए, "न तदस्ति विना यत्स्यान्मया", कुछ भी उसके बिना नहीं है, आप भी नहीं।