‹

सत्संग २९

0:00 1:18:35

मैं आपको कहाँ देखूँ?

गीता 10.12–10.25 · 79 मिनट

हर हृदय में आत्मा; यज्ञों में जप

अर्जुन उवाच परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् । पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ॥ १२ ॥
गीता 10.12 — अर्थ पढ़ें ›
आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा । असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे ॥ १३ ॥
गीता 10.13 — अर्थ पढ़ें ›
सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव । न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः ॥ १४ ॥
गीता 10.14 — अर्थ पढ़ें ›

कभी-कभी पूजा के बाद, जब दीया जल रहा होता है और घर में धूप की हल्की-सी ख़ुशबू होती है, मन में एक बहुत सीधा-सा सवाल उठता है। हम कहते तो हैं कि भगवान हर जगह हैं। सुनते आए हैं, पढ़ते आए हैं। पर जब दिन शुरू होता है, दफ़्तर की भीड़, घर के काम, बच्चों की पढ़ाई, बूढ़े माता-पिता की दवा, तब वह "हर जगह" कहीं दिखता नहीं। और फिर लगता है कि जो हर जगह है, वह शायद कहीं भी नहीं है, कम से कम मेरे लिए तो नहीं। आज का सवाल अर्जुन का भी है, और शायद आपका भी: हे भगवान, मैं आपको कहाँ देखूँ? आपको याद करूँ, तो किस चीज़ को देखकर याद करूँ?

जय श्री कृष्ण।

आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का उनतीसवाँ सत्संग है। पहले याद कर लें कि पिछली बार हम कहाँ रुके थे। दसवाँ अध्याय शुरू हुआ था, और श्रीकृष्ण ने अर्जुन को प्रसन्न होते देखकर फिर से बोलना शुरू किया था। उन्होंने कहा था कि मेरी उत्पत्ति को न देवता जानते हैं, न महर्षि, क्योंकि मैं ही उन सबका आदि हूँ। फिर उन्होंने गिनाया कि बुद्धि, ज्ञान, क्षमा, सत्य, सुख और दुःख, भय और अभय, ये सब भाव मुझसे ही होते हैं। और फिर वे चार श्लोक आए जिन्हें बहुत लोग दसवें अध्याय का हृदय मानते हैं। "अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते", मैं सबकी उत्पत्ति का कारण हूँ, मुझसे ही सब चलता है। और जो लोग यह जानकर प्रेम से मुझे भजते हैं, जिनका मन और प्राण मुझमें लगा है, जो आपस में मेरी ही चर्चा करके सन्तुष्ट होते हैं, उन्हें मैं वह बुद्धियोग देता हूँ जिससे वे मुझ तक पहुँचते हैं। और आख़िरी बात सबसे कोमल थी: "ज्ञानदीपेन भास्वता", उन पर कृपा करने के लिए मैं स्वयं उनके भीतर बैठकर ज्ञान का दीया जलाता हूँ, और अज्ञान का अँधेरा मिटा देता हूँ।

अब सोचिए, यह सुनकर अर्जुन के मन में क्या हुआ होगा। कोई आपसे कहे कि मैं तुम्हारे भीतर दीया जलाऊँगा, तो आपके मन में पहले कृतज्ञता उठती है, और फिर एक भूख। और यही आज के श्लोकों में दिखता है। अब तक अर्जुन सुन रहे थे। अब वे बोलते हैं। और गीता में यह बहुत कम होता है कि अर्जुन किसी शंका या दुःख से नहीं, केवल प्रेम से बोलें। आपको याद रहे, यह सब सञ्जय सुना रहे हैं, हस्तिनापुर में, अन्धे राजा धृतराष्ट्र को, उस दिन जब भीष्म बाणों की शय्या पर गिर चुके हैं। महाभारत के भीष्म पर्व का चौंतीसवाँ अध्याय ही गीता का दसवाँ अध्याय है, "विभूति योग"। और आज के श्लोकों में हम पहली बार उस सूची को सुनना शुरू करेंगे जिससे इस अध्याय को यह नाम मिला।

बारहवाँ श्लोक। "अर्जुन उवाच", अर्जुन बोले। "परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्।" आप परम ब्रह्म हैं, परम धाम हैं, परम पवित्र हैं। "पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्।" सनातन दिव्य पुरुष, आदिदेव, अजन्मा, सर्वव्यापी।

हमारी टीका एक बात पहले ही बता देती है: अर्जुन की यह स्तुति यहाँ से अठारहवें श्लोक तक चलती है, और यह श्लोक और अगला श्लोक मिलकर एक ही वाक्य हैं। यानी अर्जुन एक साँस में गिनाते चले जाते हैं कि आप क्या-क्या हैं, और फिर अगले श्लोक में बताते हैं कि यह बात कहने वाले कौन-कौन हैं। एक-एक शब्द को ज़रा पास से देखिए। "परं ब्रह्म", वह सबसे बड़ा सत्य, जिससे बड़ा कुछ नहीं। "परं धाम", धाम शब्द के दो अर्थ हैं, और मधुसूदन सरस्वती दोनों देते हैं: धाम यानी आश्रय, वह घर जहाँ सब टिका है; और धाम यानी प्रकाश, वह रोशनी जिससे सब दिखता है।

और "पवित्रं परमं", परम पवित्र। यहाँ रामानुज एक बहुत सुंदर बात कहते हैं। वे कहते हैं, आप पवित्र ही नहीं, पवित्र करने वाले हैं, उसके लिए जो आपको याद करता है। याद करने वाले के पाप उससे वैसे ही नहीं चिपकते जैसे कमल के पत्ते पर पानी नहीं ठहरता।

फिर चार शब्द एक साथ। "शाश्वतं", जो सदा है। फिर दिव्य, जो अपने प्रकाश से चमकता है। श्रीधर स्वामी इसका अर्थ करते हैं, जो स्वयं-प्रकाश है, जिसे दिखाने के लिए किसी और रोशनी की ज़रूरत नहीं। फिर आदिदेव, सब देवताओं से भी पहले का देव। फिर अज, यानी अजन्मा। और "विभुम्", सर्वव्यापी, जो हर जगह फैला है। अब एक बात पर ध्यान दीजिए। अर्जुन यह सब किससे कह रहे हैं? अपने मामा के बेटे से, अपने सखा से, जो इस समय उनके रथ के घोड़ों की लगाम पकड़े बैठा है। जिसके साथ उन्होंने खाया है, घूमे हैं, एक आसन पर बैठे हैं, हँसी-मज़ाक किया है। उसी के सामने हाथ जोड़कर कह रहे हैं, आप अजन्मा हैं। यह अर्जुन के लिए आसान बात नहीं थी। आँखों के सामने जो है, उसे ही मन से परम मान लेना, यह गीता के इस अध्याय तक आकर हुआ है।

अब तेरहवाँ श्लोक। "आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा।" सब ऋषि आपको ऐसा ही कहते हैं, और देवर्षि नारद भी। "असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे।" असित, देवल और व्यास भी। और अब आप स्वयं भी मुझसे यही कहते हैं।

यहाँ अर्जुन गवाह गिना रहे हैं। जैसे कोई कहे, यह बात केवल मैं नहीं कहता, इतने बड़े-बड़े लोगों ने कही है। शंकराचार्य कहते हैं, सब ऋषि यानी वसिष्ठ जैसे ऋषि। श्रीधर स्वामी भृगु का नाम लेते हैं। और मधुसूदन सरस्वती एक सवाल उठाते हैं: जब "सब ऋषि" कह दिया, तो फिर नारद, असित-देवल और व्यास के नाम अलग से क्यों? उनका उत्तर है: क्योंकि इन ऋषियों ने यह बात अर्जुन से स्वयं, आमने-सामने कही थी। बाकी ऋषियों की बात सुनी हुई थी, इनकी बात अपने कानों से सुनी हुई। मधुसूदन यह भी बताते हैं कि देवल धौम्य के बड़े भाई थे, वही धौम्य जो वन में पाण्डवों के पुरोहित रहे। और महाभारत में असित और देवल, ये दोनों नाम एक साथ एक ही ऋषि के लिए आते हैं, असित देवल। यह असित देवल कौन थे, इसकी एक अद्भुत कथा महाभारत में है, जो आज के सबसे बड़े सवाल से जुड़ी है। वह कथा थोड़ी देर में, सत्रहवें श्लोक के साथ।

पर इन नामों को सुनकर मुझे महाभारत का एक और दृश्य याद आता है। आपको याद होगा, बाईसवें सत्संग में हमने सुना था कि युद्ध की एक रात दुर्योधन भीष्म के पास गया और पूछा कि यह वासुदेव आख़िर कौन हैं, और भीष्म ने उसे वह स्तुति सुनाई जो ब्रह्मर्षियों और देवताओं ने बहुत पहले गाई थी। आज उस दृश्य का एक नया कोना खुलता है। भीष्म ने उस रात जिन-जिन के नाम लिए, उन्हें सुनिए। उन्होंने कहा, नारद ने तुम्हें देवों के देव का भी ईश्वर कहा। भगवान् भृगु ने तुम्हें देवताओं का भी देवता कहा। द्वैपायन व्यास ने कहा, वसुओं में तुम वासुदेव हो। और असित देवल ने कहा, अव्यक्त तुम्हारे शरीर से उपजा है, और देवता भी तुमसे ही जन्मे हैं। नारद, असित देवल, व्यास। वही तीन नाम जो अर्जुन यहाँ गिना रहे हैं। गीता का यह तेरहवाँ श्लोक कोई अकेली बात नहीं है। महाभारत में यह गवाही दो बार दी गई है। एक बार अर्जुन के मुँह से, अपने सारथि के सामने। और एक बार भीष्म के मुँह से, दुर्योधन के सामने, युद्ध के बीच की एक रात में। और पाठ कहता है कि उस रात यह पवित्र कथा सुनकर दुर्योधन ने केशव का बहुत आदर किया, और पाण्डवों का भी। प्रणाम करके अपने डेरे में गया और सो गया। पर सुबह फिर वही युद्ध था।

यहीं संत ज्ञानेश्वर अर्जुन के मुँह से एक बात कहलवाते हैं जो मुझे बहुत सच लगती है। अर्जुन कहते हैं: नारद तो अक्सर हमारे पास आते थे, और यही बातें गाकर सुनाते थे। पर मैं अर्थ नहीं समझता था, बस गीत की मिठास सुनता रहता था। और फिर ज्ञानेश्वर एक उपमा देते हैं: अन्धों के गाँव में सूरज उग आए, तो उन्हें बस उसकी गरमी मिलती है, रोशनी कहाँ से मिले? और आगे अर्जुन कहते हैं, व्यासदेव स्वयं हमारे महल में आकर आपका स्वरूप बताते थे। पर वह ऐसा था जैसे अँधेरे में चिन्तामणि दिख जाए, और हम उसे कोई मामूली पत्थर समझकर छोड़ दें; जब दिन निकले, तब पहचानें कि अरे, यह तो वही मणि थी।

आप सोचिए, यही बात आज इस कथा को सुनने वाले राजा पर भी लागू होती है। व्यास ने धृतराष्ट्र के पास भी आकर बैठकर बात की थी, उन्हें दृष्टि देने की बात कही थी, और उन्होंने कहा था कि मैं देखना नहीं चाहता, बस सुनना चाहता हूँ। सञ्जय उन्हें बरसों से यही बात सुनाते आए हैं। कानों तक बात पहुँचना एक बात है। भीतर रोशनी होना दूसरी। और वह दूसरी बात, जैसा पिछले सत्संग के आख़िरी श्लोक में श्रीकृष्ण ने कहा था, उनकी कृपा से होती है, जब वे स्वयं भीतर बैठकर दीया जलाते हैं।

अब चौदहवाँ श्लोक। "सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव।" हे केशव, आप मुझसे जो कहते हैं, वह सब मैं सत्य मानता हूँ। "न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः।" हे भगवन्, आपके प्रकट होने को न देवता जानते हैं, न दानव।

यहाँ रामानुजाचार्य एक बारीक बात कहते हैं। अर्जुन कह रहे हैं, "सब सत्य मानता हूँ।" रामानुज पूछते हैं, क्या इसका अर्थ यह नहीं हो सकता कि अर्जुन बस विनम्रता से हाँ में हाँ मिला रहे हैं? और उत्तर देते हैं: नहीं। अर्जुन यह कह रहे हैं कि आपने अपने बारे में जो कहा, वह मैं प्रशंसा या बड़ाई की बात नहीं, जैसा है वैसा तथ्य मानता हूँ। हम बहुत बार भगवान की स्तुति ऐसे करते हैं जैसे किसी बड़े आदमी की तारीफ़ की जाती है। अर्जुन कह रहे हैं, यह तारीफ़ नहीं, यह सच है।

और दूसरी पंक्ति में अर्जुन वही बात लौटा रहे हैं जो श्रीकृष्ण ने इसी अध्याय के दूसरे श्लोक में कही थी: "न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः", मेरी उत्पत्ति को न देवता जानते हैं, न महर्षि। अर्जुन कहते हैं, हाँ, यह सच है, और मैं इसमें दानवों को भी जोड़ता हूँ। श्रीधर स्वामी यहाँ एक कोमल अर्थ देते हैं। वे कहते हैं, देवता यह नहीं जानते कि आपका यह प्रकट होना हम पर कृपा करने के लिए है। और दानव यह नहीं जानते कि यही प्रकट होना उन्हें रोकने के लिए है। यानी एक ही रूप, एक ही रथ पर बैठा सारथि, किसी के लिए कृपा है और किसी के लिए रोक। और दोनों में से कोई पूरा नहीं जानता कि वह कौन है।

और संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर एक बात कहते हैं जो सुनने वाले हर आदमी के लिए है। अर्जुन कहते हैं, उन ऋषियों के वचन ज्ञान के बीज थे, जो बरसों पहले मेरे हृदय की ज़मीन में गहरे गिरे थे। अब आपकी कृपा की नमी आई, तो वे अंकुर बनकर उग आए। और फिर एक उपमा: माली जान लगाकर पेड़ों को सींचता है, पर फल तभी आते हैं जब वसन्त आता है। शायद आपने भी बरसों कथाएँ सुनी हैं, घर में बड़ों से, मन्दिर में, किसी सत्संग में। और कई बार लगा होगा कि कुछ भीतर उतरा नहीं। ज्ञानेश्वर कहते हैं, घबराइए मत। बीज गिरे हुए हैं। वसन्त अपने समय पर आता है।

पर अभी एक बात बाकी है। अर्जुन ने मान लिया कि देवता भी आपको नहीं जानते। तो फिर प्रश्न उठता है: अगर कोई आपको नहीं जानता, तो आपको जानता कौन है? और मुझ जैसा साधारण आदमी, जिसकी आँखें मिट्टी की हैं, आपको कैसे जाने? आइए, अगले तीन श्लोक सुनते हैं।

स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम । भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥ १५ ॥
गीता 10.15 — अर्थ पढ़ें ›
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः । याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ॥ १६ ॥
गीता 10.16 — अर्थ पढ़ें ›
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् । केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥ १७ ॥
गीता 10.17 — अर्थ पढ़ें ›

पन्द्रहवाँ श्लोक। "स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम।" हे पुरुषोत्तम, आप स्वयं ही अपने से अपने को जानते हैं। "भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते।" हे प्राणियों को उत्पन्न करने वाले, हे प्राणियों के ईश्वर, हे देवों के देव, हे जगत् के स्वामी।

पहली पंक्ति में तीन बार एक ही बात है, और जानबूझकर है: स्वयं, अपने से, अपने को। श्रीधर स्वामी इसे खोलते हैं। वे कहते हैं, आपको आप ही जानते हैं, कोई दूसरा नहीं। और वह जानना भी आप अपने से ही जानते हैं, किसी और साधन से नहीं। हम कुछ भी जानते हैं, तो किसी सहारे से जानते हैं। आँख से देखते हैं, कान से सुनते हैं, किताब से पढ़ते हैं, गुरु से सीखते हैं। पर जो सब सहारों का सहारा है, उसे जानने के लिए उससे बाहर कोई सहारा बचता ही नहीं।

संत ज्ञानेश्वर इसे दो उपमाओं से कहते हैं। वे कहते हैं, आकाश कितना बड़ा है, यह आकाश ही जानता है। और धरती कितनी ठोस है, यह धरती ही जानती है। वैसे ही आपकी सब शक्तियों को आप ही जानते हैं, लक्ष्मीपति; वेद और दूसरी बुद्धियाँ तो बस बेकार में शोभा बढ़ाती हैं।

अब दूसरी पंक्ति, जिसमें अर्जुन एक के बाद एक चार नाम लेकर पुकारते हैं। श्रीधर स्वामी कहते हैं, अर्जुन बहुत आदर से, बार-बार सम्बोधन कर रहे हैं। और मधुसूदन सरस्वती इन चारों नामों में एक सीढ़ी देखते हैं, जो बहुत सुंदर है। "भूतभावन", सब प्राणियों को उत्पन्न करने वाले, यानी सबके पिता। पर मधुसूदन कहते हैं, पिता भी कभी-कभी केवल पिता होता है, उसकी हर बात मानी नहीं जाती; इसलिए आगे "भूतेश", सबके नियन्ता, जिनकी बात चलती है। पर नियन्ता भी हर कोई पूजा के योग्य नहीं होता; इसलिए "देवदेव", जो पूजे जाने वालों के भी पूज्य हैं। और पूज्य भी हर कोई पालने वाला नहीं होता; इसलिए "जगत्पते", जो सारे जगत् का पालन करते हैं। और मधुसूदन का निष्कर्ष यह है: आप सबके पिता हैं, सबके गुरु हैं, सबके राजा हैं। फिर पुरुषोत्तम कहलाने में कहना ही क्या।

और संत ज्ञानेश्वर यहाँ अर्जुन के मुँह से एक उपमा देते हैं, जो मुझे बहुत प्यारी है। चारों ओर समुद्र और नदियाँ भरे हुए हैं, पर चातक पक्षी के लिए वे सब सूखे हैं। चातक के लिए पानी तभी पानी है, जब बादल से एक बूँद गिरे। अर्जुन कहते हैं, गुरु तो सब जगह हैं, पर कृष्ण, हमारे लिए तो आप ही गति हो।

सोलहवाँ श्लोक। "वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः।" अपनी उन दिव्य विभूतियों को पूर्ण रूप से कहने में आप ही समर्थ हैं, "याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि", जिन विभूतियों से आप इन लोकों को व्याप्त करके स्थित हैं।

यहाँ पहली बार "विभूति" शब्द माँग बनकर आता है। विभूति यानी वह ख़ास शोभा, वह ख़ास शक्ति, जिसमें भगवान की उपस्थिति दूसरी जगहों से ज़्यादा साफ़ चमकती है। और इस श्लोक का तर्क पिछले श्लोक से निकलता है। श्रीधर स्वामी कहते हैं: जब आपको आप ही जानते हैं, कोई देवता नहीं जानता, तो आपकी विभूतियाँ बताने के योग्य भी आप ही हैं। रामानुज इसमें एक शब्द जोड़ते हैं: "आप ही उन्हें प्रकट कीजिए।" यानी अर्जुन केवल जानकारी नहीं माँग रहे। वे कह रहे हैं, अपने आप को दिखाइए। जो छिपा है, उसे आप ही खोल सकते हैं।

और अब, अगले श्लोक में उतरने से पहले, एक छोटी-सी बात आपसे कहना चाहता हूँ। आज के श्लोकों में आगे एक लम्बी सूची आएगी: आदित्यों में विष्णु, देवताओं में इन्द्र, पर्वतों में मेरु, जलाशयों में समुद्र। अकेले सुनने पर यह सूची किसी को भूगोल का पाठ लग सकती है, या ऐसा लग सकता है कि भगवान केवल बड़ी-बड़ी चीज़ों में हैं, छोटी चीज़ों में नहीं। आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। इस सूची का अर्थ उसकी पहली पंक्ति में छिपा है, जो बीसवें श्लोक में आएगी, और जिसके बिना बाकी सब अधूरा है। तो अगर आप यह सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की यह यात्रा बीच में न छूटे। और आज का यह सत्संग आख़िर तक सुनिए, क्योंकि आज के सवाल का पूरा उत्तर इसके आख़िरी हिस्सों में खुलता है।

अब सत्रहवाँ श्लोक, और यही आज का प्रश्न है। "कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्।" हे योगेश्वर, मैं सदा आपका चिन्तन करता हुआ आपको कैसे जानूँ? "केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया।" और हे भगवन्, किन-किन भावों में, किन-किन चीज़ों में, मैं आपका चिन्तन करूँ?

इस श्लोक को एक बार फिर धीरे से सुनिए, क्योंकि इसमें अर्जुन ने वह बात पूछी है जो हम सब पूछना चाहते हैं पर पूछ नहीं पाते। हमारी टीका इसे बहुत सीधे कहती है: अर्जुन यहाँ एक व्यावहारिक प्रश्न पूछ रहे हैं। वे अभी निराकार को मन में नहीं टिका सकते, इसलिए संसार में ऐसे स्थान पूछ रहे हैं जहाँ उनका चिन्तन भगवान पर टिक सके।

और देखिए, आचार्य इस प्रश्न को कितनी अलग-अलग तरह से देखते हैं। मधुसूदन सरस्वती अर्जुन के मन की बात यों कहते हैं: मैं तो बहुत मोटी बुद्धि वाला हूँ। जिसे देवता भी नहीं जान सकते, उसे मैं कैसे जानूँ? नीलकण्ठ एक और गहरी बात देखते हैं। वे कहते हैं, अर्जुन सोच रहे हैं कि इन चमड़े की आँखों से मैं आपको कैसे जानूँ? आपका पूरा रूप देखना तो बहुत दुर्लभ है। इसलिए अभी कुछ स्थानों में ही आपका चिन्तन करूँ, ताकि आगे वह पूरा रूप देखने की योग्यता आ जाए। नीलकण्ठ यहाँ ग्यारहवें अध्याय की ओर इशारा कर रहे हैं, पर वह बात अपने समय पर।

और संत ज्ञानेश्वर इस प्रश्न को एक ऐसी उलझन से खोलते हैं जो बहुत सच्ची है। अर्जुन कहते हैं: अगर मैं कहूँ कि आप ही सब कुछ हैं, तो फिर चिन्तन हो ही नहीं पाता। इसे ज़रा अपने अनुभव से मिलाइए। "भगवान सब जगह हैं", यह वाक्य सच है, पर इसे पकड़कर ध्यान नहीं होता। मन को कोई एक चीज़ चाहिए, एक चेहरा, एक नाम, एक दीया, एक नदी। इसलिए ज्ञानेश्वर के अर्जुन कहते हैं, जिन-जिन भावों में आपको सोचते हुए मुझे मेहनत न करनी पड़े, वे साफ़-साफ़ करके दे दीजिए।

अब मैं आपको वह कथा सुनाता हूँ जिसका वादा किया था। असित देवल की कथा। यह महाभारत के शल्य पर्व में है, जब युद्ध के दिनों में बलराम सरस्वती नदी के किनारे तीर्थों की यात्रा कर रहे हैं, और हर तीर्थ के साथ उसकी पुरानी कथा सुनाई जाती है। एक तीर्थ पर पहुँचकर बताया जाता है कि यहीं कभी असित देवल रहते थे।

असित देवल गृहस्थ थे, और बहुत अच्छे गृहस्थ। पाठ कहता है, वे धर्म में नित्य लगे थे, पवित्र थे, संयमी थे, कर्म, मन और वाणी से सब प्राणियों के प्रति समान थे। निन्दा और प्रशंसा उनके लिए बराबर थी, सोना और मिट्टी का ढेला बराबर। वे देवताओं और अतिथियों की सदा पूजा करते थे। एक दिन उनके आश्रम में एक मुनि आए, जैगीषव्य। योग में डूबे हुए एक भिक्षु। और वहीं रहने लगे। देवल ने उन्हें कभी किसी काम में नहीं लगाया। बस भिक्षा के समय जैगीषव्य आते, और देवल बड़े आदर और प्रेम से उनका सत्कार करते। इस तरह बरस बीत गए। बहुत बरस।

और फिर एक दिन देवल के मन में एक चिन्ता उठी। पाठ उनके मन की बात ज्यों की त्यों कहता है: "मुझे इनकी पूजा करते हुए इतने बरस हो गए, और यह आलसी भिक्षु कभी कुछ बोला ही नहीं।" यही सोचते हुए देवल, जो आकाश में चल सकते थे, कलश लेकर समुद्र पर स्नान करने गए। और समुद्र पर पहुँचकर उन्होंने देखा कि जैगीषव्य वहाँ पहले से मौजूद हैं, स्नान कर चुके हैं। देवल हैरान हुए। फिर भी स्नान किया, जप किया, जल भरा, और आश्रम लौटे। और आश्रम में घुसते ही देखा, जैगीषव्य वहीं बैठे हैं, चुपचाप, जैसे काठ के बने हों।

अब देवल ने निश्चय किया कि इस भिक्षु की परीक्षा करनी है। वे आकाश में उड़े, और पीछे-पीछे चले। और जो उन्होंने देखा, उसे सुनिए। उन्होंने जैगीषव्य को आकाश के सिद्धों से पूजे जाते देखा। फिर स्वर्ग जाते देखा। फिर पितरों के लोक में, फिर यम के लोक में, फिर सूर्य के लोक में, फिर चन्द्रमा के लोक में। एक के बाद एक यज्ञ करने वालों के लोकों में। फिर मित्र और वरुण के लोक में, आदित्यों के लोक में। और पाठ कहता है, रुद्रों, वसुओं और बृहस्पति के स्थानों को पार करते देखा। इन नामों को ज़रा याद रखिए, आदित्य, रुद्र, वसु, बृहस्पति, क्योंकि आज ही श्रीकृष्ण इन्हीं के नाम लेने वाले हैं।

और फिर, एक जगह, जैगीषव्य दिखने बन्द हो गए। देवल ने हाथ जोड़कर सिद्धों से पूछा, वे कहाँ गए? सिद्धों ने कहा, वे ब्रह्मा के उस शाश्वत लोक को गए हैं जहाँ तुम्हारी गति नहीं है। देवल ऊपर उठे, और गिर पड़े। और फिर, सब लोकों से क्रम से उतरते हुए, जब देवल अपने आश्रम में घुसे, तो देखा: जैगीषव्य वहीं बैठे हैं। जहाँ बरसों से बैठे थे।

कथा आगे बताती है कि देवल ने उसी दिन विनय से झुककर जैगीषव्य से कहा, भगवन्, मैं मोक्ष का धर्म सीखना चाहता हूँ, और जैगीषव्य ने उन्हें योग सिखाया। पर मैं आपको इस कथा का वह क्षण देना चाहता हूँ जो आज के सत्रहवें श्लोक से जुड़ता है। देवल ने उन्हें समुद्र पर ढूँढ़ा, स्वर्ग में ढूँढ़ा, सूर्य के लोक में, आदित्यों और रुद्रों के बीच ढूँढ़ा। और हर जगह वे मिले भी। पर आख़िर में जहाँ वे मिले, वह था देवल का अपना घर, जहाँ वे बरसों से चुपचाप बैठे थे, और देवल उन्हें एक आलसी भिक्षु समझते रहे।

यही असित देवल हैं जिनका नाम अर्जुन तेरहवें श्लोक में ले रहे हैं। जिन्होंने भीष्म के शब्दों में कहा था कि देवता भी तुमसे ही जन्मे हैं। और अर्जुन का प्रश्न, "केषु केषु च भावेषु", किन-किन में आपको देखूँ, उसका उत्तर श्रीकृष्ण दो तरह से देंगे। वे एक लम्बी सूची देंगे, आदित्य, रुद्र, वसु, सूर्य, चन्द्रमा, पर्वत, समुद्र। वैसे ही जैसे देवल ने जैगीषव्य को लोक-लोक में देखा। पर उस सूची से पहले वे एक बात कहेंगे, जो देवल को आख़िर में अपने ही आश्रम में मिली।

पर अभी एक बात बाकी है। अर्जुन ने अभी प्रश्न पूरा नहीं किया। उनकी एक और माँग है, और उसमें एक शब्द है जो बताता है कि वे यह सब किस मन से पूछ रहे हैं। और फिर श्रीकृष्ण बोलेंगे। आइए, अगले दो श्लोक सुनते हैं।

विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन । भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ॥ १८ ॥
गीता 10.18 — अर्थ पढ़ें ›
श्रीभगवानुवाच हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः । प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥ १९ ॥
गीता 10.19 — अर्थ पढ़ें ›

अठारहवाँ श्लोक, अर्जुन की स्तुति का आख़िरी श्लोक। "विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन।" हे जनार्दन, अपने योग और अपनी विभूति को फिर विस्तार से कहिए, "भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्", क्योंकि इस अमृत को सुनते हुए मेरी तृप्ति नहीं होती।

"भूयः", फिर से। अर्जुन यह मान रहे हैं कि यह बात पहले कही जा चुकी है। मधुसूदन सरस्वती बताते हैं कि सातवें और नौवें अध्याय में श्रीकृष्ण अपनी विभूतियाँ संक्षेप में कह चुके हैं: जल में रस मैं हूँ, सूर्य और चन्द्रमा में प्रकाश मैं हूँ, मैं ही यज्ञ, मैं ही औषधि। और इसी अध्याय के आठवें श्लोक में भी। तो फिर क्यों पूछते हैं? उत्तर इसी श्लोक की दूसरी पंक्ति में है: क्योंकि तृप्ति नहीं होती।

अब "जनार्दन" शब्द पर एक क्षण रुकिए। शंकराचार्य इसके दो अर्थ देते हैं। एक, जो दुष्ट लोगों को दण्ड देकर उनकी गति तक पहुँचाते हैं। और दूसरा, बहुत कोमल: जनों से जो याचे जाते हैं, यानी सब लोग अपनी भलाई और मोक्ष के लिए जिनसे माँगते हैं। मधुसूदन इसी दूसरे अर्थ को पकड़ते हैं और अर्जुन की ओर से कहते हैं: आप तो वे हैं जिनसे सब माँगते हैं, तो मेरा भी आपसे माँगना ठीक ही है।

और फिर आख़िरी शब्द, "मेऽमृतम्", यह अमृत। ध्यान दीजिए, अर्जुन यह नहीं कहते कि आपका वचन अमृत जैसा है। वे सीधे कहते हैं, यह अमृत है। मधुसूदन इस बात पर रुकते हैं। वे कहते हैं, "आपका वचन" शब्द छोड़कर सीधे "अमृत" कह देना, यह बताता है कि मिठास का अनुभव इतना गहरा है कि उपमा देने का धीरज भी नहीं बचा। और वे एक शब्द-चित्र देते हैं: सुनना यहाँ कानों से पीना है, और यह अमृत हर कदम पर और मीठा लगता है। रामानुज एक और प्यारी बात जोड़ते हैं: मेरी यह अतृप्ति आप जानते ही हैं। यानी अर्जुन कह रहे हैं, आपसे क्या छिपाऊँ, आप तो देख ही रहे हैं कि मेरा मन नहीं भरा।

संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर बहुत सुंदर ढंग से रुकते हैं। अर्जुन कहते हैं: हे जनार्दन, मन में यह बात मत लाइए कि यह तो कह चुका, अब फिर क्या कहूँ। साधारण अमृत को भी कोई "बस" नहीं कहता, और यह तो परम अमृत है। और फिर तीन प्रश्न: क्या सूरज बासी हो जाता है? क्या आग को जूठा कहा जा सकता है? क्या रोज़ बहने वाला गंगाजल कभी बासी कहलाता है? और अन्त में अर्जुन कहते हैं, आपके मुँह से जो निकला, उसमें हमने मानो ध्वनि को रूप लेते देखा है; आज हम चन्दन के पेड़ के फूल सूँघ रहे हैं। और ज्ञानेश्वर कहते हैं, अर्जुन की यह बात सुनकर श्रीकृष्ण सारे शरीर से झूम उठे, और मन ही मन बोले: यह तो भक्ति और ज्ञान का घर बन गया है।

अब मैं आपको महाभारत के दो क्षण दिखाना चाहता हूँ, जहाँ यही शब्द, "तृप्ति नहीं होती", किसी और के मुँह से निकले हैं।

पहला क्षण तो पूरे महाभारत का आरम्भ है। आप जानते हैं कि महाभारत हमें किसने सुनाई? व्यास के शिष्य वैशम्पायन ने, राजा जनमेजय को, जो अर्जुन के परपोते थे। और आदि पर्व में एक जगह आती है जहाँ वैशम्पायन जनमेजय को पूरी कथा संक्षेप में सुना चुके हैं। तब जनमेजय कहते हैं: हे ब्राह्मण, आपने कुरुओं का यह महान चरित सुनाया तो, पर संक्षेप में ही। अब इसे विस्तार से सुनाइए, मुझमें बहुत बड़ी उत्सुकता जाग उठी है। और फिर वह वाक्य: "न हि तृप्यामि", अपने पूर्वजों का यह महान चरित सुनते हुए मेरा मन नहीं भरता। और उसके बाद जनमेजय प्रश्न पूछते हैं: धर्म को जानने वाले पाण्डवों ने इतना कष्ट क्यों सहा? भीम ने अपना क्रोध कैसे रोका? और श्रीकृष्ण जिनके सारथि थे, उन धनञ्जय ने अकेले इतनी सेनाओं को कैसे जीत लिया? सोचिए। जो महाभारत हम आज पढ़ते हैं, लाख श्लोकों वाली, वह इसी एक "मेरा मन नहीं भरता" का उत्तर है। अगर जनमेजय संक्षेप से सन्तुष्ट हो जाते, तो शायद हमें इतना विस्तार कभी न मिलता। और वैशम्पायन उसी जगह इस ग्रन्थ के बारे में कहते हैं कि इसमें केशव का गुण गाया जाता है, और यह ग्रन्थ समुद्र और मेरु पर्वत की तरह रत्नों का भण्डार है।

दूसरा क्षण युद्ध के बाद का है। भीष्म बाणों की शय्या पर लेटे हैं, और युधिष्ठिर उनसे धर्म के एक के बाद एक प्रश्न पूछ रहे हैं। अनुशासन पर्व में एक जगह, गोदान की महिमा सुनते-सुनते, युधिष्ठिर फिर से पूछते हैं, और कहते हैं: हे वीर, ऐसा अमृत सुनते हुए मैं तृप्त नहीं होता। "अमृत", और "तृप्त नहीं होता"। लगभग वही शब्द जो अर्जुन यहाँ कह रहे हैं। और आज की कथा के सुनने वाले के लिए यह कितनी अजीब बात है। धृतराष्ट्र के सामने सञ्जय अभी यही सुना रहे हैं कि भीष्म गिर गए। धृतराष्ट्र अभी नहीं जानते कि उसी शय्या के पास बैठकर, कुछ दिनों बाद, उनका भतीजा युधिष्ठिर भीष्म से धर्म का अमृत पिएगा, और कहेगा, मेरा मन नहीं भरता।

अब यह बात अपने जीवन में देखिए। संसार की चीज़ों में अक्सर उल्टा होता है। पहली बार मिठाई खाते हैं तो बहुत अच्छी लगती है, पाँचवीं बार में मन भर जाता है। नई चीज़ ख़रीदते हैं, दो हफ़्ते में उसकी चमक उतर जाती है। पर भगवान की कथा के साथ यह नहीं होता। जो दादी रोज़ सुबह वही रामायण की चौपाइयाँ पढ़ती हैं, उनसे पूछिए, क्या ऊब होती है? वे कहेंगी, रोज़ कुछ नया सुनाई देता है। यही अर्जुन की "तृप्ति नहीं" है। यह अतृप्ति दुःख की नहीं, सुख की है। एक ऐसी भूख जो भरते-भरते बढ़ती है।

और अब श्रीकृष्ण बोलते हैं। उन्नीसवाँ श्लोक। "श्रीभगवानुवाच", श्रीभगवान बोले। "हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः।" अच्छा, मैं तुम्हें अपनी दिव्य विभूतियाँ कहूँगा, "प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे", हे कुरुश्रेष्ठ, प्रधानता से कहूँगा, क्योंकि मेरे विस्तार का अन्त नहीं है।

पहला शब्द, "हन्त"। हम अनुवाद में "अच्छा" कहते हैं, पर इस छोटे-से शब्द में बहुत कुछ है। श्रीधर स्वामी कहते हैं, "हन्त" करुणा से भरा सम्बोधन है। और मधुसूदन सरस्वती इसका अर्थ करते हैं, हाँ, ठीक है, तुमने जो माँगा वह करूँगा, घबराओ मत। यानी अर्जुन की उस लम्बी, भरे मन की स्तुति के बाद, श्रीकृष्ण पहले उनके कन्धे पर मानो हाथ रखते हैं। ठीक है, सुनाता हूँ।

संत ज्ञानेश्वर यहाँ एक ऐसा दृश्य बनाते हैं कि मन भर आता है। वे कहते हैं, अर्जुन की बात सुनकर श्रीकृष्ण को यह भी याद नहीं रहा कि मैं पितामह का भी पिता हूँ, यानी ब्रह्मा का भी जनक। वे बस बोले, बेटा पाण्डुपुत्र, बहुत अच्छा किया। और ज्ञानेश्वर कहते हैं, अर्जुन को "बेटा" कहकर पुकारने में अचरज की क्या बात? वे शरीर से नन्द के बेटे ही तो थे। जो गोकुल में बड़ा हुआ हो, उसके मुँह से लाड़ में "बेटा" निकल ही जाता है।

अब "प्राधान्यतः", प्रधानता से। यानी मैं सब नहीं गिनाऊँगा, मुख्य-मुख्य गिनाऊँगा। और कारण दूसरी पंक्ति के अन्त में है: "नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे", मेरे विस्तार का अन्त नहीं। शंकराचार्य एक वाक्य कहते हैं: पूरी विभूतियाँ सौ बरस में भी नहीं कही जा सकतीं। और रामानुज "प्राधान्य" का अर्थ बताते हैं: जो अपनी-अपनी श्रेणी में सबसे ऊँचा है। आगे की सूची इसी नियम पर चलेगी। हर समूह में से सबसे श्रेष्ठ एक, आदित्यों में एक, पर्वतों में एक, नदियों में एक।

और ज्ञानेश्वर इसके दो चित्र देते हैं, जो इस पूरी सूची को सुनने की कुंजी हैं। पहला चित्र: अपने शरीर के रोम कितने हैं, यह कोई अपने आप भी नहीं गिन सकता; मेरी विभूतियाँ वैसी ही असंख्य हैं। और दूसरा चित्र: जैसे बीज मुट्ठी में आ जाए, तो मानो पूरा पेड़ हाथ में आ गया; जैसे बगीचा हाथ लग जाए, तो फल और फूल अपने आप मिल गए। वैसे ही, ज्ञानेश्वर के श्रीकृष्ण कहते हैं, मैं जो मुख्य विभूतियाँ बताऊँगा, उन्हें जान लेने से सारा विश्व जाना हुआ हो जाता है। यानी यह सूची गिनती नहीं, बीज है। कुछ नाम, जिनके सहारे मन सब जगह पहुँच सके।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण सूची शुरू करने वाले हैं। और सूची की पहली विभूति कोई पर्वत नहीं, कोई नदी नहीं, कोई देवता नहीं। वह इतनी पास है कि हम उसे रोज़ अनदेखा कर देते हैं। आइए, अगले दो श्लोक सुनते हैं।

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः । अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥ २० ॥
गीता 10.20 — अर्थ पढ़ें ›
आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् । मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ॥ २१ ॥
गीता 10.21 — अर्थ पढ़ें ›

बीसवाँ श्लोक, और आज के सवाल का पहला और सबसे बड़ा उत्तर। "अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः।" हे गुडाकेश, मैं सब प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ। "अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च।" मैं ही प्राणियों का आदि हूँ, मध्य हूँ और अन्त हूँ।

अर्जुन ने पूछा था, आपको कहाँ देखूँ? और उत्तर का पहला शब्द है, "अहमात्मा", मैं आत्मा हूँ। किसकी? सबकी। कहाँ? "सर्वभूताशयस्थितः", सब प्राणियों के आशय में, यानी हृदय में, भीतर। हमारी टीका इस श्लोक के बारे में एक वाक्य कहती है जो पूरी सूची की चाबी है: सूची उस विभूति से आरम्भ होती है जिसमें बाकी सब आ जाती हैं; आगे वे स्थान हैं जहाँ वही उपस्थिति सबसे स्पष्ट दिखती है।

पहले सम्बोधन, "गुडाकेश"। शंकराचार्य इसके दो अर्थ देते हैं: नींद को जीतने वाला, या घने केशों वाला। मधुसूदन सरस्वती पहला अर्थ लेते हैं और कहते हैं कि यह शब्द यहाँ जानबूझकर आया है। जो नींद को जीत चुका है, उसमें ध्यान की सामर्थ्य है। और फिर मधुसूदन एक बात कहते हैं जो इस पूरे प्रसंग को समझने का रास्ता है। वे कहते हैं, सबसे पहला और मुख्य चिन्तन यही है: हर प्राणी के हृदय में जो चेतना और आनन्द से भरा आत्मा है, वह मैं हूँ। जो ऐसा ध्यान कर सकता है, उसके लिए बस इतना काफ़ी है। और जो इतना न कर सके, उसके लिए आगे की सूची है: आदित्य, सूर्य, चन्द्रमा, पर्वत, नदियाँ। शंकराचार्य भी यही कहते हैं: आत्मा के रूप में सदा मेरा ध्यान करो, और जो इसमें असमर्थ हो, वह आगे बताए भावों में मेरा चिन्तन करे।

यह बात मुझे बहुत करुणा से भरी लगती है। भगवान यह नहीं कहते कि जो भीतर नहीं देख सकता, वह बेकार है। वे कहते हैं, भीतर न देख सको, तो बाहर देखो, मैं वहाँ भी मिलूँगा। यह एक सीढ़ी है। ऊपर की सीढ़ी पर खड़े होना कठिन है, तो भगवान नीचे की सीढ़ियाँ भी अपने हाथ से बिछा देते हैं।

अब रामानुजाचार्य इस श्लोक को एक अलग कोण से देखते हैं। वे कहते हैं, जैसे आत्मा शरीर का आधार है, उसका नियन्ता है, उसका स्वामी है, वैसे ही भगवान सब प्राणियों के आत्मा हैं, और सब प्राणी मानो उनका शरीर हैं। इसलिए, रामानुज कहते हैं, जब श्रीकृष्ण कहेंगे "मैं विष्णु हूँ", "मैं सूर्य हूँ", "मैं मेरु हूँ", तो ये सब शब्द आख़िर में उन्हीं तक पहुँचते हैं जो इन सबके भीतर आत्मा बनकर बैठे हैं।

और अभिनवगुप्त यहाँ वह बात कहते हैं जो उस आधे सुने सच से बचाती है जिसकी मैंने बीच में चर्चा की थी। वे कहते हैं, यह श्लोक सबसे पहले इसलिए आया है ताकि कोई आगे की सूची को ग़लत न समझ ले। अगर यह श्लोक न होता, तो कोई सोच सकता था कि "स्थिर चीज़ों में मैं हिमालय हूँ" का अर्थ है कि भगवान केवल हिमालय में हैं, और कहीं नहीं। तब भगवान को देखने की दृष्टि टुकड़ों में बँट जाती। इसलिए पहले कहा गया, मैं सबके भीतर हूँ। और फिर कहा गया, इन-इन जगहों में मैं ख़ास तौर पर चमकता हूँ। हिमालय में भगवान का होना, आपके और मेरे भीतर उनके होने को कम नहीं करता।

संत ज्ञानेश्वर इसे आकाश की उपमा से कहते हैं। बादल के नीचे भी आकाश है, ऊपर भी, भीतर भी, बाहर भी। बादल आकाश में ही बनते हैं, आकाश में ही रहते हैं, और जब बिखरते हैं, तो आकाश ही हो जाते हैं। "अहमादिश्च मध्यं च", वैसे ही मैं प्राणियों का आदि हूँ, मध्य हूँ, अन्त हूँ। श्रीधर स्वामी इसका अर्थ करते हैं: जन्म, स्थिति और संहार, तीनों का कारण मैं हूँ।

अब ज़रा असित देवल की कथा को फिर से याद कीजिए, जो अभी सुनी थी। देवल ने जैगीषव्य को समुद्र पर देखा, स्वर्ग में देखा, सूर्य और चन्द्रमा के लोक में, आदित्यों और रुद्रों के बीच देखा। वह आगे की सूची है। और आख़िर में उन्होंने उन्हें अपने ही आश्रम में बैठा पाया, जहाँ वे बरसों से थे। वह यह बीसवाँ श्लोक है। "सर्वभूताशयस्थितः", सबके हृदय में बैठा हुआ। जिसे हम लोक-लोक में ढूँढ़ते हैं, वह हमारे अपने घर में, चुपचाप, बरसों से बैठा है।

और बीसवें सत्संग में आपने वह क्षण सुना था, जब युद्ध के बाद श्रीकृष्ण ध्यान में बैठे थे, और युधिष्ठिर के पूछने पर बोले थे: भीष्म मेरा ध्यान कर रहे हैं, इसलिए मेरा मन उनके पास चला गया। आज उस क्षण का अर्थ और खुलता है। जो सबके हृदय में बैठा है, उसे पता चल जाता है कि कौन, किस हृदय से, उसे याद कर रहा है। आप रात को अकेले में जो एक बार "हे कृष्ण" कहते हैं, वह किसी दूर बैठे देवता तक चिट्ठी की तरह नहीं जाता। वह वहीं सुना जाता है, जहाँ से बोला गया।

अब इक्कीसवाँ श्लोक, और यहाँ से सूची शुरू होती है। "आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान्।" आदित्यों में मैं विष्णु हूँ, ज्योतियों में किरणों वाला सूर्य हूँ। "मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी।" मरुतों में मैं मरीचि हूँ, और नक्षत्रों में चन्द्रमा हूँ।

हमारी टीका बताती है कि आदित्य अदिति के बारह पुत्र हैं, जिनमें एक का नाम विष्णु है, और मरुत पवन के देवता हैं। और यह भी, कि आगे हर समूह में जिसका नाम लिया गया है, वह उस समूह का प्रधान या सबसे श्रेष्ठ है। श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती दोनों कहते हैं कि आदित्यों में विष्णु का अर्थ वामन भी है, वह अवतार जो अदिति के पुत्र बनकर आए थे। और श्रीधर मरुतों के सात गणों के नाम भी गिनाते हैं: आवह, प्रवह, विवह, परावह, उद्वह, संवह और परिवह। हवा, जो कहीं से उठती है, कहीं ले जाती है, कहीं से लौटती है।

"ज्योतिषां रविरंशुमान्", जितनी भी चीज़ें रोशनी देती हैं, उनमें किरणों वाला सूर्य। नीलकण्ठ इसका एक बहुत जीवित चित्र देते हैं: गर्मी की दोपहर का वह तेज़ सूरज, जो सबसे ज़्यादा तपता है। और दसवें सत्संग में आपने सुना था कि वन में धौम्य ने युधिष्ठिर को समझाया था: सूर्य जल को खींचता है और बरसाता है, और चन्द्रमा सूर्य का तेज लेकर पौधों को उगाता है; इसलिए अन्न सूर्य से आता है। आज वही दोनों, सूर्य और चन्द्रमा, एक ही श्लोक में भगवान की विभूति बनकर आ गए।

और "नक्षत्राणामहं शशी" पर रामानुज एक छोटी-सी बारीकी पकड़ते हैं। चन्द्रमा नक्षत्रों में से एक नक्षत्र तो है नहीं। तो उसे नक्षत्रों में श्रेष्ठ कैसे कहें? रामानुज कहते हैं, यहाँ अर्थ है, नक्षत्रों का स्वामी जो चन्द्रमा है, वह मैं हूँ। अब आज रात, अगर आसमान साफ़ हो, तो छत पर जाकर एक बार देखिए। हज़ारों तारे, और उनके बीच एक चन्द्रमा। और मन में बस इतना कहिए, यह भी आप हैं। बस इतना। यही वह चिन्तन है जो अर्जुन ने माँगा था, "केषु केषु च भावेषु", किन-किन चीज़ों में।

पर अभी एक बात बाकी है। अगले श्लोकों में भगवान आकाश से उतरकर बहुत पास आ जाएँगे, हमारे अपने मन तक। और फिर एक पर्वत का नाम लेंगे, जिसका वर्णन सञ्जय इसी राजा को पहले भी सुना चुके थे। आइए, अगले दो श्लोक सुनते हैं।

वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः । इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ॥ २२ ॥
गीता 10.22 — अर्थ पढ़ें ›
रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् । वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् ॥ २३ ॥
गीता 10.23 — अर्थ पढ़ें ›

बाईसवाँ श्लोक। "वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः।" वेदों में मैं सामवेद हूँ, देवताओं में इन्द्र हूँ। "इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना।" इन्द्रियों में मैं मन हूँ, और प्राणियों में चेतना हूँ।

पहली बात सुनकर बहुत लोग चौंकते हैं। वेद तो चार हैं, और आम तौर पर सबसे पहले ऋग्वेद का नाम लिया जाता है, गीता के नौवें अध्याय में भी। तो यहाँ सामवेद ही क्यों? हमारी टीका इसका उत्तर एक वाक्य में देती है: सामवेद वह वेद है जो गान के रूप में गाया जाता है। मधुसूदन सरस्वती और नीलकण्ठ दोनों यही कारण देते हैं: गान की मिठास के कारण सामवेद सबसे रमणीय है। और लोकमान्य तिलक इस पर लम्बा विचार करके एक सीधी बात कहते हैं। वे कहते हैं, कुछ लोगों ने इस पर बड़ी-बड़ी कल्पनाएँ दौड़ाईं, पर इतनी दूर जाने की ज़रूरत नहीं। भक्ति के मार्ग में भगवान की गाई हुई स्तुति को सदा सबसे ऊपर रखा गया है। इसलिए गान-प्रधान वेद को यहाँ श्रेष्ठ कहा गया।

आप सोचिए, इस सत्संग का हर हिस्सा गाए हुए श्लोकों से शुरू होता है। कोई बात पढ़ी जाए, तो बुद्धि तक पहुँचती है। वही बात गाई जाए, तो कहीं और गहरे उतरती है। भगवान ने वेदों में से उसी को चुना जो गाया जाता है।

"देवानामस्मि वासवः", देवताओं में इन्द्र। मधुसूदन कहते हैं, क्योंकि इन्द्र सब देवताओं के राजा हैं। और भीष्म ने दुर्योधन को जो ऋषियों की स्तुति सुनाई थी, उसमें व्यास के ये शब्द भी थे: तुमने ही इन्द्र को देवताओं का राजा बनाया। यानी इन्द्र की जो चमक है, वह उनकी अपनी नहीं, दी हुई है।

और अब वह बात, जो मुझे इस श्लोक में सबसे ज़्यादा छूती है। "इन्द्रियाणां मनश्चास्मि", इन्द्रियों में मैं मन हूँ। नीलकण्ठ कहते हैं, मन इसलिए श्रेष्ठ है क्योंकि वही बाकी इन्द्रियों को चलाता है। अब याद कीजिए, बीसवें सत्संग में अर्जुन ने इसी मन के बारे में क्या कहा था: "चञ्चलं हि मनः कृष्ण", हे कृष्ण, मन बहुत चंचल है, इसे रोकना हवा को रोकने जैसा कठिन है। और आज वही श्रीकृष्ण कहते हैं, इन्द्रियों में मन मैं हूँ। वह मन जिससे आप लड़ते रहते हैं, जो पूजा में बैठते ही कहीं और भाग जाता है, वह भी उन्हीं की विभूति है। उसकी शक्ति उन्हीं की शक्ति है। जो मन बिखर सकता है, वही मन जब किसी एक पर टिकता है, तो सबसे गहरे तक ले जाता है। इसलिए मन से नफ़रत मत कीजिए। वह आपका शत्रु बनकर पैदा नहीं हुआ।

और "भूतानामस्मि चेतना", प्राणियों में चेतना। श्रीधर स्वामी इसे ज्ञान की शक्ति कहते हैं। और रामानुज एक बारीकी बताते हैं: यहाँ "प्राणियों में श्रेष्ठ" का अर्थ नहीं, बल्कि "प्राणियों की" चेतना। हर जीव में जो जानने वाला है, जो देखता है कि मैं हूँ, वह रोशनी उन्हीं की है। एक चींटी में भी।

तेईसवाँ श्लोक। "रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्।" रुद्रों में मैं शंकर हूँ, यक्षों और राक्षसों में धन का स्वामी कुबेर हूँ। "वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्।" वसुओं में मैं अग्नि हूँ, और शिखर वाले पर्वतों में सुमेरु हूँ।

शंकराचार्य संख्याएँ बताते हैं: ग्यारह रुद्र, और आठ वसु। संत ज्ञानेश्वर "शङ्करश्चास्मि" पर कहते हैं: सब रुद्रों में जो शंकर हैं, कामदेव के शत्रु, वह मैं हूँ, इसमें कोई भ्रम मत रखना। और कुबेर के बारे में वे एक प्यारा शब्द जोड़ते हैं: यक्षों में वह धनवान, जो शम्भु का सखा है। एक ही श्लोक में श्रीकृष्ण शंकर को भी अपना कहते हैं, और शंकर के मित्र को भी।

और अब मेरु। आपको याद रहे, जो सञ्जय आज धृतराष्ट्र को यह सुना रहे हैं, उन्होंने इसी भीष्म पर्व के शुरू में, युद्ध से पहले, इसी राजा को मेरु पर्वत का वर्णन सुनाया था। धृतराष्ट्र ने पूछा था कि पृथ्वी के बारे में विस्तार से बताओ, और सञ्जय ने बताया था: बीच में सोने का गोल पर्वत मेरु है, जो उगते सूरज जैसा, बिना धुएँ की आग जैसा चमकता है। ज्योतियों में श्रेष्ठ सूर्य उसकी परिक्रमा करता है, चन्द्रमा और नक्षत्र भी। वहाँ ब्रह्मा, रुद्र और इन्द्र यज्ञ करते हैं, नारद वहाँ स्तुति गाते हैं, कुबेर को वहीं से धन का भाग मिलता है, और पशुपति उमा के साथ वहीं रहते हैं। सुनिए, उस एक वर्णन में आज की कितनी विभूतियाँ इकट्ठी हैं: सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र, रुद्र, इन्द्र, कुबेर, नारद। सब मेरु पर।

और सञ्जय ने उसी वर्णन में एक छोटी-सी बात कही थी। सुमुख नाम का एक पक्षी था। मेरु पर उसने देखा कि वहाँ के कौए भी सोने जैसे चमकते हैं। और उसने सोचा, यह मेरु तो ऊँचे, बीच के और नीचे पक्षियों में कोई भेद ही नहीं करता, इसलिए मैं इसे छोड़ता हूँ। सोचिए, जो पर्वत अपने पास आए हर पक्षी को सोने का बना दे, कौए को भी, उसे वह पक्षी इसीलिए छोड़ गया कि वह भेद नहीं करता। उसे अपनी बड़ाई चाहिए थी, बराबरी नहीं। सत्ताईसवें सत्संग में हमने सुना था, "समोऽहं सर्वभूतेषु", मैं सबमें सम हूँ। जो मेरु सबको सोना बना दे, वह भगवान की विभूति न हो, तो क्या हो।

पर इन नामों के साथ महाभारत का एक और दृश्य जुड़ा है, जो बहुत सोचने लायक है। युद्ध से पहले, जब सेनाएँ सज रही थीं, दुर्योधन सब राजाओं के साथ हाथ जोड़कर भीष्म के पास गया और बोला, बिना सेनापति के बड़ी से बड़ी सेना भी युद्ध में वैसे ही बिखर जाती है जैसे चींटियों का बिल। आप हमारे सेनापति बनिए। और फिर उसने भीष्म की प्रशंसा में जो कहा, उसे सुनिए: आप हमारे लिए वैसे हों जैसे चमकने वालों में सूर्य, जैसे पौधों के लिए चन्द्रमा, यक्षों में कुबेर, देवताओं में इन्द्र। जैसे पर्वतों में मेरु, देवताओं में कुमार कार्तिकेय, और वसुओं में अग्नि। आप हमारे आगे-आगे चलिए, जैसे कार्तिकेय देवताओं के आगे चलते हैं।

सुना आपने? सूर्य, चन्द्रमा, कुबेर, इन्द्र, मेरु, अग्नि, कार्तिकेय। लगभग वही सूची, जो श्रीकृष्ण आज अर्जुन को सुना रहे हैं। दुर्योधन ने भगवान की विभूतियों की सूची उठाकर भीष्म पर चढ़ा दी। और भीष्म ने हाँ तो कहा, पर एक बात साथ में कही, जो कम लोग याद रखते हैं: जैसे तुम मेरे हो, वैसे ही पाण्डव भी मेरे हैं। फिर विधि से अभिषेक हुआ, नगाड़े और शंख बजे।

और आज, जब सञ्जय यह अध्याय सुना रहे हैं, वही सेनापति बाणों की शय्या पर लेटा है। मैं इसमें दुर्योधन की निन्दा नहीं ढूँढ़ रहा। भीष्म सचमुच महान थे। उनका तेज सचमुच सूर्य जैसा था। पर गीता इसी अध्याय के आगे के श्लोकों में बताएगी कि जहाँ भी कोई तेज दिखे, वह किसका अंश है। दुर्योधन ने सूर्य का भरोसा किया, सूर्य को चमक देने वाले का नहीं। मेरु का सहारा लिया, मेरु को खड़ा करने वाले का नहीं। और वह जिसकी ये सब विभूतियाँ थीं, उस दिन दूसरी ओर, पाण्डवों के बीच, अर्जुन का सारथि बनने का वचन देकर बैठा था।

हम भी कई बार यही करते हैं। किसी बड़े आदमी पर, किसी नौकरी पर, किसी बैंक के खाते पर, किसी एक रिश्ते पर इतना भरोसा टिका देते हैं, मानो वही सूर्य हो, वही मेरु। वे अच्छे हैं, उनका सहारा भी ठीक है। पर उनकी चमक उधार की है। जिस दिन वह सहारा गिरता है, उस दिन बहुत टूटन होती है। और जिसने चमक के पीछे देखने वाले को पहचाना हो, वह गिरते सहारे के बीच भी खड़ा रहता है।

पर अभी एक बात बाकी है। दुर्योधन ने कहा था, आप वैसे आगे चलिए जैसे कार्तिकेय देवताओं के आगे चलते हैं। अगले श्लोक में श्रीकृष्ण कहेंगे, सेनापतियों में मैं स्कन्द हूँ। तो वह असली अभिषेक कैसा था, जिसकी यह नकल थी? और फिर वह विभूति आएगी जिसके लिए न सामग्री चाहिए, न सेना। आइए, आज के आख़िरी दो श्लोक सुनते हैं।

पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् । सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः ॥ २४ ॥
गीता 10.24 — अर्थ पढ़ें ›
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् । यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥ २५ ॥
गीता 10.25 — अर्थ पढ़ें ›

चौबीसवाँ श्लोक। "पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्।" हे पार्थ, पुरोहितों में मुख्य बृहस्पति मुझे जानो। "सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः।" सेनापतियों में मैं स्कन्द हूँ, और जलाशयों में समुद्र हूँ।

हमारी टीका बताती है कि बृहस्पति देवताओं के पुरोहित हैं, और स्कन्द देवताओं की सेना के सेनापति। शंकराचार्य कहते हैं, बृहस्पति इसलिए मुख्य हैं क्योंकि वे इन्द्र के पुरोहित हैं, और जो सबसे बड़े राजा का पुरोहित हो, वही पुरोहितों में मुख्य। और "सरसामस्मि सागरः" पर मधुसूदन सरस्वती याद दिलाते हैं कि सागर नाम ही सगर के पुत्रों से जुड़ा है। सगर और उनके साठ हज़ार पुत्रों की कथा आप बीसवें सत्संग में सुन चुके हैं।

अब वह अभिषेक, जिसकी बात पिछले हिस्से के अन्त में अधूरी छोड़ी थी। वैशम्पायन स्वयं जनमेजय से कहते हैं कि कार्तिकेय के जन्म की कथा भी महाभारत में है, और शल्य पर्व में, बलराम की उसी तीर्थ-यात्रा के प्रसंग में, वह कथा आती है। शिव का तेज पहले अग्नि में गिरा, पर अग्नि उसे सँभाल न सके। ब्रह्मा के कहने पर उन्होंने उसे गंगा में रखा। गंगा भी उसे धारण न कर सकीं और उन्होंने उसे हिमालय पर छोड़ दिया। वहाँ सरकण्डों के झुरमुट में एक बालक बढ़ा, और पाठ कहता है, जहाँ वह गर्भ गिरा था, वह सारा पर्वत सोने का हो गया और मेरु की तरह चमकने लगा। कृत्तिकाओं ने उसे देखा, और हर एक ने पुकारा, "यह मेरा है!" और बालक ने छह मुखों से उन सबका दूध पिया। और फिर पाठ कहता है, बृहस्पति ने उसके जन्म के संस्कार किए।

और फिर एक दृश्य आता है जो मुझे बहुत प्यारा लगता है। बालक कुमार शिव के पास जा रहा था, और उसे आते देखकर चार जनों के मन में एक साथ एक ही विचार आया: शिव के मन में, पार्वती के मन में, गंगा के मन में और अग्नि के मन में। "यह बालक आदर से पहले किसके पास जाएगा? क्या मेरे पास?" और पाठ कहता है, उन चारों के मन की बात जानकर, कुमार ने योग से एक साथ चार रूप बना लिए, और चारों के पास एक साथ पहुँच गया। मुझे इसमें आज के बीसवें श्लोक की एक झलक दिखती है। जिसे जो-जो प्रेम से चाहता है, वह उस-उसके पास पहुँचता है, एक ही क्षण में, बिना किसी को छोटा किए।

और फिर अभिषेक। पाठ कहता है, बृहस्पति ने सब सामग्री जुटाकर अग्नि में विधि से आहुति दी। कुमार को हिमालय के दिए हुए रत्नों से जड़े आसन पर बिठाया गया। और फिर जो आए, उनकी सूची सुनिए: इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, रुद्र, वसु, आदित्य, मरुत; भृगु और अङ्गिरा जैसे ऋषि; समुद्र, सरोवर, नदियाँ; हिमालय, विन्ध्य और मेरु; और काल, यम और मृत्यु भी। सरस्वती के पवित्र जल से भरे सोने के कलशों से, प्रसन्न देवताओं ने कुमार का सेनापति पद पर अभिषेक किया।

अब इसे पिछले दृश्य के साथ रखकर देखिए। एक अभिषेक में दुर्योधन ने भीष्म को शब्दों में सूर्य, मेरु और कार्तिकेय कहा। दूसरे में सूर्य, मेरु, हिमालय, समुद्र, रुद्र और वसु सचमुच स्वयं आकर एक सेनापति के चारों ओर खड़े हुए, और बृहस्पति ने आहुति दी। और आज श्रीकृष्ण कहते हैं, उस पूरी सभा में जो पुरोहित था, वह मैं हूँ; जो सेनापति था, वह मैं हूँ; जो समुद्र उस सभा में आया, वह मैं हूँ। यानी जहाँ इतनी सारी विभूतियाँ एक साथ इकट्ठी हों, वहाँ उन सबमें वही एक है।

अब आज का आख़िरी श्लोक, पच्चीसवाँ। "महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्।" महर्षियों में मैं भृगु हूँ, वाणियों में एक अक्षर, ॐ हूँ। "यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः।" यज्ञों में मैं जपयज्ञ हूँ, और स्थिर रहने वालों में हिमालय हूँ।

भृगु। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, महर्षियों में भृगु इसलिए, क्योंकि वे सबसे अधिक तेजस्वी हैं। और महाभारत के आदि पर्व में सौति बताते हैं कि भृगु वरुण के यज्ञ में अग्नि से उत्पन्न हुए थे। अभी पिछले श्लोक में सुना था, "वसूनां पावकश्चास्मि", वसुओं में मैं अग्नि हूँ; और उसी अग्नि से जन्मे भृगु भी उनकी विभूति। आज के पहले हिस्से में आपने यह भी सुना था कि भीष्म की सुनाई स्तुति में भृगु ने इन्हें देवताओं का भी देवता कहा था। यानी जो ऋषि उनकी गवाही देता है, वह भी उन्हीं का रूप है।

"गिरामस्म्येकमक्षरम्", वाणियों में एक अक्षर। हमारी टीका कहती है, यह एक अक्षर ॐ है, और आठवें अध्याय की ओर इशारा करती है, जिसे आपने तेईसवें सत्संग में सुना था: "ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्", ॐ इस एक अक्षर का उच्चारण करते हुए, मुझे याद करते हुए जो शरीर छोड़ता है, वह परम गति पाता है।

और अब वह बात, जो आज के सवाल का आख़िरी और सबसे व्यावहारिक उत्तर है। "यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि", यज्ञों में मैं जपयज्ञ हूँ। हमारी टीका इसका कारण बहुत सीधे शब्दों में देती है: पवित्र नाम या मन्त्र का जप यज्ञों में सबसे श्रेष्ठ है, क्योंकि उसमें न कोई सामग्री चाहिए, न किसी को कष्ट होता है। मधुसूदन सरस्वती और नीलकण्ठ भी यही कहते हैं: जप में किसी की हिंसा नहीं होती, और वह सबसे अधिक शुद्ध करता है। और लोकमान्य तिलक बताते हैं कि वैदिक कर्मकाण्ड में अग्नि में आहुति वाले यज्ञ को उत्तम माना जाता था, पर भक्ति के मार्ग में नाम-यज्ञ या जप-यज्ञ का महत्व सबसे बड़ा है, इसीलिए गीता यह कहती है।

संत ज्ञानेश्वर तो यहाँ जैसे खिल उठते हैं। वे कहते हैं, नाम-जप का यज्ञ परम है। स्नान और दूसरे कर्मकाण्ड के नियम उसे बाधा नहीं दे सकते। नाम से धर्म और अधर्म दोनों पवित्र हो जाते हैं, और वेदों के अर्थ के अनुसार नाम ही परब्रह्म है।

चौबीसवें सत्संग में आपने उस जापक की कथा सुनी थी, जो हिमालय की तलहटी में बरसों जप करता रहा, और जब सावित्री स्वयं प्रसन्न होकर प्रकट हुईं, तब भी वह चुप रहकर जप ही करता रहा, और बस यही माँगा कि मेरा मन जप में रमे। आज उस कथा का अर्थ और साफ़ होता है। उसने वर में भी वही माँगा जो स्वयं भगवान की विभूति थी।

अब इसे अपने जीवन पर रखिए। अर्जुन ने पूछा था, आपको कहाँ देखूँ? हम सब मेरु पर नहीं जा सकते, हिमालय हर किसी के पास नहीं, समुद्र भी रोज़ नहीं दिखता। पर नाम हर समय, हर जगह साथ है। बस में बैठे हुए, अस्पताल के गलियारे में इन्तज़ार करते हुए, रसोई में आटा गूँधते हुए, रात को नींद न आए तब। न कोई सामग्री, न कोई दिखावा, न किसी का नुक़सान। एक नाम, धीरे से, मन में। भगवान कहते हैं, वह यज्ञ मैं हूँ।

और आख़िर में, "स्थावराणां हिमालयः", जो स्थिर रहते हैं, उनमें हिमालय। मधुसूदन सरस्वती एक सवाल का उत्तर देते हैं: मेरु भी पर्वत है, हिमालय भी, फिर दोनों क्यों? वे कहते हैं, मेरु ऊँचाई के लिए है, हिमालय स्थिरता के लिए। और नौवें सत्संग में आपने सुना था कि जब सञ्जय धृतराष्ट्र को भीष्म के गिरने की खबर देने आए, तो उन्होंने भीष्म का वर्णन कैसे किया था: वीरता में इन्द्र जैसे, स्थिरता में हिमालय जैसे, गहराई में समुद्र जैसे। इन्द्र, हिमालय, समुद्र। आज के ही श्लोकों के तीन नाम। सञ्जय उस दिन जिस महान आदमी के गिरने की खबर लाए थे, उसकी हर ख़ूबी भगवान की ही विभूति थी। जो भीष्म में स्थिर था, वह हिमालय में भी स्थिर है, और वह कहीं नहीं गिरा।

तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली बात। भगवान को ढूँढ़ने की पहली जगह आपका अपना भीतर है। "अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः।" देवल ने जिसे सब लोकों में ढूँढ़ा, वह उनके अपने आश्रम में बरसों से चुपचाप बैठा था। और जो भीतर न देख सके, उसके लिए भगवान ने बाहर की सीढ़ियाँ भी बिछा दी हैं।

दूसरी बात। जहाँ भी कुछ चमके, उसकी चमक के पीछे देखिए। सूरज, चन्द्रमा, मेरु, समुद्र, और कोई महान आदमी भी। दुर्योधन ने भीष्म को सूर्य और मेरु कहा, पर भरोसा चमक पर किया, चमकाने वाले पर नहीं। अपने सहारों का आदर कीजिए, पर अपना पूरा भार उसी पर रखिए जिससे उनमें चमक आती है।

तीसरी बात। सबसे सरल यज्ञ सबसे बड़ा है। "यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि।" न सामग्री, न ख़र्च, न किसी को कष्ट। आज से दिन में बस कुछ बार, किसी भी काम के बीच, एक बार उनका नाम। और अर्जुन की तरह, सुनते-सुनते मन न भरे, तो समझिए कि रास्ता ठीक है।

अगले सत्संग में श्रीकृष्ण यह सूची आगे बढ़ाएँगे, और उसका पहला श्लोक इन शब्दों से शुरू होता है: "अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः।" सब वृक्षों में पीपल, और देवर्षियों में वही नारद, जिनका नाम अर्जुन ने आज गवाही में लिया था। उसकी बात अगले सत्संग में।

आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आपको भगवान सबसे ज़्यादा कहाँ याद आते हैं? किसी नदी के किनारे, किसी पहाड़ पर, माँ के चेहरे में, या किसी नाम में जो आप बचपन से जपते आए हैं? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।

अर्जुन ने पूछा था, मैं आपको कहाँ देखूँ? और पहला उत्तर यही था: जहाँ से तुम पूछ रहे हो, वहीं।

जय श्री कृष्ण।

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः । अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥ २० ॥
गीता 10.20 — अर्थ पढ़ें ›

तीन बातें

  1. भगवान को ढूँढ़ने की पहली जगह आपका अपना भीतर है। "अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः।" देवल ने जिसे सब लोकों में ढूँढ़ा, वह उनके अपने आश्रम में बरसों से चुपचाप बैठा था। और जो भीतर न देख सके, उसके लिए भगवान ने बाहर की सीढ़ियाँ भी बिछा दी हैं।
  2. जहाँ भी कुछ चमके, उसकी चमक के पीछे देखिए। सूरज, चन्द्रमा, मेरु, समुद्र, और कोई महान आदमी भी। दुर्योधन ने भीष्म को सूर्य और मेरु कहा, पर भरोसा चमक पर किया, चमकाने वाले पर नहीं। अपने सहारों का आदर कीजिए, पर अपना पूरा भार उसी पर रखिए जिससे उनमें चमक आती है।
  3. सबसे सरल यज्ञ सबसे बड़ा है। "यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि।" न सामग्री, न ख़र्च, न किसी को कष्ट। आज से दिन में बस कुछ बार, किसी भी काम के बीच, एक बार उनका नाम। और अर्जुन की तरह, सुनते-सुनते मन न भरे, तो समझिए कि रास्ता ठीक है।