भगवान खुद समझ का दीया जलाते हैं
गीता 10.1–10.11 · 79 मिनट
भगवान को महसूस कैसे करें
श्रीभगवानुवाच
भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः ।
यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ॥ १ ॥
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः ।
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ॥ २ ॥
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।
असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ३ ॥
आपने कभी मन्दिर में, या घर के छोटे-से पूजा के कोने में, आँखें बन्द करके यह चाहा है कि बस एक बार यह महसूस हो जाए कि भगवान सचमुच हैं, यहीं हैं, मेरे पास हैं? हम दीया जलाते हैं, आरती गाते हैं, पाठ करते हैं, और फिर भी कई बार भीतर कुछ नहीं होता, जैसे किसी बन्द दरवाज़े पर दस्तक दी हो और उधर से कोई आवाज़ न आई हो। भगवान को महसूस कैसे करें? आज का सवाल यही है। और आज के श्लोकों का उत्तर सुनकर आप शायद चौंकेंगे, क्योंकि उत्तर यह है कि समझ का वह दीया हमें अपने बल से नहीं जलाना पड़ता। भगवान उसे खुद जलाते हैं।
जय श्री कृष्ण।
आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का अट्ठाईसवाँ सत्संग है, और आज हम गीता के एक नए अध्याय का दरवाज़ा खोल रहे हैं। पहले याद कर लें कि पिछली बार हम कहाँ रुके थे। पिछले सत्संग में नौवाँ अध्याय पूरा हुआ था। श्रीकृष्ण ने कहा था, "पत्रं पुष्पं फलं तोयं", एक पत्ता, एक फूल, एक फल, थोड़ा जल, जो प्रेम से दे, उसे मैं स्वीकार करता हूँ। फिर वह भरोसा, कि बहुत बुरे आचरण वाला भी अगर अनन्य भाव से मुड़ जाए, तो उसे साधु ही मानना चाहिए, क्योंकि उसका निश्चय सही है; और वह वचन जो हमने दोबारा गाकर विदा ली थी, कि मेरा भक्त नष्ट नहीं होता। और अध्याय के अन्त में वह छोटा-सा पूरा मार्ग: "मन्मना भव मद्भक्तो", मन मुझमें लगाओ, मेरे भक्त बनो।
और जाते-जाते मैंने आपसे एक शब्द पर ध्यान देने को कहा था। दसवें अध्याय के पहले ही श्लोक का एक शब्द, "प्रीयमाणाय", तुम जो प्रसन्न हो रहे हो। मैंने कहा था, मानो नौवें अध्याय की बातें सुनते हुए श्रीकृष्ण ने अर्जुन के चेहरे पर कुछ खिलते देख लिया हो। आज वहीं से शुरू करेंगे।
और आपको याद रहे, यह सब हमें सञ्जय सुना रहे हैं, हस्तिनापुर में, अन्धे राजा धृतराष्ट्र को, उस दिन जब भीष्म बाणों की शय्या पर गिर चुके हैं। महाभारत के भीष्म पर्व का चौंतीसवाँ अध्याय ही गीता का दसवाँ अध्याय है, और उसका नाम है "विभूति योग"। विभूति यानी भगवान का फैलाव, वे जगहें और रूप जिनमें उनकी झलक दिखती है। इस अध्याय के आगे के हिस्से में श्रीकृष्ण एक लम्बी सूची देंगे कि मुझे कहाँ-कहाँ देखो। पर उस सूची से पहले, आज के इन ग्यारह श्लोकों में, वे यह बताते हैं कि देखने वाली आँख कहाँ से आती है।
पहला श्लोक। श्रीकृष्ण कहते हैं, "भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः।" हे महाबाहो, फिर से मेरा परम वचन सुनो। "यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया", जो मैं तुम्हारे हित की इच्छा से तुमसे कहूँगा, क्योंकि तुम सुनकर प्रसन्न हो रहे हो।
इस श्लोक के हर शब्द में एक बात छिपी है। पहला शब्द है "भूय एव", फिर से। श्रीधर स्वामी याद दिलाते हैं कि सातवें, आठवें और नौवें अध्याय में भगवान अपनी विभूतियाँ थोड़े में बता चुके हैं। सातवें में कहा था, "रसोऽहमप्सु कौन्तेय", जल में मैं रस हूँ। नौवें में कहा था, मैं ही यज्ञ हूँ, मैं ही औषधि हूँ। अब दसवें में वही बात फैलाकर कही जाएगी, और श्रीधर उसका कारण भी बताते हैं: ताकि हर जगह ईश्वर को देखने की दृष्टि बने। अभिनवगुप्त भी यही कहते हैं कि इस अध्याय में कोई नई बात नहीं जुड़ती, पहले नौ अध्यायों की बात ही और साफ़ की जाती है।
पर ध्यान दीजिए, इस बार अर्जुन ने कुछ नहीं पूछा। तीसरा, पाँचवाँ, आठवाँ अध्याय, ये सब अर्जुन के किसी प्रश्न से खुले थे। यहाँ अर्जुन चुप बैठे सुन रहे हैं, और श्रीकृष्ण अपने आप बोल पड़ते हैं। क्यों? उत्तर अगले शब्द में है: "प्रीयमाणाय"। शंकराचार्य, मधुसूदन सरस्वती और नीलकण्ठ, तीनों इसका एक ही चित्र देते हैं: तुम मेरे वचन ऐसे पी रहे हो जैसे कोई अमृत पी रहा हो। बोलने वाले ने सुनने वाले के चेहरे पर आनन्द देखा, और बात अपने आप आगे बढ़ गई।
संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर भगवान के मन की बात बड़े प्यार से खोलते हैं। वे कहते हैं, घड़े में पहले थोड़ा-सा पानी डालते हैं, यह देखने के लिए कि वह रिसता तो नहीं। अगर नहीं रिसता, तो उसे ऊपर तक भर देते हैं। अर्जुन, मैंने अब तक जो कहा, उसमें मैंने तुम्हारा ध्यान परख लिया; अब तुम पूरे भरे जाने लायक हो। फिर वे कहते हैं, किसान हर साल खेत बोता है, और जितनी फ़सल बढ़ती दिखती है, उतना ही बोने से थकता नहीं। सुनार सोने को बार-बार आग में डालता है, क्योंकि हर बार उसकी चमक बढ़ती है। और फिर ज्ञानेश्वर एक ऐसी बात कहते हैं जो मुझे बहुत प्यारी लगती है। माँ छोटे बच्चे को गहने पहनाती है। बच्चे को क्या पता कि वह कितना सुंदर लग रहा है? पर उस सजावट का सुख माँ की आँखें भोगती हैं। ज्ञानेश्वर के श्रीकृष्ण कहते हैं, अर्जुन, यह मैं तुम पर कोई उपकार नहीं कर रहा। तुम्हारा जितना भला होता है, उतना मेरा सुख दुगना होता है। मैं अपने ही सुख के लिए फिर से बोल रहा हूँ।
और अब "हितकाम्यया", तुम्हारे हित की इच्छा से। रामानुजाचार्य बताते हैं कि यह कौन-सा हित है: तुम्हारे भीतर भक्ति पैदा हो और बढ़ती जाए। बस यही हित है जिसके लिए भगवान फिर से बोल रहे हैं। और "महाबाहो", बड़ी भुजाओं वाले। विश्वनाथ चक्रवर्ती इस सम्बोधन में एक इशारा देखते हैं: अर्जुन, जैसे तुमने अपनी भुजाओं का बल सबसे बढ़कर दिखाया है, वैसे ही अब बुद्धि का बल भी दिखाओ, इस बात को पूरा पकड़ने में।
इसे अपनी ज़िंदगी में देखिए। कभी आपने किसी बच्चे को कहानी सुनाई है, और उसकी आँखें चमकने लगीं, और वह बोला, "और सुनाओ"? या किसी अध्यापक को देखा है, जो क्लास में एक भी बच्चे की आँख में समझ जागती देख ले तो अपने आप और खुलकर पढ़ाने लगता है? भगवान के साथ भी ऐसा ही है। सुनने वाले का आनन्द, बोलने वाले को और बुलवाता है। तो अगर आप आज इस सत्संग को मन से सुन रहे हैं, तो एक तरह से आप भी उसी जगह बैठे हैं जहाँ अर्जुन बैठे थे।
और इसी "फिर से" का एक सुंदर मेल महाभारत में भी है, और वह भी उसी सञ्जय के मुँह से जो आज हमें गीता सुना रहे हैं। पिछले सत्संग में हमने उद्योग पर्व का वह दृश्य देखा था जहाँ धृतराष्ट्र सञ्जय से पूछते हैं कि तुम माधव को कैसे जानते हो, और सञ्जय उत्तर देते हैं, "मायां न सेवे", मैं छल का सहारा नहीं लेता, भक्ति से मैंने शुद्ध मन पाया है। उसके ठीक बाद, अगले अध्याय में, धृतराष्ट्र कहते हैं, "भूयो मे पुण्डरीकाक्षं सञ्जयाचक्ष्व पृच्छतः।" सञ्जय, मैं पूछ रहा हूँ, मुझे फिर से कमलनयन के बारे में बताओ, उनके नामों और कर्मों का अर्थ बताओ, ताकि मैं पुरुषोत्तम को पा सकूँ। वही "भूयः", फिर से। एक फ़र्क़ के साथ। वहाँ सुनने वाला माँग रहा है, यहाँ बोलने वाला अपने आप दे रहा है।
और सञ्जय का उत्तर आज के दूसरे श्लोक की सबसे अच्छी भूमिका है। सञ्जय कहते हैं, मैंने वासुदेव के नामों का पवित्र अर्थ सुना है; उसमें से जितना मैं जानता हूँ, उतना बताता हूँ, क्योंकि केशव की कोई माप नहीं है। अब यह दूसरा श्लोक सुनिए।
"न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः।" मेरी उत्पत्ति को न देवताओं के समूह जानते हैं, न महर्षि। "अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः", क्योंकि मैं हर तरह से देवताओं का भी आदि हूँ और महर्षियों का भी।
हमारी टीका इसका कारण एक सीधे वाक्य में देती है: जो बाद में आया, वह अपने से पहले को नहीं देख सकता। देवता और ऋषि उन्हीं से हुए, इसलिए उनका ज्ञान उनसे पीछे नहीं पहुँच सकता। नीलकण्ठ इसे और साफ़ करते हैं। वे कहते हैं, देवताओं को भी बुद्धि शरीर मिलने के बाद मिली। जो बुद्धि बाद में बनी, वह अपने जन्म से पहले की बात कैसे नाप ले?
और यहाँ संत ज्ञानेश्वर ऐसे चित्र देते हैं कि बात दिल में उतर जाती है। वे कहते हैं, माँ के पेट में जो बच्चा है, वह अपनी माँ की उम्र नहीं जान सकता। पानी की मछली समुद्र को नाप नहीं सकती। मच्छर आकाश को लाँघ नहीं सकता। वैसे ही, ज्ञानेश्वर के भगवान कहते हैं, देवता और महर्षि मुझसे ही बने हैं, तो वे मुझे पूरा कैसे जानें? कल्प के कल्प बीत गए यह तय करते-करते कि मैं कौन हूँ, कितना हूँ, कब से हूँ।
शंकराचार्य "प्रभवं" शब्द के दो अर्थ देते हैं, और दोनों सुंदर हैं। एक, उत्पत्ति: कोई नहीं जानता कि वे कहाँ से आए, क्योंकि वे कहीं से नहीं आए। दूसरा, प्रभाव: कोई नहीं जानता कि उनकी शक्ति कितनी है। और श्रीधर स्वामी एक छोटी-सी बात जोड़ते हैं, जिसे आज के सत्संग के अन्त तक याद रखिए: उनकी कृपा के बिना उन्हें कोई नहीं जानता।
अब ज़रा इस श्लोक को उस मन के साथ रखिए जिसने आज का सवाल पूछा था। आप सोचते हैं, मैं भगवान को महसूस क्यों नहीं कर पाता, ज़रूर मुझमें कोई कमी है। पर यह श्लोक कहता है कि देवता भी उन्हें पूरा नहीं जानते, महर्षि भी नहीं। तो अगर आपको वे पूरे पकड़ में नहीं आते, तो यह आपकी हार नहीं है। यह उनकी बात का स्वभाव है। नापने की कोशिश से वे नहीं मिलते। आज के आख़िरी श्लोकों में हम देखेंगे कि वे फिर मिलते कैसे हैं। रास्ता हमारी ओर से नहीं, उनकी ओर से खुलता है।
अब तीसरा श्लोक। "यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्।" जो मुझे अजन्मा, अनादि और लोकों का महान ईश्वर जानता है, "असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते", वह मनुष्यों में मोह से रहित है, और सब पापों से छूट जाता है।
तीन शब्द हैं, अज, अनादि और लोकमहेश्वर। शंकराचार्य पहले दो को जोड़ते हैं: क्योंकि वे सबके आदि हैं, इसलिए उनका कोई आदि नहीं; और जिसका कोई आदि नहीं, वह जन्मा ही नहीं, इसलिए अजन्मा। अब सञ्जय की ओर लौटिए। धृतराष्ट्र को नाम समझाते हुए सञ्जय ने एक नाम का यही अर्थ बताया था। वे कहते हैं, ये किसी पिता से जन्म नहीं लेते, इसलिए इन्हें "अज" कहते हैं, अजन्मा। और आगे कहते हैं, वे अव्यक्त भी हैं और व्यक्त भी, सबके उद्गम भी हैं और सबके लय भी, और सदा सब कुछ जानते हैं। सोचिए, जिस आदमी ने युद्ध से पहले राजा को ये नाम समझाए थे, वही आज उसी राजा को श्रीकृष्ण के अपने मुँह से वही बात सुना रहा है।
अब वह शब्द जिस पर रामानुजाचार्य बहुत रुकते हैं: "असम्मूढः", जो मोह में नहीं है। कौन-सा मोह? रामानुज कहते हैं, भगवान को बाक़ी सबके जैसा समझ लेना। संसार में एक राजा भी मनुष्य ही होता है, जिसे किसी कर्म के कारण राज्य मिल गया। देवताओं का राजा भी वैसा ही है, किसी पुण्य से उस पद पर पहुँचा। भगवान वैसे ईश्वर नहीं हैं, जो पहले कुछ और थे और फिर ऊपर उठ गए। वे किसी पद पर पहुँचे हुए नहीं हैं; वे स्वभाव से ही सबके स्वामी हैं। जो यह भेद समझ ले, वह "असम्मूढः" है।
रामानुज "अज" और "अनादि" में भी एक बारीक फ़र्क़ बताते हैं। जो जीव मुक्त हो गया, वह भी आगे से जन्म नहीं लेगा। पर उसकी मुक्ति की एक शुरुआत थी; पहले वह बँधा था। भगवान की स्वतन्त्रता की कोई शुरुआत नहीं है। वे कभी बँधे ही नहीं थे। इसलिए अजन्मा भी, और अनादि भी।
और इस ज्ञान का फल? "सर्वपापैः प्रमुच्यते", सब पापों से छूट जाता है। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, जानबूझकर किए हुए पाप भी। संत ज्ञानेश्वर इसका एक बहुत सुंदर चित्र देते हैं। वे कहते हैं, जो मुझे ऐसे जान लेता है, वह मनुष्यों में वैसा है जैसे पत्थरों में पारस। और पाप उसे अपने आप छोड़ देते हैं, जैसे चन्दन के पेड़ में आग लगे तो उससे लिपटे साँप अपने आप उतरकर भाग जाते हैं।
और एक बात सोचने लायक है। महाभारत अपने पहले ही अध्याय में, कथा शुरू करने से पहले, नारायण को प्रणाम करता है, और वहाँ भी उन्हें यही कहा गया है: अजन्मा, सर्वव्यापी, आदि और ईश्वर। सञ्जय ने धृतराष्ट्र को इतना सब बताया, और धृतराष्ट्र ने सुना भी। पर जैसा हमने पिछली बार देखा था, उसी दिन जब धृतराष्ट्र ने दुर्योधन से केशव की शरण में जाने को कहा, तो बेटे ने साफ़ मना कर दिया, और पिता उसे रोक नहीं पाए। नाम सुन लेना एक बात है, "असम्मूढः" हो जाना दूसरी। मोह से छूटना केवल जानकारी से नहीं होता।
तो अपने लिए इस श्लोक से क्या लें? बस इतना कि जिनके आगे हम दीया जलाते हैं, वे किसी दफ़्तर के बड़े अफ़सर जैसे नहीं हैं, जिन्हें खुश करना पड़े ताकि काम निकल जाए। वे वह हैं जिनसे सब कुछ निकला है, मैं भी, मेरी पूजा भी, और मेरी यह चाह भी कि उन्हें महसूस करूँ। जो इतना भी भीतर बैठा ले, उसके मन का बोझ हल्का होने लगता है।
पर अभी एक बात बाकी है। "लोकमहेश्वर", लोकों का महान ईश्वर, यह बात सुनने में बहुत बड़ी और बहुत दूर की लगती है, आकाश की, देवताओं की। अगले दो श्लोकों में श्रीकृष्ण इसे उठाकर सीधे हमारे मन के भीतर रख देते हैं, हमारी समझ में, हमारे धीरज में, और हमारे डर में भी। आइए, सुनते हैं।
बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः ।
सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ॥ ४ ॥
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः ।
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥ ५ ॥
ये दोनों श्लोक मिलकर एक ही वाक्य हैं, हमारी टीका यही कहती है। पहले श्लोक में एक लम्बी सूची शुरू होती है, और दूसरे श्लोक के अन्त में जाकर क्रिया आती है। तो पहले पूरी सूची एक साथ सुन लेते हैं, फिर एक-एक शब्द पर रुकेंगे।
"बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः।" बुद्धि, ज्ञान, मोह का न होना, क्षमा, सत्य, इन्द्रियों का संयम और मन का संयम। "सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च", सुख और दुःख, होना और न होना, भय और अभय भी। "अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः", अहिंसा, समता, सन्तोष, तप, दान, यश और अपयश। "भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः", प्राणियों के ये अलग-अलग तरह के भाव मुझसे ही होते हैं।
पिछले श्लोक में भगवान ने कहा था कि वे "लोकमहेश्वर" हैं, लोकों के महान ईश्वर। श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती दोनों कहते हैं कि ये श्लोक उसी बात को खोल रहे हैं। पर देखिए, खोलने के लिए भगवान ने आकाश, सूर्य, समुद्र की बात नहीं की। उन्होंने हमारे मन की बात की। मैं लोकों का ईश्वर कैसे हूँ? ऐसे कि तुम्हारे भीतर जो कुछ उठता है, वह मुझसे उठता है।
अब एक-एक शब्द। "बुद्धि", शंकराचार्य कहते हैं, बारीक बात को समझ पाने की ताक़त; श्रीधर कहते हैं, सार और असार को अलग कर पाने की कुशलता। "ज्ञान", अपने आप को और चीज़ों को जैसा वे हैं, वैसा जानना। और फिर मोह का न होना, जिसे आचार्य असंमोह कहते हैं; यह बहुत काम का शब्द है। शंकराचार्य इसका अर्थ बताते हैं: जब कोई बात अचानक सामने आ खड़ी हो, तब सोच-समझकर उसमें उतरना। श्रीधर एक शब्द में कहते हैं: घबराहट का न होना। सोचिए, रात के दो बजे घर में किसी की तबीयत अचानक बिगड़ जाए। एक आदमी हाथ-पैर छोड़ देता है, दूसरा शान्त होकर गाड़ी निकालता है, डॉक्टर को फ़ोन करता है, ज़रूरी काग़ज़ उठाता है। वह दूसरा आदमी डरा नहीं है, ऐसा नहीं। पर उसकी समझ डर में डूबी नहीं। वही असम्मोह है।
"क्षमा", और इसकी जो परिभाषा शंकराचार्य देते हैं, उसे एक बार सुनकर भूलना कठिन है: कोई गाली दे, या मार भी दे, तब भी मन का न बिगड़ना। रामानुज कहते हैं, मन को बिगाड़ने का कारण सामने हो, फिर भी मन का न बिगड़ना। "सत्य", जैसा देखा, जैसा सुना, वैसा ही कहना, ताकि वही बात सुनने वाले के मन में उतरे। और रामानुज इसमें एक शर्त और जोड़ते हैं: वह वचन प्राणियों के हित वाला भी हो। फिर "दम" और "शम", दो भाई। दम यानी बाहर की इन्द्रियों को रोकना, आँख, जीभ, कान को। शम यानी भीतर के मन को शान्त करना।
और अब सूची अचानक मुड़ जाती है। "सुखं दुःखं", सुख भी, दुःख भी। "भवोऽभावो", होना भी, न होना भी। रामानुज यहाँ एक बहुत मनुष्य-जैसी बात कहते हैं। वे कहते हैं, भव का अर्थ है अच्छे अनुभव से मन का खिल उठना, और अभाव का अर्थ है बुरे अनुभव से मन का बैठ जाना। हम सब यह जानते हैं, सुबह कोई अच्छी ख़बर आई तो मन खिल गया, दोपहर कोई कड़वी बात सुनी तो मन बैठ गया। और "भयं चाभयमेव च", भय भी, अभय भी। रामानुज भय की परिभाषा ऐसी देते हैं जो आज के डॉक्टर भी मान लें: आगे आने वाले दुःख का कारण सामने दिख जाए, तो उससे जो दुःख अभी हो, वही भय है। रिपोर्ट अभी आई नहीं, पर उसका इंतज़ार ही डरा रहा है। और अभय, उस डर का हट जाना।
और अब, अगले श्लोक में उतरने से पहले, एक छोटी-सी बात आपसे कहना चाहता हूँ। अभी आपने जो सुना, उसे अकेले सुनकर कोई चौंक सकता है। भगवान कह रहे हैं कि सुख ही नहीं, दुःख भी मुझसे; अभय ही नहीं, भय भी मुझसे; और अगले श्लोक में, यश ही नहीं, अपयश भी मुझसे। आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। कोई इतना सुनकर उठ जाए, तो सोच सकता है कि भगवान ही मेरे दुःख के ज़िम्मेदार हैं, या मेरी हर गलती उन्हीं की है। इसका उत्तर इस श्लोक के अन्त में है, और फिर आज के आख़िरी श्लोकों में भगवान बताएँगे कि वे अपने भक्त के भीतर क्या करते हैं। तो अगर आप यह सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की यह यात्रा बीच में न छूटे। और आज का यह सत्संग आख़िर तक सुनिए, क्योंकि आज का सबसे बड़ा भरोसा अभी आना बाकी है।
तो पाँचवाँ श्लोक। "अहिंसा", शंकराचार्य कहते हैं, किसी प्राणी को पीड़ा न देना। "समता", श्रीधर कहते हैं, राग-द्वेष से खाली मन, जो मित्र और शत्रु के बीच एक-सा रहे। "तुष्टि", सन्तोष, और मधुसूदन सरस्वती इसकी जो परिभाषा देते हैं, वह किसी भी घर की दीवार पर लिखी जा सकती है: भोगों के बारे में यह भाव कि "इतना बहुत है"। "तप", शरीर और इन्द्रियों को शास्त्र के बताए ढंग से साधना। "दान", शंकराचार्य कहते हैं, अपनी शक्ति के अनुसार बाँटना। और फिर "यशोऽयशः", यश भी और अपयश भी।
अब हमारी टीका की बात सुनिए, जो इस सूची की कुंजी है: सूची में जानबूझकर विपरीत जोड़े रखे गए हैं। अच्छा और बुरा दोनों एक ही स्रोत से आते हैं; अनुभव में कुछ भी उनसे बाहर नहीं। श्रीधर स्वामी भी कहते हैं, ये सब भाव, और इनके उलटे भाव भी, सब मुझसे ही होते हैं।
तो फिर वह प्रश्न जो अभी मैंने रखा था: क्या मेरे बुरे भाव भी भगवान की गलती हैं? शंकराचार्य इस श्लोक की टीका के अन्त में तीन छोटे शब्द रखते हैं, जो उत्तर हैं: "स्वकर्मानुरूपेण", अपने-अपने कर्मों के अनुसार। भाव सबके उन्हीं से निकलते हैं, पर किसमें कौन-सा भाव खिलता है, यह उसके अपने कर्मों से तय होता है। और संत ज्ञानेश्वर इसका एक चित्र देते हैं जो सब साफ़ कर देता है। वे कहते हैं, उजाला भी सूर्य के कारण है और अँधेरा भी सूर्य के कारण। सूर्य उगे तो उजाला दिखता है, डूबे तो अँधेरा। सूर्य ने अँधेरा बनाया नहीं, पर उसका होना भी सूर्य के आने-जाने से ही नापा जाता है। फिर ज्ञानेश्वर कहते हैं, कोई मुझे जानता है, कोई नहीं जानता; यह जानना या न जानना प्राणियों के अपने भाग्य का काम है, इसलिए भाव सबमें बराबर नहीं उगते।
और नीलकण्ठ इस श्लोक से एक बहुत व्यावहारिक नतीजा निकालते हैं। वे कहते हैं, ये बीसों भाव मुझसे ही होते हैं, इसलिए अच्छे गुण पाने हों, तो मेरी ही शरण लेनी चाहिए। यह बात रुककर सोचने लायक है। हम अक्सर क्षमा को, धीरज को, सन्तोष को, अपनी मेहनत का माल समझते हैं, कि मैं अभ्यास करूँगा और धीरे-धीरे क्षमाशील बन जाऊँगा। अभ्यास ज़रूरी है। पर यह श्लोक कहता है कि क्षमा भी उन्हीं की है। तो जब किसी को माफ़ करना बहुत कठिन लगे, तो केवल दाँत भींचकर कोशिश मत कीजिए। उनसे माँगिए भी।
अब महाभारत की ओर चलते हैं, क्योंकि इस सूची की एक गूँज वहाँ भी सुनाई देती है। युद्ध ख़त्म हो चुका है। युधिष्ठिर राजा बन गए हैं, पर उनका मन टूटा हुआ है। शान्ति पर्व में वे व्यास से कहते हैं, आज न यह राज्य मुझे अच्छा लगता है, न कोई भोग। जिन स्त्रियों के पति और बेटे मारे गए, उनका रोना सुनकर मेरे मन को शान्ति नहीं मिलती। तब व्यास उन्हें एक बहुत पुराने राजा की बात सुनाते हैं, राजा सेनजित् की, जिन्होंने अपने दुःख में एक गीत-सा कहा था। और उस गीत की एक पंक्ति ऐसी है मानो इसी श्लोक की सूची हो: सुख और दुःख, बढ़ना और मिटना, लाभ और हानि, मरना और जीना, ये सब बारी-बारी से मिलते हैं; इसलिए न मोह में पड़ो, न बहुत हर्ष करो। और उसी जगह एक और बात कही गई है: सुख हो या दुःख, प्रिय हो या अप्रिय, जो-जो मिले, उसे मन से हारे बिना स्वीकार करो।
अब इन दोनों को साथ रखिए। सेनजित् कहते हैं, ये जोड़े बारी-बारी से आते हैं। गीता उससे एक कदम आगे जाती है: ये जोड़े एक ही हाथ से आते हैं। और यही आज के सवाल से जुड़ता है। भगवान को महसूस कैसे करें? हम उन्हें केवल अच्छे पलों में ढूँढते हैं। बेटे की नौकरी लगी, तो कहते हैं भगवान की कृपा। बीमारी आई, तो कहते हैं भगवान कहाँ गए? यह श्लोक कहता है, वे कहीं नहीं गए। जो हाथ सुख में था, वही दुःख में भी है। जो धीरज आपको अस्पताल की उस बेंच पर बैठे रहने देता है, वह भी उन्हीं का है। जिसने यह देखना सीख लिया, उसके लिए भगवान को महसूस करने के मौके दुगने हो जाते हैं।
और एक बात बताकर इस खंड को पूरा करूँगा। "मत्त एव", मुझसे ही, इन्हीं शब्दों से मिलती-जुलती एक बात श्रीकृष्ण ने बहुत बाद में फिर कही थी, युद्ध के बाद, भीष्म की बाणों की शय्या के पास, जहाँ उस सुबह स्वयं धृतराष्ट्र भी बैठे थे। वह दृश्य आज के आख़िरी हिस्से में आएगा, क्योंकि वहीं आज के आख़िरी श्लोक भी अपनी आँखों के सामने घटते दिखते हैं।
पर अभी एक बात बाकी है। भाव तो हमारे भीतर उठते हैं। पर हम खुद कहाँ से आए? यह सारी प्रजा, ये सारे मनुष्य, किसकी सन्तान हैं? अगले श्लोक में श्रीकृष्ण सात महर्षियों और मनुओं की बात करते हैं, और फिर एक ऐसा वचन कहते हैं जिसके साथ "इसमें कोई संशय नहीं" जुड़ा है। आइए, सुनते हैं।
महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा ।
मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥ ६ ॥
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः ।
सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ॥ ७ ॥
छठा श्लोक। "महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा।" पहले के सात महर्षि और चार मनु, "मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः", ये मेरे भाव वाले हैं, मेरे मन से उत्पन्न हुए हैं, और संसार की यह सारी प्रजा उन्हीं की है।
पिछले दो श्लोकों में बात हमारे भीतर के भावों की थी। अब बात उनकी है जिनसे हम सब आए। हमारे शास्त्रों में यह कहा जाता है कि सृष्टि के आरम्भ में कुछ ऋषि और मनु हुए, जिनसे आगे सारी प्रजा फैली। भगवान कहते हैं, वे सब भी मेरे मन से जन्मे।
पर ये सात कौन, और चार कौन? यहाँ आचार्यों में अच्छी-ख़ासी चर्चा है, और हमारी टीका भी साफ़ कहती है कि इन शब्दों को दो ढंग से जोड़ा जाता है। शंकराचार्य पहला ढंग लेते हैं: सात महर्षि, भृगु आदि, और चार मनु, जो सावर्ण नाम से प्रसिद्ध हैं। श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती दूसरा ढंग भी बताते हैं: सात महर्षि, उनसे भी पहले के चार, यानी सनक आदि, और फिर मनु, स्वायम्भुव आदि। मधुसूदन एक पुराण का वचन भी उठाते हैं, जिसमें सात नाम गिनाए गए हैं: भृगु, मरीचि, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ। और लोकमान्य तिलक इस पर लम्बी चर्चा करके अपना अलग मत रखते हैं। वे "पहले के चार" को भागवत धर्म के चार व्यूह मानते हैं, वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध, जो उनके अनुसार सात ऋषियों से भी पहले प्रकट हुए। हम इनमें से किसी का पक्ष नहीं लेंगे। हमारी टीका जो बात कहती है, वही असली बात है: दोनों तरह से अर्थ एक ही निकलता है, कि सब प्राणियों के आदि पिता स्वयं भगवान के मन से उत्पन्न हुए।
महाभारत में भी सृष्टि का यह क्रम आता है। आदि पर्व में वैशम्पायन राजा जनमेजय को बताते हैं कि ब्रह्मा के छह मानस पुत्र महर्षि के रूप में प्रसिद्ध हैं: मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु। मरीचि के पुत्र कश्यप हुए, और कश्यप से ही ये सारी प्रजाएँ उत्पन्न हुईं। और आगे वहीं कहा गया है कि भगवान भृगु ब्रह्मा के हृदय को चीरकर निकले। तो सूचियाँ थोड़ी-थोड़ी अलग हैं, कहीं वसिष्ठ, कहीं अंगिरा, पर बात एक ही है: ये महर्षि किसी माँ के पेट से नहीं, मन से जन्मे। मधुसूदन "मानसा जाता" का अर्थ यही करते हैं: संकल्प से उत्पन्न, गर्भ से नहीं।
अब "मद्भावा", मेरे भाव वाले। इस छोटे-से शब्द के आचार्य कई रंग दिखाते हैं। शंकराचार्य कहते हैं, उनका मन मुझमें लगा था। रामानुज कहते हैं, जो मेरा संकल्प, वही उनका संकल्प; वे मेरी इच्छा के पीछे चलते हैं। मधुसूदन कहते हैं, वे मेरे चिन्तन में लगे रहते थे, और उसी से उनमें ज्ञान और शक्ति प्रकट हुई। और नीलकण्ठ इससे अर्जुन के लिए सीधी सीख निकालते हैं: इतने प्रसिद्ध महिमा वाले ये ऋषि भी मेरी ही उपासना करते हैं, इसलिए तुम भी मेरी उपासना करो।
संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक को एक पेड़ के चित्र से खोलते हैं, और यह चित्र आप आज घर ले जा सकते हैं। वे कहते हैं, शुरू में अकेला एक बीज होता है। फिर वही अंकुरित होकर तना बनता है, तने से शाखाएँ फूटती हैं, शाखाओं से टहनियाँ, टहनियों पर पत्ते, पत्तों के बीच फूल और फल। पूरा पेड़ खड़ा हो जाता है। पर ठीक से देखो, तो वह पूरा पेड़ उसी एक बीज का फैलाव है। वैसे ही, ज्ञानेश्वर के भगवान कहते हैं, पहले मैं अकेला था। मुझसे मन जन्मा, उससे सात ऋषि और चार मनु। उन्होंने लोकों के पालक बनाए, पालकों ने लोक रचे, और लोकों से सारी प्रजा निकली। यह सारा विश्व मुझसे ही फैला है।
अब इसे अपने घर में देखिए। बहुत-से घरों में पूजा के समय संकल्प में अपना गोत्र बोला जाता है, और गोत्र किसी ऋषि का नाम होता है: कश्यप, भारद्वाज, वसिष्ठ, अत्रि। हम उसे एक रस्म की तरह बोल देते हैं। पर यह श्लोक उस वंश-वृक्ष को और पीछे ले जाता है। उस ऋषि से भी पहले कोई था, जिसके मन से वह ऋषि जन्मा। तो जब आप अपना गोत्र बोलते हैं, तो एक तरह से आप यह भी कह रहे होते हैं कि मेरी जड़ें उन्हीं के मन में हैं। भगवान को महसूस करने की एक सीढ़ी यह भी है: यह जानना कि मैं कहीं बाहर से उनके पास नहीं जा रहा, मैं उन्हीं से निकलकर उन्हीं की ओर लौट रहा हूँ।
अब सातवाँ श्लोक। "एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः।" जो मेरी इस विभूति और योग को तत्त्व से जानता है, "सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः", वह न डगमगाने वाले योग से जुड़ जाता है। इसमें कोई संशय नहीं।
दो शब्द हैं, और हमारी टीका दोनों का अर्थ बहुत साफ़ देती है। "विभूति", सब वस्तुओं में उनकी उपस्थिति का फैलाव। "योग", वह सामर्थ्य जिससे वे यह करते हैं। एक उदाहरण से समझिए। धूप हर आँगन में पड़ती है, हर खेत में, हर छत पर, यह धूप का फैलाव है, विभूति। और सूर्य में वह शक्ति है जिससे वह इतनी दूर से इतनी जगह एक साथ रोशन कर देता है, यह उसका योग है। भगवान कहते हैं, जो यह दोनों बातें ठीक-ठीक समझ ले, कि मैं सबमें फैला हूँ, और यह फैलाव मेरी अपनी शक्ति से है, वह डगमगाता नहीं।
"सोऽविकम्पेन योगेन", बिना काँपे योग से। शंकराचार्य इसका अर्थ करते हैं: सही दृष्टि का स्थिर हो जाना। रामानुज कहते हैं, न हिलने वाला भक्तियोग। और फिर रामानुज एक बात कहते हैं जो पूरे अध्याय की भूमिका है: मेरी विभूतियों और मेरे गुणों का ज्ञान भक्ति को बढ़ाता है, यह तुम अपने आप देखोगे। यह बात ध्यान से सुनने लायक है। हम अक्सर सोचते हैं कि ज्ञान और भक्ति दो अलग रास्ते हैं, एक दिमाग़ का, एक दिल का। रामानुज कहते हैं, नहीं। जितना आप जानते हैं कि वे कितने बड़े हैं, उतना प्रेम गहरा होता है। जैसे किसी साधारण-से दिखने वाले बुज़ुर्ग के बारे में आपको पता चले कि उन्होंने जीवन भर चुपचाप कितने लोगों की मदद की, तो उनके लिए आदर अपने आप बढ़ जाता है।
और संत ज्ञानेश्वर यहाँ इस न काँपने का कारण बताते हैं। वे कहते हैं, ब्रह्मा से लेकर चींटी तक, मेरे सिवा कोई दूसरी बात है ही नहीं। जो यह सचमुच जान लेता है, वह जाग जाता है, और उसके लिए ऊँच और नीच का भेद एक बुरे सपने जैसा रह जाता है। सोचिए, कोई आदमी क्यों डगमगाता है? क्योंकि कोई उसे बड़ा लगता है, जिसके आगे वह छोटा पड़ जाता है; कोई छोटा लगता है, जिस पर वह अकड़ जाता है। जिसने सबमें एक को देख लिया, उसका तराज़ू ही गिर गया। अब काँपे किस बात पर?
और "नात्र संशयः", इसमें कोई संशय नहीं। नीलकण्ठ बहुत सुंदर बात कहते हैं। वे कहते हैं, भगवान के वचन में संशय हो ही नहीं सकता, फिर भी उन्होंने यह कहा, ताकि सुनने वाले का उत्साह बढ़े। जैसे कोई पिता बच्चे को पहली बार साइकिल पर बिठाकर कहता है, "तुम गिरोगे नहीं, पक्की बात।" पिता को पता है कि बच्चा पहले दिन गिरेगा भी, पर वह वाक्य बच्चे के पैरों में ताक़त भर देता है।
अब महाभारत में एक दृश्य देखिए, जहाँ यह न डगमगाने वाला योग अपनी आँखों से दिखता है, और वह भी स्वयं श्रीकृष्ण में। पंद्रहवें सत्संग में हमने देखा था कि युद्ध के बाद एक दिन युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण को ध्यान में ऐसा स्थिर बैठे देखा, जैसे निर्वात स्थान में दीपक, और पूछा था कि आप किसका ध्यान कर रहे हैं। उन्हीं दिनों का एक और सवेरा शान्ति पर्व में आता है। रात का बस एक पहर बाकी था कि श्रीकृष्ण जाग गए। पाठ कहता है, उन्होंने ध्यान के मार्ग में प्रवेश किया, सब ज्ञान को देखा, और फिर सनातन ब्रह्म का ध्यान किया। और फिर? फिर वे उठे, स्नान किया, हाथ जोड़कर जप किया, अग्नियों के पास खड़े रहे, ब्राह्मणों को दान दिया, दर्पण में अपने को देखा, और सात्यकि को भेजा कि जाकर पता करो, युधिष्ठिर भीष्म के पास चलने को तैयार हैं या नहीं।
इस क्रम को देखिए। पहले भीतर वह स्थिरता, फिर बाहर का पूरा दिन, कर्तव्य, लोग, रथ, यात्रा। भीतर का दीया बुझा नहीं, बाहर का काम रुका नहीं। "सोऽविकम्पेन योगेन" का यही अर्थ है। यह कोई ऐसी अवस्था नहीं जिसके लिए दुनिया छोड़नी पड़े। यह वह स्थिरता है जिसके साथ दुनिया में रहा जाता है। और वह सवेरा किस काम के लिए था? श्रीकृष्ण पाण्डवों को लेकर उस शय्या की ओर जा रहे थे जहाँ भीष्म लेटे थे। उस यात्रा का अन्त हम आज के आख़िरी श्लोकों के साथ देखेंगे।
तो अपने लिए इस श्लोक से क्या लें? बस इतना कि भगवान को महसूस करने का एक रास्ता यह भी है कि उनकी विभूति को पहचानना शुरू करें। सुबह की धूप में, किसी की निःस्वार्थ मदद में, किसी बच्चे की हँसी में। हर बार जब आप किसी अच्छी चीज़ को देखकर मन में कहते हैं, "यह भी उन्हीं का है", तो वह न डगमगाने वाला योग एक धागा और मज़बूत होता है।
पर अभी एक बात बाकी है। अब तक भगवान ने बताया कि वे कौन हैं, और सब कुछ उनसे कैसे निकला। अब अगले चार श्लोक आते हैं, आठवें से ग्यारहवें तक, जिन्हें बहुत-से आचार्य गीता के भक्ति-उपदेश का हृदय मानते हैं। उनमें बताया गया है कि जो यह सब जान लेते हैं, वे कैसे जीते हैं, आपस में क्या बात करते हैं, और भगवान बदले में उनके लिए क्या करते हैं। आइए, पहले दो श्लोक सुनते हैं।
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥ ८ ॥
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥ ९ ॥
अब हम उन चार श्लोकों में आ गए हैं, जिनके बारे में हमारी टीका कहती है कि इन्हें अक्सर गीता के भक्ति-उपदेश का हृदय माना जाता है। और फिर टीका चार शब्दों में इन चारों का सार रख देती है: जानना, प्रेम करना, आपस में बाँटना, और भीतर से उत्तर पाना। विश्वनाथ चक्रवर्ती और बलदेव विद्याभूषण इन चार श्लोकों को एक नाम देते हैं, "चतुःश्लोकी", चार श्लोकों की गीता। और विश्वनाथ तो यहाँ तक कहते हैं कि ये चार श्लोक पूरी गीता का सार हैं, जो प्राणियों का ताप हर लेते हैं।
आठवाँ श्लोक। "अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते।" मैं सबकी उत्पत्ति का कारण हूँ, मुझसे ही सब चलता है। "इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः", ऐसा मानकर ज्ञानी प्रेम से भरकर मुझे भजते हैं।
पहली पंक्ति में दो बातें हैं, और दोनों अलग हैं। "प्रभव", सब कुछ मुझसे निकला। और "प्रवर्तते", सब कुछ मुझसे चलता है। शंकराचार्य कहते हैं, संसार का टिकना, मिटना, उसके सब काम और उन कामों के फल, सब मुझसे ही चलते हैं। मधुसूदन सरस्वती इसमें एक बहुत सुंदर बारीकी जोड़ते हैं: सब कुछ मुझ भीतर बैठे नियन्ता से प्रेरित होकर चलता है, और हर चीज़ अपनी मर्यादा में रहकर चलती है। नदी अपने किनारों में बहती है, ऋतु अपने समय पर आती है। नीलकण्ठ कहते हैं, बुद्धि आदि सब, मेरी कृपा पाकर ही अपने-अपने काम में लगते हैं। यानी आपकी आँख देखती है, आपका मन सोचता है, आपकी बुद्धि निर्णय लेती है, तो वह भी उन्हीं के बल से।
और अब दूसरी पंक्ति का क्रम देखिए। "इति मत्वा", ऐसा जानकर, और फिर "भजन्ते", भजते हैं। पहले समझ, फिर प्रेम। भगवान यह नहीं कह रहे कि आँख मूँदकर प्रेम करो। वे कह रहे हैं, जो यह जान लेता है कि सब कुछ मुझसे है, उसके भीतर प्रेम अपने आप उठता है। और वह शब्द, "भावसमन्विताः", भाव से भरे हुए। इस एक शब्द पर आचार्यों के रंग देखिए। शंकराचार्य कहते हैं, परम सत्य में मन का पूरी तरह लगा होना। रामानुज कहते हैं, मुझे पाने की ललक। श्रीधर कहते हैं, प्रीति। मधुसूदन कहते हैं, प्रेम। और विश्वनाथ इस भाव के नाम तक गिना देते हैं: कोई सेवक बनकर प्रेम करता है, कोई सखा बनकर। अर्जुन किस भाव से प्रेम करते थे, यह हम जानते हैं। वे सखा थे।
संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक को लहरों से समझाते हैं। वे कहते हैं, लहरों की अनगिनत मालाएँ उठती हैं, पर उनका जन्म जल में होता है, उनका सहारा जल है, और उनका जीवन भी जल ही है। हर लहर में जल के सिवा कुछ नहीं। वैसे ही इस विश्व में मेरे सिवा कुछ नहीं। फिर ज्ञानेश्वर इस श्लोक की सबसे काम की पंक्ति कहते हैं। जो भी प्राणी सामने आए, उसे भगवान मानना, यही मेरा निश्चित भक्तियोग है। सोचिए, इस एक बात से घर कैसे बदल सकता है। सुबह जो सब्ज़ी वाला दरवाज़े पर आया, दफ़्तर में जो सहकर्मी चिढ़ाता है, घर में जो बूढ़े पिता एक ही बात तीसरी बार पूछते हैं, अगर इन सबके भीतर उसी जल की एक लहर दिखने लगे, तो भगवान को महसूस करने के लिए मन्दिर तक जाने का इंतज़ार नहीं करना पड़ता।
अब महाभारत का वह दृश्य शुरू करते हैं, जो आज के बाकी श्लोकों के साथ चलेगा। पिछले खंड में हमने वह सवेरा देखा था जब श्रीकृष्ण ध्यान से उठकर भीष्म के पास चलने की तैयारी कर रहे थे। अब उससे एक दिन पहले चलिए। युद्ध के बाद श्रीकृष्ण, युधिष्ठिर, चारों पाण्डव और कृप रथों में कुरुक्षेत्र जाते हैं। ओघवती नदी के किनारे भीष्म बाणों की शय्या पर लेटे हैं, ऋषियों से घिरे, जैसे डूबते सूर्य अपनी किरणों से घिरा हो। सब रथों से उतरते हैं, पाठ कहता है, चंचल मन को संयमित करके, इन्द्रियों को समेटकर, और पहले व्यास आदि ऋषियों को प्रणाम करके भीष्म के पास जाते हैं।
बुझती आग जैसे भीष्म को देखकर श्रीकृष्ण का मन कुछ उदास हो जाता है। तेईसवें सत्संग में आपने एक वाक्य में सुना था कि उन्होंने सबसे पहले पूछा था, आपका मन स्वच्छ तो है; आज उसके आगे का पूरा दृश्य सुनिए। श्रीकृष्ण पूछते हैं, आशा है आपकी सब इन्द्रियाँ पहले की तरह निर्मल हैं, और बाणों की पीड़ा से आपका शरीर जल नहीं रहा, क्योंकि शरीर का दुःख मन के दुःख से भी अधिक बलवान होता है। फिर श्रीकृष्ण भीष्म की बहुत प्रशंसा करते हैं, कि सत्य, तप, दान और वेद में आपके जैसा किसी को हमने नहीं सुना, और फिर कहते हैं, बन्धुओं के विनाश से युधिष्ठिर का मन जल रहा है, अपनी बुद्धि से उनका शोक दूर कीजिए।
और भीष्म का उत्तर, आज के आठवें श्लोक की मानो भीष्म के अपने शब्दों में टीका है। हाथ जोड़कर भीष्म कहते हैं, हे वाणी के स्वामी, आपके सामने मैं क्या कहूँगा, जब वाणी में जो कुछ आया, वह सब आपकी वाणी में समाया हुआ है? और फिर: संसार में जो कुछ किया गया, जो किया जा रहा है, और जो किया जाना है, वह सब आपसे ही निकला है। "मत्तः सर्वं प्रवर्तते", जो बात श्रीकृष्ण ने यहाँ कुरुक्षेत्र में अर्जुन से कही, वही बात युद्ध के बाद भीष्म हाथ जोड़कर श्रीकृष्ण से कह रहे हैं।
और फिर भीष्म अपनी हालत बताते हैं, बिना छिपाए। बाणों की जलन से मेरा मन पीड़ित है, अंग ढीले पड़ गए हैं, बुद्धि साफ़ नहीं है। बोलते हुए वाणी अटकती है। मुझे न दिशाएँ सूझती हैं, न आकाश, न धरती। मैं केवल आपके बल से टिका हूँ। आपके सामने तो बृहस्पति भी बोलते हुए लड़खड़ा जाएँ। आप ही युधिष्ठिर से कहिए; आप सब विद्याओं के स्रोत हैं। वह आदमी जिसके बारे में अभी श्रीकृष्ण ने कहा था कि भूत, भविष्य और वर्तमान उसकी हथेली पर रखे हैं, वही कह रहा है, मेरी बुद्धि साफ़ नहीं है। इस दृश्य को यहीं थोड़ी देर रोक देते हैं। भीष्म की इस बात का उत्तर श्रीकृष्ण क्या देते हैं, वह आज के आख़िरी दो श्लोकों का अपना दृश्य है।
अब नौवाँ श्लोक। "मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्।" जिनका चित्त मुझमें है, जिन्होंने अपने प्राण मुझमें लगा दिए हैं, वे आपस में एक-दूसरे को समझाते हैं, "कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च", और सदा मेरी चर्चा करते हुए सन्तुष्ट रहते हैं और आनन्द लेते हैं।
"मद्गतप्राणा" के दो अर्थ आचार्य देते हैं। शंकराचार्य कहते हैं, यहाँ प्राण का अर्थ आँख, कान जैसी इन्द्रियाँ भी है, यानी जिनकी इन्द्रियाँ मुझमें सिमट आई हैं; या फिर, जिनका जीवन ही मुझमें है। रामानुज दूसरा अर्थ लेते हैं, और उसे बहुत गहरा कर देते हैं: जो मेरे बिना अपने को सँभाल ही नहीं पाते। बलदेव विद्याभूषण इसका एक चित्र देते हैं: जैसे मछली पानी के बिना। और विश्वनाथ एक और सीधी उपमा देते हैं: जैसे लोग कहते हैं कि मनुष्य के प्राण अन्न में हैं, वैसे इनके प्राण मुझमें हैं।
और अब वे दो शब्द जो इस श्लोक को बाक़ी सबसे अलग कर देते हैं: "बोधयन्तः परस्परम्", आपस में एक-दूसरे को समझाते हुए, और "कथयन्तश्च", चर्चा करते हुए। यह भक्ति अकेले कमरे में बन्द भक्ति नहीं है। यह बाँटी जाने वाली भक्ति है। रामानुज कहते हैं, हर भक्त ने भगवान के जो गुण अपने अनुभव में पाए, वे वह दूसरे को बताता है, और उनके दिव्य, मनोहर कर्मों की कथा कहता है। मधुसूदन कहते हैं, बराबर वालों के बीच शास्त्र और तर्क से उनकी बात समझाते हैं, और अपने से छोटों को उपदेश देते हैं।
और फिर "तुष्यन्ति च रमन्ति च", सन्तुष्ट भी होते हैं, आनन्द भी लेते हैं। रामानुज इन दो शब्दों को बड़ी सुंदरता से बाँटते हैं: बोलने वाले बोलकर तृप्त होते हैं, और सुनने वाले सुनकर आनन्द में डूबते हैं। शंकराचार्य कहते हैं, ऐसा आनन्द जैसे किसी प्रिय के साथ होने में होता है। और मधुसूदन सरस्वती सन्तोष के बारे में दो बड़े वचन उठाते हैं। एक योगसूत्र का, कि सन्तोष से सबसे ऊँचा सुख मिलता है। और दूसरा एक पुराने ग्रन्थ का, कि संसार में कामनाओं का जितना सुख है, और स्वर्ग का जितना बड़ा सुख है, वे दोनों मिलकर भी तृष्णा के मिट जाने के सुख के सोलहवें हिस्से के बराबर नहीं। नीलकण्ठ एक छोटी-सी बात कहते हैं जो मुस्कुराहट ले आती है: वे उसी ज्ञान से सन्तुष्ट होते हैं, मिठाई से नहीं।
संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर जैसे खुद आनन्द में बह जाते हैं। वे कहते हैं, जैसे पास-पास के दो सरोवर भरकर उफन जाएँ और एक-दूसरे में मिल जाएँ, और लहर ही लहर का गहना बन जाए। जैसे सूर्य सूर्य की आरती उतारे। जैसे दो बराबर धाराएँ मिलें, और वहाँ एक प्रयाग बन जाए। और फिर: कमल की कली खिल जाए, तो वह अपने भीतर की सुगन्ध को सँभालकर नहीं रख पाती, वह राजा और रंक दोनों को एक-सा सुगन्ध का भोज दे देती है। वैसे ही ये भक्त मेरी बात सारे जगत् में कहते फिरते हैं, और कहते-कहते उस आनन्द में खुद को भूल जाते हैं; उनके लिए रात और दिन का भेद भी नहीं रहता।
और अब ज़रा सोचिए, महाभारत अपने आप में किस चीज़ का नाम है? आदि पर्व का पहला दृश्य याद कीजिए। नैमिष वन में कुलपति शौनक का बारह वर्ष का सत्र चल रहा है। रोमहर्षण के बेटे उग्रश्रवा, जो पुरानी कथाओं के वाचक हैं, वहाँ आते हैं और विनय से झुककर कहते हैं, मैं व्यास की कही सब कथाएँ जानता हूँ, आज सुनिए। और पाठ कहता है, नैमिष वन के तपस्वी अद्भुत कथाएँ सुनने के लिए उन्हें घेरकर बैठ गए। उग्रश्रवा बताते हैं कि उन्होंने ये कथाएँ राजा जनमेजय के सर्पसत्र में सुनी थीं, जहाँ वैशम्पायन ने व्यास की आज्ञा से उन्हें विधिपूर्वक सुनाया था। और ऋषि कहते हैं, वही सुनाइए, जो कथाओं में सबसे श्रेष्ठ है, और जिसे सुनकर देवताओं और ब्रह्मर्षियों ने भी आदर दिया।
इस धागे को देखिए। व्यास ने कहा, वैशम्पायन ने सुना और जनमेजय को सुनाया, उग्रश्रवा ने सुना और नैमिष के ऋषियों को सुनाया। और उसी कथा के भीतर, सञ्जय धृतराष्ट्र को सुना रहे हैं, कि श्रीकृष्ण ने अर्जुन से क्या कहा। "बोधयन्तः परस्परम्। कथयन्तश्च मां नित्यं।" पूरा महाभारत ही इस नौवें श्लोक का एक लम्बा उदाहरण है: लोग, पीढ़ी दर पीढ़ी, बैठकर एक-दूसरे को उसकी बात सुनाते रहे। और आज, आप और मैं, इसी धागे की एक और गाँठ हैं।
और यहीं आज के सवाल का एक बहुत सीधा उत्तर छिपा है। आप भगवान को महसूस करना चाहते हैं? तो उनकी बात किसी से कीजिए। किसी बूढ़ी माँ से पूछिए कि उन्होंने अपने जीवन में कब भगवान का हाथ महसूस किया। किसी मित्र को वह भजन सुनाइए जो आपको रुला देता है। बच्चे को सोते समय श्रीकृष्ण की कोई कथा सुनाइए। आपने देखा होगा, जब हम किसी की बुराई करके उठते हैं तो मन कड़वा हो जाता है। और जब हम उनकी बात करके उठते हैं, तो मन मीठा हो जाता है। "तुष्यन्ति च रमन्ति च।" वह मिठास ही उनका महसूस होना है।
पर अभी एक बात बाकी है। अब तक बात यह थी कि भक्त क्या करते हैं: जानते हैं, प्रेम करते हैं, आपस में बाँटते हैं। पर सबसे बड़ी बात अभी बाकी है, कि भगवान बदले में उनके लिए क्या करते हैं। और भीष्म ने जो कहा था, कि मेरी बुद्धि साफ़ नहीं, मैं कुछ नहीं बोल पाऊँगा, उसका उत्तर भी। आइए, आज के आख़िरी दो श्लोक सुनते हैं।
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥ १० ॥
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः ।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥ ११ ॥
दसवाँ श्लोक। "तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।" जो निरन्तर मुझमें लगे हैं, जो प्रेम से मुझे भजते हैं, "ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते", उन्हें मैं वह बुद्धियोग देता हूँ, जिससे वे मुझ तक पहुँच जाते हैं।
सबसे पहले "प्रीतिपूर्वकम्", प्रेम से। शंकराचार्य पूछते हैं, क्या वे किसी चीज़ की माँग से भजते हैं? और उत्तर देते हैं, नहीं, स्नेह से। मधुसूदन सरस्वती और साफ़ कहते हैं: लाभ, पूजा, नाम, इनमें से किसी की चाह रखे बिना। यह वह भक्ति नहीं जो सौदे की तरह चलती है, कि मेरा यह काम हो जाए तो मैं इतने दीये जलाऊँगा। यह वह भक्ति है जो इसलिए होती है क्योंकि मन को उनसे प्रेम हो गया है।
अब इस श्लोक का सबसे बड़ा शब्द: "ददामि", मैं देता हूँ। ध्यान दीजिए, भगवान यह नहीं कह रहे कि वे भक्त बुद्धियोग कमा लेते हैं, या साध लेते हैं। वे कह रहे हैं, मैं देता हूँ। मधुसूदन कहते हैं, यह वही योग है जिसकी बात सातवें श्लोक में "सोऽविकम्पेन योगेन" कहकर हुई थी, वह न डगमगाने वाली सही दृष्टि। रामानुज कहते हैं, भक्त जिस बुद्धियोग में पहले से लगा है, उसी को मैं पकाकर पूरा कर देता हूँ। और विश्वनाथ चक्रवर्ती एक ऐसी बात कहते हैं जो इस श्लोक को बहुत ऊँचा उठा देती है: यह बुद्धियोग न अपने आप से पाया जा सकता है, न किसी और से। इसे केवल मैं दे सकता हूँ, और केवल वही ले सकते हैं।
और संत ज्ञानेश्वर? वे कहते हैं, उन्हें जो कुछ हम देना चाहें, वह तो वे पहले ही ले चुके हैं। उन्होंने जो प्रेम पकड़ रखा है, वही हमारा देना बन गया है। और फिर ज्ञानेश्वर का वह चित्र, जो इस पूरे श्लोक को एक माँ के चेहरे में बदल देता है। लाड़ला बच्चा आँगन में खेल रहा है, और माँ स्नेह भरी आँखों से उसके पीछे-पीछे दौड़ती है। बच्चा जो भी खिलौना उठाकर दिखाता है, माँ उसे आगे सोने का बनाकर रख देती है। भगवान कहते हैं, मैं भी अपने भक्त के पीछे ऐसे ही चलता हूँ। वह साधना का जो भी छोटा-सा खेल खेलता है, मैं उसे आगे सोने का कर देता हूँ।
लोकमान्य तिलक यहाँ गीता के दो और वचनों की ओर इशारा करते हैं। सातवें अध्याय में कहा था कि जो जिस देवता को श्रद्धा से पूजना चाहे, उसकी वह श्रद्धा भी मैं ही स्थिर करता हूँ। और छठे अध्याय में, बीसवें सत्संग में हमने सुना था, कि जिसमें योग की जिज्ञासा भर जाग जाए, वह अपने पुराने अभ्यास से अपने आप आगे खिंचता चला जाता है। तीनों जगह एक ही बात है: पहला कदम आपका, फिर रास्ता आपको खींचता है।
अब ग्यारहवाँ श्लोक, और आज के सत्संग का नाम इसी श्लोक से आया है। "तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः।" उन्हीं पर कृपा करने के लिए मैं अज्ञान से जन्मे अँधेरे को, "नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता", उनके अन्तःकरण में बैठकर, चमकते हुए ज्ञान के दीपक से नष्ट करता हूँ।
पहले "तेषामेवानुकम्पार्थम" का अर्थ, उन्हीं पर अनुकम्पा, यानी कृपा के लिए। नीलकण्ठ इसमें एक बारीक बात देखते हैं: भक्तों पर दया के लिए, अपना कोई काम साधने के लिए नहीं, जैसे कोई राजा करता है। और विश्वनाथ "तेषामेव" पर रुकते हैं, उन्हीं के लिए, और एक बहुत भरोसे की बात कहते हैं। कोई पूछे कि ऐसी कृपा पाने के लिए भक्त को क्या-क्या प्रयत्न करना होगा, तो विश्वनाथ कहते हैं: उन्हें मेरी कृपा पाने की कोई चिन्ता नहीं करनी, क्योंकि उनके लिए वह यत्न मैं स्वयं कर रहा हूँ। और वे इसे सीधे नौवें अध्याय से जोड़ते हैं, "योगक्षेमं वहाम्यहम्"। जैसे उनका बाहर का भार भगवान उठाते हैं, वैसे ही भीतर का अँधेरा भी।
फिर, आत्मभाव में स्थित होकर, यानी उनके भीतर बैठकर। श्रीधर स्वामी कहते हैं, उनकी बुद्धि में बैठकर। नीलकण्ठ कहते हैं, अन्तःकरण रूपी घर में। और बलदेव विद्याभूषण एक कोमल-सा चित्र देते हैं: जैसे कमल के भीतर भौंरा। भगवान बाहर खड़े होकर टॉर्च नहीं दिखाते। वे भीतर आकर दीया जलाते हैं।
और अब वह दीया। छठे अध्याय में, उन्नीसवें सत्संग में, हमने योगी के मन के लिए एक उपमा सुनी थी, "यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते", जैसे बिना हवा की जगह में रखा दीपक काँपता नहीं। वहाँ दीपक योगी का मन था, जिसे योगी खुद स्थिर करता है। यहाँ दीपक ज्ञान का है, और उसे जलाने वाले स्वयं भगवान हैं। शंकराचार्य इस दीपक का पूरा चित्र खींचते हैं, और वह चित्र अपने आप में एक साधना है। वे कहते हैं, इस दीपक में तेल है, भक्ति से मिली प्रसन्नता का। उसे हवा मिलती है, भगवान के ध्यान में मन के लगने की। उसकी बत्ती है, संयम और साधना से निखरी समझ। उसका पात्र है, विरक्त अन्तःकरण। और वह रखा है एक ऐसे कमरे में जहाँ राग और द्वेष की कोई हवा नहीं आती। और उसकी चमक आती है, निरन्तर एकाग्र ध्यान से जन्मी सही दृष्टि से।
मधुसूदन सरस्वती और नीलकण्ठ दोनों दीपक की एक बात पकड़ते हैं, जो बहुत गहरी है। अँधेरे कमरे में कोई चीज़ दिखानी हो, तो दीपक जलाने के लिए तेल, बत्ती, आग, यह सब जुटाना पड़ता है। पर एक बार दीपक जल गया, तो अँधेरा हटाने के लिए उसे और कुछ नहीं करना पड़ता। वह बस जलता है, और अँधेरा नहीं रहता। और दीपक कोई नई चीज़ नहीं बनाता। कमरे में जो पहले से था, वही दिखने लगता है। मधुसूदन कहते हैं, ज्ञान भी ऐसा ही है: जो सत्य पहले से है, वह बस प्रकट हो जाता है। और "भास्वता", चमकता हुआ, का अर्थ वे करते हैं: जिसे बुझाने वाली कोई तेज़ हवा नहीं।
और संत ज्ञानेश्वर, जैसे इस श्लोक को अपनी आँखों से देख रहे हों, कहते हैं: फिर मैं खुद मशालची बन जाता हूँ, और उनके आगे-आगे चलता हूँ। अज्ञान की रात में जो घना अँधेरा भरा होता है, उसे मिटाकर मैं उनके लिए सदा का सवेरा कर देता हूँ। और ज्ञानेश्वर कहते हैं, यह सुनकर अर्जुन का मन ठंडा हो गया, और अर्जुन बोले, प्रभु, आज मैंने अपना जन्म लेना अपनी आँखों से देख लिया; आज जीवन मेरे हाथ आ गया।
अब भीष्म की उस शय्या पर लौटते हैं, जहाँ हमने दृश्य रोका था। भीष्म ने कहा था, मेरी बुद्धि साफ़ नहीं, वाणी अटकती है, मैं आपके सामने कुछ नहीं बोल पाऊँगा, आप ही कहिए। श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं, कौरवों का भार उठाने वाले, आप जैसे स्थिर पुरुष के मुँह से यह बात शोभा देती है। और आपने जो बाणों की पीड़ा बताई, उसके लिए मेरी कृपा से दिया हुआ यह वर लीजिए। थकान, मूर्च्छा, जलन और पीड़ा आपको नहीं सताएँगे, न भूख, न प्यास। "ज्ञानानि च समग्राणि प्रतिभास्यन्ति तेऽनघ", हे निष्पाप, सारे ज्ञान आपके भीतर अपने आप प्रकट होंगे। आपका मन सदा सत्त्व में रहेगा, रज और तम से छूटा हुआ, जैसे बादलों से निकला चन्द्रमा। और ज्ञान की आँख से आप सब प्राणियों को ऐसे साफ़ देखेंगे, जैसे स्वच्छ जल में मछली।
पन्द्रहवें सत्संग में हमने गुरु धौम्य के शिष्य आरुणि की कथा सुनी थी, जिसे आशीर्वाद मिला था कि सब वेद और धर्मशास्त्र उसके मन में अपने आप प्रकट होंगे। वहाँ भी यही शब्द था, "प्रतिभास्यन्ति"। गुरु की कृपा से ज्ञान भीतर से उगता है, बाहर से ठूँसा नहीं जाता। और उस शाम, पाठ कहता है, ऋषियों ने वेद के मन्त्रों से श्रीकृष्ण का सम्मान किया, आकाश से फूल बरसे, और विदा होते समय श्रीकृष्ण ने पाण्डवों, सात्यकि, कृप, और सञ्जय के साथ भीष्म को प्रणाम किया। सञ्जय वहाँ थे। जिस आदमी के मुँह से आज हम सुन रहे हैं कि भगवान भक्त के भीतर ज्ञान का दीया जलाते हैं, उसने एक दिन यह दीया जलते अपनी आँखों से देखा।
अगली सुबह की बात आप पन्द्रहवें सत्संग में सुन चुके हैं, जब सब लोग, धृतराष्ट्र भी, उस शय्या के पास आए थे और भीष्म ने श्रीकृष्ण से कहा था कि आपकी कृपा से मेरी पीड़ा, थकान और मोह तुरन्त चले गए, और जो बीता, जो हो रहा है, जो होने वाला है, वह सब मैं हथेली पर रखे फल की तरह देखता हूँ। उस दिन हमने उसे सीखने की शुरुआत की नज़र से सुना था। आज उसे दूसरी नज़र से सुनिए, क्योंकि वह इसी श्लोक का फल है। रात भर पहले जिसे दिशाएँ नहीं सूझती थीं, उसे सवेरे सब दिख रहा है।
"ददामि बुद्धियोगं तं।" "नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता।" जो बात कुरुक्षेत्र में श्लोक बनकर कही गई, वह यहाँ एक बूढ़े, घायल योद्धा के चेहरे पर घटती दिख रही है।
"ददामि बुद्धियोगं तं।" "नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता।" जो बात कुरुक्षेत्र में श्लोक बनकर कही गई, वह यहाँ एक बूढ़े, घायल योद्धा के चेहरे पर घटती दिख रही है।
और उसी सुबह भीष्म ने जब पूछा कि आप सब जानते थे, तो आपने स्वयं युधिष्ठिर को क्यों नहीं समझाया, तब श्रीकृष्ण के उत्तर का पहला वाक्य वही था जिसकी बात हमने दूसरे खंड में की थी: "मत्तः सर्वेऽभिनिर्वृत्ता भावाः सदसदात्मकाः", सत् और असत्, सब भाव मुझसे ही निकले हैं। जो धृतराष्ट्र एक दिन हस्तिनापुर में बैठकर सञ्जय से सुन रहे थे, "भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव", वही धृतराष्ट्र उस सुबह भीष्म की शय्या के पास बैठे स्वयं श्रीकृष्ण के मुँह से लगभग वही बात सुन रहे थे। आगे का उत्तर, कि मुझे आपका यश बढ़ाना है, आप पन्द्रहवें सत्संग में सुन चुके हैं।
इसे ध्यान से सुनिए। भगवान ने दीया जलाया, और उसका सारा श्रेय अपने भक्त को दे दिया। यही अनुकम्पा है। और उस दीये से भीष्म ने क्या किया, यह भी आप जानते हैं। लज्जा से रुके हुए युधिष्ठिर विनम्र होकर पास आए, उन्होंने भीष्म के चरण पकड़े, और भीष्म ने कहा, डरो मत, पूछो। भगवान ने भीष्म के भीतर दीया जलाया, और भीष्म ने उसी दीये से युधिष्ठिर का अँधेरा हटाना शुरू किया। "बोधयन्तः परस्परम्।" एक दीये से दूसरा जलता है।
अब दसवाँ अध्याय आगे कैसे बढ़ता है? ये बातें सुनकर अर्जुन चुप नहीं रह पाते। अगले श्लोक में, जो इस अध्याय में अर्जुन का पहला वचन है, वे एक स्तुति से उत्तर देते हैं: "परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्।" अर्जुन ने श्रीकृष्ण को ऐसे क्यों पुकारा, और फिर उनसे क्या माँगा, यह अगले सत्संग में।
तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।
पहली बात। भगवान को नापने की कोशिश छोड़ दीजिए, उन्हें प्रेम करना शुरू कीजिए। "न मे विदुः सुरगणाः", देवता भी उन्हें पूरा नहीं जानते। अगर वे आपकी पकड़ में नहीं आते, तो यह आपकी हार नहीं। "इति मत्वा भजन्ते", जो यह जान ले कि सब उन्हीं से है, उसके भीतर प्रेम अपने आप उठता है।
दूसरी बात। सुख और दुःख, दोनों एक ही हाथ से आते हैं। "भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव।" इसलिए उन्हें केवल अच्छे दिनों में मत ढूँढिए। और क्षमा, धीरज, सन्तोष जैसे गुण भी उन्हीं के हैं, तो जब किसी को माफ़ करना कठिन लगे, तो उनसे माँगिए।
तीसरी बात। उनकी बात कीजिए, और बाक़ी उन पर छोड़ दीजिए। "बोधयन्तः परस्परम्", आपस में उनकी चर्चा, यही वह जगह है जहाँ मन मीठा होता है। और समझ का दीया आपको अपने बल से नहीं जलाना। "ददामि", मैं देता हूँ; "नाशयाम्यात्मभावस्थो", भीतर बैठकर मैं मिटाता हूँ। जिस भीष्म को दिशाएँ नहीं सूझती थीं, उनके भीतर भी एक रात में सवेरा हो गया।
आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आपने अपने जीवन में भगवान को सबसे पास कब महसूस किया? किसी मन्दिर में, किसी अस्पताल में, किसी के प्रेम में, या किसी बिल्कुल साधारण-से दिन? नीचे लिखिए, क्योंकि आपकी बात पढ़कर किसी और के मन में भी दीया जल सकता है। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।
वे बाहर खड़े होकर रास्ता नहीं दिखाते। वे भीतर आकर दीया जलाते हैं, और फिर आगे-आगे चलते हैं।
जय श्री कृष्ण।
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः ।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥ ११ ॥
तीन बातें
- भगवान को नापने की कोशिश छोड़ दीजिए, उन्हें प्रेम करना शुरू कीजिए। "न मे विदुः सुरगणाः", देवता भी उन्हें पूरा नहीं जानते। अगर वे आपकी पकड़ में नहीं आते, तो यह आपकी हार नहीं। "इति मत्वा भजन्ते", जो यह जान ले कि सब उन्हीं से है, उसके भीतर प्रेम अपने आप उठता है।
- सुख और दुःख, दोनों एक ही हाथ से आते हैं। "भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव।" इसलिए उन्हें केवल अच्छे दिनों में मत ढूँढिए। और क्षमा, धीरज, सन्तोष जैसे गुण भी उन्हीं के हैं, तो जब किसी को माफ़ करना कठिन लगे, तो उनसे माँगिए।
- उनकी बात कीजिए, और बाक़ी उन पर छोड़ दीजिए। "बोधयन्तः परस्परम्", आपस में उनकी चर्चा, यही वह जगह है जहाँ मन मीठा होता है। और समझ का दीया आपको अपने बल से नहीं जलाना। "ददामि", मैं देता हूँ; "नाशयाम्यात्मभावस्थो", भीतर बैठकर मैं मिटाता हूँ। जिस भीष्म को दिशाएँ नहीं सूझती थीं, उनके भीतर भी एक रात में सवेरा हो गया।