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सत्संग २७

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भगवान क्या माँगते हैं

गीता 9.26–9.34 · 72 मिनट

मैं पापी हूँ, क्या मुझे भी अपनाएँगे?

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥ २६ ॥
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यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् । यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥ २७ ॥
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आपने कभी किसी बड़े मन्दिर के बाहर खड़े होकर लोगों को देखा है? कोई चाँदी का छत्र लेकर आया है, कोई मिठाई के बड़े-बड़े डिब्बे, कोई लम्बी पर्ची कटवा रहा है। और उसी भीड़ में कहीं एक बूढ़ी माँ खड़ी है, जिसके हाथ में बस दो फूल हैं, और जो मन ही मन सोच रही है कि मेरे पास तो देने को कुछ है ही नहीं। और कभी-कभी यह सवाल इससे भी गहरा होता है। देने को कुछ न होना एक बात है। पर जिसे लगता है कि उसकी ज़िंदगी में बहुत कुछ ग़लत हुआ, जो रात को अकेले में अपने पुराने किए को याद करके सिहर जाता है, वह पूछता है: मुझ जैसे को भगवान क्यों अपनाएँगे? यही आज का सवाल है: भगवान क्या माँगते हैं? और मैं पापी हूँ, तो क्या मुझे भी अपनाएँगे?

जय श्री कृष्ण।

आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का सत्ताईसवाँ सत्संग है, और नौवें अध्याय का आख़िरी। पहले जल्दी से याद कर लें कि पिछली बार हम कहाँ रुके थे। पिछले सत्संग में, तेरहवें से पच्चीसवें श्लोक तक, श्रीकृष्ण ने बताया था कि महात्मा उन्हें कैसे भजते हैं: निरन्तर उनका कीर्तन करते हुए, यत्न करते हुए, भक्ति से नमस्कार करते हुए। फिर वह अद्भुत सूची आई, "अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्", मैं ही यज्ञ हूँ, मैं ही औषधि हूँ, मैं ही इस जगत् का पिता हूँ, माता हूँ, शरण हूँ, सुहृद् हूँ। फिर वह वचन जिसे बहुत-से लोग अपने घर की दीवार पर लिखकर रखते हैं, "तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्", जो नित्य मुझमें लगे हैं, उनका जो नहीं है उसे पाना और जो है उसे बचाना, यह भार मैं स्वयं उठाता हूँ। और आख़िर में यह बात कि जो जिसे पूजता है, वह उसी को पाता है, "यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्", और जो मुझे पूजते हैं, वे मुझे ही पाते हैं।

अब सोचिए, यह सब सुनकर एक साधारण आदमी के मन में क्या उठेगा। जो सारे जगत् का पिता है, जो स्वयं यज्ञ है, उसे पूजूँ तो कैसे? उसके योग्य भेंट कहाँ से लाऊँ? और आपको याद रहे, यह सब हमें सञ्जय सुना रहे हैं, हस्तिनापुर में, अन्धे राजा धृतराष्ट्र को, उस दिन जब भीष्म बाणों की शय्या पर गिर चुके हैं। महाभारत के भीष्म पर्व का तैंतीसवाँ अध्याय ही गीता का नौवाँ अध्याय है, "राजविद्या राजगुह्य योग"। और इस अध्याय के दूसरे ही श्लोक में श्रीकृष्ण ने इस विद्या के बारे में एक बात कही थी जो आज खुलेगी: "सुसुखं कर्तुमव्ययम्", यह करने में बहुत सरल है, और कभी नष्ट नहीं होती। आज हम देखेंगे कि वह सरलता कितनी सरल है।

छब्बीसवाँ श्लोक। "पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।" जो मुझे प्रेम से एक पत्ता, एक फूल, एक फल या थोड़ा जल अर्पित करता है, "तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः", उस शुद्ध हृदय वाले का प्रेम से लाया हुआ वह मैं स्वीकार करता हूँ।

चार चीज़ें गिनाई गई हैं, और ध्यान दीजिए, चारों कैसी हैं। हमारी टीका कहती है, ये संसार की सबसे सस्ती और सबसे आसानी से मिलने वाली चीज़ें हैं। पत्ता किसी भी पेड़ से मिल जाता है। फूल रास्ते के किनारे खिल जाता है। फल मौसम में हर घर में होता है। और जल, वह तो सबसे ग़रीब आदमी के पास भी होता है। रामानुजाचार्य यहाँ एक शब्द पर रुकते हैं: "सर्वसुलभ", जो सबको सुलभ हो। भगवान ने जानबूझकर वे चीज़ें गिनाईं जिनके लिए किसी को किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े।

और अब वह शब्द, जिस पर पूरे श्लोक का रस टिका है: "भक्त्युपहृतमश्नामि" का आख़िरी हिस्सा। हम अनुवाद में कहते हैं "स्वीकार करता हूँ", पर हमारी टीका याद दिलाती है कि इसका सीधा अर्थ है "खाता हूँ"। जैसे कोई मित्र आपके घर आए और आप जो परोसें, वह प्रेम से खा ले। भगवान यह नहीं कह रहे कि मैं तुम्हारी भेंट रख लेता हूँ, या उसे देख लेता हूँ। वे कह रहे हैं, मैं उसे खा लेता हूँ। रामानुज इसे और भी कोमल बना देते हैं। वे कहते हैं, जिसे किसी चीज़ की कमी नहीं, जिसकी हर इच्छा पूरी है, वह भक्त का दिया पत्ता ऐसे खाता है मानो उसे कोई ऐसी प्रिय चीज़ मिल गई हो जो उसकी कल्पना से भी परे थी।

और संत ज्ञानेश्वर तो इस श्लोक पर जैसे भगवान के मुँह से बोल पड़ते हैं। वे कहते हैं: भक्त मेरी ओर कोई फल बढ़ाता है, तो मैं दोनों हाथ फैला देता हूँ, और डंठल तोड़े बिना ही उसे खा लेता हूँ। फूल तो सूँघने के लिए होता है, पर भक्त दे, तो मैं उसे भी मुँह में रख लेता हूँ। पत्ता हो, चाहे ताज़ा न हो, सूखा हो, भरे मन से दिया गया हो तो मैं उसे अमृत की तरह खाता हूँ। और फिर ज्ञानेश्वर एक बात कहते हैं जो मुझे बहुत छूती है। अगर किसी के पास पत्ता भी न हो, तो पानी की तो कमी नहीं होगी। वह पानी, जो बिना मोल के मिलता है, बिना कमाए हाथ आता है। जिसने वही पानी सब कुछ समझकर मुझे दे दिया, ज्ञानेश्वर के भगवान कहते हैं, उसने मेरे लिए वैकुण्ठ से बड़े मन्दिर बना दिए।

अब श्रीधर स्वामी एक तुलना करते हैं। वे कहते हैं, छोटे देवताओं को प्रसन्न करने के लिए बहुत धन लगता है, बड़े-बड़े यज्ञ, बहुत सामग्री। पर जो सब ऐश्वर्यों का स्वामी है, वह इन चीज़ों से प्रसन्न नहीं होता, वह केवल भक्ति से प्रसन्न होता है। और लोकमान्य तिलक इसे एक वाक्य में कहते हैं, जो याद रखने लायक है: देवता भाव का भूखा है, पूजा की सामग्री का नहीं। यज्ञ के लिए बहुत सामग्री जुटानी पड़ती है, बहुत उद्योग करना पड़ता है, पर भक्ति का यज्ञ एक तुलसी के पत्ते से भी पूरा हो जाता है।

मधुसूदन सरस्वती इस श्लोक की बनावट में एक बारीकी देखते हैं। श्लोक में "भक्ति" शब्द दो बार आया है। पहले "भक्त्या प्रयच्छति", प्रेम से देता है। फिर "भक्त्युपहृतमश्नामि", प्रेम से लाया हुआ, उसे मैं खाता हूँ। मधुसूदन कहते हैं, एक ही बात दो बार कहकर भगवान यह जता रहे हैं कि मेरे स्वीकार करने का कारण केवल प्रेम है। जिसमें प्रेम नहीं, उसका ऊँचा कुल, उसका तप, उसका पाण्डित्य, कुछ भी मेरे स्वीकार करने का कारण नहीं बनता। और वे एक प्यारा चित्र देते हैं: जैसे छोटा बच्चा, माँ जो कुछ हाथ में दे दे, बिना यह सोचे कि यह खाने की चीज़ है या नहीं, मुँह में डाल लेता है। भगवान भक्त की भेंट वैसे ही लेते हैं।

और "प्रयतात्मनः", शुद्ध हृदय वाले का। शंकराचार्य इसका अर्थ करते हैं, जिसकी बुद्धि शुद्ध है। यानी यहाँ बात बर्तन की सफ़ाई की नहीं, मन की सफ़ाई की है। मन में कोई सौदा न हो, कोई दिखावा न हो। "मैं इतना चढ़ाता हूँ, बदले में इतना मिले", यह भाव न हो। बस इतना कि आप मेरे हैं, यह आपका है।

उन्नीसवें सत्संग में आपने वह कथा सुनी थी, जब दुर्वासा अपने दस हज़ार शिष्यों के साथ वन में पाण्डवों के अतिथि बनने आए, द्रौपदी खा चुकी थीं, बटलोई ख़ाली थी, और द्रौपदी ने श्रीकृष्ण को याद किया। तिलक इस श्लोक की टीका में वही कथा याद करते हैं, और आज उसका एक नया कोना दिखता है। उस बटलोई के किनारे बस थोड़ा-सा साग और अन्न का एक कण चिपका था, और श्रीकृष्ण ने वही खाकर कहा कि इससे विश्व की आत्मा प्रसन्न और तृप्त हो। "पत्रं", एक पत्ता। और साग भी तो पत्तों की ही सब्ज़ी है। गीता में यह शब्द कहने वाले ने एक दिन वन में, बटलोई के किनारे से वह ज़रा-सा साग उठाकर, इस श्लोक को सच करके दिखा दिया था।

अब यही बात मैं महाभारत की एक और कथा में रखना चाहता हूँ, जो उद्योग पर्व में है। युद्ध से पहले श्रीकृष्ण शान्ति का प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर आए थे। अपनी बुआ कुन्ती से मिलकर, उनकी परिक्रमा करके, वे दुर्योधन के महल में गए।

पाठ उस महल का वर्णन करता है: बड़ी शोभा से भरा, इन्द्र के भवन जैसा, सुन्दर आसनों से सजा। श्रीकृष्ण तीन आँगन पार करते चले गए, किसी द्वारपाल ने उन्हें नहीं रोका। ऊपर हज़ारों राजाओं के बीच दुर्योधन बैठा था, पास में दुःशासन, कर्ण और शकुनि। श्रीकृष्ण को आते देखकर दुर्योधन अपने मन्त्रियों के साथ उठ खड़ा हुआ। उन्हें सोने के सजे हुए पलंग पर बिठाया। गाय, मधुपर्क और जल भेंट किया, और फिर, पाठ कहता है, अपने घर और अपना राज्य भी भेंट कर दिया। और फिर भोजन का न्योता दिया। पर श्रीकृष्ण ने वह न्योता स्वीकार नहीं किया।

दुर्योधन ने पूछा, कर्ण की ओर देखते हुए, ऐसी बात जो शुरू में मीठी थी और अन्त में कपट से भरी: "जनार्दन, आपके लिए जो भोजन, पेय, वस्त्र और बिछौने लाए गए, आपने उन्हें क्यों नहीं लिया? आप तो दोनों पक्षों के सम्बन्धी हैं।" श्रीकृष्ण ने पहले एक सीधा उत्तर दिया: दूत अपना काम पूरा होने पर ही भोजन करते हैं। दुर्योधन ने फिर कहा, "गोविन्द, आपसे हमारा न कोई वैर है, न झगड़ा।" तब श्रीकृष्ण ने, पाठ कहता है, मानो मुस्कुराते हुए, वह बात कही जो इस श्लोक की सबसे अच्छी टीका है: "संप्रीतिभोज्यान्यन्नानि आपद्भोज्यानि वा पुनः।" भोजन या तो प्रेम के कारण खाया जाता है, या फिर संकट में। राजन्, आप हमसे प्रेम नहीं रखते, और हम संकट में भी नहीं हैं।

और वे उठकर चले गए, विदुर के घर। वहाँ भीष्म, द्रोण, कृप और दूसरे कुरु उनसे मिलने आए और बोले, "वार्ष्णेय, हम आपको रत्नों सहित अपने घर भेंट करते हैं।" श्रीकृष्ण ने कहा, "आप सब जाइए, मेरा पूरा सम्मान हो गया।" फिर विदुर भोजन लेकर आए। और गहरी श्रद्धा से भरे विदुर ने जो कहा, वह सुनिए: "गोविन्द, इन साधारण वस्तुओं से प्रसन्न होइए। यही हमारा सबसे बड़ा धन है। वरना आपका योग्य सत्कार कौन कर सकता है?" और पाठ कहता है, श्रीकृष्ण ने अपने साथियों के साथ विदुर का वह शुद्ध भोजन खाया।

इस दृश्य को ज़रा एक साथ देखिए। एक ओर सोने का पलंग, एक पूरा राज्य, और उसके पीछे बैर। दूसरी ओर साधारण भोजन, और उसके पीछे श्रद्धा। राज्य लौट गया, साधारण भोजन खा लिया गया। "तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि।" और एक बात ध्यान में रखिए, जिस पर हम आगे लौटेंगे। उस दिन श्रीकृष्ण ने कहा था कि मुझे यहाँ केवल क्षत्ता का अन्न खाना है। क्षत्ता, यानी विदुर। विदुर कौन थे, किस माँ के बेटे थे, और भगवान ने उनके घर को क्यों चुना, यह बात इस अध्याय के एक और श्लोक के साथ खुलेगी।

अब अपने घर की ओर देखिए। बहुत-से लोग पूजा इसलिए टाल देते हैं कि अभी ठीक से नहीं कर सकते, सामग्री पूरी नहीं है, समय नहीं है। इस श्लोक के बाद यह बहाना नहीं बचता। सुबह नहाकर एक लोटा जल, उसमें प्रेम से निकला एक "जय श्रीकृष्ण", यह पूरी पूजा है। घर के बाहर लगी तुलसी का एक पत्ता, यह पूरी भेंट है। और जो बच्चा भगवान की तस्वीर के आगे अपनी टॉफ़ी रख देता है, और फिर थोड़ी देर बाद चुपके से उसे वापस भी उठा लेता है, उसने भी वही किया है जो इस श्लोक में लिखा है।

अब सत्ताईसवाँ श्लोक, और यहाँ श्रीकृष्ण एक बड़ा कदम आगे बढ़ते हैं। "यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।" तुम जो करते हो, जो खाते हो, जो हवन करते हो, जो देते हो, "यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्", और हे कुन्तीपुत्र, जो तप करते हो, वह सब मुझे अर्पण करो।

हमारी टीका इसे बड़ी सरलता से जोड़ती है: पत्ते और फूल के बाद अब पूरा जीवन ही भेंट बन जाता है। और कुछ नया नहीं करना है। जो पहले से किया जा रहा है, वही भगवान को दे दिया जाता है। सूची को फिर से सुनिए: करना, खाना, हवन, दान, तप। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, "जो करते हो" में वे सब काम आ गए जो आदमी स्वभाव से करता है, बिना किसी शास्त्र के कहे, जैसे चलना, उठना, बोलना। और "जो खाते हो", अपने पेट के लिए, शरीर चलाने के लिए। फिर हवन, दान और तप, जो शास्त्र के कहने से किए जाते हैं। यानी रोज़ के मामूली काम से लेकर सबसे पवित्र काम तक, कुछ भी इस सूची से बाहर नहीं है।

नीलकण्ठ इसका एक बहुत व्यावहारिक तरीक़ा बताते हैं। वे कहते हैं, जब चलो, तो मन में सोचो कि मैं भगवान की परिक्रमा कर रहा हूँ। और जब बोलो, तो वही भाव, मानो नाम का कीर्तन हो रहा है। सोचिए, सुबह आप दफ़्तर के लिए निकलते हैं, भीड़ में, धूप में। वही रास्ता, वही बस। पर अगर मन में यह बात हो कि यह भी उसी की परिक्रमा है, तो वही रास्ता कुछ और हो जाता है।

और मधुसूदन यहाँ व्याकरण की एक बहुत सुंदर बात पकड़ते हैं। श्लोक में "कुरुष्व" शब्द है, अर्पण करो। संस्कृत में क्रिया का यह रूप यह बताता है कि काम का फल करने वाले के अपने पास लौटता है। मधुसूदन कहते हैं, भगवान इस रूप से यह जता रहे हैं कि अर्पण का सारा फल अर्पण करने वाले को मिलता है, मुझे उसमें से कुछ नहीं चाहिए। भगवान हमारा काम लेकर अपना कुछ नहीं बढ़ाते। वे बस उसे हल्का कर देते हैं।

संत ज्ञानेश्वर इसका एक शब्द-चित्र देते हैं: जो भी काम हो, जैसा भी स्वभाव से बन पड़े, उसे "मैंने किया" की हर शंका से धो डालो, और फिर धुले हुए कर्म मेरे हाथों में दे दो। चौदहवें सत्संग में हमने देखा था कि हर काम पूजा कैसे बनता है। यह श्लोक उसी बात को भक्ति की भाषा में कहता है। वहाँ बात ज्ञान की थी, कि अर्पण भी ब्रह्म है और अर्पण करने वाला भी। यहाँ बात प्रेम की है: तुम्हारा जो कुछ है, मुझे दे दो।

और एक बात सोचने लायक है। इस सूची में दूसरे नम्बर पर क्या है? "यदश्नासि", जो खाते हो। भगवान ने खाने को हवन और तप से पहले रखा है। बहुत-से घरों में खाने से पहले थाली के पास एक कौर रखने की, या मन में एक बार भगवान को याद करने की परम्परा है। वह कोई छोटी रस्म नहीं है। वह इसी श्लोक की दूसरी पंक्ति है, जो रोज़ दो बार हमारी थाली पर पढ़ी जाती है।

पर अभी एक बात बाकी है। अगर मैंने अपना सब कुछ भगवान को दे दिया, तो उसका फल क्या होगा? और एक और प्रश्न, जो आचार्यों के मन में भी उठा है: अगर भगवान केवल उन्हें अपनाते हैं जो उन्हें प्रेम से देते हैं, तो क्या भगवान भी पक्षपात करते हैं? आइए, अगले दो श्लोक सुनते हैं।

शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः । संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥ २८ ॥
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समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः । ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥ २९ ॥
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अट्ठाईसवाँ श्लोक पिछले श्लोक का फल बताता है। "शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः।" इस प्रकार तुम शुभ और अशुभ फल देने वाले कर्म-बन्धनों से मुक्त हो जाओगे। "संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि।" संन्यास-योग से जुड़े हुए मन वाले तुम, मुक्त होकर, मुझे ही प्राप्त होगे।

इस श्लोक में एक शब्द है जिसे सुनकर बहुत-से लोग चौंकते हैं: "संन्यास"। क्या भगवान अर्जुन से कह रहे हैं कि सब छोड़कर जंगल चले जाओ? हमारी टीका साफ़ कहती है: नहीं। यहाँ संन्यास का अर्थ संसार छोड़ना नहीं है। यहाँ संन्यास का अर्थ है अपने कर्मों पर और उनके फल पर अपना दावा छोड़ देना, और उन्हें भगवान को सौंप देना। शंकराचार्य इस शब्द को दो हिस्सों में खोलते हैं। यह संन्यास है, क्योंकि सब कुछ भगवान को सौंप दिया गया। और यह योग है, क्योंकि कर्म तो चल ही रहा है। यानी हाथ काम में, और दावा भगवान के चरणों में।

और तिलक यहाँ याद दिलाते हैं कि यही बात श्रीकृष्ण तीसरे अध्याय में कह चुके थे, जिसे बारहवें सत्संग में हमने सुना था: "मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा", सब कर्म मुझमें सौंपकर, और फिर युद्ध करो। तिलक कहते हैं, गीता के अनुसार असली संन्यास यही है। भगवान का भक्त भी सब काम कृष्ण को अर्पण की भावना से करता है, काम छोड़ता नहीं।

अब "शुभ और अशुभ" पर रुकिए। बुरे कर्म बाँधते हैं, यह तो सब मानते हैं। पर भगवान कह रहे हैं कि अच्छे कर्म का फल भी एक बन्धन है। पिछले सत्संग में आपने सुना था कि जो स्वर्ग के लिए यज्ञ करते हैं, वे स्वर्ग पाते हैं, और पुण्य ख़त्म होने पर लौट आते हैं। सोने की ज़ंजीर भी ज़ंजीर ही होती है। अच्छा फल भी आदमी को फिर से उसी चक्कर में ले आता है: और चाहिए, और बचाना है, और खोने का डर।

तो इससे छूटें कैसे? संत ज्ञानेश्वर एक बहुत सीधा उदाहरण देते हैं। वे कहते हैं, बीज को आग के कुण्ड में डाल दो, तो उसमें अंकुर नहीं फूटता। वैसे ही जो कर्म मुझे अर्पित हो गए, अच्छे हों या बुरे, उनका फल नहीं उगता। और श्रीधर स्वामी उसका कारण बताते हैं: जब कर्म भगवान को सौंप दिया गया, तो उसके फल से तुम्हारा रिश्ता ही नहीं बचा। जिस चिट्ठी पर आपका पता नहीं, वह आपके घर नहीं आती।

इसे रोज़ की ज़िंदगी में देखिए। एक माँ बेटे की परीक्षा के लिए रात भर जागती है। अगर वह इसे अपनी तपस्या मानकर गिनती रखे, तो नतीजा आने पर या तो घमण्ड होगा या टूटन। पर अगर वह हर रात को भगवान के हाथ में रख दे, "मैंने अपना किया, आगे आपका", तो नतीजा कुछ भी हो, उसका मन बँधता नहीं। शंकराचार्य कहते हैं, ऐसा आदमी जीते-जी कर्म के बन्धनों से छूट जाता है, और शरीर छूटने पर भगवान को पाता है। "मामुपैष्यसि", तुम मेरे पास आओगे।

और अब, अगले श्लोक में उतरने से पहले, एक छोटी-सी बात आपसे कहना चाहता हूँ। आज के बाकी श्लोक बहुत नाज़ुक हैं। अगले श्लोक में भगवान कहेंगे, "न मुझे कोई अप्रिय है, न प्रिय", और अकेले सुनने पर यह लग सकता है कि भगवान को किसी की परवाह ही नहीं। और उसके बाद वह श्लोक आता है जो कहता है कि बहुत बुरा आचरण करने वाला भी साधु माना जाए, और अकेले सुनने पर यह किसी को छूट जैसा लग सकता है। आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। इन श्लोकों का अर्थ उनके साथ वाले श्लोकों में ही खुलता है। तो अगर आप यह सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की यह यात्रा बीच में न छूटे। और आज का यह सत्संग आख़िर तक सुनिए, क्योंकि आज के सवाल का पूरा उत्तर इसके आख़िरी हिस्सों में है।

अब उनतीसवाँ श्लोक। "समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।" मैं सब प्राणियों में सम हूँ, न कोई मुझे अप्रिय है, न प्रिय। "ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्।" परन्तु जो मुझे प्रेम से भजते हैं, वे मुझमें हैं, और मैं भी उनमें हूँ।

यह श्लोक एक प्रश्न का उत्तर है, और वह प्रश्न शंकराचार्य पिछले श्लोक के अन्त में स्वयं उठाते हैं। अगर भगवान भक्तों पर कृपा करते हैं और दूसरों पर नहीं, तो क्या उनमें भी राग और द्वेष है? क्या वे भी हमारी तरह अपने लोगों का पक्ष लेते हैं? और उत्तर के लिए शंकराचार्य आग का उदाहरण देते हैं। आग किसी से प्रेम नहीं करती, किसी से बैर नहीं रखती। पर जो उसके पास जाकर बैठता है, उसकी ठण्ड दूर हो जाती है, और जो दूर खड़ा रहता है, उसकी ठण्ड बनी रहती है। इसमें आग का पक्षपात कहाँ है? फ़र्क़ दूरी का है।

हमारी टीका यही बात सूर्य से कहती है: सूर्य का कोई पक्षपात नहीं। पर जिस घर की खिड़कियाँ खुली हैं, वह प्रकाश से भर जाता है, और जिसके दरवाज़े बन्द हैं, उसमें अँधेरा रहता है। अन्तर खोलने वाले में है। और मधुसूदन सरस्वती इस सूर्य वाले चित्र को और बारीक बना देते हैं। धूप हर जगह एक जैसी पड़ती है, पर साफ़ दर्पण में सूर्य चमक उठता है, और मिट्टी के घड़े में नहीं दिखता। इससे सूर्य को दर्पण से प्रेम नहीं हो गया, न घड़े से बैर। भक्त का मन वह साफ़ दर्पण है, जिसमें भगवान दिखने लगते हैं।

अब रामानुजाचार्य की बात सुनिए, जो इस श्लोक को एक अलग ही ऊँचाई पर ले जाती है, और जो आज के आगे के श्लोकों का रास्ता भी खोलती है। वे कहते हैं: देवता हो, पशु हो, मनुष्य हो, कोई भी जाति, कोई भी रूप, कोई भी स्वभाव, कितना भी ज्ञान, शरण लेने के लिए भगवान सबके लिए एक जैसे हैं। कोई इसलिए त्यागा नहीं जाता कि वह जन्म से या ज्ञान से नीचा है, और कोई इसलिए अधिक प्रिय नहीं होता कि वह ऊँचे कुल का है। और फिर "मयि ते तेषु चाप्यहम्" पर रामानुज एक ऐसी बात कहते हैं जिसे सुनकर आँख भर आती है। जो मेरे बिना जी नहीं सकते, वे मुझमें ऐसे रहते हैं मानो मेरे बराबर हों, और मैं उनमें ऐसे रहता हूँ मानो वे मुझसे भी बड़े हों।

संत ज्ञानेश्वर इस आधी पंक्ति को एक बीज से समझाते हैं। बरगद का पूरा पेड़ उसके छोटे-से बीज में छिपा होता है, और वही बीज फिर उस पेड़ पर लगता है। वैसे ही भक्त मुझमें है, और मैं भक्त में। बाहर से दो नाम हैं, भीतर से एक ही बात।

पर यहाँ एक कठिनाई है, और मैं उसे छिपाना नहीं चाहता। अभी जो कथा हमने सुनी, दुर्योधन के महल वाली, उसमें श्रीकृष्ण ने एक बात और कही थी। "यस्तान्द्वेष्टि स मां द्वेष्टि यस्ताननु स मामनु।" जो पाण्डवों से द्वेष करता है, वह मुझसे द्वेष करता है, और जो उनके साथ है, वह मेरे साथ है। तो क्या श्रीकृष्ण के मन में दुर्योधन के लिए द्वेष था? इस वाक्य को ध्यान से सुनिए। श्रीकृष्ण यह नहीं कह रहे कि मैं तुमसे द्वेष करता हूँ। वे कह रहे हैं कि तुम्हारा द्वेष, जो तुम पाण्डवों पर फेंक रहे हो, वह मुझ तक पहुँचता है। द्वेष की दिशा दुर्योधन की ओर से है।

और देखिए, उसी दिन वे स्वयं दुर्योधन के महल तक गए थे, शान्ति माँगने। उसी बातचीत में उन्होंने दुर्योधन को सलाह दी थी कि जो गुणवान लोग मन को अच्छे न लगें, उन्हें भी जो प्रेम से अपना बना ले, वह देर तक यश में रहता है। आग वहीं थी, उतनी ही गरम। दुर्योधन बस पास नहीं आया।

और यह बात तो आप पहले सत्संग से सुनते आ रहे हैं। युद्ध से पहले दुर्योधन और अर्जुन, दोनों द्वारका गए थे। श्रीकृष्ण ने दोनों को ख़ाली हाथ नहीं लौटाया। एक ओर उनकी पूरी नारायणी सेना, दूसरी ओर वे स्वयं, बिना हथियार के। दुर्योधन ने सेना चुनी, अर्जुन ने श्रीकृष्ण को। यही "समोऽहं" है। देने वाला दोनों के लिए एक था। जिसने जो माँगा, वह उसे मिला। चौथे अध्याय में श्रीकृष्ण कह चुके थे, "ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्", जो मुझे जैसे भजता है, मैं उसे वैसे ही भजता हूँ। जिसने सेना माँगी, उसे सेना मिली। जिसने श्रीकृष्ण को माँगा, उसके रथ पर श्रीकृष्ण बैठे।

और विश्वनाथ चक्रवर्ती, जो भक्ति के बड़े आचार्य हैं, एक बात बड़ी ईमानदारी से कहते हैं। वे कहते हैं, कुछ लोग इस श्लोक का यह अर्थ भी करते हैं कि भगवान में भक्तों के प्रति एक मीठा पक्षपात है ही, और वह पक्षपात भगवान का दोष नहीं, उनका गहना है। माँ सब बच्चों की होती है, पर जो बच्चा रोकर उसकी गोद की ओर दौड़ता है, उसे वह उठा ही लेती है।

पर अभी एक बात बाकी है। अब तक बात उसकी हुई जो प्रेम से भजता है। पर जिसके कर्म ही अच्छे नहीं, जिसने ज़िंदगी में बहुत कुछ ग़लत किया, उसका क्या? अगले दो श्लोक इस अध्याय के, और शायद पूरी गीता के, सबसे बड़े भरोसों में से हैं। आइए, सुनते हैं।

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् । साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥ ३० ॥
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क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति । कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥ ३१ ॥
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तीसवाँ श्लोक। "अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।" यदि कोई अत्यन्त दुराचारी भी अनन्य भाव से मुझे भजता है, "साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः", तो उसे साधु ही मानना चाहिए, क्योंकि उसने भली-भाँति निश्चय कर लिया है।

इस श्लोक को एक-एक टुकड़े में सुनिए, क्योंकि इसका हर शब्द सोच-समझकर रखा गया है। "अपि चेत्", यदि कोई। और फिर "चेत्सुदुराचारो" में वह छोटा-सा "सु"। केवल दुराचारी नहीं, बहुत बुरा आचरण करने वाला। शंकराचार्य इसका अर्थ करते हैं, जिसका आचरण अत्यन्त निन्दित रहा हो। भगवान किसी छोटी-मोटी ग़लती वाले की बात नहीं कर रहे। वे उस आदमी की बात कर रहे हैं जिसे समाज कब का लिखकर फेंक चुका है।

फिर "भजते मामनन्यभाक्", वह मुझे अनन्य भाव से भजता है। रामानुज कहते हैं, अनन्य वह, जिसके जीवन का एक ही प्रयोजन रह गया हो: भगवान का भजन। विश्वनाथ चक्रवर्ती इसे और खोलते हैं: वह मेरे सिवा किसी और सहारे की ओर नहीं देखता, और मुझसे कुछ और नहीं माँगता।

अब वह शब्द जिसे लोग अक्सर जल्दी में पढ़ जाते हैं: "मन्तव्यः", मानना चाहिए। विश्वनाथ और बलदेव विद्याभूषण दोनों यहाँ रुकते हैं। वे कहते हैं, यह केवल वर्णन नहीं, यह एक आज्ञा है। भगवान हमसे कह रहे हैं कि ऐसे आदमी को साधु मानो। यानी यह श्लोक केवल उस आदमी के लिए भरोसा नहीं है। यह हम सबके लिए एक निर्देश भी है कि जो लौट आया है, उसे उसके पुराने नाम से मत पुकारो।

और फिर कारण: "सम्यग्व्यवसितो हि सः", क्योंकि उसने ठीक निश्चय कर लिया है। हमारी टीका इस श्लोक की पूरी चाबी इसी में रखती है: उसे साधु बनाने वाला उसका अतीत नहीं, उसका निश्चय है। जब भगवान की ओर मुड़ने का निश्चय दृढ़ हो जाता है, तो आचरण का बदलना उसके पीछे-पीछे आता है। रामानुज बताते हैं कि वह निश्चय क्या है: यह कि भगवान ही सारे जगत् का कारण हैं, और वही मेरे स्वामी हैं, मेरे गुरु हैं, मेरे सुहृद् हैं। रामानुज कहते हैं, यह निश्चय सबको आसानी से नहीं मिलता, और इसने पा लिया है। इसलिए अगर उसके आचरण में अभी थोड़ी कमी बची भी है, तो उसके कारण उसका अनादर नहीं करना चाहिए।

पर यहाँ लोकमान्य तिलक एक बहुत ज़रूरी सावधानी जोड़ते हैं, और मैं चाहता हूँ कि आप इसे साथ लेकर चलें। तिलक कहते हैं, इस श्लोक का अर्थ यह मत समझना कि भगवान का भक्त दुराचारी बना रहे, तब भी भगवान को प्यारा रहेगा। अर्थ यह है कि कोई पहले दुराचारी रहा हो, पर जब एक बार उसकी बुद्धि भगवान के भजन में पक्की हो गई, तो फिर उसके हाथ से बुरा काम होता नहीं, और वह धीरे-धीरे धर्मात्मा बन जाता है। यह श्लोक छूट नहीं है। यह मुड़ने वाले के लिए खुला दरवाज़ा है।

संत ज्ञानेश्वर यहाँ एक चित्र देते हैं जो मुझे इस श्लोक का सबसे सच्चा चित्र लगता है। वे कहते हैं, कोई आदमी बाढ़ में डूब गया, पर मरा नहीं, जीता-जागता किनारे पर निकल आया। अब उसका डूबना व्यर्थ हो गया। वह डूबा था, यह बात अब किसी काम की नहीं, क्योंकि वह किनारे पर खड़ा है। ज्ञानेश्वर कहते हैं, उसने पश्चाताप के तीर्थ में स्नान कर लिया, और नहाकर पूरे मन से मुझमें आ गया। अब उसी का कुल पवित्र है।

मधुसूदन सरस्वती यहाँ अजामिल का नाम लेते हैं, जिसकी कथा भागवत में है। पर मैं आपको महाभारत की एक कथा सुनाना चाहता हूँ, जो शान्ति पर्व में भीष्म युधिष्ठिर को सुनाते हैं। युधिष्ठिर ने पूछा था कि शरण में आए हुए की रक्षा का धर्म क्या है, और भीष्म ने एक बहुत पुरानी कथा सुनाई।

वन में एक बहेलिया रहता था। पाठ उसके बारे में बड़े कड़े शब्द कहता है: क्रूर, काल जैसा काला और भयानक, पाप में लगा हुआ। उसका न कोई मित्र था, न सम्बन्धी; उसके क्रूर काम के कारण उसके बन्धुओं ने भी उसे छोड़ दिया था। वह जाल लेकर पक्षियों को मारता और बेचता था। और पाठ कहता है, इसी तरह जीते-जीते उसका बहुत लम्बा समय बीत गया, और उसने कभी अधर्म को पहचाना ही नहीं।

एक दिन वन में बहुत बड़ी आँधी और वर्षा आई। ठण्ड से काँपता वह भटकता रहा, और उस हाल में भी उसे ठण्ड से गिरी हुई एक कबूतरी दिखी, और उसने उसे पकड़कर अपने पिंजरे में डाल लिया। रात हुई, घर दूर था, तो वह एक बड़े पेड़ के नीचे रुका, हाथ जोड़कर पेड़ के देवताओं की शरण ली, पत्ते बिछाए और सो गया। उसी पेड़ पर उस कबूतरी का पति रहता था। कथा आगे बताती है कि कबूतर ने पत्नी के कहने पर उस शिकारी को अपना अतिथि माना। सूखे पत्तों से आग जलाकर उसे गरमाया। और जब शिकारी ने भूख की बात कही, तो उस छोटे पक्षी के पास देने को कुछ नहीं था, और उसने अतिथि के लिए अपना ही शरीर उस आग को सौंप दिया।

अब उस बहेलिये को देखिए। पाठ कहता है, वह बोल उठा: "मुझ क्रूर और मूर्ख ने यह क्या कर डाला?" और बार-बार अपने को धिक्कारने लगा। "इस धर्मात्मा पक्षी ने मुझे धर्म दिखा दिया है। अब मैं धर्म का आचरण करूँगा, क्योंकि धर्म ही परम गति है।" और फिर उसने जो पहला काम किया, वह सुनिए। उसने अपनी लाठी फेंक दी, शलाकाएँ फेंकीं, जाल और पिंजरा छोड़ दिया, और पिंजरे में बँधी उस कबूतरी को खोलकर उड़ा दिया। आगे की कथा लम्बी है, पर उसका अन्त पाठ इन शब्दों में कहता है: उसने अपने को चिन्ता से मुक्त होकर स्वर्ग में देखा।

जिसे उसके अपनों ने छोड़ दिया था, जिसने सारी उम्र अधर्म को पहचाना तक नहीं, उसके लिए भी एक रात आई जब उसने ठीक निश्चय किया। "सम्यग्व्यवसितो हि सः।" और उस निश्चय का पहला प्रमाण यह था कि पिंजरा खुल गया। यह कथा पूरी तरह हमारे श्लोक जैसी नहीं है, यह बात मैं ईमानदारी से कहूँ। यहाँ बहेलिया धर्म की ओर मुड़ता है, गीता भगवान की ओर मुड़ने की बात करती है। पर मुड़ने का वह एक क्षण, जब पुराना आदमी अपने ही किए पर रो पड़ता है और नया आदमी पहला कदम उठाता है, वह दोनों में एक-सा है।

और अब इकतीसवाँ श्लोक, जो बताता है कि उस निश्चय के बाद क्या होता है। "क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।" वह शीघ्र धर्मात्मा हो जाता है, और सदा रहने वाली शान्ति पाता है। "कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति।" हे कुन्तीपुत्र, निश्चयपूर्वक जान लो, घोषणा कर दो, कि मेरा भक्त नष्ट नहीं होता।

पहला शब्द, "क्षिप्रं", जल्दी। विश्वनाथ चक्रवर्ती क्रिया के रूप पर ध्यान दिलाते हैं। भगवान ने यह नहीं कहा कि वह धर्मात्मा "हो जाएगा"। उन्होंने कहा, "भवति", हो जाता है। विश्वनाथ एक दवा का उदाहरण देते हैं: जिसने बड़ी अच्छी दवा पी ली, उसका बुखार कुछ देर तो बना रहता है, पर उसे अब गिना नहीं जाता, क्योंकि दवा भीतर जा चुकी है। भक्ति भीतर गई, तो पुरानी आदतों की गरमी कुछ दिन रह भी जाए, फिर भी आदमी बदल चुका है।

और "शश्वच्छान्तिं", सदा की शान्ति। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, यह वह शान्ति है जिसमें विषयों की प्यास बुझ जाती है। और रामानुज एक बहुत सुंदर कड़ी जोड़ते हैं। इस श्लोक में "धर्मात्मा" शब्द है। रामानुज याद दिलाते हैं कि इस अध्याय के तीसरे ही श्लोक में श्रीकृष्ण ने इस भजन को ही धर्म कहा था, "धर्मस्यास्य परन्तप"। यानी धर्मात्मा होने का अर्थ यहाँ केवल नियम निभाने वाला नहीं, वह जिसका पूरा मन इसी भजन में रम गया।

अब इस श्लोक का सबसे अनोखा हिस्सा: "कौन्तेय प्रतिजानीहि"। तुम प्रतिज्ञा करो, तुम घोषणा करो। श्रीधर स्वामी इसका एक दृश्य बनाते हैं। वे कहते हैं, भगवान जानते थे कि कुछ लोग इस बात पर तर्क करेंगे, कहेंगे कि यह कैसे हो सकता है कि दुराचारी भी न डूबे। इसलिए वे अर्जुन से कहते हैं: जहाँ लोग बहस कर रहे हों, उस सभा में जाओ, नगाड़े बजवाकर, हाथ उठाकर, निडर होकर घोषणा करो कि मेरा भक्त नष्ट नहीं होता। और मधुसूदन लिखते हैं, भगवान यह बात ऐसे कह रहे हैं मानो भक्तों के लिए दया से भरकर थोड़े नाराज़ हों: इसमें अचरज मत मानो, यह मेरी भक्ति की महिमा है। वे प्रह्लाद का नाम लेते हैं, जिनकी कथा आपने तेरहवें सत्संग में सुनी थी।

पर एक प्रश्न है, और विश्वनाथ चक्रवर्ती उसे सीधे पूछते हैं। गीता के अन्त में, अठारहवें अध्याय में, श्रीकृष्ण ख़ुद कहते हैं, "सत्यं ते प्रतिजाने", मैं तुमसे सच्ची प्रतिज्ञा करता हूँ। तो यहाँ वे स्वयं प्रतिज्ञा क्यों नहीं करते? अर्जुन से क्यों करवाते हैं? विश्वनाथ का उत्तर सुनिए। वे कहते हैं, भगवान ने उसी समय सोचा: अपने भक्त की ज़रा-सी भी हार मैं सह नहीं सकता, इसलिए मैंने कई बार अपनी प्रतिज्ञा तोड़ी है और भक्त की प्रतिज्ञा बचाई है। लोग मेरी प्रतिज्ञा पर हँस सकते हैं, पर भक्त की प्रतिज्ञा पत्थर पर खिंची लकीर है। इसलिए यह प्रतिज्ञा अर्जुन करें। और विश्वनाथ कहते हैं, इसी युद्ध में, भीष्म के साथ लड़ाई में, यह होने वाला है।

तेईसवें सत्संग में आपने भीष्म की ओर दौड़ते श्रीकृष्ण का नौवें दिन वाला दृश्य सुना था, और अर्जुन का उन्हें दसवें कदम पर रोक लेना। महाभारत में ऐसा ही एक दृश्य तीसरे दिन भी है, जब श्रीकृष्ण चक्र लेकर रथ से कूदे थे, और उसका एक कोना आज के श्लोक के लिए है। रोक लेने के बाद अर्जुन ने कहा: "मैं प्रतिज्ञा के अनुसार अपना काम नहीं छोड़ूँगा, केशव, मैं पुत्रों और भाइयों की शपथ खाता हूँ।" पाठ कहता है, यह प्रतिज्ञा सुनकर जनार्दन मन में प्रसन्न हुए, और चक्र लिए फिर रथ पर चढ़ गए। भगवान अपनी बात छोड़ने को तैयार थे। उन्हें प्रसन्न किया भक्त की प्रतिज्ञा ने। "कौन्तेय प्रतिजानीहि।"

और अब "न मे भक्तः प्रणश्यति" को अपने लिए सुनिए। बीसवें सत्संग में श्रीकृष्ण ने अधूरे साधक से कहा था कि उसका न इस लोक में नाश है, न परलोक में। आज वही भरोसा उससे भी आगे जाता है: उस आदमी तक, जिसकी साधना अधूरी ही नहीं, जिसका पुराना जीवन ही काला रहा। अगर आपके मन में कोई पुराना बोझ है, कोई ऐसा काम जिसे याद करके आज भी आप नज़र नीची कर लेते हैं, तो यह श्लोक आपके लिए है। भगवान यह नहीं पूछ रहे कि तुम कहाँ से आए हो। वे पूछ रहे हैं कि अब तुम किस ओर मुड़े हो। और अगर आप मुड़ गए हैं, तो गीता का भगवान आपके लिए सभा में हाथ उठाकर कहलवा रहा है: यह नष्ट नहीं होगा।

पर अभी एक बात बाकी है। अब तक बात आचरण की हुई, उन लोगों की जिन्होंने स्वयं कुछ ग़लत किया। पर उस समय के समाज में कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्हें उनका किया नहीं, उनका जन्म ही कुछ दरवाज़ों से दूर रखता था। अगले श्लोक में भगवान उनका नाम लेकर बात करते हैं। आइए, सुनते हैं।

मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः । स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥ ३२ ॥
गीता 9.32 — अर्थ पढ़ें ›
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा । अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥ ३३ ॥
गीता 9.33 — अर्थ पढ़ें ›

बत्तीसवाँ श्लोक। "मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः।" क्योंकि हे पार्थ, जो मेरी शरण लेते हैं, "स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्", वे नीच योनि वाले कहे जाने वाले हों, स्त्रियाँ हों, वैश्य हों या शूद्र, वे भी परम गति को प्राप्त होते हैं।

इस श्लोक को मैं बहुत धीरे और साफ़ कहना चाहता हूँ, क्योंकि यह उन लोगों का नाम लेता है जो आज भी इसे सुनते समय रुक जाते हैं। हमारी टीका इसका अर्थ एक वाक्य में कहती है, और मैं उसी को आधार बनाऊँगा: यह श्लोक उन लोगों का नाम लेता है जिन्हें उस समय का समाज वेद के अध्ययन और यज्ञ से दूर रखता था, और घोषणा करता है कि इनमें से कोई भी बात उनके और परम गति के बीच नहीं आती। यानी यह श्लोक किसी को छोटा बताने के लिए नहीं बोला गया। यह उस समय की हर दीवार के पार एक दरवाज़ा खोलने के लिए बोला गया।

पहला शब्द, "व्यपाश्रित्य"। शंकराचार्य कहते हैं, मुझे अपना आश्रय बनाकर। मधुसूदन कहते हैं, मेरी शरण में आकर। इस श्लोक में शर्त एक ही है, और वह शुरू में ही रख दी गई है। उसके बाद गिनती है, किस-किस के लिए यह शर्त काफ़ी है।

अब वह शब्द जिस पर आचार्यों में सबसे अधिक मतभेद है: "पापयोनयः"। इसका सीधा शब्दार्थ है, जिनका जन्म पाप वाली योनि में माना गया। और प्रश्न यह है कि यह शब्द किसके लिए है। शंकराचार्य इसे आगे के नामों के साथ जोड़कर पढ़ते हैं, मानो यह शब्द स्त्री, वैश्य और शूद्र, इन्हीं का परिचय हो। श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती इसे एक अलग समूह मानते हैं, यानी समाज से बाहर रखे गए लोग, और मधुसूदन तो इसमें पशु-पक्षी तक गिन लेते हैं। उसके बाद स्त्री, वैश्य और शूद्र, जिनके बारे में वे कहते हैं कि उस समय वे वेद के अध्ययन से वंचित थे। अभिनवगुप्त भी "पापयोनयः" का अर्थ पशु, पक्षी और रेंगने वाले जीव करते हैं, और गजेन्द्र की कथा याद करते हैं, उस हाथी की, जिसे भगवान ने संकट से छुड़ाया था।

और लोकमान्य तिलक इस पर खुलकर अपनी राय देते हैं। वे लिखते हैं, कुछ टीकाकार कहते हैं कि "पापयोनयः" शब्द स्त्रियों, वैश्यों और शूद्रों पर भी लागू है, पर हमारी राय में यह अर्थ ठीक नहीं। तिलक कहते हैं, स्त्री, वैश्य और शूद्र उस वर्ग में नहीं आते; उनके मार्ग में उस समय की रीति की बस इतनी बाधा थी कि वे वेद सुनने के अधिकारी नहीं माने जाते थे। वेदान्त देशिक एक और बारीक बात कहते हैं: यह शब्द इन लोगों के बारे में वह शंका दोहराता है जो लोग करते थे, कि इन्हें परम गति कैसे मिलेगी, ताकि श्लोक उस शंका को मिटा सके।

और अभिनवगुप्त उन लोगों से साफ़ असहमत हैं जो इस श्लोक को केवल ऊँचे वर्णों की प्रशंसा मानते हैं और कहते हैं कि इसका असली अर्थ स्त्रियों और दूसरों को मुक्ति देना नहीं है। अभिनवगुप्त कहते हैं, ऐसे लोग भगवान की उस शक्ति को छोटा करते हैं जो सब पर कृपा करती है, और उनके इसी अध्याय के वचनों से टकराते हैं, "न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः", और "अपि चेत्सुदुराचारो"। तो पढ़ने के ढंग अलग हैं, पर इस एक बात पर सब आचार्य एक हैं, जो श्लोक की आख़िरी पंक्ति कहती है: "तेऽपि यान्ति परां गतिम्", वे भी परम गति पाते हैं।

संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर जो कहते हैं, वह मुझे सबसे सरल लगता है। वे कहते हैं, नदी-नाले तब तक अलग-अलग नाम वाले हैं जब तक गंगा के जल तक नहीं पहुँचते; पहुँचते ही सब गंगा हो जाते हैं। खैर की लकड़ी और चन्दन की लकड़ी का भेद तब तक है जब तक दोनों एक साथ आग में नहीं डाली गईं। नमक के दाने अलग-अलग दिखते हैं, जब तक समुद्र में नहीं घुल जाते। ज्ञानेश्वर कहते हैं, वैसे ही क्षत्रिय, वैश्य, स्त्रियाँ, शूद्र, सबकी जातियाँ तभी तक अलग हैं जब तक वे मुझ तक नहीं पहुँचे। और वे प्रह्लाद को याद करते हैं, जो दैत्यों के कुल में जन्मे थे और जिनके लिए भगवान ने नृसिंह का रूप लिया।

अब वल्लभाचार्य इस श्लोक के हर शब्द के लिए एक नाम देते हैं। स्त्रियों में व्रज की गोपियाँ। वैश्यों में तुलाधार नाम के एक व्यापारी, जिन्हें वे महाभारत में प्रसिद्ध बताते हैं। और शूद्रों में, वे लिखते हैं, विदुर। और यहीं वह बात खुलती है जिसका वादा मैंने आज की शुरुआत में किया था। याद है, श्रीकृष्ण ने दुर्योधन का राज्य ठुकराकर कहा था कि मुझे केवल क्षत्ता का अन्न खाना है? तो विदुर कौन थे?

यह कथा आदि पर्व में है। जब व्यास विचित्रवीर्य की विधवा रानियों को पुत्र देने आए, तो बड़ी रानी अम्बिका से धृतराष्ट्र जन्मे, छोटी रानी अम्बालिका से पाण्डु। जब तीसरी बार अम्बिका को बुलाया गया, तो वह ऋषि के रूप से डरकर स्वयं नहीं गई, और अपने गहनों से सजाकर अपनी एक दासी को भेज दिया। उस दासी ने ऋषि का आदर से स्वागत किया, प्रणाम किया, प्रेम से उनकी सेवा की। और व्यास उससे प्रसन्न हुए। जाते समय उन्होंने उससे कहा: "तुम अब दासी नहीं रहोगी। और हे कल्याणी, तुम्हारे गर्भ में एक बहुत श्रेष्ठ बालक आया है। वह संसार में धर्मात्मा होगा, और सब बुद्धिमानों में श्रेष्ठ।" वही बालक विदुर था। और पाठ उसी जगह एक बात कहता है जो इस श्लोक को रोशनी से भर देती है: विदुर के रूप में स्वयं धर्म जन्मे थे।

आदि पर्व आगे इसका कारण भी बताता है। माण्डव्य नाम के एक मुनि को राजा के रक्षकों ने भूल से चोरों के साथ शूल पर चढ़ा दिया था। वे जीवित बचे, और धर्मराज के भवन में जाकर पूछा कि मुझे यह दण्ड किस पाप का मिला। धर्म ने कहा, बचपन में तुमने छोटे पतिंगों की पूँछ में सींक घुसाई थी। माण्डव्य ने कहा, बालक बारह वर्ष तक जो करे, उसमें पाप नहीं, क्योंकि उसे शास्त्र की समझ नहीं होती; छोटे अपराध का भारी दण्ड दिया है, इसलिए तुम शूद्र माता से मनुष्य बनकर जन्म लोगे। और पाठ कहता है, उसी से धर्म विदुर बनकर जन्मे: धर्म और अर्थ में कुशल, लोभ और क्रोध से रहित, दूरदर्शी, शान्त, और कुरुओं के हित में लगे रहने वाले।

अब एक और बात, जो अठारहवें सत्संग में आपने सुनी थी। उद्योग पर्व की उस लम्बी रात में, जब धृतराष्ट्र ने विदुर से और ज्ञान माँगा, तो विदुर ने कहा: "मैं शूद्र माता से जन्मा हूँ, इसलिए इससे आगे कहने का साहस नहीं करता", और उन्होंने ऋषि सनत्सुजात का ध्यान करके उन्हें बुलाया। उस समय की रीति ऐसी थी, और विदुर, जो स्वयं धर्म थे, उस रीति का मान रखते थे। यह दीवार थी। और उसी हस्तिनापुर में, सोने के महल को छोड़कर, भगवान ने उसी विदुर के घर का भोजन चुना। और सत्रहवें सत्संग में आपने विदुर का अन्त सुना था, जब वन में उन्होंने युधिष्ठिर से आँख मिलाई और योग के बल से अपने प्राण उनमें मिला दिए। "तेऽपि यान्ति परां गतिम्।" यह श्लोक महाभारत में किसी कल्पना की बात नहीं। इसके सामने एक जीता-जागता आदमी खड़ा है।

और इस श्लोक को आज की आँख से सुनिए। हममें से बहुत-से लोग किसी न किसी दीवार के बाहर खड़े रहे हैं। किसी को लगता है कि मैं पढ़ा-लिखा नहीं, संस्कृत नहीं आती, मन्त्र का उच्चारण ठीक नहीं होता। किसी माँ को लगता है कि घर के कामों के बीच मेरी पूजा क्या पूजा है। इस श्लोक के बाद ये सब सवाल छोटे हो जाते हैं। शर्त एक ही रखी गई थी, "मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य", मेरी शरण आओ। बाकी सब भगवान ने अपने ऊपर ले लिया।

अब तैंतीसवाँ श्लोक। "किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा।" फिर पुण्यशील ब्राह्मणों और भक्त राजर्षियों का तो कहना ही क्या! "अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्।" इस अनित्य और सुख-रहित लोक को पाकर, तुम मेरा भजन करो।

पहली पंक्ति एक सीधी तुलना है। अगर वे भी पहुँचते हैं जिनके पास उस समय कोई सहारा नहीं माना जाता था, तो जिनके पास शास्त्र भी है, अच्छे संस्कार भी, उनके पहुँचने में क्या सन्देह? और हमारी टीका एक बात याद दिलाती है: अर्जुन स्वयं जन्म से राजर्षि हैं। यानी "भक्ता राजर्षयस्तथा" कहते हुए श्रीकृष्ण सीधे अपने सामने रथ पर बैठे मित्र की ओर देख रहे हैं। मानो कह रहे हों: अर्जुन, जब इतने लोगों के लिए दरवाज़ा खुला है, तो तुम्हारे लिए तो वह पहले से खुला खड़ा है। अब तुम किस बात की देर कर रहे हो?

अब दूसरी पंक्ति के दो शब्द, जो पहली बार सुनने में कड़वे लगते हैं: "अनित्यमसुखं", अनित्य और सुख-रहित। क्या भगवान संसार की निन्दा कर रहे हैं? हमारी टीका इसका बहुत कोमल उत्तर देती है: संसार को सुख-रहित इसलिए कहा गया है कि लोग उससे निराश न हों, बल्कि उसमें रहते हुए ही उसकी ओर मुड़ें जो स्थायी है। भगवान अर्जुन को संसार से भगा नहीं रहे। वे बस इतना कह रहे हैं कि जिस घर में तुम रह रहे हो, उसकी छत हमेशा नहीं रहेगी, तो असली सहारा अभी पकड़ लो।

और इस श्लोक में एक शब्द और है जिस पर आचार्य ज़ोर देते हैं: "प्राप्य", इसे पाकर। शंकराचार्य कहते हैं, यह मनुष्य का जन्म, जो बड़ी मुश्किल से मिलता है। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, जब तक यह शरीर नष्ट नहीं होता, तब तक जल्दी से जल्दी मेरा भजन करो, देर मत करो। और धनपति एक सीधी बात कहते हैं: "अनित्य" शब्द ने "बाद में करूँगा" वाले विचार को ही काट दिया।

इस "अनित्य और असुख" को समझाने के लिए महाभारत में एक दृष्टान्त है, और वह भी विदुर का कहा हुआ है। स्त्री पर्व में, युद्ध के बाद, जब धृतराष्ट्र अपने सौ पुत्रों के शोक में डूबे थे, तब विदुर ने उन्हें एक कथा सुनाई। एक ब्राह्मण एक भयानक वन में भटक गया, जो सिंह, बाघ और हाथियों से भरा था। डर से भागते हुए उसे एक भयंकर स्त्री ने बाँहों में जकड़ लिया। वन के बीच लताओं से ढका एक कुआँ था, वह उसमें गिरा, और लताओं में उलझकर उलटा लटक गया। नीचे कुएँ में एक बड़ा साँप था। ऊपर किनारे पर छह मुँह और बारह पैरों वाला एक हाथी धीरे-धीरे पेड़ की ओर आ रहा था। काले और सफ़ेद चूहे उस पेड़ की जड़ कुतर रहे थे। और पेड़ की डालों पर मधुमक्खियों का छत्ता था, जिससे शहद की बूँदें टपक रही थीं। और वह आदमी, उलटा लटका हुआ, उन बूँदों को पीता रहता था। पाठ कहता है, वह कभी तृप्त नहीं होता था, और उसे जीने से कभी उकताहट नहीं हुई।

धृतराष्ट्र ने दुःखी होकर पूछा, वह जगह कहाँ है, और वह आदमी कैसे छूटे? तब विदुर ने अर्थ खोला। वन यह संसार है। हिंसक पशु रोग हैं। वह स्त्री बुढ़ापा है, जो रूप और रंग छीन लेता है। कुआँ यह शरीर है। नीचे का साँप काल है। लता जीने की आशा है। छह मुँह वाला हाथी वर्ष है, छह ऋतुएँ उसके मुँह, बारह महीने उसके पैर। काले-सफ़ेद चूहे रात और दिन हैं। मधुमक्खियाँ कामनाएँ हैं, और शहद की धारें वे भोग हैं जिनमें आदमी फँसा रहता है।

इस कथा को डराने के लिए मत सुनिए। ध्यान दीजिए, कुएँ में शहद भी है। "अनित्यमसुखं" का अर्थ यह नहीं कि संसार में कोई मिठास ही नहीं। मिठास है, पर वह साँप और चूहों के बीच टपक रही है। और विदुर ने अन्त में कहा था, जो समझदार इस चक्र को जान लेते हैं, वे इसके बन्धन काट देते हैं। गीता उससे एक कदम आगे कहती है: "भजस्व माम्"। जब तक लता है, तब तक उस हाथ को पकड़ लो जो कुएँ से बाहर खींच सकता है।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने कहा, "मेरा भजन करो"। पर भजन है क्या? किस तरह किया जाए? इस अध्याय का आख़िरी श्लोक इसका उत्तर चार छोटी-छोटी सीढ़ियों में देता है, और उसी के साथ यह पूरा अध्याय सिमट जाता है। आइए, सुनते हैं।

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥ ३४ ॥
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चौंतीसवाँ श्लोक, इस अध्याय का अन्तिम। "मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।" मुझमें मन लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरा पूजन करो, मुझे नमस्कार करो। "मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः।" इस प्रकार अपने को मुझसे जोड़कर, मेरे परायण होकर, तुम मुझे ही प्राप्त होगे।

हमारी टीका इस श्लोक के बारे में एक छोटी-सी बात कहती है: एक श्लोक में पूरे अध्याय का उपदेश। और यह भी कि यही श्लोक लगभग इन्हीं शब्दों में अठारहवें अध्याय में फिर आता है, गीता के बिलकुल अन्त के पास। यानी जो बात भगवान आख़िर में सबसे प्यारी बात की तरह कहेंगे, उसे वे यहाँ पहली बार रख रहे हैं।

चार सीढ़ियाँ हैं, और आचार्य हर एक को अलग पहचानते हैं। मधुसूदन सरस्वती पूछते हैं, जब "मुझमें मन लगाओ" कह दिया, तो "मेरे भक्त बनो" अलग से क्यों? और उत्तर में एक चित्र देते हैं: राजा का सेवक राजा का काम करता है, पर उसका मन अपने बेटे में लगा रहता है। मन कहीं, सेवा कहीं। भगवान दोनों को एक जगह माँगते हैं। नीलकण्ठ चारों को एक-एक "नहीं" से खोलते हैं। मन मुझमें हो, केवल बेटे-बेटियों में नहीं। भक्त मेरे बनो, किसी राजा के नहीं, जिससे धन मिले। पूजा मेरे लिए करो, स्वर्ग के लिए नहीं। और नमस्कार मुझे करो, यानी शरण मेरी लो। और रामानुज मन लगाने का एक सुंदर चित्र देते हैं: तेल की धार की तरह। जब तेल एक बर्तन से दूसरे में उँडेला जाता है, तो धार टूटती नहीं। मन ऐसे ही उनकी ओर बहता रहे।

अब ज़रा देखिए, ये चारों सीढ़ियाँ आज के सत्संग में पहले ही आ चुकी हैं। "मद्याजी", मेरा पूजन, वह पत्ता, फूल, फल और जल था। "मन्मना", मुझमें मन, वह खाना, चलना, देना था, जो सब उन्हें अर्पण हो। "मद्भक्त", वह ठीक निश्चय था, जिसने बहुत बुरा आचरण करने वाले को भी साधु बना दिया। और "मां नमस्कुरु", मुझे नमस्कार, वह "मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य" था, शरण का वह एक कदम, जिसके आगे कोई दीवार नहीं टिकी। अध्याय ने आज जो एक-एक करके दिया, यह आख़िरी श्लोक उसे एक माला में पिरो देता है।

और अब मैं इस श्लोक को उस आदमी के पास ले जाना चाहता हूँ जो इस समय यह सब सुना रहा है। सञ्जय। उद्योग पर्व में, युद्ध से पहले, एक दिन धृतराष्ट्र ने सञ्जय से पूछा था: "तुम सब लोकों के स्वामी माधव को कैसे जानते हो? और मैं उन्हें क्यों नहीं जानता?" और फिर पूछा, जनार्दन में तुम्हारी जो भक्ति सदा बनी रहती है, वह कैसी है? सञ्जय का उत्तर बहुत छोटा है, और बहुत सुंदर: "मायां न सेवे।" मैं छल का सहारा नहीं लेता, व्यर्थ के कर्मकाण्ड नहीं करता। भक्ति से मेरा मन शुद्ध हुआ है, और शास्त्र से मैं जनार्दन को जानता हूँ।

यह सुनकर धृतराष्ट्र ने अपने बेटे से कहा: "दुर्योधन, हृषीकेश जनार्दन की शरण लो। बेटा, सञ्जय हमारे भरोसे का आदमी है, केशव की शरण में जाओ।" और दुर्योधन ने उत्तर दिया: "चाहे देवकी के पुत्र भगवान लोकों का नाश कर दें, मैं उन केशव की शरण में नहीं जाऊँगा, जो अर्जुन से अपनी मित्रता की बात करते हैं।" एक नमस्कार। बस एक "मां नमस्कुरु"। आज हमने सुना कि जिसे उसके अपनों ने छोड़ दिया था, वह बहेलिया भी एक रात मुड़ गया। और जिसके पास सब कुछ था, सोने का महल, हज़ारों राजा, वह एक बार झुक नहीं सका।

और उसी दिन व्यास ने धृतराष्ट्र से एक बात कही थी, जो आज बहुत सच लगती है: "राजन्, आप कृष्ण के प्रिय हैं, क्योंकि आपके दूत सञ्जय हैं, जो आपको परम कल्याण की ओर ले जाएँगे।" सोचिए, आज वही सञ्जय, उसी अन्धे राजा के सामने बैठकर, यही नौवाँ अध्याय सुना रहे हैं। "मन्मना भव मद्भक्तो।" संत ज्ञानेश्वर इस अध्याय के अन्त में सञ्जय का एक चित्र बनाते हैं। वे कहते हैं, ये वचन कहते-कहते सञ्जय का मन भर आया, गला रुँध गया, आँखों से आनन्द के आँसू बहने लगे, रोंगटे खड़े हो गए; और बूढ़े राजा चुपचाप वैसे ही बैठे रहे। फिर सञ्जय ने आँसू पोंछे और सँभलकर आगे कहना शुरू किया। यह ज्ञानेश्वर की अपनी कल्पना है, पर इस अध्याय के बाद कोई सुनाने वाला वैसा ही हो जाए, तो अचरज नहीं।

और आज केवल एक श्लोक नहीं, गीता का नौवाँ अध्याय पूरा हो रहा है। राजविद्या, सब विद्याओं का राजा। तीन सत्संगों में हमने इसे सुना। पहले यह कि सब कुछ उन्हीं में है, फिर भी वे किसी चीज़ में बँधे नहीं। फिर यह कि वे ही यज्ञ हैं, वे ही औषधि, और जो उन्हें अनन्य भाव से भजते हैं, उनका भार वे स्वयं उठाते हैं। और आज यह, कि उन्हें पाने के लिए न सोना चाहिए, न ऊँचा कुल, न बेदाग़ अतीत। एक पत्ता चाहिए, और एक बार मुड़ जाना। अध्याय के दूसरे श्लोक में भगवान ने कहा था, "सुसुखं कर्तुमव्ययम्", यह करने में बहुत सरल है। आज हमने देखा कि वह कितना सरल था।

दसवाँ अध्याय, महाभारत के भीष्म पर्व का चौंतीसवाँ, "विभूति योग", श्रीकृष्ण इन शब्दों से शुरू करते हैं: "भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः। यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया।" एक शब्द पर ध्यान दीजिए: "प्रीयमाणाय", तुम जो प्रसन्न हो रहे हो। मानो आज की बातें सुनते हुए श्रीकृष्ण ने अर्जुन के चेहरे पर कुछ खिलते देख लिया हो। वह क्या था, और उसके बाद वे क्या कहते हैं, यह अगले सत्संग में।

तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली बात। भगवान दाम नहीं, प्रेम माँगते हैं। "पत्रं पुष्पं फलं तोयं", एक पत्ता, एक फूल, एक फल, थोड़ा जल। सोने के महल का राज्य लौट गया, विदुर का साधारण भोजन खा लिया गया। और जो कुछ आप रोज़ करते हैं, खाना, कमाना, देना, वही उन्हें दे दीजिए। कुछ नया नहीं करना है।

दूसरी बात। आपका अतीत आपको तय नहीं करता, आपका निश्चय करता है। "साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः।" जिस बहेलिये ने सारी उम्र अधर्म को पहचाना तक नहीं, उसने भी एक रात पिंजरा खोल दिया। पुराने बोझ को लेकर भगवान से दूर मत रहिए। उसी बोझ को लेकर मुड़ जाइए।

तीसरी बात। उनकी शरण के आगे कोई दीवार नहीं टिकती। "मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य", जन्म, कुल, पढ़ाई, कुछ भी बीच में नहीं आता; विदुर इसके गवाह हैं। और यह जीवन अनित्य है, कुएँ की उस लता की तरह। इसलिए जो करना है, आज कीजिए। आज रात सोने से पहले, बस एक बार, सच्चे मन से, "मां नमस्कुरु"।

आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आज आप भगवान को क्या अर्पित करेंगे? एक पत्ता, एक रोज़ का काम, या कोई पुराना बोझ, जिसे आप अब तक अकेले उठाए घूम रहे थे? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।

भगवान ने आज यह नहीं पूछा कि आप कहाँ से आए हैं। उन्होंने अर्जुन से बस इतना कहलवाया: मेरा भक्त नष्ट नहीं होता।

जय श्री कृष्ण।

क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति । कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥ ३१ ॥
गीता 9.31 — अर्थ पढ़ें ›

तीन बातें

  1. भगवान दाम नहीं, प्रेम माँगते हैं। "पत्रं पुष्पं फलं तोयं", एक पत्ता, एक फूल, एक फल, थोड़ा जल। सोने के महल का राज्य लौट गया, विदुर का साधारण भोजन खा लिया गया। और जो कुछ आप रोज़ करते हैं, खाना, कमाना, देना, वही उन्हें दे दीजिए। कुछ नया नहीं करना है।
  2. आपका अतीत आपको तय नहीं करता, आपका निश्चय करता है। "साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः।" जिस बहेलिये ने सारी उम्र अधर्म को पहचाना तक नहीं, उसने भी एक रात पिंजरा खोल दिया। पुराने बोझ को लेकर भगवान से दूर मत रहिए। उसी बोझ को लेकर मुड़ जाइए।
  3. उनकी शरण के आगे कोई दीवार नहीं टिकती। "मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य", जन्म, कुल, पढ़ाई, कुछ भी बीच में नहीं आता; विदुर इसके गवाह हैं। और यह जीवन अनित्य है, कुएँ की उस लता की तरह। इसलिए जो करना है, आज कीजिए। आज रात सोने से पहले, बस एक बार, सच्चे मन से, "मां नमस्कुरु"।