मैं ही यज्ञ, मैं ही औषधि
गीता 9.13–9.25 · 77 मिनट
जो सिर्फ़ उन्हें सोचते हैं, उनका भार वे उठाते हैं
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥ १३ ॥
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः ।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥ १४ ॥
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते ।
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥ १५ ॥
कभी रात को अचानक नींद खुली है, और मन में यह सवाल उठा है: अगर कल मैं न रहूँ, या बीमार पड़ जाऊँ, या मुझसे कुछ न हो पाए, तो घर का क्या होगा? बच्चों की पढ़ाई, माँ-बाप की दवा, किश्तें, और वह सब जो इस समय मेरे कन्धों पर टिका है? हम सब किसी न किसी बोझ को उठाए चल रहे हैं, और भीतर कहीं यह डर बैठा रहता है कि अगर मैं थक गया, तो यह बोझ कौन उठाएगा। आज के श्लोकों में श्रीकृष्ण इसी डर का उत्तर देते हैं, एक छोटे-से शब्द में: "वहाम्यहम्", मैं उठाता हूँ।
जय श्री कृष्ण।
आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का छब्बीसवाँ सत्संग है, और नौवें अध्याय का दूसरा। आपको याद रहे, यह सब हमें सञ्जय सुना रहे हैं, हस्तिनापुर के महल में, अन्धे राजा धृतराष्ट्र को, उस दिन जब भीष्म बाणों की शय्या पर गिर चुके हैं। महाभारत के भीष्म पर्व का तैंतीसवाँ अध्याय ही गीता का नौवाँ अध्याय है, "राजविद्या राजगुह्य योग", यानी विद्याओं का राजा और रहस्यों का राजा।
पहले जल्दी से याद कर लें कि पिछली बार हम कहाँ रुके थे। पिछले सत्संग में श्रीकृष्ण ने कहा था कि यह ज्ञान करने में बहुत सरल है, और प्रत्यक्ष अनुभव में आता है। फिर वह बड़ी बात आई, "मया ततमिदं सर्वं", यह सारा जगत् मुझसे व्याप्त है, सब प्राणी मुझमें हैं, पर मैं उनमें बँधा नहीं। और उसकी उपमा, जैसे हवा पूरे आकाश में चलती है, फिर भी आकाश उससे छुआ नहीं जाता। और पिछला सत्संग एक कड़वी बात पर रुका था। "अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्", जब मैं मनुष्य का शरीर लेकर आता हूँ, तो नासमझ लोग मेरा अनादर करते हैं। और ऐसे लोगों की आशा भी व्यर्थ, कर्म भी व्यर्थ, ज्ञान भी व्यर्थ।
अब आज का पहला श्लोक इसी के ठीक सामने खड़ा है। "महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः।" परन्तु हे पार्थ, दैवी स्वभाव का सहारा लिए हुए महात्मा, "भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्", मुझे सब प्राणियों का आदि और कभी न मिटने वाला जानकर, अनन्य मन से भजते हैं।
पहला शब्द देखिए, "महात्मानस्तु"। यह "तु" एक मोड़ है, जैसे हम कहते हैं, "पर दूसरी ओर"। एक ओर वे थे जो इस मनुष्य-रूप को देखकर हँसे, और दूसरी ओर ये हैं। और महात्मा का अर्थ क्या है? शंकराचार्य बहुत सीधा अर्थ करते हैं: जिसका मन छोटा नहीं है। महात्मा कोई जटा या चोला नहीं, बड़ा मन है। श्रीधर स्वामी कहते हैं, जिसका मन काम और क्रोध से दबा नहीं है। और "दैवी प्रकृति" क्या है, यह वे सोलहवें अध्याय की ओर उँगली करके बताते हैं, जहाँ अभय, मन की शुद्धि, दया जैसे गुण गिनाए जाएँगे। और नीलकण्ठ एक बहुत ईमानदार बात जोड़ते हैं। वे पूछते हैं, क्या ये लोग इसलिए भजते हैं कि सब भज रहे हैं, भीड़ के पीछे-पीछे? या दिखावे के लिए? नहीं। "ज्ञात्वा", जानकर भजते हैं। उन्होंने पहचान लिया है कि यह कौन है।
अब ज़रा सोचिए, एक ही मनुष्य-रूप, और दो तरह की आँखें। महाभारत में यह दृश्य सचमुच हुआ था, और उसके बीच में वही भीष्म खड़े थे जो आज बाणों की शय्या पर हैं। यह सभा पर्व की कथा है, युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ की, और यह कथा आज के सत्संग में धीरे-धीरे खुलेगी।
पाठ बताता है कि युधिष्ठिर के धर्म से राज करने पर प्रजा अपने-अपने काम में लगी थी, बादल समय पर बरसते थे, न सूखा था, न रोग। जब यज्ञ का मन बना, तो युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से एक बात कही, जो मुझे बहुत प्यारी लगती है: "हे कृष्ण, आपके कारण यह सारी पृथ्वी मेरे वश में है, और आपकी कृपा से मैंने यह धन पाया है।" जिसके पास सब कुछ था, वह मान रहा था कि सब किसका दिया है। यह बात हमें आज के सत्संग के अन्त तक काम आएगी।
फिर यज्ञ में बड़े-बड़े राजा आए, और एक प्रश्न उठा कि सबसे पहला सम्मान किसे दिया जाए। भीष्म ने श्रीकृष्ण का नाम लिया। और तब चेदि का राजा शिशुपाल भड़क उठा। तेरहवें सत्संग में आपने सुना था कि उसने भरी सभा में श्रीकृष्ण को "ग्वाला" कहा। यही वह आँख है जिसकी बात पिछले श्लोकों में थी। उसे सामने केवल एक मनुष्य दिखा, एक ग्वाला, एक यादव। "मानुषीं तनुमाश्रितम्।"
और भीष्म? उन्होंने उत्तर में जो कहा, उसमें इस श्लोक का "ज्ञात्वा" छिपा है। भीष्म कहते हैं, "मैंने ज्ञान में बड़े बहुत-से लोगों की सेवा की है, और उन्हें इनके गुणों का वर्णन करते सुना है। इनके जन्म से लेकर जो कर्म हैं, वे लोगों ने बार-बार कहे, और मैंने फिर-फिर सुने।" देखिए, भीष्म का जानना कहाँ से आया? सुनने से, और बार-बार सुनने से। और आगे वे कहते हैं, "हम इनकी पूजा न रिश्ते के कारण करते हैं, न किसी लाभ के लिए।" यही "भजन्त्यनन्यमनसो" का अनन्य मन है। मन में कोई दूसरा हिसाब नहीं। न रिश्ता, न फ़ायदा। बस पहचान, और प्रेम।
अब चौदहवाँ श्लोक, जो बताता है कि ये महात्मा भजते कैसे हैं। "सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः।" वे दृढ़ व्रत वाले, निरन्तर मेरा कीर्तन करते हुए, यत्न करते हुए, "नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते", और भक्ति से मुझे नमस्कार करते हुए, नित्य जुड़े रहकर मेरी उपासना करते हैं।
इसमें चार-पाँच काम गिनाए गए हैं, और श्रीधर स्वामी इन पर एक बहुत सुंदर बात कहते हैं। वे कहते हैं, यह ज़रूरी नहीं कि हर आदमी ये सब एक साथ करे। कोई स्तोत्र और मन्त्रों से कीर्तन करता है, कोई इन्द्रियों को समेटने और पूजा का यत्न करता है, कोई भक्ति से प्रणाम करता है। और "नित्ययुक्ता", हर समय सावधान, यह सब पर लागू होता है। यानी भगवान के दरबार में एक ही दरवाज़ा नहीं है। किसी का स्वभाव गाने का है, किसी का चुपचाप सेवा का, किसी का बस सिर झुकाने का।
"सततं", निरन्तर, इस पर विश्वनाथ चक्रवर्ती एक बात कहते हैं जो आज के आदमी के बहुत काम की है। वे एक पुरानी स्मृति का भाव बताते हैं कि भगवान के नाम के लिए न जगह का नियम है, न समय का। यानी आप दफ़्तर जाती हुई बस में हैं, रसोई में हैं, अस्पताल के गलियारे में किसी की रिपोर्ट का इन्तज़ार कर रहे हैं, नाम लेने के लिए आपको किसी शुभ घड़ी या पवित्र जगह की राह नहीं देखनी। और विश्वनाथ "यतन्तश्च", यत्न करते हुए, का एक बहुत सच्चा चित्र देते हैं: जैसे कोई गरीब गृहस्थ अपने परिवार के लिए धनवानों के दरवाज़े पर बार-बार जाता है, वैसे भक्त भक्तों की संगत में बार-बार जाता है, कि कहीं कीर्तन का, भक्ति का थोड़ा-सा धन मिल जाए।
और रामानुज इस श्लोक का जो चित्र खींचते हैं, उसमें प्रेम की गर्मी है। वे कहते हैं, ऐसे भक्त भगवान के नाम याद करके रोमांचित हो जाते हैं, गला भर आता है, और वे "राम, नारायण, कृष्ण, वासुदेव" जैसे नाम लेते रहते हैं। और प्रणाम करते समय वे यह नहीं देखते कि ज़मीन पर धूल है, कीचड़ है या कंकड़। जिसने किसी अपने को बहुत दिनों बाद स्टेशन पर उतरते देखा हो, वह जानता है कि उस घड़ी आदमी कपड़ों की सलवटें नहीं देखता।
और संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर जैसे नाच उठते हैं। वे कहते हैं, इन भक्तों के कीर्तन ने प्रायश्चित्त का धन्धा ही बन्द करवा दिया, क्योंकि पाप का नाम ही नहीं बचा। यमराज पूछते हैं, अब हम किसे वश में करें? तीर्थ पूछते हैं, अब हम क्या खाएँ, यहाँ तो धोने के लिए कोई दोष ही नहीं। और फिर ज्ञानेश्वर भगवान के मुँह से एक बहुत मीठी बात कहलवाते हैं: "मैं वैकुण्ठ में नहीं मिलता, सूर्य के मण्डल में भी नहीं, योगियों के मन को भी लाँघकर निकल जाता हूँ। पर जहाँ मेरे भक्त मेरा नाम गाते हैं, वहाँ मुझे खोया हुआ ढूँढ लेना।"
और "नमस्यन्तश्च", नमस्कार करते हुए, पर ज्ञानेश्वर दो उपमाएँ देते हैं जो मुझे इस श्लोक की सबसे अच्छी व्याख्या लगती हैं। जैसे ऊँचाई से गिरा पानी अपने आप नीची ज़मीन की ओर बहता है, वैसे ही ये भक्त हर प्राणी को देखकर झुक जाते हैं। और जैसे फल से लदी डाली अपने आप धरती की ओर झुक जाती है। यानी उनका झुकना कोई कसरत नहीं, भीतर के भराव का स्वभाव है। जो भरा है, वह झुकता है।
अब पंद्रहवाँ श्लोक। "ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते।" कुछ दूसरे लोग ज्ञान-यज्ञ से मेरा पूजन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, "एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्", कोई मुझे अपने से एक मानकर, कोई अलग मानकर, और कोई सब ओर मुख वाले मुझको अनेक रूपों में।
हमारी टीका इस श्लोक पर एक बड़ी उदार बात कहती है: यह श्लोक एक साथ कई रास्तों को जगह देता है। एक वह, जो अपने और भगवान में भेद नहीं देखता। एक वह, जो भगवान को अपने से अलग स्वामी मानकर पूजता है। और एक वह, जो संसार के अनेक रूपों में भगवान को देखता है। श्रीधर स्वामी तीनों को साफ़ नाम देते हैं। कोई "एक ही परम ब्रह्म है" इस भाव से। कोई "मैं उनका दास हूँ" इस भाव से। और कोई ब्रह्मा, रुद्र जैसे अनेक रूपों में उन्हीं को देखकर। मधुसूदन सरस्वती इन्हें ऊँचे, बीच के और धीमे साधक कहते हैं, पर साथ में यह भी कहते हैं कि हर एक, अपनी जगह से, अगली सीढ़ी पाता है। और तिलक एक ऐतिहासिक बात कहते हैं: अद्वैत, द्वैत, विशिष्टाद्वैत जैसे सम्प्रदाय भले बाद में बने, पर ये विचार गीता जितने पुराने हैं।
और ज्ञानेश्वर इसे दो चित्रों में रखते हैं। जो आदमी सपने से जागता है, वह कहता है, "सपने की वह सारी अनोखी सेना मैं ही तो था।" यह एकत्व है। और दूसरा चित्र: एक ही पेड़ की छोटी-बड़ी डालियाँ, एक ही सूरज की बहुत-सी किरणें। डालियाँ अलग दिखती हैं, पर पेड़ एक है। आपके घर में कोई "शिव" कहता होगा, कोई "राम", कोई "माँ", कोई चुपचाप आँख बन्द करके "वह" कहता होगा। यह श्लोक किसी को बाहर नहीं करता।
पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने कहा, "बहुधा विश्वतोमुखम्", लोग मुझे अनेक रूपों में पूजते हैं। तो प्रश्न उठता है: इतने रूप, और फिर भी सब उन्हीं की पूजा कैसे? इसका उत्तर अगले श्लोक में है, और वह इस अध्याय का सबसे अद्भुत श्लोक है, जिसमें श्रीकृष्ण एक-एक करके कहते हैं, "यह मैं हूँ, यह भी मैं हूँ।" आइए, सुनते हैं।
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् ।
मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ॥ १६ ॥
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ।
वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च ॥ १७ ॥
"अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्।" मैं क्रतु हूँ, मैं यज्ञ हूँ, मैं स्वधा हूँ, मैं औषधि हूँ। "मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्।" मैं मन्त्र हूँ, मैं ही घी हूँ, मैं अग्नि हूँ, और हवन करना भी मैं ही हूँ।
इस श्लोक को धीरे-धीरे सुनिए, क्योंकि इसमें आठ बार "मैं" आता है, और हर "मैं" के पीछे यज्ञ की एक चीज़ है। आइए, एक-एक को देखें।
क्रतु और यज्ञ, दोनों का अर्थ यज्ञ ही है, तो दोनों क्यों? शंकराचार्य कहते हैं, क्रतु है वेद में बताया हुआ बड़ा यज्ञ, और यज्ञ है स्मृति में बताया हुआ यज्ञ। श्रीधर स्वामी दोनों के उदाहरण देते हैं: क्रतु जैसे अग्निष्टोम, और यज्ञ जैसे घर के रोज़ के पाँच यज्ञ। तिलक यहाँ एक रोचक बात जोड़ते हैं: "यज्ञ" शब्द का अर्थ समय के साथ बढ़ता गया, देवपूजा, अतिथि का सत्कार, जप, सब यज्ञ कहलाने लगे, पर "क्रतु" शब्द अपने पुराने अर्थ में ही टिका रहा। यानी श्रीकृष्ण कह रहे हैं: बड़े से बड़ा राजसी यज्ञ भी मैं, और घर के आँगन का छोटा-सा रोज़ का यज्ञ भी मैं।
स्वधा, यह वह अन्न है जो पितरों को श्राद्ध में दिया जाता है। औषधि, इसके दो अर्थ शंकराचार्य बताते हैं। एक, वह अन्न जो सब प्राणी खाते हैं, धान, जौ, जो धरती की वनस्पतियों से उपजता है। और दूसरा, वह दवा जो रोग शान्त करती है। फिर मन्त्र, जिसके साथ देवताओं और पितरों को आहुति दी जाती है। आज्य, यानी यज्ञ का घी। अग्नि, जिसमें आहुति पड़ती है। और हवन, आहुति डालने की क्रिया ख़ुद।
मधुसूदन सरस्वती एक प्रश्न उठाते हैं: श्रीकृष्ण सीधे एक बार यह क्यों नहीं कह देते कि "सब कुछ मैं हूँ"? हर चीज़ के साथ अलग से "मैं" क्यों? और उत्तर देते हैं: ताकि यह समझ आ जाए कि इनमें से किसी एक को भी भगवान जानकर देखना भी उपासना है। आपको पूरा यज्ञ समझ में न आए, तो एक घी की बूँद से शुरू कीजिए।
और हमारी टीका इस श्लोक का सार एक वाक्य में कहती है, जो याद रखने लायक है: यज्ञ का हर अंग भगवान है, और पूजा करने वाला कभी भी आहुति से बाहर किसी को आहुति नहीं देता। चौदहवें सत्संग में आपने वह श्लोक सुना था, "ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।" अर्पण ब्रह्म, घी ब्रह्म, अग्नि ब्रह्म। वहाँ यह बात ब्रह्म के नाम से कही गई थी। यहाँ श्रीकृष्ण वही बात "मैं" कहकर कह रहे हैं। जो दूर का सिद्धान्त था, वह अब सामने बैठा हुआ अपना हो गया।
अब इसे अपने घर में उतारकर देखिए। सुबह रसोई में चूल्हा जलता है, वह अग्नि है। जो आटा गूँधा जाता है, वह औषधि है, धरती से उपजा अन्न। जो हाथ उसे बेलते हैं, और जो मन उसमें स्नेह डालता है, वह आहुति है। और जो खाकर काम पर जाता है, उसके भीतर भी वही बैठा है। और औषधि का दूसरा अर्थ उस माँ से पूछिए जो रात दो बजे बुख़ार में तपते बच्चे को दवा पिला रही है। उस घड़ी उस चम्मच में दवा भी वही है, और वह काँपता हुआ हाथ भी। अस्पताल में जो नर्स चुपचाप ड्रिप बदल रही है, उसकी सावधानी भी इसी श्लोक का हिस्सा है। यही आज के सत्संग का नाम है: मैं ही यज्ञ, मैं ही औषधि।
अब वह कथा आगे बढ़ाते हैं जो हमने पिछले खंड में शुरू की थी, क्योंकि उस राजसूय में ठीक इसी श्लोक का एक दृश्य घटा था। यज्ञ की भूमि सजी थी। नारद वहाँ थे, और पाठ कहता है कि नारद हरि को जानते थे, "यज्ञों से पूजे जाने योग्य ईश्वर" के रूप में। श्रीकृष्ण आए, और युधिष्ठिर ने उन्हें सूर्य जैसा चमकता एक आसन दिया, जिस पर पहले कोई नहीं बैठा था।
तब भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा, "राजाओं का यथायोग्य सम्मान किया जाए। ज्ञानी कहते हैं कि छह लोग अर्घ्य के योग्य होते हैं: आचार्य, ऋत्विज, सम्बन्धी, स्नातक, मित्र और राजा। इनमें से जो सबसे श्रेष्ठ हो, उसे पहले अर्घ्य दिया जाए।" और युधिष्ठिर ने पूछा, और इस प्रश्न का एक शब्द आज हमें आगे बहुत काम आएगा: "हे पितामह, आप किस एक को अर्घ्य देना उचित मानते हैं?"
पाठ कहता है, शान्तनु के पुत्र भीष्म ने अपनी बुद्धि से निश्चय करके, वृष्णिवंशी कृष्ण को पृथ्वी पर सबसे अधिक पूजा के योग्य माना। और कहा, "इन सबके बीच ये तेज, बल और पराक्रम से ऐसे चमकते हैं जैसे तारों के बीच सूर्य। जैसे बिना सूरज की जगह सूरज से जगमगा उठती है, और बिना हवा की जगह हवा से खिल उठती है, वैसे ही हमारी यह सभा कृष्ण से जगमगा रही है।"
फिर भीष्म की अनुमति से सहदेव ने विधिपूर्वक श्रीकृष्ण को उत्तम अर्घ्य दिया: गाय, अर्घ्य और मधुपर्क। और पाठ एक बहुत बारीक बात कहता है: वहाँ बैठे सब क्षत्रिय एक-दूसरे का मुँह देखने लगे, और उस पूजा को अपने हृदयों में रख लिया। कोई कुछ बोला नहीं। पर हर एक के मन में कुछ हुआ। किसी के मन में श्रद्धा, किसी के मन में जलन। और श्रीकृष्ण ने, पाठ कहता है, वह पूजा शास्त्र में बताई विधि से स्वीकार की।
अब इस दृश्य को आज के श्लोक के साथ रखिए। यज्ञ चल रहा है। अग्नि है, घी है, मन्त्र हैं, ऋत्विज हैं। और उस यज्ञ का पहला अर्घ्य किसे जा रहा है? उसी को, जो कुरुक्षेत्र में खड़ा होकर कह रहा है, "अहं क्रतुरहं यज्ञः", मैं ही यज्ञ हूँ। उस दिन भीष्म ने जो कुछ देखा था, वह आज रथ पर शब्दों में कहा जा रहा है।
और अब, इससे पहले कि हम अगले श्लोक में उतरें, एक छोटी-सी बात आपसे कहना चाहता हूँ। आज के सत्संग में श्रीकृष्ण एक बहुत बड़ी तस्वीर बना रहे हैं, कि यज्ञ से लेकर सूरज तक, जन्म से लेकर मृत्यु तक, सब वही हैं। और यह तस्वीर एक वचन पर जाकर रुकती है, जो गीता के सबसे बड़े भरोसों में से एक है: जो मुझे अनन्य मन से याद करते हैं, उनका भार मैं उठाता हूँ। आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। जो आदमी केवल "सब कुछ भगवान हैं" सुनकर उठ जाए, उसे यह बात बहुत बड़ी पर बहुत दूर लगेगी। और जो केवल "भार मैं उठाता हूँ" सुन ले, वह उसे सस्ता वादा समझ लेगा। तो अगर आप यह सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की यह यात्रा बीच में न छूटे। और आज का यह सत्संग आख़िर तक सुनिए, क्योंकि आज का सबसे बड़ा भरोसा अभी आना बाकी है।
अब सत्रहवाँ श्लोक। "पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः।" मैं ही इस जगत् का पिता हूँ, माता हूँ, धारण करने वाला हूँ, और पितामह हूँ। "वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च।" जानने योग्य मैं, पवित्र करने वाला मैं, ओंकार मैं, और ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं।
पिता और माता, दोनों एक साथ। संत ज्ञानेश्वर इस पर एक अद्भुत उपमा देते हैं: जैसे अर्धनारीश्वर में जो पुरुष है, वही नारी भी है, वैसे ही मैं जगत् का पिता भी हूँ और माता भी। धाता, शंकराचार्य और श्रीधर इसका अर्थ करते हैं, कर्मों का फल बाँटने वाला। मधुसूदन एक और अर्थ देते हैं, पालने-पोसने वाला। यानी जो जन्म देता है, वही पालता भी है, और वही हर किए का हिसाब भी रखता है। और पितामह, यानी पिता के भी पिता। विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं, क्योंकि वे सृष्टि रचने वाले ब्रह्मा के भी जनक हैं।
पवित्र, मधुसूदन बताते हैं, जिससे आदमी शुद्ध होता है: गंगा का स्नान, गायत्री का जप। ओंकार, जिसे रामानुज वेदों का बीज कहते हैं। और ऋक्, साम, यजुः। मधुसूदन तीनों का भेद बहुत सरल ढंग से बताते हैं: जिसके चरण और अक्षर बँधे हुए हों, वह ऋक्। वही जब गाकर कहा जाए, तो साम। और जो गद्य की तरह, बिना गाए कहा जाए, वह यजुः। यानी भगवान केवल पढ़े जाने वाले नहीं, गाए जाने वाले भी हैं। आज के श्लोक भी आप तक गाकर ही पहुँच रहे हैं।
और अब उस एक शब्द पर लौटता हूँ जिसका वादा किया था: पितामह। राजसूय में युधिष्ठिर ने भीष्म को पितामह कहकर पूछा था कि पहला अर्घ्य किसे दें। और पितामह ने उत्तर में श्रीकृष्ण का नाम लिया। आगे शिशुपाल को समझाते हुए भीष्म ने श्रीकृष्ण के लिए कहा, "हम उन्हें पूजते हैं, जो संसार के सब गुणों से भरे हैं, जो हमारे आचार्य हैं, पिता हैं और गुरु हैं।" सोचिए, कुरुओं का पितामह कह रहा है कि यह मेरा पिता है।
और अब ज़रा उस कमरे में चलिए जहाँ यह गीता सुनाई जा रही है। धृतराष्ट्र अभी-अभी सुन चुके हैं कि उनके कुल का पितामह, जिनके बल के भरोसे कभी जुआ खेला गया था, बाणों पर गिर गया। उनके लिए जैसे घर की छत गिर गई। और ठीक उसी दिन, सञ्जय के मुँह से, उन्हें यह वाक्य सुनाई दे रहा है: "पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः।" इस जगत् का पितामह मैं हूँ। घर का बड़ा चला जाए, तो लगता है सिर से साया उठ गया। यह श्लोक उस घड़ी के लिए है। जो सबका बड़ा है, वह कहीं नहीं जाता।
पर अभी एक बात बाकी है। पिता, माता, पितामह, ये तो रिश्ते हुए। अगले श्लोक में श्रीकृष्ण बारह और नाम गिनाते हैं, और उनमें दो शब्द ऐसे हैं जो मुझे इस अध्याय के सबसे कोमल शब्द लगते हैं: शरण और सुहृद्। आइए, सुनते हैं।
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥ १८ ॥
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च ।
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥ १९ ॥
"गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्।" मैं गति हूँ, भरण-पोषण करने वाला, स्वामी, साक्षी, रहने की जगह, शरण और सुहृद् हूँ। "प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्।" मैं उत्पत्ति हूँ और प्रलय, आधार हूँ, निधान हूँ, और कभी न मिटने वाला बीज हूँ।
इस एक श्लोक में बारह नाम हैं, और ध्यान से सुनें तो ये बारह नाम एक जीवन की पूरी कहानी कहते हैं: कहाँ से आए, किसने पाला, कौन देख रहा है, कहाँ रहते हैं, डर लगे तो कहाँ जाएँ, और आख़िर में कहाँ लौटेंगे।
गति, जहाँ पहुँचना है। भर्ता, जो पालता है। प्रभु, जो स्वामी है, जिसका आदेश चलता है। साक्षी, श्रीधर स्वामी कहते हैं, जो हमारे भले और बुरे दोनों को देखता है। संत ज्ञानेश्वर प्रभु शब्द पर भगवान के मुँह से एक बहुत सुंदर बात कहलवाते हैं: "आकाश सब जगह रहे, हवा एक पल भी चुप न बैठे, आग जलाए, बादल बरसे, पर्वत अपनी जगह न छोड़ें, समुद्र अपनी रेखा न लाँघे, धरती प्राणियों को उठाए रखे, यह मेरी आज्ञा है।" सुबह जब आप सूरज को ठीक समय पर उगते देखते हैं, तो वह किसी की आज्ञा मान रहा है।
अब वे दो शब्द, जिनकी बात मैंने की थी। "शरणं"। शंकराचार्य इसका अर्थ करते हैं: जो दुःखी हैं, जो शरण में आए हैं, उनका दुःख हरने वाला। मधुसूदन सरस्वती इस शब्द की जड़ में जाकर कहते हैं, शरण वह है जिसमें दुःख घुलकर मिट जाता है। और रामानुज इसमें दोनों काम देखते हैं: जो चाहिए उसे पहुँचाने वाला, और जो नहीं चाहिए उसे रोकने वाला। यह बात याद रखिए, क्योंकि आज के सबसे बड़े श्लोक में यही दो काम एक शब्द में आने वाले हैं।
और "सुहृत्"। हमारी टीका इसका अर्थ एक वाक्य में कहती है: बदले में कुछ चाहे बिना भला करने वाला। शंकराचार्य भी ठीक यही कहते हैं। सच कहूँ, यह शब्द सुनकर अपनी ज़िंदगी के रिश्तों पर नज़र जाती है। कितने लोग हैं जो हमारा भला करते हैं? बहुत हैं। पर उनमें कितने हैं जिनके भले के पीछे कोई छोटी-सी उम्मीद न हो, कि कल हम भी काम आएँगे, या कम से कम याद रखेंगे? इसमें कोई बुराई नहीं, संसार ऐसे ही चलता है। पर श्रीकृष्ण कह रहे हैं, एक ऐसा भी है जिसकी कोई उम्मीद नहीं।
और ज्ञानेश्वर इस सुहृद् पर एक ऐसी उपमा देते हैं जो मैं आपको घर ले जाने के लिए दूँगा। सूरज यह नहीं कहता कि यह समुद्र है तो इसमें चमकूँगा, और यह गली का छोटा-सा गड्ढा है तो इसमें नहीं। जहाँ पानी है, वहाँ उसका बिम्ब है। वैसे ही, भगवान कहते हैं, ब्रह्मा से लेकर सब प्राणियों का सुहृद् मैं हूँ। आप अपने को छोटा गड्ढा समझते हों, तो भी सूरज आपमें उतना ही पूरा उतरता है।
फिर निधान। हमारी टीका कहती है, निधान वह है जिसमें प्रलय के समय सब कुछ रखा रहता है, और फिर से निकाला जाता है। जैसे घर में कोई सन्दूक हो, जिसमें सर्दी के कपड़े गर्मी भर रखे रहते हैं, और सर्दी आते ही फिर निकल आते हैं। और आख़िरी शब्द, "बीजमव्ययम्", कभी न मिटने वाला बीज। श्रीधर स्वामी इस पर बारीक बात कहते हैं: धान का बीज तो बोने पर ख़ुद मिट जाता है, पौधा बन जाता है। यह बीज ऐसा नहीं। इससे सब उगता है, और यह फिर भी ज्यों का त्यों रहता है। शंकराचार्य जोड़ते हैं, बिना बीज के कुछ नहीं उगता, और संसार में रोज़ कुछ न कुछ उगता दिखता है, इसी से जानो कि बीज कहीं गया नहीं।
अब राजसूय की सभा में लौटते हैं, क्योंकि वहाँ भीष्म ने शिशुपाल को जो उत्तर दिया, वह लगभग इसी श्लोक की भाषा में है। भीष्म ने कहा, "कृष्ण ही लोकों की उत्पत्ति हैं, और उनका प्रलय भी। यह चर और अचर सारा विश्व कृष्ण के लिए ही बना है।" और फिर, "बुद्धि, मन, महत्, वायु, तेज, जल, आकाश, पृथ्वी, और चार प्रकार के प्राणी, यह सब कृष्ण में टिका है। सूर्य और चन्द्रमा, नक्षत्र और ग्रह, दिशाएँ और उपदिशाएँ, यह सब कृष्ण में टिका है।" और अन्त में भीष्म ने वह बात कही जो इस पूरे झगड़े की जड़ थी: "यह नासमझ शिशुपाल नहीं समझता कि कृष्ण हर जगह और हर समय हैं, इसीलिए ऐसे बोलता है।"
"प्रभवः प्रलयः।" भीष्म ने यह बात राजसूय की सभा में कही थी, बरसों पहले, जब सब कुछ हरा-भरा था। और आज यही बात रथ पर, स्वयं श्रीकृष्ण के मुँह से, अर्जुन से कही जा रही है। और सञ्जय इसे उस आदमी के गिरने वाले दिन सुना रहे हैं जिसने इसे सबसे पहले भरी सभा में कहा था। मुझे लगता है, धृतराष्ट्र के उस कमरे में यह बात किसी भी तर्क से ज़्यादा भारी पड़ी होगी।
अब उन्नीसवाँ श्लोक। "तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च।" मैं ही तपता हूँ, मैं वर्षा को रोकता हूँ और बरसाता हूँ। "अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन।" हे अर्जुन, मैं ही अमृत हूँ और मृत्यु भी, सत् भी मैं हूँ और असत् भी।
शंकराचार्य, मधुसूदन और नीलकण्ठ, तीनों इस श्लोक में सूरज और बादल का एक पूरा चक्र देखते हैं। सूरज बनकर मैं तपता हूँ। आठ महीने अपनी किरणों से धरती का रस खींचता हूँ, और फिर चार महीने वही रस वर्षा बनाकर लौटा देता हूँ। गाँव का कोई भी किसान यह जानता है। जेठ की धूप जितनी कड़ी, सावन उतना भरा। जिस धूप को हम कोसते हैं, वही अगली बारिश का पानी इकट्ठा कर रही होती है।
और तिलक यहाँ एक गहरी बात कहते हैं। पानी बरसाना और पानी रोकना, हमारी नज़र में एक फ़ायदे का काम है और दूसरा नुकसान का। पर असल में दोनों एक ही हाथ से होते हैं। यह बात सुनने में आसान है, पर जीने में बहुत कठिन। जब जीवन में बारिश हो रही होती है, नौकरी लगी, बच्चा हुआ, घर बना, तब हम मानते हैं कि भगवान दे रहे हैं। पर जब सूखा पड़ता है, तब लगता है कि भगवान कहीं चले गए। यह श्लोक कहता है: रोकता भी मैं ही हूँ। जो रोक रहा है, वह भी कहीं गया नहीं। वह रस इकट्ठा कर रहा है।
"अमृतं चैव मृत्युश्च।" अमृत भी मैं, मृत्यु भी मैं। रामानुज कहते हैं, जिससे संसार जीता है और जिससे मरता है, दोनों मैं। और विश्वनाथ चक्रवर्ती एक और अर्थ देते हैं: अमृत यानी मोक्ष, और मृत्यु यानी यह संसार का चक्र। ज्ञानेश्वर इसका एक चित्र देते हैं: आग लकड़ी को खाती है, और वह लकड़ी ख़ुद आग बन जाती है। मरने वाला और मारने वाला, दोनों के भीतर एक ही है।
और यहाँ मेरा मन फिर उसी शय्या की ओर जाता है। पाँचवें और छठे सत्संग में आपने सुना था कि शान्तनु ने भीष्म को वर दिया था: जब तक तुम जीना चाहोगे, मृत्यु तुम्हें छू नहीं पाएगी। और आज, जब सञ्जय यह श्लोक सुना रहे हैं, भीष्म ठीक उसी रेखा पर लेटे हैं जहाँ अमृत और मृत्यु मिलते हैं। शरीर में बाण हैं, पर प्राण उनकी इच्छा से रुके हैं, उत्तरायण की राह देख रहे हैं। जिस आदमी ने कहा था कि कृष्ण लोकों की उत्पत्ति भी हैं और प्रलय भी, वह आज अपने ही शरीर में यह देख रहा है कि दोनों एक ही हाथ में हैं।
और "सदसच्चाहमर्जुन", सत् और असत् भी मैं। श्रीधर स्वामी कहते हैं, जो दिखता है वह स्थूल, और जो नहीं दिखता वह सूक्ष्म, दोनों मैं। तिलक कहते हैं, यहाँ शायद अर्थ है जो टिकता है और जो मिट जाता है। और ज्ञानेश्वर इस पूरे खंड को एक आह के साथ समेटते हैं। भगवान कहते हैं, "अर्जुन, बताओ ऐसी कौन-सी जगह है जहाँ मैं नहीं हूँ? फिर भी प्राणियों का भाग्य देखो, कि मुझे देखते नहीं।" और एक उपमा: जैसे कोई अन्धा एक कौर अन्न के लिए दौड़ रहा हो, और पैर से टकराए चिन्तामणि को ठोकर मारकर आगे बढ़ जाए। हम सब कभी न कभी उस अन्धे की तरह दौड़े हैं।
पर अभी एक बात बाकी है। अगर यज्ञ भी वही हैं, घी भी वही, अग्नि भी वही, तो एक प्रश्न अपने आप उठता है। जो लोग बड़े-बड़े यज्ञ करते हैं, वेद पढ़ते हैं, पवित्र जीवन जीते हैं, क्या वे सब सीधे उन्हीं तक पहुँच जाते हैं? अगले दो श्लोकों में श्रीकृष्ण बहुत आदर से, पर बहुत साफ़, इसका उत्तर देते हैं। आइए, सुनते हैं।
त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा
यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक-
मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ॥ २० ॥
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं
क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ।
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना
गतागतं कामकामा लभन्ते ॥ २१ ॥
"त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते।" तीनों वेदों के अनुयायी, सोमरस पीने वाले, पापों से शुद्ध लोग, यज्ञों से मुझे पूजकर स्वर्ग की प्राप्ति चाहते हैं। "ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक-मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्।" वे पुण्य से इन्द्र का लोक पाकर, स्वर्ग में देवताओं के दिव्य भोग भोगते हैं।
इस श्लोक को सुनते समय एक बात पहले साफ़ कर लूँ, क्योंकि इसे अक्सर उलटा समझ लिया जाता है। यहाँ श्रीकृष्ण किसी बुरे आदमी की बात नहीं कर रहे। "त्रैविद्या", जो ऋक्, यजुः और साम तीनों वेद जानते हैं। "सोमपाः", जो यज्ञ में सोम पीते हैं। "पूतपापा", जिनके पाप धुल चुके हैं। यह बहुत ऊँचे, बहुत अनुशासित, बहुत पवित्र लोगों का चित्र है। वेद पढ़ना, नियम से यज्ञ करना, शुद्ध रहना, यह छोटी बात नहीं। और वेद का यह मार्ग हमारे पुरखों का मार्ग है, उसका आदर इस श्लोक में भी है।
और देखिए, श्रीकृष्ण क्या कहते हैं: "यज्ञैरिष्ट्वा", यज्ञों से पूजकर, और किसे? "मां", मुझे। यानी उनकी पूजा भी उन्हीं तक पहुँच रही है। हमारी टीका यही कहती है: उनकी पूजा श्रीकृष्ण तक ही पहुँचती है, क्योंकि यज्ञ वे ही हैं, जैसा सोलहवें श्लोक में सुना, पर वे स्वर्ग माँगते हैं, इसलिए उन्हें स्वर्ग ही मिलता है। रामानुज यही बात और खोलकर कहते हैं: वे इन्द्र आदि देवताओं के यज्ञ करते हैं, और असल में उन देवताओं के भीतर बैठे भगवान को ही पूजते हैं, पर यह जानते नहीं।
तो बात न पूजा में कमी की है, न पवित्रता में। बात केवल इतनी है: माँगा क्या? "स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते", स्वर्ग माँगा। और जो माँगा, वह मिला। पूरा मिला, ईमानदारी से मिला। "दिव्यान्दिवि देवभोगान्", स्वर्ग के दिव्य भोग।
अब इक्कीसवाँ श्लोक, और यहाँ कहानी मुड़ती है। "ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति।" वे उस विशाल स्वर्ग को भोगकर, पुण्य क्षीण होने पर, फिर मृत्युलोक में आ जाते हैं। "एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते।" इस तरह तीनों वेदों के धर्म का सहारा लेने वाले, भोग चाहने वाले लोग, बस आना-जाना ही पाते हैं।
"क्षीणे पुण्ये", पुण्य ख़त्म होने पर। यह दो शब्द इस श्लोक की कुंजी हैं। स्वर्ग कोई घर नहीं जो आपके नाम लिख दिया गया हो। वह एक खाते जैसा है, जिसमें आपने पुण्य जमा किया, और अब उसे ख़र्च कर रहे हैं। आज के आदमी की भाषा में कहूँ तो जैसे किसी ने पूरी ज़िंदगी मेहनत करके एक मोटी रकम जमा की, और फिर एक बहुत अच्छी, बहुत आराम वाली जगह पर रहने लगा, जहाँ हर दिन का किराया उसी जमा रकम से कटता है। जगह सुंदर है, कोई कमी नहीं, बस हर सुबह खाते में थोड़ा कम बचा होता है।
और "गतागतं", गया और आया। शंकराचार्य इसमें एक बारीक बात जोड़ते हैं: वे आना-जाना ही पाते हैं, स्वतन्त्रता कहीं नहीं पाते। और ज्ञानेश्वर इसकी एक उपमा देते हैं, जो सीधी दिल में उतरती है: जैसे सपने में किसी को ख़ज़ाना मिल जाए, और जागते ही सब ग़ायब। सपने में वह ख़ज़ाना झूठा नहीं था, उस समय वह पूरा सच था। पर जागना तो था ही।
अब इस "क्षीणे पुण्ये" को महाभारत की एक कथा में देखिए, जो पूरी की पूरी इसी श्लोक की तरह चलती है। यह आदि पर्व में है, कुरु वंश के एक पुरखे की कथा, राजा ययाति की। बारहवें सत्संग में आपने ययाति की जवानी वाली कथा सुनी थी, कि भोगों से उनका मन तृप्त नहीं हुआ। आज उसी ययाति की आगे की कथा।
बहुत भोगने के बाद ययाति ने अपने सबसे छोटे बेटे पूरु को राजा बनाया और वन चले गए। पाठ बताता है कि उन्होंने क्रोध को जीत लिया था, पितरों और देवताओं को तृप्त करते थे, अग्नियों में विधि से आहुति देते थे, बीने हुए दानों पर जीते थे। हज़ार वर्ष ऐसे रहे, फिर तीस वर्ष केवल जल पर, फिर एक वर्ष वायु पर, एक वर्ष पाँच अग्नियों के बीच, और छह महीने एक पैर पर खड़े होकर। और फिर, पाठ कहता है, उनकी कीर्ति धरती और आकाश को भरकर, वे स्वर्ग चले गए। "पूतपापा।" सोचिए, कितना पवित्र, कितना कठिन जीवन।
फिर स्वर्ग में एक दिन इन्द्र ने उनसे पूछा, "ययाति, तप में तुम किसके बराबर हो?" और ययाति ने उत्तर दिया, "देवताओं में, मनुष्यों में, गन्धर्वों में, महर्षियों में, मैं तप में अपने बराबर किसी को नहीं देखता।" इन्द्र ने कहा, "तुमने अपने बराबर वालों का, अपने से बड़ों का और अपने से छोटों का अपमान किया है। इसलिए तुम्हारे लोक समाप्त हो गए। पुण्य ख़त्म होने पर तुम आज गिरोगे।" एक वाक्य। हज़ारों वर्ष का तप, और एक वाक्य के घमण्ड ने खाता ख़ाली कर दिया।
ययाति ने बस एक बात माँगी, "अगर गिरना ही है, तो सज्जनों के बीच गिरूँ।" और इन्द्र ने वह मान लिया। नीचे धरती पर कुछ राजर्षि एक यज्ञ कर रहे थे, और उनमें से अष्टक ने आकाश से एक चमकते हुए आदमी को गिरते देखा, जैसे सूरज अपने रास्ते से गिर रहा हो।
अष्टक ने पूछा, "आप इतने दिन नन्दन वन में रहे, फिर उसे छोड़कर पृथ्वी पर क्यों आ गए?" और ययाति ने जो उत्तर दिया, वह मुझे इस श्लोक की सबसे सच्ची व्याख्या लगता है: "जैसे यहाँ धन ख़त्म हो जाने पर लोग किसी को छोड़ देते हैं, चाहे वह सगा हो, मित्र हो या अपना आदमी, वैसे ही वहाँ देवता उस मनुष्य को तुरन्त छोड़ देते हैं जिसका पुण्य ख़त्म हो गया।" "क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति।" आपने कभी ऐसा देखा है, किसी के अच्छे दिनों में उसके घर भीड़ लगी रहती थी, और बुरे दिन आते ही फ़ोन बजना बन्द हो गया? स्वर्ग भी, ययाति कहते हैं, उसी नियम से चलता है।
फिर वहाँ के राजाओं ने, अष्टक, प्रतर्दन, वसुमान् और शिबि ने, एक-एक करके अपने पुण्य के लोक ययाति को देने चाहे, "ले लीजिए, गिरिए मत।" और ययाति ने हर बार मना कर दिया: "मैंने कभी कुछ बिना कमाए नहीं लिया।" आख़िर में उनकी बेटी माधवी आई, जो तपस्विनी बनकर वन में रहती थी, और उसने और उसके बेटों ने अपने धर्म का फल पिता को दिया। पाँच सोने के रथ आए, और ययाति उन्हीं सज्जनों के साथ फिर स्वर्ग चले गए।
कथा का अन्त सुखद है, और उसमें सज्जनों की संगत की बड़ी महिमा है। पर इस श्लोक के लिए उस कथा का बीच का हिस्सा ज़रूरी है: स्वर्ग जितना भी ऊँचा हो, उसका आधार पुण्य का खाता है, और खाते का स्वभाव है ख़त्म होना। लौटे भी, तो फिर किसी और के पुण्य के भरोसे। "गतागतं।"
सोलहवें सत्संग में आपने मुद्गल ऋषि की कथा सुनी थी, जिन्होंने स्वर्ग के दूत से उसके गुण और दोष दोनों पूछे, और जब सुना कि वहाँ पुण्य ख़त्म होने पर गिरना पड़ता है, तो स्वर्ग का विमान लौटा दिया। ययाति ने वह दोष भोगकर जाना। मुद्गल ने सुनकर।
और एक बात, ताकि यह श्लोक किसी को डराए नहीं। श्रीकृष्ण यह नहीं कह रहे कि यज्ञ मत करो, पुण्य मत करो। वे केवल इतना कह रहे हैं कि "कामकामा", जो केवल भोग की इच्छा से करते हैं, उन्हें भोग मिलता है, और भोग का स्वभाव है ख़त्म होना। जो चीज़ ख़र्च होकर मिलती है, वह ख़र्च होकर चली भी जाती है।
पर अभी एक बात बाकी है। तो क्या हर रिश्ता खाते का ही है? क्या भगवान से भी हमें उतना ही मिलेगा जितना हमने जमा किया, और फिर ख़त्म? अगला श्लोक इसका उत्तर है, और वह गीता के सबसे बड़े भरोसों में से एक है। इस श्लोक में कोई खाता नहीं है। आइए, सुनते हैं।
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥ २२ ॥
येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥ २३ ॥
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।" जो लोग अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, "तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्", नित्य मुझमें लगे हुए उन भक्तों का योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ।
यह श्लोक कई घरों में दीवार पर लिखा मिलता है, कई लोगों के बटुए में, कई बहीखातों के पहले पन्ने पर। और इसके पीछे कारण है। आइए, इसके एक-एक शब्द को धीरे से खोलें।
योगक्षेम। हमारी टीका कहती है, इसमें मनुष्य की सारी आवश्यकताएँ आ जाती हैं: जो नहीं है उसे पाना, यह योग है, और जो है उसकी रक्षा करना, यह क्षेम है। सोचिए, हमारी सारी चिन्ता इन्हीं दो में बँटी है। जो नहीं है, नौकरी, घर, बच्चे का दाख़िला, बेटी का रिश्ता, वह कैसे मिले। और जो है, सेहत, बचत, परिवार, इज़्ज़त, वह कैसे बचा रहे। रात की नींद इन्हीं दो के बीच उड़ती है। और श्रीकृष्ण कहते हैं, ये दोनों मैं उठाता हूँ।
अब वह शब्द जिससे आज का सत्संग शुरू हुआ था: "वहाम्यहम्"। विश्वनाथ चक्रवर्ती और बलदेव विद्याभूषण दोनों इस पर रुकते हैं। वे कहते हैं, भगवान यहाँ "मैं करता हूँ" भी कह सकते थे। उन्होंने कहा, मैं ढोता हूँ, मैं कन्धे पर उठाता हूँ। और क्यों? विश्वनाथ कहते हैं, जैसे एक गृहस्थ अपनी पत्नी और बच्चों के पालन का भार उठाता है। वह भार उसे बोझ नहीं लगता, क्योंकि वह उसका अपना परिवार है। आपने किसी पिता को अपने सोते हुए बच्चे को गोद में उठाकर सीढ़ियाँ चढ़ते देखा होगा। बच्चा भारी है, सीढ़ियाँ ऊँची हैं, पर उसके चेहरे पर बोझ नहीं, सुख है।
और संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर माँ की उपमा देते हैं। वे कहते हैं, जैसे गर्भ में पल रहा बच्चा कोई उद्यम नहीं जानता, फिर भी पलता है। और जैसे चिड़िया उन बच्चों के लिए जीती है जिनके अभी पंख नहीं निकले। माँ को अपनी भूख-प्यास याद नहीं रहती, बच्चे के लिए जो अच्छा है, वह करना उसी का काम है। और ज्ञानेश्वर भगवान के मुँह से कहलवाते हैं: जिस क्षण वे पूरे मन से मेरी राह पर चल पड़े, उसी क्षण उनकी चिन्ता मुझ पर आ पड़ी।
अब एक प्रश्न, जो शंकराचार्य स्वयं उठाते हैं: क्या भगवान दूसरे भक्तों का योगक्षेम नहीं उठाते? उठाते हैं। फिर इन अनन्य भक्तों में ख़ास क्या है? शंकराचार्य का उत्तर बहुत बारीक है: दूसरे भक्त अपने लिए योगक्षेम की कोशिश ख़ुद भी करते हैं। अनन्य भक्त अपने लिए उसकी चाह ही नहीं रखते, उन्हें जीने या मरने का भी लालच नहीं, वे केवल भगवान की शरण में हैं, इसलिए भगवान ही उनका योगक्षेम उठाते हैं। मधुसूदन सरस्वती इसे और साफ़ कहते हैं: बाकी सबके लिए भगवान उनके भीतर प्रयत्न जगाकर, उस प्रयत्न के रास्ते देते हैं। अनन्य भक्तों के लिए वे बिना उनके प्रयत्न के देते हैं।
और यहाँ आचार्यों में एक सुंदर अन्तर है, जिसे मैं आपके सामने रखना चाहता हूँ, किसी का पक्ष लिए बिना। श्रीधर स्वामी कहते हैं, योग का अर्थ धन जैसी चीज़ों का मिलना है, और क्षेम उनकी रक्षा, या मोक्ष, और यह सब बिना माँगे ही भगवान देते हैं। रामानुज इसे ऊपर उठाकर कहते हैं: योग है भगवान का मिलना, और क्षेम है फिर कभी न लौटना। यानी एक आचार्य कहते हैं, तुम्हारी रोटी की चिन्ता भी वे करते हैं। दूसरे कहते हैं, तुम्हारी सबसे बड़ी यात्रा की चिन्ता वे करते हैं। मुझे लगता है, जिसे भगवान अपना मान लें, उसके लिए ये दोनों अलग नहीं।
अब इस "वहाम्यहम्" को अपनी आँखों से देखिए, महाभारत की एक रात में। यह द्रोण पर्व में है, उस दिन की रात जिस दिन अभिमन्यु मारे गए थे। पुत्र-शोक में जलते अर्जुन ने प्रतिज्ञा कर ली थी कि कल सूर्यास्त से पहले जयद्रथ को मारूँगा, नहीं तो अग्नि में प्रवेश करूँगा।
उस रात श्रीकृष्ण अर्जुन के शिविर में गए। अपने हाथों से पूजा की भूमि पर दर्भ की शय्या बिछाई, उसे मालाओं और सुगन्ध से सजाया, चारों ओर अर्जुन के शस्त्र रखे, और अर्जुन से रात की नित्य पूजा करवाई। फिर कहा, "सुप्यतां पार्थ", अब सो जाओ पार्थ, तुम्हारा कल्याण हो, "मैं तुम्हारी भलाई के लिए जाता हूँ।" और द्वार पर पहरेदार बिठाकर अपने शिविर में चले गए।
और फिर पाठ एक बात कहता है जो मुझे इस श्लोक का जीता-जागता चित्र लगती है। उस रात पाण्डवों के शिविर में कोई नहीं सोया। सब चिन्ता में थे कि अर्जुन यह प्रतिज्ञा कैसे पूरी करेंगे। और श्रीकृष्ण अपनी शय्या पर लेटे, आगे के कामों के बारे में सोचते रहे, एकाग्र मन से, योग में स्थित होकर, अर्जुन का शोक मिटाने का पूरा उपाय रचते रहे। जिसका काम था, वह सो रहा था। और जिसने उसका भार उठाया था, वह जाग रहा था।
आधी रात को श्रीकृष्ण उठे और अपने सारथी दारुक से बोले, "मुझे कुन्तीपुत्र अर्जुन से प्रिय कोई दूसरा नहीं, न पत्नियाँ, न मित्र, न बन्धु। अर्जुन के बिना इस संसार को मैं एक क्षण भी नहीं देख सकता। जो उससे द्वेष करता है, वह मुझसे द्वेष करता है। अर्जुन मेरा आधा शरीर है।" और भोर होते ही रथ तैयार रखने का आदेश दिया।
और अब क्षेम, यानी रक्षा, का एक दृश्य, जो इससे भी गहरा है, क्योंकि उसमें अर्जुन को पता ही नहीं था कि उनकी रक्षा हुई। यह भी द्रोण पर्व में है। प्राग्ज्योतिष के राजा भगदत्त अपने बड़े हाथी पर लड़ रहे थे। बहुत बिंधकर, क्रोध में, उन्होंने अपने अंकुश को वैष्णव अस्त्र से अभिमन्त्रित किया और अर्जुन की छाती पर फेंका। और पाठ कहता है, केशव ने अर्जुन को ढककर वह अस्त्र अपनी छाती पर ले लिया। और श्रीकृष्ण की छाती पर वह अस्त्र वैजयन्ती माला बन गया, कमल की कलियों और हर ऋतु के फूलों से भरी।
और अर्जुन? अर्जुन नाराज़ हो गए। बोले, "जनार्दन, तुमने कहा था कि लड़ूँगा नहीं, केवल घोड़े हाँकूँगा। मेरे रहते तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था। मैं अपने धनुष से देवता, असुर, मनुष्य, सबको जीत सकता हूँ।" और श्रीकृष्ण ने शान्ति से वह रहस्य बताया: यह अस्त्र स्वयं नारायण ने कभी पृथ्वी के पुत्र नरक को दिया था, और उससे भगदत्त को मिला। "अर्जुन, इस संसार में मेरे सिवा कोई इससे बच नहीं सकता। इसलिए मैंने यह किया। तुम कुछ और मत सोचो।"
यह है "योगक्षेमं वहाम्यहम्" का क्षेम। एक मृत्यु आई, सीधी छाती की ओर। अर्जुन उसे पहचानते भी नहीं थे। श्रीकृष्ण ने उसे अपने ऊपर ले लिया, और वह माला बन गई। और जिसकी रक्षा हुई, वह धन्यवाद देने की जगह शिकायत कर रहा था। हम में से कितने लोग हैं जिनके जीवन में कोई बड़ी विपत्ति चुपचाप मुड़कर निकल गई, और हमें पता भी नहीं चला? और हम उसी दिन किसी छोटी-सी बात पर भगवान से रूठे बैठे थे।
और एक बात ईमानदारी से कहनी ज़रूरी है। इस वचन का अर्थ यह नहीं कि अनन्य भक्त के जीवन में कोई दुःख नहीं आएगा। पाण्डवों ने वनवास भोगा, अभिमन्यु गए। श्रीकृष्ण ने आग से पहले हाथ खींच लेने का वादा नहीं किया। उन्होंने भार उठाने का वादा किया। कभी वे रास्ता बदल देते हैं, कभी रास्ते में साथ चलते हैं, और कभी अस्त्र को माला बना देते हैं।
अब तेईसवाँ श्लोक। "येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः।" हे कुन्तीपुत्र, जो दूसरे देवताओं के भक्त श्रद्धा के साथ उन्हें पूजते हैं, "तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्", वे भी मुझे ही पूजते हैं, पर अविधिपूर्वक।
यह श्लोक बहुत आदर से सुनना चाहिए। पहली बात, "श्रद्धयान्विताः", श्रद्धा से भरे हुए। श्रीकृष्ण उनकी श्रद्धा पर कोई प्रश्न नहीं उठाते। बाईसवें सत्संग में आपने सुना था कि जो जिस देवता को श्रद्धा से पूजना चाहता है, उसकी उसी श्रद्धा को श्रीकृष्ण स्वयं स्थिर करते हैं। दूसरी बात, "तेऽपि मामेव", वे भी मुझे ही। उनकी पूजा कहीं और नहीं जाती। और "अविधिपूर्वक" का अर्थ हमारी टीका यह बताती है: यह जाने बिना कि पूजा वास्तव में किसे मिलती है। शंकराचार्य भी यही कहते हैं, यहाँ "अविधि" का अर्थ है अज्ञान। पूजा व्यर्थ नहीं जाती, बस इस न जानने से उसका फल सीमित रह जाता है।
तिलक यहाँ ऋग्वेद का वह पुराना भाव याद करते हैं, कि सत्य एक है और ज्ञानी उसे अनेक नामों से पुकारते हैं। और फिर एक बात कहते हैं जो आज भी उतनी ही सच है: यह बड़े आश्चर्य की बात है कि अलग-अलग देवताओं के भक्त आपस में झगड़ते हैं, जबकि पूजा एक ही परमेश्वर की होती है। और ज्ञानेश्वर इसका बहुत सरल चित्र देते हैं: पेड़ की डालियाँ और पत्ते एक ही बीज के हैं, पर पानी जड़ में डाला जाता है। और शरीर की सब इन्द्रियाँ एक ही शरीर की हैं, पर स्वादिष्ट भोजन कान में नहीं डाला जाता, और फूल आँख पर नहीं बाँधे जाते।
और महाभारत में इसका एक बहुत कोमल दृश्य उसी रात से जुड़ा है जिसकी बात अभी की। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से जो रात की पूजा करवाई थी, वह त्र्यम्बक के लिए थी, यानी तीन नेत्रों वाले शिव के लिए, और उसी में अर्जुन ने माधव को भी सुगन्ध और मालाओं से सजाया। फिर उस रात अर्जुन ने सपना देखा कि श्रीकृष्ण उन्हें आकाश के रास्ते, हिमालय और बहुत-से पर्वत पार कराके, एक चमकते शिखर पर ले गए, जहाँ शिव पार्वती के साथ बैठे थे। और वहाँ, पाठ कहता है, अर्जुन ने त्र्यम्बक के पास रात की वही भेंट रखी देखी, जिसे उन्होंने स्वयं सजाया था, और जो वासुदेव से जुड़ी थी। और फिर, पाठ के शब्दों में, अर्जुन ने मन में कृष्ण और शर्व, दोनों की पूजा करके शंकर से दिव्य अस्त्र माँगा, और उन्हें पाशुपत मिला। शिविर में रखी भेंट शिव के पास मिली। महाभारत में श्रीकृष्ण और शिव के बीच कोई दीवार नहीं है।
पर अभी एक बात बाकी है। अगर सबकी पूजा उन्हीं तक पहुँचती है, तो फिर अन्तर कहाँ पड़ता है? क्यों कोई स्वर्ग से लौट आता है और कोई नहीं लौटता? अगले दो श्लोक इसका उत्तर देते हैं, और उनमें राजसूय की वह कथा भी पूरी होगी। आइए, सुनते हैं।
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥ २४ ॥
यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः ।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥ २५ ॥
"अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च।" क्योंकि सब यज्ञों का भोक्ता और स्वामी मैं ही हूँ। "न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते।" पर वे मुझे तत्त्व से नहीं जानते, इसलिए गिरते हैं।
"भोक्ता", जो भोग स्वीकार करता है, और प्रभु, जो स्वामी है, जो फल देता है। शंकराचार्य यहाँ आठवें अध्याय का वह शब्द याद दिलाते हैं, जो आपने तेईसवें सत्संग में सुना था, "अधियज्ञोऽहमेवात्र", इस शरीर में यज्ञ का स्वामी मैं ही हूँ। यानी जो भी आहुति कहीं भी पड़ रही है, किसी भी नाम से, उसे स्वीकार करने वाला एक ही है, और उसका फल देने वाला भी वही।
फिर अन्तर कहाँ पड़ा? "न तु मामभिजानन्ति", वे मुझे तत्त्व से, ठीक-ठीक, नहीं जानते। हमारी टीका कहती है, "गिरते हैं" का अर्थ है कि फल भोग लेने पर वे फिर जन्म लेते हैं, उसे नहीं पाते जिसका अन्त नहीं। विश्वनाथ चक्रवर्ती इसका एक बहुत साफ़ उदाहरण देते हैं। एक आदमी सूर्य की उपासना करता है, और सोचता है: सूर्य ही मुझ पर प्रसन्न हों, सूर्य ही मेरा फल दें, सूर्य ही सबसे बड़े हैं। दूसरा भी वही पूजा करता है, पर जानता है कि सूर्य के भीतर भी वही परमेश्वर हैं, वही मेरे मन में यह श्रद्धा जगा रहे हैं, और वही मुझे इस उपासना का फल देंगे। पूजा एक, सूरज एक, जल का लोटा एक। बस जानना अलग।
और रामानुज इस पर जैसे आश्चर्य से भरकर कहते हैं: यह कितनी बड़ी विचित्रता है कि एक ही कर्म में लगे लोग, केवल मन के संकल्प के भेद से, कोई बहुत थोड़ा फल पाकर गिर जाता है, और कोई भगवान को पाकर फिर कभी नहीं लौटता। आपने ययाति की कथा अभी सुनी। हज़ार वर्ष का तप, पर मन में "मैं"। "तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते", तत्त्व से न जानने के कारण वे गिरते हैं। गिरना कर्म की कमी से नहीं हुआ, जानने की कमी से हुआ।
और अब राजसूय की वह कथा पूरी होती है, जो हमने आज शुरू की थी। उस दिन यज्ञ में सैकड़ों राजा थे, बड़े-बड़े ऋषि थे, और प्रश्न केवल इतना था कि पहला अर्घ्य किसे मिले। भीष्म ने जो उत्तर दिया, उसमें इस श्लोक की पूरी बात थी। वे कह रहे थे: इस यज्ञ का सच्चा भोक्ता यह है। और आगे शिशुपाल से उन्होंने कहा, "यह अच्युत केवल हमारे लिए सबसे पूज्य नहीं हैं, ये तीनों लोकों के लिए पूजनीय हैं।" और पाठ ने जो एक छोटा-सा वाक्य लिखा, वह मुझे बहुत प्यारा लगता है: श्रीकृष्ण ने वह पूजा "शास्त्र में बताई विधि से" स्वीकार की। सब यज्ञों का भोक्ता, एक मनुष्य की तरह, नियम से, विनम्रता से, एक गाय और मधुपर्क स्वीकार कर रहा था। और शिशुपाल को उसमें केवल एक ग्वाला दिखा। "न तु मामभिजानन्ति।"
अब पच्चीसवाँ श्लोक। "यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः।" देवताओं को पूजने वाले देवताओं को जाते हैं, पितरों को पूजने वाले पितरों को जाते हैं, "भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्", भूतों को पूजने वाले भूतों को जाते हैं, और मेरा पूजन करने वाले मुझे ही प्राप्त होते हैं।
इस श्लोक में कोई डाँट नहीं है, कोई धमकी नहीं। यह बस एक नियम है, जैसे पानी नीचे की ओर बहता है। जिसका मन जहाँ टिका, वह वहाँ पहुँचा। रामानुज व्रत शब्द का अर्थ "संकल्प" करते हैं। कोई संकल्प करता है, "मैं इन्द्र आदि देवताओं को पूजूँगा", वह उन तक जाता है। कोई संकल्प करता है, "मैं पितरों का यज्ञ करूँगा", वह पितरों तक जाता है। कोई यक्ष, राक्षस जैसे भूत-गणों को पूजता है, वह उन तक। और फिर रामानुज कहते हैं, जो इन्हीं यज्ञों से, इन्हीं कर्मों से, यह संकल्प करता है कि "मैं उन भगवान को पूज रहा हूँ जिनके शरीर ये देवता, पितर और भूत हैं", वह भगवान तक पहुँचता है, और लौटता नहीं। यानी घर की पूजा बदलनी नहीं है। संकल्प गहरा करना है।
और "देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः", पितरों का यह नाम आते ही मुझे भीष्म की एक कथा याद आती है, जो उन्होंने बाणों की शय्या पर लेटे-लेटे युधिष्ठिर को सुनाई थी। यह अनुशासन पर्व में है। भीष्म कहते हैं, "जब मेरे पिता शान्तनु गए, तो उनका श्राद्ध करने मैं गंगाद्वार गया। माता गंगा ने वहाँ सहायता की। बहुत-से तपस्वी ऋषियों को बिठाकर मैंने विधि से श्राद्ध आरम्भ किया।" "और जब मैं पिण्ड देने लगा, तो कुश की बिछावन को भेदकर एक भुजा ऊपर उठी, सुंदर बाजूबन्द और आभूषणों वाली। मैं चकित रह गया: मेरे पिता स्वयं पिण्ड लेने आए थे।"
अब सोचिए, कोई भी बेटा उस घड़ी क्या करता? पिता का हाथ सामने है। पर भीष्म कहते हैं, "मुझे फिर होश आया, और शास्त्र से विचार किया कि वेद में हाथ में देने की विधि नहीं बताई, पिण्ड कुश पर देना चाहिए।" और उन्होंने पिण्ड कुश पर ही रखा। वह भुजा अन्तर्धान हो गई। और उस रात सपने में पितर आए, प्रसन्न होकर बोले, "भरतश्रेष्ठ, हम तुम्हारे इस ज्ञान से प्रसन्न हैं कि तुम धर्म में मोहित नहीं होते।"
देखिए, यह भीष्म कौन हैं? वही जिन्होंने राजसूय में सबसे पहला अर्घ्य श्रीकृष्ण को दिलवाया था। और वही अपने पिता का श्राद्ध पूरी विधि से, पूरे आदर से करते हैं। उनके लिए इन दोनों में कोई झगड़ा नहीं था। यह पच्चीसवाँ श्लोक पितरों के आदर को छोटा नहीं करता। श्राद्ध भी अपनी जगह है, देवताओं की पूजा भी। श्रीकृष्ण केवल यह बता रहे हैं कि आख़िर में मन किस पर टिका है, वहीं तक यात्रा जाती है। और बीसवें सत्संग में आपने सुना था कि वही भीष्म शरशय्या पर, हाथ जोड़कर, श्रीकृष्ण का ध्यान करते रहे, और अन्त में बस "नमः" कहा।
और इस श्लोक का आख़िरी शब्द देखिए, "मद्याजिनोऽपि माम्"। बलदेव विद्याभूषण यहाँ एक छोटी-सी बात जोड़ते हैं जो अगले सत्संग का दरवाज़ा खोलती है: भगवान के भक्त उन्हें बड़ी आसानी से मिलने वाली चीज़ों से पूजते हैं। और अगले ही श्लोक में श्रीकृष्ण बताएँगे कि वे चीज़ें क्या हैं: "पत्रं पुष्पं फलं तोयं।" उसका पूरा अर्थ, और उसके साथ वह भरोसा कि मुझ जैसे को भी अपनाया जाएगा या नहीं, अगले सत्संग में।
तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।
पहली बात। आपके घर का हर काम एक यज्ञ है। चूल्हे की आग, थाली का अन्न, बीमार के लिए दवा, सब "अहं क्रतुरहं यज्ञः" के भीतर है। आज रात खाना परोसते समय, या किसी को दवा देते समय, मन में बस इतना कह लीजिए: यह भी आप ही हैं। काम वही रहेगा, पर उसका भार हल्का हो जाएगा।
दूसरी बात। जो चीज़ ख़र्च होकर मिलती है, वह ख़र्च होकर चली जाती है। ययाति का स्वर्ग भी खाते से चलता था। अपनी पूजा को सौदा मत बनाइए। माँगने में कोई दोष नहीं, पर माँगने के बाद भी उसी को याद रखिए जो दे रहा है।
तीसरी बात। आपका भार कोई उठा रहा है। "योगक्षेमं वहाम्यहम्।" जो नहीं है, उसे पाने की चिन्ता, और जो है, उसे बचाने की चिन्ता, दोनों वे अपने कन्धे पर ले चुके हैं। जिस रात अर्जुन सोए थे, श्रीकृष्ण जाग रहे थे। आज रात आप भी थोड़ा निश्चिन्त होकर सोइए।
आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आपके जीवन में कभी ऐसा हुआ है कि कोई बड़ी विपत्ति चुपचाप टल गई, और बाद में पता चला कि आप कितने बड़े ख़तरे से बच निकले? वह कौन-सा क्षण था? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।
भगवान ने यहाँ "करता हूँ" नहीं कहा, "ढोता हूँ" कहा। अपना बोझ आज उनके कन्धे पर रख दीजिए।
जय श्री कृष्ण।
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥ २२ ॥
तीन बातें
- आपके घर का हर काम एक यज्ञ है। चूल्हे की आग, थाली का अन्न, बीमार के लिए दवा, सब "अहं क्रतुरहं यज्ञः" के भीतर है। आज रात खाना परोसते समय, या किसी को दवा देते समय, मन में बस इतना कह लीजिए: यह भी आप ही हैं। काम वही रहेगा, पर उसका भार हल्का हो जाएगा।
- जो चीज़ ख़र्च होकर मिलती है, वह ख़र्च होकर चली जाती है। ययाति का स्वर्ग भी खाते से चलता था। अपनी पूजा को सौदा मत बनाइए। माँगने में कोई दोष नहीं, पर माँगने के बाद भी उसी को याद रखिए जो दे रहा है।
- आपका भार कोई उठा रहा है। "योगक्षेमं वहाम्यहम्।" जो नहीं है, उसे पाने की चिन्ता, और जो है, उसे बचाने की चिन्ता, दोनों वे अपने कन्धे पर ले चुके हैं। जिस रात अर्जुन सोए थे, श्रीकृष्ण जाग रहे थे। आज रात आप भी थोड़ा निश्चिन्त होकर सोइए।