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सत्संग २५

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सब कुछ उसी में, फिर भी वह अलग

गीता 9.1–9.12 · 76 मिनट

भगवान दिखते क्यों नहीं

श्रीभगवानुवाच इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे । ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥ १ ॥
गीता 9.1 — अर्थ पढ़ें ›
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् । प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥ २ ॥
गीता 9.2 — अर्थ पढ़ें ›
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप । अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥ ३ ॥
गीता 9.3 — अर्थ पढ़ें ›

आपने कभी अकेले में, मन ही मन, यह सवाल पूछा है? बचपन से सुनते आए हैं कि भगवान सब जगह हैं, कण-कण में हैं, हर साँस में हैं। फिर वे दिखते क्यों नहीं? मन्दिर में मूर्ति के सामने खड़े होते हैं, आँखें बन्द करते हैं, और भीतर से एक धीमी-सी आवाज़ आती है: "अगर सब जगह हैं, तो मुझे क्यों नहीं दिखते?" आज के अध्याय में श्रीकृष्ण इसी सवाल का उत्तर देते हैं, और उत्तर ऐसा है जो पहली बार सुनने में उलटा लगता है: सब कुछ उन्हीं में है, और फिर भी वे सबसे अलग हैं।

जय श्री कृष्ण।

आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का पच्चीसवाँ सत्संग है, और आज हम एक नए अध्याय के दरवाज़े पर खड़े हैं, नौवें अध्याय के। महाभारत के भीष्म पर्व का तैंतीसवाँ अध्याय ही गीता का नौवाँ अध्याय है, और उसका नाम है "राजविद्या राजगुह्य योग", यानी विद्याओं के राजा और रहस्यों के राजा का योग। यह नाम ही बता देता है कि आज कोई साधारण बात नहीं होने वाली।

पहले जल्दी से याद कर लें कि पिछली बार हम कहाँ रुके थे। पिछले सत्संग में, आठवें अध्याय के पंद्रहवें से अट्ठाईसवें श्लोक तक, श्रीकृष्ण ने समय का एक बहुत बड़ा चित्र खींचा था। ब्रह्मा का एक दिन हज़ार युगों का, और उनकी रात भी हज़ार युगों की। दिन आता है तो सब कुछ अव्यक्त से प्रकट होता है, रात आती है तो उसी अव्यक्त में लीन हो जाता है। फिर जाने के दो मार्ग बताए गए: एक उजाले का, जिससे जाने वाला लौटकर नहीं आता, और एक धुएँ का, जिससे जाने वाला फिर लौट आता है। और अध्याय के अन्त में यह बात कि जो योगी इसे जान लेता है, वह वेदों, यज्ञों, तपों और दानों के पुण्य-फल से भी आगे निकल जाता है। मधुसूदन सरस्वती नौवें अध्याय की भूमिका में कहते हैं कि वहाँ धीरे-धीरे, पड़ाव-पड़ाव पहुँचने वाले मार्ग की बात थी, और अब श्रीकृष्ण वह बात कहेंगे जिससे मुक्ति यहीं, सीधे मिलती है।

और यह सब, आपको याद रहे, हमें सञ्जय सुना रहे हैं, हस्तिनापुर के महल में, अन्धे राजा धृतराष्ट्र को, उस दिन जब भीष्म बाणों की शय्या पर गिर चुके हैं। और आज के प्रश्न के साथ यह बात कुछ ज़्यादा ही चुभती है। "भगवान दिखते क्यों नहीं?" जो राजा यह कथा सुन रहे हैं, वे तो जन्म से ही देख नहीं सकते। पहले सत्संग में आपने सुना था कि युद्ध से पहले व्यास ने उन्हें आँखें देने की बात कही थी, और उन्होंने कहा था, "मैं अपनों का वध देखना नहीं चाहता, बस सुनना चाहता हूँ।" तो आज यह अध्याय एक ऐसे आदमी के कानों में पड़ रहा है जिसके पास आँखें नहीं, और जिसने आँखें मिलने पर भी देखना नहीं चाहा। और हम सोचेंगे कि देखने के लिए असल में कौन-सी आँख चाहिए।

विश्वनाथ चक्रवर्ती इस अध्याय के आरम्भ में एक बात कहते हैं जो इसकी जगह समझा देती है। वे कहते हैं, सारे शास्त्रों का सार गीता है, गीता का सार उसके बीच के छह अध्याय हैं, और उन छह का भी सार नौवाँ और दसवाँ अध्याय। तो समझिए, हम आज गीता के ठीक हृदय में कदम रख रहे हैं।

पहला श्लोक। "इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।" अब मैं दोष न देखने वाले तुमको यह अत्यन्त गोपनीय ज्ञान कहूँगा। "ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।" ज्ञान, विज्ञान सहित, जिसे जानकर तुम अशुभ से मुक्त हो जाओगे।

"गुह्यतमं", सबसे गोपनीय। श्रीधर स्वामी इस शब्द में एक सीढ़ी देखते हैं। धर्म का ज्ञान गुह्य है, गोपनीय। उससे आगे यह ज्ञान कि आत्मा शरीर से अलग है, वह गुह्यतर है, और गोपनीय। और उससे भी आगे परमात्मा का ज्ञान, वह गुह्यतम है। आप देखिए, गीता इसी क्रम से चली है। दूसरे अध्याय में आत्मा अमर है, तीसरे-चौथे में कर्म कैसे करें, और अब धीरे-धीरे वह बात आ रही है जो सबसे भीतर की है।

और संत ज्ञानेश्वर इस "गोपनीय" शब्द पर बड़ी प्यारी बात कहते हैं। वे कहते हैं, दूध थन में छिपा रहता है, पर थन को अपना दूध मीठा नहीं लगता। इसलिए वह उसके लिए उँडेला जाता है जो उसे चाहता है। भगवान का रहस्य भी ऐसा ही है। वह छिपाने के लिए नहीं, देने के लिए गोपनीय है।

तो वे सही हाथ कौन-से हैं? श्रीकृष्ण एक ही शर्त बताते हैं, जो पहली पंक्ति के अन्त में है: "प्रवक्ष्याम्यनसूयवे", मैं उसे कहूँगा जो दोष नहीं देखता, जिसमें असूया नहीं। हमारी टीका भी यही कहती है: सुनने वाले की एक ही योग्यता है, कि वह उपदेश देने वाले में दोष नहीं ढूँढता। और यहाँ श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती, दोनों एक बहुत गहरी बात पकड़ते हैं। वे कहते हैं, अर्जुन में असूया नहीं है, यानी वह यह नहीं सोचता कि "ये बार-बार अपनी ही बड़ाई करते रहते हैं।" अब ज़रा सोचिए, यह बात यहीं क्यों? क्योंकि इस अध्याय में श्रीकृष्ण बार-बार "मैं" कहने वाले हैं। "मुझसे यह सब व्याप्त है", "सब मुझमें है", "मैं बार-बार रचता हूँ", "मैं सबका महेश्वर हूँ"। दोष ढूँढने वाला कान यह सुनेगा तो उसे लगेगा, "देखो, कितना अपने को बड़ा बताता है।" और जो प्रेम से सुनेगा, उसे लगेगा, "देखो, मेरा मित्र अपना सबसे भीतर का सच मुझे बता रहा है।" शब्द वही हैं। सुनने वाला बदल जाए, तो वही शब्द घमंड भी लग सकते हैं और कृपा भी।

और यह बात गीता में अकेली नहीं है, बार-बार लौटती है। तीसरे अध्याय में श्रीकृष्ण ने कहा था, "श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो", जो श्रद्धा से और दोष-दृष्टि के बिना मेरे मत पर चलते हैं, वे भी कर्मों से छूट जाते हैं। और गीता के बिल्कुल अन्त में, अठारहवें अध्याय में, वे कहेंगे कि यह उपदेश उसे मत कहना "न च मां योऽभ्यसूयति", जो मुझमें दोष देखता है; और जो "श्रद्धावाननसूयश्च", श्रद्धा से और दोष-दृष्टि के बिना इसे केवल सुन भी लेता है, वह भी शुभ लोकों को पाता है। यानी गीता के दरवाज़े की चाबी कोई बड़ी विद्या नहीं है। चाबी है एक साफ़ कान।

अपने घर में देखिए। अगर मन पहले से तय कर चुका है कि "माँ तो हर बात में टोकती हैं", तो उनकी सबसे सच्ची बात भी हम तक नहीं पहुँचती। दोष ढूँढने वाला मन एक ऐसा बर्तन है जिसका मुँह उलटा रखा है। ऊपर से कितना भी अमृत बरसे, भीतर एक बूँद नहीं जाती।

फिर दो शब्द: "ज्ञानं विज्ञानसहितं"। हमारी टीका इन्हें बड़ी सरलता से अलग करती है: ज्ञान है सत्य को समझना, और विज्ञान है उसे अपने अनुभव में जीना। तैरना किताब में पढ़ना ज्ञान है। पानी में उतरकर तैर लेना विज्ञान है। और श्रीकृष्ण कहते हैं, मैं तुम्हें दोनों दूँगा, "यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्", जिसे जानकर तुम अशुभ से छूट जाओगे।

और यहाँ एक बात मुझे बहुत छूती है, जो महाभारत में युद्ध के बहुत बाद की है। ग्यारहवें और पंद्रहवें सत्संग में आपने सुना था कि युद्ध के बाद अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा था, "जो आपने पहले मित्रता से कहा था, वह मेरे विचलित मन से नष्ट हो गया।" उस समय श्रीकृष्ण ने उत्तर में कहा था, "मैंने तुम्हें गुह्य सुनाया था", और फिर कहा, "तुम श्रद्धा-रहित हो।" आज के पहले तीन श्लोकों के दो बड़े शब्द, गुह्य और श्रद्धा, वहाँ भी साथ-साथ खड़े हैं। पर देखिए, उसके बाद भी श्रीकृष्ण अर्जुन को छोड़ते नहीं। वे कहते हैं, "पूरा फिर से कहना सम्भव नहीं, पर उसी विषय में मैं तुम्हें एक पुरानी कथा सुनाता हूँ।" भगवान का धीरज ऐसा है। सुनने वाला भूल जाए, तो भी वे किसी और रास्ते से वही बात फिर कह देते हैं।

अब दूसरा श्लोक, जिसमें श्रीकृष्ण इस ज्ञान की प्रशंसा करते हैं। "राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्।" यह विद्याओं का राजा है, गोपनीयों का राजा है, उत्तम और पवित्र है। "प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्।" यह प्रत्यक्ष अनुभव में आने वाला है, धर्म के अनुकूल है, करने में बहुत सरल है, और अविनाशी है।

छह विशेषण हैं, और हर एक अपने में एक पूरा उत्तर है। "राजविद्या" को शंकराचार्य ऐसे समझाते हैं: जो सब विद्याओं में सबसे अधिक चमकती है। अभिनवगुप्त एक और अर्थ देते हैं: राजाओं की विद्या, जैसे जनक जैसे राजाओं की।

"पवित्रमिदमुत्तमम्", सबसे पवित्र। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, प्रायश्चित्त से कोई एक पाप हटता है पर उसका बीज बचा रहता है; यह ज्ञान पाप को उसकी जड़, अज्ञान, समेत हटाता है।

फिर "प्रत्यक्षावगमं", यानी जो प्रत्यक्ष अनुभव में आए। यह शब्द आज के हमारे सवाल के ठीक सामने खड़ा है। हम पूछते हैं, भगवान दिखते क्यों नहीं, और श्रीकृष्ण कहते हैं, यह ज्ञान तो प्रत्यक्ष है। शंकराचार्य कहते हैं, यह वैसे जाना जाता है जैसे सुख जाना जाता है। आपको सुख है या नहीं, इसके लिए किसी गवाह की ज़रूरत नहीं, आप ख़ुद जानते हैं। मधुसूदन सरस्वती इसमें एक रोज़ का अनुभव जोड़ते हैं: हर आदमी ने कभी न कभी भीतर कहा है, "अब मुझे समझ आ गया, मेरी नासमझी चली गई।" उस क्षण का कोई सबूत नहीं माँगता। और रामानुज इसे भक्ति के रंग में कहते हैं: जो प्रेम से मेरी उपासना करता है, उसके सामने मैं उसी समय प्रत्यक्ष हो जाता हूँ।

"धर्म्यं", धर्म के अनुकूल। कोई सोचे कि भगवान को पाने के लिए घर, कर्तव्य, धर्म, सब छोड़ना होगा, तो श्रीकृष्ण कहते हैं, नहीं, यह धर्म से अलग रास्ता नहीं है। "सुसुखं", करने में बहुत सरल। संत ज्ञानेश्वर इस पर दो पंक्तियाँ कहते हैं जो मुझे बहुत प्रिय हैं। वे कहते हैं, यह ज्ञान ऐसा लगता है मानो गुरु के मुख से अभी उगा हो, पर असल में यह हृदय में पहले से अपने आप मौजूद है। और इस तक सुख की सीढ़ियों पर चढ़कर पहुँचा जाता है। दूसरे रास्ते कष्ट की सीढ़ियों से चढ़ते हैं। यह सुख की सीढ़ियों से चढ़ता है।

और अन्तिम विशेषण, अव्यय, जो कभी नष्ट नहीं होता। और रामानुज यहाँ एक ऐसी बात लिखते हैं जिसे पढ़कर मन भीग जाता है। वे भगवान की ओर से कहते हैं: ऐसे भक्त को मैं अपने आप को भी दे दूँ, तो भी मुझे लगता है कि मैंने उसके लिए अभी कुछ किया ही नहीं। जैसे माँ बच्चे के लिए सब कुछ करके भी सोचती है, अभी तो कुछ भी नहीं किया।

अब एक सवाल अपने आप उठता है, और संत ज्ञानेश्वर उसे ख़ुद उठाते हैं। अगर यह ज्ञान इतना पवित्र है, इतना सरल है, सुख से मिलता है और कभी नष्ट नहीं होता, तो फिर लोग इसे छोड़ क्यों देते हैं? वे कहते हैं, जो लोग थोड़े से ब्याज के लिए जलती आग में कूद पड़ते हैं, वे इतनी मीठी चीज़ को कैसे छोड़ देते हैं? इसका उत्तर तीसरे श्लोक में है।

"अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप।" हे परन्तप, इस धर्म में श्रद्धा न रखने वाले मनुष्य, "अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि", मुझे प्राप्त नहीं होते, और मृत्यु-रूप संसार के मार्ग में लौटते रहते हैं।

रामानुज इस श्लोक के पीछे एक आह सुनते हैं। वे लिखते हैं, यह सचमुच बड़ा आश्चर्य है: यह रास्ता इतना प्यारा, इतना पास, इतना सरल, और फिर भी लोग इसे पाने की स्थिति में होकर भी, भरोसा न होने के कारण, मृत्यु के रास्ते पर ही चलते रहते हैं। श्रीधर स्वामी एक और बारीक बात कहते हैं: ऐसे लोग दूसरे उपायों से भगवान को पाने की मेहनत भी करते हैं, पर इस सीधे रास्ते पर भरोसा न होने से भटकते रहते हैं। यानी कमी मेहनत की नहीं, भरोसे की है।

और "निवर्तन्ते", लौटते रहते हैं। पिछले सत्संग में दो मार्ग थे, एक से न लौटना, दूसरे से लौट आना। यहाँ श्रीकृष्ण बताते हैं कि लौटते कौन हैं: जिनमें श्रद्धा नहीं।

अब संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर तीन चित्र देते हैं, और तीनों ऐसे हैं कि एक बार सुन लें तो भूलते नहीं। पहला: गाय के थन में दूध पवित्र भी है, मीठा भी, और उसी थन से चिपकी किलनी दूध को छोड़कर खून ही पीती है। दूसरा: एक ही तालाब में कमल की जड़ भी रहती है और मेंढक भी, पर पराग भौंरा ले जाता है, और पास रहने वाले मेंढक के हिस्से कीचड़ ही आता है। और तीसरा चित्र सबसे गहरा है। एक अभागे आदमी के आँगन में हज़ारों घड़े धन गड़ा है, और वह उसी आँगन में बैठकर भूखा मर रहा है। फिर ज्ञानेश्वर भगवान की ओर से कहते हैं: ऐसे ही, मैं, सब सुखों का घर राम, हृदय में बैठा हूँ, और भटका हुआ मन विषयों के पीछे दौड़ रहा है।

तो आज के सवाल का पहला उत्तर यहीं मिल गया। भगवान दूर इसलिए नहीं लगते कि वे दूर हैं। वे दूर इसलिए लगते हैं कि हमारी आँख कहीं और लगी है। घर में कई बार ऐसा होता है न, चश्मा माथे पर चढ़ा है, और हम सारा घर उलट-पलट कर ढूँढ रहे हैं। चश्मा कहीं गया नहीं। बस ढूँढने वाले को पता नहीं कि वह कहाँ रखा है।

पर एक बात साफ़ कर दूँ, क्योंकि "श्रद्धा" शब्द को लोग अक्सर गलत समझ लेते हैं। श्रद्धा का मतलब आँख मूँदकर कुछ भी मान लेना नहीं है। श्रद्धा का मतलब है इतना भरोसा कि आप कदम उठाएँ। जो डॉक्टर पर भरोसा नहीं करता, वह दवा की शीशी अलमारी में रखे-रखे बीमार रहता है। दवा में कमी नहीं थी। उसे खोलने का भरोसा नहीं था।

पर अभी एक बात बाकी है। अब तक श्रीकृष्ण ने इस ज्ञान की प्रशंसा की है, और बताया है कि उसे पाता कौन है। अब वे वह रहस्य खोलने वाले हैं, और पहली ही पंक्ति में ऐसी बात कहेंगे कि अर्जुन को भी रुककर सोचना पड़ा होगा: सब मुझमें हैं, पर मैं उनमें नहीं। और अगली ही साँस में: वे भी मुझमें नहीं हैं। आइए, वे श्लोक सुनते हैं।

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना । मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥ ४ ॥
गीता 9.4 — अर्थ पढ़ें ›
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् । भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥ ५ ॥
गीता 9.5 — अर्थ पढ़ें ›
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् । तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥ ६ ॥
गीता 9.6 — अर्थ पढ़ें ›

चौथा श्लोक, और यहीं से इस अध्याय का रहस्य खुलना शुरू होता है। "मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।" यह सारा जगत् मुझ अव्यक्त रूप वाले से व्याप्त है। "मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः।" सब प्राणी मुझमें स्थित हैं, पर मैं उनमें स्थित नहीं हूँ।

अब पहली पंक्ति का अन्तिम शब्द: "जगदव्यक्तमूर्तिना", अव्यक्त रूप वाले से। यानी जिसका रूप इन्द्रियों की पकड़ में नहीं आता। और मधुसूदन सरस्वती यहाँ ठीक वही सवाल उठाते हैं जो कोई भी उठाएगा। वे कहते हैं, कोई पूछ सकता है: आप तो वासुदेव हैं, एक शरीर वाले, रथ पर बैठे हैं, आप सारे जगत् में कैसे फैल सकते हैं? यह तो आँखों के सामने की बात से उलटी है। और उत्तर वे श्रीकृष्ण के इसी शब्द से देते हैं: इस शरीर से नहीं। अपने अव्यक्त रूप से, जो किसी इन्द्रिय की पहुँच में नहीं आता।

और देखिए, आज के सवाल का दूसरा उत्तर यहीं छिपा है। हम पूछते हैं, भगवान दिखते क्यों नहीं। श्रीकृष्ण कहते हैं, जिस रूप से मैं सब जगह हूँ, वह रूप ही आँख का विषय नहीं है। रामानुज एक उपनिषद् का वचन उद्धृत करते हैं: वह पृथ्वी में रहता है, और पृथ्वी उसे नहीं जानती; वह आत्मा में रहता है, और आत्मा उसे नहीं जानती। जो आँख के भीतर बैठकर आँख को देखने की शक्ति दे रहा है, उसे आँख सामने की चीज़ की तरह कैसे देखे? जैसे आँख सारी दुनिया देख लेती है, पर अपने आप को नहीं देख पाती।

फिर "मत्स्थानि सर्वभूतानि", सब प्राणी मुझमें हैं। संत ज्ञानेश्वर इसके लिए उपमाओं की झड़ी लगा देते हैं। वे कहते हैं, यह जगत् मेरा ही फैलाव है। जैसे दूध अपने आप जमकर दही बन जाए, तो दही दूध ही है। जैसे बीज ही पेड़ बन जाए। जैसे सोना ही गहना बन जाए। गहना बनकर सोने का सोनापन नहीं टूटता। कंगन, अँगूठी, हार, नाम अलग हैं, आकार अलग हैं, पर किसी में सोने के सिवा कुछ है नहीं।

पर फिर तुरन्त दूसरी पंक्ति: "न चाहं तेष्ववस्थितः", मैं उनमें स्थित नहीं हूँ। हमारी टीका इसे बड़ी सफ़ाई से कहती है: प्राणी भगवान पर टिके हैं, भगवान उन पर नहीं टिके; वे सबमें हैं, पर किसी से सीमित या बँधे नहीं। रामानुज कहते हैं, मेरा होना उन पर निर्भर नहीं है, मुझे उनसे कोई सहारा नहीं चाहिए। श्रीधर स्वामी मिट्टी और घड़े का उदाहरण लेते हैं: मिट्टी घड़े में बँधकर रहती है, पर मैं वैसे प्राणियों में बँधा नहीं, क्योंकि मैं आकाश की तरह असंग हूँ। इसे ऐसे सोचिए। धरती पर सारे घर टिके हैं, महल भी और झोंपड़ी भी। पर धरती किसी घर पर नहीं टिकी। कोई घर गिर जाए, तो धरती नहीं गिरती।

और इससे पहले कि हम अगले श्लोक में उतरें, एक छोटी-सी बात आपसे कहना चाहता हूँ। हम गीता के सबसे नाज़ुक मोड़ों में से एक पर खड़े हैं। श्रीकृष्ण ने अभी एक बात कही है, अगले श्लोक में वे उसे पलटेंगे, और फिर एक उपमा से दोनों को जोड़ देंगे। आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। जो केवल इतना सुनकर उठ जाए कि "सब भगवान में है", वह सोचेगा कि फिर तो सब कुछ ठीक ही है, जो हो रहा है होने दो। और जो केवल इतना सुने कि "भगवान किसी में नहीं", वह सोचेगा कि भगवान बहुत दूर बैठे हैं, उन्हें हमसे क्या। दोनों ही भ्रम हैं, और दोनों का उत्तर इसी सत्संग में आगे है। तो अगर आप यह सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की यह यात्रा बीच में न छूटे। और आज की बात आख़िर तक सुनिए, क्योंकि आज के सवाल का पूरा उत्तर तभी बनता है।

अब पाँचवाँ श्लोक, जो सुनने में चौथे का उलटा लगता है। "न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्।" और फिर भी प्राणी मुझमें स्थित नहीं हैं। मेरा ईश्वरीय योग देखो! "भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः।" मेरा आत्मा प्राणियों को धारण करने वाला और उत्पन्न करने वाला है, फिर भी उनमें स्थित नहीं है।

अभी-अभी कहा था, सब मुझमें हैं। और अब कहते हैं, वे भी मुझमें नहीं हैं। कोई भी सुनने वाला यहाँ चौंकेगा। और श्रीकृष्ण चौंकाना ही चाहते हैं, इसीलिए कहते हैं, "पश्य", देखो! हमारी टीका कहती है कि यह उलटापन जान-बूझकर है, और यहाँ आचार्य दो रास्तों से चलते हैं। शंकराचार्य और मधुसूदन सरस्वती कहते हैं कि प्राणी भगवान में केवल स्थित दिखते हैं, जैसे अँधेरे में रस्सी पर साँप दिखे; रस्सी की ओर से देखो तो साँप उसमें कभी था ही नहीं। रामानुज दूसरी ओर से कहते हैं कि भगवान प्राणियों को सचमुच धारण करते हैं, पर जैसे घड़ा पानी धारण करता है वैसे नहीं; वे उन्हें अपने संकल्प से धारण करते हैं, और उनसे छुए नहीं जाते। हमारी टीका दोनों को साथ रखती है, और मैं भी यहाँ किसी एक का पक्ष नहीं लूँगा। दोनों रास्तों से एक ही बात तक पहुँचते हैं: इन दोनों बातों को एक साथ समझ लेना, कि सब उन्हीं में है और फिर भी वे सबसे अछूते हैं, यही वह "ईश्वरीय योग" है जिसे देखने को अर्जुन से कहा गया।

अब "भूतभृन्न च भूतस्थो", प्राणियों को धारण करने वाला, उठाने वाला, फिर भी उनमें स्थित नहीं। और श्रीधर स्वामी इस शब्द पर एक ऐसी बात कहते हैं जो सीधे हमारे घरों में उतरती है। वे कहते हैं, जीव अपने शरीर को धारण करता है, पालता है, और "यह मैं हूँ" के भाव से उससे चिपककर उसी में अटका रहता है। मैं सब प्राणियों को धारण करता हूँ, पालता हूँ, पर उनमें अटका नहीं हूँ, क्योंकि मुझमें वह "मैं" का भाव नहीं। हम भी तो घर उठाते हैं। बच्चे, माता-पिता, नौकरी, ज़िम्मेदारियाँ। और उठाते-उठाते "यह मेरा है, मेरे बिना कुछ नहीं चलेगा" का भाव ऐसा चढ़ जाता है कि बोझ दुगना लगने लगता है। भगवान सारा संसार उठाते हैं, और उन्हें बोझ नहीं लगता।

और बलदेव विद्याभूषण यहाँ ठीक यही प्रश्न उठाते हैं: इतना भारी बोझ उठाने से आपको थकान तो होती होगी? उत्तर है, नहीं। और इस "नहीं" को आँखों से देखना हो, तो महाभारत के ही परिशिष्ट, हरिवंश में, एक प्रसंग है जो पूरे ब्रज ने अपनी आँखों से देखा था।

इन्द्र का उत्सव रोका गया, और वे क्रोध में आ गए। उन्होंने बादलों को आज्ञा दी कि सात रात तक ऐसी वर्षा और हवा चलाओ कि गोपों की गायें मर जाएँ। काले बादल हाथियों के झुंडों जैसे आकाश में भर गए, दिन में अँधेरा हो गया, धरती समुद्र जैसी दिखने लगी। पाठ कहता है कि गोप डरकर चिल्लाने लगे, "लोकों का अन्त आ गया।" गायें ठिठुरकर खड़ी रह गईं, कुछ गिर पड़ीं, कुछ माताएँ अपने बछड़ों को छाती से ढककर खड़ी रहीं। और छोटे बछड़े मुँह उठाकर दामोदर की ओर देख रहे थे, मानो कह रहे हों, "बचाओ।"

तब श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उसके वनों सहित उखाड़ लिया, और उसे बाएँ हाथ पर थाम लिया। पाठ का एक वाक्य मुझे बहुत प्यारा लगता है: उन्होंने पर्वत को हथेली पर रखकर, मुस्कुराते हुए, मानो तौला। फिर कहा, "यह गायों के लिए निर्वात घर है, यहाँ हवा नहीं पहुँचेगी। सब भीतर आ जाओ। यह स्थान तीनों लोकों की भी रक्षा कर सकता है, गोकुल की तो बात ही क्या।" गायें, गोप, गाड़ियाँ, सारा सामान, सब उस पर्वत के नीचे चले गए। और पाठ कहता है, श्रीकृष्ण पर्वत की जड़ में पत्थर के खम्भे की तरह खड़े रहे, और एक हाथ से उसे ऐसे थामे रहे जैसे कोई प्रिय अतिथि को थामता है। सात रात बाद इन्द्र ने बादल लौटा लिए, आकाश साफ़ हुआ, और श्रीकृष्ण ने पर्वत को प्रसन्न होकर उसकी जगह रख दिया।

अब इस चित्र को पाँचवें श्लोक के साथ रखकर देखिए। सारा ब्रज उस पर्वत के नीचे है: "मत्स्थानि सर्वभूतानि"। और वे स्वयं भीतर भीड़ में नहीं, बाहर जड़ पर खड़े हैं, सबको थामे हुए: "न चाहं तेष्ववस्थितः"। एक हाथ से, मुस्कुराते हुए, सात रात, बिना थके: "भूतभृन्न च भूतस्थो"। और एक बात पर ध्यान दीजिए। भीतर बैठे लोगों को पर्वत दिख रहा था, सिर के ऊपर की छत दिख रही थी, आपस में एक-दूसरे दिख रहे थे। जो हाथ उस पूरी छत को थामे था, वह भीतर से दिखता नहीं था। यह मेरी अपनी पढ़त है, पाठ में नहीं: पर शायद हमारी ज़िंदगी भी ऐसी ही है। छत हमें दिखती है, थामने वाला हाथ नहीं।

और श्रीकृष्ण ने उस शरण को "निर्वात" कहा था, जहाँ हवा न पहुँचे। अब हवा की ही बात छठे श्लोक में है। "यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्।" जैसे सब जगह चलने वाली महान वायु सदा आकाश में स्थित रहती है, "तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय", वैसे ही सब प्राणी मुझमें स्थित हैं, ऐसा समझो।

हमारी टीका इस उपमा को तीन शब्दों में खोलती है: वायु सदा आकाश के भीतर चलती है, फिर भी आकाश उससे न हिलता है, न मैला होता है, न बँटता है। अभिनवगुप्त एक छोटा-सा वाक्य लिखते हैं: आकाश और वायु कभी अलग नहीं होते, फिर भी आज तक किसी ने नहीं सुना कि आकाश को वायु ने छू लिया।

रामानुज इस उपमा में एक और प्रश्न जोड़ते हैं: बिना किसी सहारे के आकाश में इतनी बड़ी वायु टिकी कैसे है? कौन उसे थामे है? उनका उत्तर है: वही, जिसके संकल्प से सब टिका है।

और संत ज्ञानेश्वर कहते हैं, आकाश जितना बड़ा है, वायु उसमें उतनी ही है। जब वह हिलती है, तब अलग दिखती है; नहीं तो वह आकाश ही है। अब इस उपमा में आज के सवाल का तीसरा उत्तर देखिए। आपने कभी आकाश देखा है? आप कहेंगे, हाँ, रोज़। पर सच में आप आकाश में चीज़ें देखते हैं: बादल, पक्षी, सूरज, तारे। ख़ाली आकाश को कोई नहीं देखता। और हवा? हवा भी कोई नहीं देखता; हम पत्तों को हिलते देखते हैं, और कहते हैं हवा चल रही है। भगवान भी ऐसे ही देखे जाते हैं। सीधे नहीं, उनके किए हुए में। पत्ते हिल रहे हैं, तो कोई चला रहा है।

और इस उपमा में एक भरोसा भी है, जो मैं आपको घर ले जाने को देना चाहता हूँ। आकाश में आँधी आती है, तूफ़ान आते हैं, धूल उड़ती है। पर आँधी के बाद आकाश वैसा ही रहता है, साफ़, अटूट। आपकी ज़िंदगी में भी आँधियाँ आती हैं। बीमारी, नुकसान, किसी अपने का जाना। गीता कहती है, ये सब आँधियाँ उसके भीतर चल रही हैं जो इनसे न हिलता है, न मैला होता है, न टूटता है। जिस आकाश में आँधी चल रही है, आप उसी आकाश में हैं।

पर अभी एक बात बाकी है। अगर सब प्राणी उसी में हैं, जैसे वायु आकाश में, तो जब यह संसार ही समाप्त होता है, तब वे कहाँ जाते हैं? क्या सब मिट जाता है? और फिर दोबारा कौन बनाता है, और कैसे? श्रीकृष्ण अब यही बताने वाले हैं। आइए, अगले दो श्लोक सुनते हैं।

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् । कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥ ७ ॥
गीता 9.7 — अर्थ पढ़ें ›
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः । भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥ ८ ॥
गीता 9.8 — अर्थ पढ़ें ›

सातवाँ श्लोक। "सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्।" हे कुन्तीपुत्र, कल्प के अन्त में सब प्राणी मेरी प्रकृति में चले जाते हैं। "कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्।" और कल्प के आरम्भ में मैं उन्हें फिर प्रकट करता हूँ।

पिछले सत्संग की बात आपको याद होगी। आठवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने कहा था, "अव्यक्ताद् व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे", ब्रह्मा का दिन आने पर सब कुछ अव्यक्त से प्रकट होता है, और रात आने पर उसी में लीन हो जाता है। लोकमान्य तिलक यहाँ यही याद दिलाते हैं कि कल्प का अर्थ वही ब्रह्मा का दिन है। पर तब बात ऐसे कही गई थी मानो यह कोई अपने आप चलने वाला चक्र हो, जैसे सूरज उगता है और डूबता है। अब श्रीकृष्ण उसी चक्र में अपना नाम जोड़ देते हैं: प्राणी "मेरी" प्रकृति में जाते हैं, और "मैं" उन्हें फिर प्रकट करता हूँ। यानी जिस बड़े समय से पिछली बार हमें डर लगा था, उसके पीछे भी कोई है।

अब एक शब्द पर रुकिए: "मामिकाम्", मेरी। और मुझे यहाँ, मेरी अपनी पढ़त में, गीता के पहले ही श्लोक की याद आती है। वहाँ धृतराष्ट्र ने पूछा था, "मामकाः पाण्डवाश्चैव", मेरे बेटे और पाण्डु के बेटे। वहाँ "मेरा" एक लकीर था, जो परिवार को दो हिस्सों में बाँट रहा था। और यहाँ श्रीकृष्ण भी "मेरी" कहते हैं, "प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्"। पर उनका "मेरा" कुछ नहीं बाँटता। उसमें कौरव भी हैं, पाण्डव भी, सारे प्राणी, सारा संसार। धृतराष्ट्र का "मेरा" छोटा था, इसलिए कुरुक्षेत्र तक ले गया। श्रीकृष्ण का "मेरा" इतना बड़ा है कि उससे बाहर कोई नहीं बचता। और विडम्बना देखिए, यह दूसरा "मेरा" आज उसी पहले "मेरे" वाले राजा को सुनाया जा रहा है।

अब प्रश्न यह कि प्रलय में प्राणी जाते कहाँ हैं? क्या वे मिट जाते हैं? मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, नहीं, वे अपने कारण में सूक्ष्म रूप से लीन हो जाते हैं। और नीलकण्ठ इसे और साफ़ करते हैं: वे प्रकृति में ऐसे रहते हैं जैसे कोई गहरी नींद में हो, अपने संस्कारों के रूप में, सब एक होकर। फिर कल्प के आरम्भ में मैं उन्हें तरह-तरह के रूपों में फिर रचता हूँ। नींद का यह उदाहरण बहुत अपना-सा है। रात को आप सोते हैं, तो आपका नाम, आपकी चिन्ताएँ, आपके रिश्ते, सब कहाँ चले जाते हैं? कहीं नहीं जाते। सुबह आँख खुलती है, और एक पल में सब लौट आता है, वहीं से जहाँ छोड़ा था।

संत ज्ञानेश्वर इसके लिए चित्रों की माला बनाते हैं। वे कहते हैं, कल्प के अन्त में सब प्राणी अव्यक्त में ऐसे एक हो जाते हैं जैसे गर्मी की तेज़ धूप में बीजों वाली घास फिर से धरती में समा जाती है। जैसे शरद ऋतु आने पर बादल आकाश के आकाश में ही घुल जाते हैं। और जैसे जागने पर सपना मन का मन में ही डूब जाता है। पहला चित्र फिर सुनिए: बीजों वाली घास। घास सूख गई, दिखना बन्द हो गया, पर बीज धरती में हैं। पहली बारिश आएगी, और वही खेत फिर हरा हो जाएगा।

और यह बीज वाली बात महाभारत में एक कथा में बहुत सुंदर ढंग से आती है। वन पर्व में, जब पाण्डव वनवास में थे, मार्कण्डेय मुनि युधिष्ठिर को विवस्वान के पुत्र मनु की कथा सुनाते हैं।

मनु बदरी के पास बहुत लम्बा, कठोर तप कर रहे थे। एक दिन चीरिणी नदी के किनारे एक छोटी-सी मछली उनके पास आई और बोली, "भगवन्, मैं छोटी हूँ, और बड़ी मछलियाँ छोटी को सदा खा जाती हैं। मुझे बचाइए। आपके उपकार का बदला मैं भी चुकाऊँगी।" मनु को दया आई। उन्होंने उसे अपने हाथ में उठाया और पानी के एक घड़े में रख दिया, और पाठ कहता है, उसे बेटे जैसे स्नेह से पालने लगे। मछली बढ़ी, घड़ा छोटा पड़ गया। उन्होंने उसे एक बड़े तालाब में रखा, दो योजन लम्बे। वह फिर बढ़ी, तालाब में हिल-डुल भी न सकी। उन्होंने उसे गंगा में रखा, और फिर गंगा भी छोटी पड़ी, तो समुद्र में। और एक बात पाठ ख़ास तौर पर कहता है: मछली इतनी बड़ी होकर भी मनु के लिए ले जाने में आसान रही।

समुद्र में छोड़े जाने पर मछली मानो मुस्कुराकर बोली, "अब समय आ गया है। जल्दी ही पृथ्वी पर का यह सब, चलने वाला और न चलने वाला, प्रलय में डूब जाएगा। आप रस्सियों वाली एक मज़बूत नाव बनवाइए, सात ऋषियों के साथ उसमें चढ़िए, और सब बीज, अलग-अलग, अच्छी तरह सँभालकर उस नाव पर रख लीजिए। फिर मेरी प्रतीक्षा कीजिए। मैं सींग वाली होकर आऊँगी, उसी से पहचानना।"

और वैसा ही हुआ। जल चढ़ आया। पाठ कहता है, न धरती दिखती थी, न दिशाएँ; सब कुछ जल ही जल था, आकाश तक। उस पूरे संसार में केवल सात ऋषि, मनु और वह मछली दिखाई देते थे। मनु ने मछली का ध्यान किया, और वह पर्वत जितनी ऊँची, सींग वाली होकर आ गई। रस्सी उसके सींग में बाँधी गई, और वह बहुत वर्षों तक बिना थके नाव को उस उफनते सागर में खींचती रही, और अन्त में हिमालय की सबसे ऊँची चोटी तक ले गई। वहाँ नाव बाँधी गई, और पाठ कहता है, वह चोटी आज भी "नौबन्धन" कहलाती है।

तब मछली ने ऋषियों से कहा, "मैं प्रजापति ब्रह्मा हूँ। मछली के रूप में मैंने तुम्हें इस संकट से बचाया।" लोग यह कथा भगवान के मत्स्य रूप की कथा के नाम से जानते हैं; महाभारत के इस अध्याय में मछली अपने आप को प्रजापति ब्रह्मा कहती है, और मैं यहाँ वैसा ही कह रहा हूँ जैसा पाठ कहता है। फिर उसने कहा, "अब मनु देवता, असुर, मनुष्य, सब प्राणी, चलने वाले और न चलने वाले, फिर से रचेंगे। तप से उन्हें सूझ मिलेगी, और मेरी कृपा से वे भ्रम में नहीं पड़ेंगे।" और पाठ बड़ी ईमानदारी से कहता है कि मनु पहले रचना में उलझ गए। फिर उन्होंने बड़ा तप किया, और तब सब प्राणियों की ठीक-ठीक रचना शुरू की।

अब इस कथा को सातवें श्लोक के साथ रखिए। "कल्पक्षये", अन्त आया, सब जल में डूब गया, कुछ दिखता नहीं। पर नाव में बीज थे, "अलग-अलग, अच्छी तरह सँभाले हुए"। कुछ खोया नहीं, बस बीज बनकर सुरक्षित हो गया। और फिर "कल्पादौ", नया आरम्भ, और वही बीज फिर संसार बने। अन्त, गीता की दृष्टि में, मिट जाना नहीं है। अन्त है बीज बन जाना। जो लोग चले गए, जो समय चला गया, जो घर उजड़ गया, गीता यह नहीं कहती कि वह सब शून्य में खो गया। वह उसी की प्रकृति में लौट गया, जिसकी प्रकृति से आया था।

अब आठवाँ श्लोक। "प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः।" अपनी प्रकृति को वश में करके मैं बार-बार प्रकट करता हूँ, "भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्", इस सम्पूर्ण प्राणी-समुदाय को, जो प्रकृति के वश में होने से विवश है।

"स्वामवष्टभ्य", अपनी प्रकृति को साधकर; शंकराचार्य इसका अर्थ करते हैं वश में करके। और यही शब्द-जोड़ आपने चौथे अध्याय में भी सुना था, तेरहवें सत्संग में, जब श्रीकृष्ण अपने अवतार की बात कर रहे थे: "प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया", अपनी प्रकृति को अधीन करके मैं प्रकट होता हूँ। वहाँ अपनी प्रकृति को साधकर वे स्वयं आते हैं। यहाँ उसी प्रकृति को साधकर सारा संसार रचते हैं। दोनों जगह प्रकृति उनके हाथ में है, वे प्रकृति के हाथ में नहीं।

पर बार-बार संसार रचना, यह कितना बड़ा काम है! क्या उन्हें थकान नहीं होती? संत ज्ञानेश्वर यहाँ तीन चित्र देते हैं, और तीनों बड़े मीठे हैं। पहला: कहते हैं, यह नगर राजा ने बसाया। बात सच भी है। पर सच में देखो, तो क्या राजा के हाथ थके? दूसरा: पूर्णिमा का चाँद उगता है, और समुद्र में ज्वार उमड़ आता है। इसमें चाँद को क्या मेहनत करनी पड़ी? और तीसरा: चुम्बक के पास लोहा अपने आप हिलने लगता है। चुम्बक को उसमें क्या परिश्रम? ज्ञानेश्वर कहते हैं, ऐसे ही मैं अपनी प्रकृति को अंगीकार करता हूँ, और प्राणियों की सृष्टि अपने आप उमड़ने लगती है; जैसे राजा के राज्य में प्रजा अपने-अपने काम में लगी रहती है।

अब श्लोक का अन्तिम भाग, जो सबसे ज़्यादा सोचने वाला है: "कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्", प्रकृति के वश में होने से विवश। यह शब्द पिछले सत्संग में भी आया था। आठवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने कहा था, "भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते", यही प्राणी-समुदाय बार-बार उत्पन्न होकर विवश होकर लीन होता है। वहाँ भी "भूतग्राम", यहाँ भी "भूतग्राम"; वहाँ भी विवश, यहाँ भी विवश। शंकराचार्य कहते हैं, विवश का अर्थ है स्वतन्त्र नहीं, अज्ञान जैसे दोषों के अधीन। और श्रीधर स्वामी इसका कारण बताते हैं: अपने पुराने कर्मों और उनसे बने स्वभाव के ज़ोर से।

और यह बात हम सब अपने भीतर जानते हैं, चाहे मानें या न मानें। कितनी बार हमने सोचा, "अब गुस्सा नहीं करूँगा", और अगले ही दिन वही। "अब यह आदत छोड़ दूँगा", और फिर वही। पुराना स्वभाव एक ढलान की तरह है, पानी उधर ही बहता है। पर इस श्लोक में एक बहुत बड़ा भरोसा छिपा है, अगर आप ध्यान से देखें। विवश प्राणी हैं। प्रकृति विवश करती है। पर प्रकृति स्वयं किसके वश में है? "प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य", उसके, जो उसे वश में रखता है। यानी जिस शक्ति के आगे हम हारते हैं, उसकी लगाम किसी के हाथ में है। हम अपने स्वभाव से अकेले लड़ें, तो हारते रहेंगे। उससे जुड़ें, जिसके हाथ में स्वभाव की भी लगाम है, तो बात बदलने लगती है। सातवें अध्याय में उन्होंने यही कहा था: यह माया पार करना कठिन है, पर जो मेरी शरण आते हैं, वे इसे पार कर जाते हैं।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण कहते हैं, मैं बार-बार रचता हूँ। और संसार में तो कोई सुखी है, कोई दुखी; कोई महल में, कोई फुटपाथ पर; कोई स्वस्थ, कोई जन्म से बीमार। तो क्या यह सब करने वाले भगवान इसके ज़िम्मेदार नहीं? क्या ये कर्म उन्हें नहीं बाँधते? और अगर वे सब कुछ कर सकते हैं, तो दुःख को रोकते क्यों नहीं? यही सवाल एक माँ ने, युद्ध के बाद, बहुत रोते हुए, सीधे श्रीकृष्ण से पूछा था। आइए, पहले अगले दो श्लोक सुनते हैं।

न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय । उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ॥ ९ ॥
गीता 9.9 — अर्थ पढ़ें ›
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् । हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥ १० ॥
गीता 9.10 — अर्थ पढ़ें ›

नौवाँ श्लोक। "न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय।" हे धनञ्जय, वे कर्म मुझे नहीं बाँधते। "उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु।" मैं उन कर्मों में आसक्ति-रहित होकर उदासीन के समान बैठा रहता हूँ।

पहले सम्बोधन, "धनञ्जय"। सातवें सत्संग में आपने सुना था कि अर्जुन यह नाम कैसे पाए: सब देश जीतकर, सब ओर से धन लाकर। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं कि यहाँ यह नाम अर्जुन का उत्साह बढ़ाने को है, जैसे कोई कहे, "तुम तो ख़ुद इतने बड़े काम कर चुके हो।"

अब असली शब्द: "उदासीनवदासीनमसक्तं", उदासीन के समान बैठा हुआ, आसक्ति के बिना। और यह शब्द बहुत सावधानी से सुनना होगा, क्योंकि हिन्दी में "उदासीन" का अर्थ हो गया है बेपरवाह, जिसे कुछ फ़र्क न पड़ता हो। हमारी टीका साफ़ कहती है: यहाँ उदासीन का अर्थ प्राणियों के प्रति बेपरवाह होना नहीं है। इसका अर्थ है कि सृष्टि करने से उन्हें कुछ पाना नहीं है, इसलिए कोई ऐसा स्वार्थ नहीं जो उन्हें बाँध सके। श्रीधर स्वामी यही कहते हैं: बाँधती है कर्म में आसक्ति, और जिसकी सारी कामनाएँ पहले से पूरी हैं, उसमें आसक्ति कहाँ? "वत्", यानी "के समान", इसलिए कि सचमुच का उदासीन तो कुछ करता ही नहीं, और ये रच रहे हैं।

मधुसूदन सरस्वती इसका एक बड़ा अच्छा चित्र देते हैं। दो लोग झगड़ रहे हैं, और बीच में एक निष्पक्ष आदमी बैठा है, जैसे कोई पंच। किसकी जीत हो, किसकी हार, उसकी अपनी कोई खुशी या दुःख उसमें नहीं। वह झगड़े से अनजान नहीं है, पूरी तरह जानता है; बस वह किसी के लोभ में नहीं बँधा। और शंकराचार्य इसमें हम सबके लिए एक बात निकालते हैं: किसी को भी कर्म तब नहीं बाँधते जब "मैं करता हूँ" का अभिमान और फल की आसक्ति न हो। नहीं तो, वे कहते हैं, मूर्ख आदमी कर्मों से वैसे ही बँधता है जैसे रेशम का कीड़ा अपने ही बनाए कोये में बँध जाता है। रेशम का कीड़ा। कोई बाहर से उसे नहीं बाँधता। वह अपने ही धागे से, अपने ही चारों ओर, घेरा बुनता जाता है।

अब रामानुज और नीलकण्ठ उस प्रश्न को सीधे छूते हैं जो पिछले खंड के अन्त में हमने रखा था। अगर भगवान रचते हैं, तो कोई देवता, कोई पशु, कोई सुखी, कोई दुःखी, यह भेद क्यों? क्या वे पक्षपाती या निर्दय नहीं हुए? रामानुज ब्रह्मसूत्र का हवाला देकर कहते हैं: नहीं, क्योंकि यह भेद प्राणियों के अपने पुराने कर्मों के कारण है; मैं उस भेद में आसक्त नहीं, उदासीन के समान हूँ। और नीलकण्ठ एक किसान वाला चित्र देते हैं: बादल बरसता है, तो वह किसी बीज से प्रेम और किसी से द्वेष करके नहीं बरसता। एक ही पानी सब पर गिरता है। उसी पानी से कहीं गन्ना मीठा होता है, कहीं नीम कड़वा। फ़र्क पानी में नहीं, बीज में है।

और अब वह माँ, जिसकी बात मैंने कही थी। बाईसवें सत्संग में आपने स्त्री पर्व का वह दृश्य सुना था: युद्ध के बाद कुरुक्षेत्र में गान्धारी, जिनके सौ के सौ पुत्र गिर चुके थे, श्रीकृष्ण से पूछती हैं, "आप समर्थ थे, आपकी बात सुनी जाती थी, फिर भी आपने उपेक्षा क्यों की?", और अपने तप से उन्हें शाप देती हैं; और श्रीकृष्ण मानो हल्का-सा मुस्कुराकर उसे स्वीकार कर लेते हैं। आज उस दृश्य को इस श्लोक के एक शब्द के साथ रखिए। गान्धारी ने कहा, "उपेक्षा", यानी अनदेखी। गीता कहती है "उदासीनवदासीनमसक्तं", उदासीन के समान। दोनों शब्द पास-पास लगते हैं, पर बीच में पूरा अन्तर है। उपेक्षा वह है जो परवाह ही न करे। उदासीन के समान वह है जो पूरी परवाह करे, पर किसी के चुनाव को अपने स्वार्थ से न खींचे। और एक साँस पहले गान्धारी ने ख़ुद कहा था, "मेरे पुत्र तो उसी दिन मर गए थे जिस दिन आप अपना काम पूरा हुए बिना उपप्लव्य लौट गए।" यानी वे जानती थीं कि श्रीकृष्ण स्वयं, दूत बनकर, शान्ति का प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर आए थे। बेपरवाह आदमी ऐसा नहीं करता।

और शाप के बाद श्रीकृष्ण ने उनसे एक बात और कही थी, जो इस अध्याय के आठवें श्लोक का सीधा उत्तर है। उन्होंने कहा, "उठिए, गान्धारी, उठिए। आपने अपने हठी, ईर्ष्यालु और घमंडी पुत्र दुर्योधन को आगे रखा और उसके बुरे काम को ठीक माना। अपने किए दोष को आप मुझ पर कैसे डालना चाहती हैं?" यह कठोरता नहीं, एक सच है, जो गान्धारी ने स्वयं याद किया था: भीष्म और विदुर ने चेताया था। यही "कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्" का अर्थ है। युद्ध भगवान ने नहीं चुना था। युद्ध चुना गया था, बार-बार, सलाह सुनकर भी, अपने स्वभाव के वश में होकर। और भगवान उदासीन के समान थे: उन्होंने कहा, समझाया, और जब नहीं सुना गया, तो किसी का चुनाव ज़बरदस्ती नहीं छीना।

युद्ध से पहले भीष्म ने भी उनके बारे में कहा था, "सम्मान मिले या न मिले, जनार्दन क्रोध नहीं करेंगे।" यही "असक्तं" है। और गान्धारी के शब्द सच हुए। मौसल पर्व का आरम्भ ही इन शब्दों से होता है, "छत्तीसवाँ वर्ष आने पर", और सत्रहवें सत्संग में आपने सुना था कि श्रीकृष्ण ने कैसे शान्त भाव से, योग में स्थित होकर, एक शिकारी के बाण से शरीर छोड़ा। शाप भी उन्हें बाँध न सका; वे उसे भी उदासीन के समान स्वीकार करके चले गए।

अब दसवाँ श्लोक, जो इसी बात को पूरा करता है। "मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्।" मुझ अध्यक्ष के द्वारा प्रकृति चर और अचर सहित सबको उत्पन्न करती है। "हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते।" हे कुन्तीपुत्र, इसी कारण जगत् घूमता रहता है।

"मयाध्यक्षेण", मुझ अध्यक्ष के द्वारा। गीता का अध्यक्ष कुर्सी पर बैठकर हुक्म देने वाला नहीं है। शंकराचार्य कहते हैं, अध्यक्ष यानी वह जो केवल देखने वाला है, साक्षी, जो स्वयं नहीं बदलता। और वे एक बहुत सुंदर बात कहते हैं: संसार का सारा चलना देखे जाने के लिए ही है। "मैं यह खाऊँगा", "मैं यह देखता हूँ", "मैं यह सुनता हूँ", "मुझे सुख है", "मुझे दुःख है", हर बात आख़िर में किसी के जानने में जाकर पूरी होती है। जो सब जानता है, वही अध्यक्ष है।

श्रीधर स्वामी कहते हैं, वे केवल अपनी उपस्थिति से अधिष्ठाता हैं, इसलिए वे करने वाले भी हैं और उदासीन भी, इसमें कोई उलटापन नहीं। विश्वनाथ चक्रवर्ती एक राजा का चित्र देते हैं, अम्बरीष जैसे किसी राजा का। राज्य के सारे काम मन्त्री और सेवक करते हैं। राजा बस सिंहासन पर है। पर अगर राजा सिंहासन पर न हो, तो मन्त्री एक काम भी नहीं कर सकते। प्रकृति काम करती है, पर उनकी उपस्थिति के बिना वह जड़ है, एक पत्ता भी नहीं हिला सकती।

पर इन सब चित्रों में मुझे सबसे घरेलू, सबसे अपना चित्र संत ज्ञानेश्वर का लगता है। वे कहते हैं, घर में एक दीपक रखा है। वह किसी को आज्ञा नहीं देता, किसी को रोकता नहीं, और कौन किस काम में लगा है, यह जानता भी नहीं। फिर भी घर का सारा काम उसी के उजाले में होता है। वह साक्षी है, और घर के कामकाज का कारण भी। अब सोचिए, शाम को घर में दीपक जल रहा है। उसके उजाले में कोई बच्चा पढ़ रहा है, कोई रसोई में रोटी बना रहा है, और दो भाई किसी बात पर झगड़ रहे हैं। दीपक तीनों को बराबर उजाला दे रहा है। पढ़ाई भी उसी की रोशनी में हो रही है, और झगड़ा भी। क्या झगड़े का दोष दीपक का है? उजाला उसने दिया। उस उजाले में क्या करना है, यह हमने चुना।

और यहीं आज के सवाल का चौथा उत्तर है, शायद सबसे कठिन। हम पूछते हैं, भगवान दिखते क्यों नहीं, और कभी-कभी उसके नीचे एक और सवाल छिपा होता है: अगर हैं, तो यह सब होने क्यों देते हैं? गीता झूठी सान्त्वना नहीं देती। वह यह नहीं कहती कि दुःख नहीं है। वह कहती है कि प्रकृति अपने नियम से चलती है, और प्राणी अपने स्वभाव और अपने कर्मों से बँधे चलते हैं, और जो सबको रोशनी दे रहा है, वह किसी का चुनाव ज़बरदस्ती नहीं छीनता। शंकराचार्य भी ईमानदारी से मानते हैं कि "यह सृष्टि क्यों है", इसका पूरा उत्तर कोई नहीं दे सकता। पर जो दीपक को दोष देना छोड़कर उसकी रोशनी में अपना काम ठीक करने लगता है, उसे धीरे-धीरे दीपक दिखने लगता है।

पर अभी एक बात बाकी है। अगर भगवान इतने महान हैं, सबको धारण करने वाले, सबके अध्यक्ष, तो जब वे स्वयं मनुष्य बनकर इस धरती पर चले, लोगों के बीच बैठे, हँसे, बोले, रथ हाँका, तब लोगों ने उन्हें पहचाना क्यों नहीं? और कुछ ने तो उन्हें रस्सियों से बाँधने तक की योजना बना ली थी। अगले दो श्लोक इसी के बारे में हैं।

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् । परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥ ११ ॥
गीता 9.11 — अर्थ पढ़ें ›
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः । राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥ १२ ॥
गीता 9.12 — अर्थ पढ़ें ›

ग्यारहवाँ श्लोक। "अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।" मूर्ख लोग मनुष्य शरीर धारण किए हुए मेरा तिरस्कार करते हैं, "परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्", क्योंकि वे प्राणियों के महान ईश्वर रूप मेरे परम भाव को नहीं जानते।

यह वाक्य कोई दूर का सिद्धान्त नहीं है। श्रीकृष्ण यह उस समय कह रहे हैं जब वे सचमुच एक मनुष्य शरीर में, एक रथ पर, घोड़ों की लगाम हाथ में लिए बैठे हैं। और सातवें अध्याय में भी लगभग यही शब्द आए थे, "परं भावमजानन्तो", मेरे परम भाव को न जानते हुए। शंकराचार्य "अवजानन्ति" का अर्थ करते हैं, अवज्ञा करते हैं, "परिभव" करते हैं, यानी नीचा समझते हैं। और वे एक कड़वी पर सच्ची बात जोड़ते हैं: ऐसे बेचारे लोग अपने ही इस तिरस्कार से मारे जाते हैं। भगवान का कुछ नहीं बिगड़ता। नुकसान उसका होता है जो नीचा समझता है।

पर इस श्लोक की सबसे सुंदर व्याख्या मुझे रामानुज की लगती है। वे कहते हैं, भगवान ने अपनी अपार करुणा से, इसलिए कि हर कोई उन तक पहुँच सके, मनुष्य का शरीर लिया। और मूर्ख लोग उन्हें इसी कारण साधारण मनुष्य जैसा मान लेते हैं। फिर रामानुज कहते हैं, वे जो "परम भाव" नहीं जानते, वह क्या है? वह है उनकी अपार करुणा, उदारता, सबके लिए सुलभ होना, और प्रेम, जिसके कारण उन्होंने मनुष्य बनना स्वीकार किया। सोचिए, कितनी उलटी बात है। जिस मनुष्य-रूप को देखकर लोग कहते हैं "यह तो हमारे जैसा ही है", वही मनुष्य-रूप उनकी सबसे बड़ी महिमा का प्रमाण है। राजा महल से उतरकर आपकी गली में आ जाए, तो वह छोटा नहीं होता; उसका प्रेम बड़ा दिखता है।

तेरहवें सत्संग में आपने भीष्म के मुख से वह पुरानी बात सुनी थी, जो ब्रह्मा ने देवताओं से कही थी: "यह मनुष्य है" ऐसा सोचकर वासुदेव का कभी अपमान मत करना। और वहीं ब्रह्मा ने कहा था, जो कहे "यह केवल मनुष्य है", वह मन्दबुद्धि है। आज का "मूढा" शब्द वही बात है, अब श्रीकृष्ण के अपने मुख से।

और अब वह कथा, जिसमें लोगों ने उन्हें सचमुच केवल मनुष्य समझा, इतना कि उन्हें बाँध लेने की योजना बना डाली। यह उद्योग पर्व में है, जब श्रीकृष्ण शान्ति का प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर आ रहे थे।

उनके आने से पहले की रात धृतराष्ट्र की सभा में बात चल रही थी। दुर्योधन ने कहा, "मैंने एक बड़ा काम तय किया है। कल सुबह जनार्दन आएँगे, और मैं उन्हें बाँध लूँगा। उनके बँध जाने पर वृष्णि, पृथ्वी और पाण्डव, सब मेरे वश में होंगे।" धृतराष्ट्र दुखी हो गए, बोले, "ऐसा मत कहो। यह सनातन धर्म नहीं है। वे दूत हैं, हमारे सम्बन्धी हैं, प्रिय हैं, उन्होंने कौरवों का कोई अपराध नहीं किया।" और भीष्म ने कहा, "तुम्हारा यह पुत्र काल से घिरा है। कृष्ण से टकराकर यह अपने मन्त्रियों सहित क्षण भर में नष्ट हो जाएगा।" और वे क्रोध में सभा छोड़कर चले गए।

फिर जब सभा बैठी, और श्रीकृष्ण की, भीष्म की, द्रोण की, माता गान्धारी की, किसी की बात उसने नहीं मानी, तो दुर्योधन सभा से बाहर निकला और शकुनि, कर्ण और दुःशासन के साथ बैठकर योजना बनाई: "जनार्दन फुर्तीले हैं। इससे पहले कि वे राजा और भीष्म के साथ मिलकर हमें पकड़ें, हम ही उन्हें ज़बरदस्ती पकड़ लें। उनके पकड़े जाने की ख़बर सुनकर पाण्डव टूटे दाँतों वाले साँपों जैसे हो जाएँगे।"

पर सात्यकि संकेत पढ़ना जानते थे। उन्होंने इरादा भाँप लिया, कृतवर्मा से कहा कि सभा के द्वार पर सेना सजाकर खड़े रहो, और भीतर आकर श्रीकृष्ण को, धृतराष्ट्र और विदुर को सब बता दिया। और पाठ कहता है, मानो मुस्कुराते हुए उन्होंने कहा, "ये मूर्ख इन कमलनयन को पकड़ना चाहते हैं, जैसे बच्चे या नासमझ लोग धधकती आग को कपड़े से पकड़ना चाहें।"

और श्रीकृष्ण ने क्या कहा? उन्होंने धृतराष्ट्र की ओर देखकर कहा, "हे राजन्, यदि ये मुझे बल से पकड़ना चाहें, तो मैं इन सबको रोकने में समर्थ हूँ। पर मैं आपके सामने कोई निन्दित, पाप का काम नहीं करूँगा। दुर्योधन जैसा चाहता है, वैसा कर ले। मैं आपके सब पुत्रों को छूट देता हूँ।" नौवें श्लोक का "उदासीनवदासीनमसक्तं" यहाँ अपनी आँखों से देखिए: सामर्थ्य पूरा, पर किसी से ज़बरदस्ती नहीं।

तब धृतराष्ट्र ने दुर्योधन को वापस बुलवाया, और जो कहा, वह मुझे इस अध्याय के साथ बहुत गहरे जुड़ता लगता है। उन्होंने कहा, "मूर्ख, जिन्हें इन्द्र सहित देवता भी बल से वश में नहीं कर सकते, उन्हें तुम ऐसे पाना चाहते हो जैसे बच्चा चन्द्रमा को चाहता है।" और फिर: "हवा को हाथ से पकड़ना कठिन है, चन्द्रमा को हाथ से छूना कठिन है, धरती को सिर पर उठाना कठिन है, और केशव को बल से पकड़ना कठिन है।"

हवा को हाथ से पकड़ना। अभी छठे श्लोक में हमने सुना था कि सब प्राणी उनमें वैसे हैं जैसे वायु आकाश में। जो हवा को भी अपने भीतर लिए है, उसे कोई मुट्ठी में कैसे बाँधे? विदुर ने भी चेताया, और तब श्रीकृष्ण ने दुर्योधन से कहा, "सुयोधन, तुम मोह के कारण मुझे अकेला मानते हो, इसीलिए मेरा तिरस्कार करके मुझे पकड़ना चाहते हो।" और पाठ कहता है, यह कहकर वे ज़ोर से हँसे। पाठ का शब्द है "परिभूय", तिरस्कार करके, वही परिभव जो शंकराचार्य आज के श्लोक के अर्थ में कहते हैं। उसके बाद उस सभा में जो हुआ, उनका वह विराट रूप, और धृतराष्ट्र को दिव्य आँखें मिलना, यह आपने पंद्रहवें सत्संग में सुना था। आज बस इतना याद रखिए: जिसे बाँधने चले थे, वह पूरे ब्रह्माण्ड को अपने भीतर लिए खड़ा था।

संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर कहते हैं: पीलिया से बिगड़ी आँख को चाँदनी भी पीली दिखती है। बुख़ार से बिगड़े मुँह को दूध भी कड़वा ज़हर लगता है। वैसे ही बिगड़ी दृष्टि वाले उस अमानुष को मनुष्य मान लेते हैं। और वे एक बात कहते हैं जो आज के समय में बहुत सच लगती है। वे कहते हैं, ऐसे लोग, जब तक कोई आकार सामने रहता है, उसे भगवान मानकर पूजते हैं, और जब वह टूट जाए, तो उसे छोड़ देते हैं और कहते हैं, "भगवान है ही नहीं।" हमारी श्रद्धा भी कई बार ऐसी ही होती है। मन्नत पूरी हुई तो भगवान हैं; नहीं हुई तो नहीं हैं। जो श्रद्धा नतीजे पर टिकी है, वह आकार पर टिकी है, और आकार तो टूटते हैं।

अब बारहवाँ श्लोक, जो बताता है कि ऐसे तिरस्कार का फल क्या होता है। "मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः।" उनकी आशा व्यर्थ, कर्म व्यर्थ, ज्ञान व्यर्थ है, वे अज्ञानी हैं। "राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः।" वे मोह में डालने वाली राक्षसी और आसुरी प्रकृति का आश्रय लिए रहते हैं।

"मोघ" यानी खोखला, जिसमें कुछ निकलता नहीं। संत ज्ञानेश्वर इसके दो चित्र देते हैं जो भुलाए नहीं भूलते। ऐसा जीवन वैसा है जैसे बिना बरसे गरजते बादल। और जैसे बकरी के गले में लटकते थन, दिखने में थन, पर उनसे दूध एक बूँद नहीं निकलता। और शंकराचार्य राक्षसी-आसुरी स्वभाव को एक वाक्य में बता देते हैं: जिसकी ज़ुबान पर बस यही रहे, "काटो, तोड़ो, खाओ, पियो, दूसरे का छीन लो।"

दुर्योधन की वह योजना इस श्लोक की सबसे साफ़ तस्वीर है। सात्यकि ने कहा था, "यह काम किसी भी तरह पूरा होने वाला नहीं।" मोघाशा, व्यर्थ आशा। रात भर सोची गई, चार लोगों ने मिलकर बनाई, और एक हँसी में बिखर गई। मोघकर्मा। पर मैं यह श्लोक डराने के लिए नहीं पढ़ रहा। यह बस बताता है कि जब मन तिरस्कार की आँख पहन लेता है, तो उसकी सारी मेहनत किस दिशा में चली जाती है। और लोकमान्य तिलक कहते हैं, यह आसुरी स्वभाव का वर्णन है; अब इसके बाद दैवी स्वभाव का वर्णन आता है। यानी गीता इस अन्धेरे पर रुकती नहीं।

अगले सत्संग में श्रीकृष्ण इन्हीं शब्दों से आगे बढ़ेंगे: "महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः।" एक शब्द पर ध्यान दीजिए, "तु", परन्तु। जिन्होंने तिरस्कार किया, उनकी बात हो गई। अब उनकी बात होगी जो दूसरी प्रकृति का आश्रय लेते हैं। वे कौन हैं, और भगवान उनके लिए क्या करते हैं, यह अगली बार।

और अब एक पल उस कमरे में लौट चलिए जहाँ यह सब सुनाया जा रहा है। सञ्जय बोल रहे हैं: "मूर्ख लोग मनुष्य शरीर में मेरा तिरस्कार करते हैं।" और सुन रहे हैं धृतराष्ट्र, जिन्होंने ख़ुद उस सभा में अपने बेटे से कहा था, "केशव को बल से पकड़ना हवा को हाथ से पकड़ने जैसा है।" वे जानते थे। उन्होंने कहा भी था। और फिर भी उनका बेटा नहीं रुका, और वे उसे रोक नहीं पाए। जानना एक बात है; उस जानने पर टिकना दूसरी।

तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली बात। भगवान दिखते नहीं, क्योंकि जिस रूप से वे सब जगह हैं, वह आँख का विषय ही नहीं; जैसे आकाश नहीं दिखता, उसमें चीज़ें दिखती हैं, और हवा नहीं दिखती, पत्ते हिलते दिखते हैं। गोवर्धन के नीचे बैठे लोगों को छत दिखती थी, थामने वाला हाथ नहीं। अपने जीवन की छत को देखिए, और कभी उस हाथ को भी याद कर लीजिए।

दूसरी बात। अन्त मिटना नहीं है, बीज बनना है। मनु की नाव में बीज थे; प्रलय के बाद वही संसार बने। और जिस स्वभाव से हम बार-बार हारते हैं, उस प्रकृति की लगाम भी उन्हीं के हाथ में है। उससे अकेले मत लड़िए; उनसे जुड़कर लड़िए।

तीसरी बात। दीपक को दोष देना छोड़िए। उसकी रोशनी में क्या करना है, यह हमारा चुनाव है। और भगवान के मनुष्य बनकर पास आने को छोटा मत समझिए; रामानुज कहते हैं, वही उनकी सबसे बड़ी करुणा है। और यह सब सुनने की एक ही चाबी है, जो पहले श्लोक में मिली थी: एक साफ़ कान, जो दोष नहीं ढूँढता।

आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आपके जीवन में कभी ऐसा हुआ कि किसी मुश्किल के समय छत तो सलामत रही, पर उस समय समझ नहीं आया कि उसे थामे कौन था, और बरसों बाद समझ आया? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।

जिस हवा को कोई हाथ से पकड़ नहीं सकता, वह भी पूरी की पूरी आकाश में समाई है। आप भी उसी में हैं।

जय श्री कृष्ण।

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना । मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥ ४ ॥
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तीन बातें

  1. भगवान दिखते नहीं, क्योंकि जिस रूप से वे सब जगह हैं, वह आँख का विषय ही नहीं; जैसे आकाश नहीं दिखता, उसमें चीज़ें दिखती हैं, और हवा नहीं दिखती, पत्ते हिलते दिखते हैं। गोवर्धन के नीचे बैठे लोगों को छत दिखती थी, थामने वाला हाथ नहीं। अपने जीवन की छत को देखिए, और कभी उस हाथ को भी याद कर लीजिए।
  2. अन्त मिटना नहीं है, बीज बनना है। मनु की नाव में बीज थे; प्रलय के बाद वही संसार बने। और जिस स्वभाव से हम बार-बार हारते हैं, उस प्रकृति की लगाम भी उन्हीं के हाथ में है। उससे अकेले मत लड़िए; उनसे जुड़कर लड़िए।
  3. दीपक को दोष देना छोड़िए। उसकी रोशनी में क्या करना है, यह हमारा चुनाव है। और भगवान के मनुष्य बनकर पास आने को छोटा मत समझिए; रामानुज कहते हैं, वही उनकी सबसे बड़ी करुणा है। और यह सब सुनने की एक ही चाबी है, जो पहले श्लोक में मिली थी: एक साफ़ कान, जो दोष नहीं ढूँढता।