लौटकर न आना
गीता 8.15–8.28 · 77 मिनट
ब्रह्मा का दिन-रात; जाने के दो रास्ते
मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् ।
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥ १५ ॥
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥ १६ ॥
सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद् ब्रह्मणो विदुः ।
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥ १७ ॥
आपने कभी सोचा है कि हम जो कुछ भी बनाते हैं, वह सब कहीं न कहीं लौटकर बिखर जाता है? घर बनता है, फिर पुराना होता है। नौकरी मिलती है, फिर छूटती है। बच्चे बड़े होते हैं, और एक दिन अपना घर बसाने चले जाते हैं। और हम सुनते आए हैं कि पुण्य करो तो स्वर्ग मिलेगा, पर साथ ही यह भी सुना है कि पुण्य चुकने पर वहाँ से भी लौटना पड़ता है। तो क्या कोई ऐसी जगह है, कोई ऐसा ठिकाना, जहाँ पहुँचकर फिर लौटना न पड़े? यही आज का सवाल है: लौटकर न आना।
जय श्री कृष्ण।
आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का चौबीसवाँ सत्संग है, और आज हम आठवाँ अध्याय पूरा करेंगे। पहले याद कर लें कि पिछली बार हम कहाँ रुके थे। पिछले सत्संग में, आठवें अध्याय के पहले चौदह श्लोकों में, अर्जुन ने सात प्रश्न पूछे थे, और उनमें आख़िरी प्रश्न सबसे भारी था: मृत्यु के समय आपको कैसे जाना जाए? श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया था, "अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्", जो अन्त समय में मुझे याद करते हुए शरीर छोड़ता है, वह मेरे भाव को पाता है। फिर वह नियम आया, "यं यं वापि स्मरन्भावं", मनुष्य अन्त में जिस भाव को याद करता है, उसी को पाता है, क्योंकि जीवन भर उसका मन उसी में रँगा रहा। इसलिए यह अन्तिम क्षण की कोई चाल नहीं, जीवन भर की आदत है: "तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च", सब समय मुझे याद करो, और युद्ध करो। और पिछला सत्संग इस भरोसे पर रुका था: "तस्याहं सुलभः पार्थ", जो निरन्तर मुझे याद करता है, उसके लिए मैं सुलभ हूँ।
आपको याद रहे, यह सब हमें सञ्जय सुना रहे हैं, हस्तिनापुर में, अन्धे राजा धृतराष्ट्र को, उस दिन जब भीष्म बाणों की शय्या पर गिर चुके हैं। महाभारत के भीष्म पर्व का बत्तीसवाँ अध्याय ही गीता का आठवाँ अध्याय है, "अक्षरब्रह्म योग"। और ज़रा सोचिए, इस अध्याय में मृत्यु के समय की बात हो रही है, और सुनने वाला राजा अभी-अभी अपने पितामह के गिरने की ख़बर सुनकर बैठा है। यह बात उस कमरे में हवा की तरह भरी होगी।
अब पंद्रहवाँ श्लोक। "मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्।" मुझे पाकर, फिर से जन्म, जो दुःखों का घर है और टिकने वाला नहीं, "नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः", वे महात्मा फिर नहीं पाते, क्योंकि वे सबसे ऊँची सिद्धि पा चुके हैं।
पिछले श्लोक में श्रीकृष्ण ने कहा था, मैं सुलभ हूँ। श्रीधर स्वामी कहते हैं कि अर्जुन के मन में स्वाभाविक प्रश्न उठता है: ठीक है, आप सुलभ हैं, पर आपको पाकर होता क्या है? यह श्लोक उसी का उत्तर है। और उत्तर में जन्म के लिए दो शब्द हैं। पहला, "दुःखालय", दुःखों का आलय, यानी दुःखों का घर। शंकराचार्य कहते हैं, वह जगह जहाँ दुःख आकर बस जाते हैं। मधुसूदन सरस्वती इसमें माँ के गर्भ में रहने से लेकर जन्म लेने तक के कष्ट गिनाते हैं। और दूसरा शब्द, अशाश्वत, यानी जो टिकता नहीं। मधुसूदन एक बहुत सच्ची बात कहते हैं: यह जन्म ऐसा है कि अभी देखा, और अभी गया।
पर यहाँ नीलकण्ठ एक बड़ी ईमानदार बात जोड़ते हैं, जो मुझे बहुत अच्छी लगती है। वे कहते हैं, नासमझ आँखों को इस जीवन में थोड़ा सुख भी दिखता है, यह मानना पड़ेगा। पर वह सुख भी अशाश्वत है, टिकता नहीं। यानी गीता यह नहीं कह रही कि जीवन में कोई मिठास नहीं। बच्चे की हँसी, माँ के हाथ का खाना, किसी पुराने दोस्त का फ़ोन, यह सब मीठा है। गीता केवल इतना कहती है कि यह मिठास भी हथेली पर रखी बर्फ़ की तरह है।
और "महात्मानः" किसे कहा? नीलकण्ठ कहते हैं, जिन्होंने योग से अपने मन को जीत लिया। रामानुज इसे और कोमल बनाते हैं: महात्मा वे, जिन्हें भगवान इतने प्रिय हैं कि उनके बिना वे अपने आप को सम्भाल ही नहीं पाते। सुनिए, महात्मा की यह परिभाषा कितनी अलग है। बड़ा आदमी वह नहीं जिसके पास बहुत है, बड़ा वह है जिसका मन बड़ी चीज़ से जुड़ गया।
अब सोलहवाँ श्लोक, और यह इस पूरे सत्संग की नींव है। "आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन।" हे अर्जुन, ब्रह्मा के लोक तक जितने भी लोक हैं, सब लौटकर आने वाले हैं। "मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते।" परन्तु हे कुन्तीपुत्र, मुझे पाकर फिर जन्म नहीं होता।
इस श्लोक का पहला आधा बहुत चौंकाने वाला है। हम सोचते हैं कि स्वर्ग सबसे ऊँची मंज़िल है। श्रीकृष्ण कहते हैं, स्वर्ग तो छोड़ो, ब्रह्मा का लोक भी, जो सबसे ऊँचा माना जाता है, वह भी ऐसा स्टेशन है जहाँ से गाड़ी लौटती है। हमारी टीका इसका कारण बहुत साफ़ बताती है: सबसे ऊँचा स्वर्ग भी पुण्य से मिलता है, और पुण्य रहने तक ही रहता है। यानी वह कमाई है, और कमाई ख़र्च होती है।
सोलहवें सत्संग में आपने मुद्गल ऋषि की कथा सुनी थी, जिनके पास देवदूत स्वर्ग का विमान लेकर आया था। आपको याद होगा, मुद्गल ने पहले पूछा था कि स्वर्ग के दोष भी बताओ। और देवदूत ने कहा था, स्वर्ग में केवल पहले के कर्मों का फल भोगा जाता है, वहाँ नया कर्म नहीं होता, इसलिए भोगना जड़ को ही काटता जाता है, और अन्त में गिरना होता है। पर आज उस कथा का एक वाक्य मैं ख़ास तौर पर याद दिलाना चाहता हूँ, जो इस श्लोक के ठीक ऊपर रखा जा सकता है। देवदूत ने कहा था: "ये भयानक दोष ब्रह्मा के धाम तक हैं।" ब्रह्मा के धाम तक। वही बात जो आज श्रीकृष्ण कह रहे हैं, "आब्रह्मभुवनाल्लोकाः"।
और महाभारत अपने बिलकुल आख़िरी पन्नों में यही प्रश्न एक बार फिर उठाता है, और यह कथा हमने अब तक नहीं सुनी। स्वर्गारोहण पर्व में, जब पूरी कथा सुनाई जा चुकी है, राजा जनमेजय वैशम्पायन से पूछते हैं: भीष्म, द्रोण, धृतराष्ट्र, विराट, द्रुपद, कर्ण के पुत्र, घटोत्कच, ये सब वीर स्वर्ग में कितने समय रहे? "क्या वहाँ उनका स्थान शाश्वत है? या कर्मों के अन्त में उन्होंने कौन-सी गति पाई?" और वैशम्पायन का उत्तर बस एक पंक्ति में है: "कर्मों के अन्त में सबको जाना होता है।" फिर वे गिनाते हैं कि कौन कहाँ गया। भीष्म वसुओं में जा मिले, द्रोण बृहस्पति में, कर्ण सूर्य में। और वासुदेव, यानी श्रीकृष्ण, जो नारायण के अंश थे, कर्म के अन्त में उन्हीं नारायण में प्रवेश कर गए।
सोचिए। अठारह दिन का युद्ध, जीतने वाले और हारने वाले, स्वर्ग पाने वाले, और फिर भी महाभारत का आख़िरी उत्तर यही है कि स्वर्ग भी आख़िरी पड़ाव नहीं था। यही "पुनरावर्तिनोऽर्जुन" है, सब लौटकर आने वाले।
अब दूसरा आधा, और यहाँ छोटा-सा शब्द "तु" बहुत भारी है: "मामुपेत्य तु", परन्तु मुझे पाकर। हमारी टीका कहती है, भगवान को पाना किसी जगह को पाना नहीं है, इसलिए वहाँ से गिरना नहीं होता। इसे ऐसे समझिए। अगर आप किसी होटल में ठहरे हैं, तो पैसा जितने दिन का दिया है उतने दिन रहेंगे, फिर सामान बाँधना पड़ेगा। पर अपनी माँ के घर में कोई चेक-आउट का समय नहीं होता। स्वर्ग होटल है। भगवान घर हैं।
संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर एक प्यारी उपमा देते हैं: जो आदमी नींद से जाग चुका है, उसे सपने की बाढ़ नहीं डुबो सकती। वैसे ही जो मुझ तक पहुँच गया, उसे संसार छूता ही नहीं।
और यहाँ आचार्यों के बीच एक सुन्दर बहस भी है, जो मैं आपको बताना चाहता हूँ। अगर ब्रह्मा का लोक भी लौटाने वाला है, तो क्या वहाँ जाने वाले सब के सब लौटते हैं? श्रीधर स्वामी, मधुसूदन सरस्वती, नीलकण्ठ और बलदेव विद्याभूषण कहते हैं: नहीं, सब नहीं। जो केवल पुण्य कर्मों के बल पर वहाँ पहुँचे, वे लौटते हैं। पर जो भगवान की उपासना करते हुए, सच्चे ज्ञान के साथ वहाँ पहुँचे, वे ब्रह्मा की आयु के अन्त में ब्रह्मा के साथ ही परम पद में चले जाते हैं। इसे वे क्रम से मिलने वाली मुक्ति कहते हैं। अभिनवगुप्त, कश्मीर के आचार्य, इस पर विनम्रता से कहते हैं कि सबने ऐसा ही समझाया है, पर यह बात उनके मन में पूरी तरह नहीं बैठती, और वे अपना अलग अर्थ करते हैं: ब्रह्म-पद को पाने तक जीव ऊपर-नीचे, इधर-उधर के लोकों में पहिए की तरह घूमता ही रहता है। दोनों बातों का सार एक ही है: पुण्य से मिली हर जगह के आगे एक "जब तक" लगा है।
अब सत्रहवाँ श्लोक, जहाँ श्रीकृष्ण बताते हैं कि यह "जब तक" कितना लम्बा है। "सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद् ब्रह्मणो विदुः।" ब्रह्मा का एक दिन हज़ार युगों का होता है, "रात्रिं युगसहस्रान्तां", और उनकी रात भी हज़ार युगों में पूरी होती है। "तेऽहोरात्रविदो जनाः", जो यह जानते हैं, वही लोग सचमुच दिन और रात को जानते हैं।
हमारी टीका बताती है कि यहाँ "युग" का अर्थ चारों युगों का एक पूरा चक्र है। और इक्कीसवें सत्संग में आपने मार्कण्डेय मुनि की कथा सुनी थी, जिन्होंने प्रलय देखा था। आज उसी कथा से केवल एक हिसाब: मार्कण्डेय युधिष्ठिर को बताते हैं कि सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग, सन्ध्याओं के साथ, बारह हज़ार वर्षों का एक युग बनाते हैं, और "यही हज़ार बार पूरा हो, तो वह ब्रह्मा का एक दिन कहलाता है"। श्रीधर स्वामी इसमें यह भी जोड़ते हैं कि ये बारह हज़ार वर्ष देवताओं के वर्ष हैं, और मनुष्यों का एक पूरा वर्ष देवताओं का एक दिन-रात होता है। अब आप गिनना चाहें तो गिन लीजिए। मैं तो यहीं हार मान लेता हूँ।
पर संत ज्ञानेश्वर इस हिसाब को ऐसे कहते हैं कि वह मन में उतर जाता है। वे कहते हैं, ब्रह्मा के उस नगर में एक पहर इतना लम्बा है कि उसमें एक इन्द्र की पूरी आयु भी नहीं समाती। और ब्रह्मा के एक ही दिन में चौदह इन्द्र आते और जाते हैं। सोचिए, जिस इन्द्र के सिंहासन के लिए देवता और असुर लड़ते रहे, वह ब्रह्मा के एक दिन का चौदहवाँ हिस्सा है।
और श्रीधर स्वामी एक बात कहते हैं जो हम सबको छूती है। वे कहते हैं, जो लोग दिन-रात को केवल सूरज और चाँद की चाल से जानते हैं, वे सचमुच "तेऽहोरात्रविदो जनाः" में नहीं गिने जाते, क्योंकि उनकी नज़र छोटी है। हम भी दिन को ऑफ़िस की घड़ी से गिनते हैं, साल को कैलेंडर से, उम्र को जन्मदिन की मोमबत्तियों से। और जब कोई बड़ी परेशानी आती है, तो लगता है यही सबसे बड़ी बात है। यह श्लोक नज़र को इतना बड़ा कर देता है कि हमारी चिन्ता अपने सही आकार में दिखने लगती है। हमारी टीका यही कहती है: ऐसे दिन के आगे मनुष्य का जीवन कुछ भी नहीं; बात यह दिखाने की है कि सबसे लम्बे समय तक टिकने वाले लोक भी कितने थोड़े समय के हैं।
तो अब तक की बात इतनी है: इस संसार में, ब्रह्मा के लोक तक, हर जगह के आगे "जब तक" लगा है। और एक ही जगह है जहाँ से लौटना नहीं: श्रीकृष्ण स्वयं।
पर अभी एक बात बाकी है। ब्रह्मा का दिन तो सुन लिया। पर जब वह दिन ढलता है, तो इस सारे संसार का क्या होता है? और अगली सुबह जो संसार फिर से जागता है, क्या वह वही है, या कोई नया? आइए, अगले तीन श्लोक सुनते हैं।
अव्यक्ताद् व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे ।
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥ १८ ॥
भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ।
रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥ १९ ॥
परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः ।
यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥ २० ॥
अठारहवाँ श्लोक। "अव्यक्ताद् व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे।" ब्रह्मा का दिन आने पर सब दिखाई देने वाली चीज़ें अव्यक्त से, यानी न दिखने वाली अवस्था से, प्रकट होती हैं। "रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके।" और रात आने पर उसी अव्यक्त नाम वाले में फिर लीन हो जाती हैं।
"व्यक्त" का अर्थ है जो प्रकट है, दिखता है, और "अव्यक्त" जो छिपा हुआ है, बीज जैसा। हमारी टीका कहती है कि यह पहला अव्यक्त प्रकृति की बीज-अवस्था है, जिसमें संसार हर रात लीन होता है और जिससे फिर लौटता है। मधुसूदन सरस्वती और नीलकण्ठ यहाँ एक बारीक बात कहते हैं। वे कहते हैं, यहाँ रोज़ की सृष्टि और रोज़ के प्रलय की बात है, इसलिए यह अव्यक्त सबसे मूल प्रकृति नहीं, बल्कि ब्रह्मा की नींद की अवस्था है। ब्रह्मा जागते हैं तो संसार जागता है, सोते हैं तो संसार उनकी नींद में समा जाता है। और नीलकण्ठ इसे हमारी अपनी नींद से जोड़ते हैं: जैसे गहरी नींद में हमारी पूरी दुनिया, घर, दफ़्तर, चिन्ताएँ, सब कहीं खो जाती है, और आँख खुलते ही सब वैसी की वैसी लौट आती है। हर रात हम एक छोटा प्रलय जीते हैं, और हर सुबह एक छोटी सृष्टि।
और अगर यह सच है, तो इसमें हमारे लिए एक बहुत व्यावहारिक बात छिपी है। रात को सोते समय हम जो मन में लेकर सोते हैं, वही अक्सर सुबह सबसे पहले जागता है। झगड़ा लेकर सोए, तो सुबह वही कड़वाहट उठती है। चिन्ता लेकर सोए, तो आँख खुलते ही वही चिन्ता। पिछले सत्संग में सुना था कि अन्त समय में जो भाव मन में होता है, वही आगे ले जाता है। यह रोज़ की रात उसी का छोटा-सा अभ्यास है। सोने से पहले दो मिनट, भगवान का नाम, या बस मन में एक धन्यवाद। छोटे प्रलय में अच्छा बीज रखकर सोइए।
संत ज्ञानेश्वर इसके लिए आकाश के बादलों का चित्र देते हैं। शरद ऋतु आती है तो बादल आकाश में ही घुलकर ग़ायब हो जाते हैं, और गर्मी के बाद फिर उसी आकाश से निकल आते हैं। और दूसरा चित्र: जैसे पूरा पेड़ बीज में समा जाता है, वैसे ही अनेकता जहाँ समा जाए, उसे वे "साम्य" कहते हैं।
अब उन्नीसवाँ श्लोक, और इसमें एक शब्द है जिस पर हमें रुकना है। "भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते।" हे पार्थ, यही प्राणियों का समुदाय बार-बार उत्पन्न होकर लीन होता है, "रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे", रात आने पर विवश होकर लीन होता है, और दिन आने पर फिर उत्पन्न होता है।
"स एवायं", यही, वही का वही। शंकराचार्य और मधुसूदन दोनों ज़ोर देते हैं कि अगले कल्प में जो जीव लौटते हैं, वे नए नहीं होते, वही के वही होते हैं। मधुसूदन इसका कारण बताते हैं: अगर हर बार नए जीव बनते, तो किए हुए कर्म का फल बिना भोगे नष्ट हो जाता, और बिना किए कर्म का फल किसी के सिर आ पड़ता। ऐसा अन्याय सृष्टि में नहीं होता। यानी हम अपना खाता साथ लेकर ही लौटते हैं।
और अब वह शब्द, "विवश"। हमारी टीका कहती है, यही मुख्य शब्द है: प्राणी अपनी इच्छा से नहीं लौटते, अपने पिछले कर्मों से बँधे हुए लौटते हैं, जब तक उनसे मुक्त न हो जाएँ। तिलक इसे बहुत सीधे कहते हैं: इच्छा हो या न हो। और शंकराचार्य, मधुसूदन और नीलकण्ठ, तीनों एक ही बात कहते हैं कि यह श्लोक वैराग्य जगाने के लिए कहा गया है। मधुसूदन के शब्दों का सार यह है: सब प्राणी विवश होकर बार-बार जन्म और मृत्यु के दुःख में घूमते हैं, यह देखकर मन कहे, "बस, इस चक्कर से अब और नहीं।"
इस "विवश" को समझने के लिए महाभारत की एक छोटी-सी कथा मुझे बहुत सच्ची लगती है। यह शान्ति पर्व में है। युद्ध के बाद युधिष्ठिर भीष्म से पूछते हैं: सब प्राणियों का नाश करने वाला यह काल बीतता जा रहा है, ऐसे में क्या करना श्रेष्ठ है? और भीष्म उत्तर में एक पिता और पुत्र का पुराना संवाद सुनाते हैं।
एक ब्राह्मण था, जो वेदों के पाठ में लगा रहता था। उसका एक बेटा था, बहुत समझदार, जिसका नाम ही था मेधावी। एक दिन बेटे ने पिता से पूछा: "पिताजी, मनुष्यों की आयु तो बड़ी तेज़ी से खिसकती जा रही है। ऐसे में समझदार आदमी क्या करे?" पिता ने वही कहा जो उस समय की रीति थी: पहले ब्रह्मचर्य से वेद पढ़ो, फिर विवाह करो, पुत्र हो, यज्ञ करो, और फिर बुढ़ापे में वन जाकर मुनि बनो।
बेटे ने कहा: "जब संसार चारों ओर से घिरा है, मारा जा रहा है, और न चूकने वाली चीज़ें गिर रही हैं, तब आप इतने निश्चिन्त होकर कैसे बोल रहे हैं?" पिता चौंके: "कौन-सी चीज़ें गिर रही हैं? तुम मुझे डरा क्यों रहे हो?" और बेटे ने कहा: "संसार मृत्यु से मारा जा रहा है और बुढ़ापे से घिरा है। ये दिन और रात गिर रहे हैं। आप जागते क्यों नहीं? न चूकने वाली रातें लगातार आती हैं और जाती हैं।"
सुनिए, यह वही बात है जो आज श्रीकृष्ण कह रहे हैं, बस छोटे पैमाने पर। वहाँ ब्रह्मा के दिन और रात हैं, यहाँ हमारे अपने दिन और रात। और हर रात, बेटा कहता है, आयु का एक टुकड़ा और कट जाता है।
फिर मेधावी ने जो कहा, वह मैं लगभग उसी के शब्दों में रखना चाहता हूँ। "जब हर रात के बीतने पर आयु और छोटी हो जाती है, तो उथले पानी की मछली की तरह कौन सुख पाएगा?" और फिर: "जैसे कोई फूल चुन रहा हो और उसका मन कहीं और लगा हो, वैसे ही मृत्यु उसे पकड़कर ले जाती है, जैसे भेड़िन मेमने को।" और फिर वह पंक्ति जो इस पूरे संवाद का हृदय है: "जो कल्याण है, वह आज ही करो; यह समय तुम्हें लाँघकर न निकल जाए। कल का काम आज, और दोपहर बाद का काम दोपहर से पहले कर लो, क्योंकि मृत्यु यह देखने के लिए नहीं रुकती कि तुम्हारा काम हुआ या नहीं।"
उथले पानी की मछली। मुझे यह उपमा बहुत चुभती है। मछली पानी में है, तैर रही है, उसे लगता है सब ठीक है। उसे पता नहीं कि पानी हर घंटे घट रहा है। हमारा "विवश" होना यही है: हम तैरते रहते हैं, और पानी घटता रहता है।
इस कथा का अन्त अभी मैं रोककर रखूँगा, क्योंकि मेधावी ने आख़िर में एक ऐसी बात कही है जिसका सम्बन्ध सीधे इस अध्याय के आख़िरी श्लोकों से है। उसे हम वहीं सुनेंगे।
और अब, इससे पहले कि हम बीसवें श्लोक में उतरें, एक छोटी-सी बात आपसे कहना चाहता हूँ। अब तक हमने जो सुना, वह भारी है: ब्रह्मा का लोक भी लौटाने वाला, हर रात हम सबका विवश होकर लीन होना, और फिर लौटना। अगर कोई यहीं उठकर चला जाए, तो उसके मन में केवल यह डर रह जाएगा कि सब कुछ घूमता है और कुछ भी नहीं बचता। आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। गीता यह डर देने के लिए नहीं बोली गई। अगले ही श्लोक में श्रीकृष्ण बताते हैं कि इस सबके बीच कुछ ऐसा है जो कभी नष्ट नहीं होता, और आगे वे यह भी बताएँगे कि वहाँ तक पहुँचा कैसे जाए। तो अगर आप यह सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की यह यात्रा बीच में न छूटे। और आज का यह सत्संग आख़िर तक सुनिए, क्योंकि आज का सबसे बड़ा भरोसा अभी आना बाकी है।
तो बीसवाँ श्लोक। "परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः।" परन्तु उस अव्यक्त से परे एक दूसरा सनातन अव्यक्त भाव है। "यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति।" सब प्राणियों के नष्ट होने पर भी वह नष्ट नहीं होता।
यह "तु", यह "परन्तु", फिर आया। अभी तक की सारी बात एक ओर, और यह "परन्तु" दूसरी ओर। हमारी टीका इसे बहुत साफ़ कहती है: दो अव्यक्त हैं। पहला प्रकृति की बीज-अवस्था, जिसमें संसार सोता और जागता है। दूसरा, प्रकृति के भी पीछे की सनातन सत्ता, जो न उत्पन्न होती है, न लीन होती है। मधुसूदन एक और बात कहते हैं: वह केवल नष्ट होने वालों के बीच नष्ट होने से ही नहीं बचता, जब सब उत्पन्न होते हैं, तब वह उत्पन्न भी नहीं होता। वह आता-जाता ही नहीं।
संत ज्ञानेश्वर इसके लिए दो चित्र देते हैं, और दोनों ऐसे हैं कि एक बार सुन लें तो भूलते नहीं। पहला, लहरें। लहरें उठती हैं, गिरती हैं, आती हैं, जाती हैं, पर पानी अखण्ड रहता है। दूसरा, सोना। गहने गलाए जाते हैं, नए बनते हैं, कंगन से हार, हार से अँगूठी, पर सोना वही का वही रहता है। ज्ञानेश्वर कहते हैं, वैसे ही मरते हुए जीवों के आकारों में भी वह अमर है।
और इक्कीसवें सत्संग में आपने मार्कण्डेय की कथा सुनी थी, उस प्रलय के समुद्र में अकेले भटकते हुए, जब उन्होंने बरगद की शाखा पर एक बालक को लेटे देखा और सोचा, "जब सारा लोक नष्ट हो चुका है, तो यह शिशु यहाँ कैसे लेटा है?" आज उस प्रश्न का उत्तर यह श्लोक है: "नश्यत्सु न विनश्यति", सबके नष्ट होने पर भी जो नष्ट नहीं होता।
और यह बात हमारे लिए क्यों ज़रूरी है? क्योंकि हम पूरी ज़िन्दगी लहरों को पकड़ने में लगाते हैं। यह रिश्ता बचा रहे, यह पद बचा रहे, यह शरीर बचा रहे। और लहर अपने स्वभाव से गिरती है। गीता कहती है, लहर से प्रेम करो, पर भरोसा पानी पर रखो।
पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने कहा, एक सनातन अव्यक्त है जो नष्ट नहीं होता। पर वह है क्या, और उसका श्रीकृष्ण से क्या सम्बन्ध है? और उसे पाने का रास्ता क्या है? अगले दो श्लोकों में श्रीकृष्ण इस अव्यक्त को एक नाम देते हैं, और फिर एक ऐसा शब्द कहते हैं जिसमें पूरी भक्ति समाई है।
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् ।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ २१ ॥
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ।
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥ २२ ॥
इक्कीसवाँ श्लोक। "अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्।" वह अव्यक्त "अक्षर" कहा गया है, और उसी को परम गति कहते हैं। "यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।" जिसे पाकर कोई लौटता नहीं, वह मेरा परम धाम है।
"अक्षर", यानी जिसका क्षर न हो, जो घटे नहीं, मिटे नहीं। यही शब्द इस अध्याय के नाम में है, "अक्षरब्रह्म योग"। और ध्यान दीजिए, अध्याय के शुरू में श्रीकृष्ण ने कहा था कि ब्रह्म अक्षर है; अब घूमकर वहीं आ गए हैं, पर एक नई बात के साथ: "मम", मेरा। शंकराचार्य और मधुसूदन सरस्वती दोनों इसे "विष्णु का परम पद" कहते हैं। और श्रीधर स्वामी एक बहुत सुन्दर बारीकी पकड़ते हैं। वे कहते हैं, "मेरा धाम" कहना वैसा ही है जैसे कोई कहे "राहु का सिर", जबकि राहु तो केवल सिर ही है। यानी धाम और श्रीकृष्ण अलग नहीं हैं। श्रीधर का निष्कर्ष है: "मैं ही परम गति हूँ।"
और "परमां गतिम्" पर नीलकण्ठ कहते हैं: ब्रह्मा के लोक तक जो गति है, वह परम नहीं, क्योंकि वह बनी हुई है, किसी कर्म का फल है। यह गति परम है, क्योंकि यह किसी कर्म से बनी नहीं। रामानुज यहाँ "धाम" शब्द के दो अर्थ देते हैं। एक, स्थान। और दूसरा, प्रकाश, यानी वह ज्ञान जो सीमाओं में बँधा नहीं।
संत ज्ञानेश्वर "न निवर्तन्ते" के लिए जो उपमाएँ देते हैं, वे रसोई और खेत से ली हुई हैं, और इसीलिए इतनी सच्ची हैं। वे कहते हैं, दूध से घी बन जाए, तो घी फिर कभी दूध नहीं बनता। गन्ने से शक्कर बन जाए, तो कितनी भी चतुराई करो, शक्कर फिर गन्ना नहीं बनती। लोहा पारस को छूकर सोना बन जाए, तो उसका लोहापन कौन लौटा लाएगा? आग में पड़ा ईंधन आग ही बन जाता है। वैसे ही, ज्ञानेश्वर कहते हैं, जो उस तक पहुँच गया, उसका लौटना नहीं होता। यह किसी दरवाज़े पर ताला लगने जैसा नहीं, स्वभाव बदल जाने जैसा है।
अब बाईसवाँ श्लोक, और यहाँ से इस अध्याय की सबसे कोमल बात शुरू होती है। "पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया।" हे पार्थ, वह परम पुरुष अनन्य भक्ति से ही प्राप्त होता है, "यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्", जिसके भीतर सब प्राणी हैं और जिससे यह सब व्याप्त है।
देखिए, कितनी बड़ी बात कितने छोटे रास्ते से जोड़ दी गई। अभी तक हम ब्रह्मा के दिन, हज़ार युग, दो अव्यक्त, अक्षर, परम धाम, इन बड़े-बड़े शब्दों में घूम रहे थे। और श्रीकृष्ण कहते हैं, यह सब इतना बड़ा है, पर मिलता एक ही चीज़ से है: भक्ति। और भक्ति भी कैसी? "अनन्य", जिसमें कोई दूसरा न हो।
और यहाँ आचार्य अपने-अपने ढंग से इस "अनन्य" को खोलते हैं। शंकराचार्य कहते हैं, यह ज्ञान के रूप वाली भक्ति है, आत्मा को विषय करने वाली। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, यह प्रेम के लक्षण वाली भक्ति है, जिसमें कोई दूसरा विषय न हो। श्रीधर स्वामी कहते हैं, जिसमें शरण के रूप में कोई दूसरा न हो, एकान्त भक्ति। और बलदेव विद्याभूषण सीधे चौदहवें श्लोक को याद दिलाते हैं, जो पिछले सत्संग का अन्त था: "अनन्यचेताः सततं", अनन्य चित्त से, निरन्तर। हर आचार्य अपनी परम्परा से बोलता है, पर सबकी उँगली एक ही ओर है: मन का एक ही ठिकाना।
और श्लोक का दूसरा आधा, "यस्यान्तःस्थानि भूतानि", जिसके भीतर सब प्राणी हैं। रामानुज यहाँ सातवें अध्याय का वह श्लोक याद दिलाते हैं जो आपने इक्कीसवें सत्संग में सुना था, धागे में पिरोए मोतियों वाला। और नीलकण्ठ उपमा देते हैं: जैसे बीज के भीतर पेड़। और इक्कीसवें सत्संग में मार्कण्डेय ने उस बालक के पेट में जो देखा था, नदियाँ, पर्वत, देवता, खेत जोतते लोग, वह इसी आधे श्लोक का चित्र है।
अब इस "अनन्य भक्ति" को समझाने के लिए महाभारत की एक कथा सुनिए, जो हमने अब तक नहीं सुनी। यह भी शान्ति पर्व में है, भीष्म युधिष्ठिर को सुनाते हैं। कथा एक जापक की है, यानी जप करने वाले की।
हिमालय की तलहटी में कौशिक नाम का एक ब्राह्मण रहता था, वेदों में निपुण। वह संयम से वेद-संहिता का जप करता रहा, और ऐसे ही हज़ार वर्ष बीत गए। तब स्वयं देवी सावित्री, वेदों की माता, उसके सामने प्रकट हुईं और बोलीं, "मैं प्रसन्न हूँ।" और पाठ कहता है, वह चुपचाप जप करता रहा, उनसे कुछ नहीं बोला। जप पूरा करके उठा, देवी के चरणों में सिर रखा, और कहा, "सौभाग्य से आप प्रसन्न हैं। अगर आप प्रसन्न हैं, तो मेरा मन जप में रमे।" देवी ने पूछा, "क्या माँगते हो? जो कहोगे, मिलेगा।" और उसने माँगा: "जप के प्रति मेरी इच्छा बार-बार बढ़ती रहे, और मेरे मन की एकाग्रता दिन-दिन बढ़ती रहे।"
सोचिए। हज़ार वर्ष के जप के बाद, जब देवी कह रही हैं कि जो चाहो माँग लो, तो वह माँगता है: और जप। न स्वर्ग, न धन, न लम्बी आयु। बस यह कि जिस चीज़ से प्रेम है, वह प्रेम और बढ़े। यही "अनन्य" है। जिसमें भगवान से कुछ और माँगने की जगह ही न बचे।
फिर कथा आगे बढ़ती है। उसके तप से प्रसन्न होकर धर्म स्वयं आए, और बोले, "तुमने दिव्य और मानव सब लोक जीत लिए हैं, देवताओं के सब निवासों को लाँघकर आगे जाओगे।" और साथ में काल, मृत्यु और यम भी आ खड़े हुए, उसे ले जाने। फिर राजा इक्ष्वाकु आ पहुँचे, और राजा और ब्राह्मण के बीच इस बात पर लम्बा विवाद चला कि जप का फल कौन दे, कौन ले। ब्राह्मण ने अपने जप का पूरा फल राजा को देने का वचन दे दिया, और जब राजा ने पूछा कि उस फल में है क्या, तो ब्राह्मण ने कहा, "मैंने जप में कभी फल की कामना ही नहीं की, मैं उसका फल कैसे जानूँ?" और उसी विवाद के बीच, फटे कपड़ों में दो अजीब आदमी लड़ते हुए आए, एक-दूसरे पर क़र्ज़ का आरोप लगाते। अन्त में उन्होंने अपना असली रूप बताया: "हम दोनों को काम और क्रोध जानो। हम तुम्हारी परीक्षा लेने आए थे।" कितनी गहरी बात है। जब मन किसी ऊँची चीज़ में लगा हो, तो काम और क्रोध भी भेस बदलकर आते हैं, किसी बहस, किसी हिसाब के रूप में।
और अब भीष्म का वह निष्कर्ष, जिसके लिए मैंने यह कथा चुनी। भीष्म कहते हैं: ऐसा जापक ब्रह्मा के पास जाता है, या अग्नि के लोक में, या सूर्य में प्रवेश करता है। अगर वह वहाँ के तेज में राग से रम जाता है, तो वहीं के गुणों में बँधकर रह जाता है। चन्द्रमा में, वायु में, आकाश में जाए, तब भी, राग हो तो वहीं रहता है। "पर यदि वह वहाँ राग-रहित है, तो निःसन्देह परम को जाता है।" और फिर वह पंक्ति, जो लगता है सीधे आज के श्लोक से उठाकर रखी गई हो: वह उस स्थान को पाता है, "ब्रह्म का स्थान जहाँ से लौटना नहीं, अक्षर नाम का", दुःख-रहित, अजर और शान्त।
सुनिए, "अक्षर", "जहाँ से लौटना नहीं"। वही दो बातें जो आज इक्कीसवें श्लोक में श्रीकृष्ण कह रहे हैं। और रास्ता भी वही: राग-रहित होना। जो बीच के किसी चमकदार लोक में अटक गया, वह वहीं रह गया। जिसका मन किसी पड़ाव पर नहीं अटका, वह घर पहुँच गया। और इसी कथा में भीष्म एक जगह इससे भी कड़ी बात कहते हैं: लोकपालों, मरुतों, आदित्यों, वसुओं, देवताओं के वे सब सुन्दर स्थान, विमान, उद्यान, कमल-सरोवर, परमात्मा के स्थान की तुलना में नरक हैं।
नरक। स्वर्ग के उद्यानों को नरक कहना। यह भीष्म की अतिशयोक्ति नहीं, तुलना है। जैसे किसी ने समुद्र देख लिया हो, तो उसे सबसे सुन्दर तालाब भी छोटा लगता है।
तो इस अनन्य भक्ति का अर्थ हमारे जीवन में क्या है? मुझे लगता है, यह बहुत सरल है। हम पूजा करते हैं, और साथ में एक सूची रखते हैं: बेटे की नौकरी, बेटी की शादी, घर का कर्ज़। इसमें कोई पाप नहीं; बाईसवें सत्संग में आपने सुना था कि दुःखी होकर पुकारने वाला भी भक्त है। पर अनन्य भक्ति वह जगह है जहाँ धीरे-धीरे सूची छोटी होती जाती है, और अन्त में उस जापक की तरह बस एक माँग बचती है: "मेरा मन आप में रमे।"
पर अभी एक बात बाकी है। अब तक श्रीकृष्ण ने बताया कि कहाँ पहुँचकर लौटना नहीं होता, और वहाँ तक कौन पहुँचता है। अब वे वह बात कहने वाले हैं जिसे सुनने के लिए इस अध्याय में बहुत लोग ठहरते हैं: जाने के समय, यानी मृत्यु के समय, दो रास्ते। एक से लौटना नहीं, दूसरे से लौटना। और उन रास्तों में एक नाम आएगा, उत्तरायण, जिसे सुनते ही हमें बाणों की शय्या पर लेटे भीष्म याद आएँगे।
यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः ।
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥ २३ ॥
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥ २४ ॥
तेईसवाँ श्लोक। "यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः।" हे भरतश्रेष्ठ, अब मैं वह समय बताऊँगा जिसमें जाकर योगी नहीं लौटते, और जिसमें जाकर लौटते हैं। "प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ।"
इस पंक्ति में, "त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव", दो शब्द छिपे हैं, ध्यान से सुनिए: अनावृत्ति, यानी न लौटना, और आवृत्ति, यानी लौटना। पूरा सत्संग इन्हीं दो शब्दों के बीच है। और श्लोक में "योगिनः" कहा है। शंकराचार्य कहते हैं, यहाँ योगी में कर्म करने वाले भी गिने गए हैं, क्योंकि तीसरे अध्याय में कर्म करने वालों को भी "कर्मयोगी" कहा गया था। यानी यह बात केवल गुफा में बैठे साधकों की नहीं, हम सबकी है।
अब यहाँ एक प्रश्न उठता है जिस पर आचार्यों ने बहुत सोचा है। श्रीकृष्ण कहते हैं "समय" बताऊँगा। पर अगले श्लोक में जो गिनाया गया है, उसमें अग्नि भी है, ज्योति भी है, धुआँ भी है। अग्नि और धुआँ कोई समय तो नहीं हैं। इसलिए रामानुज, श्रीधर स्वामी, मधुसूदन सरस्वती और बलदेव विद्याभूषण कहते हैं कि यहाँ "समय" का अर्थ है मार्ग। और उस मार्ग के हर पड़ाव का एक अधिष्ठाता देवता है, जो जाने वाले को आगे पहुँचाता है। श्रीधर एक लौकिक उदाहरण देते हैं: जैसे किसी बाग़ में ज़्यादातर आम के पेड़ हों, तो पूरे बाग़ को आम का बाग़ कह देते हैं, भले बीच में दो-चार दूसरे पेड़ भी हों। वैसे ही इस मार्ग के ज़्यादातर पड़ाव समय के नाम वाले हैं, दिन, पक्ष, महीने, इसलिए पूरे मार्ग को "समय" कह दिया। हमारी टीका भी यही बताती है कि बहुत लोग इसे मार्ग के अर्थ में लेते हैं, और कुछ इसे सीधे मृत्यु के समय के रूप में पढ़ते हैं। संत ज्ञानेश्वर इसे समय के रूप में ही पढ़ते हैं, पर उसमें एक भीतरी अर्थ भी भर देते हैं, जो मैं अभी बताता हूँ।
अब चौबीसवाँ श्लोक, उजाले का मार्ग। "अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्।" अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्ल पक्ष, और उत्तरायण के छह महीने। "तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः।" इस मार्ग से जाने वाले, ब्रह्म को जानने वाले लोग, ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।
हमारी टीका कहती है, यह शुक्ल मार्ग है, जिससे लौटना नहीं होता। और मधुसूदन सरस्वती उपनिषद के आधार पर इस मार्ग के पड़ाव पूरे गिनाते हैं, जैसे कोई यात्रा का नक्शा हो: ज्वाला से दिन में, दिन से बढ़ते चाँद वाले पखवाड़े में, उससे उन छह महीनों में जब सूर्य उत्तर की ओर चलता है, फिर वर्ष में, फिर सूर्य में, फिर चन्द्रमा में, फिर बिजली में। और वहाँ, उपनिषद कहता है, एक ऐसा पुरुष आता है जो मनुष्य नहीं है, और वह उन्हें ब्रह्म तक ले जाता है। यह देवताओं का मार्ग है, ब्रह्म का मार्ग। सोचिए, उपनिषद यह नहीं कहता कि आत्मा अकेले भटकती हुई पहुँचती है। हर पड़ाव पर कोई ले जाने वाला है, और आख़िरी पड़ाव पर कोई लेने आता है।
और संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक को एक सीढ़ी बना देते हैं। वे कहते हैं, अग्नि पहला पायदान है, ज्योति दूसरा, दिन तीसरा, शुक्ल पक्ष चौथा, और उत्तरायण के छह महीने सबसे ऊपर की सीढ़ी, जिससे योगी उस घर में पहुँचते हैं। पर ज्ञानेश्वर का असली मर्म यह है: वे कहते हैं, अग्नि बाहर ही नहीं, भीतर भी है। मृत्यु के समय जिसके भीतर की आग, यानी जागी हुई चेतना, बुझी नहीं, उसकी बुद्धि भ्रम में नहीं डूबती, स्मृति अन्धी नहीं होती, मन नहीं मरता। और वे एक बहुत मार्मिक चित्र देते हैं: हवा या पानी से दीया बुझ जाए, तो आँखें होते हुए भी कुछ नहीं दिखता। वैसे ही जीवन भर का अभ्यास, अगर अन्त में भीतर का दीया बुझ जाए, तो ऐसा हो जाता है जैसे रखी हुई चीज़ दिखने से पहले ही हाथ का दीपक बुझ गया हो। इसीलिए पिछले सत्संग में श्रीकृष्ण ने कहा था, सब समय याद करो। दीया पहले से जलता रहे।
और अब उत्तरायण। यह शब्द सुनते ही, जो भी महाभारत जानता है, उसकी आँखों के सामने बाणों की शय्या आ जाती है। पाँचवें सत्संग में आपने सुना था: भीष्म रथ से गिरे, और गिरते हुए उन्होंने सूर्य को दक्षिण मार्ग में देखा। आकाश में दिव्य वाणियाँ हुईं, "यह महात्मा दक्षिणायन में मृत्यु को कैसे अपनाएगा?" और भीष्म ने कहा, "मैं ठहरा हुआ हूँ। उत्तरायण की प्रतीक्षा में अपने प्राण रोके रखूँगा, क्योंकि प्राण छोड़ना मेरे वश में है", उस वर के कारण जो पिता शान्तनु ने दिया था।
आज उसी दृश्य की एक पंक्ति पर रुकना चाहता हूँ, जिस पर हम पहले नहीं रुके थे। गंगा के भेजे हुए हंस-रूप ऋषियों से भीष्म कहते हैं: "जब सूर्य उत्तर मार्ग पर होगा, तब मैं अपने उस स्थान को जाऊँगा, जो पहले से मेरा था।" पहले से मेरा था। और आज के सत्संग की शुरुआत में आपने स्वर्गारोहण पर्व से सुना कि कर्मों के अन्त में भीष्म वसुओं में जा मिले। यानी भीष्म के लिए मृत्यु कहीं अनजान जगह जाना नहीं थी। घर लौटना थी। और वे उस लौटने का भी समय चुन रहे थे।
और एक और बात, जो हमने अब तक नहीं सुनी। युद्ध के बाद, जब श्रीकृष्ण द्वारका लौटे, तो उनके पिता वसुदेव ने उनसे कहा: "मैंने यह युद्ध लोगों की कथाओं में सुना है, पर तुम तो अपनी आँखों से देखने वाले हो, मुझे सच-सच बताओ।" और श्रीकृष्ण ने, माता के पास ही बैठे-बैठे, पिता को पूरा युद्ध संक्षेप में सुनाया। उसमें भीष्म के बारे में वे बस इतना कहते हैं: शिखण्डी ने, गाण्डीवधारी के साथ, उन्हें अनेक बाणों से मारा, और फिर "बाणशय्या पर लेटे उन मुनि ने, दक्षिणायन को छोड़कर, उत्तरायण आने पर, समय की प्रतीक्षा की।" मुनि। श्रीकृष्ण भीष्म को योद्धा नहीं, सेनापति नहीं, मुनि कहते हैं। जिसने दस दिन तक उनके पक्ष के विरुद्ध युद्ध किया, उसके लिए यह शब्द। मुझे लगता है, यह शब्द उस प्रतीक्षा का सम्मान है।
पर यहाँ एक प्रश्न अपने आप उठता है, और मैं उसे टालना नहीं चाहता। तो क्या जो भी उत्तरायण में मरे, वह इस उजाले के मार्ग से चला जाता है? वल्लभ परम्परा के आचार्य पुरुषोत्तम इसका सीधा उत्तर देते हैं: नहीं। आयु पूरी होने पर उत्तरायण आदि के समय में मरने वाले सब के सब उसे नहीं पाते। उसे वे भक्त पाते हैं जो, भीष्म की तरह, वह समय आने पर भगवान में ही एकनिष्ठ होकर प्राण छोड़ते हैं। और वे कहते हैं, श्लोक में "ब्रह्मविदो जनाः" इसीलिए कहा गया है: ब्रह्म को जानने वाले। यानी कैलेंडर अपने आप किसी को नहीं ले जाता। ले जाने वाला मन है।
और शंकराचार्य इससे भी आगे की बात कहते हैं। वे कहते हैं, यह मार्ग उनका है जो ब्रह्म की उपासना करते हुए धीरे-धीरे पहुँचते हैं। पर जिसे इसी जीवन में पूरा ज्ञान हो गया, उसके लिए कहीं जाना या आना है ही नहीं। उपनिषद कहता है, उसके प्राण कहीं निकलकर नहीं जाते; वे यहीं ब्रह्म में लीन हो जाते हैं। जो घर में ही बैठा है, उसे घर का रास्ता नहीं पूछना पड़ता।
पर अभी एक बात बाकी है। उजाले का मार्ग सुन लिया। पर श्रीकृष्ण ने दो रास्ते कहे थे। दूसरा रास्ता धुएँ का है, रात का, अँधेरे पखवाड़े का। और बहुत-से लोग उस रास्ते का नाम सुनते ही डर जाते हैं, ख़ासकर वे जिनके अपने किसी प्रियजन ने रात में, या दक्षिणायन में, शरीर छोड़ा। आइए, अगले दो श्लोक सुनते हैं, और देखते हैं कि वह रास्ता सच में किसका है।
धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् ।
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥ २५ ॥
शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।
एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः ॥ २६ ॥
पच्चीसवाँ श्लोक। "धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम्।" धुआँ, रात, कृष्ण पक्ष, और दक्षिणायन के छह महीने। "तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते।" इस मार्ग से जाने वाला योगी चन्द्रमा की ज्योति को पाकर लौट आता है।
सबसे पहले वह बात, जो इस श्लोक को सुनते समय बहुत लोग चूक जाते हैं। हमारी टीका कहती है: यह उन लोगों का मार्ग है जिन्होंने फल की इच्छा से शुभ कर्म किए। शुभ कर्म। यानी यह धुएँ का रास्ता पापियों का रास्ता नहीं है। यह उन अच्छे लोगों का रास्ता है जिन्होंने यज्ञ किया, दान दिया, कुआँ खुदवाया, धर्मशाला बनवाई, पर मन में यह रखा कि इसका पुण्य मिले, स्वर्ग मिले। शंकराचार्य और रामानुज दोनों कहते हैं, यहाँ "योगी" का अर्थ है पुण्य कर्म करने वाला। और श्रीधर स्वामी साफ़ बाँटकर बताते हैं: फल की इच्छा से किए अच्छे कर्म स्वर्ग का भोग देकर लौटाते हैं; मना किए गए बुरे कर्म नरक भोगाकर लौटाते हैं। तो धुएँ का मार्ग नरक का मार्ग नहीं। यह स्वर्ग का मार्ग है, बस वापसी के टिकट के साथ।
मधुसूदन सरस्वती उपनिषद से इस मार्ग के भी पड़ाव गिनाते हैं: धुएँ से रात में, रात से घटते चाँद वाले पखवाड़े में, उससे उन छह महीनों में जब सूर्य दक्षिण की ओर चलता है, फिर पितरों के लोक में, फिर आकाश में, फिर चन्द्रमा में। और फिर उपनिषद का वह वाक्य, जिसका सार मधुसूदन देते हैं: वहाँ वे तब तक रहते हैं जब तक उनके कर्म का बल रहता है, और फिर उसी रास्ते से लौट आते हैं। "जब तक"। वही शब्द जो आज पहले श्लोक से हमारे साथ चल रहा है।
संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक का भी भीतरी अर्थ करते हैं। वे कहते हैं, मृत्यु के समय जिसके भीतर की आग बुझकर धुआँ बन जाए, उसकी इन्द्रियाँ लकड़ी-सी जड़ हो जाती हैं, स्मृति भ्रम में डूब जाती है, मन बावला हो जाता है। और वे कहते हैं, जैसे चाँद के आगे पानी भरे बादल आ जाएँ, तो न पूरा अँधेरा रहता है, न उजाला, एक धुँधलका-सा छा जाता है। यह धुएँ का मार्ग है: न पूरा अँधेरा, न पूरा प्रकाश। पुण्य है, पर ज्ञान का उजाला नहीं।
अब "पुण्य चुकने पर लौटना" किसे कहते हैं, इसके लिए वन पर्व की एक कथा सुनिए, जो हमने अब तक नहीं सुनी। वनवास में पाण्डवों ने मार्कण्डेय मुनि से पूछा, जो बहुत लम्बे समय से जी रहे थे: "क्या कोई आपसे भी पहले जन्मा है?" मार्कण्डेय ने कहा: हाँ, इन्द्रद्युम्न नाम के एक राजर्षि। उनका पुण्य समाप्त हो गया, और वे स्वर्ग से गिर पड़े। वे मेरे पास आकर बोले, "मेरी कीर्ति मिट गई है। क्या आप मुझे पहचानते हैं?" मैंने कहा, "मैं आपको नहीं जानता।"
तब राजा ने पूछा, "क्या कोई आपसे भी पहले जन्मा है?" मार्कण्डेय ने बताया, हिमालय पर प्रावारकर्ण नाम का एक उल्लू रहता है, शायद वह जानता हो। राजा उन्हें वहाँ ले गए। उल्लू ने क्षण भर सोचा, और कहा, "मैं आपको नहीं जानता। पर इन्द्रद्युम्न नाम के सरोवर में नालिजंघ नाम का एक बगुला है, वह मुझसे भी पुराना है।" बगुले ने भी कहा, "मैं नहीं जानता। पर इसी सरोवर में अकूपार नाम का एक कछुआ है, वह मुझसे भी बहुत पुराना है।" कछुआ सरोवर से निकलकर आया। उससे पूछा गया, "क्या आप राजा इन्द्रद्युम्न को जानते हैं?" उसने क्षण भर सोचा। उसकी आँखें आँसुओं से भर गईं, वह काँपने लगा, और हाथ जोड़कर बोला: "मैं इन्हें कैसे न पहचानूँगा? इन्होंने हज़ार बार यज्ञ की अग्नि-वेदियाँ बनवाई थीं। और यह सरोवर इन्हीं की उन गायों के खुरों से बना है, जो इन्होंने दान में दी थीं। मैं उसी में रहता हूँ।"
और जैसे ही कछुए ने यह कहा, देवलोक से रथ उतरा, और वाणी हुई: "स्वर्ग तुम्हारे लिए तैयार है। तुम कीर्तिमान हो, निश्चिन्त होकर जाओ।" और यहाँ महाभारत दो पंक्तियाँ जोड़ता है जो इस कथा का सार हैं: पुण्य कर्म की चर्चा स्वर्ग और पृथ्वी दोनों को छूती है; जब तक वह चर्चा रहती है, तब तक मनुष्य स्वर्ग में सम्मान पाता है। और राजा ने जाने से पहले कहा, "रुको, पहले इन दोनों बूढ़ों को इनकी जगह पहुँचा दूँ।" उन्होंने मार्कण्डेय और उल्लू को उनके स्थान पर छोड़ा, फिर स्वर्ग गए।
अब इस कथा को इस श्लोक के साथ रखकर देखिए। कितना सुन्दर है, और साथ ही कितना नाज़ुक। इन्द्रद्युम्न का स्वर्ग इस पर टिका था कि धरती पर कोई उन्हें याद करता है या नहीं। एक कछुए की याद ने उन्हें स्वर्ग लौटा दिया। पर ज़रा सोचिए, जिस दिन वह कछुआ भी न रहे, वह सरोवर भी सूख जाए? यही "चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते" है, चाँद की ज्योति पाकर लौट आना। चाँद की रोशनी सुन्दर है, ठंडी है, पर उधार की है। सूरज की रोशनी पर टिकी है। और जो उधार पर टिका है, वह कभी न कभी लौटाना पड़ता है।
अब छब्बीसवाँ श्लोक, जो इन दोनों मार्गों को समेट देता है। "शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते।" जगत के ये दो मार्ग, शुक्ल और कृष्ण, सनातन माने गए हैं। "एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः।" एक से जाने वाला नहीं लौटता, दूसरे से जाने वाला फिर लौट आता है।
शंकराचार्य बताते हैं कि इन्हें शुक्ल और कृष्ण क्यों कहा: एक में ज्ञान का प्रकाश है, इसलिए शुक्ल; दूसरे में उसका अभाव है, इसलिए कृष्ण। और मधुसूदन सरस्वती इस श्लोक में एक बारीकी देखते हैं जो बहुत कुछ कह देती है। वे कहते हैं, उजाले के मार्ग से "कोई" अनावृत्ति को जाता है, और दूसरे मार्ग से "सब के सब" लौटते हैं। यानी अँधेरे पखवाड़े वाले रास्ते पर कोई अपवाद नहीं। जो पुण्य से गया, वह पुण्य ख़त्म होने पर लौटेगा ही।
और संत ज्ञानेश्वर इन दोनों मार्गों को एक बहुत व्यावहारिक बात से बाँधते हैं। वे कहते हैं, ये दोनों रास्ते अनादि हैं, एक सीधा है, एक भटकाने वाला। और फिर पूछते हैं: अच्छी नाव सामने दिख रही हो, तो कौन गहरे पानी में कूदेगा? जो विष और अमृत को पहचान ले, क्या वह अमृत छोड़ सकता है? यानी श्रीकृष्ण ये दोनों रास्ते डराने के लिए नहीं, दिखाने के लिए बता रहे हैं, ताकि आदमी पहचानकर चुन सके।
और अब मैं उस प्रश्न पर आना चाहता हूँ, जो पिछले खंड के अन्त में छोड़ा था। आपमें से कई लोगों के किसी प्रियजन ने रात में शरीर छोड़ा होगा, या कृष्ण पक्ष में, या दक्षिणायन में। माँ, पिता, कोई भाई, कोई बच्चा। और यह श्लोक सुनकर मन में एक काँटा-सा चुभता है: तो क्या वे धुएँ के रास्ते गए? इसका पहला उत्तर आपने अभी सुना: पुरुषोत्तम आचार्य कहते हैं कि कैलेंडर अपने आप किसी को नहीं ले जाता, ले जाने वाला मन है। और रामानुज, श्रीधर, मधुसूदन, सब कहते हैं कि यहाँ दिन, रात, पक्ष, महीने, असल में मार्ग के पड़ावों के नाम हैं, घड़ी की सुइयाँ नहीं। पर इसका सबसे बड़ा उत्तर स्वयं श्रीकृष्ण अगले श्लोक में देते हैं। और वह उत्तर इतना सरल है कि सुनकर लगता है, यह पहले क्यों नहीं सूझा।
पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने दोनों मार्ग बता दिए। अब वे बताएँगे कि इन्हें जानने का फल क्या है, और अर्जुन से एक बात कहेंगे जो आपको बहुत जानी-पहचानी लगेगी, क्योंकि यही बात वे पिछले सत्संग में भी कह चुके हैं। और उसके साथ, अपनी आख़िरी बात में, मेधावी लौटकर आएगा।
नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन ।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥ २७ ॥
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव
दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् ।
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा
योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥ २८ ॥
सत्ताईसवाँ श्लोक। "नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन।" हे पार्थ, इन दोनों मार्गों को जानने वाला कोई भी योगी मोह में नहीं पड़ता। "तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन।" इसलिए हे अर्जुन, तुम सब समय योग में स्थित रहो।
अब ज़रा इस श्लोक का दूसरा आधा पिछले सत्संग के उस श्लोक के साथ रखकर सुनिए, जिसमें श्रीकृष्ण ने कहा था, "तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च", इसलिए सब समय मुझे याद करो, और युद्ध करो। और आज, "तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन"। वही शुरुआत, वही "सब समय"। मुझे लगता है, यह संयोग नहीं है। पूरे अध्याय में मृत्यु के क्षण की, समय की, मार्गों की बात हुई, और दोनों बार श्रीकृष्ण उस क्षण से हटाकर हमें "सब समय" पर ले आते हैं।
और यहीं उस प्रश्न का सबसे बड़ा उत्तर है, जो हमने पिछले खंड में छोड़ा था। अगर कोई सब समय योग में स्थित है, तो उसकी मृत्यु किसी भी घड़ी आए, उसका क्या बिगड़ेगा? हमारी टीका ठीक यही कहती है: यह जानकर कि कृष्ण मार्ग सदा लौटा लाता है, योगी उसके फल की इच्छा नहीं करता; उसकी मृत्यु किसी भी समय हो, उसका लक्ष्य स्थिर रहता है। किसी भी समय। रात हो या दिन, उत्तरायण हो या दक्षिणायन। रामानुज कहते हैं, ऐसा योगी मृत्यु के समय मोह में नहीं पड़ता, और अपने ही उस उजाले वाले मार्ग से जाता है। और बलदेव विद्याभूषण उपनिषद का एक वाक्य याद दिलाते हैं, जो मैं ख़ास तौर पर उनके लिए रखना चाहता हूँ जो किसी प्रियजन का अन्तिम संस्कार ठीक से नहीं कर पाए: ऐसे उपासक के मरने पर उसके पुत्र-शिष्य उसका दाह आदि कर्म करें या न करें, दोनों ही दशा में वह उजाले के मार्ग से जाता है। जो जीवन भर उस ओर चलता रहा, उसका रास्ता किसी तिथि या किसी रस्म का मोहताज नहीं।
संत ज्ञानेश्वर यहाँ बहुत ऊँची बात कहते हैं, और फिर भी बहुत सरल। वे कहते हैं, क्या पानी को कभी यह चिन्ता होती है कि मुझमें लहर है या नहीं? लहर उठे तो भी वह पानी है, लहर गिरे तो भी पानी। और फिर एक और चित्र: घड़ा फूटता है, तो उसके भीतर का आकाश किसी रास्ते से चलकर बाहर के आकाश से मिलने नहीं जाता; वह तो पहले से ही आकाश था। केवल घड़े का आकार गया। ज्ञानेश्वर कहते हैं, ऐसे बोध वाले योगी को मार्ग और कुमार्ग का संकट ही नहीं पड़ता। इसलिए, अर्जुन, तुम योगयुक्त बनो।
और अब मेधावी, जिसकी कथा मैंने बीच में रोक दी थी। आपको याद होगा, उसने पिता से कहा था कि रातें गिर रही हैं, उथले पानी की मछली की तरह कौन सुख पाएगा, जो कल्याण है वह आज ही करो। फिर उसने अपना निश्चय बताया। उसने कहा: "अमृत और मृत्यु दोनों इसी शरीर में टिके हैं। मृत्यु मोह से मिलती है, और अमृत सत्य से।" फिर: "इसलिए मैं किसी को चोट न पहुँचाते हुए, सत्य को चाहते हुए, काम और क्रोध से बाहर, सुख-दुःख में सम और निर्भय होकर, अमर की तरह मृत्यु को पीछे छोड़ दूँगा।" और फिर वह पंक्ति, जिसके लिए मैंने यह कथा आज के लिए चुनी: "शान्ति के यज्ञ में लगा, संयमी, ब्रह्म के यज्ञ में स्थित, वाणी, मन और कर्म के यज्ञ वाला मैं, उत्तरायण में रहूँगा।"
उत्तरायण में रहूँगा। मरूँगा नहीं, रहूँगा। मेधावी उत्तरायण को कैलेंडर के छह महीने नहीं मान रहा। वह उसे एक रहने की जगह बना रहा है, जहाँ शान्ति है, संयम है, और वाणी, मन और कर्म तीनों अर्पण में लगे हैं। मुझे लगता है, यही "सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन" का सबसे सुन्दर चित्र है। जो भीतर से उत्तरायण में रहता है, उसके लिए बाहर का सूरज किस दिशा में है, यह छोटी बात हो जाती है। और भीष्म यह कथा सुनाकर युधिष्ठिर से कहते हैं: बेटे की यह बात सुनकर पिता ने जैसा किया, वैसा ही तुम भी करो। बाणों की शय्या पर लेटे भीष्म, जो ख़ुद बाहर के उत्तरायण की प्रतीक्षा कर रहे थे, युधिष्ठिर को भीतर के उत्तरायण की कथा सुना रहे थे।
और अब इस अध्याय का अन्तिम श्लोक। "वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव, दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम्।" वेदों के पढ़ने में, यज्ञों में, तपों में और दानों में जो पुण्य-फल बताया गया है, "अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा, योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्", इसे जानने वाला योगी उस सबको पार कर जाता है, और परम, आदि पद को प्राप्त होता है।
मधुसूदन सरस्वती यहाँ पहले इन चारों को उनकी पूरी विधि के साथ गिनाते हैं, ताकि कोई यह न समझे कि उन्हें छोटा बताया जा रहा है: वेद विधि से, गुरु के अधीन रहकर पढ़ा गया हो; यज्ञ श्रद्धा से, सब अंगों के साथ किया गया हो; तप मन और बुद्धि की एकाग्रता से तपा गया हो; दान ठीक देश, ठीक समय और योग्य पात्र को श्रद्धा से दिया गया हो। और फिर भी, इस सबका फल, जो स्वर्ग और ऐश्वर्य है, यह योगी उसे पार कर जाता है। रामानुज कहते हैं, इसे जानने के सुख के आगे वह उन सब फलों को तिनके जैसा मानता है। और अभिनवगुप्त कहते हैं, भगवान की स्मृति से सब कर्मों के संस्कार निष्फल हो जाते हैं, और सब कर्मों के क्षय होने पर वह सहज ही परम शिव को पा लेता है।
और यहाँ मुझे फिर वह जापक याद आता है, जिसकी कथा तीसरे खंड में सुनी। राजा इक्ष्वाकु से विवाद के बीच उसने एक बात कही थी जो इस श्लोक के ठीक बगल में रखी जा सकती है: "यज्ञ, अध्ययन, दान और नियम उस तरह नहीं तारते, जैसे सत्य तारता है।" और फिर: सैकड़ों और हज़ारों वर्षों का जो भी तप किया गया या किया जाएगा, वह सत्य से बढ़कर नहीं। यानी जो पुण्य से बड़ा है, वह कोई और बड़ा पुण्य नहीं। वह सत्य है, वह ज्ञान है, वह "अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा" है, इसे जानकर सबके पार चले जाना।
इन्द्रद्युम्न का स्वर्ग एक कछुए की याद पर टिका था। यह श्लोक उस पद की बात कर रहा है जो किसी की याद पर नहीं टिका, क्योंकि वह किसी कर्म का फल ही नहीं। "परं स्थानमुपैति चाद्यम्", वह परम और आदि पद, जो सबसे पहले से है।
और इसी के साथ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ। संत ज्ञानेश्वर अपना आठवाँ अध्याय इन शब्दों पर समाप्त करते हैं कि कुरुक्षेत्र का यह वृत्तान्त सञ्जय राजा को सुना रहे हैं, और ज्ञानदेव कहते हैं, आगे की बात सुनिए। और सच में, ज़रा उस कमरे की कल्पना कीजिए। अन्धे धृतराष्ट्र, जिनके पितामह इस समय बाणों पर लेटे उत्तरायण की प्रतीक्षा कर रहे हैं, अभी-अभी यह सुन रहे हैं कि जाने के दो रास्ते हैं, एक से लौटना, एक से न लौटना। उनके मन में क्या चल रहा होगा, यह पाठ नहीं बताता। पर हम इतना जानते हैं कि सञ्जय रुके नहीं।
नवाँ अध्याय, महाभारत के भीष्म पर्व का तैंतीसवाँ, "राजविद्या राजगुह्य योग", श्रीकृष्ण इन शब्दों से शुरू करते हैं: "इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे। ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।" एक शब्द पर ध्यान दीजिए: "गुह्यतमं", सबसे गुप्त। आठ अध्यायों के बाद भी श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि अब जो कहूँगा, वह सबसे गहरा रहस्य है। और वे इसे किस तरह के सुनने वाले को देते हैं, यह भी उसी पंक्ति में छिपा है। वह क्या है, यह अगले सत्संग में।
तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।
पहली बात। पुण्य से मिली हर जगह के आगे एक "जब तक" लगा है, स्वर्ग के आगे भी, ब्रह्मा के लोक के आगे भी। "मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते।" होटल कितना भी अच्छा हो, घर एक ही है। अच्छे कर्म करते रहिए, पर भरोसा उस पर रखिए जो किसी कर्म का फल नहीं।
दूसरी बात। वहाँ तक पहुँचने का रास्ता कोई बड़ा हिसाब नहीं, "भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया", अनन्य भक्ति। उस जापक की तरह, जिसने देवी से बस यह माँगा कि मेरा मन जप में और रमे। अपनी पूजा की सूची धीरे-धीरे छोटी कीजिए, जब तक उसमें एक ही माँग न बचे।
तीसरी बात। मृत्यु की घड़ी, तिथि और दिशा की चिन्ता छोड़िए। "तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन।" जो सब समय योग में है, उसका मार्ग किसी कैलेंडर का मोहताज नहीं। मेधावी की तरह भीतर के उत्तरायण में रहिए, और जो कल्याण है, वह आज ही कीजिए।
आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आपके जीवन में वह कौन-सी चीज़ है जिसके आगे आपको आज "जब तक" लगा दिखा? और आप अपने भीतर का उत्तरायण कहाँ से शुरू करेंगे? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।
भीष्म बाहर के उत्तरायण की प्रतीक्षा करते रहे। श्रीकृष्ण ने आपके लिए भीतर का उत्तरायण आज ही खोल दिया है।
जय श्री कृष्ण।
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥ १६ ॥
तीन बातें
- पुण्य से मिली हर जगह के आगे एक "जब तक" लगा है, स्वर्ग के आगे भी, ब्रह्मा के लोक के आगे भी। "मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते।" होटल कितना भी अच्छा हो, घर एक ही है। अच्छे कर्म करते रहिए, पर भरोसा उस पर रखिए जो किसी कर्म का फल नहीं।
- वहाँ तक पहुँचने का रास्ता कोई बड़ा हिसाब नहीं, "भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया", अनन्य भक्ति। उस जापक की तरह, जिसने देवी से बस यह माँगा कि मेरा मन जप में और रमे। अपनी पूजा की सूची धीरे-धीरे छोटी कीजिए, जब तक उसमें एक ही माँग न बचे।
- मृत्यु की घड़ी, तिथि और दिशा की चिन्ता छोड़िए। "तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन।" जो सब समय योग में है, उसका मार्ग किसी कैलेंडर का मोहताज नहीं। मेधावी की तरह भीतर के उत्तरायण में रहिए, और जो कल्याण है, वह आज ही कीजिए।