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सत्संग २३

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अंत समय में क्या याद आएगा

गीता 8.1–8.14 · 77 मिनट

मृत्यु के समय मन कहाँ जाता है, और तैयारी आज से क्यों

अर्जुन उवाच किं तद् ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम । अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥ १ ॥
गीता 8.1 — अर्थ पढ़ें ›
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन । प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥ २ ॥
गीता 8.2 — अर्थ पढ़ें ›
श्रीभगवानुवाच अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते । भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥ ३ ॥
गीता 8.3 — अर्थ पढ़ें ›

कभी आपने किसी अपने को आख़िरी साँसें लेते देखा है? अस्पताल का कमरा, धीमी-सी मशीन की आवाज़, घर के लोग पलंग के चारों ओर। और उस घड़ी मन में एक अजीब-सा प्रश्न उठता है: इस समय इनके मन में क्या चल रहा होगा? क्या ये भगवान को याद कर पा रहे हैं? और फिर, घर लौटते हुए, वही प्रश्न अपनी ओर मुड़ जाता है: जब मेरी बारी आएगी, तब मेरे मन में क्या होगा? यही आज का सवाल है: अंत समय में क्या याद आएगा? मृत्यु के समय मन कहाँ जाता है, और उसकी तैयारी आज से ही क्यों करनी पड़ती है?

जय श्री कृष्ण।

आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का तेईसवाँ सत्संग है, और आज हम गीता का आठवाँ अध्याय खोल रहे हैं। आज का विषय मृत्यु है। मैं जानता हूँ, यह शब्द सुनकर मन थोड़ा सिकुड़ जाता है। पर मैं आपसे पहले ही कह दूँ, आज की बात डराने के लिए नहीं है। आज की बात उस डर को धीरे-धीरे खोलने के लिए है, जो हम सब अपने भीतर कहीं दबाकर रखते हैं। और यह बात श्रीकृष्ण ने स्वयं की है, बहुत धीरज से, बहुत प्रेम से।

पहले जल्दी से याद कर लें कि पिछली बार हम कहाँ रुके थे। पिछले सत्संग में, सातवें अध्याय के दूसरे हिस्से में, श्रीकृष्ण ने चार तरह के भक्त गिनाए थे: "आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च", दुःख में पुकारने वाला, जानना चाहने वाला, कुछ पाने की इच्छा वाला, और ज्ञानी। और उन्होंने कहा था कि ये चारों ही पुण्यात्मा हैं; दुःखी होकर पुकारना भी भक्ति है। फिर उन्होंने कहा था कि जो जिस रूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, उसकी उसी श्रद्धा को मैं अचल कर देता हूँ। और अध्याय के बिलकुल अन्त में, आख़िरी दो श्लोकों में, श्रीकृष्ण ने कुछ शब्द एक साथ कह दिए थे, बिना उनका अर्थ बताए: ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव, अधियज्ञ। और फिर एक वाक्य जोड़ा था, "प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः", जिनका मन मुझमें लगा है, वे मृत्यु के समय भी मुझे जानते हैं। यानी सातवाँ अध्याय एक बीज छोड़कर रुका था, और आठवाँ अध्याय उसी बीज से उगता है।

और आपको याद रहे, यह सब हमें सञ्जय सुना रहे हैं, हस्तिनापुर में, अन्धे राजा धृतराष्ट्र को। महाभारत के भीष्म पर्व का बत्तीसवाँ अध्याय ही गीता का आठवाँ अध्याय है, और उसका नाम है "अक्षरब्रह्म योग"। और ज़रा सोचिए, यह अध्याय किस दिन सुनाया जा रहा है। उस दिन, जब भीष्म बाणों की शय्या पर गिर चुके हैं। पाँचवें और छठे सत्संग में आपने सुना था कि भीष्म को अपनी इच्छा से मृत्यु का वर था, और गिरते हुए उन्होंने कहा था कि मैं प्राण थामे रखूँगा, सही समय की प्रतीक्षा करूँगा। यानी जिस घड़ी सञ्जय मृत्यु के क्षण वाला यह अध्याय सुना रहे हैं, उसी घड़ी कुरुक्षेत्र में एक बूढ़ा योद्धा अपनी मृत्यु के क्षण की प्रतीक्षा में लेटा है। इससे बड़ी संगति क्या होगी?

अब पहला श्लोक। अध्याय अर्जुन के प्रश्न से खुलता है। "किं तद् ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम।" हे पुरुषोत्तम, वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? "अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते", अधिभूत किसे कहा गया है, और अधिदैव किसे कहते हैं?

हमारी टीका बहुत सीधी बात कहती है: ये वही शब्द हैं जो पिछले अध्याय के आख़िरी दो श्लोकों में आए थे, और अर्जुन अब एक-एक करके उनके बारे में पूछ रहे हैं। मुझे यह बात बहुत अच्छी लगती है। गुरु ने कुछ शब्द कहे, और शिष्य ने उन्हें हवा में नहीं जाने दिया। उसने उन्हें पकड़ा, मन में रखा, और फिर पूछा। हम में से बहुत लोग कथा सुनते हैं, कोई कठिन शब्द आता है, और हम सोचते हैं, चलो, आगे समझ में आ जाएगा। अर्जुन ऐसा नहीं करते।

फिर दूसरा श्लोक। "अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन।" हे मधुसूदन, इस देह में अधियज्ञ कौन है, और वह इसमें कैसे है? "प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः", और प्रयाण के समय, यानी जाने की घड़ी में, संयमी लोग आपको कैसे जानते हैं?

हमारी टीका यहाँ गिनती करती है: दो श्लोक, सात प्रश्न। और फिर एक बहुत महत्वपूर्ण बात कहती है: आख़िरी प्रश्न, मृत्यु के क्षण के बारे में, पूरे बाक़ी अध्याय का विषय है। यानी पहले छह प्रश्न तो जैसे शब्दकोश के प्रश्न हैं, इस शब्द का अर्थ क्या, उस शब्द का अर्थ क्या। पर सातवाँ प्रश्न शब्दकोश का नहीं है। वह जीवन का प्रश्न है। और श्रीकृष्ण छह प्रश्नों का उत्तर दो श्लोकों में दे देंगे, और बाक़ी अध्याय सातवें पर लगाएँगे।

"प्रयाण" शब्द पर एक पल रुकिए। हम आमतौर पर कहते हैं "मृत्यु", "मरना"। गीता यहाँ कहती है "प्रयाण", यानी चल पड़ना, यात्रा पर निकलना। जैसे कोई घर से निकलता है। घर छूटता है, पर निकलने वाला नहीं मिटता। इस एक शब्द में पूरी गीता की दृष्टि छिपी है, जो हमने पाँचवें सत्संग में सुनी थी: आत्मा न जन्मती है, न मरती है।

और यह प्रश्न इतना कठिन क्यों है? मधुसूदन सरस्वती इसे बहुत ईमानदारी से खोलते हैं। वे कहते हैं, उस समय सारी इन्द्रियाँ व्याकुल होती हैं, पूरा शरीर बेचैन होता है, ऐसे में मन को एक जगह टिकाना तो सम्भव ही नहीं लगता। तो अर्जुन का प्रश्न असल में यह है: जो मन स्वस्थ शरीर में भी नहीं टिकता, जैसा हमने बीसवें सत्संग में सुना था, वह मरते हुए शरीर में कैसे टिकेगा? यह प्रश्न अर्जुन का है, पर यह हम सबका है।

और मधुसूदन यह भी देखते हैं कि अर्जुन यह प्रश्न पूछते हुए श्रीकृष्ण को "मधुसूदन" कहते हैं, मधु नाम के दैत्य को मारने वाले। वे कहते हैं, इस पुकार में भरोसा है: जो बिना थके हर उपद्रव मिटा देते हैं, उनके लिए मेरे मन का यह छोटा-सा सन्देह मिटाना क्या कठिन है। और संत ज्ञानेश्वर यहाँ एक माँ का चित्र देते हैं। वे कहते हैं, जो बच्चा माँ की गोद में है, उसकी भूख माँ को ही लगती है; बच्चे को शब्दों में कहना नहीं पड़ता, माँ दूध पिला देती है। श्रीकृष्ण जानते थे कि अर्जुन यह पूछेंगे। इसीलिए उन्होंने पिछले अध्याय के अन्त में वे शब्द छोड़े थे।

अब तीसरा श्लोक, और यहाँ से श्रीकृष्ण का उत्तर शुरू होता है। "अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते।" परम अक्षर ब्रह्म है, और अपना स्वभाव अध्यात्म कहा जाता है। "भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः", और प्राणियों के भाव को उत्पन्न करने वाला त्याग, कर्म नाम से कहा जाता है।

तीन उत्तर हैं, एक-एक करके लेते हैं। पहला, अक्षर। शंकराचार्य शब्द को ही खोल देते हैं: "न क्षरति", जो क्षीण नहीं होता, जो नष्ट नहीं होता। और वे उपनिषद् का वह वचन याद दिलाते हैं जिसमें गार्गी से कहा गया था कि इसी अक्षर के शासन में सब कुछ टिका है; श्रीधर स्वामी आगे उसी वचन से जोड़ते हैं कि इसी के शासन में सूर्य और चन्द्रमा अपनी जगह थमे हैं। एक और बारीकी। संस्कृत में "अक्षर" का अर्थ वर्ण भी होता है, और "ॐ" को भी अक्षर कहा जाता है। तो क्या यहाँ "ॐ" की बात है? शंकराचार्य और नीलकण्ठ दोनों कहते हैं, नहीं। यहाँ "परम" शब्द लगा है, और ॐ की बात श्रीकृष्ण आगे तेरहवें श्लोक में अलग से करेंगे। वह तेरहवाँ श्लोक आज के सत्संग के अन्त में आएगा, और मैं चाहूँगा कि आप उसे याद रखें।

दूसरा, अध्यात्म। हमारा अनुवाद कहता है, "अपना स्वभाव", और हमारी टीका इसका अर्थ करती है: हर देह में रहने वाला अपना आप। शंकराचार्य भी यही कहते हैं: वही परम ब्रह्म, जो हर शरीर में भीतर का आत्मा होकर रहता है। यहाँ रामानुजाचार्य दूसरी राह लेते हैं। वे "स्वभाव" का अर्थ प्रकृति करते हैं, यानी आत्मा के साथ जुड़ा हुआ सूक्ष्म शरीर और उसकी पुरानी वासनाएँ, जिसे साधक को जानना और छोड़ना है। दोनों बड़े आचार्य हैं, दोनों की अपनी परम्परा है, और हमें यहाँ किसी का पक्ष नहीं लेना। बस इतना समझ लीजिए कि "अध्यात्म" का अर्थ है वह, जो इस शरीर के भीतर रहकर "मैं" कहलाता है।

और तीसरा, कर्म। यहाँ हमारी टीका एक बात साफ़ करती है, जो बहुत ज़रूरी है: यहाँ "कर्म" रोज़ का काम नहीं है। यह यज्ञ में दी गई आहुति है, देवताओं के लिए किया गया त्याग, जिससे वैदिक दृष्टि में वर्षा, अन्न और जन्म का पूरा चक्र चलता है। दसवें सत्संग में आपने यज्ञ का यह चक्र सुना था: अन्न से प्राणी, वर्षा से अन्न, यज्ञ से वर्षा। "विसर्ग" का अर्थ है छोड़ना, देना। यानी इस संसार का चलना ही एक देने से शुरू होता है। जो दिया गया, उसी से जीवन उपजा। तिलक इसे और बड़ा करके कहते हैं: अक्षर ब्रह्म से सब चर-अचर पदार्थों की उत्पत्ति का जो काम है, सृष्टि का यह पूरा व्यापार ही कर्म है। और संत ज्ञानेश्वर इसका चित्र देते हैं: जैसे साफ़ आकाश में न जाने कहाँ से रंग-बिरंगे बादल उठने लगते हैं, वैसे ही उस निर्मल ब्रह्म में यह सारा ब्रह्माण्ड उठ आता है।

अब मैं आपको एक कथा सुनाना चाहता हूँ, क्योंकि अर्जुन का सातवाँ प्रश्न सुनते ही मुझे महाभारत का एक और प्रश्न याद आता है। पाँचवें सत्संग में आपने सुना था कि अभिमन्यु के जाने के बाद युधिष्ठिर टूट गए थे, और व्यास उनके पास आए थे। और युधिष्ठिर ने व्यास से पूछा था: "'मृत' यह नाम कहाँ से आया? मृत्यु किसकी है? मृत्यु कहाँ से आती है? और किस कारण यह प्राणियों को ले जाती है?" उस दिन हमने प्रश्न सुना था, उत्तर नहीं। आज उत्तर सुनिए, क्योंकि आज का सत्संग इसी के लिए है।

व्यास ने कहा, इसका उत्तर एक पुरानी कथा है, जो कभी नारद ने राजा अकम्पन को सुनाई थी। अकम्पन युद्ध में शत्रुओं के हाथ बन्दी हो गए थे। उनका बेटा था हरि, बहुत वीर। वह शत्रु की सेना को चीरकर गया, पिता को छुड़ा लाया, और फिर शत्रुओं ने उसे अकेला घेरकर मार डाला। अकम्पन ने बेटे का अन्तिम संस्कार किया, पर उन्हें दिन-रात चैन नहीं मिलता था। तब नारद उनके पास आए, और अकम्पन ने उनसे वही पूछा जो हर टूटा हुआ पिता पूछता है: "कहते हैं मृत्यु सब प्राणियों पर शासन करती है। भगवन्, यह मृत्यु है कौन?"

और नारद ने सृष्टि के आरम्भ से कथा शुरू की। ब्रह्मा ने प्राणी रचे, और देखा कि संसार में कोई मरता ही नहीं। पृथ्वी बोझ से दबने लगी, धँसने लगी। ब्रह्मा बहुत सोचते रहे, पर कोई उपाय न सूझा, और उनके भीतर क्रोध उठ आया। उस क्रोध से आग निकली, जो सारे संसार को जलाने लगी। तब स्थाणु, यानी भगवान शिव, ब्रह्मा के पास गए और कहा: "प्रभु, जिन जीवों को आपने इतने प्रयत्न से रचा, वे आपके क्रोध की आग में जल रहे हैं। मुझे उन पर करुणा आती है। यह आग आप में ही लौट जाए। कोई दूसरा उपाय कीजिए, जिससे ये प्राणी बने रहें।"

ब्रह्मा पसीज गए। उन्होंने अपनी आग भीतर समेट ली। और जब वे उसे समेट रहे थे, तब उनकी सब इन्द्रियों से एक स्त्री प्रकट हुई। ब्रह्मा ने उसे सान्त्वना दी, उसे "मृत्यु" नाम दिया, और कहा: "जाओ, मूर्ख और ज्ञानी, सबको बिना भेदभाव के ले जाओ।" और पाठ कहता है, यह सुनते ही वह स्त्री फूट-फूटकर रो पड़ी। उसके आँसू गिरने लगे, और ब्रह्मा ने उन आँसुओं को अपने हाथों में थाम लिया।

मृत्यु ने हाथ जोड़कर कहा: "मैं यह क्रूर काम कैसे करूँ? मुझे अधर्म से डर लगता है। जिनके बेटे, भाई, माता-पिता, पति चले जाएँगे, वे मुझे कोसेंगे। रोते हुए लोगों के आँसुओं से मुझे डर लगता है। मैं विलाप करते प्राणियों के प्यारे प्राण नहीं हर सकूँगी।" और वह वहाँ से चली गई, और युगों तक तीर्थों में तप करती रही, एक पैर पर खड़ी रही, नदियों के जल में रही, हवा और पानी पर जीती रही, केवल इतना माँगने के लिए कि उससे अधर्म न कराया जाए।

तब ब्रह्मा ने उससे कहा: "तुम्हें कोई अधर्म नहीं लगेगा। जो आँसू मेरे हाथ में गिरे थे, वे रोग बन गए हैं, जो प्राणियों के भीतर से ही जन्मते हैं, और जिनकी आयु पूरी हो चुकी है, उन्हें वही ले जाएँगे। तुम काम और क्रोध छोड़कर, समय आने पर ही प्राण हरना।" और नारद कहते हैं, तब से मृत्यु प्राणियों के अन्त-समय पर, बिना इच्छा और बिना क्रोध के, अनासक्त होकर आती है। और फिर नारद एक वाक्य कहते हैं, जो मुझे इस कथा का हृदय लगता है: "हाथ में दण्ड लिए मृत्यु इन्हें नहीं मारती।" यह कथा सुनकर अकम्पन ने कहा, "भगवन्, मैं शोक से मुक्त हुआ।"

अब इस कथा को एक बार फिर अपने मन में रखिए। हम मृत्यु को किस रूप में सोचते हैं? एक डरावना शिकारी, जो पीछे से आकर झपट लेता है। महाभारत हमें दूसरी मृत्यु दिखाता है: वह जो स्वयं रोई थी, जिसने यह काम माँगा नहीं था, जो बिना क्रोध के, समय पूरा होने पर ही आती है। वह शत्रु नहीं है। वह सृष्टि को साँस लेने देने का उपाय है, जो शिव की करुणा से निकला।

और इससे एक बात और समझ आती है। अर्जुन यह नहीं पूछ रहे कि मृत्यु से कैसे बचूँ। गीता में यह प्रश्न कहीं नहीं है, क्योंकि उसका उत्तर सबको पता है। अर्जुन पूछ रहे हैं: उस घड़ी आपको कैसे जानूँ? यानी मृत्यु तो आएगी; प्रश्न बस इतना है कि जब वह आए, तब मेरा मुँह किस ओर हो।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने अभी छह में से तीन ही उत्तर दिए हैं। अगले श्लोक में बाक़ी तीन आएँगे, और उनमें से एक उत्तर ऐसा है जो सीधे आपके इस शरीर की ओर उँगली करता है। और फिर, अगले ही श्लोक में, वह सातवाँ प्रश्न खुलेगा। आइए, सुनते हैं।

अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् । अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥ ४ ॥
गीता 8.4 — अर्थ पढ़ें ›
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् । यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥ ५ ॥
गीता 8.5 — अर्थ पढ़ें ›
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् । तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥ ६ ॥
गीता 8.6 — अर्थ पढ़ें ›

चौथा श्लोक, और इसमें बाक़ी तीन उत्तर हैं। "अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्।" नाशवान् भाव अधिभूत है, और पुरुष अधिदैव है। "अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर", और हे देहधारियों में श्रेष्ठ, इस देह में अधियज्ञ मैं ही हूँ।

पहला शब्द, अधिभूत। हमारी टीका कहती है: जो कुछ बदलता है और नष्ट होता है, वह अधिभूत है। शंकराचार्य इसे और साफ़ करते हैं: जो कुछ भी जन्म लेता है, वह सब। संत ज्ञानेश्वर इसके लिए बादल का चित्र देते हैं: जो बनता है और फिर बिखर जाता है। पाँच तत्त्व मिलते हैं, तो एक रूप दिखता है, एक नाम पड़ता है; और जब वे अलग होते हैं, तो नाम और रूप दोनों गिर जाते हैं। यह शरीर, यह घर, ये रिश्तों के रूप, सब इसी में आते हैं। और यह कोई डरावनी बात नहीं, यह बस चीज़ों का स्वभाव है। जैसे बादल का स्वभाव है बदलना।

दूसरा शब्द, अधिदैव, यानी पुरुष। हमारी टीका कहती है: प्रकृति की शक्तियों और इन्द्रियों का अधिष्ठाता, जो उनके ऊपर बैठकर उन्हें चलाता है। शंकराचार्य, श्रीधर और मधुसूदन इसे सूर्य-मण्डल में रहने वाले उस पहले पुरुष से जोड़ते हैं, जिसके अंश सब देवता हैं। और संत ज्ञानेश्वर इसे जीव कहते हैं, जो इन्द्रियों के इस गाँव का मुखिया है, जो प्रकृति का कमाया हुआ भोगता है। आचार्यों के शब्द अलग हैं, पर दिशा एक है: इस बदलते हुए संसार के बीच कोई है जो देखता है, जो चेतन है।

और तीसरा शब्द, जिसके लिए मैंने पिछले खंड के अन्त में कहा था कि यह आपके शरीर की ओर उँगली करता है। अधियज्ञ। श्रीकृष्ण कहते हैं, "अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे", इस देह में अधियज्ञ मैं ही हूँ। हमारी टीका इसका अर्थ बहुत सुंदर करती है: हर यज्ञ जिसे सचमुच अर्पित होता है, जो देह के भीतर साक्षी होकर रहता है, वह स्वयं श्रीकृष्ण हैं। शंकराचार्य वेद का एक छोटा-सा वाक्य याद दिलाते हैं, "यज्ञो वै विष्णुः", यज्ञ ही विष्णु है।

अब इसे आज के विषय के साथ रखकर देखिए। अर्जुन ने पूछा था, अन्त समय में आपको कैसे जानूँ? और उत्तर देने से ठीक पहले श्रीकृष्ण बता देते हैं कि मैं कहाँ हूँ: "अत्र देहे", यहीं, इसी शरीर में। यानी जिसे अन्त समय में याद करना है, वह कहीं दूर आसमान में नहीं बैठा। वह उसी शरीर के भीतर है जिसे छोड़कर जाना है। जो घर छूट रहा है, उसी घर में वह रहता था।

संत ज्ञानेश्वर यहाँ एक बड़ा प्यारा उदाहरण देते हैं। एक स्फटिक की साफ़ शिला है, और उसके नीचे किसी ने बालों का एक गुच्छा रख दिया। ऊपर से देखो, तो लगता है शिला में दरार है, वह टूटी हुई है। बाल हटा दो, तो वह फिर पूरी दिखती है। क्या किसी ने उसे जोड़ा था? नहीं। वह कभी टूटी ही नहीं थी। ज्ञानेश्वर कहते हैं, "मैं" का भाव, अहंकार, वही बालों का गुच्छा है। वह हटे, तो जो एकता पहले से थी, वही दिखती है। और जहाँ यह सच दिख जाए, वहीं मैं अधियज्ञ हूँ।

और श्रीकृष्ण अर्जुन को यहाँ "देहभृतां वर" कहते हैं, देहधारियों में श्रेष्ठ। जिस श्लोक में देह की बात हो रही है, उसमें यह पुकार भी देह वाली है: तुम भी एक देहधारी हो, अर्जुन, और देहधारियों में श्रेष्ठ इसलिए कि तुम यह प्रश्न पूछ रहे हो।

और अब, इससे पहले कि हम पाँचवें श्लोक में उतरें, एक छोटी-सी बात आपसे कहना चाहता हूँ। अब जो दो श्लोक आने वाले हैं, उनमें दूसरा इस अध्याय का सबसे कठोर लगने वाला श्लोक है। उसे आधा सुनकर कोई सोच सकता है कि सब कुछ उस एक आख़िरी पल पर टिका है, और अगर उस पल मन भटक गया तो सब गया। यह डर बहुत लोगों के मन में बैठा है। और इस डर का पूरा उत्तर आज के सत्संग के अन्त में, चौदहवें श्लोक में आता है। आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। जो वह श्लोक सुनकर वहीं उठ जाए, वह गीता से एक नया डर लेकर चला जाएगा। तो अगर आप यह सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की यह यात्रा बीच में न छूटे। और आज का सत्संग आख़िर तक सुनिए, क्योंकि आज का सबसे बड़ा भरोसा सबसे अन्त में रखा है।

अब पाँचवाँ श्लोक, और यहीं से अर्जुन का सातवाँ प्रश्न खुलता है। "अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।" और जो अन्त समय में मुझे ही याद करते हुए शरीर छोड़कर जाता है, "यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः", वह मेरे भाव को प्राप्त होता है। इसमें कोई संशय नहीं है।

सुनिए, यह श्लोक कितना शांत है। इसमें कोई डराने वाला चित्र नहीं, यमदूत नहीं, कोई गिनती नहीं। बस इतना: जो मुझे याद करता हुआ जाता है, वह मुझमें आता है। और अन्त में तीन शब्द, "नास्त्यत्र संशयः", इसमें कोई संशय नहीं। शंकराचार्य कहते हैं, यह संशय कि वह पहुँचेगा या नहीं पहुँचेगा, यहाँ है ही नहीं। भगवान अपनी ओर से पक्का कर रहे हैं।

"कलेवर" शब्द पर ध्यान दीजिए। यह शरीर के लिए एक पुराना शब्द है, और गीता कहती है "मुक्त्वा कलेवरम्", शरीर को छोड़कर, जैसे कोई चीज़ हाथ से छोड़ दी जाती है। मधुसूदन सरस्वती यहाँ एक गहरी बात कहते हैं: शरीर छोड़ने का असली अर्थ है शरीर में "मैं" और "मेरा" का भाव छोड़ देना। शरीर तो समय आने पर सबका छूटता है। जो उससे पहले उसका "मेरापन" छोड़ दे, उसके लिए जाना एक कपड़ा उतारने जैसा हो जाता है।

और यहाँ संत ज्ञानेश्वर के दो चित्र हैं, जो मैं चाहता हूँ कि आप घर ले जाएँ, ख़ासकर अगर आपने हाल में किसी को खोया है। पहला: एक घड़ा गहरे पानी में डूबा हुआ है, भीतर भी पानी, बाहर भी पानी। किसी दिन भाग्य से वह घड़ा फूट जाए, तो क्या पानी भी फूटता है? दूसरा: साँप अपनी केंचुली छोड़ देता है, या गर्मी में कोई अपना कपड़ा उतार देता है। सोचिए, उसके शरीर का कौन-सा अंग टूटा? ज्ञानेश्वर कहते हैं, ऐसे ही यह आकार ऊपर से गिर जाता है, पर जो वस्तु भीतर थी, वह जैसी थी वैसी ही रहती है।

अब छठा श्लोक। "यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।" हे कुन्तीपुत्र, मनुष्य अन्त में जिस-जिस भाव को याद करते हुए शरीर छोड़ता है, "तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः", उसी-उसी को प्राप्त होता है, क्योंकि वह सदा उस भाव में रँगा रहा है।

पहली पंक्ति एक नियम है, और यह नियम केवल भगवान के बारे में नहीं है। श्रीधर स्वामी साफ़ कहते हैं: ऐसा नहीं कि केवल मुझे याद करने वाला मुझे पाता है; जो जिसे भी याद करता हुआ जाता है, वह उसी को पाता है। पर असली बात दूसरी पंक्ति के आख़िरी शब्दों में है: "सदा तद्भावभावितः", जो सदा उस भाव में रँगा रहा। हमारी टीका इसे बहुत साफ़ कहती है: अन्तिम विचार संयोग नहीं होता। मनुष्य जीवन भर जिसका चिन्तन करता है, वही अन्त में मन में उठता है। रामानुजाचार्य भी यही कहते हैं: अन्तिम विचार उसी विषय का उठता है जिसका पहले अभ्यास किया गया।

तिलक यहाँ एक ज़रूरी बात पकड़ते हैं। वे कहते हैं, पाँचवाँ श्लोक सुनकर कोई सोच सकता है कि बस मरते समय भगवान का नाम ले लो, काम चल जाएगा। इसीलिए छठा श्लोक आया, यह बताने के लिए कि जो बात जीवन भर मन में रहती है, वही मरते समय नहीं छूटती। और मधुसूदन सरस्वती इसका कारण बताते हैं: उस घड़ी मनुष्य अपने वश में नहीं होता, वह कोई नया प्रयत्न नहीं कर सकता। उस समय जो याद आता है, वह पहले के अभ्यास से बनी वासना ही लाती है।

संत ज्ञानेश्वर इसे एक दौड़ते हुए आदमी से समझाते हैं। कोई हवा की तरह दौड़ रहा है, और अचानक उसका पैर एक गड्ढे में पड़ जाता है। अब गिरना टल नहीं सकता, वह गिरेगा ही, क्योंकि उस वेग को रोकने का कोई उपाय उस क्षण बचा नहीं। और फिर वे दूसरा, बहुत सीधा उदाहरण देते हैं: जागते हुए आप जिस बात में डूबे रहते हैं, आँख लगते ही वही सपने में दिखती है। परीक्षा से पहले की रात विद्यार्थी को परीक्षा के सपने आते हैं; जिसका कोई अपना अस्पताल में हो, उसे नींद में अस्पताल का गलियारा दिखता है। मृत्यु भी एक बड़ी नींद जैसी है, और उसमें वही उठता है जो जागते हुए भरा था। ज्ञानेश्वर कहते हैं, जीते जी जो मन को भा गया और भीतर बैठ गया, वही मृत्यु की सीमा पर बड़ा होकर सामने आ खड़ा होता है।

और रामानुजाचार्य यहाँ पुराने भरत का उदाहरण देते हैं, जो अन्त समय में एक हिरन को याद करते रहे और उसी के रूप को पहुँचे। नीलकण्ठ कहते हैं, यह बात तो जीते-जी भी दिखती है: जो जिस भावना को लगातार भाता है, धीरे-धीरे उसी के रंग में ढल जाता है।

अब मैं आपको महाभारत का एक अन्त सुनाना चाहता हूँ, बहुत सँभलकर, क्योंकि उसमें किसी का फ़ैसला करना मेरा काम नहीं है। यह सौप्तिक पर्व में है, युद्ध की आख़िरी रात के बाद की भोर। और यह भी सञ्जय ही धृतराष्ट्र को सुनाते हैं, उनके अपने बेटे के बारे में।

दुर्योधन की जाँघें टूट चुकी हैं। वह रणभूमि में अकेला पड़ा है, मुँह से रक्त आ रहा है, साँस कठिनाई से चल रही है, और सियार-भेड़िये पास मँडरा रहे हैं, जिन्हें वह बड़ी मुश्किल से हटा पा रहा है। रात के उस आक्रमण के बाद उसके तीन बचे हुए साथी उसके पास आते हैं: अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा। कृपाचार्य अपने हाथों से उसके मुँह का रक्त पोंछते हैं। और पाठ कहता है, ग्यारह अक्षौहिणी सेना का स्वामी, उसकी सोने से सजी गदा उसके पास वैसे पड़ी है जैसे महल की शय्या पर प्रेम करने वाली पत्नी।

फिर अश्वत्थामा उससे कहते हैं: "दुर्योधन, अगर तुम जीवित हो, तो कानों को सुख देने वाली एक बात सुनो।" और वे रात की बात बताते हैं: पाण्डवों के शिविर पर सोते हुए आक्रमण हुआ है, द्रौपदी के सब पुत्र मारे गए हैं, धृष्टद्युम्न के पुत्र मारे गए हैं। और पाठ कहता है, यह मन को प्रिय लगने वाली बात सुनकर दुर्योधन की चेतना लौट आई। उसने कहा: "जो तुमने आज मेरे लिए किया, वह न भीष्म ने किया, न कर्ण ने, न तुम्हारे पिता ने। आज मैं अपने को इन्द्र के समान मानता हूँ।" और फिर, "स्वर्ग में हमारा फिर मिलन होगा", कहकर उसने प्राण छोड़ दिए।

पाठ यह भी कहता है कि वह स्वर्ग गया, क्योंकि वह सामने लड़कर मारा गया था। उसकी गति का निर्णय न मैं करता हूँ, न आप; वह महाभारत ने कर दिया है। पर छठे श्लोक की आँख से बस एक बात देखिए। जीवन की आख़िरी साँस पर कौन-सी ख़बर उसके डूबते मन को वापस ले आई? पहले सत्संग से हम सुनते आ रहे हैं: बचपन में भीम को विष देना, राजसूय में पाण्डवों का वैभव देखकर जलना, जुए की सभा। जो भाव जीवन भर पाला, वही आख़िरी पल में भी सबसे मीठा लगा। "सदा तद्भावभावितः।"

और इसी अध्याय में सञ्जय एक बात और कहते हैं, जो मुझे हर बार रोक देती है। वे धृतराष्ट्र से कहते हैं: "आपके पुत्र के स्वर्ग जाने पर, ऋषि की दी हुई मेरी वह दिव्य दृष्टि आज नष्ट हो गई।" जिस दृष्टि से उन्होंने गीता देखी थी, जिससे वे आज यह अध्याय सुना रहे हैं, वह उसी भोर चली गई।

अब मैं यह कथा आपको किसी को बुरा कहने के लिए नहीं सुना रहा। मैं यह इसलिए सुना रहा हूँ कि हम अपने भीतर झाँकें। हम रोज़ किस भाव का अभ्यास करते हैं? किसी की कही हुई कड़वी बात, जिसे हम दस साल से मन में दोहरा रहे हैं? कोई चिन्ता, जो हर रात सोने से पहले चलती है? या कोई नाम, कोई प्रार्थना, कोई कृतज्ञता? जो रोज़ दोहराया जाता है, वही रंग चढ़ता है।

पर अभी एक बात बाकी है। अगर अन्त का विचार जीवन भर की आदत से आता है, तो मन में एक भारी प्रश्न उठता है: मेरी आदतें तो वैसी नहीं हैं। मेरे दिन तो काम, घर, दफ़्तर और चिन्ताओं में जाते हैं। क्या मुझे सब छोड़कर दिन-रात बैठना पड़ेगा? अगला श्लोक इसका उत्तर देता है, और वह गीता के सबसे प्रसिद्ध वाक्यों में से एक है। आइए, सुनते हैं।

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च । मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयः ॥ ७ ॥
गीता 8.7 — अर्थ पढ़ें ›
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना । परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ॥ ८ ॥
गीता 8.8 — अर्थ पढ़ें ›

सातवाँ श्लोक। "तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।" इसलिए सब समय मुझे याद करो, और युद्ध करो। "मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयः", मुझमें मन और बुद्धि अर्पित करके तुम निःसन्देह मुझे ही प्राप्त होगे।

पहला शब्द, "तस्मात्", इसलिए। किसलिए? क्योंकि अभी कहा गया कि अन्त में वही याद आता है जिसमें मन जीवन भर रँगा रहा। श्रीधर स्वामी इसे बहुत साफ़ जोड़ते हैं: उस समय मनुष्य विवश होता है, तब स्मरण का कोई नया प्रयत्न सम्भव नहीं, इसलिए सदा याद करो। यानी अन्त की तैयारी अन्त में नहीं होती। वह आज होती है, अभी, इस साधारण दिन में।

और अब वे दो शब्द, जिनके लिए यह श्लोक प्रसिद्ध है: "युध्य च", और युद्ध करो। सोचिए, यह किससे कहा जा रहा है। उस आदमी से, जो रथ पर धनुष रखकर बैठ गया था, जो कह रहा था कि मैं नहीं लड़ूँगा। श्रीकृष्ण उससे यह नहीं कहते कि सब छोड़कर किसी गुफा में मेरा ध्यान करो। वे कहते हैं: मुझे याद करो, और लड़ो। दोनों साथ-साथ। हमारी टीका इसे एक वाक्य में कहती है: स्मरण कर्तव्य की जगह नहीं लेता; याद रखने की आदत रोज़ के काम के बीच ही बननी है। शंकराचार्य "युध्य" का अर्थ करते हैं, अपना स्वधर्म करो। और रामानुजाचार्य कहते हैं, "सर्वेषु कालेषु" का अर्थ है जीवन के अन्त तक, हर दिन।

तिलक यहाँ उन लोगों की ओर ध्यान दिलाते हैं जो गीता से यह निकालते हैं कि संसार के काम छोड़ दो और केवल भक्ति करो। वे कहते हैं, इस श्लोक को देखो: मरते समय भी भक्ति टिकी रहे, इसके लिए जीवन भर अभ्यास चाहिए, यह सच है; पर गीता यह नहीं कहती कि इसके लिए कर्म छोड़ो। और मधुसूदन सरस्वती एक बहुत व्यावहारिक बात जोड़ते हैं: अगर मन अभी इतना शुद्ध नहीं कि लगातार याद रख सके, तो अपना कर्तव्य करते रहो, वही मन को शुद्ध करेगा।

अब मैं आपको एक दृश्य दिखाना चाहता हूँ, जिसमें यह श्लोक जैसे साँस लेता है। सञ्जय यह कथा गीता के बाद आगे सुनाएँगे, युद्ध के नौवें दिन की। भीष्म पाण्डवों की सेना को कुचल रहे हैं, और अर्जुन उनसे नरमी से लड़ रहे हैं। श्रीकृष्ण यह सह नहीं पाते। पाठ कहता है, वे अर्जुन के सफ़ेद घोड़ों को छोड़कर रथ से कूदे, और हाथ में केवल चाबुक लिए, जिनका हथियार उनकी भुजाएँ ही थीं, भीष्म की ओर दौड़े। पीले रेशम में लिपटे, साँवले जनार्दन ऐसे दिख रहे थे जैसे बिजली की माला पहने बादल। कौरव सैनिक चिल्लाकर भागने लगे, "भीष्म मारे गए! भीष्म मारे गए!"

और अब भीष्म को देखिए। पाठ कहता है, उन्होंने बिना घबराए अपना बड़ा धनुष खींचा, और रण के बीच शान्त मन से गोविन्द से कहा: "आओ, आओ, हे कमलनयन! हे देवों के देव, आपको नमस्कार है। आज इस महायुद्ध में मुझे गिराइए। आपके हाथों मारे जाने पर भी मेरा इस लोक में भी, परलोक में भी, परम कल्याण ही है। जैसे चाहें प्रहार कीजिए। मैं आपका दास हूँ।" फिर अर्जुन पीछे दौड़े, दोनों भुजाओं से श्रीकृष्ण को पकड़ा, पैर अड़ाकर दसवें कदम पर किसी तरह रोक लिया, और बोले: "लौट चलिए, आपने कहा था कि मैं नहीं लड़ूँगा; यह भार मेरा है।" और श्रीकृष्ण बिना कुछ कहे फिर रथ पर चढ़ गए। और पाँचवें सत्संग में आपने सुना था कि उसी नौवें दिन की रात भीष्म ने स्वयं पाण्डवों से कहा था, "मेरे जीते जी तुम्हारी जीत नहीं हो सकती, मुझ पर प्रहार करो, मैं अनुमति देता हूँ।"

इस दृश्य को एक पल ठहरकर देखिए। एक हाथ में धनुष, खिंची हुई डोरी, सामने युद्ध, और मुँह पर "आपको नमस्कार है, मैं आपका दास हूँ"। "मामनुस्मर युध्य च" इससे अधिक साफ़ कहीं दिखेगा? भीष्म युद्ध छोड़कर भगवान को याद नहीं कर रहे। वे युद्ध करते हुए याद कर रहे हैं। और जिस मृत्यु की बात हो रही है, उसे भी वे भगवान के हाथ से आई कृपा की तरह देख रहे हैं। और बीसवें सत्संग में आपने सुना था कि बाद में शरशय्या पर लेटे-लेटे यही भीष्म हाथ जोड़कर श्रीकृष्ण का ध्यान करते हैं। जो मन युद्ध के बीच मुड़ा था, वही अन्त की शय्या पर भी मुड़ा। "सदा तद्भावभावितः।"

और अठारहवें सत्संग में आपने वह रात सुनी थी, जब धृतराष्ट्र जाग रहे थे और विदुर के ध्यान करने पर ऋषि सनत्सुजात प्रकट हुए थे। उसी रात धृतराष्ट्र ने उनसे पूछा: "आप कहते हैं कि मृत्यु नहीं है; फिर देवता और असुर मृत्यु से बचने के लिए संयम क्यों करते थे? सच क्या है?" और सनत्सुजात ने एक वाक्य कहा, जो इस श्लोक की सबसे अच्छी टीका है: "प्रमादं वै मृत्युमहं ब्रवीमि", मैं असावधानी को, भूल जाने को ही मृत्यु कहता हूँ, और सावधानी को अमरता। फिर उन्होंने कहा, मृत्यु किसी बाघ की तरह प्राणियों को नहीं खाती, उसका कोई रूप दिखता ही नहीं; और जिसका आचरण मोह से मुक्त है, उसके लिए मृत्यु ऐसी है जैसे तिनकों से बना बाघ। तिनकों का बाघ। दूर से डरावना, पास जाओ तो घास।

तो "सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर" का अर्थ यही है: भूलना छोड़ो। दिन भर का काम करते हुए भी भीतर एक धागा जुड़ा रहे। और "मय्यर्पितमनोबुद्धि", मन और बुद्धि मुझे अर्पित करके। श्रीधर स्वामी दोनों को अलग करते हैं: मन, जो संकल्प करता है, यह करूँ, वह करूँ; और बुद्धि, जो निश्चय करती है। यानी जो सोचो, वह भी उनके सामने रखो, और जो तय करो, वह भी।

संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर कहते हैं: आँखें जो देखें, कान जो सुनें, मन जो सोचे, वाणी जो बोले, सब भीतर-बाहर मुझे ही बना दो। और फिर एक बड़ी बात: ऐसा हो जाए, अर्जुन, तो देह जाने पर भी तुम मरते नहीं; फिर युद्ध से डर कैसा? और अगर मन में शंका हो कि यह होगा कैसे, तो ज्ञानेश्वर कहते हैं: पहले अभ्यास करके देखो, न हो तो फिर नाराज़ होना। यह गुरु की बड़ी सच्ची चुनौती है।

अब आठवाँ श्लोक, जो बताता है कि यह होगा कैसे। "अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना।" हे पार्थ, अभ्यास-योग से युक्त और दूसरी ओर न जाने वाले चित्त से, "परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्", परम दिव्य पुरुष का निरन्तर चिन्तन करता हुआ मनुष्य उसी को प्राप्त होता है।

अभ्यास क्या है? शंकराचार्य बहुत बारीक परिभाषा देते हैं: एक ही विचार का बार-बार लौटना, जिसके बीच कोई दूसरा, उलटा विचार न आए। जैसे एक धार। और "नान्यगामिना", दूसरी ओर न जाने वाला। मधुसूदन सरस्वती यहाँ एक बहुत सुंदर बात कहते हैं: अभ्यास इतना पक जाए कि मन को रोकने का प्रयत्न भी न करना पड़े, वह स्वभाव से ही कहीं और न जाए। शुरुआत में मन को बाँधना पड़ता है। अभ्यास के बाद वह अपने आप उसी घाट पर लौट आता है, जैसे गाय शाम को अपने आप घर लौटती है।

बीसवें सत्संग में आपने अर्जुन का वह बचपन सुना था, जब हवा से दीपक बुझ गया और अँधेरे में भी उनका हाथ मुँह तक ही गया, अभ्यास के कारण। आठवाँ श्लोक वही बात मृत्यु के अँधेरे के लिए कह रहा है। जब सब दीपक बुझ जाएँ, आँखें, कान, स्मृति, तब भी जो हज़ार बार किया गया है, वही होगा।

मैंने बहुत घरों में एक चीज़ देखी है, जो शायद आपने भी देखी हो। किसी दादी या नानी के हाथ से गिलास गिरता है, तो उनके मुँह से अपने आप निकलता है, "हे राम।" सीढ़ी पर पैर फिसले, तो "हरि ॐ"। उन्होंने सोचकर नहीं कहा। वह पचास साल का अभ्यास है, जो सोच से पहले बोल पड़ता है। यही "नान्यगामिना" का अर्थ है, दूसरी ओर न जाने वाला चित्त। और यही वह पूँजी है जो अन्त में काम आती है।

संत ज्ञानेश्वर इस पर दो चित्र देते हैं। एक: उपाय के बल से लँगड़ा भी पहाड़ पर चढ़ जाता है। इसलिए यह मत सोचिए कि यह मेरे बस का नहीं। और दूसरा, जो मुझे बहुत प्यारा है: जो नदी बहते-बहते समुद्र में मिल गई, क्या वह मुड़कर पीछे देखती है कि मेरा किनारा कहाँ छूटा? वे कहते हैं, ऐसे ही जिसका चित्त उस परम पुरुष में मिल गया, उसे कौन याद दिलाए कि देह है या गई।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने कहा, "परम दिव्य पुरुष का चिन्तन करो।" पर अर्जुन सोच सकते हैं, और हम भी: वह पुरुष कैसा है? किसका चिन्तन करूँ? अगले दो श्लोकों में श्रीकृष्ण उसका चित्र देंगे, आठ शब्दों में। और उन्हीं श्लोकों में वह क्षण भी आएगा, जिसकी बात यह पूरा अध्याय कर रहा है। आइए, सुनते हैं।

कविं पुराणमनुशासितार- मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः । सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप- मादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥ ९ ॥
गीता 8.9 — अर्थ पढ़ें ›
प्रयाणकाले मनसाऽचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव । भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ १० ॥
गीता 8.10 — अर्थ पढ़ें ›

हमारी टीका पहले ही बता देती है कि ये दोनों श्लोक मिलकर एक वाक्य हैं। नौवाँ श्लोक बताता है कि किसका स्मरण करना है, और दसवाँ बताता है कि किस घड़ी, और कैसे। "कविं पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः।" जो उस सर्वज्ञ, पुरातन, सबके शासक, अणु से भी सूक्ष्म का स्मरण करता है, "सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं तमसः परस्तात्", जो सबको धारण करने वाला है, जिसका रूप सोचा नहीं जा सकता, जो सूर्य के समान प्रकाशमान है और अन्धकार से परे है।

आठ शब्द हैं, और आचार्य एक-एक को खोलते हैं। मैं उन्हें संक्षेप में आपके सामने रखता हूँ, क्योंकि ये वे शब्द हैं जिनसे अन्त समय में भगवान को सोचना सिखाया जा रहा है।

"कवि"। आज हम कवि उसे कहते हैं जो कविता लिखे। यहाँ शंकराचार्य इसका अर्थ करते हैं, "क्रान्तदर्शी", जो आर-पार देखता है, सब कुछ जानने वाला। मधुसूदन जोड़ते हैं: जो बीता हुआ भी देखता है और आने वाला भी। "पुराण", सबसे पुराना, जिसका कोई आरम्भ नहीं। "अनुशासिता", सबको नियम में रखने वाला; नीलकण्ठ कहते हैं, भीतर बैठकर चलाने वाला। "अणु से भी सूक्ष्म"। रामानुजाचार्य कहते हैं, जीव से भी सूक्ष्म; श्रीधर स्वामी कहते हैं, आकाश, काल और दिशाओं से भी सूक्ष्म। संत ज्ञानेश्वर इसे दो छोरों में कहते हैं: जो आकाश से भी पुराना है, और परमाणु से भी छोटा।

"सर्वस्य धाता", सबको धारण करने वाला। शंकराचार्य कहते हैं, जो सबके कर्मों का फल ठीक-ठीक बाँटकर देता है; श्रीधर कहते हैं, जो सबका पोषण करता है। "अचिन्त्यरूप", जिसका रूप है तो, पर सोच में नहीं समाता। "आदित्यवर्ण", सूर्य के रंग वाला, यानी अपने ही प्रकाश से चमकने वाला। और "तमसः परस्तात्", अन्धकार से परे; शंकराचार्य कहते हैं, अज्ञान और मोह के अन्धकार से परे। तिलक बताते हैं कि यह पूरा वर्णन उपनिषदों से आया है; अणु से भी सूक्ष्म वाला पद और यह आख़िरी चरण श्वेताश्वतर उपनिषद् के हैं। श्रीधर स्वामी वह मन्त्र याद दिलाते हैं जिसमें ऋषि कहता है, मैंने उस महान पुरुष को जाना है, "आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्"।

अब सोचिए, अन्त समय के लिए यह चित्र क्यों? क्योंकि मृत्यु के समय मनुष्य को सबसे बड़ा डर अँधेरे का होता है। आँखों के आगे अँधेरा, आगे क्या है इसका अँधेरा। और श्रीकृष्ण कहते हैं, उस घड़ी उसे याद करो जो सूर्य के रंग का है, जो अन्धकार के उस पार है। संत ज्ञानेश्वर इस पर एक पंक्ति कहते हैं जो मुझे बहुत भाती है: वह ऐसा सूर्य है जो ज्ञानियों के लिए सदा उगा ही रहता है; अस्त होने का नाम उसके साथ कभी जुड़ा ही नहीं। जिस सूर्य का कभी अस्त नहीं होता, उसकी ओर मुँह करके कोई अँधेरे में कैसे जाएगा?

अब दसवाँ श्लोक, जो वाक्य को पूरा करता है। "प्रयाणकाले मनसाऽचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव।" प्रयाण के समय अचल मन से, भक्ति से और योग के बल से युक्त होकर, "भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्", प्राण को भौंहों के बीच भली-भाँति स्थापित करके, वह उस परम दिव्य पुरुष को प्राप्त होता है।

तीन चीज़ें साथ चाहिए: अचल मन, भक्ति, और योग का बल। मधुसूदन सरस्वती भक्ति का अर्थ करते हैं, परमेश्वर के प्रति परम प्रेम। शंकराचार्य योग-बल का अर्थ करते हैं, ध्यान के बार-बार के अभ्यास से जमा हुई मन की स्थिरता। यानी योग-बल भी कोई उस दिन अचानक मिलने वाली चीज़ नहीं है; रामानुजाचार्य साफ़ कहते हैं, यह रोज़-रोज़ के अभ्यास से चढ़ा हुआ संस्कार है।

और फिर "भ्रुवोर्मध्ये", भौंहों के बीच। शंकराचार्य और मधुसूदन इसका क्रम बताते हैं: पहले मन को हृदय-कमल में वश में करना, फिर ऊपर जाने वाली नाड़ी से धीरे-धीरे प्राण को भौंहों के बीच तक ले आना। और मधुसूदन एक शब्द जोड़ते हैं जिस पर मैं आपका ध्यान चाहता हूँ: "गुरु के बताए मार्ग से"। यह किसी किताब या वीडियो से पढ़कर प्रयोग करने की चीज़ नहीं है। यह योगियों का मार्ग है, जो जीवन भर साधा जाता है। मैं इसे आपको केवल समझाने के लिए कह रहा हूँ, जैसा श्लोक कहता है।

संत ज्ञानेश्वर इस घड़ी का चित्र बहुत कोमल रंगों में देते हैं। वे कहते हैं, जैसे घण्टे की आवाज़ धीरे-धीरे घण्टे में ही लीन हो जाती है। या जैसे ढके हुए घड़े के भीतर जलता दीया, किसी को पता ही नहीं चलता कि वह कब बुझा। ऐसे ही योगी देह छोड़ता है: न कोई छटपटाहट, न कोई शोर।

और अब मैं आपको महाभारत का वह अन्त सुनाना शुरू करता हूँ, जिसमें यह दसवाँ श्लोक, और आगे के दो श्लोक भी, लगभग शब्दशः घटते हुए दिखते हैं। यह द्रोणाचार्य का अन्त है। ग्यारहवें सत्संग में आपने उस दिन का एक हिस्सा सुना था: "अश्वत्थामा मारा गया", युधिष्ठिर का ऊँचे स्वर में कहना और धीमे स्वर में "हाथी" जोड़ना। आज उसी दिन का वह हिस्सा सुनिए, जो उस सत्संग में नहीं आया था।

उस दिन, पाठ कहता है, द्रोण के पास बड़े-बड़े ऋषि आए थे, विश्वामित्र, जमदग्नि, भरद्वाज, गौतम, वसिष्ठ और बहुत से दूसरे, उन्हें ब्रह्मलोक ले जाने की इच्छा से। उन्होंने कहा: "द्रोण, शस्त्र रख दो। मनुष्यों के लोक में तुम्हारे रहने का समय आज पूरा हो गया।" यानी द्रोण को उनका प्रयाण-काल बता दिया गया था। धरती काँपी, सूर्य से एक बड़ी उल्का गिरी, उनके घोड़े आँसू बहाने लगे। और फिर भीम उनके रथ के पास आए और बहुत कठोर बातें कहीं, और अन्त में कहा: "आपका पुत्र मारा गया पड़ा है; धर्मराज की बात पर शंका मत कीजिए।"

पाठ कहता है, यह सुनकर द्रोण ने अपना धनुष रख दिया। शरीर छोड़ने के लिए तैयार उस ब्राह्मण ने ज़ोर से पुकारा: "कर्ण, कृप, दुर्योधन, युद्ध में प्रयत्न करते रहो; तुम्हारा कल्याण हो; मैं शस्त्र छोड़ता हूँ।" और उन्होंने अपने पुत्र को भी पुकारा। फिर वे रथ में अपने बैठने के स्थान पर बैठ गए, योग में प्रवेश किया, और पाठ के शब्द हैं: उन्होंने सब प्राणियों को अभय दे दिया।

इस एक वाक्य पर रुकिए। जीवन भर का योद्धा, जिसने उस दिन भी हज़ारों को गिराया था, अन्त की घड़ी में पहला काम क्या करता है? हथियार नीचे रखता है, और सब प्राणियों को अभय देता है। जैसे कोई घर छोड़ने से पहले सब कर्ज़ चुका दे, सबसे क्षमा माँग ले, और हल्का होकर दरवाज़े पर खड़ा हो जाए। "मनसाऽचलेन", अचल मन। बाहर हाहाकार है, भीतर एकदम स्थिरता।

पर अभी एक बात बाकी है। द्रोण रथ पर योग में बैठे हैं, और ठीक उसी क्षण एक तलवार उनकी ओर बढ़ रही है। उनके मन में उस क्षण क्या था, उनका प्राण किस द्वार से गया, और उस अन्त को किसने देखा, यह अगले दो श्लोकों के साथ सुनाऊँगा, क्योंकि वे श्लोक ठीक इसी का वर्णन करते हैं। आइए, सुनते हैं।

यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥ ११ ॥
गीता 8.11 — अर्थ पढ़ें ›
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च । मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥ १२ ॥
गीता 8.12 — अर्थ पढ़ें ›

ग्यारहवाँ श्लोक। "यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः।" जिसे वेद जानने वाले अक्षर कहते हैं, जिसमें राग-रहित यति प्रवेश करते हैं, "यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये", और जिसे चाहते हुए लोग ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, वह पद मैं तुम्हें संक्षेप में कहूँगा।

तीन तरह के लोग गिनाए गए हैं, और तीनों एक ही ओर देख रहे हैं: वेद को जानने वाले, जो उसे "अक्षर" कहकर बताते हैं; संन्यासी, जिनका राग छूट गया और जो उसमें प्रवेश करते हैं; और ब्रह्मचारी, जो उसी को पाने के लिए गुरु के पास संयम से रहते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं, जिसके लिए ये सब इतना करते हैं, वह मैं तुम्हें "सङ्ग्रहेण", थोड़े में बताता हूँ।

तिलक यहाँ एक रोचक बात बताते हैं। यह श्लोक लगभग शब्दशः कठ उपनिषद् से आया है, और वहाँ "वह पद मैं संक्षेप में कहता हूँ" के ठीक बाद लिखा है, "ओमित्येतत्", वह है ॐ। यानी जो गीता के पाठक उपनिषद् जानते थे, उनके लिए यह श्लोक सुनते ही अगला शब्द मन में गूँज जाता था। श्रीकृष्ण उसे दो श्लोक बाद कहेंगे। मधुसूदन सरस्वती भी कहते हैं कि यहाँ से भगवान बताने जा रहे हैं कि ध्यान के समय उनका स्मरण प्रणव से ही करना है।

अब बारहवाँ श्लोक, जो उस घड़ी की विधि है। "सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।" शरीर के सब द्वारों को रोककर, मन को हृदय में स्थिर करके, "मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्", अपने प्राण को मस्तक में स्थापित करके, योग-धारणा में स्थित होकर।

"द्वार" क्या हैं? हमारी टीका कहती है: इन्द्रियाँ। आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा, ये शरीर के दरवाज़े हैं जिनसे संसार भीतर आता है। और उन्हें क्यों बन्द करना है? टीका कहती है, ताकि अन्तिम क्षण में बाहर का कुछ भी मन को न खींचे। मधुसूदन सरस्वती एक बारीक बात पकड़ते हैं: बाहर के दरवाज़े बन्द कर देने पर भी मन भीतर ही भीतर घूम सकता है, इसलिए दूसरा चरण है, "मनो हृदि निरुध्य", मन को हृदय में रोकना। और वे याद दिलाते हैं कि यह रोकना उसी अभ्यास और वैराग्य से होता है, जो छठे अध्याय में बताया गया था। संत ज्ञानेश्वर कहते हैं, जब संयम के किवाड़ सब द्वारों पर लग जाएँ, तो मन अपने आप हृदय में चुप बैठ जाता है, जैसे हाथ-पैर टूटा आदमी अपनी जगह नहीं छोड़ता।

और फिर तीसरा चरण, "मूर्ध्न्याधाय", प्राण को मस्तक में ले जाना। शंकराचार्य कहते हैं, हृदय से ऊपर जाने वाली नाड़ी से चढ़कर।

अब द्रोण के रथ पर लौटिए। पिछली बार हम वहाँ रुके थे, जहाँ वे शस्त्र रखकर योग में बैठ गए थे। उसी क्षण धृष्टद्युम्न ने अपना धनुष रथ में रखा, तलवार ली, और रथ से कूदकर उनकी ओर दौड़ा। चारों ओर लोग हाहाकार करने लगे, "धिक्कार है!" और अब सञ्जय वह बताते हैं, जो उन्होंने ख़ुद देखा। द्रोण शस्त्र छोड़कर परम सांख्य में स्थित हुए। उन्होंने मन से उस पुराण पुरुष, परम विष्णु की ओर गमन किया। मुख थोड़ा ऊपर उठाया, छाती आगे की ओर दृढ़ की, आँखें मूँद लीं, सत्त्व में स्थित होकर हृदय में धारणा टिकाई।

सुना आपने? "पुराण पुरुष", वही शब्द जो नौवें श्लोक में आया, "पुराण"। और "हृदय में धारणा", वही जो बारहवाँ श्लोक कह रहा है, "मनो हृदि निरुध्य", "योगधारणाम्"। और फिर पाठ कहता है: उन महात्मा की ज्योति मस्तक को भेदकर, देह को उत्तम रथ में छोड़कर, परम धाम को चली गई। "मूर्धानं तस्य निर्भिद्य", उनके मस्तक को भेदकर। और श्लोक कहता है, "मूर्ध्न्याधायात्मनः", अपने प्राण को मस्तक में रखकर।

सञ्जय कहते हैं: उनके जाते समय हमें लगा कि आकाश में दो सूर्य हैं; ज्योतियों से भरा आकाश जैसे एक हो गया। वह ज्योति उल्का जैसी हुई, और पलक झपकते ही लुप्त हो गई। और फिर सञ्जय एक बहुत अनोखी बात कहते हैं: "हम पाँच मनुष्य ही उन महात्मा को परम गति की ओर जाते देख सके: मैं, धनञ्जय पार्थ, शारद्वत कृप, वृष्णिवंशी वासुदेव, और धर्मपुत्र युधिष्ठिर।" बाक़ी कोई नहीं देख सका, पाठ कहता है, क्योंकि यह देवताओं का परम रहस्य है। और आगे सञ्जय कहते हैं: "मैंने ही तब व्यास की कृपा से द्रोण का अन्त देखा।"

फिर, पाठ कहता है, धृष्टद्युम्न ने उस शरीर का सिर काटा, जिसमें से प्राण पहले ही निकल चुके थे, जो अब कुछ बोलता नहीं था; और अर्जुन चिल्लाते रहे, "आचार्य को जीवित ले आओ, उन्हें मत मारो।" पचासी वर्ष के वे साँवले आचार्य, जिनके कानों तक के बाल पक चुके थे, उस दिन सोलह वर्ष के युवक की तरह लड़े थे। पर जिसे तलवार ने छुआ, वह केवल रथ में छोड़ा हुआ एक घर था। रहने वाला पहले ही जा चुका था।

अब इस दृश्य को इस सत्संग के ढाँचे में रखिए। जो सञ्जय आज, भीष्म के गिरने के दिन, धृतराष्ट्र को यह बारहवाँ श्लोक सुना रहे हैं, वही कुछ दिन बाद इसी श्लोक को अपनी आँखों के सामने घटते देखेंगे। उन्होंने पहले श्रीकृष्ण के मुँह से सुना, फिर द्रोण के रथ पर देखा। गीता उनके लिए केवल सुनी हुई बात नहीं रही।

पर अभी एक बात बाकी है। मैंने द्रोण के अन्त से एक बात जानबूझकर छोड़ दी है, वह शब्द जो उस क्षण उनके मुँह पर था। वह शब्द अगला श्लोक कहता है। और फिर उसके बाद वह श्लोक आता है, जो उन सबके लिए है जो द्रोण नहीं हैं, यानी हम सबके लिए। आइए, सुनते हैं।

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् । यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥ १३ ॥
गीता 8.13 — अर्थ पढ़ें ›
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः । तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥ १४ ॥
गीता 8.14 — अर्थ पढ़ें ›

तेरहवाँ श्लोक। "ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।" ॐ, इस एक अक्षर ब्रह्म का उच्चारण करते हुए और मुझे याद करते हुए, "यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्", जो देह छोड़कर जाता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।

और अब वह शब्द, जो मैंने द्रोण के अन्त से रोक रखा था। सञ्जय कहते हैं, आँखें मूँदे, हृदय में धारणा टिकाए, द्रोण ने उस क्षण जो कहा, वह था: "ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म"। ठीक यही चार शब्द। जो इस श्लोक में हैं, वही महाभारत ने द्रोण के अन्तिम क्षण के लिए लिखे हैं। और फिर, पाठ कहता है, देवों के देव, अविनाशी परम प्रभु का स्मरण करके आचार्य उस स्वर्ग में चढ़ गए जहाँ पहुँचना सज्जनों के लिए भी कठिन है। "व्याहरन्मामनुस्मरन्", उच्चारण करते हुए, और मुझे याद करते हुए। दोनों साथ।

ॐ ही क्यों? मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, "एकाक्षर" कहकर भगवान इसकी सरलता की प्रशंसा कर रहे हैं: एक ही अक्षर, कोई लम्बा मन्त्र नहीं। और नीलकण्ठ एक बहुत घरेलू उदाहरण देते हैं: जैसे आप किसी को याद करके उसका नाम पुकारें, तो वह आपकी ओर मुँह कर लेता है, वैसे ही ब्रह्म का नाम लेने से ब्रह्म साधक के और पास आ जाता है। नाम पुकारना, और पुकारे जाने वाले का मुड़ जाना।

और शंकराचार्य इस श्लोक के एक छोटे-से शब्द पर रुकते हैं, जो मैं चाहता हूँ कि आप सबसे सँभालकर घर ले जाएँ। "त्यजन्देहं", देह को छोड़ते हुए। वे कहते हैं, यह शब्द इसलिए है कि साफ़ हो जाए: जाना देह छोड़ने से होता है, अपने स्वरूप के मिटने से नहीं। जो जाता है, वह मिटता नहीं। केवल देह पीछे छूटती है, जैसे द्रोण की देह रथ में छूटी।

और अब, ईमानदारी से, वह प्रश्न जो इन चार श्लोकों को सुनकर किसी भी साधारण आदमी के मन में उठेगा। सब द्वार बन्द, मन हृदय में, प्राण मस्तक में, मुँह पर ॐ। मैं द्रोण नहीं हूँ। मैं योगी नहीं हूँ। मेरा अन्त शायद किसी अस्पताल के बिस्तर पर होगा, नलियों के बीच, दवाओं की बेहोशी में। तब कौन बैठेगा, कौन प्राण चढ़ाएगा? यह प्रश्न आपका ही नहीं। संत ज्ञानेश्वर यही प्रश्न अर्जुन के मुँह में रखते हैं: जब इन्द्रियाँ जवाब दे दें, जीवन का सुख डूब जाए, भीतर-बाहर मृत्यु के चिह्न दिखने लगें, तब कौन बैठ पाएगा, कौन इन्द्रियों को रोकेगा, किस मन से ॐ याद किया जाएगा? और फिर ज्ञानेश्वर श्रीकृष्ण से उत्तर दिलाते हैं: "ऐसी शंका को मन में जगह मत देना। जिसने सदा मेरी सेवा की, अन्त में मैं उसका सेवक बन जाता हूँ।"

और यही चौदहवाँ श्लोक है। "अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।" हे पार्थ, जो अनन्य चित्त से नित्य, निरन्तर मुझे याद करता है, "तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः", उस नित्य जुड़े हुए योगी के लिए मैं सुलभ हूँ।

सुलभ। आसानी से मिलने वाला। पूरे अध्याय में कठिन शब्दों के बाद यह शब्द ऐसे आता है जैसे लम्बी चढ़ाई के बाद ठण्डी हवा। हमारी टीका यही कहती है: पिछले तीन श्लोकों की कठिन योग-विधि के बाद यह सरल मार्ग है; जीवन भर का निरन्तर स्मरण भगवान को सुलभ बना देता है, और अन्त में किसी विशेष साधना की ज़रूरत नहीं रहती।

और मधुसूदन सरस्वती यहाँ ठीक वही बात कहते हैं जिसकी हमें ज़रूरत है। वे कहते हैं: जो प्राण को रोककर, मस्तक से अपनी इच्छा से देह नहीं छोड़ सकता, जो कर्म पूरे होने पर विवश होकर ही देह छोड़ता है, उसका क्या? और उत्तर देते हैं: जिसने जीवन भर निरन्तर याद किया, वह अपने वश से जाए या विवश होकर, उसके लिए भी मैं सुलभ हूँ। और फिर मधुसूदन श्रीकृष्ण के मन की बात लिखते हैं: "मा भैषीः", डरो मत। डरो मत। यह आज के सत्संग का सबसे बड़ा वाक्य है।

शंकराचार्य दो शब्दों को अलग करते हैं: "सततं", यानी बिना टूटे, और "नित्यशः", यानी लम्बे समय तक; छह महीने नहीं, एक साल नहीं, जब तक जीवन है। और रामानुजाचार्य इसे सबसे कोमल रंग देते हैं। वे कहते हैं, यह वह भक्त है जिसे मेरी याद के बिना जीना ही नहीं सुहाता; ऐसे को मैं स्वयं चुन लेता हूँ, और जो कुछ उसे मुझ तक पहुँचने के लिए चाहिए, वह मैं ही देता हूँ। यानी अन्त में भार आप पर नहीं है। जिसे आपने जीवन भर याद किया, वह अन्त में आपको याद रखता है।

पंद्रहवें और बीसवें सत्संग में आपने सुना था कि बाणों की शय्या पर पड़े भीष्म जब श्रीकृष्ण का ध्यान कर रहे थे, तो श्रीकृष्ण ने कहा था, "मेरा मन उनके पास चला गया।" और शान्ति पर्व बताता है कि फिर वे स्वयं रथ से कुरुक्षेत्र गए, उस शय्या तक, और भीष्म से पहले यही पूछा कि आपका मन स्वच्छ तो है। "सुलभ" का इससे सुंदर चित्र क्या होगा। जिसने युद्ध के बीच धनुष खींचते हुए भी "आपको नमस्कार" कहा, उसके अन्त की शय्या तक भगवान ख़ुद चलकर आए।

और अब उनसे एक बात, जिन्होंने किसी अपने को अचानक खोया है। दुर्घटना में, या आई.सी.यू. में बेहोशी में, या ऐसी बीमारी में जिसने आख़िरी बरसों में याददाश्त ही छीन ली। आपके मन में शायद यह काँटा चुभता हो कि वे अन्त समय भगवान का नाम भी नहीं ले पाए। आज के इन श्लोकों के साथ उस काँटे को निकाल दीजिए। गीता आख़िरी पाँच मिनट का हिसाब नहीं माँगती। जिस माँ ने पचास बरस सुबह दीया जलाया, जिस पिता ने हर काम से पहले मन ही मन नाम लिया, वह भाव कहीं नहीं गया। "सदा तद्भावभावितः", जो सदा रँगा रहा, वही रंग साथ गया। और जो इस बेहोशी में चले गए, उनके लिए मधुसूदन का वह वाक्य है: विवश होकर जाने वाले के लिए भी मैं सुलभ हूँ।

और श्रीकृष्ण अगले ही श्लोक में आगे की बात खोलेंगे: "मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्।" मुझ तक पहुँचकर फिर उस जन्म में लौटना क्यों नहीं होता, ब्रह्मा का दिन और रात क्या है, और जाने वालों के दो मार्ग कौन-से हैं, यह अगले सत्संग में।

तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली बात। मृत्यु शत्रु नहीं है। महाभारत कहता है, वह स्वयं रोई थी, और वह बिना क्रोध के, समय पूरा होने पर ही आती है। और गीता उसे "प्रयाण" कहती है, यात्रा पर निकलना। घर छूटता है, रहने वाला नहीं मिटता।

दूसरी बात। अन्त में वही याद आता है जो रोज़ दोहराया गया। "सदा तद्भावभावितः।" इसलिए तैयारी आज है, किसी आख़िरी दिन नहीं। कोई कड़वी बात जो बरसों से मन में दोहरा रहे हैं, उसकी जगह आज से एक नाम दोहराइए। और यह सब छोड़कर नहीं: "मामनुस्मर युध्य च", याद करते रहिए, और अपना काम करते रहिए।

तीसरी बात। आपको द्रोण या योगी बनकर नहीं जाना है। "तस्याहं सुलभः", जो रोज़ याद करता है, उसके लिए वे सुलभ हैं, और अन्त में भार उन्हीं पर है। मा भैषीः। डरिए मत।

आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आपके घर में किसी बड़े ने, दादी, नानी, माँ या पिता ने, कौन-सा नाम या कौन-सी प्रार्थना इतनी बार दोहराई कि वह उनकी पहचान बन गई? और आप अपने लिए आज कौन-सा नाम चुनेंगे? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।

जिसे आपने जीवन भर याद किया, अन्त में वह आपको भूलता नहीं। आज इतना ही याद रखिए।

जय श्री कृष्ण।

अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः । तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥ १४ ॥
गीता 8.14 — अर्थ पढ़ें ›

तीन बातें

  1. मृत्यु शत्रु नहीं है। महाभारत कहता है, वह स्वयं रोई थी, और वह बिना क्रोध के, समय पूरा होने पर ही आती है। और गीता उसे "प्रयाण" कहती है, यात्रा पर निकलना। घर छूटता है, रहने वाला नहीं मिटता।
  2. अन्त में वही याद आता है जो रोज़ दोहराया गया। "सदा तद्भावभावितः।" इसलिए तैयारी आज है, किसी आख़िरी दिन नहीं। कोई कड़वी बात जो बरसों से मन में दोहरा रहे हैं, उसकी जगह आज से एक नाम दोहराइए। और यह सब छोड़कर नहीं: "मामनुस्मर युध्य च", याद करते रहिए, और अपना काम करते रहिए।
  3. आपको द्रोण या योगी बनकर नहीं जाना है। "तस्याहं सुलभः", जो रोज़ याद करता है, उसके लिए वे सुलभ हैं, और अन्त में भार उन्हीं पर है। मा भैषीः। डरिए मत।