दुखी होकर पुकारना भी भक्ति है
गीता 7.16–7.30 · 76 मिनट
चार तरह के भक्त; जिस देवता में श्रद्धा, उसे भी वही स्थिर करते हैं
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥ १६ ॥
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥ १७ ॥
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥ १८ ॥
आपने कभी किसी बहुत बुरे दिन भगवान को पुकारा है? अस्पताल के गलियारे में, किसी रिपोर्ट के इंतज़ार में, या रात के दो बजे जब फ़ोन की घंटी बजी और दिल बैठ गया? उस घड़ी कोई स्तुति याद नहीं रहती, कोई विधि याद नहीं रहती। बस मुँह से निकलता है, "हे भगवान, बचा लो।" और फिर, जब संकट टल जाता है, भीतर एक शर्म-सी उठती है: मैं तो बस मुसीबत में ही याद करता हूँ। बाकी दिन तो मुझे उनकी सुध भी नहीं रहती। तो क्या वह पुकार भक्ति थी, या बस डर? आज इसी का उत्तर है, और यह उत्तर श्रीकृष्ण ख़ुद देते हैं: दुखी होकर पुकारना भी भक्ति है।
जय श्री कृष्ण।
आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का बाईसवाँ सत्संग है, और सातवें अध्याय का दूसरा और आख़िरी। आपको याद रहे, यह सब हमें सञ्जय सुना रहे हैं, हस्तिनापुर में, अन्धे राजा धृतराष्ट्र को, उस दिन जब भीष्म बाणों की शय्या पर गिर चुके हैं। महाभारत के भीष्म पर्व का इकतीसवाँ अध्याय ही गीता का यह सातवाँ अध्याय है, "ज्ञानविज्ञान योग"।
पिछले सत्संग में श्रीकृष्ण ने अपने बारे में बताना शुरू किया था। पहले एक वादा: "असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु", तुम मुझे पूरा का पूरा, बिना संशय के, कैसे जानोगे, वह सुनो। फिर एक सच्ची बात: "मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये", हज़ारों में कोई एक इस रास्ते पर यत्न करता है। फिर उनकी दो प्रकृतियाँ, एक जिससे यह संसार बना, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार, और दूसरी, जीव रूप, जो इस जगत् को धारण करती है। फिर वह सुंदर चित्र, जिससे पिछले सत्संग का नाम पड़ा: "मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव", यह सब मुझमें वैसे पिरोया है जैसे धागे में मोती। मोती दिखते हैं, धागा नहीं दिखता, पर धागा न हो तो माला बिखर जाए। फिर "रसोऽहमप्सु कौन्तेय", जल में रस मैं हूँ, सूर्य और चन्द्रमा का प्रकाश मैं हूँ। और आख़िर में वह बड़ी बात: "दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया", यह मेरी माया पार करना कठिन है, पर "मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते", जो मेरी शरण लेते हैं, वे इसे पार कर जाते हैं। आपको मार्कण्डेय याद होंगे, जो प्रलय के उस बालक के भीतर सौ वर्ष भटकते रहे, और शरण लेते ही एक क्षण में बाहर थे।
और फिर पंद्रहवें श्लोक में श्रीकृष्ण ने बताया कि कौन उनकी शरण नहीं लेते: जिनका ज्ञान माया ने हर लिया है, जो बुरे कर्मों में डूबे हैं। तो स्वाभाविक प्रश्न उठता है: फिर लेते कौन हैं? कौन हैं वे लोग जो सचमुच उनकी ओर मुड़ते हैं? आज का पहला श्लोक इसी का उत्तर है।
"चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन।" हे अर्जुन, चार प्रकार के पुण्यात्मा मनुष्य मुझे भजते हैं। "आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ।" आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी।
हमारी टीका इन चारों को बहुत सीधे शब्दों में खोलती है। आर्त वह है जो दुःख से छुटकारे के लिए उनकी ओर आता है। जिज्ञासु वह, जो समझना चाहता है। अर्थार्थी वह, जो इस लोक या परलोक का कोई लाभ चाहता है। और ज्ञानी वह, जो केवल उन्हें ही चाहता है। शंकराचार्य आर्त का चित्र और साफ़ करते हैं: जिसे चोर ने, बाघ ने या रोग ने घेर लिया हो। यानी कोई बहुत बड़ा दार्शनिक नहीं, बस एक घबराया हुआ, घिरा हुआ आदमी।
अब एक बात पर ध्यान दीजिए, जो इस पूरे श्लोक की कुंजी है। इन चारों को श्रीकृष्ण किस नाम से पुकारते हैं? पुण्यात्मा, सुकृती, अच्छे कर्म वाले। और इस सूची में सबसे पहला नाम किसका है? ज्ञानी का नहीं। आर्त का। उस आदमी का, जो रोता हुआ आया है। भगवान ने उसे सूची से बाहर नहीं रखा। उन्होंने यह नहीं कहा कि "वह तो मतलब से आया है, वह गिनती में नहीं।" उन्होंने उसे पुण्यात्माओं में गिना, और सबसे पहले गिना।
श्रीधर स्वामी इसमें एक बारीक बात जोड़ते हैं। वे कहते हैं, संकट तो सब पर आता है, पर संकट में भगवान की ओर वही मुड़ता है जिसके पीछे पिछले जन्मों का कुछ पुण्य हो। नहीं तो आदमी दुःख में भी कहीं और भटकता रहता है। यानी जिस रात आपने अस्पताल के गलियारे में "हे भगवान" कहा था, उस रात आपके भीतर का कोई पुराना पुण्य जागा था। उस पुकार पर शर्माइए मत।
और मधुसूदन सरस्वती यहाँ हर प्रकार के भक्त के उदाहरण गिनाते हैं। जिज्ञासु के लिए वे राजा जनक का नाम लेते हैं। अर्थार्थी के लिए ध्रुव का। और आर्त के उदाहरणों में, सबसे पहले जो नाम मुझे रोक लेता है, वह है: जुए की सभा में, जब उनका वस्त्र खींचा जा रहा था, द्रौपदी।
वह दृश्य महाभारत के सभा पर्व में है, और आज मैं उसे आपके सामने रखना चाहता हूँ, क्योंकि आर्त की पुकार कैसी होती है, यह उससे अच्छा कहीं नहीं दिखता। दूसरे और तीसरे सत्संग में आपने उस सभा की चुप्पी सुनी थी, बड़ों का सिर झुकाए बैठे रहना। अब उसी सभा का अगला क्षण। युधिष्ठिर सब कुछ हार चुके हैं, भाइयों को, अपने आप को, और द्रौपदी को भी। कर्ण दुःशासन से कहता है, इन पाण्डवों के और द्रौपदी के भी वस्त्र उतार लो। पाण्डव चुपचाप अपने ऊपर के वस्त्र उतारकर बैठ जाते हैं। और फिर, भरी सभा के बीच, दुःशासन द्रौपदी का वस्त्र पकड़कर बलपूर्वक खींचने लगता है।
उस घड़ी द्रौपदी क्या करती हैं? पाठ कहता है, उन्हें एक बात याद आती है, जो महात्मा वसिष्ठ ने कही थी: बड़ी आपत्ति आ पड़े, तो भगवान हरि का स्मरण करना चाहिए। मन में यह निश्चय करके वे उन कृष्ण का स्मरण करती हैं, जिन्हें पाठ यहाँ शरण में आए हुओं पर स्नेह करने वाला कहता है। और फिर वह पुकार। "गोविन्द पुण्डरीकाक्ष रक्ष मां शरणागताम्", हे गोविन्द, हे कमलनयन, मेरी रक्षा करो, मैं तुम्हारी शरण में आई हूँ।
पर सुनिए, उसके बाद के शब्द क्या हैं। यह कोई सजी-सँवरी प्रार्थना नहीं है। वे कहती हैं, "हाय कृष्ण, तुम कहाँ हो? मैं इस दशा में पड़ी हूँ, अनाथ हूँ। तुम मेरी अनदेखी क्यों करते हो? क्या तुम नहीं जानते कि कौरव मेरा अपमान कर रहे हैं?" शिकायत भी है, पुकार भी है, आँसू भी हैं। और पाठ कहता है, इस तरह स्मरण करके वे मुँह ढककर फूट-फूटकर रोने लगीं।
और तब, पाठ के शब्द हैं, "उनकी कृपा से", जैसे ही वस्त्र खींचा जाता, वैसा ही दूसरा वस्त्र प्रकट हो जाता। फिर एक और। अनेक रंगों के, बिना रंग के, सैकड़ों वस्त्र। सभा में हाहाकार मच गया। राजाओं ने संसार की उस सबसे अद्भुत बात को देखा, द्रौपदी की प्रशंसा की, और धृतराष्ट्र के पुत्र को धिक्कारा। और जब सभा के बीच वस्त्रों का ढेर लग गया, तब दुःशासन थककर, लज्जित होकर बैठ गया।
अब ज़रा सोचिए कि उस दिन द्रौपदी की पुकार में क्या नहीं था। उसमें कोई तैयारी नहीं थी, कोई विधि नहीं थी, कोई शांत ध्यान नहीं था। उसमें था डर, अपमान, शिकायत और आँसू। यही आर्त की भक्ति है। और भगवान ने उस पुकार को कम नहीं समझा।
और इससे भी आगे की एक बात महाभारत में है, जो मुझे इस श्लोक की सबसे बड़ी व्याख्या लगती है। युद्ध से पहले, जब सञ्जय धृतराष्ट्र का सन्देश लेकर पाण्डवों के पास गए थे, तो लौटकर उन्होंने कौरवों की भरी सभा में बताया कि उन्हें भीतर के कक्ष में ले जाया गया, जहाँ श्रीकृष्ण और अर्जुन बैठे थे, और साथ में द्रौपदी और सत्यभामा थीं। और वहाँ श्रीकृष्ण ने सन्देश के अन्त में एक बात कही, जिसे सञ्जय ने ज्यों का त्यों सुनाया: "बढ़े हुए कर्ज़ की तरह यह बात मेरे हृदय से नहीं हटती, कि जब मैं दूर था, तब कृष्णा ने 'गोविन्द!' कहकर मुझे पुकारा था।"
सुना आपने? भगवान कह रहे हैं, वह एक पुकार मुझ पर कर्ज़ है। और वह कर्ज़ घटा नहीं, ब्याज की तरह बढ़ता गया। जिस पुकार को हम अपनी कमज़ोरी समझकर छिपाते हैं, उसी पुकार को भगवान अपने ऊपर का कर्ज़ मानते हैं। और ध्यान दीजिए, यह बात सञ्जय ने धृतराष्ट्र के सामने ही कही थी। वही सञ्जय, वही धृतराष्ट्र, जो आज यह श्लोक सुन रहे हैं।
तेरहवें सत्संग में आपने सुना था कि वनवास में द्रौपदी ने रोकर श्रीकृष्ण से अपना दुःख कहा था, और उन्नीसवें सत्संग में, दुर्वासा वाली उस रात, उन्होंने फिर उन्हें ही याद किया था। द्रौपदी का जीवन बार-बार की पुकार का जीवन है। और हर बार उत्तर आया।
अब मधुसूदन सरस्वती की एक और बात, जो बहुत काम की है। वे कहते हैं, इस सूची में जिज्ञासु को बीच में क्यों रखा गया, आर्त और अर्थार्थी के बीच? क्योंकि आर्त भी और अर्थार्थी भी, भगवान के पास आते-आते धीरे-धीरे जिज्ञासु बन जाते हैं। जो पहले दुःख लेकर आया था, वह कुछ दिन बाद पूछने लगता है, "यह दुःख आता क्यों है? आप हैं कौन?" यानी पुकार एक दरवाज़ा है। उसके भीतर एक पूरा घर है।
और "भरतर्षभ", भरतवंश में श्रेष्ठ, इस सम्बोधन पर मधुसूदन एक बहुत अपनेपन वाली बात कहते हैं, मानो श्रीकृष्ण कह रहे हों: अर्जुन, तुम यह चिन्ता मत करना कि मैं किस प्रकार का भक्त हूँ। यह बात आपके लिए भी है। आप आर्त हैं या अर्थार्थी, इसका हिसाब मत लगाइए। आप उनकी ओर मुड़े हैं, इतना काफ़ी है।
अब सत्रहवाँ श्लोक। "तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते।" इन चारों में नित्य मुझमें लगा हुआ, एक ही भक्ति वाला ज्ञानी श्रेष्ठ है। "प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः।" क्योंकि ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ, और वह मुझे प्रिय है।
दो शब्द देखिए। "नित्ययुक्त", सदा जुड़ा हुआ, और "एकभक्ति", एक की ही भक्ति। नीलकण्ठ इन्हें एक बहुत सच्चे चित्र से समझाते हैं। वे कहते हैं, बाकी तीन की भक्ति अपनी-अपनी इच्छा के साथ बँटी रहती है: बीमार आदमी रोग के लिए सूर्य को पूजता है, विद्या चाहने वाला सरस्वती को, धन चाहने वाला कुबेर को। और जब इच्छा पूरी हो जाती है, तो जुड़ना भी ढीला पड़ जाता है। ज्ञानी की कोई ऐसी इच्छा ही नहीं जो पूरी होकर ख़त्म हो जाए। वह भगवान को किसी चीज़ के लिए नहीं, भगवान के लिए चाहता है। इसलिए वह नित्ययुक्त है।
और "प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं" में जो "अत्यन्त" का भाव है, उस पर रामानुज एक बहुत प्यारी बात कहते हैं। वे कहते हैं, यहाँ "अत्यन्त" का अर्थ है ऐसा, जिसे कहा ही न जा सके। ज्ञानी को मैं कितना प्रिय हूँ, यह मैं, जो सब जानता हूँ और सब कर सकता हूँ, वह भी नहीं बता सकता, क्योंकि उस प्रेम की कोई सीमा नहीं। भगवान अपनी सर्वज्ञता की सीमा कहाँ मानते हैं? केवल एक जगह: भक्त के प्रेम को नापने में।
और "स च मम प्रियः", वह भी मुझे प्रिय है। यह प्रेम एक तरफ़ा नहीं है। चौथे अध्याय में श्रीकृष्ण कह चुके हैं कि जो मुझे जिस भाव से भजता है, मैं उसे उसी भाव से भजता हूँ। मधुसूदन सरस्वती यहाँ वही बात याद दिलाते हैं: जिसकी जैसी प्रीति मुझमें, मेरी वैसी प्रीति उसमें।
पर अब एक प्रश्न उठता है, और यह प्रश्न शायद आपके मन में भी उठा होगा। अगर ज्ञानी इतना प्रिय है, तो बाकी तीन? क्या आर्त, जिज्ञासु और अर्थार्थी भगवान को कम प्रिय हैं? क्या द्रौपदी की वह पुकार दूसरे दर्जे की भक्ति थी? इसका उत्तर अठारहवें श्लोक में है।
"उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।" ये सभी उदार हैं, पर ज्ञानी तो मेरा आत्मा ही है, ऐसा मेरा मत है। "आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्।" क्योंकि मुझमें लगे मन वाला वह सबसे ऊँची गति रूप मुझमें ही टिका है।
"उदाराः सर्व एवैते", ये सभी उदार हैं। सबसे पहला शब्द यही है। शंकराचार्य इसे साफ़ कहते हैं: ये तीनों भी मुझे प्रिय ही हैं, मेरा कोई भक्त मुझे अप्रिय नहीं होता। बस ज्ञानी के लिए "अत्यन्त" जुड़ गया है। हमारी टीका बताती है कि इन्हें उदार क्यों कहा गया: क्योंकि वे जो भी चाहते हैं, उसके लिए कहीं और नहीं, भगवान की ओर ही जाते हैं।
अभिनवगुप्त इसमें एक बहुत गहरी बात जोड़ते हैं। वे कहते हैं, संसार में ज़्यादातर लोग अपना दुःख दूर करने या धन पाने के लिए किसके आगे हाथ फैलाते हैं? अपने ही जैसे लोगों के आगे, जिनके वैसे ही हाथ, पैर और पेट हैं, या अपने से भी छोटे लोगों के आगे। जो आदमी माँगने के लिए भी भगवान का दरवाज़ा चुनता है, उसका मन छोटा नहीं, बड़ा है। इसलिए वह उदार है।
और विश्वनाथ चक्रवर्ती और बलदेव विद्याभूषण, दोनों एक ऐसी बात कहते हैं जिसे सुनकर मन ठहर जाता है। "उदार" का एक अर्थ है देने वाला। वे पूछते हैं, ये माँगने वाले भक्त भगवान को क्या देते हैं? और उत्तर देते हैं: भगवान कुछ देना चाहते हैं, और ये आकर उनसे ले लेते हैं। तो ये भगवान को देने का सुख देते हैं, भक्त पर स्नेह लुटाने का अवसर देते हैं। जब आप दुःख में उन्हें पुकारते हैं, तो आप केवल माँग नहीं रहे होते। आप उन्हें माँ बनने का मौक़ा दे रहे होते हैं।
और ज्ञानी के लिए श्रीकृष्ण कहते हैं, "ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्", वह तो मेरा आत्मा ही है। इसे समझाने के लिए संत ज्ञानेश्वर एक ऐसा चित्र देते हैं जो किसी भी गाँव के आदमी को तुरंत समझ आ जाए। वे कहते हैं, दूध की आशा में सारा संसार गाय के गले में रस्सी डालता है। पर बछड़े को कौन-सी रस्सी चाहिए? वह तन, मन, प्राण से और कुछ जानता ही नहीं। जिसे देखता है, उससे बस यही कहता है, "यह मेरी माँ है।" और इसलिए गाय भी उस पर वैसा ही प्रेम उँडेलती है। बाकी सब दूध के लिए आते हैं, और उन्हें दूध मिलता भी है। बछड़ा माँ के लिए आता है।
आप सोचिए, एक माँ के दो बच्चे। एक तभी दौड़कर आता है जब घुटना छिल जाए। दूसरा बस आकर गोद में बैठ जाता है, उसे कुछ नहीं चाहिए। क्या माँ पहले को दुत्कार देती है? नहीं। वह घुटने पर दवा लगाती है, आँसू पोंछती है। पर उसका मन जानता है कि दूसरा बच्चा उसका अपना ही एक हिस्सा बन चुका है। यही इस श्लोक की बात है। सब उदार हैं। ज्ञानी आत्मा है।
पर अभी एक बात बाकी है। ऐसा ज्ञानी बनता कैसे है, और कब बनता है? और जो लोग भगवान को छोड़कर दूसरे दरवाज़ों पर जाते हैं, उनके साथ भगवान क्या करते हैं? उत्तर बड़ा चौंकाने वाला है। आइए, अगले तीन श्लोक सुनते हैं।
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते ।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥ १९ ॥
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ॥ २० ॥
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति ।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥ २१ ॥
"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।" बहुत जन्मों के अन्त में ज्ञानवान् मेरी शरण लेता है। कैसे? "वासुदेवः सर्वमिति", यह जानकर कि वासुदेव ही सब कुछ हैं। "स महात्मा सुदुर्लभः", ऐसा महात्मा बहुत ही दुर्लभ है।
"बहुत जन्मों के अन्त में।" श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती, दोनों इसका अर्थ एक ही तरह करते हैं: हर जन्म में थोड़ा-थोड़ा पुण्य जुड़ता है, जैसे बूँद-बूँद से घड़ा भरता है, और फिर किसी आख़िरी जन्म में वह ज्ञान पक जाता है। यह बात डराने वाली नहीं, भरोसा देने वाली है। आपने आज तक जो भी थोड़ा-बहुत किया, जो पुकारा, जो पूछा, जो सुना, वह कहीं गया नहीं। बीसवें सत्संग में, छठे अध्याय के अन्त में, यही तो सुना था कि भलाई का कोई कदम व्यर्थ नहीं जाता। यहाँ वही बात जन्मों की लम्बाई में कही जा रही है।
और "वासुदेवः सर्वमिति", यह इस अध्याय का सबसे ऊँचा वाक्य है। संत ज्ञानेश्वर कहते हैं, ऐसा भक्त जिधर देखता है, उसे मैं ही दिखता हूँ, और अगर आँख बन्द करके चुप बैठ जाए, तब भी मैं ही। जैसे कोई घड़ा तालाब में डूबा हो, तो पानी उसके भीतर भी है और बाहर भी। और रामानुज इस वाक्य का एक बहुत मीठा अर्थ करते हैं। वे कहते हैं, "वासुदेव ही सब कुछ हैं" का अर्थ है: मेरी मंज़िल भी वही, मंज़िल तक पहुँचाने वाला रास्ता भी वही, और मन में जो कोई भी और इच्छा हो, वह भी वही। जिस दिन किसी के लिए भगवान ही लक्ष्य, भगवान ही साधन और भगवान ही हर चाह बन जाएँ, उस दिन वह महात्मा है।
और "सुदुर्लभः" सुनकर पिछले सत्संग का वह श्लोक याद आता है, "मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये"। हज़ारों में कोई एक। शंकराचार्य यहाँ ठीक वही श्लोक याद दिलाते हैं।
और अब, आगे बढ़ने से पहले, एक छोटी-सी बात आपसे कहना चाहता हूँ। अभी तक हमने वे भक्त देखे जो भगवान की ओर आते हैं। अगले ही श्लोक से श्रीकृष्ण उन लोगों की बात करेंगे जो किसी और दरवाज़े पर जाते हैं, और उनकी बात सुनकर कोई सोच सकता है कि भगवान उनसे नाराज़ हैं। पर ऐसा नहीं है, और यह बात दो श्लोक बाद खुलती है। आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। तो अगर आप यह सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की यह यात्रा बीच में न छूटे। और आज का यह सत्संग आख़िर तक सुनिए, क्योंकि आज का सबसे बड़ा भरोसा अभी आना बाकी है।
अब "स महात्मा सुदुर्लभः" को मैं महाभारत की एक रात में रखना चाहता हूँ। तेरहवें सत्संग में आपने सुना था कि युद्ध के दिनों में एक रात दुर्योधन ने भीष्म से पूछा था, पाण्डव किसके सहारे जीत रहे हैं, और भीष्म ने उसे ब्रह्मा की वह पुरानी स्तुति सुनाई थी, जिसमें वासुदेव से धरती पर जन्म लेने की प्रार्थना की गई थी। यह भी सञ्जय ही धृतराष्ट्र को सुना रहे हैं।
उस रात की बात का अन्त अभी तक हमने नहीं सुना। भीष्म आगे कहते हैं, वासुदेव सब देवताओं के देवता हैं, कमलनयन से ऊँचा कोई नहीं। और फिर एक वाक्य, जो इस श्लोक की सीधी तस्वीर है: युधिष्ठिर ने उन्हें ठीक-ठीक जानकर, पूरे मन से, उन महात्मा केशव की शरण ली है। जानकर, फिर शरण। "ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।"
फिर भीष्म ऋषियों की वह पुरानी स्तुति सुनाते हैं, जिसमें द्वैपायन व्यास कहते हैं, "वसुओं में तुम वासुदेव हो", और अन्त में दुर्योधन से कहते हैं, "बेटा, मैंने तुम्हें केशव का सच्चा स्वरूप विस्तार से भी बता दिया और संक्षेप में भी। प्रसन्न मन से केशव को भजो।"
और अब सुनिए, सञ्जय बताते हैं कि दुर्योधन ने क्या किया। यह पवित्र कथा सुनकर उसने केशव का बहुत आदर किया, और महारथी पाण्डवों का भी। भीष्म ने उससे फिर कहा कि पाण्डवों से शान्ति कर लो, भाइयों के साथ मिलकर पृथ्वी का भोग करो। फिर भीष्म चुप हो गए। और दुर्योधन ने उन्हें प्रणाम किया, अपने डेरे में गया, और उस रात सफ़ेद शय्या पर सो गया।
बस। सुना, आदर किया, प्रणाम किया, और सो गया। अगली सुबह फिर वही युद्ध। सोचिए, किसे इससे अच्छा अवसर मिलेगा? भीष्म जैसे वक्ता, सीधी, साफ़ बात, और सुनने वाले के मन में आदर भी जागा। फिर भी शरण नहीं। यही "सुदुर्लभः" है। सुनने वाले हज़ार हैं, आदर करने वाले सौ, पर जानकर पूरे मन से शरण लेने वाला कोई एक, कोई युधिष्ठिर। और यह बात हमें छोटा करने के लिए नहीं है। यह याद दिलाने के लिए है कि सुनना पहला कदम है, आख़िरी नहीं। जो आज आप सुन रहे हैं, उसे किसी रात "सफ़ेद शय्या पर सो जाने" जैसा मत होने दीजिए।
अब बीसवाँ श्लोक, और यहाँ से अध्याय मुड़ता है। "कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः।" उन-उन कामनाओं से जिनका ज्ञान हर लिया गया है, वे दूसरे देवताओं की शरण लेते हैं। "तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया।" अपने स्वभाव से प्रेरित होकर, उस-उस नियम का पालन करते हुए।
"हृतज्ञानाः", जिनका ज्ञान हर लिया गया। पंद्रहवें श्लोक में माया ने ज्ञान हरा था; यहाँ कामनाएँ हर रही हैं। शंकराचार्य बताते हैं, कौन-सी कामनाएँ: पुत्र की, पशुओं की, स्वर्ग की। श्रीधर स्वामी सूची में दो और जोड़ते हैं: कीर्ति की, और शत्रु पर जीत की। विश्वनाथ चक्रवर्ती और बलदेव इसका एक बहुत व्यावहारिक कारण बताते हैं: आदमी सोचता है, यह काम तो फ़लाँ जगह जल्दी हो जाएगा, वहाँ जल्दी सुनवाई होती है। जल्दी की चाह विवेक को ढक देती है।
"तं तं नियममास्थाय", उस-उस नियम का पालन करके। नीलकण्ठ उदाहरण देते हैं, जैसे चतुर्दशी का उपवास। यानी ये लोग आलसी नहीं हैं। ये व्रत रखते हैं, नियम निभाते हैं, कष्ट सहते हैं। और "प्रकृत्या नियताः स्वया", अपने स्वभाव से बँधे हुए; शंकराचार्य कहते हैं, पिछले जन्मों के संस्कारों से।
और यहाँ मैं एक बात साफ़ कर दूँ, क्योंकि इस श्लोक को अक्सर ग़लत समझा जाता है। यह श्लोक किसी देवता को छोटा नहीं बता रहा। आचार्यों में यहाँ मतभेद भी है: श्रीधर और मधुसूदन यहाँ छोटे देवताओं की बात मानते हैं, रामानुज कहते हैं कि इन्द्र आदि सब देवता उन्हीं परमात्मा का शरीर हैं। पर एक बात पर सब एक हैं: यहाँ प्रश्न देवता का नहीं, मन का है, उन कामनाओं का जिनसे ज्ञान हर लिया गया। कौन किसे पूज रहा है, इससे ज़्यादा यहाँ यह देखा जा रहा है कि किस चाह से पूज रहा है।
इसे समझाने के लिए महाभारत में एक आदमी है, जिसकी कहानी इसी श्लोक की तरह चलती है। सिन्धु का राजा जयद्रथ, धृतराष्ट्र का दामाद। वनवास के दिनों में उसने द्रौपदी का हरण करने की कोशिश की थी। भीम और अर्जुन ने उसका पीछा किया, भीम ने उसे बालों से पकड़ लिया, उसका सिर मूँड़कर पाँच चोटियाँ छोड़ दीं, और युधिष्ठिर ने दया करके उसे छोड़ दिया, यह कहकर कि जाओ, अब कभी ऐसा मत करना।
वन पर्व कहता है, लज्जा से, थोड़ा मुँह नीचे किए, चुपचाप वह चला गया, और दुःख से पीड़ित होकर गङ्गाद्वार पहुँचा। वहाँ उसने उमापति, तीन नेत्रों वाले शिव की शरण ली, और बहुत बड़ी तपस्या की। और युद्ध के समय, द्रोण पर्व में, धृतराष्ट्र ख़ुद सञ्जय से पूछते हैं, ठीक इसी श्लोक का प्रश्न: "उसने क्या जपा, क्या होम किया, कौन-सा तप किया? उसने किस देवता की आराधना की, विष्णु की, ईशान की, या कमल से जन्मे ब्रह्मा की?" और सञ्जय बताते हैं: उसने इन्द्रियों को उनके प्रिय विषयों से हटा लिया, भूख, प्यास और धूप सही, इतना दुबला हो गया कि उसकी नसें उभर आईं, और वेद जपते हुए शिव की आराधना की।
अब इस तप को बीसवें श्लोक के सामने रखकर देखिए। "तं तं नियममास्थाय", नियम पूरा है, कष्ट पूरा है, तप सच्चा है। पर तप के पीछे चाह क्या है? सञ्जय के शब्द हैं, उस अपमान से, भीम से हारने के उस अपमान से, वर चाहते हुए। "कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः।" जिसे बदले की आग ने घेर रखा हो, उसका ज्ञान कहाँ बचेगा? उसने उस युधिष्ठिर से बदला लेना चाहा, जिसने उसे दया से छोड़ा था।
पर अब इक्कीसवाँ श्लोक सुनिए, जो मुझे इस अध्याय का सबसे उदार श्लोक लगता है। "यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति।" जो-जो भक्त जिस-जिस रूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, "तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्", उस-उस भक्त की उसी श्रद्धा को मैं अचल कर देता हूँ।
रुकिए, और इसे दोबारा सुनिए। भगवान यह नहीं कह रहे कि जो दूसरे रूप को पूजता है, मैं उसकी श्रद्धा तोड़ दूँगा, उसे भटका दूँगा, उसे सज़ा दूँगा। वे कह रहे हैं, उसकी उसी श्रद्धा को मैं अचल करता हूँ, उसे टिकाऊ बनाता हूँ। श्रीधर स्वामी कहते हैं, यह मैं अन्तर्यामी बनकर करता हूँ, सबके भीतर बैठा हुआ। और विश्वनाथ चक्रवर्ती एक बहुत बारीक बात कहते हैं: देवता तो अपने ही प्रति श्रद्धा भी पैदा नहीं कर सकते; वह श्रद्धा भी मैं ही देता हूँ। रामानुज इसे और कोमल बना देते हैं। वे कहते हैं, वह आदमी भले न जानता हो कि इन्द्र आदि देवता मेरा ही शरीर हैं, फिर भी मैं जानता हूँ कि उसकी श्रद्धा अन्त में मेरी ही ओर है, इसलिए मैं उसकी राह की रुकावटें हटा देता हूँ।
सोचिए, कितना बड़ा मन है यह। जैसे कोई पिता देखे कि उसका बच्चा किसी और बड़े को बहुत मानता है, उनकी हर बात सुनता है, और पिता उससे जलता नहीं, बल्कि बच्चे से कहता है, "हाँ, उनकी बात मानो, अच्छा करते हो।" भगवान में ईर्ष्या नहीं है। जहाँ भी सच्ची श्रद्धा है, वे उसे मज़बूत करते हैं।
और जयद्रथ की श्रद्धा भी, अपनी चाह के साथ, सच्ची थी। उसका तप भी सच्चा था। इसलिए शिव प्रसन्न हुए, उन्होंने स्वयं उसकी भेंट स्वीकार की, और कहा, "वर माँगो।"
पर अभी एक बात बाकी है। वर तो मिला। पर वह वर दिया किसने, और उसकी सीमा किसने तय की? और जो वर मिला, वह कितने दिन चला? इसका उत्तर अगले श्लोक में है, और जयद्रथ की कहानी के अन्त में भी। आइए, सुनते हैं।
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥ २२ ॥
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् ।
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥ २३ ॥
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥ २४ ॥
"स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते।" उस श्रद्धा से युक्त होकर वह उस रूप की आराधना करता है। "लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्।" और उससे अपने चाहे हुए भोग पाता है, पर वे भोग मेरे द्वारा ही दिए जाते हैं।
"मयैव विहितान्", मेरे ही द्वारा रचे हुए। श्रीधर स्वामी कहते हैं, फल देवता से ही मिलता है, पर उस देवता के भीतर बैठा अन्तर्यामी मैं हूँ, और देवता भी मेरे अधीन हैं। नीलकण्ठ कहते हैं, इससे यह दिखाया गया कि सब देवता उन्हीं की आज्ञा में चलते हैं। और संत ज्ञानेश्वर बहुत सरल शब्दों में कहते हैं: जो जैसा सोचता है, वैसा फल पाता है, पर वह सब निकलता मुझसे ही है।
और इस श्लोक के आख़िरी शब्द "विहितान्हि तान्" में शंकराचार्य एक बारीक बात पकड़ते हैं। कोई इसे "हितान्" पढ़ सकता है, यानी हितकारी भोग। शंकराचार्य कहते हैं, ऐसा पढ़ें तो उसे केवल कहने भर का समझिए, क्योंकि कामनाएँ किसी का सच्चा हित नहीं करतीं। मधुसूदन सरस्वती भी यही कहते हैं: वे हित जैसे दिखते हैं, होते नहीं। जो माँगा, वह मिल गया, पर मिलना और भला होना, दो अलग बातें हैं।
अब जयद्रथ के पास लौटिए, जहाँ हमने उसे छोड़ा था। शिव प्रसन्न हैं। वह माँगता है, "मैं युद्ध में पाँचों पाण्डवों को उनके रथों सहित एक साथ जीत लूँ।" और वन पर्व कहता है, देव ने उससे कहा, "नहीं।"
फिर शिव जो कहते हैं, वह इस श्लोक का जीता-जागता अर्थ है। वे कहते हैं, उन्हें न जीता जा सकता है, न मारा जा सकता है, पर तुम युद्ध में उन्हें रोक लोगे, महाबाहु अर्जुन को छोड़कर। क्योंकि अर्जुन नर हैं, उन्होंने बदरी में तप किया है, और नारायण उनके सहायक हैं। फिर शिव, जिनकी जयद्रथ ने आराधना की थी, उसे नारायण के बारे में बताते हैं: "देवों के देव विष्णु हैं, अनन्त आत्मा, सबकी आत्मा, और विश्व उनका रूप है।" वे वराह की, नरसिंह की, वामन की कथा सुनाते हैं, और कहते हैं कि वही विष्णु यदुओं के घर में कृष्ण बनकर जन्मे हैं, और अर्जुन के साथ एक ही रथ पर चढ़ते हैं। और अन्त में वर: "पार्थ को छोड़कर, तुम चारों पाण्डवों को एक दिन के लिए रोक लोगे। यही वर मैं तुम्हें देता हूँ।"
देखिए, कितनी सुंदर बात है। जिस देवता के पास जयद्रथ गया था, उसी देवता ने उसे वर की सीमा भी बताई, और यह भी बताया कि वह सीमा कहाँ खिंचती है: जहाँ नारायण खड़े हैं। और उसी बातचीत में शिव कहते हैं कि अर्जुन को दिव्य पाशुपत अस्त्र मैंने ही दिया है। यानी देवता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। शिव ही विष्णु की महिमा गा रहे हैं। "मयैव विहितान्हि तान्", फल देवता के हाथ से आता है, पर उसकी लम्बाई-चौड़ाई कहीं और तय होती है।
अब तेईसवाँ श्लोक। "अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्।" परन्तु उन थोड़ी समझ वालों का वह फल नाशवान् होता है। "देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि।" देवताओं को पूजने वाले देवताओं तक पहुँचते हैं, मेरे भक्त मुझ तक भी पहुँचते हैं।
हमारी टीका इसका सार दो वाक्यों में कहती है, जो मुझे बहुत साफ़ लगते हैं: दोनों में परिश्रम एक-सा है, केवल लक्ष्य अलग है। और नाशवान् वस्तु माँगने पर नाशवान् फल ही मिलता है। शंकराचार्य इस श्लोक में भगवान का एक भाव देखते हैं: करुणा। वे कहते हैं, यहाँ भगवान मानो दुःख से कह रहे हैं, "अरे, मेहनत उतनी ही, फिर भी ये अनन्त फल के लिए मेरी ओर नहीं आते। कितना कष्ट है।" यह डाँट नहीं, एक पिता की आह है।
और जयद्रथ का वह "एक दिन" कौन-सा दिन था? द्रोण पर्व बताता है। वह दिन, जब अर्जुन का किशोर पुत्र अभिमन्यु द्रोण के व्यूह को तोड़कर भीतर घुस गया था। युधिष्ठिर, भीम और सब योद्धा उसकी रक्षा के लिए उसके पीछे दौड़े। और तब सिन्धुराज ने, सञ्जय के शब्दों में, उस वरदान के बल से, अकेले ही उन सबको रोक दिया, और व्यूह में अभिमन्यु के खोले हुए रास्ते को बाणों से भर दिया। उस दिन क्या हुआ, अभिमन्यु के लिए पिता और ताऊ का विलाप, यह पाँचवें सत्संग में आपने सुना था। मैं उसे दोहराऊँगा नहीं।
पर वरदान का फल कितना चला? एक दिन। अगले ही दिन अर्जुन ने प्रतिज्ञा पूरी की, और सूर्य डूबने से पहले उनके बाण से जयद्रथ का सिर कट गया। द्रोण पर्व कहता है, वह सिर जाकर उसके बूढ़े पिता की गोद में गिरा। नसें उभर आने तक का तप, और फल? एक दिन का, और उसके बाद सब समाप्त। "अन्तवत्तु फलं।" बदले की चाह ने जो माँगा, वह मिल गया, और जिसने माँगा, उसी को खा गया।
अब "मद्भक्ता यान्ति मामपि" के छोटे-से शब्द "अपि", यानी "भी", पर मधुसूदन सरस्वती की बात सुनिए। वे कहते हैं, मेरे जो भक्त कुछ माँगते हुए आते हैं, आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी, वे पहले मेरी कृपा से अपनी चाही चीज़ पाते हैं, और फिर, धीरे-धीरे, मुझे भी पा लेते हैं। यह आज की सबसे बड़ी तसल्ली है। अगर आप भगवान के पास कुछ माँगने गए थे, तो डरिए मत। माँगी हुई चीज़ भी मिल सकती है, और साथ में देने वाला भी। दूसरी जगह चीज़ मिलती है। यहाँ चीज़ के साथ भगवान भी मिलते हैं।
और यह बात आपको पहले सत्संग से याद होगी। द्वारका में एक तरफ़ दस करोड़ ग्वालों की नारायणी सेना थी, दूसरी तरफ़ निहत्थे श्रीकृष्ण। दुर्योधन ने सेना ली, अर्जुन ने कृष्ण को। दुर्योधन का वह सारा बल, सेना पर सेना, कुरुक्षेत्र में खप गया; वह फल अन्तवान् था। और अर्जुन के पास जो था, वह आज इस रथ पर बैठकर गीता कह रहा है। "मद्भक्ता यान्ति मामपि।"
पर अब एक प्रश्न अपने आप उठता है, और अगला श्लोक उसी का उत्तर है। अगर मेहनत एक-सी है, और भगवान के पास फल भी बड़ा है, तो सब लोग सीधे उन्हीं के पास क्यों नहीं जाते? "अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः।" बुद्धि से रहित लोग मुझ अव्यक्त को व्यक्त हुआ मानते हैं। "परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्।" मेरे अविनाशी, सबसे ऊँचे परम भाव को न जानते हुए।
हमारी टीका इसे सीधे कहती है: वे उन्हें अपने जैसा साधारण आदमी मानते हैं, जो जन्मा है और मरेगा। और रामानुज इसके पीछे की एक बहुत कोमल बात बताते हैं। वे कहते हैं, भगवान परम करुणा से, अपने आश्रितों के प्रेम में, वसुदेव के पुत्र बनकर इसीलिए आए कि सब लोग उन तक पहुँच सकें। पर मूर्ख लोग उन्हें किसी साधारण राजकुमार जैसा, कर्म के कारण जन्मा हुआ मान लेते हैं, और इसीलिए उनकी शरण नहीं लेते। यानी जो रूप पास आने के लिए धरा गया था, वही न पहचानने का कारण बन गया। श्रीधर स्वामी जोड़ते हैं, इसीलिए वे उनका बहुत आदर नहीं करते, और जल्दी फल देने वाले दूसरे दरवाज़े खोजते हैं।
तेरहवें सत्संग में आपने सुना था कि ब्रह्मा ने देवताओं को सावधान किया था: इन्हें "यह मनुष्य है" सोचकर इनका अपमान मत करना। यह श्लोक उसी बात का कारण बताता है।
और इसके लिए किसी दूर की कहानी की ज़रूरत नहीं। घर में जो सबसे पास होता है, उसकी कीमत सबसे बाद में समझ आती है। माँ रोज़ खाना बनाती है, तो वह "बस माँ" है; जिस दिन वह नहीं रहती, उस दिन समझ आता है कि वह क्या थी। संत ज्ञानेश्वर इसे एक चुभते हुए चित्र में कहते हैं: अमृत के समुद्र में डूबा हुआ आदमी मुँह भींच ले, और मन में गड्ढे के पानी को याद करता रहे। भगवान सारथी बनकर सामने बैठे हों, और हम उन्हें बस सारथी समझें।
पर अभी एक बात बाकी है। अगर भगवान इतने पास हैं, तो सबको दिखते क्यों नहीं? अगले श्लोक में श्रीकृष्ण ख़ुद बताएँगे कि वे ढके हुए हैं, और किस चीज़ से ढके हुए हैं। और फिर एक ऐसी बात कहेंगे, जो एक माँ के आँसुओं के बीच सच हुई थी। आइए, सुनते हैं।
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ।
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥ २५ ॥
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ।
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥ २६ ॥
"नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः।" अपनी योगमाया से ढका हुआ मैं सबके सामने प्रकट नहीं होता। "मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्।" यह मोहित संसार मुझ अजन्मा और अविनाशी को नहीं जानता।
शंकराचार्य "सर्वस्य" पर रुकते हैं: सबके लिए प्रकट नहीं, यानी कुछ के लिए हैं, अपने भक्तों के लिए। और वे एक बहुत समझदारी की बात जोड़ते हैं: यह योगमाया मेरी अपनी है, इसलिए यह मेरा ज्ञान नहीं ढकती, जैसे जादूगर अपने ही जादू से नहीं ठगा जाता। विश्वनाथ चक्रवर्ती इसके लिए एक बहुत सुंदर उपमा देते हैं। सूर्य आकाश में सदा चमकता है, फिर भी हर जगह से हर समय नहीं दिखता, क्योंकि बीच में पर्वत आ जाता है। सूर्य कहीं गया नहीं, बस बीच में ओट है। भगवान भी वैसे ही, योगमाया की ओट में।
और मधुसूदन सरस्वती "योगमाया" के "योग" का अर्थ करते हैं, भगवान का अपना संकल्प। यानी यह पर्दा किसी और ने नहीं डाला, उन्होंने ख़ुद रखा है, उनके लिए जो उनकी ओर पीठ किए खड़े हैं। और जिसका पर्दा है, खोलने की डोरी भी उसी के हाथ में है। इसलिए रास्ता पर्दे से लड़ना नहीं, पर्दे वाले से कहना है: "मुझे दिखाइए।" वही बात जो चौदहवें श्लोक में कही थी, जो शरण लेता है, वह पार हो जाता है।
और संत ज्ञानेश्वर कहते हैं, ये लोग योगमाया के पर्दे से अन्धे हो गए हैं, इसलिए मुझे नहीं देखते। वरना बताओ, कौन-सी चीज़ है जिसमें मैं नहीं? क्या कोई पानी है, जिसमें रस न हो? पिछले सत्संग का "रसोऽहमप्सु" याद है? पानी पीते हैं, स्वाद लेते हैं, पर स्वाद में जो है, उसे नहीं पहचानते। यही ओट है।
अब छब्बीसवाँ श्लोक। "वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन।" हे अर्जुन, जो प्राणी बीत चुके, जो अभी हैं, "भविष्याणि च भूतानि", और जो आगे होंगे, उन सबको मैं जानता हूँ। "मां तु वेद न कश्चन।" पर मुझे कोई नहीं जानता।
हमारी टीका बताती है, यहाँ "कोई नहीं" का अर्थ है वह कोई नहीं जिसने उनकी शरण नहीं ली, जैसा चौदहवें श्लोक में कहा गया था। शंकराचार्य भी यही कहते हैं: मेरे शरणागत भक्त को छोड़कर। और श्रीधर स्वामी इसमें पिछले श्लोक की बात जोड़ते हैं: माया अपने स्वामी को मोहित नहीं करती, दूसरों को करती है। इसलिए वे तीनों काल देखते हैं, और हम उन्हें नहीं देख पाते।
"भविष्याणि च", जो आगे होगा, वह भी मैं जानता हूँ। इस शब्द को मैं महाभारत के एक ऐसे क्षण में रखना चाहता हूँ, जिसे सुनाना आसान नहीं है। यह स्त्री पर्व में है, युद्ध के बाद। कुरुक्षेत्र की भूमि पर गान्धारी खड़ी हैं, वे माँ जिनके सौ पुत्र गिर चुके हैं, और श्रीकृष्ण उनके साथ हैं। गान्धारी उन्हें एक-एक करके मरे हुए वीर दिखाती हैं, और फिर कहती हैं, "हे कृष्ण, आपके साथ रहने से ही सब पाण्डव अवध्य रहे। भीष्म, द्रोण, कर्ण से बच गए।" फिर कहती हैं, "मेरे पुत्र तो उसी दिन मर गए थे, जिस दिन आप अपना काम पूरा हुए बिना लौट गए थे। तभी भीष्म और विदुर ने मुझसे कहा था, अपने पुत्रों पर इतना स्नेह मत करो।"
और फिर, पाठ कहता है, शोक से बेसुध होकर वे धरती पर गिर पड़ीं। उठीं, तो क्रोध से भरी थीं। और उन्होंने श्रीकृष्ण से कहा, "आप समर्थ थे, आपकी बात सुनी जाती थी, फिर भी आपने कुरुओं और पाण्डवों को आपस में नष्ट होते देखा और उपेक्षा की।" और पति की सेवा से जो थोड़ा-सा तप उन्होंने जीवन भर में कमाया था, उसी तप से उन्होंने श्रीकृष्ण को शाप दिया: जैसे आपके देखते मेरे बन्धु आपस में कटे, वैसे ही छत्तीसवें वर्ष में आपके बन्धु भी आपस में कटेंगे, और आप भी अकेले, वन में, अनाथ की तरह मृत्यु पाएँगे।
अब सुनिए, श्रीकृष्ण ने क्या किया। पाठ कहता है, वह भयंकर वचन सुनकर महामना वासुदेव मानो हल्का-सा मुस्कुराए, और गान्धारी से बोले: "हे क्षत्राणी, मैं जानता हूँ कि यह ऐसा ही होगा। आप वही कर रही हैं जो पहले ही हो चुका है।" "जानेऽहमेतदप्येवं।" मैं जानता हूँ।
"वेदाहं… भविष्याणि च।" जो आगे होना है, वह भी मैं जानता हूँ। श्रीकृष्ण ने न शाप लौटाया, न क्रोध किया, न अपनी सफ़ाई दी। एक माँ के टूटे हुए दिल से निकला शाप उन्होंने वैसे ही ले लिया, जैसे कोई पिता अपने रोते बच्चे की मुट्ठियों की मार ले लेता है। और सत्रहवें सत्संग में आपने सुना था कि बहुत बरस बाद, छत्तीसवें वर्ष में, सचमुच, सूने वन में, योग में लेटे श्रीकृष्ण के तलवे में एक शिकारी का बाण लगा। जो उन्होंने उस दिन कहा था, वही हुआ।
और अब इस दृश्य को "मां तु वेद न कश्चन" के साथ रखकर देखिए। गान्धारी उनकी शक्ति जानती थीं; उन्होंने ख़ुद कहा, आपके साथ होने से पाण्डव अवध्य थे, आप समर्थ थे। फिर भी, उस घड़ी, शोक के उस अँधेरे में, उन्होंने उन्हें एक ऐसे बलवान आदमी की तरह देखा जिसने चाहकर अनदेखी की। यही ओट है। शक्ति दिख जाती है, पर वे स्वयं, उनकी करुणा, उनका काल का पूरा हिसाब, शोक की आँखों से नहीं दिखता।
और फिर भी, ध्यान दीजिए, गान्धारी ने अपना सारा दुःख किसके सामने रखा? उन्हीं के सामने। श्रीकृष्ण ने उनसे उठने को कहा, और एक ऐसी बात कही जो हर शोक करने वाले के लिए है: "जो बीते हुए पर, मरे या खोए हुए पर शोक करता रहता है, वह दुःख से और दुःख पाता है, दो अनर्थ झेलता है।" और पाठ कहता है, गान्धारी चुप हो गईं।
यह कथा मैं आपको इसलिए सुना रहा हूँ, क्योंकि हम में से बहुत से लोग किसी बड़े दुःख के बाद भगवान से नाराज़ हो जाते हैं। "आप थे, तो ऐसा क्यों होने दिया?" और फिर उस नाराज़गी पर हमें अपराध-बोध होता है। गीता के ये दो श्लोक कहते हैं: वे सब जानते हैं, बीता भी, अभी का भी, आगे का भी। आपकी नाराज़गी भी उनसे छिपी नहीं, और उससे वे टूटते नहीं। जो भगवान से लड़ता भी है, वह भी उन्हीं से बात कर रहा है, किसी और से नहीं। दुःख में पुकारना भी भक्ति है, और दुःख में उलाहना देना भी उसी पुकार का एक रूप है।
पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने कहा, मुझे कोई नहीं जानता। तो वह कौन-सी चीज़ है जो जन्म से ही हमारी आँखों पर पट्टी बाँध देती है? और क्या उस पट्टी को उतारा जा सकता है? इसका उत्तर उसी गान्धारी के घर में, बहुत पहले, एक जन्म के दिन से शुरू होता है। आइए, अगले दो श्लोक सुनते हैं।
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत ।
सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥ २७ ॥
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥ २८ ॥
"इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत।" हे भारत, इच्छा और द्वेष से उठे द्वन्द्व के मोह से, "सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप", सब प्राणी, हे परन्तप, जन्म के समय से ही मोह में पड़ जाते हैं।
शंकराचार्य "द्वन्द्व" शब्द को खोलते हैं: इच्छा और द्वेष, जो सर्दी और गर्मी की तरह एक-दूसरे के उलटे हैं, जो अच्छा लगे उसकी चाह, जो बुरा लगे उससे चिढ़। और "सर्गे" का अर्थ वे करते हैं, जन्म के समय, पैदा होते ही। रामानुज बताते हैं कि यह जन्म के समय ही क्यों होता है: पिछले जन्मों में जिन चीज़ों से राग और द्वेष का अभ्यास किया, वही संस्कार जन्म लेते ही फिर सामने आ खड़े होते हैं। यानी हम खाली हाथ नहीं जन्मते। अपनी पसन्द-नापसन्द की पोटली साथ लेकर आते हैं।
संत ज्ञानेश्वर इसे एक छोटी-सी कहानी बना देते हैं। वे कहते हैं, इच्छा एक कन्या थी। बड़ी होकर कामना की जवानी में आई, और उसका ब्याह द्वेष से हुआ। उन दोनों से एक पुत्र जन्मा, जिसका नाम है द्वन्द्वमोह। और उस बच्चे को उसके दादा ने पाल-पोसकर बड़ा किया, जिसका नाम है अहंकार। परिवार का पूरा वंश-वृक्ष।
अब इस "सर्गे", जन्म के समय, को महाभारत में देखिए, क्योंकि वहाँ यह मोह सचमुच एक जन्म के कमरे से शुरू होता है। पिछले खंड में हमने गान्धारी को युद्ध के बाद देखा था। अब चलिए बहुत पीछे, आदि पर्व में, उस समय जब कोई युद्ध नहीं था, कोई सभा नहीं थी, कोई जुआ नहीं था।
गान्धारी गर्भवती हैं, और दूसरे वर्ष में भी उनका प्रसव नहीं हुआ। तभी उन्होंने सुना कि वन में कुन्ती को एक पुत्र हुआ है, उगते सूर्य जैसा तेजस्वी, युधिष्ठिर। पाठ कहता है, यह सुनकर उन्होंने अपने गर्भ की धीमी गति को कोसा, और शोक से बेसुध होकर, राजा को बताए बिना, अपने ही पेट पर ज़ोर से प्रहार किया। मांस का एक कठोर पिण्ड निकला। व्यास तुरन्त आए, और पूछा, "तुम यह क्या करना चाहती हो?" और गान्धारी ने सच कहा: "मैंने सुना कि कुन्ती का पुत्र पहले जन्मा है, और अत्यन्त दुःख से मैंने यह किया।" फिर व्यास ने उस पिण्ड को एक सौ एक भागों में बाँटकर घी के कुण्डों में रखवाया।
सोचिए। अभी कोई बच्चा पैदा भी नहीं हुआ, और घर में "किसका पहले" की होड़ आ बैठी है। "इच्छाद्वेषसमुत्थेन।"
और फिर, पाठ कहता है, जिस दिन भीम जन्मे, उससे पहले की रात दुर्योधन का जन्म हुआ। जन्म लेते ही वह गधे की तरह रेंका, सियार, गिद्ध और कौए चिल्लाने लगे, आँधियाँ चलीं। डरे हुए धृतराष्ट्र ने भीष्म, विदुर और ब्राह्मणों को बुलाया, और जो प्रश्न पूछा, वह सुनिए: "युधिष्ठिर हमारा सबसे बड़ा है, वह अपने गुणों से राज्य पा चुका है। पर यह, जो उसके बाद जन्मा है, क्या यह भी राजा होगा?" नवजात बच्चा अभी आँख भी नहीं खोल पाया, और पिता के मन में पहला प्रश्न राज्य का है। विदुर और ब्राह्मणों ने कहा, कुल की शान्ति के लिए इस एक को त्याग दीजिए; कुल के लिए एक को छोड़ा जाता है। और पाठ के शब्द हैं: पुत्र-स्नेह से बँधे राजा ने वैसा नहीं किया।
माँ के मन में ईर्ष्या, पिता के मन में चाह और मोह। यह मैं किसी को दोषी ठहराने के लिए नहीं कह रहा। यह इसलिए कह रहा हूँ कि यही तो इस श्लोक की बात है: "सर्वभूतानि", सब प्राणी। हर घर में किसी न किसी रूप में यह पोटली आती है। कुरुक्षेत्र का बीज उसी रात बोया गया था, जिस रात एक बच्चा पैदा हुआ।
पर "भारत" और "परन्तप", इन दो सम्बोधनों पर मधुसूदन सरस्वती की बात सुनिए। वे कहते हैं, श्रीकृष्ण मानो कह रहे हैं: अर्जुन, अपने कुल की महिमा से और अपनी शक्ति से, तुम्हें यह द्वन्द्वमोह नाम का शत्रु दबा नहीं सकता। यानी यह मोह सबको घेरता है, पर कोई इससे छूट नहीं सकता, ऐसा नहीं है। और अगला श्लोक ठीक यही कहता है।
"येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्।" परन्तु जिन पुण्य करने वाले लोगों का पाप अन्त पर आ गया है, "ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः", वे द्वन्द्व के मोह से छूटकर, दृढ़ व्रत वाले होकर, मुझे भजते हैं।
मधुसूदन सरस्वती इन दोनों श्लोकों का रिश्ता एक नियम और उसके अपवाद की तरह बताते हैं। नियम यह है कि सब मोह में पड़ते हैं। अपवाद यह है कि जिन्होंने पुण्य किया है, वे छूट जाते हैं। और फिर वे अपनी ओर से एक सीधी-सी सलाह जोड़ते हैं: इसलिए मन को शुद्ध करने वाले अच्छे कर्म सदा करते रहना चाहिए। और विश्वनाथ चक्रवर्ती "येषां त्वन्तगतं पापं" में एक बहुत भरोसा देने वाली बात देखते हैं। वे कहते हैं, इसका अर्थ यह नहीं कि पाप पूरी तरह मिट चुका है; अर्थ है, वह अन्त की ओर है, ढलान पर है। ऐसे लोग किसी भक्त के संयोग से, सत्संग से, भजन शुरू कर देते हैं। यानी आपको पहले पूरा पवित्र बनने की ज़रूरत नहीं। भजन उसी ढलान पर शुरू हो जाता है।
"दृढव्रताः", दृढ़ व्रत वाले। शंकराचार्य कहते हैं, जिनका निश्चय पक्का हो गया कि सत्य यही है, और कुछ नहीं। और संत ज्ञानेश्वर का चित्र है: एकनिष्ठा के सीधे कदमों से, शंकाओं के काँटों को कुचलते हुए चलने वाले।
और अब मैं आपको उसी घर में ले चलता हूँ, जिसकी बात अभी हो रही थी। आदि पर्व उसी अध्याय में बताता है कि जिस वर्ष धृतराष्ट्र के सौ पुत्र जन्मे, उसी वर्ष एक वैश्य स्त्री से उनका एक और पुत्र जन्मा, बुद्धिमान युयुत्सु। वही पिता, वही घर, वही समय।
और अब वह सुबह याद कीजिए, जब यह गीता कही जा रही थी। भीष्म पर्व बताता है कि गीता के ठीक बाद, उसी सुबह, युधिष्ठिर बड़ों से अनुमति लेकर लौटे, और श्रीकृष्ण कर्ण के पास गए। उन्होंने कहा, "जब तक भीष्म नहीं गिरते, तब तक हमारा पक्ष ले लो।" कर्ण ने मना कर दिया: "केशव, मैं दुर्योधन का भला चाहता हूँ, उसके लिए मैं अपने प्राण दे चुका हूँ।" बारहवें सत्संग में आपने उनकी ऐसी ही एक और बातचीत सुनी थी। फिर युधिष्ठिर ने सेना के बीच खड़े होकर पुकारा: "जो हमें चुनेगा, मैं उसे सहायक के रूप में चुनूँगा।"
और तब, पाठ कहता है, युयुत्सु ने उनकी ओर देखा, और प्रसन्न मन से बोले, "महाराज, यदि आप मुझे चुनें, तो मैं आपकी ओर से धृतराष्ट्र के पुत्रों से लड़ूँगा।" युधिष्ठिर ने कहा, "आओ, आओ। मैं तुम्हें चुनता हूँ। धृतराष्ट्र का वंश और उनके पितरों का पिण्डदान, मुझे तुममें ही दिखाई देता है।" और युयुत्सु, नगाड़ा बजवाकर, कौरवों को छोड़कर, पाण्डवों की सेना में चले गए।
सोचिए, कितना कठिन रहा होगा। सौ भाइयों को छोड़ना, पिता के पक्ष को छोड़ना, उस "मामकाः" को छोड़ना जिससे यह पूरी गीता शुरू हुई थी। जिस घर में जन्म के दिन से द्वन्द्वमोह बैठा था, उसी घर का एक बेटा उस मोह से निकलकर धर्म की ओर खड़ा हो गया। "ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता।" और वह फ़ैसला एक दिन का नहीं निकला। महाप्रस्थानिक पर्व बताता है कि बरसों बाद, जब पाण्डव अन्तिम यात्रा पर निकले, तो युधिष्ठिर ने सारा राज्य उन्हीं युयुत्सु को सौंपा। "दृढव्रताः।"
यह बात हमारे लिए है। आपके घर में भी पुराने झगड़े होंगे, विरासत में मिली नापसन्दगियाँ, "उस परिवार से हमारी नहीं बनती", "वे लोग ऐसे ही हैं"। गीता कहती है, यह जन्म से आता है, सबको आता है। पर उसी घर से कोई एक निकल सकता है। और वह आप हो सकते हैं।
पर अभी एक बात बाकी है। जो इस मोह से छूट जाते हैं, वे क्या जानते हैं? और जिस घड़ी से हर कोई डरता है, आख़िरी घड़ी, उस समय उनके साथ क्या होता है? अध्याय के अन्तिम दो श्लोक इसी के बारे में हैं, और इन्हीं में अगले अध्याय का बीज भी है। आइए, सुनते हैं।
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ।
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ॥ २९ ॥
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ।
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥ ३० ॥
"जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये।" जो मेरा आश्रय लेकर बुढ़ापे और मृत्यु से छूटने के लिए यत्न करते हैं, "ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्", वे उस ब्रह्म को, पूरे अध्यात्म को, और सारे कर्म को जान लेते हैं।
दो शब्द साथ-साथ आए हैं, और दोनों ज़रूरी हैं: "मामाश्रित्य", मेरा सहारा लेकर, और "यतन्ति", यत्न करते हैं। न केवल अपने बल पर, न केवल बैठकर प्रतीक्षा। सहारा भी, और कदम भी। विश्वनाथ चक्रवर्ती और बलदेव विद्याभूषण यहाँ एक नई बात देखते हैं। वे कहते हैं, यह भी एक तरह का माँगने वाला भक्त है, जो बस यही चाहता है कि जन्म, बुढ़ापे और मृत्यु का यह चक्र छूट जाए। और भगवान उसे भी लौटाते नहीं; उसे भी वह ज्ञान देते हैं। संत ज्ञानेश्वर कहते हैं, जिनके मन में यह चाह जाग गई कि जन्म-मरण की कहानी अब ख़त्म हो, उनका वही यत्न एक दिन पककर पूरे ब्रह्म का फल बन जाता है, ऐसा फल जिससे पूर्णता का रस टपकता है।
अब अध्याय का अन्तिम श्लोक। "साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः।" जो मुझे अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ के सहित जानते हैं, "प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः", वे मुझमें लगे चित्त वाले, मृत्यु के समय भी मुझे ही जानते हैं।
"प्रयाणकालेऽपि", जाने के समय भी। यह "भी" बहुत बड़ा है। श्रीधर स्वामी कहते हैं, ऐसे भक्त उस घड़ी में भी घबराकर मुझे भूलते नहीं। और मधुसूदन सरस्वती इसका कारण बताते हैं: जीवन भर का जुड़ाव मन पर ऐसे संस्कार छोड़ता है कि जब इन्द्रियाँ सबसे ज़्यादा बेचैन हों, तब भी, बिना किसी यत्न के, मेरी कृपा से, मन मेरी ही ओर रहता है।
और संत ज्ञानेश्वर यहाँ एक बहुत सच्ची बात कहते हैं। वे कहते हैं, जब आयु का धागा टूटता है, तो शरीर में कैसी उथल-पुथल होती है; जो देखता है, उसके मन में भी जैसे प्रलय आ जाता है। फिर भी, न जाने कैसे, जो मुझसे चिपक गए हैं, वे जाने की उस भागदौड़ में भी मुझे नहीं छोड़ते। आपको याद होगा, बीसवें सत्संग में, शरशय्या पर लेटे भीष्म भी हाथ जोड़कर उन्हीं का ध्यान कर रहे थे।
और अब एक बात पर ध्यान दीजिए। इन दो श्लोकों में श्रीकृष्ण ने सात शब्द रख दिए: ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव, अधियज्ञ, और प्रयाणकाल। और उन्हें समझाया नहीं। हमारी टीका साफ़ कहती है, ये शब्द यहाँ समझाए नहीं गए। संत ज्ञानेश्वर इस क्षण का एक बहुत प्यारा चित्र देते हैं। वे कहते हैं, ये शब्द अर्जुन के कानों में ऐसे गिरे जैसे कृपा की हवा से पेड़ के फल। अर्जुन उन्हें पकड़ने चले, तो लगा जैसे पानी में दिखते तारे हों: पास दिखते हैं, पर हाथ में नहीं आते। और तब वे फिर श्रीकृष्ण की ओर देखते हैं।
तो आज सातवाँ अध्याय पूरा हुआ। धागे में पिरोए मोतियों से हम चले थे, जल के रस से, सूर्य की धूप से, उस माया से जिसे केवल शरण से पार किया जाता है। और आज चार तरह के भक्त देखे: दुःख में पुकारने वाला, समझना चाहने वाला, कुछ माँगने वाला, और वह, जिसके लिए वासुदेव ही सब कुछ हैं। और सबके बारे में भगवान ने एक ही बात कही: "उदाराः सर्व एवैते।"
अगली बार आठवाँ अध्याय, महाभारत के भीष्म पर्व का बत्तीसवाँ, "अक्षरब्रह्म योग"। और वह अध्याय अर्जुन के मुँह से शुरू होता है, उन्हीं सात शब्दों के प्रश्नों से: "किं तद् ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम।" हे पुरुषोत्तम, वह ब्रह्म क्या है, अध्यात्म क्या है, कर्म क्या है? और आख़िरी प्रश्न वह होगा, जो हम सबके मन में कभी न कभी उठता है: जाने की घड़ी में आपको कैसे जाना जाता है? उत्तर अगले सत्संग में।
तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।
पहली बात। दुःख में पुकारने पर शर्माइए मत। भगवान ने चार भक्तों में पहला नाम आर्त का लिया, और उसे पुण्यात्मा कहा। द्रौपदी की "गोविन्द" वाली पुकार को उन्होंने अपने हृदय पर बढ़ता हुआ कर्ज़ माना। आपकी पुकार भी उसी हिसाब में लिखी जाती है।
दूसरी बात। आप जिस श्रद्धा से भी चलते हों, भगवान उसे तोड़ते नहीं, टिकाते हैं। पर ध्यान रखिए कि माँग क्या रहे हैं। जयद्रथ का नसें उभार देने वाला तप एक दिन के फल पर ख़त्म हुआ, क्योंकि माँग में बदला था। माँगिए, पर साथ में देने वाले को भी माँग लीजिए: "मद्भक्ता यान्ति मामपि।"
तीसरी बात। जो पसन्द-नापसन्द, जो पुराने झगड़े, जन्म से हमारे साथ आए, वे हमारी तक़दीर नहीं हैं। उसी घर से, जहाँ जन्म के दिन से ईर्ष्या और मोह बैठे थे, युयुत्सु निकलकर धर्म की ओर खड़े हो गए। आपके घर का वह एक आदमी आप भी हो सकते हैं।
आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। क्या आपके जीवन में कोई ऐसी घड़ी आई थी, जब दुःख में आपने भगवान को पुकारा, और उसके बाद आपकी भक्ति कुछ बदल गई? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।
भरी सभा में एक रोती हुई स्त्री ने "गोविन्द" कहा था, और भगवान ने उसे कर्ज़ माना। आपकी पुकार भी खाली नहीं जाती।
जय श्री कृष्ण।
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥ १६ ॥
तीन बातें
- दुःख में पुकारने पर शर्माइए मत। भगवान ने चार भक्तों में पहला नाम आर्त का लिया, और उसे पुण्यात्मा कहा। द्रौपदी की "गोविन्द" वाली पुकार को उन्होंने अपने हृदय पर बढ़ता हुआ कर्ज़ माना। आपकी पुकार भी उसी हिसाब में लिखी जाती है।
- आप जिस श्रद्धा से भी चलते हों, भगवान उसे तोड़ते नहीं, टिकाते हैं। पर ध्यान रखिए कि माँग क्या रहे हैं। जयद्रथ का नसें उभार देने वाला तप एक दिन के फल पर ख़त्म हुआ, क्योंकि माँग में बदला था। माँगिए, पर साथ में देने वाले को भी माँग लीजिए: "मद्भक्ता यान्ति मामपि।"
- जो पसन्द-नापसन्द, जो पुराने झगड़े, जन्म से हमारे साथ आए, वे हमारी तक़दीर नहीं हैं। उसी घर से, जहाँ जन्म के दिन से ईर्ष्या और मोह बैठे थे, युयुत्सु निकलकर धर्म की ओर खड़े हो गए। आपके घर का वह एक आदमी आप भी हो सकते हैं।