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सत्संग २१

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धागे में पिरोए मोती

गीता 7.1–7.15 · 78 मिनट

हज़ारों में एक क्यों खोजता है; भगवान की माया

श्रीभगवानुवाच मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः । असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥ १ ॥
गीता 7.1 — अर्थ पढ़ें ›
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः । यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥ २ ॥
गीता 7.2 — अर्थ पढ़ें ›
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये । यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥ ३ ॥
गीता 7.3 — अर्थ पढ़ें ›

कभी किसी बड़े-बुज़ुर्ग के हाथ में जप की माला देखी है? मनके एक-एक करके उँगलियों से सरकते जाते हैं, कोई तुलसी का, कोई रुद्राक्ष का, कोई ज़रा बड़ा, कोई ज़रा छोटा। पर जो उन सबको एक साथ थामे हुए है, वह धागा कभी दिखाई नहीं देता। आज का सवाल यही है: अगर भगवान सचमुच इस सारे संसार को धागे की तरह थामे हुए हैं, तो वे दिखते क्यों नहीं? हज़ारों लोगों में कोई एक ही उन्हें क्यों खोजता है? और वह कौन-सी माया है जो हमें उन्हें पहचानने नहीं देती?

जय श्री कृष्ण।

आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का इक्कीसवाँ सत्संग है, और आज हम एक नए दरवाज़े से भीतर जा रहे हैं। पिछली बार, बीसवें सत्संग में, हमने छठा अध्याय पूरा किया था, और उसके साथ गीता के पहले छह अध्याय भी, जिन्हें पुराने आचार्य पहला षट्क कहते हैं। आपको याद होगा, अर्जुन ने कहा था कि मन वायु जैसा है, उसे रोकना हवा की गठरी बाँधने जैसा है; और श्रीकृष्ण ने पहले माना, "असंशयं", निःसन्देह मन चंचल है, फिर दवा दी, अभ्यास और वैराग्य। फिर वह बड़ा भरोसा आया, कि भलाई की ओर उठाया कोई कदम व्यर्थ नहीं जाता, और अधूरा रह गया साधक भी अगले जन्म में वहीं से धागा उठाता है। और अध्याय का अन्तिम श्लोक था, कि सब योगियों में भी वह सबसे श्रेष्ठ है जो श्रद्धा से, भीतर के मन को मुझमें लगाकर, मुझे भजता है।

और मैंने आपसे एक बात कही थी। "असंशयं", यह शब्द श्रीकृष्ण ने मन की चंचलता मानने के लिए कहा था, और अगली बार वे इसी शब्द से एक वादा करेंगे। आज वह वादा आपने अभी-अभी गाए हुए पहले श्लोक में सुना।

और यह याद रहे कि यह सब हमें सञ्जय सुना रहे हैं, हस्तिनापुर के महल में, अन्धे राजा धृतराष्ट्र को, उस दिन जब भीष्म बाणों की शय्या पर गिर चुके हैं। महाभारत के भीष्म पर्व का इकतीसवाँ अध्याय ही गीता का सातवाँ अध्याय है, और उसका नाम है "ज्ञानविज्ञान योग"।

अब पहला श्लोक। "मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः।" हे पार्थ, मुझमें आसक्त मन वाले होकर, मेरा ही आश्रय लेकर, योग का अभ्यास करते हुए, "असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु", तुम मुझे सम्पूर्ण रूप से और बिना किसी संदेह के जिस तरह जानोगे, वह सुनो।

सबसे पहले एक छोटी-सी बात, जिस पर मधुसूदन सरस्वती रुकते हैं। इस अध्याय की शुरुआत में अर्जुन ने कोई प्रश्न नहीं पूछा। छठे अध्याय में उन्होंने मन के बारे में पूछा था, अधूरे योगी के बारे में पूछा था, और उत्तर पा लिया था। अब वे चुप हैं। फिर भी श्रीकृष्ण बोलना शुरू करते हैं। मधुसूदन कहते हैं, जिस भगवान को भजने की बात हुई, उनका रूप कैसा है, यह अर्जुन को पूछना चाहिए था; उन्होंने पूछा नहीं, पर श्रीकृष्ण ने परम करुणा से, बिना पूछे ही, उत्तर देना शुरू किया। माँ बच्चे के रोने का इन्तज़ार नहीं करती। भूख का समय होता है, तो थाली अपने आप आ जाती है।

अब इस श्लोक के तीन टुकड़े देखिए। पहला, "मय्यासक्तमनाः", जिसका मन मुझमें आसक्त है। आसक्ति शब्द तो गीता में अब तक बुरा ही लगा था, फल की आसक्ति, विषयों की आसक्ति। पर यहाँ वही शब्द भगवान के साथ जुड़ते ही बदल जाता है। मन तो कहीं न कहीं चिपकेगा ही; सवाल बस इतना है कि किससे।

दूसरा, "मदाश्रयः", मेरा ही आश्रय लेकर। मधुसूदन और नीलकण्ठ दोनों राजा के सेवक का चित्र देते हैं, जो धन और मान के लिए राजा का आश्रय लेता है। शंकराचार्य कहते हैं, कोई कुछ पाना चाहता है तो किसी साधन का सहारा लेता है, अग्निहोत्र का, तप का, दान का। पर यह योगी दूसरे सब साधन छोड़कर केवल मेरा सहारा लेता है। और यहाँ मुझे वह दिन याद आता है जो आप पहले कई सत्संगों में सुन चुके हैं: द्वारका में, सोते हुए श्रीकृष्ण के सामने, एक ओर दस करोड़ ग्वालों की सेना, और दूसरी ओर अकेले, निहत्थे श्रीकृष्ण। दुर्योधन ने सेना चुनी। अर्जुन ने उन्हें चुना जो लड़ेंगे भी नहीं। "मदाश्रयः" का इससे सच्चा चित्र मुझे कहीं नहीं मिलता। और आज जो रथ पर बैठा उपदेश सुन रहा है, वह वही अर्जुन है जिसने सहारा चुनते समय सेना नहीं, सारथी चुना था।

तीसरा, वह वादा। "असंशयं समग्रं", बिना संदेह के और सम्पूर्ण। हमारी टीका कहती है, सम्पूर्ण का अर्थ है उन्हें सब रूपों में जानना, उनकी अपरा और परा प्रकृति, और वह सब जो यह अध्याय आगे बताएगा। शंकराचार्य और श्रीधर कहते हैं, उनकी विभूति, बल, शक्ति और ऐश्वर्य सहित। और यह पूरापन इसलिए ज़रूरी है कि आधा जाना हुआ भगवान आधे भरोसे को जन्म देता है। कोई उन्हें केवल मन्दिर की मूर्ति में जानता है, तो मन्दिर से बाहर निकलते ही वे उससे छूट जाते हैं। कोई उन्हें केवल संकट में पुकारने वाला सहारा जानता है, तो संकट जाते ही वे भी चले जाते हैं। श्रीकृष्ण कह रहे हैं, आज मैं तुम्हें ऐसे बताऊँगा कि कहीं से भी मैं छूट न सकूँ।

और यहाँ से गीता की धारा का रुख़ भी बदलता है, जिसे मधुसूदन सरस्वती बहुत साफ़ शब्दों में कहते हैं। पहले छह अध्यायों में मुख्य प्रश्न था, "तुम कौन हो?" यानी जीव, आत्मा, मन, कर्म, ध्यान। अब अगले छह अध्यायों में प्रश्न है, "वह कौन है?" जिसे भजना है, जिसका ध्यान करना है। हमारी टीका की भूमिका भी यही कहती है: पिछला अध्याय इस पर समाप्त हुआ कि श्रद्धा से भजने वाला सबसे श्रेष्ठ है, और यह अध्याय दिखाना शुरू करता है कि वे भगवान कौन हैं। आप कह सकते हैं, अब तक हम अपने घर को देख रहे थे; अब खिड़की खुली है, और बाहर का आसमान दिखने वाला है।

अब दूसरा श्लोक। "ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः।" मैं तुम्हें यह ज्ञान, विज्ञान के साथ, पूरा का पूरा कहूँगा, "यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते", जिसे जान लेने के बाद यहाँ फिर कुछ भी जानने को बाकी नहीं रहता।

ज्ञान और विज्ञान, दो शब्द, और दोनों का भेद श्रीधर स्वामी एक पंक्ति में कह देते हैं: ज्ञान वह जो शास्त्र से मिले, विज्ञान वह जो अनुभव से मिले। जैसे किसी ने आपको आम के बारे में सब बता दिया, उसका रंग, उसकी खुशबू, उसकी मिठास। यह ज्ञान है। फिर आपने आम चख लिया। यह विज्ञान है। पहले के बिना दूसरा रास्ता नहीं पाता, और दूसरे के बिना पहला अधूरा रहता है। अध्याय का नाम भी इसीलिए है, ज्ञानविज्ञान योग।

संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर बड़ी प्यारी बात कहते हैं। वे श्रीकृष्ण के मुँह से कहलवाते हैं: मैं तुम्हें यह ज्ञान ऐसे बताऊँगा कि तुम मुझे पूरा वैसे जान लो, जैसे अपनी हथेली पर रखा रत्न। हथेली का रत्न किसी से पूछकर नहीं देखना पड़ता। वह सामने है, अपना है, साफ़ है।

और "जिसे जानकर कुछ बाकी न रहे", इस पर तिलक एक उपनिषद् की याद दिलाते हैं। छान्दोग्य उपनिषद् में पिता अपने बेटे श्वेतकेतु से पूछते हैं: वह क्या है जिसे एक को जान लेने से सब जान लिया जाता है? और फिर उत्तर देते हैं: जैसे मिट्टी के एक ढेले को जान लेने से मिट्टी की बनी हर चीज़ जान ली जाती है, घड़ा हो, सकोरा हो, दीया हो; नाम और रूप अलग हैं, पर सच में सब मिट्टी है। श्रीकृष्ण यही कह रहे हैं: एक को जान लो, जिससे सब बना है, तो फिर हर चीज़ को अलग-अलग जानने की भूख शान्त हो जाती है।

और अब तीसरा श्लोक, जो इस सत्संग के सबसे कठिन पर सबसे ज़रूरी श्लोकों में है। "मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये।" हज़ारों मनुष्यों में कोई एक सिद्धि के लिए यत्न करता है। "यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः।" और यत्न करने वाले उन सिद्धों में भी कोई एक मुझे तत्त्व से, जैसा मैं हूँ वैसा, जानता है।

पहली बार सुनने पर यह श्लोक डराता है। हज़ारों में एक, और उन एक-एक में भी कोई एक? तो फिर मेरी बारी कब आएगी? पर ज़रा ठहरकर देखिए कि श्रीकृष्ण यह बात कब कह रहे हैं। अभी-अभी उन्होंने कहा, "मैं तुम्हें पूरा बताऊँगा।" और ठीक उसके बाद कह रहे हैं, "यह बहुत दुर्लभ है।" शंकराचार्य इसका कारण बताते हैं: यह सुनने वाले को उस बात की ओर मोड़ने के लिए कहा गया है, उसकी रुचि जगाने के लिए। श्रीधर स्वामी भी यही कहते हैं: इतना दुर्लभ होते हुए भी, यह ज्ञान मैं तुम्हें दूँगा। यानी यह दरवाज़ा बन्द करने वाली बात नहीं है। यह वैसे है जैसे कोई कहे, "यह चीज़ लाखों में एक को मिलती है, और आज मैं तुम्हें दे रहा हूँ।" दुर्लभता यहाँ डराने के लिए नहीं, उस चीज़ का मोल बताने के लिए है।

श्रीधर स्वामी इस सीढ़ी को और नीचे से शुरू करते हैं। वे कहते हैं, अनगिनत जीवों में मनुष्य के सिवा किसी में कल्याण की ओर चलने की इच्छा ही नहीं होती। मनुष्यों में भी हज़ारों में कोई एक, बड़े पुण्य से, आत्मज्ञान के लिए यत्न करता है। अब इसे उलटकर देखिए। जो आदमी इस समय, अपने काम-काज के बीच से समय निकालकर, गीता का इक्कीसवाँ सत्संग सुन रहा है, वह कहाँ खड़ा है? वह उन हज़ारों में से नहीं, जो कभी खोजते ही नहीं। वह उस "कोई एक" में है, जिसने चलना शुरू कर दिया है। श्लोक की पहली आधी पंक्ति आपके बारे में पहले ही सच हो चुकी है।

और संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक को एक ऐसे चित्र में रखते हैं जो इस समय कुरुक्षेत्र में बिलकुल सामने है। वे कहते हैं: जैसे तीनों लोकों में से एक-एक अच्छा योद्धा चुनकर लाखों की सेना बनाई जाए, और फिर जब लोहा मांस से टकराए, तब विजय-लक्ष्मी के आसन पर कोई एक ही बैठता है। सोचिए, सञ्जय जिस मैदान का हाल सुना रहे हैं, वहाँ ठीक यही हो रहा है। दोनों ओर की विशाल सेनाएँ, चुने हुए वीर, और अन्त में विजय किसके साथ खड़ी होगी, यह गिनती से तय नहीं होगा। और ज्ञानेश्वर आगे कहते हैं: श्रद्धा की बाढ़ में करोड़ों लोग उतरते हैं, पर पहुँचने के उस पार किनारे पर कोई विरला ही निकलता है।

और एक बात। श्लोक कहता है, "कश्चिद्यतति", कोई यत्न करता है। यह नहीं कहता कि कोई जन्म से जानता है। जानना यत्न के बाद आता है। पिछली बार हमने सुना था, "यतते च ततो भूयः", अधूरा योगी अगले जन्म में फिर से यत्न करता है। आज वही धातु, वही यत्न, फिर से आया है। यानी गीता का भरोसा टूटा नहीं है, बस आगे बढ़ा है। जो यत्न करता रहता है, वही उस दूसरी पंक्ति तक पहुँचता है।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने कहा, "मुझे तत्त्व से जानना दुर्लभ है।" तो पहले यह तो पता चले कि वह "मैं" कौन है, जिसे जानना है। अगले श्लोकों में श्रीकृष्ण बताते हैं कि यह सारा संसार किस चीज़ से बना है, और उसके भीतर कौन है जो उसे थामे हुए है। आइए, सुनते हैं।

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च । अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥ ४ ॥
गीता 7.4 — अर्थ पढ़ें ›
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् । जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥ ५ ॥
गीता 7.5 — अर्थ पढ़ें ›
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय । अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥ ६ ॥
गीता 7.6 — अर्थ पढ़ें ›

चौथा श्लोक एक सूची से शुरू होता है। "भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।" पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन और बुद्धि, "अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा", और अहंकार: इस तरह यह मेरी प्रकृति आठ भागों में बँटी हुई है।

पहले पाँच नाम तो हम सब जानते हैं। ये वे पाँच तत्त्व हैं जिनसे हमारा शरीर, यह घर, यह धरती, सब बना है। पर फिर तीन नाम आते हैं जो हमें चौंकाते हैं: मन, बुद्धि और अहंकार। हम सोचते हैं कि मन तो हम हैं, बुद्धि तो हमारी अपनी है, और "मैं" तो सबसे भीतर की चीज़ है। पर श्रीकृष्ण इन तीनों को भी मिट्टी, पानी और हवा वाली उसी सूची में रख देते हैं। हमारी टीका कहती है कि यहाँ पाँच तत्त्व अपने सूक्ष्म रूपों के भी सूचक हैं, और मन, बुद्धि, अहंकार उनके पीछे के सूक्ष्म कारणों के; और मिलकर ये वह सब हैं जो विषय रूप से जाना जा सकता है। यानी जो कुछ भी आप देख सकते हैं, सोच सकते हैं, गिन सकते हैं, यहाँ तक कि अपना मन और अपना "मैं" भी, जब आप उसे देखते हैं, तो वह भी देखी जाने वाली चीज़ है। और जो देखी जाती है, वह देखने वाला नहीं हो सकती।

शंकराचार्य, श्रीधर और मधुसूदन यहाँ बड़ी बारीकी में जाते हैं, कि भूमि का अर्थ स्थूल पृथ्वी नहीं, उसका सूक्ष्म रूप है, कि मन से उसका कारण समझा जाए, और अहंकार से वह मूल अव्यक्त। तिलक बताते हैं कि सांख्य दर्शन की गिनती से गीता की यह गिनती थोड़ी अलग है। ये बारीकियाँ विद्वानों के काम की हैं। हमारे लिए इतना काफ़ी है कि संसार की हर चीज़, बाहर की भी और भीतर की भी, इन आठ में आ जाती है। और श्रीकृष्ण इन्हें कहते हैं, "मे", मेरी। संत ज्ञानेश्वर कहते हैं, यह मेरी माया है, जैसे अपने ही शरीर की परछाईं।

अब पाँचवाँ श्लोक, और यहाँ से असली बात शुरू होती है। "अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्।" यह मेरी अपरा, यानी निचली प्रकृति है। पर हे महाबाहो, इससे अलग मेरी एक परा, ऊँची प्रकृति को जानो, "जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्", जो जीव रूप है, और जिससे यह सारा जगत् थमा हुआ है।

हमारी टीका इसे बहुत सीधे कहती है: अपरा प्रकृति जड़ है, जो जाना जाता है; परा चेतन है, जानने वाला, जो उसमें रहकर उसे जीवन देता है। एक घर को सोचिए। ईंटें, सीमेंट, लकड़ी, बिजली के तार, सब कुछ लगा है। फिर भी जब तक उसमें कोई रहता नहीं, वह मकान है, घर नहीं। घर तब बनता है जब उसमें कोई आता है, दीया जलाता है, नाम लेकर किसी को पुकारता है। आठ प्रकार वाली प्रकृति ईंट-गारा है। परा प्रकृति वह है जो उसमें रहती है।

और "जिससे यह जगत् थमा हुआ है", इस पर मधुसूदन सरस्वती एक बात कहते हैं जो हम सबने अपनी आँखों से देखी है। वे कहते हैं, जीव के बिना शरीर को थामा नहीं जा सकता; वह अपने आप बिखर जाता है। जिसने किसी अपने को अन्तिम साँस लेते देखा है, वह यह बात जानता है। एक क्षण पहले वही हाथ, वही चेहरा, वही आँखें; और एक क्षण बाद सब कुछ वैसा ही रहते हुए भी कुछ नहीं रहता। मिट्टी, पानी, हवा, सब वहीं हैं। बस वह चला गया जो इन्हें थामे था। यही परा प्रकृति है।

संत ज्ञानेश्वर इसे बहुत सुंदर शब्दों में कहते हैं: वह जो जड़ को जिलाती है, चेतन को चेताती है, और मन के द्वारा शोक और मोह भी मनवाती है। और फिर उनकी एक बात, जो इस पूरे अध्याय की कुंजी है: वह जिसके निकट होने से ही बुद्धि में जानने की शक्ति आती है।

और ध्यान दीजिए, इस श्लोक में फिर वही सम्बोधन है, "महाबाहो"। पिछली बार हमने सुना था कि ये वे भुजाएँ हैं जिन्होंने किरात-वेशी शिव से युद्ध किया था। आज श्रीकृष्ण उन्हीं बड़ी भुजाओं वाले से कह रहे हैं: इन भुजाओं को भी कोई और थामे हुए है।

अब छठा श्लोक। "एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय।" समझ लो कि सब प्राणी इन्हीं दोनों प्रकृतियों से जन्म लेते हैं। "अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा।" मैं सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति हूँ, और प्रलय भी।

श्रीधर स्वामी इसे खोलते हैं: जड़ प्रकृति शरीर का रूप लेती है, और चेतन, जो मेरा ही अंश है, भोगने वाले के रूप में उन शरीरों में प्रवेश करके उन्हें थामे रहता है। और ये दोनों प्रकृतियाँ भी मुझसे ही निकली हैं, इसलिए आख़िर में सबका कारण मैं हूँ।

संत ज्ञानेश्वर यहाँ एक ऐसा चित्र देते हैं जो आज भी हर किसी की जेब में है। वे कहते हैं, प्रकृति एक टकसाल है, सिक्के ढालने का कारख़ाना। जब सूक्ष्म प्रकृति स्थूल रूप लेती है, तो प्राणियों के सिक्के ढलने लगते हैं, चार प्रकार के ठप्पे अपने आप उभरते हैं, चौरासी लाख तरह के सिक्के। मोल में सब बराबर, पर ठप्पे अलग-अलग। और फिर वही टकसाल उन सिक्कों को गलाकर वापस धातु भी कर देती है। ज्ञानेश्वर कहते हैं, यह टकसाल भी आख़िर मुझमें ही है; इसलिए जगत् का आदि, मध्य और अन्त मैं हूँ। हम अपने आप को अलग-अलग सिक्के समझते हैं, कोई बड़ा, कोई छोटा, कोई चमकता, कोई घिसा हुआ। पर धातु सबकी एक है।

और अब, इससे पहले कि मैं आपको एक कथा में ले चलूँ, एक छोटी-सी बात आपसे कहना चाहता हूँ। अभी तक श्रीकृष्ण ने हमें सामग्री दिखाई है, ईंटें और रहने वाला। अगले श्लोकों में वे वह बताएँगे जो इस अध्याय को नाम देता है: वह धागा जिसमें सब पिरोया हुआ है। और फिर वह बात आएगी जो हमें सबसे ज़्यादा उलझाती है, कि अगर वे हर जगह हैं, तो दिखते क्यों नहीं। आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। जो आदमी यहीं रुक जाए, उसके हाथ में बस यह आएगा कि "सब भगवान से बना है", और उसे लगेगा कि यह तो बहुत दूर की, ऊँची बात है, मेरे घर की नहीं। पर इस अध्याय का असली भरोसा अन्त में है, जहाँ बताया गया है कि इस माया से निकलने का रास्ता कितना सीधा है। तो अगर आप यह सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की यह यात्रा बीच में न छूटे। और आज का यह सत्संग आख़िर तक सुनिए।

अब वह कथा, जो मुझे "प्रभवः प्रलयस्तथा", उत्पत्ति भी मैं और प्रलय भी मैं, के साथ सबसे सच्ची लगती है। यह वन पर्व में है। वनवास के दिन थे, पाण्डव काम्यक वन में थे, और एक दिन श्रीकृष्ण सत्यभामा के साथ उनसे मिलने आए। उसी समय वहाँ मार्कण्डेय मुनि भी पहुँचे, जो इतने लम्बे समय से जी रहे थे कि पाठ कहता है, फिर भी पच्चीस वर्ष के युवक जैसे दिखते थे। श्रीकृष्ण ने ही उनसे कहा कि पुरानी पवित्र कथाएँ सुनाइए।

और युधिष्ठिर ने उनसे एक बड़ा प्रश्न पूछा। उन्होंने कहा: हे महामुनि, आपने एक बार नहीं, अनेक बार युगों का अन्त देखा है। प्रलय के समय, जब यह लोक देवताओं और दानवों से भी ख़ाली हो जाता है, तब भी आप रहते हैं। हमें वह सब बताइए।

और मार्कण्डेय ने बताया। युग के अन्त में धर्म उलट जाता है, फिर लम्बा सूखा पड़ता है, सूर्य सारा जल पी जाते हैं, आग सब कुछ जला देती है, और फिर विशाल बादल उठते हैं, जो बारह वर्ष तक बरसते रहते हैं, इतना कि समुद्र अपनी सीमा लाँघ जाता है और पर्वत डूब जाते हैं। और फिर मार्कण्डेय के अपने शब्द: "उस एक ही समुद्र में, जब सब चर-अचर नष्ट हो चुके थे, न देवता, न असुर, न मनुष्य, न पशु, न पेड़, मैं अकेला, व्याकुल होकर भटकता रहा। मैं बहुत दूर तक तैरता गया, थका हुआ, पर कहीं कोई आश्रय नहीं मिला।"

सोचिए उस अकेलेपन को। पूरी सृष्टि में एक आदमी, और चारों ओर केवल पानी। जो कुछ उसने जाना था, जिनसे मिला था, सब डूब चुका है।

और फिर, मार्कण्डेय कहते हैं, उस जल-राशि में मुझे एक बहुत बड़ा, फैला हुआ बरगद का पेड़ दिखा। उसकी एक चौड़ी शाखा पर, दिव्य बिछौनों वाले एक पलंग पर, एक बालक बैठा था। मुख कमल और चन्द्रमा जैसा, आँखें खिले कमल जैसी, रंग अलसी के फूल जैसा नीला, और छाती पर श्रीवत्स का चिह्न। और मार्कण्डेय, जो भूत, वर्तमान और भविष्य जानते थे, जिन्होंने तप के बल से न जाने क्या-क्या देखा था, कहते हैं: "मैंने सोचा, पर मैं उस शिशु को पहचान नहीं पाया।"

आज के तीसरे श्लोक को याद कीजिए: यत्न करने वाले सिद्धों में भी कोई एक ही उन्हें तत्त्व से जानता है। यहाँ एक सिद्ध खड़ा है, युगों का देखा हुआ, और सामने बैठे बालक को नहीं पहचान पा रहा।

और बालक ने उनसे कहा: "हे तात, मैं जानता हूँ कि तुम बहुत थके हो और विश्राम चाहते हो। मेरे शरीर के भीतर आकर, जब तक चाहो, यहाँ रहो। मैंने तुम पर यह कृपा की है।" और फिर, मार्कण्डेय कहते हैं, उस बालक ने अचानक अपना मुख खोला, और मैं विवश होकर उसके मुख में चला गया।

पर अभी एक बात बाकी है। उस बालक के भीतर मार्कण्डेय ने क्या देखा, यह मैं आपको अगले श्लोक के साथ बताऊँगा, क्योंकि वह अगला श्लोक ही इस अध्याय का नाम है: धागे में पिरोए मोती। आइए, सुनते हैं।

मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय । मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥ ७ ॥
गीता 7.7 — अर्थ पढ़ें ›
रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः । प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥ ८ ॥
गीता 7.8 — अर्थ पढ़ें ›
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ । जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥ ९ ॥
गीता 7.9 — अर्थ पढ़ें ›

सातवाँ श्लोक। "मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय।" हे धनञ्जय, मुझसे परे, मुझसे ऊपर, दूसरा कुछ भी नहीं है। "मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव।" यह सब कुछ मुझमें वैसे ही पिरोया हुआ है, जैसे धागे में मणियों के दाने।

इस श्लोक पर हमारी टीका केवल दो वाक्य कहती है, और मुझे लगता है उनसे सुंदर कुछ कहना कठिन है: धागा दिखाई नहीं देता, फिर भी हर मणि को थामे रहता है। वैसे ही भगवान जगत् में छिपे रहकर उसे थामे हुए हैं।

अब उस माला को फिर से हाथ में लीजिए जिससे हमने आज शुरुआत की थी। कोई मनका बड़ा है, कोई छोटा; कोई चमकता है, कोई पुराना होकर घिस गया है; कोई सबसे ऊपर का सुमेरु है, कोई बीच का साधारण दाना। हर मनका अपने आप में अलग है। पर हर मनके के ठीक बीच से एक ही धागा गुज़रता है। और ज़रा सोचिए, धागा निकाल दिया जाए तो क्या होगा। मनके वहीं रहेंगे, एक भी नहीं टूटेगा, पर माला नहीं रहेगी। सब बिखर जाएँगे, कोई इधर लुढ़केगा, कोई उधर। माला को माला धागा बनाता है।

आचार्य इस उपमा के अलग-अलग रंग देखते हैं। रामानुज कहते हैं, यह सारा चेतन और जड़ संसार मेरे शरीर जैसा है, और मैं उसका आत्मा बनकर उसके भीतर हूँ, जैसे धागा मणियों में। और मधुसूदन सरस्वती एक सावधानी जोड़ते हैं, जिसे विश्वनाथ चक्रवर्ती भी उनके नाम से दोहराते हैं: धागे की उपमा केवल "पिरोए होने" के लिए है। धागा मनकों को बनाता नहीं, बस थामता है। पर भगवान तो सब कुछ बनाते भी हैं। इसलिए वे कहते हैं, उस बात के लिए ज़्यादा ठीक उपमा है सोना और कुण्डल; कुण्डल सोने से ही बना है।

और संत ज्ञानेश्वर इन दोनों बातों को एक ही पंक्ति में जोड़ देते हैं, जो मुझे बहुत प्यारी लगती है। वे कहते हैं: सोने के मनके बनाए, और उन्हें सोने के ही धागे में पिरो दिया; वैसे ही मैंने जग को भीतर और बाहर से धारण किया है। यानी मनके भी वही, धागा भी वही। जो थामे है, वही थामा भी गया है।

और सम्बोधन देखिए: "धनञ्जय"। सातवें सत्संग में आपने सुना था कि अर्जुन को यह नाम क्यों मिला: सब देशों को जीतकर, धन के बीच खड़े रहने के कारण। आज धन जीतने वाले से कहा जा रहा है कि सब धन, सब मणियाँ, जिस धागे में पिरोई हैं, वह धागा मैं हूँ।

और अब मैं आपको फिर उस बालक के पास ले चलता हूँ, जिसके मुख में मार्कण्डेय चले गए थे। मार्कण्डेय कहते हैं: "उसके पेट में प्रवेश करके मैंने राज्यों और नगरों से भरी सारी पृथ्वी देखी।" और फिर वे नाम गिनाने लगते हैं, जैसे कोई अपनी आँखों देखी बात दोहराता है: गंगा, यमुना, सरस्वती, सिन्धु, गोदावरी, नर्मदा, कावेरी, तुंगभद्रा, और न जाने कितनी नदियाँ। फिर रत्नों से भरा समुद्र। फिर चन्द्रमा और सूर्य से चमकता आकाश। फिर हिमालय, विन्ध्य, मलय, सोने का मेरु। सिंह, बाघ, सब जीव। इन्द्र और सब देवता, गन्धर्व, अप्सराएँ, ऋषि, यहाँ तक कि दैत्य और दानव भी। वे कहते हैं, वहाँ ब्राह्मण यज्ञ कर रहे थे, वैश्य खेती करवा रहे थे, सब अपने-अपने काम में लगे थे। "लोक में जो कुछ भी चर और अचर मैंने कभी देखा है, वह सब मैंने उस महात्मा के पेट में देखा।"

"मयि सर्वमिदं प्रोतं", यह सब मुझमें पिरोया हुआ है। इस श्लोक का इससे सीधा दृश्य मुझे पूरे महाभारत में नहीं मिलता। एक नन्हा बालक, बरगद के पत्तों के बीच, और उसके भीतर गंगा भी बह रही है, हिमालय भी खड़ा है, और कोई अपनी खेती में भी लगा है।

और फिर मार्कण्डेय एक बात कहते हैं जिस पर ध्यान देना चाहिए। "मैं सौ वर्षों से अधिक उसके शरीर के भीतर रहा। लगातार दौड़ता रहा, सोचता रहा, पर उस देह का अन्त मैं कभी नहीं पा सका।" मुझसे परे कुछ नहीं, "मत्तः परतरं नान्यत्"। मार्कण्डेय ने सौ वर्ष दौड़कर यह बात अपने पैरों से नाप ली। वे बाहर कैसे निकले, यह मैं अभी नहीं बताऊँगा। उसका उत्तर इसी अध्याय के एक श्लोक में छिपा है, और उस श्लोक तक हम आज पहुँचेंगे।

अब आठवाँ श्लोक, और यहाँ से श्रीकृष्ण वह धागा एक-एक मनके में दिखाने लगते हैं। "रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः।" हे कुन्तीपुत्र, जल में रस मैं हूँ, चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश मैं हूँ। "प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु।" सब वेदों में ओंकार, आकाश में शब्द, और मनुष्यों में पुरुषार्थ मैं हूँ।

हमारी टीका इस पूरी सूची की चाबी देती है: हर वस्तु को उसके सार से बताया गया है, वह गुण जिसके बिना वह वह न रहे। रस के बिना जल, प्रकाश के बिना सूर्य। प्यास में पानी पीते समय जो तृप्ति होती है, वह पानी का रस है। रस निकाल दीजिए तो पानी पानी नहीं रहता। शंकराचार्य कहते हैं, जल का जो सार है वह रस है, और उस रस रूपी मुझमें जल पिरोया हुआ है। यानी सातवें श्लोक का धागा यहाँ अलग-अलग मनकों में पकड़ में आने लगता है।

और यह बात मुझे बहुत प्यारी लगती है: भगवान को देखने के लिए हमें कहीं दूर नहीं जाना। अगली बार जब आप एक गिलास पानी पिएँ, और वह ठण्डक भीतर उतरे, तो एक क्षण के लिए याद कर लीजिए, "रसोऽहमप्सु"। सुबह की धूप चेहरे पर पड़े, या रात को चाँदनी आँगन में उतरे, तो याद कर लीजिए, "प्रभास्मि शशिसूर्ययोः"। मधुसूदन सरस्वती साफ़ कहते हैं कि ये विभूतियाँ ध्यान के लिए बताई गई हैं। यानी यह कोई तर्क नहीं, एक अभ्यास है।

"प्रणवः सर्ववेदेषु", सब वेदों में ओंकार। मधुसूदन और नीलकण्ठ दोनों एक पुरानी उपनिषद् की उपमा याद करते हैं: जैसे एक सींक में बहुत-से पत्ते पिरोकर एक साथ टाँक दिए जाते हैं, वैसे ही ओंकार में सारी वाणी पिरोई हुई है। फिर वही पिरोना, फिर वही धागा।

"शब्दः खे", आकाश में शब्द। और फिर "पौरुषं नृषु", मनुष्यों में पौरुष। श्रीधर स्वामी इसका अर्थ करते हैं उद्यम, मेहनत, और जोड़ते हैं: उद्यम में ही मनुष्य टिका है। यह बात हम में से बहुतों के लिए एक नई नज़र है। जब आप थककर भी उठते हैं, घर के लिए, बच्चों के लिए, किसी बीमार की सेवा के लिए, वह जो भीतर से खड़ा होने का बल आता है, श्रीकृष्ण कह रहे हैं, वह मैं हूँ। आपकी मेहनत भगवान से अलग कोई चीज़ नहीं है।

अब नौवाँ श्लोक। "पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ।" पृथ्वी में पवित्र गन्ध और अग्नि में तेज मैं हूँ। "जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु।" सब प्राणियों में जीवन, और तपस्वियों में तप मैं हूँ।

"पुण्यो गन्धः", पवित्र गन्ध। शंकराचार्य यहाँ एक गहरी बात कहते हैं: गन्ध स्वभाव से पवित्र है; जो दुर्गन्ध हम पाते हैं, वह बाद में किसी और चीज़ के मेल से आती है। मधुसूदन यही बात रस, रूप, शब्द सबके लिए कहते हैं। गर्मी के बाद पहली बारिश की बूँदें जब सूखी मिट्टी पर गिरती हैं, तो जो खुशबू उठती है, उसे कोई इत्र बना नहीं पाया। वह पृथ्वी की अपनी पवित्र गन्ध है। श्रीकृष्ण कहते हैं, वह मैं हूँ। और इसमें एक भरोसा भी छिपा है। चीज़ों का मूल स्वभाव पवित्र है। मैल बाद में आता है, और जो बाद में आता है, वह धुल भी सकता है।

"तेजश्चास्मि विभावसौ", अग्नि में तेज। "जीवनं सर्वभूतेषु", सब प्राणियों में जीवन; श्रीधर कहते हैं, प्राणों का धारण, आयु। और "तपश्चास्मि तपस्विषु", तपस्वियों में तप। मधुसूदन बताते हैं कि तप का अर्थ है सर्दी-गर्मी, भूख-प्यास जैसे द्वन्द्वों को सहने का सामर्थ्य, और मन की एकाग्रता भी।

और यहाँ मुझे फिर मार्कण्डेय याद आते हैं। जब वह बालक बाद में उनसे बोला, तो उसने कहा: "तुम्हारा ब्रह्मचर्य महान है, तुम मेरी शरण में आए हो, इसीलिए तुमने मुझे प्रत्यक्ष देखा।" मार्कण्डेय का तप उन्हें प्रलय के पार ले गया, पर वह तप भी उनका अपना नहीं था। "तपश्चास्मि तपस्विषु"। तपस्वी के भीतर तप बनकर भी वही बैठा था।

तो इन तीन श्लोकों का सार यह है: भगवान को खोजने के लिए दुनिया से मुँह मोड़ना ज़रूरी नहीं। पानी के स्वाद में, धूप में, मिट्टी की खुशबू में, आग की गरमाहट में, आपकी अपनी साँस में, आपके अपने परिश्रम में, हर मनके के भीतर वही धागा चल रहा है। बस आँख उस पर ठहरनी चाहिए।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने अभी चीज़ों की बात की, पानी, सूरज, धरती। अगले दो श्लोकों में वे मनुष्य के भीतर उतरते हैं: बुद्धिमान की बुद्धि, बलवान का बल, और एक ऐसी बात जो सुनने वालों को सबसे ज़्यादा चौंकाती है, कि काम भी मैं हूँ। आइए, सुनते हैं।

बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् । बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥ १० ॥
गीता 7.10 — अर्थ पढ़ें ›
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् । धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥ ११ ॥
गीता 7.11 — अर्थ पढ़ें ›

दसवाँ श्लोक। "बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्।" हे पार्थ, मुझे सब प्राणियों का सनातन बीज जानो। "बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्।" बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज मैं हूँ।

बीज की बात पहले। श्रीधर स्वामी यहाँ एक बारीक बात कहते हैं। हर पेड़ का अपना बीज होता है, और वह बीज पेड़ उगाकर ख़त्म हो जाता है। पर एक बीज ऐसा है जो कभी ख़त्म नहीं होता, जो हर पेड़ से अगले पेड़ तक चलता रहता है, जो हर बार अपने जैसा पैदा करने की शक्ति बनकर बना रहता है। श्रीकृष्ण कहते हैं, वह सनातन बीज मैं हूँ। आम की गुठली से आम का पेड़, उस पेड़ से फिर गुठली, और फिर पेड़। गुठलियाँ बदलती रहीं, पर वह जो हर गुठली में आम बनने की शक्ति थी, वह एक ही रही।

संत ज्ञानेश्वर इसे और बड़ा कर देते हैं। वे कहते हैं, जो आरम्भ में आकाश के अंकुर के साथ फूटता है, और अन्त में ओंकार की पीठ पर अक्षरों को भी निगल लेता है, जब तक संसार है तब तक संसार जैसा दिखता है, और महाप्रलय में कुछ भी नहीं दिखता, वह अनादि विश्व-बीज मैं हूँ। और फिर श्रीकृष्ण के मुँह से एक बहुत अपनापन भरी बात: यह मैं तुम्हारी हथेली पर रख रहा हूँ। वही हथेली, जिसका ज़िक्र दूसरे श्लोक में आया था।

"बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि", बुद्धिमानों की बुद्धि मैं हूँ। शंकराचार्य इसका अर्थ करते हैं विवेक-शक्ति, सही और ग़लत को अलग करके देखने की ताक़त। और "तेजस्तेजस्विनामहम्", तेजस्वियों का तेज; शंकर और श्रीधर इसका अर्थ करते हैं प्रागल्भ्य, यानी वह निडर आत्मविश्वास जिससे कोई भरी सभा में खड़ा होकर सच कह दे। आपके जीवन में कभी ऐसा क्षण आया होगा, जब किसी उलझी हुई घड़ी में अचानक मन में एक साफ़ बात कौंधी, कि यही ठीक है। या ऐसा क्षण, जब डर के बीच भी आप खड़े रह गए। श्रीकृष्ण कह रहे हैं, उस क्षण वह साफ़ नज़र भी मैं था, और वह खड़े रहने का साहस भी।

अब ग्यारहवाँ श्लोक, जो इस अध्याय के सबसे साहसी श्लोकों में है। "बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्।" बलवानों का वह बल मैं हूँ जो कामना और आसक्ति से रहित है। "धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ।" और हे भरतश्रेष्ठ, प्राणियों में धर्म के अनुकूल जो काम है, वह मैं हूँ।

पहले आधे श्लोक में दो शब्द हैं, काम और राग, और श्रीधर स्वामी तथा मधुसूदन सरस्वती दोनों का भेद बहुत साफ़ करते हैं। काम है उस चीज़ की चाह जो अभी मिली नहीं। राग है उस चीज़ से चिपकना जो मिल चुकी है, कि यह कभी न जाए, और यह और बढ़े। एक में "चाहिए", दूसरे में "छूटे नहीं"। श्रीकृष्ण कहते हैं, इन दोनों से ख़ाली जो बल है, वह मैं हूँ। श्रीधर कहते हैं, वह सात्त्विक बल, जो अपना धर्म निभाने के काम आए। शंकराचार्य कहते हैं, वह बल जो शरीर और कर्तव्य को थामने भर के लिए हो।

अब यह बल कैसा दिखता है, इसके लिए मैं आपको महाभारत के आदि पर्व में ले चलता हूँ, एकचक्रा नगरी में। लाख के घर से बचकर पाण्डव माता कुन्ती के साथ वहाँ एक ब्राह्मण के घर में छिपकर रह रहे थे, ब्रह्मचारियों के वेश में, भिक्षा माँगकर। उन्नीसवें सत्संग में आपने सुना था कि भिक्षा का आधा भाग अकेले भीम खाते थे, और फिर भी उनका पेट नहीं भरता था।

एक दिन उस ब्राह्मण के घर से रोने की आवाज़ आई। कुन्ती ने पूछा, तो ब्राह्मण ने बताया: नगर के पास यमुना के किनारे एक गुफा में बक नाम का एक नरभक्षी राक्षस रहता है, जो तेरह वर्ष से इस नगर को सताता आ रहा है। हर घर को बारी-बारी से उसके लिए ढेर सारा भोजन, दो बैल और एक मनुष्य भेजना पड़ता है। और आज इस घर की बारी है। घर में ब्राह्मण, उसकी पत्नी, एक बेटी और एक छोटा बेटा। कौन जाए? ब्राह्मण कहता है, किसी को नहीं दे सकता, सब साथ ही मर जाएँ। पत्नी कहती है, मुझे भेजो। बेटी कहती है, मुझे। और तब वह नन्हा बेटा एक-एक के पास सरककर तुतलाता है, "पिताजी मत रोओ, माँ मत रोओ, दीदी मत रोओ", और एक तिनका उठाकर कहता है, "इससे मैं उस राक्षस को मार डालूँगा।"

और तब कुन्ती ने कहा: "तुम दुखी मत हो। मेरे पाँच पुत्र हैं; उनमें से एक तुम्हारे लिए भेंट लेकर उस राक्षस के पास जाएगा।" ब्राह्मण ने मना किया, कि मैं अपने लिए अतिथि की जान नहीं दूँगा। कुन्ती ने कहा, "मेरा कोई पुत्र मुझे अप्रिय नहीं, चाहे सौ होते। पर वह राक्षस मेरे पुत्र को मार नहीं सकता।"

और फिर वह क्षण, जो इस श्लोक के दोनों आधे हिस्सों को एक साथ दिखाता है। युधिष्ठिर ने लौटकर भीम का खिला हुआ चेहरा देखा और समझ गए कि कुछ होने वाला है। उन्होंने माँ से अकेले में पूछा, और जब सुना तो घबरा गए: "आपने यह क्या कर डाला? उसी की भुजाओं के सहारे हम सब चैन से सोते हैं। कहीं दुःखों से आपकी बुद्धि तो नहीं खो गई?" और कुन्ती का उत्तर सुनिए: "मैंने यह निश्चय बुद्धि की दुर्बलता से नहीं किया। इस ब्राह्मण के घर में हम आदर से, बिना चिन्ता के रहे हैं; सच्चा मनुष्य वही है जिस पर किया उपकार व्यर्थ न जाए। मैंने यह लोभ से, अज्ञान से या मोह से तय नहीं किया। मैंने यह धर्म के लिए, सोच-समझकर किया है।"

"बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि"। देखिए, बुद्धिमान की बुद्धि कैसी होती है। वह डर से भी नहीं डगमगाती, और ममता से भी अन्धी नहीं होती। माँ का दिल है, बेटा प्यारा है, फिर भी वह सोचती है, किसका कितना ऋण है, और धर्म क्या माँगता है। और युधिष्ठिर ने सुनकर माना: "माता, तुमने जो सोच-समझकर किया है, वह उचित है।"

अब भीम। अगली सुबह वे ब्राह्मण से बोले: "मैं तुम्हें और तुम्हारे बेटे को इस विपत्ति से छुड़ाऊँगा। मैंने मन में ठान लिया है कि आज अपने प्राणों से भी तुम्हारी रक्षा करूँगा।" भोजन से भरी गाड़ी लेकर वे राक्षस के वन तक गए, और वहाँ, पाठ कहता है, बैठकर पहले वह भोजन ख़ुद खाने लगे, यह सोचकर कि लड़ाई में यह सब बिखर जाएगा। बक क्रोध में दौड़ा आया, पीठ पर दोनों हाथों से मारा, पर भीम ने मुड़कर देखा तक नहीं, खाते रहे। उसने पेड़ उखाड़कर फेंका, तो भीम ने उसे बाएँ हाथ से पकड़ लिया और दाएँ से खाते रहे।

फिर लड़ाई हुई, भारी लड़ाई। पर उसके बीच एक छोटी-सी पंक्ति है, जो मुझे इस पूरी कथा में सबसे बड़ी लगती है। भीम ने बक को उठाकर धरती पर पटका, और फिर उसे छोड़ दिया, और कहा: "हे राक्षस, साँस ले लो।" जिस बल में क्रोध हो, बदला हो, जीत की भूख हो, वह गिरे हुए को साँस लेने का समय नहीं देता। यह वह बल था जो किसी और के लिए उठा था।

और कथा का अन्त भी यही कहता है। बक मारा गया। उसका छोटा भाई और दूसरे राक्षस डरकर भीम की शरण में आए। भीम ने उन्हें मारा नहीं। उन्हें शान्त किया, और बस एक शर्त पर बाँध दिया: "फिर कभी मनुष्यों को मत मारना।" उन्होंने मान लिया, और पाठ कहता है, तब से उस नगर के लोगों को वहाँ राक्षस शान्त ही दिखते थे। भीम ने बक का शरीर नगर के द्वार पर डाला, गाड़ी और बैल ब्राह्मण को लौटाए, और चुपचाप घर के भीतर चले गए। अगले दिन नगर ने उत्सव मनाया, पर ब्राह्मण ने पाण्डवों का भेद किसी को नहीं बताया।

"बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्"। दस हज़ार हाथियों का बल, पर उसमें न नाम की चाह, न किसी चीज़ से चिपकना। एक ब्राह्मण के घर का ऋण चुकाने के लिए उठा, एक नगर को चैन की नींद देकर, बिना नाम लिए, वापस बैठ गया। श्रीकृष्ण कहते हैं, ऐसा बल मैं हूँ।

अब दूसरा आधा श्लोक, जो पहली बार सुनने वालों को चौंकाता है: "धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि", धर्म के अनुकूल काम मैं हूँ। अब तक गीता में काम शत्रु था। बारहवें सत्संग में हमने सुना था कि काम ही वह असली शत्रु है जो ज्ञान को ढक लेता है। तो यहाँ भगवान स्वयं को काम कैसे कह रहे हैं? हमारी टीका इसका उत्तर बहुत सीधे देती है: काम की निन्दा अपने आप में नहीं है। धर्म की मर्यादा में रहने वाला काम, जैसे विवाह द्वारा परिवार की इच्छा, स्वयं भगवान का ही रूप है। मधुसूदन भी कहते हैं, शास्त्र जिसकी अनुमति देता है, पत्नी, सन्तान, धन की वह इच्छा। यानी इच्छा अपने आप में बुरी नहीं। नदी भी पानी है, और बाढ़ भी पानी है। फ़र्क़ बस किनारों का है।

संत ज्ञानेश्वर इस पर बहुत सुंदर बात कहते हैं। वे कहते हैं, ऐसा काम इन्द्रियों जैसा व्यवहार तो करता है, पर धर्म को लाँघने नहीं देता; वह नियम का दीया साथ लेकर चलता है। और इसी कारण, वे कहते हैं, ऐसा आदमी मोक्ष के तीर्थ में मुक्त होकर भी संसार का भोग करता है। घर-गृहस्थी वाले के लिए इससे बड़ा भरोसा क्या होगा: आपका परिवार, आपका प्रेम, आपकी सन्तान की चाह, धर्म की मर्यादा में हो तो भगवान से दूर नहीं ले जाती, वह भी उसी धागे का एक मनका है।

और यहाँ यह भी कहना ठीक है कि अभिनवगुप्त इस काम का एक दूसरा, भीतर का अर्थ करते हैं: शुद्ध चेतना की वह इच्छा, जिसका किसी चीज़ से विरोध नहीं। आचार्यों के ये दोनों अर्थ अपनी-अपनी जगह हैं। आप जिस अर्थ से भगवान के निकट आएँ, वही आपका अर्थ है।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने कहा, बुद्धि भी मैं, बल भी मैं, धर्म के अनुकूल काम भी मैं। तो फिर क्रोध, लोभ, आलस, ये कहाँ से आते हैं? और अगर सब कुछ उन्हीं से है, तो क्या वे भी इन सबमें बँधे हैं? अगले दो श्लोक इसका उत्तर देते हैं, और साथ ही यह भी बताते हैं कि हम उन्हें क्यों नहीं पहचान पाते। आइए, सुनते हैं।

ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये । मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥ १२ ॥
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त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् । मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥ १३ ॥
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बारहवाँ श्लोक। "ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये।" जो भी सात्त्विक, राजस और तामस भाव हैं, "मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि", उन्हें मुझसे ही उत्पन्न जानो। पर मैं उनमें नहीं हूँ; वे मुझमें हैं।

श्रीधर स्वामी तीनों के उदाहरण देते हैं। सात्त्विक भाव, जैसे शान्ति और संयम। राजस, जैसे द्वेष और घमण्ड। तामस, जैसे शोक और मोह। नीलकण्ठ तामस में नींद और आलस भी गिनते हैं। यानी पिछले अंश के अन्त में जो प्रश्न उठा था, कि क्रोध और लोभ कहाँ से आते हैं, उसका पहला उत्तर यह है: वे भी उसी प्रकृति के भाव हैं जो उन्हीं से निकली है। संसार में ऐसी कोई दूसरी शक्ति नहीं जो भगवान से अलग बैठकर बुराई बनाती हो।

पर फिर वह दूसरी पंक्ति, जो इस श्लोक का दिल है: "न त्वहं तेषु ते मयि", मैं उनमें नहीं, वे मुझमें हैं। शंकराचार्य इसका अर्थ करते हैं: वे भाव मुझसे जन्मते हैं, फिर भी मैं उनके अधीन नहीं, उनके वश में नहीं, जैसे संसारी जीव होता है; वे मेरे अधीन हैं। हमारी टीका भी यही कहती है: वे भाव उन पर आश्रित हैं, पर वे उन पर आश्रित नहीं, और उनसे रँगे नहीं जाते।

संत ज्ञानेश्वर यहाँ उपमाओं की झड़ी लगा देते हैं। वे कहते हैं: सपने के तालाब में जागना कभी नहीं डूबता। आकाश में बादल उठता है, पर बादल में आकाश नहीं होता। आग से धुआँ उठता है, पर धुएँ में आग नहीं होती। रात को आप सपना देखते हैं कि बाढ़ आई है और आप डूब रहे हैं। पूरा सपना आपके भीतर ही चल रहा है; पर आप, जो जागकर उठेंगे, उस पानी में कभी भीगे नहीं थे।

अब तेरहवाँ श्लोक। "त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्।" गुणों से बने इन तीन प्रकार के भावों से यह सारा जगत्, "मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्", मोहित होकर मुझे नहीं जानता, जो इनसे परे और अविनाशी हूँ।

यहीं आज के शुरू वाले प्रश्न का उत्तर है, कि वे दिखते क्यों नहीं। श्रीकृष्ण कहते हैं, दोष देखने वाले की आँख का है, धागे का नहीं। हम मनकों के रंग में इतने खो जाते हैं कि धागा याद ही नहीं आता। और ध्यान दीजिए, केवल तामस भाव ही मोहित नहीं करते। श्लोक कहता है, तीनों। राजस तो सीधे बाँधता है, क्रोध से, लालच से। पर सात्त्विक भाव भी बाँध सकता है: अपनी शान्ति का घमण्ड, अपने ज्ञान का घमण्ड, अपनी पवित्रता का घमण्ड।

संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर एक ऐसी बात कहते हैं जो आज के शीर्षक को पूरा कर देती है। वे कहते हैं: जैसे पानी पर उगी काई पानी को ही ढक लेती है। और फिर: सब प्राणी मेरे ही हैं, पर मुझे नहीं पहचानते, जैसे पानी में बने मोती पानी में घुलते नहीं। सोचिए। मोती पानी के भीतर, सीप में जन्मा। पर बनकर वह इतना कड़ा, इतना अलग हो गया कि जिस पानी से बना, उसी में अब घुलता नहीं। हम भी ऐसे ही मोती हैं। उसी से बने, उसी में पिरोए, पर "मैं" और "मेरा" के कड़ेपन से इतने अलग कि उसमें घुलना भूल गए।

अब इस मोह का एक ऐसा चित्र, जिसमें एक महान तपस्वी भगवान को सामने पाकर भी, और उनका रूप देखकर भी, उनकी दी हुई चीज़ नहीं पहचान पाता। यह आश्वमेधिक पर्व में है, युद्ध के बाद का समय। श्रीकृष्ण हस्तिनापुर से द्वारका लौट रहे थे। रास्ते में मरुभूमि में उन्हें महर्षि उदंक मिले, बड़े तपस्वी, जिनकी ख्याति सब लोकों तक थी।

उदंक ने बड़े अपनेपन से पूछा: "हे केशव, क्या तुमने कौरवों और पाण्डवों में अटल भाईचारा करा दिया? क्या वे सब तुम्हारी रक्षा में सुख से रहेंगे?" और श्रीकृष्ण ने सच बता दिया: "मैंने शान्ति के लिए यत्न किया, पर वे नहीं माने। उन्होंने मेरी, भीष्म की और विदुर की सलाह का उल्लंघन किया। अब केवल पाँच पाण्डव बचे हैं, और धृतराष्ट्र के पुत्र सब मारे गए।"

यह सुनकर उदंक क्रोध से लाल हो गए। "हे कृष्ण, तुम समर्थ थे, फिर भी तुमने अपने ही सम्बन्धियों को नहीं बचाया। इसलिए मैं निःसन्देह तुम्हें शाप दूँगा।" देखिए, उदंक कोई बुरे आदमी नहीं हैं। उनका क्रोध भी दया से निकला है, इतने लोगों के मरने के दुःख से। पर वह राजस भाव उनकी आँख पर पर्दा बन गया, और जो सामने खड़ा है, उसे वे केवल एक सम्बन्धी, एक चूक करने वाला मनुष्य देखने लगे।

श्रीकृष्ण नाराज़ नहीं हुए। उन्होंने कहा, "पहले मेरी पूरी बात सुनो, अध्यात्म सुनो, फिर शाप देना हो तो देना। मैं तुम्हारे तप का नाश नहीं चाहता, तुमने उसे बचपन से कष्ट सहकर कमाया है।" और फिर जो उन्होंने पहला वाक्य कहा, वह सुनकर आपको लगेगा कि हम अभी-अभी गाए हुए बारहवें श्लोक को ही दोबारा सुन रहे हैं: "तम, रज और सत्त्व को मुझ पर आश्रित भाव जानो।" और आगे: "मैं ओंकार हूँ।" आठवें श्लोक का "प्रणवः सर्ववेदेषु" याद कीजिए। और एक वाक्य जो इस तेरहवें श्लोक का ही महाभारत में दूसरा रूप लगता है: "मनुष्य के रूप में मैंने कौरवों से दीन होकर याचना की, पर मोह में पड़े, मोहित होकर, उन्होंने मेरी बात नहीं मानी।"

उदंक का क्रोध उतर गया। उन्होंने कहा, "मैं आपको जगत् का कर्ता जानता हूँ। मुझे अपना वैष्णव रूप दिखाइए।" और श्रीकृष्ण ने उन्हें वही रूप दिखाया जो अर्जुन ने देखा था, हज़ार सूर्यों जैसा, सारे आकाश को भरता हुआ। उदंक ने स्तुति की, और जब वर माँगने को कहा गया, तो एक बहुत साधारण-सी चीज़ माँगी: "इस मरुभूमि में जहाँ इच्छा हो, वहाँ जल मिले।" श्रीकृष्ण ने कहा, "जब इच्छा हो, मेरा स्मरण करना," और चले गए।

और अब वह परीक्षा। एक दिन उदंक प्यासे थे, मरुभूमि में भटक रहे थे, और उन्होंने श्रीकृष्ण का स्मरण किया। तभी सामने एक आदमी दिखा, नंगा, धूल और कीचड़ से सना, कुत्तों से घिरा, तलवार बाँधे, धनुष-बाण लिए, और उसके शरीर से ही जल की धारा बह रही थी। उसने हँसते हुए कहा, "आओ उदंक, मुझसे जल लो। तुम्हें प्यासा देखकर मुझे बहुत दया आ रही है।" उदंक ने कठोर वचनों से उसे झिड़क दिया, और साथ में श्रीकृष्ण को भी कठोर बातें कहीं। वह बार-बार कहता रहा, "पियो।" वे नहीं पिए। और वह आदमी कुत्तों सहित वहीं अदृश्य हो गया।

जब श्रीकृष्ण फिर मिले, उदंक ने शिकायत की, कि ब्राह्मण को ऐसे जल देना आपको शोभा नहीं देता। और श्रीकृष्ण ने कोमल वाणी में जो बताया, वह सुनिए: "मैंने इन्द्र से कहा था कि उदंक को जल के रूप में अमृत दो। इन्द्र ने कहा, मनुष्य को अमर नहीं करना चाहिए। मैंने आग्रह किया, तो वे बोले, मैं उसी रूप में जाऊँगा; अगर उदंक ने स्वीकार किया तो अमृत दूँगा, ठुकराया तो नहीं।" "वह रूप धरकर स्वयं इन्द्र तुम्हारे सामने आए थे, अमृत लेकर। और तुमने उसे ठुकरा दिया। यह तुम्हारी बहुत बड़ी चूक है।"

"मोहितं नाभिजानाति"। उदंक ने भगवान का विश्वरूप देखा था। स्तुति की थी। वर पाया था। फिर भी जब वरदान आया, तो वह उनकी अपनी पसन्द के रूप में नहीं आया, और वे उसे पहचान नहीं पाए। हम में से कितनी बार ऐसा होता है? हम प्रार्थना करते हैं, और उत्तर आता है, पर किसी ऐसे आदमी के हाथ से, किसी ऐसी घटना के रूप में, जिसे हम छोटा, अप्रिय या अपने योग्य नहीं समझते। और हम उसे ठुकरा देते हैं, और फिर शिकायत करते हैं कि भगवान ने सुना ही नहीं। गुणों का पर्दा यही करता है: वह हमें बताता है कि भगवान को कैसा दिखना चाहिए।

पर कथा यहाँ समाप्त नहीं होती, और इसका अन्त मुझे बहुत प्यारा लगता है। श्रीकृष्ण ने कहा: "फिर भी तुम्हारी जल की इच्छा मैं पूरी करूँगा। जिन दिनों तुम्हें जल चाहिए होगा, मरुभूमि में जल से भरे बादल आएँगे, और तुम्हें रसीला जल देंगे। वे उदंक-मेघ कहलाएँगे।" और पाठ कहता है, आज भी उदंक-मेघ मरुभूमि में बरसते हैं। रसीला जल। "रसोऽहमप्सु"। जो अमृत उदंक ने एक रूप में ठुकराया था, वही रस दूसरे रूप में बादल बनकर लौट आया। भूल हमारी होती है; धागा फिर भी नहीं टूटता।

पर अभी एक बात बाकी है। अगर यह पर्दा इतना गहरा है कि उदंक जैसे तपस्वी भी उसमें उलझ जाते हैं, और मार्कण्डेय जैसे सिद्ध सौ वर्ष दौड़कर भी उसका अन्त नहीं पाते, तो फिर हम जैसे साधारण लोग उससे कैसे निकलें? आज के अन्तिम दो श्लोक यही बताते हैं, और उनमें से पहला इस पूरे अध्याय का सबसे बड़ा भरोसा है। आइए, सुनते हैं।

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया । मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥ १४ ॥
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न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः । माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥ १५ ॥
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चौदहवाँ श्लोक। "दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।" यह मेरी दैवी, तीन गुणों वाली माया, सचमुच पार करने में कठिन है। "मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।" पर जो केवल मेरी शरण में आते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं।

पहले "माया" शब्द। बहुत लोग इसका अर्थ "झूठ" या "धोखा" समझते हैं। रामानुज यहाँ साफ़ कहते हैं कि माया का अर्थ मिथ्या नहीं; यह भगवान की वह अद्भुत, सच्ची शक्ति है जो विचित्र काम करती है। श्रीधर स्वामी "दैवी" का अर्थ करते हैं अलौकिक, अत्यन्त अद्भुत। और श्रीकृष्ण कहते हैं, "मम माया", मेरी माया। हमारी टीका इस एक शब्द से पूरी बात खोल देती है: माया उनकी अपनी शक्ति है, इसलिए वह अपने बल से नहीं, उसके स्वामी की शरण लेने से पार होती है।

और "गुणमयी", इस शब्द में विश्वनाथ चक्रवर्ती और बलदेव विद्याभूषण एक सुंदर दूसरा अर्थ सुनते हैं। संस्कृत में "गुण" का एक अर्थ रस्सी का बल भी है। तो तीन गुणों वाली माया, यानी तीन लड़ों वाली रस्सी, जो इतनी कसी है कि न कोई उसे काट सके, न खोल सके। पर जिसने रस्सी बटी है, वह उसे एक झटके में खोल देता है।

संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर माया को एक बाढ़ भरी नदी कहते हैं, और फिर गिनाते हैं कि लोग उसे कैसे-कैसे पार करने उतरे। कुछ अपनी बुद्धि की बाँहों के भरोसे कूदे, उनका पता ही नहीं चला। कुछ ज्ञान के गहरे भँवर में अपने ही घमण्ड से निगल लिए गए। कुछ ने वेदों का बेड़ा बाँधा, पर उस पर अहंकार के पत्थर भी लाद लिए, और डूब गए। कुछ जवानी के भरोसे उतरे, और कामनाओं के मगर उन्हें चबा गए। और फिर ज्ञानेश्वर कहते हैं: यहाँ केवल वे ही खेल-खेल में पार हुए जिन्होंने सारे भाव से मुझे भजा; उनके लिए तो इसी किनारे पर माया का पानी सूख गया।

"मामेव", केवल मुझे। श्रीधर स्वामी इस "ही" पर ज़ोर देते हैं: न डगमगाने वाली भक्ति से। यानी शरण आधी नहीं। एक पैर इस नाव में, एक उस नाव में, ऐसे नदी पार नहीं होती।

और अब मैं आपको वह बताता हूँ जिसका वादा मैंने किया था। मार्कण्डेय, उस बालक के भीतर, सौ वर्ष से अधिक दौड़ते रहे, और उस देह का अन्त नहीं पा सके। फिर क्या हुआ? उनके अपने शब्द हैं: "तब मैं विधिपूर्वक उन्हीं की शरण में गया, उन श्रेष्ठ, वर देने वाले देव की, मन से और कर्म से। और तब मैं अचानक, वायु के वेग से, उस महात्मा के खुले मुख से बाहर निकल आया।" और फिर वह पंक्ति, जो इस श्लोक का महाभारत में अपना भाष्य लगती है: "क्षण भर में मेरी दृष्टि फिर नई हो गई। मैंने अपने आप को माया से मुक्त और होश में आया हुआ देखा।"

सौ वर्ष की दौड़ से जो नहीं हुआ, वह एक शरण से हो गया। "मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।"

और फिर उस बालक ने जो कहा, उसमें इस पूरे सत्संग के श्लोक एक-एक करके लौट आते हैं। "सच है, देवता भी मुझे ठीक-ठीक नहीं जानते", यह तीसरा श्लोक है। "जल को नार कहते हैं, वह मेरा निवास है, इसलिए मैं नारायण हूँ। चन्द्रमा और सूर्य मेरी आँखें हैं", यह आठवाँ। "अपनी माया से मैं सब प्राणियों में भली-भाँति स्थित हूँ, फिर भी कोई मुझे नहीं जानता", यह तेरहवाँ। और फिर: "मेरे भीतर तुमने जो कष्ट पाया, वह सब तुम्हारे कल्याण के लिए था।"

और अब कथा का सबसे बड़ा क्षण। यह सब सुनाकर मार्कण्डेय युधिष्ठिर से कहते हैं, और ध्यान रहे कि श्रीकृष्ण उसी समय वहीं बैठे हैं: "बहुत पहले जिन कमलनयन देव को मैंने देखा था, वे यही तुम्हारे सम्बन्धी जनार्दन हैं। यही वृष्णिवंशी कृष्ण वे पुराणपुरुष हैं, जो यहाँ मानो खेलते हुए बैठे हैं। माधव सब प्राणियों के पिता और माता हैं। हे कुरुश्रेष्ठो, इन शरण देने वाले की शरण में जाओ।" और पाठ कहता है, पाण्डवों ने, द्रौपदी के साथ, सबने जनार्दन को नमस्कार किया। और आज, कुरुक्षेत्र में, वही जनार्दन अर्जुन के रथ पर सारथी बने बैठे हैं, और अपने मुँह से वही बात कह रहे हैं जो वर्षों पहले मार्कण्डेय ने वन में कही थी: मेरी शरण आओ, तो यह माया पार हो जाएगी।

अब पन्द्रहवाँ श्लोक, जो दूसरी ओर का चित्र है। "न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः।" बुरे कर्म करने वाले, मूढ़, नीच मनुष्य मेरी शरण नहीं लेते, "माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः", जिनका ज्ञान माया ने हर लिया है, और जिन्होंने आसुरी स्वभाव का आश्रय लिया है।

यह श्लोक कठोर लगता है, पर इसे ध्यान से पढ़िए। रामानुज इसमें चार अलग-अलग लोग देखते हैं, जो एक-दूसरे से आगे बढ़कर दूर होते जाते हैं। सबसे गहरी बात श्रीधर स्वामी कहते हैं: "जिनका ज्ञान माया ने हर लिया", यानी जिन्हें शास्त्र और गुरु से ज्ञान मिला भी था, पर वह छिन गया। महाभारत में इसका उदाहरण दूर नहीं है। उस सभा का दृश्य आप पंद्रहवें सत्संग में सुन चुके हैं: माता गान्धारी की सार्थक बात अनसुनी करके दुर्योधन सभा से निकला, और शकुनि, कर्ण और दुःशासन के साथ मिलकर यह योजना बनाई कि जो पाण्डवों का आश्रय है, उन्हीं श्रीकृष्ण को बलपूर्वक पकड़ लिया जाए। ज्ञान उसके द्वार तक पहुँचा था; उसने उसे भीतर नहीं आने दिया।

पर यह श्लोक दूसरों पर उँगली उठाने के लिए नहीं है। मधुसूदन सरस्वती इसके अन्त में बस इतना कहते हैं, "अहो, उनका दुर्भाग्य", जैसे कोई दुःख से सिर हिलाए। यह एक चेतावनी है, जो हम अपने भीतर देखें: कहीं मेरा पढ़ा हुआ, सुना हुआ ज्ञान भी तो धीरे-धीरे छिन नहीं रहा? और इसका उत्तर ठीक पिछले श्लोक में है: जो भी शरण में आता है, पार हो जाता है। दरवाज़ा किसी के लिए बन्द नहीं।

और अगले सत्संग में श्रीकृष्ण बताएँगे कि जो शरण में आते हैं, वे कौन हैं। सोलहवाँ श्लोक है, "चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन", चार प्रकार के पुण्यात्मा लोग मुझे भजते हैं, और उनमें पहला नाम उसका है जो दुःख में पुकारता है। वे चार कौन हैं, यह अगली बार।

तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली बात। भगवान को देखने के लिए दुनिया छोड़नी नहीं पड़ती। "रसोऽहमप्सु", पानी का स्वाद, धूप, मिट्टी की पहली खुशबू, आपकी साँस और आपकी मेहनत, हर मनके में वही धागा है। आज एक गिलास पानी पीते समय एक क्षण के लिए यह याद कर लीजिए।

दूसरी बात। हम उन्हें इसलिए नहीं पहचानते कि हमने पहले से तय कर रखा है कि वे कैसे दिखेंगे। उदंक ने विश्वरूप देखा, फिर भी अमृत को नहीं पहचाना, क्योंकि वह उनकी पसन्द के रूप में नहीं आया। जो मदद अप्रिय रूप में आए, उसे ठुकराने से पहले एक बार ठहरिए।

तीसरी बात। यह माया अपने बल से पार नहीं होती। मार्कण्डेय सौ वर्ष दौड़े, फिर शरण गए, और एक क्षण में बाहर थे। "मामेव ये प्रपद्यन्ते।" आज रात सोने से पहले, कोई लम्बी विधि नहीं, बस इतना कह दीजिए: "मैं आपकी शरण में हूँ।"

आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आपके जीवन में कभी कोई मदद ऐसे रूप में आई थी, जिसे आपने पहले पहचाना नहीं, और बाद में समझ आया कि वह भगवान की ओर से थी? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।

मोती धागे को देख नहीं पाता। पर धागा हर मोती के बीच से होकर जाता है, आपके भी।

जय श्री कृष्ण।

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया । मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥ १४ ॥
गीता 7.14 — अर्थ पढ़ें ›

तीन बातें

  1. भगवान को देखने के लिए दुनिया छोड़नी नहीं पड़ती। "रसोऽहमप्सु", पानी का स्वाद, धूप, मिट्टी की पहली खुशबू, आपकी साँस और आपकी मेहनत, हर मनके में वही धागा है। आज एक गिलास पानी पीते समय एक क्षण के लिए यह याद कर लीजिए।
  2. हम उन्हें इसलिए नहीं पहचानते कि हमने पहले से तय कर रखा है कि वे कैसे दिखेंगे। उदंक ने विश्वरूप देखा, फिर भी अमृत को नहीं पहचाना, क्योंकि वह उनकी पसन्द के रूप में नहीं आया। जो मदद अप्रिय रूप में आए, उसे ठुकराने से पहले एक बार ठहरिए।
  3. यह माया अपने बल से पार नहीं होती। मार्कण्डेय सौ वर्ष दौड़े, फिर शरण गए, और एक क्षण में बाहर थे। "मामेव ये प्रपद्यन्ते।" आज रात सोने से पहले, कोई लम्बी विधि नहीं, बस इतना कह दीजिए: "मैं आपकी शरण में हूँ।"