‹

सत्संग २०

0:00 1:17:36

साधना अधूरी रह गई तो?

गीता 6.33–6.47 · 78 मिनट

मन नहीं टिकता, बीच में छूट गया तो सब बेकार? (नहीं: 6.40)

अर्जुन उवाच योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन । एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ॥ ३३ ॥
गीता 6.33 — अर्थ पढ़ें ›
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम् । तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥ ३४ ॥
गीता 6.34 — अर्थ पढ़ें ›
श्रीभगवानुवाच असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥ ३५ ॥
गीता 6.35 — अर्थ पढ़ें ›

आपने कभी कोई साधना शुरू की है? रोज़ सुबह दस मिनट बैठना, कोई जप, गीता का एक अध्याय, या बस इतना कि रात को सोने से पहले मन को थोड़ा शान्त करेंगे। पहले कुछ दिन बड़े अच्छे जाते हैं। फिर एक सुबह मन बैठता ही नहीं, आँख बन्द करते ही दफ़्तर की बात, घर का हिसाब, किसी की कही हुई कड़वी बात। फिर एक दिन छूटता है, फिर तीन दिन, और फिर एक दिन भीतर से आवाज़ आती है: "छोड़ो, तुमसे नहीं होगा। जितना किया, वह भी सब बेकार गया।" यही आज का सवाल है: साधना अधूरी रह गई तो? मन नहीं टिकता, और रास्ता बीच में छूट गया, तो क्या सब व्यर्थ हो गया?

जय श्री कृष्ण।

आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का बीसवाँ सत्संग है, और छठे अध्याय का आख़िरी। और आज का दिन एक और कारण से भी ख़ास है, जिसकी बात मैं आख़िर में करूँगा। पहले जल्दी से याद कर लें कि पिछली बार हम कहाँ रुके थे। पिछले सत्संग में, सोलहवें से बत्तीसवें श्लोक तक, श्रीकृष्ण ने संतुलन सिखाया था: योग न बहुत खाने वाले का है, न बिलकुल न खाने वाले का, न बहुत सोने वाले का, न बहुत जागने वाले का। फिर वह दीपक आया, "यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते", जो हवा न चलने वाली जगह में काँपता नहीं। फिर वह सीधी-सी सलाह कि यह चंचल और अस्थिर मन जहाँ-जहाँ भागे, वहाँ-वहाँ से उसे लौटाकर वापस ले आओ। और आख़िर में वह ऊँची बात, कि योगी सबमें भगवान को देखता है और सबको भगवान में, और दूसरे का सुख-दुःख अपने जैसा मानता है।

अब सोचिए, यह सब सुनकर अर्जुन के मन में क्या चल रहा होगा। आपको याद रहे, यह सब हमें सञ्जय सुना रहे हैं, हस्तिनापुर में, अन्धे राजा धृतराष्ट्र को, उस दिन जब भीष्म बाणों की शय्या पर गिर चुके हैं। महाभारत के भीष्म पर्व का तीसवाँ अध्याय ही गीता का छठा अध्याय है, "आत्मसंयम योग"। और इस पूरे अध्याय में अब तक केवल श्रीकृष्ण बोले हैं। बत्तीस श्लोक तक अर्जुन चुपचाप सुनते रहे। अब तैंतीसवें श्लोक में पहली बार वे मुँह खोलते हैं।

"योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन।" हे मधुसूदन, आपने यह जो समता वाला योग बताया है, "एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम्", मैं इसकी कोई स्थिर, टिकने वाली जगह नहीं देखता, क्योंकि मन चंचल है।

देखिए, अर्जुन यह नहीं कह रहे कि आपकी बात ग़लत है। वे यह भी नहीं कह रहे कि मैं यह नहीं करूँगा। वे सिर्फ़ इतना कह रहे हैं: "मुझे यह टिकता हुआ नहीं दिखता।" यह ईमानदारी है। गुरु ने एक बहुत ऊँची चोटी दिखाई, सबमें एक-सी नज़र, सुख-दुःख में एक-सा मन, और शिष्य हाथ जोड़कर कहता है कि मेरे पैर अभी वहाँ तक नहीं पहुँचते। पंद्रहवें सत्संग में हमने सुना था कि गुरु से सीखना पूछने से शुरू होता है। यह वही पूछना है। जो अपनी कमज़ोरी छिपाकर "हाँ, समझ गया" कह देता है, वह वहीं रह जाता है। जो कह देता है "मुझसे नहीं होता", उसी के लिए आगे का रास्ता खुलता है।

और ध्यान दीजिए, अर्जुन किस शब्द पर अटके हैं: "चञ्चल"। यह शब्द उन्होंने अभी-अभी श्रीकृष्ण से ही सुना था, छब्बीसवें श्लोक में, "मनश्चञ्चलमस्थिरम्", चंचल और अस्थिर मन। यानी श्रीकृष्ण ने कहा था, "मन भागे तो लौटा लाओ।" और अर्जुन कह रहे हैं, "लौटा तो लाऊँ, पर यह टिकता कहाँ है?"

फिर चौंतीसवाँ श्लोक, जिसमें अर्जुन अपनी बात खोलकर रखते हैं। "चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम्।" हे कृष्ण, मन चंचल है, मथ डालने वाला है, बलवान है और दृढ़ है। "तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्।" इसे वश में करना मुझे वायु को रोकने जितना कठिन लगता है।

चार शब्द हैं, और चारों अलग हैं। श्रीधर स्वामी इन्हें एक-एक करके खोलते हैं। चंचल, यानी स्वभाव से ही चपल, एक जगह न ठहरने वाला। प्रमाथि, यानी जो शरीर और इन्द्रियों को मथ डाले, उन्हें हिला दे। बलवान, यानी जिसे सोच-विचार से भी जीतना मुश्किल। और दृढ़, यानी विषयों की पुरानी वासनाओं से इतना बँधा हुआ कि उसे भेदा न जा सके। नीलकण्ठ "प्रमाथि" के लिए एक उपमा देते हैं: जैसे बहुत-से लुटेरे मिलकर एक अकेले आदमी को घेर लें। सच कहिए, जब आप बैठते हैं तो क्या ऐसा ही नहीं लगता? एक विचार नहीं आता, पूरी टोली आती है।

और वायु वाली उपमा पर आचार्यों ने बड़ी सुंदर बातें कही हैं। रामानुज कहते हैं, यह ऐसा है जैसे सामने से आती तेज़ आँधी को कोई हाथ के पंखे से रोकने चले। श्रीधर कहते हैं, आकाश में बहती हवा को घड़े में बन्द करना। और तिलक इसे ठेठ बोली में कहते हैं: हवा की गठरी बाँधना। हवा की गठरी। जिसने कभी ध्यान में बैठने की कोशिश की है, वह इस उपमा पर मुस्कुराए बिना नहीं रह सकता।

अठारहवें सत्संग में आपने यक्ष के प्रश्न सुने थे। वहाँ भी यही बात थी: "वायु से तेज़ क्या है?" और युधिष्ठिर ने उत्तर दिया था, "मन वायु से तेज़ है।" दो भाई, दो अलग जगहें, और एक ही अनुभव।

और यहाँ एक बात पर शंकराचार्य और मधुसूदन सरस्वती दोनों रुकते हैं। अर्जुन इस श्लोक में श्रीकृष्ण को "कृष्ण" कहकर पुकारते हैं। वे कहते हैं, "कृष्ण" शब्द का एक अर्थ है खींचने वाला, जो भक्तों के दोषों को खींचकर दूर कर दे। मधुसूदन लिखते हैं कि इस पुकार में अर्जुन का एक छिपा हुआ भरोसा है: मन की यह चंचलता कोई और नहीं हटा सकता, पर आप हटा सकते हैं। यानी शिकायत भी है, और शिकायत के भीतर शरण भी।

अब पैंतीसवाँ श्लोक, और यहाँ से श्रीकृष्ण का उत्तर शुरू होता है। "असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।" हे महाबाहो, इसमें कोई संदेह नहीं कि मन चंचल है और बड़ी कठिनाई से वश में आता है। "अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।" परन्तु हे कुन्तीपुत्र, यह अभ्यास से और वैराग्य से वश में होता है।

पहला शब्द सुनिए: "असंशयं"। श्रीकृष्ण बहस नहीं करते। वे यह नहीं कहते कि "अर्जुन, तुम बढ़ा-चढ़ाकर बोल रहे हो, मन तो आसान है।" वे पहले मान लेते हैं: हाँ, तुम सही हो, मन सचमुच ऐसा ही है। अच्छा शिक्षक यही करता है। जो दर्द आप बता रहे हैं, पहले वह उसे सच मानता है, फिर दवा देता है। और यह बात आपके लिए भी है: अगर आपका मन ध्यान में नहीं टिकता, तो यह आपकी कोई अनोखी कमी नहीं है। भगवान ख़ुद कह रहे हैं कि मन का स्वभाव यही है।

फिर दो सम्बोधन, और दोनों में कुछ छिपा है। "महाबाहो", बड़ी भुजाओं वाले। मधुसूदन सरस्वती याद दिलाते हैं कि ये वही भुजाएँ हैं जिन्होंने साक्षात् महादेव से युद्ध किया था। चौथे सत्संग में आपने वह कथा सुनी थी, किरात-वेशी शिव और अर्जुन की। विश्वनाथ चक्रवर्ती इसे और आगे ले जाते हैं: जिसने रणभूमि में बड़े-बड़े वीर जीते, पिनाकधारी को भी प्रसन्न कर लिया, उसकी बड़ी भुजाओं की असली परीक्षा तो तब है जब वह मन नाम के इस सबसे बड़े योद्धा को जीते।

और दूसरा सम्बोधन, "कौन्तेय", कुन्ती के बेटे। विश्वनाथ इसमें एक बहुत अपनेपन वाली बात सुनते हैं, मानो श्रीकृष्ण कह रहे हों: डरो मत, तुम मेरे पिता की बहन के बेटे हो, तुम्हारी सहायता करना मेरा काम है। और यह रिश्ता महाभारत में लिखा हुआ है। आदि पर्व बताता है कि वसुदेव के पिता शूर थे, और उनकी बेटी पृथा थी, जिसे उन्होंने अपनी बुआ के निःसन्तान बेटे कुन्तिभोज को सौंप दिया था। और उद्योग पर्व में, जब श्रीकृष्ण शान्ति का प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर आते हैं, तो पाठ साफ़ कहता है कि वे "अपनी बुआ पृथा" से मिलने गए। यानी जो इस रथ पर अर्जुन को मन का रहस्य बता रहा है, वह केवल गुरु नहीं, घर का अपना है।

अब दवा। अभ्यास और वैराग्य। हमारी टीका इसे बहुत सीधे शब्दों में कहती है: अभ्यास है मन को बार-बार अपने लक्ष्य पर लौटाना, और वैराग्य है विषय-भोगों की कमी देख लेना, ताकि मन उनके पीछे भागना छोड़ दे। और दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं।

दोनों क्यों चाहिए, इसके लिए नीलकण्ठ एक किसान का चित्र देते हैं, जो मुझे इस श्लोक की सबसे अच्छी व्याख्या लगती है। किसान नहर से खेतों में पानी बाँटता है। एक क्यारी का मुँह बन्द करता है, तो दूसरी का खोलता है। नीलकण्ठ कहते हैं, वैराग्य वह मिट्टी है जो विषयों की ओर बहती धारा का मुँह बन्द कर देती है, और अभ्यास वह फावड़ा है जो कल्याण की ओर वाली नाली खोल देता है। पानी को रोका नहीं जा सकता, वह कहीं न कहीं तो बहेगा। सवाल बस इतना है कि किस क्यारी में।

और संत ज्ञानेश्वर इसमें एक प्यारी बात जोड़ते हैं। वे कहते हैं, मन में एक अच्छाई भी है: जहाँ उसे मिठास मिल जाए, वहीं वह चिपक जाता है। इसलिए उसे अनुभव के सुख का स्वाद चखाते जाओ। मन से लड़ना नहीं है, उसे बेहतर स्वाद देना है। जिस बच्चे को अच्छा खाना मिलने लगे, वह धीरे-धीरे कूड़े की चीज़ें माँगना छोड़ देता है।

अब अभ्यास का अर्थ समझाने के लिए मुझे महाभारत में अर्जुन के बचपन से ज़्यादा सच्ची कोई कहानी नहीं मिलती। यह आदि पर्व में है, जब द्रोण हस्तिनापुर में राजकुमारों को धनुर्विद्या सिखा रहे थे।

अर्जुन हमेशा धनुष में लगे रहते थे। द्रोण ने एक दिन रसोइए को एकान्त में बुलाकर कहा, "अर्जुन को कभी अँधेरे में भोजन मत देना, और मेरी यह बात उसे बताना भी मत।" पाठ इसका कारण नहीं बताता, बस इतना कहता है। फिर एक दिन अर्जुन भोजन कर रहे थे, और हवा चली, और वहाँ जलता हुआ दीपक बुझ गया। पर अर्जुन खाते रहे। अँधेरे में भी उनका हाथ मुँह को छोड़कर कहीं और नहीं गया। पाठ कहता है, यह अभ्यास के कारण था।

और अब असली बात। अर्जुन ने उस अँधेरे में एक बात समझ ली। पाठ के शब्द हैं, "तदभ्यासकृतं मत्वा", यह अभ्यास का किया हुआ है, ऐसा मानकर, वे रात में भी धनुष से अभ्यास करने लगे। सोचिए, एक बुझे हुए दीपक से उन्होंने क्या सीखा: जो काम हाथ ने हज़ार बार किया है, वह आँखों के बिना भी हो जाता है। तो क्यों न धनुष भी ऐसा साध लूँ कि अँधेरे में भी निशाना न चूके? और फिर एक रात द्रोण ने उनकी डोरी की टंकार सुनी। वे उठे, उनके पास गए, उन्हें गले लगाया और कहा, "मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा कि संसार में कोई दूसरा धनुर्धर तुम्हारे बराबर न हो। यह मैं तुमसे सच कहता हूँ।"

और एक छोटी-सी बात, जो मुझे बहुत प्यारी लगती है। जिस श्लोक में अर्जुन रात में अभ्यास शुरू करते हैं, उसी में पाठ उन्हें "महाबाहु" कहता है। वही शब्द जिससे आज श्रीकृष्ण उन्हें पुकार रहे हैं, अभ्यास का नाम लेने से ठीक पहले।

अब इस कथा को पिछले सत्संग के दीपक के साथ रखकर देखिए। वहाँ कहा गया था कि योगी का मन उस दीपक जैसा है जो बिना हवा की जगह में काँपता नहीं। पर हमारी ज़िंदगी में हवा चलती है। बीमारी की हवा, चिन्ता की हवा, थकान की हवा। और कभी-कभी दीपक बुझ भी जाता है। मन का उत्साह, वह अच्छा भाव, वह मीठापन, सब चला जाता है। उस दिन क्या काम आता है? अभ्यास। जो रोज़ किया है, वह अँधेरे में भी हाथ को मुँह तक ले जाता है। जिस दिन ध्यान में बैठने का मन न हो, उस दिन भी बैठ जाना, पाँच मिनट ही सही, यही रात का अभ्यास है। भाव वाले दिन तो सब बैठते हैं। अर्जुन वे बनते हैं जो अँधेरे में भी डोरी खींचते हैं।

तो श्रीकृष्ण का पहला उत्तर यह है: मन कठिन है, यह सच है, पर असम्भव नहीं। बार-बार लौटाना, और जिस ओर वह भागता है उस ओर की कमी देख लेना। धीरे-धीरे, जैसे किसान की नाली मुड़ती है।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने कहा, "अभ्यास से होगा।" पर अभ्यास में समय लगता है, और अर्जुन के मन में अब एक और गहरा डर उठने वाला है: अगर समय ही न मिला तो? अगर यह जीवन बीच में ही चुक गया तो? आइए, अगले तीन श्लोक सुनते हैं।

असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः । वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥ ३६ ॥
गीता 6.36 — अर्थ पढ़ें ›
अर्जुन उवाच अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः । अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥ ३७ ॥
गीता 6.37 — अर्थ पढ़ें ›
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति । अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥ ३८ ॥
गीता 6.38 — अर्थ पढ़ें ›

छत्तीसवें श्लोक में श्रीकृष्ण अपनी बात पूरी करते हैं। "असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः।" मेरा मत है कि जिसका मन वश में नहीं, उसके लिए योग कठिनता से मिलता है। "वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः।" परन्तु जिसका मन वश में है और जो प्रयत्न करता रहता है, वह सही उपाय से इसे पा सकता है।

इस आधे श्लोक में तीन बातें हैं, और तीनों को अलग-अलग देखना चाहिए। पहली, "वश्यात्मना", जिसका मन वश में है। शंकराचार्य कहते हैं, यहाँ वश में होने का अर्थ है अभ्यास और वैराग्य से वश में किया हुआ। यानी यह कोई जन्म से मिला गुण नहीं है, यह पिछले श्लोक की दवा का फल है। दूसरी, "यतता", जो प्रयत्न करता रहता है। शंकराचार्य इसका अर्थ करते हैं, जो बार-बार, फिर-फिर प्रयत्न करता है। एक बार का ज़ोर नहीं, रोज़ का लगना। और तीसरी, "शक्योऽवाप्तुमुपायतः" का आख़िरी हिस्सा, सही उपाय से। ज़िद से नहीं, ठीक ढंग से। जैसे कोई तैरना सीखे: पानी में हाथ-पैर बहुत ज़ोर से पटकने से कोई तैरना नहीं सीखता। सही ढंग जानकर, रोज़ थोड़ा-थोड़ा उतरने से सीखता है।

तिलक इस श्लोक का सार एक वाक्य में कहते हैं, जो याद रखने लायक है: जो बात पहले बहुत कठिन दिखती है, वही अभ्यास से और लम्बे उद्योग से आख़िर में सिद्ध हो जाती है। और संत ज्ञानेश्वर यहाँ एक बहुत सच्ची बात कहते हैं। वे कहते हैं, यह मत कहो कि योग के साधन सब झूठे हैं। यह कहो कि मुझसे अभ्यास नहीं होता। फ़र्क़ बहुत बारीक है, पर बहुत बड़ा है। पहले वाक्य में रास्ता बन्द हो जाता है। दूसरे वाक्य में रास्ता खुला रहता है, बस मेरे पैर धीमे हैं।

अब सैंतीसवाँ श्लोक। अर्जुन फिर बोलते हैं। "अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः।" जिसमें श्रद्धा तो है, पर प्रयत्न ढीला है, और जिसका मन योग से हट गया। "अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति।" वह योग की सिद्धि पाए बिना, हे कृष्ण, किस गति को जाता है?

इस प्रश्न को ध्यान से सुनिए, क्योंकि अर्जुन किसके बारे में पूछ रहे हैं, यह बहुत मायने रखता है। वे किसी पाखण्डी के बारे में नहीं पूछ रहे, जो दिखावे के लिए साधु बना। वे किसी नास्तिक के बारे में भी नहीं पूछ रहे। श्रीधर स्वामी साफ़ कहते हैं: यह आदमी शुरू में श्रद्धा से ही योग में आया था, दिखावे से नहीं। फिर उसका अभ्यास ढीला पड़ गया, और वैराग्य कमज़ोर रहा। यानी अर्जुन उस आदमी के बारे में पूछ रहे हैं जो सच्चा है, पर कमज़ोर है। जिसका दिल ठीक जगह है, पर पैर साथ नहीं देते। और सच कहूँ, यह हम में से ज़्यादातर लोगों का चित्र है।

"अयतिः" शब्द पर नीलकण्ठ और तिलक दोनों एक बारीकी पकड़ते हैं। संस्कृत में "अ" का अर्थ आमतौर पर "नहीं" होता है, पर कभी-कभी उसका अर्थ "थोड़ा" भी होता है। नीलकण्ठ एक पुराना उदाहरण देते हैं: "बिना नमक की लपसी" कहने का अर्थ यह नहीं कि उसमें नमक है ही नहीं, अर्थ है कि नमक कम है। तो "अयति" वह नहीं जिसने कोई प्रयत्न नहीं किया। "अयति" वह है जिसने थोड़ा किया, अधूरा किया। तिलक भी ठीक यही कहते हैं: अधूरा प्रयत्न या अधूरा संयम करने वाला। और यह बात आज के उत्तर को और भी बड़ा बना देती है, क्योंकि उत्तर उसी के लिए है जिसने पूरा नहीं, थोड़ा किया।

और "चलितमानसः", जिसका मन हट गया। शंकराचार्य यहाँ एक और गहरा कोण जोड़ते हैं। वे कहते हैं, यह वह भी हो सकता है जिसका मन अन्त-समय में, मृत्यु की घड़ी में, योग से हट गया, जिसकी स्मृति उस घड़ी में खो गई। यानी अर्जुन केवल उस आदमी के बारे में नहीं पूछ रहे जिसने बीच में साधना छोड़ दी। वे उसके बारे में भी पूछ रहे हैं जिसका जीवन ही बीच में चुक गया। जिसने साठ की उम्र में गीता पढ़नी शुरू की और बासठ में चला गया। जिसने बड़े मन से जप का संकल्प लिया और फिर बीमारी ने बिस्तर पकड़ा दिया।

और अब, इससे पहले कि हम अगले श्लोक में उतरें, एक छोटी-सी बात आपसे कहना चाहता हूँ। हम इस अध्याय के सबसे नाज़ुक मोड़ पर खड़े हैं। अर्जुन ने प्रश्न रख दिया है, और अगले श्लोक में वे अपना डर एक चित्र में रखेंगे, जो लगभग हर साधक के मन में कभी न कभी उठता है। उस डर का उत्तर दो श्लोक बाद आता है। आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। जो आदमी अर्जुन का डर सुनकर, उस फटे बादल की बात सुनकर, यहीं उठ जाए, वह गीता से वही डर लेकर चला जाएगा जिसे मिटाने के लिए गीता बोली गई। तो अगर आप यह सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की यह यात्रा बीच में न छूटे। और आज का यह सत्संग आख़िर तक सुनिए, क्योंकि आज का सबसे बड़ा भरोसा अभी आना बाकी है।

अब अड़तीसवाँ श्लोक, और इसमें अर्जुन अपना डर एक चित्र में रख देते हैं। "कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति।" क्या वह दोनों ओर से गिरा हुआ, फटे हुए बादल की तरह नष्ट तो नहीं हो जाता? "अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि।" बिना किसी आधार के, ब्रह्म के रास्ते में भटका हुआ?

फटा हुआ बादल। यह उपमा बहुत सोची-समझी है। आसमान में एक बड़ा बादल है। हवा का एक झोंका उसमें से एक छोटा टुकड़ा तोड़ देता है। वह टुकड़ा पहले वाले बादल से अलग हो गया, और अगले बादल तक पहुँचा नहीं। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, ऐसा टुकड़ा बरसने लायक़ भी नहीं रहता, बीच में ही घुलकर मिट जाता है। न उससे खेत को पानी मिला, न वह किसी बड़े बादल का हिस्सा बना।

और "दोनों ओर से गिरा हुआ", यह "दोनों" क्या है? हमारी टीका कहती है: एक ओर इस लोक के फल, जिन्हें उसने साधना के लिए छोड़ दिया, और दूसरी ओर योग का लक्ष्य, जिसे वह पा नहीं सका। हमारी बोली में इसका एक मुहावरा है: न इधर के रहे, न उधर के। यही असली डर है। आदमी सोचता है कि मैंने कुछ सुख छोड़े, कुछ महत्वाकांक्षाएँ छोड़ीं, कुछ लोगों से दूरी बनाई, सुबह की नींद छोड़ी, और बदले में मुझे वह शान्ति भी पूरी नहीं मिली जिसके लिए यह सब छोड़ा। तो क्या मैं घाटे में रहा? जिन्होंने कुछ नहीं छोड़ा, वे कम से कम अपना संसार तो भोग रहे हैं।

और एक छोटी बात, जो मधुसूदन सरस्वती इस श्लोक के "महाबाहो" में देखते हैं। यहाँ यह सम्बोधन अर्जुन श्रीकृष्ण के लिए कर रहे हैं। मधुसूदन कहते हैं, ये वे बड़ी भुजाएँ हैं जो भक्तों के सब संकट दूर कर सकती हैं। और इस सम्बोधन में यह भाव भी है कि अर्जुन जानते हैं, ऐसा प्रश्न पूछने पर भी श्रीकृष्ण नाराज़ नहीं होंगे, वे इस प्रश्न का भार भी सह लेंगे। अच्छा है कि अर्जुन ने यह डर मन में दबाया नहीं। जो डर पूछ लिया जाए, उसका उत्तर मिलता है। जो डर दबा दिया जाए, वह भीतर ही भीतर साधना को खा जाता है।

अब इस डर को मैं महाभारत की एक कथा में रखना चाहता हूँ, और उसका अन्त अभी नहीं बताऊँगा। यह वन पर्व में है। वनवास के दिनों में पाण्डव ऋषि लोमश के साथ तीर्थों की यात्रा कर रहे थे, और लोमश युधिष्ठिर को इक्ष्वाकु कुल की एक लम्बी कहानी सुनाते हैं।

राजा सगर के साठ हज़ार पुत्र यज्ञ का घोड़ा खोजते हुए पाताल तक पहुँचे, वहाँ कपिल मुनि के पास घोड़ा देखा, मुनि का अनादर करके उसे पकड़ने दौड़े, और कपिल की दृष्टि से सब एक साथ भस्म हो गए। फिर सगर के पोते अंशुमान् गए, उन्होंने कपिल को सिर झुकाकर प्रणाम किया, और कपिल प्रसन्न हुए। उन्होंने घोड़ा भी लौटाया और एक बात भी कही: "तुम्हारा पौत्र महेश्वर को प्रसन्न करके गंगा को स्वर्ग से ले आएगा, सगर के पुत्रों को पवित्र करने के लिए।"

और अब वह आदमी, जिसके बारे में मैं आपसे बात करना चाहता हूँ। अंशुमान् के पुत्र हुए दिलीप। लोमश कहते हैं, दिलीप ने अपने पितरों की उस भयानक मृत्यु के बारे में सुना, तो वे दुःख से तड़प उठे और उनकी सद्गति के बारे में सोचने लगे। उन्होंने गंगा को उतारने के लिए बहुत बड़ा प्रयत्न किया। और पाठ के शब्द हैं: "पूरी शक्ति से प्रयत्न करते हुए भी वे उसे उतार न सके।" फिर उन्होंने अपने पुत्र भगीरथ को राज्य सौंपा और वन में चले गए।

अब ज़रा अर्जुन की आँखों से दिलीप को देखिए। एक पूरा जीवन। एक सच्चा संकल्प, अपने लिए नहीं, अपने पितरों के लिए। पूरी शक्ति। और नतीजा? गंगा नहीं उतरी। क्या दिलीप वही फटा हुआ बादल थे? न राज्य का पूरा सुख भोगा, न वह काम पूरा हुआ जिसके लिए सब लगा दिया?

पर अभी एक बात बाकी है। अर्जुन ने अपना डर रख दिया है। अब वे बस एक बात और कहेंगे, और फिर श्रीकृष्ण वह उत्तर देंगे जिसके लिए यह पूरा अध्याय, और शायद यह पूरा सत्संग, बोला गया है। और उसी उत्तर में दिलीप का अन्त भी मिलेगा। आइए, सुनते हैं।

एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः । त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥ ३९ ॥
गीता 6.39 — अर्थ पढ़ें ›
श्रीभगवानुवाच पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते । न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति ॥ ४० ॥
गीता 6.40 — अर्थ पढ़ें ›
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः । शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥ ४१ ॥
गीता 6.41 — अर्थ पढ़ें ›

उनतालीसवें श्लोक में अर्जुन अपना प्रश्न श्रीकृष्ण के हाथ में रख देते हैं। "एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः।" हे कृष्ण, मेरे इस संशय को पूरी तरह, जड़ से काटने में आप ही समर्थ हैं। "त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते।" क्योंकि आपके सिवा इस संशय को काटने वाला कोई दूसरा नहीं मिलता।

शंकराचार्य कहते हैं, कोई दूसरा, यानी कोई ऋषि नहीं, कोई देवता नहीं। और मधुसूदन सरस्वती इसका कारण बताते हैं: यह प्रश्न इस लोक का नहीं है, मरने के बाद की गति का है। इसका उत्तर वही दे सकता है जो सब कुछ अपनी आँखों से देखता है। और यह शब्द, "छेत्ता", काटने वाला, आपको पंद्रहवें सत्संग से याद होगा। चौथे अध्याय के आख़िरी श्लोक में श्रीकृष्ण ने कहा था कि अज्ञान से जन्मे, हृदय में बैठे संशय को ज्ञान की तलवार से काटो। आज अर्जुन वही तलवार श्रीकृष्ण के ही हाथ में वापस दे रहे हैं: यह संशय मुझसे नहीं कटता, आप काटिए। और उसी सत्संग में आपने सुना था कि युद्ध के बहुत बाद, भीष्म की शय्या के पास जाने से पहले, युधिष्ठिर भी श्रीकृष्ण से यही माँगते हैं: "छिन्धि मे संशयं", मेरा संशय काटिए। दोनों भाई, दो अलग घड़ियाँ, एक ही दरवाज़ा।

संत ज्ञानेश्वर इस प्रश्न को एक यात्री की तरह देखते हैं, और उनका चित्र मुझे अर्जुन के फटे बादल से भी ज़्यादा छूता है। वे कहते हैं: एक आदमी इन्द्रियों के गाँव से निकला, श्रद्धा की सड़क पर चल पड़ा, आत्मसिद्धि के नगर की ओर। पर नगर तक पहुँचा नहीं, और लौटकर गाँव भी नहीं आ सका, और बीच रास्ते में ही उसकी आयु का सूरज डूब गया। अब बताइए, भगवन्, उस यात्री का क्या होगा?

और अब चालीसवाँ श्लोक। "श्रीभगवानुवाच।" "पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।" हे पार्थ, उसका न इस लोक में विनाश होता है, न परलोक में। "न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति।" क्योंकि हे प्रिय, भलाई करने वाला कोई भी कभी दुर्गति को नहीं जाता।

इसे एक बार और सुनिए, धीरे से, अपने लिए। भलाई करने वाला कोई भी, कभी, दुर्गति को नहीं जाता।

"नैवेह नामुत्र", न यहाँ, न वहाँ। श्रीधर स्वामी बताते हैं कि दोनों जगह विनाश का अर्थ क्या होता। यहाँ विनाश यानी लोगों की नज़र में गिर जाना, "न इधर का न उधर का" कहलाना। और वहाँ विनाश यानी नरक। श्रीकृष्ण कहते हैं, दोनों में से कुछ नहीं होगा। और शंकराचार्य विनाश का एक और अर्थ देते हैं: पहले से नीचे का जन्म पाना। यानी जितनी दूर तक तुम आ गए थे, उससे पीछे नहीं धकेले जाओगे। जो सीढ़ियाँ चढ़ लीं, वे चढ़ी हुई रहेंगी।

और यह आदमी "कल्याणकृत्", भलाई करने वाला, क्यों कहलाया? उसने तो साधना अधूरी छोड़ी थी! श्रीधर स्वामी उत्तर देते हैं: क्योंकि वह श्रद्धा से योग में आया था। श्रद्धा से एक कदम उठाना ही भलाई है। अभिनवगुप्त एक और बारीक बात कहते हैं: इसने भगवान के मार्ग वाली भलाई की है, और वह यज्ञ के फल की तरह ख़र्च होकर ख़त्म होने वाली चीज़ नहीं है। पुण्य का फल भोगने पर घटता है। पर भगवान की ओर उठाया गया कदम घटता नहीं।

और अब वह एक शब्द, जिसके लिए शायद यह पूरा श्लोक बोला गया: "तात"। हमारी टीका कहती है, यह स्नेह का शब्द है, जो पिता पुत्र से या गुरु शिष्य से कहता है। शंकराचार्य इसकी जड़ खोलते हैं: पिता को तात इसलिए कहते हैं कि वह पुत्र के रूप में अपने को आगे फैलाता है, और इसीलिए पुत्र को भी तात कहा जाता है, और शिष्य भी पुत्र ही है। और एक बात जो आपको चौंका सकती है। पूरी गीता में, सात सौ श्लोकों में, श्रीकृष्ण अर्जुन को "तात" केवल यहीं कहते हैं। सबसे गहरे डर के उत्तर में, सबसे कोमल शब्द। मानो कोई पिता अपने डरे हुए बच्चे के सिर पर हाथ रखकर कहे: बेटा, तू जितना चला है, वह कहीं नहीं गया।

और यह वचन गीता में पहली बार नहीं आया। सातवें सत्संग में, दूसरे अध्याय के चालीसवें श्लोक में, आपने सुना था: "नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते। स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्।" इस मार्ग में शुरू किया गया प्रयत्न नष्ट नहीं होता, और इस धर्म का थोड़ा-सा पालन भी बड़े भय से बचाता है। रामानुज कहते हैं, अर्जुन ने योग की वह महिमा वहीं सुन ली थी, और अब उसे ठीक से, पूरा सुनना चाहते हैं। वहाँ भी चालीसवाँ श्लोक, यहाँ भी चालीसवाँ। जैसे भगवान ने एक ही वचन दो बार दिया हो, ताकि भूल न जाए।

और अब मैं आपको महाभारत में एक ऐसी रात पर ले चलता हूँ, जहाँ श्रीकृष्ण ने यही बात, लगभग इन्हीं शब्दों में, अपने बारे में कही थी।

यह उद्योग पर्व में है। श्रीकृष्ण युद्ध रोकने के लिए, शान्ति का प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर आए हैं। दिन में वे अपनी बुआ कुन्ती से मिले, और रात को विदुर के घर ठहरे। भोजन और विश्राम के बाद विदुर उनसे कहते हैं कि आपका यहाँ आना ठीक से सोचा-समझा नहीं है। दुर्योधन मूर्ख है, क्रोधी है, हठी है; धृतराष्ट्र के सब पुत्र तय कर चुके हैं कि पाण्डवों को उनका हिस्सा नहीं देंगे; उनसे बात करना बहरों के बीच गाने जैसा है। और विदुर कहते हैं, मैं यह प्रेम से कह रहा हूँ, क्योंकि आपके लिए मेरा प्रेम पाण्डवों के लिए प्रेम से भी बढ़कर है।

श्रीकृष्ण का उत्तर सुनिए। पहले वे विदुर की बात को सच मानते हैं: "आपने यह माता-पिता की तरह कहा है।" फिर कहते हैं: "मैं यह सब जानता हूँ। दुर्योधन की दुष्टता भी, क्षत्रियों का बैर भी। यह जानते हुए भी मैं आज कौरवों के पास आया हूँ।" और फिर वह वाक्य: "यदि मनुष्य पूरी शक्ति से धर्म के काम में प्रयत्न करे, और फिर भी उसे पूरा न कर पाए, तो भी वह पुण्य उसे मिल जाता है। इसमें मुझे कोई संदेह नहीं।"

संस्कृत में वाक्य का अन्त है, "मे नास्ति संशयः", मुझे कोई संशय नहीं। सोचिए, गीता में अर्जुन कह रहे हैं "मेरा संशय काटिए", और महाभारत में, उससे पहले, श्रीकृष्ण इसी बात पर कह चुके हैं, "इसमें मुझे कोई संशय नहीं।"

और वे आगे कहते हैं: भलाई के लिए प्रयत्न करते हुए दुर्योधन मुझ पर संदेह भी करे, तब भी मेरे हृदय को संतोष होगा, और मैं ऋण से मुक्त हो जाऊँगा। और आप जानते हैं आगे क्या हुआ। शान्ति नहीं हुई। धृतराष्ट्र ख़ुद आदि पर्व में कहते हैं कि श्रीकृष्ण शान्ति चाहते हुए आए, और बिना सफल हुए लौट गए। तो क्या श्रीकृष्ण का वह प्रयत्न व्यर्थ गया? उन्होंने ख़ुद पहले ही उत्तर दे दिया था: जो धर्म के लिए पूरी शक्ति से लगा, उसका पुण्य उसे मिल गया, काम पूरा हुआ हो या नहीं।

और अब दिलीप, जिन्हें पिछले खंड में हमने बीच में छोड़ दिया था। पूरी शक्ति से प्रयत्न करके भी वे गंगा नहीं उतार पाए, भगीरथ को राज्य देकर वन चले गए। लोमश आगे क्या कहते हैं? "तप की सिद्धि से वह राजा समय आने पर वन से स्वर्ग चले गए।" फटा बादल नहीं। स्वर्ग। और उनका अधूरा काम भी कहीं नहीं गया, पर वह कहानी थोड़ी देर बाद।

अब इकतालीसवाँ श्लोक, जहाँ श्रीकृष्ण बताते हैं कि ऐसे साधक के साथ आगे होता क्या है। "प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः।" वह पुण्य करने वालों के लोकों को पाता है और वहाँ बहुत वर्षों तक रहता है। "शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते।" फिर योग से गिरा हुआ वह, शुद्ध आचरण वाले, सम्पन्न लोगों के घर में जन्म लेता है।

शंकराचार्य कहते हैं, पुण्य करने वालों के लोक, यानी वे लोक जो अश्वमेध जैसे बड़े यज्ञ करने वालों को मिलते हैं। सोचिए, जिसने साधना अधूरी छोड़ी, उसे वह मिलता है जो बड़े-बड़े यज्ञ करने वालों को मिलता है। संत ज्ञानेश्वर यहाँ एक बहुत सुंदर बात कहते हैं: वहाँ के अद्भुत भोग भोगते हुए भी उसका मन उकता जाता है, और वह बार-बार पछताता है, "हे भगवन्, यह बीच में रुकावट क्यों आ गई?" यानी स्वर्ग भी उसके लिए घर नहीं, पड़ाव है। उसका मन आगे की ओर ही लगा रहता है।

फिर जन्म, "शुचीनां श्रीमतां", शुद्ध और श्रीमान् लोगों के घर में। नीलकण्ठ एक बहुत व्यावहारिक बात कहते हैं: केवल श्रीमान् कहा होता, तो डर था कि धन उसे नीचे खींच ले। इसलिए साथ में "शुचीनां" कहा, शुद्ध आचरण वाले, जो अपना धन अच्छे कामों में ही लगाते हैं। संत ज्ञानेश्वर उस घर का चित्र खींचते हैं: जहाँ नीति के रास्ते पर चला जाता है, सच बोला जाता है, और जो देखा जाता है वह शास्त्र की आँख से देखा जाता है।

और मधुसूदन सरस्वती यहाँ ऐसे जन्म के दो उदाहरण देते हैं, और दोनों हमारे लिए जाने-पहचाने हैं: अजातशत्रु और जनक। अजातशत्रु, यानी युधिष्ठिर। मधुसूदन के अनुसार, जिस साधक में भोग की कुछ इच्छा बची रह गई थी, वह राजाओं के कुल में जन्म लेता है, वह भोग भी पा लेता है, और फिर भी धर्म और ज्ञान की ओर खिंचता रहता है। ग्यारहवें सत्संग में आपने सुना था कि युद्ध जीतने के बाद युधिष्ठिर राज्य छोड़कर वन जाने को तैयार बैठे थे, और जनक की गाथा याद करते थे, "मिथिला जले तो मेरा कुछ नहीं जलता।" राजमहल में पलकर भी जिसका मन बार-बार वन की ओर भागे, मधुसूदन उसे ऐसा ही यात्री मानते हैं, जो पिछली बार कहीं बीच में रुक गया था।

और आप भी ज़रा अपने घर की ओर देखिए। अगर आपके घर में कोई बच्चा है जो छोटी उम्र में ही पूछता है, "भगवान कहाँ रहते हैं?", जो पूजा की थाली देखकर अपने आप हाथ जोड़ लेता है, तो क्या पता वह कोई यात्री हो, जो अपनी अधूरी यात्रा पूरी करने आपके घर आया हो। और उसके लिए वह घर शुद्ध बना रहे, यह आपके हाथ में है।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने यहाँ एक रास्ता बताया: पहले पुण्य के लोक, फिर अच्छे घर में जन्म। पर हमारी टीका कहती है, यह उसके लिए है जो थोड़े अभ्यास के बाद, बची हुई कामनाओं के कारण गिरा। जिसने लम्बा अभ्यास किया था और फिर भी बीच में रह गया, उसके लिए एक और, सीधा और उससे भी दुर्लभ रास्ता है। आइए, अगले दो श्लोक सुनते हैं।

अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् । एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥ ४२ ॥
गीता 6.42 — अर्थ पढ़ें ›
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् । यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥ ४३ ॥
गीता 6.43 — अर्थ पढ़ें ›

बयालीसवाँ श्लोक दूसरा रास्ता बताता है। "अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्।" अथवा वह बुद्धिमान योगियों के कुल में ही जन्म लेता है। "एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्।" ऐसा जन्म संसार में और भी दुर्लभ है।

हमारी टीका दोनों श्लोकों का भेद साफ़ करती है। इकतालीसवाँ उसके लिए था जो थोड़े अभ्यास के बाद, बची हुई कामनाओं के कारण गिरा; उसे पहले पुण्य के लोकों का पड़ाव मिलता है। यह श्लोक उसके लिए है जो लम्बे अभ्यास के बाद गिरा। उसे बीच का पड़ाव नहीं लेना पड़ता, वह सीधे योगियों के बीच जन्म लेता है। श्रीधर स्वामी भी यही कहते हैं: थोड़े समय का अभ्यास छूटे तो वह गति, बहुत समय का अभ्यास छूटे तो यह।

और यहाँ एक बात मुझे बहुत सुंदर लगती है। शंकराचार्य इसे "दरिद्र योगियों का कुल" कहते हैं। यानी पिछले श्लोक में धनी और शुद्ध घर था, और यह घर शायद धन में छोटा है, पर गीता इसे "दुर्लभतर", और भी दुर्लभ कहती है। भगवान की तराज़ू में घर का बड़प्पन तिजोरी से नहीं, उस घर में बैठी समझ से तुलता है। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, ऐसा घर इसलिए श्रेष्ठ है कि वहाँ भटकाने वाली चीज़ें कम हैं, और वे शुकदेव का नाम लेते हैं, जो व्यास के पुत्र थे।

और अब तैंतालीसवाँ श्लोक, जो इस पूरे प्रसंग का सबसे रहस्य भरा श्लोक है। "तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्।" वहाँ वह पहले शरीर वाली बुद्धि के उस जुड़ाव को फिर पा लेता है। "यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन।" और हे कुरुनन्दन, वहाँ से वह सिद्धि के लिए फिर और अधिक प्रयत्न करता है।

"पौर्वदेहिकम्", पहले देह का। यानी जो समझ पिछले शरीर में बनी थी, वह मिटी नहीं। शरीर गया, नाम गया, घर बदला, पर वह समझ साथ आई। रामानुज इसके लिए एक बहुत सहज उपमा देते हैं: जैसे सोया हुआ आदमी जागकर वहीं से काम शुरू करता है जहाँ उसे छोड़ा था। रात की नींद ने आपका सीखा हुआ नहीं मिटाया। सुबह उठते ही आप अपनी भाषा बोलते हैं, अपना रास्ता पहचानते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं, मृत्यु भी साधक के लिए ऐसी ही एक लम्बी नींद है।

नीलकण्ठ इसे और साफ़ करते हैं: पिछले जन्म में योग की जितनी भूमि जीत ली गई थी, उतनी इस जन्म में थोड़े-से ही अभ्यास से फिर मिल जाती है। जैसे किसी ने बचपन में साइकिल चलानी सीखी हो और बीस साल बाद फिर बैठे; दो-चार डगमगाहट, और फिर पैर अपने आप चल पड़ते हैं। पहली बार सीखने में जो महीने लगे थे, वे दोबारा नहीं लगते।

और संत ज्ञानेश्वर ऐसे जन्म का जो चित्र खींचते हैं, वह सुनने लायक़ है। वे कहते हैं: शरीर का आकार अभी ठीक से उभरा भी नहीं होता, और अपने ज्ञान की भोर फूट पड़ती है, जैसे सूरज निकलने से पहले ही उजाला फैल जाता है। उम्र के गाँव तक पहुँचने का इंतज़ार नहीं करना पड़ता, बचपन में ही समझ उसे वर लेती है, और सारे शास्त्र अपने आप उसके मुँह से निकलने लगते हैं।

और महाभारत में एक बालक की कथा है जिसे सुनकर ज्ञानेश्वर का यह चित्र आँखों के सामने आ जाता है। यह भी वन पर्व में है, उसी तीर्थयात्रा में। लोमश पाण्डवों को उद्दालक के पुत्र श्वेतकेतु का आश्रम दिखाते हैं, और युधिष्ठिर के पूछने पर अष्टावक्र की कथा सुनाते हैं। उद्दालक का नाम आपने पंद्रहवें सत्संग में सुना था, आरुणि को उनके गुरु ने यही नाम दिया था। लोग मानते हैं कि ये वही उद्दालक हैं।

उद्दालक का एक शिष्य था, कहोल, गुरु की सेवा करने वाला। गुरु ने उसे वेद का ज्ञान दिया और अपनी बेटी सुजाता का विवाह भी उससे कर दिया। सुजाता के गर्भ में एक अग्नि जैसा तेजस्वी बालक था। एक रात कहोल पाठ कर रहे थे, और गर्भ के भीतर से उस बालक ने कहा: "पिताजी, आप सारी रात पाठ करते हैं, पर यह ठीक नहीं निकलता।" शिष्यों के सामने टोके जाने पर पिता को क्रोध आया, और उन्होंने शाप दे दिया कि तुम आठ जगह से टेढ़े पैदा होगे। और वह वैसा ही पैदा हुआ, और अष्टावक्र कहलाया।

फिर दुःख की बात: बालक के जन्म से पहले ही कहोल धन के लिए राजा जनक के पास गए, और वहाँ वन्दी नाम के एक विद्वान ने उन्हें शास्त्रार्थ में हराकर पानी में डुबो दिया। यह बात बालक से छिपाई गई। वह उद्दालक को ही अपना पिता मानकर बड़ा हुआ। और बारहवें वर्ष में एक दिन, जब श्वेतकेतु ने उसे उद्दालक की गोद से खींचकर कहा, "यह तुम्हारे पिता की गोद नहीं है", तब उसने माँ से सच जाना।

बारह बरस का वह बालक जनक के यज्ञ के लिए चल पड़ा। द्वार पर द्वारपाल ने रोक दिया: "यहाँ बालक ब्राह्मण भीतर नहीं जाते। केवल वृद्ध और विद्वान ब्राह्मण।" और फिर उसने एक बात कही जो इस श्लोक के ठीक सामने खड़ी है: "इस संसार में बालक बड़ों से ही बुद्धि लेते हैं, और समय के साथ स्वयं बड़े होते हैं। ज्ञान थोड़े समय में सीखना संभव नहीं।"

अष्टावक्र का उत्तर सुनिए: "सिर के बाल सफ़ेद हो जाने से कोई बड़ा नहीं होता। जो सचमुच जानता है, वह बालक भी हो, तो देवता उसे बड़ा मानते हैं।" फिर राजा जनक ने ख़ुद उसकी परीक्षा ली, पहेलियाँ पूछीं, और हर पहेली का उत्तर पाकर कहा, "तुम बालक नहीं हो, मैं तुम्हें बड़ा मानता हूँ", और अपने हाथ से द्वार खोल दिया। आगे की कथा कहती है कि उस बालक ने वन्दी को शास्त्रार्थ में हरा दिया, उसके पिता कहोल जल से लौट आए, और पिता के कहने पर समंगा नदी में स्नान करते ही उसके सारे अंग सीधे हो गए।

अब ज़रा द्वारपाल की बात फिर से सुनिए: "ज्ञान थोड़े समय में सीखना संभव नहीं।" बात सही है। एक जन्म के थोड़े समय में संभव नहीं। महाभारत अष्टावक्र के पिछले जन्म के बारे में कुछ नहीं कहता, और मैं भी नहीं कहूँगा। पर जब गीता के इस श्लोक के साथ यह कथा रखता हूँ, तो मुझे लगता है कि गीता उस द्वारपाल के प्रश्न का उत्तर पहले से दे रही है: कुछ लोग अपनी पढ़ाई पहले से साथ लेकर आते हैं। "पौर्वदेहिकम्।" और जनक ने ठीक कहा था: ऐसा बालक, बालक नहीं होता।

अब इस श्लोक का दूसरा आधा, जिसे लोग अक्सर छोड़ देते हैं: "यतते च ततो भूयः", और वहाँ से वह फिर और अधिक प्रयत्न करता है। पिछली समझ लौट आई, पर काम ख़त्म नहीं हुआ। अष्टावक्र को भी द्वार पर बहस करनी पड़ी, राजा की परीक्षा देनी पड़ी, वन्दी से लड़ना पड़ा। पिछला जमा हुआ धन रास्ता छोटा करता है, रास्ता ख़त्म नहीं करता। चलना फिर भी अपने पैरों से है।

और श्लोक का आख़िरी शब्द, "कुरुनन्दन", कुरुओं को आनन्द देने वाले। पहले सत्संग में आपने कुरु की कथा सुनी थी, वह राजर्षि जिसने दूसरों के कल्याण के लिए कुरुक्षेत्र को बरसों हल से जोता था। और मधुसूदन सरस्वती इस शब्द में एक बहुत प्यारा इशारा देखते हैं। वे कहते हैं, श्रीकृष्ण अर्जुन से मानो कह रहे हैं: तुम्हारा जन्म भी तो शुद्ध और श्रीमान् कुल में हुआ है, तुम भी ऐसे ही यात्री हो, इसलिए पिछले संस्कारों के बल से तुम्हें ज्ञान बिना बड़े परिश्रम के मिल जाएगा। यानी जिस अर्जुन को अभी लग रहा था कि मन वायु की तरह हाथ से निकल जाता है, उससे भगवान कह रहे हैं: तुम जितना सोचते हो, उससे बहुत आगे से चल रहे हो।

और शायद यही बात आपके लिए भी है। आप आज यह सत्संग सुन रहे हैं, बीसवाँ सत्संग, बिना किसी के कहे। यह खिंचाव कहाँ से आया? गीता का उत्तर है: शायद बहुत पहले से।

पर अभी एक बात बाकी है। अगला श्लोक कहता है कि यह पिछला अभ्यास आदमी को खींचता है, उसके न चाहते हुए भी, "ह्यवशोऽपि सः", विवश होकर भी। और इस खिंचाव को समझाने के लिए महाभारत के पास एक ऐसी कथा है जो सीधे उस दिन से जुड़ती है जिस दिन सञ्जय यह गीता सुना रहे हैं, यानी भीष्म के गिरने के दिन से। आइए, सुनते हैं।

पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः । जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥ ४४ ॥
गीता 6.44 — अर्थ पढ़ें ›
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः । अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥ ४५ ॥
गीता 6.45 — अर्थ पढ़ें ›

चवालीसवाँ श्लोक। "पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः।" उसी पहले के अभ्यास से वह खिंच जाता है, विवश होकर भी। "जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते।" योग को केवल जानना चाहने वाला भी वेद के कर्मकाण्ड और उसके फलों से आगे निकल जाता है।

"ह्रियते", खिंच जाता है, और "ह्यवशोऽपि", बिना अपने बस के भी। यह शब्द बहुत ईमानदार है। कभी-कभी आदमी ख़ुद नहीं समझ पाता कि वह किसी सत्संग की ओर, किसी ग्रन्थ की ओर, किसी मन्दिर की ओर क्यों खिंचा जा रहा है। घर वाले भी पूछते हैं, "तुम्हें यह सब कब से अच्छा लगने लगा?" और उसके पास कोई उत्तर नहीं होता। गीता कहती है, उत्तर पीछे है। पुराना अभ्यास अपनी ओर खींच रहा है।

शंकराचार्य यहाँ एक बहुत गहरी बात कहते हैं, जो मुझे इस श्लोक की कुंजी लगती है। वे कहते हैं, अगर उस आदमी ने कोई ऐसा अधर्म किया हो जो योग के संस्कार से ज़्यादा बलवान हो, तो कुछ समय के लिए वह संस्कार दब जाता है। पर जैसे ही वह अधर्म का फल ख़त्म होता है, योग का संस्कार अपने आप अपना काम शुरू कर देता है। और फिर वे कहते हैं: बहुत लम्बे समय तक दबा रहे, तब भी उसका नाश नहीं होता। बीज ज़मीन में बरसों पड़ा रहे तो भी, पहली बारिश में अंकुर फूटता है।

नीलकण्ठ इसका एक उदाहरण देते हैं: प्रह्लाद। तेरहवें सत्संग में आपने नृसिंह की कथा सुनी थी। नीलकण्ठ कहते हैं, पिता उसे दूसरी ओर ले जाना चाहता था, फिर भी वह उसी पुराने अभ्यास के बल से भगवान की ओर ही खिंचता रहा। और श्लोक का दूसरा आधा, हमारी टीका के अनुसार: यहाँ "शब्दब्रह्म" वेद का कर्मकाण्ड वाला भाग है, जो कर्मों के फल का वचन देता है। योग का सच्चा जिज्ञासु, जिसने अभी केवल जानना चाहा है, वह भी उस लक्ष्य से ऊपर उठ जाता है। सोचिए, केवल जानने की सच्ची इच्छा का इतना मोल है।

अब इस खिंचाव को समझने के लिए मैं आपको एक ऐसी कथा सुनाना चाहता हूँ जो अपने आप में मीठी नहीं है, बल्कि दुःख और क्रोध से भरी है। पर उसी कारण वह इस श्लोक को बहुत साफ़ कर देती है। और यह कथा सीधे उस दिन से जुड़ी है जिस दिन सञ्जय यह गीता सुना रहे हैं। आपको याद होगा, पहले सत्संग में सञ्जय ने कहा था कि भीष्म शिखण्डी के हाथों गिरे। और भीष्म ने युद्ध से पहले ही प्रण किया था कि वे शिखण्डी को नहीं मारेंगे, क्योंकि वह पहले स्त्री था। दुर्योधन ने उनसे पूछा था, "क्यों?" और तब भीष्म ने उद्योग पर्व में अपनी ही ज़ुबानी एक लम्बी कथा सुनाई।

बहुत पहले भीष्म अपने छोटे भाई विचित्रवीर्य के लिए काशिराज की तीन पुत्रियों को स्वयंवर से हर लाए थे: अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका। सबसे बड़ी, अम्बा, ने मन से शाल्वराज को चुना था। भीष्म ने उसे जाने दिया, पर शाल्व ने उसे अपनाने से मना कर दिया, यह कहकर कि उसे दूसरा हर ले गया था। अम्बा ने अपने दुर्भाग्य का मूल भीष्म को माना। परशुराम उसके लिए भीष्म से लड़े, और लड़ाई के बाद उन्होंने ख़ुद माना कि वे भीष्म को नहीं हरा सकते। तब अम्बा ने कहा, "मैं वहाँ जाऊँगी जहाँ मैं स्वयं भीष्म को युद्ध में गिरा सकूँ।" और वह तप करने चली गई।

भीष्म बताते हैं कि उसी दिन से वे व्यथित और उदास रहने लगे, और उन्होंने लोगों को लगा दिया कि रोज़ उसका समाचार लाएँ। और अम्बा का तप सुनिए: छह महीने केवल हवा पीकर ठूँठ की तरह खड़ी, फिर एक वर्ष यमुना के जल में, फिर एक वर्ष पैर के अँगूठे पर खड़ी होकर एक सूखे पत्ते पर। बारह वर्ष। और एक दिन जल में से भीष्म की माता गंगा ने उससे पूछा कि तुम किसलिए यह कष्ट उठा रही हो। उसने कहा, भीष्म के विनाश के लिए। और गंगा ने कहा: "तुम टेढ़ी राह पर चल रही हो।"

फिर महादेव प्रकट हुए। अम्बा ने भीष्म की हार माँगी। महादेव ने कहा, "तुम उसे मारोगी।" और उसने पूछा, मैं स्त्री होकर युद्ध में कैसे जीतूँगी? तब महादेव ने जो कहा, वही इस श्लोक का सबसे साफ़ चित्र है: "तुम युद्ध में भीष्म को मारोगी और पुरुषत्व पाओगी। और दूसरे शरीर में जाकर भी तुम यह सब याद रखोगी। द्रुपद के कुल में जन्म लेकर तुम महारथी बनोगी।" फिर अम्बा ने यमुना के पास चिता बनाई, और "भीष्म के वध के लिए" कहकर उस आग में प्रवेश कर गई। और भीष्म बताते हैं कि वही द्रुपद के घर कन्या बनकर जन्मी, जिसे पुत्र की तरह पाला गया, और जो शिखण्डी कहलाई।

अब इसे गीता के श्लोक के साथ रखिए। एक संकल्प, जो दुःख और क्रोध से उपजा था, जिसे गंगा ने ख़ुद "टेढ़ी राह" कहा, वह भी एक मृत्यु को पार कर गया। आग में जला शरीर, नया जन्म, नया नाम, और फिर भी वह संकल्प उसे खींचता हुआ ठीक उसी जगह ले आया, कुरुक्षेत्र में भीष्म के सामने। "ह्रियते ह्यवशोऽपि सः।" अब सोचिए। अगर क्रोध का संकल्प मृत्यु के पार जा सकता है, तो वह संकल्प क्यों नहीं जाएगा जो प्रेम से, श्रद्धा से, भगवान की ओर लिया गया था? श्रीधर स्वामी इसी ढंग का तर्क इस श्लोक पर देते हैं: जब केवल जानना चाहने वाला भी इतना आगे निकल जाता है, तो जो सचमुच चल पड़ा, उसके बारे में क्या कहना। और फ़र्क़ भी याद रखिए। अम्बा का संकल्प उसे एक टेढ़ी, केवल बरसात में बहने वाली नदी तक ले गया, और फिर एक युद्ध तक। साधक का संकल्प उसे किस ओर ले जाता है, यह अगला श्लोक बताता है।

पैंतालीसवाँ श्लोक। "प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः।" पर जो योगी प्रयत्नपूर्वक लगातार यत्न करता है, वह पापों से शुद्ध होकर, "अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्", अनेक जन्मों में सिद्ध होकर, तब परम गति को पाता है।

"अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्", अनेक जन्मों में सिद्ध होकर परम गति। शंकराचार्य इसका अर्थ बहुत कोमलता से खोलते हैं: हर जन्म में थोड़ा-थोड़ा संस्कार जोड़ते हुए, उस जुड़े हुए धन से वह सिद्ध होता है। यानी एक ही जन्म में सब पूरा कर लेने का दबाव गीता आप पर नहीं डालती। आप आज जो पाँच मिनट बैठे, वह भी उस थैली में गया। जो एक श्लोक समझा, वह भी। जो एक बार गुस्सा रोका, वह भी। संत ज्ञानेश्वर कहते हैं, ऐसा साधक सैकड़ों वर्षों की करोड़ों बाधाएँ और हज़ारों जन्मों की रुकावटें लाँघकर आख़िर आत्मसिद्धि के किनारे जा लगता है।

और अब वह कहानी, जिसे मैंने दो बार बीच में छोड़ा था। दिलीप स्वर्ग गए, पर गंगा अब भी नहीं उतरी थी। उनके पुत्र भगीरथ बड़े होकर चक्रवर्ती राजा बने। लोमश कहते हैं, जब भगीरथ ने सुना कि उनके पितर कपिल के द्वारा मारे गए और स्वर्ग नहीं पहुँच पाए, तो दुखते हृदय से उन्होंने राज्य मन्त्री को सौंप दिया और तप के लिए हिमालय चले गए। फल, मूल और जल पर जीते हुए हज़ार वर्ष तक तप किया, और गंगा स्वयं देह धारण करके प्रकट हुईं। पर गंगा ने कहा, आकाश से मेरे गिरने का वेग नीलकण्ठ महेश्वर के सिवा कोई नहीं सह सकता। तो भगीरथ कैलास गए, और शंकर को प्रसन्न किया। और फिर वह घड़ी आई। गंगा आकाश से गिरीं, और हर ने उन्हें अपने माथे पर मोतियों की माला की तरह थाम लिया। धरती पर पहुँचकर गंगा ने भगीरथ से कहा, "मुझे रास्ता दिखाओ।" और भगीरथ उन्हें उस जगह ले गए जहाँ सगर के पुत्रों के शरीर पड़े थे। उन्होंने समुद्र को भर दिया, गंगा को अपनी पुत्री के रूप में अपनाया, और अपने पितरों को जल दिया।

अब इस पूरी कहानी को एक साथ देखिए। सगर का यज्ञ। अंशुमान् का विनय, और कपिल का वचन कि तुम्हारा पौत्र गंगा लाएगा। दिलीप का पूरा जीवन, जिसमें गंगा नहीं उतरी। और भगीरथ। हम आज भी किसी बहुत बड़े परिश्रम को "भगीरथ प्रयत्न" कहते हैं। पर याद रखिए, उस भगीरथ प्रयत्न के भीतर दिलीप का अधूरा प्रयत्न भी बैठा है। कपिल ने यह वचन भगीरथ के दादा अंशुमान् को दिया था। यह कहानी पीढ़ियों की है, जन्मों की नहीं, यह मैं साफ़ कह दूँ। पर इसका नियम वही है जो इस श्लोक का है: बीच में रुका हुआ प्रयत्न टूटता नहीं, अगली कड़ी उसे उठा लेती है। अनेक जन्मों में सिद्धि। किसी एक जीवन ने गंगा नहीं उतारी। कई जीवनों के जुड़े हुए प्रयत्न ने उतारी।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने अब तक यह बताया कि योगी का कुछ नष्ट नहीं होता। अब आख़िरी दो श्लोकों में वे यह बताएँगे कि योगी किन-किन से बड़ा है, और फिर, सबसे आख़िर में, उस योगी का नाम लेंगे जिसे वे सबसे ऊपर मानते हैं। आइए, छठे अध्याय के आख़िरी दो श्लोक सुनते हैं।

तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः । कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥ ४६ ॥
गीता 6.46 — अर्थ पढ़ें ›
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना । श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥ ४७ ॥
गीता 6.47 — अर्थ पढ़ें ›

छियालीसवाँ श्लोक। "तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः।" योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, शास्त्र के ज्ञानियों से भी श्रेष्ठ माना गया है। "कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन।" और फल के लिए कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ है। इसलिए, हे अर्जुन, तुम योगी बनो।

नीलकण्ठ तीनों को पहचान देते हैं। तपस्वी वे, जो कठिन व्रत करते हैं, चान्द्रायण, महीने भर के उपवास। ज्ञानी, यहाँ शास्त्र के पण्डित; हमारी टीका भी यही कहती है, क्योंकि सत्य का अनुभव करने वाले ज्ञानी की प्रशंसा अगले अध्याय में सबसे ऊपर है। और कर्मी, अग्निहोत्र जैसे कर्म करने वाले। अभी हमने अम्बा का तप सुना: बारह वर्ष, हवा पर, जल में, अँगूठे पर। तप में कोई कमी नहीं थी। पर मन में बदला था। गीता का योगी वह है जिसका मन सम हो गया। केवल शरीर को कसना योग नहीं, मन को सम करना योग है।

और "तस्माद्योगी भवार्जुन" किससे कहा जा रहा है? उस अर्जुन से, जो कुरुक्षेत्र में रथ पर खड़ा है। तिलक यहीं ज़ोर देते हैं: यहाँ योगी का अर्थ कर्मयोगी है। यानी श्रीकृष्ण यह नहीं कह रहे कि जंगल चले जाओ। वे कह रहे हैं, यहीं, इसी रथ पर, अपने कर्तव्य के बीच, सम मन वाले बनो।

और अब इस अध्याय का अन्तिम श्लोक। "योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।" और सब योगियों में भी, जो मुझमें लगे हुए अन्तरात्मा से, "श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः", श्रद्धा के साथ मुझे भजता है, उसे मैं सबसे श्रेष्ठ योगी मानता हूँ।

इतनी लम्बी बात के बाद, आसन, दृष्टि, आहार, दीपक, मन के घोड़े, इन सबके बाद, श्रीकृष्ण आख़िर में एक बहुत सरल बात पर आते हैं: जिसका भीतर का मन मुझमें चला गया है। रामानुज एक उपमा देते हैं: सरसों के दानों में भी कोई बड़ा, कोई छोटा होता है, पर मेरु पर्वत के सामने सब एक जैसे छोटे हैं। वैसे ही तपस्वी, ज्ञानी, कर्मी और दूसरे योगी, आपस में चाहे जितने अलग हों, इस भक्त योगी के सामने सब पीछे हैं। और मधुसूदन सरस्वती एक बात जोड़ते हैं जो इस रथ पर बहुत मायने रखती है: ऐसा भक्त "यह तो मनुष्य है" वाला भ्रम छोड़कर भजता है। अर्जुन के सामने जो सारथी बैठा है, उसे सारथी मात्र न समझना, यही इस श्लोक का पहला कदम है।

और यह श्लोक मुझे सीधे उस आदमी के पास ले जाता है जो इस समय, जब सञ्जय यह सब सुना रहे हैं, बाणों की शय्या पर पड़ा है। भीष्म। पंद्रहवें सत्संग में आपने सुना था कि युद्ध के बाद श्रीकृष्ण एक दिन ध्यान में स्थिर बैठे थे, और युधिष्ठिर के पूछने पर बोले: "शरशय्या पर पड़े भीष्म मेरा ध्यान कर रहे हैं, इसलिए मेरा मन उनके पास चला गया।" मन इधर से उधर गया, और उधर से इधर। "मद्गतेनान्तरात्मना", जिसका अन्तरात्मा मुझमें गया हो, उसकी इससे अच्छी तस्वीर क्या होगी?

और शान्ति पर्व आगे बताता है कि भीष्म ने शरशय्या पर लेटे-लेटे, हाथ जोड़कर, कर्म, मन और वाणी से श्रीकृष्ण का ध्यान किया, और उनकी एक लम्बी स्तुति की। उस स्तुति में एक पंक्ति है जो हमें आज यहाँ बैठे सबको छूती है: भीष्म उस आत्मा को नमस्कार करते हैं, "जिसने युद्ध में अर्जुन का सारथ्य करते हुए, तीनों लोकों के उपकार के लिए, गीता रूपी अमृत दिया।" सोचिए, जिस गीता को हम बीस सत्संगों से सुन रहे हैं, उसके लिए भीष्म ने शरशय्या से नमस्कार किया। और स्तुति के अन्त में, पाठ कहता है, उन्होंने केवल "नमः" कहकर श्रीकृष्ण को प्रणाम किया। और श्रीकृष्ण ने उनका भक्तियोग जानकर, प्रसन्न होकर, उन्हें दिव्य ज्ञान दिया। श्रद्धा, भीतर का मन, और अन्त में बस एक "नमः"। "स मे युक्ततमो मतः।"

और अब वह बात, जिसका वादा मैंने शुरू में किया था। आज केवल छठा अध्याय समाप्त नहीं हो रहा। आज गीता के पहले छह अध्याय पूरे हो रहे हैं। पुराने आचार्य गीता के अठारह अध्यायों को छह-छह के तीन हिस्सों में देखते हैं, और यह पहला हिस्सा, पहला षट्क, आज पूरा हुआ। बीस सत्संग। धृतराष्ट्र के डर से हम चले थे, "मामकाः पाण्डवाश्चैव" से। फिर अर्जुन का शोक देखा, और वह अमर आत्मा, जो न जन्मती है न मरती है। फिर कर्म करने का अधिकार, फल का नहीं। फिर यज्ञ का चक्र, और बड़ों का उदाहरण। फिर भगवान बार-बार क्यों आते हैं, और हर काम पूजा कैसे बनता है। फिर घर में रहकर कमल के पत्ते जैसा जीना। और इस अध्याय में, मन को दोस्त बनाना, संतुलन, और आज यह भरोसा कि कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता। बलदेव विद्याभूषण कहते हैं, पहले षट्क में ज्ञान से भरे निष्काम कर्म बताए गए, जिनका मुकुट योग है। विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं कि यह आख़िरी श्लोक अगले छह अध्यायों का सूत्र है, जो भक्ति के बारे में हैं। यानी आज हम एक सीढ़ी के ऊपर खड़े हैं, और यहीं से अगली सीढ़ी शुरू होती है।

सातवाँ अध्याय, महाभारत के भीष्म पर्व का इकतीसवाँ, "ज्ञानविज्ञान योग", श्रीकृष्ण इन शब्दों से शुरू करते हैं: "मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः। असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु।" एक शब्द पर ध्यान दीजिए: "असंशयं"। आज पैंतीसवें श्लोक में श्रीकृष्ण ने इसी शब्द से माना था कि मन चंचल है। अगली बार वे इसी शब्द से एक वादा करेंगे। वह वादा क्या है, यह अगले सत्संग में।

तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली बात। मन का न टिकना आपकी कोई अनोखी कमी नहीं है; भगवान ने ख़ुद कहा, "असंशयं", निःसन्देह मन चंचल है। उसकी दवा है बार-बार लौटाना, और जिधर वह भागता है उधर की कमी देख लेना। और जिस दिन भीतर का दीपक बुझ जाए, उस दिन भी बैठिए। अर्जुन ने अँधेरे में ही सीखा था कि अभ्यास आँखों के बिना भी काम करता है।

दूसरी बात। भलाई की ओर उठाया गया कोई कदम व्यर्थ नहीं जाता। "न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति।" दिलीप गंगा नहीं उतार पाए, फिर भी स्वर्ग गए, और उनका अधूरा काम भगीरथ ने पूरा किया। श्रीकृष्ण की शान्ति-यात्रा सफल नहीं हुई, फिर भी उन्होंने कहा था, जो धर्म के लिए पूरी शक्ति से लगा, उसे वह पुण्य मिल गया। आपकी अधूरी साधना फटा बादल नहीं है।

तीसरी बात। छूटा हुआ धागा फिर उठाइए। "यतते च ततो भूयः", वहाँ से फिर और प्रयत्न। पिछले छूटे दिनों का हिसाब मत गिनिए, वह अपराध-बोध भी एक रुकावट है। आज रात, या कल सुबह, बस पाँच मिनट। जो पीछे जमा है, वह आपके साथ है।

आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आपकी कौन-सी साधना, कौन-सा अच्छा संकल्प, कभी बीच में छूट गया था? और आज आप उसे फिर से कहाँ से उठाएँगे? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।

भगवान ने गीता में अर्जुन को "तात" केवल एक बार कहा, उस आदमी के लिए जो बीच रास्ते में थक गया था। वह शब्द आज आपके लिए है।

जय श्री कृष्ण।

श्रीभगवानुवाच पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते । न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति ॥ ४० ॥
गीता 6.40 — अर्थ पढ़ें ›

तीन बातें

  1. मन का न टिकना आपकी कोई अनोखी कमी नहीं है; भगवान ने ख़ुद कहा, "असंशयं", निःसन्देह मन चंचल है। उसकी दवा है बार-बार लौटाना, और जिधर वह भागता है उधर की कमी देख लेना। और जिस दिन भीतर का दीपक बुझ जाए, उस दिन भी बैठिए। अर्जुन ने अँधेरे में ही सीखा था कि अभ्यास आँखों के बिना भी काम करता है।
  2. भलाई की ओर उठाया गया कोई कदम व्यर्थ नहीं जाता। "न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति।" दिलीप गंगा नहीं उतार पाए, फिर भी स्वर्ग गए, और उनका अधूरा काम भगीरथ ने पूरा किया। श्रीकृष्ण की शान्ति-यात्रा सफल नहीं हुई, फिर भी उन्होंने कहा था, जो धर्म के लिए पूरी शक्ति से लगा, उसे वह पुण्य मिल गया। आपकी अधूरी साधना फटा बादल नहीं है।
  3. छूटा हुआ धागा फिर उठाइए। "यतते च ततो भूयः", वहाँ से फिर और प्रयत्न। पिछले छूटे दिनों का हिसाब मत गिनिए, वह अपराध-बोध भी एक रुकावट है। आज रात, या कल सुबह, बस पाँच मिनट। जो पीछे जमा है, वह आपके साथ है।