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सत्संग १९

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न ज़्यादा, न कम

गीता 6.16–6.32 · 81 मिनट

खाने, सोने, काम का संतुलन; हवा में न काँपता दीया

नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः । न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥ १६ ॥
गीता 6.16 — अर्थ पढ़ें ›
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥ १७ ॥
गीता 6.17 — अर्थ पढ़ें ›
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते । निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥ १८ ॥
गीता 6.18 — अर्थ पढ़ें ›

कभी आपने ध्यान दिया है कि जिस दिन हम बहुत भरपेट खा लेते हैं, उस दिन मन भारी और सुस्त रहता है, और जिस दिन काम के चक्कर में खाना ही छूट जाए, उस दिन मन चिड़चिड़ा और बिखरा रहता है? हफ़्ते भर देर रात तक जागते हैं, और फिर छुट्टी के दिन दोपहर तक सोते हैं, और उसके बाद भी थकान नहीं जाती। तो मन को शान्त करने के लिए हमें ज़्यादा करना है, या कम? ज़्यादा तप, ज़्यादा नियम, ज़्यादा जागना? या ज़्यादा आराम?

गीता का उत्तर आज के सत्संग के नाम में ही है: न ज़्यादा, न कम। और इसी उत्तर के ठीक बाद श्रीकृष्ण एक ऐसी तस्वीर देते हैं जो एक बार मन में बैठ जाए तो फिर उतरती नहीं: एक दीपक, जो ऐसी जगह रखा है जहाँ हवा नहीं चलती, और इसलिए उसकी लौ काँपती नहीं।

जय श्री कृष्ण।

आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का उन्नीसवाँ सत्संग है। पिछली बार हमने छठे अध्याय के पहले पन्द्रह श्लोक सुने थे। वहाँ श्रीकृष्ण ने कहा था कि अपना उद्धार अपने ही द्वारा करो, अपने को नीचे मत गिराओ, क्योंकि तुम स्वयं ही अपने मित्र हो और स्वयं ही अपने शत्रु। फिर उन्होंने बैठने की पूरी विधि बताई थी: साफ़ जगह, अपना स्थिर आसन, न बहुत ऊँचा न बहुत नीचा, शरीर, सिर और गर्दन सीधे और अचल, आँखें ठहरी हुई, और मन भगवान में। और उस सारे अभ्यास का उद्देश्य कोई चमत्कार नहीं था, भीतर की शुद्धि थी, और उसका फल शान्ति। पिछली बार के अन्त में मैंने कहा था कि वह मन से दोस्ती का तरीक़ा था, और अगली बार हम सुनेंगे कि उस दोस्ती को रोज़ कैसे निभाया जाए। आज वही बात है: आसन से उठकर, दिन भर खाने, सोने और काम के बीच हम कैसे जिएँ कि अगली बार बैठें तो मन बैठ सके।

जैसा हम हर बार करते हैं, पहले याद कर लें कि यह सब कहाँ कहा जा रहा है। महाभारत के भीष्म पर्व का तीसवाँ अध्याय गीता का छठा अध्याय है, आत्मसंयम योग। और यह सब हस्तिनापुर के महल में सञ्जय अन्धे राजा धृतराष्ट्र को सुना रहे हैं, उस दिन, जब भीष्म बाणों की शय्या पर गिर चुके हैं। और आज के पहले श्लोक में नींद की बात आती है, इसलिए मुझे उसी राजा की वह रात याद आती है जो हम सातवें, नवें और पिछले सत्संग में भी छू चुके हैं। युद्ध से पहले, सञ्जय के लौट आने की रात, राजा ने विदुर को बुलाकर कहा था, "इसी ने मेरी नींद उड़ा दी है। मैं जाग रहा हूँ और जल रहा हूँ।" उद्योग पर्व, तैंतीसवाँ अध्याय। जो राजा उस रात सो नहीं सका था, आज वही यह सुन रहा है कि योग न बहुत जागने वाले का है।

तो सोलहवाँ श्लोक। "नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।" हे अर्जुन, योग न बहुत खाने वाले का होता है, न बिलकुल न खाने वाले का। "न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन।" न बहुत सोने वाले का, न बहुत जागने वाले का।

इस श्लोक की बनावट देखिए। खाने की एक जोड़ी, बहुत खाना और बिलकुल न खाना; सोने की एक जोड़ी, बहुत सोना और बहुत जागना। और हर जोड़ी के दोनों सिरे एक साथ मना हैं। अगर बस इतना कहा जाता कि बहुत खाने वाले का योग नहीं, तो कई लोग सोचते कि जितना कम, उतना अच्छा। इसलिए एक ही साँस में दोनों ओर दीवार खड़ी कर दी गई, ताकि रास्ता बीच से जाए।

और यह बात ठीक इसी जगह आती है। बैठने की विधि सुनकर मन में जोश आता है कि अब कुछ बड़ा करूँ: खाना आधा कर दूँ, रात को तीन बजे उठूँ। श्रीकृष्ण उस जोश को ठीक समय पर थाम लेते हैं। मधुसूदन सरस्वती यहाँ "अर्जुन" सम्बोधन का भाव यही बताते हैं: हे अर्जुन, सावधान रहो।

रामानुजाचार्य इस श्लोक को और फैलाकर पढ़ते हैं। वे कहते हैं कि बहुत खाना और न खाना योग के विरोधी हैं, वैसे ही बहुत घूमना-फिरना और बिलकुल न घूमना, बहुत सोना और बहुत जागना, और बहुत अधिक परिश्रम और बिलकुल परिश्रम न करना। यानी यह श्लोक सिर्फ़ थाली और बिस्तर की बात नहीं कर रहा। यह पूरे दिन की बात कर रहा है। जो दफ़्तर में बारह-चौदह घंटे खटता है, और जो दिन भर कुछ नहीं करता, दोनों का मन बैठने पर एक-सा नहीं बैठता।

और नींद वाली बात पर एक सुन्दर संयोग है। गीता में अर्जुन का एक नाम बार-बार आता है, "गुडाकेश"। हमारी टीका पहले अध्याय में इसका अर्थ बताती है: निद्रा को जीतने वाले, जिन्होंने आलस्य को जीत लिया था। और आज वही श्रीकृष्ण उसी अर्जुन से कहते हैं कि योग बहुत जागने वाले का भी नहीं है। यानी नींद को जीतने का अर्थ नींद को मिटा देना नहीं है। नींद को जीतने का अर्थ है कि नींद आपकी सेवक रहे, स्वामी न बने। जब आप चाहें तब आए, और जितनी चाहिए उतनी आए।

संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर बहुत सीधे शब्दों में बोलते हैं। वे कहते हैं कि जो जीभ के हाथ बिक गया है, या जिसने अपने को नींद के हाथ बेच दिया है, वह इस मार्ग का अधिकारी नहीं कहा गया। पर फिर तुरन्त दूसरी ओर मुड़ते हैं। जो हठ की रस्सी से भूख-प्यास को बाँधकर, भोजन को ही मार डालता है, और नींद के रास्ते पर पैर भी नहीं रखता, ज्ञानेश्वर पूछते हैं, उसका तो शरीर ही उसका नहीं रहा, फिर योग किसका होगा? इसलिए, वे कहते हैं, न विषयों का बहुत सेवन करना, न उनसे ऐसा वैर करना कि सब कुछ रोक दो। यह भी नहीं।

और यही बात महाभारत में भीष्म पितामह के मुँह से भी आती है। अनुशासन पर्व में युधिष्ठिर भीष्म से पूछते हैं कि लोग जिस उपवास को तप कहते हैं, क्या सचमुच वही तप है? और भीष्म का उत्तर है: जो मनुष्य महीने या आधे महीने के उपवास से अपने शरीर को हानि पहुँचाता है, वह न तपस्वी है, न धर्म को जानने वाला। उत्तम तप तो त्याग है। अनुशासन पर्व, एक सौ चालीसवाँ अध्याय, तीसरे से पाँचवें श्लोक तक। पिछली बार मैंने आपसे कहा था कि धृतराष्ट्र ने अपने अन्तिम दिनों में जो कठोर तप किया, उसे हम अपना नमूना न बनाएँ। यह वही सावधानी है, और अब वह भीष्म के शब्दों में भी आ गई। शरीर को सताना तप नहीं है। शरीर को साधना तप है।

अब सत्रहवाँ श्लोक, जो आज के सत्संग का पहला बड़ा श्लोक है, और जिसे आज के अन्त में हम दोबारा सुनेंगे। "युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु। युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा।"

जो आहार और विहार में, कर्मों में चेष्टा में, और सोने-जागने में उचित मात्रा रखता है, उसके लिए योग दुःखों का नाश करने वाला होता है।

पिछले श्लोक ने बताया कि क्या नहीं; यह बताता है कि क्या। और पूरा श्लोक एक ही शब्द पर टिका है, जो तीन बार आता है: "युक्त"। शंकराचार्य शब्द खोलते हैं: आहार यानी अन्न, विहार यानी पैरों से चलना-फिरना, चेष्टा यानी कामों में लगना, स्वप्न और अवबोध यानी सोना और जागना। और "युक्त" यानी जिसकी एक मर्यादा है, एक नाप है; सोने-जागने के लिए, नियत समय। हमारी टीका इसे एक वाक्य में कहती है: गीता का योग सन्तुलन का मार्ग है, अति का नहीं। भूखा या अधिक खाया हुआ शरीर, थका या सुस्त मन, स्थिर नहीं हो सकता।

अब सवाल उठता है कि वह नाप किसका है? कितना खाना युक्त है, कितना सोना युक्त है? और यहाँ शंकराचार्य पिछले श्लोक पर एक बहुत सुन्दर शब्द देते हैं, "आत्मसंमित", यानी अपने नाप का। वे शतपथ की एक श्रुति का भाव याद दिलाते हैं: जो अन्न अपने नाप का होता है, वह रक्षा करता है और हानि नहीं करता; जो उससे ज़्यादा होता है, वह हानि करता है; और जो उससे कम होता है, वह रक्षा नहीं करता। मधुसूदन सरस्वती इसे और सरल कर देते हैं: अपने नाप का अन्न वह है जो ठीक से पच जाए और शरीर को काम करने लायक बनाए रखे।

ध्यान दीजिए, कोई तराज़ू नहीं दिया गया। कोई गिनती नहीं, कोई घड़ी नहीं। नाप "आत्मसंमित" है, अपने से नपा हुआ। और यहाँ मुझे महाभारत का एक दृश्य याद आता है, जो मुझे हमेशा मुस्कुरा देता है।

लाक्षागृह की आग से बचकर पाण्डव माता कुन्ती के साथ एकचक्रा नगरी में एक ब्राह्मण के घर छिपकर रह रहे थे। आदि पर्व का एक सौ इकहत्तरवाँ अध्याय कहता है कि वे जटाधारी ब्रह्मचारियों की तरह भिक्षा माँगने निकलते, और नगर के लोग उन्हें इतना चाहने लगे कि उनके पात्र तरह-तरह के भोजन से भर देते। भाई दिन भर की भिक्षा लाकर माता को सौंप देते, और माता उसे बाँटती। और बँटवारा कैसे होता था? पाठ कहता है: बाक़ी भाई माता के साथ आधा खाते थे, और सारी भिक्षा का बाक़ी आधा अकेला महाबली भीम खाता था। आधा हिस्सा एक आदमी का, और आधा बाक़ी पाँच का। और फिर भी, पाठ कहता है, भीम के लिए वह आधा हिस्सा ऐसा था जैसे धधकती बड़ी आग में घी की एक बूँद। उसका पेट कभी नहीं भरता था, और भूख से वह फीका और दुबला हो गया। फिर उसने एक कुम्हार के लिए लाखों बोझ मिट्टी ढोई, और कुम्हार ने हँसते हुए उसे एक बहुत बड़ा पात्र बनाकर दिया। उसे लेकर वह भिक्षा माँगने जाता तो लोग हँसते और उसे भर देते। फिर भी वह अकेले में माँ से कहता, "माँ, मेरा पेट नहीं भरा।"

अब इसे श्लोक के पास रखिए। कुन्ती ने बराबर नहीं बाँटा था, हर बेटे को उसके नाप से बाँटा था। यह मेरी अपनी पढ़त है, पर मुझे लगता है कि "युक्त" का अर्थ यही है: बराबर नहीं, अपने लिए ठीक। जो भीम के लिए ठीक था, वह नकुल के लिए बहुत ज़्यादा होता। इसलिए जब कोई आपसे कहे कि इतने बजे सोओ, इतना खाओ, तो उसे सुन लीजिए, पर गीता का शब्द याद रखिए। गीता ने "युक्त" कहा है, किसी दूसरे का नाप नहीं।

और एक बात साफ़ कह दूँ। मैं यहाँ खाने या सोने का कोई नियम नहीं दे रहा, और गीता भी कोई तौल नहीं देती; श्लोक का शब्द बस "युक्त" है। शरीर की सचमुच कोई तकलीफ़ हो, तो वह बात अपने डॉक्टर से करने की है। गीता यहाँ मन की ओर से बोल रही है: अति से मन नहीं टिकता।

और श्लोक का आख़िरी शब्द: "दुःखहा", दुःखों को मारने वाला। शंकराचार्य कहते हैं, संसार के सारे दुःखों को। सोचिए, थाली का नाप, बिस्तर का समय, काम के घंटे, इतनी छोटी चीज़ों से इतनी बड़ी बात जुड़ी है। ज्ञानेश्वर इसे एक प्यारी तस्वीर से कहते हैं: जब युक्ति के हाथ से इन्द्रियों को उनका भोजन परोसा जाता है, तब मन में सन्तोष बढ़ता जाता है। इन्द्रियों को भूखा नहीं मारा जाता, उन्हें नाप से परोसा जाता है। और जो इन्द्रियाँ नाप से भरी हों, वे मन को बार-बार खींचकर बाहर नहीं ले जातीं।

अब अठारहवाँ श्लोक। "यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते। निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा।" जब भली-भाँति वश में किया हुआ चित्त आत्मा में ही स्थित हो जाता है और सब कामनाओं से स्पृहारहित हो जाता है, तब वह युक्त कहा जाता है।

श्रीधर स्वामी कहते हैं कि यह इस प्रश्न का उत्तर है: योग पूरा कब होता है? दो बातें। एक, थामा हुआ चित्त आत्मा में ही टिक जाए; शंकराचार्य कहते हैं, बाहर की चीज़ों की चिन्ता छोड़कर। और दो, "निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो", सब कामनाओं की ललक चली जाए, शंकराचार्य के शब्दों में देखी हुई चीज़ों की भी और अनदेखी की भी।

और अब एक छोटी-सी बात पर ध्यान दीजिए, जो मुझे इस हिस्से में सबसे सुन्दर लगती है। सत्रहवें श्लोक में "युक्त" शब्द तीन बार आया था, आहार के साथ, चेष्टा के साथ, नींद के साथ, और वहाँ उसका अर्थ था ठीक नाप का। और अठारहवें श्लोक में वही शब्द फिर आता है, "युक्त इत्युच्यते", तब वह युक्त कहा जाता है, और यहाँ उसका अर्थ है योग में जुड़ा हुआ। एक ही शब्द, दो अर्थ। जिसका जीवन युक्त है, नपा-तुला है, उसका मन युक्त होता है, जुड़ जाता है। ऐसा लगता है जैसे श्रीकृष्ण कह रहे हों कि जिस दिन तुम्हारी थाली और तुम्हारी नींद ठीक नाप पर आ जाएँगी, उस दिन तुम्हारा मन भी ठीक जगह पर आने लगेगा। ज्ञानेश्वर महाराज यही कहते हैं: बाहर युक्ति की मुद्रा बनती है, भीतर सुख बढ़ता है, और योग बिना ज़ोर लगाए अपने आप घट जाता है।

पर अभी एक बात बाकी है। जब मन इस तरह युक्त हो जाए, तो वह दिखता कैसा है? उन्नीसवें श्लोक में श्रीकृष्ण इसका जो उत्तर देते हैं, वह गीता की सबसे प्रसिद्ध उपमाओं में से एक है, वही दीपक, जिसकी बात मैंने शुरू में की थी। और उस दीपक को महाभारत ने एक बार श्रीकृष्ण के अपने चेहरे पर भी देखा था। आइए, पहले वह श्लोक सुनते हैं।

यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता । योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥ १९ ॥
गीता 6.19 — अर्थ पढ़ें ›
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया । यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥ २० ॥
गीता 6.20 — अर्थ पढ़ें ›
सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् । वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥ २१ ॥
गीता 6.21 — अर्थ पढ़ें ›

उन्नीसवाँ श्लोक: "यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता। योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः।"

जैसे वायुरहित स्थान में रखा दीपक काँपता नहीं, वही उपमा आत्मा के ध्यान का अभ्यास करते हुए, वश में किए चित्त वाले योगी के लिए कही गई है।

"दीपो निवातस्थो", ऐसी जगह रखा दीपक जहाँ हवा नहीं। "नेङ्गते", हिलता नहीं, काँपता नहीं। और फिर एक छोटा शब्द, जिसे जल्दी में हम सुनते ही नहीं: "सोपमा स्मृता", यह उपमा कही गई है, याद की गई है। शंकराचार्य इस "स्मृता" पर रुकते हैं। वे कहते हैं, यह उपमा उन योग जानने वालों ने सोची है जो चित्त की चाल को देखते रहे हैं। यानी यह किसी कवि का सजाया हुआ वाक्य नहीं है। यह उन लोगों की गवाही है जो बरसों अपने मन के सामने बैठे, उसे हिलते-डुलते देखा, और फिर एक दिन उसे ठहरते भी देखा, और जब बताना पड़ा कि ठहरा हुआ मन कैसा होता है, तो उन्हें इससे अच्छी तस्वीर नहीं मिली।

अब इस दीपक को ध्यान से देखिए। उसकी लौ क्यों नहीं काँपती? मधुसूदन सरस्वती का उत्तर बहुत सीधा है: क्योंकि वहाँ वह हवा नहीं है जो उसे हिलाती। लौ को किसी ने पकड़कर नहीं रखा है। बस हिलाने वाला कारण नहीं है। और यहीं पिछला हिस्सा इस श्लोक से जुड़ जाता है। मन की लौ को हिलाने वाली हवाएँ कौन-सी हैं? ज़रूरत से ज़्यादा भरा पेट, या खाली पेट। अधूरी नींद, या ज़रूरत से ज़्यादा नींद। दिन भर की बेतहाशा भाग-दौड़। और अठारहवें श्लोक की वे कामनाएँ, जिनकी ललक मन को खींचती रहती है। इसलिए गीता पहले हवा बन्द करवाती है, फिर दीपक की बात करती है। यह मेरा जोड़ है, पर मुझे लगता है कि श्लोकों का क्रम इसी ओर इशारा करता है।

रामानुजाचार्य इस उपमा में एक और बात देखते हैं, जो बहुत ज़रूरी है। वे कहते हैं कि निवात में रखा दीपक अचल भी रहता है और प्रकाश वाला भी। श्रीधर स्वामी भी यही दो गुण गिनाते हैं: बिना कम्पन के, और प्रकाश देने वाला। यानी ठहरा हुआ मन बुझा हुआ मन नहीं है। कई लोग ध्यान को ऐसी अवस्था समझते हैं जिसमें मन सुन्न हो जाए, कुछ न रहे। श्लोक दीपक की बात कर रहा है, पत्थर की नहीं। लौ स्थिर है, पर जल रही है, और उसकी रोशनी आसपास सब कुछ साफ़ दिखा रही है।

तिलक इस उपमा के साथ दो और तस्वीरें याद दिलाते हैं। जैसे कोई तेल से भरा बर्तन लेकर सीढ़ियाँ चढ़ रहा हो, या तूफ़ान में अपनी नाव को बचा रहा हो, उस समय आदमी का मन जैसा एक जगह जुड़ा रहता है, योगी का मन वैसा ही एकाग्र रहता है। आपने भी कभी यह देखा होगा। माँ जब पूरा भरा दूध का गिलास लेकर बच्चे के कमरे तक जाती है, तो उस समय उससे कोई बात करे, वह सुनती ही नहीं। उसकी आँखें गिलास पर हैं और मन भी।

और अब वह बात, जो मैंने शुरू में कही थी। पन्द्रहवें सत्संग में आपने शान्ति पर्व का एक दृश्य सुना था। युद्ध समाप्त हो चुका है, युधिष्ठिर राजा बन चुके हैं, और एक दिन वे श्रीकृष्ण के पास जाते हैं, तो देखते हैं कि वे ध्यान में बैठे हैं, इतने अचल कि युधिष्ठिर चकित होकर कहते हैं: "हे अच्युत, जैसे निर्वात स्थान में दीपक स्थिर जलता है, वैसे ही आप योग की दृढ़ता से निश्चल हैं।" शान्ति पर्व, पैंतालीसवाँ अध्याय, छठा श्लोक। सोचिए। जो उपमा श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र में अर्जुन को दी थी, वही उपमा युद्ध के बाद युधिष्ठिर के मुँह से अपने आप निकलती है, जब वे उन्हीं श्रीकृष्ण को ध्यान में देखते हैं। जिसने यह बात कही, वह खुद वैसे ही बैठा मिला। और उस दिन श्रीकृष्ण ध्यान में किसका चिन्तन कर रहे थे, वह बात हम आज के सत्संग में थोड़ा आगे चलकर, तीसवें श्लोक पर, फिर से खोलेंगे, क्योंकि वहीं उसका असली अर्थ खुलता है।

बीसवें श्लोक में उतरने से पहले आपसे एक छोटी-सी बात। हम आज के सत्संग का लगभग एक तिहाई सुन चुके हैं, और यहाँ तक आकर कई लोग मान लेते हैं कि बात पूरी हो गई: न ज़्यादा खाओ, न कम, और मन दीपक जैसा हो जाएगा। पर आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। आगे श्रीकृष्ण वह बताने वाले हैं जो सबसे ज़्यादा काम का है: जब मन फिर भी भटके, और वह भटकेगा, तब क्या करें। और उसके बाद वह श्लोक, जिसमें वे कहते हैं कि जो मुझे सब जगह देखता है, उसके लिए मैं कभी ओझल नहीं होता। तो अगर आप यह सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की यह यात्रा बीच में न छूटे। और आज का यह सत्संग आख़िर तक सुनिए।

अब बीसवाँ श्लोक। "यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया। यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति।" जिस अवस्था में योग के अभ्यास से निरुद्ध चित्त उपराम हो जाता है, और जिसमें अपने से आत्मा को देखता हुआ आत्मा में ही सन्तुष्ट रहता है।

हमारी टीका यहाँ एक ज़रूरी सूचना देती है: श्लोक बीस से तेईस तक एक ही वाक्य हैं, जो उस अवस्था का वर्णन करके तेईसवें श्लोक में उसका नाम देते हैं। यानी अगले चार श्लोक एक ही चीज़ के चार चेहरे हैं, और नाम बाद में आएगा। श्रीधर स्वामी यहाँ पतञ्जलि का प्रसिद्ध सूत्र याद दिलाते हैं, योग चित्त की वृत्तियों का निरोध है, और कहते हैं कि "यत्रोपरमते चित्तं", यानी चित्त का थम जाना, योग का स्वरूप है। और "पश्यन्नात्मनि तुष्यति", अपने में सन्तोष, उसका फल है। रामानुज इसमें एक मानवीय रंग भरते हैं। वे कहते हैं, चित्त वहाँ इसलिए रमता है कि उसे लगता है, यही सबसे बड़ा सुख है; और उसे सन्तुष्ट होने के लिए किसी और चीज़ की ज़रूरत नहीं पड़ती।

और "योगसेवया" शब्द पर ध्यान दीजिए: योग की सेवा से। जैसे किसी बुज़ुर्ग की सेवा रोज़ होती है, एक दिन ज़ोर लगाकर नहीं। मन का यह थमना किसी एक दिन की कसरत से नहीं आता, रोज़ की सेवा से आता है। थोड़ा, पर रोज़।

अब इक्कीसवाँ श्लोक। "सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्। वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः।" जिसमें वह उस अनन्त सुख को जानता है जो बुद्धि द्वारा ग्रहण होता है और इन्द्रियों से परे है; और जिसमें स्थित होकर वह तत्त्व से कभी विचलित नहीं होता।

यहाँ श्रीधर स्वामी वही सवाल उठाते हैं जो हमारे मन में भी उठता है। जब आँख, कान, जीभ, किसी का किसी चीज़ से मेल ही नहीं हो रहा, तब सुख आएगा कहाँ से? हमें तो सुख सदा किसी चीज़ से मिला है: स्वाद से, गीत से, किसी के छूने से। उनका उत्तर है: इसीलिए श्लोक कहता है "बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्", यह इन्द्रियों से परे है, और इसे केवल बुद्धि पकड़ती है। और मधुसूदन सरस्वती यहाँ ऐसी बात कहते हैं जो आज के पहले श्लोक से फिर जुड़ जाती है। वे कहते हैं कि "सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्" के तीन विशेषण तीन अलग सुखों को अलग करते हैं। अन्तहीन होना उस परम सुख का स्वरूप बताता है। इन्द्रियों से परे होना उसे इन्द्रियों और विषयों के मेल वाले सुख से अलग करता है। और बुद्धि से पकड़ा जाना उसे गहरी नींद के सुख से अलग करता है, क्योंकि गहरी नींद में बुद्धि लीन हो जाती है, जबकि यहाँ बुद्धि जागी हुई है। यानी यह सुख अच्छी नींद का सुख नहीं है। अच्छी नींद के बाद जो हल्कापन मिलता है, वह भी सुन्दर है, पर वह इससे अलग है। यह जागते हुए का सुख है।

आपने कभी इसकी झलक देखी होगी, शायद बिना नाम दिए। सुबह-सुबह कहीं चुपचाप बैठे, कुछ पाने की जल्दी नहीं, कोई ख़बर नहीं आई, कोई तारीफ़ नहीं मिली, और फिर भी भीतर एक भरापन था। या किसी बूढ़े माँ-बाप के पास बैठे, बिना बात किए, और लगा कि बस, यही ठीक है। वह छोटा-सा पल इस श्लोक की बहुत छोटी झलक है। श्लोक कहता है कि वह भरापन बाहर से नहीं आया था, इसलिए बाहर की किसी चीज़ के जाने से वह जाता भी नहीं। "न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः", जो वहाँ ठहर गया, वह फिर तत्त्व से हिलता नहीं।

पर अभी एक बात बाकी है। "हिलता नहीं", यह कहना आसान है। अगले श्लोक में श्रीकृष्ण इसकी सबसे कड़ी परीक्षा रखते हैं: भारी से भारी दुःख भी उसे नहीं हिला सकता, और उसे पाकर वह किसी दूसरे लाभ को उससे बड़ा नहीं मानता। और महाभारत में एक ऐसा ऋषि है, जिसकी छह बार परीक्षा हुई, और फिर जिसके सामने स्वर्ग का विमान आकर खड़ा हुआ। उसने क्या किया, यह सुनिए।

यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः । यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥ २२ ॥
गीता 6.22 — अर्थ पढ़ें ›
तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् । स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥ २३ ॥
गीता 6.23 — अर्थ पढ़ें ›
सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः । मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥ २४ ॥
गीता 6.24 — अर्थ पढ़ें ›

बाईसवाँ श्लोक: "यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः। यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते।" जिसे पाकर वह उससे अधिक दूसरा कोई लाभ नहीं मानता, और जिसमें स्थित होकर वह भारी दुःख से भी विचलित नहीं होता।

दो कसौटियाँ हैं। पहली लाभ की: इसे पाने के बाद कोई दूसरा लाभ इससे बड़ा नहीं लगता। दूसरी दुःख की: "गुरुणापि", भारी से भारी दुःख भी इसे हिला नहीं पाता। शंकराचार्य और नीलकण्ठ भारी दुःख का उदाहरण देते हैं, जैसे शरीर पर शस्त्र का गिरना। और रामानुज एक ऐसा उदाहरण देते हैं जो सीधे दिल पर लगता है: गुणवान पुत्र के बिछुड़ जाने जैसा दुःख। ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं कि चाहे मेरु से भी बड़ा देह के दुःख का पहाड़ ऊपर आ पड़े, चित्त उसके नीचे दबता नहीं। इसका अर्थ यह नहीं कि उसे दर्द नहीं होता। इसका अर्थ है कि दर्द आता है, पर वह उसे उसकी जगह से नहीं हटा पाता।

सोलहवें सत्संग में आपने मुद्गल ऋषि को सुना था, जिन्होंने स्वर्ग से आया विमान भी लौटा दिया था। वह इस श्लोक की पहली कसौटी का जीवन था। आज मैं आपको महाभारत की एक ऐसी कथा सुनाना चाहता हूँ जिसमें दोनों कसौटियाँ एक साथ दिखती हैं, और जो हमने इस यात्रा में अब तक नहीं सुनी। वन पर्व में, वनवास के दिनों में, युधिष्ठिर मार्कण्डेय ऋषि से पूछते हैं कि क्या कभी कोई स्त्री द्रौपदी जैसी हुई है। और मार्कण्डेय उन्हें सावित्री की कथा सुनाते हैं।

सावित्री ने सत्यवान को पति चुना था। तब नारद ने बताया कि उसकी आयु बस एक वर्ष बची है, और पिता ने कहा, किसी दूसरे को चुन लो। सावित्री ने कहा, "मैंने एक बार पति चुन लिया है, मैं दूसरा नहीं चुनूँगी।" वन पर्व, दो सौ पचानवेवाँ अध्याय। पाठ कहता है कि सावित्री एक-एक दिन गिनती रही, और नारद की बात सदा उसके मन में रही। मृत्यु के दिन से पहले उसने एक कठिन व्रत लिया। ससुर ने चिन्ता से कहा कि यह बहुत कठिन है, तो उसने उत्तर दिया: "पिताजी, दुःख मत कीजिए। यह दृढ़ निश्चय से लिया गया है, और दृढ़ निश्चय ही इसे पूरा कराता है।" वन पर्व, दो सौ सत्तानवेवाँ अध्याय। वह व्रत उसका अपना था, और गीता हमें उसका नमूना नहीं देती। हम उससे जो लेते हैं, वह उसका निश्चय है। और पाठ कहता है कि उस दिन वह पति के साथ वन जाते हुए मुस्कुराती-सी दिखती थी, पर उसका हृदय दुःख से जल रहा था।

फिर वन में सत्यवान के सिर में पीड़ा उठी, वह सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गया, और यम आए। सत्यवान के प्राण लेकर वे दक्षिण की ओर चले, और सावित्री उनके पीछे-पीछे चली। यम ने कहा, लौट जाओ, जितनी दूर आया जा सकता था, तुम आ चुकी हो। वह नहीं लौटी। यम उसकी बातों से प्रसन्न होते गए और बार-बार कहते रहे, "इसके जीवन को छोड़कर कोई भी वर माँग लो।" उसने ससुर की आँखें माँगीं, उनका राज्य माँगा, पिता के लिए पुत्र माँगे। और हर बार यम कहते, "तुम थकी-सी दिखती हो, लौट जाओ, ताकि तुम्हें थकान न हो।" और सावित्री का उत्तर था: "पति के पास रहते मुझे थकान कैसी? जहाँ मेरे पति हैं, वही मेरी निश्चित गति है।" वन पर्व, दो सौ अट्ठानवेवाँ अध्याय, उनतीसवाँ और तीसवाँ श्लोक।

और आख़िर में, जब यम ने बिना किसी अपवाद के वर माँगने को कहा, तब उसने कहा: "यह सत्यवान जीवित हो। पति से बिछुड़कर मैं सुख नहीं चाहती, स्वर्ग नहीं चाहती, धन-लक्ष्मी नहीं चाहती।" उसी अध्याय का चौवनवाँ श्लोक। और यम ने पाश खोल दिया।

अब इसे बाईसवें श्लोक पर रखिए। यम हर बार बड़े से बड़े वर दे रहे थे, और कोई भी वर सावित्री को वहाँ से नहीं हटा सका जहाँ उसका मन टिका था। "यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।" और भारी दुःख, पति का शरीर पीछे पड़ा है, मृत्यु के देवता आगे चल रहे हैं, फिर भी उसका पैर नहीं रुका। यह मेरी तुलना है, पर इस श्लोक का इससे सुन्दर चित्र मुझे नहीं मिला। और ध्यान दीजिए, उसकी स्थिरता किसी पत्थर जैसी नहीं थी। उसका हृदय जल रहा था। बस वह हिला नहीं।

अब तेईसवाँ श्लोक, जहाँ उस अवस्था को नाम मिलता है। "तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्। स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा।" उसे योग नाम वाला, दुःख के संयोग का वियोग जानना चाहिए। उस योग का अभ्यास निश्चयपूर्वक और बिना ऊबे हुए चित्त से करना चाहिए।

हमारी टीका यहाँ एक सुन्दर उलटफेर दिखाती है: योग को प्रायः संयोग कहा जाता है, यानी जुड़ना; यहाँ उसे उससे परिभाषित किया गया है जिसे वह तोड़ता है, दुःख का सम्बन्ध। यानी योग का एक अर्थ है जुड़ना, और उसी का दूसरा अर्थ है छूटना। भगवान से जुड़ना, और दुःख से छूटना। श्रीधर स्वामी एक बारीक बात और जोड़ते हैं कि यहाँ "दुःख" में वह सुख भी गिना गया है जिसमें दुःख मिला हुआ है, यानी विषयों का वह सुख जो जाते-जाते दुःख छोड़ जाता है।

और फिर दो साधन, जो सावित्री की कथा में अभी हमने अपनी आँखों से देखे। "निश्चयेन", निश्चय से; और "योगोऽनिर्विण्णचेतसा", बिना ऊबे, बिना हारे मन से। मधुसूदन सरस्वती इस ऊब को बड़े मानवीय ढंग से खोलते हैं। वे कहते हैं कि ऊब यह पछतावा है: "इतने समय से कर रहा हूँ, फिर भी योग सिद्ध नहीं हुआ, इससे बड़ा कष्ट क्या होगा।" और उसका उत्तर वे धैर्य के एक वाक्य में देते हैं: इस जन्म में या अगले में, सिद्ध तो होगा ही, जल्दी क्या है?

और यहाँ मधुसूदन एक कथा भी देते हैं, जो वे कहते हैं परम्परा जानने वाले सुनाते हैं, यानी यह महाभारत की कथा नहीं, आचार्यों की परम्परा की कथा है। एक छोटी चिड़िया के अण्डे समुद्र किनारे रखे थे, और लहरें उन्हें बहा ले गईं। चिड़िया ने ठान लिया कि मैं समुद्र को सुखा दूँगी, और अपनी चोंच से एक-एक बूँद उठाकर बाहर फेंकने लगी। सबने रोका, वह नहीं रुकी। कहते हैं कि नारद वहाँ आए, उन्होंने भी रोका, तो उसने कहा, इस जन्म में नहीं तो अगले में, पर मैं सुखाकर रहूँगी। तब नारद ने करुणा से गरुड़ को उसकी सहायता के लिए भेजा, गरुड़ के पंखों की हवा से समुद्र डर गया और उसने अण्डे लौटा दिए। मधुसूदन कहते हैं, जो बिना थके मन को रोकने के इस काम में लगा रहता है, उस पर ईश्वर कृपा करता है, और उस चिड़िया की तरह उसका काम पूरा होता है। मुझे इस कथा में चिड़िया की ताकत नहीं, उसकी ज़िद अच्छी लगती है। एक-एक बूँद। और वह मानकर चलती है कि मदद आएगी।

अब चौबीसवाँ श्लोक। "सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः। मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः।" संकल्प से उत्पन्न सब कामनाओं को पूरी तरह त्यागकर, और मन से ही इन्द्रियों के समूह को सब ओर से वश में करके। हमारी टीका बताती है कि श्लोक चौबीस और पच्चीस मिलकर एक वाक्य हैं, इसलिए यह वाक्य अगले श्लोक में पूरा होगा।

"सङ्कल्पप्रभवान्", संकल्प से जन्मी कामनाएँ। पिछली बार दूसरे श्लोक पर हमारी टीका ने संकल्प का अर्थ बताया था: मन का अपने लाभ के लिए लगातार योजना बनाना, "यह होगा, फिर मुझे वह मिलेगा।" रामानुज यहाँ कामनाओं को दो तरह का बताते हैं, और यह भेद बहुत काम का है। एक वे जो छूने से उपजती हैं, जैसे सर्दी में गर्मी की चाह, गर्मी में ठण्डक की। ये शरीर के रहते पूरी तरह नहीं टलतीं; इनमें बस इतना करना है कि उनसे उठने वाली ख़ुशी और खीज को छोड़ दें। और दूसरी वे जो संकल्प से उपजती हैं, जैसे पुत्र-पौत्र, खेत, यह मेरा हो, वह मेरा हो। ये मन की बनाई हुई हैं, इसलिए मन ही इन्हें छोड़ सकता है। यानी श्रीकृष्ण आपसे ठण्ड न लगने को नहीं कह रहे। वे उस बात को छोड़ने को कह रहे हैं जिसे मधुसूदन "इदं मे स्यात्" कहते हैं, उस "यह मुझे मिलना चाहिए" को, जो रात भर बिस्तर पर योजनाएँ बुनता है।

और "मनसैव", मन से ही। नीलकण्ठ कहते हैं कि पहले आधे में भीतर का संयम है, जिसे शम कहते हैं, और दूसरे आधे में बाहर की इन्द्रियों का संयम, जिसे दम कहते हैं। और पिछली बार तिलक के हवाले से हमने सुना था कि यही "मन से ही" इस अभ्यास को हठ से अलग करता है। इन्द्रियों को ज़बरदस्ती बाँधना नहीं है, मन को समझाकर उन्हें लौटाना है।

पर अभी एक बात बाकी है। यह वाक्य अधूरा है, और उसका बाक़ी हिस्सा गीता के सबसे दयालु शब्दों में से एक से शुरू होता है: धीरे-धीरे। और उसके बाद वह श्लोक, जो हर उस आदमी के लिए है जो ध्यान में बैठता है और दो मिनट बाद पाता है कि मन कहीं और पहुँच गया। उस मन के लिए महाभारत में एक राजकुमार का उदाहरण है, जिसके पास सब कुछ था, और फिर भी उसका मन रात-दिन एक ही जगह भागता था।

शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया । आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥ २५ ॥
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यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् । ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥ २६ ॥
गीता 6.26 — अर्थ पढ़ें ›

पच्चीसवाँ श्लोक पिछले वाक्य को पूरा करता है। "शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया। आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्।" धैर्य से पकड़ी हुई बुद्धि के द्वारा धीरे-धीरे उपराम हो। मन को आत्मा में स्थित करके और कुछ भी चिन्तन न करे।

"शनैः शनैरुपरमेद्", धीरे-धीरे उपराम हो। "शनैः" शब्द यहाँ दो बार आया है, एक के पीछे एक, जैसे कोई बड़ा किसी जल्दबाज़ बच्चे का हाथ पकड़कर कहे, धीरे, धीरे। हमारी टीका कहती है: "धीरे-धीरे" मन पर जबरदस्ती करने से सावधान करता है। स्थिरता धैर्यपूर्ण, नियमित अभ्यास से बढ़ती है। और शंकराचार्य इसका अर्थ दो शब्दों में करते हैं, "न सहसा", अचानक नहीं, एक झटके में नहीं। फिर "बुद्ध्या धृतिगृहीतया", ऐसी बुद्धि से जिसे धृति ने, यानी धैर्य और दृढ़ता ने, थाम रखा हो। मधुसूदन सरस्वती उस बुद्धि की भाषा बताते हैं: यह होगा, कभी न कभी ज़रूर होगा, फिर जल्दी क्या है।

"न किञ्चिदपि चिन्तयेत्", कुछ भी न सोचे। इसे सुनकर बहुत लोग घबरा जाते हैं कि सोचना बन्द कैसे होगा। पर ध्यान दीजिए, यह वाक्य "धीरे-धीरे" के बाद आता है, और "आत्मसंस्थं मनः कृत्वा" के बाद, यानी मन को पहले आत्मा में टिका देने के बाद। श्रीधर स्वामी कहते हैं कि अगर पुराने संस्कारों से मन हिले, तो धारणा से उसे स्थिर करो, धीरे-धीरे, अभ्यास के क्रम से। यानी यह पहले दिन का आदेश नहीं है, यह रास्ते के अन्त की अवस्था है। पहले दिन तो सौ बातें आएँगी। और शंकराचार्य कहते हैं, यही योग की परम विधि है।

अब छब्बीसवाँ श्लोक, आज के सत्संग का दूसरा बड़ा श्लोक, और शायद सबसे काम का। "यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्। ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्।" चंचल और अस्थिर मन जिस-जिस कारण से भटकता है, उस-उस से इसे रोककर आत्मा में ही वश में लाए।

इस श्लोक में सबसे पहले जो बात दिलासा देती है, वह यह है कि श्रीकृष्ण मान रहे हैं कि मन भटकेगा। वे यह नहीं कहते कि अगर मन भटका तो तुम असफल हो। वे कहते हैं, जहाँ-जहाँ जाए, वहाँ-वहाँ से लौटा लाओ। हमारी टीका इसे बहुत सरल कहती है: मन भटकेगा, यह स्वाभाविक है। अभ्यास है उसे बार-बार, बिना खीझे, वापस लाना। "बिना खीझे"। जो आदमी हर बार मन के भटकने पर अपने को कोसता है, वह असल में मन को दूसरी जगह भटका देता है, अपने ऊपर गुस्से में।

शंकराचार्य बताते हैं कि मन किसी शब्द, किसी रूप, किसी याद के कारण, अपने स्वभाव के दोष से बाहर निकलता है। और उसे लौटाने का उपाय भी बताते हैं: उस चीज़ को उसके असली रूप में देखो, कि यह आती-जाती है, और वैराग्य की भावना से मन को लौटाओ। और मधुसूदन सरस्वती यहाँ एक ऐसी बात कहते हैं जो आज के पहले श्लोक से सीधे जुड़ती है। वे कहते हैं कि मन दो दिशाओं में भटकता है। एक बाहर की ओर, चीज़ों की ओर, राग और द्वेष की ओर, उसे वे विक्षेप कहते हैं। और दूसरी नीचे की ओर, नींद और सुस्ती की ओर, जिसे वे लय कहते हैं। और लय के कारण वे गिनाते हैं: बची हुई नींद, बहुत खा लेना, और थकान। सुना आपने? सोलहवें श्लोक की वही बातें। जिसने पेट ज़्यादा भर लिया या नींद अधूरी छोड़ दी, उसका मन ध्यान में बैठते ही झपकी की ओर फिसलता है। इसलिए मधुसूदन गौडपादाचार्य का वचन याद दिलाते हैं: जब चित्त डूबने लगे तो उसे जगाओ, और जब बिखरने लगे तो उसे शान्त करो।

संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक का बहुत व्यावहारिक रूप देते हैं। वे कहते हैं, अपने जी में एक नियम बना लो। अगर उतने से चित्त टिक जाए, तो काम बन गया। नहीं तो उसे छोड़ दो। और छोड़ा हुआ मन जहाँ जाएगा, वहाँ से नियम ही उसे पकड़कर लौटा लाएगा। इसी तरह उसे स्थिर रहने की आदत पड़ जाएगी। छोड़ दो, और फिर ले आओ। बिना लड़ाई के। जैसे कोई पतंग की डोर ढीली भी करता है और खींचता भी है।

अब उस मन को देखिए जिसे कभी लौटाया नहीं गया। सभा पर्व में, युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के बाद, शकुनि दुर्योधन को लेकर हस्तिनापुर लौटता है और धृतराष्ट्र से कहता है कि आपका बेटा फीका, पीला और दुबला हो गया है, चिन्ता में डूबा है। धृतराष्ट्र बेटे से पूछते हैं, और उनके प्रश्न सुनिए: "तुम उत्तम वस्त्र पहनते हो, मांस-भात खाते हो, अच्छी नस्ल के घोड़े तुम्हें ढोते हैं, अच्छी शय्याएँ, अच्छे भवन, मनचाहे विहार, सब तुम्हारे पास हैं। फिर तुम पीले और दुबले क्यों हो?" सभा पर्व, छिहत्तरवाँ अध्याय। और दुर्योधन का उत्तर: "कुन्ती के पुत्र की वह चमकती लक्ष्मी देखकर अब मेरा भोग मुझे प्रसन्न नहीं करता। आँखों से ओझल होने पर भी मैं मानो उसे देखता रहता हूँ।" और आगे: "मैं उसी के बारे में सोचता रहता हूँ, और मुझे बिलकुल शान्ति नहीं मिलती।"

यह छब्बीसवें श्लोक का उलटा चित्र है। "यतो यतो निश्चरति", मन एक जगह भागा, पाण्डवों के वैभव की ओर, और फिर वहीं जाता रहा, सामने हो तब भी, ओझल हो तब भी। और उसे लौटाने के बजाय उसे और खुराक दी गई। उसी अध्याय में शकुनि जुए का उपाय बताता है, और धृतराष्ट्र जुए के लिए हज़ार खम्भों और सौ द्वारों वाली सभा बनवाने की आज्ञा दे देते हैं। और ज़रा याद कीजिए कि आज यह श्लोक कौन सुन रहा है। वही धृतराष्ट्र, जिन्होंने उस दिन बेटे से पूछा था कि सब कुछ होते हुए भी तुम दुबले क्यों हो। थाली भरी थी, शय्या नरम थी, और फिर भी शरीर फीका पड़ रहा था, क्योंकि मन कहीं और भाग गया था। सत्रहवें श्लोक में "युक्ताहारविहारस्य" की बात थी, पर यह कथा बताती है कि बिना लौटाए मन के साथ अच्छा भोजन भी शरीर को नहीं लगता।

हम सब के भीतर एक छोटा-सा दुर्योधन है, जिसका मन किसी और की तरक्की, किसी पुराने अपमान, किसी अधूरी चाह की ओर बार-बार भागता है। श्रीकृष्ण उसे मारने को नहीं कहते। वे कहते हैं, जहाँ-जहाँ जाए, वहाँ-वहाँ से उसे लौटा लाओ। आज भी, और कल भी।

पर अभी एक बात बाकी है। लौटाते-लौटाते एक दिन ऐसा आता है जब मन लौटकर टिकने लगता है। उस दिन क्या मिलता है? सत्ताईसवें और अट्ठाईसवें श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं कि वह सुख योगी के पास अपने आप आता है, उसे ढूँढ़ने नहीं जाना पड़ता। और एक शब्द है वहाँ, "सुखेन", जो इस पूरे अभ्यास का सबसे मीठा वादा है।

प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् । उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥ २७ ॥
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युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः । सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥ २८ ॥
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सत्ताईसवाँ श्लोक: "प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्। उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्।" जिसका मन शान्त है, जिसका रजोगुण शान्त हो गया है, जो निष्पाप और ब्रह्मरूप हो गया है, उस योगी को उत्तम सुख प्राप्त होता है।

इस श्लोक का व्याकरण बहुत कुछ कहता है। वाक्य का कर्ता योगी नहीं है, कर्ता सुख है। "सुखमुत्तमम् उपैति", उत्तम सुख उसके पास आता है। योगी सुख के पीछे नहीं जा रहा, सुख योगी के पास आ रहा है। श्रीधर स्वामी इसे एक शब्द में कहते हैं: "स्वयमेव", अपने आप। आपने कभी बगीचे में यह देखा होगा। जब तक आप चिड़िया के पीछे दौड़ते हैं, वह उड़ जाती है। जब आप चुपचाप बेंच पर बैठ जाते हैं, थोड़ी देर में वह आपके पास के दाने चुगने लगती है। दुर्योधन सुख के पीछे दौड़ रहा था, और उसके पास भोग का हर साधन था, फिर भी सुख नहीं टिका। यह श्लोक उसका दूसरा पहलू है।

अब श्लोक के विशेषण। "प्रशान्तमनसं", जिसका मन भली-भाँति शान्त है। "शान्तरजसं", जिसका रज शान्त हो गया, यानी वह बेचैनी जो हर समय कुछ करवाती रहती है। और "ब्रह्मभूतमकल्मषम्", ब्रह्मरूप हुआ और जिसमें मैल नहीं। मधुसूदन सरस्वती यहाँ पिछले श्लोक की अपनी बात को पूरा करते हैं। याद है, उन्होंने कहा था कि मन दो दिशाओं में भटकता है, बिखराव की ओर और डूबने की ओर। यहाँ वे कहते हैं कि "शान्तरजसं" का अर्थ है जिसका बिखराव थम गया, और "मैल न होने" का एक अर्थ है जिसमें डुबाने वाला तम नहीं रहा। यानी न बिखरा, न डूबा। फिर वही बात, जो आज बार-बार लौट रही है: न ज़्यादा, न कम। न बेचैनी, न सुस्ती। उसी बीच की जगह में वह सुख आता है।

और ब्रह्मरूप होना, इस पर शंकराचार्य कहते हैं, जीते जी मुक्त, जिसे यह निश्चय हो गया कि सब कुछ ब्रह्म ही है। रामानुज कहते हैं, जो अपने असली स्वरूप में टिक गया। दोनों का भाव यही है कि वह जो था, वही हो गया। उसे कुछ नया नहीं बनना पड़ा, बस ऊपर की धूल हटी।

अब अट्ठाईसवाँ श्लोक। "युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः। सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते।" इस प्रकार मन को सदा ध्यान में लगाता हुआ निष्पाप योगी सुखपूर्वक ब्रह्म के संस्पर्श रूप अनन्त सुख को भोगता है।

इस श्लोक की पहली आधी पंक्ति आपने पहले भी सुनी है। पन्द्रहवें श्लोक में, पिछले सत्संग में, यही शब्द थे: "युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी"। वहाँ फल था शान्ति, यहाँ फल है सुख। और "सदा" शब्द पर तिलक की एक बात बहुत काम की है, जो उन्होंने पन्द्रहवें श्लोक पर लिखी थी। वे कहते हैं कि "सदा" का मतलब दिन के चौबीसों घंटे नहीं है। उसका अर्थ इतना ही है कि हर दिन, अपनी शक्ति के अनुसार, थोड़ी-थोड़ी देर यह अभ्यास करता रहे। यह बात उन लोगों के लिए बहुत राहत की है जो सोचते हैं कि ध्यान तो साधु-संन्यासियों का काम है, गृहस्थ के पास इतना समय कहाँ।

और अब वह शब्द, जिसकी बात मैंने पिछले हिस्से के अन्त में की थी: "सुखेन"। सुखपूर्वक, आसानी से। शंकराचार्य इसका अर्थ करते हैं "अनायासेन", बिना श्रम के। सोचिए, कितना सुन्दर क्रम है। पच्चीसवें श्लोक में "शनैः", धीरे-धीरे। छब्बीसवें में बार-बार लौटाना। और अट्ठाईसवें में "सुखेन", आसानी से। जो शुरू में कठिन था, वही अभ्यास पकने पर आसान हो जाता है। जैसे साइकिल चलाना पहले हफ़्ते में संघर्ष है, और फिर एक दिन आप सोचते भी नहीं कि संतुलन कैसे बन रहा है।

मधुसूदन सरस्वती यह भी बताते हैं कि यह आसानी कहाँ से आती है। वे कहते हैं, ईश्वर के प्रति समर्पण से, जिससे सब विघ्न हट जाते हैं, और वे पतञ्जलि के गिनाए विघ्न याद दिलाते हैं: रोग, सुस्ती, संशय, लापरवाही, आलस्य, विषयों की ललक, भ्रम, आगे की भूमि न मिलना, और मिली हुई भूमि पर न टिक पाना। इस सूची में पहला ही विघ्न रोग है, और दूसरा सुस्ती। यानी जिस शरीर को सोलहवें श्लोक ने नाप से रखने को कहा था, वह यहाँ भी काम आता है।

फिर "ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं", ब्रह्म के स्पर्श वाला अनन्त सुख। एक छूना। और संत ज्ञानेश्वर इस छूने को ऐसी तस्वीर से कहते हैं जो मुझे बहुत प्यारी लगती है। वे कहते हैं कि उस सुख के साथ वह परब्रह्म के भीतर आ जाता है, और फिर जैसे नमक पानी में जाकर पानी को छोड़ना नहीं जानता, वैसा ही हो जाता है। और फिर वे कहते हैं कि समता के उस महल में महासुख की दिवाली होती है, जो सारे जगत के साथ दिखती है। दिवाली अकेले नहीं मनाई जाती। जो सुख भीतर जलता है, वह बाहर भी रोशनी करता है। और यहीं से अगले श्लोक का दरवाज़ा खुलता है।

एक छोटी-सी बात और। अठारहवें सत्संग में आपने सरोवर पर यक्ष के प्रश्न सुने थे। उनमें एक प्रश्न था जो हमने तब नहीं सुना: "कौन सुखी है?" और युधिष्ठिर का उत्तर था कि जो पाँचवें या छठे दिन भी अपने ही घर में चाहे केवल साग पकाता हो, पर जिस पर कोई कर्ज़ नहीं और जो परदेस में नहीं रहता, वही सुखी है। वन पर्व, तीन सौ चौदहवाँ अध्याय, एक सौ सत्रहवाँ श्लोक। यानी सुख की परिभाषा में छप्पन भोग कहीं नहीं हैं। उसमें बस इतना है कि मन पर बोझ न हो और आदमी अपने घर में हो। और गीता उसी बात को एक कदम और भीतर ले जाती है: अपने घर में होना, यानी आत्मा में होना।

पर अभी एक बात बाकी है। अब तक हम आसन पर बैठे योगी की बात कर रहे थे, उसके भीतर के दीपक की, उसके भीतर के सुख की। अब श्रीकृष्ण अचानक आँखें खोलकर बाहर देखने को कहते हैं। उनतीसवें और तीसवें श्लोक में वह योगी सब प्राणियों में अपने को देखता है, और सबको भगवान में। और वहाँ एक ऐसा दृश्य है जिसमें श्रीकृष्ण ने बस एक बटलोई के किनारे चिपका साग का ज़रा-सा अंश खाया था, और नदी में नहाते हज़ारों लोगों का पेट भर गया।

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥ २९ ॥
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यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति । तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥ ३० ॥
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उनतीसवाँ श्लोक: "सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि। ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः।" योगयुक्त पुरुष आत्मा को सब प्राणियों में स्थित और सब प्राणियों को आत्मा में देखता है। वह सर्वत्र समदर्शी होता है।

अब तक की सारी बात भीतर की थी। आसन, दीपक, मन का लौटना, भीतर का सुख। और अचानक यह श्लोक आँखें खोल देता है। जो भीतर टिका, वह अब बाहर देखता है, और उसे बाहर भी वही दिखता है। देखने की दो दिशाएँ हैं। एक, "सर्वभूतस्थमात्मानं", अपने आत्मा को सब प्राणियों में। और दो, "सर्वभूतानि चात्मनि", सब प्राणियों को अपने आत्मा में। शंकराचार्य कहते हैं, ब्रह्मा से लेकर घास के एक तिनके तक। रामानुज इसे बहुत सरल और बहुत गहरे ढंग से कहते हैं। वे कहते हैं कि सब आत्माएँ अपने ज्ञान-स्वरूप में एक-सी हैं, और जो ऊँच-नीच, छोटा-बड़ा दिखता है, वह शरीर का है, प्रकृति का है। नीलकण्ठ यहाँ ईशोपनिषद् का भाव याद दिलाते हैं: जो सब प्राणियों को अपने में और अपने को सब प्राणियों में देखता है, वह फिर किसी से घृणा नहीं करता। सत्रहवें सत्संग में आपने जो "समदर्शी" सुना था, विद्या वाले ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल में एक को देखना, यह उसी की जड़ है।

अब महाभारत का वह दृश्य, जिसका मैंने वादा किया था। वन पर्व में दुर्योधन ने सुना कि पाण्डव वन में भी आराम से रह रहे हैं, और उसने एक चाल चली। बहुत जल्दी क्रोध करने वाले ऋषि दुर्वासा दस हज़ार शिष्यों के साथ उसके पास आए। उसने उनकी ख़ूब सेवा की, और जब वे प्रसन्न हुए तो वर माँगा कि आप शिष्यों सहित युधिष्ठिर के अतिथि बनिए, पर उस समय, जब द्रौपदी सबको खिलाकर स्वयं भी खा चुकी हो। वन पर्व, दो सौ तिरसठवाँ अध्याय। पाण्डवों के पास सूर्य की दी हुई एक बटलोई थी, जिसमें अन्न तभी तक रहता था जब तक द्रौपदी भोजन न कर ले। दुर्वासा ठीक उसी समय आए। युधिष्ठिर ने आदर से उन्हें भोजन का निमन्त्रण दिया, और वे शिष्यों के साथ नदी में स्नान करने चले गए। और द्रौपदी के पास कुछ नहीं था।

उसने मन में श्रीकृष्ण को याद किया। उस स्तुति में वह उन्हें "विश्व की आत्मा" कहती है, और कहती है कि तुम सब प्राणियों के आदि और अन्त हो, उनके परम आश्रय हो। और श्रीकृष्ण आ गए। आते ही बोले, "मैं भूखा हूँ, मुझे जल्दी भोजन दो।" द्रौपदी लज्जित होकर बोली कि बटलोई में अब कुछ नहीं बचा। उन्होंने बटलोई मँगवाई, और उसके किनारे पर चिपका ज़रा-सा साग और अन्न का एक कण देखा। उसे खाकर उन्होंने कहा: "इससे विश्व की आत्मा देव प्रसन्न और तृप्त हों।" और उधर नदी में खड़े दस हज़ार मुनियों को अचानक लगा कि उनका पेट गले तक भर गया है। दुर्वासा डर गए कि बेकार रसोई बनवाकर हमने अपराध किया है, और शिष्यों सहित भाग गए। वन पर्व, दो सौ चौंसठवाँ अध्याय।

अब इसे उनतीसवें श्लोक के पास रखिए। "सर्वभूतानि चात्मनि", सब प्राणी उसमें हैं। जिसमें सब हैं, उसके एक कौर से सबका पेट भर गया। उन्होंने अपने लिए नहीं खाया था; उन्होंने विश्व की आत्मा के तृप्त होने की बात कही थी। और यह आज के सत्संग के पहले श्लोक से भी एक धागा जोड़ता है। हमने भोजन को नाप की चीज़ कहा था। यहाँ भोजन अर्पण बन गया। जो खाता है, वह यह याद रखे कि वह अकेला नहीं खा रहा।

अब तीसवाँ श्लोक, आज का तीसरा बड़ा श्लोक। "यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति।" जो मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिए अदृश्य नहीं होता।

"न प्रणश्यामि", मैं खोता नहीं, ओझल नहीं होता। शंकराचार्य कहते हैं, मैं उसके लिए परोक्ष नहीं होता, दूर की कोई बात नहीं रह जाता। श्रीधर स्वामी इसे और कोमल बना देते हैं: मैं उसके सामने प्रकट रहकर उस पर कृपा की दृष्टि डालता हूँ। और फिर दूसरा आधा, जो मुझे पूरी गीता के सबसे प्यारे वाक्यों में से लगता है: "स च मे न प्रणश्यति", और वह भी मेरी आँखों से ओझल नहीं होता। हम भगवान को देखें, यह तो हम समझते हैं। पर यहाँ भगवान कह रहे हैं कि मैं भी उसे देखता रहता हूँ। द्रौपदी ने बटलोई के पास बैठकर याद किया, और बाद में श्रीकृष्ण ने पाण्डवों से कहा, "द्रौपदी ने मुझे याद किया, और मैं जल्दी से आ गया।" उसी अध्याय का चालीसवाँ श्लोक।

और अब वह खुला धागा, जो मैंने दीपक वाले श्लोक पर छोड़ा था। युद्ध के बाद युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण को निर्वात के दीपक की तरह ध्यान में बैठे देखा था, और पूछा था कि आप किसका ध्यान कर रहे हैं। मधुसूदन सरस्वती इसी तीसवें श्लोक की टीका में वही प्रसंग याद दिलाते हैं। श्रीकृष्ण ने कहा था: "बाणों की शय्या पर पड़े भीष्म मेरा ध्यान कर रहे हैं, इसलिए मेरा मन उनके पास चला गया।" और यह भी: "इन्द्रियों के समूह को एकत्र करके, और बुद्धि से मन को संयमित करके, वे शरण के लिए मेरे पास आए हैं।" शान्ति पर्व, पैंतालीसवाँ अध्याय, ग्यारहवाँ और अठारहवाँ श्लोक। सुनिए, क्या हुआ। भीष्म ने चौबीसवें और पच्चीसवें श्लोक जैसा किया, इन्द्रियों को समेटा, बुद्धि से मन को थामा, और भगवान को याद किया। और भगवान, जो दीपक की तरह अचल बैठे थे, उनका मन उठकर भीष्म के पास चला गया। "स च मे न प्रणश्यति।" और सोचिए कि यह तीसवाँ श्लोक कब सुनाया जा रहा है। जिस समय सञ्जय यह सुना रहे हैं, उस समय भीष्म बाणों की शय्या पर पड़े हैं। जो भक्त इस समय पीड़ा में पड़ा है, उसी के लिए आगे चलकर भगवान का मन अपने ध्यान से उठकर जाने वाला है।

संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर कहते हैं कि वह भक्त और मैं ऐसे हैं जैसे दीपक और उसका प्रकाश। आज का सत्संग एक दीपक से शुरू हुआ था, और यहाँ आकर पता चलता है कि वह दीपक अकेला नहीं जल रहा। उसके प्रकाश में कोई और भी है।

पर अभी एक बात बाकी है। जो सब में भगवान को देखता है, वह दुनिया में रहेगा कैसे? काम करेगा, लड़ेगा, घर चलाएगा, तो क्या वह योग से गिर जाएगा? इकतीसवाँ श्लोक इसका उत्तर देता है, और बत्तीसवाँ श्लोक इस अध्याय के इस हिस्से की सबसे ऊँची बात कहता है: दूसरे का दुःख अपना जैसा लगना। और उसके लिए महाभारत में एक ऐसा क्षण है जब युधिष्ठिर को अपने चार भाइयों में से केवल एक को जीवित करने का अधिकार मिला था।

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः । सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥ ३१ ॥
गीता 6.31 — अर्थ पढ़ें ›
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन । सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥ ३२ ॥
गीता 6.32 — अर्थ पढ़ें ›

इकतीसवाँ श्लोक: "सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः। सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते।" जो योगी एकत्व में स्थित होकर सब प्राणियों में स्थित मुझे भजता है, वह सब प्रकार से बरतता हुआ भी मुझमें ही रहता है।

"सर्वथा वर्तमानोऽपि", किसी भी तरह बरतते हुए भी। यह शब्द उस डर का उत्तर है जो पिछले हिस्से के अन्त में उठा था। रामानुज कहते हैं कि ध्यान से उठने के बाद भी, जैसे-तैसे काम करते हुए भी, वह मुझे ही देखता रहता है। नीलकण्ठ उदाहरण देते हैं कि कोई याज्ञवल्क्य की तरह कर्म छोड़कर रहे, या वसिष्ठ और जनक की तरह अपने कर्तव्य करते हुए रहे, दोनों दशाओं में वह भगवान से नहीं छूटता। और ज़रा सोचिए कि यह बात किससे कही जा रही है। अर्जुन से, जिसे कुछ ही देर में धनुष उठाकर युद्ध करना है। श्रीकृष्ण उसे यह नहीं कह रहे कि भगवान में रहना है तो रथ से उतर जाओ। वे कह रहे हैं कि रथ पर रहते हुए भी, युद्ध करते हुए भी, तुम मुझमें रह सकते हो। संत ज्ञानेश्वर इसे दो तस्वीरों से कहते हैं: कपड़े में एक ही धागा, और बहुत-से गहनों में एक ही सोना। और फिर कहते हैं, वह शरीर में है, पर शरीर का नहीं है।

अब बत्तीसवाँ श्लोक। "आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन। सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः।" हे अर्जुन, जो अपने समान मानकर सर्वत्र सुख या दुःख को समान देखता है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है।

"आत्मौपम्येन", अपनी उपमा से, अपने को नाप बनाकर। आज का सत्संग "आत्मसंमित" से शुरू हुआ था, अपने नाप का भोजन। और अब यह अपने नाप से दूसरों को देखने पर रुकता है। शंकराचार्य इसे बहुत साफ़ कहते हैं: जैसे मुझे सुख प्रिय है, वैसे सब प्राणियों को सुख प्रिय है; जैसे मुझे दुःख अप्रिय है, वैसे सबको दुःख अप्रिय है। और जो यह देख लेता है, वह किसी के साथ उलटा बर्ताव नहीं करता, वह अहिंसक हो जाता है। हमारी टीका भी यही कहती है: वह दूसरे के सुख-दुःख को अपने सुख-दुःख की तरह अनुभव करता है, इसलिए किसी का अहित नहीं चाहता। रामानुज एक उदाहरण देते हैं जो चुभता भी है और समझाता भी है: जो पराए के बेटे का जन्म और मृत्यु अपने बेटे के जन्म और मृत्यु जैसा देखे। और श्रीधर स्वामी कहते हैं, ऐसा योगी जो सबके लिए सुख ही चाहता है, किसी के लिए दुःख नहीं, वही मुझे श्रेष्ठ लगता है।

अब वह क्षण, जिसका मैंने वादा किया था। पिछले सत्संग में आपने सरोवर पर यक्ष और युधिष्ठिर का प्रसंग सुना था, पर उसका अन्त हमने नहीं सुना था। प्रश्नोत्तर के आख़िर में युधिष्ठिर कहते हैं कि सच्चा पुरुष वह है जिसके लिए प्रिय और अप्रिय, सुख और दुःख एक समान हैं, और जो सबके प्रति समभाव रखता है, वही योगी है, वही सब धनों वाला है। वन पर्व, तीन सौ चौदहवाँ अध्याय, एक सौ तेईसवाँ और चौबीसवाँ श्लोक। तब यक्ष कहता है, तुमने ठीक उत्तर दिए; अपने भाइयों में से जिस एक को चाहो, वह जी उठे। और युधिष्ठिर कहते हैं, "नकुल जी उठे।"

यक्ष चकित होता है। भीम तुम्हें प्रिय है, दस हज़ार हाथियों जितना बल है उसमें; अर्जुन के भुजबल का सब सहारा लेते हैं; इन्हें छोड़कर तुम सौतेली माँ के बेटे को क्यों चुनते हो? और युधिष्ठिर का उत्तर सुनिए: "कुन्ती और माद्री, मेरे पिता की दो पत्नियाँ थीं। मेरी बुद्धि का निश्चय है कि दोनों का एक-एक पुत्र जीवित रहे। जैसी कुन्ती, वैसी ही माद्री। मेरे लिए उन दोनों में कोई भेद नहीं।" और यक्ष, जो असल में धर्म थे, कहते हैं: क्योंकि तुम दया को अर्थ और काम दोनों से बड़ा मानते हो, इसलिए तुम्हारे सब भाई जी उठें। वन पर्व, तीन सौ चौदहवाँ अध्याय, एक सौ पच्चीस से एक सौ छत्तीस तक।

यही "आत्मौपम्य" है। युधिष्ठिर ने अपनी माँ का दुःख सोचा, और फिर उतना ही दुःख माद्री का सोचा। अपनी माँ के पास दो बेटे बचे रहें और दूसरी माँ का कोई न बचे, यह उन्हें अपने दुःख जैसा लगा। और याद कीजिए, गीता के पहले श्लोक में धृतराष्ट्र ने कहा था, "मामकाः पाण्डवाश्चैव", मेरे वाले और पाण्डु वाले। वही धृतराष्ट्र आज वह श्लोक सुन रहे हैं जो कहता है कि सबका सुख-दुःख अपने जैसा देखो। और विदुर ने युद्ध से पहले की उसी जागती रात में उनसे यही बात सबसे छोटे शब्दों में कही थी: जो अपने लिए बुरा लगे, वह दूसरे के साथ नहीं करना चाहिए; संक्षेप में यही धर्म है। उद्योग पर्व, उनतालीसवाँ अध्याय, बहत्तरवाँ श्लोक।

तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली बात। "युक्त", अपना नाप। योग न बहुत खाने वाले का है, न बिलकुल न खाने वाले का; न बहुत सोने वाले का, न बहुत जागने वाले का; और रामानुज के शब्दों में, न बहुत खटने वाले का, न बिलकुल न करने वाले का। नाप अपना है, किसी दूसरे का नहीं; कुन्ती ने भीम को उसके नाप से परोसा था। और भीष्म की बात भी याद रखिए: शरीर को सताना तप नहीं है।

दूसरी बात। मन का दीपक हवा बन्द करने से स्थिर होता है, लौ को पकड़ने से नहीं। अति की हवाएँ कम कीजिए, और फिर जब मन भटके, और वह भटकेगा, तो उसे बिना खीझे, धीरे-धीरे लौटा लाइए। "शनैः"। जो एक दिन कठिन लगता है, वही एक दिन "सुखेन" हो जाता है।

तीसरी बात। जो सबमें भगवान को देखता है, उसके लिए भगवान कभी ओझल नहीं होते, और वह भी भगवान की आँखों से कभी ओझल नहीं होता। द्रौपदी ने याद किया और वे आ गए; भीष्म ने याद किया और उनका मन उठकर चला गया। और इस देखने की पहचान यह है कि दूसरे का दुःख अपने जैसा लगने लगे, जैसा युधिष्ठिर को माद्री के लिए लगा।

अगली बार अर्जुन श्रीकृष्ण से वह बात कहेंगे जो हम सबके मन में है: यह मन तो वायु जैसा है, इसे पकड़ना हवा को मुट्ठी में बाँधने जैसा कठिन है। और फिर वह प्रश्न, जिसके उत्तर में गीता का सबसे दिलासा देने वाला वाक्य आता है: जो श्रद्धा से चला पर बीच में छूट गया, उसका क्या होता है?

आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आपके दिन में कौन-सी चीज़ ज़रूरत से ज़्यादा है, और कौन-सी ज़रूरत से कम: खाना, नींद, काम, या आराम? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।

न ज़्यादा, न कम। हवा थमेगी, तो दीपक अपने आप सीधा जलेगा।

जय श्री कृष्ण।

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥ १७ ॥
गीता 6.17 — अर्थ पढ़ें ›

तीन बातें

  1. "युक्त", अपना नाप। योग न बहुत खाने वाले का है, न बिलकुल न खाने वाले का; न बहुत सोने वाले का, न बहुत जागने वाले का; और रामानुज के शब्दों में, न बहुत खटने वाले का, न बिलकुल न करने वाले का। नाप अपना है, किसी दूसरे का नहीं; कुन्ती ने भीम को उसके नाप से परोसा था। और भीष्म की बात भी याद रखिए: शरीर को सताना तप नहीं है।
  2. मन का दीपक हवा बन्द करने से स्थिर होता है, लौ को पकड़ने से नहीं। अति की हवाएँ कम कीजिए, और फिर जब मन भटके, और वह भटकेगा, तो उसे बिना खीझे, धीरे-धीरे लौटा लाइए। "शनैः"। जो एक दिन कठिन लगता है, वही एक दिन "सुखेन" हो जाता है।
  3. जो सबमें भगवान को देखता है, उसके लिए भगवान कभी ओझल नहीं होते, और वह भी भगवान की आँखों से कभी ओझल नहीं होता। द्रौपदी ने याद किया और वे आ गए; भीष्म ने याद किया और उनका मन उठकर चला गया। और इस देखने की पहचान यह है कि दूसरे का दुःख अपने जैसा लगने लगे, जैसा युधिष्ठिर को माद्री के लिए लगा।