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सत्संग १८

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मन को दोस्त कैसे बनाएँ

गीता 6.1–6.15 · 81 मिनट

अपना उद्धार खुद; ध्यान के लिए कैसे बैठें

श्रीभगवानुवाच अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः । स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥ १ ॥
गीता 6.1 — अर्थ पढ़ें ›
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव । न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ॥ २ ॥
गीता 6.2 — अर्थ पढ़ें ›
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते । योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥ ३ ॥
गीता 6.3 — अर्थ पढ़ें ›

रात के ग्यारह बजे हैं। दिन भर की थकान है, बिस्तर है, बत्ती बुझ चुकी है, और आप चाहते हैं कि अब नींद आ जाए। पर ठीक उसी समय मन उठकर बैठ जाता है। कल की बैठक, पिछले महीने की कोई बात, किसी का कहा हुआ एक वाक्य, और वे सारी चिन्ताएँ जो दिन में किसी तरह दबी रही थीं। कभी आपको लगा है कि जिसे मैं "अपना मन" कहता हूँ, वह मेरा साथी है, या मेरे ही ख़िलाफ़ खड़ा है?

आज का सत्संग इसी सवाल पर है। मन को दोस्त कैसे बनाया जाए, और जब शान्त होकर बैठना हो, तो कैसे बैठा जाए। गीता का छठा अध्याय इसका सीधा उत्तर देता है, और उसका सबसे बड़ा वाक्य आज के इन्हीं पन्द्रह श्लोकों के बीच में है: अपना उद्धार अपने ही द्वारा करो, क्योंकि तुम स्वयं ही अपने मित्र हो और स्वयं ही अपने शत्रु।

जय श्री कृष्ण।

आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का अठारहवाँ सत्संग है। पिछली बार हमने पाँचवें अध्याय का आख़िरी हिस्सा सुना था, सोलहवें से उनतीसवें श्लोक तक। वहाँ श्रीकृष्ण ने कहा कि जिसका अज्ञान आत्मा के ज्ञान से कट गया, उसका ज्ञान सूर्य की तरह चमकता है, और ऐसे ज्ञानी विद्या और विनय वाले ब्राह्मण में, गाय में, हाथी में, कुत्ते में और चाण्डाल में भी एक ही को देखते हैं। फिर उन्होंने बाहर के सुख और भीतर के सुख का फ़र्क बताया, और कहा कि जो इसी जीवन में, शरीर छूटने से पहले, काम और क्रोध से उठने वाले वेग को सह लेता है, वही योगी है, वही सुखी है। और उसके बाद अध्याय के आख़िर में दो श्लोकों में ध्यान की एक बहुत छोटी रूपरेखा रखी गई, दृष्टि को भौंहों के बीच, साँस को सम, इन्द्रिय, मन और बुद्धि को वश में, इच्छा, भय और क्रोध से रहित। और अध्याय एक वाक्य पर रुका, जिसमें भगवान कहते हैं कि मुझे सब प्राणियों का सुहृद्, यानी सच्चा मित्र, जानकर मनुष्य शान्ति पाता है।

आज का छठा अध्याय उसी छोटी रूपरेखा का विस्तार है। हमारे कोष में लिखी इस अध्याय की भूमिका यही कहती है: पिछला अध्याय ध्यान की छोटी रूपरेखा पर समाप्त हुआ था, यह अध्याय पूरा अभ्यास देता है, पर पहले ध्यान को कर्म से जोड़ता है। यह "पहले कर्म से जोड़ता है" बहुत ज़रूरी है, और आज के पहले तीन श्लोक वही करते हैं।

जैसा हम हर बार करते हैं, पहले यह याद कर लें कि हम गीता को उसके अपने घर में पढ़ रहे हैं। हमारे कोष में भीष्म पर्व के अध्याय पच्चीस से बयालीस गीता हैं, और तीसवाँ अध्याय गीता का छठा अध्याय है, आत्मसंयम योग। सञ्जय हस्तिनापुर में, भीष्म के गिरने के बाद, अन्धे राजा धृतराष्ट्र को यह सब सुना रहे हैं। और आज मैं चाहता हूँ कि इस अध्याय को सुनते समय हम उसी राजा की एक और रात को याद रखें।

सातवें और नवें सत्संग में हमने उसकी जागती रात सुनी थी। सञ्जय पाण्डवों के पास से लौट चुके हैं, कल सभा में युधिष्ठिर का सन्देश सुनाएँगे, और राजा नींद के बिना विदुर को बुलाते हैं। वे कहते हैं, "मैं जाग रहा हूँ और जल रहा हूँ।" और यह भी कि, "मेरे मन को ठीक से शान्ति नहीं मिली, मेरी सब इन्द्रियाँ बेचैन हैं।" यह उद्योग पर्व के तैंतीसवें अध्याय की बात है। ज़रा ध्यान दीजिए। एक राजा, जिसके पास सब कुछ है, उसकी शिकायत वही है जो आज रात ग्यारह बजे हमारी है: मेरा मन मेरे वश में नहीं, मेरी इन्द्रियाँ बेचैन हैं।

अब उस रात का वह हिस्सा सुनिए जो हमने तब नहीं सुना था। विदुर रात भर राजा को नीति की बातें सुनाते रहे। फिर राजा ने कहा कि अगर कुछ ऐसा रह गया हो जो तुमने नहीं कहा, तो वह भी बताओ। तब विदुर ने कहा कि प्राचीन और सनातन कुमार सनत्सुजात ने कहा है कि मृत्यु है ही नहीं, और मुझसे आगे की बात कहने का साहस नहीं होता, वही आपको समझाएँगे। राजा ने पूछा कि इस शरीर में रहते हुए उनसे भेंट कैसे हो। विदुर ने उन ऋषि का ध्यान किया, और महाभारत के शब्दों में, विदुर के मन की बात जानकर वे प्रकट हो गए। उद्योग पर्व का इकतालीसवाँ अध्याय। और विदुर ने ऋषि से जो माँगा, वह मुझे बहुत सुन्दर लगता है। उन्होंने कहा कि इस उत्तर को सुनकर राजा सब दुःखों के पार हो जाएँ, ताकि लाभ और हानि, प्रिय और अप्रिय, बुढ़ापा और मृत्यु, भय, भूख और प्यास, घमण्ड, बेचैनी और आलस्य, काम और क्रोध उन्हें फिर न सताएँ। सोचिए, इस सूची में वही सब है जो आज रात हमारे अपने मन में भी चल रहा है।

तो पहला श्लोक। श्रीभगवान् बोले: "अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः। स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः।"

शब्द एक-एक करके। "अनाश्रितः कर्मफलं", कर्मफल का आश्रय न लेकर। यानी काम करते हुए उसके फल पर टेक न लगाना, उसे अपना सहारा न बनाना। "कार्यं कर्म", वह काम जो करने योग्य है, जो करना ही चाहिए। "करोति यः", जो करता है। और अब श्रीकृष्ण कहते हैं, "स संन्यासी च योगी च", वही संन्यासी भी है और योगी भी। और फिर वह बात, जो पूरे श्लोक की धुरी है: "न निरग्निर्न चाक्रियः"। जिसने केवल अग्नि छोड़ दी, वह संन्यासी नहीं, और जिसने केवल क्रिया छोड़ दी, वह योगी नहीं।

हमारी टीका इसे साफ़ कहती है: विधिवत् संन्यासी अग्नि की सेवा और सब कर्मकाण्ड छोड़ देता है, पर श्लोक कहता है कि केवल बाहरी चिह्न से कोई संन्यासी नहीं बनता, फल का भीतरी त्याग बनाता है। श्रीधर स्वामी बताते हैं कि भगवान यह बात क्यों उठा रहे हैं। पाँचवें अध्याय में संन्यास की इतनी बड़ाई हो चुकी थी कि सुनने वाला कहीं यह न समझ बैठे कि बस अब सारे काम एकदम छोड़ देने चाहिए। इसलिए श्रीकृष्ण पहले ही श्लोक में कर्मयोग को संन्यास से भी ऊँचा बैठाते हैं। आचार्य शंकर इसका बारीक भाव देते हैं। वे कहते हैं कि यहाँ संन्यासी और योगी शब्द एक ख़ास अर्थ में आए हैं। जो फल की चाह छोड़ दे, उसमें संन्यास है। और जो कर्म को योग का अंग मानकर करे, और मन को बिखेरने वाली फल की चाह छोड़ दे, उसमें योग है। तिलक एक और बात जोड़ते हैं। वे लिखते हैं कि मनुस्मृति में संन्यासी के लिए कहा गया है कि वह अग्नि को छोड़ दे और जंगल में भिक्षा से जिए, और यहाँ भगवान उसी बाहरी रूप को सच्चा लक्षण नहीं मानते। संन्यास बुद्धि में है, अग्नि या कर्म छोड़ने की बाहरी क्रिया में नहीं।

अब इसे अपने जीवन पर रखकर देखिए। आपने कभी छुट्टी ली है, और छुट्टी की पहली सुबह पहाड़ पर बैठकर भी दफ़्तर का ईमेल खोल लिया है? काम छूट गया था, पर काम की चिन्ता नहीं छूटी थी। यही इस श्लोक का मतलब है। काम छोड़ देने से मन शान्त नहीं होता, और घर छोड़ देने से भी नहीं। मन तब शान्त होता है जब काम करते हुए फल की टेक छूटती है।

और इसी बात को सनत्सुजात उसी रात, राजा से, अपने शब्दों में कहते हैं। वे कहते हैं कि कोई केवल चुप रहने से मुनि नहीं बनता, और न वन में रहने से। जो अपने असली स्वरूप को जानता है, वही श्रेष्ठ मुनि कहलाता है। उद्योग पर्व तैंतालीसवाँ अध्याय, इकसठवाँ श्लोक। और उसी अध्याय में यह भी कि जो कपट से जीता है, उसे वेद के मन्त्र भी पाप से पार नहीं कराते। यानी बाहरी चिह्न, बाहरी रूप, उस रात भी वही कमज़ोर पड़ रहे थे, जो छठे अध्याय का पहला श्लोक कहता है।

अब दूसरा श्लोक। "यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव। न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन।" हे पाण्डव, जिसे संन्यास कहते हैं, उसी को योग जानो, क्योंकि संकल्पों को न त्यागने वाला कोई भी योगी नहीं होता।

यहाँ "संकल्प" शब्द को ठीक से पकड़ लीजिए। हमारी टीका कहती है कि संकल्प यहाँ मन का अपने लाभ के लिए लगातार योजना बनाना है: "यह होगा, फिर मुझे वह मिलेगा।" रात के दो बजे जो मन चलता है, वह यही करता है। अगर वह फ़ोन आ गया तो यह कहूँगा, अगर नहीं आया तो वह करूँगा, और अगर उसने ऐसा कहा तो मैं क्या जवाब दूँगा। यह सोचना नहीं है, यह मन का सिलाई-मशीन की तरह चलते रहना है, जिसमें कपड़ा कोई नहीं है। नीलकण्ठ कहते हैं कि संन्यासी और योगी में समानता यही है कि दोनों में संकल्प छूटा हुआ है, और इसी से कर्मयोगी को भी यहाँ संन्यासी और योगी कहकर बड़ाई दी गई है। और सनत्सुजात इसके लिए एक सरल उपाय देते हैं, जो मुझे बहुत व्यावहारिक लगता है। वे कहते हैं कि उठती हुई कामनाओं को, उन पर ध्यान न देते हुए, उपेक्षा से नष्ट कर दे। यानी मन के हर बुलावे पर दौड़कर जाना ज़रूरी नहीं। वह उठे, तो उठने दो; उसे खाना मत दो।

अब तीसरा श्लोक, जो इस हिस्से का आधार है। "आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते। योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते।"

योग पर चढ़ना चाहने वाले मुनि के लिए कर्म साधन कहा जाता है, और उसी के योग पर चढ़ जाने पर शम साधन कहा जाता है।

"आरुरुक्षोः" यानी चढ़ने की इच्छा रखने वाले के लिए, और "योगारूढस्य" यानी जो चढ़ चुका उसके लिए। श्रीकृष्ण एक सीढ़ी की बात कर रहे हैं, और हमारी टीका कहती है कि ये एक ही मार्ग के दो चरण हैं। निष्काम कर्म मन को तैयार करता है, और जब मन तैयार हो जाए, तब शान्ति उसे आगे ले जाती है। संत ज्ञानेश्वर इसे पहाड़ चढ़ने की तरह कहते हैं। वे कहते हैं कि जिसे योग के इस पर्वत की चोटी पर पहुँचना है, वह कर्म की पहली सीढ़ियों को छोड़कर सीधे चोटी की बात न करे। जो पहली सीढ़ी छोड़ता है, वह आगे भी नहीं पहुँचता।

इस "शम" पर आचार्यों में थोड़ा मतभेद है, और मैं उसे छिपाऊँगा नहीं। शंकर, श्रीधर और मधुसूदन कहते हैं कि जब कोई योग पर चढ़ चुका हो, तब उसके लिए कर्मों का रुक जाना, मन का विक्षेप थम जाना, साधन बनता है। नीलकण्ठ भी यही कहते हैं कि जो योग के अंगों में लगा हो और बिखराव सह न पाता हो, उसके लिए कर्मों का शमन सहायक है। पर तिलक इसे उलट देते हैं। वे कहते हैं कि इसका अर्थ यह नहीं कि चढ़ने के बाद कर्म छूट जाते हैं। उनके अनुसार पहले कर्म से मन शान्त होता है, और जब शान्त मन सिद्ध हो जाता है, तब वही शान्ति कर्म का आधार बन जाती है, यानी वह शान्त चित्त से, फल की आशा के बिना, अपने काम करता रहता है। दोनों पढ़तों में एक बात साझी है: चढ़ने के समय कर्म सहारा है, और चोटी पर पहुँचकर मन की शान्ति ही सबसे बड़ा सहारा है।

और इस सीढ़ी का हिसाब सनत्सुजात की उसी रात की बातचीत में बहुत सादगी से रखा है। ब्रह्मचर्य, यानी संयम और विद्या की साधना, पर बोलते हुए वे कहते हैं कि लक्ष्य का एक चौथाई भाग समय से मिलता है, एक चौथाई गुरु के संग से, एक चौथाई अपने उत्साह से, और एक चौथाई शास्त्र से। उद्योग पर्व, चौवालीसवाँ अध्याय, सोलहवाँ श्लोक। चार हिस्से, और उनमें से तीन बाहर से आते हैं। समय बीतता है तो बहुत कुछ पक जाता है, गुरु मिलते हैं, शास्त्र सुनने को मिलता है। पर एक चौथाई ऐसा है जो किसी और के हाथ में नहीं, वह अपना उत्साह है। और मुझे लगता है कि बाक़ी तीन चौथाई भी तभी काम करते हैं जब वह एक चौथाई साथ हो। सीढ़ी के पहले पायदान पर यही है: कर्म में अपनी बाँह लगाना।

पर अभी एक बात बाकी है। तीन श्लोकों में हमने सुना कि चढ़ने के लिए क्या चाहिए। अब चौथा श्लोक बताता है कि जो चढ़ गया, उसकी पहचान क्या है। और उसके बाद वह श्लोक आता है जिसके लिए आज का पूरा सत्संग है, पाँचवाँ, जिसमें श्रीकृष्ण पहली बार कहते हैं कि तुम्हारा सबसे नज़दीकी साथी भी तुम हो और सबसे नज़दीकी विरोधी भी।

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते । सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥ ४ ॥
गीता 6.4 — अर्थ पढ़ें ›
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् । आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥ ५ ॥
गीता 6.5 — अर्थ पढ़ें ›
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः । अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥ ६ ॥
गीता 6.6 — अर्थ पढ़ें ›

इन तीन श्लोकों में से पहला पिछले हिस्से का समापन है, और बाक़ी दो आज के सत्संग का हृदय। चौथा श्लोक: "यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते। सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते।" जब वह न इन्द्रियों के विषयों में आसक्त होता है, न कर्मों में, और सब संकल्पों का त्यागी हो जाता है, तब वह योगारूढ़ कहा जाता है।

देखिए, श्रीकृष्ण यहाँ दो चीज़ों में आसक्ति छुड़ा रहे हैं: विषयों में, और कर्मों में। विषयों में तो हम सब जानते हैं कि मन चिपकता है। पर "कर्मों में" भी? हाँ। हम काम से भी चिपक जाते हैं। "मैं ही करूँगा, मेरे बिना नहीं होगा, मेरे नाम से होगा।" मधुसूदन सरस्वती इसी को खोलते हैं: "मैं इनका कर्ता हूँ और ये मेरे भोग हैं", यह जो अभिनिवेश है, यह पकड़, यही चिपकना है। नीलकण्ठ एक सीधा उदाहरण देते हैं। जिसे बहुत तेज़ भूख लगी हो, वह बाक़ी सब बातों से उदासीन होकर भोजन पर बैठ जाता है। उसी तरह जिसे योग पर चढ़ने की तीव्र इच्छा है, वह बाक़ी हर तरफ़ से ढीला होकर वहीं बैठ जाता है। और संत ज्ञानेश्वर कहते हैं कि इन्द्रियाँ कर्म में लगी रहती हैं, पर भीतर फल की चाह नहीं रहती। देह के रहते जो जागा हुआ भी सोया-सा दिखे, उसे योगारूढ़ जानो।

अब पाँचवाँ श्लोक। इसे धीरे-धीरे सुनिए। "उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।"

अपने द्वारा अपना उद्धार करो, अपने को नीचे मत गिराओ। क्योंकि तुम स्वयं ही अपने मित्र हो, और स्वयं ही अपने शत्रु।

शब्द देखिए। "उद्धरेत्", ऊपर उठाए, जैसे कीचड़ में फँसे को कोई बाहर खींचता है। "आत्मना", अपने से। "आत्मानम्", अपने को। एक ही श्लोक में आत्मा शब्द सात बार आता है। तिलक बताते हैं कि संस्कृत में यह शब्द तीन अर्थों में चलता है: भीतर का आत्मा, "स्वयं", और अन्तःकरण या मन। और हमारी टीका बहुत सरल करके कहती है कि श्लोक पाँच और छह में "स्वयं" का अर्थ अपना शरीर, इन्द्रियाँ और मन है। वश में हों तो सहायक हैं; वश में न हों तो हमारे विरुद्ध काम करते हैं।

और फिर वही टीका एक वाक्य कहती है जिसे मैं चाहता हूँ कि आप आज साथ ले जाएँ: यह काम कोई दूसरा हमारे लिए नहीं कर सकता। गुरु या शास्त्र की सहायता तभी फल देती है जब अपना मन उसे अपनाता है। शंकराचार्य इसे एक पैने तर्क से कहते हैं। वे कहते हैं कि कोई दूसरा बन्धु ऐसा नहीं जो संसार से मुक्त कराए। और दूसरे बन्धु तो प्रायः स्नेह के बन्धन का घर बन जाते हैं। इसलिए श्लोक का यह कहना ठीक है कि अपना बन्धु अपना आप ही है। और जो बाहर का कोई शत्रु हमें चोट पहुँचाता दिखता है, वह भी हमारे अपने भीतर की किसी बात के सहारे ही हम तक पहुँचता है, इसलिए यह कहना भी ठीक है कि अपना शत्रु भी अपना आप ही है। इसे ग़लत मत समझिएगा। श्रीकृष्ण यह नहीं कह रहे कि दुनिया में कोई आपका साथ नहीं देता। वे यह कह रहे हैं कि जहाँ तक आपके भीतर का उद्धार है, वहाँ अन्तिम कदम आपका ही है। माँ-बाप, गुरु, मित्र, सब रास्ता दिखा सकते हैं; चलना पैरों को ही पड़ता है।

और एक बात। इस श्लोक का पहला शब्द देखिए: "उद्धरेत्", उठाओ। पहला आदेश उठाने का है, डाँटने का नहीं। "तुम अपने ही शत्रु हो" सुनकर कुछ लोग अपने को कोसने लगते हैं, जैसे मन बुरा हो और उसे सज़ा देनी हो। यह श्लोक वह नहीं कहता। श्लोक कहता है, अपने को उठाओ, और अपने को गिरने मत दो। श्रीधर स्वामी कहते हैं कि विषयों में आसक्ति छोड़ने से मोक्ष है और उसी आसक्ति से बन्धन, यह देखकर अपने रागादि के स्वभाव को छोड़ देना चाहिए। यानी जो खिंचाव मन को नीचे ले जाता है, उसे छोड़ा जा सकता है। वह आदत है, पत्थर की लकीर नहीं।

छठे श्लोक में उतरने से पहले आपसे एक छोटी-सी बात कहना चाहता हूँ। हम आज के सत्संग का लगभग एक तिहाई सुन चुके हैं, और यहाँ तक आकर बहुत-से लोग मान लेते हैं कि मुख्य बात हो गई: अपना उद्धार अपने हाथ में है, बस। पर आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। इस सत्संग के आख़िरी हिस्से में बैठने की वह पूरी विधि आने वाली है, और एक ऐसी बात भी, जिसे अधिकतर लोग आधा सुनकर ग़लत समझ लेते हैं: श्लोक कहता है कि दृष्टि को नाक की नोक पर रखो, और हमारी टीका कहती है कि वह क्यों है, और वह किसके लिए नहीं है। तो अगर आप यह सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि यह यात्रा बीच में न छूटे। और आज का यह सत्संग आख़िर तक सुनिए।

छठा श्लोक इसे दो भागों में खोलता है। "बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः। अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्।" जिसने अपने से अपने को जीत लिया है, वह स्वयं अपना मित्र है। परन्तु जिसने अपने को नहीं जीता, उसके लिए वह स्वयं शत्रु की तरह शत्रुता में बरतता है।

"जितः", जीत लिया गया। पर किससे जीता? मधुसूदन सरस्वती इसे साफ़ करते हैं: अपने विवेक से, शस्त्र से नहीं। और जब यह जीत होती है, तब वही अपना आप मित्र क्यों बन जाता है? क्योंकि उसकी मनमानी भागदौड़ बन्द हो जाती है, और वह अपने ही हित का काम करने लगता है। और जिसने नहीं जीता, उसका मन किसी बाहर के शत्रु की तरह उच्छृंखल दौड़ता है, और अपने ही स्वामी का अनिष्ट करता है। रामानुज यहाँ विष्णु पुराण का एक वचन याद दिलाते हैं, जो पराशर ने कहा था: मन ही मनुष्यों के बन्धन और मोक्ष का कारण है। विषयों में लगा हुआ मन बाँधता है, और विषयों से छूटा हुआ मन मुक्त करता है। मधुसूदन और ज्ञानेश्वर दोनों एक तस्वीर देते हैं, जो मेरे मन से कभी नहीं उतरती। रेशम का कीड़ा अपने ही मुँह से धागा निकालता है, और उसी से अपने चारों ओर कोष बुनता जाता है, और फिर उसी में बँध जाता है। ज्ञानेश्वर इसके साथ एक तोते की बात भी कहते हैं। एक नली पर बैठा तोता, नली घूमती है, वह डरकर उसे कसकर पकड़ लेता है और सोचता है कि मैं बँध गया, जबकि उसे किसी ने बाँधा नहीं। पंजा खोलना भर है। वे कहते हैं, बिना बात के अपने आपको बँधा मान लेने वाले को और कौन बाँधेगा?

अब इस बात को महाभारत की एक घड़ी में रखकर देखिए, जो हमने अब तक नहीं सुनी। वन पर्व में पाण्डव बारह वर्ष के वनवास में हैं। एक ब्राह्मण की अरणी, यानी अग्नि जलाने की लकड़ी, एक हिरन के सींग में अटककर चली जाती है। ब्राह्मण युधिष्ठिर से पुकार करता है कि मेरा अग्निहोत्र न छूटे। पाँचों भाई हिरन के पीछे दौड़ते हैं, उसे बेध नहीं पाते, थक जाते हैं, और भूख-प्यास से बेहाल एक बरगद के नीचे बैठते हैं। वन पर्व, तीन सौ बारहवाँ अध्याय।

फिर युधिष्ठिर नकुल को पानी खोजने भेजते हैं। नकुल एक निर्मल सरोवर पर पहुँचते हैं, और तभी आकाश से एक आवाज़ आती है: "दुस्साहस मत करो। इस पानी पर मेरा पहले से नियम बना है। पहले मेरे प्रश्नों के उत्तर दो, फिर पियो, और ले भी जाओ।" पर नकुल बहुत प्यासे थे। पाठ के शब्दों में, उन्होंने उन बातों की परवाह नहीं की, ठंडा पानी पिया, और पीते ही गिर पड़े। फिर सहदेव गए, उन्हें भी वही आवाज़ मिली, वही हुआ। फिर अर्जुन, जिन्होंने उस आवाज़ को ललकारा और आकाश में बाण बरसाए, और उसके बाद पानी पिया और गिर पड़े। फिर भीम, जिन्होंने सोचा कि लड़ना पड़ेगा तो लड़ेंगे, पहले पानी पी लूँ, और वे भी गिर गए। वन पर्व, तीन सौ तेरहवाँ अध्याय।

ज़रा रुककर देखिए। ये चारों कौन हैं? कोई साधारण आदमी नहीं। वे जिनकी बाहों के भरोसे हज़ारों-लाखों का युद्ध लड़ा जाना था। और चारों को किसी शत्रु ने नहीं गिराया। उन्हें उनकी अपनी प्यास ने, और चेतावनी को न सुनने की जल्दी ने गिराया। यह छठे श्लोक का दृश्य है। जो अपने को नहीं जीतता, उसका अपना आप, उसकी अपनी प्यास, उसकी अपनी जल्दी, शत्रु की तरह काम करती है। बाहर कोई नहीं था जो उन्हें बाँधे।

और अब पाँचवें भाई को देखिए। युधिष्ठिर भी प्यासे और थके हैं। वे भाइयों को ढूँढ़ते हुए सरोवर पर पहुँचते हैं। चारों को मरा देखकर वे बहुत देर तक विलाप करते हैं, और फिर, पाठ कहता है, अपने को सँभालते हैं। वे पानी में उतरते भी हैं। पर जैसे ही आवाज़ आती है, "तुम्हारे छोटे भाइयों को मैंने मृत्यु के वश में पहुँचाया, तुम पाँचवें होगे यदि मेरे प्रश्नों के उत्तर न दो", वे रुकते हैं। यक्ष का भयानक रूप सामने आता है, ताड़ जितना ऊँचा, आग और सूर्य जैसा चमकता, और पाठ कहता है कि वे दृढ़ खड़े रहे और काँपे नहीं। वे सुनते हैं, और कहते हैं, "तुम्हारा जो पहले से अधिकार है, उसे मैं नहीं चाहता। पूछो।" वन पर्व, तीन सौ चौदहवाँ अध्याय।

यही उद्धार है। भाइयों की तुलना में युधिष्ठिर के पास न ज़्यादा बल था, न कम प्यास। उनके पास एक पल का रुकना था। प्यास को "रुको" कह पाना। और इस बातचीत में यक्ष ने जो पूछा, उसमें हमारे आज के श्लोकों के कई उत्तर बैठे हैं। यक्ष ने पूछा, "वायु से तेज़ क्या है?" युधिष्ठिर ने कहा, "मन।" यक्ष ने पूछा, "किसे वश में करके लोग शोक नहीं करते?" उत्तर था, "जो मन को वश में करते हैं, वे शोक नहीं करते।" फिर यक्ष ने पूछा, "मनुष्यों का सबसे कठिन शत्रु कौन-सा है जिसे जीतना बहुत मुश्किल है?" और युधिष्ठिर ने कहा, "क्रोध।" और जब यक्ष ने पूछा कि दम किसे कहते हैं, तो उत्तर था, "मन को वश में करना।" ये सब वन पर्व के उसी तीन सौ चौदहवें अध्याय में हैं। आख़िर में यक्ष ने अपना परिचय दिया। वे धर्म थे, युधिष्ठिर के पिता, जो उन्हें परखने आए थे। और उस प्रश्नोत्तर के बाद चारों भाई उठ खड़े हुए।

आप सोच रहे होंगे कि मन को रोक पाना इतना आसान कैसे है। आसान नहीं है। पर श्रीकृष्ण का पाँचवाँ श्लोक हमें कोई सज़ा नहीं सुनाता, एक काम सौंपता है, कि अपने को अपने ही हाथ से उठाओ। और जब आप ऐसा कर पाते हैं, तब अपना मन आपके ख़िलाफ़ नहीं रहता, आपके पक्ष में आ खड़ा होता है। जो चीज़ आपकी सबसे बड़ी शत्रु दिखती थी, वही सबसे भरोसेमंद साथी बन सकती है।

पर अभी एक बात बाकी है। अगर मन दोस्त बन जाए, तो उसके साथ जीना कैसा दिखता है? सातवें, आठवें और नवें श्लोक में श्रीकृष्ण उस दोस्ती का चेहरा दिखाते हैं: सर्दी-गर्मी में, सुख-दुःख में, मान-अपमान में, और आगे मिट्टी, पत्थर और सोने तक में। और वहाँ हमारी वही एक रात फिर लौटकर आएगी।

जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः । शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥ ७ ॥
गीता 6.7 — अर्थ पढ़ें ›
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः । युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥ ८ ॥
गीता 6.8 — अर्थ पढ़ें ›
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु । साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥ ९ ॥
गीता 6.9 — अर्थ पढ़ें ›

पाँचवें और छठे श्लोक ने बताया कि मन मित्र भी हो सकता है और शत्रु भी। अब ये तीन श्लोक उस मित्रता का चेहरा दिखाते हैं। यानी जब कोई अपने मन को जीत लेता है, तो उसके दिन-रात कैसे दिखते हैं। सातवाँ श्लोक: "जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः। शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः।"

अपने को जीतने वाले और शान्त पुरुष के लिए सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख और मान-अपमान में परमात्मा सदा स्थित रहता है।

इस श्लोक में छह चीज़ें गिनाई गई हैं, और ग़ौर कीजिए, तीन जोड़ियों में। सर्दी और गर्मी, यह शरीर का मौसम है। सुख और दुःख, यह मन का मौसम है। मान और अपमान, यह लोगों का मौसम है। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं कि ये छहों ऐसे हैं जो चित्त को बिखेर देते हैं। ठण्ड लगे तो ध्यान टूटे, दुःख आए तो टूटे, किसी ने अपमान किया तो टूटे। श्लोक कहता है कि जिसने अपने को जीत लिया, उसके लिए इनके बीच भी भीतर कोई ठहरा हुआ बैठा रहता है।

"परमात्मा समाहितः", इस पर आचार्यों में एक सुन्दर बात है। शंकराचार्य कहते हैं कि ऐसे पुरुष के लिए परमात्मा अपने ही आत्मा के रूप में साक्षात् स्थित रहता है। रामानुज कहते हैं कि यहाँ भीतर बैठा आत्मा ही परमात्मा कहा गया है। और श्रीधर तथा मधुसूदन एक दूसरी तरह से भी पढ़ते हैं कि ऐसे जितात्मा और शान्त पुरुष का ही आत्मा केवल अपने में ठहर पाता है, किसी और का नहीं। पढ़तें अलग-अलग हैं, पर बात एक है: मन की हलचल थम जाए तो भीतर कुछ पहले से बैठा मिलता है। संत ज्ञानेश्वर इसे एक घड़े की तस्वीर से कहते हैं। घड़े के भीतर का आकाश घड़े में बन्द दिखता है। जब घड़ा टूट जाता है, तो उस आकाश को कहीं जाकर बड़े आकाश से मिलना नहीं पड़ता। वह तो पहले से वही था। इसी तरह, वे कहते हैं, जिसका देह का अहंकार जड़ से कट गया, उसके लिए परमात्मा पहले से मौजूद है। वह कहीं दूर से लाया नहीं जाता। जो बीच में था, वह हटता है।

और अब इसी श्लोक के आख़िरी जोड़े, मान और अपमान, को महाभारत की उसी रात में देखिए जिसकी हम बात कर रहे थे। सनत्सुजात धृतराष्ट्र से कहते हैं कि जो मान के लिए प्रयत्न नहीं करता, उसे जब संयमी लोग सम्मान दें, तो वह गर्व न करे, और अपमान होने पर बहुत न जले। वे आगे कहते हैं कि संसार अपने स्वभाव से चलता है, पलक के झपकने और खुलने की तरह। इसलिए सम्मान पाने पर यही सोचे कि यहाँ ज्ञानी लोग सम्मान करते ही हैं। और एक वाक्य जो मुझे बहुत सच्चा लगता है: मान और मौन कभी साथ नहीं रहते। उद्योग पर्व, बयालीसवाँ अध्याय, उनतालीस से बयालीस। आप सोचिए, इसे सुनने वाला एक राजा है, जिसके चारों ओर रोज़ जय-जयकार होती है। और उससे कहा जा रहा है कि मान की भूख और भीतर का मौन, यानी मन की चुप्पी, साथ नहीं रहते। हम राजा नहीं हैं, पर हमारे हाथ में भी एक छोटा-सा दरबार है। एक फ़ोन, जिसमें हर तारीफ़ और हर ताने की गिनती होती है।

अब आठवाँ श्लोक। "ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः। युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः।" जो ज्ञान और विज्ञान से तृप्त है, अविचल है, इन्द्रियों को जीत चुका है, और मिट्टी, पत्थर और सोने को समान मानता है, वह योगी "युक्त" कहा जाता है।

ज्ञान और विज्ञान का फ़र्क हमारी टीका ने बहुत सीधे शब्दों में रखा है। ज्ञान शिक्षा से तत्त्व को जानना है; विज्ञान उसे अपना अनुभव बना लेना है। यानी किसी ने बताया कि आग जलाती है, यह ज्ञान है; और अपनी उँगली एक बार जलकर जानना, यह विज्ञान है। शंकराचार्य भी यही कहते हैं कि शास्त्र के पदार्थों का जानना ज्ञान है, और उन्हीं को अपने अनुभव में उतार लेना विज्ञान। और जो इन दोनों से तृप्त हो जाए, उसके मन में "और चाहिए" की जलन नहीं रहती। श्रीधर यही कहते हैं कि उसका चित्त निराकांक्ष हो जाता है। फिर "कूटस्थ", अविचल। मधुसूदन कहते हैं, विषय सामने हों तब भी जिसमें कोई विकार न उठे। और "समलोष्टाश्मकाञ्चनः", मिट्टी का ढेला, पत्थर और सोना, तीनों बराबर।

इसका मतलब यह नहीं कि सोने का भाव उसे पता नहीं। ज्ञानेश्वर महाराज इसे इस तरह कहते हैं कि वह मेरु पर्वत जितने सोने के ढेर को और मिट्टी के ढेले को एक नज़र से देखता है। बात यह है कि सोना देखकर उसके भीतर कुछ उछलता नहीं, और मिट्टी देखकर कुछ गिरता नहीं। सोचिए, आपको वेतन में एक अच्छी बढ़ोतरी मिलती है। एक दिन ख़ुशी है। फिर कुछ दिन बाद वही बढ़ोतरी नई ज़रूरत बन जाती है, और मन फिर कुछ और माँगता है। यह मन का वह खेल है जिसमें सोना भी जल्दी मिट्टी हो जाता है। श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि जिसकी तृप्ति भीतर है, उसके लिए यह खेल रुक जाता है। चीज़ें आती हैं, जाती हैं, काम आती हैं। बस वे उसे हिलाती नहीं।

अब नवाँ श्लोक, जिसमें यह समता सबसे ऊँची जगह पर पहुँचती है। "सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु। साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते।"

जो सुहृद्, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष्य और बन्धुओं में, तथा साधुओं और पापियों में भी समबुद्धि रखता है, वह श्रेष्ठ है।

हमारी टीका इन शब्दों को अलग-अलग पहचानती है। सुहृद् बिना कहे भला करता है; मित्र स्नेह से। उदासीन किसी पक्ष में नहीं रहता; मध्यस्थ दोनों पक्षों का भला चाहता है। शंकराचार्य जोड़ते हैं कि द्वेष्य वह है जो हमें अप्रिय है। और मधुसूदन बारीकी से कहते हैं कि "अरि" वह है जो अपने स्वभाव की क्रूरता से हमें चोट पहुँचाए, और "द्वेष्य" वह जिसने हमारा किया हुआ कोई अपकार देखकर हमारा बुरा किया हो। तिलक कहते हैं कि ये सब शब्द इसलिए गिनाए गए हैं कि पूरी बात का अर्थ व्यापक हो जाए, ताकि कोई सम्बन्ध छूट न जाए। फिर सबसे अन्त में साधु और पापी, यानी अच्छे चलन वाले और बुरे चलन वाले। शंकर कहते हैं कि "समबुद्धि" का अर्थ है कि "किसने क्या किया, कौन कैसा है" इस हिसाब में उसका मन उलझा नहीं रहता।

पर इसका यह अर्थ नहीं कि वह अच्छे और बुरे में फ़र्क नहीं करता, या हर किसी के साथ एक-सा बर्ताव करता है। इसे समझने के लिए मैं आपको वन पर्व की एक घटना सुनाता हूँ, जो हमने अब तक नहीं सुनी। दुर्योधन, कर्ण और शकुनि द्वैतवन जाते हैं, जहाँ पाण्डव वनवास में रह रहे हैं। बहाना है गौशालाओं की यात्रा का, और दुर्योधन अपने मुँह से कहता है कि पाण्डु के पुत्रों को छाल और मृगचर्म में देखने से बड़ा आनन्द उसे इस पृथ्वी का राज्य भी नहीं दे सकता। वन पर्व, दो सौ उनतालीसवाँ अध्याय। पर वहाँ गन्धर्वों से भिड़ंत हो जाती है। कर्ण हार जाता है, सेना भाग जाती है, और दुर्योधन को चित्रसेन नाम का गन्धर्व रस्सी से बाँधकर रथ पर चढ़ा लेता है। दुःशासन और राज-कुल की स्त्रियाँ भी पकड़ी जाती हैं। दुर्योधन के मन्त्री भागे-भागे युधिष्ठिर के पास पहुँचते हैं। वन पर्व, दो सौ तैंतालीसवाँ अध्याय।

भीम उन्हें सुनकर कहते हैं कि जो काम हमें करना था, वह गन्धर्वों ने कर दिया। और भीम के पास कारण हैं, जो वे थोड़ी देर बाद एक-एक करके गिनाते भी हैं: लाख का घर, जिसमें जलाने की योजना थी; भोजन में मिलाया गया कालकूट विष; बाँधकर गंगा में फेंकना; जुए की सभा में द्रौपदी के बाल पकड़े जाना; और राज्य का छिन जाना। पर युधिष्ठिर कहते हैं, "यह कठोर बातों का समय नहीं है।" फिर आगे: "भाई-बन्धुओं में फूट होती है, झगड़े होते हैं, लम्बे वैर चलते हैं, पर बन्धुओं का धर्म नहीं मिटता। जब पराए लोग हमारा अपमान करते हैं, तब हम एक सौ पाँच हैं। आपस के झगड़े में हम पाँच ही हैं और वे सौ।" और जब दुर्योधन की पुकार सुनाई देती है, तो वे कहते हैं कि जब शत्रु भी हाथ जोड़कर शरण में आया हो, तब कोई सज्जन अपने प्राण बचाने के लिए कैसे रुक सकता है। वर देना, राज्य पाना और पुत्र का जन्म, इन तीनों के बराबर अकेला यह है कि संकट में पड़े शत्रु को छुड़ा लिया जाए। वन पर्व, दो सौ चौवालीसवाँ अध्याय। पर ध्यान दीजिए, वे भीम को आदेश भी देते हैं कि पहले मीठी बात से छुड़ाना, न माने तो हल्के बल से, फिर भी न माने तो कड़े बल से। वे दुर्योधन के किए को भूले नहीं थे। फिर भी उनका मन उस पर टिककर कड़वा नहीं हुआ।

छुड़ाए जाने पर वे दुर्योधन को प्रेम से यह कहकर विदा करते हैं: "फिर कभी ऐसा दुस्साहस मत करना। दुस्साहस करने वाले सुख नहीं पाते। सकुशल घर जाओ, और किसी से बैर मत रखना।" और पाठ कहता है कि दुर्योधन लज्जा से भरा, मानो भीतर से फटता हुआ, नगर की ओर चला गया। वन पर्व, दो सौ सैंतालीसवाँ अध्याय। यही समबुद्धि है। उसने शत्रु को शत्रु ही रहने दिया, पर अपने बर्ताव को शत्रुता का गुलाम नहीं बनने दिया। कार्य अलग-अलग हो सकते हैं, पर मन का स्तर वही रहता है।

पर अभी एक बात बाकी है। अब तक श्रीकृष्ण ने बताया कि मन वश में आ जाए तो वह कैसा दिखता है। अगले श्लोकों में वे वह करने वाले हैं जो ध्यान के नाम पर लोग सबसे पहले पूछते हैं: कहाँ बैठें, किस पर बैठें, कैसे बैठें। और वहाँ भी हमें धृतराष्ट्र की एक और तस्वीर मिलेगी, एक ऐसी तस्वीर जिसकी आप शायद आशा नहीं करेंगे।

योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः । एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥ १० ॥
गीता 6.10 — अर्थ पढ़ें ›
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः । नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥ ११ ॥
गीता 6.11 — अर्थ पढ़ें ›

अब तक श्रीकृष्ण मन की बात कर रहे थे, उसे जीतने की और उसके मित्र बन जाने की। अब वे सीधे बैठने की बात पर आते हैं, और ये दोनों श्लोक उसकी भूमिका हैं: कहाँ, किस हाल में, किस पर। दसवाँ श्लोक: "योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः। एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः।"

योगी एकान्त में अकेला रहकर, मन और शरीर को वश में रखकर, आशारहित और संग्रहरहित होकर, मन को निरन्तर ध्यान में लगाए।

शब्दों को एक-एक करके देखिए। "युञ्जीत", जोड़े, लगाए। "सततम्", निरन्तर, बार-बार। रामानुज इसका अर्थ करते हैं कि योग के समय हर दिन। यानी यह कोई एक बार का काम नहीं, रोज़ का अभ्यास है। "आत्मानम्" यहाँ मन के लिए है। "रहसि स्थितः", एकान्त में रहकर। "एकाकी", अकेला। "यतचित्तात्मा", जिसका चित्त और शरीर, दोनों वश में हैं। "निराशीः", जिसमें कोई आशा, कोई लालसा लगी हुई नहीं। और "अपरिग्रहः", जिसने चीज़ें बटोर नहीं रखीं।

अब आचार्य एकान्त को कैसे खोलते हैं, यह देखना मुझे अच्छा लगा। शंकराचार्य कहते हैं, पर्वत की गुफा जैसा कोई स्थान। रामानुज कहते हैं, ऐसा स्थान जहाँ लोग न हों और शब्द न हो। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, ऐसा स्थान जहाँ वे लोग न हों जो योग में विघ्न डालते हैं। और संत ज्ञानेश्वर इसे बहुत लम्बाई से, बहुत प्रेम से बताते हैं। वे कहते हैं कि ऐसा स्थान ढूँढ़ना चाहिए जहाँ बैठने पर उठने का मन न हो, जहाँ मन में अपने आप धीरज आए, जहाँ बहुत पास में पानी हो, हवा धीमी हो, फल देने वाले पेड़ हों, और भीड़ का पैरों का शब्द न हो। और फिर वे एक बात जोड़ते हैं जो मुझे सबसे काम की लगती है: जो स्थान तुम्हारे मन को स्वीकार हो, जहाँ तुम्हारा मन टिके, वहीं आसन लगाओ। यानी एकान्त का असली पैमाना बाहर की गुफा नहीं, भीतर की स्वीकृति है। दो कमरों के किसी फ़्लैट में रहने वाली एक माँ के लिए वह गुफा शायद सुबह साढ़े पाँच बजे की बालकनी का कोना है, घर के जागने से पहले के पन्द्रह मिनट, एक दरी और एक दीवार का सहारा। वही उसका "रहसि स्थितः" है। और "निराशीः" और "अपरिग्रहः" भी उसी कोने के साथ चलते हैं: बैठते समय मन में कोई सौदा न हो, कि आज ध्यान अच्छा लगा तो कल का काम बनेगा, और पास में बटोरा हुआ कुछ न हो, न फ़ोन, न अधूरी चिट्ठियाँ, न दिन भर की सूची।

तिलक यहाँ एक बात साफ़ कर देते हैं, जो इन श्लोकों को पढ़ते हुए अक्सर छूट जाती है। वे कहते हैं कि यह वर्णन हठ-योग का नहीं है। हठ-योग में इन्द्रियों को ज़बरदस्ती रोका जाता है, जबकि आगे इसी अध्याय में, चौबीसवें श्लोक में, कहा गया है कि मन से ही इन्द्रियों के समूह को रोकना है। यानी बल से नहीं, समझ से। और वे यह भी कहते हैं कि इसका यह अर्थ नहीं कि कर्मयोग चाहने वाला पूरी आयु इसी अभ्यास में बिता दे। यह अभ्यास उस समता को पाने का साधन है जो कर्म के बीच भी चाहिए, और इसी अध्याय के अन्त में भगवान कहेंगे कि जिन्हें समाधि इस जन्म में पूरी सिद्ध न हो, वे जितना हो सके उतना करते हुए आगे बढ़ें। वह बात हम बीसवें सत्संग में सुनेंगे।

अब यह एकान्त वाली बात महाभारत में एक ऐसी जगह दिखती है जहाँ हम शायद उसे ढूँढ़ने नहीं जाते। आश्रमवासिक पर्व में धृतराष्ट्र का अन्तिम समय आता है। युद्ध के बहुत बाद, बूढ़े राजा राजमहल छोड़कर वन की ओर चले। वहाँ से आगे की बात: राजा ने विदुर की सलाह के अनुसार गंगा के पवित्र तट पर निवास बनाया, और फिर वहाँ से कुरुक्षेत्र गए, राजर्षि शतयूप के आश्रम में। जी हाँ, वही कुरुक्षेत्र। वहाँ व्यास की अनुमति से शतयूप ने उन्हें वनवास का पूरा विधान बताया, और वे तप में लग गए। आश्रमवासिक पर्व, बीसवाँ अध्याय, पहले से तेरहवाँ श्लोक। और पाठ कहता है कि उन्होंने कर्म, मन, वाणी और दृष्टि से इन्द्रियों के समूह को वश में करके कठोर तप किया। और एक पंक्ति है जो मैं आपके लिए ख़ासतौर से रखना चाहता हूँ: वे "मोह से मुक्त होकर" वहाँ तप करते रहे। बीसवें अध्याय का सत्रहवाँ श्लोक।

ज़रा रुककर सोचिए। यह वही राजा हैं जिनका पहला शब्द, गीता के पहले श्लोक में, "मामकाः" था, मेरे वाले। जिसने पुत्र-प्रेम में कहा था कि मूर्ख दुर्योधन जब भटकता है, तो मैं भी उसके साथ भटक जाता हूँ। और अब वही राजा उसी कुरुक्षेत्र की धरती पर, जहाँ उनके सौ बेटे गिरे थे, मोह से मुक्त होकर तप कर रहे हैं। और उनके पास कौन सेवा में है? पाठ के शब्दों में, विदुर और सञ्जय। वही सञ्जय जिन्होंने उन्हें कुरुक्षेत्र का सब कुछ, और यह गीता, सुनाई थी।

मैं यह इसलिए कह रहा हूँ कि हम अक्सर सोचते हैं कि मन बदलने का समय निकल चुका। जो पूरी उम्र "मेरा-तेरा" में चला, वह अब क्या बदलेगा? धृतराष्ट्र की यह तस्वीर कहती है कि मन का दरवाज़ा देर से भी खुलता है। और इसके साथ एक सावधानी भी, जो गीता खुद इसी अध्याय में आगे देगी। उस तप की कठोरता को हम अपना नमूना न बनाएँ। श्रीकृष्ण का योग संयम का है, शरीर को सताने का नहीं।

अब ग्यारहवाँ श्लोक। "शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः। नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्।" शुद्ध स्थान में अपना स्थिर आसन स्थापित करे, जो न बहुत ऊँचा हो न बहुत नीचा, और जिस पर कुशा, मृगछाला और वस्त्र एक पर एक बिछे हों।

यहाँ चार बातें हैं। एक, स्थान शुद्ध हो, "शुचौ देशे"। शंकर कहते हैं कि वह या तो स्वभाव से शुद्ध हो, या शुद्ध किया गया हो। रामानुज कहते हैं कि वहाँ अशुद्ध लोग न बैठते हों और अशुद्ध चीज़ें न पड़ी हों। दो, आसन "स्थिर" हो, यानी हिलने-डुलने वाला नहीं। तीन, "आत्मनः", अपना। और चार, न बहुत ऊँचा, न बहुत नीचा, और ऊपर-नीचे तीन तहें।

"आत्मनः", अपना, इसमें मधुसूदन सरस्वती एक बारीक बात पकड़ते हैं। वे कहते हैं कि यह शब्द इसलिए आया कि आसन किसी और का न हो, क्योंकि दूसरे की इच्छा के नियम योग में विघ्न डालते हैं। और यह आसन की मर्यादा से बहुत आगे की बात है। जिस जगह आप बार-बार लौटते हैं और जो आपकी अपनी है, वहाँ मन कुछ जल्दी समझ जाता है कि अब क्या करना है। मधुसूदन पतंजलि का सूत्र भी याद दिलाते हैं: जो स्थिर भी हो और सुखद भी, वही आसन है।

तहों के बारे में हमारी टीका कहती है कि समास में परतें ऊपर से गिनी गई हैं: सबसे ऊपर वस्त्र, उसके नीचे मृगछाला, सबसे नीचे कुशा। संत ज्ञानेश्वर इसे और खोलते हैं कि ऊपर साफ़ मृगचर्म, बीच में धुले हुए वस्त्र की घड़ी, और नीचे कुशा के कोमल अंकुर, जो मिलकर एक-से बैठ जाएँ। और ऊँचाई पर वे ख़ासतौर से कहते हैं कि यदि आसन बहुत ऊँचा होगा तो शरीर डोलेगा, और बहुत नीचा होगा तो ज़मीन की कमी लगेगी। इसलिए समभाव से, न ऊँचा न नीचा।

आज कुशा और मृगछाला हर घर में नहीं मिलती, और श्लोक का मतलब भी तीन चीज़ों की सूची से बड़ा है। श्लोक के गुण ये हैं: साफ़ जगह, ऐसा आसन जो अपना हो, जो हिले नहीं, जिसकी ऊँचाई न बहुत ज़्यादा हो न बहुत कम, और जिसकी तहें नरम हों। यह मेरी अपनी पढ़त है, पर आप देखेंगे कि पूरी बात इसी तरफ़ जाती है। श्रीकृष्ण यहाँ किसी विशेष वस्तु की बात नहीं कर रहे। वे यह कह रहे हैं कि बैठना भी ध्यान का हिस्सा है: जगह चुनना, आसन बिछाना, फिर बैठना। जो बिना तैयारी के बैठता है, वह पहले दस मिनट तैयारी में गँवाता है।

पर अभी एक बात बाकी है। जगह मिल गई, आसन बिछ गया। अब बैठ कर क्या होना है? बारहवें और तेरहवें श्लोक में श्रीकृष्ण शरीर को सीधा और अचल रखने की बात करेंगे, और दृष्टि की बात भी, जिस पर हमने कहा था कि अधिकतर लोग आधा सुनकर चले जाते हैं।

तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः । उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥ १२ ॥
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समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः । सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥ १३ ॥
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अब जगह भी चुन ली गई, आसन भी बिछ गया। बारहवें श्लोक में श्रीकृष्ण बैठने के बाद का पहला काम बताते हैं। "तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः। उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये।"

वहाँ आसन पर बैठकर, मन को एकाग्र करके और चित्त तथा इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखकर, अन्तःकरण की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे।

"तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा": वहाँ, उसी आसन पर, मन को एकाग्र करके, यानी एक ही बात पर टिकाकर। नीलकण्ठ कहते हैं कि मन ऐसा हो जिसके आगे एक ही ध्येय स्फुरित हो, कोई और बात बीच में न आए। "यतचित्तेन्द्रियक्रियः", चित्त की क्रियाएँ भी और इन्द्रियों की क्रियाएँ भी वश में। नीलकण्ठ इसे और खोलते हैं कि चित्त की क्रियाएँ विषयों के स्मरण हैं, और इन्द्रियों की क्रियाएँ उनका ग्रहण। यानी बाहर की चीज़ों को देखना-सुनना बन्द, और भीतर उन्हें दोहराना भी बन्द। और मधुसूदन सरस्वती एक छोटी, पर साफ़ बात जोड़ते हैं: "उपविश्य", बैठकर ही। लेटकर नहीं, खड़े रहकर नहीं।

और अब सबसे ज़रूरी शब्द, श्लोक का आख़िरी: "आत्मविशुद्धये", आत्मा की, यानी अन्तःकरण की, शुद्धि के लिए। यह अभ्यास किसलिए है? किसी चमत्कार के लिए नहीं, किसी शक्ति के लिए नहीं, कुछ दिखाने के लिए नहीं। भीतर के साफ़ होने के लिए। शंकराचार्य यही कहते हैं कि अन्तःकरण की विशुद्धि के लिए। श्रीधर स्वामी इसे और सरल कहते हैं: मन की उपशान्ति के लिए। मुझे यह सुनना अच्छा लगता है कि ध्यान की पहली कसौटी सुख या अनुभव नहीं है। कसौटी यह है कि बैठने के बाद आप भीतर से कुछ साफ़ हुए या नहीं। कम चिड़चिड़े, कम बिखरे, कम भरे हुए।

संत ज्ञानेश्वर एक बहुत सरल बात इसी जगह कहते हैं। वे कहते हैं कि आसन पर बैठकर अन्तःकरण को एकाग्र करके सद्गुरु का स्मरण करो। और उस स्मरण के आदर से भीतर-बाहर सात्त्विक भाव भर जाता है। उसके बाद, उनके शब्दों में, विषयों का विस्मरण होने लगता है, इन्द्रियों की कसमसाहट मिट जाती है, और मन की घड़ी हृदय में बैठने लगती है। यानी एकाग्रता कोई ज़ोर नहीं है। वह किसी प्रिय का स्मरण करते-करते अपने आप आती है, जैसे थका बच्चा माँ की गोद में पहुँचकर ढीला हो जाए।

अब तेरहवाँ श्लोक। इसे धैर्य से सुनिए। "समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः। सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्।"

शरीर, सिर और गर्दन को सीधा और अचल रखकर, स्थिर होकर, अपनी नासिका के अग्रभाग को देखते हुए और इधर-उधर की दिशाओं को न देखते हुए।

ध्यान दीजिए, यह वाक्य पूरा नहीं हुआ। हमारी टीका कहती है कि श्लोक तेरह और चौदह मिलकर एक वाक्य हैं। बात आगे चलेगी। पहले इसके शब्द: "समम्", सीधा। "कायशिरोग्रीवं", शरीर, सिर और गर्दन। "धारयन्", धारण करते हुए। "अचलम्", हिलते नहीं। "स्थिरः", स्थिर होकर। तिलक बताते हैं कि "शुद्ध स्थान" और "शरीर, ग्रीवा और शिर को सम" करने वाली ये बातें श्वेताश्वतर उपनिषद् की हैं, यानी बहुत पुराने उपनिषदों के योग से यह वर्णन मेल खाता है। श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती "काय" का अर्थ शरीर का मध्य भाग लेते हैं, और कहते हैं कि नीचे के आधार से लेकर सिर के ऊपर तक सब कुछ एक सीध में, बिना झुकाव, बिना कंपन के। सीधे बैठने का अर्थ अकड़कर बैठना नहीं है। "स्थिरः" शब्द साथ है, यानी तनाव से नहीं, दृढ़ता से। मधुसूदन का शब्द है "दृढ़प्रयत्न"।

अब वह हिस्सा जिसके बारे में मैंने कहा था। "सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं", अपनी नाक की नोक को देखते हुए। पहली बार सुनकर लोग यहीं रुक जाते हैं और सोचते हैं कि गीता कह रही है कि नाक की नोक को घूरते रहो। पर हमारी टीका क्या कहती है? "नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि आँखों को स्थिर रखने का उपाय है, स्वयं ध्यान का विषय नहीं।" यानी ध्यान का विषय नाक नहीं है। आँखें कहीं रुकें, ताकि इधर-उधर न भागें। शंकराचार्य इसे बड़े साफ़ तर्क से खोलते हैं। वे कहते हैं कि यहाँ अपनी नाक की नोक को सचमुच देखने का विधान नहीं है। नहीं तो मन वहीं बँध जाएगा, आत्मा में नहीं टिकेगा, और आत्मा में मन को टिकाने की बात तो आगे पच्चीसवें श्लोक में आने वाली है। इसलिए उनका अर्थ है कि दृष्टि को ऐसे टिकाओ मानो नासिका के अग्रभाग को देख रहे हों, और मन भीतर समाधान में रहे। नीलकण्ठ और भी व्यावहारिक कारण देते हैं। वे कहते हैं कि आँखें पूरी बन्द करने में सो जाने का डर है और पूरी खुली रखने में बिखर जाने का डर, इसीलिए आधी खुली। श्रीधर भी आँखों को आधी बन्द रखने की बात कहते हैं, और मधुसूदन कहते हैं कि आँखें बन्द न हों, ताकि मन नींद-सी में न डूबे, और विषयों के पीछे भी न दौड़े। और ज्ञानेश्वर महाराज भी यही कहते हैं कि ऊपर की पलकें ढलती हैं, नीचे की ऊपर उठती हैं, और दृष्टि भीतर की ओर टिककर नासिका के अग्र पर ठहरती है।

"दिशश्चानवलोकयन्", और दिशाओं को न देखते हुए। मधुसूदन इसका कारण देते हैं कि बार-बार दिशाओं में देखना योग में बाधा है। सोचिए, वही हम अपने साथ रोज़ करते हैं। आँख फ़ोन पर जाती है, मन फ़ोन पर जाता है। आँख दरवाज़े पर जाती है कि कोई आया क्या, और मन भी वहीं चला जाता है। मन उसी तरफ़ जाता है जिधर आँख जाती है। इसलिए श्लोक पहले आँखों को ठहराने की बात करता है, क्योंकि मन को ठहराना उसके बाद आता है।

अब इसी बैठने की तस्वीर महाभारत में देखिए। सनत्सुजात की उसी रात की बातचीत में दो वाक्य हैं जो इस श्लोक के साथ बैठे हुए लगते हैं। एक: "शान्त होकर उपासना करनी चाहिए, और मन से भी नहीं हिलना चाहिए।" उद्योग पर्व, तैंतालीसवाँ अध्याय, साठवाँ श्लोक। और दूसरा, पैंतालीसवें अध्याय का बीसवाँ: "अकेले और चुपचाप उपासना करनी चाहिए, मन से भी चेष्टा न करते हुए, और प्रशंसा से प्रसन्नता तथा निन्दा से क्रोध को त्याग देना चाहिए।" देखिए, यहाँ "न हिलना" शरीर के लिए नहीं, मन के लिए भी कहा गया है। गीता का "अचलम्" सिर्फ़ पीठ की बात नहीं है।

और एक बहुत शान्त, बहुत गम्भीर दृश्य है, जिसे मैं धीरे से कहना चाहता हूँ। आश्रमवासिक पर्व के अन्त में नारद युधिष्ठिर को बताते हैं कि धृतराष्ट्र का अन्त कैसे हुआ। गंगा के किनारे वन में अचानक दावाग्नि फैल गई। राजा बहुत दुबले और कमज़ोर थे, गान्धारी और कुन्ती भी, और भाग नहीं सकते थे। उन्होंने सञ्जय से कहा कि तुम जाओ, जहाँ आग तुम्हें न जलाए। फिर पाठ कहता है कि राजा ने अपने मन को एकाग्र किया और पूर्व की ओर मुख करके बैठ गए। सञ्जय ने उन्हें देखा, प्रदक्षिणा की, और कहा, "हे प्रभो, अपने को योग में लगाइए।" राजा ने बात मानी, इन्द्रियों के समूह को रोका, और काठ के समान अचल रहे। आश्रमवासिक पर्व, उनतालीसवाँ अध्याय, इक्कीस से तीस। सञ्जय उस आग से निकल गए और बाद में हिमालय की ओर चले गए। और नारद का समापन यह है कि उनके लिए शोक नहीं करना चाहिए।

यह दृश्य अनुकरण करने के लिए नहीं है। इसमें कोई बात सिखाने की नहीं, देखने की है। जिस राजा का मन पूरे जीवन "मेरा-तेरा", भय और बेचैनी में डोला, उसने आख़िर में "अचलम्" का अर्थ जिया। श्लोक में "काठ के समान" शब्द नहीं है, पर महाभारत की यह पंक्ति मुझे उसी तेरहवें श्लोक के ठीक पास बैठी मिलती है।

पर अभी एक बात बाकी है। तेरहवाँ श्लोक अधूरा था, और अगला श्लोक उसका बाक़ी वाक्य पूरा करेगा। उसमें वे शब्द हैं जहाँ लोग अक्सर उलझ जाते हैं: निडर, शान्त, ब्रह्मचर्य का व्रत, और "मुझमें चित्त लगाए"। और उसके बाद पन्द्रहवाँ श्लोक, जिसमें इस सब का फल है।

प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः । मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥ १४ ॥
गीता 6.14 — अर्थ पढ़ें ›
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः । शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥ १५ ॥
गीता 6.15 — अर्थ पढ़ें ›

चौदहवाँ श्लोक तेरहवें का बाक़ी वाक्य पूरा करता है। "प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः। मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः।"

शान्त मन वाला, भयरहित, ब्रह्मचर्य के व्रत में स्थित होकर, मन को संयमित करके, मुझमें चित्त लगाए और मेरे परायण होकर युक्त होकर बैठे।

शब्द एक-एक। "प्रशान्तात्मा", जिसका मन शान्त है। "विगतभीः", जिसका भय चला गया। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं कि शास्त्र के निश्चय की दृढ़ता से उसे यह शंका नहीं रही कि मैं ठीक कर रहा हूँ या नहीं। और मैं चाहता हूँ कि आप याद करें कि सरोवर पर युधिष्ठिर कैसे खड़े थे: यक्ष की गर्जना के सामने, पाठ के शब्दों में, दृढ़ और अकम्पित। भय का जाना और मन का शान्त होना, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। फिर "ब्रह्मचारिव्रते स्थितः", ब्रह्मचर्य के व्रत में स्थित। शंकराचार्य इसे ब्रह्मचारी के व्रत जैसा बताते हैं, जिसमें गुरु की सेवा और भिक्षा का अन्न जैसी मर्यादाएँ आती हैं। यहाँ श्लोक में मर्यादा और संयम की बात है, और टीकाकार उसे उसी अर्थ में लेते हैं।

इस पर सनत्सुजात की उसी रात की बातें फिर काम आती हैं। चौवालीसवें अध्याय में वे धृतराष्ट्र से ब्रह्मचर्य पर बोलते हैं। वे कहते हैं कि जिस ब्रह्म के बारे में तुम पूछ रहे हो, वह जल्दबाज़ी से नहीं मिलता। जब मन बुद्धि में लीन हो जाए, तब उस पर चिन्तन किया जाता है, क्योंकि यह विद्या ब्रह्मचर्य से, यानी संयमी जीवन से, मिलती है। उसके चार चरण बताते हैं: गुरु को प्रणाम और बिना घमण्ड, बिना क्रोध के अध्ययन; गुरु का प्रिय करना; यह जानना कि "इन्होंने ही मुझे बनाया"; और यह कभी न कहना कि "मैंने यह किया"। और आगे उनका एक वाक्य है जो मुझे बहुत कोमल लगता है: जो इस मार्ग से अपने को पवित्र करता है, वह ज्ञानी बालक जैसी निर्मलता फिर पा लेता है। उद्योग पर्व, चौवालीसवाँ अध्याय, तेईसवाँ श्लोक।

अब श्लोक के आख़िरी दो शब्द: "मच्चित्तो" और "मत्परः"। मुझमें चित्त, और मैं ही परम। शंकराचार्य और मधुसूदन दोनों इनके फ़र्क को पकड़ते हैं। वे कहते हैं कि कोई आदमी किसी का चिन्तन करता हो, पर उसे परम न मानता हो। यहाँ दोनों हैं: चित्त भी भगवान में और परम लक्ष्य भी वही। मधुसूदन पूछते हैं कि यदि पुत्र आदि प्रिय चिन्तन के योग्य हों, तो ऐसा कैसे? और उत्तर में उपनिषद् की बात याद दिलाते हैं कि यह आत्मा पुत्र से प्रिय है, धन से प्रिय है, और सबसे प्रिय है, क्योंकि यह सबसे भीतर है। यानी पुत्र का प्रेम गलत नहीं ठहराया गया। बस इतना कहा गया कि जो उस प्रेम के भी भीतर बैठा है, वही सबसे प्यारा है।

और यहाँ मुझे एक पुरानी बात फिर याद आती है। पाँचवें अध्याय का आख़िरी श्लोक कहता था कि मुझे सब प्राणियों का सुहृद् जानकर मनुष्य शान्ति पाता है। और आज के पूरे हिस्से में बात थी कि तुम स्वयं अपने मित्र हो। ये दोनों वाक्य अलग नहीं हैं। जिस मन ने अपने को जीता, वह तभी पूरा मित्र बनता है जब उसका भी कोई मित्र हो, जो उसे अकेला न छोड़े। "मच्चित्तो" और "मत्परः", यही उस मित्रता का नाम है। अपने मित्र बनिए, और अपने भीतर के उस सुहृद् के भरोसे बनिए।

अब पन्द्रहवाँ श्लोक, जिसमें सब का फल है। "युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः। शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति।" इस प्रकार मन को सदा ध्यान में लगाते हुए, वश में किए मन वाला योगी मुझमें स्थित निर्वाण रूप परम शान्ति को प्राप्त करता है।

शब्द देखिए। "शान्तिम्", वही चीज़ जो उस रात धृतराष्ट्र के पास नहीं थी। याद कीजिए, उन्होंने कहा था, "मेरे मन को ठीक से शान्ति नहीं मिली।" यहाँ श्रीकृष्ण उसी का उत्तर दे रहे हैं। "निर्वाणपरमाम्", जिसका अन्तिम छोर निर्वाण है। शंकर कहते हैं, निर्वाण यानी मोक्ष, और यह शान्ति उसी में पूरी होती है। "मत्संस्थाम्", मुझमें स्थित। रामानुज और शंकर इसका अर्थ करते हैं कि जो मुझमें ठहरी है, मेरे अधीन।

मधुसूदन सरस्वती यहाँ एक सावधानी की बात कहते हैं, जो इस पूरे अभ्यास के लिए ज़रूरी है। वे कहते हैं कि ऐसा योगी संसार के ऐश्वर्य नहीं पाता, जो दूसरे विषयों के समाधि-फल होते हैं। पतंजलि ने उन्हें समाधि में बाधाएँ कहा है। यानी ध्यान की कमाई शक्तियाँ और चमत्कार नहीं हैं। उसकी कमाई शान्ति है। सोचिए, यह कितना अच्छा सौदा है। आप कुछ पाने नहीं बैठे, कुछ हटाने बैठे हैं: भीतर का शोर। और जो बचता है, उसे श्रीकृष्ण शान्ति कहते हैं।

अब उसी रात की बात पूरी कर दूँ। सनत्सुजात का आख़िरी अध्याय, छियालीसवाँ, एक ही वाक्य बार-बार लौटाता है: "योगी उस सनातन भगवान को देखते हैं।" एक शुद्ध तेज, एक महान चमकती ज्योति, उसी से सूर्य चमकता है, और योगी उसे देखते हैं। वही अध्याय कहता है कि जो अलग-अलग जगह लगे सब प्राणियों में आत्मा को देखता है, वह फिर क्यों शोक करे। उद्योग पर्व, छियालीसवाँ अध्याय, पच्चीसवाँ श्लोक। और अगले अध्याय का पहला श्लोक कहता है: इस प्रकार सनत्सुजात और विदुर के साथ बातें करते हुए राजा की वह रात बीत गई। फिर सवेरा हुआ, और सब सभा में सञ्जय को सुनने चले। उस रात की बात धृतराष्ट्र के जीवन में उसी क्षण नहीं उतरी। युद्ध हुआ, भीष्म गिरे, और आज हम सञ्जय से सुनी उसी कथा में बैठे हैं। पर वह बात खोई नहीं। वह वर्षों बाद गंगा-तट पर, कुरुक्षेत्र की उसी धरती पर, एक शान्त मन में फिर उतरी। यह मेरी अपनी पढ़त है, पर आप देखेंगे कि महाभारत इसी दिशा में चलता है।

तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली बात। मन अपने आप में न मित्र है, न शत्रु; वह वैसा बरतता है जैसा आपने उसे साधा है। जिसने उसे जीता, उसके लिए वह मित्र है, और जिसने नहीं जीता, उसके लिए वह शत्रु की तरह बरतता है। पर पहला शब्द "उद्धरेत्" था, उठाओ। अपने को कोसिए मत, उठाइए। और उठाने का काम कोई और नहीं कर सकता। हमारी टीका ने साफ़ कहा था: गुरु या शास्त्र की सहायता तभी फल देती है जब अपना मन उसे अपनाता है।

दूसरी बात। मन की दोस्ती की पहचान मौसम में होती है। शरीर का मौसम, मन का मौसम और लोगों का मौसम। जब ताने मिलें, तारीफ़ मिले, कुछ छिन जाए, कुछ मिल जाए, और भीतर का कोई बैठा रहे। युधिष्ठिर ने अपने शत्रु को संकट में छुड़ाया, और फिर भी उसे सावधान करके घर भेजा। समता कमज़ोरी नहीं है। और रात के ग्यारह बजे जो मन उठकर बैठ जाता है, उससे भी लड़िए मत। उसे उस दोस्त की तरह बिठाइए जो देर रात घर लौटा हो: पानी दीजिए, बात सुन लीजिए, और कहिए कि बाक़ी कल सुबह।

तीसरी बात। बैठना भी साधना है। साफ़ जगह, अपना स्थिर आसन, न ऊँचा न नीचा, सीधा और अचल शरीर, ठहरी हुई आँखें, और उसका उद्देश्य कोई चमत्कार नहीं, "आत्मविशुद्धये", अन्तःकरण की शुद्धि। और उसका फल शान्ति। जिस दिन बैठने की जगह बन जाए, उस दिन तैयारी में दस मिनट गँवाना बन्द हो जाता है।

अगली बार हम इसी अध्याय के सोलहवें श्लोक से आगे बढ़ेंगे, जहाँ श्रीकृष्ण कहेंगे कि योग न बहुत खाने वाले का है, न बिलकुल न खाने वाले का, न बहुत सोने वाले का, न बहुत जागने वाले का। फिर वह दीपक आएगा, जो हवा न चलने वाली जगह में काँपता नहीं। आज जो सुना, वह दोस्ती का तरीक़ा था। अगली बार हम सुनेंगे कि उस दोस्ती को रोज़ कैसे निभाया जाए।

आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आज रात जब मन फिर उठकर बैठ जाए, तो आप उससे क्या कहेंगे: दुश्मन की तरह, या दोस्त की तरह? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।

गीता कहती है, तुम स्वयं ही अपने मित्र हो। यह वाक्य शिकायत नहीं है, भरोसा है।

जय श्री कृष्ण।

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् । आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥ ५ ॥
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तीन बातें

  1. मन अपने आप में न मित्र है, न शत्रु; वह वैसा बरतता है जैसा आपने उसे साधा है। जिसने उसे जीता, उसके लिए वह मित्र है, और जिसने नहीं जीता, उसके लिए वह शत्रु की तरह बरतता है। पर पहला शब्द "उद्धरेत्" था, उठाओ। अपने को कोसिए मत, उठाइए। और उठाने का काम कोई और नहीं कर सकता। हमारी टीका ने साफ़ कहा था: गुरु या शास्त्र की सहायता तभी फल देती है जब अपना मन उसे अपनाता है।
  2. मन की दोस्ती की पहचान मौसम में होती है। शरीर का मौसम, मन का मौसम और लोगों का मौसम। जब ताने मिलें, तारीफ़ मिले, कुछ छिन जाए, कुछ मिल जाए, और भीतर का कोई बैठा रहे। युधिष्ठिर ने अपने शत्रु को संकट में छुड़ाया, और फिर भी उसे सावधान करके घर भेजा। समता कमज़ोरी नहीं है। और रात के ग्यारह बजे जो मन उठकर बैठ जाता है, उससे भी लड़िए मत। उसे उस दोस्त की तरह बिठाइए जो देर रात घर लौटा हो: पानी दीजिए, बात सुन लीजिए, और कहिए कि बाक़ी कल सुबह।
  3. बैठना भी साधना है। साफ़ जगह, अपना स्थिर आसन, न ऊँचा न नीचा, सीधा और अचल शरीर, ठहरी हुई आँखें, और उसका उद्देश्य कोई चमत्कार नहीं, "आत्मविशुद्धये", अन्तःकरण की शुद्धि। और उसका फल शान्ति। जिस दिन बैठने की जगह बन जाए, उस दिन तैयारी में दस मिनट गँवाना बन्द हो जाता है।