सबमें एक ही नज़र
गीता 5.16–5.29 · 79 मिनट
बाहरी सुख दुःख की जड़ क्यों; भीतर का सुख
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् ॥ १६ ॥
तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥ १७ ॥
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥ १८ ॥
हम सब जानते हैं कि किस बात से हमें ख़ुशी मिलती है। नई चीज़ घर आ जाए, कोई तारीफ़ कर दे, छुट्टी मिल जाए, मनपसंद खाना सामने हो। पर कभी ठहरकर देखा है कि जो चीज़ आज ख़ुशी देती है, वही कुछ दिन बाद चिन्ता क्यों देने लगती है? नई गाड़ी पर पहली खरोंच, तारीफ़ करने वाले का बदला हुआ मन, छुट्टी का आख़िरी दिन। और एक दूसरा सवाल भी है, जो इससे जुड़ा हुआ है। हम लोगों को अलग-अलग तराज़ू पर तौलते क्यों हैं? किसी के आने पर हम खड़े हो जाते हैं, और किसी के आने पर नज़र भी नहीं उठाते।
आज के सत्संग में ये दोनों सवाल एक साथ आएँगे: बाहर का सुख दुःख की जड़ क्यों बन जाता है, भीतर का सुख कैसा होता है, और सबको एक ही नज़र से देखना असल में क्या है। इसी को हमने आज का नाम दिया है: सबमें एक ही नज़र।
जय श्री कृष्ण।
आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का सत्रहवाँ सत्संग है, और आज हम गीता के पाँचवें अध्याय को पूरा करेंगे। पहले थोड़ा याद कर लें। पाँचवें अध्याय के पहले ही श्लोक में अर्जुन ने साफ़ पूछ लिया था: आप कर्मों के संन्यास की भी प्रशंसा करते हैं और कर्म करने की भी, इन दोनों में जो एक श्रेष्ठ हो, वह मुझे निश्चित करके बताइए। पिछले सत्संग में, पहले से पन्द्रहवें श्लोक तक, हमने श्रीकृष्ण का उत्तर सुना। दोनों रास्ते कल्याण देते हैं, पर अर्जुन जैसी हालत वाले के लिए योग के साथ किया गया कर्म बेहतर है। सच्चा संन्यासी वह है जो न किसी से द्वेष करता है, न कुछ चाहता है, उसका बाहरी जीवन चाहे जैसा हो। और फिर वह सुन्दर उपमा आई थी, दसवें श्लोक में: जो अपने कर्म ब्रह्म को अर्पित करके, आसक्ति छोड़कर करता है, वह पाप से वैसे ही अछूता रहता है जैसे कमल का पत्ता पानी में रहकर भी गीला नहीं होता। और पन्द्रहवें श्लोक ने एक बात कहकर बात रोकी थी: भगवान किसी का पाप नहीं लेते, न किसी का पुण्य। अज्ञान ने ज्ञान को ढक रखा है, उसी से जीव मोह में पड़ते हैं।
तो सवाल वहीं खड़ा है। अगर ज्ञान ढका हुआ है, तो वह खुलता कैसे है, और खुल जाए तो होता क्या है? आज के पहले तीन श्लोक इसी का उत्तर हैं।
और जैसा हम हर बार करते हैं, यह भी याद रखिए कि हम गीता को उसके अपने घर में सुन रहे हैं। हमारे कोष में महाभारत के भीष्म पर्व के अध्याय पच्चीस से बयालीस गीता हैं, और उनमें उनतीसवाँ अध्याय गीता का यही पाँचवाँ अध्याय है, कर्मसंन्यास योग। सञ्जय हस्तिनापुर में, भीष्म के गिर जाने के बाद, अन्धे राजा धृतराष्ट्र को यह सब सुना रहे हैं, उस राजा को, जिसने गीता के पहले ही श्लोक में "मामकाः" कहा था, मेरे वाले। आज की सबको एक नज़र से देखने की बात उसके कानों में कैसी पड़ी होगी, सोचिए।
सोलहवाँ श्लोक। "ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः। तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्।"
परन्तु जिनका वह अज्ञान आत्मा के ज्ञान से नष्ट हो गया है, उनका वह ज्ञान सूर्य की तरह उस परम तत्त्व को प्रकाशित कर देता है।
शुरुआत के छोटे-से शब्द पर ध्यान दीजिए: "तु", यानी "परन्तु"। पिछला श्लोक कह रहा था कि ज्यादातर लोग मोह में हैं, क्योंकि अज्ञान ने ज्ञान को ढक दिया है। और यह श्लोक कहता है, परन्तु कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनका यह परदा हट गया। और परदा हटा तो क्या दिखा? "आदित्यवत्", सूर्य की तरह।
हमारी टीका यहाँ एक बहुत सीधी बात कहती है, जिसे मैं चाहता हूँ कि आप याद रखें। सूर्य कोई चीज़ बनाता नहीं है। सुबह जब सूरज निकलता है, तो आँगन का पेड़, दीवार का रंग, रास्ते का पत्थर, ये सब रात में भी वहीं थे। सूरज ने उन्हें पैदा नहीं किया, बस दिखा दिया। वैसे ही ज्ञान आत्मा को पैदा नहीं करता। आत्मा तो पहले से है, आप में, मुझमें, हर एक में। ज्ञान केवल वह आवरण हटा देता है जो उसे ढके हुए था।
मधुसूदन सरस्वती जोड़ते हैं कि सूरज को अँधेरा हटाने के लिए किसी सहायक की ज़रूरत नहीं पड़ती, वह उगता है और अँधेरा अपने आप चला जाता है। और संत ज्ञानेश्वर कहते हैं: जब पूर्व के मन्दिर में सूर्य उगता है, तो दिवाली केवल पूर्व दिशा में नहीं होती, उसी पल बाकी सब दिशाओं से भी कालिमा चली जाती है।
आपने भी अनुभव किया होगा कि किसी रिश्ते की कोई उलझन बरसों से समझ में नहीं आ रही थी, और एक दिन किसी की एक बात से अचानक सब साफ़ हो गया। उस दिन कुछ नया नहीं बना था, बस रोशनी आ गई थी। गीता कहती है कि अपने असली स्वरूप के बारे में भी यही होता है।
फिर सत्रहवाँ श्लोक। "तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः। गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः।"
जिनकी बुद्धि उसी में लगी है, जिनका मन उसी में है, जो उसी में टिके हैं और जिनका वही परम आश्रय है, ज्ञान से जिनके पाप धुल गए हैं, वे वहाँ जाते हैं जहाँ से लौटना नहीं होता।
इस श्लोक में चार बार एक ही छोटा-सा शब्द आता है: "तत्", "वह"। तद्बुद्धि, तदात्मा, तन्निष्ठा, तत्परायण। जैसे कोई चार सीढ़ियाँ चढ़ रहा हो। पहले बुद्धि उस ओर मुड़ती है, यानी समझ में आता है कि असली चीज़ वही है। फिर मन उसमें लगने लगता है। फिर आदमी उसी में टिकने लगता है, उसकी निष्ठा वहीं हो जाती है। और आख़िर में वही उसका सहारा बन जाता है, उसका परम आश्रय। श्रीधर स्वामी कहते हैं कि यह सब उसी परमेश्वर की कृपा से मिले आत्मज्ञान से होता है, और उससे जिनके पाप झड़ गए, वे मुक्ति को जाते हैं। और हमारी टीका "अपुनरावृत्ति" का अर्थ सीधा बताती है: जन्म और मृत्यु के चक्र में फिर न लौटना।
हमारी बुद्धि दिन भर किस्तों में, बच्चों के नतीजों में, दफ़्तर की बैठकों में लगी रहती है, और मन उसके पीछे-पीछे चलता है। श्रीकृष्ण यह सब छोड़ने को नहीं कह रहे। वे इतना कह रहे हैं कि बुद्धि का एक कोना, मन का एक कोना, उस "तत्" के लिए रखिए। धीरे-धीरे वही कोना बढ़ता है।
और अब अठारहवाँ श्लोक, आज के सत्संग का सबसे बड़ा श्लोक, जिससे हमने आज का नाम लिया है। "विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः।"
ज्ञानी लोग विद्या और विनय से भरे ब्राह्मण में, गाय में, हाथी में, कुत्ते में और चाण्डाल में, सबमें समान ही देखते हैं।
ज़रा इस सूची को ध्यान से सुनिए। श्रीकृष्ण ने ये पाँच नाम यूँ ही नहीं चुने। सबसे पहले वह ब्राह्मण, जिसमें विद्या भी है और विनय भी। यानी जिसे उस समाज में सबसे ऊँचा, सबसे आदरणीय माना जाता था। और सबसे आख़िर में "श्वपाक", यानी चाण्डाल, जिसे उसी समाज ने सबसे नीचे रखा था। और बीच में तीन पशु: गाय, जिसे पवित्र माना जाता है; हाथी, जो सबसे बड़ा और राजसी है; और कुत्ता, जिसे लोग दरवाज़े से भगा देते हैं।
श्रीधर स्वामी इस सूची का ढाँचा बहुत सुन्दर खोलते हैं। वे कहते हैं, ब्राह्मण और चाण्डाल के बीच जो फ़र्क दिखाया गया है, वह आचरण और कर्म का फ़र्क है। और गाय, हाथी और कुत्ते के बीच का फ़र्क जाति का, यानी प्राणी की किस्म का फ़र्क है। मतलब, जितने तरह के फ़र्क दुनिया में दिखाई देते हैं, ऊँच-नीच का भी, आकार का भी, पवित्र-अपवित्र का भी, वे सब इस एक श्लोक में रख दिए गए हैं। और फिर कहा गया: ज्ञानी इन सबमें एक ही को देखता है।
अब यहाँ एक बहुत ज़रूरी बात, जिसे हमारी टीका साफ़ शब्दों में कहती है, और जिसके बिना यह श्लोक गलत समझा जा सकता है। समदर्शन का अर्थ है सबमें एक ब्रह्म को देखना। इसका अर्थ सबसे एक जैसा व्यवहार करना नहीं है। व्यवहार तो हर एक के साथ अलग रहेगा। गाय को आप चारा देंगे, विद्वान को आप आसन देंगे। हाथी के लिए एक तरह का रास्ता चाहिए, कुत्ते के लिए दूसरा। डॉक्टर बच्चे को और बूढ़े को एक ही ख़ुराक नहीं देता। टीका कहती है: व्यवहार बदलता है, दृष्टि नहीं बदलती।
आचार्य शंकर और मधुसूदन सरस्वती कहते हैं कि ये प्राणी अपने गुणों और संस्कारों में अलग हैं, पर इनके भीतर का ब्रह्म उनसे छुआ भी नहीं जाता। और मधुसूदन इसके लिए एक उपमा देते हैं जो सुनने में थोड़ी कठोर है, पर बात को बिल्कुल साफ़ कर देती है। वे कहते हैं, आकाश का एक ही सूर्य गंगा के जल में भी दिखता है, किसी तालाब में भी, और किसी गंदे पानी में भी। पानी के गुण-दोष अलग-अलग हैं, पर उनमें झलकते सूर्य को किसी पानी का दोष नहीं लगता। जो यह जानता है, उसके मन में किसी के लिए राग और किसी के लिए द्वेष नहीं बचता।
और नीलकण्ठ, जिन्होंने पूरे महाभारत पर टीका लिखी, एक ऐसी उपमा देते हैं जो हमारे घर के मन्दिर में ही मिल जाएगी। सोचिए, किसी के घर सोने की एक मूर्ति है और वह जिस पीठ पर रखी है, वह भी सोने की है। पूजा करने वाला आकार देखता है, यह भगवान हैं, यह उनका आसन है, और उसके लिए दोनों में बड़ा फ़र्क है। पर सुनार जब उन्हें देखता है, तो उसकी नज़र सोने पर जाती है, और सोना दोनों में एक है। नीलकण्ठ कहते हैं, ज्ञानी की नज़र वैसी ही है। आकार का फ़र्क उसे भी दिखता है, पर उसकी नज़र उस पर टिकती है जो सबमें एक है।
अब इस श्लोक को महाभारत के भीतर रखकर देखिए। आपको आश्चर्य होगा कि इस श्लोक के दो शब्द, कुत्ता और चाण्डाल, महाभारत में युधिष्ठिर के अपने मुँह से एक साथ आते हैं।
वन पर्व का दूसरा अध्याय। जुए में सब हारकर पाण्डव वन को निकल रहे हैं। सुबह हुई है, और भिक्षा पर जीने वाले बहुत-से ब्राह्मण उनके आगे आकर खड़े हो गए हैं कि हम भी आपके साथ चलेंगे। युधिष्ठिर उन्हें लौटाना चाहते हैं, कहते हैं कि हमारा सब कुछ छिन गया है, मैं आपको कैसे पालूँगा। और फिर वे एक गृहस्थ के धर्म की बात करते हैं। वे कहते हैं: अकेले अपने लिए भोजन नहीं पकाना चाहिए, अकेले नहीं खाना चाहिए। और फिर यह, "कुत्तों के लिए, चाण्डालों के लिए और पक्षियों के लिए भूमि पर अन्न रखना चाहिए। इसे वैश्वदेव कहते हैं, और यह शाम और सुबह दिया जाता है।"
देखिए, कितनी सुन्दर बात है। जिस राजा का राज्य अभी-अभी छिना है, जो ख़ुद कल से फल-मूल पर जीने वाला है, उसके मन में भी यह बात है कि घर का भोजन तब तक पूरा नहीं होता, जब तक उसमें दरवाज़े के कुत्ते का, और समाज से बाहर रखे गए आदमी का, और आँगन के पक्षी का हिस्सा न निकल जाए। बहुत-से घरों में आज भी पहली रोटी गाय की और आख़िरी कुत्ते की निकाली जाती है। उस रोटी के पीछे यही दृष्टि है: मेरी रसोई में जो पका है, उसमें सबका हिस्सा है।
पर गीता का समदर्शन रोटी निकालने से भी आगे जाता है। रोटी निकालना एक रीति है। समदर्शन वह नज़र है जिससे वह रीति निकली। और इस नज़र की सबसे बड़ी परीक्षा महाभारत में बहुत आख़िर में आती है, युधिष्ठिर के जीवन के सबसे आख़िरी मोड़ पर, और उसमें भी एक कुत्ता है।
महाप्रस्थानिक पर्व। युद्ध को बरसों बीत चुके हैं। पाँचों भाई और द्रौपदी राज्य छोड़कर, योग में चलते हुए उत्तर की ओर हिमालय के पार जा रहे हैं। एक कुत्ता पूरे रास्ते उनके पीछे-पीछे चला है। रास्ते में एक-एक करके द्रौपदी और चारों भाई गिर जाते हैं, और आख़िर में अकेले युधिष्ठिर बचते हैं, और उनके पीछे वही कुत्ता।
तब इन्द्र अपना रथ लेकर आते हैं, आकाश और धरती को गुँजाते हुए, और कहते हैं, "चढ़िए।" युधिष्ठिर पहले कहते हैं कि मैं अपने भाइयों के बिना स्वर्ग नहीं जाना चाहता। इन्द्र बताते हैं कि वे सब पहले ही पहुँच चुके हैं, और तुम इसी शरीर से जाओगे। तब युधिष्ठिर कहते हैं, "हे भूत और भविष्य के स्वामी, यह कुत्ता सदा मेरा भक्त रहा है। यह भी मेरे साथ चले, क्योंकि मेरा मन दया में लगा है।"
यही असली परीक्षा है। इन्द्र कहते हैं, "तुम्हें आज अमरता मिली है, मेरे बराबर का पद, पूरा वैभव, बड़ी सिद्धि और स्वर्ग के सारे सुख। कुत्ते को छोड़ दो, इसमें कोई निर्दयता नहीं है।" और फिर वे यह भी कहते हैं कि स्वर्ग में कुत्ते वालों के लिए जगह नहीं है।
और युधिष्ठिर का उत्तर: "हे इन्द्र, श्रेष्ठ आदमी के लिए नीच काम करना कठिन है। मुझे वह वैभव न मिले, जिसके लिए मुझे अपने भक्त को छोड़ना पड़े।" फिर वे कहते हैं कि जो डरा हुआ हो, जिसका और कोई सहारा न हो, जो दुखी हो, कमज़ोर हो, रक्षा के लिए शरण में आया हो और जीना चाहता हो, उसे मैं प्राण देकर भी नहीं छोड़ूँगा, यह मेरा सदा का व्रत है। और इन्द्र जब कहते हैं कि तुमने अपने भाइयों को और द्रौपदी को भी तो छोड़ा था, तो वे कहते हैं: जो मर चुके, उन्हें मैं जिला नहीं सकता था, इसलिए छोड़ा; पर मैंने किसी जीवित को नहीं छोड़ा।
और तब वह कुत्ता अपना असली रूप दिखाता है। वह स्वयं धर्म थे। धर्म प्रसन्न होकर कहते हैं, "हे राजेन्द्र, तुम अपने पिता के आचरण से, अपनी बुद्धि से और सब प्राणियों के प्रति इस दया से कुलीन हो।" और फिर कहते हैं, "अब तुमने यह सोचकर कि यह कुत्ता भक्त है, देवताओं का रथ छोड़ दिया। इसलिए स्वर्ग में कोई तुम्हारे बराबर नहीं।"
अब इस दृश्य को अठारहवें श्लोक के पास रखिए। एक ओर इन्द्र का रथ, अमरता, देवताओं का पद। दूसरी ओर एक कुत्ता, "शुनि"। जिस आदमी की नज़र में इन दोनों का तराज़ू बराबर हो गया, उसकी परीक्षा पूरी हो गई। और ध्यान दीजिए, युधिष्ठिर ने कुत्ते को देवता नहीं समझा था। उन्हें पता नहीं था कि वह धर्म हैं। उन्होंने उसे कुत्ता ही समझा, और फिर भी नहीं छोड़ा। समदर्शन यही है: सामने वाला जो है, उसे वही जानते हुए भी, उसके भीतर के उस एक को न भूलना।
हमारी ज़िंदगी में इन्द्र का रथ नहीं आता, पर छोटे-छोटे रथ रोज़ आते हैं। किसी बड़े आदमी की दावत, जिसके लिए किसी पुराने, कम हैसियत वाले दोस्त का फ़ोन टालना पड़े। दफ़्तर का वह माहौल, जहाँ चपरासी से बात करते हुए लोग अपनी आवाज़ बदल लेते हैं। हर ऐसे मोड़ पर एक छोटा-सा इन्द्र कहता है, "छोड़ दो, इसमें कोई निर्दयता नहीं है।" और हर ऐसे मोड़ पर अठारहवाँ श्लोक धीरे से पूछता है: तुम्हारी नज़र रथ पर है, या उस पर जो तुम्हारे पीछे-पीछे चला आया है?
पर अभी एक बात बाकी है। यह सब सुनकर मन में एक शंका उठती है, और पुराने आचार्यों के मन में भी उठी थी। अगर सबको एक नज़र से देखना है, तो क्या धर्मशास्त्र गलत हैं, जो कहते हैं कि सबका आदर उसकी योग्यता के अनुसार हो? और क्या यह नज़र मरने के बाद मिलती है, या इसी जीवन में? अगला श्लोक इसका उत्तर देता है, और उसका पहला ही शब्द है, "इहैव", यहीं। आइए, पहले वे श्लोक सुनते हैं।
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥ १९ ॥
न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् ।
स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः ॥ २० ॥
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् ।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥ २१ ॥
इससे पहले कि हम इन श्लोकों में उतरें, एक छोटी-सी बात आपसे कहनी है। हम अभी आज के सत्संग के बीच में भी नहीं पहुँचे, और अगर कोई यहीं उठ जाए, तो वह इतना ही ले जाएगा कि सबको बराबर समझो। पर आधा सुना हुआ सच, सच नहीं रहता, वह भ्रम बन जाता है। बराबर समझने की बात तब तक खोखली रहती है, जब तक यह न समझ आए कि हम असमान क्यों देखते हैं। और उसका उत्तर इन्हीं अगले श्लोकों में है, जहाँ श्रीकृष्ण सुख की बात करते हैं। तो अगर आप यह सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की यह यात्रा बीच में न छूटे। और आज का सत्संग आख़िर तक सुनिए, क्योंकि पाँचवाँ अध्याय आज पूरा होगा, और उसके आख़िरी श्लोक में भगवान अपने बारे में वह बात कहते हैं, जिसे सुनकर भय मिटता है।
उन्नीसवाँ श्लोक। "इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः। निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः।"
जिनका मन समता में टिक गया है, उन्होंने यहीं संसार को जीत लिया। क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और सम है, इसलिए वे ब्रह्म में ही स्थित हैं।
"इहैव", यहीं। आचार्य शंकर और श्रीधर स्वामी दोनों इसका अर्थ लगाते हैं: जीते जी, इसी जीवन में। यानी समता कोई ऐसा इनाम नहीं जो मरने के बाद किसी दूसरे लोक में मिले। जो आज, इसी घर में, इसी दफ़्तर में, लोगों को एक नज़र से देखने लगा, उसने यहीं संसार को जीत लिया। तिलक महाराज इसे और सीधे कहते हैं: मरने की प्रतीक्षा किए बिना, यहीं के यहीं।
और कारण भी श्लोक ख़ुद देता है: "निर्दोषं हि समं ब्रह्म"। ब्रह्म निर्दोष है और सम है। अब याद कीजिए वह शंका, जो पिछले हिस्से के आख़िर में उठी थी। धर्मशास्त्र तो कहते हैं कि आदर योग्यता के अनुसार हो। श्रीधर स्वामी, मधुसूदन सरस्वती और नीलकण्ठ, तीनों इस शंका को उठाते हैं, गौतम के धर्मसूत्र का एक वचन देकर, कि जो बराबर वालों का आदर असमान करे और असमान का बराबर, वह दोष का भागी होता है। और तीनों का उत्तर एक-सा है। वह नियम पूजा करने वाले के लिए है, व्यवहार की दुनिया के लिए। ज्ञानी व्यवहार में मर्यादा रखता है, पर उसकी नज़र उस पर टिकी है जो सबमें निर्दोष और सम है।
पर इस श्लोक की एक और बात मुझे बहुत भारी लगती है। "निर्दोषं", बिना दोष के। जिसकी नज़र सम नहीं, उसे सबसे पहले दूसरों में दोष दिखते हैं, और अपने में कोई दोष नहीं दिखता। और इसी बात का एक दृश्य महाभारत में उसी यात्रा में है, जिसकी बात हमने अभी कुत्ते के साथ की थी।
महाप्रस्थानिक पर्व का दूसरा अध्याय। पाण्डव योग का पालन करते हुए हिमालय को पार करके, बालू का सागर पार करके, मेरु की ओर तेज़ी से चल रहे हैं। तभी योग से डिगकर द्रौपदी धरती पर गिर पड़ती हैं। भीम पूछते हैं, "राजकन्या से तो कभी कोई अधर्म नहीं हुआ, फिर वह क्यों गिरीं?" और युधिष्ठिर कहते हैं, "पक्षपातो महानस्या विशेषेण धनञ्जये।" इनके मन में बड़ा पक्षपात था, विशेष रूप से अर्जुन के प्रति, उसी का फल ये आज भोग रही हैं।
फिर सहदेव गिरते हैं, और युधिष्ठिर कहते हैं, वह किसी को अपने जितना समझदार नहीं मानता था। फिर नकुल, जिसके मन में बैठा था कि रूप में मेरे बराबर कोई नहीं। फिर अर्जुन, जिन्होंने दूसरे सब धनुर्धरों को छोटा समझा। और फिर भीम, जिन्होंने दूसरों का ध्यान रखे बिना अपने बल की डींग मारी।
इस अध्याय को मैं किसी को छोटा दिखाने के लिए नहीं सुना रहा। ये सब महान लोग थे, और अपने दोष में भी ये हमसे कहीं ऊँचे थे। पर देखिए, हर गिरने की जड़ में एक ही चीज़ है: एक तराज़ू जो सीधा नहीं था। किसी के मन में पाँच में से एक के लिए ज़्यादा झुकाव, किसी के मन में "मेरे बराबर कोई नहीं"। समता केवल दूसरों को बराबर देखना नहीं, अपने को भी बाकियों से ऊपर न देखना है। और यह इतना बारीक है कि सबसे बड़े लोग भी रास्ते के आख़िरी हिस्से में इसी पर ठोकर खाते हैं।
अब बीसवाँ श्लोक। "न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्। स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः।"
वह प्रिय को पाकर हर्ष से उछलता नहीं, और अप्रिय को पाकर घबराता नहीं। स्थिर बुद्धि वाला, मोह से रहित, ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म में स्थित है।
ध्यान दीजिए, यह श्लोक अचानक लोगों से हटकर घटनाओं पर आ गया। पहले कहा गया कि लोगों को एक नज़र से देखो। अब कहा जा रहा है कि घटनाओं को भी। अच्छी ख़बर आए या बुरी, तारीफ़ हो या निन्दा, मन का तराज़ू दोनों पर एक-सा रहे। मधुसूदन सरस्वती और नीलकण्ठ एक बारीक बात पकड़ते हैं। वे कहते हैं, यहाँ क्रिया का जो रूप है, "न प्रहृष्येत्", वह आज्ञा जैसा है। जो ज्ञानी के लिए स्वभाव है, वही साधक के लिए अभ्यास है। ज्ञानी अपने आप ऐसे रहता है, और जो वहाँ पहुँचना चाहता है, उसे जान-बूझकर ऐसे रहने का अभ्यास करना है।
संत ज्ञानेश्वर इस पर एक सुन्दर चित्र देते हैं। मृगजल की बाढ़ से कभी कोई पहाड़ बहता है क्या? रेगिस्तान में दूर पानी जैसा दिखता है, लहराता है, पर वह पानी है ही नहीं। पहाड़ उसके सामने वैसा ही खड़ा रहता है। ज्ञानी के लिए शुभ और अशुभ की लहरें वैसी ही हैं।
और अब महाभारत का वह वचन, जो इस श्लोक के साथ बहुत-से घरों में बड़े-बूढ़े दोहराते आए हैं, और जिसका घर हमें वन पर्व के उसी दूसरे अध्याय में मिलता है। युधिष्ठिर ब्राह्मणों से बात करते-करते, शोक में भरकर, धरती पर बैठ गए। तब शौनक नाम के एक विद्वान ब्राह्मण, जो योग और सांख्य में निपुण थे, उनसे बोले: "शोकस्थानसहस्राणि हर्षस्थानशतानि च। दिवसेदिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम्।" शोक के हज़ारों कारण और हर्ष के सैकड़ों कारण दिन-प्रतिदिन मूर्ख को घेर लेते हैं, ज्ञानी को नहीं।
सुनिए कितना सच्चा हिसाब है। शोक के हज़ार, हर्ष के सौ। जो हर बात पर उछलता है, वह हर बात पर गिरता भी है। घटनाएँ ज्ञानी के जीवन में भी आती हैं, बस उसके भीतर घर नहीं बना पातीं। और उसी बात में आगे वे एक उपमा भी देते हैं, जिसे सुनकर आपको पिछला सत्संग याद आ जाएगा: जिनके पास ज्ञान है, जिनका मन सधा है, उन पर आसक्ति नहीं चिपकती, जैसे कमल के पत्तों पर पानी नहीं टिकता।
और अब इक्कीसवाँ श्लोक, आज के बड़े श्लोकों में से एक। "बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्। स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते।"
जिसका मन बाहर के विषयों के स्पर्श में आसक्त नहीं है, वह आत्मा में जो सुख है, उसे पाता है। ब्रह्म के साथ योग में जुड़ा हुआ वह अक्षय सुख भोगता है।
"बाह्यस्पर्श", बाहर के स्पर्श। आचार्य शंकर बताते हैं कि यहाँ स्पर्श का मतलब केवल छूना नहीं, वह सब है जो इन्द्रियों से छुआ जाता है: शब्द, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श। कान जो सुनते हैं, आँखें जो देखती हैं, जीभ जो चखती है। और श्लोक कहता है, इनमें जिसका मन अटका नहीं, उसे एक दूसरा सुख मिलता है, जो बाहर से नहीं आता। "आत्मनि", अपने भीतर।
अब यहाँ मधुसूदन सरस्वती एक बहुत ईमानदार सवाल उठाते हैं, जो शायद आपके मन में भी हो। वे कहते हैं, बाहर के सुख का स्वाद तो हमने अनगिनत जन्मों से चखा है, वह बहुत ताक़तवर है। और भीतर का यह सुख हमने कभी चखा ही नहीं। जिसका स्वाद पता नहीं, उसके लिए जिसका स्वाद पता है, उसे कोई कैसे छोड़े? और उत्तर देते हुए वे महाभारत का ही एक श्लोक उद्धृत करते हैं: "यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम्। तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम्।" संसार का जो कामना का सुख है, और जो स्वर्ग का बड़ा सुख है, ये दोनों मिलकर भी उस सुख की सोलहवीं कला के बराबर नहीं, जो तृष्णा के मिट जाने से मिलता है।
शौनक भी उसी वन पर्व वाली बात में यही कहते हैं: प्यास का कोई अन्त नहीं, और सन्तोष ही सबसे बड़ा सुख है। और संत ज्ञानेश्वर का उत्तर तो एक चित्र में है। चकोर पक्षी, जिसने कुमुद के पत्ते की थाली में चाँदनी का भोजन कर लिया हो, क्या वह फिर रेत चूमता फिरेगा? यानी भीतर का सुख छोड़ने से नहीं आता। जब वह थोड़ा-सा भी मिल जाता है, तो बाहर की चीज़ों की पकड़ अपने आप ढीली हो जाती है।
आपने भी इसका स्वाद कभी चखा होगा। किसी शाम, बिना किसी कारण के, मन बहुत हल्का था, और उस शाम आपको न फ़ोन खोलने की ज़रूरत लगी, न कुछ ख़रीदने की, न किसी से अपनी बात मनवाने की। गीता कहती है, वही ठहराव आपका असली घर है। बाकी सब उस घर से बाहर की सैर है।
पर अभी एक बात बाकी है। मधुसूदन ने जो श्लोक उद्धृत किया, "तृष्णा के मिटने का सुख", वह महाभारत में एक ऐसे आदमी के मुँह से निकला था, जिसके दो बछड़े एक ऊँट उठाकर भाग गया था। वह कथा, और उसके साथ बाहर के सुख का वह कड़वा सच, अगले श्लोक में है।
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ २२ ॥
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥ २३ ॥
बाईसवाँ श्लोक। "ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते। आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः।"
क्योंकि विषयों के स्पर्श से पैदा होने वाले जो भोग हैं, वे दुःख के ही कारण हैं। हे कुन्तीपुत्र, उनका आदि भी है और अन्त भी, इसलिए समझदार आदमी उनमें नहीं रमता।
यह आज के सत्संग का वह श्लोक है जिसका प्रश्न हमने शुरू में पूछा था: बाहर का सुख दुःख की जड़ क्यों बन जाता है? और श्लोक का एक शब्द इसका पूरा उत्तर है: "दुःखयोनयः"। योनि यानी जन्म देने की जगह, गर्भ। बाहर के भोग दुःख को जन्म देने वाले हैं। श्रीकृष्ण यह नहीं कह रहे कि उनमें सुख होता ही नहीं। सुख होता है, तभी तो हम उनके पीछे भागते हैं। वे कह रहे हैं कि उस सुख की कोख से दुःख पैदा होता है।
हमारी टीका इसे तीन हिस्सों में खोलती है, और ये तीनों हिस्से आप अपने जीवन में तुरंत पहचान लेंगे। ऐसा सुख तीन तरह से दुःख देता है। पहला, उसे पाने के प्रयास में: जो चीज़ अभी मिली नहीं, उसके लिए बेचैनी, मेहनत, होड़। दूसरा, खो जाने के भय में: जो मिल गई, उसके छिन जाने का डर। और तीसरा, जब वह समाप्त हो जाए, तब बची हुई लालसा में: वह चली गई, पर उसकी याद और फिर से पाने की चाह रह गई।
और श्रीधर स्वामी एक चौथी बात जोड़ते हैं, जो सबसे बारीक है। वे कहते हैं, भोग के समय में भी, ठीक जब हम उसका सुख ले रहे होते हैं, तब भी वह होड़ और जलन से भरा होता है। नया घर लिया, और उसी हफ़्ते पड़ोसी का घर उससे बड़ा दिखने लगा। बच्चे के अच्छे नंबर आए, और उसी शाम किसी और के बच्चे के ज़्यादा नंबर सुन लिए। सुख अभी हाथ में ही था, और उसमें काँटा लग गया।
फिर दूसरा शब्द, "आद्यन्तवन्तः", आदि और अन्त वाले। आचार्य शंकर इसे सीधे बताते हैं: इन भोगों का आदि है विषय और इन्द्रिय का मिलना, और अन्त है उनका बिछड़ना। बीच में थोड़ी देर का सुख है। नीलकण्ठ का उदाहरण बहुत भारी है, पर सच्चा है। वे कहते हैं, घर में पुत्र जन्मा तो जो सुख हुआ, वह उसके न रहने पर नष्ट हो जाता है, और बदले में बहुत बड़ा दुःख दे जाता है। इसलिए समझदार, जिसे नीलकण्ठ "परिपाकदर्शी" कहते हैं, यानी जो आख़िरी नतीजा देख लेता है, वह उनमें बरतता है, पर रमता नहीं।
संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर कई चित्र देते हैं, और उनमें से दो मुझे भुलाए नहीं भूलते। पहला: मछली को काँटे में लगा मांस का टुकड़ा तभी तक अच्छा लगता है, जब तक उसने उसे निगला नहीं। और दूसरा: साँप के फन की छाया चूहे को कितनी ठंडक देगी?
अब वह कथा, जिसका वादा मैंने किया था। शान्ति पर्व में युधिष्ठिर भीष्म से पूछते हैं: अगर कोई आदमी बहुत मेहनत करे और फिर भी धन न मिले, और धन की प्यास उसे जकड़े रहे, तो वह क्या करे कि सुखी हो? भीष्म पहले सुखी आदमी के पाँच लक्षण बताते हैं, और उनमें पहला है "सर्वसाम्य", यानी सबके प्रति समता। फिर वे मङ्कि नाम के एक आदमी की पुरानी कथा सुनाते हैं।
मङ्कि ने धन के लिए बार-बार यत्न किया था, और हर बार उसकी कोशिश टूट गई थी। आख़िर उसने किसी तरह थोड़े-से पैसे जोड़कर दो बछड़े ख़रीदे, जिन्हें अभी सधाना था। एक दिन वह उन्हें सधाने के लिए ले गया। जुए में बँधे दोनों बछड़े दौड़ते हुए एक बैठे हुए ऊँट के बीच से निकल गए। ऊँट क्रोध में उठा, दोनों बछड़ों को अपनी गर्दन पर उठा लिया, और तेज़ी से भाग निकला। और मङ्कि खड़ा देखता रहा कि उसके दोनों प्यारे बछड़े ऊँट की गर्दन से ऐसे लटके हैं, जैसे गले में मणियाँ लटकती हों, और मर रहे हैं।
अब उस टूटे हुए आदमी के मुँह से जो निकला, वह महाभारत ने "मङ्कि का गीत" कहकर सँभालकर रखा है। वह कहता है: सब कामनाओं के अन्त तक कोई कभी नहीं पहुँचा, न पहले वाले, न बाद वाले। और फिर वह अपने मन से, अपनी कामना से, सीधे बात करता है: हे मन, तू बार-बार ठगा गया है, फिर भी ऊबता नहीं। और फिर वह वाक्य, जो इस पूरी कथा का दिल है: "काम जानामि ते मूलं संकल्पात्किल जायसे।" हे काम, मैं तेरी जड़ जानता हूँ, तू संकल्प से जन्मता है। मैं तेरी कल्पना ही नहीं करूँगा, तो तू जड़ समेत नहीं रहेगा।
वह आगे कहता है: धन पाने की कोशिश सुख नहीं देती, पाकर चिन्ता और बढ़ जाती है, और पाया हुआ खो जाए तो वह मृत्यु जैसा लगता है। सुनिए, यह हमारी टीका के उन्हीं तीन दुःखों का हिसाब है: पाने में, रखने में, खोने में। और फिर, जब मन शान्त होने लगता है, मङ्कि कहता है: मैं ब्रह्म में टिक गया हूँ, जैसे गर्मी में ठंडा सरोवर, मैं शान्त हूँ, शीतल हूँ, सुख से बैठा हूँ। और उसी जगह वह श्लोक आता है जो मधुसूदन ने इक्कीसवें श्लोक पर उद्धृत किया था: संसार का काम-सुख और स्वर्ग का बड़ा सुख, दोनों तृष्णा मिटने के सुख की सोलहवीं कला के बराबर नहीं। भीष्म कथा इस बात से समाप्त करते हैं कि बछड़ों के नाश से ही मङ्कि अमृतत्व तक पहुँचा, उसने काम की जड़ काट दी।
हम सबके जीवन में कभी न कभी कोई ऊँट आता है, जो वह चीज़ उठाकर भाग जाता है जिस पर हमने सब कुछ लगा दिया था। उस दिन हम दो में से एक काम करते हैं। या तो अगले बछड़े ख़रीदने की योजना बनाते हैं, या मङ्कि की तरह पहली बार अपनी कामना की जड़ देखते हैं।
और अब तेईसवाँ श्लोक, जो इस सबका व्यावहारिक रूप है। "शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्। कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः।"
जो मनुष्य यहीं, शरीर छूटने से पहले, काम और क्रोध से पैदा होने वाले वेग को सह सकता है, वही योगी है, वही सुखी है।
"वेग", यानी धक्का, उफान, जैसे नदी में बाढ़ का रेला। श्रीकृष्ण यह नहीं कह रहे कि कामना और क्रोध कभी उठेंगे ही नहीं। वे कहते हैं, जब उठें, तो उनका वेग सह लेना। आचार्य शंकर इस वेग के लक्षण तक लिखते हैं। कामना का वेग उठे तो रोंगटे खड़े होते हैं, आँखें और चेहरा खिल उठता है। क्रोध का वेग उठे तो शरीर काँपता है, पसीना आता है, होंठ दाँतों में दबते हैं, आँखें लाल होती हैं। यानी यह कोई छिपी हुई चीज़ नहीं। यह शरीर में दिखने वाला तूफ़ान है, और योगी वह है जो उस तूफ़ान के बीच भी पतवार नहीं छोड़ता।
और फिर वह बात, "प्राक्शरीरविमोक्षणात्", शरीर छूटने से पहले। शंकर और नीलकण्ठ दोनों इसका एक चौंकाने वाला अर्थ बताते हैं। वे कहते हैं, यह वेग मरने तक उठ सकता है, इसलिए किसी दिन यह भरोसा मत कर लेना कि मैंने काम और क्रोध को जीत लिया। शौनक भी वन पर्व में यही कहते हैं: मनुष्य बूढ़ा हो जाता है, पर तृष्णा बूढ़ी नहीं होती, वह प्राण जाने तक रहने वाला रोग है, और जो उसे छोड़ दे, उसे सुख मिलता है।
अब महाभारत में इस वेग का एक ऐसा दृश्य सुनिए, जिसमें एक ही रात में काम का वेग भी है और क्रोध का भी। वन पर्व। वनवास के बीच अर्जुन अस्त्र सीखने इन्द्र के लोक में गए हैं। एक दिन देवताओं की सभा में अप्सराएँ नाच रही थीं, और इन्द्र ने देखा कि अर्जुन की आँखें उर्वशी पर टिकी हैं। इन्द्र ने गन्धर्वराज चित्रसेन को उर्वशी के पास भेजा। उर्वशी स्वयं भी अर्जुन के गुणों पर मुग्ध थी। वह चाँदनी रात में सज-धजकर अर्जुन के भवन में पहुँची।
और अर्जुन ने क्या किया? महाभारत कहता है, उर्वशी को देखते ही अर्जुन ने लज्जा से आँखें झुका लीं, और उसे वैसे प्रणाम किया जैसे बड़ों को किया जाता है। जब उर्वशी ने अपने आने का कारण बताया, तो अर्जुन ने हाथों से कान ढक लिए और कहा, "यह बात मेरे लिए अनसुनी हो। मेरे लिए आप गुरुजनों की पत्नियों के समान हैं।" फिर उन्होंने बताया कि सभा में वे उसे एकटक इसलिए देख रहे थे कि उनके मन में आया, यही तो पुरु के वंश की माता हैं, हमारे कुल की जननी। और कहा: जैसे कुन्ती, माद्री और शची मेरे लिए हैं, वैसे ही आप।
अब देखिए, वेग ने अपना रूप बदला। जो कामना का वेग उर्वशी को लाया था, वह ठुकराए जाने पर क्रोध का वेग बन गया। महाभारत कहता है, वह क्रोध से बेसुध हो गई, काँपने लगी, भौंहें टेढ़ी हो गईं, और उसने अर्जुन को शाप दिया कि तुम स्त्रियों के बीच एक नर्तक बनकर, पुरुषत्व से रहित होकर रहोगे।
और सुबह जब इन्द्र को यह सब पता चला, तो उन्होंने अर्जुन को एकान्त में बुलाया, मुस्कराए, और कहा: "आज तुम्हारे जैसे पुत्र से पृथा सचमुच अच्छे पुत्र वाली हुई। धैर्य में तुमने ऋषियों को भी जीत लिया है।" और उन्होंने बताया कि यह शाप भी तुम्हारे काम आएगा। अज्ञातवास के तेरहवें वर्ष में तुम इसी शाप के सहारे छिपे रहोगे। आपको याद होगा, दसवें सत्संग में हमने अर्जुन को विराट की सभा में बृहन्नला के वेश में आते देखा था। वह वेश इसी रात से निकला था। और महाभारत इस अध्याय के आख़िर में ख़ुद कहता है: जो पाण्डुपुत्र के इस धैर्य की कथा सुनता है, उसकी कामना पाप भरे भोगों की ओर नहीं जाती।
तेईसवें श्लोक का "सोढुं", सहना, यही है। अर्जुन के सामने स्वर्ग की सबसे सुन्दर अप्सरा थी, और उसके पिता इन्द्र की अनुमति भी। सब कुछ अनुकूल था। फिर भी उन्होंने वेग को अपने ऊपर से गुज़र जाने दिया, उसमें बहे नहीं। हमारे सामने उर्वशी नहीं आती। पर किसी के कड़वे वाक्य पर तुरंत जवाब देने का वेग, किसी ग़ुस्से भरे संदेश को भेज देने का वेग, किसी लालच भरे सौदे में हाँ कहने का वेग, ये रोज़ आते हैं। उस पल में बस इतना कर लीजिए कि वेग को गुज़र जाने दीजिए। साँस लीजिए, एक घंटा रुकिए, सुबह तक रुकिए। अधिकतर वेग सुबह तक अपने आप उतर जाते हैं, और जो बचता है, वह सोचा-समझा होता है। श्रीकृष्ण कहते हैं, जो यह कर सकता है, "स युक्तः स सुखी नरः", वही योगी है, वही सुखी है।
पर अभी एक बात बाकी है। वेग को सह लेना एक बात है, पर सहने के बाद जो भीतर बचता है, वह क्या है? क्या भीतर सिर्फ़ एक ख़ाली जगह रह जाती है, जहाँ न सुख है न दुःख? अगला श्लोक कहता है, नहीं। वहाँ एक सुख है, एक रमना है, और एक रोशनी है।
योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः ।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥ २४ ॥
लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥ २५ ॥
चौबीसवाँ श्लोक। "योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः। स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति।"
जिसका सुख भीतर है, जो भीतर ही रमता है, और जिसकी रोशनी भीतर ही है, वह योगी ब्रह्मरूप होकर ब्रह्मनिर्वाण को पाता है।
तीन शब्द, और तीनों में "अन्तः", भीतर। अन्तःसुख, अन्तराराम, अन्तर्ज्योति। श्रीधर स्वामी इन्हें बाहर की चीज़ों के सामने रखकर समझाते हैं। जिसका सुख भीतर है, विषयों में नहीं। जिसकी क्रीड़ा, जिसका खेल भीतर है, बाहर नहीं। और जिसकी दृष्टि भीतर है, गाने-नाचने और तमाशों में नहीं। यानी जो चीज़ें हम बाहर ढूँढते हैं, ख़ुशी, मनोरंजन और देखने लायक कुछ, वे तीनों उसे भीतर मिल गई हैं।
मधुसूदन सरस्वती यहाँ फिर एक ईमानदार प्रश्न उठाते हैं। वे कहते हैं, मान लिया कि संन्यासी ने सब छोड़ दिया। पर जंगल में बैठे हुए भी कोयल की मीठी आवाज़ तो कान में आएगी, धीमी हवा तो छुएगी, चाँद तो उगेगा, मोर तो नाचेगा, गंगा का ठंडा पानी तो पिएगा, केतकी के फूल की गन्ध तो आएगी। तो उसका सुख भी बाहर से ही आया न? और उत्तर में वे तीसरे शब्द पर उँगली रखते हैं: "तथान्तर्ज्योतिरेव"। जैसे उसका सुख भीतर है, वैसे ही उसका जानना, उसकी रोशनी भी भीतर से है। कोयल बोलेगी, पर उसका सुख कोयल पर टिका नहीं है। कोयल चुप हो जाए, तब भी वह सुख वहीं रहता है।
श्रीकृष्ण यह नहीं कह रहे कि सुन्दर चीज़ों से आँखें फेर लो। वे कह रहे हैं कि अपना सुख उनसे उधार मत लो। जिसका सुख बाहर से उधार लिया हुआ है, उसे हर दिन वह उधार चुकाना पड़ता है, और जिस दिन बाहर कुछ अच्छा नहीं होता, वह कंगाल हो जाता है। और जिसका सुख भीतर से है, वह कोयल को भी सुनता है, चाँद को भी देखता है, पर उनके न होने पर भी कंगाल नहीं होता।
और फिर वह बड़ा शब्द, "ब्रह्मनिर्वाण"। निर्वाण सुनकर बहुत लोग डर जाते हैं, मानो बुझ जाना, कुछ न रहना। हमारी टीका यहाँ साफ़ कहती है: ब्रह्मनिर्वाण ब्रह्म में सारे भेद का शान्त हो जाना है, पूरी शान्ति, शून्यता नहीं। आचार्य शंकर इसका अर्थ "ब्रह्म में निर्वृति" लगाते हैं, यानी परम विश्राम, और कहते हैं, यह इसी जीवन में, जीते हुए मिलता है। जैसे लम्बी यात्रा के बाद घर पहुँचकर ली गई चैन की साँस। उसमें आदमी मिटता नहीं, पूरा होता है।
फिर पच्चीसवाँ श्लोक। "लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः। छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः।"
जिनके पाप नष्ट हो गए हैं, जिनके संशय कट गए हैं, जो संयमी हैं और सब प्राणियों के हित में लगे रहते हैं, वे ऋषि ब्रह्मनिर्वाण पाते हैं।
यहाँ चार लक्षण हैं, और मधुसूदन सरस्वती इन्हें एक सीढ़ी की तरह पढ़ते हैं। पहले अच्छे कर्मों से पाप क्षीण होते हैं। फिर मन शुद्ध होने से बारीक बात को समझने की शक्ति आती है। फिर सुनने और विचार करने से संशय कटते हैं। और फिर मन एक जगह टिकता है।
"छिन्नद्वैधाः", जिनका दुविधा वाला मन कट गया। आपको याद होगा, पन्द्रहवें सत्संग में हमने चौथे अध्याय का आख़िरी श्लोक सुना था, जहाँ श्रीकृष्ण ने कहा था कि हृदय में बैठे इस संशय को ज्ञान की तलवार से काटकर उठो। वही "काटना" यहाँ फिर आया है। तब वह आज्ञा थी, काटो। अब वह एक पहुँचे हुए आदमी का वर्णन है, जिसका संशय कट चुका।
पर इस श्लोक का आख़िरी लक्षण सबसे ज़्यादा ध्यान माँगता है: "सर्वभूतहिते रताः", जो सब प्राणियों के हित में रमे रहते हैं। सोचिए, अभी चौबीसवें श्लोक में कहा गया कि ज्ञानी भीतर ही रमता है। और यहीं, अगले ही श्लोक में, कहा जा रहा है कि वह सबके हित में रमता है। तो क्या यह उलटी बात नहीं? जो भीतर रमता है, वह बाहर सबके हित में कैसे लगेगा?
यही तो गीता की बड़ी बात है। जो सबमें एक ही आत्मा देख चुका, उसके लिए दूसरे का हित अपना ही हित है। उसके भीतर और बाहर के बीच दीवार नहीं बची। आचार्य शंकर इस शब्द का अर्थ देते हैं "अहिंसक", जो किसी को दुःख नहीं पहुँचाता। श्रीधर स्वामी कहते हैं "कृपालु", दया से भरे। और तिलक महाराज इसी शब्द को पकड़कर एक बड़ी बात कहते हैं: जो सब प्राणियों के हित में लगा है, वह कर्म छोड़कर बैठा हुआ आदमी नहीं हो सकता। इसलिए यह वर्णन, उनके अनुसार, कर्म करते हुए मुक्त हुए कर्मयोगी का है। यानी पिछले सत्संग वाला वही कमल का पत्ता, जो पानी में है, सबके बीच है, पर भीगता नहीं।
महाभारत में इसी भाव का एक छोटा-सा, पर बहुत गहरा वाक्य है, जो भगवान व्यास ने वन में बूढ़े धृतराष्ट्र से कहा था। युद्ध के बहुत बाद धृतराष्ट्र राज्य छोड़कर वन में तप कर रहे हैं। व्यास उनसे मिलने आते हैं, कुशल पूछते हैं, पुत्रों के शोक की बात पूछते हैं, और फिर कहते हैं: "हे भारत, सब प्राणियों में ये तीन बातें श्रेष्ठ हैं: वैर का न होना, सत्य, और क्रोध का न होना।"
ज़रा सोचिए, यह बात किससे कही जा रही है। उस आदमी से, जिसके मन के "मेरे वाले" और "उनके वाले" ने एक पूरी पीढ़ी को कुरुक्षेत्र में खड़ा कर दिया था। जीवन के आख़िरी पड़ाव में, सब कुछ खो देने के बाद, व्यास उसे वही सिखा रहे हैं जो सञ्जय ने उसे बहुत पहले गीता के इन श्लोकों में सुनाया था: किसी से वैर नहीं। "सर्वभूतहिते रताः" का सबसे पहला क़दम यही है। सबका भला करने से पहले, किसी का बुरा न चाहना।
आप इसे अपने घर में आज़माकर देखिए। जिस रिश्तेदार से बरसों से मन खट्टा है, उसका भला करने की बात तो दूर, बस इतना कीजिए कि उसके बारे में बुरा सोचना बंद कर दीजिए। उसकी कोई बुरी ख़बर आए, तो मन में जो छोटी-सी ख़ुशी उठती है, उसे पहचानिए और जाने दीजिए। यह छोटा काम लगता है। पर व्यास के तीन रत्नों में यही पहला है।
पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने अब तक ज्ञानी का वर्णन किया है, उसका सुख, उसकी नज़र, उसका सबके लिए हित। अब अध्याय के आख़िरी चार श्लोकों में वे पहली बार बताते हैं कि वहाँ पहुँचने वाला बैठता कैसे है, उसकी आँखें कहाँ टिकती हैं, उसकी साँस कैसी चलती है। एक छोटी-सी झलक, जिसे अगला पूरा अध्याय खोलेगा।
कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् ।
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम् ॥ २६ ॥
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः ।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥ २७ ॥
छब्बीसवाँ श्लोक। "कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्। अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्।"
जो काम और क्रोध से छूट गए हैं, जिनका चित्त वश में है और जिन्होंने आत्मा को जान लिया है, उन यतियों के लिए ब्रह्मनिर्वाण सब ओर से विद्यमान है।
"अभितः", सब ओर से। इस एक शब्द पर आचार्यों ने बहुत सुन्दर बातें कही हैं। आचार्य शंकर और श्रीधर स्वामी कहते हैं, इसका अर्थ है दोनों ओर से: जीते हुए भी और मरने के बाद भी। हमारी टीका भी यही कहती है। यानी ऐसे आदमी को शान्ति के लिए मृत्यु का इन्तज़ार नहीं करना पड़ता। वह इस ओर भी है, उस ओर भी। रामानुजाचार्य एक शब्द में कहते हैं, "हस्तस्थं", हाथ में रखा हुआ। और तिलक महाराज लिखते हैं, जैसे कोई चीज़ आसपास, सामने ही रखी हो, बैठे-बिठाए।
और मधुसूदन सरस्वती इस श्लोक को तेईसवें श्लोक से जोड़कर एक बारीक सीढ़ी दिखाते हैं। वहाँ कहा गया था कि काम और क्रोध उठें तो उनका वेग सह लो। यहाँ कहा जा रहा है, "कामक्रोधवियुक्त", उनसे छूटे हुए। पहले वेग आता है और आप उसे सहते हैं। फिर धीरे-धीरे वह आना ही कम हो जाता है। जैसे कोई पुरानी आदत, जिसे पहले रोज़ रोकना पड़ता था, और फिर एक दिन ध्यान आता है कि महीनों से उसका मन ही नहीं हुआ।
"यतीनाम्", यतियों के लिए। यति का सामान्य अर्थ संन्यासी है। पर रामानुजाचार्य इस शब्द को "यतनशील" पढ़ते हैं, यानी जो प्रयत्न में लगा है। यह मुझे बहुत भरोसा देने वाली बात लगती है। ब्रह्मनिर्वाण केवल उनके लिए नहीं जिन्होंने गेरुआ पहन लिया। वह उनके लिए भी हाथ के पास रखा है, जो रोज़ अपने मन से थोड़ा-थोड़ा जूझ रहे हैं।
और अब सत्ताईसवाँ श्लोक, जहाँ अध्याय अचानक एक नई दिशा लेता है। "स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः। प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ।"
बाहर के विषयों को बाहर ही छोड़कर, दृष्टि को भौंहों के बीच टिकाकर, नाक के भीतर चलने वाली प्राण और अपान, यानी भीतर आती और बाहर जाती साँस, को सम करके,
हमारी टीका बताती है कि यह श्लोक और अगला श्लोक मिलकर एक ही वाक्य हैं, और ये उस ध्यान की छोटी-सी रूपरेखा देते हैं जिसे अगला अध्याय विस्तार से सिखाएगा। मधुसूदन सरस्वती और नीलकण्ठ दोनों इसे और साफ़ कहते हैं: ये श्लोक सूत्र जैसे हैं, और पूरा छठा अध्याय इनकी व्याख्या होगा। इसलिए आज मैं आपको बैठने की विधि नहीं सिखाऊँगा। वह अगला अध्याय करेगा, श्रीकृष्ण के अपने शब्दों में। आज बस इन शब्दों का अर्थ समझ लेते हैं।
"स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्च", बाहर की चीज़ों को बाहर कर देना। आचार्य शंकर एक बहुत गहरी बात कहते हैं। वे कहते हैं, शब्द, रूप जैसे विषय कानों और आँखों के रास्ते भीतर, बुद्धि तक घुस आते हैं। और जो उनके बारे में सोचना छोड़ देता है, उसके लिए वे बाहर ही रह जाते हैं। आवाज़ आती रहे, पर मन उसके पीछे न चले, तो वह बाहर ही है।
"चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः", दृष्टि भौंहों के बीच। श्रीधर स्वामी इसका कारण बताते हैं, जो बहुत व्यावहारिक है। वे कहते हैं, आँखें पूरी बन्द करो तो मन नींद में डूबने लगता है, और पूरी खुली रखो तो वह बाहर भाग जाता है। इसलिए आधी बन्द आँखें, और दृष्टि भौंहों के बीच। और प्राण-अपान को सम करना, यानी भीतर जाती और बाहर आती साँस को बराबर, धीमा और शान्त करना। यहाँ भी आज इतना ही। कोई ज़ोर नहीं, कोई साँस रोकना नहीं। अगला अध्याय बताएगा कि कैसे बैठें, कहाँ बैठें, और कितना।
पर इस श्लोक का एक दृश्य महाभारत में है, जो मुझे हर बार रोक लेता है, और जिसमें यही टिकी हुई दृष्टि है। आश्रमवासिक पर्व। धृतराष्ट्र, गान्धारी और कुन्ती के साथ, वन में तप कर रहे हैं, और युधिष्ठिर अपने भाइयों के साथ उनसे मिलने आश्रम में पहुँचे हैं। युधिष्ठिर कुशल पूछते हैं, और फिर पूछते हैं, विदुर कहाँ हैं, वे दिखाई नहीं दे रहे? धृतराष्ट्र बताते हैं कि विदुर कठोर तप में लगे हैं, हवा पर रहते हैं, बिना भोजन के, इतने दुबले कि नसें उभर आई हैं, और इस सूने वन में कभी-कभी किसी को दिख जाते हैं।
और ठीक तभी दूर एक आकृति दिखती है। जटाएँ, दुबला शरीर, धूल से भरे अंग। लोग कहते हैं, यही धर्मात्मा विदुर हैं। विदुर लोगों को देखकर लौट जाते हैं, और युधिष्ठिर अकेले उनके पीछे दौड़ते हैं, पुकारते हुए, "मैं आपका प्यारा युधिष्ठिर हूँ!" घने वन के एक सूने कोने में विदुर एक पेड़ का सहारा लेकर खड़े हो जाते हैं।
और फिर महाभारत लिखता है: विदुर ने बिना पलक झपकाए राजा को देखा, अपनी दृष्टि को उनकी दृष्टि से जोड़कर, एकाग्र होकर। और योग के बल से विदुर ने युधिष्ठिर में प्रवेश किया, अंगों को अंगों में, प्राणों को प्राणों में, और इन्द्रियों को इन्द्रियों में रखते हुए, मानो तेज से दमकते हुए। और युधिष्ठिर ने देखा कि विदुर का शरीर पेड़ के सहारे वैसे ही खड़ा है, आँखें स्थिर, पर प्राण उसमें नहीं हैं।
युधिष्ठिर उस शरीर का दाह करना चाहते थे, तब एक वाणी हुई: इस शरीर को जलाना नहीं है, इसे यहीं छोड़ देना तुम्हारा सनातन धर्म है। यह यति-धर्म पा चुका है, यह शोक करने योग्य नहीं। "यतिधर्म"। आपने अभी छब्बीसवें श्लोक में "यतीनाम्" सुना। काम और क्रोध से छूटे हुए, चित्त को वश में किए हुए। विदुर का पूरा जीवन, धृतराष्ट्र को बार-बार सच्ची और कड़वी सलाह देने का, जैसा हमने सातवें और नवें सत्संग में उस जागती रात में सुना था, उसी यति का जीवन था।
और अगले दिन व्यास ने धृतराष्ट्र को इसका रहस्य बताया। वे कहते हैं, विदुर स्वयं धर्म थे, जो माण्डव्य ऋषि के शाप से मनुष्य बनकर जन्मे। और फिर एक वाक्य: "जो धर्म है वही विदुर है, और जो विदुर है वही पाण्डव है।" यानी जो एक तत्त्व विदुर में था, वही युधिष्ठिर में था। दो शरीर, एक धर्म। विदुर का युधिष्ठिर में समा जाना उसी एक का अपने में लौट आना था। और इसी अध्याय में व्यास यह भी कहते हैं कि वह धर्म चर और अचर सबमें व्याप्त है। अठारहवाँ श्लोक याद कीजिए: ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ता, चाण्डाल, सबमें एक।
मैं यह कथा आपसे इसलिए नहीं कह रहा कि आप भी पेड़ के सहारे खड़े होकर यह सब करने लगें। वह विदुर का अपना तप था, बरसों का। मैं यह इसलिए कह रहा हूँ कि सत्ताईसवें श्लोक की वह टिकी हुई दृष्टि कोई जादू नहीं है। वह एक ऐसे मन का बाहरी रूप है, जिसने जीवन भर बाहर की चीज़ों को बाहर रखा। विदुर की आँखें उस दिन स्थिर हुईं, क्योंकि उनका मन बरसों पहले स्थिर हो चुका था।
पर अभी एक बात बाकी है। सत्ताईसवाँ श्लोक एक अधूरा वाक्य है। वह कहता है, बाहर को बाहर करके, दृष्टि टिकाकर, साँस सम करके, और फिर रुक जाता है। वह वाक्य अगले श्लोक में पूरा होता है, और उसके बाद आता है पाँचवें अध्याय का आख़िरी श्लोक, जिसमें भगवान अपना परिचय देते हैं, एक ऐसे शब्द से, जो हम अपने सबसे सच्चे मित्र के लिए बोलते हैं।
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः ।
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥ २८ ॥
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥ २९ ॥
अट्ठाईसवाँ श्लोक, जो पिछले श्लोक का वाक्य पूरा करता है। "यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः। विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः।"
जिसने इन्द्रियों, मन और बुद्धि को वश में कर लिया है, जो मोक्ष में तत्पर है और इच्छा, भय और क्रोध से रहित है, वह मुनि सदा मुक्त ही है।
इस श्लोक में एक छोटा-सा बदलाव है, जिसे आप शायद पहली बार में न पकड़ें। तेईसवें और छब्बीसवें श्लोक में दो ही चीज़ों की बात थी, काम और क्रोध। यहाँ तीन हैं: इच्छा, भय और क्रोध। भय पहली बार आया है। और यह बहुत सच्ची बात है। जो चाहता है, वह डरता भी है, कि कहीं न मिले, कहीं छिन न जाए। और जो डरता है, वह जल्दी क्रोध करता है। ये तीनों एक ही परिवार के हैं।
और श्लोक का अन्त, "सदा मुक्त एव सः", वह सदा मुक्त ही है। रामानुजाचार्य यहाँ एक बहुत ढाढ़स देने वाली बात कहते हैं। वे कहते हैं, ऐसा साधक जैसे मंज़िल पर मुक्त है, वैसे ही रास्ते में भी मुक्त ही है। यानी मुक्ति कोई ऐसी चीज़ नहीं जो आख़िरी दिन किसी दरवाज़े पर मिलेगी। जिस दिन आप सच्चे मन से इस रास्ते पर चलने लगे, उसी दिन से उसकी हवा आपको छूने लगती है।
और अब पाँचवें अध्याय का आख़िरी श्लोक। "भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्। सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति।"
मुझे सब यज्ञों और तपों का भोगने वाला, सब लोकों का महान ईश्वर, और सब प्राणियों का सुहृद् जानकर मनुष्य शान्ति पाता है।
भगवान यहाँ अपने तीन परिचय देते हैं। पहला, "भोक्तारं यज्ञतपसां", हर यज्ञ और हर तप का भोगने वाला। यानी आप जो भी अर्पित करते हैं, कोई पूजा, कोई कठिन व्रत, कोई चुपचाप किया हुआ त्याग, वह कहीं खो नहीं जाता, वह उन्हीं तक पहुँचता है। दूसरा, "सर्वलोकमहेश्वरम्", सब लोकों के बड़े स्वामी, जिनके हाथ में सब कुछ है।
और तीसरा, और यही इस श्लोक का दिल है, "सुहृदं सर्वभूतानां", सब प्राणियों के सुहृद्। हमारी टीका कहती है: सुहृद् वह मित्र है जो बदले की आशा के बिना भला करता है। और आचार्य शंकर भी यही अर्थ देते हैं, जो बदले में उपकार की अपेक्षा किए बिना उपकार करे। और टीका आगे कहती है: भगवान को ऐसा सुहृद् जानने से भय मिट जाता है, और भय मिटने पर शान्ति आती है। अभी अट्ठाईसवें श्लोक में भय पहली बार आया था। और अगले ही श्लोक में उसकी दवा आ गई।
और ध्यान दीजिए, "सर्वभूतानां"। सब प्राणियों के। केवल भक्तों के नहीं, केवल अच्छे लोगों के नहीं। अठारहवें श्लोक में ज्ञानी की नज़र ब्राह्मण से चाण्डाल तक और गाय से कुत्ते तक एक थी। यहाँ भगवान बताते हैं कि उस नज़र का स्रोत कौन है। जो सबका मित्र है, वही सबमें है।
अब महाभारत का वह दृश्य, जिसमें यह श्लोक मुझे सबसे साफ़ दिखाई देता है। मौसल पर्व। बहुत बरसों बाद, जब यादवों का आपसी संहार हो चुका, और बलराम योग में शरीर छोड़ चुके, तब श्रीकृष्ण अकेले सूने वन में घूमते हैं, फिर धरती पर बैठ जाते हैं। महाभारत कहता है, उन्होंने इन्द्रियों, वाणी और मन को रोका, और महायोग में प्रवेश करके लेट गए। सुनिए, ये वही शब्द हैं जो हमने अभी अट्ठाईसवें श्लोक में सुने, इन्द्रिय और मन वश में।
तभी जरा नाम का एक शिकारी, हिरन की तलाश में, उस जगह आया। उसने योग में लेटे केशव के तलवे को हिरन समझकर बाण से बींध दिया, और अपना शिकार उठाने दौड़ा। और वहाँ उसने देखा, योग में लीन, पीले वस्त्र वाले, अनेक भुजाओं वाले एक पुरुष को। ख़ुद को अपराधी मानकर, डरे हुए मन से, उसने उनके पैर पकड़ लिए।
अब महाभारत का अगला वाक्य ध्यान से सुनिए। वह कहता है, "आश्वासितः", उसे ढाढ़स मिला। अपने पुण्य के फल से, भक्ति से, और अपने कर्म और जन्म पर पछतावे से उसे ढाढ़स मिला, और अनन्त पराक्रम वाले उस देव के दर्शन करके उसने शरीर छोड़ा, और देवता उसे स्वर्ग ले गए। लोग कहते हैं कि श्रीकृष्ण ने स्वयं उसे ढाढ़स दिया था। हमारे पाठ में इतना ही है कि उसे ढाढ़स मिला। पर सोचिए, किसके पैर पकड़े हुए उसे ढाढ़स मिला? उसी के, जिसके पैर में उसका बाण लगा था।
जिस आदमी ने भगवान के शरीर पर बाण चलाया, वह भय में काँपता हुआ उनके पैरों पर गिरा, और उसकी कहानी नरक पर नहीं, स्वर्ग पर ख़त्म हुई। "सुहृदं सर्वभूतानां" का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा। भगवान का सुहृद्-पन यह नहीं देखता कि सामने वाले ने क्या किया। वह यह देखता है कि सामने वाला अब किस ओर मुड़ा है।
और अब, जैसे अर्जुन के लिए, वैसे हमारे लिए भी, पाँचवाँ अध्याय यहीं पूरा होता है। सत्ताईसवें और अट्ठाईसवें श्लोक में जो ध्यान की छोटी-सी झलक आई, वह अधूरी छोड़ी गई है, जान-बूझकर। संत ज्ञानेश्वर इस अध्याय के अन्त में एक प्यारा दृश्य रचते हैं। वे कहते हैं, जब श्रीकृष्ण ने योग का यह संकेत दिया, तो अर्जुन चकित रह गए। श्रीकृष्ण ने यह देखकर मुस्कराते हुए पूछा, क्या इन बातों से तुम्हारा मन ऊब गया? और अर्जुन बोले, आपने तो मेरे मन की बात पहले ही जान ली, जो मैं पूछना चाहता था। यह रास्ता मुझे अच्छा लगा है, बस एक बार इसे विस्तार से, शुरू से अन्त तक, फिर समझाइए। और श्रीकृष्ण कहते हैं, ठीक है, सुनो।
वही विस्तार छठा अध्याय है, भीष्म पर्व का तीसवाँ अध्याय, आत्मसंयम योग। और वह अध्याय शुरू होता है एक ऐसी बात से, जो पाँचवें अध्याय के पूरे सवाल को एक बार फिर छूती है: असली संन्यासी कौन है, और असली योगी कौन? और उसी अध्याय में आगे वह बात आएगी जो आज के आख़िरी श्लोक का जोड़ा है। आज भगवान ने कहा कि मैं सबका मित्र हूँ। अगली बार वे बताएँगे कि आप अपने ही मित्र कैसे बनें।
तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।
पहली बात। सबमें एक नज़र का अर्थ सबसे एक-सा व्यवहार नहीं है। गाय को चारा, विद्वान को आसन, यह व्यवहार अलग ही रहेगा। पर भीतर का तराज़ू सीधा रहे। युधिष्ठिर ने इन्द्र के रथ के सामने कुत्ते को नहीं छोड़ा। इस हफ़्ते देखिए कि आपकी ज़िंदगी में वह कौन है, जिसे आप किसी बड़े रथ के लिए पीछे छोड़ने वाले थे।
दूसरी बात। बाहर का सुख दुःख की कोख है, क्योंकि उसका आदि भी है और अन्त भी: पाने की बेचैनी, खोने का डर, और जाने के बाद की लालसा। इसका अर्थ यह नहीं कि सुन्दर चीज़ों से भागिए। इसका अर्थ है, अपना सुख उनसे उधार मत लीजिए। मङ्कि की तरह, अपनी किसी एक कामना की जड़ पहचानिए: वह संकल्प से जन्मती है।
तीसरी बात। वेग आएगा, शरीर छूटने तक आएगा। उसे सहना ही योग है। किसी कड़वे जवाब, किसी ग़ुस्से भरे संदेश से पहले, अर्जुन की तरह, उसे अपने ऊपर से गुज़र जाने दीजिए। और जब डर लगे, तो आख़िरी श्लोक याद कीजिए। जो सबका सुहृद् है, जिसके पैर में बाण लगा और फिर भी बाण चलाने वाला स्वर्ग गया, वह आपका भी मित्र है।
आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आपके जीवन में वह कौन-सा सुख है, जिसके बिना आपको लगता है कि आप ख़ुश नहीं रह सकते? और क्या कभी कोई ऐसा दिन आया, जब वह नहीं था, और फिर भी मन शान्त था? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्री कृष्ण।
जो नज़र ब्राह्मण में और कुत्ते में एक को देख लेती है, वह अपने भीतर भी उसी एक को देख लेती है। और वहीं वह सुख है, जो कभी ख़त्म नहीं होता।
जय श्री कृष्ण।
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥ १८ ॥
तीन बातें
- सबमें एक नज़र का अर्थ सबसे एक-सा व्यवहार नहीं है। गाय को चारा, विद्वान को आसन, यह व्यवहार अलग ही रहेगा। पर भीतर का तराज़ू सीधा रहे। युधिष्ठिर ने इन्द्र के रथ के सामने कुत्ते को नहीं छोड़ा। इस हफ़्ते देखिए कि आपकी ज़िंदगी में वह कौन है, जिसे आप किसी बड़े रथ के लिए पीछे छोड़ने वाले थे।
- बाहर का सुख दुःख की कोख है, क्योंकि उसका आदि भी है और अन्त भी: पाने की बेचैनी, खोने का डर, और जाने के बाद की लालसा। इसका अर्थ यह नहीं कि सुन्दर चीज़ों से भागिए। इसका अर्थ है, अपना सुख उनसे उधार मत लीजिए। मङ्कि की तरह, अपनी किसी एक कामना की जड़ पहचानिए: वह संकल्प से जन्मती है।
- वेग आएगा, शरीर छूटने तक आएगा। उसे सहना ही योग है। किसी कड़वे जवाब, किसी ग़ुस्से भरे संदेश से पहले, अर्जुन की तरह, उसे अपने ऊपर से गुज़र जाने दीजिए। और जब डर लगे, तो आख़िरी श्लोक याद कीजिए। जो सबका सुहृद् है, जिसके पैर में बाण लगा और फिर भी बाण चलाने वाला स्वर्ग गया, वह आपका भी मित्र है।