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सत्संग १६

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घर छोड़ें या घर में रहकर?

गीता 5.1–5.15 · 79 मिनट

गृहस्थ रहते हुए मुक्ति; कमल के पत्ते जैसा जीना

अर्जुन उवाच संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि । यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥ १ ॥
गीता 5.1 — अर्थ पढ़ें ›
श्रीभगवानुवाच संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ । तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥ २ ॥
गीता 5.2 — अर्थ पढ़ें ›
ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति । निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥ ३ ॥
गीता 5.3 — अर्थ पढ़ें ›

कभी-कभी, किसी बहुत थके हुए दिन के बाद, मन में एक आवाज़ उठती है: सब छोड़ दूँ। यह घर, यह भागदौड़, यह रोज़ का हिसाब-किताब, सब छोड़कर कहीं चला जाऊँ, किसी आश्रम में, किसी पहाड़ पर, जहाँ बस मैं रहूँ और भगवान। और ठीक उसी समय दूसरी आवाज़ आती है: फिर माँ की दवाई कौन लाएगा? बच्चों की फ़ीस कौन भरेगा? जो लोग मुझ पर टिके हैं, उनका क्या होगा? और इन दोनों आवाज़ों के बीच एक तीसरा, चुपचाप बैठा हुआ सवाल रहता है, जो शायद आपने कभी किसी से पूछा नहीं: क्या घर में रहकर भी भगवान मिल सकते हैं? या उसके लिए सब छोड़ना ही पड़ता है?

आज का सत्संग इसी सवाल पर है। घर छोड़ें, या घर में रहकर?

जय श्री कृष्ण।

आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का सोलहवाँ सत्संग है, और आज हम पाँचवें अध्याय में प्रवेश कर रहे हैं। पिछले सत्संग में चौथा अध्याय पूरा हुआ था। श्रीकृष्ण ने कहा था कि गुरु के पास प्रणाम से, प्रश्न से और सेवा से जाकर ज्ञान मिलता है, कि सबसे बड़ा पापी भी ज्ञान की नाव से पार उतर जाता है, और ज्ञान की आग सारे कर्मों को राख कर देती है। और आख़िरी श्लोक में उन्होंने अर्जुन से कहा था कि हृदय में बैठे संशय को ज्ञान की तलवार से काटो, योग में स्थित हो जाओ, और उठो। और जाते-जाते हमने पाँचवें अध्याय का पहला श्लोक सुन लिया था, जिसमें अर्जुन फिर एक प्रश्न लेकर खड़े हैं। आज उसी प्रश्न से शुरुआत है।

महाभारत के भीष्म पर्व में अध्याय पच्चीस से बयालीस तक गीता है, और उसका उनतीसवाँ अध्याय यही, गीता का पाँचवाँ अध्याय है, जिसका नाम हमारे पाठ में है "कर्मसंन्यास योग"। और याद रखिए कि यह सब कौन, किसे सुना रहा है। भीष्म बाणों की शय्या पर गिर चुके हैं, और सञ्जय एक अंधे राजा को, जिसके सौ बेटे रणभूमि में खड़े हैं, सुना रहे हैं कि घर, कर्म और त्याग के बारे में श्रीकृष्ण क्या कहते हैं। यह बात आज के सत्संग के आख़िर में हमें बहुत काम आएगी।

अब पहला श्लोक। अर्जुन बोलते हैं: "संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि।" हे कृष्ण, आप कर्मों के संन्यास की प्रशंसा करते हैं, और फिर योग की, यानी कर्म करने की भी। "यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्।" इन दोनों में जो एक श्रेष्ठ हो, वह मुझे पक्का करके बताइए।

अर्जुन का मन समझिए। हमारी टीका कहती है कि पिछले अध्याय में अर्जुन ने दो बातें सुनी थीं। एक तरफ़ वह ज्ञान, जिसमें सारे कर्म समाप्त हो जाते हैं, जल जाते हैं। और दूसरी तरफ़ अध्याय के अन्त में यह आज्ञा, कि योग में स्थित होकर उठो और युद्ध करो। अब अर्जुन को लगता है कि दोनों बातें आपस में टकरा रही हैं। श्रीधर स्वामी ठीक यही लिखते हैं: अर्जुन को आगे और पीछे की बातों में विरोध दिखा। कर्म छोड़ना और कर्म करना, दोनों एक ही आदमी एक ही समय में कैसे करे? शंकराचार्य भी यही कहते हैं कि एक ही पुरुष दोनों का पालन साथ नहीं कर सकता, इसलिए अर्जुन एक, निश्चित बात चाहते हैं।

और नीलकण्ठ "पुनर्योगं" में छिपे एक छोटे-से शब्द पर रुकते हैं, जिसका अर्थ है "फिर"। वे कहते हैं कि इससे पता चलता है कि ये दोनों रास्ते शास्त्र में पहले से हैं: एक ओर वे, जो संसार को सारहीन देखकर सब छोड़कर निकल पड़ते हैं, और दूसरी ओर वे, जो वेद के पाठ से, यज्ञ, दान और तप से उसी सत्य को जानना चाहते हैं। यानी अर्जुन की उलझन बहुत पुरानी है, और मधुसूदन सरस्वती कहते हैं कि वे यहाँ हर उस साधक की ओर से पूछ रहे हैं, जो अभी रास्ते पर है।

और आख़िरी शब्द, "सुनिश्चितम्", पक्का करके। जब आदमी बहुत उलझ जाता है, तो यही कहता है: मुझे बस एक बात साफ़-साफ़ बता दो, मैं वही करूँगा।

इससे पहले कि उत्तर सुनें, एक बात। यह प्रश्न सिर्फ़ रथ पर नहीं पूछा गया। अर्जुन के बड़े भाई ने यही प्रश्न युद्ध के बाद अपने जीवन से पूछा था। आपको याद होगा, ग्यारहवें सत्संग में हमने सुना था कि युद्ध जीतकर युधिष्ठिर कहते हैं, अगर हम वृष्णि और अन्धकों के नगर में भिक्षा माँगकर जी लेते, तो अपने ही बन्धुओं को मारकर इस दशा में न पहुँचते। वे राज्य छोड़कर वन जाना चाहते थे। तब अर्जुन ने उन्हें जनक की रानी की बात सुनाई थी, कि आपकी प्रतिज्ञा कुछ और है और आचरण कुछ और। और व्यास ने कहा था कि शास्त्र में गृहस्थ आश्रम को सबसे ऊँचा धर्म माना गया है, और साथ में यह भी, कि चारों आश्रमों में इसे निभाना कठिन है। यानी अर्जुन रथ पर जो पूछ रहे हैं, उनका घर बरसों बाद उसी प्रश्न से गुज़रेगा। और आज के सत्संग का पूरा सवाल भी यही है।

अब श्रीकृष्ण का उत्तर। दूसरा श्लोक। "संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ।" संन्यास और कर्मयोग, दोनों परम कल्याण करने वाले हैं। "तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते।" परन्तु उन दोनों में कर्मसंन्यास से कर्मयोग श्रेष्ठ है।

देखिए, उत्तर के दो हिस्से हैं। पहला हिस्सा किसी को छोटा नहीं करता। जो सब छोड़कर संन्यास लेता है, वह भी कल्याण की ओर जा रहा है, और जो कर्म करते हुए योग में रहता है, वह भी। "निःश्रेयसकरावुभौ", दोनों कल्याण करने वाले। श्रीकृष्ण संन्यासियों की निन्दा नहीं कर रहे। पर फिर एक "तु" आता है, "परन्तु"। और उसके बाद वह शब्द, "विशिष्यते", यानी कर्मयोग विशेष है, बढ़कर है।

किसके लिए बढ़कर है? हमारी टीका इसका उत्तर बहुत साफ़ देती है: उसके लिए, जो अभी पूरे ज्ञान में स्थित नहीं है। और फिर एक वाक्य, जो मैं चाहता हूँ आप घर ले जाएँ: भीतर की शुद्धि के बिना बाहरी कर्म छोड़ने से काम तो छूटता है, आसक्ति बनी रहती है। मधुसूदन सरस्वती और नीलकण्ठ दोनों यही कहते हैं, अपने-अपने शब्दों में। वे कहते हैं कि जो संन्यास अभी तैयार न हुए आदमी ने लिया, जिसके भीतर वैराग्य पका ही नहीं, उस संन्यास से कर्मयोग श्रेष्ठ है। क्योंकि कर्मयोग चित्त को शुद्ध करता है, और शुद्ध चित्त में ही सच्चा वैराग्य पैदा होता है।

यहाँ ईमानदारी से बता दूँ कि आचार्य इस श्लोक को एक ही तरह नहीं पढ़ते। शंकराचार्य की दृष्टि में यह प्रशंसा उस कोरे संन्यास के मुक़ाबले है, जिसके साथ ज्ञान नहीं। पर लोकमान्य तिलक गीता-रहस्य में लिखते हैं कि अगर भगवान का मत यह होता कि ज्ञान के बाद कर्म की ज़रूरत नहीं, तो वे सीधे कह देते कि संन्यास श्रेष्ठ है। उन्होंने "तु" लगाकर कर्मयोग को श्रेष्ठ कहा, इसलिए ज्ञानी भी संसार की भलाई के लिए जीवन भर निष्काम कर्म करता रहे। तिलक ख़ुद मानते हैं कि बहुत-से टीकाकार इससे सहमत नहीं। पर दोनों दृष्टियाँ एक बात पर एक हैं: हम जैसे लोगों के लिए, जो अभी रास्ते में हैं, कर्म छोड़कर भागना उत्तर नहीं है।

और संत ज्ञानेश्वर इसी जगह एक बहुत सुंदर चित्र देते हैं। वे कहते हैं कि संन्यास और योग दोनों मोक्ष देने वाले हैं, पर कर्मयोग ऐसा सरल है जैसे नदी पार करने के लिए नाव, जिस पर बैठकर जानने वाले भी पार हो जाते हैं और न जानने वाले भी, बच्चे भी। तैरकर पार जाना हर किसी के बस का नहीं। नाव में बैठना हर कोई कर सकता है।

पर सवाल यह है कि वह कर्मयोगी, जो घर में है, दुकान में है, दफ़्तर में है, उसे संन्यासी कहा जा सकता है या नहीं? तीसरा श्लोक इसी का उत्तर है, और यह इस अध्याय के सबसे प्यारे श्लोकों में से है।

"ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति।" जो न द्वेष करता है, न आकांक्षा करता है, उसे सदा का संन्यासी जानो। "निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते।" क्योंकि हे महाबाहो, जो द्वन्द्वों से रहित है, वह सुख से, आसानी से, बन्धन से छूट जाता है।

शब्द देखिए। "नित्यसंन्यासी"। कभी-कभार का नहीं, किसी ख़ास दिन का नहीं, सदा का संन्यासी। और उसकी पहचान कपड़ों से नहीं, दो बातों से है: "न द्वेष्टि", वह किसी से जलता नहीं, किसी चीज़ से चिढ़ता नहीं; और "न काङ्क्षति", वह किसी चीज़ के लिए तरसता नहीं। शंकराचार्य लिखते हैं कि ऐसा आदमी कर्म में लगा रहते हुए भी नित्यसंन्यासी है। और हमारी टीका एक पंक्ति में कहती है: संन्यास मन की अवस्था है, वेश का बदलना नहीं।

संत ज्ञानेश्वर यहाँ एक ऐसी बात कहते हैं जो सीधे आज के सवाल का उत्तर है। वे कहते हैं कि जिसके मन से "मैं" और "मेरा" की याद मिट गई, वही सदा का संन्यासी है। और ऐसे आदमी को घर और बाकी सब कुछ छोड़ने की कोई ज़रूरत नहीं। फिर वे एक उपमा देते हैं: जब आग बुझ जाती है और केवल राख बचती है, तो उस राख में आप रूई लपेट सकते हैं, वह नहीं जलती। वैसे ही, जिसकी बुद्धि में संकल्पों की आग बुझ चुकी है, वह सारी उपाधियों के बीच, घर-गृहस्थी के बीच रहकर भी कर्म के बन्धन में नहीं आता।

और "सुखं", शंकराचार्य के अनुसार बिना परिश्रम के, आसानी से। पर नीलकण्ठ एक ईमानदार सावधानी जोड़ते हैं, कि मन के स्वभाव से संन्यासी के भीतर भी कभी राग उठ सकता है, और उसके गिरने का डर रहता है। यानी वेश बदलने से कोई सुरक्षित नहीं हो जाता।

अब महाभारत का एक ऐसा आदमी, जिसे देखकर यह श्लोक आँखों के सामने खड़ा हो जाता है। वन पर्व में, वनवास के ग्यारहवें साल, जब युधिष्ठिर दुःख से सो नहीं पाते, भगवान व्यास उनसे मिलने आते हैं, दान की महिमा बताते हैं, और एक गृहस्थ की कथा सुनाते हैं, जिसका नाम था मुद्गल।

व्यास कहते हैं: राजन्, कुरुक्षेत्र में मुद्गल नाम का एक धर्मात्मा रहता था। जी हाँ, वही कुरुक्षेत्र। वह खेतों में कटाई के बाद गिरे हुए दाने बीनकर जीता था। इन्द्रियों को वश में रखने वाला, सच बोलने वाला, अतिथि-सेवा का व्रत लिए हुए। और वह अकेला नहीं था। अपनी पत्नी और बेटे के साथ, वह पंद्रह दिन में एक ही बार खाता था। पंद्रह दिन दाने बीनकर जितना धान जुटता, उससे पहले पर्व का यज्ञ होता, फिर अतिथियों को भोजन, और जो बचता, उसी से परिवार का पेट भरता। और पाठ कहता है कि वह ईर्ष्या से रहित होकर, प्रेम से देता था, और शुद्ध मन से दिए उस अन्न में ऐसी बरकत थी कि अतिथि को देखते ही वह बढ़ जाता था।

फिर एक दिन दुर्वासा मुनि आए। उन्होंने इस धर्मात्मा के दृढ़ व्रत के बारे में सुना था, और उसके द्वार पर आ पहुँचे। सिर मुँड़ा हुआ, बिना वस्त्र, पागलों जैसा रूप, और मुँह से कठोर बातें। आकर बोले, "मैं भोजन माँगने आया हूँ।" मुद्गल ने कहा, "आपका स्वागत है", पैर धोने को जल दिया, आचमन का जल दिया, और पंद्रह दिन का कमाया हुआ भोजन श्रद्धा से उनके सामने रख दिया। दुर्वासा सारा खा गए। फिर बचे हुए जूठे भोजन को अपने शरीर पर मल लिया, और हँसते, गाते, नाचते, चिल्लाते, जैसे आए थे वैसे भाग गए।

मुद्गल, उनकी पत्नी और उनका बेटा भूखे रह गए। और अगले पंद्रह दिन वे फिर दाने बीनते रहे। अगला पर्व आया, और दुर्वासा फिर आए, और फिर सारा भोजन खा गए। ऐसा छह बार हुआ। छह बार, यानी लगभग तीन महीने, एक परिवार ने अपना सारा अन्न एक ऐसे अतिथि को दे दिया, जो खाकर हँसता हुआ भाग जाता था।

और अब पाठ की वह पंक्ति सुनिए, जिसके लिए मैंने यह कथा चुनी। पत्नी और बेटे के साथ दाने बीनते उस ब्राह्मण के मन में न क्रोध आया, न ईर्ष्या, न अपमान का भाव, न घबराहट। और आगे लिखा है कि दुर्वासा ने देखा, इस मुनि के मन में कोई बदलाव दिखाई ही नहीं देता।

अब इसे तीसरे श्लोक के पास रखिए। "यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति।" मुद्गल ने घर नहीं छोड़ा था। पत्नी थी, बेटा था, अतिथि थे, यज्ञ था, गृहस्थी की पूरी ज़िम्मेदारी। और फिर भी वह नित्यसंन्यासी था। तब दुर्वासा प्रसन्न होकर बोले, "इस लोक में तुम्हारे जैसा ईर्ष्या से रहित दाता कोई नहीं।" और यह भी कहा कि भूख धर्म की समझ को भगा देती है और धीरज भी छीन लेती है। सोचिए, दफ़्तर से लौटकर खाना देर से आए, तो कितनी जल्दी आवाज़ ऊँची हो जाती है। यहाँ छह पर्वों की भूख थी, और आवाज़ नहीं बदली।

और कथा यहाँ ख़त्म नहीं होती। दुर्वासा अभी बोल ही रहे थे कि आकाश से देवताओं का एक दूत विमान लेकर उतरा, हंसों और सारसों से जुता हुआ, घंटियों से सजा, दिव्य सुगन्ध वाला। और उसने मुद्गल से कहा, "हे मुनि, अपने कर्मों से जीते इस विमान पर चढ़ो, तुम्हें सबसे ऊँची सिद्धि मिल गई है।" आप सोचेंगे कि कहानी का सुखद अन्त यही है, कि मुद्गल विमान में बैठकर स्वर्ग चले गए। पर मुद्गल ने जो किया, वह इस अध्याय के एक दूसरे श्लोक का उत्तर है, और उसे मैं आपको वहीं सुनाऊँगा, जब हम उस श्लोक तक पहुँचेंगे।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि संन्यास और कर्मयोग दोनों कल्याण करते हैं, और फिर कहा कि कर्मयोग बढ़कर है। तो प्रश्न उठता है: अगर दोनों एक ही जगह पहुँचाते हैं, तो फ़र्क़ क्या है? और अगर फ़र्क़ है, तो दोनों एक कैसे? अगले दो श्लोकों में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो इन्हें अलग देखता है, वह बालक है, और जो एक देखता है, वही असल में देखता है।

साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः । एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ॥ ४ ॥
गीता 5.4 — अर्थ पढ़ें ›
यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते । एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥ ५ ॥
गीता 5.5 — अर्थ पढ़ें ›
संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः । योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ॥ ६ ॥
गीता 5.6 — अर्थ पढ़ें ›

चौथा श्लोक। "साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः।" सांख्य और योग को बालक अलग-अलग बताते हैं, पण्डित नहीं। "एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्।" जो इनमें से एक में भी ठीक से टिक जाता है, वह दोनों का फल पा लेता है।

पहले यह समझ लें कि यहाँ "सांख्य" और "योग" से क्या मतलब है, क्योंकि ये शब्द आगे दर्शनों के नाम भी बन गए। हमारी टीका कहती है कि यहाँ सांख्य का अर्थ है संन्यास के साथ ज्ञान का मार्ग, और योग का अर्थ है आसक्ति के बिना कर्म का मार्ग। और शंकराचार्य एक सूक्ष्म बात पकड़ते हैं। अर्जुन ने पूछा था संन्यास और कर्मयोग के बारे में। पर श्रीकृष्ण उत्तर में शब्द बदल देते हैं, "सांख्य" और "योग" कहते हैं। क्यों? शंकर कहते हैं, क्योंकि भगवान अर्जुन के प्रश्न में अपनी बात जोड़ रहे हैं: वह संन्यास, जिसके साथ ज्ञान है, और वह कर्म, जिसके साथ समबुद्धि है। सूखा त्याग नहीं, सूखा काम नहीं।

और "बालाः" शब्द को उम्र से मत जोड़िए। मधुसूदन सरस्वती इसका अर्थ करते हैं, वे लोग जिनके पास शास्त्र के अर्थ की समझ और विवेक नहीं है। जो बाहर का रूप देखते हैं, कि एक गेरुआ पहने बैठा है और एक दफ़्तर का थैला लिए, और कह देते हैं कि ये दो अलग रास्ते, दो अलग मंज़िलें। संत ज्ञानेश्वर इस पर पूछते हैं: क्या दीपक और उसका प्रकाश दो अलग चीज़ें हैं? अज्ञान के कारण लोग इन्हें भिन्न कहते हैं। पर जिन्होंने अनुभव से तत्त्व देख लिया, वे दोनों को एक ही मानते हैं।

अब श्लोक का सबसे ज़रूरी शब्द, जिसका अर्थ है ठीक से, भली-भाँति। मधुसूदन कहते हैं, अपनी योग्यता के अनुसार, शास्त्र के अनुसार, ठीक से किया जाए तो। यानी श्रीकृष्ण यह नहीं कह रहे कि कोई भी रास्ता आधे मन से पकड़ लो, सब बराबर है। वे कह रहे हैं कि जो रास्ता आपका है, उसमें पूरी तरह टिक जाओ।

पर इससे पहले कि हम पाँचवें श्लोक पर चलें, एक छोटी-सी बात। यह वह जगह है जहाँ बहुत-से लोग मन ही मन मान लेते हैं कि दोनों बराबर हैं, तो मैं जैसा हूँ वैसा ठीक हूँ, और उठ जाते हैं। पर आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। जो यहीं उठ जाएगा, वह छठे श्लोक की चेतावनी नहीं सुन पाएगा, और वह कमल का पत्ता भी नहीं देख पाएगा, जिसके लिए यह अध्याय याद किया जाता है। तो अगर आप ये सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की ये यात्रा बीच में न छूटे। और आज का ये सत्संग आख़िर तक सुनिए।

पाँचवाँ श्लोक। "यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते।" जो स्थान सांख्य वाले पाते हैं, वहीं योगी भी पहुँचते हैं। "एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति।" जो सांख्य और योग को एक देखता है, वही सच में देखता है।

"स पश्यति", वही देखता है। यानी बाकी लोग आँखें होते हुए भी पूरा नहीं देख रहे। और मधुसूदन सरस्वती यहाँ एक बात कहते हैं जो मुझे बहुत गहरी लगी। वे कहते हैं, जिसे आप इस जन्म में सब छोड़कर ज्ञान में डूबा देखते हैं, समझ लीजिए कि उसने पिछले जन्मों में भगवान को अर्पण करके कर्म किए होंगे, क्योंकि कारण के बिना कोई कार्य नहीं होता। और जिसे आप आज भगवान को अर्पण करके कर्म करते देखते हैं, उसके आगे, इस जन्म में या किसी और जन्म में, वह ज्ञान भी आएगा। यानी ये दो सड़कें नहीं, एक ही सड़क के दो हिस्से हैं। एक आदमी अभी पहले हिस्से पर है, दूसरा आगे वाले पर। पर सड़क एक है।

संत ज्ञानेश्वर इसके लिए आकाश और अवकाश का उदाहरण देते हैं। आकाश, और उसके भीतर की ख़ाली जगह, इनमें कोई भेद नहीं। वैसे ही योग और संन्यास की एकता जो पहचान ले, उसी ने संसार को ठीक देखा, और उसी ने अपने आपको भी देखा।

इसे हमारे घरों पर लगाकर देखिए। कई बार घर में रहने वाला भक्त अपने आप को छोटा मानने लगता है, कि मैं तो गृहस्थी में फँसा हूँ, असली साधना तो आश्रम वाला कर रहा है। पाँचवाँ श्लोक कहता है, मंज़िल एक है। तुलना की ज़रूरत नहीं, बस अपने रास्ते पर ठीक से, भली-भाँति, चलने की ज़रूरत है।

और अब छठा श्लोक, जिसमें वह चेतावनी है। "संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः।" परन्तु हे महाबाहो, योग के बिना संन्यास पाना कठिन है, दुःख देने वाला है। "योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति।" जो योग से जुड़ा मुनि है, वह जल्दी ही ब्रह्म को पा लेता है।

"दुःखमाप्तुमयोगतः", योग के बिना पाना कठिन। हमारी टीका कहती है: इसीलिए दूसरे श्लोक में कर्मयोग को श्रेष्ठ कहा था। निष्काम कर्म मन को शुद्ध करता है, और सच्चे संन्यास के लिए शुद्ध मन ही चाहिए। और मधुसूदन सरस्वती यहाँ बहुत कड़ी बात कहते हैं, पर सच्ची। वे कहते हैं कि जिसने मन को शुद्ध करने वाले कर्म के बिना, ज़बरदस्ती संन्यास ले लिया, उसके हाथ दुःख ही आता है। क्योंकि अशुद्ध मन में ज्ञान टिकता नहीं, और कर्म वह छोड़ चुका। वह दोनों से छूट जाता है, न इधर का रहा, न उधर का। श्रीधर स्वामी एक पुराने आचार्य का वचन उद्धृत करते हैं, कि असावधान, बाहर भटकते मन वाले, चुगली करने वाले और झगड़े के शौकीन लोग संन्यासियों में भी दिख जाते हैं। यानी वेश बदल लेने से मन नहीं बदल जाता।

अब मैं आपको एक ऐसे राजा की कथा सुनाना चाहता हूँ, जिन्होंने सचमुच सब छोड़ा था, और बहुत ऊँचे मन से छोड़ा था। वे थे पाण्डवों के पिता, पाण्डु। यह आदि पर्व में है।

पाण्डु ने दिग्विजय करके जो धन जीता, वह धृतराष्ट्र की अनुमति से भीष्म, सत्यवती, अपनी माता और विदुर को भेंट कर दिया। फिर महल का सुख छोड़कर कुन्ती और माद्री के साथ हिमालय की दक्षिणी ढलानों पर वन में रहने लगे, शिकार करते हुए। और पाठ एक छोटी-सी बात कहता है: धृतराष्ट्र के भेजे हुए लोग बिना थके उनके लिए वन में ज़रूरत की चीज़ें पहुँचाते रहते थे। एक दिन पाण्डु ने हिरनों के एक जोड़े पर बाण चला दिए। वह हिरन वास्तव में किंदम नाम के एक तपस्वी मुनि थे, जो हिरन का रूप धरकर अपनी पत्नी के साथ थे। मरते हुए मुनि ने शाप दिया: जिस दिन तुम काम से मोहित होकर अपनी प्रिया के पास जाओगे, उसी घड़ी तुम भी प्राण छोड़ोगे।

पाण्डु शोक से भर गए, और बोले: मैं केवल मुक्ति का निश्चय करता हूँ। एक दिन एक पेड़ के नीचे रहूँगा, एक दिन दूसरे के नीचे, सिर मुँड़ाए, मौन, भिक्षा माँगता हुआ। निन्दा और प्रशंसा मेरे लिए एक समान होंगी। और फिर वह शब्द, जो सीधे हमारे तीसरे श्लोक का है: मैं "निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः" रहूँगा, द्वन्द्वों से मुक्त, कुछ भी पास न रखने वाला। कोई एक बाँह बसूले से काटे और दूसरा दूसरी बाँह पर चन्दन लगाए, तो मैं दोनों में से किसी का न बुरा सोचूँगा, न भला।

कितना ऊँचा संकल्प है। तब कुन्ती और माद्री ने कहा, "और भी आश्रम हैं, जिनमें आप धर्म का सहारा लेकर हमारे साथ रह सकते हैं। आप हमें छोड़ेंगे, तो हम आज ही प्राण त्याग देंगी।" पाण्डु मान गए, पत्नियों के साथ वन में तपस्वी का जीवन लेना तय किया, अपनी चूड़ामणि, हार, रत्न सब ब्राह्मणों को दे दिए, और हस्तिनापुर सन्देश भेजा कि पाण्डु संन्यास लेकर वन चला गया।

बरस बीते। शतशृंग पर्वत पर, ऋषियों के बीच, पाण्डु के पाँच पुत्र हुए। और फिर एक वसन्त आया। पाठ कहता है कि अर्जुन का चौदहवाँ वर्ष पूरा हुआ था, वन फूलों से लदा था, पलाश, आम, चम्पा, कमल के तालाब। उस वन को देखकर पाण्डु के मन में काम जाग उठा। माद्री अकेली उनके पीछे आई थी। और पाठ कहता है कि उस घड़ी उन्हें शाप याद नहीं रहा। बाद में माद्री ने रोते हुए कुन्ती से कहा, "मैंने रोते हुए बार-बार उन्हें रोका, पर उन्होंने अपने आप को नहीं रोका।" और उसी दिन पाण्डु के प्राण छूट गए।

मैं यह कथा पाण्डु को छोटा दिखाने के लिए नहीं सुना रहा। वे धर्मात्मा थे। बहुत बाद में व्यास स्वयं युधिष्ठिर से कहते हैं कि तुम्हारे पिता पाण्डु ने अपने बड़े भाई धृतराष्ट्र की सेवा एक शिष्य की तरह, गुरु मानकर की थी। पर छठे श्लोक के पास रखकर देखिए। पाण्डु का त्याग एक झटके से पैदा हुआ था, एक शाप के डर से। कुन्ती अपने विलाप में कहती हैं कि वे सदा उदास रहते थे और उसी शाप को सोचते रहते थे। यानी भीतर की आग बुझी नहीं थी, उस पर डर का ढक्कन रखा हुआ था। याद कीजिए ज्ञानेश्वर की वह राख, जिसमें रूई नहीं जलती। राख तब बनती है जब आग सचमुच बुझ जाए। ढकी हुई आग राख नहीं होती। वह एक वसन्त की हवा का इन्तज़ार करती है।

और यही बात संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर कहते हैं: जो युक्ति के रास्ते से, योग के रास्ते से, मोक्ष के पर्वत पर चढ़ता है, वह जल्दी चोटी तक पहुँच जाता है। और जो योग छोड़ देता है, वह व्यर्थ ही लालसा में पड़ा रहता है, और संन्यास उसे कभी मिलता नहीं। इसका मतलब यह नहीं कि त्याग बुरा है। मतलब यह है कि त्याग फल है, बीज नहीं। बीज है वह रोज़ का कर्म, जो मन को धीरे-धीरे धोता है।

पर अभी एक बात बाकी है। "योगयुक्तो मुनि", योग से जुड़ा मुनि, जल्दी पहुँच जाता है। पर वह योगयुक्त आदमी दिखता कैसा है? क्या उसकी कोई पहचान है? अगले तीन श्लोकों में श्रीकृष्ण उसकी पूरी तस्वीर खींचते हैं, और उसमें एक ऐसा वाक्य है जो सुनने में अजीब लगता है: वह देखता है, सुनता है, खाता है, सोता है, और फिर भी मानता है कि मैं कुछ नहीं करता।

योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः । सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ७ ॥
गीता 5.7 — अर्थ पढ़ें ›
नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् । पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन् ॥ ८ ॥
गीता 5.8 — अर्थ पढ़ें ›
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥ ९ ॥
गीता 5.9 — अर्थ पढ़ें ›

सातवाँ श्लोक उस आदमी की पहचान है जो योग से जुड़ा है। "योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः।" जो योग से युक्त है, जिसका मन शुद्ध है, जिसने अपने शरीर को जीत लिया है और इन्द्रियों को भी। "सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते।" और जिसका आत्मा सब प्राणियों का आत्मा हो गया है, वह कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता।

इन शब्दों में एक क्रम है, एक सीढ़ी। मधुसूदन सरस्वती इसे ऐसे खोलते हैं: पहले योग, यानी भगवान को अर्पण करके, फल की इच्छा के बिना किया गया कर्म। उससे मन शुद्ध होता है, "विशुद्धात्मा"। शुद्ध मन से शरीर वश में आता है, "विजितात्मा"। फिर बाहर की इन्द्रियाँ, "जितेन्द्रियः"। और मधुसूदन यहाँ मनुस्मृति का एक वचन याद करते हैं, कि जिसकी वाणी पर संयम है, मन पर संयम है और शरीर पर संयम है, उसे ही सच्चा त्रिदण्डी कहते हैं। त्रिदण्ड संन्यासी का दण्ड होता है। पर यह त्रिदण्ड हाथ में नहीं, भीतर पकड़ा जाता है।

और रामानुजाचार्य यहाँ एक बात कहते हैं, जो हम गृहस्थों के लिए बहुत तसल्ली की है। वे कहते हैं कि कर्मयोगी का मन आसानी से जीत में आ जाता है, क्योंकि वह उस काम में लगा रहता है जिसका उसे अभ्यास है। इसे ध्यान से सुनिए। ख़ाली बैठा मन सबसे ज़्यादा भटकता है। जिसके हाथ में रोज़ का कोई ठीक काम है, किसान का खेत, माँ की रसोई, कारीगर का औज़ार, उसका मन उस काम में बँधकर अपने आप शान्त होना सीखता है। ख़ाली हाथ बैठकर मन को जीतना बहुत कठिन है।

और श्लोक का सबसे ऊँचा शब्द, "सर्वभूतात्मभूतात्मा"। शंकराचार्य कहते हैं, ब्रह्मा से लेकर घास के तिनके तक, सब प्राणियों के भीतर जो चेतन आत्मा है, वही जिसका अपना आत्मा है। संत ज्ञानेश्वर इसकी उपमा नमक से देते हैं। नमक जब तक समुद्र में नहीं गिरा, तब तक वह छोटा और अलग लगता है। समुद्र में मिलते ही वह समुद्र जितना हो जाता है। जिसका मन ऐसे घुल गया, उसके लिए किसी का दुःख पराया नहीं रहता, और किसी का सुख चुराने की इच्छा नहीं रहती।

आपको मुद्गल याद होंगे, जिन्हें हमने इस सत्संग के शुरू में छोड़ा था। जब दुर्वासा छह बार उनका भोजन खाकर भी उन्हें बदला हुआ नहीं देख पाए, तो दुर्वासा ने उनके बारे में जो कहा, वह इस श्लोक की लगभग व्याख्या है। उन्होंने कहा कि मन चंचल है और उसे वश में करना कठिन है, और मन और इन्द्रियों को एकाग्र करना ही सच्चा तप है। और फिर गिनाया: इन्द्रियों पर विजय, धीरज, दूसरों से बाँटना, संयम, शान्ति, दया, सत्य और धर्म, ये सब तुममें दृढ़ता से टिके हैं। वही "जितेन्द्रियः", और वह एक गृहस्थ के बारे में, जो पत्नी और बेटे के साथ खेत में दाने बीन रहा था।

अब आठवाँ और नौवाँ श्लोक। हमारी टीका बताती है कि ये दोनों मिलकर एक ही वाक्य हैं, इसलिए इन्हें साथ सुनिए। "नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्।" तत्त्व को जानने वाला, योग से जुड़ा आदमी यह माने कि "मैं कुछ भी नहीं करता"। कब? "पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन्।" देखते हुए, सुनते हुए, छूते हुए, सूँघते हुए, खाते हुए, चलते हुए, सोते हुए, साँस लेते हुए। "प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि।" बोलते हुए, छोड़ते हुए, पकड़ते हुए, आँखें खोलते और मूँदते हुए भी। "इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्।" यह निश्चय रखते हुए कि इन्द्रियाँ ही अपने-अपने विषयों में बरत रही हैं।

देखिए श्रीकृष्ण ने कितनी लम्बी सूची दी है। श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती इसे बाँटकर समझाते हैं। देखना, सुनना, छूना, सूँघना, चखना, ये पाँच ज्ञान की इन्द्रियों के काम हैं। चलना पैरों का, बोलना वाणी का, पकड़ना हाथों का, छोड़ना शरीर के नीचे के अंगों का। साँस प्राण का काम है, पलक झपकना भी एक प्राण का, और नींद मन और बुद्धि की अवस्था। यानी सुबह से रात तक हमारा पूरा दिन इस सूची में आ गया। कोई काम छूटा नहीं। और श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि यह सब होते हुए भी तत्त्व जानने वाला भीतर से यह जानता है कि ये इन्द्रियों के काम हैं, आत्मा के नहीं।

पर यहाँ एक ग़लतफ़हमी बहुत आसानी से हो सकती है, और लोकमान्य तिलक इसे पहले ही रोक देते हैं। वे लिखते हैं कि "मैं कुछ नहीं करता" का यह मतलब नहीं कि इन्द्रियों को जो चाहे करने दो, और फिर कह दो कि मैंने तो कुछ नहीं किया। मतलब इसका उलटा है। जब "मैं करता हूँ" का अहंकार छूट जाता है, तो इन्द्रियाँ अपने आप कोई बुरा काम नहीं करतीं, वे आत्मा के वश में रहती हैं। और तिलक एक बात और कहते हैं: ज्ञानी हो जाने पर भी साँस लेना, पलक झपकना तो चलता ही रहेगा, पल भर जीना भी कर्म है। तो संन्यासी और कर्मयोगी में यह भेद कहाँ रहा कि एक कर्म छोड़ता है और दूसरा करता है? कर्म दोनों को करना पड़ता है। भेद केवल आसक्ति का है।

शंकराचार्य कहते हैं, जो जान चुका है कि रेत में दिखता पानी असल में पानी नहीं, वह फिर प्यास बुझाने वहाँ नहीं दौड़ता। और संत ज्ञानेश्वर कहते हैं कि भ्रान्ति की सेज पर सोया आदमी सपनों के सुख में भटकता है, और ज्ञान का सवेरा होते ही जाग जाता है। जागा हुआ आदमी सपने में किए कामों को अपना नहीं कहता।

अब मैं आपको शान्ति पर्व से एक छोटा-सा संवाद सुनाता हूँ, जो इस सूची को जीवित कर देता है। युधिष्ठिर बाणों की शय्या पर लेटे भीष्म से पूछते हैं: किस आचरण से मनुष्य शोक के बिना पृथ्वी पर विचरे? और भीष्म उत्तर में एक पुरानी कथा सुनाते हैं, प्रह्लाद और एक मुनि की, जिसने अजगर जैसा व्रत लिया था।

प्रह्लाद ने एक ब्राह्मण को देखा, स्वस्थ, कोमल, संयमी, मीठा बोलने वाला, और बहुत शान्त। उन्होंने पूछा: आप न लाभ चाहते हैं, न हानि पर शोक करते हैं। जब लोग धारा में बहाए जा रहे हैं, आप अनमने-से, अचल दिखते हैं। आप इन्द्रियों के विषयों की परवाह न करके साक्षी की तरह मुक्त विचरते हैं। यह कौन-सी समझ है? और मुनि का उत्तर सुनिए। उन्होंने कहा, मिलन अन्त में बिछोह बन जाते हैं, और जोड़ा हुआ धन अन्त में नष्ट होता है, इसलिए मैं कहीं मन नहीं अटकाता। कभी संयोग से मुझे बहुत बड़ा कौर मिल जाता है तो खा लेता हूँ, और फिर बहुत दिन बिना खाए पड़ा रहता हूँ। कभी पलंग पर सोता हूँ, कभी ज़मीन पर, और कभी महल में भी मुझे शय्या मिल जाती है। कभी छाल पहनता हूँ, कभी रेशम। और फिर वह पंक्ति: जो धर्म के अनुसार उपभोग अपने आप आ जाए, उसे मैं ठुकराता नहीं, और जो बहुत दुर्लभ हो, उसके पीछे दौड़ता भी नहीं।

अब नौवें श्लोक से मिलाइए। खाना होता है, सोना होता है, पहनना होता है, पर वह मुनि उन्हें पकड़कर नहीं बैठता। इन्द्रियाँ अपने विषयों में बरत रही हैं, और वह भीतर साक्षी की तरह खड़ा है। मैं आपसे अजगर का व्रत लेने को नहीं कह रहा। हमारे पास घर है, नौकरी है, बच्चों का टिफ़िन है। पर उस मुनि का एक वाक्य हर घर में चल सकता है: जो धर्म से मिला है, उसे प्रसाद समझकर ले लो, और जो नहीं मिला, उसके लिए रात की नींद मत बेचो। शादी की पंगत में जो परोसा गया, खा लिया; रेल में ऊपर की बर्थ मिली, वहीं सो गए। वही "नैव किञ्चित्करोमीति" का पहला अभ्यास है।

पर अभी एक बात बाकी है। अगर तत्त्व जानने वाला कहता है कि मैं कुछ नहीं करता, तो हम जैसे लोगों का क्या, जो अभी तत्त्व नहीं जानते, जिनके भीतर "मैंने किया" अभी पूरी ताक़त से बोलता है? क्या हमारे लिए भी कोई रास्ता है? दसवाँ श्लोक ठीक हम जैसों के लिए है, और उसी में वह कमल का पत्ता है, जिसका यह सत्संग इन्तज़ार कर रहा था।

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः । लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥ १० ॥
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कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि । योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ॥ ११ ॥
गीता 5.11 — अर्थ पढ़ें ›

दसवाँ श्लोक। अगर आप इस पूरे अध्याय से एक ही श्लोक याद रखें, तो यही रखिए। "ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः।" जो अपने कर्मों को ब्रह्म में रखकर, अर्पण करके, और आसक्ति छोड़कर कर्म करता है, "लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा।" वह पाप से वैसे ही नहीं भीगता, जैसे कमल का पत्ता पानी से।

पिछले श्लोकों में श्रीकृष्ण उस आदमी की बात कर रहे थे जो तत्त्व जान चुका है। पर नीलकण्ठ कहते हैं कि यह श्लोक उसके लिए है जो अभी विद्वान नहीं हुआ। विद्वान तो आसक्ति के बिना होने से कर्म करते हुए भी नहीं बँधता। पर जो अविद्वान है, वह भी अपने कर्मों को सबके भीतर बैठे अन्तर्यामी में रखकर, यह मानकर कि "करवाने वाले वही हैं, मैं कर्ता नहीं", कर्म करे, तो वह भी पाप से नहीं भीगता। यानी पिछले खंड के अन्त में जो प्रश्न था, कि हम जैसों का क्या, उसका उत्तर यही है। जो अभी "मैं कुछ नहीं करता" पूरी ईमानदारी से नहीं कह सकता, वह कम से कम इतना कह सकता है: "मैं यह आपके लिए कर रहा हूँ।"

श्रीधर स्वामी इस श्लोक से पहले एक उलझन रखते हैं: जिसके भीतर "मैं करता हूँ" का अभिमान है, उसे कर्म का लेप लगेगा, और मन अभी शुद्ध नहीं, इसलिए संन्यास भी उसके लिए नहीं। वह तो बड़े संकट में पड़ गया। और इसी संकट का उत्तर है यह श्लोक: परमेश्वर को अर्पण, और फल में आसक्ति का त्याग।

शंकराचार्य इस अर्पण को सेवक के चित्र से समझाते हैं, जो स्वामी के लिए पूरे मन से काम करता है, पर यह नहीं सोचता कि खेत मेरा है, फ़सल मेरी है। और शंकर कहते हैं कि आसक्ति का यह त्याग मोक्ष के फल में भी हो, यानी मैं इसलिए काम नहीं कर रहा कि बदले में मुक्ति मिले। ऐसे कर्म का एक ही फल बचता है, मन की शुद्धि। और मधुसूदन सरस्वती कहते हैं: जैसे कमल के पत्ते पर ऊपर से पानी डालो, तो वह उसे नहीं भिगोता।

अब कमल का पत्ता। मैंने गाँव के तालाब में इसे बहुत बार देखा है, और शायद आपने भी। कमल की जड़ नीचे कीचड़ में है। उसका डंठल पूरा पानी में डूबा है। पत्ता पानी की सतह पर ही लेटा है, उसी पानी पर। और फिर भी, अगर आप उस पर पानी की बूँद गिराएँ, तो वह बूँद मोती की तरह लुढ़ककर नीचे चली जाती है। पत्ता भीगता नहीं। और ध्यान दीजिए, कमल ने सूखा रहने के लिए तालाब नहीं छोड़ा। वह तालाब के बीच में है, पानी से ही जीता है, पानी से ही बढ़ता है। उसका सूखापन पानी से भागने का नहीं, पानी में रहने का एक ढंग है। आज के सत्संग का सवाल था, घर छोड़ें या घर में रहकर? कमल का पत्ता चुपचाप इसका उत्तर देता है।

संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर एक और छोटा-सा चित्र देते हैं, दीपक का। जैसे दीपक के प्रकाश में घर के सारे काम होते रहते हैं, कोई खाना बनाता है, कोई पढ़ता है, पर दीपक कुछ नहीं करता, वैसे ही योग से जुड़े आदमी के शरीर में कर्म होते रहते हैं। वह सारे कर्म करता है, पर कर्म के बन्धन में नहीं आता, जैसे कमल का पत्ता पानी में रहकर पानी से नहीं भीगता।

और कीचड़ की बात आई है, तो चौदहवें सत्संग का वह व्याध याद कीजिए। मिथिला के कसाईखाने में वह हिरन और भैंसे का मांस बेच रहा था, ग्राहकों की भीड़ थी, और फिर भी वेदपाठी कौशिक उसके पास धर्म सीखने भेजे गए थे। उसका काम कीचड़ जैसा था, पर उसका मन कमल के पत्ते जैसा, माता-पिता की सेवा और अपने धर्म में लगा हुआ। कमल यह नहीं चुनता कि उसकी जड़ कहाँ होगी। वह बस यह चुनता है कि उसका पत्ता किसकी ओर खुलेगा।

अब ग्यारहवाँ श्लोक, जो बताता है कि यह अर्पण किन-किन हाथों से होता है। "कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि।" शरीर से, मन से, बुद्धि से, और केवल इन्द्रियों से भी, "योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये।" योगी आसक्ति छोड़कर अपने अन्तःकरण की शुद्धि के लिए कर्म करते हैं।

"केवल" शब्द पर हमारी टीका कहती है कि इन्द्रियाँ काम करें, पर उनके पीछे "मेरा" का भाव न हो। शंकराचार्य और मधुसूदन सरस्वती कहते हैं कि "केवल" शरीर, मन और बुद्धि, तीनों के साथ लगता है, और उसका अर्थ है ममता से ख़ाली, इस भाव से कि "मैं यह ईश्वर के लिए करता हूँ, अपने फल के लिए नहीं"। और नीलकण्ठ एक सुंदर उदाहरण देते हैं: केवल शरीर से, यानी "मैं यह जवान ब्राह्मण हूँ", ऐसी पहचान के बिना। श्रीधर स्वामी बताते हैं कि शरीर से स्नान जैसे काम, बुद्धि से सत्य का निश्चय, और इन्द्रियों से भगवान की कथा सुनना और कीर्तन करना। और संत ज्ञानेश्वर कहते हैं कि योगी कर्म ऐसे करते हैं जैसे बालक की चेष्टा, केवल शरीर से, बिना किसी दावे के।

और "सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये", आसक्ति छोड़कर अपनी शुद्धि के लिए। यह शब्द बताता है कि कर्मयोगी का कर्म दुनिया के लिए तो है ही, पर उसके भीतर एक और काम भी चल रहा है। हर काम उसके मन को थोड़ा और धो रहा है।

शरीर, मन और बुद्धि, तीनों से अर्पण, इसका एक जीता-जागता चित्र महाभारत में है, और वह किसी ऋषि का नहीं, एक गृहिणी का है। यह वन पर्व में है। वनवास के दिनों में श्रीकृष्ण सत्यभामा के साथ पाण्डवों से मिलने आते हैं, और द्रौपदी और सत्यभामा अकेले में बैठकर बातें करती हैं। सत्यभामा हँसी में पूछती हैं: द्रौपदी, ये पाँचों पाण्डव, जो लोकपालों जैसे वीर हैं, तुम्हारे वश में कैसे रहते हैं? कोई व्रत है, कोई मन्त्र है, कोई जड़ी-बूटी? द्रौपदी पहले कहती हैं कि मन्त्र-जड़ी के रास्ते से पति वश में नहीं होता। जिस दिन पति जान लेता है कि पत्नी ऐसे उपायों में लगी है, वह उससे वैसे डरने लगता है जैसे घर में घुसे साँप से। और डरे हुए को शान्ति कहाँ।

फिर द्रौपदी अपनी साधना बताती हैं, और उसमें तीनों हैं। मन की बात पहले: मैं सदा अहंकार, काम और क्रोध को छोड़ती हूँ, ईर्ष्या को रोककर अपने मन को अपने वश में रखती हूँ, घमण्ड के बिना सेवा करती हूँ। फिर बुद्धि की बात: इन्द्रप्रस्थ में हर दिन आठ हज़ार ब्राह्मण महल में भोजन करते थे, हज़ारों गृहस्थों और संन्यासियों का पालन होता था, और सब दास-दासियों के नाम, उनका भोजन, वस्त्र, किसने कौन-सा काम किया और कौन-सा नहीं, राज्य की पूरी आय और ख़र्च, यह सब मैं अकेली जानती थी। और फिर शरीर की बात: मैं सबसे पहले जागती हूँ और सबसे बाद में सोती हूँ। पाण्डव सारा घर मुझ पर छोड़कर अपने कामों में लगे रहते हैं, और यह बोझ कमज़ोर मन वालों के उठाने लायक नहीं, मैं सारा सुख छोड़कर रात-दिन इसे सँभालती हूँ।

अब ग्यारहवाँ श्लोक फिर से सुनिए। "कायेन", शरीर से, सबसे पहले जागना। "मनसा", मन से, ईर्ष्या को रोकना। "बुद्ध्या", बुद्धि से, हज़ारों लोगों का हिसाब रखना। और यह सब कोई जादू नहीं, अहंकार, काम और क्रोध को रोज़ छोड़ते जाना। मैं यह कथा इसलिए नहीं सुना रहा कि हर घर उसी तरह चले, हर घर की अपनी रीत होती है। मैं इसलिए सुना रहा हूँ कि द्रौपदी के मुँह से सुनिए कि एक भरे-पूरे घर को सँभालना अपने आप में एक तप है। जो आपको चुपचाप घर चलाते दिखते हैं, वे शायद आपके घर के सबसे बड़े योगी हैं।

पर अभी एक बात बाकी है। एक ही घर में दो लोग एक जैसा काम करते हैं। एक उसी काम से हल्का होता जाता है, और दूसरा उसी काम से बँधता जाता है। काम एक, फल उलटे। ऐसा क्यों? बारहवाँ श्लोक इसका कारण एक शब्द में बताता है, और उसके बाद मैं आपको बताऊँगा कि मुद्गल ने उस विमान का क्या किया।

युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् । अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ॥ १२ ॥
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सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी । नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥ १३ ॥
गीता 5.13 — अर्थ पढ़ें ›

बारहवाँ श्लोक उस प्रश्न का उत्तर है जो हमने अभी रखा था, कि एक ही काम किसी को छुड़ाता है और किसी को बाँधता है, तो क्यों? "युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्।" जो योग से जुड़ा है, वह कर्म का फल छोड़कर स्थायी शान्ति पाता है। "अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते।" और जो योग से नहीं जुड़ा, वह कामना की प्रेरणा से फल में अटककर बँध जाता है।

श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती दोनों इस श्लोक से पहले ठीक यही प्रश्न उठाते हैं: कर्म वही है, फिर एक मुक्त क्यों होता है और दूसरा क्यों बँधता है? और उत्तर एक शब्द में है, "युक्त"। शंकराचार्य बताते हैं कि युक्त वह है जिसका भाव यह है: "मैं ये कर्म ईश्वर के लिए करता हूँ, अपने फल के लिए नहीं।" और अयुक्त वह, जो कहता है: "यह काम मैं अपने फल के लिए कर रहा हूँ।" काम दोनों के हाथ में एक जैसा है। फ़र्क़ उस वाक्य में है, जो भीतर बोला जा रहा है।

और "नैष्ठिकीम्" शब्द, स्थायी, टिकी हुई शान्ति। शंकर कहते हैं कि यह शान्ति एक क्रम से आती है: पहले मन की शुद्धि, फिर ज्ञान, फिर सब कर्मों का त्याग, और फिर ज्ञान में टिक जाना। यानी यह कोई एक दिन की राहत नहीं, एक सीढ़ी के अन्त की शान्ति है। संत ज्ञानेश्वर इस पर बहुत प्यारी बात कहते हैं। जो कर्मफल की आशा से ऊब चुका, उसके घर शान्ति स्वयं चलकर आती है और उसे वर लेती है, जैसे दुल्हन वर को चुनती है। और दूसरे के बारे में वे कहते हैं कि वह अभिलाषा की गाँठ से फल-भोग की खूँटी से बँधा है। खूँटी से बँधा जानवर रस्सी जितना ही घूम पाता है। उसकी आज़ादी उसकी रस्सी की लम्बाई है।

अब मैं आपको वह वादा पूरा करता हूँ। मुद्गल याद हैं? कुरुक्षेत्र के वे गृहस्थ, जो छह बार अपना सारा भोजन दुर्वासा को देकर भी नहीं डिगे, और जिनके सामने देवताओं का दूत विमान लेकर खड़ा था, कि चढ़ो, स्वर्ग चलो।

मुद्गल तुरन्त नहीं चढ़े। उन्होंने देवदूत से कहा: सज्जन कहते हैं कि सात क़दम साथ चलने से मित्रता हो जाती है। उसी मित्रता के नाते पूछता हूँ, मुझे स्वर्ग के गुण बताओ, और उसके दोष भी। जो सच हो और मेरे हित का हो, वह बिना हिचके कहो, उसी के अनुसार मैं निश्चय करूँगा। देवदूत ने पहले गुण बताए: वहाँ न भूख है न प्यास, न थकान, न सर्दी-गर्मी, न डर। वहाँ की मालाएँ कभी नहीं मुरझातीं। और फिर उसने ईमानदारी से दोष भी बताए। उसने कहा, स्वर्ग में केवल पहले किए कर्मों का फल भोगा जाता है, वहाँ कोई नया कर्म नहीं होता, इसलिए भोगते-भोगते पुण्य की जड़ कटती जाती है। और अन्त में गिरना होता है। नीचे वाले अपने से ऊपर वालों की चमक देखकर जलते हैं, और जब गिरने वाले की माला मुरझाने लगती है, तो उसे डर घेर लेता है। फिर उसने कहा कि ब्रह्मा के लोक से भी ऊपर विष्णु का परम पद है, और वहाँ वही जाते हैं जो ममता और अहंकार से रहित हैं, द्वन्द्वों के पार हैं, इन्द्रियों को वश में रखते हैं और ध्यानयोग में लगे हैं।

मुद्गल ने अपनी बुद्धि से सोचा, और फिर कहा: हे देवदूत, तुम्हें नमस्कार, सुख से जाओ। इतने बड़े दोषों वाले स्वर्ग से, उसके सुख से, मुझे कोई काम नहीं। जहाँ से अन्त में गिरना है, वह मुझे नहीं चाहिए। मैं केवल उस स्थान को खोजूँगा, जहाँ जाकर न शोक होता है, न पीड़ा, और जहाँ से कोई डिगता नहीं।

और फिर पाठ कहता है कि उन्होंने देवदूत को विदा किया, दाने बीनकर जीने का ढंग भी छोड़ दिया, और सबसे ऊँची शान्ति में स्थित हो गए। निन्दा और प्रशंसा उनके लिए एक हो गई, मिट्टी का ढेला, पत्थर और सोना एक हो गए। ध्यानयोग से बल पाकर उन्होंने वह सनातन सिद्धि पाई, जो निर्वाण है।

अब बारहवें श्लोक के पास रखिए। स्वर्ग क्या है? पुण्य कर्म का फल। "कर्मफलं त्यक्त्वा", मुद्गल ने अपने ही अच्छे कर्मों का सबसे बड़ा फल लौटा दिया, और "शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्", पाठ के अपने शब्दों में, वे सबसे ऊँची शान्ति में स्थित हो गए। और देखिए, मुद्गल ने जीवन भर गृहस्थ रहकर कर्म किए। संन्यास उनके पास सबसे आख़िर में आया, जब फल को ठुकराने की ताक़त भीतर पक चुकी थी। यही मधुसूदन सरस्वती पाँचवें श्लोक पर कह रहे थे। पाण्डु का त्याग एक झटके से आया था और एक वसन्त में टूट गया; मुद्गल का त्याग पककर आया था, और वह निर्वाण तक गया।

और व्यास यह कथा किसे सुना रहे थे? वनवास के ग्यारहवें साल के उस युधिष्ठिर को, जो राज्य छिनने के दुःख में सो नहीं पाते थे। और कथा के अन्त में व्यास ने कहा, शोक मत करो, सुख के बाद दुःख आता है और दुःख के बाद सुख, जैसे घूमते पहिये के आरे बारी-बारी से आते रहते हैं।

अब तेरहवाँ श्लोक, जिसमें एक नगर है। "सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी।" जिसने अपने को वश में कर लिया है, वह सब कर्मों को मन से त्यागकर सुख से रहता है। "नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्।" नौ द्वारों वाले नगर में, वह देहधारी न कुछ करता है, न करवाता है।

नौ द्वारों वाला नगर क्या है? हमारी टीका बताती है: यह शरीर, जिसके नौ द्वार हैं, दो आँखें, दो कान, दो नथुने, मुख, और नीचे के दो द्वार। और आत्मा इसमें एक निवासी की तरह रहता है, काम करने वाले की तरह नहीं। और "मनसा" शब्द को मत छोड़िए। लोकमान्य तिलक इस पर ज़ोर देकर लिखते हैं: सब कर्मों का संन्यास मन से, प्रत्यक्ष नहीं। यानी हाथ काम करते रहते हैं, त्याग मन में होता है।

शंकराचार्य यहाँ एक बहुत सूक्ष्म बात कहते हैं। जो अज्ञानी है, जो अपने को शरीर ही मानता है, वह सोचता है, "मैं घर में बैठा हूँ, ज़मीन पर बैठा हूँ, आसन पर बैठा हूँ।" और जो विवेकी है, वह जानता है, "मैं इस देह में रह रहा हूँ, जैसे कोई घर में रहता है।" मधुसूदन सरस्वती इसमें एक चित्र जोड़ते हैं, जो मुझे बहुत अच्छा लगता है। वे कहते हैं, ऐसा आदमी इस देह में वैसे रहता है जैसे परदेस गया कोई यात्री किसी पराए घर में ठहरा हो। उस घर में कोई उसका आदर करे तो वह फूल नहीं जाता, कोई अपमान करे तो टूट नहीं जाता, क्योंकि वह जानता है कि यह घर उसका नहीं। और नीलकण्ठ इसे एक राजा से समझाते हैं, जिसने अपने नगर के सारे काम मन्त्रियों पर छोड़ दिए हैं। नगर चल रहा है, दरबार चल रहा है, और राजा शान्त बैठा है।

श्रीधर स्वामी यहाँ कहते हैं कि जिसका मन शुद्ध नहीं, वह संन्यास लेकर भी फिर करने और करवाने लगता है, और जिसका मन शुद्ध है, वह न करता है न करवाता है, इसलिए सुख से रहता है। संत ज्ञानेश्वर कहते हैं: वह नौ द्वारों वाली देह में है भी, और नहीं भी।

इसे आज के घर पर लगाइए। बहुत-से लोग किराए के मकान में रहते हैं। उसे साफ़ रखते हैं, उसकी देखभाल करते हैं, पर दीवार के रंग पर पड़ोसी से झगड़ा नहीं करते, क्योंकि जानते हैं कि यह मकान हमेशा का नहीं। तेरहवाँ श्लोक कहता है कि यह शरीर भी ऐसा ही एक मकान है, और इसमें रहने का ढंग वही है: पूरी देखभाल, पर पूरा अधिकार नहीं।

पर अभी एक बात बाकी है। अगर आत्मा न करता है, न करवाता है, तो फिर यह सब करवाता कौन है? क्या भगवान हमसे सब करवाते हैं? और अगर करवाते हैं, तो क्या हमारे पाप और पुण्य उनके खाते में जाते हैं? अगले दो श्लोक इसी का उत्तर हैं, और वहाँ मैं आपको हस्तिनापुर के उस अंधे राजा के पास ले चलूँगा, जो यह सब सुन रहा था, और बताऊँगा कि बहुत बरसों बाद उसने अपना घर कैसे छोड़ा।

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः । न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥ १४ ॥
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नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः । अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥ १५ ॥
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चौदहवाँ श्लोक। "न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः।" प्रभु लोगों के लिए न कर्तापन रचते हैं, न कर्म, "न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते।" न कर्म के फल से उनका जोड़। यह सब स्वभाव ही चला रहा है।

"प्रभुः" किसे कहा? शंकराचार्य और मधुसूदन सरस्वती के लिए यहाँ प्रभु है आत्मा, देह का स्वामी, जो न किसी से कहता है "यह करो", न ख़ुद करता है, न फल भोगता है। श्रीधर स्वामी के लिए प्रभु हैं ईश्वर, जो जीव में कर्तापन पैदा नहीं करते, जीव का अपना अनादि अज्ञान ही कर्तापन बनकर चलता है। हमारी टीका कहती है: करना और भोगना प्रकृति का काम है, आत्मा अपने स्वरूप में इनसे अछूता है। और रामानुजाचार्य "स्वभाव" का अर्थ बताते हैं, पिछले कर्मों से बनी प्रकृति की वासना।

नीलकण्ठ यहाँ सूर्य की उपमा देते हैं। सूर्य उगता है, तो कमल खिल जाते हैं, रात के कुमुद सिमट जाते हैं, घड़े अपनी जगह पड़े रहते हैं, और मनुष्य उठकर काम में लग जाते हैं। सूर्य किसी को कुछ करने को नहीं कहता, सब अपने-अपने स्वभाव से करते हैं। और आपको अजगर-व्रत वाले उस मुनि का एक वाक्य याद आएगा, जो मैंने पहले जानबूझकर नहीं सुनाया था। उसने प्रह्लाद से कहा था: प्रवृत्तियाँ अपने स्वभाव से ही चलती दिखती हैं, सब अपने स्वभाव में लगी हैं। "स्वभावस्तु प्रवर्तते" का यही अर्थ, एक मुनि के मुँह से।

पन्द्रहवाँ श्लोक। "नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः।" सर्वव्यापी परमेश्वर न किसी का पाप लेते हैं, न पुण्य। "अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः।" ज्ञान अज्ञान से ढका है, और उसी से जीव मोह में पड़ते हैं।

शंकराचार्य कहते हैं, भगवान भक्त का भी पाप नहीं लेते, और भक्तों का दिया पुण्य भी नहीं लेते। तो फिर पूजा, दान, यज्ञ क्यों? क्योंकि ज्ञान ढका हुआ है, और ढके हुए ज्ञान में आदमी यही सोचता है: मैं करता हूँ, मैं करवाता हूँ, मैं भोगूँगा। श्रीधर स्वामी "विभु" का अर्थ करते हैं, जो पूरा है, जिसे कुछ चाहिए ही नहीं। जिसे कुछ नहीं चाहिए, वह किसी के पुण्य का हिस्सा क्यों ले? और नीलकण्ठ एक उपमा देते हैं जो इस श्लोक को आँखों के सामने रख देती है। एक चक्रवर्ती सम्राट गहरी नींद में सोया है, और सपने में देखता है कि शत्रुओं ने घेर लिया है, वह दीन है, दुखी है, संकट में है। वह सम्राट है, पर नींद ने उसका यह ज्ञान ढक दिया है। "अज्ञानेनावृतं ज्ञानं।"

अब यह श्लोक महाभारत में दो जगह बहुत साफ़ बोलता है। पहली जगह, अनुशासन पर्व के आरम्भ में। युद्ध के बाद युधिष्ठिर बाणों की शय्या पर लेटे भीष्म के पास बैठे हैं और कहते हैं, मेरे कारण आप इस दशा में पहुँचे, मुझे शान्ति नहीं मिलती। और भीष्म कहते हैं, तुम दूसरे के अधीन रहकर भी अपने को ही कारण कैसे मानते हो? कर्मों की गति सूक्ष्म है। और वे गौतमी नाम की एक बूढ़ी, शान्त स्वभाव वाली स्त्री की कथा सुनाते हैं।

गौतमी के बेटे को साँप ने डस लिया था। अर्जुनक नाम का एक व्याध उस साँप को बाँधकर ले आया और बोला, बताइए, इसे आग में डालूँ या टुकड़े कर दूँ? गौतमी ने कहा, इसे छोड़ दो, इसे मारने से मेरा बेटा अमर नहीं हो जाएगा। फिर बहस चली। साँप बोला, मेरा क्या दोष, मुझे मृत्यु ने भेजा। मृत्यु आई और बोली, मुझे काल ने भेजा। काल आया और बोला, न मैं, न मृत्यु, न साँप, हर प्राणी अपने ही कर्म से बँधा है। और तब गौतमी ने वह वाक्य कहा जो सुनने वाले का हृदय रोक देता है: "मैंने भी वह कर्म किया जिससे मेरा यह पुत्र मरा। काल और मृत्यु चले जाएँ, अर्जुनक, साँप को छोड़ दे।" पाठ कहता है कि सब जैसे आए थे वैसे लौट गए, और व्याध भी शोक से मुक्त हुआ, और गौतमी भी।

मैं यह कथा किसी दुखी माँ-बाप से यह कहने के लिए नहीं सुना रहा कि दोष आपका है। गौतमी ने किसी पर दोष नहीं डाला, अपने ऊपर भी फ़ैसला नहीं सुनाया, बस अपना हिस्सा पहचाना और एक और हत्या को शोक में जुड़ने नहीं दिया। पन्द्रहवाँ श्लोक भी यही कहता है: हमारा हिसाब हमारे साथ चलता है, भगवान उसे नहीं छीनते। और जिस दिन यह दिख जाता है, उस दिन दोष की लम्बी ज़ंजीर, साँप, मृत्यु, काल, भाग्य, वहीं टूट जाती है।

और दूसरी जगह, जो मैंने आपसे वादा की थी: वह अंधा राजा, जिसे सञ्जय यह गीता सुना रहे हैं। युद्ध के बाद पन्द्रह बरस धृतराष्ट्र हस्तिनापुर में ही रहे, और युधिष्ठिर ने उनका आदर ऐसा रखा कि लोगों को उनके प्रेम में कोई कमी नहीं दिखी। पर भीम की चुभती बातों से उनका मन संसार से हट गया। और एक दिन उन्होंने अपने हितैषियों को बुलाकर आँसुओं से भरे गले से कहा: कुरुओं का विनाश मेरे अपराध से हुआ। मैंने वासुदेव की हितकारी बात नहीं सुनी, मैं पुत्र के स्नेह में डूबा था। विदुर, भीष्म, द्रोण, कृप, व्यास, सञ्जय और गान्धारी ने पग-पग पर मुझसे कहा था, और वही बात आज मुझे जला रही है। सुन रहे हैं? सञ्जय का नाम भी उस सूची में है। जो ज्ञान सामने था, उसे पुत्र-मोह ढके हुए था। "अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः।" पहले सत्संग का "मामकाः", मेरे और उनके, बरसों बाद राजा के अपने मुँह से उतर रहा है।

और फिर राजा ने बताया कि वे महल में रहते हुए ही, चुपचाप, दिन में चौथे और कभी आठवें समय केवल भूख मिटाने भर खाते हैं, जप करते हैं, मृगचर्म ओढ़कर कुश पर भूमि पर सोते हैं, और गान्धारी भी। युधिष्ठिर ने दुखी होकर कहा: आप घर में रहते हुए उपवास से इतने दुबले हो गए, और हमने जाना ही नहीं। धृतराष्ट्र ने कहा, हमारे कुल में यही उचित है कि पुत्रों को राज्य सौंपकर आयु के अन्त में वन जाएँ। युधिष्ठिर ने कहा, आप जाएँगे तो मैं भी पीछे चलूँगा। तब व्यास आए और बोले, इस बूढ़े राजा को जाने दो, बाधा मत बनो।

कार्तिक की पूर्णिमा को, अग्निहोत्र की अग्नि आगे रखकर, वल्कल और मृगचर्म पहने, धृतराष्ट्र अपने भवन से निकले। युधिष्ठिर हाथ जोड़े पुकार उठे, "महाराज, आप कहाँ जाएँगे?" और भूमि पर गिर पड़े। और आगे एक दृश्य है: कुन्ती, आँखों पर पट्टी बाँधे गान्धारी का हाथ अपने कन्धे पर रखे चल रही हैं, और धृतराष्ट्र गान्धारी के कन्धे पर हाथ रखे, पाठ के शब्दों में, प्रसन्न मन से चल रहे हैं। विदुर साथ थे, और सञ्जय भी। वही सञ्जय, जिनके मुँह से आज हम यह अध्याय सुन रहे हैं।

कुन्ती ने लौटने से इनकार कर दिया। युधिष्ठिर ने रोका, भीम ने पूछा कि जब पुत्रों का जीता राज्य भोगने का समय आया, तब यह बुद्धि कहाँ से आई? और कुन्ती ने उत्तर दिया: मैंने अपने किसी फल के लिए वासुदेव को प्रेरित नहीं किया था। मैं पुत्रों के जीते राज्य का फल नहीं चाहती। बारहवाँ श्लोक याद है? "कर्मफलं त्यक्त्वा।" एक माँ ने अपने ही बेटों की जीत का फल लौटा दिया।

और अब वह पंक्ति, जिसके लिए यह पूरी कथा सुनाई। धृतराष्ट्र ने गान्धारी से कहा कि युधिष्ठिर की माँ को लौटा दो, क्योंकि राज्य में रहकर भी ये तप और दान का बड़ा व्रत कर सकती हैं। सुनिए, आज के सवाल का उत्तर किसके मुँह से आया। उस राजा के, जो ख़ुद घर छोड़कर जा रहा था, और जो महल में रहते हुए चुपचाप कुश पर सोता था। घर में रहकर भी तप हो सकता है, और घर छोड़ना भी एक धर्म है, जब उसका समय आए। बुढ़ापे में, ज़िम्मेदारी सौंपकर, आशीर्वाद देते हुए। वन में आगे उनका क्या हुआ, वह किसी और दिन।

तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली बात। संन्यास कपड़ों से नहीं, मन से पहचाना जाता है। "यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति", जो न चिढ़ता है, न तरसता है, वह घर में रहकर भी नित्यसंन्यासी है, जैसे मुद्गल। इस हफ़्ते एक दिन अपने आप से पूछिए: आज मुझे किस बात पर चिढ़ आई, और किस चीज़ के लिए तरसा? बस गिन लीजिए, बदलने की जल्दी मत कीजिए।

दूसरी बात। झटके से किया त्याग टिकता नहीं। पाण्डु का त्याग एक शाप के डर से आया था और एक वसन्त में टूट गया, मुद्गल का त्याग जीवन भर के अर्पित कर्म से पका था और निर्वाण तक गया। इसलिए अगर कभी सब छोड़कर भागने का मन हो, तो पहले उसी घर में, उसी काम में, शरीर, मन और बुद्धि से अर्पण करना सीखिए। भागने का मन अपने आप धीमा पड़ जाएगा, और अगर त्याग का समय सचमुच आया, तो वह पका हुआ आएगा।

तीसरी बात। कमल का पत्ता तालाब नहीं छोड़ता। रोज़ एक काम चुनिए, खाना बनाना, दुकान खोलना, किसी बड़े की दवा लाना, और शुरू करने से पहले मन में इतना कह दीजिए: "यह आपके लिए।" फल आए या न आए, वह काम आपको भिगोएगा नहीं।

अगली बार हम इसी अध्याय का बाकी हिस्सा सुनेंगे, जहाँ अज्ञान हटते ही ज्ञान सूर्य की तरह चमक उठता है, और ज्ञानी ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल में एक ही को देखता है।

आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आपके घर में वह कौन है, जो सबसे पहले जागता है और सबसे बाद में सोता है, और जिसे आपने कभी योगी नहीं कहा? नीचे उसके बारे में दो पंक्तियाँ लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्री कृष्ण।

भगवान को पाने के लिए घर छोड़ना ज़रूरी नहीं। घर को भगवान का कर देना काफ़ी है।

जय श्री कृष्ण।

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः । लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥ १० ॥
गीता 5.10 — अर्थ पढ़ें ›

तीन बातें

  1. संन्यास कपड़ों से नहीं, मन से पहचाना जाता है। "यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति", जो न चिढ़ता है, न तरसता है, वह घर में रहकर भी नित्यसंन्यासी है, जैसे मुद्गल। इस हफ़्ते एक दिन अपने आप से पूछिए: आज मुझे किस बात पर चिढ़ आई, और किस चीज़ के लिए तरसा? बस गिन लीजिए, बदलने की जल्दी मत कीजिए।
  2. झटके से किया त्याग टिकता नहीं। पाण्डु का त्याग एक शाप के डर से आया था और एक वसन्त में टूट गया, मुद्गल का त्याग जीवन भर के अर्पित कर्म से पका था और निर्वाण तक गया। इसलिए अगर कभी सब छोड़कर भागने का मन हो, तो पहले उसी घर में, उसी काम में, शरीर, मन और बुद्धि से अर्पण करना सीखिए। भागने का मन अपने आप धीमा पड़ जाएगा, और अगर त्याग का समय सचमुच आया, तो वह पका हुआ आएगा।
  3. कमल का पत्ता तालाब नहीं छोड़ता। रोज़ एक काम चुनिए, खाना बनाना, दुकान खोलना, किसी बड़े की दवा लाना, और शुरू करने से पहले मन में इतना कह दीजिए: "यह आपके लिए।" फल आए या न आए, वह काम आपको भिगोएगा नहीं।