संदेह को कैसे काटें
गीता 4.33–4.42 · 76 मिनट
गुरु से कैसे सीखें; श्रद्धा और संदेह
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप ।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥ ३३ ॥
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ ३४ ॥
आपके मन में एक सवाल है जो बरसों से पड़ा हुआ है। कोई छोटा-मोटा सवाल नहीं, वो सवाल जो रात को सोने से पहले लौट आता है: मैं जैसा जी रहा हूँ, वो ठीक है या नहीं? ईश्वर है या नहीं, और अगर है तो मुझसे उसका क्या लेना-देना? और दिक्कत ये है कि इस सवाल के साथ दो अलग-अलग रुकावटें हैं। पहली ये कि पूछें किससे। जिससे पूछने जाओ, डर लगता है कि वो हमें छोटा समझेगा, या हँसेगा, या ऐसा उत्तर देगा जो किताब से रटा हुआ हो। और दूसरी रुकावट उसके बाद की है। मान लीजिए कोई बहुत भला आदमी मिल भी गया, उसने बहुत अच्छी बात कही भी, तब भी भीतर से एक आवाज़ कहती है: "पता नहीं, सच ही होगा क्या?"
पहली रुकावट पूछने की है, दूसरी मानने की। और आज चौथे अध्याय के आख़िरी दस श्लोकों में श्रीकृष्ण इन्हीं दोनों के बारे में बात करते हैं। इसी को हमने आज का नाम दिया है: संदेह को कैसे काटें।
जय श्री कृष्ण।
आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का पंद्रहवाँ सत्संग है, और चौथे अध्याय का आख़िरी। पहले जल्दी से याद कर लें कि अब तक इस अध्याय में क्या हुआ। तेरहवें सत्संग में श्रीकृष्ण ने बताया कि यह योग कितना पुराना है, कि सूर्य से मनु और इक्ष्वाकु तक चला और फिर लुप्त हो गया, और "यदा यदा हि धर्मस्य" का वचन आया कि जब-जब धर्म की हानि होती है, वे स्वयं प्रकट होते हैं। पिछले सत्संग में, सोलहवें से बत्तीसवें श्लोक तक, उन्होंने कर्म में अकर्म देखना सिखाया, और यज्ञ के इतने रूप गिनाए: देवताओं को अर्पण, इन्द्रियों का संयम, दान, तप, स्वाध्याय, प्राणायाम। और बीच में वह श्लोक था, "ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ", जो बहुत-से घरों में भोजन से पहले बोला जाता है। बत्तीसवें श्लोक ने कहा था कि ये सारे यज्ञ कर्म से पैदा होते हैं, और इसे जानकर तुम मुक्त हो जाओगे। और पिछली बार जाते-जाते मैंने आपसे कहा था कि आगे श्रीकृष्ण ज्ञान के यज्ञ को सबसे ऊँचा बताएँगे, बताएँगे कि वह ज्ञान किससे और कैसे सीखा जाता है, और यह भी कि उसके रास्ते की सबसे बड़ी रुकावट क्या है, श्रद्धा या संशय। आज वही सब हमारे सामने है।
तो अब ज़रा सोचिए कि अर्जुन के मन में क्या चल रहा होगा। उनके सामने एक लम्बी सूची रखी गई है, इतने सारे यज्ञ, इतने सारे रास्ते। और स्वाभाविक सवाल ये है कि इनमें सबसे ऊपर कौन-सा? श्रीकृष्ण इस सवाल का उत्तर पूछे जाने से पहले ही दे देते हैं। तैंतीसवाँ श्लोक।
"श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप। सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते।" हे परन्तप, द्रव्य से होने वाले यज्ञ से ज्ञान का यज्ञ श्रेष्ठ है। क्योंकि हे पार्थ, सारे कर्म, बिना किसी कमी के, ज्ञान में आकर पूरे हो जाते हैं।
पहले शब्दों को देख लें। "द्रव्यमय" यानी जो द्रव्य से, वस्तुओं से हो, जैसे घी, अन्न, समिधा, दान की वस्तुएँ। "ज्ञानयज्ञ" यानी वो यज्ञ जिसमें अर्पण वस्तु का नहीं, समझ का होता है, जहाँ आदमी अपने भीतर के सच को जानने में खुद को लगाता है। और "परिसमाप्यते" का अर्थ है, पूरी तरह समाप्त होना, यानी अपनी मंज़िल पर पहुँच जाना।
हमारी टीका इस श्लोक की बात बहुत सीधे कहती है: दूसरे यज्ञ ऐसा फल देते हैं जो नश्वर है, और ज्ञान मुक्ति देता है, जो नश्वर नहीं। और सब कर्म ज्ञान में जाकर ऐसे पूरे होते हैं जैसे सब नदियाँ आख़िर में समुद्र में जा मिलती हैं। नदी कितनी भी दूर से चली हो, कितने भी मोड़ लिए हों, उसकी यात्रा समुद्र में पहुँचकर ही पूरी होती है। आचार्य शंकर इसे और खोलते हैं। वो कहते हैं कि द्रव्य वाला यज्ञ एक फल को शुरू करता है, जिसे फिर भोगना पड़ता है। पर ज्ञान का यज्ञ कोई नया फल शुरू नहीं करता, इसलिए वो ज़्यादा ऊँचा है। जैसे कोई हर महीने किस्त भरता रहे और हर किस्त के बाद अगली बाकी रहे, और कोई एक दिन पूरा कर्ज़ ही चुका दे। शंकर वही उपमा देते हैं जो हम दूसरे अध्याय में सुन चुके हैं: जब चारों ओर से पानी भर जाए, तो छोटे-छोटे कुओं का अलग से कोई काम नहीं रह जाता। ज्ञान वैसा ही भरा हुआ जलाशय है।
पर यहाँ एक बारीक बात नीलकण्ठ बताते हैं, जो पूरे महाभारत के टीकाकार हैं। श्लोक में "श्रेयान्" है, यानी "ज़्यादा श्रेष्ठ", तुलना वाला रूप, और इसी से पता चलता है कि बाकी यज्ञ भी अच्छे हैं, बस ज्ञान उनसे ज़्यादा श्रेष्ठ है। श्रीकृष्ण यह नहीं कह रहे कि जो दान करता है या घर में पूजा करता है, वो समय बरबाद कर रहा है। वो कह रहे हैं कि इन सबकी जड़ में जो समझ काम कर रही है, वही इन सबको अर्थ देती है। और तिलक महाराज जोड़ते हैं कि इसका मतलब यह नहीं कि ज्ञान के बाद कर्म छोड़ दिए जाएँ। कर्म चलते रहते हैं, पर ज्ञान और समबुद्धि से किए हुए कर्म का बोझ करने वाले को नहीं लगता। ज्ञान कर्म को ख़त्म नहीं करता, हल्का कर देता है।
अब आइए चौंतीसवें श्लोक पर, जहाँ से आज का असली प्रश्न शुरू होता है। श्रीकृष्ण ने कह दिया कि ज्ञान सबसे श्रेष्ठ है। तो अगला सवाल अपने आप खड़ा होता है: ये ज्ञान मिलता कैसे है? ये किसी दुकान में नहीं बिकता, किताब की दो पंक्तियों में नहीं समाता। तो कैसे?
"तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः।" उस ज्ञान को जानो, प्रणाम से, प्रश्न से और सेवा से। जो ज्ञानी तत्त्व को देख चुके हैं, वे तुम्हें उस ज्ञान का उपदेश करेंगे।
इस श्लोक में तीन चीज़ें हैं, और तीनों के पीछे बड़ी गहराई है। पहली, "प्रणिपात"। शंकर और मधुसूदन सरस्वती दोनों इसका अर्थ लगाते हैं, पूरी तरह नीचे झुक जाना, सीधा लेटकर किया हुआ लम्बा नमस्कार। पर इसे कमर झुकाने की रस्म मत समझिए। ये उस मन की स्थिति का नाम है जो कहता है: मैं यहाँ कुछ पाने आया हूँ, और जो पाने आया हूँ वो मेरे पास अभी है नहीं। दूसरी, "परिप्रश्न"। प्रश्न नहीं, परि-प्रश्न, यानी चारों ओर से, गहराई से, बार-बार पूछना। शंकर लिखते हैं कि प्रश्न ऐसे होने चाहिए: बन्धन क्या है, मोक्ष क्या है, विद्या क्या है, अविद्या क्या है। और श्रीधर स्वामी का सवाल तो और भी सीधा है: ये मेरा संसार आया कहाँ से, और ये कैसे समाप्त होगा। और तीसरी, "सेवा", यानी गुरु की शुश्रूषा, उनके पास रहकर उनके काम आना।
ध्यान दीजिए कि क्रम क्या है। पहले झुकना, फिर पूछना, फिर सेवा। और हमारी टीका इस श्लोक में दो बातें पक्की करती है। पहली, कि जिनसे सीखा जाए, उनमें शास्त्र का ज्ञान भी होना चाहिए और तत्त्व का अनुभव भी, दोनों। और दूसरी, कि यहाँ "प्रश्न" का मतलब सच्ची जिज्ञासा है, केवल तर्क के लिए तर्क करना नहीं।
और यही बात श्लोक के दूसरे हिस्से में है: "ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः", ज्ञानी और तत्त्व को देखने वाले। एक ही बात दो शब्दों में क्यों? नीलकण्ठ बताते हैं कि "ज्ञानी" वो है जो ग्रन्थ जानता है, और "तत्त्वदर्शी" वो जिसने अनुभव किया है। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं कि शब्दों और तर्कों के बड़े विद्वान भी हो सकते हैं, पर जिसने स्वयं साक्षात्कार किया है, उसी का उपदेश फल देता है। और वो जोड़ते हैं कि श्लोक का बहुवचन आदर के लिए है। जिसे सच्चा तत्त्वदर्शी मिल गया, उसे दूसरे-तीसरे गुरु के पास भटकने की ज़रूरत नहीं। आज, जब हर सुबह एक नया वीडियो, एक नया उपदेशक सामने आ जाता है, मुझे यह बात बहुत सुकून देती है।
अब मैं आपको महाभारत का एक ऐसा दृश्य सुनाना चाहता हूँ, जो इस श्लोक को चलती हुई तस्वीर बना देता है। यह दृश्य युद्ध के बाद का है। आपने जो कथा अब तक सुनी, उसमें सञ्जय धृतराष्ट्र को गीता सुना रहे हैं, भीष्म के गिर जाने के बाद। पर आगे जाकर, जब युद्ध ख़त्म हो चुका है, यही भीष्म बाणों की शय्या पर लेटे हैं, और उनके पास वो आदमी पहुँचता है जिसे सबसे ज़्यादा सीखना है, युधिष्ठिर। यह कथा महाभारत के शान्ति पर्व में है।
युधिष्ठिर पर शोक सवार है। उसी पर्व के पहले अध्यायों में वे अपने को बन्धुओं का घाती कहते हैं। और इसी हालत में वे एक दिन श्रीकृष्ण के पास जाते हैं। श्रीकृष्ण वहाँ ध्यान में बैठे हैं, इतने स्थिर जैसे हवा रहित स्थान में दीपक की लौ। युधिष्ठिर चकित होकर पूछते हैं कि आप ऐसे क्यों बैठे हैं। और सुनिए कि वे कैसे पूछते हैं। वे कहते हैं, मैं शरण में आया हूँ, मुझे अगर सुनने के योग्य समझें, तो "छिन्धि मे संशयं देव", हे देव, मेरा संशय काट दीजिए। शान्ति पर्व के पैंतालीसवें अध्याय का सातवाँ श्लोक। ये शब्द याद रखिएगा, "संशय काट दीजिए", क्योंकि आज के श्लोकों का अन्त इसी शब्द पर होगा।
श्रीकृष्ण मुस्कुराकर बताते हैं कि वो ध्यान में भीष्म के पास चले गए थे, क्योंकि भीष्म उनका ध्यान कर रहे थे। और वो युधिष्ठिर से कहते हैं कि भीष्म के पास जाओ, उनके चरण छूकर वो पूछो जो तुम्हारे मन में है, क्योंकि भीष्म के अस्त होते ही ज्ञान कम हो जाएगा। यह वही श्रीकृष्ण हैं जिन्होंने अर्जुन को गीता दी, और देखिए कि वे अपने शिष्य को दूसरे गुरु के पास भेजने में ज़रा नहीं हिचकते।
अब वह दृश्य, भीष्म की शय्या के पास। नारद वहाँ हैं, ऋषि हैं, बचे हुए राजा हैं, धृतराष्ट्र हैं, श्रीकृष्ण हैं, और पाँचों पाण्डव। नारद कहते हैं कि समय आ गया है, भीष्म सूर्य की तरह अस्त होने वाले हैं, उनसे अपने मन के संशय पूछ लो। और पाठ कहता है: राजा भीष्म के पास गए, पर पूछने में असमर्थ होकर एक-दूसरे को देखने लगे। यही वह मुश्किल है जिसकी बात हम कर रहे थे। ज्ञानी सामने लेटे हैं, पर पहला शब्द किसी के मुँह से नहीं निकलता।
युधिष्ठिर श्रीकृष्ण से कहते हैं कि आपके सिवा कोई पितामह से पूछने में समर्थ नहीं। भीष्म कहते हैं कि आपकी कृपा से मेरी पीड़ा, थकान और मोह चले गए, और जो हुआ, हो रहा है और होगा, वो मैं हथेली में रखे फल की तरह देखता हूँ। फिर भीष्म श्रीकृष्ण से पूछते हैं, जो मुझे बहुत प्यारा लगा: आपने ख़ुद पाण्डव को ये बातें क्यों नहीं कहीं? श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं आपका यश और बढ़ाना चाहता हूँ। जो ख़ुद गुरु हैं, वो भी चुपचाप पीछे हटकर दूसरे को गुरु बनने की जगह देते हैं। शान्ति पर्व, तिरपनवाँ अध्याय।
और अब वो क्षण, जिसके लिए मैंने यह दृश्य चुना। भीष्म कहते हैं कि मैं बोलूँगा, पर पूछें युधिष्ठिर ही। तब श्रीकृष्ण बताते हैं कि युधिष्ठिर क्यों नहीं आ रहे: वो बहुत लज्जित हैं, शाप से डरे हुए हैं, क्योंकि जिन पूज्य गुरुजनों और बन्धुओं का आदर-सत्कार करना था, उन्हीं को उन्होंने बाणों से बींध दिया। भीष्म उत्तर देते हैं कि क्षत्रिय का धर्म ही युद्ध में देह त्यागना और युद्ध में लड़ना है, इसमें कोई पाप नहीं। और तब पाठ कहता है, युधिष्ठिर एक विनीत शिष्य की तरह पास आए, उन्होंने पितामह के चरण पकड़ लिए। भीष्म प्रसन्न हुए, उनका सिर सूँघा और कहा, "बैठो।" और फिर कहा, "मां पृच्छ तात विस्रब्धं", हे तात, मुझसे निःसंकोच पूछो, "मा भैस्त्वं", तुम डरो मत।
देखिए, चौंतीसवाँ श्लोक एक ही दृश्य में पूरा हो गया। चरण पकड़ना, यही प्रणिपात। पूछने की इजाज़त पाकर पूछना, यही परिप्रश्न। पाण्डवों का शय्या के पास रहकर सेवा करना, यही सेवा। और सामने वह जो सब जानता है, तत्त्वदर्शी। अगले अध्याय में युधिष्ठिर प्रणाम करके पूछते हैं, और प्रश्नों का वह सिलसिला शुरू होता है जो महाभारत के सबसे बड़े हिस्सों में से एक बन जाता है।
एक बात और, जो इस दृश्य में छिपी है। युधिष्ठिर ने सीखने की शुरुआत अपनी शर्म को पार करके की। गुरु से सीखने में सबसे बड़ी बाधा बहुत बार गुरु की योग्यता नहीं, हमारी अपनी लज्जा होती है। हम सोचते हैं, मुझे तो पहले से पता होना चाहिए था। अस्पताल में किसी नए डॉक्टर को देखिए, जो रात की ड्यूटी में एक मरीज़ की रिपोर्ट समझ नहीं पा रहा। सीनियर को फ़ोन करने में उसे झिझक होती है, कि वे सोचेंगे इसे इतना भी नहीं आता। और वही झिझक कभी-कभी मरीज़ पर भारी पड़ती है। जो सीनियर सचमुच अच्छा होता है, वो फ़ोन उठाकर सबसे पहले यही कहता है, "अच्छा किया जो पूछ लिया।" भीष्म का वाक्य, "डरो मत", वही है जिसे कोई भी सच्चा गुरु अपने शिष्य के लिए रखता है।
पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने कह दिया कि ज्ञान गुरु से मिलता है, झुककर, पूछकर, सेवा करके। तो क्या ज्ञान सिर्फ़ उसी के पास पहुँचता है जो झुककर माँगे? और जब वह मिल जाए, तब आदमी को क्या मिलता है? वो अगले दो श्लोकों में है, और उनमें श्रीकृष्ण एक ऐसा वादा करते हैं जो पूरे चौथे अध्याय का सबसे बड़ा आश्वासन है, उन लोगों के लिए जो अपने को सबसे बड़ा पापी मानते हैं।
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥ ३५ ॥
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ॥ ३६ ॥
इन दो श्लोकों में श्रीकृष्ण ने एक के बाद एक दो वादे किए हैं, और दोनों वादे ऐसे हैं कि पहली बार सुनने पर भरोसा नहीं होता। पहला, कि ज्ञान मिलने के बाद तुम्हें ऐसा मोह फिर नहीं होगा। और दूसरा, कि अगर तुम सब पापियों में सबसे बड़े पापी भी हो, तो भी इसी नौका से पार हो जाओगे।
पैंतीसवाँ श्लोक। "यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव। येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि।" जिसे जानकर, हे पाण्डव, तुम फिर इस प्रकार के मोह में नहीं पड़ोगे। और जिसके द्वारा तुम सब प्राणियों को, बिना किसी को छोड़े, पहले अपने में देखोगे, और फिर मुझमें।
श्लोक में "मोहमेवं" है, यानी "इस प्रकार के मोह को"। आचार्य शंकर इसका अर्थ यों लगाते हैं: जैसे तुम इस समय मोह में पड़े हुए हो। श्रीकृष्ण किसी अनजाने, अमूर्त मोह की बात नहीं कर रहे। वो उसी मोह की बात कर रहे हैं जिसमें अर्जुन पहले अध्याय में डूबे थे। और मधुसूदन सरस्वती साफ़ बताते हैं कि यह मोह "बन्धुओं के वध आदि से पैदा हुआ भ्रम" है। आपको याद होगा, पहले सत्संग में हमने धृतराष्ट्र के उस पहले शब्द पर बात की थी, "मामकाः", मेरे अपने। और तब कहा था कि "मेरे" और "उनके" की जो लकीर खिंच जाती है, वही इस सारे युद्ध की जड़ है और वही अर्जुन के शोक की भी। अब देखिए कि पैंतीसवाँ श्लोक उस लकीर के साथ क्या करता है।
श्रीकृष्ण कहते हैं, ज्ञान मिलने पर तुम सब प्राणियों को पहले अपने में देखोगे, फिर मुझमें। श्रीधर स्वामी इसे ऐसे कहते हैं: पिता, पुत्र और सारे सम्बन्ध अपनी ही अविद्या के रचे हुए हैं, ज्ञान आने पर वे आत्मा से अलग नहीं दिखते, और फिर वह आत्मा परमात्मा से अलग नहीं दिखता। रामानुजाचार्य अपने ढंग से कहते हैं कि जब देह को ही आत्मा मानने का मोह हट जाता है, तब सब आत्माएँ अपने स्वरूप में एक-सी दिखती हैं। और तिलक महाराज बताते हैं कि भागवत पुराण भी भक्त की पहचान यही बताता है कि वो सब प्राणियों में भगवान को और भगवान में सब प्राणियों को देखता है।
आचार्य अलग-अलग रास्ते से चलते हैं, पर पहुँचते एक जगह हैं: "मेरे" और "तेरे" की लकीर पतली होने लगती है। इसका मतलब यह नहीं कि माँ अब माँ नहीं रही और बेटा बेटा नहीं रहा। इसका मतलब यह है कि जिस दिन आपको दिख जाए कि जिस जीवन ने आपको जिलाया है वही सामने वाले को भी जिला रहा है, उस दिन किसी के साथ अन्याय करना मुश्किल हो जाता है, और घृणा टिक नहीं पाती। किसी पुराने झगड़े में फँसे आदमी से पूछिए कि उसे क्या चुभता है। वो कहेगा, "वो तो बिलकुल अलग है, उसे मेरी परवाह ही नहीं।" यही "अलग" होने का भाव झगड़ों का ईंधन है, और ज्ञान उस ईंधन को ही ख़त्म कर देता है।
संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक के पास यह पंक्ति रखते हैं कि जब गुरु की कृपा होगी, तब ज्ञान के प्रकाश से मोह का अन्धकार जाएगा। और एक बात और, जो वे पहले कहते हैं: जिनके वचन से मन निडर हो जाता है, ब्रह्म की तरह संशय से रहित। जी, "संशय से रहित", यह शब्द इस सत्संग का धागा है। हम बार-बार इस पर लौटेंगे।
पर हर वादा एक कसौटी माँगता है। श्रीकृष्ण ने कहा, "फिर मोह नहीं होगा।" क्या सचमुच अर्जुन को फिर कभी मोह नहीं हुआ? इस सवाल का उत्तर महाभारत ख़ुद देता है, और बड़ी ईमानदारी से देता है। वो हम इसी सत्संग में आगे सुनेंगे, चालीसवें श्लोक के पास।
पर इससे पहले कि हम छत्तीसवें श्लोक में उतरें, एक छोटी-सी बात आपसे कहना चाहता हूँ। हम चौथे अध्याय के आख़िरी पड़ाव पर हैं, और ये वो जगह है जहाँ बहुत-से लोग सोचते हैं कि गुरु और श्रद्धा की बात तो सुन ली, अब आगे क्या रह गया। पर आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। जो आदमी अगले श्लोक के आश्वासन पर ही उठ जाए, वो यह सोचकर चला जाएगा कि गीता हर बात माफ़ कर देती है, और उस तलवार को नहीं सुन पाएगा जो इसी सत्संग के आख़िर में आती है और जिसके बिना यह अध्याय अधूरा है। तो अगर आप ये सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की ये यात्रा बीच में न टूटे। और आज का हिस्सा आख़िर तक सुनिए।
अब छत्तीसवाँ श्लोक, जिसे सुनकर मेरा मन हमेशा थोड़ा ठहर जाता है। "अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः। सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि।" भले ही तुम सब पापियों से भी बढ़कर पाप करने वाले हो, तब भी तुम ज्ञान की नौका से ही सारे पाप को पार कर जाओगे।
शब्द देखिए। "पापकृत्तमः", यानी पाप करने वालों में भी सबसे अधिक। श्रीकृष्ण ने यहाँ जान-बूझकर सबसे ऊँची तुलना चुनी। "ज्ञानप्लव" यानी ज्ञान की नाव। "वृजिन" यानी पाप, जिसे शंकर "पाप का समुद्र" कहते हैं। और "सन्तरिष्यसि" यानी तैरकर पार उतर जाओगे। पर शंकर यहाँ एक बात और जोड़ते हैं, जो चौंकाती है: जो मुक्ति चाहता है, उसके लिए तो धर्म भी इस जगह पाप ही कहा जाता है। यानी "वृजिन" में सिर्फ़ बुरे कर्म नहीं, वे अच्छे कर्म भी आते हैं जो बन्धन बनाए रखते हैं। मधुसूदन सरस्वती भी यही कहते हैं।
और मधुसूदन एक और बारीकी बताते हैं, जो मुझे सबसे प्यारी लगी। वो कहते हैं कि श्लोक के आरम्भ का "अपि चेदसि", यानी "भले ही अगर तुम हो", ऐसा पद है जो किसी असम्भव बात को मान लेने के लिए आता है। यानी श्रीकृष्ण वास्तव में यह नहीं कह रहे कि अर्जुन तुम सबसे बड़े पापी हो। वो कह रहे हैं कि मान भी लें कि कोई सबसे बड़ा पापी हो, तब भी, ज्ञान की महिमा बताने के लिए। और यह नौका "ज्ञान ही", कोई और नहीं। "एव" शब्द इसी के लिए है।
संत ज्ञानेश्वर इसी श्लोक पर कहते हैं कि तुम भले ही पापों की खान हो, भ्रान्ति का समुद्र हो, मोह का पहाड़ हो, तब भी ज्ञान की शक्ति के सामने यह सब छोटा पड़ जाता है। "मैं तो बहुत गिर चुका हूँ", यह भाव बहुतों के मन में रहता है। किसी ने बरसों माँ-बाप की सुध नहीं ली और अब वो नहीं रहे। किसी ने किसी का दिल बहुत दुखाया और अब माफ़ी माँगने का मौका नहीं। किसी ने ऐसा काम किया जो अब भी रात को सोने नहीं देता। ऐसे आदमी के लिए यह श्लोक है। यह कहता है कि दरवाज़ा बन्द नहीं हुआ।
पर यहाँ मैं आपको वह दृश्य याद दिलाना चाहता हूँ, जो इस श्लोक को सबसे गहरे अर्थ में खोलता है। आपको याद होगा, हमने कुछ देर पहले युधिष्ठिर को भीष्म के चरणों में बैठे देखा था। पर वहाँ पहुँचने से बहुत पहले की एक घड़ी है, शान्ति पर्व का छब्बीसवाँ अध्याय, जहाँ युधिष्ठिर ने तय किया था कि वो जीएँगे ही नहीं।
वो ऋषियों के सामने बैठकर कहते हैं: बालक अभिमन्यु, द्रौपदी के पाँचों पुत्र, धृष्टद्युम्न, विराट, द्रुपद, इन सबके मारे जाने के बाद शोक मुझे नहीं छोड़ता। मैं बन्धुओं का घाती हूँ, राज्य का लोभी हूँ। जिन भीष्म की गोद में खेलकर मैं बड़ा हुआ, उन्हें मैंने युद्ध में गिरवाया। वो आचार्य द्रोण को याद करते हैं, जिनसे उन्होंने हाथी के मारे जाने पर "अश्वत्थामा मारा गया" कहा था, वही दिन जो हमने ग्यारहवें सत्संग में सुना था। फिर वे अपने बड़े भाई कर्ण को याद करते हैं, जो युद्ध में कभी पीठ दिखाकर नहीं भागे और जिन्हें उन्होंने मरवाया, और पूछते हैं: "मुझसे अधिक पापी, अत्यन्त उग्र कौन है?" फिर कहते हैं, मैं अपराधी, पापी और पृथ्वी के नाश का कारण हूँ, इसलिए यहीं बैठकर अपना शरीर सुखा दूँगा। मुझे प्रायोपवेशन में बैठा जानिए, मैं न खाऊँगा, न पानी पिऊँगा।
ध्यान दीजिए। यह किसी सामान्य आदमी की बात नहीं है। ये वे हैं जिन्हें सारे लोग धर्मराज कहते हैं। और अपने बारे में उनका फ़ैसला है: "मुझसे बड़ा पापी कौन है।" यह वही बात है जो छत्तीसवें श्लोक में कही गई है: सबसे बड़ा पापी, "पापकृत्तमः"। तब व्यास मुनि उन्हें रोककर कहते हैं, "ऐसा न करो।" और बाद में, इकतीसवें अध्याय में, जब युधिष्ठिर कहते हैं कि वे कर्म मुझे जलाते और पकाते हैं, तब व्यास उनसे वही बात कहते हैं जो इस नौका की शर्त है: प्रायश्चित्त बताए गए हैं, पर वे शरीर वाले के लिए हैं। इसलिए तुम जीते हुए प्रायश्चित्त करोगे, और बिना किए मरोगे तो कष्ट पाओगे।
सुना आपने? नाव पर बैठने के लिए ज़िन्दा रहना पड़ता है। शोक में आदमी अक्सर सोचता है कि इस बोझ से बड़ा कोई उपाय है तो बस यही कि मैं ख़त्म हो जाऊँ। पर पाप का समुद्र पार करने के लिए पहले यह मानना पड़ता है कि पार करने वाला अभी मौजूद है। श्रीकृष्ण का "सन्तरिष्यसि", तुम पार हो जाओगे, भविष्य का वचन है, और भविष्य का वचन उसी को दिया जाता है जिसे आगे जीना है।
और आगे चलकर युधिष्ठिर की नाव क्या बनी, यह भी महाभारत में दिखता है। श्रीकृष्ण उन्हें भीष्म के पास भेजते हैं, जहाँ वही सीखना होता है जो चौंतीसवें श्लोक में था, और शान्ति पर्व के तैंतीसवें और चौंतीसवें अध्याय तो पापों के प्रायश्चित्तों का विधान ही गिनाते हैं। श्रीकृष्ण का वादा सच्चा है, पर वो एक रात का जादू नहीं है। नाव तैरती है, पर पार पहुँचने में समय लगता है।
पर अभी एक बात बाकी है। श्रीधर स्वामी इस श्लोक पर एक सवाल उठाते हैं, जो हम सबके मन में उठ सकता है। नौका से तो आदमी पार उतर जाता है, पर पानी का समुद्र तो वहीं का वहीं रहता है। तो क्या ज्ञान पाप को सिर्फ़ पार कर देता है, या उसे मिटा भी देता है? इस सवाल के उत्तर में श्रीकृष्ण अगले ही श्लोक में एक बिलकुल नया चित्र खींचते हैं, और वो नौका का नहीं, आग का है।
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥ ३७ ॥
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥ ३८ ॥
एक अच्छा सवाल कई बार जवाब से भी ज़्यादा काम का होता है। श्रीधर स्वामी का वो सवाल, कि नौका पार करा देती है पर समुद्र तो वहीं रहता है, श्रीकृष्ण ने जैसे उनके पूछने से पहले सुन लिया था। सैंतीसवाँ श्लोक उसी का उत्तर है।
"यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन। ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा।" हे अर्जुन, जैसे भली-भाँति जलती हुई आग ईंधन को राख कर देती है, वैसे ही ज्ञान की आग सब कर्मों को राख कर देती है।
"भस्मसात्" का अर्थ है, ऐसी राख जिसमें से फिर कुछ नहीं उगता। जला हुआ बीज बोया नहीं जा सकता। यही असली बात है। नौका पार करा देती है, पर कर्म का बीज बचा रहे तो कभी भी अंकुर फूट सकता है। आग वो बीज ही ख़त्म कर देती है। आचार्य शंकर यहाँ एक सावधानी बरतते हैं। वो कहते हैं कि ज्ञान सचमुच की आग की तरह लकड़ी नहीं जलाता। असल में सही समझ ही वो कारण है कि कर्म अपना बीज खो देते हैं, यानी आगे फल देने की ताकत उनमें नहीं रहती। मुझे यह बात बहुत सच्ची लगती है। सोचिए किसी ऐसे आदमी को, जिसने जवानी में गुस्से में अपने पिता से कड़वी बात कह दी थी, और फिर बरसों तक हर बार उनके सामने जाते हुए वह बात उसके गले में अटकी रही। फिर एक दिन उसके अपने बेटे ने उससे वैसी ही बात कह दी, और उस रात उसे पहली बार समझ आया कि पिता ने उस दिन क्या सहा होगा, और यह भी कि पिता ने उसे कब का माफ़ कर दिया था। बात वही है, दिन वही है, पर समझ बदलते ही वह याद काँटा नहीं रहती। उसमें से आगे दुख उगाने वाला बीज निकल जाता है। शंकर जिस "बीज खो देने" की बात करते हैं, उसका एक छोटा-सा रूप हम अपने घरों में भी देख लेते हैं।
पर अब एक सवाल उठता है। अगर ज्ञान सब कर्मों को जला देता है, तो ज्ञानी को बीमारी क्यों आती है? बुढ़ापा क्यों आता है? हमारी टीका साफ़ उत्तर देती है: ज्ञान पिछले कर्मों के जमा हुए फल को भी जलाता है और आगे होने वाले कर्मों को भी। पर जिन कर्मों ने इस जीवन में फल देना शुरू कर दिया है, वे छोड़े हुए बाण की तरह अपना वेग पूरा करते हैं। शंकर और श्रीधर स्वामी दोनों यही कहते हैं कि जिस कर्म से यह देह बनी है, वह उपभोग से ही चुकता है। बाण धनुष से छूट चुका है, अब धनुष तोड़ दें तब भी वह अपनी दूरी तय करेगा। इसका मतलब यह नहीं कि आग असफल रही। आग उस बाण पर नहीं, उन सब बाणों पर काम करती है जो अभी तरकश में हैं।
मधुसूदन सरस्वती इसी जगह उपनिषद् की एक पंक्ति याद दिलाते हैं: उस परम को देख लेने पर हृदय की गाँठ खुल जाती है, सारे संशय कट जाते हैं, और इसके कर्म क्षीण हो जाते हैं। देखिए, उपनिषद् में भी हृदय की गाँठ और संशय का कटना साथ-साथ आता है। आज के सत्संग का धागा यहाँ भी है।
संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक को एक बहुत बड़े चित्र में रखते हैं। वो कहते हैं, प्रलय के समय की वह आग, जो हवा के झोंके से भड़ककर पानी तक को सोख लेती है, उसके सामने घास और लकड़ी की क्या बिसात? हमारे जीवन के पाप, पछतावे, पुरानी भूलें, हमें पहाड़ जैसे लगते हैं, पर वे सब जलते हुए सूखे ईंधन हैं, अगर आग सच में जल उठे। असली सवाल यह नहीं कि ईंधन कितना है। असली सवाल यह है कि आग जली या नहीं।
अब एक बात, जो मुझे महाभारत का दृश्य पढ़कर सूझी। अभी थोड़ी देर पहले हमने युधिष्ठिर के वे शब्द सुने थे, शान्ति पर्व के इकतीसवें अध्याय में, कि वे कर्म मुझे जलाते हैं और पकाते हैं। पाठ में वाक्य यही है। जिसने बन्धुओं को मरवाया, उसे उसके अपने कर्म जला रहे हैं। और सैंतीसवाँ श्लोक उलटी तस्वीर दिखाता है। कर्म आदमी को जलाते हैं, जब तक आग उनके पास होती है। और जब आग आदमी के पास आ जाती है, यानी ज्ञान की आग, तब कर्म जलते हैं और आदमी बचता है। यही फ़र्क़ है। एक ही आग है, पर इस पर निर्भर है कि वो आपको जला रही है, या आपके बोझ को।
अब अड़तीसवाँ श्लोक। "न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते। तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति।" इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निश्चय ही कुछ नहीं है। योग में सिद्ध हुआ आदमी उसे समय पाकर अपने भीतर स्वयं पा लेता है।
पहली पंक्ति सीधी है। संत ज्ञानेश्वर इस पर बहुत देर ठहरते हैं। वो कहते हैं कि ज्ञान की पवित्रता से तुलना करने को कुछ मिलता ही नहीं, अमृत के स्वाद को अमृत ही कहना पड़ता है, उसी तरह ज्ञान की उपमा ज्ञान से ही दी जा सकती है। मधुसूदन सरस्वती इसका कारण बताते हैं: दूसरी चीज़ें पाप को ऊपर से धोती हैं, पर अज्ञान की जड़ बनी रहती है, इसलिए पाप फिर उग सकता है। ज्ञान अज्ञान को ही हटाता है, तब पाप जड़ से जाता है।
दूसरी पंक्ति में तीन शब्द हैं जिन्हें ध्यान से पकड़ना है। पहला, "स्वयं", अपने आप। दूसरा, "कालेन", समय पाकर। तीसरा, "योगसंसिद्धः", योग में सिद्ध होकर। शंकर कहते हैं कि यह योग कर्मयोग भी है और ध्यान का योग भी। श्रीधर स्वामी बताते हैं कि मन को शुद्ध करने वाले कर्म के बिना यह ज्ञान नहीं मिलता, और मधुसूदन यह कि योग्य बना हुआ आदमी उसे अपने ही अन्तःकरण में पाता है, किसी दूसरे का दिया हुआ नहीं। नीलकण्ठ "कालेन" पर एक बात जोड़ते हैं, कि इससे पता चलता है कि ज्ञान लम्बे प्रयत्न से सधता है।
ध्यान दीजिए कि हम चौंतीसवें श्लोक से यहाँ तक आकर कैसे एक नए मोड़ पर पहुँचे हैं। चौंतीसवें ने कहा था कि ज्ञानी उपदेश करेंगे। अड़तीसवाँ कहता है कि पाना तुम्हें स्वयं पड़ेगा। गुरु तलवार देता है, उसे चलाना शिष्य को ही है। यह बात आख़िरी श्लोक में और साफ़ होगी। तिलक महाराज इसी जगह कहते हैं कि ज्ञान पाने के दो मार्ग हैं: एक बुद्धि का, जिसमें आदमी निष्काम कर्म करते-करते अपनी ही समझ से ज्ञान तक पहुँचता है, और दूसरा श्रद्धा का। यह अड़तीसवाँ श्लोक पहले मार्ग का है।
और अब वह कथा, जिसमें "स्वयं" और "समय" दोनों हैं। महाभारत के आदि पर्व में, तीसरे अध्याय में, आचार्य धौम्य के तीन शिष्य हैं: उपमन्यु, आरुणि और बैद। उनमें से पहले आरुणि की कथा सुनिए, जो पाठ में ज़रा-सी है, पर बहुत गहरी है।
आचार्य ने आरुणि से कहा, "जाओ, खेत की मेड़ की दरार बाँध दो।" वो गया, पर दरार बाँध नहीं पाया। पाठ कहता है कि बहुत परेशान होकर उसे एक उपाय सूझा, और वो खुद उस दरार में लेट गया। उसके लेटने से पानी रुक गया। कुछ समय बाद आचार्य ने पूछा कि आरुणि कहाँ गया, और दूसरे शिष्यों के साथ उसे खोजने निकले। वहाँ पुकारा, "हे आरुणि, कहाँ हो? आओ, वत्स!"
आचार्य की आवाज़ सुनकर आरुणि तुरन्त मेड़ तोड़कर उठा और सामने आ खड़ा हुआ। उसने कहा, "पानी किसी और तरह नहीं रुक रहा था, इसलिए मैं उसे रोकने के लिए दरार में लेटा था। आपकी आवाज़ सुनते ही मैं मेड़ तोड़कर आपके पास आ गया हूँ। मैं आपको प्रणाम करता हूँ, आज्ञा दें, मैं क्या करूँ?"
और अब आचार्य के शब्द। उन्होंने कहा, "क्योंकि तुम मेड़ को तोड़कर उठे हो, इसलिए तुम उद्दालक नाम से जाने जाओगे।" और फिर: "क्योंकि तुमने मेरी बात का पालन किया, इसलिए तुम्हारा कल्याण होगा। सब वेद और सब धर्मशास्त्र तुम्हारे मन में स्वयं प्रकट होंगे।" "स्वयं प्रकट होंगे", पाठ में यही शब्द है, "प्रतिभास्यन्ति"।
सोचिए। इस कथा में हमें वेद-पाठ नहीं दिखता। दिखता है एक शिष्य, जिसे मेड़ बाँधनी थी, और जिसने जब कोई और उपाय नहीं देखा तो ख़ुद को ही उसमें लगा दिया। और फिर गुरु का वचन, कि अब वेद तुम्हारे मन में अपने आप चमकेंगे। यही अड़तीसवें श्लोक की बात है: जो आदमी अपने योग में पक गया है, सेवा में, कर्म में, आज्ञा-पालन में, समय पाकर वही ज्ञान उसके भीतर से प्रकट होता है। यह कथा हमें यह भी सिखाती है कि "समय" का मतलब ख़ाली इन्तज़ार नहीं है। आरुणि खाली नहीं बैठा था, वह पानी के बीच लेटा था। जब हम कहते हैं कि कुछ चीज़ें समय लेती हैं, तब हम अक्सर इसका अर्थ यह निकालते हैं कि बस रुके रहो। श्रीकृष्ण का "कालेन" यह नहीं कहता। वो कहता है कि योग में लगे रहो, और समय अपना काम करेगा।
पर अभी एक बात बाकी है। अड़तीसवाँ श्लोक पहला मार्ग था: अपने कर्म और अपनी समझ से, समय लगाकर ज्ञान तक पहुँचना। लेकिन हर आदमी के पास इतना समय और इतनी सधी हुई बुद्धि नहीं होती। तो जिसके पास यह नहीं है, उसके लिए क्या? अगला श्लोक उसके लिए है, और उसमें वो शब्द आता है जो इस पूरे सत्संग का दिल है: श्रद्धा।
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥ ३९ ॥
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥ ४० ॥
ये दो श्लोक एक दूसरे के सामने रखे गए आईने हैं। उनमें से एक में वो आदमी है जो श्रद्धा से चलता है, और दूसरे में वो जो संशय में रुका हुआ है। पहले का अन्त शान्ति है, और दूसरे का अन्त है "न यह लोक, न परलोक, न सुख"।
उनतालीसवाँ श्लोक। "श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः। ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति।" श्रद्धावान्, उसमें लगा हुआ और इन्द्रियों को वश में रखने वाला मनुष्य ज्ञान पाता है। और ज्ञान पाकर वह जल्दी ही परम शान्ति पर पहुँच जाता है।
इस श्लोक की सबसे सुन्दर बात ये है कि इसमें तीन शर्तें हैं, और हर शर्त एक ख़ास गड़बड़ी को रोकने के लिए है। आचार्य शंकर और नीलकण्ठ दोनों इसे ऐसे समझाते हैं। पहली शर्त, श्रद्धा। पर कोई श्रद्धा तो रखता है और फिर भी आलसी रहता है, मन से चलता है पर पैर से नहीं। इसलिए दूसरी शर्त, "तत्परः", यानी उसी में पूरी तरह लगा हुआ। फिर कोई श्रद्धा भी रखता है, लगा भी रहता है, पर इन्द्रियाँ उसे इधर-उधर खींच लेती हैं। इसलिए तीसरी शर्त, "संयतेन्द्रियः", यानी जिसने इन्द्रियों को विषयों से लौटा लिया है। हमारी टीका इसी को छोटे में कहती है: श्रद्धा मार्ग खोलती है, तत्परता उसमें लगाए रखती है, और इन्द्रिय-संयम मन को भटकने से रोकता है, तीनों ज़रूरी हैं।
अब "श्रद्धा" क्या है? इसे अन्धविश्वास मत समझिए। श्रीधर स्वामी इसे कहते हैं, गुरु के बताए अर्थ में "आस्तिक्य बुद्धि", यानी यह पक्का भरोसा कि हाँ, ऐसा ही है। मधुसूदन सरस्वती भी गुरु और वेदान्त के वाक्यों में यही भरोसा श्रद्धा कहते हैं। सोचिए, आप किसी अनजान शहर में हैं, और नक्शा कहता है अगला मोड़ दाएँ है। उस पर पहले से भरोसा किए बिना आप एक क़दम नहीं चल सकते, और चलकर ही पता चलता है कि नक्शा सही था। श्रद्धा वही भरोसा है जो चलने से पहले चाहिए, और चलने के बाद पक्का हो जाता है।
और आचार्य शंकर यहाँ एक बहुत ईमानदार बात कहते हैं। वो कहते हैं कि प्रणाम, सेवा जैसी बाहरी चीज़ें पक्की नहीं होतीं, क्योंकि कोई छली भी ऐसा कर सकता है, कोई झूठे ढोंग से भी सेवा का दिखावा कर सकता है। पर श्रद्धा, तत्परता और संयम, ये तीनों पक्के साधन हैं, क्योंकि ये भीतर की चीज़ें हैं, इन्हें दिखावे से नहीं पाया जा सकता। यानी चौंतीसवें श्लोक में जो बाहर का रूप था, उसे उनतालीसवाँ भीतर का रूप देता है।
अब इन तीनों शर्तों का सबसे जीवित उदाहरण मुझे वही कथा लगती है जिसके एक शिष्य को हम आरुणि के साथ पीछे छोड़ आए थे: उपमन्यु। आदि पर्व का वही तीसरा अध्याय।
आचार्य धौम्य ने उपमन्यु से कहा, "गायों की रखवाली करो।" वो दिन भर गायें चराता और शाम को लौटता, और हर बार मोटा-ताज़ा दिखता। आचार्य ने पूछा, "किससे पेट भरते हो?" उसने कहा, "भिक्षा से।" आचार्य बोले, "मुझे सौंपे बिना भिक्षा नहीं खानी चाहिए।" उसने 'ठीक है' कहा और सारी भिक्षा गुरु को सौंपने लगा। फिर भी वो मोटा रहा। उसने कहा कि दूसरी बार माँग लेता हूँ। आचार्य ने कहा कि यह गुरु-सेवा का ठीक ढंग नहीं, तुम दूसरों की जीविका में बाधा डालते हो, लोभी बन रहे हो। फिर उसने दूध पिया, तो वो रुकवाया गया। फिर बछड़ों के मुँह से गिरता झाग पिया, तो वह भी रोक दिया गया। हर बार पाठ में एक ही उत्तर है, "ठीक है।"
और फिर वो दिन आया जब भूख से व्याकुल होकर उसने वन में आक के पत्ते खा लिए। पत्ते कड़वे, तीखे और जलन करने वाले थे। पाठ कहता है कि उसकी आँखें मारी गईं, वो अन्धा हो गया और भटकते हुए एक कुएँ में गिर गया। सूरज ढल गया। आचार्य ने कहा, "मैंने उपमन्यु को हर ओर से रोक दिया है। निश्चय ही वह रूठ गया है, इसीलिए नहीं लौटता।" और वे शिष्यों के साथ उसे खोजने निकले। मैं इस कथा को इसकी पूरी कठोरता के साथ आपको सुना रहा हूँ, क्योंकि यही पाठ में लिखी है। इसमें संयम का एक आदर्श नहीं है कि शिष्य कभी गिरा नहीं। शिष्य गिरा, और कुएँ तक गिरा।
पर कुएँ में से उसने क्या किया? वहाँ से आचार्य की पुकार का उत्तर दिया: "यह रहा मैं, इस कुएँ में गिर पड़ा हूँ।" आचार्य के कहने पर उसने अश्विनीकुमारों की स्तुति की। और जब वे प्रसन्न होकर उसे पुआ देने आए, तब उसने कहा कि मैं गुरु को सौंपे बिना यह नहीं खा सकता। अश्विनीकुमारों ने कहा कि तुम्हारे आचार्य ने भी पहले ऐसा ही पुआ गुरु को सौंपे बिना खा लिया था, तुम भी खा लो। उसने उत्तर दिया, "मैं इसके लिए आपसे क्षमा माँगता हूँ, पर गुरु को सौंपे बिना मैं यह खाने का साहस नहीं कर सकता।" तब अश्विनीकुमारों ने कहा कि तुम्हारी इस गुरुभक्ति से हम प्रसन्न हैं, तुम्हारी आँखें लौट आएँगी। उसने गुरु के पास जाकर सब बताया। और गुरु ने वही कहा जो आरुणि से कहा था: "सब वेद और सब धर्मशास्त्र तुम्हारे मन में स्वयं प्रकट होंगे।" पाठ में आगे लिखा है, "यह उपमन्यु की परीक्षा थी।"
देखिए, श्रद्धा, तत्परता और संयम तीनों इस कथा में हैं। श्रद्धा, कि भूखा होने पर भी वह आचार्य की बात छोड़कर चला नहीं गया। तत्परता, कि वह दिन भर अपने काम में लगा रहा। संयम, कि वह बार-बार रोके जाने पर भी रुका रहा, और देवताओं का दिया पुआ हाथ में आया तब भी गुरु से पहले उसने कुछ नहीं खाया। पर यह संयम पूरा सधा हुआ नहीं था, वह एक बार टूटा भी। श्रद्धावान की पहचान यह नहीं कि वह कभी गिरता नहीं। यह है कि गिरकर भी पुकार का उत्तर देता है।
उसी अध्याय में सेवा का ढाँचा पूरा करने वाली एक बात और है। धौम्य के तीसरे शिष्य बैद ने लम्बे समय तक कठिन काम सहे और कभी विरोध नहीं किया। पर जब वह ख़ुद गृहस्थ हुआ और उसके अपने शिष्य बने, तो उसने उनसे कभी कोई काम करने को नहीं कहा, क्योंकि वह गुरुकुल का कष्ट जानता था। और उसी बैद के शिष्य उत्तंक से जब घर की स्त्रियों ने एक अनुचित काम करने को कहा, तो उसने कहा, "आचार्य ने मुझसे कभी नहीं कहा कि अनुचित काम भी करना।" इन कथाओं को साथ रखिए। सेवा है, पर अन्धी आज्ञा नहीं। श्रद्धा है, पर विवेक के साथ।
अब चालीसवाँ श्लोक। "अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति। नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः।" अज्ञानी, श्रद्धा से रहित और संशय से भरा हुआ आदमी नष्ट हो जाता है। संशय में पड़े आदमी के लिए न यह लोक है, न परलोक, और न सुख।
इस श्लोक में तीन तरह के लोग हैं, पर नीलकण्ठ इनके बारे में एक बहुत सटीक बात कहते हैं। वो कहते हैं कि अज्ञानी का इलाज आसानी से हो सकता है। जो श्रद्धा नहीं रखता, उसका इलाज कोशिश से हो सकता है। पर संशयात्मा का इलाज असम्भव-सा है, क्योंकि जो मित्रों तक पर संशय करे, उसके लिए यह लोक नहीं, और वेद के वाक्य पर भी संशय करे, तो परलोक नहीं। सदा संशय में रहने से सुख भी नहीं। श्रीधर स्वामी इसे ऐसे गिनाते हैं: संशयी के लिए यह लोक इसलिए नहीं कि धन कमाना, विवाह करना जैसे काम सिद्ध नहीं होते, परलोक इसलिए नहीं कि धर्म ही नहीं बनता, और सुख इसलिए नहीं कि संशय भोग का सुख तक छीन लेता है। हमारी टीका इसे एक वाक्य में कहती है: वह किसी पर इतना भरोसा नहीं करता कि उसके अनुसार चल सके, इसलिए उसे न लौकिक लाभ मिलता है, न आध्यात्मिक।
संत ज्ञानेश्वर इस पर बहुत देर तक ठहरते हैं। वो कहते हैं कि जिसे ज्वर चढ़ा हो, उसे ठंड और गर्मी का भेद नहीं रहता। जन्म से अन्धे को दिन और रात का भेद नहीं दिखता। वैसे ही संशय वाले आदमी को सही-ग़लत और हित-अहित नहीं सूझता। वो साफ़ कहते हैं कि संशय से बड़ा कोई पाप नहीं।
पर एक बात बहुत ध्यान से समझिए, वरना ये श्लोक डराने वाला बन जाएगा। चौंतीसवें श्लोक में श्रीकृष्ण ने ख़ुद कहा था, "परिप्रश्नेन", खूब पूछो। तो प्रश्न और संशय में फ़र्क़ क्या है? प्रश्न उत्तर की ओर चलता है। संशय उत्तर से भागता है। जो पाँच डॉक्टरों से पूछता है और पाँचों की दवा आधी-आधी लेकर बीच में छोड़ देता है, वह प्रश्न नहीं कर रहा, वह संशय में जी रहा है। और "संशयात्मा" शब्द ही देखिए, जिसकी आत्मा ही संशय हो गई हो, जिसका पूरा स्वभाव ही शंका हो गया हो। एक बार का संदेह नहीं। अर्जुन की उलझन और वो सारे सवाल, जो वे दूसरे अध्याय से पूछते चले आए हैं, प्रश्न हैं, क्योंकि वे कहकर बैठे थे कि मैं आपका शिष्य हूँ, मुझे सिखाइए, और हर उत्तर के बाद अगला सवाल लेकर लौटे हैं।
अब वह दृश्य, जिसे सोचकर मेरा मन सबसे ज़्यादा काँपता है। सञ्जय ये श्लोक किसे सुना रहे हैं? धृतराष्ट्र को। यानी जब सञ्जय ने चालीसवाँ श्लोक पढ़ा, तब राजा के कानों में पड़ा "संशयात्मा विनश्यति"। उद्योग पर्व में, जब श्रीकृष्ण शान्ति की बात लेकर कौरवों की सभा में आए, तब धृतराष्ट्र ने विदुर से कहा कि गान्धारी को बुला लाओ, शायद वह बेटे को समझा सके। वे ख़ुद कहते हैं कि यह बेटा किसी की आज्ञा नहीं मानता। और गान्धारी ने सभा में आकर कहा: "धृतराष्ट्र, इसमें सबसे अधिक दोषी आप ही हैं, क्योंकि आप पुत्र से मोह रखते हैं। उसकी दुष्टता जानते हुए भी आप उसकी सोच के पीछे चलते हैं।"
देखिए, यह कैसा आदमी है। जानता है कि बेटा ग़लत है, चाहता भी है कि शान्ति हो। उसी सभा में जब श्रीकृष्ण ने अपना विराट रूप दिखाया, तो धृतराष्ट्र को भी कुछ देर को आँखें मिलीं और उन्होंने वह रूप देखा। फिर उन्होंने ख़ुद माँगा, "मेरी आँखें फिर बन्द हो जाएँ, मैं आपको देख चुका हूँ।" और जाते समय श्रीकृष्ण से कहा, "आपको मुझ पर बहुत सन्देह नहीं करना चाहिए।" एक आदमी दूसरों से प्रार्थना करता है कि मुझ पर संदेह न करो, और अपने ही मन के बँटवारे से कोई फ़ैसला नहीं ले पाता। उसने भगवान का रूप अपनी आँखों से देख लिया, फिर भी आँखें बन्द करवाकर उसी पुराने मोह में लौट गया। इसे संशयात्मा कहना मेरा अपना पढ़ना है, पाठ ऐसा नहीं कहता; पाठ बस वही कहता है जो मैंने सुनाया, उद्योग पर्व के एक सौ उनतीसवें से एक सौ इकतीसवें अध्याय तक। और आगे क्या हुआ, सौ पुत्रों का जाना, वह हम पाँचवें सत्संग में सुन चुके हैं।
अब एक पुराना वादा पूरा करना है। मैंने कहा था कि पैंतीसवें श्लोक की कसौटी बताऊँगा, कि क्या अर्जुन को फिर कभी मोह नहीं हुआ। वह भी इसी चालीसवें श्लोक से जुड़ती है।
आपको ग्यारहवें सत्संग की वह घड़ी याद होगी। युद्ध ख़त्म हो चुका है, इन्द्रप्रस्थ की सभा में अर्जुन श्रीकृष्ण से कहते हैं कि जो आपने मित्रता से मुझसे पहले कहा था, वह सब मुझ विचलित मन वाले का नष्ट हो गया। यानी गीता का उपदेश उनके मन से खिसक गया था, और वे उसे फिर सुनना चाहते हैं। और श्रीकृष्ण के उत्तर में एक शब्द है, जो आज के चालीसवें श्लोक का ही शब्द है। वे अर्जुन को गले लगाकर कहते हैं, "नूनमश्रद्दधानोऽसि", निश्चय ही तुम श्रद्धा से रहित हो, और उसे पूरा फिर से कहना अब सम्भव नहीं। अश्वमेधिक पर्व, सत्रहवाँ अध्याय।
मैं इसे कठोर नहीं मानता। यह उस मित्र का वाक्य है जिसे अर्जुन के खो जाने की चोट लगी है, और ध्यान दीजिए कि वे अर्जुन को छोड़ते नहीं। अगले ही वाक्य में कहते हैं कि मैं तुम्हें एक पुरानी कथा सुनाता हूँ, जिससे तुम उत्तम गति पाओ। और उस पुरानी कथा के आरम्भ में एक दृश्य है, जो हमने तब नहीं सुना। काश्यप नाम का एक तपस्वी ब्राह्मण एक सिद्ध के पास जाता है। पाठ कहता है, उसने एकाग्र मन से, परम भक्ति से, विधि के अनुसार उनके चरण पकड़े, और बड़ी सेवा से उन्हें प्रसन्न किया। उसके बाद अगले अध्याय में उसने बहुत कठिन प्रश्न पूछे। चरण, सेवा, प्रश्न। चौंतीसवाँ श्लोक, ज्यों का त्यों, महाभारत में बोलता हुआ। श्रीकृष्ण अर्जुन को वही रास्ता दे रहे हैं, जो उन्होंने पहली बार दिया था: जाओ, झुको, पूछो, सेवा करो।
तो फिर पैंतीसवें श्लोक के वादे का क्या हुआ? मैं इसका ईमानदार उत्तर यह समझता हूँ कि ज्ञान ने उसी सुबह अर्जुन को उठा दिया था। वे गाण्डीव लेकर खड़े हुए, यह हम पहले सत्संगों में सुन चुके हैं। पर जो समझ युद्ध के बीच मिली थी, उसे बचाए रखने के लिए श्रद्धा और तत्परता चाहिए, और वह रोज़ की कमाई है। जो एक बार का दर्शन होता है, वह भी दोबारा याद करना पड़ता है। इसलिए चालीसवाँ श्लोक डराने के लिए नहीं, चौकन्ना करने के लिए है।
पर अभी एक बात बाकी है। संशय को बुरा कह देने से वह नहीं जाता। चालीसवें श्लोक के बाद एक ही प्रश्न बचा है: उसका इलाज क्या है? चौथे अध्याय के आख़िरी दो श्लोक वही इलाज बताते हैं, और उसी में वह आदमी भी दिखाते हैं जिसका संशय कट चुका है।
योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम् ।
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ॥ ४१ ॥
तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः ।
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥ ४२ ॥
चौथे अध्याय के ये आख़िरी दो श्लोक एक तस्वीर और एक आज्ञा हैं। पहले में वो आदमी है जिसके कर्म उसे बाँधते नहीं। दूसरे में वो हाथ है जो अर्जुन की ओर बढ़ाया गया है, कि उठो, और अपना ही संशय काटो।
इकतालीसवाँ श्लोक। "योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम्। आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय।" हे धनंजय, जिसने योग से कर्मों का संन्यास कर दिया है, जिसके संशय ज्ञान से कट गए हैं, उस आत्मवान् को कर्म नहीं बाँधते।
तीन विशेषण हैं, और तीनों हमारे आज के सत्संग से जुड़े हैं। "योगसंन्यस्तकर्माणं", यानी जिसने कर्म योग के द्वारा अर्पित कर दिए। श्रीधर स्वामी कहते हैं, परमेश्वर की आराधना के रूप में उसमें समर्पित कर दिए। दूसरा, "ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम्", जिसका संशय ज्ञान से कट गया। और तीसरा, "आत्मवन्तं", जिसका अर्थ मधुसूदन सरस्वती करते हैं, वह जो कभी असावधान नहीं होता, जो हर समय सजग रहता है। हमारी टीका कहती है कि यह श्लोक उपदेश के दोनों भागों को जोड़ता है, योग, यानी आसक्ति रहित कर्म, और ज्ञान, और दोनों मिलकर मनुष्य को कर्म के बन्धन से मुक्त करते हैं। श्रीधर स्वामी इसे तीसरे और चौथे, दो अध्यायों में कही हुई कर्ममय और ज्ञानमय निष्ठा का सार कहते हैं।
और नीलकण्ठ यहाँ वह सूची देते हैं जो मुझे बहुत उपयोगी लगी, कि "संशय" में असल में क्या-क्या आता है। वो गिनाते हैं: क्या आत्मा देह में है या उससे अलग? क्या वह सब जगह फैला है या नहीं? क्या वह कर्ता है या अकर्ता? क्या एक है या अनेक? क्या उसके गुण हैं या वह निर्गुण है? ये वही प्रश्न हैं जो हम सबके मन में कभी न कभी आते हैं। और नीलकण्ठ कहते हैं कि ज्ञान से जब ये सब कट जाते हैं, तब कर्म फिर बाँध नहीं पाता।
इसे आज के जीवन में देखिए। एक घर में दो बहनें हैं, और दोनों बूढ़ी माँ की देखभाल बारी-बारी से करती हैं। बड़ी बहन दिन भर की नौकरी के बाद भी शाम को माँ के पास बैठती है, दवा देती है, बाल सँवारती है, और लौटते हुए हल्की होती है। छोटी बहन उससे आधा काम करती है, पर हर बार भीतर एक हिसाब चलता रहता है: मैं ही क्यों, भाई क्यों नहीं आता, माँ हमेशा दीदी की ही तारीफ़ क्यों करती हैं। फ़र्क़ काम में नहीं, भीतर है। एक ने अपने सवाल बैठा दिए हैं, दूसरी के भीतर सवाल ही सवाल चल रहे हैं। असली हल्कापन कम काम करने से नहीं आता। वह तब आता है जब भीतर के सवाल बैठ जाएँ और हाथ सच्चे मन से काम में लगा हो।
अब बयालीसवाँ श्लोक, जो इस अध्याय का अन्तिम श्लोक है। "तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः। छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत।" इसलिए, हे भारत, अज्ञान से पैदा हुए, हृदय में बैठे अपने इस संशय को ज्ञान की तलवार से काटकर योग में स्थित हो जाओ, और उठो।
एक-एक शब्द धीरे से सुनिए। "तस्मादज्ञानसम्भूतं", यानी इसलिए, अज्ञान से पैदा हुआ। संशय का जन्म अज्ञान से होता है, वह अपनी जड़ से बाहरी नहीं है। "हृत्स्थं", हृदय में बैठा हुआ। मधुसूदन सरस्वती इसे बहुत ख़ूबसूरती से खोलते हैं: वो कहते हैं कि श्लोक में दोनों बातें साथ कही गई हैं, कि शत्रु हृदय में बैठा है और हथियार ज्ञान का है, ताकि पता चले कि इस शत्रु को आसानी से मारा जा सकता है। जो ख़ुद हमारे भीतर घर बनाकर बैठा है, वह हमारी पहुँच के भीतर है। और फिर वह पद, "ज्ञानासिनात्मनः"। इसमें दो शब्द मिलकर एक हो गए हैं: पहला, ज्ञान की तलवार से, और दूसरा, "अपने", यानी अपने इस संशय को। यही छोटा-सा "अपना" है, जिस पर मेरा मन बार-बार रुकता है।
शंकराचार्य यहाँ एक बहुत सुन्दर बात लिखते हैं। वो कहते हैं कि "अपना" इसलिए कहा गया कि संशय अपना ही होता है, दूसरे का संशय दूसरे के द्वारा काटा नहीं जाता। इसे एक सीधी तस्वीर में देखिए। गुरु आपको तलवार दे सकता है। वह उसे चलाना सिखा सकता है। पर आपके भीतर बैठा संशय आप ही के हाथ से कटेगा, कोई और उसे आपके भीतर जाकर नहीं काट सकता। और अब मुझे वह वाक्य याद आता है, जो हमने इस सत्संग के पहले हिस्से में सुना था, शान्ति पर्व के पैंतालीसवें अध्याय में, जब युधिष्ठिर श्रीकृष्ण से कहते हैं, "छिन्धि मे संशयं देव", हे देव, मेरा संशय काट दीजिए।
देखिए कितनी सुन्दर बात है। युधिष्ठिर कहते हैं, "छिन्धि", आप काट दीजिए। और श्रीकृष्ण गीता में अर्जुन से कहते हैं, "छित्त्वैनं संशयं", इस संशय को काटकर। दोनों ही सही हैं। पहला उस आदमी की प्रार्थना है जो अपनी तलवार माँग रहा है। दूसरा उस आदमी को दिया गया आदेश है जिसे तलवार मिल चुकी है। गुरु के पास जाना और पूछना पहला क़दम है। पर जो मिला, उसे ख़ुद उठाकर अपने भीतर चलाना, यह दूसरा।
अब आख़िरी पद: "योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत", और उसमें आख़िरी क्रिया, उठो। हमारी टीका इस पर एक छोटा-सा वाक्य कहती है, जो मुझे बहुत भारी लगता है: "उठो" कर्म के लिए आह्वान है, क्योंकि पहले अध्याय के अन्त में अर्जुन रथ में बैठ गए थे। आपको याद होगा, तीसरे सत्संग में हमने पहले अध्याय के अन्तिम श्लोकों में अर्जुन को रथ के पिछले भाग में धनुष-बाण छोड़कर बैठे देखा था, शोक से भरे मन के साथ। यही शब्द दूसरे अध्याय के आरम्भ में भी आया था, जब श्रीकृष्ण ने कहा था कि हृदय की इस छोटी दुर्बलता को छोड़कर उठो। आज वह फिर आता है, और इस बार संशय के कटने के बाद, जैसे लम्बी बात के अन्त में कोई धीरे से कंधे पर हाथ रख दे।
संत ज्ञानेश्वर इसी जगह कहते हैं: "उठो, जल्दी से, और हृदय में बैठे इस संशय को समाप्त कर दो।" और फिर वे अगले ही श्लोक की ओर एक संकेत करते हैं, कि अब देखिए पाण्डव-पुत्र उस पूर्वापर बात को सोचकर कैसा सवाल पूछेंगे। यानी ज्ञानेश्वर भी यहाँ जानते थे कि अध्याय यहीं नहीं रुकता।
अब एक क्षण के लिए सञ्जय की ओर चलिए। वे भीष्म के गिर जाने के बाद धृतराष्ट्र को सुना रहे हैं, और राजा के सामने अर्जुन के लिए कहे गए ये शब्द पढ़ रहे हैं: "योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत।" उठो, हे भरतवंशी। श्रीधर स्वामी बताते हैं कि "भारत" सम्बोधन से श्रीकृष्ण याद दिलाते हैं कि क्षत्रिय के रूप में युद्ध अर्जुन का अपना धर्म है। पर आज के श्रोता के लिए यह पुकार रणभूमि की नहीं। वह आपके अपने रथ की है, उस मोड़ की जहाँ आप संशय के साथ बैठ गए हैं, कि इस रिश्ते को सँभालूँ या छोड़ दूँ, इस कठिन काम में हाथ डालूँ या टाल दूँ। जिस घड़ी में आप समझ चुके हैं पर उठ नहीं पा रहे, उस घड़ी के लिए यह शब्द है।
एक बात, जो मैंने आपसे इस अध्याय के आरम्भ में नहीं कही थी। इस चौथे अध्याय का नाम "ज्ञानकर्मसंन्यासयोग" है। हम तीन सत्संगों में इसके भीतर से गुज़रे हैं। पहले में हमने देखा कि भगवान बार-बार क्यों आते हैं। दूसरे में, कि हर काम पूजा कैसे बनता है। और आज, कि ज्ञान गुरु से कैसे मिलता है, श्रद्धा उसे कैसे टिकाती है, और संशय उसे कैसे खाता है। तीनों में एक धागा है: श्रीकृष्ण अर्जुन को भीतर की ओर ले जा रहे हैं। पहले ईश्वर के भरोसे पर, फिर कर्म के भाव पर, और अब अपने ही संशय पर।
और अब आख़िर में एक छोटी-सी झलक आगे की। चौथा अध्याय ख़त्म होते ही, पाँचवें अध्याय का पहला श्लोक अर्जुन का है। वे फिर पूछ बैठते हैं: "संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि। यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्।" हे कृष्ण, आप कर्मों के संन्यास की प्रशंसा करते हैं और फिर योग की, यानी कर्म करने की। इन दोनों में जो एक श्रेष्ठ हो, वह मुझे निश्चित करके बताइए। हमारी टीका कहती है कि अर्जुन ने पिछले अध्याय में दो बातें सुनी हैं: सब कर्मों को समाप्त करने वाला ज्ञान, और योग में स्थित होकर लड़ने की आज्ञा। और वे एक साफ़ उत्तर चाहते हैं। श्रीकृष्ण क्या उत्तर देंगे, यह हम अगली बार सुनेंगे। और अर्जुन का यह नया प्रश्न भी उसी भरोसे का प्रमाण है जो आज हमने सुना: पूछो, परि-प्रश्न करो।
तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।
पहली बात। जो भी सीखना है, वह पूछने से शुरू होता है, और पूछने में सबसे बड़ी बाधा हमारी अपनी लज्जा है। युधिष्ठिर को भी भीष्म के पास जाने में शर्म आ रही थी, और भीष्म ने सबसे पहले यही कहा: "डरो मत।" इस हफ़्ते एक सवाल चुनिए, जो आपने बरसों से नहीं पूछा। किसी बड़े से, किसी जानकार से, किसी ऐसे से जिसके भीतर शास्त्र का ज्ञान भी हो और जीवन का अनुभव भी। और उससे बिना शर्म पूछिए।
दूसरी बात। प्रश्न और संशय अलग हैं। प्रश्न उत्तर की ओर चलता है और संशय उत्तर से डरता है। श्रद्धा कोई अन्धा भरोसा नहीं, वह चलने से पहले का वह भरोसा है जो चलने पर पक्का होता है। और उपमन्यु की तरह, आप गिर भी जाएँ तो चलेगा, बस पुकार का उत्तर देते रहिए। और अगर आपको लगता है कि आपने बहुत बड़े पाप किए हैं, तो छत्तीसवाँ श्लोक याद रखिए: ज्ञान की नौका पापकृत्तम को भी पार करा देती है, बस उस पर बैठने के लिए जीना पड़ता है।
तीसरी बात। गुरु तलवार देता है, काटना आपको है। ज्ञान सुन लेना काफ़ी नहीं, उसे अपने ही संशय पर चलाना पड़ता है। और संशय हृदय में बैठा है, इसलिए वह आपकी पहुँच के भीतर है। इसी हफ़्ते उस एक संशय को नाम दीजिए, जो आपको उठने नहीं दे रहा। नाम दे देना ही उसे काटने की पहली चोट है।
आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आपके मन का वह कौन-सा सवाल है, जो बरसों से पड़ा है और जिसे आपने अब तक किसी से नहीं पूछा? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्री कृष्ण।
संशय को डर की तरह नहीं, एक अधूरे प्रश्न की तरह देखिए। हर प्रश्न के पीछे कोई उत्तर बैठा है, जो आपसे पहले आपकी प्रतीक्षा कर रहा है।
जय श्री कृष्ण।
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥ ३९ ॥
तीन बातें
- जो भी सीखना है, वह पूछने से शुरू होता है, और पूछने में सबसे बड़ी बाधा हमारी अपनी लज्जा है। युधिष्ठिर को भी भीष्म के पास जाने में शर्म आ रही थी, और भीष्म ने सबसे पहले यही कहा: "डरो मत।" इस हफ़्ते एक सवाल चुनिए, जो आपने बरसों से नहीं पूछा। किसी बड़े से, किसी जानकार से, किसी ऐसे से जिसके भीतर शास्त्र का ज्ञान भी हो और जीवन का अनुभव भी। और उससे बिना शर्म पूछिए।
- प्रश्न और संशय अलग हैं। प्रश्न उत्तर की ओर चलता है और संशय उत्तर से डरता है। श्रद्धा कोई अन्धा भरोसा नहीं, वह चलने से पहले का वह भरोसा है जो चलने पर पक्का होता है। और उपमन्यु की तरह, आप गिर भी जाएँ तो चलेगा, बस पुकार का उत्तर देते रहिए। और अगर आपको लगता है कि आपने बहुत बड़े पाप किए हैं, तो छत्तीसवाँ श्लोक याद रखिए: ज्ञान की नौका पापकृत्तम को भी पार करा देती है, बस उस पर बैठने के लिए जीना पड़ता है।
- गुरु तलवार देता है, काटना आपको है। ज्ञान सुन लेना काफ़ी नहीं, उसे अपने ही संशय पर चलाना पड़ता है। और संशय हृदय में बैठा है, इसलिए वह आपकी पहुँच के भीतर है। इसी हफ़्ते उस एक संशय को नाम दीजिए, जो आपको उठने नहीं दे रहा। नाम दे देना ही उसे काटने की पहली चोट है।