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सत्संग १४

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हर काम पूजा कैसे बने

गीता 4.16–4.32 · 81 मिनट

रोज़ का काम और साधना अलग क्यों लगते हैं

किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः । तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥ १६ ॥
गीता 4.16 — अर्थ पढ़ें ›
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः । अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥ १७ ॥
गीता 4.17 — अर्थ पढ़ें ›
कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः । स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥ १८ ॥
गीता 4.18 — अर्थ पढ़ें ›

सुबह आप पाँच मिनट पूजा के लिए बैठते हैं, या बस आँखें बन्द करके भगवान का नाम लेते हैं, और मन थोड़ा शान्त होता है। और फिर आप उठते हैं, और बाक़ी पूरा दिन जिस चीज़ में बीतता है, वह जैसे किसी दूसरी दुनिया की चीज़ है: ईमेल, बच्चों का टिफ़िन, ग्राहक का फ़ोन, दफ़्तर की मीटिंग, शाम की सब्ज़ी। कभी आपको ऐसा लगा है कि साधना एक कमरे में रहती है और ज़िन्दगी दूसरे कमरे में, और बीच का दरवाज़ा बन्द है?

आज का सत्संग इसी एक चुभन पर है। रोज़ का काम और साधना अलग क्यों लगते हैं, और हर काम पूजा कैसे बन सकता है? और जवाब, जैसा गीता में अक्सर होता है, हमारे सोचने के ढंग को थोड़ा उलट देता है।

जय श्री कृष्ण।

आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का चौदहवाँ सत्संग है, और हम चौथे अध्याय के बीच में हैं। पिछली बार हमने इस अध्याय की शुरुआत सुनी थी, जहाँ श्रीकृष्ण ने बताया कि यह योग उन्होंने सबसे पहले सूर्य को कहा था, सूर्य से मनु तक और मनु से इक्ष्वाकु तक पहुँचा, और फिर समय के साथ खो गया। उन्होंने अर्जुन को यह इसलिए दोबारा दिया कि अर्जुन उनके भक्त और सखा हैं। फिर वह बड़ा वचन आया, यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत, कि जब-जब धर्म की हानि होती है, तब-तब वे अपने आपको प्रकट करते हैं, सज्जनों की रक्षा के लिए। उन्होंने यह भी कहा था कि उनके जन्म और कर्म दिव्य हैं, और जो उनके पास जिस भाव से आता है, उसे वे उसी भाव से स्वीकार करते हैं। और उसी हिस्से में एक बात और थी, जो आज की पूरी भूमिका है। श्रीकृष्ण ने कहा कि वे सारा कुछ रचने वाले होकर भी अकर्ता हैं, कर्म उन्हें छूते नहीं, और उन्हें कर्मफल की चाह नहीं है। जो उन्हें इस तरह जान लेता है, वह भी कर्मों से नहीं बँधता। और पन्द्रहवें श्लोक पर वे यह कहकर रुके कि मुक्ति चाहने वाले पूर्वजों ने भी कर्म ही किया है, इसलिए तुम भी कर्म ही करो, कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्।

अब यहाँ एक बहुत स्वाभाविक सवाल उठता है, और आज के सोलहवें श्लोक से वही सवाल उठाया गया है। अगर कर्म करना ही है, पर कर्म बाँधता भी है, तो कर्म का वह रूप कौन-सा है जो नहीं बाँधता? कर्म आख़िर है क्या?

एक बात और याद रखिए, जो इस पूरी शृंखला में हमारे साथ चलती है। गीता आसमान से उतरी हुई अलग किताब नहीं है। हमारे कोष में महाभारत के भीष्म पर्व का अट्ठाईसवाँ अध्याय ही गीता का चौथा अध्याय है, और इसे संजय सुना रहे हैं राजा धृतराष्ट्र को, उस घड़ी में जब भीष्म बाणों की शय्या पर लेट चुके हैं। व्यास ने संजय को दिव्य दृष्टि दी थी, ताकि युद्ध की हर बात राजा तक पहुँचे, और राजा ने कहा था कि वह वध देखना नहीं, सुनना चाहता है। तो आज जब श्रीकृष्ण कर्म और अकर्म की गुत्थी खोलेंगे, तो एक कान उस अन्धे राजा का भी है, जो महल में बैठा है, हाथ से कुछ नहीं कर रहा, और फिर भी जिसके किए हुए का फल इस समय कुरुक्षेत्र में सामने आ रहा है।

अब सोलहवाँ श्लोक। किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः, तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्। कर्म क्या है और अकर्म क्या है, इस विषय में तो बुद्धिमान भी मोहित हो जाते हैं। इसलिए मैं तुम्हें वह कर्म-तत्त्व भली-भाँति कहूँगा, जिसे जानकर तुम अशुभ से छूट जाओगे।

यहाँ दो बातें पकड़ने लायक हैं। पहली, "कवयोऽप्यत्र", यानी बुद्धिमान भी। श्रीकृष्ण यह नहीं कह रहे कि सामान्य लोग उलझे हैं। वे कह रहे हैं कि जो पढ़े-लिखे और समझदार माने जाते हैं, वे भी यहाँ चक्कर खा जाते हैं। शंकराचार्य इसे यूँ लेते हैं कि कर्म की बात ऐसी है कि मेधावी लोग भी इसमें मोह को प्राप्त होते हैं, और इसलिए इसे सीधे बता देना ज़रूरी है। और दूसरी बात, "अशुभ" शब्द। हमारी टीका कहती है कि यहाँ अशुभ का अर्थ जन्म-मृत्यु का चक्र है, जो एकमात्र सच्ची हानि है। यानी श्रीकृष्ण यह वादा नहीं कर रहे कि इसे जानकर आपकी नौकरी या आपका स्वास्थ्य सुधर जाएगा। वे कह रहे हैं कि इसे जानकर आप उस बन्धन से छूटेंगे जो असल में बाँधता है।

फिर सत्रहवाँ श्लोक, और यह श्लोक एक छोटा-सा नक्शा देता है। कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः, अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः। कर्म का तत्त्व भी जानना चाहिए, विकर्म का भी, और अकर्म का भी, क्योंकि कर्म की गति गहन है।

तीन शब्द हैं। कर्म, यानी जो करना है। विकर्म, जिसे हमारी टीका यों समझाती है कि वह है जिसका शास्त्र निषेध करता है, यानी वह काम जो नहीं करना चाहिए। और अकर्म, जो न करना है। और हमारी टीका आगे एक बहुत काम की बात जोड़ती है कि तीनों को वास्तव में जैसे वे हैं वैसे देखना है, और जो ऊपर से दिखता है, वह वैसा होता नहीं। श्रीधर स्वामी इसी जगह एक आपत्ति उठाते हैं, जो हम सबके मन की है: यह तो सब जानते हैं कि शरीर का चलना कर्म है और चुपचाप बैठे रहना अकर्म, इसमें समझाने को क्या है? और उत्तर यह है कि लोक में जो प्रसिद्ध है, उसी पर रुक जाना काफ़ी नहीं, क्योंकि कर्म की चाल गहरी है।

और इस गहराई को समझने के लिए मैं आपको वह कथा सुनाना चाहता हूँ जो महाभारत के वन पर्व में है, और जिसमें इन्हीं तीन शब्दों का जीता-जागता रूप मिलता है। वनवास के दिनों में, जब युधिष्ठिर ऋषि मार्कण्डेय के पास बैठे थे, तब युधिष्ठिर ने उनसे धर्म के कुछ कठिन सवाल पूछे थे, और मार्कण्डेय ने उन्हें एक ब्राह्मण की कथा सुनाई। यह वन पर्व के दो सौ आठवें और नौवें अध्याय से शुरू होती है।

कौशिक नाम के एक ब्राह्मण थे। वेद पढ़ने वाले, तप के धनी, तपस्वी और धर्मशील। अंगों और उपनिषदों सहित वेदों का पाठ करते थे। एक दिन वे किसी पेड़ के नीचे बैठे वेद पढ़ रहे थे, और ऊपर पेड़ पर एक बगुली बैठी थी, और उसने उनके ऊपर बीट गिरा दी। ब्राह्मण क्रोध से भर गए। उन्होंने ऊपर देखा और उस बगुली का बुरा सोचा, और वह धरती पर गिर पड़ी, प्राणहीन।

अब ज़रा रुककर देखिए कि इस दृश्य में कर्म कहाँ है और अकर्म कहाँ। बाहर से देखने वाला कहेगा कि यह आदमी तो चुपचाप पेड़ के नीचे बैठा वेद पढ़ रहा था, यही तो अकर्म है, शान्त साधना है। और एक नज़र में, बिना हाथ उठाए, एक प्राणी मर गया। वह सबसे बड़ा कर्म हो गया, और वह भी ऐसा कर्म जो नहीं होना चाहिए था, यानी विकर्म। जब बगुली को गिरा हुआ देखा, तो कौशिक दया से दुखी हो गए, और वे बार-बार यही कहते रहे कि द्वेष और राग के ज़ोर में आकर मैंने बुरा काम कर दिया। यही मार्कण्डेय की कथा का पहला पाठ है, और यही सत्रहवें श्लोक की पहली गहराई। जो अकर्म दिखता था, उसके भीतर कर्म चल रहा था।

और यही अठारहवाँ श्लोक कहता है। कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः, स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्। जो कर्म में अकर्म देखता है और अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है। वह योगी सब कर्म करने वाला होकर भी योग में स्थित है।

यह श्लोक जितना छोटा है, उतना ही उलझा हुआ लगता है, तो इसे धीरे-धीरे खोलते हैं। हमारी टीका इसे इस तरह कहती है कि सारी क्रिया शरीर, इन्द्रियों और मन की है, आत्मा कुछ नहीं करता। इसलिए जो कुछ भी होता है, उसमें ज्ञानी उस आत्मा को देखता है जो कुछ नहीं कर रहा, और यही है कर्म में अकर्म देखना। और दूसरी ओर, "मैं तो कुछ नहीं करता" सोचकर चुप बैठ जाना भी अहंकार का एक कर्म है, और यही है अकर्म में कर्म देखना। जो यह दोनों बातें देख लेता है, वह कर्म करते हुए भी मुक्त है।

शंकराचार्य यहाँ एक बहुत सुन्दर तस्वीर देते हैं, जिसे मधुसूदन सरस्वती और संत ज्ञानेश्वर भी अपने ढंग से दोहराते हैं। आप कभी नाव में बैठे हैं और किनारे के पेड़ों को देखा है? नाव चल रही होती है, पर लगता है कि किनारे के पेड़ उलटी दिशा में दौड़ रहे हैं। और दूर कोई आदमी चल रहा हो, तो वह आँख को ठहरा-सा दिखता है। शंकराचार्य कहते हैं कि कर्म को लेकर हम सबकी दृष्टि ऐसी ही उलटी है। जिसे हम चलना समझ रहे हैं, वह कहीं और चल रहा है, और जिसे ठहरना समझ रहे हैं, वहाँ भीतर कुछ चल रहा है।

और मधुसूदन सरस्वती इस श्लोक के दूसरे हिस्से पर एक पंक्ति कहते हैं जो मुझे बहुत सीधी लगती है। वे कहते हैं कि सब काम छोड़कर बैठे रहने में भी "मैं कुछ नहीं करता, चुपचाप सुख से बैठा हूँ" ऐसा जो अभिमान है, वही कर्म है। कितनी बार हमने कहा है कि मैं तो अब किसी बात में नहीं पड़ता, और उस कहने में ही एक शिकायत और एक हिसाब चल रहा था।

और यहाँ आप राजा धृतराष्ट्र को भी याद कीजिए। आपको याद होगा, सातवें और नौवें सत्संग में उद्योग पर्व की वह जागती रात, जब राजा ने विदुर को बुलवाकर कहा था कि मैं जाग रहा हूँ और जल रहा हूँ, मेरी नींद उड़ गई है। देखने वाला कहता कि अपने कक्ष में बैठा वह राजा तो कुछ नहीं कर रहा। और उसके भीतर उस रात सबसे ज़्यादा कर्म चल रहा था: हिसाब, डर, पुत्र की चिन्ता, जो आगे चलकर युद्ध के मैदान में उतरने वाला था।

और अब सोचिए कि आपके अपने दिन के लिए इसका क्या मतलब है। दफ़्तर में एक आदमी दिन भर फ़ाइलें निपटाता है, फ़ोन उठाता है, मीटिंग में बोलता है। बाहर से वह सबसे व्यस्त है। और भीतर से उसने कुछ भी अपने सिर नहीं लिया, कुछ भी अपने नाम नहीं किया, इसलिए शाम को उसके कन्धे हल्के हैं। और दूसरा आदमी छुट्टी के दिन सोफ़े पर पड़ा रहता है, पर भीतर सारे हिसाब चल रहे हैं कि किसने क्या कहा, कौन आगे निकल गया, कल क्या होगा। शाम को वह चूर होता है, बिना कुछ किए। पहले आदमी ने कर्म में अकर्म देखा, और दूसरे ने अकर्म में कर्म पाया।

तो इन तीन श्लोकों ने हमें एक चश्मा दिया। कर्म की पहचान उसके बाहर के रूप से नहीं, उसके भीतर के रंग से होती है। और जो यह देख लेता है, वह "कृत्स्नकर्मकृत्" है, यानी सारे कर्म करने वाला, और फिर भी योग में टिका हुआ।

पर अभी एक बात बाकी है। हमने कौशिक को बगुली के पास छोड़ा है, पछताते हुए, भिक्षा माँगने गाँव की ओर जाते हुए। और वहीं एक घर में वे एक ऐसी स्त्री से मिलेंगे जो उनसे कह देगी कि मैं बगुली नहीं हूँ। और उनके साथ उन्नीसवाँ श्लोक भी चलेगा, जो बताता है कि कर्म का यह बन्धन जलता कैसे है।

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः । ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः ॥ १९ ॥
गीता 4.19 — अर्थ पढ़ें ›
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः । कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः ॥ २० ॥
गीता 4.20 — अर्थ पढ़ें ›
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः । शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥ २१ ॥
गीता 4.21 — अर्थ पढ़ें ›

उन्नीसवाँ श्लोक वही बात खोलता है जिस पर हम अठारहवें में रुके थे, कि कर्म करते हुए भी आदमी बँधता क्यों नहीं। यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः, ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः। जिसके सब कार्य कामना और संकल्प से रहित हैं, और जिसके सब कर्म ज्ञानरूपी अग्नि से जल गए हैं, उसे ज्ञानीजन पण्डित कहते हैं।

"समारम्भ" का अर्थ है वे सब काम जो शुरू किए जाते हैं, चाहे घर के हों, चाहे दफ़्तर के, चाहे पूजा के। श्रीकृष्ण कहते हैं कि इन सबमें दो चीज़ें न हों, "काम" और "संकल्प"। श्रीधर स्वामी के अनुसार "काम" वह तृष्णा है जो फल की ओर खिंचती है, और "संकल्प" वह भीतर की बँधी हुई योजना कि यह काम मैं उस चीज़ के लिए कर रहा हूँ। हमारी टीका इसे इसी तरह समझाती है कि संकल्प यह योजना है कि कर्म से क्या मिलेगा, और इसके बिना कर्म भविष्य के बन्धन का बीज नहीं छोड़ता। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं कि संकल्प का एक रूप "मैं करने वाला हूँ" का अभिमान भी है। और "जलना" शब्द पर हमारी टीका की बात याद रखने लायक है, कि जलने का अर्थ यही है कि ऐसा कर्म भविष्य के बन्धन का बीज नहीं छोड़ता। पिछली बार हमने संत ज्ञानेश्वर की भुने हुए बीज वाली उपमा सुनी थी, जो बो दो तो भी अंकुर नहीं फूटता। "ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं" में उसी भूनने वाली आग की बात है।

अब कथा की ओर लौटते हैं, क्योंकि वहाँ यही श्लोक मनुष्य के रूप में खड़ा मिलता है। कौशिक भिक्षा के लिए गाँव में एक ऐसे घर पहुँचे जहाँ पहले भी भिक्षा ले चुके थे। उन्होंने "दीजिए" कहा, और घर की स्वामिनी ने कहा, "रुकिए।" वह उस समय बर्तन माँज रही थी। ठीक उसी समय उसके पति घर आए, भूख से बहुत पीड़ित। और उस स्त्री ने ब्राह्मण को वहीं छोड़ दिया और पहले पति की सेवा की। उन्हें पाँव धोने का जल दिया, आचमन के लिए जल दिया, आसन दिया, और भोजन परोसा। कथा बताती है कि वह देवताओं, अतिथियों, सेवकों और सास-ससुर की सेवा में भी सदा लगी रहती थी, और अपनी इन्द्रियों को वश में रखती थी। फिर जब वह पति की सेवा कर चुकी, तो उसकी नज़र उस ब्राह्मण पर पड़ी जो भिक्षा की आशा में खड़ा था, और उसे याद आया। वह लज्जित हुई, और भिक्षा लेकर बाहर आई।

अब कौशिक की हालत देखिए। जिस आदमी ने अभी-अभी अपने क्रोध से एक प्राणी की जान ली थी और पछताया था, वह फिर वही क्रोध लिए खड़ा है। कथा कहती है कि वह क्रोध से तपता हुआ, मानो तेज से जलता हुआ दिखा। स्त्री ने पहले नरमी से क्षमा माँगी, और बताया कि पति भूखे और थके हुए आए थे। पर उसने कहा कि तुमने मुझे रोके रखा, तुमने पति को ब्राह्मण से बड़ा बना दिया, और फिर यह भी कहा कि ब्राह्मण तो आग के समान होते हैं, अपमानित हों तो पर्वतों और वनों सहित पृथ्वी को भी जला सकते हैं। और उस स्त्री ने जो उत्तर दिया, वह इस पूरी कथा की चाबी है। उसने कहा, "हे ब्रह्मर्षि, मैं बगुली नहीं हूँ। हे तपोधन, क्रोध छोड़िए। क्रोधित होकर इस क्रोध भरी दृष्टि से आप मेरा क्या कर लेंगे?"

यह वन पर्व के दो सौ नौवें अध्याय में है। और इसके आगे वह स्त्री कहती है कि मैं जानती हूँ कि आपने क्रोध में बगुली को जला दिया, और क्रोध मनुष्यों के शरीर में ही रहने वाला शत्रु है। फिर वह बताती है कि देवता किसे ब्राह्मण मानते हैं: जो क्रोध और मोह को छोड़ देता है, जो सच बोलता है, जो चोट खाकर भी चोट नहीं पहुँचाता, जिसने इन्द्रियों को जीता है, और जिसके लिए सारा संसार अपने समान है। उसने बगुली की बात कैसे जानी, इस पर वह बस एक वाक्य कहती है: देखिए, पति की सेवा का फल कैसा है। और कौशिक अगले अध्याय की शुरुआत में उसी आश्चर्य पर सोचते रह जाते हैं।

अब इस कथा को ऊपर के श्लोक के साथ रखकर देखिए। कौशिक के पास तप था, वेद थे, पाठ था, पर उनके भीतर "काम" और "संकल्प" जिन्दा थे: मान की चाह, अपमान का जवाब देने की ताक़त, और यह भाव कि मैं तपस्वी हूँ, मुझे ऐसे कैसे अपमानित किया जा सकता है। उनके कर्म जल नहीं रहे थे, वे फल दे रहे थे, और फल कैसा, एक मरी हुई बगुली। और उस स्त्री का दिन चौके और बर्तनों और सेवा में बीतता था, और वहाँ कथा में हमें कोई सौदा नहीं दिखता। वह अपना कर्तव्य जैसा समझती थी, पूरे मन से निभाती थी, और उसके पास न शिकायत का हिसाब था, न बदले की ताक़त की धौंस। इसीलिए वह कौशिक से बड़ी निकली, चाहे उसके पास तपस्वी का नाम नहीं था।

आगे बढ़ने से पहले आपसे एक छोटी-सी बात कहना चाहता हूँ। हम इस सत्संग के क़रीब तीसरे हिस्से तक पहुँच गए हैं, और यहीं वह जगह है जहाँ मन निष्कर्ष निकाल लेता है कि अच्छा, तो गीता कहती है कि काम में लगे रहो और कामना मत रखो, बस इतनी-सी बात है। पर आधा सुना हुआ सत्य भ्रम बन जाता है। क्योंकि "कामना मत रखो" अपने आप में एक और बोझ बन सकता है, जब तक यह न दिखे कि कामना के बदले हाथ में क्या आता है। और उसका उत्तर इस सत्संग के अगले हिस्सों में एक श्लोक में है जो भोजन से पहले बोला जाता है। अगर आप यह सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि यह यात्रा बीच में न टूटे, और आज का हिस्सा अन्त तक सुनिए।

अब बीसवाँ श्लोक। त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः, कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः। कर्मफल की आसक्ति को त्यागकर जो सदा तृप्त और आश्रय-रहित है, वह कर्म में भली-भाँति लगा हुआ भी कुछ नहीं करता।

इस श्लोक का सबसे चौंकाने वाला शब्द "नित्यतृप्त" है, यानी सदा तृप्त। श्रीकृष्ण ने यह नहीं कहा कि फल की इच्छा छोड़ दो और भूखे रहकर काम करो। उन्होंने कहा कि जो तृप्त है, उसके काम का स्वभाव ही दूसरा हो जाता है। श्रीधर स्वामी इसका अर्थ करते हैं कि वह अपने ही आनन्द से तृप्त है। और "निराश्रय" का अर्थ वे यह करते हैं कि उसे अपने योगक्षेम के लिए, यानी जो पाया उसे बचाए रखने और जो नहीं पाया उसे पाने के लिए, किसी सहारे की ज़रूरत नहीं रही। शंकराचार्य कहते हैं कि निराश्रय वह है जो किसी भी फल का साधन अपना आश्रय नहीं बनाता, देखे हुए फल का भी नहीं और अनदेखे फल का भी नहीं। तिलक महाराज इसे एक सरल वाक्य में रखते हैं कि वह यह बुद्धि नहीं रखता कि अमुक काम की सिद्धि के लिए मैं अमुक काम कर रहा हूँ।

ज़रा इस फ़र्क़ को अपने घर में देखिए। एक माँ खाने के बाद, जब उसका अपना पेट भरा हो, बच्चे के लिए कुछ पकाती है, तो उसके हाथ में एक तरह की निश्चिन्तता होती है। और वही माँ अगर भूखी होकर, चिड़चिड़ी होकर, यह हिसाब लगाते हुए पकाए कि इसके बदले मुझे क्या मिलेगा, तो वही रोटी दूसरी बन जाती है। पहली रोटी में काम है, पर माँग नहीं। दूसरी में काम भी है और माँग भी, और माँग ही थकाती है। नित्यतृप्त होने का मतलब यही है कि वह माँग भीतर से पहले ही भरी जा चुकी है। रामानुजाचार्य कहते हैं कि ऐसा आदमी कर्म के बहाने से असल में ज्ञान का अभ्यास कर रहा होता है।

इक्कीसवाँ श्लोक सीढ़ी का अगला पायदान है। निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः, शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्। जो कामना रहित है, जिसने चित्त और शरीर को वश में कर लिया है, और सब संग्रह त्याग दिया है, वह केवल शरीर-सम्बन्धी कर्म करता हुआ पाप को प्राप्त नहीं होता।

हमारी टीका कहती है कि यह श्लोक संन्यासी का वर्णन करता है, जिसने सब त्याग दिया है और केवल शरीर के निर्वाह के लिए ज़रूरी काम करता है, और वह न्यूनतम काम भी उसे नहीं बाँधता। मधुसूदन सरस्वती इसे तर्क से जोड़ते हैं। वे कहते हैं कि जब ज्ञान के बल पर बड़े-बड़े यज्ञ जैसे कर्म भी फल नहीं देते, तो रोटी जुटाने जैसे छोटे और विक्षेप-रहित काम का तो बाँधना बनता ही नहीं। यानी श्लोक बीस ने उसकी बात की जो पूरे मन से काम में डूबा है और फिर भी बँधा नहीं, और श्लोक इक्कीस उसी का सबसे हल्का रूप दिखाता है, कि जिसके पास कुछ नहीं बचा, उसकी खाने और जीने जितनी हरकत भी बन्धन नहीं। यह श्लोक संन्यासी का है, पर इसकी एक छाँव घर के बुज़ुर्गों पर भी पड़ती है। जिनके दिन अब बस दवा, थोड़ा भोजन और आराम में बीतते हैं, और जो सोचते हैं कि अब मैं किसी काम का नहीं रहा, उनसे यह श्लोक कहता है कि जिस मन ने आशा और संग्रह की पकड़ छोड़ दी, उसके लिए शरीर चलाने जितना जीना भी भार नहीं, साधना है।

पर अभी एक बात बाकी है। अब तक श्रीकृष्ण ने यह बताया कि कर्म किस हाल में बाँधता नहीं। अगले तीन श्लोक वह बात कहेंगे जो इस पूरे सत्संग का दिल है, कि कर्म को पूजा में बदला कैसे जाए। और उसके लिए कौशिक को एक ऐसे व्याध के पास जाना पड़ेगा जो मिथिला में मांस बेचता है, और जिसके घर में वे पहली बार अपनी आँखों से देखेंगे कि पूजा किसे कहते हैं।

यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः । समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥ २२ ॥
गीता 4.22 — अर्थ पढ़ें ›
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः । यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥ २३ ॥
गीता 4.23 — अर्थ पढ़ें ›
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् । ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥ २४ ॥
गीता 4.24 — अर्थ पढ़ें ›

बाईसवाँ श्लोक उस आदमी की तस्वीर पूरी करता है जिसके कर्म बाँधते नहीं। यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः, समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते। जो अपने-आप मिले में सन्तुष्ट है, द्वन्द्वों से परे है, ईर्ष्या रहित है और सिद्धि-असिद्धि में सम है, वह कर्म करके भी नहीं बँधता।

चार बातें हैं, और चारों रोज़ के जीवन की हैं। "यदृच्छालाभ" यानी वह जो बिना माँगे, बिना खींचे अपने समय पर मिल जाए। शंकराचार्य यही अर्थ करते हैं कि जो लाभ बिना प्रार्थना के आ पहुँचा, उसी में सन्तोष। "द्वन्द्वातीत" यानी गर्मी-सर्दी, सुख-दुःख, मान-अपमान जैसे जोड़ों से परे, और शंकराचार्य इसे ऐसे समझाते हैं कि इनसे चोट खाकर भी उसका मन निराश नहीं होता। "विमत्सर" यानी जिसके मन में दूसरे के लिए ईर्ष्या या बैर नहीं। और "सम सिद्धि और असिद्धि में", यानी काम बन जाए तो फूलना नहीं, न बने तो टूटना नहीं। और आख़िरी पंक्ति में वही बात फिर आती है, "कृत्वापि न निबध्यते", कर्म करके भी नहीं बँधता।

इसे एक दफ़्तर के दिन में देखिए। आपने महीनों मेहनत की, और तरक्की आपके साथी को मिल गई। उस शाम दो रास्ते होते हैं। एक, कि मन रात भर उसी हिसाब में घूमे कि उसने क्या चाल चली होगी, और अगले दिन उसकी हर बात में काँटा दिखे। दूसरा, कि आप उसे सच्चे मन से बधाई दें, और अगले दिन अपना काम उतने ही मन से करें। दोनों में काम एक-सा है। पर पहले आदमी को वह काम बाँध रहा है, और दूसरा "विमत्सर" है, और उसका काम उसे बाँधता नहीं।

संत ज्ञानेश्वर कहते हैं कि ऐसा आदमी जो भी अपने समय पर मिले, उसी में सुखी रहता है, क्योंकि उसके लिए "अपना" और "पराया" दो हैं ही नहीं, और जिसके लिए सारा संसार उससे अलग नहीं, उसे कौन-सा कर्म बाँधेगा।

तेईसवाँ श्लोक उसी तस्वीर में आख़िरी रेखा खींचता है, और वह "यज्ञ" शब्द है। गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः, यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते। जो आसक्ति रहित है, मुक्त है, जिसका चित्त ज्ञान में स्थित है और जो यज्ञ के लिए कर्म करता है, उसके सम्पूर्ण कर्म विलीन हो जाते हैं।

"यज्ञायाचरतः" यानी वह जो कर्म को यज्ञ के लिए करता है, अर्पण की तरह। आपको याद होगा, दसवें सत्संग में, तीसरे अध्याय के नौवें श्लोक पर, हमने सुना था कि यज्ञ के निमित्त के सिवा किया हुआ कर्म संसार को बाँधता है। यहाँ वही बात दूसरी ओर से आती है, कि यज्ञ बनाकर किया हुआ कर्म बाँधने की जगह घुल जाता है। "प्रविलीयते" का अर्थ हमारी टीका यह करती है कि कर्म और उसका फल बिना ऐसा संस्कार छोड़े मिट जाते हैं जो बाद में फल दे। शंकराचार्य "समग्र" शब्द पर रुकते हैं और कहते हैं कि यहाँ कर्म अपने फल के साथ विलीन हो जाता है। संत ज्ञानेश्वर की उपमा मुझे बहुत भाती है। वे कहते हैं कि जैसे बेमौसम के बादल आकाश में बिना किसी शोर के अपने आप घुल जाते हैं, वैसे ही ऐसे आदमी के सारे कर्म घुल जाते हैं, जहाँ से उठे थे वहीं।

और अब चौबीसवाँ श्लोक, जो इस सत्संग की जान है और जिसके लिए यह पूरा रास्ता चला। ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्, ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना। अर्पण ब्रह्म है, हवि ब्रह्म है, ब्रह्मरूपी अग्नि में ब्रह्मरूपी कर्ता द्वारा हवन किया गया है। ब्रह्मरूप कर्म में समाधिस्थ पुरुष द्वारा प्राप्त करने योग्य फल भी ब्रह्म ही है।

इसे एक-एक करके खोलते हैं। यज्ञ की क्रिया में कई चीज़ें होती हैं। एक चम्मच या करछी, जिससे आहुति दी जाती है, उसे "अर्पण" कहा गया है। फिर "हवि", यानी जो चीज़ अर्पित की जा रही है, जैसे घी। फिर अग्नि, जिसमें वह डाली जा रही है। फिर करने वाला, जो डाल रहा है। फिर डालने की क्रिया। और आख़िर में वह फल, जिसे पाने के लिए यज्ञ किया गया है। हमारी टीका कहती है कि यज्ञ का हर अंग, यानी साधन, हवि, अग्नि, हवन करने वाला, क्रिया और उसका फल, ब्रह्म देखा जाता है। ऐसे व्यक्ति के लिए परमात्मा से बाहर कुछ नहीं, इसलिए कर्म नहीं बाँधता। और टीका यह भी जोड़ती है कि यह श्लोक प्रायः भोजन से पहले बोला जाता है।

शंकराचार्य इसके लिए एक बहुत सुन्दर उदाहरण देते हैं। जिसने सीप को पहचान लिया, वह उसमें चाँदी नहीं देखता, उसके लिए जो चाँदी दिखती थी, वह सीप ही थी। वैसे ही जो ब्रह्म को जान लेता है, उसके लिए लोक में जो "करछी" कहलाती है, वह ब्रह्म ही है, जो "घी" कहलाता है वह ब्रह्म ही है, जो "अग्नि" कहलाती है वह ब्रह्म ही है, और करने वाला भी ब्रह्म ही है। श्रीधर स्वामी कहते हैं कि इस दृष्टि से किया हुआ कर्म किसी दूसरे फल के लिए नहीं रह जाता, उसका फल भी वही ब्रह्म है। और नीलकण्ठ बहुत आगे तक जाते हैं। वे कहते हैं कि जिसे यह समाधि में दिख गया, उसके लिए सोना, बैठना, जो भी वह करता है, सब ब्रह्म ही है।

यहाँ एक ज़रूरी बात। इसका मतलब यह नहीं कि आप रसोई में चम्मच को देखकर "यह ब्रह्म है" कहना शुरू कर दें और बाक़ी सब वैसा ही चलता रहे। रामानुजाचार्य कहते हैं कि जो साधक यह जानकर कर्म करता है कि उसका कर्म परब्रह्म से भरा है, उसका कर्म ज्ञान का रूप ले लेता है और आत्मा को साक्षात् देखने का साधन बन जाता है। यह श्लोक तर्क के लिए नहीं, काम के बीच जीकर देखने के लिए है।

और ठीक यहीं मैं आपको कौशिक के पास वापस ले चलता हूँ, क्योंकि मार्कण्डेय की कथा इस श्लोक को घर की चौखट तक ले आती है। उस पतिव्रता स्त्री ने कौशिक से कहा था कि मुझे लगता है आप धर्म को सचमुच नहीं जानते, और अगर आप सबसे ऊँचा धर्म जानना चाहते हैं तो मिथिला नगरी में जाइए, वहाँ एक व्याध रहता है जो माता-पिता की सेवा करता है, सच बोलता है और इन्द्रियों को जीत चुका है। वह आपको धर्म बताएगा। और कौशिक का मन बदल गया। उन्होंने अपने को धिक्कारा। उन्होंने कहा कि श्रद्धा रखनी ही चाहिए, और मिथिला की ओर चल पड़े, वनों, गाँवों और नगरों को पार करते हुए, उस नगरी की ओर जो राजा जनक की रक्षा में थी।

मिथिला पहुँचकर उन्होंने ब्राह्मणों से धर्मव्याध का पता पूछा, और उन्होंने पता बता दिया। कौशिक वहाँ पहुँचे तो देखा कि वह कसाईखाने में बैठा हिरन और भैंसे का मांस बेच रहा है, और ग्राहकों की भीड़ है। वे एक ओर खड़े रहे। व्याध ने उन्हें देखा और तुरन्त उठकर उनके पास आया, प्रणाम किया, और कहा, "मैं ही वह व्याध हूँ, आज्ञा दीजिए। और मैं जानता हूँ कि आप किसलिए आए हैं। उस पतिव्रता ने आपसे कहा था कि मिथिला जाओ।" कौशिक को लगा कि यह दूसरा आश्चर्य है।

घर पहुँचकर, जब व्याध ने उनका स्वागत किया, पाँव धोने का जल दिया और आसन दिया, तो कौशिक ने सीधी बात कही। उन्होंने कहा कि यह काम आपके लिए उचित नहीं लगता, और आपके इस कठोर काम से मैं बहुत दुखी हूँ। व्याध ने जो उत्तर दिया, वह साफ़ और शान्त था। उसने कहा कि यह काम मेरे कुल के योग्य है, बाप-दादों से चला आया है, मैं अपने धर्म पर चलता हूँ, इसलिए मुझ पर खेद मत कीजिए। और फिर उसने गिनाया कि वह इस काम के बीच क्या सँभालकर चलता है: वह यत्न से अपने बूढ़े माता-पिता की सेवा करता है, सच बोलता है, किसी से ईर्ष्या नहीं करता, यथाशक्ति दान देता है, किसी की निन्दा नहीं करता, और देवता, अतिथि और आश्रितों को देने के बाद जो बचता है, उसी से जीता है। वह यह भी साफ़ कहता है कि काम कठोर है, और दो अध्याय आगे वह उसे अपने पहले के किए का फल बताता है और कहता है कि मैं इस दोष को मिटाने का यत्न करता हूँ।

फिर उसने कई अध्यायों में कौशिक के प्रश्नों के उत्तर दिए: कर्म और उसका फल, सनातन जीव, और वह जानी-पहचानी उपमा कि शरीर रथ है, आत्मा चलाने वाला, इन्द्रियाँ घोड़े, और जो धीर पुरुष लगाम थामे रखता है वही सबसे अच्छा सारथी है। कौशिक ने कहा कि धर्म की बातों में आपसे कुछ भी अनजाना नहीं है।

और तब व्याध ने वह बात कही जो इस सत्संग के लिए सबसे बड़ी है। उसने कहा, "अब मेरे उस धर्म को भी अपनी आँखों से देखिए जिसका मैं पालन करता हूँ। हे श्रेष्ठ ब्राह्मण, उसी से मैंने यह सिद्धि पाई है।" वह कौशिक को भीतरी घर में ले गया। वन पर्व का दो सौ सत्रहवाँ अध्याय।

वहाँ क्या था? एक सफ़ेद पुता हुआ, चार भवनों वाला घर, जो मन्दिर जैसा लगता था, जिसमें देव-प्रतिमाएँ भली-भाँति पूजित थीं, पलंग और आसन बिछे थे और सुगन्ध महक रही थी। और वहाँ सफ़ेद वस्त्र पहने, भोजन करके सन्तुष्ट बैठे थे उसके बूढ़े माता और पिता। व्याध ने सिर झुकाकर उनके चरणों में प्रणाम किया।

फिर उसने कौशिक से कहा, और इस वाक्य को ध्यान से सुनिए। "मेरे पिता और माता, ये दोनों ही मेरे सबसे बड़े देवता हैं। देवताओं के लिए जो करना चाहिए, वह मैं इन दोनों के लिए करता हूँ। जैसे ब्राह्मण भेंट लाकर देवताओं की सेवा करते हैं, वैसे ही मैं बिना आलस के इन दोनों की सेवा करता हूँ। मेरे लिए ये दोनों ही वे पवित्र अग्नियाँ हैं जिनकी ज्ञानी बात करते हैं। ये ही मेरे यज्ञ और चारों वेद हैं, ये मेरे लिए सब कुछ हैं।" उसने बताया कि वह अपने हाथों से उन्हें नहलाता है, उनके पैर धोता है, उन्हें भोजन देता है, उनसे वही बोलता है जो उन्हें प्रिय हो, और पत्नी और पुत्र के साथ बिना आलस के उनकी सेवा करता है।

अब चौबीसवें श्लोक को उसके घर में रखकर देखिए। ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ। जो अर्पण का साधन है, उसे वहाँ पानी का लोटा और सेवा के हाथ समझ लीजिए। जो हवि है, वह थाली का भोजन है, जो वह अपने हाथ से परोसता है। जो अग्नि है, वे माता-पिता हैं, जिन्हें वह स्वयं पवित्र अग्नियाँ कहता है। जो करने वाला है, वह व्याध स्वयं है। और जो फल है, वह उसकी अपनी वह सिद्धि है जिसे वह ब्राह्मण को दिखाने लाया था। उसका पेशा वही रहा। उसका बाज़ार वही रहा। पर उसने अपने पूरे दिन के बीच एक ऐसा कोना बना रखा था जहाँ हर हरकत अर्पण थी, और मुझे लगता है कि उसी कोने की रोशनी में बाज़ार भी उसके लिए हल्का रहा होगा। ब्रह्मार्पणं का मतलब पूजा के कमरे को दफ़्तर में उठा ले जाना नहीं है। इसका मतलब है कि हर कमरे में, हर हाथ की हरकत में, अर्पण की एक जगह बन सकती है।

पर अभी एक बात बाकी है। चौबीसवें श्लोक के बाद श्रीकृष्ण एक लम्बी सूची शुरू करेंगे, कि लोग यज्ञ कितने तरह से करते हैं। देवताओं की पूजा से लेकर साँस के हवन तक। और उस सूची में आपको वह यज्ञ भी मिलेगा जो आप शायद अपने रोज़ के जीवन में पहले से कर रहे हैं, बिना यह जाने कि उसे यज्ञ कहा जा सकता है।

दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते । ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ॥ २५ ॥
गीता 4.25 — अर्थ पढ़ें ›
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति । शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ॥ २६ ॥
गीता 4.26 — अर्थ पढ़ें ›

पच्चीसवें श्लोक से श्रीकृष्ण एक सूची शुरू करते हैं, जो तीसवें तक चलती है। हमारी टीका इसे इस तरह कहती है कि श्लोक पच्चीस से तीस यज्ञ के अनेक रूप गिनाते हैं। सुनने में यह किसी पुराने कर्मकाण्ड की फ़ेहरिस्त लगती है, पर मेरा आग्रह है कि इसे एक नक़्शे की तरह सुनिए, जिसमें बाहर से भीतर की ओर उतरते हुए, हर तरह के साधक के लिए एक जगह है।

दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते, ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति। कुछ योगी देवताओं के लिए ही यज्ञ भली-भाँति करते हैं। दूसरे ब्रह्मरूपी अग्नि में यज्ञ द्वारा यज्ञ का ही हवन करते हैं।

यह सबसे बाहर का रूप और सबसे भीतर का रूप एक ही श्लोक में रख देता है। पहला है देवताओं के लिए किया गया यज्ञ, यानी हवन, पूजा, और वे सब विधियाँ जिनसे हम इन्द्र, अग्नि, वरुण जैसी शक्तियों को स्मरण करते हैं। मधुसूदन सरस्वती इसमें दर्श-पूर्णमास और ज्योतिष्टोम जैसे नाम लेते हैं। और श्रीधर स्वामी "एव" शब्द पर ध्यान दिलाते हैं, कि "देवताओं के लिए ही" कहने में यह भी बता दिया गया कि ऐसा साधक अभी इन्द्र आदि में ब्रह्म-बुद्धि नहीं रखता। वह कर्मयोगी है, देवता को देवता मानकर, श्रद्धा से यज्ञ करता है। और दूसरा रूप है जो ब्रह्म की अग्नि में यज्ञ का ही हवन करता है। हमारी टीका इसका अर्थ यह करती है कि यह जीवात्मा को ब्रह्म में अर्पित करना है, अर्थात् स्वयं को उससे एक जानना। श्रीधर इसे ज्ञानयोगियों का यज्ञ कहते हैं।

देखिए, इस सूची में कोई ऊँचा-नीचा नहीं गिना जा रहा। अलग-अलग लोग अलग-अलग जगह खड़े हैं, और सबका काम यज्ञ कहलाता है। इसीलिए तीसवें श्लोक पर पहुँचकर श्रीकृष्ण कहेंगे कि ये सब यज्ञ को जानने वाले हैं।

छब्बीसवाँ श्लोक तो और सीधे हमारे रोज़ के जीवन में उतरता है। श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति, शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति। अन्य योगी श्रोत्र आदि इन्द्रियों को संयमरूपी अग्नियों में हवन करते हैं। अन्य लोग शब्द आदि विषयों को इन्द्रियरूपी अग्नियों में हवन करते हैं।

इसके दो हिस्से हैं, और दोनों बिलकुल उलटे दिखते हैं। हमारी टीका कहती है कि पहला इन्द्रियों को पूरी तरह रोकना है, और दूसरा इन्द्रियों को उनके विषयों में लगाना है, पर केवल मर्यादा में और आसक्ति के बिना। श्रीधर स्वामी इसे बहुत साफ़ बाँटते हैं। वे कहते हैं कि पहला हिस्सा नैष्ठिक ब्रह्मचारियों का है, जो इन्द्रियों को संयम की आग में डाल देते हैं। और दूसरा हिस्सा गृहस्थों का है, जो भोग के समय भी आसक्त नहीं होते, और अपनी इन्द्रियों को अग्नि मानकर शब्द, रूप, रस जैसे विषयों को उसमें हवि की तरह डालते हैं। शंकराचार्य भी दूसरे हिस्से को यों कहते हैं कि कान और आँख जैसी इन्द्रियों से जो विषय बिना किसी रोक के सही ढंग से लिया जाए, उसी को वे होम मानते हैं।

यह बात मुझे बहुत मानवीय लगती है, क्योंकि यहाँ श्रीकृष्ण हमारे सुनने, देखने और चखने को भी यज्ञ की सूची में गिनते हैं। शाम को आप कोई प्रिय भजन सुनते हैं, बच्चों की हँसी सुनते हैं, रोटी का पहला कौर चखते हैं। अगर वह सब मर्यादा में है और उसमें आप चिपक नहीं गए हैं, तो वह भी हवन है। जो चीज़ फँसाती थी, वही सामने आकर अर्पण बन सकती है। और इसका उलटा भी सच है, कि जो बहुत ऊँचा लगने वाला त्याग है, उसमें भी अगर "मैं त्यागी हूँ" का अभिमान आ जाए, तो उसकी आग बुझ जाती है।

इसी बात के लिए एक बहुत पुरानी तस्वीर महाभारत के अश्वमेधिक पर्व में है, जिसे श्रीकृष्ण स्वयं अर्जुन को सुनाते हैं। यह युद्ध के बाद की बात है। श्रीकृष्ण, जिन्हें वहाँ वासुदेव कहा गया है, अर्जुन से कहते हैं कि इस विषय में लोग एक पुराने ब्राह्मण-दम्पती का संवाद सुनाते हैं। एक ब्राह्मणी ने अपने पति को सब कर्म छोड़े हुए, चुपचाप बैठे देखा, और पूछा कि तुम्हें पति मानकर आश्रय लेने वाली मैं किस लोक को जाऊँगी, तुम जो सब कर्म त्यागे, कंगाल बने बैठे हो? यह अश्वमेधिक पर्व का इक्कीसवाँ अध्याय है।

ब्राह्मण ने मानो मुस्कराते हुए उत्तर दिया कि मैं तुम्हारी बात का बुरा नहीं मानता। लोग जो पकड़ा, देखा और सुना जाता है, उसी को "कर्म, कर्म" कहते हैं, पर ज्ञान के बिना कर्म करने वाले केवल मोह में पड़ते हैं, और इस संसार में कोई क्षण भर भी कर्म-रहित नहीं रह सकता। आप पहचानिए, यह वही बात है जो तीसरे अध्याय के पाँचवें श्लोक में कही गई थी, और जो आज हमने अठारहवें श्लोक में सुनी। फिर वह ब्राह्मण बताता है कि उसने भीतर क्या देखा। शरीर के भीतर एक अग्नि है जिसे वैश्वानर कहा गया है, जो सात प्रकार से स्थापित है। नाक, जीभ, आँख, त्वचा, कान, मन और बुद्धि, ये उसकी सात ज्वालाएँ हैं। जो सूँघा, देखा, चखा, छुआ, सुना, सोचा और समझा जाता है, वह उसकी समिधा है, उसका ईंधन। और जानने वाले सात ऋत्विज हैं, जो उसमें आहुति डालते हैं।

यही तस्वीर छब्बीसवें श्लोक की है, बस गीता में वह एक पंक्ति में है और अश्वमेधिक पर्व में एक पूरा दृश्य। आपकी आँख जब कुछ देखती है, तो एक अग्नि में आहुति पड़ती है। प्रश्न बस इतना है कि आहुति में क्या डाला जा रहा है, और किस भाव से।

पर अभी एक बात बाकी है। अब तक की सूची में देवता, ब्रह्म और इन्द्रियाँ थीं। अगले दो श्लोकों में सूची उन चीज़ों की ओर मुड़ती है जो भीतर की हलचल से लेकर पैसे तक सब कुछ अपने भीतर समेट लेती हैं, और उनमें एक यज्ञ ऐसा है जो युधिष्ठिर के विशाल अश्वमेध के सामने, एक प्रस्थ भर सत्तू से भारी ठहराया गया था।

सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे । आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥ २७ ॥
गीता 4.27 — अर्थ पढ़ें ›
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे । स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ॥ २८ ॥
गीता 4.28 — अर्थ पढ़ें ›

सत्ताईसवाँ श्लोक सूची को और भीतर ले जाता है। सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे, आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते। दूसरे योगी इन्द्रियों के सब कर्मों और प्राणों के सब कर्मों को ज्ञान से प्रज्वलित आत्मसंयमयोगरूपी अग्नि में हवन करते हैं।

छब्बीसवें श्लोक में हर इन्द्रिय अलग-अलग अग्नि थी। यहाँ वह सारी हलचल, चाहे सुनना-देखना हो, चाहे बोलना-पकड़ना, चाहे साँस का आना-जाना, एक ही अग्नि में डाली जाती है, "आत्मसंयमयोग" में, यानी मन को भीतर के एक बिन्दु पर थामने के योग में। श्रीधर स्वामी इसे ध्यान में टिके हुए साधकों का यज्ञ कहते हैं, जो ध्यान के विषय को ठीक से जानकर उसमें मन को बाँधते हैं और बाक़ी सारी क्रियाओं को ठहरा देते हैं। और शंकराचार्य "ज्ञानदीपिते" शब्द पर एक सुन्दर तस्वीर देते हैं, कि जैसे दीपक में तेल पड़ने से लौ और उजली हो जाती है, वैसे विवेक से यह अग्नि जलती है। यानी इस अग्नि का ईंधन संयम नहीं, समझ है।

इसे अपने जीवन में कभी देखा है? कोई गाने वाला जब गाने में पूरी तरह डूब जाता है, तो उसकी आँख, उसकी साँस, उसके हाथ सब एक ही धारा में बहते हैं। यह योगियों का दर्जा नहीं, पर उसी दिशा की झलक है।

अठाईसवाँ श्लोक एक साथ पाँच यज्ञ गिनाता है। द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे, स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः। कुछ द्रव्ययज्ञ करने वाले हैं, कुछ तपयज्ञ करने वाले, कुछ योगयज्ञ करने वाले। तथा दूसरे कठोर व्रत वाले यत्नशील साधक स्वाध्याय और ज्ञानयज्ञ करने वाले हैं।

इन पाँचों को एक-एक करके सरल भाषा में सुन लेते हैं। "द्रव्ययज्ञ" का अर्थ हमारी टीका यह करती है कि यह दान है: धन देना, लोकहित के कार्य करना। नीलकण्ठ इसमें कुएँ, बावड़ी और बाग़ बनवाना और तीर्थ में दान देना गिनाते हैं। "तपोयज्ञ" यानी व्रत और तप, जैसे कठिन उपवास और संयम के नियम। "योगयज्ञ", श्रीधर स्वामी के अनुसार, मन की वृत्तियों को रोकने वाला समाधि का अभ्यास है, और नीलकण्ठ इसमें यह भी जोड़ते हैं कि फल की आसक्ति छोड़कर सन्ध्या जैसे नित्य कर्मों का अनुष्ठान भी योगयज्ञ है। "स्वाध्याय" का अर्थ हमारी टीका शास्त्र का पाठ और अध्ययन बताती है, और "ज्ञानयज्ञ" शास्त्र के अर्थ को समझना और उस पर विचार करना है। और ये सब करने वाले "यतयः संशितव्रताः" हैं, यानी यत्नशील और तीखे किए हुए, कसे हुए व्रतों वाले, जैसा शंकराचार्य कहते हैं।

इन पाँचों में सबसे रोज़ का यज्ञ पहला है, द्रव्ययज्ञ, यानी जो आप कमाते हैं उसका एक हिस्सा बाँटना। और इस पर महाभारत की एक कथा है जिसे सुनकर "दान" शब्द का मतलब बदल जाता है।

यह अश्वमेधिक पर्व में है, युद्ध के बाद की। धर्मराज युधिष्ठिर ने अश्वमेध महायज्ञ किया। ब्राह्मण, स्वजन और दीन, अन्धे और कंगाल तक तृप्त हुए, चारों दिशाओं में महादान की घोषणा हो चुकी थी, और धर्मराज के सिर पर फूलों की वर्षा हो रही थी। तभी एक बिल से एक नेवला निकला, जिसका आधा शरीर सुनहरा था। उसने ऐसा नाद किया कि पशु-पक्षी डर गए, और फिर मनुष्य की वाणी में बोला, "हे राजाओ, तुम्हारा यह यज्ञ कुरुक्षेत्र में रहने वाले उस उदार उञ्छवृत्ति वाले के एक प्रस्थ सत्तू के बराबर नहीं है।" सब ब्राह्मण चकित रह गए और पूछा कि तुम कौन हो जो हमारे यज्ञ की निन्दा करते हो। और नेवले ने पूरी बात बताई, जो अश्वमेधिक पर्व के बानवें अध्याय में है।

कुरुक्षेत्र में एक ब्राह्मण रहता था जो उञ्छवृत्ति से जीता था, यानी खेतों से झड़े हुए दाने चुन-चुनकर, कबूतर की तरह। उसके साथ उसकी पत्नी, पुत्र और पुत्रवधू थे। एक भयंकर अकाल पड़ा, और उस परिवार को भोजन नहीं मिल रहा था। एक दिन बड़ी कठिनाई से उन्हें एक प्रस्थ जौ मिले। उन्होंने उसका सत्तू बनाया, जप और नित्य कर्म किया, अग्नि में आहुति दी, और सत्तू चार बराबर हिस्सों में बाँट लिया। ठीक जब वे खाने बैठे, कोई ब्राह्मण अतिथि आ गया। उन्होंने प्रसन्न होकर उसका स्वागत किया, और ब्राह्मण ने अपने हिस्से का सत्तू उसे दे दिया। अतिथि ने उसे खाया, पर उसे तृप्ति नहीं मिली।

तब पत्नी ने कहा कि मेरा हिस्सा भी दे दीजिए। ब्राह्मण ने मना किया, कि वह बूढ़ी है, भूख से थकी है, और पति का धर्म है कि वह पत्नी की रक्षा करे। पर पत्नी ने कहा कि हम दोनों का धर्म और अर्थ एक है, मेरा सत्तू लीजिए। उसने ले लिया, पर अतिथि तृप्त नहीं हुआ। फिर पुत्र ने अपना हिस्सा दिया, यह कहकर कि बूढ़े पिता का पालन मेरा काम है, और पिता ने झिझकते हुए ले लिया। फिर भी अतिथि तृप्त नहीं हुआ। तब पुत्रवधू ने अपना हिस्सा दिया, और ससुर के बार-बार मना करने पर भी मनाती रही, और आख़िर उसका सत्तू भी अतिथि को दिया गया।

तब वह अतिथि प्रसन्न हुआ। वह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं था। कथा कहती है कि वह मनुष्य रूप में स्वयं धर्म था। उसने कहा कि तुम्हारा दान शुद्ध है, न्याय से पाया गया है, और अपनी शक्ति भर दिया गया है। आकाश से फूल बरस रहे हैं, देवता और ऋषि तुम्हें देखना चाहते हैं, स्वर्ग का रथ आ गया है। और वह परिवार उसी रथ पर बैठकर स्वर्ग चला गया। नेवला कहता है कि वह उसी समय बिल से निकला था, और सत्तू के कणों और जल की नमी से उसका आधा शरीर सोने का हो गया। तब से वह तपोवनों और यज्ञों में जाता है, यह सोचकर कि दूसरा पार्श्व भी सोने का हो जाए। पर युधिष्ठिर के इतने बड़े यज्ञ से वह सोने का नहीं हुआ। इसीलिए उसने हँसकर वह बात कही थी।

धर्म ने उस ब्राह्मण से जो कहा, उसकी कुछ पंक्तियाँ आज के हमारे प्रश्न का सीधा उत्तर हैं। उसने कहा कि धन का आना एक सूक्ष्म बात है, योग्य पात्र को दान उससे ऊँचा है, दान से भी ऊँचा समय है, और उससे भी ऊँची श्रद्धा। उसने कहा कि जो हज़ार देने में समर्थ है और सौ देता है, जो सौ में समर्थ है और दस देता है, जो शक्ति के अनुसार केवल जल ही देता है, सबका फल समान माना गया है। और यह कि धर्म बड़े दिए हुए दानों से उतना प्रसन्न नहीं होता जितना न्याय से कमाए और श्रद्धा से पवित्र छोटे दानों से।

अब आप अठाईसवें श्लोक के पहले यज्ञ को इस कथा के साथ सुनिए। द्रव्ययज्ञ का मतलब यह नहीं कि बहुत पैसा देना है। इसका मतलब है कि जो आपके हाथ में है, वह न्याय से कमाया हुआ हो, श्रद्धा से दिया जाए, और देने वाले को यह न लगे कि वह कुछ गँवा रहा है। उस परिवार के पास सत्तू का एक प्रस्थ था। आपके पास शायद एक रविवार की दो घण्टे की छुट्टी है, एक सहयोगी के लिए आपकी बात सुनने की फ़ुरसत है, किसी के खाते में एक छोटी रक़म है। उसमें से आपने आज किसे दिया?

पर अभी एक बात बाकी है। अठाईसवें श्लोक में एक यज्ञ है जो रोज़ हमारे साथ चलता है, जिसके लिए कोई सामग्री नहीं लगती, कोई समय नहीं माँगा जाता। उसका नाम है साँस। और अगले दो श्लोक बताएँगे कि कुछ साधकों ने साँस को ही अपना हवन-कुण्ड बना लिया है।

अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे । प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥ २९ ॥
गीता 4.29 — अर्थ पढ़ें ›
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति । सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥ ३० ॥
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उनतीसवाँ श्लोक सीधे साँस की बात करता है। अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे, प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः। दूसरे योगी अपान में प्राण का हवन करते हैं, तथा प्राण में अपान का। प्राणायाम में तत्पर वे प्राण और अपान की गति को रोक देते हैं।

इसे आदर से और सीधे शब्दों में समझ लेते हैं। हमारी देह में साँस की दो धाराएँ मानी गई हैं। शंकराचार्य "प्राण" को वह कहते हैं जो मुँह और नाक से बाहर निकलने की ओर जाती है, और "अपान" को वह जो उसके उलट नीचे की ओर जाती है। इन दोनों की गति पर जो ध्यान लगाता है, वह प्राणायाम करता है। हमारी टीका बताती है कि ये प्राणायाम के तीन अंग हैं: रेचक यानी साँस छोड़ना, पूरक यानी साँस लेना, और कुम्भक यानी साँस रोकना। श्रीधर स्वामी इसे इस तरह समझाते हैं कि साँस भीतर भरते समय प्राण को अपान के साथ एक किया जाता है, साँस बाहर छोड़ते समय अपान का प्राण में हवन होता है, और जब दोनों की गति रोक ली जाती है, तब कुम्भक होता है। यानी श्लोक कहता है कि साँस का भीतर आना, बाहर जाना और ठहर जाना, तीनों को जो पूरे ध्यान से देखता है, उसकी साँस अपने आप हवन बन जाती है।

और यह बात हम महाभारत में भी सुनते हैं। उसी व्याध ने, जिससे हम कौशिक के साथ मिले थे, कौशिक को यह सिखाया था कि शरीर के भीतर अग्नि और वायु कैसे काम करते हैं। उसने कहा कि अग्नि सिर में और नाभि में स्थित है, और प्राण इन सबमें स्थित है। जो हो चुका, जो है और जो होगा, सब प्राण में टिका है, और हम उसे ब्रह्म की ज्योति मानकर उसकी उपासना करते हैं। फिर उसने अपान, उदान, व्यान और समान के स्थान गिनाए, और बताया कि कौन-सी वायु कहाँ किस काम में लगी है। यह वन पर्व का दो सौ सोलहवाँ अध्याय है। यानी जो व्याध कसाईखाने में बैठा था, वही साँस और प्राण की बात उतनी ही साफ़ समझा सकता था जितनी माता-पिता की सेवा की।

एक बात मैं आपसे ज़रूर कहना चाहूँगा। साँस को हवन बनाना योगियों की गहरी साधना है, पर उसका एक सरल रूप हर किसी के पास है। किसी दिन किसी बात पर गुस्सा चढ़े, या फ़ोन पर कोई कड़वी बात सुनकर दिल तेज़ धड़कने लगे, तो उत्तर देने से पहले एक लम्बी साँस छोड़कर देखिए। उस एक रेचक में बहुत कुछ बाहर निकल जाता है, और जवाब देने वाला आदमी कुछ और हो जाता है। यह मेरा अपना सुझाव है, गीता का शब्द नहीं, पर श्लोक की दिशा यही है। और जो इसे गहराई से करना चाहें, उनके लिए इतना ही कि यह किताब से नहीं, किसी जानकार से सीखने की चीज़ है।

तीसवाँ श्लोक सूची का आख़िरी रूप बताता है और फिर पूरी सूची को एक वाक्य में समेट देता है। अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति, सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः। दूसरे नियमित आहार करने वाले प्राणों को प्राणों में हवन करते हैं। ये सब यज्ञ को जानने वाले हैं और यज्ञ द्वारा इनके पाप नष्ट हो चुके हैं।

"प्राणों में प्राणों का हवन" सुनने में उलझा हुआ लगता है। हमारी टीका इसे सरल करती है। वह कहती है कि आहार कम करने पर प्राणशक्तियाँ शिथिल होकर एक-दूसरे में लीन होती हैं, और यही "प्राणों में प्राणों का हवन" है। नीलकण्ठ इसमें एक और अर्थ भी देखते हैं। वे "नियताहार" का मतलब सिर्फ़ खाना नहीं, इन्द्रियों के विषयों का भोग भी लेते हैं, कि जो वैराग्य से अपनी इन्द्रियों को विषयों से बटोर लेता है, वह उन्हें मन में समेटता है, मन को चित्त में, और चित्त को अहंकार में, जो फिर ईंधन के अभाव में जलती आग की तरह अपने आप बुझ जाता है। श्रीधर स्वामी उनतीसवें श्लोक के हवन का एक और रूप भी बताते हैं, कि साँस के आने-जाने के साथ "सोऽहम्" का स्मरण, यानी "वह मैं हूँ", इसी हवन का रूप हो सकता है।

यहाँ गिनती देखिए। श्रीधर स्वामी और नीलकण्ठ दोनों इन यज्ञों को गिनते हैं, और कुल बारह बनते हैं: देवताओं का यज्ञ, ब्रह्म में अर्पण, संयम की अग्नियाँ, इन्द्रियों की अग्नियाँ, आत्मसंयम की अग्नि, धन का दान, तप, योग, स्वाध्याय, ज्ञान, साँस का हवन, और आहार-संयम। और तीसवाँ श्लोक उन सबके बारे में एक वाक्य कहता है, कि "सर्वेऽप्येते" यानी ये सब, जो इनमें से किसी भी रास्ते पर हैं, यज्ञ को जानने वाले हैं, और यज्ञ से उनके पाप धुल चुके हैं।

नीलकण्ठ यहाँ एक बहुत ईमानदार बात कहते हैं, जिसे मैं छोड़ना नहीं चाहता। वे कहते हैं कि ये सब यज्ञ पाप के क्षय के लिए हैं, मोक्ष के सीधे साधन नहीं। यानी यज्ञ आपको धोता है, आपका दरवाज़ा साफ़ करता है, और उसके बाद का काम ज्ञान का है। यही बात श्रीकृष्ण आगे के श्लोकों में कहने वाले हैं, कि यज्ञों में ज्ञान का यज्ञ श्रेष्ठ है। इसलिए अगर आपको लगता है कि आपका रोज़ का काम या आपकी रोज़ की पूजा, कोई भी अकेली, पूरी मंज़िल नहीं है, तो आप ग़लत नहीं हैं। वह रास्ते का एक पड़ाव है, और श्रीकृष्ण उसे यज्ञ कहते हैं।

पर अभी एक बात बाकी है। यज्ञों की यह लम्बी सूची एक बात छोड़ती नहीं, कि अगर इनमें से कोई भी यज्ञ आपके जीवन में नहीं है, तो क्या होगा। इकतीसवाँ श्लोक इसका उत्तर बहुत सीधा देता है, और बत्तीसवाँ श्लोक इस पूरी सूची को उसी बात से जोड़ देता है जिससे हमने आज की शुरुआत की थी।

यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् । नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥ ३१ ॥
गीता 4.31 — अर्थ पढ़ें ›
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे । कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥ ३२ ॥
गीता 4.32 — अर्थ पढ़ें ›

इकतीसवाँ श्लोक सूची के बाद का फल बताता है, और एक चेतावनी भी। यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्, नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम। हे कुरुश्रेष्ठ! यज्ञ से बचे अमृत का भोग करने वाले सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। यज्ञ न करने वाले के लिए यह लोक भी सुखदायक नहीं, फिर परलोक कैसे होगा?

"यज्ञशिष्टामृत" यानी यज्ञ करने के बाद जो बचा, वही अमृत है। शंकराचार्य और श्रीधर स्वामी दोनों इसे इस तरह कहते हैं कि यज्ञ करके, बचे हुए समय में, जो शास्त्र के अनुसार भोजन किया जाए, वह अमृत है, और ऐसे लोग ज्ञान के रास्ते से सनातन ब्रह्म तक पहुँचते हैं। नीलकण्ठ यहाँ उन सबके लिए एक सरल रास्ता बताते हैं जो इन बारह में से कोई भी बड़ा यज्ञ नहीं कर पाते। वे कहते हैं कि रोज़ के पाँच महायज्ञ करके उनका बचा हुआ भोजन खाने वाले भी चित्त को शुद्ध करके सनातन ब्रह्म तक पहुँचते हैं। आपको याद होगा, दसवें सत्संग में, तीसरे अध्याय के तेरहवें श्लोक पर हमने यही बात सुनी थी, कि जो पहले अर्पण करके बचा हुआ खाता है, वह दोषों से छूटता है, और जो पहले और अकेले खाता है, उसके साथ दोष बना रहता है। यहाँ वही बात और ऊँचाई पर लौटी है।

और दूसरी पंक्ति कठोर लगती है। "नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य", यज्ञ न करने वाले के लिए यह लोक भी नहीं है। श्रीधर स्वामी इसमें बहुत सुन्दर बात देखते हैं। वे कहते हैं कि यह मनुष्य-लोक थोड़े सुख वाला है, पर जो यज्ञ से, यानी देने से, खाली है, उसके लिए यह थोड़ा-सा सुख भी नहीं बचता, तो परलोक कहाँ से होगा। मैं इसे श्राप की तरह नहीं, एक देखे हुए तथ्य की तरह सुनता हूँ। कोई भी ऐसा आदमी जो सिर्फ़ लेता है, जिसके जीवन में कुछ भी किसी और के लिए नहीं छूटता, वह भरा हुआ भी खाली रहता है, और आपने ऐसे लोग देखे होंगे। यह वही ख़ालीपन है जिसे हमने दसवें सत्संग में "मोघं पार्थ स जीवति" के नाम से सुना था।

और इस श्लोक का सम्बोधन है "कुरुसत्तम", हे कुरुओं में श्रेष्ठ। अर्जुन के लिए यह प्रशंसा है, पर इसे सुनने वाला एक और कान भी है, उस राजा का जो कुरुओं का राजा कहलाता है और बाणों की शय्या पर लेटे अपने पितामह की खबर लिए बैठा है। राजा चुप है, और कथा आगे चलती है।

और अब बत्तीसवाँ श्लोक, जो सूची को बन्द करता है और दरवाज़ा खोलता है। एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे, कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे। इस प्रकार बहुत प्रकार के यज्ञ वेद की वाणी में विस्तार से कहे गए हैं। उन सबको कर्म से उत्पन्न जानो। ऐसा जानकर तुम मुक्त हो जाओगे।

"ब्रह्मणो मुखे" यानी वेद के मुख में। शंकराचार्य कहते हैं कि वेद के द्वारा जो यज्ञ जाने जाते हैं, वे ब्रह्म के मुख में फैले हुए कहे जाते हैं, जैसे "हम वाणी में प्राण का हवन करते हैं" जैसे वाक्य। और फिर आता है वह शब्द जिसमें इस श्लोक का सार है, "कर्मजान्", कर्म से उत्पन्न। हमारी टीका इसे यूँ खोलती है कि "कर्म से उत्पन्न" का अर्थ है शरीर, वाणी और मन से होने वाले, आत्मा से नहीं। और यह जानना कि आत्मा इनमें से कुछ नहीं करता, यही मुक्त करता है।

श्रीधर स्वामी इसे इस तरह कहते हैं कि ये सब यज्ञ वाणी, मन और शरीर के कर्म से पैदा हुए हैं, आत्मा के स्वरूप को छूते तक नहीं। और शंकराचार्य वह वाक्य कहते हैं जो इस श्लोक का दिल है, कि जो यह जान लेता है कि यह सब मेरा व्यापार नहीं है, मैं तो निर्व्यापार और साक्षी हूँ, वह इस सम्यक् दर्शन से मुक्त हो जाता है। और अब देखिए कि यह कैसे गोल घूमकर अठारहवें श्लोक पर आ गया। वहाँ हमने सुना था कि कर्म में अकर्म देखो। यहाँ बत्तीसवें में वही बात उसका आख़िरी रूप लेती है: यज्ञ भी, चाहे वह देवता की पूजा हो, चाहे साँस का हवन, चाहे सत्तू का दान, सब शरीर, वाणी और मन के हैं। और जो इन सबको देख रहा है, वह इनमें से कुछ नहीं कर रहा।

इसी अध्याय में थोड़ी देर पहले श्रीकृष्ण ने अपने बारे में कहा था, कि वे सब रचने वाले होकर भी अकर्ता हैं। और अब वे अर्जुन से कह रहे हैं कि तुम भी इस दृष्टि के लायक हो। यही वह दरवाज़ा है जिसे हमने शुरू में पूछा था: रोज़ का काम और साधना अलग क्यों लगते हैं? क्योंकि हम मान बैठे हैं कि काम करने वाला एक "मैं" है और पूजा करने वाला दूसरा "मैं"। और गीता कहती है कि दोनों ही शरीर, वाणी और मन की हलचलें हैं, और इन्हें देखने वाला एक ही है, जो न दफ़्तर में कुछ करता है, न पूजा में।

आज के सत्रह श्लोकों ने एक ही सवाल का जवाब कई रंगों में दिया। तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली बात। काम की पहचान उसके बाहरी रूप से नहीं होती, उसके भीतर के रंग से होती है। अठारहवें श्लोक ने कहा था कि कर्म में अकर्म देखो और अकर्म में कर्म। कौशिक पेड़ के नीचे वेद पढ़ते बैठे थे और उनके भीतर क्रोध का कर्म चल रहा था, और वह स्त्री बर्तनों और चौके में डूबी थी और भीतर से मुक्त थी। इसलिए अगली बार जब आपका दिन आपको साधना से दूर लगे, तो अपने से पूछिए: आज यह काम मैं किस भाव से कर रहा हूँ, और उस भाव में कितना "मेरा" है। और जब दफ़्तर की मीटिंग बहुत लम्बी हो जाए, तो उतना तो सोच ही सकते हैं कि इसे भी अर्पण बना लें।

दूसरी बात। एक छोटा-सा काम चुन लीजिए और उसे ब्रह्मार्पण की तरह कीजिए। चौबीसवें श्लोक के साथ हमारी टीका ने कहा कि यह प्रायः भोजन से पहले बोला जाता है। तो अगर आप खाने से पहले एक पल रुककर यह श्लोक मन में दोहरा लें, तो वही थाली, वही रोटी, वही हाथ, वह सब एक यज्ञ बन जाता है। या फ़ोन उठाने से पहले एक साँस। या बच्चे का टिफ़िन बाँधते हुए यह सोचना कि यह मैं किसी के लिए कर रहा हूँ। उस छोटे अर्पण के बाद वही काम हल्का हो जाता है, क्योंकि उसका फल अब उसकी हर हरकत में ही रखा है।

तीसरी बात। हर किसी का यज्ञ अपना है, और उसे किसी से तौलने की ज़रूरत नहीं। श्रीकृष्ण ने बारह रूप गिनाए और किसी को छोटा-बड़ा नहीं कहा। और नेवले की कथा ने बताया कि एक प्रस्थ सत्तू, जो न्याय से कमाया और श्रद्धा से दिया गया, एक विशाल यज्ञ से भारी हो सकता है। इसलिए आपका यज्ञ वही है जो आपके हाथ में है, आज, अभी।

अगली बार हम इसी अध्याय में आगे बढ़ेंगे, तैंतीसवें श्लोक से। अब तक श्रीकृष्ण ने बताया कि कर्म को यज्ञ कैसे बनाएँ। अगले श्लोकों में वे कहेंगे कि इन सब यज्ञों में ज्ञान का यज्ञ श्रेष्ठ है, क्योंकि सारे कर्म ज्ञान में जाकर पूरे होते हैं। और फिर वे बताएँगे कि यह ज्ञान किससे और कैसे सीखा जाता है: विनम्र प्रणाम से, प्रश्न से और सेवा से। और जिस ज्ञान की नौका सबसे बड़े पापी को भी पार कर देती है, उसके सामने सबसे बड़ी रुकावट कौन-सी है, श्रद्धा या संशय, यह हम अगले सत्संग में सुनेंगे।

आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आपके दिन का वह कौन-सा एक काम है जिसे आप आज ही पूजा बना सकते हैं? और अगर उसे आज किसी के लिए अर्पण की तरह कर दें, तो वह किसके लिए होगा? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।

जिसने अपने काम को अर्पण बना लिया, उसके लिए पूजा का कमरा हर कमरे में खुल गया।

जय श्री कृष्ण।

ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् । ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥ २४ ॥
गीता 4.24 — अर्थ पढ़ें ›

तीन बातें

  1. काम की पहचान उसके बाहरी रूप से नहीं होती, उसके भीतर के रंग से होती है। अठारहवें श्लोक ने कहा था कि कर्म में अकर्म देखो और अकर्म में कर्म। कौशिक पेड़ के नीचे वेद पढ़ते बैठे थे और उनके भीतर क्रोध का कर्म चल रहा था, और वह स्त्री बर्तनों और चौके में डूबी थी और भीतर से मुक्त थी। इसलिए अगली बार जब आपका दिन आपको साधना से दूर लगे, तो अपने से पूछिए: आज यह काम मैं किस भाव से कर रहा हूँ, और उस भाव में कितना "मेरा" है। और जब दफ़्तर की मीटिंग बहुत लम्बी हो जाए, तो उतना तो सोच ही सकते हैं कि इसे भी अर्पण बना लें।
  2. एक छोटा-सा काम चुन लीजिए और उसे ब्रह्मार्पण की तरह कीजिए। चौबीसवें श्लोक के साथ हमारी टीका ने कहा कि यह प्रायः भोजन से पहले बोला जाता है। तो अगर आप खाने से पहले एक पल रुककर यह श्लोक मन में दोहरा लें, तो वही थाली, वही रोटी, वही हाथ, वह सब एक यज्ञ बन जाता है। या फ़ोन उठाने से पहले एक साँस। या बच्चे का टिफ़िन बाँधते हुए यह सोचना कि यह मैं किसी के लिए कर रहा हूँ। उस छोटे अर्पण के बाद वही काम हल्का हो जाता है, क्योंकि उसका फल अब उसकी हर हरकत में ही रखा है।
  3. हर किसी का यज्ञ अपना है, और उसे किसी से तौलने की ज़रूरत नहीं। श्रीकृष्ण ने बारह रूप गिनाए और किसी को छोटा-बड़ा नहीं कहा। और नेवले की कथा ने बताया कि एक प्रस्थ सत्तू, जो न्याय से कमाया और श्रद्धा से दिया गया, एक विशाल यज्ञ से भारी हो सकता है। इसलिए आपका यज्ञ वही है जो आपके हाथ में है, आज, अभी।