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सत्संग १३

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भगवान बार-बार क्यों आते हैं

गीता 4.1–4.15 · 81 मिनट

जब अधर्म बढ़े तो भरोसा कहाँ रखें

श्रीभगवानुवाच इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् । विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥ १ ॥
गीता 4.1 — अर्थ पढ़ें ›
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः । स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥ २ ॥
गीता 4.2 — अर्थ पढ़ें ›
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः । भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥ ३ ॥
गीता 4.3 — अर्थ पढ़ें ›

रात को जब आप दिन की ख़बरें पलट रहे होते हैं, कभी ऐसा हुआ है कि भीतर से एक थकी हुई आवाज़ उठी हो: ये सब कब तक चलेगा? जो सीधे चलते हैं वे पीछे रह जाते हैं, जो चालाकी करते हैं वे आगे निकल जाते हैं, और कहीं कोई देखने वाला नज़र नहीं आता। और उसी साँस में एक दूसरी आवाज़ भी आई हो कि अगर कोई देख ही नहीं रहा, तो मैं ही क्यों सीधा चलूँ?

आज का सत्संग इसी एक सवाल पर है। जब चारों ओर अधर्म बढ़ता दिखे, तो भरोसा कहाँ रखें? और इसका जो उत्तर इस देश ने सबसे ज़्यादा सुना है, वह गीता के चौथे अध्याय में है: यदा यदा हि धर्मस्य। आज हम वहाँ तक पहुँचेंगे। पर उससे पहले के छह श्लोक, जिन्हें लोग अक्सर छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं, यह तय करते हैं कि वह वादा किस तरह का है, और किसके लिए है।

जय श्री कृष्ण।

आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का तेरहवाँ सत्संग है। पिछली बार हमने तीसरे अध्याय के आख़िरी चौदह श्लोक सुने थे, जहाँ अर्जुन ने वह सवाल पूछा जो शायद हम सबके मन में है: मनुष्य न चाहते हुए भी, मानो किसी के ज़ोर से, पाप क्यों कर बैठता है? और श्रीकृष्ण ने सीधा नाम लिया था। रजोगुण से उपजा यह काम ही क्रोध है, यह बहुत खाने वाला और महापापी है, इसे ही यहाँ शत्रु जानो। फिर उन्होंने बताया कि यह शत्रु कैसे ढकता है, जैसे धुएँ से आग ढकती है, जैसे मैल से दर्पण ढकता है, जैसे गर्भ जेर से ढका रहता है, और कहाँ बैठा है, इन्द्रियों में, मन में और बुद्धि में। उसके बाद वह सीढ़ी, जो पूरे अध्याय को समेटती है: इन्द्रियाँ श्रेष्ठ हैं, उनसे श्रेष्ठ मन, मन से श्रेष्ठ बुद्धि, और जो बुद्धि से भी परे है वह आत्मा। और अध्याय इस आदेश पर रुका कि आत्मा को जानकर, बुद्धि से मन को थामकर, इस कठिनता से जीते जाने वाले कामरूप शत्रु को मार डालो।

मैं चाहता हूँ कि आप यहाँ एक पल ठहरिए। शत्रु भीतर है, और वह इतना पुराना, इतना चतुर और इतना भूखा है कि अकेला आदमी उससे कैसे पार पाएगा? मुझे लगता है कि चौथा अध्याय इस सवाल का नाम नहीं लेता, पर उसका उत्तर देता है। और वह उत्तर है: तुम अकेले नहीं हो। यह मेरी अपनी पढ़त है, पर आप देखेंगे कि अध्याय इसी दिशा में चलता है।

पिछली बार हमने कहा था कि चौथा अध्याय इस सवाल पर खुलता है कि यह योग आया कहाँ से, और आज वही सवाल हमारे सामने है। जैसा हम हर बार करते हैं, पहले यह याद कर लें कि हम गीता को उसके अपने घर में पढ़ रहे हैं। हमारे कोष में महाभारत के भीष्म पर्व का अट्ठाईसवाँ अध्याय ही गीता का चौथा अध्याय है, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग। संजय इसे राजा धृतराष्ट्र को सुना रहे हैं, उसी राजा को जिसे संजय दौड़कर यह ख़बर दे चुके हैं कि भीष्म बाणों की शय्या पर गिर पड़े हैं। और ध्यान दीजिए कि आज के पहले तीन श्लोक किसके बारे में हैं: राजाओं के बारे में। हमारी टीका कहती है कि इस उपदेश को राजधर्म की जड़ में रखा गया है, यह संसार में कर्म करने वाले राजाओं के लिए था, केवल वनवासियों के लिए नहीं। तो एक अन्धा राजा बैठा है, और उसे वह परम्परा सुनाई जा रही है जो राजाओं को दी गई थी।

पहला श्लोक श्रीभगवानुवाच से शुरू होता है, यानी भगवान बोले। इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्, विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्। मैंने यह अविनाशी योग विवस्वान्, यानी सूर्य को कहा था। विवस्वान् ने मनु को कहा और मनु ने इक्ष्वाकु को।

श्रीकृष्ण यहाँ अपना उपदेश एक वंशावली से शुरू करते हैं, और यह सोचने लायक है कि क्यों। मनु मानवजाति के आदि पिता हैं और इक्ष्वाकु सूर्यवंश के पहले राजा, यह हमारी टीका बताती है। रामानुजाचार्य कहते हैं कि कोई यह न समझ ले कि जो योग अर्जुन को अभी सुनाया जा रहा है, वह युद्ध के लिए हौसला बढ़ाने को आज गढ़ा गया है। यह तो मन्वन्तर के आरम्भ से सबके उद्धार के लिए कहा गया था। शंकराचार्य दो बातें जोड़ते हैं। एक, कि इसे सूर्य को इसलिए दिया गया ताकि जगत की रक्षा करने वाले क्षत्रियों में बल आए, क्योंकि जब ज्ञान और रक्षा दोनों सँभले रहते हैं तभी जगत सँभलता है। और दो, कि इसे अविनाशी इसलिए कहा गया कि इसका फल कभी क्षीण नहीं होता। नीलकण्ठ इसी अविनाशी शब्द का अर्थ यूँ लेते हैं कि यह परम्परा कभी टूटी नहीं थी, और इसलिए अनादि है।

तिलक महाराज यहाँ एक बहुत काम की बात कहते हैं। वे लिखते हैं कि इस योग का अर्थ कर्मयोग है, यानी समता की बुद्धि से कर्म करने का मार्ग, और यही भागवत धर्म है। उनके अनुसार महाभारत के नारायणीय उपाख्यान में भी यही परम्परा, विवस्वान् से मनु और मनु से इक्ष्वाकु तक, आती है। यह बात मैं तिलक के शब्दों में ही आपके सामने रख रहा हूँ, क्योंकि वह प्रसंग हमारे कोष में अभी नहीं है।

अब दूसरा श्लोक। एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः, स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप। इस प्रकार परम्परा से मिले इस योग को राजर्षियों ने जाना। पर हे परन्तप, बहुत समय बीतने से यह योग यहाँ लुप्त हो गया।

"राजर्षयो" यानी राजर्षि, जो राजा भी था और ऋषि भी। नीलकण्ठ जनक, अजातशत्रु और कैकेय जैसे राजाओं के नाम गिनाते हैं, और साथ में सनक और वसिष्ठ जैसे ऋषियों के, जिन्होंने सूक्ष्म तत्त्व को देखा था। पर श्लोक में असली चोट दूसरी पंक्ति में है: "नष्टः", लुप्त हो गया। हमारी टीका कहती है कि यह तब लुप्त हुआ जब यह ऐसे लोगों के हाथ में आया जिनमें संयम नहीं था और जो इसे धारण नहीं कर सके। मधुसूदन सरस्वती इससे भी आगे जाते हैं। वे कहते हैं कि यह योग उन कमज़ोर, अजितेन्द्रिय लोगों तक पहुँचकर लुप्त हुआ जिन पर काम, क्रोध जैसे शत्रु हावी थे, और इसीलिए, वे लिखते हैं, भगवान मानो शोक करते हैं कि अहो, लोक का कैसा दुर्भाग्य। और "परन्तप" कहकर वे अर्जुन को याद दिलाते हैं कि जो अपने भीतर के शत्रुओं को तपा देता है, वही इसका अधिकारी है। देखिए, पिछले सत्संग का शत्रु यहाँ फिर लौट आया है।

संत ज्ञानेश्वर इसी बात को अपनी ठेठ उपमाओं में कहते हैं। वे कहते हैं कि लोग शरीर के आदर में और विषयों के सुख में इतने डूबे कि आत्मबोध भूल गए। जिनके पास वैराग्य की समझ ही नहीं, उनके सामने उसकी बात करना ऐसा है जैसे जन्म के अन्धे को सूरज बताना, या बहरों की बस्ती में गीत सुनाना, या सियार को चाँदनी में रस दिलाना। और अन्त में वे कहते हैं कि मोह इतना बढ़ा कि बहुत-सा समय व्यर्थ गया, और इसी से यह योग लोक से लोप हो गया।

मुझे इस श्लोक में एक बात बहुत ईमानदार लगती है। यह नहीं कहता कि किसी शत्रु ने इस परम्परा को छीन लिया। यह कहता है कि बहुत समय बीता, और धारण करने वाले हाथ ढीले पड़ गए। आपके घर में भी शायद कोई अच्छी आदत रही होगी, जैसे रोज़ शाम को दिया जलाना, या बिना बताए किसी की मदद कर देना, जो दादी से माँ तक आई और माँ से हम तक आते-आते टूट गई। किसी ने उसे छीना नहीं, हमने बस कहा कि आजकल समय नहीं है। धर्म की हानि अक्सर इसी तरह शुरू होती है: पहले संयम ढीला होता है, फिर बाक़ी सब।

और इस राजा के लिए यह बात और भी चुभने वाली है। यही संजय, युद्ध के शुरुआती दिनों की कथा सुनाते हुए, आगे राजा से कहेंगे कि विदुर ने, भीष्म ने, द्रोण ने और मैंने भी आपको बार-बार रोका, पर आप नहीं समझे, जैसे रोगी अच्छी दवा को ठुकरा दे। यह भीष्म पर्व के पैंसठवें अध्याय में है। यानी परम्परा कई बार इसलिए भी लुप्त होती है कि सुनने वाला ही उसे नहीं सुनता। यह जोड़ मेरी है, पर बात संजय की है, और उन्होंने यह उसी राजा के सामने कही थी जिसे आज परम्परा की यह कथा सुनाई जा रही है।

अब तीसरा श्लोक, जो इन तीनों की चाबी है। स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः, भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्। तुम मेरे भक्त और सखा हो, इसलिए वही यह पुरातन योग आज मैंने तुम्हें कहा है, क्योंकि यह उत्तम रहस्य है।

"तेऽद्य", यानी तुम्हें आज। परम्परा टूट गई थी, और आज, कुरुक्षेत्र में, दोनों सेनाओं के बीच, उसे फिर से जोड़ा जा रहा है। और जोड़ने का कारण दो शब्दों में है: भक्त और सखा। मधुसूदन सरस्वती इनका अर्थ करते हैं कि भक्त वह जो शरण में आकर अत्यन्त प्रीति रखता है, और सखा वह जो समान उम्र का स्नेही साथी है, जो सदा साथ रहता है। आपको याद होगा कि पहले सत्संग में हमने सुना था कि खाण्डव के बाद इन्द्र के वर देने पर श्रीकृष्ण ने अर्जुन के साथ सदा की मित्रता ही माँगी थी, आदि पर्व के दो सौ साठवें अध्याय में। तो यह "सखा" शब्द यूँ ही नहीं कहा गया।

और "रहस्यं" पर हमारी टीका कहती है कि यह रहस्य इसलिए नहीं कि इसे जानबूझकर छिपाया गया है, बल्कि इसलिए कि इसे वही ग्रहण कर पाता है जो प्रेम और विश्वास से इसके पास आता है। नीलकण्ठ एक पुरानी श्रुति का वाक्य रखते हैं, जिसमें विद्या स्वयं ब्राह्मण के पास आकर कहती है: मेरी रक्षा करो, मैं तुम्हारा ख़ज़ाना हूँ, मुझे ईर्ष्या करने वाले, टेढ़े और असंयमी को मत देना, तभी मैं सामर्थ्यवान रहूँगी। यानी जो बात बहुत क़ीमती हो, वह हर किसी के हाथ में पड़कर निर्बल हो जाती है।

संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर एक बहुत मीठी बात कहते हैं। श्रीकृष्ण मानो अर्जुन से कह रहे हैं कि यह मेरे हृदय का गुप्त धन है, पर तुमसे मैं इसे कैसे छिपाऊँ, तुम तो मुझे बहुत प्यारे हो। हम युद्ध के बीच में खड़े हैं, फिर भी थोड़ी देर यह सह लेना चाहिए, क्योंकि पहले तुम्हारा अज्ञान हटाना है। सोचिए, जिस घड़ी दोनों सेनाएँ युद्ध के लिए खड़ी हैं, उस घड़ी भी भगवान एक मित्र के लिए रुके हैं।

इसे अपने जीवन से जोड़िए। जब मन बहुत भारी होता है, तो हम किससे कहते हैं? उससे जिसके सामने दिखावा नहीं करना पड़ता। कोई दोस्त जिससे कह सकें कि आज रात बैठ, एक बात बतानी है। श्रीकृष्ण यहाँ कह रहे हैं कि भगवान से भी वही रिश्ता बन सकता है, भक्त का भी और सखा का भी। और जब अधर्म बढ़ता दिखे और मन डगमगाए, तो पहला सहारा कोई सिद्धान्त नहीं, यह रिश्ता है।

तो पहले तीन श्लोकों ने हमें तीन बातें दीं। एक, कि यह योग नया नहीं, पीढ़ियों से चला आया है। दो, कि वह लुप्त तब होता है जब धारण करने वाले संयम खो देते हैं। और तीन, कि वह फिर से आता है, और उसी के पास आता है जो प्रेम और विश्वास से उसके पास बैठता है।

पर अभी एक बात बाकी है। अर्जुन ने यह सब सुनकर एक ऐसा सवाल पूछा है जो सीधा, और एक पल को लगभग अशिष्ट लगता है। उसने कहा कि आपका जन्म तो बाद का है, और सूर्य का बहुत पहले का, तो मैं कैसे मानूँ कि आपने ही उन्हें यह कहा था? चौथा श्लोक यही सवाल है, और पाँचवाँ और छठा श्लोक उसका ऐसा उत्तर हैं जिस पर आज का पूरा सत्संग टिका है।

अर्जुन उवाच अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः । कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥ ४ ॥
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श्रीभगवानुवाच बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन । तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ॥ ५ ॥
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अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् । प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ॥ ६ ॥
गीता 4.6 — अर्थ पढ़ें ›

चौथे श्लोक में अर्जुन बोलते हैं, यानी अर्जुन उवाच। अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः, कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति। आपका जन्म तो बाद का है और विवस्वान् का जन्म पहले का। तो मैं यह कैसे समझूँ कि आपने ही आरम्भ में यह कहा था?

पहली बार सुनकर यह सवाल कुछ अटपटा लगता है, क्योंकि जिस रथ के सारथि से अर्जुन यह पूछ रहे हैं, उनके साथ वे बरसों रह चुके हैं। हमारी टीका इसे इतने सरल शब्दों में रखती है कि अर्जुन अभी भी श्रीकृष्ण को अपनी ही उम्र का एक मनुष्य देखते हैं, और यह प्रश्न उसी द्वार को खोलता है जिससे भगवान के जन्म का उपदेश भीतर आता है। शंकराचार्य कहते हैं कि कुछ मूर्ख लोग वासुदेव के बारे में शंका करते हैं कि ये न ईश्वर हैं, न सर्वज्ञ, और उसी शंका को दूर करने के लिए अर्जुन यहाँ उसे अपने मुँह से कहते हैं।

रामानुजाचार्य यहाँ एक बहुत ख़ूबसूरत बात कहते हैं। वे कहते हैं कि अर्जुन जानते हैं। आगे वे ख़ुद कहेंगे कि आप परम ब्रह्म हैं, परम धाम हैं, और इसी तरह ऋषि और नारद आपको कहते हैं। पर जानते हुए भी वे अनजान की तरह पूछ रहे हैं, ताकि उत्तर में वे सब बातें खुलें जो हम सब जानना चाहते हैं: यह जन्म सच है या जादू जैसा, कैसे होता है, किस कारण, कब और किसलिए।

संत ज्ञानेश्वर इस प्रश्न में अर्जुन का प्रेम देखते हैं। वे कहते हैं कि अर्जुन बोले, आप संसार से थके हुए लोगों की छाँव हैं और अनाथ जीवों की माँ हैं, इसलिए जो पूछ रहा हूँ उस पर क्रोध मत कीजिए। जो आपने पहले कहा, वह मेरे मन में बैठता नहीं, तो मैं जैसा समझ पा रहा हूँ वैसा ही कह रहा हूँ।

महाभारत हमें इस सवाल की जड़ दिखाता है। यह वही आदत है जो मनुष्य में बहुत पुरानी है कि जो सामने बैठा है उसे अपने नाप से तौलना। राजसूय यज्ञ में, जब युधिष्ठिर के दरबार में सब राजा इकट्ठा थे, देवर्षि नारद ने उन्हें देखकर ब्रह्मा के भवन की वह पुरानी सभा याद की जिसमें देवताओं ने पृथ्वी पर अपने अंशों से जन्म लेना स्वीकार किया था। और उन्होंने मन में कहा कि वही नारायण, जिनके भुजबल का सहारा इन्द्र सहित सब देवता लेते हैं, यहाँ यदुओं के घर सचमुच एक मनुष्य की तरह रहते हैं। यह सभा पर्व के उनतालीसवें अध्याय में है। और उसी सभा में शिशुपाल उठा, और उसने युधिष्ठिर से कहा कि पूजा के योग्य दूसरे लोग उपस्थित रहते तुमने एक ग्वाले की पूजा की है। एक ही सभा में एक व्यक्ति उन्हें नारायण पहचान रहा है और दूसरा ग्वाला।

भीष्म पर्व में यही बात ब्रह्मा के मुख से सुनाई जाती है, जिसे भीष्म दुर्योधन को बताते हैं, छियासठवें अध्याय में। ब्रह्मा देवताओं से कहते हैं कि "यह मनुष्य है" ऐसा सोचकर इनका कभी अपमान मत करना, और जो कहे कि यह केवल मनुष्य है, उसे वे मन्दबुद्धि कहते हैं। इसलिए अर्जुन का प्रश्न उस आदत का सबसे विनम्र रूप है। शिशुपाल गाली देकर कहता है, अर्जुन प्रेम से पूछकर कहते हैं।

अब पाँचवें श्लोक में उत्तर आता है, श्रीभगवानुवाच। बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन, तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप। हे अर्जुन, मेरे और तुम्हारे बहुत-से जन्म बीत चुके हैं। हे परन्तप, उन सबको मैं जानता हूँ, तुम नहीं जानते।

इस पंक्ति में एक छोटा-सा शब्द है जिसे आप शायद सुनकर निकल जाएँ: "तव चार्जुन", यानी और तुम्हारे भी, अर्जुन। श्रीकृष्ण सिर्फ़ अपने जन्मों की बात नहीं कर रहे। वे कह रहे हैं कि तुम भी बहुत बार आ चुके हो, यह तुम्हारा पहला आना नहीं है। अन्तर बस इतना है कि मुझे सब याद है और तुम्हें कुछ याद नहीं। मैं इसमें एक सहारा देखता हूँ। जिसे आपके सारे अतीत की ख़बर है, उसके लिए आपका आज कोई अचानक आया हुआ संकट नहीं है।

शंकराचार्य बताते हैं कि भगवान की ज्ञान-शक्ति पर कोई परदा नहीं पड़ता, जबकि अर्जुन की ज्ञान-शक्ति धर्म और अधर्म से बँधी हुई है। श्रीधर स्वामी लगभग वही कहते हैं: मेरी विद्या-शक्ति कभी लुप्त नहीं होती, तुम अविद्या से ढके हो। मधुसूदन सरस्वती यहाँ "परन्तप" शब्द पर रुकते हैं। वे कहते हैं कि अर्जुन शत्रु को अपने से अलग मानकर उसे मारने चले हैं, यानी उनका देखना उलटा हो गया है, और यह भगवान इस सम्बोधन से इशारा कर रहे हैं। संत ज्ञानेश्वर श्रीकृष्ण की ओर से कहते हैं कि अगर तुम्हें लगता है कि जब विवस्वान् था तब मैं नहीं था, तो तुम यह नहीं जानते कि हम दोनों के बहुत जन्म बीत चुके हैं। तुम अपने जन्म याद नहीं रखते, पर मैं जिस-जिस अवसर पर जो-जो होकर आया, वह सब मुझे याद है।

और यहाँ एक बात है जो गीता के बाहर महाभारत में हमारे सामने आती है, और जो इस श्लोक को और गहरा कर देती है। यह बात श्रीकृष्ण अर्जुन से पहले भी कह चुके थे। वनवास के दिनों में, जब पाण्डवों के वन जाने की ख़बर सुनकर भोज, वृष्णि, अन्धक और पाञ्चाल उन्हें वन में देखने आए, तो क्रोध में भरे उन सब लोगों के बीच अर्जुन ने श्रीकृष्ण के पुराने कर्म गिनाए: दस हज़ार वर्ष का तप गन्धमादन पर्वत पर, एक पैर पर खड़े रहकर सौ वर्ष का तप बदरी में, बारह वर्ष का यज्ञ-सत्र सरस्वती के तट पर, और यह भी कि "अपने उन-उन हज़ारों अवतारों में तुमने अधर्म में रुचि रखने वाले सैकड़ों असुरों को मारा।" यह वन पर्व के बारहवें अध्याय में है। यानी वही अर्जुन, जो वन में हज़ारों अवतारों की बात कर चुके थे, रथ पर बैठकर पूछ रहे हैं कि आपका जन्म तो बाद का है। रामानुजाचार्य की बात यहाँ सच बैठती है। उन्हें मालूम था, वे सबके लिए पूछ रहे थे।

और उसी वन-सभा में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से यह भी कहा था: तुम मेरे हो और मैं तुम्हारा हूँ, तुम नर हो और मैं नारायण, हम दोनों ऋषि समय आने पर इस लोक में आए हैं, और हम दोनों के बीच कोई भेद नहीं जाना जा सकता। भीष्म पर्व के उसी छियासठवें अध्याय में ब्रह्मा भी यही कहते हैं कि नर और नारायण, वे दोनों प्राचीन श्रेष्ठ ऋषि, साथ-साथ मनुष्य लोक में जन्मे हैं, और मूर्ख उन्हें नहीं पहचानते। तो गीता का "मेरे और तुम्हारे बहुत से जन्म" कोई अचानक कही गई बात नहीं, यह उस पुरानी जोड़ी की पहचान है जो श्रीकृष्ण और अर्जुन के रूप में रथ पर बैठी है।

अब छठा श्लोक, जो पूछे गए सवाल का वह हिस्सा खोलता है जो सबसे उलझा हुआ था। अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्, प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया। मैं अजन्मा और अविनाशी स्वरूप होते हुए भी, और सब प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी, अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ।

यहाँ एक साथ तीन बातें हैं जो आपस में टकराती लगती हैं। अजन्मा होकर भी जन्म, अविनाशी होकर भी आना-जाना, ईश्वर होकर भी देह। और हमारी टीका इन सबका एक ही उत्तर देती है कि भगवान के जन्म और हमारे जन्म में यही अन्तर है। हम प्रकृति और पिछले कर्मों के वश में जन्म लेते हैं, वे अपनी इच्छा से प्रकृति को अपने वश में रखकर प्रकट होते हैं। वे जन्मे हुए और देहधारी दिखते हैं, पर जो हैं, वही रहते हैं।

शंकराचार्य इसे यूँ कहते हैं कि वे देहवान्-से और जन्मे हुए-से दिखते हैं, वास्तव में वैसे नहीं जैसे संसार के लोग। श्रीधर स्वामी कहते हैं कि वे अपनी शुद्ध सत्त्व वाली प्रकृति को स्वीकार करके, अपनी इच्छा से उतरते हैं। नीलकण्ठ एक जादूगर की उपमा देते हैं जो अपनी जगह से हिले बिना, अदृश्य रहकर, अपनी माया से दूसरा जादूगर रचता है जो रस्सी पर चढ़ता दिखता है। बस इतना फ़र्क़ है कि साधारण जादूगर अपना खेल समेट लेता है, जबकि भगवान अपनी माया को नहीं समेटते, इसलिए उनका स्वरूप भी बना रहता है। और ज्ञानेश्वर दर्पण की उपमा देते हैं: जैसे एक ही चीज़ दर्पण में दो दिखती है, वैसे ही मैं निराकार हूँ, पर प्रकृति को अपनाकर कार्य के लिए आकार धारण करता हूँ।

इसे अपनी भाषा में कहूँ तो यह ऐसा है जैसे कोई डॉक्टर जो ख़ुद बीमार नहीं है, अपनी मर्ज़ी से संक्रमण वाले वार्ड में जाता है। मरीज़ भी उसी वार्ड में है, डॉक्टर भी, पर मरीज़ वहाँ बीमारी की मजबूरी से आया है और डॉक्टर करुणा से। "सम्भवाम्यात्ममायया" का अर्थ मुझे यही लगता है: अपनी इच्छा से, अपनी ही शक्ति से, रूप लेना।

तीन श्लोक पूरे हुए। श्रीकृष्ण ने कहा कि मैं भी आता हूँ, तुम भी आते हो, और मेरा आना बन्धन से नहीं, अपनी इच्छा से है। पर अभी एक बात बाकी है। हर कोई जानता है कि भगवान आते हैं। असली सवाल यह है कि कब आते हैं, किसलिए आते हैं, और जब वे आते हैं तो हमारे लिए इसका क्या अर्थ है। सातवाँ श्लोक वही श्लोक है जो शायद आपने सैकड़ों बार सुना होगा, और मैं चाहता हूँ कि आज आप उसे पहली बार सुनें।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥ ७ ॥
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परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ ८ ॥
गीता 4.8 — अर्थ पढ़ें ›
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः । त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥ ९ ॥
गीता 4.9 — अर्थ पढ़ें ›

इन श्लोकों में उतरने से पहले आपसे एक छोटी-सी बात कहना चाहता हूँ। हम आज के सत्संग का लगभग एक तिहाई सुन चुके हैं, और अब जो श्लोक आ रहा है, उसे इतना सुना गया है कि बहुत-से लोग सुनते ही मान लेते हैं कि बात पूरी हो गई। पर आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। जो आदमी यहीं उठ जाएगा, उसके हाथ में बस इतना रह जाएगा कि जब अधर्म बढ़ेगा तब भगवान आएँगे, तो हम निश्चिन्त होकर बैठ सकते हैं। और वह यह नहीं सुनेगा कि इसी अध्याय के आख़िरी श्लोकों में श्रीकृष्ण उस भरोसे का असली अर्थ बताते हैं, और अर्जुन को क्या करने का आदेश देते हैं। तो अगर आप ये सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि ये यात्रा बीच में न टूटे। और आज का हिस्सा आख़िर तक सुनिए।

अब सातवाँ श्लोक। यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत, अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्। हे भारत, जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अपने आपको प्रकट करता हूँ।

सबसे पहले इन शब्दों का अर्थ। "ग्लानिर्भवति" में श्रीधर स्वामी ग्लानि का अर्थ हानि करते हैं, यानी घटना, और "अभ्युत्थानमधर्मस्य" में अभ्युत्थान का अर्थ बढ़ना। और "धर्म" क्या है? हमारी टीका इसे बहुत सीधा कहती है कि धर्म वह व्यवस्था है जो जीवन को धारण करती है: सही कर्तव्य, सही आचरण, कल्याण का मार्ग। अधर्म इसका उलटा है। शंकराचार्य इसमें वह व्यवस्था गिनते हैं जो प्राणियों को उन्नति और परम कल्याण देती है। तिलक महाराज एक ज़रूरी बात जोड़ते हैं कि यहाँ धर्म का अर्थ केवल परलोक का वैदिक धर्म नहीं है, उसमें न्याय और नीति भी आती हैं। जब अन्याय, अनीति और दुष्टता का बोलबाला हो और अच्छे लोग कष्ट पाने लगें, तब यह श्लोक लागू होता है। रामानुजाचार्य एक और बात पकड़ते हैं: "यदा यदा", जब-जब। उनके अनुसार इसका अर्थ है कि भगवान के प्रकट होने का कोई कालनियम नहीं, किसी ख़ास युग की शर्त नहीं।

और "सृजाम्यहम्" पर ठहरिए। भगवान यह नहीं कहते कि मैं आ पहुँचता हूँ, वे कहते हैं कि मैं अपने आपको रचता हूँ, अपने आपको प्रकट करता हूँ। संत ज्ञानेश्वर इसे इतने सुन्दर ढंग से कहते हैं कि उसे सुनकर सन्देह की गुंजाइश नहीं रहती। वे श्रीकृष्ण की ओर से कहते हैं कि उस घड़ी मैं अपने भक्तों के पक्ष में साकार होकर उतरता हूँ, अज्ञान का अँधेरा निगल जाता हूँ, अधर्म की हद तोड़ देता हूँ, दोषों की लिखी हुई सूची फाड़ देता हूँ, और सज्जनों के हाथ से सुख की ध्वजा खड़ी करवाता हूँ।

अब इस वादे को मैं आपको एक कथा से दिखाना चाहता हूँ, जो महाभारत की अपनी है, और जो यह बताती है कि "धर्म की हानि" महाभारत की नज़र में कैसी दिखती थी। आदि पर्व के पैंसठवें अध्याय में पहले एक सुनहरा समय बताया जाता है। राजा काम और क्रोध से उपजे दोषों को छोड़कर केवल उन्हीं को दण्ड देते थे जो दण्ड के योग्य थे। वर्षा ठीक समय पर और ठीक जगह होती थी। कोई बालक रहते हुए नहीं मरता था। ब्राह्मण वेद को पैसे लेकर नहीं बेचते थे, और व्यापारी झूठे नाप-तौल से सामान नहीं बेचते थे। सब अपने-अपने कर्म में लगे थे, और धर्म कहीं नहीं घटता था।

फिर कथा मुड़ती है। हारे हुए और स्वर्ग से गिराए हुए असुर पृथ्वी पर राजाओं के घर और तरह-तरह के प्राणियों में जन्म लेने लगे। घमण्ड से भरे, बल के नशे में, वे सब वर्णों को सताने लगे और आश्रमों में रहने वाले ऋषियों का अपमान करने लगे। और तब, पाठ कहता है, बोझ से दुखी और भय से पीड़ित पृथ्वी सब प्राणियों के पितामह ब्रह्मा की शरण में गई। ब्रह्मा को उसका प्रयोजन पहले से मालूम था। उन्होंने कहा कि जिस काम के लिए तुम आई हो, उसी में मैं सब देवताओं को लगाऊँगा, उठो और अपने स्थान को जाओ। और देवताओं से कहा कि इस भूमि का बोझ उतारने के लिए तुम सब अलग-अलग अपने अंशों से, अपना रूप छिपाकर, इसी पर जन्म लो। देवता वैकुण्ठ में नारायण के पास गए। इन्द्र ने पुरुषोत्तम से कहा कि पृथ्वी को दुष्टों से साफ़ करने के लिए अपने अंश से अवतार लीजिए, और हरि ने कहा, ऐसा ही हो। ध्यान दीजिए कि इस कथा का पहला क़दम हर बार शरण है। पृथ्वी ब्रह्मा के पास गई, देवता नारायण के पास गए। किसी ने निराश होकर हार नहीं मानी, और पहला क़दम किसी ने बदले का नहीं उठाया।

और भीष्म पर्व के पैंसठवें अध्याय में यही कथा दूसरी तरफ़ से कही जाती है, और वहाँ एक विडम्बना भी है, क्योंकि इसे भीष्म दुर्योधन को सुना रहे हैं। जब दुर्योधन ने रात को आकर पूछा कि पाण्डव किसका सहारा लेकर हमें हर पल हरा रहे हैं, तो भीष्म ने कहा कि ऐसा कोई प्राणी न है, न होगा, जो शार्ङ्ग धनुषधारी से रक्षित पाण्डवों को जीत सके। और फिर उन्होंने गन्धमादन पर्वत की वह पुरानी बैठक सुनाई, जहाँ ब्रह्मा ने आकाश में जगमगाता विमान देखा, हाथ जोड़े और परम पुरुष वासुदेव की स्तुति की। और उसी स्तुति में उनकी माँग यह थी कि आप यदुवंश को बढ़ाने वाले होकर जन्म लीजिए, धर्म की स्थापना के लिए, दैत्यों के वध के लिए, और जगत को धारण करने के लिए। यही तीन बातें अगले श्लोक की हैं।

आगे छियासठवें अध्याय में उत्तर आता है। भगवान ने कोमल और गम्भीर वाणी में कहा, "वत्स, योग से मुझे तुम्हारी यह सारी इच्छा ज्ञात है। वैसा ही होगा।" और ब्रह्मा ने देवताओं को बताया कि जो दैत्य, दानव और राक्षस पहले युद्ध में मारे गए थे, वे ही अब मनुष्यों में भयानक और महाबली होकर जन्मे हैं, और उनके वध के लिए वासुदेव नाम से प्रसिद्ध होकर वे मनुष्यों के लोक में जाएँगे। यह बात सुनने लायक है कि जो पहले मारे गए थे, वही फिर जन्मे हैं। बुरा समय हर बार नया नहीं होता, वह वही पुराना अँधेरा है जो नए चेहरे लेकर आता है। और आगे हम सुनेंगे कि श्रीकृष्ण स्वयं एक जगह यही बात अपने मुँह से कहते हैं।

अब आठवाँ श्लोक। परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्, धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे। सज्जनों की रक्षा के लिए, दुष्टों के विनाश के लिए और धर्म की स्थापना के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।

तीन काम हैं। साधुओं की रक्षा, दुष्कृत करने वालों का विनाश, और धर्म की फिर से स्थापना। श्रीधर स्वामी यहाँ एक बहुत सुन्दर बात कहते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि सुनने वाले को "दुष्टों का विनाश" सुनकर कठोरता का सन्देह हो सकता है। वे कहते हैं कि जैसे माँ बच्चे को दुलारती भी है और कभी ताड़ती भी है, पर उसकी करुणा में कमी नहीं होती, वैसे ही नियन्ता की करुणा गुण और दोष दोनों पर रहती है। मधुसूदन सरस्वती उसी सन्देह को दूसरी तरफ़ से उठाते हैं। वे कहते हैं कि क्या धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि से भगवान को सन्तोष मिलता है, जो ठीक उसी घड़ी प्रकट होते हैं? नहीं, वे कहते हैं, प्रयोजन तीन ही हैं, सज्जनों की सब ओर से रक्षा, पापियों का विनाश, और अधर्म को हटाकर धर्म का ठीक से स्थापित होना।

रामानुजाचार्य "परित्राणाय" में एक ऐसा अर्थ जोड़ते हैं जो कम सुना जाता है। वे कहते हैं कि सज्जन वे हैं जो भगवान के दर्शन के बिना क्षण भर भी नहीं जी पाते, उन्हें एक क्षण हज़ार कल्प जैसा लगता है, इसलिए भगवान अपने स्वरूप और चेष्टाओं को दिखाकर उनकी रक्षा करते हैं, और उनके विरोधियों का नाश और धर्म की स्थापना करते हैं। यानी रक्षा केवल संकट से बचाना नहीं, मिल जाना भी है। संत ज्ञानेश्वर कहते हैं कि जब वह अविवेक की कालिख हटाकर विवेक का दीया जलाते हैं, तो योगियों के लिए निरन्तर दिवाली हो जाती है। और अन्त में कहते हैं कि ऐसे काम के लिए मैं युग-युग में उतरता हूँ, पर जो इसे संसार में पहचान ले, वही विवेकी है।

"युगे युगे" की बात भी भीष्म के मुँह से सुनी जा सकती है। राजसूय यज्ञ के समय युधिष्ठिर के पूछने पर भीष्म ने अवतारों की कथा सुनाई, और पहली ही बात यह कही कि उनके हज़ारों अवतार अनेक बार हो चुके हैं, और मैं अपनी शक्ति के अनुसार ही उनका वर्णन करूँगा। यह सभा पर्व के पैंतालीसवें से पचासवें अध्याय में है, और मैं केवल वही नाम ले रहा हूँ जो वहाँ गिनाए गए हैं। वराह के रूप में उन्होंने समुद्र में डूबती पृथ्वी को अपने दाँत पर उठाया। वामन के रूप में वे इन्द्र के छोटे भाई बनकर आए, बलि से केवल तीन पग भूमि माँगी, और तीन पगों में स्वर्ग, आकाश और पृथ्वी नाप लिए, और फिर, पाठ कहता है, इतना सब करके भी उन्हें कोई गर्व नहीं हुआ, उन्होंने तीनों लोक इन्द्र को लौटा दिए। नृसिंह की कथा हम आगे सुनेंगे। परशुराम, और दशरथ के पुत्र राम, जिन्होंने रावण को मारा, उसी सूची में हैं, और राम के राज्य के बारे में भीष्म कहते हैं कि उस समय पृथ्वी पर कहीं कोई अधर्मी मनुष्य नहीं था। फिर कृष्ण, जो डरे हुओं को अभय देने वाले कहे गए हैं, और उसके बाद, कलियुग के अन्त में, जब धर्म शिथिल हो जाएगा, कल्कि का नाम भी वहीं है। यह सूची मैंने नहीं बनाई, और गीता में इसका कोई नाम नहीं आता। मैं बस इसलिए आपके सामने रखता हूँ कि "युगे युगे" शब्द महाभारत के लिए कोई कविता की बात नहीं, एक गिनी-चुनी, याद की हुई परम्परा है।

अब नौवाँ श्लोक, जो इस पूरे वादे को हमारे हाथ में रखता है। जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः, त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन। हे अर्जुन, मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं। जो इन्हें इस प्रकार तत्त्व से जान लेता है, वह शरीर छोड़कर पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता, मुझे ही प्राप्त होता है।

देखिए कि भगवान ने यहाँ क्या नहीं कहा। उन्होंने यह नहीं कहा कि जो मुझे मान ले, या जो मेरी कथा सुन ले। उन्होंने कहा, तत्त्व से जान ले। श्रीधर स्वामी बताते हैं कि जन्म मेरी इच्छा से हुआ और कर्म धर्म के पालन के रूप में, दोनों दूसरों पर कृपा के लिए ही हैं, यही "दिव्य" का अर्थ है। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं कि भोले लोग मान बैठते हैं कि भगवान का जन्म भी हमारे जैसा गर्भवास है और कर्म भी अपने भोग के लिए। तत्त्व से जानना इस भ्रम को हटाना है। नीलकण्ठ एक और बात जोड़ते हैं, जो मुझे बहुत व्यावहारिक लगती है: वे कहते हैं कि इससे यह दिखता है कि जो भगवान को पाना चाहे, उसे उनके जन्मों और कर्मों का गान करना चाहिए। और तिलक महाराज कहते हैं कि भगवान के दिव्य जन्म को जान लेने से अध्यात्म-ज्ञान होता है और दिव्य कर्म को जान लेने से निष्काम कर्म का तत्त्व, इसलिए इन दोनों में सब कुछ आ गया।

यहाँ भीष्म की बात फिर काम आती है। ब्रह्मा देवताओं से कहते हैं कि जो इन्हें केवल मनुष्य समझकर इनका अपमान करता है, वह घोर अन्धकार में डूबता है। और उसके कुछ आगे, भीष्म पर्व के सड़सठवें अध्याय में, भीष्म दुर्योधन से कहते हैं कि जो कृष्ण की शरण लेते हैं, वे भटकते नहीं, और बड़े भय में डूबे हुओं की जनार्दन सदा रक्षा करते हैं। तो इस सत्संग का पहला उत्तर यह है। जब अधर्म बढ़ता दिखे, तो भरोसा उस पर रखिए जिसके जन्म और कर्म, दोनों, दूसरों पर कृपा के लिए हैं। और उसे ऐसे जानिए कि वह आपके भीतर से डर और भ्रम को हटाए।

पर अभी एक बात बाकी है। श्लोक नौ ने कहा कि जो तत्त्व से जान ले, वह भगवान को ही पाता है। तो ऐसे लोग कौन थे जो सचमुच जान सके? और जब हम डर और गुस्से से भरे होते हैं, जैसा अधर्म को देखकर हम सब होते हैं, तब वह जानना हमारे लिए कैसे सम्भव है? दसवाँ और ग्यारहवाँ श्लोक इसी का उत्तर हैं, और ग्यारहवें में भगवान स्वयं एक ऐसी बात कहते हैं जो सुनने में बहुत कोमल है।

वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः । बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥ १० ॥
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ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् । मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥ ११ ॥
गीता 4.11 — अर्थ पढ़ें ›

दसवाँ श्लोक उस सवाल का उत्तर है जो नौवें के बाद उठता है, कि तत्त्व से जानने वाले कौन थे। वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः, बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः। राग, भय और क्रोध से रहित, मुझमें तन्मय और मेरे आश्रित बहुत-से भक्त ज्ञानरूप तप से पवित्र होकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं।

सबसे पहले एक शब्द: "बहवो", बहुत-से। हमारी टीका इसी पर ज़ोर देती है कि यह कोई नया मार्ग नहीं, बहुत-से लोग पहले ही इससे जा चुके हैं। श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती भी कहते हैं कि यह भक्ति का मार्ग अभी-अभी शुरू नहीं हुआ, यह अनादि परम्परा से चला आया है। यह सुनना ही अपने आप में एक सहारा है, क्योंकि अधर्म के दिनों में आदमी को सबसे ज़्यादा अकेलापन लगता है। मैं ही क्यों सीधा चलूँ, मेरे जैसे और कौन हैं? और श्लोक कहता है कि बहुत हैं, और बहुत हो चुके हैं।

अब तीन शब्द: राग, भय और क्रोध। मधुसूदन सरस्वती इन्हें बहुत मानवीय ढंग से खोलते हैं। वे कहते हैं कि राग यानी विषयों की तृष्णा। भय यानी यह त्रास कि सब विषय छोड़ दूँगा तो जिऊँगा कैसे। और क्रोध यानी यह द्वेष कि यह मार्ग तो सारे विषयों का उच्छेद करने वाला है, यह मेरा भला कैसे करेगा। यानी वे कहते हैं कि भय और क्रोध स्वयं उस मार्ग के प्रति भी उठ सकते हैं। नीलकण्ठ राग को विषयों से प्रीति कहते हैं, भय को अपने नाश की आशंका, और क्रोध को वह जलन जो अपने को भी पीड़ा देती है और दूसरे को भी। और यहाँ बात सीधे हमारी बात से जुड़ती है। जब अधर्म बढ़ता दिखे, तो हमारे भीतर ठीक यही तीन उठते हैं: जो मेरे पास है वह छिन न जाए, यह राग; मेरा या मेरे अपनों का क्या होगा, यह भय; और जिसने किया है उसे जला देने का मन, यह क्रोध। इसीलिए श्लोक कहता है कि भरोसे में टिकने वाले वे थे जिनके भीतर से ये तीन हट चुके थे।

और वे हटे कैसे? "ज्ञानतपसा", ज्ञानरूप तप से। शंकराचार्य कहते हैं कि यहाँ ज्ञान ही परमात्मा के विषय में तप है। नीलकण्ठ इसे और ठोस करते हैं, कि इसका अर्थ है भगवान के जन्म और कर्मों का, और उनके स्वरूप का, निरन्तर चिन्तन। यानी तप का मतलब केवल भूखे रहना या खड़े रहना नहीं। नौवें श्लोक में जिनकी बात हुई, उन्हीं जन्मों और कर्मों को बार-बार याद करना भी तप है। संत ज्ञानेश्वर इसे पीतल की उपमा से कहते हैं। जैसे पीतल की कालिख पूरी तरह छूट जाए तो उसमें सोना कहाँ से जोड़ना बाकी रहता है, वैसे ही संयम और तप से जो साफ़ हो गए, उनके और मेरे बीच कोई परदा नहीं रह जाता।

मुझे इसका एक सजीव उदाहरण उसी वन-सभा में मिलता है जिसकी बात हम अभी कर चुके हैं, और वह बहुत हल्की आवाज़ में कहा गया है। वहाँ सब क्रोध में भरे पूछ रहे थे कि हम क्या करें, और श्रीकृष्ण स्वयं, पाठ के शब्दों में, इतने क्रोध में थे मानो सब प्राणियों को जला डालें। उस घड़ी अर्जुन ने क्रोध का उत्तर क्रोध से नहीं दिया। उन्होंने उनके पहले के जन्मों के कर्म एक-एक करके गिनाने शुरू किए, और पाठ कहता है कि इसी से उन्हें शान्त किया। नीलकण्ठ ने "ज्ञानतपसा" का जो अर्थ किया, वह यहाँ चलता हुआ दिखता है: क्रोध के बीच खड़े होकर उनके जन्म और कर्मों का स्मरण करना। और यह आप आज रात भी आज़मा सकते हैं।

एक बात और साफ़ कर दूँ। अन्याय देखकर क्रोध आना स्वाभाविक है, और महाभारत उस वन-सभा में श्रीकृष्ण के क्रोध की बात भी कहता है। गीता जिस क्रोध को छोड़ने को कहती है, उसे नीलकण्ठ ने परिभाषित किया है: वह जलन जो अपने को भी पीड़ा देती है और दूसरे को भी। न्याय के लिए उठना एक बात है, और बदले की आग में ख़ुद जल जाना दूसरी।

अब ग्यारहवाँ श्लोक, जो मुझे पूरे अध्याय के सबसे कोमल श्लोकों में लगता है। ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्, मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः। हे पार्थ, जो मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं भी उन्हें उसी प्रकार भजता हूँ। सब मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।

"भजाम्यहम्", मैं भी भजता हूँ। भक्त भगवान को भजता है, यह तो हम सुनते आए हैं, पर यहाँ भगवान कहते हैं कि मैं भी उसे भजता हूँ, यानी उसके अनुसार उसे उत्तर देता हूँ। शंकराचार्य इसे खोलते हैं: जो फल की चाह से आते हैं उन्हें फल, जो मुक्ति चाहते हैं उन्हें ज्ञान, जो ज्ञानी और संन्यासी हैं उन्हें मोक्ष, और जो दुखी हैं उनका दुख हरकर, और यह सब किसी राग-द्वेष या मोह से नहीं। श्रीधर स्वामी कहते हैं कि उनमें कोई पक्षपात नहीं, इन्द्र जैसे देवताओं को पूजने वाले भी उन्हीं के मार्ग पर हैं, क्योंकि उन रूपों में भी वही पूजे जाते हैं। हमारी टीका जोड़ती है कि इस श्लोक की दूसरी पंक्ति तीसरे अध्याय के तेईसवें श्लोक जैसी ही है, पर वहाँ उसका अर्थ था कि लोग बड़ों की नकल करते हैं, और यहाँ अर्थ है कि हर मार्ग अन्त में उन्हीं तक जाता है।

नीलकण्ठ इसमें एक अनोखा पहलू जोड़ते हैं। वे कहते हैं कि जो मनुष्य मुझे जैसे भी पाता है, शत्रु के रूप में या मित्र के रूप में, उसके अनुसार मैं भी उसके साथ वैसा ही व्यवहार करता हूँ। जैसे बिम्ब की पूजा या अनादर प्रतिबिम्ब पर पड़ता है, वैसे ही जो कोई जैसा प्रेम या द्वेष मेरे इन प्राणियों से करता है, मैं भी उसी के अनुरूप उसे फल देता हूँ, इसलिए कल्याण चाहने वाले को सबके कल्याण में लगना चाहिए।

इसे चार लोगों की कथा से देखिए, जो चारों श्रीकृष्ण के पास अलग-अलग ढंग से आए। दुर्योधन ने सेना चुनी और सेना पाई, और अर्जुन ने निहत्थे श्रीकृष्ण को चुना और श्रीकृष्ण को ही पाया, यह कथा हम पहले कई बार सुन चुके हैं, उद्योग पर्व के सातवें अध्याय की। तीसरी द्रौपदी हैं। वन पर्व के बारहवें अध्याय में, अपने अपमान की पूरी वेदना कहकर, वे श्रीकृष्ण से कहती हैं कि मेरे न पति हैं, न पुत्र, न भाई, और, हे मधुसूदन, न ही तुम, क्योंकि तुम मेरी ऐसे अनदेखी करते हो मानो तुम्हें कोई दुख नहीं। वे शिकायत के साथ ही आई थीं। और उत्तर में श्रीकृष्ण ने कहा कि शोक मत करो, पाण्डवों के लिए जो उचित है वह मैं करूँगा, मैं सच्ची प्रतिज्ञा करता हूँ कि तुम राजाओं की रानी बनोगी। "आकाश गिर जाए, हिमालय टूट जाए, पृथ्वी टुकड़े-टुकड़े हो जाए, समुद्र सूख जाए, पर मेरा वचन कभी व्यर्थ नहीं होगा।" जो जैसे आया, उसे उसी भाव से उत्तर मिला। उन्होंने आँसुओं से भरी शिकायत सुनी, और शिकायत को ठुकराया नहीं।

चौथा शिशुपाल है। उसकी कथा नीलकण्ठ के शब्द "शत्रु के रूप में" के पास रखकर सुनिए, पर यह मानकर नहीं कि गीता शत्रुता को भक्ति कहती है। सभा पर्व में कथा है कि शिशुपाल जब बालक था तो उसके तीन नेत्र और चार भुजाएँ थीं। एक आकाशवाणी ने कहा था कि जिसकी गोद में बैठने पर अतिरिक्त भुजाएँ गिर जाएँगी और तीसरी आँख भीतर समा जाएगी, वही उसकी मृत्यु होगा। श्रीकृष्ण की गोद में रखते ही वैसा हुआ, और उसकी माता ने डरकर श्रीकृष्ण से वर माँगा कि इसके अपराध क्षमा कर देना। श्रीकृष्ण ने कहा, मैं इसके सौ अपराध क्षमा करूँगा, चाहे वे वध के योग्य हों। यह सभा पर्व के छियासठवें अध्याय में है। बरसों बाद राजसूय यज्ञ में शिशुपाल ने उन्हें ग्वाला कहकर उनका अपमान किया, और युद्ध के लिए ललकारा। श्रीकृष्ण ने कहा कि मैंने वे सौ अपराध क्षमा कर दिए, अब और नहीं। युद्ध हुआ, और अन्त में उन्होंने चक्र से उसका सिर काट दिया। और पाठ कहता है कि उसके शरीर से एक उत्तम तेज उठा, कृष्ण को प्रणाम किया, और उन्हीं में समा गया। मैं इस कथा से कोई सिद्धान्त नहीं बना रहा हूँ। मैं बस यह कह रहा हूँ कि जिसे उन्होंने सौ बार क्षमा किया, पाठ में उसकी आख़िरी तस्वीर उन्हीं में समा जाने की है।

तो ग्यारहवाँ श्लोक हमसे यह कहता है कि भगवान के पास हम जैसे हैं वैसे ही जा सकते हैं, शिकायत के साथ, डर के साथ, माँग के साथ, और वे उसी के अनुरूप उत्तर देते हैं। और दूसरी तरफ़ यह भी कि जैसा भाव हम दुनिया को देते हैं, वही हमारे पास लौटता है।

पर अभी एक बात बाकी है। अगर भगवान सबको उनके माँगे के अनुसार देते हैं, तो फिर ज़्यादातर लोग मोक्ष क्यों नहीं माँगते, और छोटी-छोटी सिद्धियों के पीछे क्यों भागते हैं? बारहवाँ श्लोक इसका उत्तर देता है, और तेरहवें में श्रीकृष्ण एक ऐसी बात कहते हैं जो पहली बार सुनने में सबसे उलटी लगती है: मैं सब रचता हूँ, और फिर भी मैं कर्ता नहीं हूँ।

काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः । क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥ १२ ॥
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चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः । तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥ १३ ॥
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बारहवाँ श्लोक एक कठिन प्रश्न का सीधा उत्तर है, और उसमें न किसी पर आरोप है, न शिकायत। काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः, क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा। कर्मों की सिद्धि चाहते हुए लोग यहाँ देवताओं की पूजा करते हैं, क्योंकि मनुष्य लोक में कर्मों से उत्पन्न सिद्धि शीघ्र मिलती है।

हमारी टीका इसे बहुत ईमानदारी से कहती है कि यह बताता है कि अधिकतर लोग मुक्ति के बजाय फल क्यों चाहते हैं: फल जल्दी मिलता है और दिखता है, जबकि ज्ञान धीरे और कठिनाई से आता है। श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती दोनों यही कहते हैं कि ज्ञान का फल अन्तःकरण की शुद्धि पर टिका है, इसलिए वह जल्दी नहीं मिलता। रामानुजाचार्य एक और परत खोलते हैं: वे कहते हैं कि लोग अनादि काल से जमा पापों के कारण जल्दी मिलने वाला फल चाहते हैं, पुत्र, पशु, अन्न, स्वर्ग, और संसार से उकताया हुआ कोई विरला ही मुक्ति का मार्ग पकड़ता है। इसमें आलोचना कम और पहचान ज़्यादा है। परीक्षा का नतीजा, नौकरी, ठीक होता हुआ स्वास्थ्य, ये सब हम जल्दी चाहते हैं, और इन्हें चाहना कोई पाप नहीं।

संत ज्ञानेश्वर इसे तीन तस्वीरों में कहते हैं, और मैं इन्हें अपने पास रखता हूँ। वे कहते हैं कि जो जिस भाव से उपासना करता है, वही पाता है, पर वह कर्म का फल है, लेन-देन का सौदा नहीं। जैसे खेत में जो बोया जाए वही उगता है। जैसे दर्पण में वही दिखता है जो सामने रखा हो। और जैसे पहाड़ की दरार में अपनी ही आवाज़ गूँजकर लौटती है। इसी तरह, वे श्रीकृष्ण की ओर से कहते हैं, इन सब उपासनाओं में मैं साक्षी हूँ, और हर किसी की भावना उसी पर लौटकर फल बन जाती है।

इस श्लोक को सबसे साफ़ मैंने महाभारत की एक कथा में देखा है, और वह नृसिंह की कथा है, सभा पर्व के छियालीसवें अध्याय में। हिरण्यकशिपु नाम का एक दैत्य समुद्र में उतरकर हज़ारों वर्ष खम्भे की तरह अचल खड़ा होकर तप करता रहा। ब्रह्मा प्रसन्न होकर आए, और उसने वर माँगा कि मुझे न देवता मारें, न मनुष्य, न किसी शस्त्र से, न सूखी चीज़ से, न गीली चीज़ से, न दिन में, न रात में, न आकाश में, न धरती पर, न भीतर, न बाहर। आदमी ने हर दरवाज़ा बन्द करने की कोशिश की। और ब्रह्मा ने कहा, ये अद्भुत वर मैंने तुम्हें दिए।

यह है "क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा"। तप किया, और फल तुरन्त और पूरा मिला। वर मिलते ही देवता ब्रह्मा के पास पहुँचे और बोले कि यह असुर इसी बल पर हमें सताएगा। ब्रह्मा ने कहा कि उसे अपने तप का फल मिलना ही चाहिए, और जब उस फल की अवधि पूरी हो जाएगी तब श्रीकृष्ण उसका वध करेंगे। और ठीक वैसा ही हुआ। उसने सातों द्वीप जीत लिए, देवताओं के स्थान छीन लिए, मुनियों को सताया, और बहुत लम्बे समय तक राज किया। ध्यान दीजिए कि ब्रह्मा ने कर्म के फल को रद्द नहीं किया। जिसने तप किया था, उसे उसका फल पूरा दिया गया। फिर देवता दोबारा ब्रह्मा के पास गए, और ब्रह्मा ने कहा कि ऐसी विपत्ति मेरे लिए भी कठिन है, पर नारायण हैं, संकट में वे ही मेरे और तुम्हारे परम आश्रय हैं। जब देवता श्वेतद्वीप पहुँचे, तो नारायण ने अदृश्य रहकर कहा, "हे अमरो, भय छोड़ दो। मैं तुम्हें अभय देता हूँ।" फिर उन्होंने आधा मनुष्य और आधा सिंह का शरीर धारण किया, और सन्ध्या के समय, भवन की सीमा पर, यानी देहली पर, उसे अपनी जाँघ पर रखकर नखों से फाड़ डाला।

अब वर के हर शब्द को देखिए। न दिन, न रात, तो सन्ध्या। न भीतर, न बाहर, तो देहली। न धरती, न आकाश, तो जाँघ। न शस्त्र, तो नख। न मनुष्य, न पशु, तो नरसिंह। वर का एक भी शब्द तोड़ा नहीं गया, और फिर भी अधर्म का अन्त हुआ। मुझे इसमें गहरी तसल्ली मिलती है। जब अधर्म सचमुच फलता-फूलता दिखे, तो यह कथा हमसे कहती है कि वह फल उसके अपने कर्म का है, एक समय तक चलेगा, और उसी समय के भीतर उसका अन्त भी पहले से तय है। ईश्वर कर्म की व्यवस्था को तोड़कर नहीं, उसके भीतर से रास्ता निकालकर उत्तर देते हैं।

और इस कथा का एक धागा महाभारत में फिर लौटता है, और वह आज के सत्संग के नाम का सबसे सीधा उत्तर है। आपको शिशुपाल याद होगा। सभा पर्व के सत्तरवें अध्याय में, उसी युद्ध के बीच, जब श्रीकृष्ण का रथ बाणों से ढक गया और उनके सारथि दारुक ने घबराकर कहा कि ऐसा युद्ध मैंने पहले कभी नहीं देखा, तब श्रीकृष्ण ने उससे कहा: पहले यही बहुत बलवान दैत्य हिरण्यकशिपु था, जो वरदान से घमण्डी होकर देवताओं का शत्रु बना। फिर यही रावण नाम का बड़ा पराक्रमी राक्षस था। "और हर बार मैं ही इस दुष्ट की मृत्यु बनता हूँ। इसलिए डरो मत।" भगवान बार-बार क्यों आते हैं? क्योंकि अधर्म भी बार-बार लौटता है, नया नाम और नया चेहरा लेकर। और महाभारत की यह पंक्ति बताती है कि हर बार उसके सामने वही खड़े मिलते हैं।

अब तेरहवाँ श्लोक। चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः, तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्। गुण और कर्म के विभाग से चारों वर्ण मेरे द्वारा रचे गए हैं। उसका कर्ता होते हुए भी मुझ अविनाशी को तुम अकर्ता ही जानो।

इस श्लोक में दो बातें हैं, और मैं दोनों को वैसे ही रख रहा हूँ जैसे श्लोक और हमारी टीका रखती है। पहली, कि यह विभाग गुण और कर्म से है। हमारी टीका कहती है कि वर्ण गुण और कर्म से निर्धारित हैं, अर्थात् स्वभाव और उसके अनुकूल कर्म से। मधुसूदन सरस्वती इसे यूँ कहते हैं कि शरीर बनाने वाले गुणों में भेद होने से सबके स्वभाव एक-से नहीं होते। तिलक महाराज बताते हैं कि इस विभाग का विस्तार आगे अठारहवें अध्याय में आएगा, इसलिए यहाँ मैं उसे वहीं के लिए रखता हूँ। और दूसरी बात बिलकुल अलग है: "कर्ता होते हुए भी अकर्ता।" हमारी टीका कहती है कि संसार की दृष्टि से भगवान कर्ता हैं, पर अपने स्वरूप में वे कुछ नहीं करते, क्योंकि कर्म प्रकृति का है।

श्रीधर स्वामी इसे एक सवाल से खोलते हैं कि जब कर्म और कर्ता इतने भिन्न-भिन्न हैं, तो रचने वाले में पक्षपात क्यों नहीं? वे उत्तर देते हैं कि रचा तो मैंने है, पर आसक्ति से रहित होने के कारण मैं फल में अकर्ता ही हूँ। नीलकण्ठ कहते हैं कि इसीलिए अन्य देवताओं के भक्त भी वास्तव में मेरे ही हैं, क्योंकि वे सब मुझसे उत्पन्न हुए हैं, जैसे सन्तान के तृप्त होने से पिता तृप्त होता है। और मधुसूदन सरस्वती कहते हैं कि व्यवहार की दृष्टि से कर्ता हूँ, परमार्थ की दृष्टि से अकर्ता।

मुझे इसका सबसे सरल रूप अपने ही घरों में दिखता है। कोई माँ या पिता ने जो घर बनाया, वही उसका कर्ता है, पर जो माता-पिता घर को अपनी मिलकियत की गाँठ नहीं बनाते, वे घर को रचकर भी उसमें उलझते नहीं। दसवें सत्संग में हमने कहा था कि बन्धन काम में नहीं, गाँठ में है। यहाँ भी वही है: रचना और गाँठ अलग-अलग चीज़ें हैं।

और महाभारत में भीष्म इस बात को सरल शब्दों में सामने रखते हैं। भीष्म पर्व के छियासठवें अध्याय में वे दुर्योधन से कहते हैं कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, अपने-अपने गुणों के लिए जाने जाते हुए और सदा अपने काम में लगे हुए, अपने कर्मों से उन्हीं की सेवा और पूजा करते हैं। यानी जो जिसका काम है, उसी में उसकी पूजा है।

पर अभी एक बात बाकी है। अगर भगवान कर्ता होकर भी अकर्ता हैं, तो हमारे लिए इसका क्या अर्थ है? चौदहवाँ श्लोक इसका उत्तर देता है, और पन्द्रहवाँ वह आदेश, जिसके लिए श्रीकृष्ण ने यह पूरा रास्ता तय किया।

न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा । इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥ १४ ॥
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एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः । कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥ १५ ॥
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चौदहवाँ श्लोक इस पूरी यात्रा की चाबी हमारे हाथ में रखता है। न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा, इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते। कर्म मुझे लिप्त नहीं करते और मुझे कर्मफल की स्पृहा नहीं है। जो मुझे इस प्रकार जानता है, वह भी कर्मों से नहीं बँधता।

यहाँ दो रस्सियाँ हैं, और दोनों का नाम इस श्लोक में है। पहली, कर्म का लिप्त करना, यानी "मैंने किया" की पकड़। दूसरी, फल की स्पृहा, यानी "मुझे मिले" की पकड़। मधुसूदन सरस्वती और नीलकण्ठ दोनों कहते हैं कि कर्म तब चिपकता है जब कर्ता होने का अभिमान और फल की चाह दोनों हों, और भगवान में दोनों नहीं हैं। शंकराचार्य जोड़ते हैं कि जो भी भगवान को आत्मा के रूप में जानकर कह सके कि मैं कर्ता नहीं, मुझे फल की चाह नहीं, वह भी कर्मों से नहीं बँधता। श्रीधर स्वामी का वाक्य मुझे बहुत पसन्द है: जो इसे जानता है, उसके अहंकार की कसावट ढीली हो जाती है।

रामानुजाचार्य एक अलग दिशा खोलते हैं, और वह पिछले श्लोक के सवाल का उत्तर भी है। वे कहते हैं कि सृष्टि में जो भेद दिखता है, वह भगवान के कारण नहीं है। वह रचे गए जीवों के अपने पुराने कर्मों की शक्ति से है, भगवान केवल निमित्त हैं, और इसीलिए उन पर न पक्षपात आता है, न निर्दयता। हमारी टीका इस श्लोक का सार यूँ कहती है कि जो यह जानता है कि भगवान कर्म करते हुए भी नहीं बँधते, उसके लिए वही मुक्ति खुली है, बशर्ते वह कर्तापन का दावा किए बिना और फल की इच्छा के बिना कर्म करे। और तिलक महाराज की टिप्पणी बहुत ज़रूरी है कि "जानता है" का अर्थ यहाँ केवल जानना नहीं, जानकर वैसा बरतना है।

संत ज्ञानेश्वर इसे एक पंक्ति में कहते हैं: यह सब मेरे ही कारण हुआ, पर मैंने नहीं किया, ऐसा जिसने जान लिया, वह छूट गया।

और यहाँ महाभारत हमें एक चित्र देता है, जो इस श्लोक को जीवित कर देता है। वही वन-सभा, जहाँ अर्जुन श्रीकृष्ण के पुराने कर्म गिना रहे थे। उस सूची में एक बात मैंने अब तक बचाकर रखी थी: प्रभास तीर्थ में दिव्य हज़ार वर्ष तक एक पैर पर खड़े रहना, और पाठ कहता है कि वह संसार को चलाने के लिए था। हर यज्ञ में सौ लाख सोने का दान भी उसी सूची में है। और उन्हें वहाँ सब प्राणियों के भीतर का ज्ञाता, तपों का भण्डार और सनातन यज्ञ कहा गया है। तीसरे अध्याय में उन्होंने कहा था कि तीनों लोकों में मुझे कुछ पाना नहीं है, फिर भी मैं कर्म में लगा हूँ। यहाँ वही बात एक दूसरी तरफ़ से सामने आती है: इतना कर्म, और फिर भी कर्ता का दावा नहीं, फल की माँग नहीं। यही नमूना है जिसे जानकर बरतना है।

अब पन्द्रहवाँ श्लोक, जिसके लिए यह पूरा रास्ता तय हुआ था। एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः, कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्। इस प्रकार जानकर मुक्ति चाहने वाले पूर्वजों ने भी कर्म किए हैं। इसलिए तुम भी पूर्वजों द्वारा सदा से किए जाने वाले कर्म ही करो।

"कर्मैव", कर्म ही। शंकराचार्य कहते हैं कि इसका अर्थ है कि न चुप बैठना, और न संन्यास लेकर भाग जाना। अगर तुम आत्मा को पूरी तरह नहीं जानते, तो अपनी शुद्धि के लिए करो, और अगर जानते हो, तो लोक की भलाई के लिए करो। मधुसूदन सरस्वती इस युग के उदाहरण में ययाति और यदु जैसे नाम लेते हैं और कहते हैं कि पहले के युगों में भी ऐसा ही हुआ। नीलकण्ठ कहते हैं कि "पूर्वतरं" का अर्थ है कि यह वेद में कहा गया है, किसी ने आज गढ़ा नहीं।

संत ज्ञानेश्वर यहाँ एक बहुत सुन्दर उपमा देते हैं। वे कहते हैं कि पहले के मुमुक्षुओं ने भी मुझे इस तरह जानकर सब कर्म किए, पर उनके कर्म ऐसे भुने हुए बीज जैसे हो गए जिन्हें बो भी दो तो अंकुर नहीं फूटता। उनके लिए वे कर्म बन्धन नहीं, मोक्ष का कारण बन गए। यानी एक ही खेत है, और एक ही बीज, पर भुने हुए बीज से फसल नहीं उगती। तिलक महाराज भी यही कहते हैं कि मोक्ष और कर्म में विरोध नहीं है।

अब मैं आपको वह बात कहता हूँ जो इस सत्संग का उत्तर है। हमारा सवाल था कि जब अधर्म बढ़े तो भरोसा कहाँ रखें, और अब तक हमने सुना कि भरोसा उस पर रखिए जो आता है। पर "कुरु कर्मैव" बताता है कि भरोसा हाथ पर हाथ धरकर बैठना नहीं है। इसे महाभारत में उन्हीं पाण्डवों के बारे में सुनिए, जिनके बारे में भीष्म दुर्योधन से कहते हैं कि उनकी रक्षा शार्ङ्ग धनुषधारी करते हैं। संजय धृतराष्ट्र को बताते हैं कि पाण्डव न मन्त्रों से कुछ करते हैं, न कोई माया रचते हैं, न डराने की कोई चाल चलते हैं। वे नियम से लड़ते हैं। वे अपने सब काम, जीविका तक, धर्म से आरम्भ करते हैं, वे युद्ध से पीछे नहीं हटते, और जहाँ धर्म है वहीं विजय है। यह भीष्म पर्व के पैंसठवें अध्याय में है, उसी जगह जहाँ संजय राजा को बार-बार रोके जाने की याद दिलाते हैं। और भगवान की देन भी भीष्म ने वहीं बताई है: वे पाण्डवों को सदा कल्याण में लगी बुद्धि देते हैं, युद्ध में बल देते हैं, और भयों से उनकी रक्षा करते हैं। यानी भरोसा और कर्म साथ चलते हैं। बुद्धि मिलती है, बल मिलता है, भय हटता है, और कर्म फिर भी हमें ही करना है, अधर्म के हथियार उठाए बिना, धर्म के रास्ते पर।

तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली बात। अधर्म का बढ़ना भगवान की अनुपस्थिति का प्रमाण नहीं है। श्लोक के अनुसार वही वह घड़ी है जिसके लिए वे वचन दे चुके हैं। सातवें और आठवें श्लोक का वादा है: जब-जब धर्म घटे, तब-तब मैं प्रकट होता हूँ, सज्जनों की रक्षा, दुष्टों के नाश और धर्म की स्थापना के लिए। हमें तारीख़ नहीं बताई गई। लेकिन पृथ्वी की पुकार ब्रह्मा तक पहुँची थी, और हिरण्यकशिपु जैसा अधर्म भी अपने ही फल की सीमा पर आकर रुका।

दूसरी बात। भरोसा जानकारी से पक्का होता है। नौवें श्लोक ने कहा कि उनके जन्म और कर्म दिव्य हैं, दूसरों पर कृपा के लिए हैं। इसलिए जिस रात डर, क्रोध या अकेलापन घेरे, उस रात वही कीजिए जो अर्जुन ने उस वन-सभा में किया: उनके कर्मों को याद कीजिए, उनके नाम का स्मरण कीजिए, और ग्यारहवें श्लोक पर टिकिए, कि जो जैसे उनके पास आता है, उसे उसी तरह उत्तर मिलता है। शिकायत लेकर जाइए, तो भी जाइए।

तीसरी बात। इस प्रतीक्षा में काम मत छोड़िए। "कुरु कर्मैव", कर्म ही करो। अपना काम, अपने रास्ते से, बिना किसी के साथ अधर्म किए, और बिना "मैंने किया, मुझे मिले" की गाँठ बाँधे। और अगर मन में बार-बार यह उठे कि आज की ख़बर देखकर तो कुछ करने का मन ही नहीं करता, तो कोई एक छोटा-सा काम चुन लीजिए, जो आज आपके हाथ में है, और उसे नियम से पूरा कर दीजिए।

अगली बार हम चौथे अध्याय में सोलहवें श्लोक से आगे बढ़ेंगे, जहाँ श्रीकृष्ण एक ऐसी बात कहेंगे जिस पर बुद्धिमान लोग भी चकरा जाते हैं: कर्म क्या है और अकर्म क्या है। वे उसी में कहेंगे कि जो कर्म में अकर्म देखता है, वही बुद्धिमान है, और फिर रोज़ के काम को अर्पण में बदलने की बात करेंगे। आज जो सुना, वह भरोसा था। अगली बार हम सुनेंगे कि वह भरोसा रोज़ के काम में कैसे उतरता है।

आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। इस हफ़्ते कौन-सा अन्याय आपको सबसे ज़्यादा परेशान करता रहा? और उसके बीच, आज आप कौन-सा एक छोटा काम, धर्म के रास्ते से, पूरा कर सकते हैं? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।

अधर्म चाहे जितना बढ़े, वचन उससे बड़ा है। हमारा काम इतना है कि उस वचन पर टिकें, और अपना कर्म न छोड़ें।

जय श्री कृष्ण।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥ ७ ॥
गीता 4.7 — अर्थ पढ़ें ›

तीन बातें

  1. अधर्म का बढ़ना भगवान की अनुपस्थिति का प्रमाण नहीं है। श्लोक के अनुसार वही वह घड़ी है जिसके लिए वे वचन दे चुके हैं। सातवें और आठवें श्लोक का वादा है: जब-जब धर्म घटे, तब-तब मैं प्रकट होता हूँ, सज्जनों की रक्षा, दुष्टों के नाश और धर्म की स्थापना के लिए। हमें तारीख़ नहीं बताई गई। लेकिन पृथ्वी की पुकार ब्रह्मा तक पहुँची थी, और हिरण्यकशिपु जैसा अधर्म भी अपने ही फल की सीमा पर आकर रुका।
  2. भरोसा जानकारी से पक्का होता है। नौवें श्लोक ने कहा कि उनके जन्म और कर्म दिव्य हैं, दूसरों पर कृपा के लिए हैं। इसलिए जिस रात डर, क्रोध या अकेलापन घेरे, उस रात वही कीजिए जो अर्जुन ने उस वन-सभा में किया: उनके कर्मों को याद कीजिए, उनके नाम का स्मरण कीजिए, और ग्यारहवें श्लोक पर टिकिए, कि जो जैसे उनके पास आता है, उसे उसी तरह उत्तर मिलता है। शिकायत लेकर जाइए, तो भी जाइए।
  3. इस प्रतीक्षा में काम मत छोड़िए। "कुरु कर्मैव", कर्म ही करो। अपना काम, अपने रास्ते से, बिना किसी के साथ अधर्म किए, और बिना "मैंने किया, मुझे मिले" की गाँठ बाँधे। और अगर मन में बार-बार यह उठे कि आज की ख़बर देखकर तो कुछ करने का मन ही नहीं करता, तो कोई एक छोटा-सा काम चुन लीजिए, जो आज आपके हाथ में है, और उसे नियम से पूरा कर दीजिए।