मन मेरी बात क्यों नहीं मानता
गीता 3.30–3.43 · 79 मिनट
जानते हुए भी गलत क्यों कर बैठते हैं; इच्छा, असली शत्रु
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा ।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ॥ ३० ॥
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥ ३१ ॥
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥ ३२ ॥
कभी ऐसा हुआ है कि आप भीतर से पूरी तरह जानते थे कि यह बात नहीं कहनी चाहिए, या यह काम नहीं करना चाहिए, और फिर भी आपने वह कह दिया, वह कर दिया? और बाद में अकेले बैठकर खुद से पूछा हो कि मैंने ऐसा क्यों किया, मैं तो ऐसा चाहता ही नहीं था। दिमाग़ साफ़ कह रहा था कि रुक जाओ, और हाथ ने फिर भी वही बटन दबा दिया। मन मेरी बात क्यों नहीं मानता?
आज का सत्संग इसी एक सवाल पर है। और यह सवाल हमारा ही नहीं है। अर्जुन ने रथ पर बैठकर, इसी अध्याय में, लगभग इन्हीं शब्दों में यही पूछा था, और श्रीकृष्ण ने उसका जो उत्तर दिया, वह पूरी गीता के सबसे सीधे और सबसे काम के उत्तरों में से एक है।
जय श्री कृष्ण।
आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का बारहवाँ सत्संग है। आज हम तीसरे अध्याय के आख़िरी चौदह श्लोक साथ पढ़ेंगे, तीसवें से तैंतालीसवें तक, और इसके साथ कर्मयोग का यह अध्याय पूरा होगा।
पिछली बार हमने सत्रहवें से उनतीसवें श्लोक तक सुना था। श्रीकृष्ण ने कहा था कि जो आत्मा में ही तृप्त है, उसके लिए करने को कुछ नहीं बचता, फिर भी जनक जैसे ज्ञानी कर्म से ही सिद्धि तक पहुँचे। और स्वयं उन्होंने कहा कि तीनों लोकों में उन्हें कुछ पाना शेष नहीं, फिर भी वे कर्म में लगे रहते हैं। फिर वह बात आई जो हर घर पर लागू होती है: यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। श्रेष्ठ पुरुष जो-जो करता है, दूसरे लोग भी वही करते हैं, और वह जो प्रमाण बना देता है, संसार उसी के पीछे चलता है। अन्त में सत्ताईसवें से उनतीसवें श्लोक तक उन्होंने यह दिखाया कि सारे कर्म प्रकृति के गुणों से होते हैं, पर अहंकार से मोहित मन मान बैठता है कि मैं कर्ता हूँ, और जो पूरा जानता है, वह अधूरा जानने वालों को हिलाए नहीं। आज के श्लोक उसी के आगे की बात हैं, और उस सवाल तक ले जाते हैं जो इतना सब सुनकर किसी के भी मन में उठता है: बात ठीक है, पर मैं चाहूँ भी तो मन साथ क्यों नहीं देता?
और एक बात पहले याद दिला दूँ, क्योंकि हम गीता को उसके अपने घर में पढ़ रहे हैं। हमारे कोष में महाभारत के भीष्म पर्व का सत्ताईसवाँ अध्याय ही गीता का तीसरा अध्याय है। इसे संजय सुना रहे हैं राजा धृतराष्ट्र को, भीष्म के बाणों की शय्या पर गिर जाने के बाद। और मैं चाहता हूँ कि आज आप उस राजा को ख़ास तौर पर याद रखें। क्योंकि आज का सवाल उन्हीं का सवाल है। आपको याद होगा, पहले सत्संग में, और फिर पिछली बार भी, हमने उनका अपना यह वाक्य सुना था कि मैं अन्धा हूँ, पुत्र के प्रेम में बँधा हूँ, और जब मूर्ख दुर्योधन भटकता है तो मैं भी उसके साथ भटक जाता हूँ। यह आदि पर्व के पहले अध्याय में, एक सौ छियासठवें श्लोक में है। जो आदमी अपने मुँह से यह कहता है, वह जानता तो है, पर रुक नहीं पाता। और आज वही आदमी अर्जुन के मुँह से उसी सवाल को पूछा जाता हुआ सुनेगा।
तो पहले तीसवाँ श्लोक। मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा, निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः। अपने भीतर के आत्मा में लगे चित्त से सारे कर्म मुझमें अर्पण करके, कामना और ममता से रहित होकर, सन्ताप के बिना युद्ध करो।
इस श्लोक में एक भाव है जिसे हम जल्दी में पार कर जाते हैं, संन्यास का। हम सुनते ही सोचते हैं कि छोड़ दो। पर यहाँ छोड़ने की बात नहीं है, सौंपने की बात है। कर्म वही रहेगा, युद्ध वही रहेगा, पर उसे रखने की जगह बदल जाएगी। शंकराचार्य इसे यूँ खोलते हैं कि विवेक की बुद्धि से यह सोचकर करो कि मैं ईश्वर के लिए सेवक की तरह कर रहा हूँ। श्रीधर स्वामी कहते हैं कि यह दृष्टि रखो कि भीतर बैठा अन्तर्यामी जैसा कराएगा वैसा मैं करूँगा। और रामानुजाचार्य एक कदम और जाते हैं, वे कहते हैं कि ये सब कर्म वास्तव में मेरे ही करवाए हुए हैं और मेरी ही आराधना हैं, इसलिए उनके फल की आशा भी नहीं और उन पर मेरा-पन भी नहीं। संत ज्ञानेश्वर इसी जगह बड़े प्यार से कहते हैं कि हाथ में धनुष लो और रथ पर चढ़ो, वीर की वृत्ति को गले लगाओ, बस चित्त को आत्मरूप में टिकाए रखो, और यह अभिमान भीतर मत घुसने दो कि इस काम का कर्ता मैं हूँ।
अब श्लोक का सबसे मार्मिक शब्द, "विगतज्वरः", यानी ज्वर के बिना। हमारी टीका कहती है कि यह ज्वर वही शोक और व्याकुलता है जो अर्जुन ने पहले अध्याय में दिखाई थी, जब उनका शरीर काँप रहा था और गाण्डीव हाथ से फिसल रहा था। मधुसूदन सरस्वती इसमें जोड़ते हैं कि शोक को ज्वर, यानी बुखार, इसलिए कहा गया कि वह तपाता है, यानी इस लोक और परलोक के अपयश और बुरे फल की चिन्ता का ताप। ज़रा बुखार के साथ काम करने की सोचिए। काम वही है, पर हर क़दम पर थकान, हर बात पर चिड़चिड़ापन। श्रीकृष्ण यह नहीं कह रहे कि काम बदल दो। वे कह रहे हैं कि काम के साथ जुड़ा हुआ ताप उतार दो। मान लीजिए आपकी बीमार माँ को रात में अस्पताल ले जाना है। दौड़-भाग, फ़ॉर्म, दवाइयाँ, सब वही हैं। एक आदमी हर चीज़ में काँपता है, हर नर्स पर झल्लाता है, और दूसरा वही सब करते हुए भीतर टिका रहता है। दोनों के हाथ में वही काम है, फ़र्क़ इतना है कि एक के पास बुखार है और दूसरे के पास नहीं।
अब इकतीसवाँ श्लोक। ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः, श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः। जो मनुष्य श्रद्धा से युक्त और दोष-दृष्टि के बिना मेरे इस मत का सदा पालन करते हैं, वे भी कर्मों से मुक्त हो जाते हैं।
यहाँ दो शर्तें हैं, श्रद्धा और अनसूया, यानी दोष न निकालना। मधुसूदन सरस्वती अनसूया का बड़ा साफ़ उदाहरण देते हैं। वे कहते हैं कि वह सोच, कि ये तो मुझे दुःख देने वाले कर्म में लगा रहे हैं, ये कितने निर्दय हैं, यही दोष-दृष्टि है, और परम मित्र श्रीकृष्ण के बारे में ऐसी सोच न रखना ही अनसूया है। यहाँ एक बात मुझे बहुत भली लगती है। आपको याद होगा कि इसी अध्याय के पहले श्लोक में अर्जुन ने कहा था कि मुझे इस घोर कर्म में क्यों लगाते हैं। पर उन्होंने सवाल पूछा था, दोष नहीं निकाला था। और श्रीकृष्ण ने उन्हें कभी फटकारा नहीं। श्रद्धा का मतलब यह नहीं कि सवाल मत पूछो। इसका मतलब है कि सवाल इस भरोसे से पूछो कि जवाब देने वाला मेरा भला चाहता है।
और श्लोक में एक छोटा-सा पद है, तेऽपि, यानी वे भी। वे भी मुक्त हो जाते हैं। श्रीधर स्वामी कहते हैं कि जो इस मत पर धीरे-धीरे चलते हैं, वे भी, ज्ञानी की तरह, कर्मों से छूट जाते हैं। रामानुजाचार्य इसे और उदार बना देते हैं। वे कहते हैं कि जो अभी पूरी तरह इस पर चल नहीं पाते, पर श्रद्धा रखते हैं और दोष नहीं ढूँढ़ते, उनके पाप श्रद्धा और इस निर्दोष दृष्टि से क्षीण होते जाते हैं, और वे भी जल्दी ही इसी मार्ग पर चलकर छूट जाते हैं। यानी यह श्लोक उनके लिए भी है जो कहते हैं कि मुझसे तो यह सब होता ही नहीं। आप अभी कच्चे हैं, तो भी इस श्लोक के भीतर हैं।
इसका एक सुन्दर रूप आपने दसवें सत्संग में देखा था। युधिष्ठिर ने उद्योग पर्व में संजय से कहा था कि अगर शान्ति छोड़ने या लड़कर धर्म छोड़ने का दोष मुझ पर आता हो, तो यशस्वी केशव कहें, और अन्त में यह भी कहा कि मैं केशव की बात का उल्लंघन नहीं करता। यह उद्योग पर्व के अट्ठाईसवें अध्याय का चौदहवाँ श्लोक है। देखिए, उन्होंने भी सवाल रखा था, पर भरोसा बनाए रखा था।
अब बत्तीसवाँ श्लोक, जो थोड़ा कठोर लगता है। ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्, सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः। परन्तु जो दोष लगाते हुए मेरे इस मत का पालन नहीं करते, उन्हें सब ज्ञानों में मोहित, विवेकहीन और नष्ट हुआ ही जानो।
"नष्ट" शब्द सुनकर डर मत जाइए। शंकराचार्य यहाँ "निन्दा करने वाले" की बात करते हैं, और मधुसूदन सरस्वती उन्हें कहते हैं जो दोष निकालकर उस बात पर चलते ही नहीं। नीलकण्ठ कहते हैं कि वे ईश्वर को न जानते हुए केवल देह में ही टिके रहते हैं। यानी श्लोक किसी को शाप नहीं दे रहा, वह एक स्थिति का वर्णन कर रहा है, जिसमें आदमी की समझ ही बिगड़ जाती है। संत ज्ञानेश्वर इसके लिए पतंगे की उपमा देते हैं कि पतंगा दीपक से लिपटता है और वहीं उसकी मृत्यु होती है, क्योंकि प्रकाश उसके सहने की चीज़ नहीं। और ज़रा देखिए कि दोष ढूँढ़ना कैसे काम करता है। जब कोई हमें सही बात कहता है और हम उसकी बात पर चलना नहीं चाहते, तो सबसे आसान उपाय यह है कि कहने वाले में कमी निकाल लो। तुम खुद क्या करते हो, तुम्हें हमारी हालत का क्या पता। इस तरह बात की जगह बात कहने वाला निशाना बन जाता है, और बात बच निकलती है। यही मुझे इस श्लोक का असली अर्थ लगता है: दोष-दृष्टि वह दीवार है जिसके पीछे हम अपनी असली उलझन को छिपा लेते हैं।
और महाभारत हमें इसकी एक कठिन तस्वीर दिखाता है। उद्योग पर्व के एक सौ उनतालीसवें अध्याय में भीष्म और द्रोण दुर्योधन को समझा रहे हैं। वह चुप है, उदास है, तिरछी नज़र से देखता है, मुँह नीचे किए है और भौंहें सिकोड़े है। यह पहले ही श्लोक में लिखा है। फिर द्रोण कहते हैं कि पापों से रोके जाने पर भी दुष्ट मनुष्य पाप ही करना चाहता है। वे कहते हैं कि कुरुओं के बड़े-बूढ़े ने, मैंने, विदुर ने और वासुदेव ने भी तुम्हें तुम्हारी भलाई की बात कही, फिर भी तुम उसे बिलकुल नहीं मानते। और यह भी कि लोभ से तुमने युधिष्ठिर की राजलक्ष्मी ऐसे उठा ली जैसे किसी की फेंकी हुई माला उठा ली हो। अन्त में वे बस इतना माँगते हैं कि उन वीरों से युद्ध बस करो। मैं यह नहीं कहता कि यह बत्तीसवें श्लोक की ठीक वही बात है। पर तस्वीर वही है: बात सुनी गई, पर मानी नहीं गई। और जिसने भी यह सुना होगा, उसके मन में एक ही सवाल उठा होगा: यह आदमी, जिसे इतने लोग इतना समझा चुके हैं, फिर भी क्यों नहीं मानता? क्या यह सिर्फ़ ज़िद है, या इससे कुछ गहरा है?
गहरी बात यही है। और अगला श्लोक ठीक यहीं से शुरू होता है, एक ऐसे वाक्य के साथ जो पहली बार सुनने पर निराश कर सकता है: ज्ञानी भी अपनी प्रकृति के अनुसार ही चेष्टा करता है। पर अभी एक बात बाकी है, और वह यह कि इसी बात में एक ऐसी चाबी छिपी है जो हमें इस पूरे सवाल का दरवाज़ा खोलकर देगी।
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥ ३३ ॥
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥ ३४ ॥
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥ ३५ ॥
तैंतीसवाँ श्लोक वह वाक्य है जिससे मैंने पिछला खंड खत्म किया था। सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि, प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति। ज्ञानी भी अपनी प्रकृति के अनुसार ही चेष्टा करता है। सब प्राणी अपनी प्रकृति के अनुसार चलते हैं, फिर इसमें हठ क्या करेगा?
श्लोक की पहली पंक्ति का सबसे वज़नदार शब्द है "भी", यानी ज्ञानी भी। श्रीधर स्वामी इसी पर रुकते हैं। वे कहते हैं कि जब गुण-दोष को जानने वाला भी अपने स्वभाव के अनुरूप ही चलता है, तो अज्ञानी की तो बात ही क्या। और यह प्रकृति क्या है? हमारी टीका कहती है कि यहाँ प्रकृति का अर्थ पिछले कर्मों से बना स्वभाव है। शंकराचार्य इसे पहले के किए धर्म-अधर्म के संस्कार कहते हैं, जो इस जन्म की शुरुआत में ही प्रकट हो जाते हैं। यानी हम खाली पन्ने की तरह नहीं आए थे। हम अपने साथ झुकाव लेकर आए थे, और वे झुकाव हमारी हर चेष्टा में बोलते हैं।
फिर निग्रहः, जिसका अर्थ तिलक ने बड़े सीधे शब्दों में खोला है। वे कहते हैं कि यहाँ निग्रह का अर्थ केवल संयम नहीं है, ज़बरदस्ती या हठ है। देह है तो भूख-प्यास रहेगी, और ज्ञानी कितना ही बड़ा हो, भूख लगते ही उसे भिक्षा माँगने बाहर निकलना पड़ेगा। इसलिए चतुर आदमी का काम यह नहीं कि हठ से अपनी स्वाभाविक वृत्तियों को एकदम मार डालने की कोशिश करे, बल्कि योग्य संयम से उन्हें अपने वश में कर ले। अभिनवगुप्त भी यही कहते हैं कि ज्ञानी का भी भोजन आदि का व्यवहार उलट नहीं हो जाता, वह भी अपने स्वभाव के उचित ही बरतता है।
आप इसे अपने अनुभव से परख सकते हैं। हम सब ने कभी एक जनवरी को, या किसी बड़ी बीमारी के बाद, या किसी बड़ी ग़लती के बाद, पक्का संकल्प किया है कि अब से मैं ऐसा नहीं करूँगा। और हम में से अधिकतर ने देखा है कि कुछ दिन बाद कोई पुराना झुकाव बिना बुलाए लौट आया। श्रीकृष्ण इसे कमज़ोरी की तरह नहीं देखते, वे इसे एक तथ्य की तरह कहते हैं। हठ से स्वभाव को एक रात में नहीं बदला जा सकता। और यह बात उन्होंने किसी साधारण आदमी के बारे में नहीं, ज्ञानी के बारे में कही है।
इसी बात का एक बहुत पुराना उदाहरण महाभारत में है, और वह एक ऐसे आदमी का है जिसे संसार तपस्वी के रूप में जानता था। आदि पर्व के बानवें और तिरानवें अध्यायों में शकुन्तला राजा दुष्यन्त को अपने जन्म की कथा सुनाती है, जैसी उसने अपने पालक पिता कण्व से सुनी थी, और वह कथा विश्वामित्र की है। कण्व कहते हैं कि बहुत पहले विश्वामित्र ने ऐसा बड़ा तप किया कि देवताओं के स्वामी इन्द्र घबरा गए। उन्हें डर था कि तप के तेज से जलता हुआ यह ऋषि कहीं उन्हें उनके पद से न गिरा दे, और उन्होंने मेनका नाम की अप्सरा को भेजा कि जाओ, इनका तप तोड़ो। यह बानवें अध्याय के बत्तीसवें से अड़तीसवें श्लोक में है। मेनका ने मना नहीं किया, पर डरते हुए यह कहा कि वे महान तपस्वी हैं और क्रोधी भी, उन्होंने क्षत्रिय कुल में जन्म लेकर अपने बल से ब्राह्मणत्व पाया, एक नदी रच दी, क्रोध में नक्षत्रों से भरा एक दूसरा लोक बना दिया, और ऐसे आदमी को मैं कैसे छुऊँ? फिर भी वह गई।
तिरानवें अध्याय में वही हुआ जो इन्द्र चाहते थे। मेनका ऋषि के पास खेल रही थी, हवा ने उसका वस्त्र उड़ा दिया, ऋषि ने उसे देखा, और ऋषि का मन काम के वश में आ गया। उसके बाद वे उसके साथ इतने समय तक रहे कि हज़ारों वर्ष उन्हें एक दिन जैसे लगे। और तब पाठ अपना निदान ख़ुद लिखता है, तिरानवें अध्याय के दसवें श्लोक में: मुनि सदा एकाग्र रहे थे, फिर भी उन्होंने काम और क्रोध को नहीं जीता था, और इसीलिए बरसों का कमाया तप उन्होंने नष्ट कर दिया। फिर वे मोह में पड़े, मन में क्रोध लिए कन्द-मूल खाते रहे। कण्व को जब उनकी बेटी पक्षियों के बीच मिली, तो पक्षियों ने भी यही कहा कि आपके मित्र काम और क्रोध को नहीं जीत सके।
अब ज़रा रुककर सोचिए। यह वह आदमी है जिसकी एकाग्रता सच्ची थी, जिसके तप से इन्द्र काँपते थे। श्लोक के शब्द "ज्ञानवानपि", यानी ज्ञानी भी, उसी पर ठीक बैठते हैं, और उसकी प्रकृति के भीतर बचा हुआ झुकाव एक क्षण में उसे वहाँ ले गया जहाँ उसका सारा ज्ञान नहीं जाना चाहता था। मैं इसे उसकी निन्दा की तरह नहीं सुना रहा, पाठ भी निन्दा नहीं करता, वह बस बताता है कि हुआ क्या। और देखिए कि पाठ ने जो दो नाम लिए, काम और क्रोध, वही दो नाम श्रीकृष्ण आगे चलकर सैंतीसवें श्लोक में लेंगे, एक ही शत्रु के दो रूप बताकर।
चौंतीसवाँ श्लोक। इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ, तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ। हर इन्द्रिय के अपने विषय में राग और द्वेष स्थित हैं। मनुष्य उन दोनों के वश में न आए, क्योंकि वे दोनों उसके मार्ग के लुटेरे हैं।
यह श्लोक पिछले श्लोक का दूसरा आधा है, और इसके बिना पहला आधा निराशा बन जाता। श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती दोनों यही आशंका उठाते हैं कि अगर सब प्राणी अपनी प्रकृति से ही चलते हैं, तो फिर शास्त्र की विधि और निषेध का, यानी यह करो और यह मत करो का, क्या अर्थ रहा? और उत्तर इसी श्लोक में है। हमारी टीका इसे यूँ पकड़ती है कि प्रकृति धक्का देती है, पर राग और द्वेष के रास्ते से धक्का देती है। इसलिए जहाँ इन्द्रिय अपने विषय से मिलती है, वहीं इन दोनों पर नज़र रखना वह जगह है जहाँ प्रयत्न सचमुच काम करता है। यानी आप अपने पूरे स्वभाव से नहीं लड़ रहे। आप बस एक जगह पर पहरा दे रहे हैं, जहाँ से हर बार प्रवेश होता है।
शंकराचार्य और मधुसूदन सरस्वती इन्हें परिपन्थिनौ का अर्थ करते हुए लुटेरा कहते हैं, यानी वे जो रास्ते पर घात लगाकर बैठे हैं। लुटेरा राहगीर के सामने नहीं आता, वह मोड़ पर मिलता है। राग और द्वेष भी ऐसे ही हैं, वे भीतर के रास्ते पर हर इन्द्रिय के मोड़ पर बैठे हैं। आँख ने कुछ देखा, और उसी क्षण या तो "यह चाहिए" उठा या "यह नहीं चाहिए"। कान ने कुछ सुना, और वही। और उसके बाद जो हम करते हैं, वह इन दोनों में से किसी के आदेश पर होता है।
श्रीधर स्वामी इसे एक सुन्दर उपमा देते हैं। वे कहते हैं कि प्रकृति राग और द्वेष जगाकर असावधान आदमी को ऐसे बलपूर्वक खींच ले जाती है जैसे कोई गहरी धारा, और शास्त्र का काम यह है कि उससे पहले ही उसे भगवान के भजन जैसे कामों में लगा दे, जो राग-द्वेष को जड़ ही न पकड़ने दें। मधुसूदन सरस्वती एक और बात जोड़ते हैं। वे कहते हैं कि अगर आपको पता चल जाए कि जो भोजन सामने है, उसमें विष मिला है, तो वह कितना ही स्वादिष्ट दिखे, उसकी चाह उठती ही नहीं। यानी जानकारी राग को उसकी जड़ से काट सकती है। और संत ज्ञानेश्वर ने यही बात मछली के उदाहरण से कही है कि इन्द्रियों में जो काम बैठा है, वह सुख की आशा दिखाता है, जैसे चारा मछली को लुभाता है, पर उसके भीतर काँटा है जो प्राण ले जाता है, और मछली को वह काँटा इसलिए नहीं दिखता कि वह चारे के पीछे छिपा है।
सोचिए, रात के ग्यारह बजे आपके फ़ोन की घंटी बजती है और स्क्रीन पर एक ऐसा नाम चमकता है जिससे आपकी बहस चल रही है। उस एक क्षण में, देखने और उठाने के बीच, दो चीज़ें हो चुकी होती हैं: एक पुरानी चुभन ने सिर उठाया, और एक "अभी जवाब दे दूँ" ने। ठीक वहीं लुटेरा बैठा है। उसके बाद लिखा गया हर वाक्य उसी का दिया हुआ होता है। श्रीकृष्ण का कहना यह है कि वह क्षण पहचाना जा सकता है, और जो पहचाना जा सके, उस पर पहरा लगाया जा सकता है।
इससे पहले कि हम पैंतीसवें श्लोक में उतरें, आपसे एक छोटी-सी बात कहना चाहता हूँ। हम आज इस अध्याय के आख़िरी पड़ाव पर हैं, और यह वह जगह है जहाँ बहुत-से लोग सोचते हैं कि राग-द्वेष और इन्द्रियों की बातें तो बहुत सुनी हैं, इनमें नया क्या होगा। पर आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। जो यहीं उठ जाएगा, वह उस प्रश्न को नहीं सुन पाएगा जो अर्जुन आगे पूछने वाले हैं, और उस उत्तर को भी नहीं, जिसे सुनकर बहुत-से लोग कहते हैं कि यह तो मेरे ही मन की बात है। तो अगर आप ये सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की ये यात्रा बीच में न टूटे। और आज का हिस्सा आख़िर तक सुनिए।
अब पैंतीसवाँ श्लोक। श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्, स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः। भली-भाँति निभाए गए दूसरे के धर्म से गुण रहित अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारी है, दूसरे का धर्म भय देने वाला है।
यह श्लोक बिना किसी भूमिका के अचानक आ जाता है, और पहली बार सुनने पर लगता है कि बात कहाँ से कहाँ चली गई। पर थोड़ा पीछे देखें तो यह वही बात है जो अर्जुन के मन में पहले अध्याय से चल रही थी। हमारी टीका कहती है कि अर्जुन उस जीवन की ओर खिंच रहे थे जिसमें भिक्षा माँगकर जी लिया जाए, जो एक योद्धा का धर्म नहीं है। और श्लोक उनसे कहता है कि अपना भाग निभाना, चाहे वह कितना ही कमज़ोर क्यों न दिखे, ऐसी भूमिका उठा लेने से कहीं सुरक्षित है जो अपनी है ही नहीं। श्रीधर स्वामी इस सवाल को पकड़ते हैं कि अर्जुन सोच सकते थे, युद्ध तो दुःख देने वाला काम है और अहिंसा आसान है, और दोनों ही धर्म कहे जाते हैं, तो आसान वाला क्यों न चुन लें? श्लोक इसी का उत्तर है।
यहाँ "अपना" शब्द सबसे ज़रूरी है। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं कि स्वधर्म वह है जो जिसके लिए विहित है, जो उसके अपने स्थान के अनुसार उसके हिस्से आया है। और तिलक बड़ी व्यावहारिक बात कहते हैं कि जिस आदमी ने सारी ज़िन्दगी फ़ौज में बिताई हो, उसके लिए सिपाही का पेशा ही सुभीते का होगा, दर्ज़ी का नहीं। और कोई भी काम हो, उसमें कुछ न कुछ दोष निकाला जा सकता है, पर उसी नुक्ताचीनी के कारण अपना तय किया हुआ काम छोड़ बैठना धर्म नहीं है। संत ज्ञानेश्वर इसे दो चित्रों में रखते हैं। एक, दूसरों के सुन्दर महल देखकर अपने घर का छप्पर कौन तोड़ता है? दो, चीनी और दूध दोनों मीठे हैं, पर जिसके पेट में कृमि का दोष हो, उसके लिए ये ही हानिकारक हैं। वही चीज़ जो किसी और के लिए अमृत है, मेरे लिए बीमारी बन सकती है।
और इस श्लोक के लिए मुझे महाभारत की एक माँ याद आती है। छठे सत्संग में आपने सुना था कि कौरवों की सभा से लौटकर श्रीकृष्ण कुन्ती के पास गए, और कुन्ती ने युधिष्ठिर के लिए सन्देश भेजा कि तुम्हारे लिए भिक्षा मना है, तुम क्षत्रिय हो, भुजाओं के बल से जीने वाले। उसी सन्देश के बाद कुन्ती श्रीकृष्ण से कहती हैं कि इसी बात पर एक पुरानी कथा है, विदुला और उसके पुत्र की, और उसे युधिष्ठिर को ठीक-ठीक सुनाइएगा। यह उद्योग पर्व के एक सौ तैंतीसवें अध्याय के पहले और दूसरे श्लोक में है।
विदुला एक सुशील, दूर की सोचने वाली राजकुमारी थी, जिसकी बात राजसभाओं में सुनी जाती थी। उसका पुत्र सञ्जय सिन्धु के राजा से हार गया था और निराश पड़ा था। नाम सुनकर चौंकिए मत, यह वह सञ्जय नहीं जो धृतराष्ट्र को कथा सुना रहे हैं, बस नाम एक है। और माँ ने इसी नाम को लेकर उसे एक जगह टोका भी, कि नाम से तो तुम सञ्जय हो, यानी जीतने वाले, पर मुझे तुममें वह बात नहीं दिखती, अपने नाम जैसे बनो। पर उसकी पहली बात यह थी कि अपने को इतने थोड़े में मत पालो, डर को समेट लो, उठो। और फिर वह वाक्य कहा जो आज भी लोग उद्धृत करते हैं, कि पल भर जल लेना देर तक धुआँ देते रहने से अच्छा है। यह एक सौ तैंतीसवें अध्याय के चौदहवें और पन्द्रहवें श्लोक में है। उसने यह भी कहा, एक सौ चौंतीसवें अध्याय में, कि क्षत्रिय का हृदय सदा एक-सा रहता है, और अच्छे कुल का क्षत्रिय किसी दूसरे का अनुचर बनकर नहीं जीता। और एक बात जो मुझे इस कथा में सबसे ज़रूरी लगती है, एक सौ तैंतीसवें के सत्रहवें श्लोक में: पाए या न पाए, समझदार पछताता नहीं, वह बिना रुके अगला काम शुरू कर देता है।
पुत्र ने माँ के कठोर शब्दों पर कहा कि आपका हृदय लोहे का बना है, आप निर्दयी हैं। यह एक सौ पैंतीसवें अध्याय का पहला श्लोक है। और माँ ने आख़िर में, एक सौ छत्तीसवें अध्याय के सातवें श्लोक में, बताया कि मैंने यह सब तुम्हारी शक्ति परखने और तुम्हारा तेज जगाने के लिए कहा था। तब पुत्र ने कहा कि मुझे यह नाव खेनी है, क्योंकि आप मेरी मार्गदर्शक हैं, और यह भी माना कि मैं बीच-बीच में पलटकर जवाब इसलिए देता रहा कि आपकी और बातें सुन सकूँ। मैं माँ के हर शब्द को नहीं दोहरा रहा, कुछ बहुत कड़े हैं। मैं बस वह बात ले रहा हूँ जो श्लोक से मिलती है। माँ का डर यह नहीं था कि बेटा हार गया। उसका डर यह था कि हार के बाद वह किसी और की चापलूसी करके, किसी और के पीछे-पीछे चलकर जीने लगेगा, और इसीलिए उसने अनुचर बनने वाली वह बात कही थी। हारा हुआ, विगुण, अधूरा सञ्जय भी अपनी जगह पर उठकर खड़ा हो, यह उससे कहीं बेहतर है कि वह किसी और की छाया में आराम से बैठा रहे।
ध्यान दीजिए कि कथा हमें क्या नहीं कह रही। वह यह नहीं कह रही कि हर कोई युद्ध लड़े। वह कह रही है कि जो जगह आपके हिस्से आई है, वहाँ से भागकर किसी आसान, चमकती हुई जगह में छिप जाना उसका उत्तर नहीं, और पल भर का अधूरा सही काम भी उस सुरक्षित लगती निष्क्रियता से भारी है। विदुला के पुत्र को हार के बाद फिर वही भूमिका उठानी थी जिसमें वह हारा था। यही अर्जुन के सामने भी था।
आज के जीवन में इसे सुनिए। जो माँ कहती है कि काश मैं भी दफ़्तर में कुछ बड़ा करती, और जो आदमी दूसरों की छुट्टियों की तस्वीरें देखकर अपने घर के दिन को छोटा गिनने लगता है, वे दोनों दूसरे के चमकते हुए धर्म को देखकर अपने धर्म की कमियाँ गिन रहे हैं। श्रीकृष्ण नहीं कह रहे कि अपनी कमियाँ मत देखो। वे कह रहे हैं कि अपनी जगह पर, अधूरे ढंग से ही सही, खड़े रहना दूसरे की जगह पर पूरे ढंग से खड़े होने से बेहतर है, क्योंकि वहाँ आपकी जड़ें नहीं हैं, और "परधर्मो भयावहः" का यही अर्थ है: जहाँ जड़ें नहीं हैं, वहाँ डर है।
पर अभी एक बात बाकी है। अब तक श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि प्रकृति धक्का देती है, राग-द्वेष उसके रास्ते हैं, और अपना काम पकड़े रहना सुरक्षित है। इतना सुनकर अर्जुन के भीतर वह सवाल उठता है जो शायद आपके भीतर कई बार उठा होगा, और जिसे वे कुछ ऐसे शब्दों में पूछेंगे कि सुनने वाले को लगे कि यह तो मेरे बारे में पूछ रहा है।
अर्जुन उवाच
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः ।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥ ३६ ॥
श्रीभगवानुवाच
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥ ३७ ॥
छत्तीसवाँ श्लोक अर्जुन का है, और पूरे अध्याय में शायद यही एक ऐसा श्लोक है जिसमें हर पढ़ने वाला अपना चेहरा देख लेता है। अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः, अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः। हे वार्ष्णेय! तो फिर यह मनुष्य न चाहता हुआ भी, मानो बलपूर्वक लगाया गया, किससे प्रेरित होकर पाप करता है?
इस सवाल के तीन शब्द ध्यान से सुनिए। पहला, "अनिच्छन्नपि", यानी न चाहते हुए भी। अर्जुन उस पाप की बात नहीं कर रहे जो आदमी जानबूझकर, योजना बनाकर करता है। वे उस की बात कर रहे हैं जो चाहे बिना हो जाता है। दूसरा, "बलादिव", मानो ज़बरदस्ती से। और तीसरा, "नियोजितः", यानी किसी ने लगाया है। शंकराचार्य इसकी उपमा देते हैं कि जैसे राजा अपने सेवक को किसी काम में लगा देता है, वैसे कोई इस आदमी को लगा रहा है। और हमारी टीका की एक छोटी-सी टिप्पणी है कि "वार्ष्णेय" का अर्थ वृष्णि वंश में उत्पन्न, यानी श्रीकृष्ण का कुल। अर्जुन अपने मित्र को उसके कुल के नाम से पुकारते हैं, जैसे कोई बहुत अपना सवाल पूछने से पहले उसका हाथ पकड़ ले।
यह सवाल अभी क्यों उठा? श्रीधर स्वामी इसका कारण बताते हैं। वे कहते हैं कि श्रीकृष्ण ने अभी कहा था कि राग-द्वेष के वश में मत आना, और अर्जुन को यह कठिन लगा, क्योंकि उन्होंने देखा कि जो लोग विवेक के बल से काम और क्रोध को रोकते भी हैं, वे भी फिर पाप में गिरते दिखते हैं। इसलिए उन्हें लगा कि इन दोनों के पीछे शायद कोई और प्रेरक है। और मधुसूदन सरस्वती इसे और तीखा बनाते हैं। वे कहते हैं कि अर्जुन असल में यह पूछ रहे हैं कि पाप के जितने कारण गिनाए गए हैं, क्या वे सब बराबर के हैं, या कोई एक मुख्य है और बाकी उसके सहायक भर हैं? क्योंकि अगर सब बराबर हैं, तो हर एक से अलग-अलग लड़ना पड़ेगा, जो बहुत बड़ा परिश्रम है। और अगर एक ही मुख्य है, तो उसे हटाते ही काम पूरा हो जाएगा। आप देखिए कि यह कितना व्यावहारिक सवाल है। हमारे जीवन में बीस कमज़ोरियाँ दिखती हैं, पर क्या उन सबकी जड़ अलग-अलग है, या कहीं एक ही जड़ है?
संत ज्ञानेश्वर इस सवाल को बड़े सुन्दर ढंग से दोहराते हैं। वे अर्जुन के मुँह से कहलवाते हैं कि हे देव, ऐसा कैसे होता है कि ज्ञानी की स्थिति भी डिग जाती है? जो सब कुछ जानते हैं, वे भी भटकते क्यों दिखते हैं? जैसे आँख वाला आदमी भी बीज और भूसे का फ़र्क़ एक क्षण को न पहचाने, वैसे ही। जो लोग पाप से अपने को बचाते हैं, उन्हें भी ज़बरदस्ती उसी में घसीट लिया जाता है। और जिनसे वे जान बचाकर भागते हैं, वही उनसे चिपक जाते हैं। फिर अर्जुन पूछते हैं कि ऐसी ज़बरदस्ती किसकी है, यह बताइए।
महाभारत में इस सवाल का एक ऐसा रूप है जो आज भी सीने में चुभता है। उद्योग पर्व के एक सौ चालीसवें अध्याय में श्रीकृष्ण कर्ण को अपने रथ पर चढ़ाकर नगर से बाहर ले जाते हैं। वहाँ वे उन्हें बताते हैं कि तुम वेद और धर्मशास्त्र जानने वाले हो, और शास्त्र के नियम से, कुँवारी कन्या से जन्मा पुत्र उसी का माना जाता है जो उससे विवाह करे, इसलिए तुम धर्म से पाण्डु के पुत्र हो और कुन्ती के पुत्रों में सबसे बड़े। श्रीकृष्ण कहते हैं कि मेरे साथ चलो। पाँचों पाण्डव तुम्हारे चरण पकड़ेंगे, तुम्हारा अभिषेक होगा, युधिष्ठिर तुम्हारे पीछे सफ़ेद चँवर लेकर बैठेंगे, भीम छत्र पकड़ेंगे, और अर्जुन तुम्हारा रथ चलाएँगे। सोचिए कि यह किसी भी आदमी के सामने रखा जा सकने वाला सबसे बड़ा प्रस्ताव है।
और अगले अध्याय में कर्ण का उत्तर आता है, जो मुझे हर बार पढ़कर बहुत गम्भीर कर देता है। उन्होंने कहा, "मैं यह सब जानता हूँ।" उन्होंने कहा कि आप मित्रता से यह कह रहे हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं, और धर्म के अनुसार मैं पाण्डु का पुत्र हूँ, यह भी मैं जानता हूँ। यह एक सौ इकतालीसवें अध्याय का दूसरा श्लोक है। फिर उन्होंने अपनी कहानी कही कि कुन्ती ने मुझे जन्म लेते ही त्याग दिया, सारथि अधिरथ मुझे घर ले आया, राधा ने मुझे दूध पिलाया और पाला, अधिरथ के ही प्रबन्ध से मेरा विवाह हुआ, और मेरे पुत्र-पौत्र हुए। और फिर कहा कि हे गोविन्द, न पूरी पृथ्वी के लिए, न सोने के ढेरों के लिए, न खुशी से और न डर से मैं वह नाता झूठा करने का साहस कर सकता हूँ। तेरह वर्ष मैंने दुर्योधन के आश्रय में बिना किसी काँटे के राज्य भोगा है, और उसने मुझ पर भरोसा करके ही पाण्डवों से यह झगड़ा ठाना है। यह बारहवें से सत्रहवें श्लोक तक है।
मैं कर्ण को आज के श्लोक का नमूना नहीं बना रहा, क्योंकि उनके अपने कारण थे, कृतज्ञता थी, वचन था। पर उन्हीं की इसी बातचीत में एक वाक्य और है, जो सुनकर लगता है कि अर्जुन का सवाल कितना पुराना है। उन्होंने कहा, "हे कृष्ण, मैंने धृतराष्ट्र के पुत्र को प्रसन्न करने के लिए पहले पाण्डवों से कड़वी बातें कहीं। उस बुरे काम से मैं सचमुच पछतावे से जलता हूँ।" यह पैंतालीसवाँ श्लोक है। देखिए, जानने वाला आदमी है। जो उसने किया, उसे वह बुरा काम कहता है। और फिर भी जल रहा है। जानने और चलने के बीच की यह खाई ही अर्जुन का सवाल है।
अब श्रीकृष्ण का उत्तर, जो कोई भूमिका नहीं बाँधता। काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः, महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्। रजोगुण से उत्पन्न यह काम ही क्रोध है। यह बहुत खाने वाला और महापापी है। इसे ही यहाँ शत्रु जानो।
इस उत्तर में पहली बात जो मुझे बहुत बड़ी लगती है, वह यह है कि जिन दो नामों को श्रीकृष्ण शत्रु बता रहे हैं, उन्हें हम पहले सुन चुके हैं। "काम" और "क्रोध" दोनों हम पिछले अध्याय में मिल चुके हैं। दूसरे अध्याय के बासठवें और तिरसठवें श्लोक में गुस्से की जो कड़ी थी, जिसे हमने आठवें सत्संग में सुना था, उसमें कामना के रुकने से क्रोध पैदा होता है। वही बात यहाँ एक कदम पीछे जाकर कही जा रही है। वहाँ कड़ी दिखाई गई थी, यहाँ उसका सिरा पकड़ा जा रहा है, और उसे नाम दिया जा रहा है: शत्रु।
"काम एष, क्रोध एष", यानी यही काम है, यही क्रोध है। हमारी टीका कहती है कि काम और क्रोध एक ही शक्ति हैं, दो नहीं। रुका हुआ काम ही क्रोध बन जाता है। श्रीधर स्वामी कहते हैं कि क्रोध को अर्जुन ने पहले अलग गिना था, पर वह अलग नहीं, वह काम ही है जो किसी से टकराकर क्रोध के रूप में बदल गया। अभिनवगुप्त "एष" शब्द के दोहराव पर रुकते हैं और कहते हैं कि इन दो शब्दों से पता चलता है कि दोनों में कोई दूरी नहीं, वे एक-दूसरे के बिना रहते ही नहीं। मध्वाचार्य इससे भी आगे जाते हैं और कहते हैं कि कामना के बिना क्रोध पैदा ही नहीं होता, और जहाँ गुरु की निन्दा पर भी क्रोध आता है, वहाँ भी भीतर कोई कामना, कोई प्रियता छिपी है। इसे अपने जीवन में परखिए। अगली बार जब आप किसी पर गुस्सा हों, तो उसी क्षण रुककर पूछिए कि मुझे इस वक़्त क्या चाहिए था जो नहीं मिला? समय पर पहुँचना, इज़्ज़त, किसी का जवाब, आराम, तारीफ़। ज़्यादातर बार आपको क्रोध के नीचे कोई एक छोटी-सी माँग बैठी मिलेगी।
फिर "रजोगुणसमुद्भवः"। रजोगुण वह है जो भीतर की बेचैनी को चलाता है, जो कहता है कि कुछ और चाहिए, कुछ और करो। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं कि कामना रजोगुण से पैदा होती है, और पैदा होकर आदमी को वापस रजोगुण के काम में, यानी दुःख वाली दौड़ में धकेल देती है। शंकराचार्य कहते हैं कि दुखी लोगों का यह विलाप सुना जाता है कि इस तृष्णा ने ही मुझसे यह सब करवाया। और श्रीधर स्वामी एक बहुत सुन्दर बात निकालते हैं कि जब सत्त्व बढ़ने से रजोगुण क्षीण होता है, तब काम भी क्षीण होता है। यानी शत्रु की भोजनशाला बन्द की जा सकती है।
फिर महाशनो महापाप्मा। मधुसूदन सरस्वती और नीलकण्ठ दोनों यहाँ एक बहुत बारीक बात खोलते हैं। वे कहते हैं कि शत्रु को जीतने के चार उपाय हैं: साम, यानी समझाना, दान, यानी कुछ देकर मनाना, भेद, यानी फूट डालना, और दण्ड। तो अर्जुन यह पूछ सकते हैं कि क्या इस काम को कुछ देकर मना नहीं सकते? श्रीकृष्ण "महाशनो" शब्द से इसका उत्तर देते हैं। जो बहुत खाता है, उसे कितना भी दो, वह तृप्त नहीं होता। इसलिए दान से यह नहीं सधता। और "महापाप्मा", अत्यन्त उग्र, इसलिए समझाने से भी नहीं सधता। तब बचा केवल दण्ड, यानी उसका सामना। मुझे यह बात बहुत सच्ची लगती है। जो आदमी हर इच्छा पूरी करके अपनी इच्छाओं को मना लेना चाहता है, उसे बहुत जल्द पता चल जाता है कि हर पूरी की हुई इच्छा अगली इच्छा का रास्ता खोल जाती है। इस बात को हम अगले खंड में एक राजा की कथा से देखेंगे।
और अब थोड़ी देर पहले वाली विश्वामित्र की कथा को इस श्लोक के साथ रखकर देखिए। मेनका को इन्द्र ने भेजा था, फिर भी शत्रु इन्द्र नहीं था। इन्द्र और मेनका ने बस दरवाज़ा खटखटाया, और दरवाज़ा भीतर से खुला। पाठ ख़ुद कहता है कि ऋषि ने काम और क्रोध को जीता नहीं था। श्रीकृष्ण यहाँ कहते हैं, विद्ध्येनमिह वैरिणम्, यानी इसे यहीं का शत्रु जानो, इसी देह और इसी संसार में। शंकराचार्य और मधुसूदन सरस्वती दोनों इस "यहीं" का अर्थ संसार करते हैं। यह कोई बाहर से आया हुआ दुश्मन नहीं है। यह वह है जिसे हमने अपने भीतर मित्र की तरह बसा रखा है।
तो अब आपके पहले सवाल का उत्तर साफ़ होने लगा है। मैं ऐसा चाहता तो नहीं था, फिर क्यों हो गया? क्योंकि चाह बहुत गहरी थी, इतनी पुरानी और इतनी चुप कि "मैं" को पता ही नहीं चला। या फिर वह चाह के रुकने का क्रोध था। और इस शत्रु का नाम जान लेना ही सबसे बड़ी जीत की शुरुआत है, क्योंकि जब तक नाम पता नहीं होता, आदमी अपने ऊपर ही नाराज़ होता रहता है।
पर अभी एक बात बाकी है। इस शत्रु का नाम तो मिल गया, पर यह हमें कैसे हराता है? श्रीकृष्ण अब तीन तस्वीरें देंगे, तीन सरल, रोज़ की चीज़ें, और हर तस्वीर शत्रु के अलग दाँव को दिखाती है। और उनमें से तीसरी तस्वीर को सुनकर शायद आपको अपने कुछ भारी दिन याद आ जाएँ।
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च ।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥ ३८ ॥
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ।
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥ ३९ ॥
अड़तीसवाँ श्लोक तीन तस्वीरें देता है। धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च, यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्। जैसे धुएँ से अग्नि और मैल से दर्पण ढका जाता है, और जैसे जेर से गर्भ ढका रहता है, वैसे ही उस काम से यह ज्ञान ढका है।
पहले श्लोक का आख़िरी पद पकड़ लीजिए, तेनेदमावृतम्, जिसका अर्थ है, उससे यह ढका हुआ है। ज्ञान नष्ट नहीं हुआ, ढका है। आग बुझी नहीं, दर्पण टूटा नहीं, गर्भ मरा नहीं। हमारी टीका इन तीनों को ढकने के तीन स्तर बताती है। धुआँ अग्नि को थोड़ा ढकता है और उड़ जाता है। दर्पण की मैल पोंछनी पड़ती है। और गर्भ जन्म तक ढका ही रहता है। मधुसूदन सरस्वती इसे और खोलते हैं। वे कहते हैं कि ये तीन तस्वीरें काम की तीन अवस्थाएँ हैं। पहली में काम सूक्ष्म है, बस उठा है, जैसे धुआँ, और धुएँ में लिपटी आग तब भी जलाती है, यानी आदमी अभी काफ़ी समझ रहा होता है। दूसरी में वह किसी चीज़ के बारे में सोचते-सोचते गाढ़ा हो गया है, जैसे दर्पण पर जमी मैल, और अब दर्पण में चेहरा तो नहीं दिखता, पर दर्पण को दर्पण की तरह पहचाना जा सकता है। तीसरी में भोगते-भोगते वह इतना बढ़ गया है कि गर्भ की तरह चारों ओर से घेर लेता है, और भीतर का प्राणी न हाथ-पैर चला पाता है, न बाहर से दिखता है।
इन्हें अपने दिनों से जोड़कर देखिए। पहले दर्जे में आप किसी बात पर हल्के से खिंचे हैं और अब भी कह सकते हैं कि नहीं, यह ठीक नहीं। रसोई में धुआँ उठा है, पर आग अभी भी दिखती है। दूसरे दर्जे में आप उसी बात को बार-बार सोच चुके हैं, और सही-ग़लत का अन्दाज़ा धुँधला हो गया है, जैसे नहाने के बाद का शीशा, जिस पर भाप जमी है। उसे पोंछना पड़ेगा, यानी कोई मेहनत, कोई ठहराव, कोई भला दोस्त। और तीसरे दर्जे में आप इतने गहरे गुस्से या नशे या लालसा में हैं कि कोई कुछ भी कहे, कुछ पहुँचता ही नहीं। और यहीं इस श्लोक की सबसे बड़ी करुणा है। तीनों हालतों में आपके भीतर का ज्ञान वहीं मौजूद है। नीचे दबा है, मरा नहीं।
इसका सबसे कठिन उदाहरण स्वयं अर्जुन हैं, और उसे आपने पिछले सत्संग में सुना था। अश्वमेधिक पर्व के सत्रहवें अध्याय में, युद्ध के बाद, वे श्रीकृष्ण से कहते हैं कि जो आपने पहले मित्रता से कहा था, वह मुझ विचलित मन वाले का नष्ट हो गया। उस बातचीत को मैं दोबारा नहीं सुनाऊँगा, बस इतना जोड़ूँगा कि अर्जुन ने "नष्ट" कहा, और श्लोक "ढका" कहता है। जिसने गीता सीधे श्रीकृष्ण के मुँह से सुनी, उसका ज्ञान भी ढक सकता है। तो हमारा-आपका ढक जाना कोई अपराध नहीं है, वह होने वाली बात है, जिसके लिए उपाय बताया जा रहा है।
संत ज्ञानेश्वर दो चित्र और देते हैं। एक, चन्दन के पेड़ की जड़ को साँप लपेटे रहते हैं, पर इससे चन्दन चन्दन होना नहीं छोड़ता। दो, धान का बीज भूसी में लिपटा रहता है, और भूसी में लिपटा बीज ही उगता है। वे कहते हैं कि हमने ज्ञान को अकेला कभी देखा ही नहीं, वह इस शत्रु के साथ ही लिपटा मिलता है, इसलिए पहले इसे जीतो, फिर ज्ञान पाओ।
उनतालीसवाँ श्लोक। आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा, कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च। हे कुन्तीपुत्र! ज्ञानियों के इस नित्य शत्रु, कामरूप और कभी पूरी न होने वाली अग्नि से ज्ञान ढका हुआ है।
"ज्ञानिनो नित्यवैरिणा", ज्ञानी का सदा का शत्रु। यहाँ शंकराचार्य और मधुसूदन सरस्वती एक बहुत गहरी बात कहते हैं। वे कहते हैं कि ज्ञानी इसे शुरू में ही शत्रु पहचान लेता है, जबकि अज्ञानी इसे तृष्णा के समय मित्र की तरह देखता है, और जब दुःख आता है तभी समझता है कि इसी ने मुझे दुखी किया। हमारी टीका भी यही कहती है कि अज्ञानी विषयों के पीछे भागते हुए इसे मित्र मानता है और दुःख पाने पर ही समझता है। यानी फ़र्क़ यह नहीं कि ज्ञानी पर यह हमला नहीं करता। फ़र्क़ इतना है कि ज्ञानी इसका चेहरा पहले पहचान लेता है।
फिर "दुष्पूरेणानलेन", जिसे कभी पूरा न किया जा सके, ऐसी आग। श्रीधर स्वामी कहते हैं कि विषयों से भरते जाओ तब भी यह भरता नहीं, और न भरो तो शोक और सन्ताप बनकर जलाता है। मधुसूदन सरस्वती और नीलकण्ठ दोनों यहाँ वही प्रसिद्ध श्लोक रखते हैं, जो मनु का कहा जाता है: न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति, हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते। कामनाएँ उन्हें भोगने से कभी शान्त नहीं होतीं, जैसे घी डालने पर आग और भड़क उठती है।
और यही श्लोक महाभारत में एक राजा के मुँह से आया है, जिसने इसे हज़ार वर्ष जीकर सीखा। आदि पर्व में ययाति की कथा है। शुक्राचार्य के क्रोध से ययाति तुरन्त बूढ़े हो गए। उन्होंने कहा कि देवयानी के साथ मैं अभी जवानी से तृप्त नहीं हुआ हूँ, कृपा करें। और शुक्र ने इतनी छूट दी कि जो पुत्र अपनी जवानी दे, वह उनका बुढ़ापा ले ले, और वही राजा बने। यह आदि पर्व के सतहत्तरवें अध्याय में है। बड़े चार पुत्रों ने मना कर दिया। सबसे छोटे पूरु ने कहा कि बड़ों की बात मनुष्य के लिए पवित्र होती है, और पिता की जवानी माँगने पर पिता का बुढ़ापा ले लिया। यह अठहत्तरवाँ अध्याय है।
अब हज़ार वर्ष बीते। आदि पर्व के उन्यासीवें अध्याय में कथा का अन्त है। ययाति ने ये हज़ार वर्ष धर्म के विरुद्ध गए बिना, यज्ञ, दान और प्रजा की रक्षा करते हुए जिए। ध्यान दीजिए, उन्होंने कुछ बुरा नहीं किया। फिर भी पाठ कहता है कि अच्छे भोग पाकर वह राजा तृप्त भी हुआ और थक भी गया। और तब उन्होंने पूरु से कहा: न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति। भोगों को भोगने से कामना कभी शान्त नहीं होती। पृथ्वी पर जितना अन्न, सोना, पशु और स्त्रियाँ हैं, वे सब एक व्यक्ति के लिए भी काफ़ी नहीं, इसलिए तृष्णा छोड़ देनी चाहिए। और फिर वह वाक्य जो मुझे सबसे भारी लगता है: मूर्खों से तृष्णा छोड़ी नहीं जाती, मनुष्य बूढ़ा हो जाता है पर तृष्णा बूढ़ी नहीं होती, वह प्राण जाने तक का रोग है। और, पूरे हज़ार वर्ष मेरा मन सुखों में लगा रहा, फिर भी हर दिन इनके लिए मुझमें तृष्णा पैदा होती है। यह बारहवें से पन्द्रहवें श्लोक तक है।
ययाति ने जवानी लौटा दी, राज्य पूरु को दे दिया, और पत्नियों सहित वन में तप करने चले गए। इस कथा का सबक यह नहीं कि सुख बुरा है। राजा ने धर्म के भीतर रहकर सुख लिया था। सबक यह है कि इस आग का स्वभाव ही नहीं कि कभी कहे, बस, अब बहुत। आप नई गाड़ी लेते हैं और कुछ महीने बाद उसकी चमक वही नहीं रहती। वेतन बढ़ता है और खर्च उससे थोड़ा आगे चलने लगता है। और बहुत कम लोग किसी दिन सचमुच यह कह पाते हैं कि बस, अब मेरे पास जितना है, काफ़ी है। और श्रीकृष्ण यही अर्जुन से कह रहे हैं कि इस शत्रु को खिलाकर मत जीतो। उसे जीतने का दूसरा रास्ता है।
पर अभी एक बात बाकी है। शत्रु का नाम पता है, उसका स्वभाव भी, और उसकी चाल भी। अब सवाल है कि वह रहता कहाँ है? क्योंकि जिस शत्रु का ठिकाना पता चल जाए, उससे लड़ने की जगह मिल जाती है। और श्रीकृष्ण अगले ही श्लोक में उसके तीन ठिकाने बताते हैं, जिनमें से एक आपको चौंका सकता है।
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ॥ ४० ॥
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥ ४१ ॥
चालीसवाँ श्लोक शत्रु का पता बताता है। इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते, एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्। इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इसके वासस्थान कहे जाते हैं। यह इनके द्वारा ज्ञान को ढककर देहधारी को मोहित करता है।
हमारी टीका इस श्लोक पर एक ही वाक्य कहती है, और वह काफ़ी है: शत्रु के ठिकाने बता देने से पता चलता है कि उससे कहाँ लड़ना है। मधुसूदन सरस्वती और मध्वाचार्य भी यही बात कहते हैं कि जब शत्रु का ठिकाना हाथ में आ जाता है, तब शत्रु का नाश आसान हो जाता है। नीलकण्ठ इसके लिए बड़ी ठीक उपमा देते हैं। वे कहते हैं कि जैसे किसी सामन्त के पास पहाड़ी किले होते हैं, और राजा किलों को अपने हाथ में लेकर उस सामन्त को हरा देता है, वैसे ही इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि काम के किले हैं। किला हाथ में आ जाए, तो सामन्त के पास रहने की जगह नहीं बचती।
और यह शत्रु इन तीन ठिकानों में कैसे काम करता है, यह अभिनवगुप्त और श्रीधर स्वामी अपने-अपने ढंग से समझाते हैं। पहले इन्द्रिय का काम होता है, कुछ देखा या सुना, और वहीं क्रोध या चाह उठी। फिर मन उसे संकल्प बना देता है, यानी उसके बारे में सोचने-सँजोने लगता है। फिर बुद्धि उस पर निश्चय की मुहर लगा देती है कि हाँ, यही करना है। और इसी रास्ते से ज्ञान ढकता चला जाता है। आप इसे फ़ोन से समझिए। आँख ने किसी की तस्वीर देखी, और जी में कुछ हिला। मन ने उसके चारों ओर कहानी बुनी, कि उसके पास यह है और मेरे पास नहीं। और फिर बुद्धि ने ऐसे तर्क सजा दिए कि मैं कुछ ग़लत तो नहीं कर रहा, मैं तो बस देख रहा हूँ। ध्यान दीजिए कि सबसे अन्तिम किला सबसे चतुर है। बुद्धि सबसे अच्छी वकील है, और वह जो मुक़दमा दे दो, उसे जीत ही देती है।
और यही क्रम महाभारत ने विश्वामित्र के दृश्य में बिना किसी टीका के लिख दिया है, जिसे हमने आज पहले सुना था। आदि पर्व के तिरानवें अध्याय को क्रम से पढ़िए। पहले आँख: हवा ने मेनका का वस्त्र उड़ाया और ऋषि ने उसे देखा, यह पाँचवें और छठे श्लोक में है। फिर मन: सातवें श्लोक में लिखा है कि वे काम के वश में पड़ गए और उन्होंने उसके साथ मिलन में मन लगाया। फिर निश्चय: आठवें श्लोक में उन्होंने उसे पास बुला लिया। और उसके बाद हज़ारों वर्षों का एक दिन जैसा बीत जाना, यानी ज्ञान का पूरी तरह ढक जाना। तीनों किले एक के बाद एक गिरे। जिस किसी ने उस ऋषि के बारे में सुना, उसे यही लगा होगा कि कितना बड़ा तप था और कितनी जल्दी सब हो गया। असल में जल्दी नहीं हुआ था। पाठ पहले ही बता चुका था कि उन्होंने काम और क्रोध को जीता नहीं था, यानी शत्रु तप के भीतर ही चुपचाप अपने किलों में बैठा रहा।
इकतालीसवाँ श्लोक। तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ, पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्। इसलिए हे भरतश्रेष्ठ! तुम पहले इन्द्रियों को वश में करके ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले इस पापी को अवश्य मार डालो।
इन्द्रियाण्यादौ, यानी इन्द्रियों को पहले। मधुसूदन सरस्वती इसका अर्थ करते हैं कि मोह के आने से पहले, काम के घेर लेने से पहले। और इन्द्रियों से ही क्यों शुरू करें? वे कहते हैं कि इन्द्रियाँ वश में आ जाएँ तो मन और बुद्धि भी वश में आ जाते हैं, क्योंकि संकल्प और निश्चय बाहरी इन्द्रियों के रास्ते से ही हानि करते हैं। मतलब बाहर का दरवाज़ा सबसे पहले सँभालिए, अन्दर के कमरों में अपने आप शान्ति आती है। श्लोक के अन्त में ज्ञान और विज्ञान दो शब्द आते हैं। हमारी टीका कहती है कि ज्ञान वह है जो शास्त्र और गुरु से मिलता है, और विज्ञान वही सत्य अपने अनुभव में जानना है। काम दोनों को रोकता है। यानी वह केवल सुनी हुई बात को नहीं ढकता, अनुभव की बात को भी ढक लेता है।
लेकिन ध्यान रखिए कि "नियम्य" का अर्थ मार डालना नहीं है, लगाम लगाना है। तैंतीसवें श्लोक में हम सुन चुके थे कि हठ नहीं चलता। तिलक इसी को आगे खोलते हैं और कहते हैं कि इन्द्रियों पर अपनी सत्ता होनी चाहिए, वे अपने काबू में रहें, बस यहाँ इतना ही निग्रह चाहा गया है। वृत्तियों को ज़बरदस्ती मार देना नहीं चाहा गया। और जिस अलर्क की कथा हम अगले खंड में सुनेंगे, वह यही दिखाएगी कि इन्द्रियों पर बाण चलाने से बात नहीं बनती, एकाग्र होने से बनती है।
इसे एक बहुत पुराने चित्र से समझिए, जिसे लोग उपनिषदों से जोड़ते हैं: शरीर रथ है, आप उसे चलाने वाले हैं, और इन्द्रियाँ घोड़े। "नियम्य" का भाव ठीक यही है। सारथी घोड़ों को मारता नहीं, उन्हें चलाता है। लगाम कसी हुई नहीं, सधी हुई होती है। इसलिए सुबह की पहली घंटी पर ध्यान दीजिए, पहले निवाले पर, पहली सूचना पर, पहले तीखे वाक्य पर। इन्द्रियाण्यादौ का मतलब यही है: जब तक बस धुआँ उठा है, उसी समय, दर्पण पर मैल जमने से पहले।
पर अभी एक बात बाकी है। ठिकाने तीन हैं: इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि। और जब तीनों में शत्रु बैठा है, तो एक सवाल बचता है जो मुझे पूरे अध्याय का सबसे बड़ा सवाल लगता है: मैं कहाँ खड़ा हूँ? अगर मेरी इन्द्रियाँ, मेरा मन और मेरी बुद्धि तीनों उसके किले हैं, तो वह कौन है जो इन सबको देख रहा है, और जिसे इस शत्रु से लड़ना है? अगला श्लोक इसी का उत्तर एक सीढ़ी की तरह देता है।
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥ ४२ ॥
एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥ ४३ ॥
बयालीसवाँ श्लोक सीढ़ी की तरह है। इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः, मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः। इन्द्रियों को श्रेष्ठ कहते हैं, इन्द्रियों से श्रेष्ठ मन है, मन से श्रेष्ठ बुद्धि है, और जो बुद्धि से भी परे है, वह आत्मा है।
परं, परा और परतस्तु जैसे पदों का अर्थ यहाँ ऊँचा नहीं, भीतर का और सूक्ष्म है। शंकराचार्य कहते हैं कि इन्द्रियाँ स्थूल, बाहरी देह की तुलना में सूक्ष्म और भीतर की हैं, इसलिए श्रेष्ठ कही गईं। उनसे भीतर संकल्प-विकल्प वाला मन है। उससे भीतर निश्चय करने वाली बुद्धि है। और जो इन सबको देख रहा है, वह बुद्धि का भी साक्षी है। श्रीधर स्वामी यही कहते हैं कि वह सब के भीतर है और सबको देखने वाला आत्मा है। तिलक बताते हैं कि यह श्लोक कठोपनिषद् का है, और मधुसूदन सरस्वती उसी श्रुति को सामने रखते हैं। हमारी टीका का वाक्य है कि हर स्तर पिछले से सूक्ष्म और भीतरी है, और आत्मा इन सबसे परे है।
अब इसे अपने पहले सवाल से जोड़िए। मन मेरी बात क्यों नहीं मानता? इस सीढ़ी के हिसाब से उत्तर यह निकलता है कि मन आपसे नीचे की सीढ़ी पर है। आप मन के भीतर नहीं हैं, आप मन के पीछे खड़े हैं। पर हम सबने अपने को मन से इतना मिला लिया है कि जब मन भागता है, तो लगता है कि मैं भाग रहा हूँ। अभिनवगुप्त यही बात एक प्रश्न बनाकर पूछते हैं कि जब क्रोध इन्द्रिय के पास पैदा हुआ, तो मन, बुद्धि या आत्मा का उससे क्षुब्ध होना कैसे ठहरेगा? कभी रात को जब नींद नहीं आती और मन एक के बाद एक चिन्ता दोहराता चला जाता है, तब यह भी अनुभव होता है कि कोई है जो देख रहा है कि मन भाग रहा है। वही देखने वाला इस श्लोक का "सः" है। और जो देख सकता है कि मन भाग रहा है, वह मन से बड़ा है।
और अब तैंतालीसवाँ श्लोक, जिसके साथ अध्याय पूरा होता है। एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना, जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्। इस प्रकार बुद्धि से परे आत्मा को जानकर और बुद्धि द्वारा मन को स्थिर करके, हे महाबाहु! इस कठिनता से जीते जाने वाले कामरूप शत्रु को मार डालो।
"आत्मा से आत्मा को थामकर", हमारी टीका इसका अर्थ यह बताती है कि बुद्धि से मन को स्थिर रखना। शंकराचार्य कहते हैं कि अपने संस्कारित मन से अपने को सम्यक् थामो। और "दुरासदम्" का अर्थ वे यह करते हैं कि इसे पाना कठिन है, इसके अनेक रूप हैं, और ठीक से जानना कठिन है। यानी श्रीकृष्ण अर्जुन से यह नहीं कह रहे कि यह आसान है। वे कह रहे हैं कि कठिन है, पर तुम महाबाहु हो। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं कि महाबाहु के लिए शत्रु को मारना सुगम है, इसीलिए यह सम्बोधन उचित है। हमारी टीका की अन्तिम पंक्ति मुझे बहुत सुन्दर लगती है कि अध्याय जहाँ से आरम्भ हुआ, वहीं युद्ध पर समाप्त होता है, पर अब रणभूमि भीतर है।
और इस भीतर के युद्ध की एक कथा महाभारत में है, जो इस पूरे अध्याय को एक तस्वीर में रख देती है। अश्वमेधिक पर्व के इकतीसवें अध्याय में पितर परशुराम को अलर्क नाम के राजर्षि की कथा सुनाते हैं। अलर्क ने धनुष से समुद्र तक पृथ्वी जीती थी। फिर वे एक बहुत बड़ा राज्य छोड़कर पेड़ के नीचे बैठे और सोचा कि मेरा बल मन से उपजा है, और मन को जीतकर विजय निश्चित है, इसलिए जो मन सब मनुष्यों को चंचलता से कर्म में दौड़ाता है, उस पर मैं तीखे बाण चलाऊँगा। यह चौथे से छठे श्लोक में है। और मन ने उत्तर दिया: हे अलर्क, ये बाण मुझ तक नहीं पहुँचेंगे। ये तुम्हारे ही मर्मस्थान छेदेंगे। दूसरे बाण खोजो।
फिर अलर्क ने नाक पर बाण चलाने की सोची, क्योंकि वह गन्धों के लिए ललचाती है। फिर जीभ पर, रसों के लिए। फिर त्वचा पर, स्पर्शों के लिए। फिर कान पर, शब्दों के लिए। फिर आँख पर, रूपों के लिए। फिर बुद्धि पर, अनेक निश्चयों के लिए। और हर एक ने वही उत्तर दिया कि ये बाण तुम्हारे ही मर्म छेदेंगे। दूसरे बाण खोजो। तब अलर्क ने कठोर तप किया, पर इन सातों पर चलाने के लिए कोई बढ़कर बाण नहीं पाया। बहुत देर सोचकर उन्होंने योग से बढ़कर कोई श्रेय नहीं पाया। और मन को एकाग्र और स्थिर करके, योग में टिककर, उन्होंने एक ही बाण से इन्द्रियों को गिरा दिया। इसके बाद आत्मा में प्रवेश करके उन्होंने परम सिद्धि पाई, और चकित होकर गाथा गाई: हाय, कैसा कष्ट कि हमने सब कुछ बाहर किया, भोग की तृष्णा से भरकर पहले राज्य की सेवा की, अब मैंने जाना कि योग से बढ़कर कोई सुख नहीं। यह छब्बीसवें से तीसवें श्लोक तक है।
इस कथा को आज के श्लोकों के साथ रखकर देखिए। तैंतीसवें श्लोक में कहा था कि हठ क्या करेगा, और अलर्क के सारे बाण उसी हठ के बाण थे, जो लौटकर उन्हीं को बींधते। इकतालीसवें में कहा था कि इन्द्रियों को वश में करो, और बयालीस-तैंतालीस में कि बुद्धि से परे आत्मा को जानकर अपने को स्थिर करो। अलर्क ने वही किया, एकाग्र मन, योग में टिकना, और तब एक ही बाण काफ़ी हुआ।
तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।
पहली बात। न चाहते हुए भी कुछ कर बैठना आपके चरित्र की गवाही नहीं है। वह एक पहचाना हुआ शत्रु है, जिसका नाम काम है, और जिसका दूसरा रूप क्रोध है। इसलिए अगली बार अपने से पूछिए कि मैं ऐसा क्यों हूँ, इसकी जगह यह पूछिए कि इस क्षण कौन-सी चाह अटक गई है। नाम पता चल जाए तो आधा बोझ उतर जाता है, और बाकी आधा वही है जो आख़िरी दो श्लोक सिखाते हैं।
दूसरी बात। यह शत्रु अपने किलों में रहता है: इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि। इसलिए पहरा वहीं लगाइए, और पहली घड़ी में, यानी इन्द्रियाण्यादौ। पहले निवाले पर, पहली सूचना पर, पहले तीखे वाक्य पर। लगाम से चलाइए, तलवार से नहीं। जैसे अलर्क ने अन्त में पाया, योग से बढ़कर कोई सुख नहीं।
तीसरी बात। आप इन सबसे परे हैं। इस हफ़्ते एक बार, जब मन भागे, तो उसे रोकने की जगह बस इतना कहिए कि मन भाग रहा है, और देखिए कि कौन देख रहा है। वही देखने वाला मन से बड़ा है, और उसी की शरण में काम का ज़ोर घटता है।
अगली बार हम चौथे अध्याय में चलेंगे, जो हमारे कोष में भीष्म पर्व का अट्ठाईसवाँ अध्याय है। उसका पहला श्लोक एक ऐसे प्रश्न पर खुलता है जो यहाँ तक पहुँचकर सबके मन में उठता है कि यह योग आया कहाँ से? श्रीकृष्ण कहेंगे, इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्: मैंने यह अविनाशी योग विवस्वान् को, यानी सूर्य को, कहा था। उनसे यह मनु तक गया, और मनु से इक्ष्वाकु तक। यानी जो हमने तीन अध्यायों में सुना, वह कोई नई बात नहीं, वह एक बहुत पुरानी परम्परा की बात है। वह परम्परा कैसे चली, कैसे खो गई, और श्रीकृष्ण अर्जुन को यह फिर से क्यों दे रहे हैं, वह हम अगली बार सुनेंगे।
आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आज के दिन ऐसा कौन-सा एक क्षण था जब आप चाहकर भी अपने को रोक नहीं पाए, और उसके नीचे कौन-सी चाह बैठी थी? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।
जो मन से लड़कर हार गया, वह मन के पार खड़ा होना सीख ले, तो उसकी हार पहली बार जीत में बदलती है।
जय श्री कृष्ण।
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥ ४२ ॥
तीन बातें
- न चाहते हुए भी कुछ कर बैठना आपके चरित्र की गवाही नहीं है। वह एक पहचाना हुआ शत्रु है, जिसका नाम काम है, और जिसका दूसरा रूप क्रोध है। इसलिए अगली बार अपने से पूछिए कि मैं ऐसा क्यों हूँ, इसकी जगह यह पूछिए कि इस क्षण कौन-सी चाह अटक गई है। नाम पता चल जाए तो आधा बोझ उतर जाता है, और बाकी आधा वही है जो आख़िरी दो श्लोक सिखाते हैं।
- यह शत्रु अपने किलों में रहता है: इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि। इसलिए पहरा वहीं लगाइए, और पहली घड़ी में, यानी इन्द्रियाण्यादौ। पहले निवाले पर, पहली सूचना पर, पहले तीखे वाक्य पर। लगाम से चलाइए, तलवार से नहीं। जैसे अलर्क ने अन्त में पाया, योग से बढ़कर कोई सुख नहीं।
- आप इन सबसे परे हैं। इस हफ़्ते एक बार, जब मन भागे, तो उसे रोकने की जगह बस इतना कहिए कि मन भाग रहा है, और देखिए कि कौन देख रहा है। वही देखने वाला मन से बड़ा है, और उसी की शरण में काम का ज़ोर घटता है।