बड़े जो करते हैं, सब वही करते हैं
गीता 3.17–3.29 · 76 मिनट
घर और समाज के लिए हम क्या उदाहरण बनते हैं
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥ १७ ॥
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥ १८ ॥
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥ १९ ॥
आपने कभी किसी छोटे बच्चे को अकेले खेलते हुए सुना है? वह अपनी गुड़िया को डाँट रहा होता है, या अपने भालू को समझा रहा होता है, और आप चौंककर रुक जाते हैं, क्योंकि वही लहजा है, वही शब्द हैं, और वही हाथ हिलाने का ढंग भी, जो आपका अपना है। उस पल एक अजीब-सी बात समझ आती है कि हमें लगता था हम बच्चे को सिखा रहे हैं, और असल में वह हमें देख रहा था, हर दिन, हर बात पर।
आज का सत्संग इसी एक बात पर है। हम घर में, दफ़्तर में, मोहल्ले में जो कुछ करते हैं, उसे कोई न कोई देख रहा है, और देखकर सीख रहा है। तो सवाल यह नहीं है कि हम क्या कहते हैं। सवाल यह है कि हम क्या उदाहरण बनते हैं, क्योंकि बड़े जो करते हैं, सब वही करते हैं। और गीता के तीसरे अध्याय का यह हिस्सा इसी सवाल का उत्तर देता है, एक ऐसी बात कहकर जो पहली बार सुनने पर लगभग उलटी लगती है।
जय श्री कृष्ण।
आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का ग्यारहवाँ सत्संग है। पिछली बार हम तीसरे अध्याय के पहले सोलह श्लोक सुनकर रुके थे, और सोलहवें श्लोक में श्रीकृष्ण ने एक कठोर-सी बात कही थी कि जो इस चक्र को आगे नहीं चलाता, जो लेता है पर लौटाता कुछ नहीं, वह व्यर्थ जीता है। हमने तब तीन बातें घर के लिए ली थीं: कि काम छोड़ देने से कर्म नहीं छूटता, कि जो हमारे हिस्से आया है उसे अर्पण की तरह कीजिए, और कि हम एक चक्र की कड़ी हैं, अकेले ढोने वाले नहीं। और अंत में मैंने कहा था कि आज के श्लोकों में उन लोगों की बात होगी जिन्हें कुछ पाना शेष नहीं रहा, और फिर भी वे काम करते हैं। वही आज है।
एक बार उस राजा को भी याद कर लीजिए जिसके कानों तक यह सब पहुँच रहा है। संजय, जिन्हें व्यास ने दिव्य दृष्टि दी थी, भीष्म के गिरने के बाद धृतराष्ट्र को कुरुक्षेत्र की पूरी बात सुना रहे हैं, और गीता उसी कथन के भीतर है। धृतराष्ट्र जन्म से नेत्रहीन हैं। यह बात आज के श्लोकों में बहुत काम आएगी, क्योंकि आगे एक उपमा आने वाली है जिसमें एक अन्धे आदमी के साथ सड़क पर चलते हुए एक देखने वाले का चित्र है।
अब सत्रहवाँ श्लोक। यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः, आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते। परन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रमने वाला, आत्मा में ही तृप्त और आत्मा में ही सन्तुष्ट है, उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं रहता।
ध्यान दीजिए कि यहाँ तीन अलग-अलग बातें गिनाई गई हैं: रति, तृप्ति और संतोष। रति यानी जिसमें मन रमे, तृप्ति यानी जिससे पेट भर जाए, और संतोष यानी जिससे और कुछ चाहिए ही न। मधुसूदन सरस्वती हमें बताते हैं कि संसार के आदमी को ये तीनों बाहर से मिलती हैं: रति फूलों की माला, चन्दन और स्त्री के संग से, तृप्ति स्वादिष्ट भोजन और पेय से, और संतोष पशु, पुत्र और धन के मिल जाने से और रोग न होने से। रामानुजाचार्य इस सूची में बाग़, माला, चन्दन, गीत, बाजे और नृत्य गिनते हैं। और फिर वे कहते हैं कि इस श्लोक का आदमी वह है जिसकी ये तीनों चीज़ें भीतर से आती हैं। शंकराचार्य जोड़ते हैं कि सामान्य संतोष तो बाहर कुछ पा लेने से होता है, पर यह आदमी हर तरफ़ से प्यास-रहित है।
"मानव" शब्द पर भी मधुसूदन सरस्वती रुकते हैं। वे कहते हैं कि यहाँ कोई भी मनुष्य हो सकता है जो ऐसा हो गया, यह किसी ख़ास पद या जन्म की बात नहीं। और वे एक श्रुति का वाक्य याद दिलाते हैं कि जो आत्मा में खेलता है, आत्मा में रमता है, वह क्रियावान भी है, और ब्रह्म को जानने वालों में सबसे श्रेष्ठ कहा गया है। इसे दिमाग़ के किसी कोने में रख लीजिए: "क्रियावान भी।" आगे वाले श्लोक इसी शब्द को खोलेंगे।
हमारी टीका इसे इस तरह रखती है कि यह पिछले श्लोकों के नियम का एकमात्र अपवाद है। कर्तव्य दो कारणों से होता है, या तो कुछ पाने के लिए, या अपने को शुद्ध करने के लिए। जिसने आत्मा को जान लिया, उसे न कुछ पाना है, न कुछ शुद्ध करना है। श्रीधर स्वामी कहते हैं कि अब तक श्रीकृष्ण ने अज्ञानी के लिए मन शुद्ध करने वाला कर्मयोग कहा था, और अब ज्ञानी के लिए बताते हैं कि उसके लिए कर्म उपयोगी नहीं रहा।
अठारहवाँ श्लोक इसी बात को और खोलता है। नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन, न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः। उसका यहाँ न कुछ करने से कोई प्रयोजन है और न न करने से। और सब प्राणियों में किसी से भी उसका कोई स्वार्थ का सम्बन्ध नहीं है।
इसमें तीन "नहीं" हैं। करने से कुछ मिलता नहीं, न करने से कुछ बिगड़ता नहीं, और किसी से कुछ लेना-देना बाक़ी नहीं। श्रीधर स्वामी कहते हैं कि अहंकार न रहने से वह विधि और निषेध, यानी "यह करो, यह मत करो", दोनों के पार है, इसलिए करने से पुण्य नहीं और न करने से दोष नहीं। और वे एक शंका भी उठाते हैं कि कहीं देवता उसके रास्ते में बाधा न डालें, तो उत्तर में श्रुति का भाव रखते हैं कि देवता भी उसके कल्याण को रोक नहीं सकते, क्योंकि वह उनका भी आत्मा हो जाता है। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं कि जो नित्य है, बना-बनाया है, वह किए हुए कर्म से मिलता ही नहीं, और ज्ञानी के पास तो सब कुछ पहले से है।
संत ज्ञानेश्वर इसे रोज़ की एक बात से समझाते हैं। वे कहते हैं कि जब भूख मिट जाती है तो भोजन के साधन अपने आप छूट जाते हैं, जैसे खाना खा लेने के बाद चूल्हा और बर्तन अपना काम पूरा कर चुके होते हैं। उसी तरह जो आत्मा के संतोष से तृप्त हो गया, उसके लिए कर्म नहीं रहता। पर वे तुरंत जोड़ते हैं कि जब तक वह बोध मन में नहीं मिलता, तब तक हे अर्जुन, इन साधनों को अपनाना ही पड़ता है।
ऐसे आदमी की एक झलक महाभारत में है, और वह युद्ध के बाद की है। जब युधिष्ठिर शोक में डूबे राज्य छोड़ने की बात कर रहे होते हैं और भीम उन्हें टोकते हैं, तब शान्ति पर्व के सत्रहवें अध्याय में युधिष्ठिर उत्तर देते हुए बहुत पहले के जनक की एक गाथा याद करते हैं, जो मोक्ष को देखते हुए जनक ने गाई थी। गाथा यह है: "मेरा धन अनन्त है, पर मेरे पास कुछ भी नहीं; मिथिला के जल जाने पर भी मेरा कुछ नहीं जलता।" यह शान्ति पर्व के सत्रहवें अध्याय के अठारहवें और उन्नीसवें श्लोक में है। इसे सुनिए, और अपने आप से पूछिए कि जिसकी राजधानी जल जाए और जिसका कुछ न जले, वह आदमी कैसा होगा। यह वही आदमी है जिसका चित्र सत्रहवें और अठारहवें श्लोक ने खींचा है।
हम में से ज़्यादातर लोग उस ऊँचाई पर नहीं हैं, पर उसकी एक छोटी-सी झलक हमने कहीं न कहीं देखी है। कोई रिटायर हो चुके मास्टरजी, जिनके बच्चे अपने-अपने घर बसा चुके, जिन्हें न किसी तरक्की की चाह है न किसी तारीफ़ की, और जो फिर भी हर शाम मोहल्ले के दो-चार बच्चों को मुफ़्त में गणित पढ़ा देते हैं। उनसे पूछिए कि इसमें आपको क्या मिलता है, तो वे हँसकर कहेंगे कि कुछ नहीं, बस अच्छा लगता है। उनके लिए करने से कुछ मिलना बाक़ी नहीं, और न करने से कुछ बिगड़ता भी नहीं। फिर भी वे करते हैं। इस एक "फिर भी" को याद रखिए, क्योंकि आज का पूरा सत्संग इसी पर टिका है।
पर जनक की उस गाथा के साथ एक बात ध्यान देने की है। युधिष्ठिर ने यह गाथा राज्य छोड़ने के पक्ष में सुनाई थी। तो क्या यह चित्र यह कहता है कि ऐसा आदमी सब छोड़कर चला जाएगा? गीता का उत्तर इसके ठीक बाद आता है, और वह इतना सीधा है कि पहली बार सुनकर चौंकाता है।
उन्नीसवाँ श्लोक। तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर, असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः। इसलिए तुम सदा आसक्ति रहित होकर करने योग्य कर्म भली-भाँति करो, क्योंकि आसक्ति रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परम को प्राप्त करता है।
पूरा श्लोक एक छोटे-से शब्द "इसलिए" पर टिका है। हमारी टीका कहती है कि यह "इसलिए" पीछे की ओर इशारा करता है: अर्जुन अभी आत्मा में संतुष्ट वह पुरुष नहीं हैं। इसलिए उनके लिए परम की ओर जाने का रास्ता आसक्ति रहित कर्म से होकर जाता है, जो मन को शुद्ध करता है और ज्ञान तक पहुँचाता है। मधुसूदन सरस्वती यही कहते हैं कि तुम ऐसे ज्ञानी नहीं हो, तुम तो मोक्ष चाहने वाले हो जिसका अधिकार कर्म में है। और रामानुजाचार्य बताते हैं कि "सततं" यानी तब तक, जब तक आत्मा की प्राप्ति न हो जाए।
तिलक महाराज इस श्लोक पर बहुत सुन्दर बात कहते हैं। वे कहते हैं कि अगर ज्ञानी के लिए करना और न करना, दोनों बराबर हैं, तो न करने का ही इतना आग्रह क्यों? जो शास्त्र से अपने आप सामने आता जाए, उसे आग्रह छोड़कर कर लो और छुट्टी पा लो। "आग्रह छोड़कर कर लो।" मुझे इसमें बहुत हल्कापन लगता है। ज़्यादातर बोझ काम का नहीं होता, काम के बारे में हमारे आग्रह का होता है।
संत ज्ञानेश्वर इसे और सीधे कहते हैं कि इसलिए तुम सब कामना छोड़कर, जो तुम्हारे योग्य है, अपने कर्तव्य में लगे रहो, क्योंकि इसी राह पर चलकर बहुत लोग संसार में कैवल्य को पहुँचे हैं। यानी ऊँचाई की ओर जाने वाली पहली सीढ़ी आज की ज़िम्मेदारी ही है।
मैं जानता हूँ कि यहाँ कोई कहेगा कि मैं तो उस ऊँचाई पर नहीं हूँ, मुझे तो अभी बहुत कुछ पाना है, इसलिए उन्नीसवाँ श्लोक तो मेरे लिए ठीक है। पर श्रीकृष्ण बात यहाँ ख़त्म नहीं करते। अगले ही श्लोक में वे एक ऐसा नाम लेते हैं जो इस पूरी बात को पलट देता है।
पर अभी एक बात बाकी है। जिस जनक की गाथा हमने अभी सुनी, वही जनक अब बीसवें श्लोक में आने वाले हैं, और वहाँ श्रीकृष्ण कहेंगे कि जो पूरा हो चुका है, उसे भी, किसी और की ख़ातिर, काम करना चाहिए। और फिर एक ऐसा वाक्य आएगा जो आपके घर के हर कमरे में काम आता है।
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।
लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि ॥ २० ॥
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ २१ ॥
बीसवाँ श्लोक वही नाम लेकर शुरू होता है जो हमने अभी युधिष्ठिर के मुँह से सुना था। कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः, लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि। जनक आदि ज्ञानीजन भी कर्म से ही सिद्धि को प्राप्त हुए। लोकसंग्रह को देखते हुए भी तुम्हें कर्म करना ही चाहिए।
पहले सिद्धि को समझ लीजिए। सिद्धि यानी पूरा हो जाना, वह अवस्था जहाँ कुछ और पाना नहीं बचता। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जनक जैसे लोग वहाँ कर्म से ही पहुँचे, कर्म को छोड़कर नहीं। शंकराचार्य यहाँ बहुत ईमानदारी से दो संभावनाएँ रखते हैं। वे कहते हैं कि अगर जनक और अश्वपति जैसे राजा ज्ञान पा चुके थे, तब तो वे लोगों को सही रास्ते पर रखने के लिए कर्म करते रहे। और अगर तब तक ज्ञान पूरा नहीं हुआ था, तो कर्म ही उनके मन को शुद्ध करने की सीढ़ी बना। दोनों हाल में बात एक है: कर्म उनके रास्ते की रुकावट नहीं, रास्ता ही था।
हमारी टीका जनक को इस तरह याद करती है कि वे ज्ञानी राजा थे जो ज्ञानी होकर भी राज्य करते रहे। और रामानुजाचार्य एक और बात कहते हैं: ज्ञान के अधिकारी लोगों के लिए भी कर्मयोग श्रेष्ठ है, इसीलिए जनक जैसे राजर्षि, जो ज्ञानियों में अगुवा थे, कर्मयोग से ही उस स्थिति तक गए।
अब वह शब्द जो इस पूरे सत्संग की चाबी है: लोकसंग्रह। हमारी टीका इसका अर्थ यह बताती है कि लोगों को सही मार्ग पर बनाए रखना और उन्हें ग़लत मार्ग पर जाने से रोकना। श्रीधर स्वामी इसे एक साफ़ वाक्य में रखते हैं कि अगर मैं अपने धर्म में लगा रहूँ तो सब लोग भी लग जाएँगे, और अगर मैं छोड़ दूँ तो ज्ञानी को देखकर अज्ञानी भी कर्म छोड़ देगा। तिलक महाराज इस पर एक सूक्ष्म बात पकड़ते हैं। वे कहते हैं कि श्लोक के उस छोटे-से "भी" में ही संकेत है कि अब बात के एक नए पहलू की शुरुआत हो रही है। अब तक कारण यह था कि कर्म छूटता ही नहीं, इसलिए करो। अब दूसरा कारण आ रहा है: करने में स्वयं एक बड़ा लक्ष्य है। और तिलक यह भी कहते हैं कि लोकसंग्रह शब्द में "लोक" केवल मनुष्य नहीं हैं, पूरा जगत है, जिसे बचाकर, धारण करके, पालना है।
संत ज्ञानेश्वर इस पर जो उपमा देते हैं, वह मुझे सबसे प्यारी लगती है। वे कहते हैं कि जैसे सड़क पर कोई अन्धा आदमी चल रहा हो और उसके साथ एक देखने वाला भी चल रहा हो, वैसे ही जो जानता है, उसे अज्ञानियों के साथ चलना चाहिए, और अपने आचरण से धर्म को प्रकट करना चाहिए। फिर वे सवाल करते हैं कि अगर ऐसा न करो, तो उन्हें इस रास्ते का पता कैसे चलेगा? धृतराष्ट्र इस उपमा को सुन रहे हैं, और सोचिए कि उन्होंने क्या सुना होगा। एक अन्धे राजा के कानों में पड़ा कि देखने वाले का काम है उसके साथ चलना। और उनके आस-पास देखने वाले कौन थे? विदुर, जिन्होंने जागती रात में बैठकर उन्हें समझाया था, और भीष्म और द्रोण, जो उस जुए की सभा में सिर झुकाए बैठे रहे थे। आपको याद होगा, दूसरे और नौवें सत्संग में हमने इन दोनों रातों और दिनों को देखा था। देखने वाले थे, पर साथ चलने वाले कितने?
आप अपने आस-पास देखिए। एक अनुभवी सर्जन है, जो हर छोटे से छोटे ऑपरेशन से पहले भी पूरे बीस मिनट हाथ धोता है, पूरी तैयारी करता है। नए डॉक्टर उसे देखकर वही सीखते हैं, कहे बिना। किसी दिन वह कह दे कि इस मामूली काम में इतना क्या, तो उसी दिन से वार्ड की आदत बदल जाती है, और उसे ख़बर तक नहीं होती। आप इस सर्जन की जगह अपने घर, अपने दफ़्तर, अपनी दुकान का कोई चेहरा रखकर देख सकते हैं।
अब इक्कीसवाँ श्लोक, जो इस सत्संग का नाम भी है। यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः, स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते। श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, दूसरे लोग भी वैसा-वैसा ही करते हैं। वह जो प्रमाण बना देता है, संसार उसी का अनुसरण करता है।
इस श्लोक में दो अलग बातें हैं, और दोनों को अलग-अलग सुनिए। पहली: जो-जो वह करता है, वही दूसरे करते हैं, यानी उसके काम। दूसरी: वह जिसे प्रमाण मान लेता है, यानी जिसे वह कसौटी बना दे, संसार भी उसे कसौटी मान लेता है। शंकराचार्य कहते हैं कि चाहे लौकिक हो या वैदिक, श्रेष्ठ जिसे प्रमाण मानता है, लोग उसी को प्रमाण मान लेते हैं। यानी बड़े का असर सिर्फ़ उसके हाथों पर नहीं, उसके मापदंड पर होता है। वह जिस बात को ठीक मान ले, वह बात दूसरों के लिए ठीक हो जाती है।
रामानुजाचार्य बताते हैं कि "श्रेष्ठ" वह है जो पूरे शास्त्र को जानने और उसे निभाने के लिए प्रसिद्ध हो, और कम जानने वाले लोग वही करते हैं, उन्हीं अंगों के साथ करते हैं, जिनके साथ वह करता है। श्रीधर स्वामी कहते हैं कि श्रेष्ठ चाहे कर्म के शास्त्र को प्रमाण माने, चाहे त्याग के शास्त्र को, लोग उसी का अनुसरण करते हैं। और मधुसूदन सरस्वती एक बात कहते हैं जो थोड़ी कड़वी है। वे कहते हैं कि श्रेष्ठ चाहे शुभ करे या अशुभ, दूसरे लोग वही करते हैं, अपनी स्वतंत्र बुद्धि से नहीं। वे एक पुरानी कहावत भी रखते हैं कि लोगों का व्यवहार मुखिया के पीछे-पीछे चलता है।
संत ज्ञानेश्वर इसे बहुत सरल रखते हैं कि बड़े लोग जो-जो करते हैं, उसी को लोग धर्म का नाम दे देते हैं, और बाकी सब वही करने लगते हैं। इसीलिए, वे कहते हैं, कर्म छोड़ना नहीं चाहिए, और संतों को तो उसे और विशेष ढंग से करना चाहिए। "बड़े" शब्द को लेकर हम सब बहुत सावधान रहते हैं कि हम बड़े नहीं हैं। पर यह श्लोक बड़प्पन को पद से नहीं नापता। जिस पर कोई देख रहा हो, वही उस घड़ी में बड़ा है: घर में पिता, पीछे चलती छोटी बहन, कक्षा में शिक्षक, दुकान पर मालिक, भीड़ में पहला आदमी जो क़तार में खड़ा हुआ।
और अब महाभारत का वह दृश्य, जो इस श्लोक का सबसे कठिन उदाहरण है, और मैं इसे बिना फ़ैसला सुनाए रखूँगा। द्रोण पर्व के एक सौ इक्यानवें अध्याय में संजय धृतराष्ट्र को सुनाते हैं कि द्रोण पांचालों का भारी संहार कर रहे हैं, और पाण्डवों ने जीत की आशा छोड़ दी है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि शस्त्र हाथ में रहते द्रोण को कोई नहीं जीत सकता, और सुझाव देते हैं कि कोई उनसे कह दे कि अश्वत्थामा मारा गया। अर्जुन को यह बात पसंद नहीं आती। बाकी सब को आती है, और युधिष्ठिर को बड़ी कठिनाई से। तब भीम गदा से अश्वत्थामा नाम के एक हाथी को मारकर द्रोण के पास जाकर पुकारते हैं, "अश्वत्थामा मारा गया।"
द्रोण को विश्वास नहीं होता। वे अपने पुत्र का बल जानते हैं। और तब वे क्या करते हैं? वे किसी और से नहीं, केवल युधिष्ठिर से पूछते हैं। संजय स्वयं बताते हैं कि द्रोण को अटल भरोसा था कि यह पाण्डव तीनों लोकों के ऐश्वर्य के लिए भी झूठ नहीं बोलेगा, क्योंकि बचपन से ही उन्हें उस पाण्डव से सच की आशा थी। और तब, असत्य के भय में डूबे और जीत में खिंचे हुए युधिष्ठिर ऊँचे स्वर में कहते हैं, "अश्वत्थामा मारा गया," और अस्पष्ट स्वर में जोड़ते हैं, "हाथी।" संजय यह भी कहते हैं कि इससे पहले उनका रथ धरती से चार अंगुल ऊपर चलता था, और ऐसा कहते ही उनके घोड़े धरती को छूने लगे। और द्रोण जीवन से निराश हो गए।
इस दृश्य में मैं कोई उपदेश नहीं जोड़ना चाहता। मैं सिर्फ़ यह कहता हूँ कि इसे इक्कीसवें श्लोक की रोशनी में देखिए। जब एक आदमी की सच्चाई इतनी जानी हुई हो कि उसका सबसे बड़ा शत्रु भी उसी के शब्द को प्रमाण मान ले, तो उस आदमी का एक अस्पष्ट शब्द भी युद्ध का पूरा रुख बदल देता है। यही "स यत्प्रमाणं कुरुते" का भार है। और यह भार उसके हर शब्द पर होता है, चाहे वह जीत के बहुत पास खड़ा हो या बहुत थका हुआ।
अब आप सोचिए कि आपके घर में आपकी बात का क्या वज़न है। बच्चे जानते हैं कि आप जो कहते हैं वही करते हैं, या वे जानते हैं कि "सच बोलो" कहने वाले पिता फ़ोन पर "कह देना मैं घर पर नहीं हूँ" भी कह देते हैं? बच्चा कोई भाषण याद नहीं रखता। वह उस छोटे-से पल को याद रखता है।
पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण अब तक अर्जुन को लोगों का उदाहरण दे रहे थे, जनक और अपने जैसे श्रेष्ठों का। अब वे एक ऐसी बात कहने वाले हैं जो मुझे पूरी गीता के सबसे बड़े वाक्यों में लगती है। वे अपना ही नाम लेंगे, और कहेंगे कि तीनों लोकों में मेरे लिए कुछ करने को नहीं है, कुछ पाने को नहीं है, फिर भी मैं लगा रहता हूँ। बाईसवाँ और तेईसवाँ श्लोक।
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन ।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥ २२ ॥
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥ २३ ॥
इन दोनों श्लोकों में उतरने से पहले आपसे एक छोटी-सी विनती है। हम इस सत्संग के लगभग एक तिहाई तक आ पहुँचे हैं, और यही वह जगह है जहाँ कई लोग मन में निष्कर्ष बना लेते हैं कि अच्छा, तो बात इतनी-सी है कि बड़े लोगों को अच्छा उदाहरण बनना चाहिए। पर आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। क्योंकि अगर बात इतनी ही होती, तो वह एक कहावत में पूरी हो जाती। असली बात यह है कि जिसके पास पाने को कुछ भी न बचा हो, वह काम क्यों करे, और उस उत्तर का आपके अपने घर से क्या रिश्ता है। तो अगर आप यह सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि यह यात्रा बीच में न टूटे, और आज का हिस्सा आख़िर तक सुनिए।
बाईसवाँ श्लोक। न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन, नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि। हे पार्थ! तीनों लोकों में मेरे लिए न कुछ कर्तव्य है और न कोई प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है, फिर भी मैं कर्म में ही लगा रहता हूँ।
पूरे गीता-उपदेश में यह जगह मुझे बहुत विशेष लगती है, क्योंकि श्रीकृष्ण यहाँ कोई सिद्धान्त नहीं समझा रहे, अपना जीवन सामने रख रहे हैं। उनके मुँह से यह सुनना कि "मेरे लिए तीनों लोकों में कुछ करने को नहीं है," और फिर, उसी साँस में, "फिर भी मैं लगा रहता हूँ।" और यह बात वह कह रहा है जो उसी रथ पर बैठा अर्जुन के घोड़ों की लगाम पकड़े हुए है। आपको याद होगा, पहले सत्संग में हमने देखा था कि उद्योग पर्व में जब दुर्योधन और अर्जुन द्वारका गए, तब श्रीकृष्ण ने कहा था कि मैं हथियार नहीं उठाऊँगा, और अर्जुन के माँगने पर कहा, "मैं सारथि बनूँगा।" जिसके पास देने को एक पूरी सेना थी, उसने ख़ुद लगाम थामना स्वीकार किया।
श्लोक के शब्दों में दो बातें हैं: कर्तव्य कुछ नहीं, और पाने को कुछ नहीं। शंकराचार्य बस इतना कहते हैं कि जब कुछ अप्राप्त है ही नहीं जिसे पाना हो, तब भी मैं कर्म में ही लगा हूँ। रामानुजाचार्य इसे बहुत बड़ा खोलते हैं। वे कहते हैं कि श्रीकृष्ण सबके ईश्वर हैं, जिनकी सब इच्छाएँ पूरी हैं, जो सब जानते हैं, जिनका संकल्प सच होता है, जो तीनों लोकों में देवता, मनुष्य आदि रूप लेकर अपनी इच्छा से विचरते हैं। फिर भी, वे कहते हैं, लोक की रक्षा के लिए वे कर्म में लगे हैं। श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती कहते हैं कि यहाँ मैं ही उदाहरण हूँ। और मधुसूदन सरस्वती "पार्थ" शब्द पर भी रुकते हैं: श्रीकृष्ण अर्जुन को इस नाम से बुलाकर याद दिला रहे हैं कि तुम मेरे ही जैसे हो, इसलिए जैसा मैं बरतता हूँ, वैसा तुम बरतो।
संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक को श्रीकृष्ण की आवाज़ में बहुत प्यारे ढंग से कहते हैं। वे कहते हैं कि मुझे क्या कमी है, या कौन-सी पीड़ा मुझे धर्म का आचरण करवाती है, अगर तुम ऐसा सोचो? तो सुनो, इस पूर्णता में मेरे जैसा दूसरा कोई जगत् में नहीं, यह तुम जानते हो। तुमने मेरा वह पराक्रम देखा है जब मैं गुरु के मरे हुए पुत्र को लौटा लाया। वही मैं चुपचाप, इसी राह पर, कर्म में लगा हूँ। मुझे इसमें यह दिखता है कि जिसकी सामर्थ्य पर कोई शंका नहीं, उसका कर्म में लगे रहना और भी बड़ी बात हो जाती है।
महाभारत में इसकी एक बहुत छोटी, बहुत सुन्दर झलक है, जो मैं आपको दिखाना चाहता हूँ। सभा पर्व के अड़तीसवें अध्याय में युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ चल रहा है। आपको याद होगा, आठवें सत्संग में हमने देखा था कि इसी यज्ञ में पाण्डवों का वैभव देखकर दुर्योधन का मन जला था, जैसा धृतराष्ट्र ने स्वयं कहा था। यज्ञ से पहले युधिष्ठिर सबको काम बाँटते हैं, जिसे जो योग्य हो। किसी को भोजन की देखरेख, किसी को ब्राह्मणों के स्वागत का काम, किसी को राजाओं के सत्कार का, किसी को सोने और रत्नों की देखभाल का। दुर्योधन को भेंट स्वीकार करने का काम मिलता है। और अर्जुन को कहा जाता है कि वे काम पूरा कराने के लिए कृष्ण के पास रहें। इसी सूची में बारहवें श्लोक में लिखा है: कृष्ण स्वयं ही ब्राह्मणों के पैर धोने में लगे। "स्वयं ही" शब्द श्लोक में है। यह काम उन्होंने अपने ऊपर लिया।
सोचिए कि उस सभा में हर कोई देख रहा होगा कि सबसे बड़ा काम किसके हाथ में है। और जिसे संसार भगवान कहता है, वह ब्राह्मणों के पैरों के पास झुका हुआ था। एक भी भाषण नहीं, एक भी उपदेश नहीं। बाईसवें श्लोक को जीकर दिखाना इसे ही कहते हैं।
अब तेईसवाँ श्लोक। यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः, मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः। क्योंकि हे पार्थ! यदि मैं कभी सावधान होकर कर्म में न लगा रहूँ, तो मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करेंगे।
यहाँ एक शब्द है जो आसानी से छूट जाता है: कर्मण्यतन्द्रितः, यानी कर्म में बिना तन्द्रा के। तन्द्रा वह अधसोई-सी हालत है जिसमें काम तो होता है पर मन वहाँ नहीं होता। बिना तन्द्रा का आदमी वह है जो जागा हुआ है, सावधान है। शंकराचार्य इसका अर्थ करते हैं "अनलस", यानी जो आलसी नहीं। श्रीकृष्ण यह नहीं कह रहे कि मैं बस काम करता हूँ। वे कहते हैं कि मैं जागकर करता हूँ। और इसमें बहुत बड़ा अन्तर है। जिसके पास पाने को कुछ नहीं, उसके पास ढील देने का सबसे आसान बहाना होता है। और श्रीकृष्ण ठीक वही हैं जो सबसे सावधान हैं।
रामानुजाचार्य इस श्लोक को श्रीकृष्ण के अपने जन्म से जोड़ते हैं। वे कहते हैं कि सबके ईश्वर होकर भी वे मनुष्यों में, शिष्ट जनों के अगुवा वसुदेव के घर में अवतरित हुए, और अगर वे अपने कुल के योग्य कर्म में सदा सावधान न रहें, तो कम जानने वाले शिष्ट लोग भी उनके रास्ते पर चलेंगे, और अपना कर्तव्य छोड़कर हानि उठाएँगे। श्रीधर स्वामी और नीलकण्ठ इसे साफ़ कहते हैं कि मनुष्य कर्म करना छोड़ देंगे। देखिए, कैसे श्रीकृष्ण अपनी ढील को दूसरों की ढील का कारण बनता हुआ देखते हैं।
संत ज्ञानेश्वर इसे एक अलग ढंग से पूछते हैं कि मैं स्वधर्म में कैसे बरतता हूँ? जैसे कोई कामना वाला बरतता है, पर केवल एक उद्देश्य के लिए: कि जितने प्राणी हमारे ही आधीन हैं, वे भटक न जाएँ। "जो हमारे आधीन हैं, वे भटक न जाएँ।" ज़रा एक पल इसे अपने घर के भीतर रखकर देखिए। जो बच्चे, जो बुज़ुर्ग, जो काम करने वाले आपके आधीन हैं, उनके सामने आपकी सावधानी किसी और की सुरक्षा है।
धृतराष्ट्र ने अपने ही शब्दों में आदि पर्व में कहा था कि मैं अन्धा हूँ, पुत्र के प्रेम में दुर्बल हूँ, और जब मूर्ख दुर्योधन भटकता है, तो मैं भी उसके साथ भटक जाता हूँ। यह सुनने में ईमानदार वाक्य है, पर इसमें तेईसवें श्लोक का उलटा भी छिपा है। एक पिता, जिसके पीछे सौ पुत्र और पूरा राज्य चलना था, पीछे-पीछे चलने लगा। वह रास्ता बन ही नहीं पाया, जिस पर दूसरे चलते। जो आगे होना था, वह पीछे हो गया। यह कथन आदि पर्व के पहले अध्याय का एक सौ छियासठवाँ श्लोक है।
और घर में यही बात बहुत सरल रूप में लौटती है। सुबह-सुबह जो पिता चुपचाप अपनी चाय बनाकर, बिना किसी को बताए, कुछ देर प्रार्थना में बैठता है, उसके बच्चे उससे कुछ पूछे बिना वही सीखते हैं कि दिन कैसे शुरू होता है। जो माँ थकी होने पर भी, बिना किसी के देखे, सबसे पहले जागती है, उसकी बेटी जानती है कि ज़िम्मेदारी क्या होती है, भाषण के बिना। तेईसवें श्लोक के उस शब्द का यही अर्थ है: बिना किसी पुरस्कार के, जागकर करना।
पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने कह दिया कि मैं ढील दूँ, तो लोग मेरे पीछे ढील दे देंगे। अब वे उसका आगे का परिणाम गिनाएँगे, और वह परिणाम इतना बड़ा है कि सुनकर हम सब रुक जाते हैं: कि इन सब लोकों का ही नाश हो जाएगा। चौबीसवाँ और पच्चीसवाँ श्लोक।
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।
सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥ २४ ॥
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसङ्ग्रहम् ॥ २५ ॥
चौबीसवाँ श्लोक सुनने में भारी है, पर इसे ध्यान से सुनिए। उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्, सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः। यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब लोक नष्ट-भ्रष्ट हो जाएँ, मैं संकरता का कर्ता बनूँ और इस सारी प्रजा को नष्ट करने वाला बनूँ।
श्रीकृष्ण पिछले श्लोक की बात का परिणाम गिना रहे हैं। तेईसवें में उन्होंने कहा था कि अगर मैं ढील दूँ तो लोग मेरे रास्ते पर चलेंगे। अब वे कहते हैं कि चलकर क्या होगा: ये लोक डूब जाएँगे। शंकराचार्य बताते हैं कि जो कर्म संसार की स्थिति को थामे रखता है, उसके अभाव से ये सब लोक नष्ट हो जाएँगे, और जो मैं प्रजा के कल्याण के लिए प्रवृत्त हूँ, उसी प्रजा का नाश कर बैठूँ, यह मुझ ईश्वर के योग्य नहीं होगा। मधुसूदन सरस्वती इसमें जोड़ते हैं कि अगर मैं न करूँ, तो मेरे पीछे चलने वाले मनु जैसे लोग भी कर्म नहीं कर पाएँगे, और जो मैं प्राणियों की भलाई के लिए खड़ा हूँ, उन्हीं को कैसे नष्ट करूँ?
"संकरता" शब्द पर हमारी टीका एक पुल जोड़ती है। वह कहती है कि यह वही शब्द है जो पहले अध्याय में वर्णसंकर के लिए आया था, यानी समाज और कर्तव्य की व्यवस्था का टूटना। आपको याद होगा, तीसरे सत्संग में अर्जुन ने इसी डर से हथियार रखने की बात की थी, कि कुल टूट जाएगा। और अब श्रीकृष्ण वही डर दूसरी ओर से दिखाते हैं: कुल केवल लड़ाई से नहीं टूटता, वह तब भी टूटता है जब ऊपर वाले अपना हिस्सा करना छोड़ दें। हमारी टीका कहती है कि जब ऊपर वाले अपना भाग करना छोड़ देते हैं, तो नीचे की व्यवस्था बिखर जाती है।
संत ज्ञानेश्वर इसी बात को बहुत सहज ढंग से कहते हैं। वे श्रीकृष्ण के मुँह से कहलाते हैं कि अगर हम पूर्णकाम होकर बस आत्मा की स्थिति में बैठ रहें, तो यह प्रजा कैसे पार उतरेगी? लोग हमारी ओर देखेंगे, फिर वैसा ही करेंगे, और जो लोक की व्यवस्था है, वह सब बिगड़ जाएगी। इसलिए जो यहाँ समर्थ है और सर्वज्ञता से भरा है, उसे तो और भी ज़्यादा, कर्म नहीं छोड़ना चाहिए। "जो सबसे ज़्यादा समर्थ है, वही सबसे कम छुट्टी ले सकता है।" यह ज्ञानेश्वर की बात का मेरा अपना सार है।
रामानुजाचार्य इसी श्लोक को सीधे अर्जुन से जोड़ देते हैं। वे कहते हैं कि तुम पाण्डु के पुत्र हो, युधिष्ठिर के छोटे भाई हो, शिष्ट जनों के अगुवा हो। अगर तुम ज्ञान की निष्ठा में चले गए, तो तुम्हारे पीछे चलने वाले लोग अपना अधिकार न जानकर कर्म की निष्ठा से हट जाएँगे और नष्ट होंगे। अर्जुन के जाने से सिर्फ़ अर्जुन नहीं जाता, उसके पीछे की पूरी क़तार हिल जाती है।
और महाभारत में यही दृश्य युद्ध के बाद ख़ुद युधिष्ठिर के साथ घटित होता है। शान्ति पर्व के सातवें अध्याय में वे कहते हैं कि अगर हम वृष्णि और अन्धकों के नगर में भिक्षा पर जीते, तो बन्धुओं को खोकर इस दुर्गति में न पहुँचते। फिर वे क्षत्रिय के आचार को, शरीर के बल को और उस धन को धिक्कारते हैं। यह वही वाक्य है जो संजय ने उद्योग पर्व में उन्हें सुझाया था, जो हमने पिछले सत्संग में सुना था। भाई और द्रौपदी एक-एक करके उन्हें मनाने की कोशिश करते हैं, और जब वे चुप रहते हैं, तब व्यास बोलते हैं।
शान्ति पर्व के तेईसवें अध्याय में व्यास कहते हैं कि अर्जुन की बात सच है, कि शास्त्र में देखा गया सर्वोच्च धर्म गृहस्थ आश्रम है। उनके शब्दों का भाव यह है कि देवता, पितर, अतिथि और सेवक सदा गृहस्थ पर निर्भर रहते हैं, पक्षी, पशु और सब प्राणी गृहस्थों से ही पोषित होते हैं। इसलिए तुम्हारे लिए गृहस्थ-धर्म छोड़कर वन जाना विहित नहीं है। और वे कहते हैं कि तुम्हें पिता और पितामह का राज्य जुए में जुते बैल की तरह उठाना चाहिए। एक पल रुककर इसे सुनिए: "जुए में जुते बैल की तरह।" यह किसी महिमा की भाषा नहीं है। यह उस भार की भाषा है जो उठाना ही है, क्योंकि उसके नीचे बहुत लोग जी रहे हैं। चौबीसवें श्लोक का यही अर्थ है, इसी शब्द में।
अब इसे अपने घर में रखकर देखिए। किसी बड़े परिवार में एक आदमी होता है जो हर बीमारी में, हर शादी-ग़मी में सबसे पहले पहुँचता है, चुपचाप, बिना जताए। एक दिन वह यह कहकर रुक जाता है कि अब क्या फ़र्क पड़ता है, सब अपना-अपना देख लेंगे। उसके पीछे दो-चार साल में पूरे परिवार की रीत बदल जाती है, और कोई कह नहीं पाता कि कब और किसके कारण। मैं चाहता हूँ कि आप इस चित्र में किसी का चेहरा देख लें, और शायद अपना भी।
अब पच्चीसवाँ श्लोक। सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत, कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसङ्ग्रहम्। हे भारत! कर्म में आसक्त अज्ञानी जैसे कर्म करते हैं, आसक्ति रहित ज्ञानी भी लोकसंग्रह चाहता हुआ वैसे ही कर्म करे।
इस श्लोक में बहुत बारीक बात है। ज्ञानी और अज्ञानी, दोनों वही काम कर रहे हैं। एक ही दफ़्तर, एक ही रसोई, एक ही मेज़। हमारी टीका कहती है कि बाहर से दोनों एक जैसे दिख सकते हैं, अन्तर भीतर है: एक अपने लाभ के लिए कर्म करता है, दूसरा दूसरों के भले के लिए। शंकराचार्य बताते हैं कि अज्ञानी वे हैं जो सोचते हैं कि इस कर्म का फल मेरा होगा, और ज्ञानी भी वैसा ही करता है, पर असक्त होकर। और मधुसूदन सरस्वती एक शंका उठाते हैं कि ईश्वर तो कर्तापन के अभिमान से मुक्त है, उसका काम चल जाता है; पर मुझ जैसे साधारण जीव के लिए, जो लोकसंग्रह के लिए कर्म करे, कर्ता होने का अभिमान ज्ञान को ढँक सकता है। उत्तर वे यही देते हैं कि वह वैसे ही करे जैसे अज्ञानी करता है, पर कर्तापन के अभिमान और फल की चाह के बिना।
संत ज्ञानेश्वर इसका बहुत सुन्दर रूप रखते हैं। वे कहते हैं कि जैसे फल की आशा वाला आदमी कर्म में तत्पर होता है, वैसे ही आशा-रहित को भी तत्पर होना चाहिए, क्योंकि यह लोक-व्यवस्था बार-बार, हर तरह से बचाने योग्य है। रास्ते के आधार पर चलो, और संसार को आगे चलाओ, और लोगों के लिए अलौकिक मत बन जाओ। "लोगों के लिए अलौकिक मत बन जाओ।" यानी इतने ऊँचे बनकर न बैठो कि लोगों से अलग दिखने लगो। ज्ञानी अगर लोगों के बीच चलता भी न दिखे, तो लोग उसका ज्ञान कैसे पहचानेंगे?
यहाँ मुझे शान्ति पर्व की वही कथा फिर याद आती है जो अर्जुन ने ख़ुद अपने बड़े भाई को सुनाई थी, जब वे चुप बैठे थे। अठारहवें अध्याय में अर्जुन विदेह के राजा जनक की कथा कहते हैं, उन्हीं जनक की जिनका नाम बीसवें श्लोक में आया। वे राज्य छोड़कर एक मुट्ठी अन्न पर भिक्षा से जीने लगे थे, निस्पृह और ईर्ष्या-रहित। और उनकी पत्नी, क्रुद्ध पर समझदार, एकान्त में उनके पास जाकर तर्क से बोलती हैं।
पत्नी का पहला सवाल यह है: आपकी प्रतिज्ञा कुछ और है और आचरण कुछ और, क्योंकि बड़ा राज्य छोड़कर आप मुट्ठी भर अन्न पर लोभ करते हैं। वे कहती हैं कि इससे आप अब अतिथियों, देवताओं, ऋषियों और पितरों का पोषण नहीं कर सकते, और हज़ारों वेदज्ञ ब्राह्मणों के पालक रहे आप आज दूसरों से जीविका माँगते हैं। उनका सबसे वज़नदार तर्क यह है कि गृहस्थ और भिक्षु, दोनों अन्न से जीते हैं, और जो अन्न देने वाला है, वह प्राण देने वाला है, और संयमी भी गृहस्थों पर ही निर्भर हैं। और फिर वे साफ़ कहती हैं कि केवल त्याग से, केवल माँगने से कोई भिक्षु नहीं होता। जो अनासक्त होकर समर्थ की तरह चलता है, आसक्ति रहित है, शत्रु और मित्र में सम है, वही निश्चय ही मुक्त है।
यह बात इतनी सीधी है कि पच्चीसवें श्लोक का भाष्य लगती है। अनासक्त होकर समर्थ की तरह चलना। अर्जुन ने ख़ुद दूसरे अध्याय में कहा था कि भिक्षा का अन्न खाना भी अच्छा है। और वही अर्जुन युद्ध के बाद युधिष्ठिर के सामने जनक की रानी की यह सीख रख रहे हैं। एक बात और ध्यान देने की है: अर्जुन उसी कथा के अन्त में कहते हैं कि जनक भी तत्त्वज्ञ कहे जाते थे, पर वे उस समय मोह से भरे थे। आप मोह में न चलिए। यह शान्ति पर्व के अठारहवें अध्याय का सैंतीसवाँ श्लोक है।
पर अभी एक बात बाकी है। अब तक श्रीकृष्ण हमें यह बता रहे थे कि जो जानता है, वह काम करता रहे। अब वे एक और नाज़ुक बात छेड़ने वाले हैं, उस पर जो कुछ जानता है और जो सामने वाले को बताना चाहता है: क्या कहे, और कब, और कितना। छब्बीसवाँ और सत्ताईसवाँ श्लोक।
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ॥ २६ ॥
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥ २७ ॥
छब्बीसवाँ श्लोक एक बहुत नाज़ुक जगह को छूता है, उस जगह को जहाँ ज्ञान और स्नेह आमने-सामने खड़े होते हैं। न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्, जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन्। ज्ञानी पुरुष कर्मों में आसक्त अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम उत्पन्न न करे, बल्कि स्वयं योगयुक्त होकर सब कर्म भली-भाँति करता हुआ उनसे भी प्रसन्नता से करवाए।
पहले यह देखिए कि श्लोक किससे क्या नहीं कहने को कह रहा है। शंकराचार्य बताते हैं कि बुद्धिभेद का मतलब है उस पक्के निश्चय को हिला देना कि "मुझे यह करना है और इसका फल मुझे मिलेगा।" और श्रीधर स्वामी एक बहुत स्वाभाविक शंका उठाते हैं। वे कहते हैं कि कोई पूछ सकता है कि करुणा से तो यही ठीक होता कि ज्ञानी उन्हें सीधे तत्त्व का ज्ञान दे दे, फिर उसे रोका क्यों जाए? और उनका उत्तर है कि अगर वह उसकी बुद्धि को कर्म से हटा दे, तो कर्म में उसकी श्रद्धा चली जाएगी और ज्ञान अभी पैदा हुआ नहीं, इसलिए वह दोनों से चूक जाएगा। दोनों से चूक जाना। यही भय है इस श्लोक के पीछे।
हमारी टीका इसी बात को एक वाक्य में रखती है कि जो तैयार नहीं है, उससे यह कहना कि कर्म व्यर्थ है, उसे ज्ञान तक नहीं उठाता। वह केवल उस कर्म को छोड़ देता है जो उसे ज्ञान के योग्य बनाता। मधुसूदन सरस्वती इसी के लिए एक स्मृति-वचन उद्धृत करते हैं, जिसका भाव यह है कि आधे जागे हुए अज्ञानी से जो यह कह देता है कि सब कुछ ब्रह्म है, वह उसे एक बड़े संकट में डाल देता है। और रामानुजाचार्य बताते हैं कि ऐसे लोग, जो कर्म में ही टिके हैं और जिन्हें अनादि संस्कारों से कर्म के सिवा रास्ता नहीं दिखता, उनके लिए कर्मयोग ही आत्मा को देखने का रास्ता है, और ज्ञानी को चाहिए कि वह उन्हें उसी में प्रीति दिलाए।
संत ज्ञानेश्वर इस पर जो उपमा देते हैं, वह इतनी घरेलू है कि मुझे हर बार मुस्कराहट आ जाती है। वे कहते हैं कि जो बच्चा अभी बड़ी कठिनाई से माँ का दूध पीता है, वह पकवान कैसे खाएगा? इसलिए उसे पकवान न दो। वैसे ही जो कर्म में भी अभी योग्य नहीं बना है, उसे खेल-खेल में भी निष्कर्मता का ज्ञान न दिखाओ। उसे अच्छे कर्म में लगाओ, उसी की प्रशंसा करो, और निष्कर्मता भी उसे आचरण करके दिखाओ। और वे जोड़ते हैं कि ऐसा आदमी, जो लोक-संग्रह के लिए कर्मासक्तों के बीच उन्हीं जैसा बरतता है, उसे कर्म का बन्धन नहीं लगता, जैसे बहुरूपिया राजा-रानी का वेश धारण करता है, पर उसके मन में कोई पति-पत्नी का भाव नहीं होता, वह दर्शकों के लिए खेलता है।
यहाँ तिलक महाराज एक बहुत ज़रूरी सावधानी जोड़ते हैं। वे कहते हैं कि इसका यह मतलब बिलकुल नहीं कि लोगों को अज्ञान में बनाए रखा जाए। लोकसंग्रह का अर्थ ही लोगों को चतुर और सदाचारी बनाना है। वे कहते हैं कि जो लोग आदत से सदाचरण में दृढ़ नहीं हुए, उनको सिर्फ़ मुँह से ज्ञान बता दिया जाए, तो वे अपने ग़लत बर्ताव के बचाव में ही ब्रह्मज्ञान का दुरुपयोग करने लगते हैं, और बात-बात पर कहते मिलते हैं कि "अमुक ज्ञानी तो ऐसा कहता है।" और अगर ज्ञानी ख़ुद कर्म को अचानक छोड़ बैठे, तो वह लोगों के निकम्मे हो जाने का उदाहरण बन जाता है। मुझे यह बात आज भी बहुत सच लगती है।
आप सोचिए कि कितनी बार आपने सुना है। किसी ने थोड़ा-सा वेदान्त पढ़ा, और घर की औरत से, जो सुबह से रसोई और बच्चों में लगी है, कह दिया कि यह सब तो माया है, इतना क्यों उलझती हो। किसी किशोर ने "कर्म करो, फल की चिंता मत करो" को पढ़कर अपनी परीक्षा की तैयारी को टाल दिया, यह कहकर कि फल तो मेरे हाथ में है ही नहीं। किसी ने शोक में डूबे दोस्त से कह दिया कि आत्मा तो मरती ही नहीं, तुम रो क्यों रहे हो। ये सब वाक्य सच हैं, और इन्हीं सच्चे वाक्यों से घर टूटते हैं, क्योंकि उन्हें कहने वाले ने सामने वाले की तैयारी नहीं देखी।
महाभारत में इसका ठीक उलटा चित्र है। अभी हमने देखा कि शान्ति पर्व के तेईसवें अध्याय में शोक में डूबे युधिष्ठिर से व्यास ने संन्यास या ब्रह्म की बड़ी बातें नहीं कहीं। उन्होंने उन्हें उनका कर्तव्य याद दिलाया, गृहस्थ-धर्म, देवता, पितर, अतिथि, और राज्य का भार। और गीता में ख़ुद श्रीकृष्ण ने अर्जुन के साथ यही किया है। दूसरे अध्याय में उन्होंने पहले आत्मा की बात रखी, और अर्जुन ने तीसरे अध्याय के आरम्भ में कहा कि आप तो मानो मेरी बुद्धि को उलझा रहे हैं। तब श्रीकृष्ण ने कर्म की बात खोलकर रखी, और मुझे लगता है कि इसका कारण यही था कि वही अर्जुन की तैयारी के अनुकूल था। ज्ञान देने वाला वह नहीं जो सबसे ऊँची बात कह दे। ज्ञान देने वाला वह है जो वही कहे, जो सुनने वाले के पाँव के नीचे की ज़मीन पर रखा जा सके।
अब सत्ताईसवाँ श्लोक। प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः, अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते। सब कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं, परन्तु अहंकार से मोहित मनुष्य "मैं कर्ता हूँ" ऐसा मानता है।
यहाँ एक सवाल बनता है, जिसे श्रीधर स्वामी खुलकर उठाते हैं: अगर ज्ञानी को भी वही कर्म करना है जो अज्ञानी करता है, तो दोनों में फ़र्क क्या रहा? वे कहते हैं कि अगले दो श्लोक यही फ़र्क दिखाते हैं, और फ़र्क "मैं कर्ता हूँ" में है। हमारी टीका कहती है कि शरीर, इन्द्रियाँ और मन सब प्रकृति के कार्य हैं, और कर्म वही करते हैं। अहंकार उनकी क्रिया को अपनी मान लेता है, और इसी से श्रेय और फल दोनों पर दावा करता है। शंकराचार्य जोड़ते हैं कि शरीर और इन्द्रियों के समूह को "मैं" मानना ही अहंकार है, और उससे आदमी तरह-तरह से मोहित हो जाता है। रामानुजाचार्य बहुत सीधे कहते हैं कि जो "मैं" नहीं है, उसे "मैं" मान लेना ही अहंकार है।
संत ज्ञानेश्वर इसे एक चित्र से समझाते हैं: अगर कोई दूसरे का बोझ अपने सिर पर ले ले, तो क्या वह कुचला नहीं जाएगा? वैसे ही प्रकृति के स्वभाव से जो शुभ-अशुभ कर्म बन रहे हैं, मूर्ख उन्हें मतिभ्रम में अपना मान लेता है और कहता है "मैं कर्ता हूँ।" "दूसरे का बोझ अपने सिर।" यह चित्र मुझे बहुत भारी लगता है, क्योंकि हम सब इस बोझ को बहुत सँभालकर ढोते हैं। मैंने बनाया, मैंने सँभाला, मैंने किया।
खेत का किसान देखिए। बीज, मिट्टी, पानी, धूप, हवा, और खुद बीज के भीतर की प्रकृति, ये सब मिलकर अन्न उगाते हैं। किसान सुबह उठकर पानी देता है, खर-पतवार निकालता है, रखवाली करता है, और अपना यह हिस्सा पूरा करता है। पर वह अच्छा किसान वही है जो फ़सल देखकर कहता है कि इस साल बारिश अच्छी रही। जो कहता है कि मैंने उगाया, वह पहली बाढ़ में टूट जाता है, क्योंकि फ़सल के साथ उसने अपना नाम भी खेत में बो दिया था। महाभारत में इसका एक दृश्य है, जो मुझे पूरी कथा में सबसे विनम्र दृश्यों में लगता है। शल्य पर्व के तिरसठवें अध्याय में दुर्योधन गिर चुका है, अठारह दिन की लड़ाई ख़त्म हो चुकी है, और पाण्डव दुर्योधन के शिविर में पहुँचते हैं। सब रथों से उतरते हैं। तब श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि गाण्डीव और दोनों बड़े अक्षय तरकश उतार दो, मैं बाद में उतरूँगा, तुम पहले उतरो, यही तुम्हारे लिए श्रेयस्कर है। अर्जुन वैसा ही करते हैं। फिर श्रीकृष्ण लगामें छोड़कर रथ से उतरते हैं।
और जैसे ही वे उतरते हैं, ध्वज पर बैठा वानर, जिसे आदि पर्व में हनुमान कहा गया है, देवताओं के साथ चला जाता है, और वह महान रथ, द्रोण और कर्ण के दिव्य अस्त्रों से जला हुआ, आग से दहक उठता है, और तरकश, लगामें, घोड़े, जुए के बन्धन सहित भस्म होकर भूमि पर गिर पड़ता है। पाण्डव विस्मित हैं। अर्जुन हाथ जोड़कर, झुककर, स्नेह से पूछते हैं कि हे गोविन्द, यह रथ आग से क्यों जला? और श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं: हे अर्जुन, यह रथ द्रोण और कर्ण के अस्त्रों से पहले ही जल चुका था, मेरे खड़े रहने से यह युद्ध में बिखरा नहीं। अब आज तुम्हारे काम पूरा कर लेने पर, मुझसे छोड़े जाने पर, यह ब्रह्मास्त्र के तेज से जला हुआ बिखर गया।
अठारह दिन तक अर्जुन ने इसी रथ से लड़ाई लड़ी। अठारह दिन तक उसे लगा होगा कि लड़ाई उसकी है, उसका धनुष है, उसका निशाना है। और जब काम पूरा हुआ, तब उसे पता चला कि रथ तो पहले ही जल चुका था, और उसे कोई और थामे हुए था। मुझे लगता है कि अर्जुन की पूरी यात्रा में दोनों तरफ़ यही "मैं" था। पहले अध्याय में यह भाव कि मेरे हाथों पाप होगा, मैं नहीं मारूँगा। और बाद में, युद्ध के बीच, यह भाव कि मैं जीत रहा हूँ। दोनों कथन "मैं कर्ता हूँ" के हैं, बस एक में बोझ उठाने का अभिमान है और दूसरे में बोझ से घबराने का। श्लोक कहता है कि कर्म हो रहे हैं, गुणों से, सर्वशः, हर तरह से। और जो उन्हें सँभाल रहा है, वह कभी-कभी हमें तब दिखता है, जब वह हाथ छोड़ दे।
पर अभी एक बात बाकी है। अगर कर्म प्रकृति के हैं और मैं उनका कर्ता नहीं हूँ, तो फिर ज्ञानी कर्म करता कैसे है, और उसके भीतर क्या होता है? अट्ठाईसवाँ श्लोक इसका उत्तर एक छोटे-से वाक्य में देता है: गुण ही गुणों में बरत रहे हैं। और उसी के साथ हम जनक की एक ऐसी कथा सुनेंगे जो अब तक हमने नहीं सुनी।
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥ २८ ॥
प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् ॥ २९ ॥
अट्ठाईसवाँ श्लोक वह उत्तर है जिसका हम इंतज़ार कर रहे थे। तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः, गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते। परन्तु हे महाबाहु! गुण और कर्म के विभाग के तत्त्व को जानने वाला ज्ञानी यह मानकर कि गुण ही गुणों में बरत रहे हैं, आसक्त नहीं होता।
इसे धीरे-धीरे खोलते हैं। "गुण और कर्म का विभाग" यानी बँटवारा: एक तरफ़ गुण और उनके काम, दूसरी तरफ़ मैं। श्रीधर स्वामी इसे दो हिस्सों में रखते हैं। पहला: मैं गुणों से बना नहीं हूँ, यानी आत्मा गुणों से अलग है। दूसरा: ये कर्म मेरे नहीं हैं, यानी आत्मा कर्मों से भी अलग है। जो इन दोनों बँटवारों का तत्त्व जानता है, वह कर्ता होने का आग्रह नहीं करता। और उसका कारण यह है कि इन्द्रियाँ, जो गुणों से बनी हैं, अपने विषयों में, जो वे भी गुणों से बने हैं, बरत रही हैं। हमारी टीका भी यही कहती है, और जोड़ती है कि आत्मा केवल साक्षी है।
नीलकण्ठ इसे बहुत रोज़ के उदाहरण से समझाते हैं, जो मुझे अच्छा लगता है। वे कहते हैं कि जब शरीर गोरा होता है तब हम कहते हैं कि मैं गोरा हूँ। हाथ से कुछ उठाते हैं तो कहते हैं कि मैंने उठाया। आँख से कुछ देखते हैं तो कहते हैं कि मैंने देखा। बुद्धि में कोई हलचल होती है तो कहते हैं कि मैं सुखी हूँ। और ये सब, वे कहते हैं, बँटे हुए हैं, और भीतर का "मैं" फूलों में धागे की तरह इन सब में पिरोया हुआ, इन सबसे अलग है। वे एक पुरानी श्रुति की पहेली भी उद्धृत करते हैं: अन्धे ने मणि पाई, बिना उँगली वाले ने उसे पिरोया, बिना गर्दन वाले ने उसे पहना, बिना जीभ वाले ने उसकी प्रशंसा की। और खोलते हैं कि अन्धी आँख रूप को प्रकाशित करती है, जड़ हाथ उसे उठाता है, सिर-रहित अहंकार कहता है "मुझे मिली," और जड़ बुद्धि कहती है "मैं सुखी हूँ।" हर किसी के पास एक हिस्सा है, और पूरा श्रेय एक ऐसे के नाम लिखा जा रहा है जिसने कुछ किया ही नहीं।
संत ज्ञानेश्वर इस स्थिति को एक सूर्य की उपमा से रखते हैं। वे कहते हैं कि ऐसे ज्ञानी शरीर में रहते हुए भी देह का अभिमान छोड़कर, गुणों और कर्मों के पार जाकर, साक्षी होकर रहते हैं, इसलिए उन्हें कर्म का बन्धन नहीं लगता, जैसे प्राणियों की चेष्टाओं को सूर्य नहीं पकड़ता। आप ग़ौर कीजिए कि सूर्य सबके काम में उजाला देता है, और किसी के काम का दोष उसे नहीं लगता।
घर में यह कैसा दिखता है, इसका एक छोटा-सा चित्र देता हूँ। एक पिता थके हुए लौटे हैं और किसी बात पर बच्चे पर चिल्ला देते हैं। फिर थोड़ी देर बाद वे बैठकर कहते हैं कि आज मेरे भीतर चिड़चिड़ाहट चल रही थी, और वह मुझसे बोल गई। मुझे माफ़ करना। वे यह नहीं कहते कि मैं बुरा आदमी हूँ, और यह भी नहीं कहते कि कोई बात नहीं। वे गुण को गुण की तरह देख लेते हैं। बच्चा क्या सीखता है? कि क्रोध आता है, चला जाता है, और आदमी उससे बड़ा है। वह अपनी पूरी ज़िन्दगी के लिए एक बड़ी चीज़ सीख लेता है, एक वाक्य में। अब उनतीसवाँ श्लोक, जो छब्बीसवें का दोहराव है। प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु, तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्। प्रकृति के गुणों से मोहित लोग गुणों और कर्मों में आसक्त रहते हैं। पूरा जानने वाला ज्ञानी उन अधूरा जानने वाले मन्दबुद्धि लोगों को विचलित न करे।
हमारी टीका कहती है कि यह श्लोक छब्बीसवें की बात को पक्का करने के लिए दोहराता है: ज्ञानी की मुक्ति का उपदेश उन्हें न दिया जाए जो अभी उसका उपयोग नहीं कर सकते। शंकराचार्य कहते हैं कि "मन्द" यानी मन्द प्रज्ञा वाले, जो केवल कर्म के फल को देखते हैं। पर मधुसूदन सरस्वती इसमें एक बात जोड़ते हैं जो मुझे बहुत राहत देती है। वे कहते हैं कि जो लोग सच में मन्द नहीं हैं, जिनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया है, वे विवेक के उदय से अपने आप ही विचलित हो जाते हैं, यानी अपने आप ज्ञान के अधिकार तक पहुँच जाते हैं। पके हुए फल को तोड़ने की ज़रूरत नहीं पड़ती। और कच्चे को झटका देने से वह न पकता है, न मीठा होता है।
और यह बात महाभारत में अर्जुन के अपने अनुभव में दिखती है। अश्वमेधिक पर्व के सत्रहवें अध्याय में युद्ध के बाद अर्जुन श्रीकृष्ण से कहते हैं कि युद्ध के समय मैंने आपका ईश्वरीय रूप जाना था, पर जो आपने पहले मित्रता से कहा था, वह सब मेरे विचलित मन में नष्ट हो गया। श्रीकृष्ण अर्जुन को गले लगाकर उत्तर देते हैं कि मैंने तुम्हें गुह्य और सनातन बातें सुनाई थीं, तुम्हारे न समझने से जो तुमने ग्रहण नहीं किया, वह मुझे बहुत अप्रिय है, और अब मैं उसे पूरा उसी तरह दोबारा नहीं कह सकता। यहाँ तक कि वे अर्जुन को "श्रद्धा-रहित और मन्द बुद्धि" तक कह देते हैं, वही "मन्द" जो उनतीसवें श्लोक में है। और फिर भी वे उसे छोड़ते नहीं। वे कहते हैं कि इसी विषय में मैं तुम्हें एक पुरानी कथा सुनाता हूँ, जिससे उस बुद्धि का आश्रय लेकर तुम उत्तम गति पाओ। यानी जो ऊँचा उपदेश नहीं टिका, उसकी जगह उन्होंने कथा रख दी। यह उनतीसवें श्लोक का आचरण है।
और उस कथा के भीतर, जो एक ब्राह्मण अपनी पत्नी को सुनाता है, अश्वमेधिक पर्व के तैंतीसवें अध्याय में, वही जनक फिर लौट आते हैं, जिनकी गाथा से हमने आज शुरुआत की थी।
कथा यह है। राजा जनक ने किसी अपराध में फँसे एक ब्राह्मण से कहा कि तुम मेरे राज्य में नहीं रह सकते। ब्राह्मण ने पूछा, राजन्, बताओ कि तुम्हारे वश में कितना राज्य है, क्योंकि मैं किसी दूसरे राजा के राज्य में रहना चाहता हूँ। जनक ने बार-बार गरम साँस भरी और कोई उत्तर नहीं दिया। उन्हें मूर्च्छा आ गई, जैसे सूर्य को ग्रह लग जाए। जब वे सँभले, तब बोले कि पिता-पितामहों से मिले राज्य के रहते भी मैंने पृथ्वी में अपना कोई राज्य नहीं पाया। मैंने मिथिला को खोजा, तो नहीं मिली। उसमें अपनी प्रजा को खोजा, तो वह भी नहीं मिली। तब मुझे मूर्च्छा आई, और जब उसका अन्त हुआ, तो मेरी बुद्धि लौट आई, और मैंने माना कि मेरा कोई राज्य नहीं, या फिर सब कुछ मेरा ही राज्य है।
फिर वे अपना रहस्य खोलते हैं, और यह अट्ठाईसवें श्लोक की ही व्याख्या लगता है। वे कहते हैं कि मैं अपने लिए नाक तक पहुँची गन्ध नहीं चाहता, इसलिए मुझसे जीती हुई पृथ्वी सदा मेरे वश में रहती है। मैं अपने लिए मुख में आया रस नहीं चाहता, इसलिए जल मेरे वश में रहते हैं। न आँख का रूप, न त्वचा का स्पर्श, न कान का शब्द, न मन के भीतर कोई और मन। और फिर यह वाक्य: सब आरम्भ इसी प्रयोजन से होते हैं, देवताओं, पितरों, प्राणियों और अतिथियों के लिए। इन्द्रियाँ अपने विषयों में बरत रही हैं, पर "मेरे लिए" की कोई गाँठ नहीं बँधी। यही गुण का गुण में बरतना है।
तब ब्राह्मण हँस पड़ा और बोला कि मुझे धर्म जानो, जो आज यहाँ तुम्हारी परीक्षा लेने आया हूँ। और फिर उसने कहा: तुम इस चक्र के एकमात्र चलाने वाले हो, जिसकी नाभि ब्रह्म है, जो रोके नहीं रुकता, जो लौटता नहीं। मुझे यह वही चक्र लगता है जिसकी बात हमने पिछले सत्संग में की थी, जिसे श्लोक चौदह से सोलह में श्रीकृष्ण ने रखा था और जिसमें सोलहवें श्लोक ने कहा था कि जो इसे आगे नहीं चलाता, वह व्यर्थ जीता है। जनक, जिन्होंने कहा कि मिथिला जले तो मेरा कुछ नहीं जलता, वही उस चक्र के चलाने वाले हैं। छोड़ने और चलाने में कोई विरोध नहीं था। वह एक ही आदमी था।
तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।
पहली बात। आप देखे जा रहे हैं, चाहे आप मानें या नहीं। इक्कीसवाँ श्लोक पद से बड़प्पन नहीं नापता, वह इससे नापता है कि किसकी ओर कोई देख रहा है। इसलिए कोई एक छोटी आदत चुन लीजिए जो आप चाहते हैं कि आपके घर का सबसे छोटा सदस्य आपसे ले ले, चाहे वह समय पर उठना हो, सबके साथ बैठकर खाना, या बात करते समय फ़ोन रख देना, और उसे बिना बताए कीजिए। भाषण देने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।
दूसरी बात। जागकर, बिना पुरस्कार की गिनती के, अपना हिस्सा कीजिए। श्रीकृष्ण जिनके पास पाने को कुछ नहीं था, वे सबसे सावधान थे, और जब ब्राह्मणों के पैर धोने का काम बाक़ी था, तो उन्होंने स्वयं उसे उठा लिया। और अगर आप सोचते हैं कि बड़े लोग छोटे काम से बचते हैं, तो राजसूय का वह दृश्य याद कर लीजिए।
तीसरी बात। जिसे आप सिखाना चाहते हैं, उसे वहाँ से सिखाइए जहाँ वह खड़ा है, और कर्ता होने का बोझ कुछ हल्का रखिए। छब्बीसवें श्लोक ने कहा कि अधूरे को झकझोरिए मत, पहले उसे प्रीति से काम में लगाइए, और ख़ुद करके दिखाइए। सत्ताईसवें ने कहा कि "मैंने किया" में हम दूसरे का बोझ अपने सिर पर उठा लेते हैं। अर्जुन अठारह दिन उस रथ से लड़ते रहे, और रथ को वही थामे थे जो उसकी लगाम पकड़े बैठे थे। आपके घर का रथ भी शायद आप अकेले नहीं थामे हैं।
अगली बार हम तीसवें श्लोक से आगे बढ़ेंगे, जहाँ श्रीकृष्ण इस पूरे उपदेश को एक वाक्य में बाँधेंगे: सब कर्म मुझमें अर्पण करके, कामना और ममता से रहित होकर, सन्ताप छोड़कर लड़ो। और उसके बाद अर्जुन एक ऐसा सवाल पूछेगा जो शायद हम सब के भीतर कभी न कभी उठा है: आदमी न चाहते हुए भी पाप क्यों कर बैठता है, मानो किसी ने उसे बलपूर्वक लगा दिया हो?
आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आपके घर में वह कौन है जिसे आप आज भी देखकर सीखते हैं, चाहे वे अब हों या न हों? और आपके पीछे वह कौन है जो आपको देखकर सीख रहा है, और क्या आप जानते हैं कि वह क्या सीख रहा है? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्रीकृष्ण।
जो बड़ा होता है, वह जो करता है, पूरा घर वही सीखता है। इसलिए बड़ा होना भी एक काम है, और सबसे सावधानी का।
जय श्री कृष्ण।
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ २१ ॥
तीन बातें
- आप देखे जा रहे हैं, चाहे आप मानें या नहीं। इक्कीसवाँ श्लोक पद से बड़प्पन नहीं नापता, वह इससे नापता है कि किसकी ओर कोई देख रहा है। इसलिए कोई एक छोटी आदत चुन लीजिए जो आप चाहते हैं कि आपके घर का सबसे छोटा सदस्य आपसे ले ले, चाहे वह समय पर उठना हो, सबके साथ बैठकर खाना, या बात करते समय फ़ोन रख देना, और उसे बिना बताए कीजिए। भाषण देने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।
- जागकर, बिना पुरस्कार की गिनती के, अपना हिस्सा कीजिए। श्रीकृष्ण जिनके पास पाने को कुछ नहीं था, वे सबसे सावधान थे, और जब ब्राह्मणों के पैर धोने का काम बाक़ी था, तो उन्होंने स्वयं उसे उठा लिया। और अगर आप सोचते हैं कि बड़े लोग छोटे काम से बचते हैं, तो राजसूय का वह दृश्य याद कर लीजिए।
- जिसे आप सिखाना चाहते हैं, उसे वहाँ से सिखाइए जहाँ वह खड़ा है, और कर्ता होने का बोझ कुछ हल्का रखिए। छब्बीसवें श्लोक ने कहा कि अधूरे को झकझोरिए मत, पहले उसे प्रीति से काम में लगाइए, और ख़ुद करके दिखाइए। सत्ताईसवें ने कहा कि "मैंने किया" में हम दूसरे का बोझ अपने सिर पर उठा लेते हैं। अर्जुन अठारह दिन उस रथ से लड़ते रहे, और रथ को वही थामे थे जो उसकी लगाम पकड़े बैठे थे। आपके घर का रथ भी शायद आप अकेले नहीं थामे हैं।