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सत्संग १०

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काम छोड़ दूँ या करता रहूँ?

गीता 3.1–3.16 · 78 मिनट

ज़िम्मेदारियाँ छोड़कर भागने का मन; देने-लेने का चक्र

अर्जुन उवाच ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन । तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥ १ ॥
गीता 3.1 — अर्थ पढ़ें ›
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे । तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥ २ ॥
गीता 3.2 — अर्थ पढ़ें ›
श्रीभगवानुवाच लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ । ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥ ३ ॥
गीता 3.3 — अर्थ पढ़ें ›

रविवार की रात को, जब आप कल की तैयारी कर रहे होते हैं, कभी ऐसा हुआ है कि भीतर से आवाज़ आई हो: बस, अब और नहीं? सब कुछ छोड़कर कहीं चला जाऊँ, जहाँ न दफ़्तर की घंटी हो, न घर की लंबी सूची, न किसी को जवाब देना पड़े। और उसी साँस में एक दूसरी आवाज़ भी आई हो कि अगर मैं छोड़ दूँ, तो इन सबका क्या होगा, और मेरा अपना क्या होगा?

आज का सत्संग इसी एक सवाल पर है। काम छोड़ दूँ, या करता रहूँ? और बड़ी बात ये है कि ये सवाल सिर्फ़ हमारा नहीं है। ये वही सवाल है जो कुरुक्षेत्र में एक रथ पर बैठे आदमी ने श्रीकृष्ण से पूछा था, और जिसका जवाब गीता का तीसरा अध्याय है।

जय श्री कृष्ण।

आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का दसवाँ सत्संग है। पिछली बार हमने दूसरे अध्याय का आख़िरी हिस्सा सुना था, जहाँ श्रीकृष्ण ने वो तस्वीर दिखाई जो पूरे अध्याय का निचोड़ है: एक समुद्र, जिसमें चारों ओर से नदियाँ आकर गिरती रहती हैं और वो फिर भी अपनी जगह नहीं छोड़ता, न उफनता है, न सूखता है। उसी तरह जिसके भीतर इच्छाएँ आती हैं और समा जाती हैं, पर उसे डिगाती नहीं, वही शान्ति पाता है। और अध्याय का आख़िरी श्लोक कहता है कि ये ब्राह्मी स्थिति है, यानी परमात्मा में टिकी हुई अवस्था, जिसे पाकर आदमी फिर मोह में नहीं गिरता। और जाते-जाते मैंने आपसे कहा था कि तीसरा अध्याय अर्जुन के एक प्रश्न से शुरू होगा, वही प्रश्न जो हम सबके मन में उठता है। आज से हम तीसरे अध्याय में चल रहे हैं। इसका नाम है कर्मयोग, और इसमें सोलह श्लोक हम आज साथ पढ़ेंगे।

एक बात पहले याद दिला दूँ, क्योंकि हम गीता को उसके अपने घर में पढ़ रहे हैं। गीता कोई अलग किताब बनकर आसमान से नहीं उतरी। वो महाभारत के भीष्म पर्व का हिस्सा है, और हमारे कोष में महाभारत के भीष्म पर्व का सत्ताईसवाँ अध्याय ही गीता का तीसरा अध्याय है। इसे संजय सुना रहे हैं राजा धृतराष्ट्र को, उस घड़ी में जब भीष्म बाणों की शय्या पर लेट चुके हैं। वही संजय, जिन्हें व्यास ने दिव्य दृष्टि दी थी, ताकि वे युद्ध की हर बात देखें और राजा को सुनाएँ। तो जो कुछ आज हम सुन रहे हैं, वो एक अन्धे राजा के कानों तक भी पहुँच रहा है, और मैं चाहता हूँ कि आप बीच-बीच में उस राजा को भी याद रखें।

और इस अध्याय के पहले ही श्लोक में एक बात है जो अगर आप ध्यान से देखें तो चौंकाती है। अर्जुन पूछ रहे हैं, ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन, तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव। हे जनार्दन, अगर आप कर्म से बुद्धि को श्रेष्ठ मानते हैं, तो हे केशव, मुझे इस घोर कर्म में क्यों लगाते हैं?

अर्जुन ने ये बात हवा में नहीं बनाई। दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण ने साफ़ कहा था कि फल की चाह से किया हुआ कर्म बुद्धियोग से बहुत नीचे है, और बुद्धि की शरण लो। और उसी अध्याय का अन्त स्थिर बुद्धि की महिमा से हुआ था। हमारी टीका इसे यूँ पकड़ती है कि दूसरे अध्याय में फल के लिए किए कर्म से स्थिर बुद्धि को श्रेष्ठ कहा गया, फिर भी युद्ध करने को कहा गया, और अर्जुन को इसमें विरोध दिखता है। आप सोचिए, कोई आपसे कहे कि मन की शान्ति सफलता से बड़ी है, और अगले ही पल कहे कि सोमवार की मीटिंग में जाओ और पूरा दम लगाकर जाओ। तो मन में यही सवाल उठेगा कि फिर पहली बात का क्या हुआ।

और यहाँ अर्जुन के लिए "कर्म" का मतलब कोई फ़ाइल या बिल नहीं है। वो इसे "घोर" कहते हैं, यानी भयानक, क्योंकि उनके सामने वो युद्ध है जिसमें उन्हें अपने ही गुरु और पितामह के सामने खड़ा होना है। श्रीधर स्वामी बताते हैं कि अर्जुन ने दूसरे अध्याय के आख़िर तक सुनकर यही समझा कि भगवान की अपनी राय में बुद्धि कर्म से ऊँची है। रामानुजाचार्य इसे यूँ खोलते हैं कि अर्जुन कह रहे हैं, अगर आत्मा को देखने का साधन ज्ञान में टिकना है और कर्म उसकी तैयारी भर है, तो फिर मुझे सीधे ज्ञान में क्यों नहीं लगाते, इस भयानक कर्म में क्यों उतारते हैं। और नीलकण्ठ एक बहुत ईमानदार बात कहते हैं। वो कहते हैं कि अर्जुन ने उस मार्ग को, जो शान्त है और जो उनके अपने मन के अनुकूल है, मान लिया है, और अब कह रहे हैं कि यही ठीक है, तो मुझे भीख माँगकर जीने जैसी राह क्यों नहीं दी जा रही। सच कहिए, हम भी तो अक्सर उसी उपदेश को ऊँचा मानते हैं जो हमारे मन के अनुकूल हो।

और यहाँ महाभारत हमें कुछ ऐसा दिखाता है जो इस प्रसंग को और गहरा कर देता है। ये सवाल पहली बार रथ पर नहीं उठा। उद्योग पर्व में, युद्ध से पहले, राजा धृतराष्ट्र के दूत बनकर यही संजय युधिष्ठिर के पास गए थे। और वहाँ उन्होंने स्वयं युधिष्ठिर से कहा था कि अगर कौरव बिना युद्ध के आपको आपका हिस्सा न दें, तो अन्धक और वृष्णियों के राज्य में भिक्षा माँगकर जीना भी अच्छा है, पर युद्ध से राज्य लेना नहीं। यह उद्योग पर्व के सत्ताईसवें अध्याय का दूसरा श्लोक है। उसी अध्याय में वे कहते हैं कि जीवन थोड़े समय का है, इसलिए पाप मत करो। तो वो आदमी जो आज धृतराष्ट्र को अर्जुन का सवाल सुना रहा है, वो खुद कभी यही सलाह लेकर गया था: काम छोड़ दो, बच जाओ। और जब उसे उत्तर मिला था, तो वो उत्तर भी उसने अपने कानों से सुना था। वो उत्तर श्रीकृष्ण ने दिया था, और उसे हम थोड़ी देर में सुनेंगे।

अब दूसरा श्लोक। व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे, तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्। आप मिली-जुली-सी बातों से मानो मेरी बुद्धि को मोहित कर रहे हैं। इसलिए निश्चय करके वह एक बात कहिए जिससे मैं कल्याण पा सकूँ।

यहाँ एक छोटा-सा शब्द पकड़ने लायक है, जो इस पंक्ति में दो बार आता है: "इव", यानी "मानो"। "व्यामिश्रेणेव", मानो मिली-जुली बातों से, और "मोहयसीव", मानो मोहित कर रहे हैं। अर्जुन ये नहीं कह रहे कि आप मुझे उलझा रहे हैं। वो कहते हैं, ऐसा लगता है मानो आप उलझा रहे हों। हमारी टीका कहती है कि दो बार "मानो" कहना विनय है, अर्जुन गुरु पर उलझाने का आरोप नहीं लगाते, केवल कहते हैं कि उन्हें उपदेश मिला-जुला-सा लगता है। श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती दोनों इसे और साफ़ करते हैं। वो कहते हैं कि परम कृपालु श्रीकृष्ण तो किसी को भ्रम में डाल ही नहीं सकते, ये तो अर्जुन की अपनी समझ की कमी से ऐसा लग रहा है, और "इव" शब्द यही बताता है। और ये भी देखिए कि आदमी जब सचमुच सीखना चाहता है, तो उसकी भाषा कैसी हो जाती है। वो गुरु पर दोष नहीं डालता, वो कहता है कि शायद मैं ही ठीक से नहीं समझ पा रहा।

नीलकण्ठ यहाँ गिनकर बताते हैं कि अर्जुन को उलझन किन बातों से हुई होगी। एक जगह श्रीकृष्ण कहते हैं कि वेद तीनों गुणों के कार्यों की बात करते हैं, तुम तीनों गुणों से ऊपर उठो। दूसरी जगह कहते हैं कि तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने का है, फल का नहीं। तीसरी जगह कहते हैं कि द्वन्द्वों से रहित और योगक्षेम की चिन्ता से रहित होकर आत्मा में स्थित हो जाओ, जो छोड़ने की भाषा लगती है। और फिर कहते हैं कि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर कुछ नहीं, जो कर्म की भाषा है। एक ही उपदेश में कहीं छोड़ने की बात, कहीं करने की। तो अर्जुन माँगते हैं कि निश्चय करके एक बात कहिए।

मुझे इसमें हम सब दिखते हैं। जब हम किसी बड़े फ़ैसले के सामने होते हैं, तो हम भी अक्सर यही कहते हैं: बस एक बात पक्की बता दीजिए। डॉक्टर से कहते हैं, आराम करूँ या चलूँ-फिरूँ, एक बात बताइए। और कई बार सच ये होता है कि उत्तर दोनों में है, बस अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग तरह से।

और ठीक यही तीसरा श्लोक कहता है। यहाँ से "श्रीभगवानुवाच" है, यानी भगवान बोले। लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ, ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्। हे अर्जुन, इस संसार में दो प्रकार की निष्ठा मैंने पहले कही है: सांख्ययोगियों की ज्ञानयोग से और कर्मयोगियों की कर्मयोग से।

"अनघ" यानी निष्पाप। नीलकण्ठ कहते हैं कि इसका अर्थ है विशुद्ध मन वाले, और भगवान जैसे कह रहे हैं कि मेरी बात को शुद्ध मन से सुनो, उसमें विरोध नहीं मिलेगा। फिर "पुरा प्रोक्ता", मैंने पहले कहा था। नीलकण्ठ और श्रीधर दोनों का मत है कि श्रीकृष्ण यहाँ कह रहे हैं कि मैंने दो अलग-अलग रास्ते बताए ही नहीं थे जो एक-दूसरे से अलग चलते हों। निष्ठा तो एक ही है, परमात्मा में टिक जाना, पर उसके पास पहुँचने के दो ढंग हैं, और ये दोनों ढंग अलग-अलग अधिकारी के लिए हैं। श्रीधर स्वामी इसे यूँ कहते हैं कि अगर मैंने दो अलग-अलग, एक-दूसरे से निरपेक्ष मार्ग कहे होते, तब तो तुम्हारा यह प्रश्न बनता कि दोनों में से जो भला हो, वही एक बात कहिए। पर मैंने तो एक ही बात दो प्रकार से कही।

हमारी टीका इसे बहुत सुन्दर ढंग से रखती है। वो कहती है कि श्रीकृष्ण यहाँ एक मार्ग को दूसरे से ऊपर नहीं रखते। दोनों मार्ग सच्चे हैं, अलग-अलग लोगों के लिए। ज्ञानमार्गी मन को कर्म से परे आत्मा में लगाता है, और कर्ममार्गी आसक्ति छोड़कर कर्म करता है और इससे उस ज्ञान के योग्य बनता है। यानी सवाल "कौन-सा रास्ता बड़ा है" है ही नहीं। सवाल ये है कि मैं कौन-सा रास्ता चल सकता हूँ, आज, अपने मन की इस हालत में।

मधुसूदन सरस्वती इस अध्याय की भूमिका में पूरे रास्ते को एक सीढ़ी की तरह गिनाते हैं। पहले बिना फल की चाह के कर्म में लगना, उससे अन्तःकरण का शुद्ध होना, फिर शम और दम जैसे साधन, फिर कर्मों का संन्यास, फिर भक्ति और वेदान्त का विचार, फिर तत्त्वज्ञान, और उसका फल जीवन्मुक्ति। देखिए, सीढ़ी की पहली पैड़ी कर्म है। और जो पहली पैड़ी को छोड़कर सीधे ऊपर की पैड़ी पर कूदना चाहता है, वो अक्सर बीच हवा में रह जाता है।

तो पहले तीन श्लोक हमें ये दे गए। पहला, कि जब कोई उपदेश आपको विरोधी लगे, तो गुरु पर दोष डालने से पहले कहिए "मानो", यानी शायद मेरी समझ अधूरी है। दूसरा, कि "बस एक बात पक्की बता दीजिए" की माँग बहुत स्वाभाविक है, पर कई बार उसके पीछे यह चाह भी छिपी होती है कि फ़ैसले का बोझ मुझे खुद न उठाना पड़े। और तीसरा, कि मार्ग दो हैं, पर लक्ष्य एक है, और मार्ग चुनने का सवाल अपने योग्य को पहचानने का सवाल है।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने कह दिया कि दो रास्ते हैं। अब अर्जुन के मन में सबसे सीधा सवाल उठता है, और वो हम सबके मन का सवाल है: अगर मैं काम ही छोड़ दूँ, तो क्या मुझे वो मिल जाएगा जो मैं चाहता हूँ? चौथा श्लोक इसका उत्तर देता है, और वो उत्तर थोड़ा चौंकाने वाला है।

न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते । न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥ ४ ॥
गीता 3.4 — अर्थ पढ़ें ›
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् । कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥ ५ ॥
गीता 3.5 — अर्थ पढ़ें ›
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् । इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥ ६ ॥
गीता 3.6 — अर्थ पढ़ें ›

चौथा श्लोक अर्जुन के उस मौन सवाल का उत्तर है जो अभी पूछा नहीं गया था। न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते, न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति। मनुष्य कर्मों को आरम्भ न करने से निष्कर्मता नहीं पाता, और केवल कर्मों को त्याग देने से सिद्धि को प्राप्त नहीं होता।

यहाँ दो शब्द हैं जिन पर रुकना चाहिए। पहला, "निष्कर्मता"। सुनकर लगता है कि इसका मतलब है कर्म का न होना, यानी हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाना। पर हमारी टीका इसे सीधा कर देती है। वो कहती है कि निष्कर्मता वह अवस्था है जिसमें कर्म बाँधता नहीं, केवल कर्म का न होना नहीं। और ये अवस्था शुद्ध मन और ज्ञान से आती है, और मन अपना कर्तव्य करने से शुद्ध होता है। उससे पहले काम छोड़ देने से मनुष्य मुक्त नहीं होता, केवल निकम्मा होता है। "मुक्त नहीं, निकम्मा।" ये वाक्य बहुत सीधा है, और मुझे इसमें गीता की वो आदत दिखती है कि वो मीठी बात कहकर बहलाती नहीं।

दूसरा शब्द है "सिद्धि", यानी वो पूर्णता जिसके लिए हम काम छोड़ना चाहते थे। श्रीधर स्वामी बताते हैं कि चित्त की शुद्धि के लिए, जब तक ज्ञान पैदा न हो, तब तक अपने आश्रम और अपने स्थान के योग्य कर्म करने चाहिए, वरना शुद्धि न होगी और ज्ञान उठेगा नहीं। मधुसूदन सरस्वती इसमें एक श्रुति का सहारा लेते हैं, जो कहती है कि ब्राह्मण वेद के अध्ययन से, यज्ञ से, दान से और तप से उस परमात्मा को जानना चाहते हैं। यानी जिसके लिए कारण ही नहीं बना, उसका फल कहाँ से आएगा। बीज बोया ही नहीं, और अगली सुबह वृक्ष की छाँव माँग रहे हैं।

तिलक महाराज इस श्लोक पर एक टिप्पणी जोड़ते हैं। वो कहते हैं कि संन्यास-मार्ग के कुछ टीकाकारों ने "नैष्कर्म्य" का अर्थ सीधे "ज्ञान" ले लिया, और इस आधार पर श्लोक का मतलब निकाला कि कर्मों से ही ज्ञान होता है। तिलक का कहना है कि ये अर्थ न सरल है, न ठीक। उनकी दृष्टि में श्लोक का सीधा सन्देश यही है कि कर्मों को शुरू ही न करने से कोई कर्म से छूट नहीं जाता। मैं आचार्यों के बीच के इस मतभेद को यहाँ छेड़ना नहीं चाहता। मैं बस इतना चाहता हूँ कि आप देखें कि दोनों छोर इस बात पर एकमत हैं कि कर्म का न करना छुटकारा नहीं है।

और अब वो बात, जो मुझे इस पूरे प्रसंग में सबसे सुन्दर लगती है। जब संजय युधिष्ठिर के पास भिक्षा वाली सलाह लेकर गए थे, तो युधिष्ठिर ने कहा था कि इसका उत्तर वासुदेव देंगे। उद्योग पर्व के अट्ठाईसवें अध्याय में वे कहते हैं कि अगर शान्ति छोड़ने के लिए मैं दोष के योग्य हूँ, या लड़कर अपना धर्म छोड़ रहा हूँ, तो यशस्वी केशव कहें, मैं उनकी बात का उल्लंघन नहीं करता। और तब उनतीसवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने संजय को जो उत्तर दिया, वो इन्हीं श्लोकों का पुराना रूप है। उन्होंने कहा कि कुछ ब्राह्मण कहते हैं कि परलोक की सिद्धि कर्म से मिलती है, कुछ कहते हैं कि कर्म छोड़कर ज्ञान से। पर भोजन को जानने वाला भी यहाँ बिना खाए तृप्त नहीं होता। फिर उन्होंने कहा कि कर्म का फल तो दिखता है: प्यास से व्याकुल मनुष्य पानी पीकर शान्त होता है। और जो कर्म के सिवा किसी और चीज़ को अच्छा मानता है, उस दुर्बल की बात व्यर्थ है।

एक बार ठहरकर इस उपमा को सुन लीजिए। भोजन की विधि जानना एक बात है, पेट भरना दूसरी। जो रसोई की सारी किताबें पढ़ चुका हो, वो भी भूखा सोता है अगर चूल्हा न जलाए। संजय ने ये बात श्रीकृष्ण के मुँह से पहले सुनी थी, और आज रथ पर वही बात अर्जुन के लिए नए रूप में कही जा रही है। और धृतराष्ट्र भी, हो सकता है, ये सब पहले सुन चुके हों, क्योंकि संजय उसी यात्रा से लौटकर रात को हस्तिनापुर पहुँचे थे और राजा के सामने पाण्डवों का पक्ष रखा था। पर सुनना और अपनाना अलग हैं।

अब पाँचवाँ श्लोक, जो इस सत्संग की रीढ़ है। न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्, कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः। कोई भी मनुष्य कभी एक क्षण भी बिना कर्म किए नहीं रहता, क्योंकि प्रकृति से उत्पन्न गुण सबसे विवश करके कर्म कराते हैं।

ज़रा अपने आप पर इसे आज़माइए। इस पल, जब आप ये सत्संग सुन रहे हैं, आपकी साँस चल रही है, दिल धड़क रहा है, भोजन पच रहा है, आँखें झपक रही हैं, और मन कहीं न कहीं दौड़ रहा है। आपने इनमें से किसी को करने का फ़ैसला नहीं किया था। हमारी टीका गुणों को तीन तन्तु बताती है: सत्त्व, यानी स्वच्छता, रज, यानी वेग, और तम, यानी जड़ता। जब तक मनुष्य खुद को शरीर और मन मानता है, ये तीनों उसे चलाते रहते हैं: साँस लेना, सोचना, चाहना। श्रीधर स्वामी इसमें यह जोड़ते हैं कि चाहे ज्ञानी हो या अज्ञानी, कोई भी, किसी भी अवस्था में, क्षण भर भी कर्म के बिना नहीं रहता।

संत ज्ञानेश्वर इसी बात को अपनी ज्ञानेश्वरी में बड़े सुन्दर चित्रों से समझाते हैं। वो कहते हैं कि अगर कोई सारे शास्त्रोक्त कर्म छोड़ भी दे, तो क्या इन्द्रियों का स्वभाव मर जाएगा? क्या कानों का सुनना रुक जाएगा, आँखों का तेज चला जाएगा, नाक गंध लेना छोड़ देगी, साँस की आवाजाही थम जाएगी, भूख-प्यास शान्त हो जाएगी? फिर वे कहते हैं कि जैसे सूखा पत्ता हवा के वश में बिना किसी चेष्टा के आसमान में घूमता रहता है, वैसे ही प्रकृति के आधार पर चलने वाला मनुष्य भी, कर्म छोड़कर भी, निरन्तर कर्म में रहता है। पत्ते को हवा उठा ले जाती है, और वो समझता है कि वो उड़ रहा है।

इसलिए हमारी टीका बहुत सीधा निष्कर्ष देती है: चुनाव कर्म करने और न करने में नहीं, अच्छे और बुरे कर्म में है। कर्म तो होगा ही। सवाल सिर्फ़ यह है कि वह किसके वश में होगा, मेरी समझ के या गुणों की हवा के। जो आदमी कहता है कि मैं सब छोड़कर कुछ नहीं करूँगा, वो असल में बहुत कुछ कर रहा होता है: चिन्ता कर रहा होता है, शिकायत कर रहा होता है, पुरानी बातें दोहरा रहा होता है। वो बस कर्म को चुन नहीं रहा, कर्म उसे चुन रहा है।

अब छठा श्लोक, जो ठीक यही दिखाता है। कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्, इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते। जो कर्मेन्द्रियों को रोककर मन से इन्द्रियों के विषयों का स्मरण करता हुआ बैठा रहता है, वह मूढ बुद्धि वाला मिथ्याचारी कहा जाता है।

कर्मेन्द्रियाँ हैं हाथ, पैर, वाणी और बाकी अंग। हमारी टीका कहती है कि मन में लालसा रहते हुए इन्हें रोक लेना केवल दिखावा है, भीतर कुछ नहीं बदला। श्रीधर स्वामी बताते हैं कि ऐसा आदमी भगवान के ध्यान के बहाने बैठता है, पर चूँकि मन शुद्ध नहीं, इसलिए वो आत्मा में टिक नहीं पाता। नीलकण्ठ कहते हैं कि वो एकान्त में ध्यान के बहाने आसन लगाता है, और आँखें भले बन्द हों, इन्द्रियों के विषय मन में घूम रहे हैं, इसलिए उसका आचरण दिखावा बन जाता है।

इस श्लोक का स्वर कठोर लगता है, पर मैं इसे फटकार की तरह नहीं पढ़ता। ये एक निदान है, जैसे डॉक्टर कहे कि बुखार नीचे दिख रहा है पर संक्रमण भीतर है। सोचिए, कोई आदमी काम छोड़कर घर बैठ गया है, इस इरादे से कि अब चैन मिलेगा। पर दिन भर वह पुराने दफ़्तर के झगड़े मन में दोहराता है, किसने क्या कहा, कौन आगे निकल गया। हाथ-पैर शान्त हैं और भीतर एक पूरी अदालत चल रही है। उसने काम तो छोड़ा, पर बोझ नहीं छोड़ा। और बोझ वही है जो उसे थका रहा है। मधुसूदन सरस्वती यही कहते हैं कि "मैंने तो संन्यास ले लिया" के अभिमान के साथ कर्मशून्य बैठने वाले को वह फल नहीं मिलता, क्योंकि भीतर की शुद्धि हुई ही नहीं।

तो इन तीन श्लोकों ने जो तस्वीर खींची, वह ये है। कर्म से भागकर छुटकारा नहीं मिलता, क्योंकि कर्म हमारे साथ चलता है। और जो भागकर बैठ जाता है, वह अक्सर बाहर से शान्त और भीतर से व्यस्त होता है।

पर अभी एक बात बाकी है। अगर न कर्म छोड़ने से बात बनती है, और न कर्म के भीतर मन भटकने से, तो फिर रास्ता क्या है? सातवाँ श्लोक एक आदमी का चित्र बनाता है जिसमें मन और हाथ, दोनों अपनी जगह पर हैं। आइए, उसे सुनते हैं।

यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन । कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥ ७ ॥
गीता 3.7 — अर्थ पढ़ें ›
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः । शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः ॥ ८ ॥
गीता 3.8 — अर्थ पढ़ें ›

इन दोनों श्लोकों में उतरने से पहले आपसे एक छोटी-सी बात कहना चाहता हूँ। हम तीसरे अध्याय के एक तिहाई के क़रीब पहुँच चुके हैं, और यही वो जगह है जहाँ बहुत-से लोग मन ही मन निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि अच्छा, गीता कहती है कि भागो मत, काम करते रहो, बस इतनी-सी बात। पर आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। क्योंकि अगर इतनी ही बात होती, तो ये सत्संग एक कहावत में ख़त्म हो जाता। असली बात यह है कि काम करते हुए भी आदमी कैसे हल्का रह सकता है, और उसका उत्तर इस सत्संग के अगले हिस्से में एक ऐसे शब्द में है जिसे हम रोज़ सुनते हैं और शायद कभी ठीक से समझा नहीं। तो अगर आप ये सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि ये यात्रा बीच में न टूटे। और आज का हिस्सा आख़िर तक सुनिए।

अब सातवाँ श्लोक। यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन, कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते। परन्तु हे अर्जुन, जो मन से इन्द्रियों को वश में करके, आसक्ति रहित होकर कर्मेन्द्रियों से कर्मयोग का आचरण करता है, वह श्रेष्ठ है।

ये श्लोक पिछले श्लोक का आईना है। हमारी टीका कहती है कि पिछले श्लोक से ठीक उलटा है: वहाँ अंग रुके हैं और मन दौड़ता है, यहाँ मन वश में है और अंग काम करते हैं। दूसरा सच्चा है और मन को शुद्ध करता है। देखिए कि श्रीकृष्ण क्रम कैसा रखते हैं। पहले "मनसा नियम्य", यानी मन से इन्द्रियों को सँभालना, और फिर "आरभते", यानी शुरू करना। पहले भीतर की लगाम, फिर बाहर का काम। वे ये नहीं कहते कि मन पूरा शान्त हो जाए तब काम शुरू करना। वे कहते हैं कि मन की डोर पकड़कर काम शुरू करो।

श्रीधर स्वामी इसे इस तरह खोलते हैं कि ऐसा पुरुष ज्ञानेन्द्रियों को मन से रोककर उन्हें ईश्वर की ओर झुका देता है, और कर्मेन्द्रियों से कर्म करता है, फल की इच्छा के बिना। और परिणाम यह कि चित्त शुद्ध होता है और वह ज्ञान का अधिकारी बनता है। मधुसूदन सरस्वती एक बहुत सुन्दर बात जोड़ते हैं। वे कहते हैं कि परिश्रम तो दोनों का बराबर है। जो मिथ्याचारी बनकर बैठा है, वो भी थक रहा है, और जो कर्म कर रहा है, वो भी। पर फल में अन्तर है। कर्मयोगी का फल कहीं बढ़कर है। थकावट एक-सी, नतीजा अलग। और नीलकण्ठ इस आदमी को "पुरुषधौरेय" कहते हैं, यानी पुरुषों में अग्रणी, और बताते हैं कि "असक्त" का मतलब है कर्म के फलों में, जैसे स्वर्ग या यहाँ के भोगों में, चिपका हुआ न होना।

"असक्त" शब्द को लोग अक्सर "उदासीन" समझ लेते हैं, यानी ठंडा, बेपरवाह। पर ऐसा नहीं है। असक्त का मतलब है, चिपका हुआ नहीं। एक माँ रसोई में खाना बना रही है, पूरे मन से, स्वाद का ध्यान रखकर, पर वो इसलिए नहीं बना रही कि कल कोई उसकी तारीफ़ करे। एक नर्स रात की पाली में मरीज़ के पास खड़ी है, पूरी सावधानी से, पर उसके मन में घड़ी की सुइयाँ नहीं चल रहीं। देखिए, दोनों काम कर रही हैं, दोनों थक रही हैं, पर उनके भीतर वह खिंचाव नहीं है जो हर क्षण पूछता रहे कि इससे मुझे क्या मिलेगा।

अब आठवाँ श्लोक, जिसमें श्रीकृष्ण सीधे आदेश देते हैं। नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः, शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः। तुम अपना नियत कर्म करो, क्योंकि कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है। कर्म न करने से तो तुम्हारे शरीर का निर्वाह भी नहीं होगा।

यहाँ पहला शब्द "नियत" है, और उस पर पूरी बात टिकी है। हमारी टीका कहती है कि "नियत कर्म" का अर्थ है वह कर्म जो मनुष्य के स्थान और स्वभाव से उसके हिस्से आता है, न कि जो उसे अच्छा लगे। क्षत्रिय अर्जुन के लिए यह धर्मयुद्ध लड़ना है। श्रीधर स्वामी इसमें संध्या-उपासना जैसे नित्य कर्मों को गिनते हैं, और नीलकण्ठ कहते हैं कि "नियत" वह कर्म है जिसका स्वभाव ही पाप को हटाना है। नीलकण्ठ यह भी जोड़ते हैं कि क्षत्रिय के लिए भिक्षा पर जीने का मार्ग खुला ही नहीं है, इसलिए अर्जुन का भिक्षा वाला विकल्प वैसे भी उनके हिस्से का नहीं।

और यह बात महाभारत भी कहता है, श्रीकृष्ण के अपने मुँह से। उद्योग पर्व के उनतीसवें अध्याय में, उसी उत्तर में जो उन्होंने संजय को दिया, वे प्राचीन क्षत्रिय धर्म गिनाते हैं: पढ़े, यज्ञ करे, धन दे, पर कभी कुछ माँगे नहीं। यानी जिस भिक्षा की बात संजय ने सुझाई थी, उसे श्रीकृष्ण क्षत्रिय के धर्म में गिनते ही नहीं। तो दूसरे अध्याय में अर्जुन ने जो कहा था कि भीख का अन्न खाना भी अच्छा है, उसका उत्तर गीता अब बहुत शान्ति से दे रही है।

और "शरीरयात्रापि", यानी शरीर की यात्रा भी न चलेगी। इसमें एक गहरी व्यावहारिक बात है। जो आदमी सब कुछ छोड़ने की बात करता है, उसे भी हर सुबह उठना है, खाना है, कपड़े पहनने हैं, किसी न किसी के सहारे जीना है। अकर्म, यानी पूरा न करना, शुद्ध रूप में कभी होता ही नहीं, वो हमेशा किसी और के कर्म पर टिका होता है। जब हम कहते हैं कि मैं सब छोड़ दूँगा, तो सच में हम कहते हैं कि कोई और करे, मैं उसका फल लूँ।

इस श्लोक के लिए महाभारत में मुझे एक और दृश्य याद आता है, जो नियत कर्म का अर्थ और साफ़ करता है। तेरहवें वर्ष में, जब पाण्डवों को पहचाने बिना विराट के नगर में रहना था, तो युधिष्ठिर ने भीम से पूछा था कि जिस वीर ने बक, हिडिम्ब, किर्मीर और जटासुर को मारा, वह मत्स्यराज की सेवा कैसे करेगा। भीम ने कहा कि मैं बलल नाम का रसोइया बनूँगा। और विराट पर्व के ग्यारहवें अध्याय में अर्जुन आते हैं, मूँगों के कुण्डल और शंख के कंगन पहने, बृहन्नला नाम से, वही बृहन्नला जिसे आपने छठे सत्संग में राजकुमार उत्तर का सारथि बनते सुना था, और कहते हैं कि मैं नाचना-गाना सिखाने में कुशल हूँ। राजा खुद कहते हैं कि यह वेश आपके योग्य नहीं, आपके हाथों में तो धनुष शोभा देगा। पर अर्जुन वही काम माँगते हैं, राजकुमारी उत्तरा की सखियों को संगीत सिखाना। गाण्डीव थामने वाला हाथ, उस वर्ष, नाचना-गाना सिखा रहा था। और उस पूरे वर्ष उसने काम को छोटा या बड़ा नहीं गिना, जो सामने था, वही उसने किया।

मैं यह नहीं कहता कि यही "नियत कर्म" की परिभाषा है। मैं इतना कहता हूँ कि जो लोग अपना हिस्सा समय के अनुसार निभाना जानते हैं, उनके लिए काम बदल सकता है, पर काम से भागना नहीं होता। यह मेरी अपनी पढ़त है, और मैं इसे यहीं छोड़ता हूँ।

तो सातवें और आठवें श्लोक ने हमें दो बातें दीं। एक, कि जो करना है, वो मन की डोर पकड़कर करना है, चिपके बिना। दो, कि जो करना है, वो वही है जो मेरे हिस्से आया है, वह नहीं जो मुझे अच्छा लगे।

पर अभी एक बात बाकी है। "आसक्ति छोड़कर करो" सुनना आसान है। पर आदमी बिना किसी वजह के काम क्यों करे? जब इनाम की चाह निकल जाए, तो काम में खड़े रहने की ताक़त कहाँ से आएगी? नौवाँ श्लोक इसी का उत्तर है, और उसमें एक ऐसा शब्द आता है, "यज्ञ", जिसका अर्थ हम सबने शायद बहुत छोटा समझ रखा है।

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः । तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥ ९ ॥
गीता 3.9 — अर्थ पढ़ें ›
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥ १० ॥
गीता 3.10 — अर्थ पढ़ें ›

नौवाँ श्लोक इस पूरे सत्संग की चाबी है, इसलिए इसे धीरे-धीरे सुनिए। यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः, तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर। यज्ञ के लिए किए गए कर्म को छोड़कर दूसरे कर्मों से यह संसार बँधता है। इसलिए हे कुन्तीपुत्र, आसक्ति से मुक्त होकर उसी के लिए भली-भाँति कर्म करो।

श्रीधर स्वामी, मधुसूदन सरस्वती और नीलकण्ठ, तीनों इस श्लोक के पीछे एक आपत्ति पकड़ते हैं, और आपत्ति वही है जो अर्जुन के मन में चल रही है। स्मृति का वचन है कि कर्म से जीव बँधता है। अगर कर्म बाँधता है, तो मोक्ष चाहने वाला कर्म क्यों करे? और ये सवाल हम भी रोज़ पूछते हैं, किसी और शब्द में: जब हर काम मुझे और उलझाता है, तो करूँ ही क्यों? श्रीकृष्ण का उत्तर इस श्लोक में है। वे कहते हैं कि हर कर्म नहीं बाँधता। बाँधता वह कर्म है जो यज्ञ के लिए नहीं है।

तो यज्ञ क्या है? सुनकर तुरंत हवन-कुण्ड और घी की आहुति याद आती है। पर श्रीधर और मधुसूदन दोनों यहाँ श्रुति का एक वाक्य उठाते हैं, "यज्ञो वै विष्णुः", यानी यज्ञ ही विष्णु है, और इसलिए यज्ञ के लिए कर्म का अर्थ हुआ ईश्वर की आराधना के लिए कर्म। नीलकण्ठ "यज्" धातु का अर्थ याद दिलाते हैं, देवताओं का पूजन। और हमारी टीका इसे सीधी भाषा में कहती है: यहाँ यज्ञ का अर्थ केवल हवन से बड़ा है। अपने लाभ के लिए नहीं, भगवान को अर्पण के रूप में किया गया हर कर्तव्य यज्ञ है। ऐसे किया गया कर्म बाँधने वाला संस्कार नहीं छोड़ता। आपके चूल्हे की रोटी भी, अगर वह किसी को खिलाने के लिए, एक अर्पण की तरह बनी है, तो यज्ञ है।

संत ज्ञानेश्वर इस बात को बहुत सीधे ढंग से कहते हैं। वे कहते हैं कि अपना धर्म, जो तुम्हारे हिस्से आया है, वही नित्य यज्ञ है, उसे निभाते हुए पाप के आने का रास्ता ही नहीं रहता। और जब आदमी अपना धर्म छोड़कर बुरे कर्मों में रमता है, तभी संसार का बन्धन पड़ता है। इसलिए जो अपने धर्म का पालन अखंड करता है, उस यज्ञ करने वाले को बन्धन कभी नहीं। जो लोग कर्मों से बँधे हैं, वे इसलिए बँधे हैं कि वे उस नित्य यज्ञ से चूक गए।

अब ज़रा सोचिए कि बन्धन किसमें है। काम में? या काम के साथ जुड़ी "मेरा" और "मुझे" की गाँठ में? एक अस्पताल में दो डॉक्टर हैं, दोनों उतनी ही मेहनत से ऑपरेशन करते हैं। एक के भीतर हर पल यह चलता रहता है कि अगर यह मरीज़ बच गया तो मेरा नाम होगा, और न बचा तो मेरी साख गई। दूसरा अपना पूरा कौशल उस मरीज़ को सौंपता है, और नतीजा परिस्थिति और ईश्वर पर छोड़ देता है। दोनों के हाथ एक-से हैं, पर पहला हर ऑपरेशन के साथ और भारी होता जाता है, और दूसरा भारी काम के बीच भी हल्का रह जाता है। बन्धन काम में नहीं था, गाँठ में था।

"मुक्तसङ्ग" का अर्थ यही गाँठ खोलना है, और "समाचर" का अर्थ, मधुसूदन सरस्वती बताते हैं, "भली-भाँति और श्रद्धा से करना।" यानी असक्ति का अर्थ लापरवाही नहीं है। श्रीकृष्ण यह नहीं कहते कि फल की चिन्ता नहीं तो काम आधे मन से करो। वे कहते हैं, ठीक से करो, श्रद्धा से करो, और जिसे किसी अर्पण की तरह किया है, उसके फल का बोझ उस पर छोड़ दो।

और अब मैं वह बात कहना चाहता हूँ जो इस श्लोक में छिपी है। अर्जुन ने पूछा था कि जब कोई इनाम नहीं है तो काम क्यों करूँ। यज्ञ उसका उत्तर है। काम किसी को देने के लिए है, किसी ऐसे के लिए जिसके सामने मैं छोटा हूँ। जब मैं उसके लिए करता हूँ, तो थकान में भी एक सम्मान होता है। वही ताक़त है जो इनाम की जगह खड़ी होती है।

महाभारत में युधिष्ठिर ने उद्योग पर्व के अट्ठाईसवें अध्याय में कुछ ऐसी ही बात संजय से कही थी। उन्होंने कहा कि हमारे पिता और दादा उसी मार्ग पर चले, जो यज्ञ चाहते थे और जो अपने कर्म करते थे, और उसके सिवा मैं कोई दूसरा मार्ग नहीं मानता, मैं नास्तिक नहीं हूँ। और श्रीकृष्ण ने उनतीसवें अध्याय में क्षत्रिय का वह रूप बताया जिसमें वह सावधान रहकर धर्म से प्रजा की रक्षा करता है, दान देता है, और यज्ञों से पूजा करता है। यानी राजा के लिए प्रजा की रक्षा भी यज्ञ की क़तार में थी। यह मेरी अपनी पढ़त है, पर इतना पक्का है कि श्रीकृष्ण वहाँ रक्षा, दान और यज्ञ को एक ही साँस में गिनते हैं।

अब दसवाँ श्लोक। सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः, अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्। आरम्भ में प्रजापति ने यज्ञ के साथ प्रजा को रचकर कहा, इससे तुम बढ़ो, यह तुम्हें इच्छित भोग देने वाला हो।

यहाँ श्लोक एक बहुत पुरानी बात याद दिलाता है, जो सृष्टि के आरम्भ की है। "सहयज्ञाः", यानी यज्ञ के साथ। प्राणी अकेले नहीं रचे गए, उनके साथ यज्ञ भी रचा गया, जैसे मनुष्य के साथ-साथ साँस रची गई। हमारी टीका कहती है कि यज्ञ को सृष्टि के आरम्भ से ही उसका अंग बताया गया है, बाद में जोड़ा गया नहीं। और "अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्", इससे बढ़ो, यह तुम्हारी इच्छाएँ दुहने वाला हो, इसमें कामधेनु का संकेत है, वह गाय जो हर इच्छा पूरी करती है। श्रीधर स्वामी बताते हैं कि यहाँ "यज्ञ" शब्द सब आवश्यक कर्मों का प्रतिनिधि है, यानी वे सब काम जो अपने स्थान पर करने ही हैं।

संत ज्ञानेश्वर इस प्रसंग को एक कथा की तरह कहते हैं, और उनका चित्र सुन्दर है। वे कहते हैं कि प्राणियों को रचते समय ब्रह्मा ने उनके साथ नित्य यज्ञ भी रचा, पर प्राणी उसे जान न सके, क्योंकि वह सूक्ष्म था। तब उन्होंने ब्रह्मा से पूछा कि हमारा आश्रय क्या है। और ज्ञानेश्वर के शब्दों में ब्रह्मा ने कहा कि तुम्हें व्रत-नियमों से शरीर को पीड़ा नहीं देनी, बहुत दूर तीर्थों में नहीं भागना, किसी चाह के साथ मन्त्र-यन्त्र के विधान नहीं करने, दूसरे देवताओं को खोजना नहीं। तुम बस अपने कर्तव्य के यज्ञ में बिना प्रयास के यजन करो, बिना किसी हेतु के, जैसे पतिव्रता पति की सेवा करती है। तब यह कर्तव्य ही तुम्हारे लिए कामधेनु हो जाएगा, और कभी तुम्हें छोड़कर नहीं जाएगा।

मैं यहाँ एक बात साफ़ कर दूँ। ज्ञानेश्वर महाराज की यह व्याख्या उनका अपना ज़ोर है, और वे यह सिखा रहे हैं कि जो सबसे पास रखा है, उसी में ईश्वर को ढूँढ़ो। इसका अर्थ यह नहीं कि तीर्थ या अनुष्ठान बेकार हैं। इसका अर्थ यह है कि कई बार हम उन्हें इसलिए पकड़ते हैं कि अपने सामने रखे कर्तव्य से बच सकें। और यह बात शायद हम सबके लिए है।

तो नौवें और दसवें श्लोक ने हमें दो चित्र दिए। एक, कि बन्धन कर्म में नहीं, कर्म की गाँठ में है, और अर्पण वह है जो गाँठ खोल देता है। दो, कि यह अर्पण कोई बाद में जोड़ी हुई रीति नहीं, वह सृष्टि के साथ ही आया है।

पर अभी एक बात बाकी है। प्रजापति ने अगली पंक्ति में कहा है, "तुम देवताओं को बढ़ाओ, और देवता तुम्हें बढ़ाएँ।" यह देवता कौन हैं, और मनुष्य उन्हें क्या दे सकता है जो वे नहीं रखते? ग्यारहवाँ श्लोक एक ऐसा चक्र दिखाता है जिसे समझ लेने पर देने-लेने की पूरी दुनिया हमारी आँखों में बदल जाती है।

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः । परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ ११ ॥
गीता 3.11 — अर्थ पढ़ें ›
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः । तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ॥ १२ ॥
गीता 3.12 — अर्थ पढ़ें ›

ग्यारहवाँ श्लोक वह पंक्ति दोहराता है जो प्रजापति ने कही थी, और उसे ज़रा खोल देता है। देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः, परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ। तुम इससे देवताओं को उन्नत करो और वे देवता तुम्हें उन्नत करें। इस प्रकार एक-दूसरे को उन्नत करते हुए तुम परम कल्याण प्राप्त करोगे।

सबसे पहले इसके दो शब्द। "भावयत" का अर्थ है पोषण करना, बढ़ाना, तृप्त करना। श्रीधर स्वामी इसे सीधे कहते हैं कि यज्ञ में देवताओं को उनका भाग देकर उन्हें बढ़ाओ, और वे देवता वर्षा और अन्न के द्वारा तुम्हें बढ़ाएँ। यानी बात आदान-प्रदान की है, एक तरफ़ा भीख की नहीं। मधुसूदन सरस्वती इसमें इन्द्र आदि देवताओं के तृप्त होने का और यजमान के परम श्रेय पाने का उल्लेख करते हैं। नीलकण्ठ इसे "देवता की पूजा का यज्ञ" कहते हैं।

अब सवाल उठता है कि यह देवता कौन हैं, और आज के आदमी के लिए यह बात कैसे खुलती है। हमारी टीका सरल उत्तर देती है: देवता संसार को चलाने वाली शक्तियाँ हैं, जैसे वर्षा, सूर्य, वायु आदि। और श्लोक देने के ऐसे चक्र का वर्णन करता है जिसमें दोनों पक्ष एक-दूसरे को चलाते हैं। मैं इसे वैसे ही रखना चाहता हूँ जैसा लिखा है, पूरे आदर के साथ। शास्त्र की दृष्टि में सूर्य, वर्षा और वायु निर्जीव मशीन नहीं, वे चलाने वाली शक्तियाँ हैं, जिनके प्रति कृतज्ञता का एक विधान है। वह विधान यज्ञ है।

और यहाँ महाभारत हमें श्रीकृष्ण की अपनी आवाज़ में ठीक यही दृश्य दिखाता है, उसी उत्तर में जो उन्होंने संजय को दिया था। उद्योग पर्व के उनतीसवें अध्याय में वे गिनाते हैं कि कर्म से ही देवता परलोक में चमकते हैं, कर्म से ही यहाँ वायु बहती है, कर्म से ही सूर्य रोज़ बिना थके उगता है और दिन-रात बनाता है। चन्द्रमा बिना थके महीनों और पखवाड़ों से गुज़रता है। अग्नि जलाई जाती हुई बिना थके जलती है और प्राणियों के लिए अपना काम करती है। पृथ्वी बिना थके इतना बड़ा बोझ उठाती है, नदियाँ बिना थके जल बहाकर सब प्राणियों को तृप्त करती हैं, और बरसाने वाला देव भी बिना थके बरसता है। फिर वे कहते हैं कि इन्द्र ने भी देवताओं में श्रेष्ठ बनने के लिए बिना थके ब्रह्मचर्य का पालन किया, सुख और मन की प्रिय चीज़ें छोड़ीं, और सत्य, धर्म, संयम और सहनशीलता से अपना पद पाया। वैसे ही बृहस्पति ने भी।

आप देखिए कि यह कितना बड़ा आईना है। जिन्हें हम देवता कहते हैं, उनके बारे में भी श्रीकृष्ण यही कहते हैं कि वे कर्म से ही चमकते हैं और बिना थके अपना काम करते हैं। तो अर्जुन का यह सवाल कि क्या मैं काम छोड़ दूँ, उस पूरे ब्रह्माण्ड के सामने रखा जाए तो अटपटा लगता है, जहाँ सूरज एक दिन के लिए भी छुट्टी नहीं लेता। अर्जुन को डाँट नहीं मिल रही, उसे सिर्फ़ यह दिखाया जा रहा है कि वह जिस घर में खड़ा है, वह घर किस पर चलता है।

इस श्लोक का "परस्परं भावयन्तः" हमारे रोज़ के जीवन में सुनाई देता है। किसान अनाज उगाता है और शहर उसे खाता है, और शहर का काम किसान तक कपड़ा, दवा और स्कूल पहुँचाता है। माँ बच्चे को पालती है और बच्चा बड़ा होकर माँ को सँभालता है। जिस दिन यह आदान-प्रदान रुकता है, उसी दिन कोई न कोई भूखा रह जाता है। गीता कहती है कि यह सिर्फ़ मनुष्यों के बीच का नहीं, पूरे संसार का नियम है।

अब बारहवाँ श्लोक, जो थोड़ा तीखा लगता है। इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः, तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः। यज्ञ से उन्नत देवता तुम्हें इच्छित भोग देंगे। उनके दिए हुए भोगों को जो उन्हें बिना दिए भोगता है, वह चोर ही है।

"चोर" शब्द सुनकर चौंकना स्वाभाविक है। पर हमारी टीका इसे बहुत सँभालकर खोलती है। वो कहती है कि संसार के साझे भण्डार से लेना और कुछ न लौटाना चोरी है, चाहे कोई कानून न टूटे। ध्यान दीजिए कि श्लोक पहले यही कह रहा है कि इच्छित भोग मिलेंगे। यानी भोग को बुरा नहीं कहा जा रहा। देवता देते हैं, और लेना ग़लत नहीं है। चोरी तब बनती है, जब सारा लेना ही लेना हो, और देना कहीं हो ही नहीं।

मधुसूदन सरस्वती इसी बात को ऋण की भाषा में रखते हैं। वे कहते हैं कि देवताओं के दिए भोग ऋण जैसे हैं, और जो यज्ञ में देवता के उद्देश्य से कुछ अर्पित किए बिना केवल अपने शरीर और इन्द्रियों को तृप्त करता है, वह देवताओं के ऋण को चुकाए बिना उनका धन खा रहा है। मधुसूदन यह भी कहते हैं कि यज्ञ का फल सिर्फ़ परलोक का नहीं, यहाँ के पशु, अन्न और धन भी इसी से मिलते हैं। श्रीधर स्वामी बताते हैं कि पंचयज्ञ आदि से देवताओं को दिए बिना खाने वाला चोर जानना चाहिए, और नीलकण्ठ उन्हीं नित्य यज्ञों में वैश्वदेव और अग्निहोत्र को गिनते हैं।

मैं इस श्लोक को किसी पर उँगली उठाने के लिए नहीं पढ़ता। मैं इसे हिसाब की तरह पढ़ता हूँ। जिस पानी को हम पीते हैं, जिस हवा में हम साँस लेते हैं, जिस सड़क पर हम चलते हैं, जिस माँ ने रातें जागकर हमें पाला, उसके सामने हम सब किसी न किसी ऋण में खड़े हैं। श्लोक यह नहीं कहता कि तुम बुरे हो। वह कहता है कि जो मिला है, उसमें से कुछ वापस रखना ही उस मिलने को पूरा करता है। और जब कोई यह हिसाब बिल्कुल भूल जाता है, तो उसके भीतर एक अजीब ख़ालीपन आता है, जो और ज़्यादा पाने से नहीं भरता।

संत ज्ञानेश्वर इस ख़ालीपन का चित्र बहुत ख़ूब खींचते हैं। वे कहते हैं कि जो आदमी सारी सम्पत्ति पाकर भी इन्द्रियों के मद में चलता है, स्वाद के पीछे लालची हो जाता है, अग्नि में आहुति नहीं देता, देवताओं की पूजा नहीं करता, घर आए अतिथि को भोजन नहीं देता, गुरु की भक्ति से विमुख हो जाता है और अपनों को सन्तोष नहीं देता, उसे बहुत बड़ी हानि होती है, क्योंकि जो हाथ में था वह भी चला जाता है। वह मिले हुए भोगों को भी भोग नहीं पाता। फिर वे उपमा देते हैं, जैसे जिस शरीर की आयु पूरी हो चुकी हो उसमें प्राण नहीं टिकते, या जैसे अभागे के घर में लक्ष्मी नहीं रहती। कितनी सटीक बात है। देना बन्द करने वाला आदमी सिर्फ़ दूसरों को नहीं खोता, वह अपने पास रखे हुए का स्वाद भी खो देता है।

तो ये दो श्लोक हमें क्या दे गए? पहला, कि जिस संसार में हम काम माँग रहे हैं या छोड़ना चाहते हैं, वह संसार खुद लगातार काम कर रहा है, और हम उसके उसी चक्र के भीतर हैं। दूसरा, कि लेना बुरा नहीं, पर केवल लेना अधूरा है।

पर अभी एक बात बाकी है। अगर यह सब सुनकर हमारे मन में सवाल उठे कि मैं तो आम गृहस्थ हूँ, रोज़ चूल्हा जलाता हूँ, रोज़ कुछ पचाता हूँ, मैं क्या लौटाऊँ, मेरे पास यज्ञ का समय कहाँ, तो अगला श्लोक सीधे गृहस्थ की रसोई में उतर आता है। और उसी के साथ महाभारत की एक ऐसी रसोई याद आती है जिसका अन्न बारह वर्ष तक कभी घटा नहीं।

यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः । भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥ १३ ॥
गीता 3.13 — अर्थ पढ़ें ›
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः । यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥ १४ ॥
गीता 3.14 — अर्थ पढ़ें ›

तेरहवाँ श्लोक सीधा रसोई में आता है। यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः, भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्। यज्ञ से बचा हुआ खाने वाले सज्जन सब पापों से छूट जाते हैं। परन्तु जो पापी केवल अपने लिए पकाते हैं, वे पाप ही खाते हैं।

इस श्लोक का आधार हमारी टीका बड़े सीधे ढंग से बताती है। वह कहती है कि गृहस्थ के दैनिक जीवन में, यानी पीसने, पकाने, बुहारने आदि में, छोटे जीवों को अनजाने कष्ट होता है। इसलिए देवता, ऋषि, पितर, अतिथि और जीवों को रोज़ भाग देकर, बचे हुए अन्न से भोजन करने पर वह दोष मिटता है। पहले और अकेले खाने से वह बना रहता है। श्रीधर स्वामी और नीलकण्ठ दोनों इसे स्मृति के वचन से जोड़ते हैं, जो पाँच चीज़ें गिनाता है: ओखली और मूसल, चक्की, चूल्हा, पानी का घड़ा और झाड़ू। गृहस्थ के घर के यही पाँच काम हैं, और इन्हीं से अनजाने में हिंसा होती है। उसका उपाय पाँच दैनिक यज्ञ हैं, जिन्हें हम आज शायद पंच महायज्ञ के नाम से जानते हैं।

आप सोचिए कि यह कितनी मानवीय दृष्टि है। श्लोक कहता है कि तुम चूल्हा जलाओगे, चक्की चलाओगे, झाड़ू लगाओगे, तो कुछ सूक्ष्म जीवों को पीड़ा होगी, और यह जीने की क़ीमत है। इसका हल यह नहीं कि जीना छोड़ दो। हल यह है कि जो पकाओ उसमें से पहले कुछ दूसरों को दो, और जो बचे उसे कृतज्ञता से खाओ। ऐसा नहीं कि पूरा बोझ आपके कन्धों पर रहे। आप दे सकते हैं, और देना ही उस दोष का मरहम है।

और यहाँ महाभारत में एक रसोई है जो इस श्लोक को चलती-फिरती आँखों से दिखा देती है। वन पर्व के तीसरे अध्याय में पाण्डव वनवास में हैं। राज्य जा चुका है, और उनके पीछे-पीछे बहुत से वेदपाठी ब्राह्मण चले आए हैं। युधिष्ठिर पुरोहित धौम्य से कहते हैं कि मैं इन्हें छोड़ भी नहीं सकता, और पालने की सामर्थ्य भी मेरे पास नहीं, बताइए मैं क्या करूँ। ध्यान दीजिए, उस घड़ी में युधिष्ठिर के पास एक सुविधाजनक रास्ता था: मैं ख़ुद वन में हूँ, मेरी क्या ज़िम्मेदारी। पर उन्होंने ज़िम्मेदारी को नहीं छोड़ा, उसका उपाय पूछा।

धौम्य जो उत्तर देते हैं, वह तीसरे अध्याय के पाँचवें से नौवें श्लोकों में है, और वह लगभग हमारे चौदहवें श्लोक की तस्वीर है। वे कहते हैं कि प्राचीन काल में प्राणी भूख से बहुत पीड़ित होते थे, तब सूर्य ने अपने पिता की तरह उन पर दया की। उत्तरायण में वह अपनी किरणों से जल को ऊपर खींच लेता है, और दक्षिणायन में लौटकर वही जल धरती पर बरसाता है। जब धरती खेत बन गई, तब चन्द्रमा ने सूर्य का तेज लेकर उसमें पौधे उगाए। और धौम्य निष्कर्ष कहते हैं कि प्राणियों के प्राणों का सहारा अन्न सचमुच सूर्य से ही बना है, इसलिए उसकी शरण में जाइए। पानी का ऊपर जाना और नीचे आना, खेत का बनना, अन्न का उगना और प्राणों का पलना, वह एक चक्र है। और युधिष्ठिर उसी चक्र में अपना कर्म जोड़ते हैं। वे गंगा के जल में खड़े होकर तप करते हैं, सूर्य की स्तुति गाते हैं, और सूर्य प्रसन्न होकर दर्शन देते हैं, बारह वर्ष तक अन्न देने का वचन देते हैं, और उन्हें ताँबे का एक बर्तन देते हैं। उनके शब्द थे कि जब तक द्रौपदी इस बर्तन से परोसेगी, तब तक रसोई में जो पकेगा, वह कभी घटेगा नहीं।

और फिर वही दृश्य, जो मुझे सबसे प्यारा लगता है। वन पर्व के तीसरे अध्याय में बताया गया है कि भोजन किस क्रम में होता था। पहले ब्राह्मण भोजन करते। उनके बाद युधिष्ठिर छोटे भाइयों को भोजन कराते। उसके बाद वे स्वयं बचा हुआ अन्न खाते। और युधिष्ठिर को खिलाकर द्रौपदी बचा हुआ खाती। जब द्रौपदी खा लेती, तब उस दिन का अन्न समाप्त हो जाता। यज्ञशिष्टाशी, यानी यज्ञ से बचा हुआ खाने वाला। श्लोक ने जो कहा, वह एक घर में, एक रसोई में, रोज़ की रीत बना हुआ था। जो सबको खिलाकर अन्त में खाती थी, उसके खा लेने के बाद ही उस दिन का अन्न पूरा होता था।

अब चौदहवाँ श्लोक, जो इस सत्संग की रीढ़ में से एक है। अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः, यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः। प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न वर्षा से होता है, वर्षा यज्ञ से होती है और यज्ञ कर्म से उत्पन्न होता है।

हमारी टीका इस श्लोक को अगले दो श्लोकों के साथ जोड़कर देखती है। वह कहती है कि श्लोक 14 से 16 संसार-चक्र को एक कड़ी के रूप में दिखाते हैं: प्राणी, अन्न, वर्षा, यज्ञ, कर्म, और फिर वापस। हर कड़ी पिछली पर टिकी है, इसलिए कर्म से इनकार करना चक्र को तोड़ना है। श्रीधर स्वामी इसके साथ स्मृति का एक वचन रखते हैं कि अग्नि में दी हुई आहुति सूर्य तक पहुँचती है, सूर्य से वर्षा होती है, वर्षा से अन्न, और अन्न से प्रजा। मधुसूदन सरस्वती याद दिलाते हैं कि इनमें से पहली दो कड़ियाँ तो सबको दिखती ही हैं: प्राणी अन्न से बनते हैं और अन्न वर्षा से। बाक़ी कड़ियाँ शास्त्र बताता है। और संत ज्ञानेश्वर इसे इस क्रम में सुनाते हैं कि प्राणी अन्न से बढ़ते हैं, अन्न को वर्षा जन्म देती है, वर्षा का जन्म यज्ञ में है, यज्ञ को कर्म प्रकट करता है, और कर्म का आदि वेद है।

मैं श्लोक की बात को वैसे ही रखता हूँ जैसे वह है। इसमें एक चक्र है, जिसमें हर कड़ी अगली को सँभालती है। और इसे आप अपनी आज की ज़िंदगी में उतारकर देखना चाहें, तो आपकी थाली की रोटी तक पहुँचने में किसान, ट्रक चलाने वाला, दुकानदार, और रसोई में आपकी माँ या पत्नी, इतने हाथ लगे हैं। उनमें से कोई एक हाथ खींच ले, तो रोटी वहीं रुक जाती है। और आपका काम भी किसी की थाली तक पहुँचने वाली एक कड़ी है, जिसे आप शायद देख नहीं पाते।

अब इसे उस सवाल पर रखकर देखिए जिसके साथ हम आज बैठे थे। जब भागने का मन करता है, तब भीतर एक ही तस्वीर होती है: मैं अकेला हूँ और सारा बोझ मेरे कन्धों पर है। चौदहवाँ श्लोक उस तस्वीर को बदलता है। वह कहता है कि तुम अकेले नहीं हो। तुम एक चक्र की कड़ी हो। तुम्हारे आगे एक कड़ी है जो तुम्हें थामे है, और तुम्हारे पीछे एक कड़ी है जिसे तुम थामे हो। तुम जब काम करते हो तो तुम बोझ नहीं उठा रहे, तुम एक बहते हुए प्रवाह का हिस्सा हो। और जब कड़ी अपना काम छोड़ती है, तब चक्र उस कड़ी के बिना नहीं चलता, और बाक़ी कड़ियाँ उस ख़ाली जगह का बोझ उठाती हैं। यह डराने की बात नहीं है। यह बताने की बात है कि आपका होना किसी के लिए मायने रखता है।

तो तेरहवें और चौदहवें श्लोक ने हमें क्या दिया? पहला, कि अनजाने में होने वाली छोटी हानियों का भी इलाज है, और वह है पहले देना, फिर खाना। दूसरा, कि जीवन एक चक्र है जिसमें आप एक कड़ी हैं, अकेले ढोने वाले नहीं।

पर अभी एक बात बाकी है। चक्र की इस कड़ी में पहली बार "ब्रह्म" शब्द आने वाला है, और वह दो बार आता है, पर दोनों बार अलग अर्थ में। पन्द्रहवाँ श्लोक बताता है कि इस पूरे चक्र की जड़ कहाँ है, और सोलहवाँ श्लोक उस आदमी के बारे में बोलता है जो चक्र में अपनी कड़ी निभाता नहीं। वह श्लोक कठोर शब्दों में है, पर उसके पीछे जो बात है वह कोमल है।

कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् । तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥ १५ ॥
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एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः । अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥ १६ ॥
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पन्द्रहवाँ श्लोक पूरे चक्र की जड़ तक ले जाता है। कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्, तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्। कर्म को वेद से उत्पन्न जानो और वेद को अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न। इसलिए सर्वव्यापी ब्रह्म सदा यज्ञ में प्रतिष्ठित है।

यहाँ "ब्रह्म" शब्द दो बार आता है, और हमारी टीका इसे सुलझा देती है। वह कहती है कि श्लोक में पहला "ब्रह्म" वेद है, जो बताता है कि कौन-सा कर्म करना है, और दूसरा सर्वव्यापी परमात्मा है। चूँकि यह कड़ी अविनाशी तक जाती है, इसलिए यज्ञ में परमात्मा सदा उपस्थित है। यानी चक्र का सिरा एक ऐसी जगह जाकर टिकता है जो कभी मिटती नहीं।

श्रीधर स्वामी वेद के लिए श्रुति का वाक्य रखते हैं कि ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद उस महान सत्ता का निःश्वास हैं, यानी उसकी साँस जैसे। जैसे साँस सोचकर नहीं ली जाती, सहज निकलती है, वैसे वेद भी किसी आदमी के रचने से नहीं, उसी सत्ता से अपने आप प्रकट हुआ। मधुसूदन सरस्वती और नीलकण्ठ इसी से यह निष्कर्ष लेते हैं कि जो वाणी किसी मनुष्य की रची नहीं, उसमें मनुष्य की भूल की शंका नहीं, इसलिए धर्म के विषय में वही प्रमाण है। श्रीधर "यज्ञे प्रतिष्ठितम्" को एक सुन्दर उपमा से खोलते हैं, "उद्यमस्था सदा लक्ष्मीः", यानी लक्ष्मी सदा उद्यम में रहती है। जैसे हम कहते हैं कि लक्ष्मी मेहनत में बसती है, वैसे ही परमात्मा कर्तव्य के उस यज्ञ में बसता है, जो उसके लिए किया जाए।

इसे अपनी बात से जोड़िए। जब हम काम छोड़कर कहीं दूर चले जाने की बात सोचते हैं, तो अक्सर मन में एक तस्वीर होती है कि शान्ति और ईश्वर कहीं और हैं, काम की इस भागदौड़ से अलग किसी जगह। पन्द्रहवाँ श्लोक उस तस्वीर को धीरे से पलट देता है। वह कहता है कि जो सर्वत्र है, वह यज्ञ में, यानी अर्पण के रूप में किए जा रहे कर्तव्य में, सदा रहता है। अर्थात अगर आप अपने सामने रखे काम को सचमुच अर्पण की तरह कर रहे हैं, तो आप उसी जगह खड़े हैं जहाँ वह मिलता है। इसके लिए कहीं जाना नहीं पड़ता।

अब सोलहवाँ श्लोक, जो इस पूरे सिलसिले का समापन है। एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः, अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति। हे पार्थ, जो यहाँ इस प्रकार चलाए गए चक्र को आगे नहीं चलाता, वह इन्द्रियों में रमने वाला पापमय जीवन जीता है। वह व्यर्थ ही जीता है।

शब्द कठोर हैं, "अघायु" और "मोघं", पर इन्हें ठीक से सुनिए। श्रीधर स्वामी "अघायु" का अर्थ बताते हैं कि जिसकी आयु अघ, यानी पाप में बीतती है, क्योंकि वह इन्द्रियों के विषयों में ही रमता है, ईश्वर की आराधना के लिए किए जाने वाले कर्म में नहीं। नीलकण्ठ कहते हैं कि वह न धर्म में रमता है, न आत्मा में, केवल इन्द्रियों में, और ऐसे जीता है जैसे मच्छर-मक्खी जीते हैं। फिर नीलकण्ठ उसी साँस में उलटा भी कहते हैं कि जो इस चक्र को चलाता है, वह जगत का उपकार करने वाला धन्य है। श्लोक के पीछे कोई शाप नहीं है। इसमें एक थकान का निदान है।

ज़रा सोचिए कि "मोघं जीवति" कैसा होता है। कोई आदमी हर दिन कमाता है और हर शाम खर्च करता है, सिर्फ़ अपने सुख के लिए। आज का ख़रीदा हुआ सुख कल पुराना हो जाता है, और फिर अगला ख़रीदना पड़ता है। कहीं कोई ऐसी चीज़ नहीं बन रही जो उसके जाने के बाद भी रहे, जो किसी की थाली तक पहुँचे, किसी के काम आए। और कुछ वर्षों में उसके भीतर एक अजीब ख़ालीपन उठता है, जिसे वह "सब कुछ है, फिर भी कुछ नहीं है" कहता है। मुझे लगता है कि सोलहवाँ श्लोक उसी ख़ालीपन का नाम है। वह यह नहीं कहता कि सुख लेना पाप है। वह कहता है कि केवल सुख में रमे रहना, चक्र में कुछ जोड़े बिना, व्यर्थ जीना है।

और अब वह बात जो मैं चाहता हूँ कि इस सत्संग से आप साथ ले जाएँ। अर्जुन का सवाल था कि काम छोड़ दूँ या करता रहूँ। श्रीकृष्ण ने सोलह श्लोकों में उसे कुछ ऐसा दिखाया है जो उत्तर से बड़ा है, एक पूरी तस्वीर। तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली बात। काम छोड़ देने से कर्म नहीं छूटता। पाँचवें श्लोक ने कहा था कि कोई एक क्षण भी बिना कर्म के नहीं रहता, और छठे ने बताया कि बाहर से बैठा हुआ आदमी भीतर बहुत कुछ करता रहता है। इसलिए अगली बार जब भागने का मन करे, तो अपने से पूछिए: मुझे काम थका रहा है, या उसके साथ बँधी कोई गाँठ? गाँठ खुल सकती है। और सोमवार की सुबह तो वैसे भी आनी है, तो क्यों न वह हल्के मन से आए।

दूसरी बात। जो आपके हिस्से आया है, उसे मन की लगाम पकड़कर, फल से चिपके बिना, और किसी को अर्पण की तरह कीजिए। सातवें, आठवें और नौवें श्लोक का यह निचोड़ है। रोज़ के एक काम को चुन लीजिए, चाहे वह रसोई का हो या दफ़्तर का, और सुबह उसे शुरू करने से पहले बस इतना मन में कह दीजिए कि यह मैं किसी के लिए कर रहा हूँ। देखिए कि उस काम का वज़न कैसे बदलता है।

तीसरी बात। आप एक चक्र की कड़ी हैं, अकेले ढोने वाले नहीं। ग्यारहवें से सोलहवें श्लोक तक यही तस्वीर थी। आपने जो पाया है, उसमें से आज कुछ लौटाइए, छोटा-सा ही सही: किसी को भोजन, किसी को समय, किसी के काम में हाथ। युधिष्ठिर ने वन में भी अपनी रसोई से ब्राह्मणों को भोजन कराया, और द्रौपदी सबके बाद खाती रही। देना ही कड़ी को मज़बूत रखता है।

अगली बार हम इसी अध्याय में आगे बढ़ेंगे, सत्रहवें श्लोक से। अब तक श्रीकृष्ण ने बताया कि कर्म कैसे करना है। अगली बार वे उन लोगों की बात करेंगे जिन्हें कुछ पाना शेष नहीं रहा, जो अपने आप में पूरी तरह तृप्त हैं, और फिर भी काम करते रहते हैं। जनक का नाम आएगा, और स्वयं श्रीकृष्ण का भी, कि वे क्यों कर्म करते हैं जबकि उन्हें कुछ पाना नहीं है। और उसके बाद जो कहा जाएगा, वह हमारे अपने बच्चों के सामने, हमारे अपने घर में, हमारे उदाहरण बनने की बात होगी।

आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आपके जीवन में वह कौन-सा काम है जिसे छोड़ने का मन सबसे ज़्यादा होता है? और अगर आज एक बार उसे बिना फल की गिनती के, किसी के लिए अर्पण की तरह कर सकें, तो वह किसके लिए होगा? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्री कृष्ण।

काम से भागकर कोई मुक्त नहीं हुआ। काम को अर्पण बनाकर बहुतों ने भार उतारा है।

जय श्री कृष्ण।

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः । तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥ ९ ॥
गीता 3.9 — अर्थ पढ़ें ›

तीन बातें

  1. काम छोड़ देने से कर्म नहीं छूटता। पाँचवें श्लोक ने कहा था कि कोई एक क्षण भी बिना कर्म के नहीं रहता, और छठे ने बताया कि बाहर से बैठा हुआ आदमी भीतर बहुत कुछ करता रहता है। इसलिए अगली बार जब भागने का मन करे, तो अपने से पूछिए: मुझे काम थका रहा है, या उसके साथ बँधी कोई गाँठ? गाँठ खुल सकती है। और सोमवार की सुबह तो वैसे भी आनी है, तो क्यों न वह हल्के मन से आए।
  2. जो आपके हिस्से आया है, उसे मन की लगाम पकड़कर, फल से चिपके बिना, और किसी को अर्पण की तरह कीजिए। सातवें, आठवें और नौवें श्लोक का यह निचोड़ है। रोज़ के एक काम को चुन लीजिए, चाहे वह रसोई का हो या दफ़्तर का, और सुबह उसे शुरू करने से पहले बस इतना मन में कह दीजिए कि यह मैं किसी के लिए कर रहा हूँ। देखिए कि उस काम का वज़न कैसे बदलता है।
  3. आप एक चक्र की कड़ी हैं, अकेले ढोने वाले नहीं। ग्यारहवें से सोलहवें श्लोक तक यही तस्वीर थी। आपने जो पाया है, उसमें से आज कुछ लौटाइए, छोटा-सा ही सही: किसी को भोजन, किसी को समय, किसी के काम में हाथ। युधिष्ठिर ने वन में भी अपनी रसोई से ब्राह्मणों को भोजन कराया, और द्रौपदी सबके बाद खाती रही। देना ही कड़ी को मज़बूत रखता है।