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सत्संग ९

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शांति के बिना सुख कहाँ

गीता 2.64–2.72 · 72 मिनट

भरा हुआ समुद्र: इच्छाएँ आएँ पर मन न डोले

रागद्वेषविमुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् । आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥ ६४ ॥
गीता 2.64 — अर्थ पढ़ें ›
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते । प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥ ६५ ॥
गीता 2.65 — अर्थ पढ़ें ›

एक आदमी के पास सब कुछ है। अच्छा घर है, परिवार है, समाज में इज़्ज़त है, महीने के आख़िर में पैसा भी बचता है। फिर भी हर रात उसे नींद देर से आती है, और सुबह वो थका हुआ उठता है। और दूसरा आदमी है, जिसके पास इतना सब नहीं, पर वो रात को आराम से सोता है और सुबह हल्के मन से उठता है। तो सुख असल में कहाँ रहता है? उन चीज़ों में जो हमारे पास हैं, या मन की उस हालत में जिसे हम शांति कहते हैं? और अगर वो हालत है, तो क्या उसे पाया जा सकता है, या वो कुछ ही लोगों को मिली होती है? आज का सत्संग इसी सवाल पर है: शांति के बिना सुख कहाँ।

जय श्री कृष्ण।

आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का नौवाँ सत्संग है, और दूसरे अध्याय का आख़िरी। हमने इस अध्याय में बहुत लम्बा रास्ता तय किया है। अर्जुन के आँसुओं से शुरू होकर आत्मा के अमर होने तक, फिर कर्तव्य और फल की चिन्ता तक, और पिछली बार हम स्थितप्रज्ञ की कथा में गुस्से की उस जंजीर तक पहुँचे थे जो एक छोटे-से विचार से शुरू होकर आदमी को पूरी तरह गिरा देती है। आज उस अध्याय की आख़िरी नौ कड़ियाँ हैं, और ये वो हैं जिनमें श्रीकृष्ण सबसे सीधे उस चीज़ की बात करते हैं जिसे हम सब ढूँढते हैं: शांति।

पहले जल्दी से याद कर लें कि पिछली बार कहाँ रुके थे। अर्जुन ने चौवनवें श्लोक में एक सवाल पूछा था, जिसमें असल में चार सवाल थे: जो स्थिर बुद्धि वाला है, वो कैसे बोलता है, कैसे बैठता है, और कैसे चलता है। हमारी टीका इस पर एक बहुत काम की बात कहती है: अर्जुन बाहर के लक्षण पूछ रहे हैं, पर श्रीकृष्ण का पूरा उत्तर भीतर के लक्षणों पर है। वो क्या चाहता है, किससे डरता है, और किसे पकड़े रहता है। श्रीकृष्ण ने कहा कि जो मन की सब कामनाओं को छोड़कर अपने आप में ही सन्तुष्ट रहता है, जिसका मन दुखों में घबराता नहीं और सुखों के पीछे भागता नहीं, जो राग, भय और क्रोध से छूटा है। फिर कछुए की उपमा आई, कि वो जब चाहे अंग समेट लेता है और जब चाहे बाहर निकालता है, यानी इन्द्रियों पर अधिकार, उन्हें हमेशा के लिए बन्द कर देना नहीं। और उसके बाद वो जंजीर, जो बासठवें और तिरसठवें श्लोक में आई: विषयों का चिन्तन करने से उनमें आसक्ति होती है, आसक्ति से कामना, कामना से क्रोध, क्रोध से मूढ़ता, मूढ़ता से स्मृति का भ्रम, स्मृति के भ्रम से बुद्धि का नाश, और बुद्धि के नाश से आदमी का अपना ही नाश। और उस कड़ी को याद रखने के लिए हमने चार शब्द घर ले जाने को रखे थे: चिन्तन, चिपकाव, चाह और क्रोध। जाते-जाते मैंने आपसे कहा था कि अगली बार श्रीकृष्ण इन्हीं विषयों के बीच राग-द्वेष से मुक्त होकर चलने वाले की बात करेंगे, और एक ऐसे समुद्र की उपमा देंगे जो हर नदी को अपने में समा लेता है। वो दोनों बातें आज के सत्संग में हैं।

अब ज़रा सोचिए कि ये जंजीर सुनकर किसी के मन में क्या सवाल उठा होगा। यही कि तो क्या करें? अगर विषयों के चिन्तन से इतना बड़ा नाश है, तो क्या सब कुछ छोड़कर भाग जाएँ? खाना, पहनना, लोगों से मिलना, सब बन्द? और हमारी टीका इस उलझन का उत्तर पहले ही वाक्य में दे देती है। वो कहती है कि बासठ और तिरसठ की कड़ी का उत्तर विषयों से भागना नहीं है, बल्कि राग और द्वेष के बिना उनके बीच रहना है। आज के सारे श्लोक इसी एक वाक्य को खोलते हैं।

और एक बारीक बात है, जो श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती दोनों कहते हैं। अर्जुन ने चौवनवें श्लोक में पूछा था, "व्रजेत किम्", यानी वो चलता कैसे है, इस संसार में कैसे विचरता है। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं कि चौंसठवें श्लोक से लेकर इकहत्तरवें तक, ये आठ श्लोक उसी चौथे सवाल का उत्तर हैं। और श्रीधर स्वामी चौंसठवें श्लोक पर ही लिखते हैं कि इसी में वो सवाल सुलझ गया कि वह विषयों के बीच कैसे चलता और भोग करता है। तो जब हम आज शांति की बात सुनें, तो ये याद रखें कि ये बैठकर आँखें बन्द करने वाले आदमी की शांति भर नहीं है। ये चलते-फिरते, काम करते, खाते-पीते आदमी की शांति है।

और अब वो बात, जो इस पूरे सत्संग में हमारे साथ चलेगी। याद कीजिए, ये गीता सञ्जय धृतराष्ट्र को सुना रहे हैं, उस समय जब भीष्म पितामह बाणों की शय्या पर लेट चुके हैं। सञ्जय भागे-भागे आए थे, और महाभारत कहता है कि धृतराष्ट्र उस समय चिन्ता में बैठे थे। यह भीष्म पर्व के तेरहवें अध्याय की शुरुआत है। और युद्ध से पहले की धृतराष्ट्र की वह जागती रात आपको याद होगी, जो हमने सातवें सत्संग में पूरी सुनी थी, जब राजा ने विदुर से कहा था कि मेरे मन को ठीक से शांति नहीं है और मेरी सब इन्द्रियाँ बेचैन हैं। आज उस रात से बस यही एक बात हमारे काम की है, क्योंकि आज के श्लोकों की भाषा भी यही है: शांति, मन, इन्द्रियाँ। उस रात विदुर ने नीति से उत्तर दिया था। गीता, जो उसी राजा को बाद में सुनाई जाती है, इसका उत्तर एक और ही गहराई पर देती है।

तो अब आइए, पहले श्लोक पर। "रागद्वेषविमुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्। आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति।"

जिसका अन्तःकरण अपने वश में है, वो अपनी उन इन्द्रियों से, जो उसके वश में हैं और राग-द्वेष से छूटी हुई हैं, विषयों में विचरता हुआ प्रसन्नता को पा लेता है।

इस श्लोक का सबसे बड़ा शब्द है "चरन्", यानी विचरता हुआ। यानी वो विषयों के बीच है। वो खाता है, देखता है, सुनता है, लोगों से मिलता है। श्रीधर स्वामी ने तो साफ़ लिखा है कि वो विषयों का भोग करता हुआ भी शांति पाता है। और शंकराचार्य यहाँ एक और शब्द पर ध्यान दिलाते हैं, "अवर्जनीयान्", यानी वो विषय जिनसे बचा नहीं जा सकता, जिनके बिना शरीर और जीवन चलता ही नहीं। मधुसूदन सरस्वती इसमें जोड़ते हैं कि ऐसे अनिवार्य विषयों का भोग शुद्धता में बाधा नहीं डालता, और यही बात उस शंका का उत्तर है कि अगर विषय का स्मरण भी हानि करता है, तो भोग तो और भी हानि करेगा।

फिर सवाल उठता है, कि अगर ये बाधा नहीं डालते, तो डालता क्या है? उत्तर श्लोक के शुरू में है: राग और द्वेष। चीज़ में दोष नहीं, उससे बँधा हुआ "चाहिए" और "नहीं चाहिए" है। एक उदाहरण लीजिए, जो मेरा अपना है। घर में दाल बनी है। एक आदमी उसे खाकर शांत है, और दूसरा नमक ज़रा कम होने पर पूरे खाने के समय मुँह फुलाकर बैठा है। दाल दोनों के सामने एक ही है। फ़र्क दाल में नहीं, उस "चाहिए" में है जो उसके साथ चिपका हुआ है। और यही फ़र्क पैसे में है, तारीफ़ में है, किसी के बर्ताव में है। एक ही बात कोई कह देता है, और एक आदमी उसे दिन भर ढोता है, और दूसरा उसे सुनकर आगे चल देता है।

संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर एक बहुत सुंदर उपमा देते हैं। वो कहते हैं कि सूर्य आकाश में रहकर अपनी किरणों से सारे जगत को छूता है, तो क्या उस संग से उसमें कोई दोष लग जाता है? नहीं लगता। वैसे ही जो मन राग और क्रोध से रहित होकर विषयों के बीच रहता है, उसे विषय नहीं बाँधते। और जब सब कुछ उसी का रूप हो गया, तो विषय किसे बाधा देंगे? नीलकण्ठ एक और चित्र देते हैं, जो मुझे बहुत पसंद है। वो कहते हैं कि ऐसा आदमी विषयों को वैसे देखता है जैसे रास्ते में पड़े तिनकों को। वो उन्हें देखता है, पर उन पर उसका ध्यान नहीं अटकता।

रामानुजाचार्य यहाँ एक और बात जोड़ते हैं, जो मैं छोड़ना नहीं चाहूँगा। वो कहते हैं कि ऐसा मन तभी आता है जब उसने अपने को श्रीकृष्ण में टिका लिया हो, यानी वही बात जो इकसठवें श्लोक में आई थी, "मत्परः", मुझमें लगा हुआ। मतलब ये कि संयम अकेला खड़ा नहीं रह सकता। उसे टिकने के लिए ऊपर कुछ चाहिए।

अब पैंसठवाँ श्लोक। "प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते। प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते।"

प्रसन्नता होने पर उसके सब दुखों का नाश हो जाता है, क्योंकि प्रसन्न चित्त वाले की बुद्धि जल्दी ही स्थिर हो जाती है।

ध्यान दीजिए कि क्रम क्या है। हम आम तौर पर सोचते हैं कि पहले दुख दूर हों, तब शांति मिलेगी। यानी पहले काम बने, कर्ज़ उतरे, घर के झगड़े निपटें, और फिर मन शांत होगा। पर श्लोक उलटा कहता है। पहले चित्त की प्रसन्नता, और फिर दुखों का नाश। शंकराचार्य लिखते हैं कि प्रसन्न चित्त वाले की बुद्धि जल्दी ही आकाश की तरह चारों ओर से निश्चल हो जाती है। और मधुसूदन सरस्वती इसमें बड़ी बारीकी से क्रम खोलते हैं: पहले चित्त की प्रसन्नता, फिर बुद्धि का टिकना, फिर वो अज्ञान हटना जो हमें दुख देता है, और तब सब दुखों का जाना। श्लोक में दुखों का नाश पहले इसलिए कहा गया है कि सुनने वाला प्रसन्नता पाने में पूरा ज़ोर लगाए।

ज्ञानेश्वर महाराज इसे एक छवि में बाँधते हैं। जिसके पेट में अमृत का झरना बहता हो, उसे भूख-प्यास कभी नहीं सताती। वैसे ही जिसका हृदय प्रसन्न हो, उसके पास दुख के आने की जगह ही नहीं बचती। और बुद्धि अपने आप टिक जाती है, जैसे बिना हवा की जगह रखा दीया ज़रा भी नहीं काँपता।

तो ये दो श्लोक हमारे हाथ में तीन बातें रख गए। पहली, कि विषयों से भागने की ज़रूरत नहीं, उनके बीच रहकर भी मन साफ़ रह सकता है। दूसरी, कि गड़बड़ विषय में नहीं, राग और द्वेष में है। और तीसरी, कि शांति दुखों के खत्म होने का नतीजा नहीं, बल्कि बुद्धि के टिकने की पहली शर्त है।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने अब तक बताया कि प्रसन्न मन को क्या मिलता है। अब वो उलटी तरफ़ से बात करने वाले हैं, उसके बारे में जिसके पास ये प्रसन्नता नहीं। और उसके बारे में वो एक ऐसी पंक्ति कहेंगे जो सुनने में सिर्फ़ एक सवाल लगती है, पर जिसका जवाब हम सब अपनी-अपनी ज़िन्दगी से जानते हैं। उस पंक्ति का आख़िरी हिस्सा है: "शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्।" जो अशान्त है, उसे सुख कहाँ? सुनिए अगला श्लोक।

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना । न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥ ६६ ॥
गीता 2.66 — अर्थ पढ़ें ›
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते । तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥ ६७ ॥
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"नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना। न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्।" असंयमी की बुद्धि स्थिर नहीं होती, और उसमें भावना भी नहीं होती। भावना के बिना शान्ति नहीं, और जिसमें शान्ति नहीं, उसे सुख कहाँ?

ये श्लोक छोटा है, पर इसमें पूरी एक सीढ़ी है, नीचे से ऊपर की ओर, पाँच पायदानों की। पहली पायदान है "युक्त" होना। युक्त यानी जुड़ा हुआ, सधा हुआ। अयुक्त यानी बिखरा हुआ मन, जो कहीं टिकता ही नहीं। उसके बाद आती है "बुद्धि", फिर "भावना", फिर "शान्ति", और सबसे ऊपर "सुख"। और श्रीकृष्ण ये सीढ़ी उलटी तरफ़ से सुना रहे हैं। जो पहली पायदान पर नहीं है, उसके लिए दूसरी नहीं है, तीसरी नहीं है, और आख़िरी तो बहुत दूर है।

इन शब्दों के मतलब आचार्यों ने बहुत खोलकर बताए हैं। श्रीधर स्वामी कहते हैं कि यहाँ बुद्धि का मतलब है शास्त्र और गुरु के उपदेश से आत्मा के बारे में पाई हुई समझ, और भावना का मतलब है ध्यान। भावना से ही बुद्धि आत्मा में टिकती है। मधुसूदन सरस्वती इसे और बारीकी से बाँटते हैं। वो कहते हैं कि बुद्धि वो है जो सुनने और सोचने से पैदा होती है, यानी जब हम किसी बात को ध्यान से सुनें और भीतर उसे तौलें। और भावना वो है जिसमें एक ही विचार की धारा लगातार बहती रहे, बीच में दूसरे विचार उसे तोड़ें नहीं। आसान शब्दों में, भावना वो अभ्यास है जिसमें मन किसी एक बात पर इतनी देर टिकता है कि वो बात मन का हिस्सा बन जाए।

अब इसे आज के जीवन से जोड़ कर देखिए। एक परिवार छुट्टियों में पहाड़ पर जाता है। सुबह की धूप है, सामने घाटी है, चाय की भाप उठ रही है। और घर के मुखिया हाथ में फ़ोन लिए बैठे हैं, दुकान का हिसाब देख रहे हैं, किसी का सन्देश आया है तो उसका जवाब सोच रहे हैं। घाटी वहीं है, चाय वहीं है। सुख बाहर रखा हुआ है, पर उसे लेने वाला भीतर मौजूद नहीं है। "शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्", यानी अशान्त को सुख कहाँ, इसका मतलब यही है। सुख हमेशा बाहर किसी चीज़ में नहीं रहता कि उसे पकड़ लिया जाए। उसे लेने के लिए एक ऐसा मन चाहिए जो उस घड़ी में मौजूद हो।

शंकराचार्य इस श्लोक के आख़िरी हिस्से पर एक बहुत गहरी बात कहते हैं। वो पूछते हैं कि सुख क्या है? और उत्तर देते हैं कि सुख वो है जब इन्द्रियों की विषयों के सेवन की प्यास रुक जाती है। विषयों की प्यास अपने आप में एक दुख ही है। जहाँ तृष्णा है, वहाँ सुख की गन्ध भी नहीं आ सकती। एक उदाहरण मेरा अपना है। गर्मी की दोपहर में किसी को गला सूखा हुआ है और वो ठंडा पानी पीता है। जो सुख मिलता है, वो पानी का है या प्यास के रुकने का? जब प्यास बुझ जाती है, तो उसी गिलास का अगला घूँट वैसा सुख नहीं देता। और रामानुजाचार्य भी यही कहते हैं कि जिसे विषयों की स्पृहा लगी हो, यानी जो उनके पीछे बेचैन हो, उसे शान्ति नहीं मिलती, और अशान्त को वो सुख कहाँ जो हमेशा रहे।

संत ज्ञानेश्वर इस पर एक चुभती हुई उपमा देते हैं। वो कहते हैं कि अगर आग में भुने हुए बीज उग सकें, तब अशान्त आदमी को भी सुख मिल सकता है। भुने हुए बीज में से अंकुर नहीं फूटता, क्योंकि उसके भीतर का जीवन जल चुका है। और अशान्त मन से सुख का अंकुर नहीं फूटता, क्योंकि उसकी तरफ़ बढ़ने की जो कोमलता चाहिए, वो बेचैनी में जल चुकी है।

और अब मैं आपको फिर उसी राजा के पास ले चलना चाहता हूँ, जिसकी बेचैन रात हमने आज शुरू में याद की थी। उसी लम्बी बातचीत में, उद्योग पर्व के छत्तीसवें अध्याय में, विदुर धृतराष्ट्र को पहले हंस के रूप में घूम रहे एक ऋषि की पुरानी कथा सुनाते हैं, जिसमें वो ऋषि साध्य देवताओं को कुछ बातें समझाते हैं। और उस कथा के बाद विदुर अपनी ओर से कहते हैं कि इन्द्रियों का स्वभाव चंचल है। उनमें जो भी बलवान हो जाए, उसी के रास्ते आदमी की समझ रिसने लगती है, वैसे ही जैसे फूटे घड़े से पानी धीरे-धीरे रिसता है। और इस पर धृतराष्ट्र जो कहते हैं, वो मुझे बहुत सीधा और बहुत सच्चा लगता है। वो कहते हैं: "ये सब हमेशा बेचैन है, और मेरा ये मन भी हमेशा बेचैन है। हे ज्ञानी, मुझे उस अवस्था के बारे में बताइए जो इस बेचैनी से मुक्त हो।" ये वही सवाल है जो गीता का ये श्लोक पूछ रहा है। और विदुर का उत्तर क्या है? वो कहते हैं कि मुझे आपके लिए विद्या, तप, इन्द्रियों के संयम और लोभ के त्याग के सिवा कोई शान्ति नहीं दिखती, और योग से शान्ति मिलती है। और ठीक अगली ही बात में विदुर कहते हैं कि मोक्ष चाहने वाले राग और द्वेष से मुक्त होकर इस संसार में विचरते हैं। सुनकर लगता है जैसे चौंसठवें श्लोक की गूँज हो, जहाँ श्रीकृष्ण ने भी राग-द्वेष से छूटी इन्द्रियों से विषयों के बीच विचरने की बात कही थी। एक ही सत्य, दो जगह, दो अलग वक्ताओं के मुँह से, और दोनों बार सुनने वाला वही अन्धा राजा।

विदुर उसी जगह एक और बात कहते हैं, जो इस श्लोक के साथ पढ़ने लायक है। वो कहते हैं कि जो आपस में बँटे हुए हैं, उन्हें अच्छे से अच्छे बिस्तर पर भी नींद नहीं आती। जो बँटे हैं, उन्हें यहाँ सुख नहीं मिलता, और वो शान्ति की परवाह भी नहीं करते। मैं ये नहीं कहूँगा कि ये बात धृतराष्ट्र के अपने घर के लिए थी, क्योंकि ये बात विदुर ने सामान्य रूप से कही है। पर आप सुनकर खुद देख सकते हैं कि ये किस घर पर लागू होती थी।

इससे पहले कि हम सड़सठवें श्लोक में उतरें, आपसे एक छोटी-सी बात कहना चाहता हूँ। हम आज दूसरे अध्याय के आख़िरी पड़ाव पर हैं, और ये वो जगह है जहाँ बहुत-से लोग सोचते हैं कि शान्ति की बातें तो बहुत सुनी हैं, इनमें नया क्या है। पर आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। जो यहाँ उठ जाएगा, वो उस उपमा से चूक जाएगा जो इस पूरे अध्याय का सबसे सुंदर चित्र है, और जो इस सत्संग में आगे आने वाली है: समुद्र और नदियों का चित्र। तो अगर आप ये सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की ये यात्रा बीच में न टूटे। और आज का हिस्सा आख़िर तक सुनिए।

अब सड़सठवाँ श्लोक। "इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते। तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि।"

विषयों में विचरती इन्द्रियों में से जिसके पीछे मन चल पड़ता है, वो इन्द्रिय उसकी बुद्धि को वैसे ही हर लेती है जैसे जल में नाव को हवा।

हमारे अनुवाद में इस श्लोक के पहले हिस्से का एक छोटा-सा शब्द है "जिसके साथ", यानी मूल का "यत्"। इन्द्रियाँ तो पाँचों अपनी-अपनी दिशा में चल रही हैं। आँख कुछ देख रही है, कान कुछ सुन रहे हैं, जीभ को कुछ चाहिए। और इनमें से कोई एक, सिर्फ़ एक, मन को अपने साथ खींच ले जाती है। श्रीधर स्वामी कहते हैं कि जब सिर्फ़ एक इन्द्रिय के पीछे मन चल पड़े और वो बुद्धि को हर ले, तो जब बहुत-सी इन्द्रियाँ मिलकर खींचें तब तो कहना ही क्या। और वो नाव का चित्र ऐसे खींचते हैं कि जैसे नाविक लापरवाह हो और हवा नाव को समुद्र में चारों ओर घुमा दे।

ये वही बात है जो विदुर ने फूटे घड़े की उपमा से कही थी, और ये दोनों बातें एक-दूसरे से मिलती हैं। इन्द्रियाँ पाँच या छह हैं, पर रिसाव एक छेद से भी हो सकता है। और आप खुद सोचिए कि आपकी वो एक इन्द्रिय कौन-सी है। किसी की आँख, जो फ़ोन की स्क्रीन पर टिकी रहती है और घंटे बीत जाते हैं। किसी की जीभ, जो खाने की सोचकर ही सब काम छोड़ देती है। किसी के कान, जो हर चर्चा में सबसे पहले अपनी तारीफ़ या किसी की बुराई सुनने दौड़ते हैं। बाकी चार इन्द्रियाँ शांत बैठी हों, तब भी एक के पीछे मन के चल पड़ने से बुद्धि की नाव दिशा खो देती है।

मधुसूदन सरस्वती इस उपमा में एक ऐसी बारीकी पकड़ते हैं जो मुझे बहुत सुंदर लगती है। वो कहते हैं कि श्लोक में "जल में नाव" कहा गया है, "भूमि पर नाव" नहीं। क्यों? क्योंकि हवा नाव को तभी बहा सकती है जब वो जल में हो। ज़मीन पर रखी नाव को हवा कहीं नहीं ले जा सकती। वो समझाते हैं कि इसका मतलब ये है: जल है मन की चंचलता। जब तक मन में चंचलता का पानी भरा है, तभी इन्द्रियाँ बुद्धि को बहा ले जा सकती हैं। जहाँ मन स्थिर है, वहाँ इन्द्रिय का वो बल नहीं चलता। यानी असली बात इन्द्रियों में नहीं, मन के पानी में है।

नीलकण्ठ भी यही पढ़ते हैं कि जब मन राग और द्वेष से रंग जाता है, तब वो इन्द्रियों के पीछे चल पड़ता है, और बुद्धि मन के पीछे चलती है। और शंकराचार्य कहते हैं कि जैसे वायु जल में चल रही नाव को उसके मार्ग से उठाकर उलटे रास्ते पर ले जाती है, ऐसे ही वो मन आत्मा के बारे में बनी हुई बुद्धि को छीनकर विषयों की ओर ले जाता है।

संत ज्ञानेश्वर इसी जगह एक बहुत मार्मिक चित्र देते हैं। वो कहते हैं कि नाव किनारे पर पहुँचने ही वाली हो और तभी कोई तेज़ हवा उसे आ पकड़े, तो वो फिर पीछे उसी बुरी जगह पहुँच जाती है जहाँ से निकली थी। वैसे ही जो पुरुष बहुत कुछ पा चुका हो, अगर वो खेल-खेल में भी इन्द्रियों को लाड़ लड़ाए, तो संसार के दुख उसे फिर घेर लेते हैं। इसमें चेतावनी भी है और दिलासा भी। चेतावनी ये कि किनारे के पास भी ध्यान रखना होता है। और दिलासा ये कि हमें नाव नहीं बदलनी है, पानी को शान्त करना सीखना है।

और अब वो प्रमाण, जो महाभारत में इस श्लोक को जीता-जागता दिखाता है। उसी बातचीत के अन्त की बात है। उद्योग पर्व के चालीसवें अध्याय में विदुर ने उपदेश खत्म किया है, और धृतराष्ट्र कहते हैं: "आप जैसा सदा सिखाते हैं, वैसा ही है, और हे सौम्य, जैसा आप कहते हैं, मेरी बुद्धि भी वैसी ही हो जाती है।" फिर वो कहते हैं: "पर पाण्डवों के बारे में मेरी बुद्धि सदा इसी तरह बनी रहने पर भी, दुर्योधन के पास पहुँचते ही फिर पलट जाती है।" सोचिए, एक आदमी अपने मन की नाव को खुद देख रहा है। उसे पता है कि दिशा कौन-सी ठीक है। उसने ठीक दिशा में पाल भी बाँध लिया था। और जैसे ही दुर्योधन, उनका अपना बेटा, सामने आता है, हवा पलट जाती है। और गौर कीजिए कि धृतराष्ट्र ये सब जानते हैं, और खुद कहते हैं। अपने मन को पलटते हुए देख पाना, पहचान की शुरुआत यहीं से होती है।

तो इस हिस्से में हमने क्या सीखा? पहला, कि शान्ति एक सीढ़ी है और पहली पायदान है मन को सधा हुआ रखना। दूसरा, कि सुख का स्वाद लेने वाला मन चाहिए, केवल सुख की चीज़ नहीं। और तीसरा, कि मन के सागर में बुद्धि की नाव को बहाने वाली हवा एक ही इन्द्रिय हो सकती है, और उसे पहचान लेना आधी जीत है।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने पूरी चेतावनी दे दी। अब वो उसका सीधा नतीजा निकालेंगे, और उसी में अर्जुन को "महाबाहो" कहकर पुकारेंगे। और उसके बाद वो एक ऐसा श्लोक कहेंगे जो पहली बार सुनने में उलझा देने वाला लगता है: कि जो सबकी रात है, उसमें संयमी जागता है। रात और जागना, ये क्या बात है? सुनिए अगला श्लोक।

तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ६८ ॥
गीता 2.68 — अर्थ पढ़ें ›
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी । यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥ ६९ ॥
गीता 2.69 — अर्थ पढ़ें ›

अड़सठवाँ श्लोक। "तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।" इसलिए, हे महाबाहो, जिसकी इन्द्रियाँ सब प्रकार से विषयों से वश में की हुई हैं, उसकी बुद्धि स्थिर है।

इस श्लोक की पहली बात उसका पहला शब्द है, "तस्मात्", यानी इसलिए। श्रीकृष्ण अब तक जो कुछ कह चुके हैं, चिन्तन की जंजीर, मन के पीछे चल पड़ने की नाव, बिखरे हुए मन की सीढ़ी, वो सब यहाँ आकर एक निष्कर्ष बनता है। श्रीधर स्वामी कहते हैं कि इन्द्रियों का संयम स्थिर बुद्धि का साधन भी है और उसका लक्षण भी, और यहाँ उसी बात का समापन किया जा रहा है। मधुसूदन सरस्वती इसमें एक सुंदर बात जोड़ते हैं। वो कहते हैं कि श्लोक में "तस्य" शब्द दो लोगों की ओर संकेत करता है: उस पर जो चल रहा है, और उस पर जो पहुँच चुका है। जो चल रहा है, उसके लिए इन्द्रियों का संयम रास्ता है, और जो पहुँच चुका है, उसके लिए वही संयम उसकी पहचान है। जो काम शुरू में अभ्यास लगता है, वही आगे चलकर स्वभाव बन जाता है।

"सर्वशः" शब्द पर भी टीकाकार रुके हैं। शंकराचार्य कहते हैं कि इसका मतलब है सब प्रकार से, मन और बाकी सब तरीकों से। नीलकण्ठ कहते हैं कि इन्द्रियाँ अपने कारण, यानी मन, के साथ वश में हों। ये बारीकी बहुत बड़ी है। ऊपर से दबाई हुई इन्द्रियाँ और भीतर से भागता मन, ये पूर्ण संयम नहीं है। पूर्ण संयम वो है जिसमें आँख भी वश में हो, और जिस मन के सहारे आँख चलती है, वो भी।

और अब वो सम्बोधन, "महाबाहो"। श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती, दोनों कहते हैं कि श्रीकृष्ण ने यहाँ जानबूझकर अर्जुन को ये नाम दिया है। जिन बाहुओं में शत्रुओं को रोकने की ताकत है, वो इन्द्रियों रूपी शत्रु को भी रोक सकती हैं। इस नाम की ताकत देखनी हो तो महाभारत में एक दृश्य सुनिए, जो इसी युद्ध के दसवें दिन का है। भीष्म पर्व के एक सौ उन्नीसवें अध्याय में जब अर्जुन के बाण भीष्म को घायल कर रहे हैं, तो भीष्म दुःशासन से कहते हैं कि इन्द्र भी इसे युद्ध में नहीं जीत सकता। और फिर कहते हैं कि देवता, दानव और राक्षस भी मिलकर मुझे नहीं हरा सकते, मनुष्य योद्धाओं की तो बात ही क्या, सिवाय क्रोध में भरे अर्जुन के। यानी जिस अर्जुन को स्वयं भीष्म अजेय कह रहे हैं, उसी को श्रीकृष्ण यहाँ याद दिला रहे हैं कि तुम्हारी असली लड़ाई वो है जो तुम्हारे भीतर चलती है, और उसमें भी तुम्हारी बाँहों में ताकत है। वही बाँह भीतर के शत्रु को भी थाम सकती है।

तिलक महाराज यहाँ एक ज़रूरी बात ख़बरदार करते हैं, जो मुझे आज के सत्संग के लिए बहुत काम की लगती है। वो कहते हैं कि इन्द्रियों के निग्रह का मतलब ये नहीं है कि इन्द्रियों को अचानक दबा दो और सारे कर्म छोड़ बैठो। गीता का आशय यही है कि जैसा चौंसठवें श्लोक में कहा गया, इन्द्रियाँ वश में रहें, और निष्काम बुद्धि से कर्म चलते रहें। वही बात जो हमने पहले श्लोक में सुनी थी: विषयों के बीच, राग-द्वेष के बिना।

संत ज्ञानेश्वर इसी श्लोक पर कछुए की वही उपमा लौटाते हैं जो हमने पिछली बार सुनी थी। वो कहते हैं कि जैसे कछुआ अपनी इच्छा से अंग पसारता है और अपनी इच्छा से समेट लेता है, वैसे ही जिसकी इन्द्रियाँ उसके कहने पर चलती हैं, उसकी बुद्धि ठहरी हुई है। ध्यान दीजिए: "उसके कहने पर चलती हैं।" यानी मालिक वही है। और ज्ञानेश्वर इसी साँस में अगली बात की ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि अब मैं तुम्हें पूर्ण के चिह्न की एक और गहरी बात बताता हूँ।

और वो गहरी बात है उनहत्तरवाँ श्लोक। "या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः।"

जो सब प्राणियों के लिए रात है, उसमें संयमी जागता है। और जिसमें प्राणी जागते हैं, वो तत्त्व को देखने वाले मुनि के लिए रात है।

पहली बार सुनने में ये श्लोक एक पहेली लगता है। रात में जागना और दिन में सोना? पर यही इसकी खूबी है, कि ये पहेली बनकर हमें रोकता है और फिर खुलता है।

हमारी अपनी टीका इसे इस तरह खोलती है। वो कहती है कि अधिकांश लोग आत्मा की ओर से सोए हुए हैं और विषयों की दुनिया में जागे हुए। मुनि इसके उलटे हैं: आत्मा के प्रति जागरूक, और जिससे दूसरे उत्तेजित होते हैं उसके प्रति उदासीन। सोचिए इसका मतलब क्या हुआ। जिन बातों में हम सब दिन-रात लगे हैं, कमाना, जोड़ना, तुलना करना, कौन आगे निकल गया, किसने क्या कहा, उन बातों के लिए मुनि सोया हुआ है। और जिस बात के लिए हम सब सोए हुए हैं, कि मैं कौन हूँ, मेरे भीतर क्या है जो बदलता नहीं, उसके लिए वो जागा हुआ है।

श्रीधर स्वामी इसे उल्लू की उपमा से समझाते हैं। उल्लू को दिन में दिखाई नहीं देता, और रात में दिखाई देता है। जो दिन में अन्धा है, उसके लिए रात ही उसका दिन है। वैसे ही ब्रह्म को जानने वाले की आँखें खुली हैं, फिर भी उसकी दृष्टि विषयों पर नहीं, ब्रह्म पर टिकी है। और मधुसूदन सरस्वती इसमें कौए और उल्लू की जोड़ी जोड़ते हैं। कौए को रात को नहीं दिखता और उल्लू को दिन को। एक का दिन दूसरे की रात है, और ये एक बड़ा आश्चर्य है। वो एक और बात भी कहते हैं, जो मुझे बहुत पास की लगती है। वो कहते हैं कि सपना तब तक सच लगता है जब तक आदमी जागा नहीं। जागते ही उसका डर चला जाता है। तत्त्व का ज्ञान होने पर भ्रम पर टिके व्यवहार वैसे ही अपनी पकड़ खो देते हैं।

नीलकण्ठ इसमें एक बहुत ही कोमल बात जोड़ते हैं, जिसे सुनकर मुझे लगा कि इस श्लोक को ग़लत समझने से बचाने के लिए ये ज़रूरी है। वो लिखते हैं कि जो योगी भीतर इतनी स्पष्टता में जी रहा है, उसे बाहर का व्यवहार कई बार वैसा लगता है जैसे घने अँधेरे में चलना, और इसीलिए वो बाहर के व्यवहार से घबराता भी है। इस बात को वो योग के एक पुराने ग्रन्थ के सहारे समझाते हैं, कि ज्ञानी आँख की पुतली जैसा होता है, यानी इतना कोमल कि ज़रा-से कष्ट से भी विचलित हो जाता है। इसका मतलब ये है कि "रात" शब्द का अर्थ तिरस्कार नहीं है। मुनि संसार से घृणा नहीं करता। उसे बस वो चीज़ें उस तरह खींचती नहीं जैसे हमें खींचती हैं।

आचार्यों में इस श्लोक पर एक मतभेद भी है, और उसे मैं छिपाना नहीं चाहता। शंकराचार्य इसे इस तरह समझाते हैं कि कर्म अविद्या की अवस्था में होता है, और जिसने जान लिया है उसके लिए कर्म छोड़ देना ही स्वाभाविक है। तिलक महाराज इस पर अलग राय रखते हैं। वो कहते हैं कि जिसे अज्ञानी लोग अनावश्यक समझते हैं, वही ज्ञानी को ज़रूरी लगता है, और जिसमें अज्ञानी उलझे रहते हैं, उसे ज्ञानी तुच्छ मानता है। उदाहरण के लिए, ज्ञानी इच्छा से किए गए कर्मों को तुच्छ मानता है, जबकि बाकी लोग उनसे चिपके रहते हैं, और ज्ञानी को जो निष्काम कर्म चाहिए, उसकी चाह दूसरों को नहीं होती। हम इस भेद में उलझें नहीं। दोनों इस बात पर एक हैं कि ज्ञानी की पसन्द और हमारी पसन्द एक-दूसरे की उलटी होती है।

अब इस श्लोक को एक पल के लिए धृतराष्ट्र की उसी जागती रात के पास रखिए, जिसे आज शुरू में याद किया था। वो जाग तो रहे थे, पर किस चीज़ के लिए? इस चिन्ता में कि कल सभा में सञ्जय क्या कहेंगे। यानी बाहर की उस बात के लिए जिसमें सब जागे रहते हैं: "यस्यां जाग्रति भूतानि", वही दिन, जिसमें सब प्राणी जागते हैं। और गीता का मुनि भी रात में जागता है, पर वो जागना बेचैनी का जागना नहीं है। उसमें आँखों के नीचे की थकान नहीं, भीतर का उजाला है। जागने के ये दो तरीके हैं: एक में आदमी बेचैन होकर जागता है, और दूसरे में वो जागने का अर्थ ही दूसरा हो जाता है।

आप भी अपने आप से एक सवाल पूछ सकते हैं। मेरी ज़िन्दगी में वो कौन-सी बातें हैं जिनके लिए मैं सबसे ज़्यादा जागा हुआ हूँ? किसी के कहे हुए एक वाक्य के लिए, किसी के भाव के लिए, किसी की तरक्की के लिए? और वो कौन-सी बातें हैं जिनके लिए मैं सोया पड़ा हूँ? ये सवाल कोई फ़ैसला नहीं देता। बस ये दिखाता है कि हमारी नींद और हमारा जागना कहाँ बँटा हुआ है।

संत ज्ञानेश्वर इसी जगह इन दोनों पंक्तियों को बहुत सीधे ढंग से कहते हैं: जहाँ प्राणी सोए हैं, वहाँ वो देखता है, और जहाँ जीव जाग रहे हैं, वहाँ वो सोया है। वो ऐसा निरुपाधि, सीमा से रहित स्थिर बुद्धि है, जिसे केवल मुनीश्वर ही जानते हैं।

तो इस हिस्से में दो बातें हमारे साथ रह गईं। पहली, कि संयम कोई ऊपरी दबाव नहीं, मन समेत सब जगह का है, और उसकी ताकत उसी के हाथ में है जिसमें जीतने की ताकत है। दूसरी, कि शान्ति वाला आदमी दुनिया से भागा हुआ नहीं होता, वो दुनिया की उन चीज़ों के लिए सोया होता है जो हमें उकसाती हैं, और उस चीज़ के लिए जागा होता है जो हमसे अनदेखी रह जाती है।

पर अभी एक बात बाकी है। यहाँ तक श्रीकृष्ण ने बताया कि संयमी किस चीज़ के लिए जागता और किसके लिए सोता है। अब वो एक ऐसी उपमा देने वाले हैं जिसके बाद शायद हम शान्ति को फिर कभी पहले जैसा नहीं देखेंगे। एक समुद्र है, जिसमें चारों तरफ़ से नदियाँ आकर गिर रही हैं, और वो फिर भी वैसा ही रहता है। सुनिए अगला श्लोक।

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् । तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥ ७० ॥
गीता 2.70 — अर्थ पढ़ें ›
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः । निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति ॥ ७१ ॥
गीता 2.71 — अर्थ पढ़ें ›

सत्तरवाँ श्लोक। "आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्। तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी।"

जैसे सब ओर से भरते हुए, अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में जल आकर समा जाते हैं, वैसे ही जिसमें सब कामनाएँ समा जाती हैं, वह शान्ति को प्राप्त होता है, भोगों को चाहने वाला नहीं।

मुझे लगता है कि पूरे दूसरे अध्याय में ये सबसे सुंदर चित्र है। और आज की जो सीढ़ी हमने पहले श्लोक से चढ़नी शुरू की थी, उसका शिखर भी यही है।

पहले इसे ध्यान से देखिए। समुद्र की दो बातें श्लोक में बताई गई हैं। पहली, "आपूर्यमाण", यानी जो चारों ओर से भरा जा रहा है। नदियाँ आ रही हैं, बरसात का पानी आ रहा है, कुछ भी रुका नहीं है, जो आया वो समुद्र में आकर गिरा। और दूसरी, अचल प्रतिष्ठा, यानी जिसकी स्थिति नहीं हिलती, जो अपनी मर्यादा में टिका रहता है। हमारी टीका इसे इस तरह कहती है: नदियाँ समुद्र में गिरती हैं, पर वो न बढ़ता है न घटता है। मुनि के पास भी विषय आते हैं, वो उन्हें ठुकराता नहीं, पर वे उसे विचलित नहीं करते। इसमें दोनों बातें हैं। न ठुकराना, और न डोलना।

रामानुजाचार्य इसे बहुत साफ़ कहते हैं। समुद्र में नदियाँ जाएँ या न जाएँ, उसमें कोई फ़र्क नहीं पड़ता। वैसे ही संयमी के सामने शब्द, रूप, रस जैसे विषय आएँ या न आएँ, अपने आत्मा को देखने से मिली तृप्ति के कारण उसमें कोई विकार नहीं आता। और शंकराचार्य भी कहते हैं कि वो अपने ही भीतर टिका है, इसलिए कामनाएँ उसे अपने वश में नहीं कर पातीं। श्रीधर स्वामी कहते हैं कि वो भोगों के बीच भी भीतर की ओर देखता रहता है, और जो उसके हिस्से का आता है, उसके प्रारब्ध से जो आता है, उसे वो ले लेता है, पर उससे बदलता नहीं।

मधुसूदन सरस्वती इस अचल प्रतिष्ठा का एक और अर्थ देते हैं। वो कहते हैं कि "अचल" पर्वतों को भी कहते हैं, तो इसका मतलब यह भी हो सकता है कि जिसमें पर्वत तक टिके हुए हैं, यानी इतनी गहराई। यहाँ मुझे एक छोटी-सी बात याद आती है, जो भीष्म पर्व के तेरहवें अध्याय में है। जब सञ्जय धृतराष्ट्र को भीष्म के गिरने की ख़बर सुनाते हैं, तो वो भीष्म की तारीफ़ में कहते हैं कि वो साहस में इन्द्र जैसे थे, दृढ़ता में हिमालय जैसे, गहराई में समुद्र जैसे, और सहनशीलता में पृथ्वी जैसे। यानी सञ्जय ने भी जब किसी स्थिर मनुष्य का चित्र खींचा, तो समुद्र की गहराई ही उठाई।

और उसी भीष्म पर्व में कुछ अध्याय आगे दसवें दिन का वो दृश्य है, जिसमें भीष्म पर चारों ओर से बाण बरस रहे हैं। एक सौ उन्नीसवें अध्याय में सञ्जय कहते हैं कि जब शिखण्डी ने उनकी छाती पर नौ बाण मारे, तब भी भीष्म काँपे नहीं, जैसे भूकम्प में पर्वत नहीं हिलता। और उसी अध्याय में आगे सञ्जय बताते हैं कि अन्त में उनके शरीर पर दो अंगुल की जगह भी ऐसी नहीं बची थी जो बींधी न गई हो, और तब वे रथ से गिरे। मैं ये नहीं कहता कि इन पंक्तियों का गीता के श्लोक से कोई सीधा सम्बन्ध है, और ये भी नहीं कि भीष्म ने ये स्थिति पूरी तरह पा ली थी। पर आप सुनिए कि चारों ओर से भरते जाने और फिर भी अचल रहने का ये चित्र उस मनुष्य पर कितना जमता है जिस पर चारों ओर से बाण भरते जा रहे हों और जो बाहर से टिका रहे। और गिरने के बाद वो क्या करते हैं, वो हम अगले हिस्से में देखेंगे।

अब इस उपमा का दूसरा पहलू देखिए, जो इसी श्लोक की आख़िरी पंक्ति में है: "न कामकामी।" शंकराचार्य इसे खोलकर कहते हैं कि "काम" वो चीज़ें हैं जिन्हें चाहा जाता है, यानी विषय, और "कामकामी" वो है जिसका स्वभाव ही उन चाही हुई चीज़ों को चाहते रहना है। यानी इच्छा का आना और इच्छा के पीछे दौड़ना, दो अलग बातें हैं। नदी आना समुद्र का दोष नहीं है। दोष तब बनता है जब समुद्र नदी बन जाए, यानी हर बरसात में उफनने लगे और हर गर्मी में सूखने लगे।

संत ज्ञानेश्वर इस श्लोक पर कई ओवियाँ कहते हैं, और उनमें यही दोनों बातें हैं। वो कहते हैं कि बरसात में जब सारी नदियाँ भरकर बहती हुई समुद्र में मिलती हैं, तब भी समुद्र ज़रा भी बढ़कर अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता। और गर्मी में जब सारी नदियाँ सूख जाती हैं, तब भी समुद्र ज़रा भी घटता नहीं। वैसे ही जब उसे ऋद्धि-सिद्धि जैसी बड़ी चीज़ें मिलती हैं, तो उसके मन में हलचल नहीं होती, और जब न मिलें, तो उसे बेचैनी नहीं सताती। फिर वो एक बहुत प्यारा दृष्टान्त देते हैं। सूर्य के घर में क्या दीये की बाती के भरोसे उजाला होता है? जिसके पास अमृत रखा हो, वो क्या खट्टी काँजी पीने जाएगा? जो खुद आत्मा के सुख का अनुभव कर चुका है, उसे चीज़ों से अपने को भरने की ज़रूरत ही नहीं रह जाती।

एक बात मैं बहुत ध्यान से कहना चाहता हूँ। इस श्लोक को सुनकर कुछ लोगों को लगता है कि शान्ति का मतलब है कि इच्छा आए ही नहीं। श्रीकृष्ण ऐसा नहीं कह रहे। समुद्र में नदियाँ आती हैं। इच्छाएँ आएँगी, भूख की, आराम की, इज़्ज़त की, प्रेम की। तिलक महाराज इसी श्लोक की टीका में साफ़ लिखते हैं कि इसका ये मतलब नहीं है कि शान्ति पाने के लिए कर्म न करना चाहिए। आम लोगों का मन फल की आशा से घबरा जाता है और कर्मों से उसकी शान्ति बिगड़ जाती है, पर जो सिद्ध अवस्था तक पहुँच गया है, उसका मन फलाशा से क्षुब्ध नहीं होता। कितने ही कर्म क्यों न करने हों, समुद्र की तरह शान्त रहकर वो सब काम करता रहता है।

इसे अपने जीवन में देखना हो, तो एक बड़े अस्पताल की ओ.पी.डी. की कल्पना कीजिए, जो मेरा अपना उदाहरण है। सुबह से मरीज़ आ रहे हैं। एक के बाद दूसरा, फिर तीसरा, फिर सौवाँ। कोई घबराया हुआ, कोई ग़ुस्से में, कोई रो रहा है। और एक अच्छा डॉक्टर सौवें मरीज़ को भी उसी ध्यान से देखता है जिस ध्यान से पहले को देखा था। मरीज़ों की भीड़ आई, पर वो उफना नहीं। और शाम को भीड़ चली गई, तो वो खाली भी नहीं हुआ। वो ऐसा कर पाता है क्योंकि उसके भीतर कोई ऐसी जगह है जो भीड़ से नहीं भरती।

एक बारीकी और। विदुर उसी लम्बी बातचीत में धृतराष्ट्र से कहते हैं कि आग को कभी लकड़ियाँ पूरी नहीं पड़तीं, और समुद्र को नदियाँ पूरी नहीं पड़तीं। मृत्यु को कभी प्राणी पूरे नहीं पड़ते। ये उद्योग पर्व के चालीसवें अध्याय का सातवाँ श्लोक है। ये पढ़कर आप सोच सकते हैं कि क्या गीता और विदुर में विरोध है। वहाँ समुद्र की भूख की बात है, और यहाँ समुद्र की तृप्ति की। पर मुझे इसमें विरोध नहीं, दो नज़रिए दिखते हैं, और ये मेरा अपना पढ़ना है। विदुर लोक में प्रचलित मुहावरे से बात कह रहे हैं, कि इच्छा का पेट नहीं भरता। गीता उसी समुद्र को लेकर कहती है कि जिसके भीतर भराव है, उसे नदियों की ज़रूरत नहीं। फ़र्क समुद्र में नहीं है, देखने वाले की नज़र में है।

विदुर उसी बातचीत के शुरू में गंगा के एक गहरे कुण्ड की भी उपमा देते हैं, उद्योग पर्व के तैंतीसवें अध्याय में। वो कहते हैं कि ज्ञानी वो है जो सम्मान पाकर फूलता नहीं और अपमान पर जलता नहीं, गंगा के गहरे कुण्ड की तरह अडिग रहता है। ये वही बात है, जो हम सत्तावनवें श्लोक में सुन चुके हैं और अब समुद्र के चित्र में देख रहे हैं।

अब इकहत्तरवाँ श्लोक। "विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः। निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति।"

जो पुरुष सब कामनाओं को त्यागकर लालसारहित, ममतारहित और अहंकाररहित होकर विचरता है, वह शान्ति को प्राप्त होता है।

यहाँ श्रीकृष्ण ने पूरे अध्याय के स्थितप्रज्ञ को कुछ शब्दों में कस दिया है: सब कामनाओं का त्याग, और फिर "निःस्पृहः", "निर्ममो निरहङ्कारः", यानी लालसा से रहित, "मेरा" से रहित और "मैं" के घमंड से रहित। मधुसूदन सरस्वती इन कामनाओं के तीन प्रकार बताते हैं। एक, बाहर की चीज़ें, जैसे घर और खेत, जो मिल भी चुकी हों। दूसरी, भीतर की कामनाएँ, जो मन में बनाए हुए राज्यों की तरह होती हैं, यानी ख्याली पुलाव। और तीसरी, वो चाहें जो बस वासना के रूप में भीतर पड़ी रहती हैं, जिन्हें वो रास्ते में चलते-चलते पैर से छू जाने वाले तिनकों जैसा कहते हैं: न हमने उन्हें बुलाया, न हम उन्हें ठीक से देखते हैं, पर वो छू जाती हैं। इन तीनों से मुक्त मनुष्य को वो शान्ति मिलती है।

और नीलकण्ठ इसमें एक सीढ़ी देखते हैं, जो मुझे बहुत सच्ची लगती है। वो कहते हैं कि जिसमें अहंकार नहीं, उसमें "मेरा" नहीं रहता, और जिसमें "मेरा" नहीं रहता, वो दूसरों के धन की चाह भी नहीं करता, क्योंकि चाह वही करता है जिसमें "ये मेरा हो जाए" का भाव हो। यानी क्रम ये है: "मैं" से "मेरा", "मेरा" से स्पृहा, और स्पृहा से कामना। जड़ में अहंकार है। हमारी टीका इस पर एक छोटी, पर गहरी बात कहती है: "मेरा" और "मैं" ही पहले अध्याय में अर्जुन के शोक का कारण थे। इनका न रहना ही वह शान्ति है जिसका यह अध्याय वचन देता है।

याद कीजिए गीता का पहला ही श्लोक, जिसमें धृतराष्ट्र पूछते हैं: "मेरे बेटों ने और पाण्डु के बेटों ने क्या किया?" शब्द था "मामकाः", यानी मेरे। और उद्योग पर्व के उनतालीसवें अध्याय में जब विदुर उन्हें अच्छी बातें सुनाते हैं, तब धृतराष्ट्र कहते हैं: "आपकी सब बातें भविष्य के लिए अच्छी हैं और ज्ञानियों को मान्य हैं, पर मैं अपने पुत्र को छोड़ नहीं पाता।" और विदुर उसी अध्याय में, जिसमें ये बातचीत है, एक पंक्ति कहते हैं जो मुझे चुपचाप बैठा देती है: "धृतराष्ट्र, लालसा छोड़ दो। एक हज़ार वाले भी जीते हैं, और सौ वाले भी जीते हैं।" और छत्तीसवें अध्याय में जब धृतराष्ट्र पूछते हैं कि मुझे वो अवस्था बताइए जो बेचैनी से मुक्त हो, तब विदुर के उत्तर में लोभ का त्याग भी है। श्रीकृष्ण का "निःस्पृहः" और विदुर का "लालसा छोड़ दो", ये दोनों एक ही दवा के दो नाम हैं।

इस श्लोक के "चरति" शब्द पर आचार्यों में दो राय हैं, और दोनों सुनने लायक हैं। शंकराचार्य इसे संन्यासी की तरह पढ़ते हैं, जो केवल जीवन चलाने भर की चेष्टा करता हुआ घूमता है। श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती कहते हैं कि वो प्रारब्ध के अनुसार जो भोग आते हैं उन्हें भोगता हुआ विचरता है। और तिलक महाराज साफ़ कहते हैं कि "चरति" का अर्थ भीख माँगता फिरना नहीं है, क्योंकि चौंसठवें श्लोक में यही शब्द "विषयों में विचरता हुआ" के अर्थ में आया है, इसलिए यहाँ भी इसका अर्थ संसार में व्यवहार करना है। हम किसी एक के पक्ष में नहीं बैठें। इतना सब मानते हैं कि "चरति" चलते रहने का नाम है, रुक जाने का नहीं।

संत ज्ञानेश्वर इस पूरे श्लोक को एक वाक्य में कह देते हैं। वो कहते हैं कि जो आत्मबोध से सन्तुष्ट है और परमानन्द से पुष्ट है, वही स्थिरप्रज्ञ है। वो अहंकार को दण्ड देकर, सब कामनाएँ छोड़कर, विश्व होकर विश्व के भीतर विचरता है। "विश्व होकर विश्व में विचरता है।" अपने घर, अपने पैसे, अपनी छोटी-सी पहचान से बाहर निकल आया आदमी अब हर जगह घर पाता है।

मैं आपको ये नहीं कहूँगा कि ये एक रात में हो जाता है। अक्सर बँटवारे के समय, घर की एक दीवार पर, किसी की रिटायरमेंट पर कुर्सी छिन जाने पर, हम देखते हैं कि "मेरा" कितना भारी होता है। जिसने उसे थोड़ा भी ढीला करना सीख लिया, उसका बोझ उसी हिसाब से हल्का हो जाता है।

पर अभी एक बात बाकी है। हम गीता के दूसरे अध्याय के आख़िरी श्लोक के सामने खड़े हैं। उसमें श्रीकृष्ण इस पूरी यात्रा को एक नाम देंगे। और उसके साथ एक वचन देंगे, जो हम सबके लिए है, ख़ासकर उस घड़ी के लिए जब मन कहता है कि अब बहुत देर हो चुकी है। सुनिए आख़िरी श्लोक।

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति । स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥ ७२ ॥
गीता 2.72 — अर्थ पढ़ें ›

बहत्तरवाँ श्लोक, दूसरे अध्याय का आख़िरी। "एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति। स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति।" हे पार्थ, यह ब्रह्म की स्थिति है। इसे पाकर मनुष्य फिर मोहित नहीं होता। अन्तकाल में भी इसमें स्थित होकर वह ब्रह्मनिर्वाण को प्राप्त होता है।

देखिए, श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यहाँ "पार्थ" कहा है, यानी पृथा का पुत्र, माँ के नाम से। जब कोई हमें हमारी माँ के नाम से पुकारे, तो उसमें एक अलग अपनापन होता है। पूरे अध्याय में श्रीकृष्ण ने कठिन बातें कही हैं, आत्मा, कर्म, फल, इन्द्रियाँ, और आख़िर में जब वो एक वचन देते हैं, तो उसके पहले वही कोमल सम्बोधन आता है।

इस श्लोक में तीन चीज़ें हैं। पहली, इस स्थिति का नाम: "ब्राह्मी स्थिति", यानी ब्रह्म में टिकी हुई अवस्था। ये वही स्थिति है जिसकी तस्वीर श्रीकृष्ण ने पचपनवें श्लोक से खींचनी शुरू की थी, और जिसे हमने इन सत्संगों में एक-एक रंग भरकर देखा। दूसरी, उसका फल: "नैनां प्राप्य विमुह्यति", यानी इसे पाकर आदमी फिर मोहित नहीं होता। और तीसरी, उसकी पहुँच: "स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि", यानी अन्त समय में भी इसमें टिककर।

"फिर मोहित नहीं होता", इसका वज़न समझने के लिए पहले अध्याय में लौटिए। जिस मोह में अर्जुन रथ के पिछले भाग में बैठ गए थे, उसी को धृतराष्ट्र ने महाभारत के आदि पर्व में याद किया था, जब उन्होंने कहा था कि अर्जुन मोह से घिरकर रथ में बैठ गए। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं कि ज्ञान से जिस अज्ञान का नाश हो चुका है, वो फिर पैदा नहीं हो सकता। रामानुजाचार्य कहते हैं कि जो इस स्थिति को पा लेता है, वो फिर संसार के चक्र में नहीं लौटता। तो श्रीकृष्ण अर्जुन को वचन दे रहे हैं कि जिस दिन यह स्थिति पाओगे, उस दिन के बाद तुम्हारी रथ में बैठ जाने वाली घड़ी दोबारा नहीं आएगी।

अब "अन्तकाल में भी" पर आइए। हमारी टीका कहती है कि इसका अर्थ है कि जीवन के अन्त में भी इस स्थिति को पाने वाला मुक्त हो जाता है, और फिर जो युवावस्था से इसमें रहे, उसका तो कहना ही क्या। शंकराचार्य, श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती, तीनों इसे इसी तरह पढ़ते हैं। श्रीधर स्वामी तो कहते हैं कि अन्त समय में क्षणभर भी इसमें टिक जाए, तो भी ब्रह्म में लय हो जाता है, तो बचपन से टिकने वाले की बात ही क्या। नीलकण्ठ इसमें एक और बात जोड़ते हैं, कि एक बार भी पाई हुई ये स्थिति फल देती है, इसके लिए उपासना की तरह बहुत लम्बे अभ्यास की शर्त नहीं है। और "निर्वाण" का अर्थ वो इस तरह खोलते हैं कि जिसमें कहीं जाना ही न रह जाए, जैसे घड़ा टूटने पर घड़े के भीतर का आकाश महाआकाश से एक हो जाता है, उसे कहीं जाना नहीं पड़ता।

तिलक महाराज इसी श्लोक पर एक बहुत व्यावहारिक बात कहते हैं। वो कहते हैं कि अगर कभी संयोग से घड़ी-दो घड़ी इस स्थिति का अनुभव हो जाए, तो उससे कोई स्थायी लाभ नहीं होता, क्योंकि मरते समय की वासना ही अगला जन्म तय करती है, जैसा गीता के आठवें अध्याय में बताया जाएगा। इसीलिए श्लोक में "अन्तकाल में भी" कहा गया है। और अगर अन्त के समय वासना का शून्य होना ज़रूरी है, तो उसका अभ्यास पहले से करना पड़ेगा। यानी इस सारे सत्संग का मतलब यह नहीं कि हम इसे बुढ़ापे पर टाल दें। इसका मतलब यह है कि आज जो छोटा-सा अभ्यास हम करेंगे, वही अन्त के दिन का सहारा बनेगा।

और अब मैं आपको भीष्म की उस घड़ी में ले जाना चाहता हूँ, जो इस श्लोक को सुनकर अपने आप याद आती है। मैं ये नहीं कहता कि ये श्लोक भीष्म की कथा है। पर जब हम "अन्तकाल" सुनते हैं, तो महाभारत की यही तस्वीर सामने आती है।

यह घड़ी आप पहले सुन चुके हैं। पाँचवें सत्संग में हमने भीष्म पर्व के एक सौ उन्नीसवें अध्याय की वह बात सुनी थी, कि बाणों की शय्या पर पड़े भीष्म ने उत्तरायण की प्रतीक्षा में प्राण थामे रखे, क्योंकि प्राण छोड़ने की शक्ति उनके अपने हाथ में थी। आज उसी अध्याय का वह हिस्सा सुनिए जो तब नहीं आया: उसका आख़िरी श्लोक कहता है कि योग का सहारा लेकर और महान उपनिषद् का पाठ करते हुए, वो महाबुद्धिमान शान्तनु-पुत्र अपने समय की प्रतीक्षा में वहीं टिके रहे।

अगले अध्याय में, एक सौ बीसवें में, वो दृश्य है जिसमें वैद्य आते हैं। वे सब औज़ार लेकर आए हैं, बाण निकालने में कुशल। भीष्म दुर्योधन से कहते हैं: "वैद्यों का सम्मान करो, उन्हें दक्षिणा दो और विदा करो। अब इन वैद्यों का मेरे लिए क्या काम? मैं योद्धा की रीति में प्रशंसित सर्वोच्च अवस्था को पा चुका हूँ।" और सञ्जय कहते हैं कि सब राजा देखकर चकित रह गए कि भीष्म धर्म में कितने दृढ़ खड़े हैं। और उसी अध्याय में, अपनी बाणों की शय्या से, वो सब राजाओं से कहते हैं कि अब आपस का वैर छोड़ दो और लड़ाई बन्द करो।

अब सोचिए धृतराष्ट्र ये सब कैसे सुन रहे होंगे। इसी अध्याय के पहले ही श्लोकों में वो कहते हैं: "आज मैंने सुना कि मेरे पिता मारे गए। इससे बढ़कर कष्ट क्या हो सकता है? सञ्जय, मेरा हृदय निश्चय ही लोहे का बना है, जो भीष्म के मारे जाने की ख़बर सुनकर भी सौ टुकड़े नहीं होता।" एक ओर वो आदमी जो बाणों पर लेटा है और जिसने सिर के नीचे तकिये की जगह अर्जुन से बाणों का तकिया माँगा, और दूसरी ओर वो आदमी जो राजमहल में बैठकर कहता है कि मेरा हृदय सौ टुकड़े नहीं हुआ। इन दोनों को साथ रखकर देखने पर लगता है कि शान्ति इस बात से तय नहीं होती कि आपके नीचे क्या बिछा है।

अब नीलकण्ठ, मधुसूदन सरस्वती का दिया हुआ इस पूरे अध्याय का सार उद्धृत करते हैं, जो मुझे यहाँ कहना अच्छा लगता है। उसमें चार बातें हैं: ज्ञान, उसका साधन, यानी कर्म, उसका फल, यानी चित्त की शुद्धि, और उसका भी फल, यानी ज्ञान में स्थिर हो जाना। और रामानुजाचार्य अपने ढंग से कहते हैं कि शरीर को ही आत्मा मान लेने के मोह में पड़कर अर्जुन युद्ध से हट गए थे, और उस मोह को शान्त करने के लिए यह अध्याय आत्मा की समझ और उसके साथ बिना आसक्ति के कर्म की बात करता है।

आइए, इस अध्याय को एक बार पलटकर देखें, क्योंकि यह हमारे छह सत्संगों की यात्रा रही है। पहले दस श्लोकों में अर्जुन आँसुओं में थे, और श्रीकृष्ण ने सबसे पहले धुँधलेपन का नाम लिया। फिर आत्मा की बात हुई, कि जो कभी जन्मा नहीं, वो मरता भी नहीं। फिर कर्तव्य की, कि जो आया है उसे जाना है और डर के आगे अपना धर्म है। फिर वो श्लोक आया जिसे सब जानते हैं: कर्म पर अधिकार है, फल पर नहीं। फिर स्थितप्रज्ञ का चित्र और गुस्से की जंजीर। और आज, इस सब का फल: शान्ति, और उस शान्ति का सबसे सुंदर चित्र, समुद्र। यही कारण है कि हमारी टीका कहती है कि ये अध्याय छोटे रूप में पूरी गीता है। आपने अभी छोटी गीता सुन ली।

तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली बात। शान्ति कोई चीज़ नहीं है जो बाहर से आती है, वो मन की एक स्थिति है, और उसकी एक सीढ़ी है। सधा हुआ मन, फिर समझ, फिर टिकने का अभ्यास, फिर शान्ति, फिर सुख। छियासठवें श्लोक ने कहा कि अशान्त को सुख कहाँ। और सड़सठवें ने बताया कि मन जिस एक इन्द्रिय के पीछे चल पड़ता है, वही बुद्धि को बहा ले जाती है। इसलिए आज रात एक काम कीजिए। अपनी वो एक इन्द्रिय पहचानिए, जो आपके मन की नाव को सबसे ज़्यादा खींचती है। सब कुछ ठीक करने की ज़रूरत नहीं, बस उस एक को देखना शुरू कीजिए।

दूसरी बात। इच्छाओं का आना कोई अपराध नहीं, वो नदियों का आना है। श्रीकृष्ण ने कहीं नहीं कहा कि इच्छा मत करो। उन्होंने कहा कि समुद्र बनो, जो भरता है और फिर भी हिलता नहीं। और समुद्र बनने का रास्ता भीतर की तृप्ति से गुज़रता है। जिसने अपने भीतर थोड़ा-सा भी सुख चखा है, वो हर नदी से भरे जाने का इन्तज़ार नहीं करता।

तीसरी बात। "मेरा" और "मैं" को थोड़ा ढीला कीजिए। पहले अध्याय में अर्जुन का शोक इन्हीं से उपजा था, और आज के श्लोक ने कहा कि यही शान्ति के सबसे बड़े बाधक हैं। इसे एक रात में छोड़ने की ज़रूरत नहीं। हर दिन ज़रा-सा ढीला कर दीजिए। और याद रखिए बहत्तरवें श्लोक का वचन: अन्तकाल में भी इस स्थिति में टिक जाने वाला पा लेता है। यानी किसी के लिए भी बहुत देर नहीं हुई है।

और अब देखिए कि अध्याय कहाँ जाकर रुकता है। संत ज्ञानेश्वर कहते हैं कि ये वचन सुनकर अर्जुन ने मन में सोचा कि ये तो मेरे ही मन की बात निकली: भगवान ने तो यहाँ सारे कर्म ही हटा दिए, तो मुझे लड़ना भी नहीं पड़ेगा। और इसी सोच से वो अगला प्रश्न उठाते हैं। यानी अगली बार तीसरा अध्याय एक प्रश्न से शुरू होगा। अर्जुन कहेंगे: "ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन। तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव।" हे जनार्दन, अगर आप कर्म से बुद्धि को श्रेष्ठ मानते हैं, तो मुझे इस घोर कर्म में क्यों लगाते हैं? और फिर कहेंगे, "व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे", आप मिली-जुली-सी बातों से मानो मेरी बुद्धि को मोहित कर रहे हैं। ये वही सवाल है जो हम सबके मन में कभी न कभी उठता है: काम छोड़ दूँ, या करता रहूँ? उसका उत्तर कर्म की हमारी पूरी समझ बदल देता है। वो हम अगली बार सुनेंगे।

आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आपके जीवन में वो कौन-सी नदी है जो जब आती है, तो आपको सबसे ज़्यादा उफना देती है? कोई चाह, कोई ख़बर, कोई आदमी? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्री कृष्ण।

इच्छाएँ आएँगी, नदियाँ रुकती नहीं। पर जिसके भीतर समुद्र की गहराई हो, उसके लिए हर नदी बस घर लौटता हुआ पानी है।

जय श्री कृष्ण।

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् । तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥ ७० ॥
गीता 2.70 — अर्थ पढ़ें ›

तीन बातें

  1. शान्ति कोई चीज़ नहीं है जो बाहर से आती है, वो मन की एक स्थिति है, और उसकी एक सीढ़ी है। सधा हुआ मन, फिर समझ, फिर टिकने का अभ्यास, फिर शान्ति, फिर सुख। छियासठवें श्लोक ने कहा कि अशान्त को सुख कहाँ। और सड़सठवें ने बताया कि मन जिस एक इन्द्रिय के पीछे चल पड़ता है, वही बुद्धि को बहा ले जाती है। इसलिए आज रात एक काम कीजिए। अपनी वो एक इन्द्रिय पहचानिए, जो आपके मन की नाव को सबसे ज़्यादा खींचती है। सब कुछ ठीक करने की ज़रूरत नहीं, बस उस एक को देखना शुरू कीजिए।
  2. इच्छाओं का आना कोई अपराध नहीं, वो नदियों का आना है। श्रीकृष्ण ने कहीं नहीं कहा कि इच्छा मत करो। उन्होंने कहा कि समुद्र बनो, जो भरता है और फिर भी हिलता नहीं। और समुद्र बनने का रास्ता भीतर की तृप्ति से गुज़रता है। जिसने अपने भीतर थोड़ा-सा भी सुख चखा है, वो हर नदी से भरे जाने का इन्तज़ार नहीं करता।
  3. "मेरा" और "मैं" को थोड़ा ढीला कीजिए। पहले अध्याय में अर्जुन का शोक इन्हीं से उपजा था, और आज के श्लोक ने कहा कि यही शान्ति के सबसे बड़े बाधक हैं। इसे एक रात में छोड़ने की ज़रूरत नहीं। हर दिन ज़रा-सा ढीला कर दीजिए। और याद रखिए बहत्तरवें श्लोक का वचन: अन्तकाल में भी इस स्थिति में टिक जाने वाला पा लेता है। यानी किसी के लिए भी बहुत देर नहीं हुई है।