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अध्याय २ · सांख्ययोग

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सञ्जय बोले

2.1 तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् । विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥ १ ॥

इस प्रकार करुणा और आँसुओं से भरे, व्याकुल हुए, विषाद-ग्रस्त अर्जुन से मधुसूदन ने यह सब कहा।

To him, overcome with pity, grieving, his eyes troubled and full of tears, Madhusūdana spoke these words.

श्रीभगवान् बोले

2.2 कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् । अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥ २ ॥

अर्जुन, यह मोह तुम्हें कहाँ से आ गया, वो भी इस कठिन समय में? यह श्रेष्ठ पुरुषों के योग्य नहीं - न स्वर्ग देगा, न यश।

Arjuna, where has this weakness come from, at this hard hour? It is not worthy of a noble man. It does not lead to heaven, and it brings disgrace.

2.3 क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते । क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥ ३ ॥

कायरता को छोड़ो पार्थ! यह तुम्हें शोभा नहीं देती। हे परन्तप! हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता को छोड़कर चलो उठो।

Son of Pṛthā, do not yield to unmanliness. It does not suit you. Cast off this petty weakness of heart and stand up, scorcher of foes.

अर्जुन बोले

2.4 कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन । इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ॥ ४ ॥

हे मधुसूदन! मैं युद्ध में भीष्म और द्रोण से बाणों से कैसे लड़ूँगा? हे अरिसूदन! वे तो पूजा के योग्य हैं।

Madhusūdana, how can I fight back with arrows in battle against Bhīṣma and Droṇa? Slayer of enemies, they are worthy of worship.

2.5 गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके । हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ॥ ५ ॥

इन महानुभाव गुरुजनों को न मारकर इस संसार में भीख का अन्न खाना भी अच्छा है। धन चाहने वाले होने पर भी यदि मैं इन गुरुओं को मारूँ, तो यहाँ जो भी भोग भोगूँगा, वे रक्त से सने होंगे।

It is better to live on begged food in this world than to kill these noble teachers. If I kill them, even though they seek their own ends, every pleasure I enjoy here will be smeared with blood.

2.6 न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः । यानेव हत्वा न जिजीविषाम- स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥ ६ ॥

हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए क्या अच्छा है: हम जीतें या वे हमें जीतें। जिन्हें मारकर हम जीना भी नहीं चाहेंगे, वे ही धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे सामने खड़े हैं।

We do not even know which is better for us: that we should win, or that they should win over us. The sons of Dhṛtarāṣṭra stand before us, and if we killed them we would not wish to live.

2.7 कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः । यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥ ७ ॥

दीनता के दोष ने मेरे स्वभाव को दबा दिया है, और धर्म के विषय में मेरा चित्त मोहित है। मैं आपसे पूछता हूँ: जो निश्चित रूप से मेरे लिए कल्याणकारी हो, वह मुझे बताइए। मैं आपका शिष्य हूँ। आपकी शरण में आए मुझको शिक्षा दीजिए।

My nature is overcome by the fault of weakness, and my mind is confused about dharma. I ask you: tell me for certain what is truly good for me. I am your pupil. Teach me, for I have taken refuge in you.

2.8 न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् । अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥ ८ ॥

क्योंकि पृथ्वी पर निष्कण्टक समृद्ध राज्य और देवताओं का स्वामित्व पाकर भी मुझे ऐसा कुछ नहीं दिखता जो इन्द्रियों को सुखा देने वाले मेरे इस शोक को दूर कर सके।

For I see nothing that could drive away this grief that dries up my senses, not even a prosperous kingdom on earth without a rival, nor lordship over the gods.

सञ्जय बोले

2.9 एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप । न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥ ९ ॥

कृष्ण से ऐसे "मैं नहीं लड़ूँगा" कहकर अर्जुन चुप हो गए।

Having spoken thus to Hṛṣīkeśa, Guḍākeśa, the scorcher of foes, said to Govinda, "I will not fight," and fell silent.

2.10 तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत । सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ॥ १० ॥

तब दोनों सेनाओं के बीच रोते हुए अर्जुन से हृषीकेश ने मानो हँसते हुए यह कहा।

Then, descendant of Bharata, between the two armies, Hṛṣīkeśa, as if smiling, spoke these words to the grieving Arjuna.

श्रीभगवान् बोले

2.11 अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे । गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥ ११ ॥

ज्ञानियों जैसी बातें तो कह रहे हो, पर उनके लिए शोक कर रहे हो जो इसके लायक नहीं हैं। पंडित न मरे हुओं के लिए शोक करते हैं, न जीवितों के लिए।

You grieve for those who should not be grieved for, and yet you speak words that sound wise. The wise grieve neither for the dead nor for the living.

2.12 न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः । न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥ १२ ॥

ऐसा कोई समय नहीं था जब मैं नहीं था, या तुम नहीं थे, या ये राजा नहीं थे। और न ऐसा होगा कि इसके बाद हम सब नहीं रहेंगे।

Never was there a time when I was not, nor you, nor these kings. Nor will any of us ever cease to be from now on.

2.13 देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा । तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥ १३ ॥

जैसे देहधारी इस शरीर में बचपन, जवानी और बुढ़ापे से गुज़रता है, वैसे ही उसे दूसरा शरीर मिलता है। धीर पुरुष इसमें मोहित नहीं होता।

Just as the one who lives in this body passes through childhood, youth and old age, so it passes on to another body. The steady person is not bewildered by this.

2.14 मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः । आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥ १४ ॥

हे कौन्तेय! इन्द्रियों और विषयों के संयोग सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख देते हैं। वे आते-जाते रहते हैं और अनित्य हैं। उन्हें सहन करो।

Son of Kuntī, the contacts of the senses with their objects give cold and heat, pleasure and pain. They come and go and do not last. Bear them patiently, descendant of Bharata.

2.15 यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ । समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ १५ ॥

हे पुरुषश्रेष्ठ! जिस धीर पुरुष को ये व्याकुल नहीं करते, जो दुःख-सुख में समान रहता है, वह अमृतत्व (मोक्ष) के योग्य होता है।

Best among men, the steady person whom these do not disturb, who is the same in pain and pleasure, is fit for immortality.

2.16 नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ १६ ॥

जो भी अवतरित है, अस्थायी है; जो भी शाश्वत है, सत् है। तत्त्वदर्शी वह है जिसने यह देख लिया है।

The unreal has no being, and the real never ceases to be. Those who see the truth have seen the final truth of both.

2.17 अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् । विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥ १७ ॥

जिससे यह सब व्याप्त है, वह तो अविनाशी है। और जिसका विनाश ही नहीं हो सकता, उसकी हत्या कैसी ?

Know that to be imperishable by which all this is pervaded. No one can destroy this undecaying one.

2.18 अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः । अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥ १८ ॥

देह तो नाशवान् है ही, और इस देह को धारण करने वाली शरीरधारी आत्मा अजर, अमर और तुम्हारे शस्त्रों की पहुँच से परे है। इसलिए हे भारत! युद्ध करो।

These bodies of the eternal, indestructible, immeasurable embodied one are said to have an end. So fight, descendant of Bharata.

2.19 य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् । उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥ १९ ॥

जो इसे मारने वाला मानता है और जो इसे मरा हुआ मानता है, वे दोनों नहीं जानते। यह न मारता है, न मारा जाता है।

One who thinks this Self slays, and one who thinks it is slain, both fail to understand. It neither slays nor is slain.

2.20 न जायते म्रियते वा कदाचिन् नायं भूत्वा भविता वा न भूयः । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ २० ॥

यह न कभी जन्मता है, न मरता है। यह होकर फिर होने वाला नहीं है। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है। शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता।

It is never born and never dies. It did not come to be, and will not come to be again. Unborn, eternal, everlasting and ancient, it is not slain when the body is slain.

2.21 वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् । कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥ २१ ॥

हे पार्थ! जो पुरुष इसे अविनाशी, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह कैसे किसी को मरवाता है और कैसे किसी को मारता है?

Son of Pṛthā, when a person knows this Self to be indestructible, eternal, unborn and undecaying, how can he slay anyone, or cause anyone to be slain?

2.22 वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि । तथा शरीराणि विहाय जीर्णा- न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ २२ ॥

जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र छोड़कर दूसरे नए वस्त्र पहन लेता है, वैसे ही देहधारी पुराने शरीर छोड़कर दूसरे नए शरीर प्राप्त करता है।

Just as a man casts off worn-out clothes and puts on new ones, so the embodied one casts off worn-out bodies and enters new ones.

2.23 नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥ २३ ॥

न शस्त्र इसे काट सकते हैं, न आग इसे जला सकती है, न जल इसे भिगो सकता है, न वायु इसे सुखा सकती है।

Weapons do not cut it, fire does not burn it, water does not wet it, and wind does not dry it.

2.24 अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च । नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥ २४ ॥

यह काटा नहीं जा सकता, जलाया नहीं जा सकता, गीला नहीं किया जा सकता और सुखाया नहीं जा सकता। यह नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर, अचल और सनातन है।

It is beyond the reach of weapons, fire, water and wind, for it is eternal, present everywhere, steady, unmoving and ancient.

2.25 अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते । तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥ २५ ॥

यह अव्यक्त, अचिन्त्य और विकाररहित कहा जाता है। इसलिए इसे ऐसा जानकर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।

It is called unmanifest, beyond thought and unchanging. So, knowing it to be such, you should not grieve.

2.26 अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् । तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ॥ २६ ॥

और यदि तुम इसे सदा जन्मने वाला और सदा मरने वाला मानो, तो भी हे महाबाहो! तुम्हें इस प्रकार शोक नहीं करना चाहिए।

And even if you think it is constantly born and constantly dies, mighty-armed one, still you should not grieve like this.

2.27 जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च । तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ २७ ॥

क्योंकि जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित है। इसलिए जिसे टाला नहीं जा सकता, उसके विषय में तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।

For death is certain for what is born, and birth is certain for what has died. So you should not grieve over what cannot be avoided.

2.28 अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥ २८ ॥

हे भारत! प्राणी आरम्भ में अव्यक्त, बीच में व्यक्त और अन्त में फिर अव्यक्त रहते हैं। उसमें शोक की क्या बात है?

Beings are unmanifest in the beginning, manifest in the middle, and unmanifest again at the end, descendant of Bharata. What is there to lament in that?

2.29 आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन- माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः । आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥ २९ ॥

कोई इसे आश्चर्य की तरह देखता है, कोई दूसरा इसके विषय में आश्चर्य की तरह कहता है, और कोई दूसरा इसे आश्चर्य की तरह सुनता है। सुनकर भी कोई इसे ठीक से नहीं जानता।

Someone sees this Self as a wonder, another speaks of it as a wonder, another hears of it as a wonder. And even after hearing, no one truly knows it.

2.30 देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत । तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ ३० ॥

हे भारत! सबके शरीर में रहने वाला यह देहधारी सदा अवध्य है। इसलिए तुम्हें किसी भी प्राणी के लिए शोक नहीं करना चाहिए।

The one who dwells in everyone's body can never be slain, descendant of Bharata. So you should not grieve for any being.

2.31 स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि । धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥ ३१ ॥

अपने धर्म को देखकर भी तुम्हें विचलित नहीं होना चाहिए। क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर कल्याणकारी दूसरा कुछ नहीं है।

Looking at your own dharma too, you should not waver. For a kṣatriya there is nothing better than a righteous war.

2.32 यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् । सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥ ३२ ॥

हे पार्थ! अपने-आप प्राप्त हुआ और स्वर्ग के खुले द्वार जैसा ऐसा युद्ध भाग्यशाली क्षत्रियों को ही मिलता है।

Son of Pṛthā, fortunate are the kṣatriyas who get such a war. It has come unsought, an open door to heaven.

2.33 अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्ग्रामं न करिष्यसि । ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥ ३३ ॥

किन्तु यदि तुम यह धर्मयुक्त युद्ध नहीं करोगे, तो अपने धर्म और कीर्ति को खोकर पाप के भागी बनोगे।

But if you will not fight this righteous battle, you will lose your own dharma and your fame, and you will incur sin.

2.34 अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् । सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ॥ ३४ ॥

लोग सदा तुम्हारी अपकीर्ति की बात भी करेंगे। सम्मानित व्यक्ति के लिए अपकीर्ति मृत्यु से भी बढ़कर है।

People will speak of your disgrace for ever. For a man who has been honoured, disgrace is worse than death.

2.35 भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः । येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥ ३५ ॥

महारथी मानेंगे कि तुम डर के कारण युद्ध से हट गए। जिनकी दृष्टि में तुम बहुत सम्मानित थे, उनकी दृष्टि में तुम छोटे हो जाओगे।

The great chariot-warriors will think you withdrew from battle out of fear. Those who held you in high esteem will think little of you.

2.36 अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः । निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ॥ ३६ ॥

तुम्हारे शत्रु तुम्हारी सामर्थ्य की निन्दा करते हुए बहुत-सी न कहने योग्य बातें कहेंगे। उससे अधिक दुःखदायी भला क्या होगा?

Your enemies will say many things that should not be said, scorning your strength. What could be more painful than that?

2.37 हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् । तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥ ३७ ॥

मारे गए तो स्वर्ग पाओगे, जीत गए तो पृथ्वी का राज्य भोगोगे। इसलिए हे कौन्तेय! युद्ध का निश्चय करके उठो।

If you are slain, you will gain heaven. If you win, you will enjoy the earth. So stand up, son of Kuntī, resolved to fight.

2.38 सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ । ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥ ३८ ॥

सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समान मानकर फिर युद्ध के लिए तैयार हो जाओ। इस प्रकार तुम्हें पाप नहीं लगेगा।

Hold joy and sorrow, gain and loss, winning and losing as one, then prepare for the fight, and in this way no sin will touch you.

2.39 एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु । बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥ ३९ ॥

यह बुद्धि तुम्हें सांख्य (ज्ञान) के विषय में कही गई। अब इसे योग के विषय में सुनो। हे पार्थ! इस बुद्धि से युक्त होकर तुम कर्मों के बन्धन को छोड़ दोगे।

This understanding has been told to you in terms of knowledge. Now hear it in terms of yoga. Son of Pṛthā, joined with this understanding, you will cast off the bondage of action.

2.40 नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते । स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥ ४० ॥

इस मार्ग में आरम्भ किए प्रयत्न का नाश नहीं होता, और उलटा फल भी नहीं होता। इस धर्म का थोड़ा-सा पालन भी बड़े भय से रक्षा करता है।

In this path no effort begun is lost, and no harm comes from it. Even a little of this practice saves one from great fear.

2.41 व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन । बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥ ४१ ॥

हे कुरुनन्दन! इस मार्ग में निश्चयात्मक बुद्धि एक ही होती है। पर अस्थिर विचार वालों की बुद्धियाँ अनेक शाखाओं वाली और अनन्त होती हैं।

Joy of the Kurus, on this path the resolute understanding is one. But the thoughts of the irresolute are many-branched and endless.

2.42 यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः । वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥ ४२ ॥

हे पार्थ! कम समझ वाले लोग फूलों-सी सजी बातें करते हैं। वे वेद के वचनों में ही उलझे रहते हैं और कहते हैं कि इसके आगे कुछ नहीं है।

Son of Pṛthā, the unwise speak flowery words. They delight in the words of the Veda and say there is nothing beyond them.

2.43 कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् । क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥ ४३ ॥

वे कामनाओं से भरे और स्वर्ग को ही परम मानने वाले हैं। उनकी वाणी भोग और ऐश्वर्य पाने के लिए अनेक विशेष क्रियाओं से भरी है, और कर्मों के फल के रूप में जन्म देने वाली है।

They are full of desires and hold heaven as the highest goal. Their speech is full of special rites aimed at pleasure and power, and it brings rebirth as the fruit of action.

2.44 भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् । व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥ ४४ ॥

जो भोग और ऐश्वर्य में आसक्त हैं और उस वाणी से जिनका चित्त हर लिया गया है, उनकी निश्चयात्मक बुद्धि समाधि में स्थिर नहीं होती।

Those who are attached to pleasure and power, whose minds are carried away by that speech, do not gain the resolute understanding that rests in samādhi.

2.45 त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन । निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥ ४५ ॥

वेद तीनों गुणों के कार्यों का वर्णन करते हैं। हे अर्जुन! तुम तीनों गुणों से ऊपर उठो। द्वन्द्वों से रहित, सदा सत्त्व में स्थित, योगक्षेम की चिन्ता से रहित और आत्मवान् बनो।

The Vedas deal with the three guṇas. Arjuna, go beyond the three guṇas. Be free from the pairs of opposites, ever established in purity, free from the worry of getting and keeping, centred in the Self.

2.46 यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके । तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥ ४६ ॥

सब ओर से जल से भर जाने पर छोटे जलाशय में जितना प्रयोजन रहता है, ज्ञानी ब्राह्मण का सब वेदों में उतना ही प्रयोजन रहता है।

As much use as there is in a small pond when water floods on every side, so much use is there in all the Vedas for a brāhmaṇa who knows.

2.47 कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥ ४७ ॥

तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने का है, उसके फलों का नहीं। तुम कर्मफल के लिए कर्म करने वाले मत बनो, और कर्म न करने में भी तुम्हारी आसक्ति न हो।

Your right is only to the action, never to its fruits. Do not act for the sake of the fruit, and do not let yourself cling to not acting.

2.48 योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय । सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥ ४८ ॥

हे धनञ्जय! योग में स्थित होकर कर्म करो। आसक्ति छोड़ो और सफलता-असफलता में समान रहो। यह समता ही योग कहलाती है।

Dhanañjaya, do your work steady in yoga. Give up attachment, and be the same in success and failure. Evenness of mind is called yoga.

2.49 दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय । बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥ ४९ ॥

हे धनञ्जय! फल के लिए किया कर्म बुद्धियोग से बहुत निम्न है। उस बुद्धि की शरण लो। फल के लिए कर्म करने वाले दीन हैं।

Dhanañjaya, action done for a reward is far below the yoga of understanding. Take refuge in that understanding. Those who act for the fruit are pitiable.

2.50 बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते । तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥ ५० ॥

बुद्धि से युक्त पुरुष इसी लोक में पुण्य और पाप दोनों को छोड़ देता है। इसलिए योग में लग जाओ। योग ही कर्मों में कुशलता है।

One joined with understanding leaves behind both good and evil deeds, here in this life. So devote yourself to yoga. Yoga is skill in action.

2.51 कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः । जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥ ५१ ॥

क्योंकि बुद्धि से युक्त ज्ञानी कर्मों से उत्पन्न फल को छोड़कर, जन्म के बन्धन से मुक्त होकर दुःखरहित पद को प्राप्त होते हैं।

For the wise, joined with understanding, give up the fruit born of action. Freed from the bondage of birth, they reach the state that is free from all ill.

2.52 यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति । तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥ ५२ ॥

जब तुम्हारी बुद्धि मोह रूपी दलदल को पार कर जाएगी, तब तुम सुने हुए और सुनने योग्य सब भोगों से वैराग्य को प्राप्त होगे।

When your understanding crosses beyond the thicket of delusion, you will become indifferent to all that you have heard and all that is yet to be heard.

2.53 श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला । समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥ ५३ ॥

सुनी हुई बातों से विचलित तुम्हारी बुद्धि जब समाधि में निश्चल और अचल हो जाएगी, तब तुम योग को प्राप्त होगे।

Your understanding is now bewildered by all it has heard. When it stands unmoved and steady in samādhi, then you will attain yoga.

अर्जुन बोले

2.54 स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव । स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥ ५४ ॥

हे केशव! समाधि में स्थित स्थितप्रज्ञ के क्या लक्षण हैं? स्थिरबुद्धि पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?

Keśava, what are the marks of one whose wisdom is steady, who is settled in samādhi? How does a man of steady mind speak, how does he sit, how does he walk?

श्रीभगवान् बोले

2.55 प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् । आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥ ५५ ॥

हे पार्थ! जब मनुष्य मन में उठने वाली सब कामनाओं को त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही सन्तुष्ट रहता है, तब वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।

Son of Pṛthā, when a person gives up all the desires that arise in the mind and is content in the Self alone, by the Self, he is called one of steady wisdom.

2.56 दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः । वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥ ५६ ॥

दुःखों में जिसका मन उद्विग्न नहीं होता, सुखों में जिसकी लालसा मिट गई है, और जो राग, भय और क्रोध से रहित है, वह मुनि स्थिरबुद्धि कहा जाता है।

One whose mind is not troubled in sorrow, who has no craving for pleasures, who is free from passion, fear and anger, is called a sage of steady mind.

2.57 यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् । नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ५७ ॥

जो सब जगह आसक्ति रहित है, और उस-उस शुभ या अशुभ को पाकर न प्रसन्न होता है न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है।

One who clings to nothing anywhere, who neither rejoices nor hates on meeting this good thing or that bad one, his wisdom is established.

2.58 यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ५८ ॥

जैसे कछुआ सब ओर से अपने अंगों को समेट लेता है, वैसे ही जब यह पुरुष इन्द्रियों को उनके विषयों से समेट लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर है।

When he draws his senses back from their objects on all sides, as a tortoise draws in its limbs, his wisdom is established.

2.59 विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः । रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥ ५९ ॥

विषयों को ग्रहण न करने वाले देहधारी के विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, पर उनका रस (आसक्ति) बना रहता है। परमात्मा को देखकर उसका रस भी निवृत्त हो जाता है।

When the embodied one does not take them in, the objects fall away, but the taste for them remains. When he has seen the Supreme, even the taste falls away.

2.60 यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः । इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥ ६० ॥

हे कौन्तेय! मथ डालने वाली इन्द्रियाँ प्रयत्न करते हुए बुद्धिमान् पुरुष के मन को भी बलपूर्वक हर लेती हैं।

Son of Kuntī, the turbulent senses carry off by force the mind even of a wise man who is striving.

2.61 तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः । वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ६१ ॥

उन सब इन्द्रियों को वश में करके योगयुक्त होकर मेरे परायण होकर बैठे। क्योंकि जिसकी इन्द्रियाँ वश में हैं, उसकी बुद्धि स्थिर है।

Restraining them all, he should sit disciplined, intent on me. For one whose senses are under control, his wisdom is established.

2.62 ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते । सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥ ६२ ॥

विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उनमें आसक्ति हो जाती है। आसक्ति से कामना उत्पन्न होती है, और कामना से क्रोध।

When a man dwells on objects, attachment to them arises. From attachment desire is born, and from desire comes anger.

2.63 क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः । स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥ ६३ ॥

क्रोध से मूढ़ता होती है, मूढ़ता से स्मृति भ्रमित होती है। स्मृति के नष्ट होने से बुद्धि का नाश होता है, और बुद्धि के नाश से वह नष्ट हो जाता है।

From anger comes delusion, and from delusion confusion of memory. When memory is lost, understanding is ruined, and when understanding is ruined, he perishes.

2.64 रागद्वेषविमुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् । आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥ ६४ ॥

पर जिसका अन्तःकरण वश में है, वह अपने वश में की हुई और राग-द्वेष से रहित इन्द्रियों द्वारा विषयों में विचरता हुआ प्रसन्नता को प्राप्त होता है।

But one whose mind is disciplined, moving among objects with senses under his own control and free from liking and dislike, attains serenity.

2.65 प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते । प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥ ६५ ॥

प्रसन्नता होने पर उसके सब दुःखों का नाश हो जाता है। क्योंकि प्रसन्न चित्त वाले की बुद्धि शीघ्र ही स्थिर हो जाती है।

In that serenity all his sorrows come to an end. For the understanding of one whose mind is serene soon becomes steady.

2.66 नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना । न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥ ६६ ॥

असंयमी की बुद्धि स्थिर नहीं होती, और उसमें भावना भी नहीं होती। भावना के बिना शान्ति नहीं, और अशान्त को सुख कहाँ?

The undisciplined have no steady understanding, and no contemplation. Without contemplation there is no peace, and without peace, where is happiness?

2.67 इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते । तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥ ६७ ॥

विषयों में विचरती इन्द्रियों में से जिसके साथ मन चल पड़ता है, वह उसकी बुद्धि को वैसे ही हर लेती है जैसे जल में नाव को वायु।

When the mind follows the roaming senses, it carries away his wisdom, as the wind carries away a boat on the water.

2.68 तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ६८ ॥

इसलिए हे महाबाहो! जिसकी इन्द्रियाँ सब प्रकार से विषयों से वश में की हुई हैं, उसकी बुद्धि स्थिर है।

So, mighty-armed one, one whose senses are completely held back from their objects, his wisdom is established.

2.69 या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी । यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥ ६९ ॥

जो सब प्राणियों के लिए रात है, उसमें संयमी जागता है। जिसमें प्राणी जागते हैं, वह तत्त्व को देखने वाले मुनि के लिए रात है।

What is night for all beings, in that the self-controlled one is awake. That in which beings are awake is night for the sage who sees.

2.70 आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् । तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥ ७० ॥

जैसे सब ओर से भरते हुए, अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में जल आकर समा जाते हैं, वैसे ही जिसमें सब कामनाएँ समा जाती हैं, वह शान्ति को प्राप्त होता है, भोगों को चाहने वाला नहीं।

As the waters enter the ocean, which is ever being filled yet stays unmoved in its depths, so all desires enter the one who attains peace, not the one who chases desires.

2.71 विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः । निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति ॥ ७१ ॥

जो पुरुष सब कामनाओं को त्यागकर लालसारहित, ममतारहित और अहंकाररहित होकर विचरता है, वह शान्ति को प्राप्त होता है।

A person who gives up all desires and lives free from longing, without "mine" and without ego, attains peace.

2.72 एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति । स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥ ७२ ॥

हे पार्थ! यह ब्रह्म की स्थिति है। इसे पाकर मनुष्य फिर मोहित नहीं होता। अन्तकाल में भी इसमें स्थित होकर वह ब्रह्मनिर्वाण को प्राप्त होता है।

Son of Pṛthā, this is the state of Brahman. Having reached it, one is never deluded again. Remaining in it even at the hour of death, one reaches the peace of Brahman.