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सत्संग ८

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गुस्सा कहाँ से आता है

गीता 2.54–2.63 · 76 मिनट

चाह से गुस्सा, गुस्से से भ्रम: मन की जंजीर

अर्जुन उवाच स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव । स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥ ५४ ॥
गीता 2.54 — अर्थ पढ़ें ›
श्रीभगवानुवाच प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् । आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥ ५५ ॥
गीता 2.55 — अर्थ पढ़ें ›

कभी ऐसा हुआ है कि आप किसी बात पर इतने भड़क गए हों कि बोलते समय आपको पता ही न चला हो कि आप क्या बोल रहे हैं? और फिर जब वो घड़ी बीत गई, तब आपको खुद पर हैरानी हुई कि ये शब्द मेरे मुँह से निकले कैसे। दफ़्तर में किसी की एक बात पर, घर में किसी के एक ताने पर, सड़क पर किसी गाड़ी के अचानक आगे आ जाने पर। और बाद में, जब मन ठंडा हुआ, तब वही सवाल कि मैं तो ऐसा नहीं हूँ, फिर ये कहाँ से आया?

आज का सत्संग इसी सवाल पर है: गुस्सा कहाँ से आता है? और गीता का जवाब उतना सीधा नहीं है जितना हम सोचते हैं। वो ये नहीं कहती कि गुस्सा बुरी चीज़ है, इसे छोड़ दो। वो हमें एक पूरी कड़ी दिखाती है, जिसमें गुस्सा बीच का एक मोती है, पहला नहीं। और जिस दिन पहला मोती दिख जाता है, उस दिन से गुस्से से लड़ने की जगह उसे बनने से पहले ही रोकना सीखा जा सकता है।

जय श्री कृष्ण।

आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का आठवाँ सत्संग है। पिछली बार हमने दूसरे अध्याय का वो हिस्सा सुना था जहाँ श्रीकृष्ण आत्मा की बात से आगे बढ़कर जीने की रीति पर आते हैं। उन्होंने कहा था, "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।" तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने का है, उसके फलों का नहीं। उन्होंने कहा था कि सफलता और असफलता में समान रहकर काम करो, और उसी समता को योग कहा। और फिर वो पंक्ति, जो बहुत-से लोगों को जीवन भर याद रहती है: "योगः कर्मसु कौशलम्।" योग कर्मों में कुशलता है। और उस हिस्से का अंत हुआ था तिरपनवें श्लोक पर, जहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि सुनी-सुनाई बातों से डगमगाती हुई तुम्हारी बुद्धि जब समाधि में निश्चल और अचल हो जाएगी, तब तुम योग को पा लोगे।

आज का सत्संग वहीं से उठता है। और उठता है अर्जुन के एक सवाल से, जो उन्होंने अभी-अभी सुने इसी "निश्चल बुद्धि" शब्द को पकड़कर पूछा है। श्रीधर स्वामी इसे बहुत सीधे ढंग से कहते हैं: पिछले श्लोक में जिस आत्मतत्त्व को जानने वाले की बात हुई, अर्जुन अब उसके लक्षण जानना चाहते हैं। यानी वो पूछ रहे हैं, ऐसा आदमी होता कैसा है? मैं उसे पहचानूँगा कैसे?

और इससे पहले कि हम उस सवाल में उतरें, मैं आपको एक बार फिर धृतराष्ट्र के पास ले चलना चाहता हूँ। क्योंकि ये पूरी गीता सञ्जय उन्हीं को सुना रहे हैं, उस समय जब भीष्म बाणों की शय्या पर लेटे हैं। महाभारत के भीष्म पर्व में, जब धृतराष्ट्र शोक में डूबे हैं और सञ्जय युद्ध की कथा शुरू करने जा रहे हैं, तब वो सबसे पहले जो कुछ कहते हैं, उसमें एक बात है। वो कहते हैं कि छल में चतुर लोगों के किए अपमान को पाण्डवों ने अपने मन्त्रियों के साथ सहा, और आपका मान रखकर उसे बहुत समय तक वन में धीरज से झेला। इस पंक्ति को याद रखिएगा। "बहुत समय तक धीरज से झेला।" आज का सत्संग गुस्से का है, और जिस कथा के बीच ये गीता कही जा रही है, उसमें गुस्से के भी बड़े-बड़े दृश्य हैं, और धीरज के भी। हम दोनों को आज साथ-साथ देखेंगे।

तो अब पहले श्लोक पर आइए। सुनिए कि अर्जुन पूछते क्या हैं। "स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव। स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्।"

हे केशव, समाधि में स्थित उस स्थिर बुद्धि वाले के लक्षण क्या हैं? वो बोलता कैसे है, बैठता कैसे है, और चलता कैसे है?

देखिए, ये कितना मानवीय सवाल है। अर्जुन ने अभी-अभी बहुत ऊँची बात सुनी है, और अब वो उसे ज़मीन पर उतार कर पूछ रहे हैं: ऐसा आदमी दिखता कैसा है? उसकी बोली कैसी, उसका बैठना कैसा, उसकी चाल कैसी? जैसे कोई कहे कि आपने जिस शांत आदमी की बात की, वो अगर मुझे बाज़ार में मिल जाए, तो मैं उसे पहचानूँगा कैसे?

मधुसूदन सरस्वती इस सवाल को चार हिस्सों में खोलते हैं, और ये बड़ा काम का है। पहला: समाधि में बैठे हुए स्थितप्रज्ञ को दूसरे लोग किस पहचान से कहते हैं? यानी उसका नाम किस लक्षण पर पड़ता है। और बाकी तीन उस आदमी के बारे में हैं जो समाधि से उठकर संसार में लौटा है: वो बोलता कैसे है, बैठता कैसे है, चलता कैसे है। मधुसूदन कहते हैं कि "बोलना" से अर्जुन का मतलब यह भी है कि प्रशंसा और निंदा मिलने पर वो क्या कहता है। "बैठना" का मतलब है कि बाहर की इन्द्रियों को वो कैसे सँभालता है। और "चलना" का मतलब है कि जब उसे विषयों के बीच जाना पड़े, तब वो उनके बीच कैसे चलता है। मतलब सवाल केवल ध्यान के आसन का नहीं है। सवाल पूरे दिन भर के जीने का है: बोलना, बैठना, चलना, यानी सुबह से रात तक का आदमी।

और अर्जुन का "केशव" कहना भी यहाँ यूँ ही नहीं है। मधुसूदन सरस्वती लिखते हैं कि इस संबोधन में अर्जुन ये भी कह रहे हैं कि आप सबके भीतर बैठे जानने वाले हैं, इसलिए ऐसा गूढ़ रहस्य बताने में आप ही समर्थ हैं। जब आदमी को सच में किसी भीतर की बात का जवाब चाहिए होता है, तो वो उसी को पुकारता है जो भीतर से जानता हो।

अब एक बहुत दिलचस्प बात, जो हमारी अपनी टीका में आती है और जिस पर पूरी बात आज की टिकी है। हमारी टीका कहती है कि अर्जुन बाहरी लक्षण पूछ रहे हैं, बोली, बैठक, चाल। पर अध्याय के बाकी हिस्से में श्रीकृष्ण का उत्तर लगभग पूरा भीतरी लक्षणों पर है। वो ये नहीं बताते कि ऐसा आदमी कैसे चलता है। वो ये बताते हैं कि वो चाहता क्या है, डरता किससे है, और पकड़े किसे रहता है। अर्जुन ने पूछा, "वो कैसा दिखता है?" और जवाब मिला, "वो भीतर से कैसा है।" इसीलिए, आगे के श्लोकों में जब हम गुस्से तक पहुँचेंगे, तब आप देखेंगे कि श्रीकृष्ण गुस्से का इलाज उसके चेहरे पर नहीं, उसकी जड़ में ढूँढ़ते हैं।

और आचार्य शंकर यहाँ एक बात कहते हैं जो मुझे बहुत पसंद है, और जिसे श्रीधर स्वामी और नीलकण्ठ भी अपने ढंग से कहते हैं। वो कहते हैं कि अध्यात्म के हर शास्त्र में जो लक्षण पूरे हो चुके आदमी के बताए जाते हैं, वही असल में साधना करने वाले के साधन होते हैं। क्योंकि जो चीज़ साधक को प्रयत्न से करनी पड़ती है, वही सिद्ध पुरुष में सहज हो जाती है। सोचिए इसका मतलब क्या हुआ। मतलब अब जो श्लोक आने वाले हैं, उनमें श्रीकृष्ण एक ऐसे आदमी का चित्र खींचेंगे जो हम से बहुत आगे खड़ा है, पर वो चित्र केवल प्रशंसा के लिए नहीं है। वो हमारा नक़्शा भी है। उस आदमी के लक्षण वही रास्ते हैं जिन पर हमें आज एक कदम चलना है।

अब आइए पचपनवें श्लोक पर। यहाँ से श्रीकृष्ण का उत्तर शुरू होता है, और उत्तर का पहला शब्द ही बहुत कुछ कह देता है। "प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्। आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते।"

हे पार्थ, जब मनुष्य मन में उठने वाली सब कामनाओं को पूरी तरह छोड़ देता है और आत्मा से आत्मा में ही सन्तुष्ट रहता है, तब वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।

इस एक श्लोक में तीन बातें हैं, और तीनों को अलग-अलग सुनना ठीक रहेगा।

पहली बात, "प्रजहाति।" श्रीकृष्ण "जहाति" नहीं कहते, यानी "छोड़ता है" नहीं कहते। वो कहते हैं "प्रजहाति", यानी अच्छी तरह, जड़ से छोड़ता है। आचार्य शंकर इस "प्र" का अर्थ बताते हैं, प्रकर्ष से, पूरी तरह। और नीलकण्ठ और भी साफ़ कहते हैं, समूल, जड़ समेत। मतलब ये कामनाओं को ऊपर-ऊपर से दबाने की बात नहीं है। ये वैसा नहीं है कि पत्ते तोड़ दिए और जड़ में पानी देते रहे। इस उपमा पर हम थोड़ी देर में फिर लौटेंगे, क्योंकि ज्ञानेश्वर महाराज ने इसी बात को बहुत सुंदर ढंग से कहा है।

दूसरी बात, "मनोगतान्।" ये कामनाएँ कहाँ हैं? मन में हैं। और मधुसूदन सरस्वती इस एक शब्द से बड़ा अर्थ निकालते हैं। वो कहते हैं कि श्रीकृष्ण ने "मनोगत" इसीलिए कहा कि कामनाएँ आत्मा का स्वभाव नहीं हैं, मन के धर्म हैं। अगर ये आत्मा का स्वभाव होतीं, तो इन्हें छोड़ा न जा सकता, वैसे ही जैसे आग की गर्मी को आग से अलग नहीं किया जा सकता। पर चूँकि ये मन की हैं, इसलिए ये मन के हटाने से हटाई जा सकती हैं। ये बात सुनने में छोटी लगती है, पर इसमें एक बड़ी राहत छिपी है। जो चीज़ मन में आई है, वो आप नहीं हैं। जैसे आकाश में बादल आते हैं और आकाश बादल नहीं बन जाता। आपकी चाह, आपका लालच, आपका गुस्सा, ये सब मन के मौसम हैं। मौसम बदलता है, और जो उसे देखता है, वो नहीं बदलता।

तीसरी बात, और सबसे गहरी: "आत्मन्येवात्मना तुष्टः।" आत्मा से आत्मा में ही सन्तुष्ट। यहाँ आचार्य शंकर एक सवाल उठाते हैं जो मुझे बहुत ईमानदार लगता है। वो कहते हैं, अगर आदमी सब कामनाएँ छोड़ दे, तो फिर उसे संतोष किस बात से मिलेगा? संतोष का कोई कारण ही नहीं बचा। और जिसके पास संतुष्ट रहने का कारण नहीं, उसके शरीर के बचे हुए व्यवहार तो पागल और बेसुध आदमी जैसे हो जाएँगे। इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि उसका संतोष बाहर से नहीं आता, आत्मा से आता है। वो सत्य को देखने के अमृत-रस से तृप्त रहता है, और उसे बाहर के किसी लाभ पर टिकना नहीं पड़ता।

और मधुसूदन सरस्वती यहाँ एक और शंका सामने रखते हैं। वो पूछते हैं, कि जब सब वृत्तियाँ शांत हैं, तो स्थितप्रज्ञ के चेहरे पर जो प्रसन्नता दिखती है, वो कहाँ से आती है? और जवाब देते हैं कि वो परम आनन्द रूप आत्मा में तृप्ति से आती है, न कि किसी छोटी, तुच्छ चीज़ से। वो एक श्रुति-वाक्य भी याद करते हैं, जिसका आशय है कि जब हृदय में बसी सब कामनाएँ छूट जाती हैं, तब मरणशील मनुष्य यहीं अमर हो जाता है और ब्रह्म को पा लेता है।

और अब जो मैं कहने जा रहा हूँ, वो इस सत्संग की रीढ़ है। श्रीधर स्वामी कहते हैं कि सिद्ध के लक्षण कहते-कहते श्रीकृष्ण यहाँ से अध्याय के अंत तक ज्ञान के भीतरी साधन ही बता रहे हैं। और इन्हीं के बीच वो चीज़ छिपी है जिसका नाम अभी तक आया नहीं है: क्रोध। अभी श्रीकृष्ण ने गुस्से का नाम नहीं लिया। उन्होंने कहा है, "काम"। इच्छा। पर सत्संग के अंत तक आप देखेंगे कि वो इच्छा ही गुस्से की जननी है। और बहुत आगे, तीसरे अध्याय में, श्रीकृष्ण इसे इतना सीधा कह देंगे कि कोई अटकल बाकी नहीं रहेगी: "काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।" ये काम ही क्रोध है, रजोगुण से उपजा हुआ। आज हम उसकी पहली झलक देख रहे हैं।

नीलकण्ठ एक और सुंदर बात जोड़ते हैं। वो कामनाओं के तीन रूप गिनाते हैं। एक, मोटी कामनाएँ, जो जागते हुए बाहर की चीज़ों के लिए उठती हैं, और जो कुछ दिन अकेले में, शांत जगह पर रहने भर से कमज़ोर पड़ जाती हैं। दो, वो कामनाएँ जो जागते हुए मन में बैठे संस्कारों से सपनों में उभरती हैं, और जिनका इलाज भगवान के ध्यान जैसे अच्छे संस्कारों का अभ्यास है। और तीन, बहुत सूक्ष्म, वो जो गहरी समाधि में भी दिव्य सुख की कल्पना बनकर आती हैं। नीलकण्ठ कहते हैं कि तीनों के छूटने पर ही आदमी "आत्मा में ही आत्मा से" तृप्त रहता है। मैं आपको ये इसलिए बता रहा हूँ कि आप देख सकें, कामना केवल "मुझे ये चाहिए" जितनी सरल चीज़ नहीं है। वो कई तहों में बैठी है, और हर तह का अपना इलाज है।

अब ज़रा ये सब अपने जीवन में उतारकर देखिए। हम सब किसी न किसी चीज़ की चाह में दिन शुरू करते हैं। किसी को पदोन्नति चाहिए, किसी को सम्मान, किसी को सुकून, किसी को बस इतना कि फ़ोन पर वो एक संदेश आ जाए जिसका इंतज़ार है। और जब तक वो चाह हमारे भीतर टिकी है, तब तक हमारा संतोष दूसरों के हाथ में है। जवाब आया तो अच्छा, नहीं आया तो मन बेचैन। श्रीकृष्ण यहाँ कह रहे हैं कि स्थिर बुद्धि का पहला चिह्न ये नहीं कि उसके पास कुछ नहीं है, बल्कि ये कि उसका संतोष किसी के जवाब पर नहीं टिका। एक माँ जो बच्चे को सुला कर बाहर आती है, और जिसे उस पल में किसी और चीज़ की ज़रूरत नहीं लगती, वो इस श्लोक का एक छोटा-सा रूप जी रही है। मैं ये नहीं कहता कि वो स्थितप्रज्ञ है, पर उसने उस संतोष का स्वाद चखा है जो भीतर से आता है।

और याद रखिए कि श्रीकृष्ण ये किससे कह रहे हैं। उस अर्जुन से जो अभी कुछ ही देर पहले इसी इच्छा के हाथों रो रहा था, कि जिनके लिए राज्य चाहा, वही सामने खड़े हैं। उसे श्रीकृष्ण यह नहीं कह रहे कि इच्छा करना पाप है। वो कह रहे हैं कि इच्छा कहाँ रखी है, ये देखो, और संतोष कहाँ रखा है, ये देखो।

पर अभी एक बात बाकी है। इस सवाल का उत्तर एक श्लोक में पूरा नहीं होता, क्योंकि अर्जुन ने चार सवाल पूछे थे, और श्रीकृष्ण अगले श्लोक में उस स्थितप्रज्ञ का एक ऐसा लक्षण बताने वाले हैं, जिसमें तीन चीज़ें एक साथ गिनाई गई हैं, और उनमें से एक वही है जिसकी बात हम आज कर रहे हैं। वो तीन कौन हैं, और वो एक साथ क्यों गिनाए गए हैं, यही हम सुनेंगे।

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः । वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥ ५६ ॥
गीता 2.56 — अर्थ पढ़ें ›
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् । नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ५७ ॥
गीता 2.57 — अर्थ पढ़ें ›

इन दो श्लोकों में उतरने से पहले आपसे एक छोटी-सी बात कहना चाहता हूँ। हम आज उस हिस्से में हैं जहाँ बहुत-से लोग गीता सुनते-सुनते सोचते हैं कि ये तो साधु-संतों की बातें हैं, हमारे दफ़्तर और घर की रोज़ की खटपट से इनका क्या लेना। पर आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। जो यहीं उठ जाएगा, वो गुस्से की उस पूरी कड़ी को नहीं सुन पाएगा जो इस सत्संग के आख़िरी श्लोकों में खुलती है, और जिसे सुनकर बहुत-से लोग कहते हैं कि यह तो मेरे ही बारे में लिखा है। तो अगर आप ये सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि ये यात्रा बीच में न टूटे। और आज का हिस्सा आख़िर तक सुनिए।

अब आइए, छप्पनवें श्लोक पर। "दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः। वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते।"

जिसका मन दुःखों में उद्विग्न नहीं होता, सुखों में जिसकी लालसा मिट गई है, और जो राग, भय और क्रोध से रहित है, वह मुनि स्थिर बुद्धि वाला कहलाता है।

ध्यान दीजिए, यहाँ पहली बार "क्रोध" शब्द आया है। और वो अकेला नहीं आया। वो एक तिकड़ी में आया है: राग, भय और क्रोध। श्रीकृष्ण इन तीनों को एक साथ गिनाते हैं, एक ही साँस में। और यह कोई संयोग नहीं। रामानुज इन तीनों की परिभाषा ऐसी देते हैं कि आप देखेंगे कि ये तीनों एक ही परिवार के हैं।

रामानुज कहते हैं कि राग वो है जिसमें आदमी उन चीज़ों के लिए ललकता है जो अभी आई नहीं हैं। भय वो है जो उस कारण को देखकर उपजता है जिससे प्रिय चीज़ छिन सकती है या अप्रिय चीज़ आ सकती है। और क्रोध, उनके अनुसार, वो अपने मन का विकार है जो उन दूसरे लोगों के प्रति उठता है जो उस बिछोह या उस अप्रिय के आने का कारण बनते दिखते हैं। मतलब, राग चाहता है, भय डरता है कि वो चाह छिन जाएगी, और क्रोध उस आदमी पर टूटता है जो उस छिनने का कारण दिखाई देता है।

इसे अपने जीवन में रखकर देखिए। दफ़्तर में आपको अपनी नौकरी से लगाव है, ये राग है। कोई कह देता है कि कंपनी में कटौतियाँ आ रही हैं, ये भय है। और अगले दिन आप किसी सहकर्मी की एक मामूली-सी बात पर फट पड़ते हैं, ये क्रोध है। या अस्पताल की वो प्रतीक्षा-कक्ष वाली रात, जब घर का कोई बड़ा भीतर भर्ती है। भीतर भय है, और वही भय बाहर आता है जब आप नर्स से ऊँची आवाज़ में बोल पड़ते हैं। बाद में आप पछताते हैं, क्योंकि आप जानते हैं कि नर्स का कोई दोष नहीं था। पर गुस्सा नर्स पर नहीं था, गुस्सा उस भय पर था जो किसी और पर निकल गया।

इसीलिए मैंने कहा था कि गुस्सा बीच का मोती है, पहला नहीं। गुस्से के पीछे लगभग हमेशा या तो कोई चाह खड़ी होती है, या कोई डर। और गीता यहाँ यही कह रही है कि स्थिर बुद्धि वाला वो नहीं जो गुस्से को दबाता रहे, बल्कि वो जिसमें गुस्से को ईंधन देने वाले राग और भय ही ढीले पड़ गए हैं।

अब छप्पनवें श्लोक का पहला हिस्सा भी सुनिए। "दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः।" दुःखों में जिसका मन उद्विग्न नहीं होता। और मधुसूदन सरस्वती यहाँ एक बहुत बारीक बात पकड़ते हैं, जो मुझे पूरे अध्याय की सबसे व्यावहारिक बातों में से लगती है। वो कहते हैं कि दुःख तो आता है, वो आदमी के अपने बीते कर्मों से आता है, और स्थितप्रज्ञ को भी आता है। पर उस दुःख के ऊपर एक और चीज़ चढ़ती है, जिसका नाम उद्वेग है। और वो ये होती है कि आदमी सोचने लगता है, अरे मैं कितना अभागा हूँ, मुझे ही ये दुःख क्यों मिला, कोई मेरा ये कष्ट हटा दे। मधुसूदन कहते हैं कि यह बाद की बेचैनी भ्रम से पैदा होती है, अविवेक से, और विवेकी में नहीं होती।

मैं इसे आपकी भाषा में कहूँ तो यूँ कि चोट एक बार लगती है, पर मन उसे दूसरी बार, तीसरी बार, चौथी बार लगा लेता है, हर बार ये सोचकर कि ऐसा मेरे साथ क्यों हुआ। पहली चोट जीवन देता है, बाकी चोटें हम खुद अपने को देते हैं। और गुस्सा अक्सर इसी दूसरी, तीसरी चोट से जन्म लेता है।

सुखों के बारे में भी मधुसूदन यही बात कहते हैं, और यहाँ तो बात और भी सुंदर है। "सुखेषु विगतस्पृहः।" सुख आता है, तो उसके साथ एक आवाज़ भी आती है: अहा, कैसा मैं धन्य हूँ, अब यह सुख कभी न टूटे। मधुसूदन कहते हैं कि यह आवाज़ भी भ्रम है। आचार्य शंकर एक सुंदर उपमा से इसे कहते हैं: जैसे ईंधन डालने पर आग बढ़ती है, वैसे ही सुख मिलने पर जिसकी लालसा बढ़ती जाती है, वो "विगतस्पृह" नहीं है। जो सुख को आते देखता है, उसका स्वागत भी करता है, पर उसे पकड़कर बैठ नहीं जाता, वही सुख में विगतस्पृह है।

और नीलकण्ठ यहाँ एक बात जोड़ते हैं जो बहुत सीधी है। वो कहते हैं कि दुःख के साधन, जैसे शस्त्र का प्रहार, आ जाएँ तब भी जिसका मन अचंचल रहता है, और सुख के साधन, जैसे फूलों की माला और चंदन, मिल जाएँ तब भी जो उनसे निःस्पृह है, वही इस अवस्था में है। और ज्ञानेश्वर महाराज उसी बात को अपने ढंग से कहते हैं: उसके मन में नाना दुःख आने पर भी उद्वेग नहीं, और सुख की आतुरता से वो अटकता नहीं। उसमें काम और क्रोध सहज ही नहीं हैं, और भय को वो जानता ही नहीं। ऐसा जो सीमा-रहित है, वही स्थिर बुद्धि है।

अब एक बात और। जिस कथा के बीच ये गीता कही जा रही है, उसमें एक वीर ऐसा है जिसके क्रोध पर पूरी सेना की रचना टिकाई गई थी। आपको याद होगा, पहले सत्संग में हमने सुना था कि युद्ध से ठीक पहले अर्जुन ने छोटी पाण्डव सेना के लिए वज्र व्यूह रचा और भीम को सबसे आगे रखा। उसी जगह अर्जुन कारण भी बताते हैं, और आज वही कारण हमारे काम का है: संसार में सचमुच ऐसा कोई पुरुष नहीं जो क्रोध में भरे भीम को देखना भी सह सके। ध्यान से सुनिए इस बात को। क्रोध की एक अपनी ताक़त होती है, और युद्ध की रचना करने वाले उसे जानते थे। पर गीता, जो उसी रणभूमि में कही जा रही है, वो ताक़त नहीं माँगती। वो अर्जुन से कहती है, और ये हम पिछले सत्संगों में सुन चुके हैं, कि सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समान मानकर फिर युद्ध के लिए तैयार हो जाओ। श्रीकृष्ण अर्जुन से कहीं नहीं कहते कि गुस्से में लड़ो। वो कहते हैं, समता में लड़ो।

सत्तावनवें श्लोक पर आइए। "यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्। नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।"

जो सब जगह आसक्ति से रहित है, और उस-उस शुभ या अशुभ को पाकर न प्रसन्न होता है, न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है।

इस श्लोक का एक शब्द है, "सर्वत्रानभिस्नेह", यानी सब जगह आसक्ति-रहित, चिपकाव-रहित। आचार्य शंकर कहते हैं कि यहाँ "सब जगह" का मतलब है शरीर और जीवन तक, यानी जिसे अपने शरीर और अपनी आयु पर भी चिपकाव नहीं रहा। और फिर दो क्रियाएँ आती हैं: "नाभिनन्दति", वो अभिनंदन नहीं करता, और "न द्वेष्टि", वो द्वेष नहीं करता।

यहाँ नीलकण्ठ की टीका बहुत काम की है, और मैं इसे अपने शब्दों में बताता हूँ। वो कहते हैं कि जिसे चीज़ों से चिपकाव है, वो धन, पत्नी, शरीर, जीवन जैसी किसी भी चीज़ के घटने-बढ़ने पर या तो दैन्य के साथ बोलता है, यानी "मैं बर्बाद हो गया", या घमंड के साथ, यानी "मैं पूरा हो गया", और आगे-पीछे का कुछ नहीं देखता। पर स्थितप्रज्ञ ऐसा नहीं। वो शुभ पाकर खुश होकर शुभ देने वाले की प्रशंसा नहीं करता, और अशुभ पाकर दुखी होकर अशुभ लाने वाले की निंदा नहीं करता। एक पंक्ति फिर सुनिए: अशुभ पाकर, अशुभ लाने वाले की निंदा नहीं करता। गुस्से का स्वभाव यही है न? हम बुरी बात का दोष किसी चेहरे को देते हैं। और जब उस चेहरे को निंदा मिल जाती है, तब हमें लगता है कि बात सुलझ गई, जबकि बात वहीं पड़ी रहती है।

श्रीधर स्वामी भी यही कहते हैं कि वह शुभ को पाकर प्रशंसा नहीं करता, अशुभ को पाकर निंदा नहीं करता, वह केवल तटस्थ भाव से बोलता है। और अर्जुन का सवाल याद कीजिए, कि वो बोलता कैसे है। यही उसका उत्तर है: वो बोलता है, पर उसकी बोली में न स्तुति का तेल है, न निंदा की आग।

अब यहाँ एक बात की सावधानी रखिए, क्योंकि "तटस्थ" शब्द को हम बहुत ठंडा समझ लेते हैं। लगता है कि ऐसा आदमी पत्थर जैसा है, किसी से मतलब नहीं। ज्ञानेश्वर महाराज इसे बिल्कुल उलट कर कहते हैं, और मुझे उनकी उपमा बहुत प्यारी लगती है। वो कहते हैं कि वह पूर्ण चंद्रमा जैसा है, जो हर जगह एक-सा चमकता है और अपनी रोशनी में ऊँच-नीच नहीं देखता। उसकी समता अटूट है, प्राणियों पर उसकी दया है, और उसके चित्त में किसी समय बदलाव नहीं आता। कुछ अच्छा मिले तो संतोष से नहीं डगमगाता, कुछ बुरा हो तो विषाद उसे नहीं गिराता। चंद्रमा ठंडा नहीं है। चंद्रमा शीतल है। ठंडे और शीतल में बहुत फ़र्क़ होता है: ठंडा वो जिसे परवाह नहीं, शीतल वो जिसकी परवाह इतनी गहरी है कि उसमें उबाल नहीं आता।

तो आज इन दो श्लोकों से हमने क्या पाया? गुस्सा अकेला नहीं रहता, वह राग और भय के साथ रहता है। और स्थिर बुद्धि वाले की पहचान यह नहीं कि उसे कभी कुछ नहीं होता, बल्कि यह कि दुःख पर उसकी दूसरी चोट नहीं लगती, सुख को वो पकड़कर नहीं बैठता, और बुरी बात के लिए किसी चेहरे को सूली पर नहीं चढ़ाता। ज़रा सोचिए, आज कितनी बार हमने किसी "लाने वाले" को दोषी ठहराया।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण अब एक ऐसी उपमा देने वाले हैं जिसे सुनकर शायद आप मुस्कुरा दें, क्योंकि वो एक छोटे-से जीव की है। और उसी उपमा में छिपा है यह रहस्य कि इन्द्रियों को "बंद" करना नहीं, "समेटना" होता है, और दोनों में ज़मीन-आसमान का अंतर है।

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ५८ ॥
गीता 2.58 — अर्थ पढ़ें ›
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः । रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥ ५९ ॥
गीता 2.59 — अर्थ पढ़ें ›

अट्ठावनवाँ श्लोक एक तस्वीर है। छोटी-सी, पर जो एक बार देख ली, वो भूलती नहीं। "यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।"

जैसे कछुआ सब ओर से अपने अंगों को समेट लेता है, वैसे ही जब यह पुरुष इन्द्रियों को उनके विषयों से समेट लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर है।

एक बात पहले ही सुन लीजिए, जो हमारी अपनी टीका इस श्लोक पर कहती है, क्योंकि यही इस पूरी उपमा की चाबी है। टीका कहती है: कछुआ जब चाहे अंग समेटता है, और जब चाहे बाहर निकालता है। यह उपमा इन्द्रियों पर अधिकार की है, उन्हें सदा के लिए बंद कर देने की नहीं। समझ लीजिए, कछुआ अपने अंग काटकर नहीं फेंकता। वो उन्हें भीतर ले लेता है, और जब ख़तरा टल जाता है, तब बाहर निकाल लेता है। श्रीकृष्ण यह नहीं कह रहे कि आँख, कान, जीभ, ये सब बेकार हैं, इन्हें बंद कर दो। वो कह रहे हैं कि जिसे इन पर अधिकार है, वो इन्हें उस पल समेट सकता है जब ज़रूरत हो।

इसमें "यदा" शब्द पर ध्यान दीजिए। "जब।" यह कोई स्थायी अवस्था नहीं बताई जा रही, एक सामर्थ्य बताई जा रही है: जब वो चाहे। श्रीधर स्वामी इसमें एक बारीकी जोड़ते हैं। वो कहते हैं कि कछुआ अपने अंगों को बिना प्रयास के, अपने स्वभाव से ही समेट लेता है, इसी तरह योगी भी इन्द्रियों को बिना खींचतान के भीतर ले लेता है। यानी ये ज़ोर-ज़बरदस्ती की बात नहीं है। जिसने अभ्यास किया है, उसके लिए यह उतना ही सहज है जितना कछुए के लिए।

आचार्य शंकर कहते हैं कि कछुआ यह भय से करता है, और ज्ञान में टिका साधक यही काम अपनी समझ से करता है। रामानुज कहते हैं कि ठीक उसी क्षण जब इन्द्रियाँ अपने विषयों को छूने के लिए उठी हों, वो उन्हें वापस समेटकर मन को आत्मा में स्थिर कर देता है। और मधुसूदन सरस्वती इसे अर्जुन के दूसरे सवाल का उत्तर बताते हैं, "किमासीत", यानी वो बैठता कैसे है। उनका उत्तर है: उसका बैठना वो है जिसमें वो इन्द्रियों को विषयों से समेटकर समाधि के लिए टिकता है।

अब इसे गुस्से तक ले आइए। आपके सामने एक संदेश आता है, किसी रिश्तेदार का, किसी सहकर्मी का, कुछ ऐसा जो आपको चुभता है। आपकी उँगलियाँ पहले से जवाब लिखने को उठ जाती हैं। यही वो क्षण है जहाँ कछुए की उपमा काम आती है। उँगलियाँ उठती हैं, आँखें पढ़ती हैं, कान सुनना चाहते हैं कि वो दूसरा क्या कह रहा है, और मन उन सबके पीछे दौड़ता है। जो उस एक पल में इन्द्रियों को समेट सकता है, वो जवाब नहीं भेजता, वो फ़ोन नीचे रखता है, पानी पीता है, और अपने भीतर लौटता है। तीन मिनट बाद वही आदमी वही जवाब शायद नहीं लिखेगा, या बहुत अलग ढंग से लिखेगा। उसने गुस्से को हराया नहीं, उसने उसे बनने का समय ही नहीं दिया। यह कछुए की चाल है, और इसके लिए किसी बड़ी साधना की ज़रूरत पहले दिन नहीं, बस एक पल का अभ्यास चाहिए।

पर अब उनसठवाँ श्लोक आता है, और यह पिछले श्लोक की आँख खोलने वाली टीका है, क्योंकि यहाँ श्रीकृष्ण एक आम ग़लतफ़हमी को सीधे पकड़ते हैं। "विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः। रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते।"

विषयों को ग्रहण न करने वाले देहधारी के विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, पर उनका रस, यानी आसक्ति, बना रहता है। परमात्मा को देखकर उसका रस भी निवृत्त हो जाता है।

यहाँ "निराहार" शब्द का अर्थ केवल उपवास नहीं है। श्रीधर स्वामी समझाते हैं कि इन्द्रियों के द्वारा विषयों को ग्रहण करना ही यहाँ "आहार" है। तो निराहार का मतलब हुआ, वो जो इन्द्रियों से विषय ले ही नहीं रहा। और "रस" का मतलब है, आचार्य शंकर के अनुसार, राग, यानी विषयों के प्रति जो लगाव है। तो श्लोक कह रहा है कि आप किसी चीज़ से दूर हो जाएँ, तो वो चीज़ आपसे दूर हो जाती है, पर उसके प्रति जो स्वाद आपके भीतर है, वो आपके भीतर ही बना रहता है।

मधुसूदन सरस्वती यहाँ एक आपत्ति उठाते हैं, जो बहुत वाजिब है। वो कहते हैं कि कोई मूढ़ आदमी भी, कोई रोगी या कठोर तप करने वाला, जब इन्द्रियों से विषय नहीं लेता, तो उसके विषय भी छूट जाते हैं। तो फिर उसे स्थितप्रज्ञ क्यों न कहें? और उत्तर यही है कि उसका रस नहीं गया। नीलकण्ठ इसमें और आगे जाते हैं: गहरी नींद में, बेहोशी में भी इन्द्रियाँ विषयों से हट जाती हैं, पर कोई यह नहीं कहता कि सोया हुआ आदमी स्थितप्रज्ञ है, क्योंकि जागने पर वही राग लौट आता है। राग की जड़ आत्मा का अज्ञान है, और जब तक वो अज्ञान नहीं जला, राग सूक्ष्म रूप में सोया पड़ा रहता है।

श्रीधर स्वामी इसी बात को उपवास से जोड़ते हैं। भूख से तड़पते आदमी को शब्द और स्पर्श की चाह नहीं रहती, पर भोजन की चाह तो और बढ़ जाती है। और बाल गंगाधर तिलक, जो इस श्लोक पर बहुत ज़ोर देते हैं, कहते हैं कि इस तरह निराहार रहकर जो विषय छूटते हैं, वो केवल मजबूरी की कमज़ोरी से छूटते हैं, इसलिए वह एक बाहरी क्रिया भर है। मन की विषय-वासना इससे कम नहीं होती। वो यह भी कहते हैं कि गीता का सिद्धांत यही है कि शरीर को कृश करने वाले उपाय अकेले छोड़ देने योग्य हैं, और नियमित खान-पान के साथ ज्ञान ही इन्द्रियों को वश में करने का सही साधन है।

ज्ञानेश्वर महाराज ने इसे एक ऐसी उपमा से कहा है कि सुनने वाला फिर भूल नहीं पाता। वो कहते हैं कि साधक नियम से विषयों को छोड़ते हैं, कान, आँख आदि इन्द्रियों को रोक लेते हैं, पर जीभ के रस पर नियम नहीं लगा पाते, और वही विषय उन्हें हज़ार तरह से पकड़ लेते हैं। जैसे कोई पेड़ के ऊपर के पत्ते तो तोड़ता रहे, और जड़ में पानी देता रहे, तो पेड़ मरेगा कैसे? उलटे वह और भरकर फैलेगा। वही हाल है उस साधक का, जो ऊपर से इन्द्रियों को रोकता है और भीतर से रस को पानी देता है। ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं कि असली बात तब होती है जब परब्रह्म का अनुभव हो जाता है: तब शरीर का भाव मिट जाता है, इन्द्रियाँ विषयों को भूल जाती हैं, और "वही मैं हूँ" की प्रतीति प्रकट होती है।

अब इसे हम अपने जीवन से जोड़ें, क्योंकि यही वो जगह है जहाँ गुस्से के बारे में सबसे ज़्यादा ग़लतफ़हमी रहती है। कितनी बार हमने कहा, "मैं तो चुप रहा, मैंने उससे कुछ नहीं कहा।" और सचमुच, मुँह से कुछ नहीं निकला। विषय हट गया, वह आदमी सामने से हट गया। पर रात भर करवटें बदलते हुए हम वही बात दोहराते रहे। उसके हर शब्द को चबाते रहे। हर जवाब को मन में सौ बार बनाते रहे। यही रस है। मुँह बंद रहा, पर भीतर का स्वाद वही रहा। और अगली बार जब वही आदमी सामने आएगा, वह स्वाद पूरी ताक़त से लौट आएगा।

इसका उलटा भी उतना ही सच है, और यह बात हमें हिम्मत देती है। श्लोक का दूसरा आधा कहता है कि "परं दृष्ट्वा", किसी ऊँची चीज़ को देखकर, रस भी लौट जाता है। यानी रस को जबरदस्ती निकाला नहीं जाता। जब आदमी को कुछ ऐसा मिल जाता है जो उससे ज़्यादा मीठा है, तब पहले वाला स्वाद अपने आप फीका पड़ने लगता है। आपने देखा होगा कि जिस बच्चे को घर की बनी ताज़ा मिठाई मिल जाए, वो फिर बाज़ार की बासी टॉफ़ी के लिए नहीं मचलता।

और इसी बात का एक दर्पण महाभारत में भी है, धृतराष्ट्र के अपने शब्दों में। आपको याद होगा, पहले और छठे सत्संग में हमने उनकी ये स्वीकारोक्ति सुनी थी: मैं अन्धा हूँ, और कमज़ोरी तथा पुत्र-प्रेम के कारण सह लेता हूँ, जब मूर्ख दुर्योधन भटकता है, तो मैं भी उसके साथ भटक जाता हूँ। आज उसे इस श्लोक के साथ रखकर सुनिए। देखिए, उन्हें दिखाई देता है कि बात ग़लत है। विषय सामने स्पष्ट है। पर रस, यानी पुत्र-प्रेम का वह स्वाद, बना रहता है, और वही उन्हें हर बार भटका देता है। मैं यह इसलिए नहीं कह रहा कि हम धृतराष्ट्र की निंदा करें। मैं इसलिए कह रहा हूँ कि जो आदमी जानते हुए भटकता है, उसकी हालत हम सबकी हालत है।

तो इन दो श्लोकों ने हमें दो बातें दीं। पहली: इन्द्रियों को समेटने की कला होती है, और वह समेटना है, काटना नहीं। दूसरी: समेटना अकेला काफ़ी नहीं, क्योंकि स्वाद भीतर बचा रहता है। और यह दूसरी बात ही अगले श्लोक की भूमिका है, जहाँ श्रीकृष्ण एक बहुत कठोर, बहुत सच्ची बात कहने जा रहे हैं।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण अब कहेंगे कि जो ज्ञानी है, जो प्रयत्न भी कर रहा है, उसका मन भी इन्द्रियाँ बलपूर्वक हर ले जाती हैं। और फिर वो ऐसा उपाय बताएँगे जिसमें पहली बार वो स्वयं को लक्ष्य बताते हैं: मेरे परायण होकर बैठो।

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः । इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥ ६० ॥
गीता 2.60 — अर्थ पढ़ें ›
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः । वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ६१ ॥
गीता 2.61 — अर्थ पढ़ें ›

साठवाँ श्लोक गीता के सबसे ईमानदार श्लोकों में से एक है। "यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः। इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः।"

हे कौन्तेय, मथ डालने वाली इन्द्रियाँ प्रयत्न करते हुए बुद्धिमान् पुरुष के मन को भी बलपूर्वक हर लेती हैं।

इसमें श्रीकृष्ण वह बात कह रहे हैं जो हम में से लगभग हर कोई कभी न कभी महसूस कर चुका है, पर किसी के सामने मानता नहीं। कि मैं जानता हूँ, मैं कोशिश भी कर रहा हूँ, फिर भी मन मेरे हाथ से निकल गया। और श्रीकृष्ण इसमें हमें दोष नहीं देते। वो कहते हैं, "यततो ह्यपि", प्रयत्न करते हुए भी। "विपश्चितः", विवेकी का भी। यानी जो पढ़ा-लिखा है, जो समझदार है, जो कोशिश में लगा है, उसका भी।

देखिए, यह कितना बड़ा आश्वासन है। हम अक्सर अपने गुस्से के बाद अपने ऊपर यह फ़ैसला सुना देते हैं कि मैं पाखंडी हूँ, मैं इतना सुनता-पढ़ता हूँ और फिर भी वैसा ही हूँ। श्रीकृष्ण यहाँ कह रहे हैं कि यह तुम्हारे ज्ञान की कमी का प्रमाण नहीं है। यह इन्द्रियों का स्वभाव है। वो मथने वाली हैं, "प्रमाथीनि", जैसे दही को मथानी मथती है। जिस चीज़ को वो मथ दें, वह फिर स्थिर कहाँ रहती है।

और जिसे यह बात अर्जुन से कही जा रही है, वह अर्जुन ख़ुद इसका उदाहरण है। पहले अध्याय में उन्होंने कहा था, "मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं और मुँह सूख रहा है। गाण्डीव धनुष हाथ से फिसल रहा है, और मेरा मन चकरा-सा रहा है।" ये वही अर्जुन हैं जिन्होंने, जैसा हमने पहले सत्संग में सुना, विराट नगर के युद्ध में देवदत्त शंख ऐसे बजाया था मानो तीनों लोकों को हिला रहे हों। वो भी, जब मन को मथ दिया गया, तो खड़े नहीं रह सके। तो श्रीकृष्ण अर्जुन से यह नहीं कह रहे कि तुम कमज़ोर हो। वो कह रहे हैं कि जो तुमने झेला, वह इन्द्रियों और मन की सबसे पुरानी कहानी है।

इस श्लोक के शब्दों पर आचार्यों ने बहुत सुंदर उपमाएँ दी हैं। आचार्य शंकर कहते हैं कि इन्द्रियाँ विषयों की तरफ़ जाने वाले आदमी को पहले विक्षुब्ध करती हैं, उसे आकुल कर देती हैं, और फिर उसके विवेक से भरे मन को उसकी आँखों के सामने ही हर ले जाती हैं। "सामने ही।" वह देख रहा होता है कि क्या हो रहा है, और फिर भी रोक नहीं पाता। मधुसूदन सरस्वती इसे चोरों की उपमा से समझाते हैं। जैसे लुटेरे किसी धनी आदमी और उसके रखवाले को दबाकर, उन दोनों के देखते-देखते ही धन उठा ले जाते हैं, वैसे ही इन्द्रियाँ, विषय पास आने पर, विवेक के रहते हुए भी मन को उठा ले जाती हैं। नीलकण्ठ भी यही कहते हैं: जैसे वन में बहुत-से चोर अकेले आदमी को कुचलकर उसका धन ले जाते हैं।

और रामानुज एक बहुत गहरी बात कहते हैं, जो इस श्लोक को उसके अगले श्लोक से जोड़ती है। वो कहते हैं कि आत्मा को देखे बिना विषयों का राग नहीं जाता, और राग गए बिना इन्द्रियों पर जीत नहीं होती। यानी इन्द्रियों को जीतना आत्मदर्शन पर टिका है, और आत्मदर्शन इन्द्रियों को जीतने पर। दोनों एक-दूसरे पर टिके हैं। इसीलिए, रामानुज कहते हैं, ज्ञान में स्थिर होना इतना दुर्लभ है। आप सोचिए, एक आदमी दो खंभों के बीच फँसा है, जिनमें से हर एक दूसरे को थामे हुए है। उसे निकलने का एक ही रास्ता चाहिए, और वह रास्ता श्रीकृष्ण अगले श्लोक में देने वाले हैं।

ज्ञानेश्वर महाराज इस श्लोक को ऐसा लिखते हैं कि पढ़ने वाले की आँखें नम हो जाएँ। वो कहते हैं कि जो साधक निरंतर यत्न करते हैं, जो यम और नियम की बाड़ से मन को मुट्ठी में पकड़े रहते हैं, उन्हें भी ये इन्द्रियाँ कासाविस कर देती हैं, बेचैन कर देती हैं। इनका बल ऐसा है कि मंत्र जानने वाले को भी भरमा दें। विषय ऋद्धि-सिद्धि का बहाना बनाकर आते हैं, और इन्द्रियों के स्पर्श से मन पकड़ में आ जाता है। और तब मन चल देता है, और अभ्यास ठगा-सा रह जाता है। ज्ञानेश्वर महाराज यहाँ यह चित्र खींच रहे हैं कि इन्द्रियों में ऐसा बल है कि वर्षों की साधना भी एक पल में पीछे छूट जाती है।

और अब सोचिए कि इन्द्रियाँ जब मन को हर ले जाती हैं, तो मन के साथ क्या जाता है? आगे के श्लोक बताएँगे कि विवेक जाता है, याद जाती है, बुद्धि जाती है। इसीलिए यहाँ "हरन्ति" शब्द आया है। चुराया जाना। जो चुरा लिया गया, वह वापस भी पाया जा सकता है, पर पहले पता चलना चाहिए कि चोरी हुई है। गुस्से में सबसे पहले जो चीज़ चुराई जाती है, वह आपकी अपनी समझ है। और आपको उसका चोरी होना तब पता चलता है जब आप सबसे ज़्यादा उसकी ज़रूरत में होते हैं।

तो फिर रास्ता क्या है? इकसठवाँ श्लोक। "तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः। वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।"

उन सब इन्द्रियों को वश में करके योगयुक्त होकर मेरे परायण होकर बैठे। क्योंकि जिसकी इन्द्रियाँ वश में हैं, उसकी बुद्धि स्थिर है।

और यहाँ हमारी अपनी टीका वह बात कहती है जिसके लिए पिछले तीन श्लोक तैयारी कर रहे थे। वो कहती है: यहाँ पहली बार श्रीकृष्ण स्वयं को लक्ष्य बताते हैं। केवल संयम पर्याप्त नहीं, जैसा श्लोक साठ ने दिखाया। वह तभी टिकता है जब मन को टिकने के लिए कुछ ऊँचा मिले। यह पूरी बात इन थोड़े-से शब्दों में है। जो मन को केवल "मत जाओ, मत जाओ" कहकर बाँधना चाहता है, वह थककर हारेगा। मन खाली नहीं रह सकता। उसे कुछ चाहिए जिसे वह थामे। और श्रीकृष्ण कह रहे हैं, उसे मुझे थमा दो।

"मत्परः।" शंकराचार्य इसका अर्थ यों बताते हैं: मैं वासुदेव, जो सबका भीतरी आत्मा हूँ, जिसके लिए सबसे ऊँचा हूँ, वह मत्पर है, कि मुझसे अलग कुछ नहीं। नीलकण्ठ कहते हैं कि मत्पर वह है जिसे स्त्री आदि बाहर की चीज़ों से भी, और शरीर और इन्द्रियों जैसी भीतर की चीज़ों से भी, मैं अधिक प्रिय हूँ। यानी उसका सबसे प्यारा कोई और नहीं रहा। "मैं सबसे अधिक प्रिय हूँ।" यह भक्ति का वह बीज है जो गीता में यहाँ पहली बार दिखता है, और तिलक भी कहते हैं कि "मत्परायण" पद से यहाँ भक्ति-मार्ग का आरम्भ हो जाता है।

मधुसूदन सरस्वती इसे एक बहुत सुंदर लोक-व्यवहार से समझाते हैं। वो कहते हैं कि जैसे दुनिया में किसी बलवान राजा की शरण लेने वाले को लुटेरे नहीं छू पाते, क्योंकि वे जान जाते हैं कि यह राजा के आश्रित है, और तब वे स्वयं उसके वश में हो जाते हैं, वैसे ही जब आदमी सबके भीतर बसे भगवान का आश्रय लेता है, तब दुष्ट इन्द्रियाँ उसी के प्रभाव से वश में आ जाती हैं। देखिए, उपमा वही है जो साठवें श्लोक में थी, लुटेरों की। वहाँ लुटेरे धन उठा ले गए थे, यहाँ उन्हीं लुटेरों के सामने राजा की मुहर लगी है।

रामानुज भी इसे इसी तरह कहते हैं। वो कहते हैं कि जब मन मुझ में लगा रहता है, तो उसके सारे दोष जलकर निर्मल हो जाते हैं, और तब निर्मल मन इन्द्रियों को अपने वश में कर लेता है। वो विष्णु पुराण की एक पंक्ति याद करते हैं, जिसका आशय है कि जैसे हवा के साथ भड़की हुई आग सूखी घास के ढेर को जला देती है, वैसे ही चित्त में बसे विष्णु योगियों के सब दोषों को जला देते हैं। अगर आप इसे गुस्से पर लगाएँ, तो अर्थ यह है कि गुस्से को बुझाने की कोशिश से ज़्यादा काम की बात यह है कि भीतर कोई आग जल रही हो, भगवान की स्मृति की। उसमें गुस्सा भी जल जाता है, और जलाने के लिए ज़ोर नहीं लगाना पड़ता।

ज्ञानेश्वर महाराज इस श्लोक पर एक ऐसी बात कहते हैं जो थोड़ी कठोर है, पर सत्य है। वे कहते हैं कि बाहर के विषय भले न हों, पर यदि मन में कुछ भी बचा है, तो पूरा संसार वहीं है। जैसे विष का एक कण भी खाने पर बहुत हो जाता है और जान ले लेता है, वैसे ही मन में बसी विषयों की ज़रा-सी शंका भी सारे विवेक को नष्ट कर देती है। इसलिए वो कहते हैं कि जो मुझे अपने हृदय में कभी नहीं भूलता, वही योग में टिकता है।

अब इसे अपने जीवन पर उतारिए। रात के दो बजे, जब मन पुराने झगड़े घुमा रहा है, तब आपके पास क्या है जो आपका मन थाम सके? कोई नाम, कोई छोटा-सा मंत्र, श्रीकृष्ण का कोई रूप, कोई पंक्ति जो आप जानते हैं? यह कोई बड़ी साधना नहीं माँगता। इसके लिए कोई गुफ़ा नहीं चाहिए। इसके लिए चाहिए एक ऐसी जगह जो आपने पहले से तैयार रखी हो, जहाँ मन लौट सके। जिस घर में कोई दीया पहले से जल रहा हो, उसमें अँधेरा आने पर भी लौटने की जगह रहती है।

और एक बात। अर्जुन ने दूसरे अध्याय के आरम्भ में ही शरण ली थी। उसी शरण का फल यहाँ दिखता है। जिसने सुनना सीख लिया, उसे अब सँभालने वाला भी मिल गया।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण अब वह बात कहेंगे जिसके लिए ये सारे श्लोक बने हैं। वह कहेंगे कि अगर मन इन्द्रियों के पीछे चला जाए, तो आगे क्या होता है। और वह एक कड़ी है, जिसमें हर मोती अगले को जन्म देता है, और अंत में आदमी अपने ही हाथों से खो जाता है। यही वह श्लोक है जिसके कारण आज का सत्संग है।

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते । सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥ ६२ ॥
गीता 2.62 — अर्थ पढ़ें ›
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः । स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥ ६३ ॥
गीता 2.63 — अर्थ पढ़ें ›

ये वे दो श्लोक हैं जिनके कारण आज का सत्संग है। बासठवाँ और तिरसठवाँ। और मैं चाहता हूँ कि हम इन्हें धीरे-धीरे सुनें, एक-एक कड़ी पर रुककर।

"ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।"

विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उनमें आसक्ति हो जाती है। आसक्ति से कामना उत्पन्न होती है, और कामना से क्रोध।

गुस्सा कहाँ से आता है? यही है उसका जवाब, और यह एक ही साँस में दिया गया है। चार कड़ियाँ हैं, और गुस्सा चौथी है। पहली कड़ी है "ध्यायतो", यानी बार-बार सोचते रहना। दूसरी "सङ्ग", यानी चिपकाव। तीसरी "काम", यानी चाह। और चौथी "क्रोध"।

आचार्य शंकर इसे सीधा रखते हैं: शब्द आदि विषयों को मन में घुमाने वाले पुरुष में उनके प्रति प्रीति पैदा होती है, प्रीति से तृष्णा, और तृष्णा जब कहीं से रुकावट पाती है, तब उससे क्रोध। इस "रुकावट पाने" पर ध्यान दीजिए। हमारी अपनी टीका भी यही कहती है: जब कामना के मार्ग में कोई बाधा आती है, तो उससे क्रोध उपजता है। यह कड़ी केवल चिन्तन से आरम्भ होती है, इसलिए मन की रक्षा सबसे पहले है। यह टीका एक वाक्य में आज का पूरा सत्संग कह देती है। गुस्सा कोई ऐसी चीज़ नहीं जो आसमान से टपकती है। वह किसी चाह के रुक जाने की आवाज़ है, और वह चाह किसी चिन्तन से उगी थी।

मधुसूदन सरस्वती इस कड़ी को और बारीकी से खोलते हैं। वे कहते हैं कि "सङ्ग" वह है जिसमें आदमी बार-बार सोचते हुए मान बैठता है कि ये चीज़ें मेरे बड़े सुख का कारण हैं। इसे वे एक सुंदर भ्रम, "शोभन अध्यास" कहते हैं, यानी चीज़ पर एक सुंदरता लाद देना जो उसमें है नहीं। फिर इस मान्यता से "काम" पैदा होता है: ये सब मेरे हों। और जब कोई उसे रोकता है, तब वह तृष्णा भीतर से जलने लगती है, और वही क्रोध है, "अभिज्वलन", भीतर की जलन।

रामानुज इसमें एक बहुत मार्के की बात जोड़ते हैं, और यही बात मुझे गुस्से का सबसे सच्चा चित्र लगती है। वे कहते हैं कि काम, आसक्ति का पका हुआ रूप है, वह दशा जिसमें आदमी विषय को भोगे बिना रह नहीं सकता। और क्रोध तब पैदा होता है जब वह चाह भीतर बैठी है, पर चीज़ पास नहीं है, और पास में कुछ लोग हैं। तब वह सोचता है कि इन्हीं ने मेरी चाही हुई चीज़ बिगाड़ दी। यानी गुस्सा अक्सर उन पर गिरता है जो पास खड़े हैं। उन पर, जिनका उस चाह से लेना-देना कभी था ही नहीं।

अब इसे अपने जीवन में चलाकर देखिए। एक आदमी किसी रिश्तेदार का नया घर देखकर लौटा है। रास्ते भर वही घर घूमता रहा, उसकी बालकनी, उसकी रसोई। यह चिन्तन है। घर पहुँचकर उसे अपना घर छोटा लगने लगा। यह चिपकाव है, कि वैसा घर मेरे सुख की चीज़ है। रात को वह कहता है कि मेरे पास भी होना चाहिए। यह चाह है। और अगली सुबह पत्नी बस इतना कह देती है कि इस महीने की किश्त भरनी है। और वह फट पड़ता है। पत्नी ने कुछ नहीं बिगाड़ा था। पर चाह रुकी थी, और जो पास खड़ा था, उसी पर वह टूटी। मैं यह उदाहरण अपनी ओर से दे रहा हूँ, पर आप जानते हैं कि हमारे घरों में ऐसे सुबह-सुबह के विस्फोट कैसे बनते हैं। जड़ किश्त में नहीं, तीन दिन पहले के चिन्तन में थी।

और यह कड़ी महाभारत में भी इसी रूप में दिखती है, और वो भी धृतराष्ट्र के अपने शब्दों में। आदि पर्व के आरम्भ में वे सञ्जय को बताते हैं कि दुर्योधन ने राजसूय में पाण्डुपुत्र का वैभव देखा, और सभा में चढ़कर वहाँ के दृश्य देखते समय उसकी हँसी उड़ाई गई। इससे चिढ़कर, पाण्डवों को युद्ध में न जीत पाने के कारण, उसने गान्धार के राजा के साथ मिलकर कपट के जुए की योजना बनाई। देखिए, वही क्रम। देखना और बार-बार सोचना। वैभव पर चिपकाव। चाह। फिर रुकावट, हँसी का वह अपमान, और चिढ़ना। और फिर वही हुआ जो अगली कड़ी कहती है: जुआ, द्रौपदी को सभा में घसीटा जाना, राज्य का छिन जाना। मैं इस कथा को आज केवल दर्पण की तरह रख रहा हूँ। धृतराष्ट्र वही आदमी हैं जो अभी यह गीता सुन रहे हैं, और जिनके अपने बेटे की यह कथा इसमें चल रही है।

और अब तिरसठवाँ श्लोक, जो इस कड़ी को आगे बढ़ाता है, और जिसे सुनकर लोग अक्सर चुप हो जाते हैं। "क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।"

क्रोध से मूढ़ता होती है, मूढ़ता से स्मृति भ्रमित होती है। स्मृति के नष्ट होने से बुद्धि का नाश होता है, और बुद्धि के नाश से वह नष्ट हो जाता है।

यहाँ चार कड़ियाँ और हैं, और हर कड़ी पिछली से गहरी। पहली, "सम्मोह": क्या करना है और क्या नहीं, इसका विवेक चला जाता है। आचार्य शंकर कहते हैं कि क्रोध में आदमी इतना मूढ़ हो जाता है कि वह अपने गुरु को भी गाली दे बैठता है। दूसरी, "स्मृतिविभ्रम": वह याद हिल जाती है जो शास्त्र और गुरु के उपदेश से बनी थी। तीसरी, "बुद्धिनाश": भीतर का वह यंत्र, जो उचित और अनुचित को परखता है, काम के योग्य नहीं रहता। और चौथी, "प्रणश्यति": वह नष्ट हो जाता है।

"स्मृति" शब्द पर हमारी अपनी टीका एक बड़ी साफ़ बात कहती है। वह कहती है कि यहाँ स्मृति का अर्थ है, सीखे हुए उचित-अनुचित का स्मरण। जब क्रोध उसे ढक देता है, तो मनुष्य अपने ही ज्ञान के विरुद्ध काम करता है, और यही उसका पतन है। "अपने ही ज्ञान के विरुद्ध।" यह वाक्य दोबारा सुनिए। गुस्से में आदमी को वह बात पता नहीं होती, ऐसा नहीं। उसे पता है। पर उस पल वह पता कहीं हाथ नहीं आता। जिस आदमी ने सैकड़ों बार सीखा है कि कठोर शब्द बाद में कितने भारी पड़ते हैं, वही उस पल सबसे कठोर शब्द कहता है, और कहते हुए उसे वह सीख याद नहीं आती।

आख़िरी कड़ी, "प्रणश्यति", पर मधुसूदन सरस्वती और आचार्य शंकर एक ही बात कहते हैं, और वह बहुत सोचने की है। वे कहते हैं कि आदमी तभी तक आदमी है जब तक उसका भीतरी यंत्र कर्तव्य और अकर्तव्य को पहचानने के योग्य है। जब वह योग्य नहीं रहा, तब आदमी नष्ट हो चुका है, भले ही वह साँस ले रहा हो। मधुसूदन तो कहते हैं कि दुनिया में जो आदमी किसी भी पुरुषार्थ के योग्य नहीं रहा, उसके बारे में लोग कहते हैं कि वह मर गया। श्रीधर स्वामी इसे और सीधे कहते हैं, कि वह पेड़-पौधों जैसा जड़ हो जाता है, मृतक के समान।

रामानुज इसे साधक की ओर से देखते हैं, और वह मुझे बहुत मार्मिक लगता है। वे कहते हैं कि स्मृति का भंग होने पर वह प्रयत्न भूल जाता है जो उसने इन्द्रियों को जीतने के लिए शुरू किया था। और बुद्धि का नाश होने पर आत्मज्ञान के लिए जो निश्चय उसने किया था, वह नष्ट हो जाता है, और वह फिर संसार में डूब जाता है। यानी वर्षों की साधना, एक गुस्से के सामने, इतनी कमज़ोर।

और ज्ञानेश्वर महाराज इन चारों कड़ियों के लिए चित्र देते हैं, जो सुनकर भूलते नहीं। वे कहते हैं कि जब क्रोध से मूढ़ता प्रकट होती है, तो स्मृति ऐसे बुझती है जैसे तेज़ आँधी में दीया। या जैसे सूर्यास्त के समय रात सूर्य के तेज को निगल लेती है। फिर अज्ञान का अंधापन छा जाता है, और बुद्धि भीतर व्याकुल हो उठती है, जैसे जन्म का अंधा आदमी भागने की नौबत में पड़ जाए, तो घबराकर बेतहाशा इधर-उधर दौड़ता है। वे कहते हैं कि इसके बाद बुद्धि पूरी तरह उलझ जाती है, और जो भी ज्ञान था, जड़ से उखड़ जाता है। और फिर वे वह बात कहते हैं जो पूरी कड़ी का सार है: जैसे एक चिंगारी ईंधन में लगे और बढ़ते-बढ़ते तीनों लोकों को जला सके, वैसे ही विषयों का ध्यान, अगर मन ज़रा-सा भी उसे ढो ले, तो इतने बड़े पतन तक पहुँचा सकता है। चिंगारी। जो आदमी चिंगारी के समय सावधान है, उसे ज्वाला से लड़ना नहीं पड़ता।

अब महाभारत का वो प्रसंग, जिसमें यही बात जीकर दिखाई गई है। वन पर्व में युधिष्ठिर के मुँह से क्रोध के बारे में ऐसी बातें आती हैं जो इन दो श्लोकों के बहुत पास बैठती हैं। पाण्डव वन में हैं। द्रौपदी ने पहले दुर्योधन के बारे में कहा है कि उस दुष्ट का हृदय निश्चय ही लोहे का है, जिसने इन्हें मृगचर्म पहनाकर वन भेज दिया और ज़रा नहीं पछताया। फिर उन्होंने प्रह्लाद और बलि की पुरानी कथा सुनाई, जिसमें प्रह्लाद कहते हैं कि न तो हमेशा क्षमा अच्छी है, न हमेशा तेज। जो सदा क्षमा करता है, उसका तिरस्कार होता है। जो कभी क्षमा नहीं करता, उससे लोग डरते और घृणा करते हैं। समय देखकर कोमल या कठोर होना चाहिए। और द्रौपदी इसी से यह निष्कर्ष निकालती हैं कि हे राजन्, धृतराष्ट्र के पुत्रों के प्रति अब तेज का समय आ गया है।

ध्यान दीजिए, द्रौपदी की बात को हलके में नहीं लिया जा सकता। उनका अपमान सच्चा है, उनका दुःख सच्चा है, और प्रह्लाद की बात भी अपनी जगह ठीक है। वन पर्व कहता है कि युधिष्ठिर ने उनकी बात सुनी और मुस्कुराते हुए उत्तर दिया। वे कहते हैं कि क्रोध मनुष्यों का नाश करता है। उन्नति और अवनति दोनों क्रोध पर टिकी हैं। जो क्रोध को रोकता है, उसकी उन्नति होती है। क्रुद्ध मनुष्य कभी नहीं जानता कि क्या कहना चाहिए और क्या नहीं। क्रोध में वह उन्हें मार सकता है जिन्हें नहीं मारना चाहिए, गुरुजनों को कठोर वचन कह सकता है, और अपने आप को भी यमलोक भेज सकता है। सुनिए, यह वही बात है न जो आचार्य शंकर ने सम्मोह पर कही थी, कि क्रुद्ध आदमी गुरु तक को आक्रोश दे बैठता है। और यह वही है जो तिरसठवें श्लोक में चार कड़ियों में कही गई।

युधिष्ठिर एक बात और कहते हैं जो मुझे इस पूरे प्रसंग की सबसे सुंदर बात लगती है। वे कहते हैं कि सत्य को देखने वाले ज्ञानी उसी को तेजस्वी मानते हैं जो उठे हुए क्रोध को बुद्धि से रोक लेता है। और मूर्ख लोग क्रोध को ही तेज मान लेते हैं। "उठे हुए क्रोध को बुद्धि से रोक लेना।" यही वह जगह है जहाँ कड़ी तोड़ी जा सकती है, बासठवें और तिरसठवें श्लोक के बीच। क्रोध उठ चुका है, पर अभी सम्मोह नहीं आया। बुद्धि अभी साथ है। इसी पल में वह कछुए की तरह समेट सकती है।

और याद रखिए, युधिष्ठिर यहाँ हार नहीं मान रहे। वे यह भी कहते हैं कि बड़े लोग शान्ति की बात करेंगे, और तब राजा राज्य लौटा देंगे। नहीं तो वे अपने लोभ से नष्ट होंगे। और वे कहते हैं कि सुयोधन क्षमा के योग्य नहीं है, इसलिए क्षमा मुझे ही प्राप्त हुई है। यहाँ बात क्षमा या तेज की नहीं है। युधिष्ठिर कर्म से पीछे नहीं हट रहे। वे कह रहे हैं कि जो भी करना हो, क्रोध की आँधी में न किया जाए। और यही वह भेद है जो गीता भी अर्जुन को सिखा रही है, जिसे हमने पिछले सत्संगों में सुना: कर्म करो, पर सम बुद्धि से। श्रीकृष्ण अर्जुन से यह नहीं कहते कि लड़ो मत। वे कहते हैं कि जो करो, वह इस कड़ी के बाहर रहकर करो।

तो अब, इस सारी कथा के बाद, सवाल यह है कि कड़ी में कहाँ पकड़ें। मेरी समझ में, चार जगहें हैं, और हर जगह का अपना औज़ार है, जो आज के श्लोकों में ही दिए गए हैं। पहली जगह, चिन्तन। यहाँ औज़ार है मत्परता, यानी मन को कुछ ऊँचा थमा देना। जो मन दिन भर किसी की बालकनी, किसी की तरक़्क़ी, किसी की बात घुमाता है, उसे आप कछुए की तरह उस चीज़ से समेटकर किसी नाम, किसी पंक्ति की ओर ला सकते हैं। दूसरी जगह, चिपकाव। यहाँ औज़ार है पहचान: यह सोच, कि यह चीज़ मेरे सुख का कारण है, एक सुंदरता है जो मैंने उस पर लादी है। तीसरी जगह, चाह के रुक जाने पर क्रोध का उठना। यहाँ औज़ार है बुद्धि से रोक लेना, उठे हुए क्रोध को पहचानकर, कछुए की चाल से, एक पल पीछे हट जाना। और चौथी जगह, जब सम्मोह आ चुका हो। वहाँ कुछ मत कीजिए, कुछ मत कहिए, जगह छोड़ दीजिए, क्योंकि उस पल आपका भीतरी यंत्र आपके साथ नहीं है।

आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली बात। गुस्सा बीच का मोती है। उसके पीछे लगभग हमेशा कोई चाह या कोई डर खड़ा होता है। अगली बार जब आप फट पड़ें, तो बाद में शांत होकर यह पूछिए कि मैं असल में क्या चाहता था, और वह कहाँ रुका। गुस्सा उस पर कम निकलेगा जिस पर निकल रहा था, और उस चाह की ओर ज़्यादा मुड़ेगा जिसकी वह पुकार थी।

दूसरी बात। इस कड़ी में सबसे पहली कड़ी ही आपके हाथ में है। आप क्या बार-बार सोचते हैं, यह आप काफ़ी हद तक चुन सकते हैं। किसके घर, किसकी तरक़्क़ी, किसके कहे शब्द दिन भर चलाते हैं, यह चुनाव है। और जब गुस्सा उठ चुका हो, तब कछुए की तरह एक पल को समेट लीजिए: फ़ोन नीचे, पानी का एक घूँट, और कुछ न कहना। उस एक पल में आपकी बुद्धि अभी साथ है।

तीसरी बात। स्मृति वही बचती है जो पहले से तैयार रखी हो। गुस्से के पल में आप नई बात नहीं सीख सकते, क्योंकि उस पल सीखा हुआ सब ढक जाता है। इसलिए पहले से एक छोटा-सा ठिकाना बनाकर रखिए, एक नाम, एक मंत्र, श्रीकृष्ण का कोई रूप, और ये चार पंक्तियाँ: चिन्तन, चिपकाव, चाह, क्रोध। आज आपने इन्हें सुना है। यही सुनना कल उस पल की स्मृति बन सकता है।

अगली बार हम इसी अध्याय के आख़िरी हिस्से में पहुँचेंगे। श्रीकृष्ण कहेंगे कि इसी दुनिया में, इन्हीं विषयों के बीच, ऐसे चलने वाला भी है जो राग और द्वेष से मुक्त होकर चलता है, और उसे शांति मिलती है। और वे एक समुद्र की उपमा देंगे, जो हर नदी को अपने में समा लेता है और फिर भी भरा रहता है। वह उपमा आज की कड़ी का जवाब है।

आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आपके जीवन में वह कौन-सा पहला मोती है, जिससे आपका गुस्सा शुरू होता है? कोई बात जो आप बार-बार सोचते हैं, कोई चाह जो अधूरी है, कोई डर जो चुपचाप बैठा है? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्री कृष्ण।

गुस्सा आता है, पर वह पहला नहीं होता। पहला तो वह होता है जिस पर हम बार-बार लौटकर सोचते हैं। वहीं से कड़ी को ढीला किया जा सकता है।

जय श्री कृष्ण।

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते । सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥ ६२ ॥
गीता 2.62 — अर्थ पढ़ें ›

तीन बातें

  1. गुस्सा बीच का मोती है। उसके पीछे लगभग हमेशा कोई चाह या कोई डर खड़ा होता है। अगली बार जब आप फट पड़ें, तो बाद में शांत होकर यह पूछिए कि मैं असल में क्या चाहता था, और वह कहाँ रुका। गुस्सा उस पर कम निकलेगा जिस पर निकल रहा था, और उस चाह की ओर ज़्यादा मुड़ेगा जिसकी वह पुकार थी।
  2. इस कड़ी में सबसे पहली कड़ी ही आपके हाथ में है। आप क्या बार-बार सोचते हैं, यह आप काफ़ी हद तक चुन सकते हैं। किसके घर, किसकी तरक़्क़ी, किसके कहे शब्द दिन भर चलाते हैं, यह चुनाव है। और जब गुस्सा उठ चुका हो, तब कछुए की तरह एक पल को समेट लीजिए: फ़ोन नीचे, पानी का एक घूँट, और कुछ न कहना। उस एक पल में आपकी बुद्धि अभी साथ है।
  3. स्मृति वही बचती है जो पहले से तैयार रखी हो। गुस्से के पल में आप नई बात नहीं सीख सकते, क्योंकि उस पल सीखा हुआ सब ढक जाता है। इसलिए पहले से एक छोटा-सा ठिकाना बनाकर रखिए, एक नाम, एक मंत्र, श्रीकृष्ण का कोई रूप, और ये चार पंक्तियाँ: चिन्तन, चिपकाव, चाह, क्रोध। आज आपने इन्हें सुना है। यही सुनना कल उस पल की स्मृति बन सकता है।