गीता सार - अध्याय 2
गीता 2.39–2.53 · 78 मिनट
नतीजे की चिंता में काम बिगड़ना
एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु ।
बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥ ३९ ॥
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥ ४० ॥
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन ।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥ ४१ ॥
कभी ऐसा हुआ है कि आपने किसी काम में अपनी पूरी मेहनत लगा दी, और उसके बाद नींद की जगह नतीजे की चिंता ने ले ली? इंटरव्यू देकर लौटे हों और फ़ोन हर पाँच मिनट पर देखते रहे हों, किसी बीमार के पास रात भर बैठे हों और मन इसी में अटका रहा हो कि सुबह क्या होगा। और अजीब बात ये है कि इस चिंता से काम में कोई मदद नहीं मिलती। जो होना था वो चिंता करने से पहले ही हो चुका होता है, और जो होना है वो चिंता करने से बदलता नहीं। फिर भी मन उसी में लगा रहता है, और कई बार तो चिंता खुद काम को बिगाड़ने लगती है।
"मेहनत करो और फल की चिंता छोड़ दो।" ये वाक्य हम सबने सैकड़ों बार सुना है, और हर बार सुनकर मन में एक ही सवाल उठा है: कहना आसान है, पर ऐसा होता कैसे है? आज का सत्संग इसी "पर कैसे" का है। क्योंकि गीता में ये बात सिर्फ़ कही नहीं गई, इसे करने का तरीका भी बताया गया है।
जय श्री कृष्ण।
आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का सातवाँ सत्संग है। पिछली बार हमने दूसरे अध्याय का वो हिस्सा सुना था जहाँ श्रीकृष्ण ने कहा, "जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।" यानी जो जन्मा है उसकी मृत्यु निश्चित है, और जो मरा है उसका जन्म निश्चित है, इसलिए जिसे टाला ही नहीं जा सकता, उसके लिए शोक करना उचित नहीं। फिर वो अर्जुन के अपने धर्म की ओर मुड़े, कि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर कल्याणकारी कुछ नहीं, और बिना लड़े लौटने पर अपयश ही मिलेगा। और पिछला हिस्सा जिस श्लोक पर रुका, उसमें एक बीज रखा हुआ था: "सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।" सुख और दुःख को, लाभ और हानि को, जय और पराजय को समान मानकर, तब युद्ध के लिए तैयार हो जाओ, इस तरह तुम्हें पाप नहीं लगेगा। वो बीज आज वृक्ष बनने जा रहा है। जय और पराजय को समान कैसे माना जाए, और ऐसा मानकर कोई काम पूरे मन से कैसे करे, इसी का उत्तर आज के पन्द्रह श्लोकों में है।
पर इससे पहले मैं आपको एक बार फिर धृतराष्ट्र के पास ले चलना चाहता हूँ। क्योंकि ये गीता सञ्जय उन्हीं को सुना रहे हैं, उस समय जब भीष्म बाणों की शय्या पर लेट चुके हैं। महाभारत में लिखा है कि जब सञ्जय युद्धभूमि से लौटकर भीष्म के गिरने की खबर लेकर आए, तब राजा चिंता में डूबे बैठे थे। भीष्म पर्व के तेरहवें अध्याय का दूसरा श्लोक यही कहता है। युद्ध से पहले की एक रात का हाल उद्योग पर्व में लिखा है, और मैं वो आपको लगभग उन्हीं के शब्दों में सुनाता हूँ।
राजा को नींद नहीं आ रही। सञ्जय पाण्डवों के पास से लौटकर उन्हें फटकार गए हैं और कह गए हैं कि कल सभा में युधिष्ठिर का सन्देश सुनाएँगे। धृतराष्ट्र विदुर को बुलवाते हैं, और जब विदुर पहुँचते हैं तो महाभारत लिखता है कि राजा चिंता में खोए हुए थे। फिर वो अपनी हालत खुद बताते हैं। वो कहते हैं, "आज मैं उस कुरुवीर की बात जान नहीं पाया, न जानने का ये ताप मेरे अंगों को जला रहा है, उसी ने मेरी नींद छीन ली है।" और फिर कहते हैं, "सञ्जय के लौटने के बाद से मेरे मन को ठीक से शान्ति नहीं है, मेरी सारी इन्द्रियाँ बिगड़ी हुई हैं, और आज मेरी बस एक ही बड़ी चिंता है: वो क्या कहेगा?" ये उद्योग पर्व का तैंतीसवाँ अध्याय है, श्लोक सात से बारह। ध्यान दीजिए कि इस आदमी के पास महल है, सेना है, सलाहकार हैं, और फिर भी नींद उसके पास नहीं है, क्योंकि उसकी पूरी जान एक सवाल में फँसी है: नतीजा क्या होगा? विदुर उसे बताते हैं कि नींद उन लोगों की उड़ती है जिन पर बलवान ने हमला किया हो, जिनका धन छिन गया हो, जो किसी की चाह में डूबे हों, और चोर की। यानी नींद उन्हीं की जाती है जो किसी ऐसी चीज़ को पकड़कर बैठे हैं जो उनके हाथ में नहीं है।
आज की गीता इसी रात का इलाज है। धृतराष्ट्र के कान में आज वो पड़ने वाला है जो उनके अपने जीवन में कभी नहीं उतरा। और हम, जो आज उसे सुन रहे हैं, हर एक के पास अपनी कोई न कोई जगती हुई रात है।
तो अब पहले श्लोक पर आइए। "एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु। बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि।"
इसका अर्थ है: ये बुद्धि तुम्हें सांख्य के विषय में कही गई, अब इसे योग के विषय में सुनो। हे पार्थ, इस बुद्धि से युक्त होकर तुम कर्मों के बन्धन को छोड़ दोगे। और यही वो श्लोक है जहाँ दूसरे अध्याय की धारा मुड़ती है। इसे ठीक से समझ लेना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि आगे की पूरी गीता इसी मोड़ पर टिकी है।
पहले "सांख्य" शब्द को लीजिए। हमारी अपनी टीका बहुत साफ़ कहती है कि यहाँ सांख्य उस बाद के नाम वाले दर्शन की बात नहीं है। इसका अर्थ है वो आत्मा का ज्ञान जो श्रीकृष्ण ने अभी बताया: कि भीतर रहने वाला न जन्मता है, न मरता है, न मारता है, न मारा जाता है। और "योग" का अर्थ है आसक्ति के बिना कर्म करने की रीति, जो इसी श्लोक से बताई जाने वाली है। टीका ये भी जोड़ती है कि दोनों का लक्ष्य एक ही है, मुक्ति। और जैसा नीलकण्ठ याद दिलाते हैं, श्रीकृष्ण तीसरे अध्याय में खुद कहेंगे कि इस लोक में दो निष्ठाएँ पहले से कही गई हैं, ज्ञानयोग से सांख्यों की और कर्मयोग से योगियों की।
अब सोचिए कि अर्जुन के मन में इस समय क्या चल रहा होगा। श्रीकृष्ण ने उसे समझाया कि आत्मा न मारती है, न मारी जाती है। तो अर्जुन के भीतर तुरन्त सवाल उठ सकता है कि जब सब कुछ आत्मा का खेल है और करने वाला कोई है ही नहीं, तब आप मुझसे लड़ने को क्यों कह रहे हैं? ये सवाल मैं अपनी तरफ़ से नहीं गढ़ रहा। मधुसूदन सरस्वती और नीलकण्ठ, दोनों टीकाकार खुद इस शंका को उठाते हैं, और फिर इसका उत्तर देते हैं। उत्तर ये है कि ज्ञान और कर्म दोनों का उपदेश अलग-अलग अवस्था के लिए है। जिसका मन शुद्ध हो चुका है, उसके लिए ज्ञान की बात है। और जिसका मन अभी उतना साफ़ नहीं हुआ, उसके लिए कर्म ही वो रास्ता है जिससे मन साफ़ होता है। और श्रीधर स्वामी यही बात और सीधी कहते हैं: अगर आत्मा की बात सुनकर भी तुम्हें उसका सीधा अनुभव नहीं हो पाता, तो कर्मयोग वो साधन है जिससे अन्तःकरण शुद्ध होता है और फिर वही ज्ञान भीतर उतरता है।
मुझे इसमें एक बहुत मानवीय बात दिखती है। एक बात का समझ में आना और उसके अनुसार जीना, दो अलग काम हैं। आत्मा अमर है, ये सुनकर भी सोमवार की सुबह दफ़्तर तो जाना ही है। उस सोमवार में, उस चिंता में, ये ज्ञान कैसे काम आए, यही योग का सवाल है। सांख्य बताता है कि सच क्या है, और योग बताता है कि उस सच को हाथ में लेकर काम कैसे किया जाए।
"कर्मबन्धं प्रहास्यसि", तुम कर्मों के बन्धन को छोड़ दोगे। यहाँ एक बारीक बात है। शंकराचार्य कहते हैं कि कर्म ही धर्म और अधर्म नाम का बन्धन है। और तिलक की व्याख्या में इस वाक्य का अर्थ ऐसे आता है कि इस बुद्धि से युक्त होने पर, कर्मों को न छोड़ने पर भी, तुम कर्म का बन्धन छोड़ दोगे। इस पर एक बार ठहरिए। कर्म न छोड़ने पर भी बन्धन छूट जाएगा। एक रस्सी की बात सोचिए। वो हाथ से फिसलती हुई निकल जाए, तो हाथ खाली रहता है। वही रस्सी हाथ पर लिपट जाए, तो हाथ बँध जाता है। रस्सी वही है, काम वही है, फ़र्क पकड़ने के ढंग का है। योग उसी ढंग का नाम है।
संत ज्ञानेश्वर इसके लिए एक सुंदर उपमा देते हैं। वो कहते हैं कि जैसे कोई वज्र का कवच पहन ले, तो शस्त्रों की वर्षा सहकर भी वो जीता-जागता और अछूता बचा रहता है, वैसे ही बुद्धियोग से युक्त मनुष्य को कर्म का बन्धन किसी तरह बाँध नहीं पाता। कर्म की बारिश होती रहेगी। पर उस कवच के भीतर जो है, वो भीगता नहीं।
अब दूसरा श्लोक। "नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते। स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्।"
इस मार्ग में आरम्भ किए प्रयत्न का नाश नहीं होता, और उलटा फल भी नहीं होता। इस धर्म का थोड़ा-सा पालन भी बड़े भय से रक्षा करता है। ध्यान दीजिए कि श्रीकृष्ण ने योग की पहली ही बात में सबसे बड़े डर का जवाब रख दिया। वो डर क्या है? ये कि मैं इतनी मेहनत करूँ और सब बेकार चला जाए।
हमारी टीका इसे बहुत सीधे ढंग से खोलती है। जो अनुष्ठान किसी फल के लिए किए जाते हैं, उनमें किसी अंग में भी चूक हो जाए तो वो निष्फल हो जाते हैं, और कभी-कभी हानि भी कर सकते हैं। पर जो कर्म फल की इच्छा के बिना किया गया, उसमें ये खतरा नहीं है। जितना किया, उतना काम आता है। और यहाँ "बड़ा भय" वही है जो बार-बार जन्म और मृत्यु का भय है। शंकराचार्य इसकी तुलना खेती और दवा से करते हैं: खेती में बीज बो दिया पर सूखा पड़ गया तो सब गया, और दवा की विधि गलत हो जाए तो रोगी को नुकसान भी हो सकता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि यहाँ ऐसा नहीं है। और तिलक यही पढ़ते हैं कि इस जन्म में सिद्धि न मिले, तो भी किया हुआ कर्म व्यर्थ नहीं जाता, वो आगे काम आता है।
संत ज्ञानेश्वर इसमें एक सुंदर बात जोड़ते हैं, कि हृदय में इस बुद्धि का थोड़ा-सा भी प्रकाश हो जाए, तो संसार का सारा भय मिट जाता है। दीया छोटा हो, तो भी अँधेरा उसके पास नहीं टिकता।
अपने जीवन में देखिए। एक विद्यार्थी परीक्षा में असफल हो गया। जो उसने पढ़ा, वो उसकी समझ में रह गया। एक छोटा कारोबार बन्द हो गया, पर उस आदमी ने जो लोगों से बात करना सीखा, हिसाब रखना सीखा, गिरकर उठना सीखा, वो उसके साथ गया। एक नर्स रात भर एक मरीज़ के पास बैठी रही और सुबह वो मरीज़ नहीं बचा। उसने जो सेवा की, वो सेवा खाली नहीं गई। फल की चिंता सबसे ज़्यादा इसी डर से पलती है कि अगर नतीजा हाथ नहीं आया तो सारी मेहनत मिट्टी हो जाएगी। श्रीकृष्ण का उत्तर है कि मेहनत मिट्टी नहीं होती। नतीजा आए या न आए, कर्म का एक अंश भीतर बस जाता है।
अब तीसरा श्लोक। "व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन। बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्।"
हे कुरुनन्दन, इस मार्ग में निश्चयात्मक बुद्धि एक ही होती है। पर अस्थिर विचार वालों की बुद्धियाँ अनेक शाखाओं वाली और अनन्त होती हैं। एक पेड़ की कल्पना कीजिए, जिसकी जड़ एक है, पर शाखाएँ इतनी कि गिनी न जाएँ। शंकराचार्य कहते हैं कि निश्चय करने वाली बुद्धि एक ही होती है, और जिनके पास वो नहीं है, उनकी बुद्धि की शाखाएँ फैलती-फैलती संसार को भी अन्तहीन बना देती हैं। श्रीधर स्वामी समझाते हैं कि निश्चयात्मक बुद्धि का मतलब है एक पक्का भरोसा, कि मैं परमेश्वर की भक्ति से ही तर जाऊँगा। जबकि कामना वालों की इच्छाएँ गिनती में अनन्त हैं, और फिर हर इच्छा के आगे कर्म, गुण और फल के भेद से और शाखाएँ फूटती हैं।
तिलक यहाँ एक बात समझाते हैं जो मुझे बहुत काम की लगी। उनका कहना है कि "बुद्धि" शब्द के दो अर्थ हैं: एक, कार्य और अकार्य का निश्चय करने वाली शक्ति, और दूसरा, वो इच्छा या वासना जो उस निश्चय के बाद मन में उठती है। जिसकी निश्चय करने वाली बुद्धि एक जगह टिकती नहीं, उसके मन में क्षण-क्षण में नई-नई वासनाएँ उठती रहती हैं।
अब इसे नतीजे की चिंता से जोड़कर देखिए, क्योंकि यही आज की हमारी बात है। जब आप किसी काम के बीच में हों, और मन में एक साथ दस आवाज़ें चल रही हों कि अगर ये न हुआ तो क्या होगा, वो न हुआ तो क्या कहेंगे, उसने ऐसा कहा तो क्या करूँगा, तो ये ही बुद्धि की शाखाएँ हैं। हर "अगर" एक नई शाखा है। और काम करने वाला एक ही है, इन सब शाखाओं में बँटा हुआ। नतीजा ये होता है कि जो ध्यान काम में लगना था, वो उन शाखाओं में बँट जाता है। काम की कुल ताक़त इस बात पर नहीं टिकती कि आपके पास कितनी ताक़त है, इस पर टिकती है कि उसमें से कितनी उस समय काम पर लगी हुई है।
इसके लिए मुझे महाभारत की एक घटना याद आती है, और ये हमारे श्लोक से इतनी मिलती है कि जैसे इसी के लिए लिखी गई हो। आदि पर्व में लिखा है कि जब द्रोणाचार्य ने राजकुमारों की परीक्षा लेनी चाही, तो उन्होंने कारीगरों से एक नकली चिड़िया बनवाई और उसे पेड़ की चोटी पर रखवा दिया, राजकुमारों को बिना बताए। फिर उन्होंने कहा कि धनुष लेकर निशाना साधो, और जब मैं कहूँ, तब उसका सिर गिरा दो। सबसे पहले उन्होंने युधिष्ठिर को बुलाया। जब युधिष्ठिर धनुष खींचे खड़े थे, तो द्रोण ने पूछा, "क्या तुम पेड़ की चोटी पर बैठी चिड़िया को देखते हो?" युधिष्ठिर बोले, "हाँ।" फिर पूछा, "क्या तुम इस पेड़ को, मुझे या अपने भाइयों को भी देखते हो?" युधिष्ठिर ने बार-बार कहा कि हाँ, मैं पेड़ को भी देखता हूँ, आपको भी, भाइयों को भी, और चिड़िया को भी। द्रोण अप्रसन्न से हुए और बोले, "हट जाओ, तुम इस निशाने को नहीं भेद सकते।" फिर दुर्योधन और बाकी धृतराष्ट्र-पुत्रों से, और भीम और बाकी शिष्यों से भी वही सवाल हुआ। सबने कहा, "हम तो सब कुछ देखते हैं," और सब डाँटे गए। ये आदि पर्व के एक सौ बयालीसवें अध्याय के अठहत्तर से नवासी श्लोक तक की बात है। और जब अर्जुन की बारी आई, तो द्रोण ने वही पूछा। अर्जुन ने कहा, "मैं केवल चिड़िया को देखता हूँ। न पेड़ को, न आपको।" द्रोण ने फिर पूछा कि क्या दिखता है, तो अर्जुन बोले, "मुझे चिड़िया का सिर दिखता है, उसका शरीर नहीं।" तब द्रोण के रोंगटे खड़े हो गए। उन्होंने कहा, "छोड़ो," और अर्जुन ने बिना किसी दुविधा के बाण छोड़कर चिड़िया का सिर काट गिराया। ये आदि पर्व का एक सौ तैंतालीसवाँ अध्याय है, श्लोक एक से दस।
इस कहानी में मैं कोई उपदेश नहीं जोड़ना चाहता। सिर्फ़ देखिए कि द्रोण ने जिस आँख को ढूँढा, वो एक ही चीज़ देखने वाली आँख थी, जिसके सामने पेड़ भी, गुरु भी, भाई भी ओझल हो जाएँ। और ताकि कहानी का गलत अर्थ न निकले, एक बात साफ़ कर दूँ। युधिष्ठिर में कोई कमी नहीं थी। उसी अध्याय में महाभारत उन्हें रथ पर लड़ने वालों में सबसे श्रेष्ठ कहता है। उनकी नज़र पूरे दृश्य को देख रही थी, और एक राजा के लिए पूरा दृश्य देखना भी बड़ा गुण है। मगर उस क्षण का काम एक निशाना भेदना था, और उसके लिए ध्यान का एक होना ज़रूरी था। यानी "व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह", वो एक बुद्धि काम की उस घड़ी में चाहिए।
इस कथा को श्लोक के साथ मैंने अपनी ओर से रखा है, महाभारत ने इसे यहाँ नहीं जोड़ा। पर जब आप किसी काम पर बैठते हैं और साथ में बॉस का चेहरा, रिज़ल्ट की तारीख़ और बैंक का बैलेंस भी देख रहे होते हैं, तो आपकी दशा पेड़, गुरु और भाइयों वाली है। ये कोई दोष नहीं, मन का स्वभाव ही पूरा दृश्य देखना है। श्रीकृष्ण बस इतना कह रहे हैं कि जब काम करना हो, तो उस घड़ी बुद्धि एक कर लीजिए।
तो इन तीन श्लोकों ने हमें मोड़ दिया सच जानने से सच के साथ जीने की ओर, सबसे बड़े डर का उत्तर दिया कि प्रयत्न व्यर्थ नहीं जाता, और ये पहचान दी कि निश्चय एक होता है जबकि चिंताएँ अनन्त शाखाओं वाली।
पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण अगले तीन श्लोकों में उन लोगों की बात करने वाले हैं जिनके पास बहुत सुंदर शब्द हैं, फूलों जैसे सजे हुए, और जो कहते हैं कि इसके आगे कुछ है ही नहीं। कौन हैं वो लोग? और श्रीकृष्ण उनकी बात इतनी बारीकी से क्यों रखते हैं? सुनिए, अगले श्लोक क्या कहते हैं।
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥ ४२ ॥
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् ।
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥ ४३ ॥
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥ ४४ ॥
इन श्लोकों में उतरने से पहले आपसे एक छोटी-सी बात कहना चाहता हूँ। हम दूसरे अध्याय के उस मोड़ पर हैं जहाँ गीता का केंद्रीय विचार पहली बार सामने आने वाला है, और वो अगले ही श्लोकों में खुलेगा। पर आधा सुना हुआ सत्य भ्रम बन जाता है। जो आदमी यहीं उठ जाएगा, उसके हाथ में "फल की चिंता मत करो" वाला वाक्य तो रह जाएगा, पर ये नहीं रहेगा कि उसे जिया कैसे जाता है, और बिना जिए वो वाक्य एक नई चिंता बन जाता है। तो अगर आप ये सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि ये यात्रा बीच में न टूटे। और आज का हिस्सा आख़िर तक सुनिए।
अब आइए, बयालीसवें श्लोक पर। "यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः। वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः।"
श्रीकृष्ण कहते हैं: हे पार्थ, कम समझ वाले लोग फूलों जैसी सजी हुई बातें करते हैं। वे वेद के वचनों में ही उलझे रहते हैं और कहते हैं कि इसके आगे कुछ नहीं है। इस श्लोक को सुनकर पहले एक बात साफ़ कर लें, क्योंकि यहाँ बहुत लोग ठोकर खाते हैं। श्रीकृष्ण वेद का खण्डन नहीं कर रहे। हमारी टीका इस पर ज़ोर देकर कहती है कि श्लोक बयालीस से चौवालीस तक एक ही वाक्य हैं, और वे वेद को नहीं नकारते। वे उस बात को नकारते हैं कि वेद के फल बताने वाले वचन ही पूरा वेद हैं, जिसके कारण मन कामनाओं में बिखरा रहता है। यानी निशाना वेद नहीं है। निशाना वो नज़र है जो वेद के एक हिस्से को पूरा समझ बैठती है।
अब देखिए कि टीकाकार "फूलों जैसी सजी हुई वाणी" को कैसे समझाते हैं। शंकराचार्य कहते हैं कि जैसे फूलों से लदा पेड़ दूर से बहुत सुंदर लगता है, वैसे ही ये वाणी सुनने में रमणीय है। श्रीधर स्वामी इसे और तीखा करके कहते हैं कि जैसे कोई विषैली लता, जो देखने में पहले मनोहर लगती है। मधुसूदन सरस्वती इसे पलाश के खिले हुए पेड़ से जोड़ते हैं, जो पहली नज़र में सुहाना है। और तीनों टीकाकार उदाहरण के रूप में वेद के वो वचन गिनाते हैं जो फल का वादा करते हैं। जैसे ये कि जो चातुर्मास्य यज्ञ करता है, उसका पुण्य कभी नहीं घटता। या ये कि हमने सोम पिया और हम अमर हो गए। मैं इनके शब्द नहीं पढ़ूँगा, पर आप देखिए कि इनमें से हर वाक्य एक वादा है: ये करो, तो ये मिलेगा।
अब सोचिए कि श्रीकृष्ण ये बात यहाँ क्यों रख रहे हैं। अर्जुन ने इसी अध्याय के सातवें श्लोक में कहा था कि मुझे वो बताइए जो निश्चित रूप से कल्याणकारी हो। और श्रीकृष्ण उसे योग की बुद्धि समझा रहे हैं, कि कर्म करो पर फल पर अधिकार मत मानो। ऐसे में एक स्वाभाविक सवाल उठता है, जिसे श्रीधर स्वामी ने खुद उठाया है: अगर स्वर्ग जैसा फल ही परम नहीं है, तो वेद इतने कर्म उसी फल के लिए क्यों बताते हैं? इसका सीधा उत्तर अगले ही श्लोक में आएगा। उससे पहले ये तीन श्लोक उन लोगों की पहचान कराते हैं जिनके लिए वो वाणी बनी है और जिन्हें वो बाँध लेती है।
तैंतालीसवाँ श्लोक। "कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्। क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति।"
वे कामनाओं से भरे और स्वर्ग को ही परम मानने वाले हैं। उनकी वाणी भोग और ऐश्वर्य पाने के लिए अनेक विशेष क्रियाओं से भरी है, और कर्मों के फल के रूप में जन्म देने वाली है। यहाँ भी देखिए कि भाषा कितनी संयत है। श्रीकृष्ण किसी को बुरा नहीं कह रहे। वो बस एक पहचान बता रहे हैं: ये वो लोग हैं जिनका केंद्र कामना है, जिनका लक्ष्य स्वर्ग है, और जिनके कर्म भोग और ऐश्वर्य की ओर जाते हैं।
शंकराचार्य इसका अर्थ यों खोलते हैं कि कर्म का फल जन्म ही है। जब वाणी ऐसे कर्म सिखाती है जिनसे स्वर्ग, पशु और पुत्र मिलें, तो हर फल के साथ अगला जन्म भी जुड़ा आता है, और इसी तरह संसार का चक्र चलता रहता है। मधुसूदन सरस्वती इसे एक पानी खींचने वाले रहट की तरह देखते हैं, जिसमें जन्म, उससे कर्म, कर्म से फल, फल से फिर जन्म, ये कड़ी बिना रुके घूमती रहती है।
तो ये कोई बुराई की सूची नहीं है। आगे तीसरे अध्याय में श्रीकृष्ण स्वयं यज्ञ की बड़ी महिमा कहेंगे, इसलिए यज्ञ से कोई बैर यहाँ है ही नहीं। ये एक सच्चा नक्शा है: कर्मकाण्ड का मार्ग कामना से चलता है, कामना से फल मिलता है, फल भोगा जाता है, और भोग के बाद फिर नई कामना उठती है। मनुष्य के जीवन में भी यही चक्र है। एक पद मिल गया, तो अब अगला पद। घर बन गया, तो अब बड़ा घर। और हर बार मन कहता है कि इस बार जो मिलेगा, उसके बाद चैन होगा।
चौवालीसवाँ श्लोक। "भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्। व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते।"
जो भोग और ऐश्वर्य में आसक्त हैं और उस वाणी से जिनका चित्त हर लिया गया है, उनकी निश्चयात्मक बुद्धि समाधि में स्थिर नहीं होती। "चित्त हर लिया गया।" ये शब्द मुझे बहुत ठीक लगता है। किसी ने आपके चित्त को हरने के लिए आप पर हमला नहीं किया होता। आप खुद अपनी मर्ज़ी से किसी सुंदर वादे के पीछे चलते-चलते अपना चित्त वहीं छोड़ आते हैं। और फिर जब बैठकर किसी एक बात पर मन टिकाना चाहते हैं, तो पाते हैं कि मन तो कहीं और है।
आज भी ऐसी सजी बातें हमें हर रोज़ सुनाई देती हैं: इतना करोगे तो इतने दिन में ये बन जाओगे, ये रास्ता पकड़ो तो इतना कमाओगे। मैं इन्हें गलत नहीं कहता, इनमें से कई सच भी हो सकती हैं। पर ये सब एक ही सुर में बोलती हैं: ये करो, तो वो मिलेगा, और वही अंतिम बात है। जो पूरा दिन ऐसी बातें सुनता रहे, उसका मन कर्म में नहीं, उसके परिणाम में लटका रहता है, और जब परिणाम नहीं आता तो मन टूट जाता है।
और ये बात हमारे अपने अनुभव से परखी जा सकती है: जिसका मन किसी वादे ने हर लिया है, वो समाधि में तो दूर, किसी एक काम में भी नहीं टिक पाता।
तो इन तीन श्लोकों से हमने क्या समझा? पहला, कि श्रीकृष्ण वेद का तिरस्कार नहीं कर रहे, वे वेद के फल-वचनों को ही पूरा वेद मान लेने की भूल बता रहे हैं। दूसरा, कि ऐसे वादों से लदी हुई वाणी मन को कामनाओं में बाँट देती है। और तीसरा, कि बँटा हुआ मन ही वो है जिसमें निश्चय की एक बुद्धि नहीं टिकती।
पर अभी एक बात बाकी है। अगर वेद का फल-वाला हिस्सा पूरा सच नहीं, तो फिर वेद किस काम के हैं? और अर्जुन को वह क्या करना है, जो कर्मकाण्ड से भी ऊपर है? सुनिए, अगले तीन श्लोकों में श्रीकृष्ण अर्जुन से क्या करने को कहते हैं, और फिर वो श्लोक, जिसमें कर्मयोग के चारों सूत्र एक साथ रख दिए गए हैं।
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥ ४५ ॥
यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके ।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥ ४६ ॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥ ४७ ॥
पिछले तीन श्लोकों में हमने उन लोगों की पहचान की जिनका मन किसी वादे ने हर लिया है। अब श्रीकृष्ण उस सवाल का उत्तर देते हैं जो अभी उठा था: अगर स्वर्ग ही परम फल नहीं, तो वेद इतने कर्म क्यों बताते हैं? पैंतालीसवाँ श्लोक। "त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन। निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्।"
वेद तीनों गुणों के कार्यों का वर्णन करते हैं। हे अर्जुन, तुम तीनों गुणों से ऊपर उठो। द्वन्द्वों से रहित, सदा सत्त्व में स्थित, योगक्षेम की चिन्ता से रहित और आत्मवान् बनो। श्रीधर स्वामी इसका सीधा अर्थ ये करते हैं कि वेद उन लोगों से बात करते हैं जो गुणों से बँधे हैं और फल चाहते हैं, उन्हें उनके फल का रास्ता बताते हैं। अर्जुन को कामना से ऊपर उठना है, और इसके साथ इस श्लोक में चार बातें गिनाई गई हैं।
पहला, द्वन्द्वों से रहित होना। सुख-दुःख, सर्दी-गर्मी, मान-अपमान, ये जोड़े हर दिन आते हैं। श्रीधर स्वामी का अर्थ है कि इन्हें सहो। और ये वही बात है जो हमने दूसरे अध्याय के चौदहवें श्लोक में सुनी थी, कि इन्द्रियों और विषयों के संयोग सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख देते हैं, पर वे आते-जाते हैं और अनित्य हैं। दूसरा, सदा सत्त्व में स्थित होना। मधुसूदन सरस्वती और नीलकण्ठ दोनों कहते हैं कि यहाँ सत्त्व का अर्थ धैर्य है। मधुसूदन समझाते हैं कि जिसके सत्त्व को रजोगुण और तमोगुण ने दबा लिया है, वो सर्दी-गर्मी की पीड़ा से ही सोचने लगता है कि मैं मर जाऊँगा, और अपने धर्म से विमुख हो जाता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि तुम उस घबराहट के नीचे धैर्य को थामे रहो।
तीसरी बात, और आज हमारे लिए सबसे अहम, है "निर्योगक्षेम"। हमारी टीका इसे यों खोलती है: योग का अर्थ है जो नहीं है उसे पाना, और क्षेम का अर्थ है जो है उसकी रक्षा करना। साधक से यह चिन्ता छोड़ने को कहा गया है, संसार छोड़ने को नहीं। ज़रा ठहरकर देखिए कि ये दो शब्द हमारी रोज़ की चिंताओं का कितना सही हिसाब हैं। जो नहीं है, वो कैसे मिले: नौकरी, रिश्ता, मकान, पैसा, बच्चे का दाखिला। और जो है, वो कैसे बचे: नौकरी बनी रहे, सेहत बनी रहे, माँ-बाप बने रहें, इज़्ज़त बनी रहे। हमारी लगभग सारी रात की चिंताएँ इन्हीं दो खानों में आती हैं। और श्रीकृष्ण यहाँ यही चिंता छोड़ने की बात कर रहे हैं।
तब सवाल उठता है कि क्या फिर भूख लगे तो भी कुछ न करें? मधुसूदन सरस्वती खुद ये आपत्ति उठाते हैं, और उत्तर देते हैं कि निर्योगक्षेम का मतलब है मन को बिखेरने वाला संग्रह छोड़ देना, और "कैसे जिऊँगा" की चिंता भी छोड़ देना, क्योंकि सबके भीतर बैठा परमेश्वर ही योगक्षेम को निभाएगा। इसीलिए अन्तिम पद है "आत्मवान्": जिसके पास परमात्मा ध्येय के रूप में भी है और योगक्षेम निभाने वाले के रूप में भी। शंकराचार्य इसका अर्थ सावधान, यानी प्रमाद से रहित, करते हैं। और तिलक कहते हैं कि यहाँ ये शंका उठ सकती है कि कर्मकाण्ड छोड़ देने से निर्वाह कैसे होगा, पर श्रीकृष्ण इसका उत्तर यहाँ नहीं देते। उसका उत्तर उन्होंने नवें अध्याय में रखा है, जहाँ वे स्वयं कहेंगे, "योगक्षेमं वहाम्यहम्", कि जो अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, उन नित्य मुझमें लगे हुए भक्तों का योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ। यानी जो आज एक आज्ञा की तरह कहा जा रहा है, वो आगे चलकर एक वचन बनेगा।
छियालीसवाँ श्लोक। "यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके। तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः।"
सब ओर से जल से भर जाने पर छोटे जलाशय में जितना प्रयोजन रहता है, ज्ञानी ब्राह्मण का सब वेदों में उतना ही प्रयोजन रहता है। हमारी टीका कहती है कि अनुष्ठान जो छोटे-छोटे सुख देने का वचन देते हैं, वे सब आत्मज्ञान के आनन्द में समा जाते हैं, जैसे हर छोटा जलाशय बाढ़ में समा जाता है। यहाँ "ब्राह्मण" का अर्थ है ब्रह्म को जानने वाला। मधुसूदन सरस्वती इसे और सुंदर ढंग से कहते हैं: जैसे पहाड़ के झरने कई तरफ़ से बहकर एक ही ताल में आ मिलते हैं, तो हर झरने से जो काम बनता था, वो उस एक ताल से बन जाता है। उसी तरह छोटे-छोटे आनन्द ब्रह्म के आनन्द के ही अंश हैं।
पर यहाँ भी एक बात बहुत ज़रूरी है, और शंकराचार्य उसे कहना नहीं भूलते। वो कहते हैं कि जब तक कोई ज्ञान में स्थिर होने का अधिकारी नहीं हो जाता, तब तक कुएँ और तालाब जैसा कर्म भी करना ही चाहिए। यानी बाढ़ आने से पहले कुआँ बेकार नहीं है। नीलकण्ठ जोड़ते हैं कि एक जन्म में सारे वेद के सारे कर्म करना किसी के लिए संभव ही नहीं, और ज़रूरी भी नहीं। संत ज्ञानेश्वर कहते हैं कि सूरज उगने पर सारे रास्ते दिखने लगते हैं, पर क्या तुम सारे रास्तों पर चलते हो? और पूरी धरती पानी से भर जाए, तब भी तुम उतना ही लेते हो जितनी तुम्हारी प्यास है।
और अब सैंतालीसवाँ श्लोक। इसे गीता का सबसे जाना-पहचाना श्लोक कहा जा सकता है, और इसी वजह से इसे सबसे ज़्यादा गलत भी समझा गया है। "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।"
तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने का है, उसके फलों का नहीं। तुम कर्मफल के लिए कर्म करने वाले मत बनो, और कर्म न करने में भी तुम्हारी आसक्ति न हो। इस श्लोक के चार अंग हैं, चार चरण, और हमारी टीका उन्हें साफ़ गिनाती है। पहला: कर्म करो। दूसरा: फल पर अधिकार मत मानो। तीसरा: फल की इच्छा को कर्म का कारण मत बनाओ। चौथा: इसे कर्म छोड़ने का बहाना मत बनाओ। तिलक इन चारों को कर्मयोग की चतुःसूत्री कहते हैं, यानी चार सूत्र, जो एक-दूसरे के अर्थ को पूरा करते हैं। हम इन्हें एक-एक करके देखेंगे।
पहला, "कर्मण्येवाधिकारस्ते", तुम्हारा अधिकार कर्म में ही है। शंकराचार्य कहते हैं कि तुम्हारा अधिकार कर्म में है, ज्ञान में स्थिर होने में नहीं। और मधुसूदन सरस्वती इसे ऐसे कहते हैं कि कर्म में तुम्हें ये बोध रहे कि "मुझे ये करना है"। यहाँ "अधिकार" का अर्थ वो है जो आपके हाथ में है, जिस पर आपका बस चलता है। एक किसान के हाथ में क्या है? हल चलाना, बीज डालना, पानी देना, निराई करना। बारिश उसके हाथ में नहीं, बाज़ार का भाव उसके हाथ में नहीं। एक डॉक्टर के हाथ में ऑपरेशन की तैयारी है, उसका हुनर है, उसकी सावधानी है। शरीर का उत्तर उसके हाथ में नहीं। एक विद्यार्थी के हाथ में पढ़ना है, पर पर्चा बनाने वाले का मन और जाँचने वाले का मूड उसके हाथ में नहीं। फल इसलिए दूर नहीं है कि वो बुरा है। वो इसलिए आपका अधिकार नहीं है कि उसके बनने में बहुत सारी चीज़ें शामिल हैं और आप उनमें से सिर्फ़ एक हैं।
दूसरा, "मा फलेषु कदाचन", फलों में कभी नहीं। "कदाचन" का मतलब कभी भी, और मधुसूदन सरस्वती इसे खोलकर कहते हैं कि कर्म से पहले, कर्म करते समय और कर्म के बाद, किसी भी अवस्था में फल पर अपना अधिकार मत मानो। ये बात ध्यान से सुनिए। हम सोचते हैं कि काम से पहले योजना बनाते समय फल को सोचना ठीक है, और काम के बाद उसकी प्रतीक्षा करना भी ठीक है, बस काम के बीच में न सोचें। पर श्रीकृष्ण "कदाचन" कहकर तीनों घड़ियों को छूते हैं। तो क्या योजना भी न बनाएँ? नहीं। योजना बनाना और फल पर अधिकार जताना दो अलग चीज़ें हैं।
इसके लिए मैं आपको विदुर की बात सुनाना चाहता हूँ, उसी रात की, जिसमें धृतराष्ट्र जाग रहे थे। विदुर ने उन्हें जो सलाह दी, उसे उद्योग पर्व के चौंतीसवें अध्याय में पढ़ा जा सकता है। वो कहते हैं कि किसी भी काम को शुरू करने से पहले उसका परिणाम और फल देखो, और अपनी शक्ति भी तौलो, तब निश्चय करो कि करना है या नहीं। जल्दबाज़ी में कुछ मत करो। यह पूरी तैयारी की बात है। और उसी साँस में विदुर ये भी कहते हैं कि जो काम ठीक उपाय से सोच-समझकर किया गया हो और फिर भी न सधे, तो बुद्धिमान आदमी उस पर मन को मुरझाने नहीं देता। श्लोक छह से नौ। यानी महाभारत के भीतर ही विदुर वही दो बातें एक साथ रख देते हैं: काम से पहले खूब सोचो, और काम के बाद जो हाथ से बाहर रह गया, उस पर मन मत गलाओ। गीता यही दोनों बातें, और गहराई में, श्रीकृष्ण के मुँह से कह रही है।
तीसरा चरण है, कर्मफल को ही अपने कर्म का कारण मत बनाओ। शंकराचार्य इसका अर्थ यों करते हैं कि जब फल की तृष्णा से कर्म में लगोगे, तब तुम उसी फल के, यानी जन्म के, कारण बन जाओगे। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं कि फलकामना से कर्म करने वाला उस फल का उत्पन्न करने वाला हेतु बन जाता है, और फिर उसे भोगने के लिए बँध जाता है। मेरी समझ में इसका सरल अर्थ ये है कि कर्म इसलिए करना कि फल मिले, और कर्म इसलिए करना कि वो करने योग्य है, ये दो अलग भाव हैं। दो शिक्षक एक ही कक्षा को एक ही पाठ पढ़ाते हैं। एक इसलिए पढ़ाता है कि इस साल उसकी तरक़्क़ी हो जाए, दूसरा इसलिए कि सामने बैठे बच्चों को बात समझ आ जाए। बाहर से दोनों का पढ़ाना एक-सा दिखेगा। पर पहले के भीतर हर घड़ी एक मीटर चलता है, कि इससे मुझे कितना मिलेगा, और जिस दिन तरक़्क़ी रुकती है, उस दिन उसका पढ़ाना भी ढीला पड़ जाता है। दूसरे के भीतर वो मीटर नहीं है।
और चौथा चरण, जिसके बिना ये पूरा श्लोक गलत पढ़ा जाता है: "मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि", कर्म न करने में भी तुम्हारी आसक्ति न हो। शंकराचार्य बताते हैं कि अगर कर्मफल नहीं चाहिए, तो दुःख वाला कर्म क्यों करें, ऐसी बुद्धि से कर्म न करने में प्रीति नहीं होनी चाहिए। हमारी टीका इसे और सीधा कहती है कि यह अन्तिम अंग सीधे अर्जुन को उत्तर है, जो धनुष रख देना चाहते थे। अर्जुन ने इसी अध्याय के आरम्भ में कहा था कि मैं भिक्षा माँगकर जी लूँगा, और फिर "मैं नहीं लड़ूँगा" कहकर चुप हो गए थे। और श्रीकृष्ण यहाँ वही रास्ता बन्द करते हैं। फल की चिंता छोड़ने का अर्थ ये नहीं कि कोशिश छोड़ दो। बल्कि जो फल की चिंता छोड़ता है, उसके पास कोशिश के लिए ज़्यादा ताक़त बचती है, क्योंकि चिंता में जो ताक़त जाती थी, वो अब काम में आ जाती है।
जो लोग इस श्लोक का मतलब "जो होगा देखा जाएगा" समझ लेते हैं, वे चौथे चरण से बच निकलते हैं। वो वाक्य आधे-अधूरे काम का बहाना बन सकता है, जबकि "कर्मण्येव" का अर्थ है कि अधिकार कर्म में ही है, इसलिए पूरा कर्म करो। और फल की चिंता छोड़ने का अर्थ ये भी नहीं कि लक्ष्य न रखो। लक्ष्य के बिना कोई तीर नहीं छूटता। अर्जुन की आँख में चिड़िया का सिर था, और ये लक्ष्य था। पर उसकी आँख में चिड़िया गिरने के बाद की वाह-वाही नहीं थी। लक्ष्य वो है जिसकी तरफ़ आप निशाना साधते हैं। फल वो है जिसकी तरफ़ आप निशाना साध चुकने के बाद ताकते रहते हैं।
तो आज हमने क्या पाया? पैंतालीसवें में कामना से ऊपर उठने की चार बातें, जिनमें योग और क्षेम की चिंता छोड़ना सबसे बड़ी है। छियालीसवें में दिखा कि छोटे जलाशय बाढ़ में समा जाते हैं, पर कुआँ तब तक काम का है जब तक बाढ़ नहीं आई। और सैंतालीसवें में कर्मयोग के चार सूत्र: कर्म करो, फल पर अधिकार मत मानो, फल को कर्म का कारण मत बनाओ, और कर्म छोड़ने का बहाना मत बनाओ।
पर अभी एक बात बाकी है। हमारा सवाल था "पर कैसे?" और अभी तक हमने "क्या" सुना है। कैसे करें कि फल की चिंता सचमुच छूटे? श्रीकृष्ण अगले ही श्लोक में एक छोटी-सी पहचान देते हैं, जिसे योग का सबसे सरल परिचय कहा जा सकता है: एक ही शब्द में। सुनिए, अगला श्लोक क्या कहता है।
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥ ४८ ॥
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय ।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥ ४९ ॥
पिछले श्लोक में कर्मयोग के चार सूत्र आए थे। अब श्रीकृष्ण अपने "कैसे" का उत्तर देते हैं, और वो उत्तर एक शब्द में है। अड़तालीसवाँ श्लोक। "योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।"
हे धनञ्जय, योग में स्थित होकर कर्म करो। आसक्ति छोड़ो और सफलता-असफलता में समान रहो। यह समता ही योग कहलाती है। देखिए कि श्रीकृष्ण ने अर्जुन को किस नाम से बुलाया है, "धनञ्जय।" विराट पर्व में जब अर्जुन उत्तर कुमार को अपने दस नाम बताते हैं, तो इस नाम का कारण भी खुद कहते हैं। वो कहते हैं, "मैंने सब जनपदों को जीता और सब ओर से धन लिया, और उस धन के बीच खड़ा रहा, इसलिए लोग मुझे धनञ्जय कहते हैं।" ये विराट पर्व के तैंतालीसवें अध्याय का छब्बीसवाँ श्लोक है। यानी जो आदमी धन जीतने के लिए प्रसिद्ध है, उसी से श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि जीत और हार में एक-सा रहना सीखो।
"योग" शब्द को लेकर हम सबके मन में एक तस्वीर है: कोई आँखें बन्द करके बैठा है। पर यहाँ श्रीकृष्ण ने योग की परिभाषा ऐसी दी है जो किसी दफ़्तर में, किसी रसोई में, किसी अस्पताल में भी लागू होती है। योग का अर्थ है समता, सफलता और असफलता में एक-सा रहना। मधुसूदन सरस्वती यहाँ एक बहुत काम की बात कहते हैं। वो याद दिलाते हैं कि दूसरे अध्याय के अड़तीसवें श्लोक में, जो पिछले सत्संग का अन्तिम श्लोक था, सुख-दुःख और जय-पराजय को समान मानने की बात आई थी, और वहाँ वो सिर्फ़ युद्ध के लिए थी। पर यहाँ उसी समता को देखे-अनदेखे सब फलों को छोड़कर, हर कर्म पर लागू कर दिया गया है। बीज वही था, पर अब उसका दायरा बड़ा हो गया।
शंकराचार्य इस श्लोक में एक सूक्ष्म बात देखते हैं। वो कहते हैं कि "सिद्धि" यहाँ केवल धन या विजय नहीं है। फल की तृष्णा के बिना किया गया कर्म मन को शुद्ध करता है, और उसी से ज्ञान की प्राप्ति होती है, और वो भी एक सिद्धि है। उसका उलटा असिद्धि है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि इन दोनों में भी समान रहकर कर्म करो। और वे ये भी जोड़ते हैं कि "ईश्वर मुझसे प्रसन्न हो जाए" की आसक्ति भी छोड़ो। यानी आसक्ति केवल संसार के फल की नहीं, पुण्य और प्रसाद के फल की भी छूटनी है। पर एक छोटा-सा चित्र इसे अपने जीवन में उतार देगा। जो विद्यार्थी अच्छे नम्बर आने पर इतना उछलता है कि अगले महीने की तैयारी भूल जाता है, और कम नम्बर आने पर इतना टूटता है कि पढ़ना छोड़ देता है, उसकी दोनों हालतें एक ही बीमारी की हैं।
संत ज्ञानेश्वर इस पर बहुत कोमल बात कहते हैं। वो कहते हैं कि जो कर्म तुमने शुरू किया, वो अगर भाग्य से पूरा हो जाए, तो उस पर विशेष रूप से खुश मत होना, और अगर किसी कारण से पूरा हुए बिना रुक जाए, तो उस असन्तोष में भड़क मत जाना। फिर कहते हैं कि जितना भी कर्म बन पड़ा, उतना आदिपुरुष को अर्पित कर दो, तो वो अपने आप पूर्ण हो गया। और जो मन कर्म के पूरे होने और न होने में समान रहता है, वही सबसे उत्तम योगस्थिति है। ध्यान दीजिए कि ज्ञानेश्वर "खुश मत होना" भी कहते हैं, सिर्फ़ "दुखी मत होना" नहीं। क्योंकि जो पूरी तरह खुशी में बह जाता है, वो उसी लहर के साथ दुख में भी बह जाएगा।
एक गलतफ़हमी यहाँ ठीक कर दें। समता का मतलब ठण्डापन नहीं है। श्रीकृष्ण अर्जुन से ये नहीं कह रहे कि तुम्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ना चाहिए। अर्जुन को कर्म करना है, पूरी ताक़त से। बेटा परीक्षा देकर लौटे, तो पिता को उसकी फ़िक्र होगी ही, होनी भी चाहिए। फ़र्क पड़ता है, पर वो फ़र्क आपको तोड़ता या उड़ाता नहीं। मैं इसे यों समझता हूँ कि समता नाव के पेंदे का वो वज़न है, जो नाव को लहर के साथ ऊपर-नीचे तो होने देता है, पर पलटने नहीं देता।
उनचासवाँ श्लोक। "दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय। बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः।"
हे धनञ्जय, फल के लिए किया कर्म बुद्धियोग से बहुत निम्न है। उस बुद्धि की शरण लो। फल के लिए कर्म करने वाले दीन हैं। कठोर श्लोक है, पर कठोरता सही जगह पर है। तिलक इसके "बुद्धि" शब्द पर बहुत ज़ोर देते हैं, और बताते हैं कि यहाँ बुद्धि का अर्थ समत्वबुद्धि है। उनकी एक बात मुझे बहुत गहरी लगी: किसी भी कर्म की भलाई-बुराई कर्म पर नहीं टिकी होती। कर्म एक ही क्यों न हो, करने वाले की बुद्धि के अनुसार वो शुभ या अशुभ हो जाता है। एक ही दवा दो हाथों में, एक ही चाकू दो हाथों में, दो अलग कर्म बन जाते हैं।
शंकराचार्य कहते हैं कि फल की इच्छा से किया कर्म इसलिए निचला है कि वो जन्म-मरण का कारण बनता है, और "बुद्धि में शरण" का अर्थ है समता की उस बुद्धि को अपना आश्रय बनाना।
अब "कृपण" शब्द। ये शब्द हमें कहीं सुना हुआ लगना चाहिए। दूसरे अध्याय के सातवें श्लोक में अर्जुन ने अपनी हालत के लिए खुद कहा था, "कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः", यानी दीनता के दोष ने मेरे स्वभाव को दबा लिया है। उसी शब्द की जड़ से अब श्रीकृष्ण कहते हैं कि फल के लिए कर्म करने वाले कृपण हैं, दीन हैं। शंकर, श्रीधर और मधुसूदन, तीनों यहाँ उपनिषद् का एक वाक्य याद करते हैं कि जो इस अक्षर को बिना जाने इस लोक से चला जाता है, वो कृपण है। और मधुसूदन सरस्वती इसे एक कंजूस के उदाहरण से समझाते हैं: जैसे एक कंजूस बड़े कष्ट से धन कमाता है और ज़रा-से दिखाई देने वाले सुख के लोभ में दान जैसे बड़े सुख को भोग नहीं पाता, वैसे ही जो आदमी बहुत दुख उठाकर कर्म करता है और छोटे-से फल के लोभ में परम आनन्द से वंचित रह जाता है, वो अपने ही को ठगता है।
मेरे मन में एक तस्वीर बनती है। एक आदमी काम कर रहा है, और उसका एक हाथ काम में लगा है, दूसरा हाथ फैला हुआ है। वो हाथ फल के लिए फैला है। जो काम में नहीं लगा, वो दीन हो जाता है, क्योंकि उसकी पूरी हालत इस पर निर्भर हो गई है कि दूसरे उसकी हथेली पर क्या रखते हैं। श्रीकृष्ण अर्जुन को दीनता से निकालकर इस आदमी की जगह नहीं बैठाना चाहते। वो उसे वो बनाना चाहते हैं जिसके दोनों हाथ काम में लगे हैं।
आपको याद होगा, पहले सत्संगों में हमने सुना था कि श्रीकृष्ण ने एक ओर अपनी नारायणी सेना रखी थी और दूसरी ओर अकेले अपने को, शस्त्र न उठाने वाले को। अर्जुन ने श्रीकृष्ण को चुना, और दुर्योधन पूरी सेना पाकर बहुत प्रसन्न हुआ। आज उस घड़ी को इस एक शब्द के साथ रखकर देखिए। एक ने गिनती चुनी, दूसरे ने शरण। गीता यहाँ उसी को "बुद्धौ शरणमन्विच्छ" कह रही है, बुद्धि की शरण लो, गिनती की नहीं।
तो इन दो श्लोकों में हमने क्या पाया? पहले में योग की परिभाषा, समता: सफलता और असफलता, दोनों में एक-सा। और दूसरे में वो चेतावनी कि फल के लिए किया कर्म बुद्धियोग से बहुत नीचे है, और फल के लिए कर्म करने वाला हाथ फैलाए खड़ा रहता है।
पर अभी एक बात बाकी है। अगर समता ही योग है, तो इसका फल क्या है? और एक बड़ा सवाल: क्या अच्छे और बुरे कर्म, पुण्य और पाप, दोनों छोड़ने की बात कही जा रही है? श्रीकृष्ण अगले श्लोक में एक ऐसी बात कहते हैं जिसे सुनकर पहले चौंक जाना स्वाभाविक है। सुनिए।
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥ ५० ॥
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥ ५१ ॥
पिछले श्लोक के अन्त में मैंने एक बात कही थी, जो सुनकर चौंकाती है। उसे अब सुन लीजिए। पचासवाँ श्लोक। "बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते। तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्।"
बुद्धि से युक्त पुरुष इसी लोक में पुण्य और पाप दोनों को छोड़ देता है। इसलिए योग में लग जाओ। योग ही कर्मों में कुशलता है। "पुण्य और पाप दोनों को छोड़ देता है।" पहली बार सुनने पर ये वाक्य अटपटा लगता है। पाप छोड़ना तो समझ में आता है, पर पुण्य क्यों छोड़ें? शंकराचार्य और मधुसूदन सरस्वती दोनों का उत्तर है कि वह इन्हें अपने मन की शुद्धि और ज्ञान की प्राप्ति के रास्ते से छोड़ता है। यानी जो आदमी सम बुद्धि से कर्म करता है, उसके भीतर न पाप का बोझ जमा होता है, न पुण्य का अभिमान। नीलकण्ठ भी यही कहते हैं कि कर्मयोगी फल को छोड़ता है, इसलिए पुण्य और पाप दोनों के फल का बन्धन उस पर नहीं बनता। मैं इसे यों सुनता हूँ कि वह भले काम करना नहीं छोड़ता। वह भले काम का हिसाब रखना छोड़ता है। "मैंने इतना किया, मुझे इतना मिलना चाहिए", ये बही-खाता बन्द हो जाता है।
सोने की बेड़ी हो या लोहे की, बेड़ी तो बेड़ी ही है। बहुत लोग बुरे कर्म का फल तो नहीं चाहते, पर भले कर्म का फल उन्हें प्यारा लगता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस हिसाब से जो ऊपर उठ गया है, उसके पास न बुरा खाता है, न भला खाता। उसके पास बस काम है।
और फिर वो वाक्य, जो इस श्लोक की जान है: "योगः कर्मसु कौशलम्", योग कर्मों में कुशलता है। हमारी अपनी टीका बहुत सावधानी से इसका अर्थ बताती है। वो कहती है कि यह कुशलता फल पाने की चतुराई नहीं है। यह ऐसे कर्म करने की कला है कि कर्म बाँधे नहीं, और यह समबुद्धि से ही सम्भव है। क्योंकि "कुशलता" शब्द सुनकर हम तुरन्त सोचते हैं कि जो होशियार है, वो ज़्यादा पा लेता है। श्रीकृष्ण का अर्थ ये नहीं है। उनका कुशल वो है जो वही काम करता है जो सब करते हैं, पर उसे वो चोटें नहीं लगतीं जो उसी काम में और लोगों को लग जाती हैं।
शंकराचार्य इसे ऐसे समझाते हैं: कुशलता वह है जिससे वे कर्म भी, जिनका स्वभाव बाँधना है, समता की बुद्धि से अपने आप बाँधना छोड़ देते हैं। श्रीधर स्वामी कहते हैं कि जो कर्म स्वभाव से बाँधने वाले हैं, उन्हीं को ईश्वर की आराधना से मोक्ष की ओर ले जाने की चतुराई ही योग है। और मधुसूदन सरस्वती कहते हैं कि समत्वबुद्धि से किया कर्म, खुद कर्म होकर भी, बुरे कर्मों का क्षय करता है, और यही उसकी महाकुशलता है।
इसके लिए रसोई की एक साधारण-सी तस्वीर काम आती है। रसोई में गर्म कड़ाही उतारनी है। नंगे हाथ से पकड़ेंगे तो हाथ जलेगा। इसलिए कोई कपड़ा लेते हैं। कड़ाही उतर गई, काम हुआ, हाथ भी बच गया। कर्म वह गर्म कड़ाही है। उसे उतारना ही है, क्योंकि सब कुछ उसी पर पकता है। पर उसे पकड़ने के लिए जो कपड़ा चाहिए, वो समता है। जो आदमी गर्म कड़ाही के लिए कपड़ा नहीं ढूँढता, वो या तो काम छोड़ देता है, या हाथ जला लेता है। जो कपड़ा ढूँढ लेता है, वह काम भी करता है और जलता भी नहीं।
संत ज्ञानेश्वर कहते हैं कि चित्त की समता ही योग का सार है, जहाँ मन और बुद्धि एक हो जाते हैं। बाहर से देखें तो इसमें कर्म ही कर्म दिखता है, पर वही कर्म करने से यह योग मिलता है। इसलिए बुद्धियोग में स्थिर हो जाओ और फल के हेतु को मन से हटा दो।
इक्यावनवाँ श्लोक। "कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः। जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्।"
क्योंकि बुद्धि से युक्त ज्ञानी कर्मों से उत्पन्न फल को छोड़कर, जन्म के बन्धन से मुक्त होकर दुःखरहित पद को प्राप्त होते हैं। जो पिछले श्लोक में सिद्धान्त था, वो यहाँ वचन बन जाता है। "अनामय" का अर्थ है जिसमें कोई रोग, कोई पीड़ा न हो। शंकराचार्य कहते हैं कि यह वह पद है जो सब उपद्रवों से रहित है, और वे एक छोटी-सी बात जोड़ते हैं, "जीवन्त एव", यानी जीते-जी। वे जन्म के बन्धन से जीते हुए ही मुक्त हो जाते हैं। ज्ञानेश्वर कहते हैं कि वे कर्म में तो बरतते हैं, पर कर्म के फल को छूते नहीं, उनका आना-जाना मिट जाता है, और वे उस पद को पाते हैं जो रोगरहित है।
इस श्लोक के साथ महाभारत की एक घड़ी मुझे बार-बार याद आती है, और वह इस सत्संग की कहानी से आगे की है। युद्ध पूरा हो चुका है, पाण्डव जीत चुके हैं। शान्ति पर्व के पहले अध्याय में लिखा है कि पाण्डव, विदुर और धृतराष्ट्र जल-अर्पण करके शुद्धि के लिए एक महीने तक नगर के बाहर ठहरे रहे, और व्यास, नारद जैसे ऋषि उनसे मिलने आए। नारद ने युधिष्ठिर से कहा कि तुमने पूरी पृथ्वी जीत ली है, आशा है तुम प्रसन्न हो, और इस समृद्धि को पाकर शोक तुम्हें पीड़ा नहीं देता होगा। और युधिष्ठिर का उत्तर महाभारत में ऐसा है: ये पृथ्वी जीती गई श्रीकृष्ण की भुजा के सहारे, ब्राह्मणों की कृपा से और भीम और अर्जुन के बल से। पर मेरे हृदय में ये महान दुःख सदा बना रहता है कि मैंने अपने बन्धुओं के इस भयंकर विनाश को कराया है। सुभद्रा के पुत्र और द्रौपदी के पुत्रों को मरवाकर, हे भगवन, ये जीत मुझे हार का आकार लगती है। ये शान्ति पर्व के पहले अध्याय के दस से पन्द्रह श्लोक हैं। "जयोऽयमजयाकारो।" जीत, पर हार की शक्ल में। मैं इस पंक्ति को बिना टीका के आपके सामने रखना चाहता हूँ। उस आदमी को वो मिल गया था जो करोड़ों लोग माँगते हैं, और उसने फिर भी कहा कि ये जीत हार का आकार लगती है। फल पा लेना और फल से मुक्त हो जाना, दो अलग बातें हैं।
और इसी से श्रीकृष्ण के वचन का वज़न समझ में आता है। वे ये नहीं कह रहे कि फल पाओगे तो खराब होगा। वे कह रहे हैं कि जो फल को छोड़कर कर्म करता है, वो उस बन्धन से बाहर निकल जाता है जो फल के साथ जुड़ा आता है। उसे जीत मिले या न मिले, उसके पास वह बेचैनी नहीं बचती जो जीतने के बाद भी बची रहती है।
तो कर्मों की कुशलता फल पाने की चतुराई नहीं, बाँधे बिना कर्म करने की कला है, पुण्य और पाप दोनों के हिसाब से ऊपर उठना है और भले काम छोड़ना नहीं है, और इसका फल जीते-जी मिलने वाला वो पद है जो पीड़ा से रहित है।
पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण के इन वचनों को सुनकर एक सवाल हर सुनने वाले के मन में उठता है: ये स्थिति कब आएगी? हम तो रोज़ चिंता में डूबे हैं। कब हमारी बुद्धि इस दलदल से पार होगी? और जब होगी, तब कैसा लगेगा? सुनिए, अगले दो श्लोक यही बताते हैं।
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥ ५२ ॥
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥ ५३ ॥
आख़िरी दो श्लोक उस सवाल का उत्तर देते हैं जो हर सुनने वाले के मन में उठा होगा: ये स्थिति आएगी कब? बावनवाँ श्लोक। "यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति। तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च।"
जब तुम्हारी बुद्धि मोह रूपी दलदल को पार कर जाएगी, तब तुम सुने हुए और सुनने योग्य सब भोगों से वैराग्य को प्राप्त होगे। "यदा", जब। श्रीकृष्ण कोई तारीख़ नहीं देते। मधुसूदन सरस्वती साफ़ कहते हैं कि इसके लिए कोई कालनियम नहीं है कि इतने दिन में मन शुद्ध हो जाएगा। जब मन का वह कालुष्य पार हो जाएगा, तब। यह बात मुझे सहारा देती है, क्योंकि जो रोज़ अभ्यास करके भी पाता है कि मन अब भी डोलता है, वो गिनती करने बैठ जाता है कि इतने दिन हो गए। दलदल पार करने की कोई समय-सीमा नहीं, पर पार होगा।
"मोहकलिल", दलदल या गहन कालुष्य। श्रीधर स्वामी इसे शरीर और उसके सम्बन्धों में "मैं यही हूँ" वाली बुद्धि कहते हैं। और नीलकण्ठ का अर्थ मुझे आज के विषय से सबसे सीधा जुड़ता लगा। वो कहते हैं कि मोह वह व्याकुलता है जो प्रिय के बिछड़ने और अप्रिय के मिलने के ताप से उठती है, और वही बुद्धि पर कीचड़ की तरह जम जाती है। इस पर रुकिए। जिस चिंता की हम आज बात कर रहे हैं, कि जो चाहा है वो मिलेगा या नहीं और जो मिला है वो बचेगा या नहीं, यही तो वह व्याकुलता है। नीलकण्ठ कहते हैं कि यही बुद्धि का दलदल है। और इसे पार करने पर जो मिलता है, उसका नाम है "निर्वेद"।
निर्वेद का अर्थ तिलक के अनुसार ऊब जाना या चाह का न रहना है। नीलकण्ठ इसे ऐसे समझाते हैं: जिस बुद्धि पर मैल जमा है, उसमें बार-बार सुनी बात भी नहीं चमकती, और जब बुद्धि शुद्ध हो जाती है, तब शास्त्र का अर्थ अपने आप चमक उठता है। दोनों हालतों में सुनने की भूख शान्त हो जाती है। मैं इसे यों समझता हूँ कि सुनना एक पुल है, किनारा नहीं। जिस दिन किनारा पैरों के नीचे आ जाता है, उस दिन पुल की ज़रूरत नहीं रहती। और जब तक पुल पर चल रहे हैं, तब तक उसे पूरी निष्ठा से चलना है।
तिरपनवाँ श्लोक। "श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला। समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि।"
सुनी हुई बातों से विचलित तुम्हारी बुद्धि जब समाधि में निश्चल और अचल हो जाएगी, तब तुम योग को प्राप्त होगे। शंकराचार्य कहते हैं कि अनेक साधन और साध्य बताने वाली, कभी करने की और कभी न करने की बातें सुनते-सुनते जो बुद्धि बिखर गई थी, वह जब स्थिर होकर आत्मा में टिक जाएगी, तब योग मिलेगा। नीलकण्ठ बताते हैं कि यहाँ बिखराव कैसा है: आत्मा नित्य है या अनित्य, करने वाली है या नहीं, एक है या अनेक, ऐसे प्रश्न जब बहुत सारी बातें सुनकर संशय में बदल जाते हैं। हम सब इस बिखराव को जानते हैं। इतना सुन लिया, इतना पढ़ लिया, इतने लोगों की इतनी राय सुन ली, और अब भीतर एक शोर है।
"निश्चला" और "अचला", दो शब्द हैं, और मधुसूदन सरस्वती इनका फ़र्क बहुत सुंदर ढंग से बताते हैं। निश्चला वह बुद्धि है जो बिखराव से रहित है, जिसमें विचार इधर-उधर नहीं उछलते। और अचला वह है जिसमें जड़ता भी नहीं है, यानी वो सुस्ती या नींद की तरह रुकी हुई भी नहीं। दो दोष हैं: एक बिखर जाना और दूसरा सुन्न पड़ जाना। और स्थिर बुद्धि में दोनों नहीं होते। और एक जगह वे इसे हवा-रहित जगह में रखे दीपक की तरह बताते हैं, जो न काँपता है, न बुझता है। इस दीपक की उपमा हम आगे छठे अध्याय में फिर देखेंगे। अभी इतना याद रख लीजिए कि फल की चिंता छोड़ने का मतलब बिखर जाना भी नहीं है, और सुन्न पड़ जाना भी नहीं।
तिलक यहाँ सार देते हैं कि तरह-तरह के फल सुनकर जिसकी बुद्धि डोलती है, वह स्थिर नहीं होती, और स्थिर होने पर नया सवाल खुलता है। ठीक यहीं अर्जुन अगला सवाल पूछते हैं, जो अगली बार का हमारा विषय है: "स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव", कि जो ऐसी बुद्धि में स्थित हो गया, उसकी पहचान क्या है, वो कैसे बोलता है, कैसे बैठता है, कैसे चलता है।
तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।
पहली बात। हर काम को दो हिस्सों में बाँट लीजिए: जो मेरे हाथ में है और जो मेरे हाथ में नहीं है। इंटरव्यू से पहले अपनी तैयारी हाथ में है, पैनल का मन नहीं। मरीज़ की सेवा हाथ में है, उसकी देह का उत्तर नहीं। काम शुरू करते समय अपने हिस्से का नाम लीजिए, और काम पूरा होने पर अपने आप से एक वाक्य कहिए: जो मेरे हाथ में था, वह मैंने कर दिया। इस वाक्य के बाद की रात, बिना उत्तर के भी, हल्की होती है। श्रीकृष्ण यही कह रहे हैं: "कर्मण्येवाधिकारस्ते।"
दूसरी बात। समता दोनों तरफ़ साधनी पड़ती है। जीत पर उछलना और हार पर बैठ जाना, दोनों एक ही बीमारी हैं। और समता ठण्डापन नहीं है, न ढील देने का नाम है। चौथा चरण याद रखिए: "मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।" फल की चिंता छोड़ने वाले को पहले से ज़्यादा काम करना चाहिए, क्योंकि चिंता में जो ताक़त जाती थी, वो अब काम में आ गई। खुद से एक बात पूछिए: मेरी राहत इसलिए है कि फल मिल गया, या इसलिए कि मैंने अपना काम पूरा किया? पहली राहत फल के साथ चली जाएगी, दूसरी अपने साथ रहती है।
तीसरी बात। आरम्भ का प्रयत्न व्यर्थ नहीं जाता। "नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति।" आधा किया हुआ काम, अधूरी रह गई कोशिश, वो भी कहीं बस जाती है। इसलिए बड़ी चिंता में छोटे कदम से डरिए मत। और जो डर यह है कि "अगर सब बिगड़ गया तो?", उसके लिए श्रीकृष्ण ने आगे का वचन भी रखा है: "योगक्षेमं वहाम्यहम्।" जिस चिंता को आज छोड़ने को कहा गया है, उसे आगे वे खुद उठाने का वचन देंगे। गीता सुनाए जाने से पहले व्यास ने धृतराष्ट्र से यही कहा था कि जब सब अपने काल की चपेट में हों, तो शोक में मन मत लगाओ। भीष्म पर्व के दूसरे अध्याय का पाँचवाँ श्लोक। पर व्यास ने यह नहीं बताया था कि ऐसा कैसे किया जाए। वह "कैसे" आज श्रीकृष्ण ने दिया।
अगली बार हम वहीं से लौटेंगे जहाँ आज रुके हैं। अर्जुन पूछेंगे कि स्थिर बुद्धि वाले की पहचान क्या है, और उत्तर में श्रीकृष्ण एक ऐसी कड़ी सुनाएँगे जो चाह से शुरू होती है और क्रोध से होती हुई बुद्धि के नाश तक पहुँचती है। और उसे सुनकर शायद आप समझेंगे कि हमारा गुस्सा कहाँ से आता है।
आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आपके जीवन में वो कौन-सा काम है जिसके नतीजे की चिंता में आप आजकल सबसे ज़्यादा जागते हैं? और उसमें आपके हाथ में क्या है, और क्या नहीं है? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्री कृष्ण।
जो आपके हाथ में है, उसे पूरे मन से कीजिए। जो आपके हाथ में नहीं है, उसे उसके हाथ में रहने दीजिए जिसके हाथ में वह है।
जय श्री कृष्ण।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥ ४७ ॥
तीन बातें
- हर काम को दो हिस्सों में बाँट लीजिए: जो मेरे हाथ में है और जो मेरे हाथ में नहीं है। इंटरव्यू से पहले अपनी तैयारी हाथ में है, पैनल का मन नहीं। मरीज़ की सेवा हाथ में है, उसकी देह का उत्तर नहीं। काम शुरू करते समय अपने हिस्से का नाम लीजिए, और काम पूरा होने पर अपने आप से एक वाक्य कहिए: जो मेरे हाथ में था, वह मैंने कर दिया। इस वाक्य के बाद की रात, बिना उत्तर के भी, हल्की होती है। श्रीकृष्ण यही कह रहे हैं: "कर्मण्येवाधिकारस्ते।"
- समता दोनों तरफ़ साधनी पड़ती है। जीत पर उछलना और हार पर बैठ जाना, दोनों एक ही बीमारी हैं। और समता ठण्डापन नहीं है, न ढील देने का नाम है। चौथा चरण याद रखिए: "मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।" फल की चिंता छोड़ने वाले को पहले से ज़्यादा काम करना चाहिए, क्योंकि चिंता में जो ताक़त जाती थी, वो अब काम में आ गई। खुद से एक बात पूछिए: मेरी राहत इसलिए है कि फल मिल गया, या इसलिए कि मैंने अपना काम पूरा किया? पहली राहत फल के साथ चली जाएगी, दूसरी अपने साथ रहती है।
- आरम्भ का प्रयत्न व्यर्थ नहीं जाता। "नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति।" आधा किया हुआ काम, अधूरी रह गई कोशिश, वो भी कहीं बस जाती है। इसलिए बड़ी चिंता में छोटे कदम से डरिए मत। और जो डर यह है कि "अगर सब बिगड़ गया तो?", उसके लिए श्रीकृष्ण ने आगे का वचन भी रखा है: "योगक्षेमं वहाम्यहम्।" जिस चिंता को आज छोड़ने को कहा गया है, उसे आगे वे खुद उठाने का वचन देंगे। गीता सुनाए जाने से पहले व्यास ने धृतराष्ट्र से यही कहा था कि जब सब अपने काल की चपेट में हों, तो शोक में मन मत लगाओ। भीष्म पर्व के दूसरे अध्याय का पाँचवाँ श्लोक। पर व्यास ने यह नहीं बताया था कि ऐसा कैसे किया जाए। वह "कैसे" आज श्रीकृष्ण ने दिया।